भारतकोश
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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

समुद्र देवताका मूर्तिमती नदियोंके साथ संवाद

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समुद्र देवताका मूर्तिमती नदियोंके साथ संवाद

भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इसी प्रकार जो राजा बलमें बढ़े-चढ़े तथा बन्धनमें डालने और विनाश करनेमें समर्थ शत्रुके प्रथम वेगको सिर झुकाकर नहीं सह लेता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १२ ॥
सारासारं बलं वीर्यमात्मनो द्विषतश्च यः।
जानन् विचरति प्राज्ञो न स याति पराभवम् ॥ १३ ॥
जो बुद्धिमान् राजा अपने तथा शत्रुके सार-असार, बल तथा पराक्रमको जानकर उसके अनुसार बर्ताव करता है, उसकी कभी पराजय नहीं होती है ॥ १३ ॥
एवमेव यदा विद्वान् मन्यतेऽतिबलं रिपुम्।
संश्रयेद् वैतसीं वृत्तिमेतत् प्रज्ञानलक्षणम् ॥ १४ ॥
इस प्रकार विद्वान् राजा जब शत्रुके बलको अपनेसे अधिक समझे, तब बेंतका ही ढंग अपना ले; अर्थात् उसके सामने नतमस्तक हो जाय। यही बुद्धिमानीका लक्षण है ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सरित्सागरसंवादे त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सरिताओं और समुद्रका संवादविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥

११४-

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चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ

युधिष्ठिर उवाच

विद्वान् मूर्खप्रगल्भेन मृदुतीक्ष्णेन भारत ।
आक्रुश्यमानः सदसि कथं कुर्यादरिंदम ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**शत्रुदमन भारत! यदि कोई ढीठ मूर्ख मधुर या तीखे शब्दोंमें भरी सभाके बीच किसी विद्वान् पुरुषकी निन्दा करने लगे, तो वह उसके साथ कैसा बर्ताव करे? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

श्रूयतां पृथिवीपाल यथैषोऽर्थोऽनुगीयते ।
सदा सुचेताः सहते नरस्येहाल्पमेधसः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भूपाल! सुनो, इस विषयमें सदासे जैसी बात कही जाती है, उसे बता रहा हूँ। विशुद्ध चित्तवाला पुरुष इस जगत्में सदा ही मूर्ख मनुष्यके कठोर वचनोंको सहन करता है ॥ २ ॥

अरुष्यन् क्रुश्यमानस्य सुकृतं नाम विन्दति ।
दुष्कृतं चात्मनो मर्षी रुष्यत्येवापमार्ष्टि वै ॥ ३ ॥
जो निन्दा करनेवाले पुरुषके ऊपर क्रोध नहीं करता, वह उसके पुण्यको प्राप्त कर लेता है। वह सहनशील मनुष्य अपना सारा पाप उस क्रोधी पुरुषपर ही धो डालता है ॥ ३ ॥

टिट्टिभं तमुपेक्षेत वाशमानमिवातुरम् ।
लोकविद्वेषमापन्नो निष्फलं प्रतिपद्यते ॥ ४ ॥
अच्छे पुरुषको चाहिये कि वह टिटिहरी या रोगीकी तरह टाँय-टाँय करते हुए उस निन्दाकारी पुरुषकी उपेक्षा कर दे। इससे वह सब लोगोंके द्वेषका पात्र बन जायगा और उसके सारे सत्कर्म निष्फल हो जायँगे ॥ ४ ॥

इति संश्लाघते नित्यं तेन पापेन कर्मणा ।
इदमुक्तो मया कश्चित् सम्मतो जनसंसदि ॥ ५ ॥
स तत्र व्रीडितः शुष्को मृतकल्पोऽवतिष्ठते ।
श्लाघन्नश्लाघनीयेन कर्मणा निरपत्रपः ॥ ६ ॥
वह मूर्ख तो उस पापकर्मके द्वारा सदा अपनी प्रशंसा करते हुए कहता है कि मैंने अमुक सम्मानित पुरुषको भरी सभामें ऐसी-ऐसी बातें सुनायीं कि वह लाजसे गड़ गया,

उसका मुख सूख गया और वह अधमरा-सा हो गया, इस प्रकार निन्दनीय कर्म करके वह अपनी प्रशंसा करता है और तनिक भी लजाता नहीं है ।।

उपेक्षितव्यो यत्नेन तादृशः पुरुषाधमः । यद् यद् ब्रूयादल्पमतिस्तत्तदस्य सहेद्बुधः ।। ७ ।। ऐसे नराधमकी यत्नपूर्वक उपेक्षा कर देनी चाहिये। मूर्ख मनुष्य जो कुछ भी कह दे, विद्वान् पुरुषको वह सब सह लेना चाहिये ।। ७ ।।

प्राकृतो हि प्रशंसन् वा निन्दन् वा किं करिष्यति । वने काक इवाबुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम् ।। ८ ।। जैसे वनमें कौआ व्यर्थ ही काँव-काँव किया करता है, उसी तरह मूर्ख मनुष्य भी अकारण ही निन्दा करता है। वह प्रशंसा करे या निन्दा, किसीका क्या भला या बुरा करेगा? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकेगा ।। ८ ।।

यदि वाग्भिः प्रयोगः स्यात् प्रयोगे पापकर्मणः । वागेवार्थो भवेत् तस्य न ह्येवार्थो जिघांसतः ।। ९ ।। यदि पापाचारी पुरुषके कटुवचन बोलनेपर बदलेमें वैसे ही वचनोंका प्रयोग किया जाय तो उससे केवल वाणीद्वारा कलहमात्र होगा। जो हिंसा करना चाहता है, उसका गाली देनेसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा ।। ९ ।।

निषेकं विपरीतं स आचष्टे वृत्तचेष्टया । मयूर इव कौपीनं नृत्यं संदर्शयन्निव ।। १० ।। मयूर जब नाच दिखाता है, उस समय वह अपने गुप्त अंगोंको भी उघाड़ देता है। इसी प्रकार जो मूर्ख अनुचित आचरण करता है वह उस कुचेष्टाद्वारा अपने छिपे हुए दोषोंको प्रकट करता है ।। १० ।।

यस्यावाच्यं न लोकेऽस्ति नाकार्यं चापि किंचन । वाचं तेन न संदध्याच्छुचिः संश्लिष्टकर्मणा ।। ११ ।। संसारमें जिसके लिये कुछ भी कह देना या कर डालना असम्भव नहीं है, ऐसे मनुष्यसे उस भले मनुष्यको बात भी नहीं करनी चाहिये जो अपने सत्कर्मके द्वारा विशुद्ध समझा जाता है ।। ११ ।।

प्रत्यक्षं गुणवादी यः परोक्षे चापि निन्दकः । स मानवः श्ववल्लोके नष्टलोकपरापरः ।। १२ ।। जो सामने आकर गुण गाता है और परोक्षमें निन्दा करता है, वह मनुष्य संसारमें कुत्तेके सामन है। उसके लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं ।। १२ ।।

तादृग्जनशतस्यापि यद् ददाति जुहोति च । परोक्षेणापवादी यस्तं नाशयति तत्क्षणात् ।। १३ ।।

परोक्षमें परनिन्दा करनेवाला मनुष्य सैकड़ों मनुष्योंको जो कुछ दान देता है और होम करता है, उन सब अपने कर्मोंको तत्काल नष्ट कर देता है ।। १३ ।। तस्मात् प्राज्ञो नरः सद्यस्तादृशं पापचेतसम् । वर्जयेत् साधुभिर्वर्ज्यं सारमेयामिषं यथा ।। १४ ।। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह वैसे पापपूर्ण विचारवाले पुरुषको तत्काल त्याग दे। वह कुत्तेके मांसके समान साधु पुरुषोंके लिये सदा ही त्याज्य है ।। परिवादं ब्रुवाणो हि दुरात्मा वै महाजने । प्रकाशयति दोषांस्तु सर्पः फणमिवोच्छ्रितम् ।। १५ ।। जैसे साँप अपने फनको ऊँचा उठाकर प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जनसमुदायमें किसी महापुरुषकी निन्दा करनेवाला दुरात्मा अपने ही दोषोंको प्रकट करता है ।। तं स्वकर्माणि कुर्वाणं प्रतिकर्तुं य इच्छति । भस्मकूट इवाबुद्धिः खरो रजसि सज्जति ।। १६ ।। जो परनिन्दारूप अपना कार्य करनेवाले दुष्ट पुरुषसे बदला लेना चाहता है, वह राखमें लोटनेवाले मूर्ख गदहेके सामन केवल दुःखमें निमग्न होता है ।। १६ ।। मनुष्यशालावृकमप्रशान्तं जनापवादे सततं निविष्टम् । मातङ्गमुन्मत्तमिवोन्नदन्तं त्यजेत तं श्वानमिवातिरौद्रम् ।। १७ ।। जो सदा लोगोंकी निन्दामें ही तत्पर रहता है, वह मनुष्यके शरीररूप घरमें रहनेवाला भेड़िया है। वह सदा अशान्त बना रहता है। मतवाले हाथीके समान चीत्कार करता है और अत्यन्त भयंकर कुत्तेके समान काटनेको दौड़ता है। श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि उसे सदाके लिये त्याग दे ।। १७ ।। अधीरजुष्टे पथि वर्तमानं दमादपेतं विनयाच्च पापम् । अरिव्रतं नित्यमभूतिकामं धिगस्तु तं पापमतिं मनुष्यम् ।। १८ ।। वह मूर्खोंद्वारा सेवित पथपर चलनेवाला है। इन्द्रिय-संयम और विनयसे कोसों दूर है। उसने शत्रुताका व्रत ले रखा है। वह सदा सबकी अवनति चाहता है। उस पापात्मा एवं पापबुद्धि मनुष्यको धिक्कार है ।। १८ ।। प्रत्युच्यमानस्त्वभिभूय एभि- र्निशाम्य मा भूस्त्वमथार्तरूपः । उच्चस्य नीचेन हि सम्प्रयोगं विगर्हयन्ति स्थिरबुद्धयो ये ।। १९ ।।

यदि ऐसे दुष्ट मनुष्य किसीपर आक्रमण करके उसकी निन्दा करने लगें और उसे सुनकर भला मनुष्य उसका उत्तर देनेके लिये उद्यत हो तो उसे रोककर कहे कि तुम दुखी न होओ; क्योंकि स्थिर बुद्धिवाले मनुष्य उच्च पुरुषका नीचके साथ होनेवाले संयोगकी अर्थात् बराबरीकी निन्दा करते हैं।। १९ ।।
क्रुद्धो दशार्धेन हि ताडयेद् वा
स पांसुभिर्वा विकिरेत् तुषैर्वा ।
विवृत्य दन्तांश्च विभीषयेद् वा
सिद्धं हि मूढे कुपिते नृशंसे ।। २० ।।
यदि क्रूर स्वभावका मूर्ख मनुष्य कुपित हो जाय तो वह थप्पड़ मार सकता है, मुँहपर धूल अथवा भूसी झोंक सकता है और दाँत निकालकर डरा सकता है। उसके द्वारा सारी कुचेष्टाएँ सम्भव हैं ।। २० ।।
विगर्हणां परमदुरात्मना कृतां
सहेत यः संसदि दुर्जनान्नरः ।
पठेदिदं चापि निदर्शनं सदा
न वाङ्मयं स लभति किंचिदप्रियम् ।। २१ ।।
जो इस दृष्टान्तको सदा पढ़ता या सुनता रहता है और जो मनुष्य सभामें किसी अत्यन्त दुष्टात्माद्वारा की हुई निन्दाको सह लेता है, वह दुर्जन मनुष्यसे कभी वाणीद्वारा होनेवाले निन्दाजनित किंचिन्मात्र दुःखका भी भागी नहीं होता ।। २१ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि टिट्टिभकं नाम
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें एक सौ चौदहवाँ
अध्याय पूरा हुआ ।। ११४ ।।

११५-

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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः

राजा तथा राजसेवकोंके आवश्यक गुण

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ संशयो मे महानयम् ।
संछेत्तव्यस्त्वया राजन् भवान् कुलकरो हि नः ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले— 'परमबुद्धिमान् पितामह! मेरे मनमें यह एक महान् संशय बना हुआ है। राजन्! आप मेरे उस संदेहका निवारण करें; क्योंकि आप हमारे वंशके प्रवर्तक हैं ॥ १ ॥

पुरुषाणामयं तात दुर्वृत्तानां दुरात्मनाम् ।
कथितो वाक्यसंचारस्ततो विज्ञापयामि ते ॥ २ ॥

तात! आपने दुरात्मा और दुराचारी पुरुषोंके बोलचालकी चर्चा की है; इसलिये मैं आपसे कुछ निवेदन कर रहा हूँ ॥ २ ॥

यद्धितं राज्यतन्त्रस्य कुलस्य च सुखोदयम् ।
आयत्यां च तदात्वे च क्षेमवृद्धिकरं च यत् ॥ ३ ॥
पुत्रपौत्राभिरामं च राष्ट्रवृद्धिकरं च यत् ।
अन्नपाने शरीरे च हितं यत्तद् ब्रवीहि मे ॥ ४ ॥

आप मुझे ऐसा कोई उपाय बताइये जो हमारे इस राज्यतन्त्रके लिये हितकारक, कुलके लिये सुखदायक, वर्तमान और भविष्यमें भी कल्याणकी वृद्धि करनेवाला, पुत्र और पौत्रोंकी परम्पराके लिये हितकर, राष्ट्रकी उन्नति करनेवाला तथा अन्न, जल और शरीरके लिये भी लाभकारी हो ॥ ३-४ ॥

अभिषिक्तो हि यो राजा राष्ट्रस्थो मित्रसंवृतः ।
ससुहृत्समुपेतो वा स कथं रञ्जयेत् प्रजाः ॥ ५ ॥

जो राजा अपने राज्यपर अभिषिक्त हो देशमें मित्रोंसे घिरा हुआ रहता है, तथा जो हितैषी सुहृदोंसे भी सम्पन्न है, वह किस प्रकार अपनी प्रजाको प्रसन्न रखे? ॥ ५ ॥

यो ह्यसत्संग्रहरतिः स्नेहरागबलात्कृतः ।
इन्द्रियाणामनीशत्वादसज्जनबुभूषकः ॥ ६ ॥
तस्य भृत्या विगुणतां यान्ति सर्वे कुलोद्गताः ।
न च भृत्यफलैरर्थैः स राजा सम्प्रयुज्यते ॥ ७ ॥

जो असद् वस्तुओंके संग्रहमें अनुरक्त है, स्नेह और रागके वशीभूत हो गया है और इन्द्रियोंपर वश न चलनेके कारण सज्जन बननेकी चेष्टा नहीं करता, उस राजाके उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए समस्त सेवक भी विपरीत गुणवाले हो जाते हैं। ऐसी दशामें सेवकोंके

रखनेका जो फल धनकी वृद्धि आदि है, उससे वह राजा सर्वथा वंचित रह जाता है॥ ६-७॥ एतन्मे संशयस्यास्य राजधर्मान् सुदुर्विदान् । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या भवान् शंसितुमर्हति ॥ ८ ॥ मेरे इस संशयका निवारण करके आप दुर्बोध राजधर्मोंका वर्णन कीजिये; क्योंकि आप बुद्धिमें साक्षात् बृहस्पतिके समान हैं॥ ८॥ शंसिता पुरुषव्याघ्र त्वन्नः कुलहिते रतः। क्षत्ता चैको महाप्राज्ञो यो नः शंसति सर्वदा ॥ ९ ॥ पुरुषसिंह! हमारे कुलके हितमें तत्पर रहनेवाले आप ही हमें ऐसा उपदेश दे सकते हैं। दूसरे हमारे हितैषी महाज्ञानी विदुरजी हैं, जो हमें सर्वदा सदुपदेश दिया करते हैं॥ ९॥ त्वत्तः कुलहितं वाक्यं श्रुत्वा राज्यहितोदयम् । अमृतस्याव्ययस्येव तृप्तः स्वप्स्याम्यहं सुखम् ॥ १० ॥ आपके मुखसे कुलके लिये हितकारी तथा राज्यके लिये कल्याणकारी उपदेश सुनकर मैं अक्षय अमृतसे तृप्त होनेके समान सुखसे सोऊँगा॥ १०॥ कीदृशाः संनिकर्षस्था भृत्याः सर्वगुणान्विताः। कीदृशैः किं कुलीनैर्वा सह यात्रा विधीयते ॥ ११ ॥ कैसे सर्वगुणसम्पन्न सेवक राजाके निकट रहने चाहिये और किस कुलमें उत्पन्न हुए कैसे सैनिकोंके साथ राजाको युद्धकी यात्रा करनी चाहिये?॥ ११॥ न ह्येको भृत्यरहितो राजा भवति रक्षिता। राज्यं चेदं जनः सर्वस्तत्कुलीनोऽभिकांक्षति ॥ १२ ॥ सेवकोंके बिना अकेला राजा राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि उत्तम कुलमें उत्पन्न सभी लोग इस राज्यकी अभिलाषा करते हैं॥ १२॥

भीष्म उवाच

न च प्रशास्तुं राज्यं हि शक्यमेकेन भारत। असहायवता तात नैवार्थः केचिदप्युत ॥ १३ ॥ लब्धुं लब्धा ह्यपि सदा रक्षितुं भरतर्षभ। यस्य भृत्यजनः सर्वो ज्ञानविज्ञानकोविदः ॥ १४ ॥ हितैषी कुलजः स्निग्धः स राज्यफलमश्नुते ॥ १५ ॥ भीष्मजीने कहा— तात भरतनन्दन! कोई भी सहायकोंके बिना अकेले राज्य नहीं चला सकता। राज्य ही क्या? सहायकोंके बिना किसी भी अर्थकी प्राप्ति नहीं होती। यदि प्राप्ति हो भी गयी तो सदा उसकी रक्षा असम्भव हो जाती है (अतः सेवकों या सहायकोंका

होना आवश्यक है)। जिसके सभी सेवक ज्ञान-विज्ञानमें कुशल, हितैषी, कुलीन और स्नेही हों, वही राजा राज्यका फल भोग सकता है ॥ १३-१५ ॥ मन्त्रिणो यस्य कुलजा असंहार्याः सहोषिताः । नृपतेर्मतिदाः सन्तः सम्बन्धज्ञानकोविदाः ॥ १६ ॥ अनागतविधातारः कालज्ञानविशारदाः । अतिक्रान्तमशोचन्तः स राज्यफलमश्नुते ॥ १७ ॥ जिसके मन्त्री कुलीन, धनके लोभसे फोड़े न जा सकनेवाले, सदा राजाके साथ रहनेवाले, उन्हें अच्छी बुद्धि देनेवाले, सत्पुरुष, सम्बन्ध-ज्ञानकुशल, भविष्यका भलीभाँति प्रबन्ध करनेवाले, समयके ज्ञानमें निपुण तथा बीती हुई बातके लिये शोक न करनेवाले हों, वही राजा राज्यके फलका भागी होता है ॥ १६-१७ ॥ समदुःखसुखा यस्य सहायाः प्रियकारिणः । अर्थचिन्तापराः सत्याः स राज्यफलमश्नुते ॥ १८ ॥ जिसके सहायक राजाके सुखमें सुख और दुःखमें दुःख मानते हों, सदा उसका प्रिय करनेवाले हों और राजकीय धन कैसे बढ़े—इसकी चिन्तामें तत्पर तथा सत्यवादी हों, वह राजा राज्यका फल पाता है ॥ १८ ॥ यस्य नार्तो जनपदः संनिकर्षगतः सदा । अक्षुद्रः सत्यथालम्बी स राजा राज्यभाग्भवेत् ॥ १९ ॥ जिसका देश दुखी न हो तथा सदा समीपवर्ती बना रहे, जो स्वयं भी छोटे विचारका न होकर सदा सन्मार्गका अवलम्बन करनेवाला हो, वही राजा राज्यका भागी होता है ॥ १९ ॥ कोशाख्यपटलं यस्य कोशवृद्धिकरैर्न रैः । आप्तैस्तुष्टैश्च सततं चीयते स नृपोत्तमः ॥ २० ॥ विश्वासपात्र, संतोषी तथा खजाना बढ़ानेका सतत प्रयत्न करनेवाले, खजांचियोंके द्वारा जिसके कोषकी सदा वृद्धि हो रही हो, वही राजाओंमें श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ कोष्ठागारमसंहार्यैराप्तैः संचयतत्परैः । पात्रभूतैरलुब्धैश्च पाल्यमानं गुणी भवेत् ॥ २१ ॥ यदि लोभवश फूट न सकनेवाले, विश्वासपात्र, संग्रही, सुपात्र एवं निर्लोभ मनुष्य अन्नादि भण्डारकी रक्षामें तत्पर हों तो उसकी विशेष उन्नति होती है ॥ २१ ॥ व्यवहारश्च नगरे यस्य कर्मफलोदयः । दृश्यते शंखलिखितः स धर्मफलभाङ् नृपः ॥ २२ ॥ जिसके नगरमें कर्मके अनुसार फलकी प्राप्तिका प्रतिपादन करनेवाले शंख-लिखित मुनिके बनाये हुए न्याय-व्यवहारका पालन होता देखा जाता है, वह राजा धर्मके फलका भागी होता है ॥ २२ ॥

संगृहीतमनुष्यश्च यो राजा राजधर्मवित् । षड्वर्गं प्रतिगृह्णाति स धर्मफलमश्नुते ॥ २३ ॥

जो राजा राजधर्मको जानता और अपने यहाँ अच्छे लोगोंको जुटाकर रखता है तथा अवसरके अनुसार संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव एवं समाश्रय नामक छः गुणोंका उपयोग करता है, वह धर्मके फलका भागी होता है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥

सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा

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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः

सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा

युधिष्ठिर उवाच
(न सन्ति कुलजा यत्र सहायाः पार्थिवस्य तु ।
अकुलीनाश्च कर्तव्या न वा भरतसत्तम ॥)
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! जहाँ राजाके पास अच्छे कुलमें उत्पन्न सहायक नहीं हैं, वहाँ वह नीच कुलके मनुष्योंको सहायक बना सकता है या नहीं? ।।

भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
निदर्शनं परं लोके सज्जानाचरिते सदा ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जो लोकमें सत्पुरुषोंके आचरणके सम्बन्धमें सदा उत्तम आदर्श माना जाता है ॥ १ ॥

अस्यैवार्थस्य सदृशं यच्छ्रुतं मे तपोवने ।
जामदग्न्यस्य रामस्य यदुक्तमृषिसत्तमैः ॥ २ ॥
मैंने तपोवनमें इस विषयके अनुरूप बातें सुनी हैं, जिन्हें श्रेष्ठ महर्षियोंने जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे कहा था ॥ २ ॥

वने महति कस्मिंश्चिदमनुष्यनिषेविते ।
ऋषिर्मूलफलाहारो नियतो नियतेन्द्रियः ॥ ३ ॥
किसी महान् निर्जन वनमें फल-मूलका आहार करके रहनेवाले एक नियमपरायण जितेन्द्रिय महर्षि रहते थे ॥ ३ ॥

दीक्षादमपरः शान्तः स्वाध्यायपरमः शुचिः ।
उपवासविशुद्धात्मा सततं सत्त्वमास्थितः ॥ ४ ॥
वे उत्तम व्रतकी दीक्षा लेकर इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह करते हुए प्रतिदिन पवित्रभावसे वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें लगे रहते थे। उपवाससे उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया था। वे सदा सत्त्वगुणमें स्थित थे ॥ ४ ॥

तस्य संदृश्य सद्भावमुपविष्टस्य धीमतः ।
सर्वे सत्त्वाः समीपस्था भवन्ति वनचारिणः ॥ ५ ॥

एक जगह बैठे हुए उन बुद्धिमान् महर्षिके सद्भावको देखकर सभी वनचारी जीव-जन्तु उनके निकट आया करते थे॥ ५॥ सिंहव्याघ्रगणाः क्रूरा मत्ताश्चैव महागजाः । द्वीपिनः खड्गभल्लूका ये चान्ये भीमदर्शनाः ॥ ६ ॥ क्रूर स्वभाववाले सिंह और व्याघ्र, बड़े-बड़े मतवाले हाथी, चीते, गैंडे, भालू तथा और भी जो भयानक दिखायी देनेवाले जानवर थे, वे सब उनके पास आते थे॥ ६॥ ते सुखप्रश्नदाः सर्वे भवन्ति क्षतजाशनाः । तस्यर्षेः शिष्यवच्चैव न्यग्भूताः प्रियकारिणः ॥ ७ ॥ यद्यपि वे सारे-के-सारे मांसाहारी हिंसक जानवर थे, तो भी उस ऋषिके शिष्यकी भाँति नीचे सिर किये उनके पास बैठते थे, उनके सुख और स्वास्थ्यकी बात पूछते थे और सदा उनका प्रिय करते थे॥ ७॥ दत्त्वा च ते सुखप्रश्नं सर्वे यान्ति यथागतम् । ग्राम्यस्त्वेकः पशुस्तत्रनाजहात् स महामुनिम् ॥ ८ ॥ वे सब जानवर ऋषिसे उनका कुशल-समाचार पूछकर जैसे आते, वैसे लौट जाते थे; परंतु एक ग्रामीण कुत्ता वहाँ उन महामुनिको छोड़कर कहीं नहीं जाता था॥ ८॥ भक्तोऽनुरक्तः सततमुपवासकृशोऽबलः । फलमूलोदकाहारः शान्तः शिष्टाकृतिर्यथा ॥ ९ ॥ वह उन महामुनिका भक्त और उनमें अनुरक्त था; उपवास करनेके कारण दुर्बल एवं निर्बल हो गया था। वह भी फल-मूल और जलका आहार करके रहता, मनको वशमें रखता और साधु-पुरुषोंके समान जीवन बिताता था॥ ९॥ तस्यर्षेरुपविष्टस्य पादमूले महामते । मनुष्यवद्गतो भावो स्नेहबद्धोऽभवद् भृशम् ॥ १० ॥ महामते! उन महर्षिके चरणप्रान्तमें बैठे हुए उस कुत्तेके मनमें मनुष्यके समान भाव (स्नेह) हो गया। वह उनके प्रति अत्यन्त स्नेहसे बँध गया॥ १०॥ ततोऽभ्यायान्महावीर्यो द्वीपी क्षतजभोजनः । स्वार्थमत्यन्तसंतुष्टः क्रूरकाल इवान्तकः ॥ ११ ॥ तदनन्तर एक दिन कोई महाबली रक्तभोजी चीता अत्यन्त प्रसन्न होकर उस कुत्तेको पकड़नेके लिये क्रूर काल एवं यमराजके समान उधर आ निकला॥ ११॥ लेलिह्यमानस्तृषितः पुच्छास्फोटनतत्परः । व्यादितास्यः क्षुधाभुग्नः प्रार्थयानस्तदामिषम् ॥ १२ ॥ वह बारंबार अपने दोनों जबड़े चाटता और पूँछ फटकारता था, उसे प्यास सता रही थी। उसने मुँह फैला रखा था। भूखसे उसकी व्याकुलता बढ़ गयी थी और वह उस कुत्तेका मांस प्राप्त करना चाहता था॥

दृष्ट्वा तं क्रूरमायान्तं जीवितार्थी नराधिप । प्रोवाच श्वा मुनिं तत्र तच्छृणुष्व विशाम्पते ॥ १३ ॥ प्रजानाथ! नरेश्वर! उस क्रूर चीतेको आते देख अपनी प्राणरक्षा चाहते हुए वहाँ कुत्तेने मुनिसे जो कुछ कहा, वह सुनो— ॥ १३ ॥ श्वशत्रुर्भगवन्नेष द्वीपी मां हन्तुमिच्छति । त्वत्प्रसादाद् भयं न स्यादस्मान्मम महामुने ॥ १४ ॥ तथा कुरु महाबाहो सर्वज्ञस्त्वं न संशयः । 'भगवन्! यह चीता कुत्तोंका शत्रु है और मुझे मार डालना चाहता है। महामुने! महाबाहो! आप ऐसा करें, जिससे आपकी कृपासे मुझे इस चीतेसे भय न हो। आप सर्वज्ञ हैं, इसमें संशय नहीं है। (अतः मेरी प्रार्थना सुनकर उसको अवश्य पूर्ण करें)' ॥ १४ १/२ ॥ स मुनिस्तस्य विज्ञाय भावज्ञो भयकारणम् । रुतज्ञः सर्वसत्त्वानां तमैश्वर्यसमन्वितः ॥ १५ ॥ वे सिद्धिके ऐश्वर्यसे सम्पन्न मुनि सबके मनोभावको जाननेवाले और समस्त प्राणियोंकी बोली समझनेवाले थे। उन्होंने उस कुत्तेके भयका कारण जानकर उससे कहा ॥ १५ ॥

मुनिरुवाच

न भयं द्वीपिनः कार्यं मृत्युतस्ते कथंचन । एष श्वरूपरहितो द्वीपी भवसि पुत्रक ॥ १६ ॥ **मुनिने कहा—**बेटा! अपने लिये मृत्युस्वरूप इस चीतेसे तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये। यह लो, तुम अभी कुत्तेके रूपसे रहित चीता हुए जाते हो ॥ १६ ॥ ततः श्वा द्वीपितां नीतो जाम्बूनदनिभाकृतिः । चित्राङ्गो विस्फुरद्दंष्ट्रो वने वसति निर्भयः ॥ १७ ॥ तदनन्तर मुनिने कुत्तेको चीता बना दिया। उसकी आकृति सुवर्णके समान चमकने लगी। उसका सारा शरीर चितकबरा हो गया और बड़ी-बड़ी दाढ़ें चमक उठीं। अब वह निर्भय होकर वनमें रहने लगा ॥ १७ ॥ तं दृष्ट्वा सम्मुखे द्वीपी आत्मनः सदृशं पशुम् । अविरुद्धस्ततस्तस्य क्षणेन समपद्यत ॥ १८ ॥ चीतेने अपने सामने जब अपने ही समान एक पशुको देखा, तब उसका विरोधी भाव क्षणभरमें दूर हो गया ॥ १८ ॥ ततोऽभ्ययान्महारौद्रो व्यादितास्यः क्षुधान्वितः । द्वीपिनं लेलिहद्वक्त्रो व्याघ्रो रुधिरलालसः ॥ १९ ॥ तदनन्तर एक दिन एक महाभयंकर भूखे बाघने उसका रक्त पीनेकी इच्छासे मुँह फैलाकर दोनों जबड़ोंको चाटते हुए उस चीतेका पीछा किया ॥ १९ ॥

व्याघ्रं दृष्ट्वा क्षुधाभुग्नं दंष्ट्रिणं वनगोचरम् । द्वीपी जीवितरक्षार्थमृषिं शरणमेयिवान् ॥ २० ॥ बड़ी-बड़ी दाढ़ोंसे युक्त वनचारी बाघको भूखसे कुटिल भाव धारण किये देख वह चीता अपने जीवनकी रक्षाके लिये पुनः ऋषिकी शरणमें आया ॥ २० ॥

संवासजं परं स्नेहमृषिणा कुर्वता तदा । स द्वीपी व्याघ्रतां नीतो रिपूणां बलवत्तरः ॥ २१ ॥ तब सहवासजनित उत्तम स्नेहका निर्वाह करते हुए महर्षिने चीतेको बाघ बना दिया। अब वह अपने शत्रुओंके लिये अत्यन्त प्रबल हो उठा ॥ २१ ॥

ततो दृष्ट्वा स शार्दूलो नाहनत् तं विशाम्पते । स तु श्वा व्याघ्रतां प्राप्य बलवान् पिशिताशनः ॥ २२ ॥ प्रजानाथ! तदनन्तर वह बाघ उसे अपने समान रूपमें देखकर मार न सका। उधर वह कुत्ता बलवान् बाघ होकर मांसका आहार करने लगा ॥ २२ ॥

न मूलफलभोगेषु स्पृहामप्यकरोत् तदा । यथा मृगपतिर्नित्यं प्रकाङ्क्षति वनौकसः । तथैव स महाराज व्याघ्रः समभवत् तदा ॥ २३ ॥ महाराज! अब तो उसे फल-मूल खानेकी कभी इच्छा ही नहीं होती थी। जैसे वनराज सिंह प्रतिदिन जन्तुओंका मांस खाना चाहता है, उसी प्रकार वह बाघ भी उस समय मांसभोजी हो गया ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कुत्ता और ऋषिका संवादविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)

११७-

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सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः

कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुनः कुत्ता हो जाना

भीष्म उवाच

व्याघ्रश्चोटजमूलस्थस्तृप्तः सुप्तो हतैर्मृगैः ।
नागश्चागात् तमुद्देशं मत्तो मेघ इवोद्धतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वह बाघ अपने मारे हुए मृगोंके मांस खाकर तृप्त हो महर्षिकी कुटीके पास ही सो रहा था। इतनेमें ही वहाँ ऊँचे उठे हुए मेघके समान काला एक मदोन्मत्त हाथी आ पहुँचा ॥ १ ॥

प्रभिन्नकरटः प्रांशुः पद्मी विततकुम्भकः ।
सुविषाणो महाकायो मेघगम्भीरनिःस्वनः ॥ २ ॥
उसके गण्डस्थलसे मदकी धारा चू रही थी। उसका कुम्भस्थल बहुत विस्तृत था। उसके ऊपर कमलका चिह्न बना हुआ था, उसके दाँत बड़े सुन्दर थे। वह विशालकाय ऊँचा हाथी मेघके समान गम्भीर गर्जना करता था ॥ २ ॥

तं दृष्ट्वा कुञ्जरं मत्तमायान्तं बलगर्वितम् ।
व्याघ्रो हस्तिभयात् त्रस्तस्तमृषिं शरणं ययौ ॥ ३ ॥
उस बलाभिमानी मदोन्मत्त गजराजको आते देख वह बाघ भयभीत हो पुनः ऋषिकी शरणमें गया ॥ ३ ॥

ततोऽनयत् कुञ्जरत्वं व्याघ्रं तमृषिसत्तमः ।
महामेघनिभं दृष्ट्वा स भीतो ह्यभवद् गजः ॥ ४ ॥
तब उन मुनिश्रेष्ठने उस बाघको हाथी बना दिया। उस महामेघके समान हाथीको देखकर वह जंगली हाथी भयभीत होकर भाग गया ॥ ४ ॥

ततः कमलषण्डानि शल्लकीगहनानि च ।
व्यचरत् स मुदायुक्तः पद्मरेणुविभूषितः ॥ ५ ॥
तदनन्तर वह हाथी कमलोंके परागसे विभूषित और आनन्दित हो कमलसमूहों तथा शल्लकी लताकी झाड़ियोंमें विचरने लगा ॥ ५ ॥

कदाचिद् भ्रममाणस्य हस्तिनः सम्मुखं तदा ।
ऋषेस्तस्योटजस्थस्य कालोऽगच्छन्निशानिशम् ॥ ६ ॥
कभी-कभी वह हाथी आश्रमवासी ऋषिके सामने भी घूमा करता था। इस तरह उसका कितनी ही रातोंका समय व्यतीत हो गया ॥ ६ ॥

अथाजगाम तं देशं केसरी केसरारुणः । गिरिकन्दरजो भीमः सिंहो नागकुलान्तकः ॥ ७ ॥ तदनन्तर उस प्रदेशमें एक केसरी सिंह आया, जो अपनी केसरके कारण कुछ लाल-सा जान पड़ता था। पर्वतकी कन्दरामें पैदा हुआ वह भयानक सिंह गजवंशका विनाश करनेवाला काल था ॥ ७ ॥

तं दृष्ट्वा सिंहमायान्तं नागः सिंहभयार्दितः । ऋषिं शरणमापेदे वेपमानो भयातुरः ॥ ८ ॥ उस सिंहको आते देख वह हाथी उसके भयसे पीड़ित एवं आतुर हो थर-थर काँपने लगा और ऋषिकी शरणमें गया ॥ ८ ॥

स ततः सिंहतां नीतो नागेन्द्रो मुनिना तदा । वन्यं नागणयत् सिंहं तुल्यजातिसमन्वयात् ॥ ९ ॥ तब मुनिने उस गजराजको सिंह बना दिया। अब वह समान जातिके सम्बन्धसे जंगली सिंहको कुछ भी नहीं गिनता था ॥ ९ ॥

दृष्ट्वा च सोऽभवत् सिंहो वन्यो भयसमन्वितः । स चाश्रमेऽवसत् सिंहस्तस्मिन्नेव महावने ॥ १० ॥ उसे देखकर जंगली सिंह स्वयं ही डर गया। वह सिंह बना हुआ कुत्ता महावनमें उसी आश्रममें रहने लगा ॥ १० ॥

तद्भयात् पशवो नान्ये तपोवनसमीपतः । व्यदृश्यन्त तदा त्रस्ता जीविताकांक्षिणस्तथा ॥ ११ ॥ उसके भयसे जंगलके दूसरे पशु डर गये और अपनी जान बचानेकी इच्छासे तपोवनके समीप कभी नहीं दिखायी दिये ॥ ११ ॥

कदाचित् कालयोगेन सर्वप्राणिविहिंसकः । बलवान् क्षतजाहारो नानासत्त्वभयंकरः ॥ १२ ॥ अष्टपाद्दूर्ध्वनयनः शरभो वनगोचरः । तं सिंहं हन्तुमागच्छन्मुनेस्तस्य निवेशनम् ॥ १३ ॥ तदनन्तर कालयोगसे वहाँ एक बलवान् वनवासी समस्त प्राणियोंका हिंसक शरभ आ पहुँचा, जिसके आठ पैर और ऊपरकी ओर नेत्र थे। वह रक्त पीनेवाला जानवर नाना प्रकारके वन-जन्तुओंके मनमें भय उत्पन्न कर रहा था। वह उस सिंहको मारनेके लिये मुनिके आश्रमपर आया ॥ १२-१३ ॥

(तं दृष्ट्वा शरभं यान्तं सिंहः परभयातुरः । ऋषिं शरणमापेदे वेपमानः कृताञ्जलिः ॥) शरभको आते देख सिंह अत्यन्त भयसे व्याकुल हो काँपता हुआ हाथ जोड़कर मुनिकी शरणमें आया ॥

तं मुनिः शरभं चक्रे बलोत्कटमरिंदम ।
ततः स शरभो वन्यो मुनेः शरभमग्रतः ॥ १४ ॥
दृष्ट्वा बलिनमत्युग्रं द्रुतं सम्प्राद्रवद् वनात् ।
शत्रुदमन युधिष्ठिर! तब मुनिने उसे बलोन्मत्त शरभ बना दिया। जंगली शरभ उस मुनिनिर्मित अत्यन्त भयंकर एवं बलवान् शरभको सामने देखकर भयभीत हो तुरंत ही उस वनसे भाग गया ॥ १४ १/२ ॥
स एवं शरभस्थाने संन्यस्तो मुनिना तदा ॥ १५ ॥
मुनेः पार्श्वगतो नित्यं शरभः सुखमाप्तवान् ।
इस प्रकार मुनिने उस कुत्तेको उस समय शरभके स्थानमें प्रतिष्ठित कर दिया। वह शरभ प्रतिदिन मुनिके पास सुखसे रहने लगा ॥ १५ १/२ ॥
ततः शरभसंत्रस्ताः सर्वे मृगगणास्तदा ॥ १६ ॥
दिशः सम्प्राद्रवन् राजन् भयाज्जीवितकांक्षिणः ।
राजन्! उस शरभसे भयभीत हो जंगलके सभी पशु अपनी जान बचानेके लिये डरके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ १६ १/२ ॥
शरभोऽप्यतिसंहृष्टो नित्यं प्राणिवधे रतः ॥ १७ ॥
फलमूलाशनं कर्तुं नैच्छत् स पिशिताशनः ।
शरभ भी अत्यन्त प्रसन्न हो सदा प्राणियोंके वधमें तत्पर रहता था। वह मांसभोजी जीव फल-मूल खानेकी कभी इच्छा नहीं करता था ॥ १७ १/२ ॥
ततो रुधिरतर्षेण बलिना शरभोऽन्वितः ॥ १८ ॥
इयेष तं मुनिं हन्तुमकृतज्ञः श्वयोनिजः ।
तदनन्तर एक दिन रक्तकी प्रबल प्याससे पीड़ित वह शरभ, जो कुत्तेकी जातिसे पैदा होनेके कारण कृतघ्न बन गया था, मुनिको ही मार डालनेकी इच्छा करने लगा ॥ १८ १/२ ॥
(चिन्तयामास च तदा शरभः श्वानपूर्वकः ।
अस्य प्रभावात् सम्प्राप्तो वाङ्मात्रेण तु केवलम् ॥
शरभत्वं सुदुष्प्रापं सर्वभूतभयङ्करम् ।
उस पहलेके कुत्ते और वर्तमानकालके शरभने सोचा कि इन महर्षिके प्रभावसे—इनके वाणीद्वारा केवल कह देनेमात्रसे मैंने परम दुर्लभ शरभका शरीर पा लिया, जो समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर है ॥
अन्येऽप्यत्र भयत्रस्ताः सन्ति हस्तिभयार्दिताः ॥
मुनिमाश्रित्य जीवन्तो मृगाः पक्षिगणास्तथा ।
तेषामपि कदाचिच्च शरभत्वं प्रयच्छति ॥
सर्वसत्त्वोत्तमं लोके बलं यत्र प्रतिष्ठितम् ।

इन मुनीश्वरकी शरण लेकर जीवन धारण करनेवाले दूसरे भी बहुत-से मृग और पक्षी हैं, जो हाथी तथा दूसरे भयानक जन्तुओंसे भयभीत रहते हैं। सम्भव है, ये उन्हें भी कदाचित् शरभका शरीर प्रदान कर दें, जहाँ संसारके सभी प्राणियोंसे श्रेष्ठ बल प्रतिष्ठित है।।

पक्षिणामप्ययं दद्यात् कदाचिद् गारुडं बलम् ।। यावदन्यस्य सम्प्रीतः कारुण्यं च समाश्रितः । न ददाति बलं तुष्टः सत्त्वस्यान्यस्य कस्यचित् ।। तावदेनमहं विप्रं वधिष्यामि च शीघ्रतः । स्थातुं मया शक्यमिह मुनिघातान्न संशयः ॥)

ये चाहें तो कभी पक्षियोंको भी गरुड़का बल दे सकते हैं। अतः दयाके वशीभूत हो जबतक किसी दूसरे जीवपर संतुष्ट या प्रसन्न हो ये उसे ऐसा ही बल नहीं दे देते, तबतक ही इन ब्रह्मर्षिका मैं शीघ्र वध कर डालूँगा। मुनिका वध हो जानेके पश्चात् मैं यहाँ बेखटके रह सकूँगा, इसमें संशय नहीं है ।।

ततस्तेन तपःशक्त्या विदितो ज्ञानचक्षुषा ।। १९ ।। विज्ञाय स महाप्राज्ञो मुनिः श्वानं तमुक्तवान् ।

ज्ञाननेत्रोंसे युक्त उन मुनीश्वरने अपनी तपःशक्तिसे शरभके उस मनोभावको जान लिया। जानकर उन महाज्ञानी मुनिने उस कुत्तेसे कहा— ।। १९½ ।।

श्वा त्वं द्वीपित्वमापन्नो द्वीपीव्याघ्रत्वमागतः ।। २० ।। व्याघ्रान्नागो मदपटुर्नागः सिंहत्वमागतः । सिंहस्त्वं बलमापन्नो भूयः शरभतां गतः ।। २१ ।।

'अरे! तू पहले कुत्ता था, फिर चीता बना, चीतेसे बाघकी योनिमें आया, बाघसे मदोन्मत्त हाथी हुआ, हाथीसे सिंहकी योनिमें आ गया, बलवान् सिंह रहकर फिर शरभका शरीर पा गया ।। २०-२१ ।।

मया स्नेहपरीतेन विसृष्टो न कुलान्वयः । यस्मादेवमपापं मां पाप हिंसितुमिच्छसि । तस्मात् स्वयोनिमापन्नः श्वैव त्वं हि भविष्यसि ।। २२ ।।

'यद्यपि तू नीच कुलमें पैदा हुआ था, तो भी मैंने स्नेहवश तेरा परित्याग नहीं किया। पापी! तेरे प्रति मेरे मनमें कभी पापभाव नहीं हुआ था, तो भी इस प्रकार तू मेरी हत्या करना चाहता है; अतः तू फिर अपनी पूर्वयोनिमें ही आकर कुत्ता हो जा' ।। २२ ।।

ततो मुनिजनद्वेष्टा दुष्टात्मा प्राकृतोऽबुधः । ऋषिणा शरभः शप्तस्तद्रूपं पुनराप्तवान् ।। २३ ।।

महर्षिके इस प्रकार शाप देते ही वह मुनिजनद्रोही दुष्टात्मा नीच और मूर्ख शरभ फिर कुत्तेके रूपमें परिणत हो गया ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कुत्ता तथा ऋषिका
संवादविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं।)

राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ

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अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः

राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ

भीष्म उवाच

स श्वा प्रकृतिमापन्नः परं दैन्यमुपागतः ।
ऋषिणा हुङ्कृतः पापस्तपोवनबहिष्कृतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार अपनी योनिमें आकर वह कुत्ता अत्यन्त दीनदशाको पहुँच गया। ऋषिने हुंकार करके उस पापीको तपोवनसे बाहर निकाल दिया ॥ १ ॥

एवं राज्ञा मतिमता विदित्वा सत्यशौचताम् ।
आर्जवं प्रकृतिं सत्यं श्रुतं वृत्तं कुलं दमम् ॥ २ ॥
अनुक्रोशं बलं वीर्यं प्रभावं प्रश्रयं क्षमाम् ।
भृत्या ये यत्र योग्याः स्युस्तत्र स्थाप्याः सुरक्षिताः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार बुद्धिमान् राजाको चाहिये कि वह पहले अपने सेवकोंकी सच्चाई, शुद्धता, सरलता, स्वभाव, शास्त्रज्ञान, सदाचार, कुलीनता, जितेन्द्रियता, दया, बल, पराक्रम, प्रभाव, विनय तथा क्षमा आदिका पता लगाकर जो सेवक जिस कार्यके योग्य जान पड़ें, उन्हें उसीमें लगावे और उनकी रक्षाका पूरा-पूरा प्रबन्ध कर दे ॥ २-३ ॥

नापरीक्ष्य महीपालः सचिवं कर्तुमर्हति ।
अकुलीननराकीर्णो न राजा सुखमेधते ॥ ४ ॥
राजा परीक्षा लिये बिना किसीको भी अपना मन्त्री न बनावे; क्योंकि नीच कुलके मनुष्यका साथ पाकर राजाको न तो सुख मिलता है और न उसकी उन्नति ही होती है ॥ ४ ॥

कुलजः प्राकृतो राज्ञा स्वकुलीनतया सदा ।
न पापे कुरुते बुद्धिं भिद्यमानोऽप्यनागसि ॥ ५ ॥
कुलीन पुरुष यदि कभी राजाके द्वारा बिना अपराधके ही तिरस्कृत हो जाय और लोग उसे फोड़ें या उभाड़ें तो भी वह अपनी कुलीनताके कारण राजाका अनिष्ट करनेकी बात कभी मनमें नहीं लाता है ॥ ५ ॥

अकुलीनस्तु पुरुषः प्राकृतः साधुसंश्रयात् ।
दुर्लभैश्वर्यतां प्राप्तो निन्दितः शत्रुतां व्रजेत् ॥ ६ ॥
किंतु नीच कुलका मनुष्य साधुस्वभावके राजाका आश्रय पाकर यद्यपि दुर्लभ ऐश्वर्यका भोग करता है तथापि यदि राजाने एक बार भी उसकी निन्दा कर दी तो वह उसका शत्रु बन