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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर

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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर

अर्जुन उवाच

ब्रह्म यत्परमं ज्ञेयं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।
भवतो हि प्रसादेन सूक्ष्मे मे रमते मतिः ॥ १ ॥

अर्जुन बोले— भगवन्! इस समय आपकी कृपासे सूक्ष्म विषयके श्रवणमें मेरी बुद्धि लग रही है, अतः जाननेयोग्य परब्रह्मके स्वरूपकी व्याख्या कीजिये ॥ १ ॥

वासुदेव उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं मोक्षसंयुक्तं शिष्यस्य गुरुणा सह ॥ २ ॥
कश्चिद् ब्राह्मणमासीनमाचार्यं संशितव्रतम् ।
शिष्यः पप्रच्छ मेधावी किंस्विच्छ्रेयः परंतप ॥ ३ ॥
भगवन्तं प्रपन्नोऽहं निःश्रेयसपरायणः ।
याचे त्वां शिरसा विप्र यद् ब्रूयां ब्रूहि तन्मम ॥ ४ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— अर्जुन! इस विषयको लेकर गुरु और शिष्यमें जो मोक्षविषयक संवाद हुआ था, वह प्राचीन इतिहास बतलाया जा रहा है। एक दिन उत्तम व्रतका पालन करनेवाले एक ब्रह्मवेत्ता आचार्य अपने आसनपर विराजमान थे। परंतप! उस समय किसी बुद्धिमान् शिष्यने उनके पास जाकर निवेदन किया—'भगवन्! मैं कल्याणमार्गमें प्रवृत्त होकर आपकी शरणमें आया हूँ और आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर याचना करता हूँ कि मैं जो कुछ पूछूँ; उसका उत्तर दीजिये। मैं जानना चाहता हूँ कि श्रेय क्या है?' ॥ २-४ ॥

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तमेवंवादिनं पार्थ शिष्यं गुरुरुवाच ह । सर्वं तु ते प्रवक्ष्यामि यत्र वै संशयो द्विज ॥ ५ ॥ पार्थ! इस प्रकार कहनेवाले उस शिष्यसे गुरु बोले—‘विप्र! तुम्हारा जिस विषयमें संशय है, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा’ ॥ ५ ॥ इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठ गुरुणा गुरुवत्सलः । प्राञ्जलिः परिपप्रच्छ यत्तच्छृणु महामते ॥ ६ ॥ महाबुद्धिमान् कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! गुरुके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उस गुरुके प्यारे शिष्यने हाथ जोड़कर जो कुछ पूछा, उसे सुनो ॥ ६ ॥

शिष्य उवाच

कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत्सत्यं ब्रूहि यत्परम् । कुतो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ७ ॥ शिष्य बोला—विप्रवर! मैं कहाँसे आया हूँ और आप कहाँसे आये हैं? जगत्‌के चराचर जीव कहाँसे उत्पन्न हुए हैं? जो परमतत्त्व है, उसे आप यथार्थरूपसे बताइये ॥ ७ ॥ केन जीवन्ति भूतानि तेषामायुश्च किं परम् ।

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किं सत्यं किं तपो विप्र के गुणाः सद्भििरीरिताः ॥ ८ ॥
विप्रवर! सम्पूर्ण जीव किससे जीवन धारण करते हैं? उनकी अधिक-से-अधिक आयु कितनी है? सत्य और तप क्या है? सत्पुरुषोंने किन गुणोंकी प्रशंसा की है? ॥ ८ ॥
के पन्थानः शिवाश्च स्युः किं सुखं किं च दुष्कृतम् ।
एतान् मे भगवन् प्रश्नान् याथातथ्येन सुव्रत ॥ ९ ॥
वक्तुमर्हसि विप्रर्षे यथावदिह तत्त्वतः ।
त्वदन्यः कश्चन प्रश्नानेतान् वक्तुमिहार्हति ॥ १० ॥
ब्रूहि धर्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं मम ।
मोक्षधर्मार्थकुशलो भवाँल्लोकेषु गीयते ॥ ११ ॥
कौन-कौन-से मार्ग कल्याण करनेवाले हैं? सर्वोत्तम सुख क्या है? और पाप किसे कहते हैं? श्रेष्ठ व्रतका आचरण करनेवाले गुरुदेव! मेरे इन प्रश्नोंका आप यथार्थरूपसे उत्तर देनेमें समर्थ हैं। धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! यह सब जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है। इस विषयमें इन प्रश्नोंका तत्त्वतः यथार्थ उत्तर देनेमें आपसे अतिरिक्त दूसरा कोई समर्थ नहीं है। अतः आप ही बतलाइये; क्योंकि संसारमें मोक्षधर्मके तत्त्वके ज्ञानमें आप कुशल बताये गये हैं ॥ ९—११ ॥
सर्वसंशयांच्छेत्ता त्वदन्यो न च विद्यते ।
संसारभीरवश्चैव मोक्षकामास्तथा वयम् ॥ १२ ॥
हम संसारसे भयभीत और मोक्षके इच्छुक हैं। आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं, जो सब प्रकारकी शंकाओंका निवारण कर सके ॥ १२ ॥

वासुदेव उवाच

तस्मै सम्प्रतिपन्नाय यथावत् परिपृच्छते ।
शिष्याय गुणयुक्ताय शान्ताय प्रियवर्तिने ॥ १३ ॥
छायाभूताय दान्ताय यतते ब्रह्मचारिणे ।
तान् प्रश्नानब्रवीत् पार्थ मेधावी स धृतव्रतः ।
गुरुः कुरुकुलश्रेष्ठ सम्यक् सर्वानरिंदम ॥ १४ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**कुरुकुलश्रेष्ठ शत्रुदमन अर्जुन! वह शिष्य सब प्रकारसे गुरुकी शरणमें आया था। यथोचित रीतिसे प्रश्न करता था। गुणवान् और शान्त था। छायाकी भाँति साथ रहकर गुरुका प्रिय करता था तथा जितेन्द्रिय, संयमी और ब्रह्मचारी था। उसके पूछनेपर मेधावी एवं व्रतधारी गुरुने पूर्वोक्त सभी प्रश्नोंका ठीक-ठीक उत्तर दिया ॥ १३-१४ ॥

गुरुरुवाच

ब्रह्मणोक्तमिदं सर्वमृषिप्रवरसेवितम् ।

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वेदविद्यां समाश्रित्य तत्त्वभूतार्थभावनम् ॥ १५ ॥ गुरु बोले— बेटा! ब्रह्माजीने वेद-विद्याका आश्रय लेकर तुम्हारे पूछे हुए इन सभी प्रश्नोंका उत्तर पहलेसे ही दे रखा है तथा प्रधान-प्रधान ऋषियोंने उसका सदा ही सेवन किया है। उन प्रश्नोंके उत्तरमें परमार्थविषयक विचार किया गया है ॥ १५ ॥ ज्ञानं त्वेव परं विद्मः संन्यासं तप उत्तमम् । यस्तु वेद निराबाधं ज्ञानतत्त्वं विनिश्चयात् । सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥ १६ ॥ हम ज्ञानको ही परब्रह्म और संन्यासको उत्तम तप जानते हैं। जो अबाधित ज्ञानतत्त्वको निश्चयपूर्वक जानकर अपनेको सब प्राणियोंके भीतर स्थित देखता है, वह सर्वगति (सर्वव्यापक) माना जाता है ॥ १६ ॥ यो विद्वान् सहसंवासं विवासं चैव पश्यति । तथैकत्वनानात्वे स दुःखात् परिमुच्यते ॥ १७ ॥ जो विद्वान् संयोग और वियोगको तथा वैसे ही एकत्व और नानात्वको एक साथ तत्त्वतः जानता है, वह दुःखसे मुक्त हो जाता है ॥ १७ ॥ यो न कामयते किंचिन्न किंचिदभिमन्यते । इहलोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ १८ ॥ जो किसी वस्तुकी कामना नहीं करता तथा जिसके मनमें किसी बातका अभिमान नहीं होता, वह इस लोकमें रहता हुआ ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥ प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्वभूतविधानवित् । निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः ॥ १९ ॥ जो माया और सत्त्वादि गुणोंके तत्त्वको जानता है, जिसे सब भूतोंके विधानका ज्ञान है और जो ममता तथा अहंकारसे रहित हो गया है, वह मुक्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं है ॥ १९ ॥ अव्यक्तबीजप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान् । महाहङ्कारविटप इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥ २० ॥ महाभूतविशेषश्च विशेषप्रतिशाखवान् । सदापर्णः सदापुष्पः सदा शुभफलोदयः ॥ २१ ॥ अजीवः सर्वभूतानां ब्रह्मबीजः सनातनः । एतज्ज्ञात्वा च तत्त्वानि ज्ञानेन परमासिना ॥ २२ ॥ छित्त्वा चामरतां प्राप्य जहाति मृत्युजन्मनी ।

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यह देह एक वृक्षके समान है। अज्ञान इसका मूल अंकुर (जड़) है, बुद्धि स्कन्ध (तना) है, अहंकार शाखा है, इन्द्रियाँ खोखले हैं, पञ्च महाभूत उसके विशेष अवयव हैं और उन भूतोंके विशेष भेद उसकी टहनियाँ हैं। इसमें सदा ही संकल्परूपी पत्ते उगते और कर्मरूपी फूल खिलते रहते हैं। शुभाशुभ कर्मोंसे प्राप्त होनेवाले सुख-दुःखादि ही उसमें सदा लगे रहनेवाले फल हैं। इस प्रकार ब्रह्मरूपी बीजसे प्रकट होकर प्रवाहरूपसे सदा मौजूद रहनेवाला देहरूपी वृक्ष समस्त प्राणियोंके जीवनका आधार है। जो इसके तत्त्वको भलीभाँति जानकर ज्ञानरूपी उत्तम तलवारसे इसे काट डालता है, वह अमरत्वको प्राप्त होकर जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ।। २०—२२ १/२ ।।

भूतभव्यभविष्यादि धर्मकामार्थनिश्चयम् ।
सिद्धसंघपरिज्ञातं पुराकल्पं सनातनम् ॥ २३ ॥
प्रवक्ष्येऽहं महाप्राज्ञ पदमुत्तममद्य ते ।
बुद्ध्वा यदिह संसिद्धा भवन्तीह मनीषिणः ॥ २४ ॥

महाप्राज्ञ! जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्य आदिके तथा धर्म, अर्थ और कामके स्वरूपका निश्चय किया गया है, जिसको सिद्धोंके समुदायने भलीभाँति जाना है, जिसका पूर्वकालमें निर्णय किया गया था और बुद्धिमान् पुरुष जिसे जानकर सिद्ध हो जाते हैं, उस परम उत्तम सनातन ज्ञानका अब मैं तुमसे वर्णन करता हूँ ।। २३-२४ ।।

उपगम्यर्षयः पूर्वं जिज्ञासन्तः परस्परम् ।
प्रजापतिर्भरद्वाजो गौतमो भार्गवस्तथा ॥ २५ ॥
वसिष्ठः कश्यपश्चैव विश्वामित्रोऽत्रिरेव च ।
मार्गान् सर्वान् परिक्रम्य परिश्रान्ताः स्वकर्मभिः ॥ २६ ॥
ऋषिमाङ्गिरसं वृद्धं पुरस्कृत्य तु ते द्विजाः ।
ददृशुर्ब्रह्मभवने ब्रह्माणं वीतकल्मषम् ॥ २७ ॥
तं प्रणम्य महात्मानं सुखासीनं महर्षयः ।
पप्रच्छुर्विनयोपेता नैःश्रेयसमिदं परम् ॥ २८ ॥

पहलेकी बात है, प्रजापति दक्ष, भरद्वाज, गौतम, भृगुनन्दन शुक्र, वसिष्ठ, कश्यप, विश्वामित्र और अत्रि आदि महर्षि अपने कर्मोंद्वारा समस्त मार्गोंमें भटकते-भटकते जब बहुत थक गये, तब एकत्रित हो आपसमें जिज्ञासा करते हुए परम वृद्ध अंगिरा मुनिको आगे करके ब्रह्मलोकमें गये और वहाँ सुखपूर्वक बैठे हुए पापरहित महात्मा ब्रह्माजीका दर्शन करके उन महर्षि ब्राह्मणोंने विनयपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। फिर तुम्हारी ही तरह अपने परम कल्याणके विषयमें पूछा— ।। २५—२८ ।।

कथं कर्म क्रियात् साधु कथं मुच्येत किल्बिषात् ।
के नो मार्गाः शिवाश्च स्युः किं सत्यं किं च दुष्कृतम् ॥ २९ ॥

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‘श्रेष्ठ कर्म किस प्रकार करना चाहिये? मनुष्य पापसे किस प्रकार छूटता है? कौन-से मार्ग हमारे लिये कल्याणकारक हैं? सत्य क्या है? और पाप क्या है? ।। २९ ।। कौ चोभौ कर्मणां मार्गौ प्राप्नुयुर्दक्षिणोत्तरौ । प्रलयं चापवर्गं च भूतानां प्रभवाप्ययौ ।। ३० ।। ‘तथा कर्मोंके वे दो मार्ग कौन-से हैं, जिनसे मनुष्य दक्षिणायन और उत्तरायण गतिको प्राप्त होते हैं? प्रलय और मोक्ष क्या हैं? एवं प्राणियोंके जन्म और मरण क्या हैं?’ ।। ३० ।। इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठैर्यदाह प्रपितामहः । तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणु शिष्य यथागमम् ।। ३१ ।। शिष्य! उन मुनिश्रेष्ठ महर्षियोंके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन प्रपितामह ब्रह्माजीने जो कुछ कहा, वह मैं तुम्हें शास्त्रानुसार पूर्णतया बताऊँगा, उसे सुनो ।। ३१ ।।

ब्रह्मोवाच सत्याद् भूतानि जातानि स्थावराणि चराणि च । तपसा तानि जीवन्ति इति तद् वित्त सुव्रताः । स्वां योनिं समतिक्रम्य वर्तन्ते स्वेन कर्मणा ।। ३२ ।। ब्रह्माजीने कहा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षियो! ऐसा जानो कि चराचर जीव सत्यस्वरूप परमात्मासे उत्पन्न हुए हैं और तपरूप कर्मसे जीवन धारण करते हैं। वे अपने कारणस्वरूप ब्रह्मको भूलकर अपने कर्मोंके अनुसार आवागमनके चक्रमें घूमते हैं ।। ३२ ।। सत्यं हि गुणसंयुक्तं नियतं पञ्चलक्षणम् ।। ३३ ।। क्योंकि गुणोंसे युक्त हुआ सत्य ही पाँच लक्षणोंवाला निश्चित किया गया है ।। ३३ ।। ब्रह्म सत्यं तपः सत्यं सत्यं चैव प्रजापतिः । सत्याद् भूतानि जातानि सत्यं भूतमयं जगत् ।। ३४ ।। ब्रह्म सत्य है, तप सत्य है और प्रजापति भी सत्य है। सत्यसे ही सम्पूर्ण भूतोंका जन्म हुआ है। यह भौतिक जगत् सत्यरूप ही है ।। ३४ ।। तस्मात् सत्यमया विप्रा नित्यं योगपरायणाः । अतीतक्रोधसंतापा नियता धर्मसेविनः ।। ३५ ।। इसलिये सदा योगमें लगे रहनेवाले, क्रोध और संतापसे दूर रहनेवाले तथा नियमोंका पालन करनेवाले धर्मसेवी ब्राह्मण सत्यका आश्रय लेते हैं ।। ३५ ।। अन्योन्यनियतान् वैद्यान् धर्मसेतुप्रवर्तकान् । तानहं सम्प्रवक्ष्यामि शाश्वताँल्लोकभावनान् ।। ३६ ।। जो परस्पर एक-दूसरेको नियमके अंदर रखनेवाले, धर्म-मर्यादाके प्रवर्तक और विद्वान् हैं, उन ब्राह्मणोंके प्रति मैं लोक-कल्याणकारी सनातन धर्मोंका उपदेश करूँगा ।। ३६ ।।

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चातुर्विद्यं तथा वर्णांश्चातुराश्रमिकान् पृथक् । धर्ममेकं चतुष्पादं नित्यमाहुर्मनीषिणः ॥ ३७ ॥ वैसे ही प्रत्येक वर्ण और आश्रमके लिये पृथक्-पृथक् चार विद्याओंका वर्णन करूँगा। मनीषी विद्वान् चार चरणोंवाले एक धर्मको नित्य बतलाते हैं ॥ ३७ ॥

पन्थानं वः प्रवक्ष्यामि शिवं क्षेमकरं द्विजाः । नियतं ब्रह्मभावाय गतं पूर्वं मनीषिभिः ॥ ३८ ॥ द्विजवरो! पूर्व कालमें मनीषी पुरुष जिसका सहारा ले चुके हैं और जो ब्रह्मभावकी प्राप्तिका सुनिश्चित साधन है, उस परम मंगलकारी कल्याणमय मार्गका तुमलोगोंके प्रति उपदेश करता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ ३८ ॥

गदन्तस्तं मयाद्येह पन्थानं दुर्विदं परम् । निबोधत महाभागा निखिलेन परं पदम् ॥ ३९ ॥ सौभाग्यशाली वक्तागण! उस अत्यन्त दुर्विज्ञेय मार्गको, जो कि पूर्णतया परमपदस्वरूप है, यहाँ अब मुझसे सुनो ॥ ३९ ॥

ब्रह्मचारिकमेवाहुराश्रमं प्रथमं पदम् । गार्हस्थ्यं तु द्वितीयं स्याद् वानप्रस्थमतः परम् । ततः परं तु विज्ञेयमध्यात्मं परमं पदम् ॥ ४० ॥ आश्रमोंमें ब्रह्मचर्यको प्रथम आश्रम बताया गया है। गार्हस्थ्य दूसरा और वानप्रस्थ तीसरा आश्रम है, उसके बाद संन्यास आश्रम है। इसमें आत्मज्ञानकी प्रधानता होती है, अतः इसे परमपदस्वरूप समझना चाहिये ॥ ४० ॥

ज्योतिराकाशमादित्यो वायुरिन्द्रः प्रजापतिः । नोपैति यावदध्यात्मं तावदेतान् न पश्यति ॥ ४१ ॥ जबतक अध्यात्मज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती, तबतक मनुष्य इन ज्योति, आकाश, वायु, सूर्य, इन्द्र और प्रजापति आदिके यथार्थ तत्त्वको नहीं जानता (आत्मज्ञान होनेपर इनका यथार्थ ज्ञान हो जाता है) ॥ ४१ ॥

तस्योपायं प्रवक्ष्यामि पुरस्तात् तं निबोधत । फलमूलानिलभुजां मुनीनां वसतां वने ॥ ४२ ॥ वानप्रस्थं द्विजातीनां त्रयाणामुपदिश्यते । सर्वेषामेव वर्णानां गार्हस्थ्यं तद् विधीयते ॥ ४३ ॥ अतः पहले उस आत्मज्ञानका उपाय बतलाता हूँ, सब लोग सुनिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीन द्विजातियोंके लिये वानप्रस्थ आश्रमका विधान है। वनमें रहकर मुनिवृत्तिका सेवन करते हुए फल-मूल और वायुके आहारपर जीवन-निर्वाह करनेसे वानप्रस्थ-धर्मका पालन होता है। गृहस्थ-आश्रमका विधान सभी वर्णोंके लिये है ॥ ४२-४३ ॥

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श्रद्धालक्षणमित्येवं धर्मं धीराः प्रचक्षते ।
इत्येवं देवयाना वः पन्थानः परिकीर्तिताः ।
सद्भिरध्यासिता धीरैः कर्मभिर्धर्मसेतवः ॥ ४४ ॥
विद्वानोंने श्रद्धाको ही धर्मका मुख्य लक्षण बतलाया है। इस प्रकार आपलोगोंके प्रति देवयान मार्गोंका वर्णन किया गया है। धैर्यवान् संत-महात्मा अपने कर्मोंसे धर्म-मर्यादाका पालन करते हैं ॥ ४४ ॥

एतेषां पृथगध्यास्ते यो धर्मं संशितव्रतः ।
कालात् पश्यति भूतानां सदैव प्रभवाप्ययौ ॥ ४५ ॥
जो मनुष्य उत्तम व्रतका आश्रय लेकर उपर्युक्त धर्मोंमेंसे किसीका भी दृढ़तापूर्वक पालन करते हैं, वे कालक्रमसे सम्पूर्ण प्राणियोंके जन्म और मरणको सदा ही प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ ४५ ॥

अतस्तत्त्वानि वक्ष्यामि याथातथ्येन हेतुना ।
विषयस्थानि सर्वाणि वर्तमानानि भागशः ॥ ४६ ॥
अब मैं यथार्थ युक्तिके द्वारा पदार्थोंमें विभागपूर्वक रहनेवाले सम्पूर्ण तत्त्वोंका वर्णन करता हूँ ॥ ४६ ॥

महानात्मा तथाव्यक्तमहंकारस्तथैव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च महाभूतानि पञ्च च ॥ ४७ ॥
विशेषाः पञ्चभूतानामिति सर्गः सनातनः ।
चतुर्विंशतिरेका च तत्त्वसंख्या प्रकीर्तिता ॥ ४८ ॥
अव्यक्त प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, दस इन्द्रियाँ, एक मन, पञ्च महाभूत और उनके शब्द आदि विशेष गुण—यह चौबीस तत्त्वोंका सनातन सर्ग है। तथा एक जीवात्मा-इस प्रकार तत्त्वोंकी संख्या पचीस बतलायी गयी है ॥ ४७-४८ ॥

तत्त्वानामथ यो वेद सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ।
स धीरः सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति ॥ ४९ ॥
जो इन सब तत्त्वोंकी उत्पत्ति और लयको ठीक-ठीक जानता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें धीर है और वह कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ ४९ ॥

तत्त्वानि यो वेदयते यथातथं
गुणांश्च सर्वानखिलांश्च देवताः ।
विधूतपाप्मा प्रविमुच्य बन्धनं
स सर्वलोकानमलान् समश्नुते ॥ ५० ॥
जो सम्पूर्ण तत्त्वों, गुणों तथा समस्त देवताओंको यथार्थरूपसे जानता है, उसके पाप धुल जाते हैं और वह बन्धनसे मुक्त होकर सम्पूर्ण दिव्यलोकोंके सुखका अनुभव करता है ॥ ५० ॥

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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-
संवादविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

ब्रह्माजीके द्वारा तमोगुणका, उसके कार्यका और फलका वर्णन

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षट्त्रिंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीके द्वारा तमोगुणका, उसके कार्यका और फलका वर्णन

ब्रह्मोवाच
तदव्यक्तमनुद्रिक्तं सर्वव्यापि ध्रुवं स्थिरम् ।
नवद्वारं पुरं विद्यात् त्रिगुणं पञ्चधातुकम् ॥ १ ॥
एकादशपरिक्षेपं मनोव्याकरणात्मकम् ।
बुद्धिस्वामिकमित्येतत् परमेकादशं भवेत् ॥ २ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महर्षियो! जब तीनों गुणोंकी साम्यावस्था होती है, उस समय उसका नाम अव्यक्त प्रकृति होता है। अव्यक्त समस्त प्राकृत कार्योंमें व्यापक, अविनाशी और स्थिर है। उपर्युक्त तीन गुणोंमें जब विषमता आती है, तब वे पञ्चभूतका रूप धारण करते हैं और उनसे नौ द्वारवाले नगर (शरीर)-का निर्माण होता है, ऐसा जानो। इस पुरमें जीवात्माको विषयोंकी ओर प्रेरित करनेवाली मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। इनकी अभिव्यक्ति मनके द्वारा हुई है। बुद्धि इस नगरकी स्वामिनी है, ग्यारहवाँ मन दस इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ है ॥ १-२ ॥

त्रीणि स्रोतांसि यान्यस्मिन्नाप्यायन्ते पुनः पुनः ।
प्रनाड्यस्तिस्र एवैताः प्रवर्तन्ते गुणात्मिकाः ॥ ३ ॥
इसमें जो तीन स्रोत (चित्तरूपी नदीके प्रवाह) हैं, वे उन तीन गुणमयी नाड़ियोंके द्वारा बार-बार भरे जाते एवं प्रवाहित होते हैं ॥ ३ ॥

तमो रजस्तथा सत्त्वं गुणानेतान् प्रचक्षते ।
अन्योन्यमिथुनाः सर्वे तथान्योन्यानुजीविनः ॥ ४ ॥
अन्योन्यापाश्रयाश्चापि तथान्योन्यानुवर्तिनः ।
अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च त्रिगुणाः पञ्चधातवः ॥ ५ ॥
सत्त्व, रज और तम—इन तीनोंको गुण कहते हैं। ये परस्पर एक-दूसरेके प्रतिद्वन्द्वी, एक-दूसरेके आश्रित, एक-दूसरेके सहारे टिकनेवाले, एक-दूसरेका अनुसरण करनेवाले और परस्पर मिश्रित रहनेवाले हैं। पाँचों महाभूत त्रिगुणात्मक हैं ॥ ४-५ ॥

तमसो मिथुनं सत्त्वं सत्त्वस्य मिथुनं रजः ।
रजसश्चापि सत्त्वं स्यात् सत्त्वस्य मिथुनं तमः ॥ ६ ॥
तमोगुणका प्रतिद्वन्द्वी है सत्त्वगुण और सत्त्व-गुणका प्रतिद्वन्द्वी रजोगुण है। इसी प्रकार रजोगुणका प्रतिद्वन्द्वी सत्त्वगुण है और सत्त्वगुणका प्रतिद्वन्द्वी तमोगुण है ॥ ६ ॥

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नियम्यते तमो यत्र रजस्तत्र प्रवर्तते ।
नियम्यते रजो यत्र सत्त्वं तत्र प्रवर्तते ॥ ७ ॥
जहाँ तमोगुणको रोका जाता है, वहाँ रजोगुण बढ़ता है और जहाँ रजोगुणको दबाया जाता है, वहाँ सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है ॥ ७ ॥
नैशात्मकं तमो विद्यात् त्रिगुणं मोहसंज्ञितम् ।
अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु ।
तामसं रूपमेतत् तु दृश्यते चापि सङ्गतम् ॥ ८ ॥
तमको अन्धकाररूप और त्रिगुणमय समझना चाहिये। उसका दूसरा नाम मोह है। वह अधर्मको लक्षित करानेवाला और पाप करनेवाले लोगोंमें निश्चित रूपसे विद्यमान रहनेवाला है। तमोगुणका यह स्वरूप दूसरे गुणोंसे मिश्रित भी दिखायी देता है ॥ ८ ॥
प्रकृत्यात्मकमेवाहू रजः पर्यायकारकम् ।
प्रवृत्तं सर्वभूतेषु दृश्यमुत्पत्तिलक्षणम् ॥ ९ ॥
रजोगुणको प्रकृतिरूप बतलाया गया है, यह सृष्टिकी उत्पत्तिका कारण है। सम्पूर्ण भूतोंमें इसकी प्रवृत्ति देखी जाती है। यह दृश्य जगत् उसीका स्वरूप है, उत्पत्ति या प्रवृत्ति ही उसका लक्षण है ॥ ९ ॥
प्रकाशं सर्वभूतेषु लाघवं श्रद्दधानता ।
सात्त्विकं रूपमेवं तु लाघवं साधुसम्मितम् ॥ १० ॥
सब भूतोंमें प्रकाश, लघुता (गर्वहीनता) और श्रद्धा—यह सत्त्वगुणका रूप है। गर्वहीनताकी श्रेष्ठ पुरुषोंने प्रशंसा की है ॥ १० ॥
एतेषां गुणतत्त्वानि वक्ष्यन्ते तत्त्वहेतुभिः ।
समासव्यासयुक्तानि तत्त्वतस्तानि बोधत ॥ ११ ॥
अब मैं तात्त्विक युक्तियोंद्वारा संक्षेप और विस्तारके साथ इन तीनों गुणोंके कार्योंका यथार्थ वर्णन करता हूँ, इन्हें ध्यान देकर सुनो ॥ ११ ॥
सम्मोहोऽज्ञानमत्यागः कर्मणामविनिर्णयः ।
स्वप्नः स्तम्भो भयं लोभः स्वतः सुकृतदूषणम् ॥ १२ ॥
अस्मृतिश्चाविपाकश्च नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता ।
निर्विशेषत्वमन्धत्वं जघन्यगुणवृत्तिता ॥ १३ ॥
अकृते कृतमानित्वमज्ञाने ज्ञानमानिता ।
अमैत्री विकृताभावो ह्यश्रद्धा मूढभावना ॥ १४ ॥
अनार्जवमसंज्ञत्वं कर्म पापमचेतना ।
गुरुत्वं सन्नभावत्वमवशित्वमवाग्गतिः ॥ १५ ॥
सर्व एते गुणा वृत्तास्तामसाः सम्प्रकीर्तिताः ।
ये चान्ये विहिता भावा लोकेऽस्मिन् भावसंज्ञिताः ॥ १६ ॥

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तत्र तत्र नियम्यन्ते सर्वे ते तामसा गुणाः । मोह, अज्ञान, त्यागका अभाव, कर्मोंका निर्णय न कर सकना, निद्रा, गर्व, भय, लोभ, स्वयं शुभ कर्मोंमें दोष देखना, स्मरणशक्तिका अभाव, परिणाम न सोचना, नास्तिकता, दुश्चरित्रता, निर्विशेषता (अच्छे-बुरेके विवेकका अभाव), इन्द्रियोंकी शिथिलता, हिंसा आदि निन्दनीय दोषोंमें प्रवृत्त होना, अकार्यको कार्य और अज्ञानको ज्ञान समझना, शत्रुता, काममें मन न लगाना, अश्रद्धा, मूर्खतापूर्ण विचार, कुटिलता, नासमझी, पाप करना, अज्ञान, आलस्य आदिके कारण देहका भारी होना, भाव-भक्तिका न होना, अजितेन्द्रियता और नीच कर्मोंमें अनुराग—ये सभी दुर्गुण तमोगुणके कार्य बतलाये गये हैं। इनके सिवा और भी जो-जो बातें इस लोकमें निषिद्ध मानी गयी हैं, वे सब तमोगुणी ही हैं ॥ १२—१६ १/२ ॥ परिवादकथा नित्यं देवब्राह्मणवैदिकी ॥ १७ ॥ अत्यागश्चाभिमानश्च मोहो मन्युस्तथाक्षमा । मत्सरश्चैव भूतेषु तामसं वृत्तमिष्यते ॥ १८ ॥ देवता, ब्राह्मण और वेदकी सदा निन्दा करना, दान न देना, अभिमान, मोह, क्रोध, असहनशीलता और प्राणियोंके प्रति मात्सर्य—ये सब तामस बर्ताव हैं ॥ १७-१८ ॥ वृथारम्भा हि ये केचिद् वृथा दानानि यानि च । वृथा भक्षणमित्येतत् तामसं वृत्तमिष्यते ॥ १९ ॥ (विधि और श्रद्धासे रहित) व्यर्थ कार्योंका आरम्भ करना, (देश-काल-पात्रका विचार न करके अश्रद्धा और अवहेलनापूर्वक) व्यर्थ दान देना तथा (देवता और अतिथिको दिये बिना) व्यर्थ भोजन करना भी तामसिक कार्य है ॥ १९ ॥ अतिवादोऽतितिक्षा च मात्सर्यमभिमानिता । अश्रद्दधानता चैव तामसं वृत्तमिष्यते ॥ २० ॥ अतिवाद, अक्षमा, मत्सरता, अभिमान और अश्रद्धाको भी तमोगुणका बर्ताव माना गया है ॥ २० ॥ एवंविधाश्च ये केचिल्लोकेऽस्मिन् पापकर्मिणः । मनुष्या भिन्नमर्यादास्ते सर्वे तामसाः स्मृताः ॥ २१ ॥ संसारमें ऐसे बर्ताववाले और धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले जो भी पापी मनुष्य हैं, वे सब तमोगुणी माने गये हैं ॥ २१ ॥ तेषां योनीः प्रवक्ष्यामि नियताः पापकर्मणाम् । अवाङ्निरयभावा ये तिर्यङ्निरयगामिनः ॥ २२ ॥ ऐसे पापी मनुष्योंके लिये दूसरे जन्ममें जो योनियाँ निश्चित की हुई हैं, उनका परिचय दे रहा हूँ। उनमेंसे कुछ तो नीचे नरकोंमें ढकेले जाते हैं और कुछ तिर्यग्योनिंयोंमें जन्म ग्रहण करते हैं ॥ २२ ॥ स्थावराणि च भूतानि पशवो वाहनानि च ।

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क्रव्यादा दन्दशूकाश्च कृमिकीटविहंगमाः ॥ २३ ॥ अण्डजा जन्तवश्चैव सर्वे चापि चतुष्पदाः । उन्मत्ता बधिरा मूका ये चान्ये पापरोगिणः ॥ २४ ॥ मग्नास्तमसि दुर्वृत्ताः स्वकर्मकृतलक्षणाः । अवाक्स्रोतस इत्येते मग्नास्तमसि तामसाः ॥ २५ ॥ स्थावर (वृक्ष-पर्वत आदि) जीव, पशु, वाहन, राक्षस, सर्प, कीड़े-मकोड़े, पक्षी, अण्डज प्राणी, चौपाये, पागल, बहरे, गूँगे तथा अन्य जितने पापमय रोगवाले (कोढ़ी आदि) मनुष्य हैं, वे सब तमोगुणमें डूबे हुए हैं। अपने कर्मोंके अनुसार लक्षणोंवाले ये दुराचारी जीव सदा दुःखमें निमग्न रहते हैं। उनकी चित्तवृत्तियोंका प्रवाह निम्न दशाकी ओर होता है, इसलिये उन्हें अर्वाक् स्रोता कहते हैं। वे तमोगुणमें निमग्न रहनेवाले सभी प्राणी तामसी हैं ।। २३—२५ ।।

तेषामुत्कर्षमुद्रेकं वक्ष्याम्यहमतः परम् । यथा ते सुकृताँल्लोकाँल्लभन्ते पुण्यकर्मिणः ॥ २६ ॥ इसके पश्चात् मैं यह वर्णन करूँगा कि उन तामसी योनियोंमें गये हुए प्राणियोंका उत्थान और समृद्धि किस प्रकार होती है तथा वे पुण्यकर्मा होकर किस प्रकार श्रेष्ठ लोकोंको प्राप्त होते हैं ।। २६ ।।

अन्यथा प्रतिपन्नास्तु विवृद्धा ये च कर्मणः । स्वकर्मनिरतानां च ब्राह्मणानां शुभैषिणाम् ॥ २७ ॥ संस्कारेणोर्ध्वमायान्ति यतमानाः सलोकताम् । स्वर्गे गच्छन्ति देवानामित्येषा वैदिकी श्रुतिः ॥ २८ ॥ जो विपरीत योनियोंको प्राप्त प्राणी हैं, उनके पापकर्मोंका भोग पूरा हो जानेपर) जब पूर्वकृत पुण्य-कर्मोंका उदय होता है, तब वे शुभकर्मोंके संस्कारोंके प्रभावसे स्वकर्मनिष्ठ कल्याणकामी ब्राह्मणोंकी समानताको प्राप्त होते हैं अर्थात् उनके कुलमें उत्पन्न होते हैं और वहाँ पुनः यत्नशील होकर ऊपर उठते हैं एवं देवताओंके स्वर्गलोकमें चले जाते हैं—यह वेदकी श्रुति है ।। २७-२८ ।।

अन्यथा प्रतिपन्नास्ते विबुद्धाः स्वेषु कर्मसु । पुनरावृत्तिधर्माणस्ते भवन्तीह मानुषाः ॥ २९ ॥ वे पुनरावृत्तिशील सकाम धर्मका आचरण करनेवाले मनुष्य देवभावको प्राप्त हो जानेके अनन्तर जब वहाँसे दूसरी योनिमें जाते हैं तब यहाँ (मृत्युलोकमें) मनुष्य होते हैं ।। २९ ।।

पापयोनिं समापन्नाश्चाण्डाला मूकचूचुकाः । वर्णान् पर्यायशश्चापि प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तरम् ॥ ३० ॥

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उनमेंसे कोई-कोई (बचे हुए पापकर्मका फल भोगनेके लिये) पुनः पापयोनिसे युक्त चाण्डाल, गूँगे और अटककर बोलनेवाले होते हैं और प्रायः जन्म-जन्मान्तरमें उत्तरोत्तर उच्च वर्णको प्राप्त होते हैं ।। ३० ।।

शूद्रयोनिमतिक्रम्य ये चान्ये तामसा गुणाः ।
स्रोतोमध्ये समागम्य वर्तन्ते तामसे गुणे ।। ३१ ।।
कोई शूद्रयोनिसे आगे बढ़कर भी तामस गुणोंसे युक्त हो जाते हैं और उसके प्रवाहमें पड़कर तमोगुणमें ही प्रवृत्त रहते हैं ।। ३१ ।।

अभिष्वङ्गस्तु कामेषु महामोह इति स्मृतः ।
ऋषयो मुनयो देवा मुह्यन्त्यत्र सुखेप्सवः ।। ३२ ।।
यह जो भोगोंमें आसक्त हो जाना है, यही महामोह बताया गया है। इस मोहमें पड़कर भोगोंका सुख चाहनेवाले ऋषि, मुनि और देवगण भी मोहित हो जाते हैं (फिर साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है?) ।। ३२ ।।

तमो मोहो महामोहस्तामिस्रः क्रोधसंज्ञितः ।
मरणं त्वन्धतामिस्रस्तामिस्रः क्रोध उच्यते ।। ३३ ।।
तम (अविद्या), मोह (अस्मिता), महामोह (राग), क्रोध नामवाला तामिस्र और मृत्युरूप अन्धतामिस्र—यह पाँच प्रकारकी तामसी प्रकृति बतलायी गयी है। क्रोधको ही तामिस्र कहते हैं ।। ३३ ।।

वर्णतो गुणतश्चैव योनितश्चैव तत्त्वतः ।
सर्वमेतत्तमो विप्राः कीर्तितं वो यथाविधि ।। ३४ ।।
विप्रवरो! वर्ण, गुण, योनि और तत्त्वके अनुसार मैंने आपसे तमोगुणका पूरा-पूरा यथावत् वर्णन किया ।। ३४ ।।

कोन्वेतद् बुध्यते साधु कोन्वेतत् साधु पश्यति ।
अतत्त्वे तत्त्वदर्शी यस्तमसस्तत्त्वलक्षणम् ।। ३५ ।।
जो अतत्त्वमें तत्त्व-दृष्टि रखनेवाला है, ऐसा कौन-सा मनुष्य इस विषयको अच्छी तरह देख और समझ सकता है? यह विपरीत दृष्टि ही तमोगुणकी यथार्थ पहचान है ।। ३५ ।।

तमोगुणा बहुविधाः प्रकीर्तिता
यथावदुक्तं च तमः परावरम् ।
नरो हि यो वेद गुणानिमान् सदा
स तामसैः सर्वगुणैः प्रमुच्यते ।। ३६ ।।
इस प्रकार तमोगुणके स्वरूप और उसके कार्यभूत नाना प्रकारके गुणोंका यथावत् वर्णन किया गया तथा तमोगुणसे प्राप्त होनेवाली ऊँची-नीची योनियाँ भी बतला दी गयीं। जो मनुष्य इन गुणोंको ठीक-ठीक जानता है, वह सम्पूर्ण तामसिक गुणोंसे सदा मुक्त रहता है ।। ३६ ।।

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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे षट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६ ।।

रजोगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः

रजोगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल

ब्रह्मोवाच
रजोऽहं वः प्रवक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तमाः ।
निबोधत महाभागा गुणवृत्तं च राजसम् ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा— महाभाग्यशाली श्रेष्ठ महर्षियो! अब मैं तुम लोगोंसे रजोगुणके स्वरूप और उसके कार्यभूत गुणोंका यथार्थ वर्णन करूँगा। ध्यान देकर सुनो ॥ १ ॥
सन्तापो रूपमायासाः सुखदुःखे हिमातपौ ।
ऐश्वर्यं विग्रहः संधिर्हेतुवादोऽरतिः क्षमा ॥ २ ॥
बलं शौर्यं मदो रोषो व्यायामकलहावपि ।
ईर्ष्येप्सा पिशुनं युद्धं ममत्वं परिपालनम् ॥ ३ ॥
वधबन्धपरिक्लेशाः क्रयो विक्रय एव च ।
निकृन्त छिन्धि भिन्धीति परर्मावकर्तनम् ॥ ४ ॥
उग्रं दारुणमाक्रोशः परच्छिद्रानुशासनम् ।
लोकचिन्तानुचिन्ता च मत्सरः परिभावनः ॥ ५ ॥
मृषा वादो मृषा दानं विकल्पः परिभाषणम् ।
निन्दा स्तुतिः प्रशंसा च प्रस्तावः पारधर्षणम् ॥ ६ ॥
परिचर्यानुशुश्रूषा सेवा तृष्णा व्यपाश्रयः ।
व्यूहो नयः प्रमादश्च परिवादः परिग्रहः ॥ ७ ॥
संताप, रूप, आयास, सुख-दुःख, सर्दी, गर्मी, ऐश्वर्य, विग्रह, सन्धि, हेतुवाद, मनका प्रसन्न न रहना, सहनशक्ति, बल, शूरता, मद, रोष, व्यायाम, कलह, ईर्ष्या, इच्छा, चुगली खाना, युद्ध करना, ममता, कुटुम्बका पालन, वध, बन्धन, क्लेश, क्रय-विक्रय, छेदन, भेदन और विदारणका प्रयत्न, दूसरोंके मर्मको विदीर्ण कर डालनेकी चेष्टा, उग्रता, निष्ठुरता, चिल्लाना, दूसरोंके छिद्र बताना, लौकिक बातोंकी चिन्ता करना, पश्चात्ताप, मत्सरता, नाना प्रकारके सांसारिक भावोंसे भावित होना, असत्य भाषण, मिथ्या दान, संशयपूर्ण विचार, तिरस्कारपूर्वक बोलना, निन्दा, स्तुति, प्रशंसा, प्रताप, बलात्कार, स्वार्थबुद्धिसे रोगीकी परिचर्या और बड़ोंकी शुश्रूषा एवं सेवावृत्ति, तृष्णा, दूसरोंके आश्रित रहना, व्यवहार-कुशलता, नीति, प्रमाद (अपव्यय), परिवाद और परिग्रह—ये सभी रजोगुणके कार्य हैं ॥ २—७ ॥
संस्कारा ये च लोकेषु प्रवर्तन्ते पृथक्पृथक् ।
नृषु नारीषु भूतेषु द्रव्येषु शरणेषु च ॥ ८ ॥

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संसारमें जो स्त्री, पुरुष, भूत, द्रव्य और गृह आदिमें पृथक्-पृथक् संस्कार होते हैं, वे भी रजोगुणकी ही प्रेरणाके फल हैं ॥ ८ ॥ संतापोऽप्रत्ययश्चैव व्रतानि नियमाश्च ये । आशीर्युक्तानि कर्माणि पूर्तानि विविधानि च ॥ ९ ॥ स्वाहाकारो नमस्कारः स्वधाकारो वषट्क्रिया । याजनाध्यापने चोभे यजनाध्ययने अपि ॥ १० ॥ दानं प्रतिग्रहश्चैव प्रायश्चित्तानि मङ्गलम् । संताप, अविश्वास, सकाम भावसे व्रत-नियमोंका पालन, काम्य कर्म, नाना प्रकारके पूर्त (वापी, कूप-तड़ाग आदि पुण्य) कर्म, स्वाहाकार, नमस्कार, स्वधाकार, वषट्कार, याजन, अध्यापन, यजन, अध्ययन, दान, प्रतिग्रह, प्रायश्चित्त और मंगलजनक कर्म भी राजस माने गये हैं ॥ ९-१०½ ॥ इदं मे स्यादिदं मे स्यात्स्नेहो गुणसमुद्भवः ॥ ११ ॥ ‘मुझे यह वस्तु मिल जाय, वह मिल जाय’ इस प्रकार जो विषयोंको पानेके लिये आसक्तिमूलक उत्कण्ठा होती है, उसका कारण रजोगुण ही है ॥ ११ ॥ अभिद्रोहस्तथा माया निकृतिर्मान एव च । स्तैन्यं हिंसा जुगुप्सा च परितापः प्रजागरः ॥ १२ ॥ दम्भो दर्पोऽथ रागश्च भक्तिः प्रीतिः प्रमोदनम् । द्यूतं च जनवादश्च सम्बन्धाः स्त्रीकृताश्च ये ॥ १३ ॥ नृत्यवादित्रगीतानां प्रसङ्गा ये च केचन । सर्व एते गुणा विप्रा राजसाः सम्प्रकीर्तिताः ॥ १४ ॥ विप्रगण! द्रोह, माया, शठता, मान, चोरी, हिंसा, घृणा, परिताप, जागरण, दम्भ, दर्प, राग, सकाम भक्ति, विषय-प्रेम, प्रमोद, द्यूतक्रीड़ा, लोगोंके साथ विवाद करना, स्त्रियोंके लिये सम्बन्ध बढ़ाना, नाच-बाजे और गानमें आसक्त होना—से सब राजस गुण कहे गये हैं ॥ १२—१४ ॥ भूतभव्यभविष्याणां भावानां भुवि भावना । त्रिवर्गनिरता नित्यं धर्मोऽर्थः काम इत्यपि ॥ १५ ॥ कामवृत्ताः प्रमोदन्ते सर्वकामसमृद्धिभिः । अर्वाक्स्रोतस इत्येते मनुष्या रजसा वृताः ॥ १६ ॥ जो इस पृथ्वीपर भूत, वर्तमान और भविष्य पदार्थोंकी चिन्ता करते हैं, धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्गके सेवनमें लगे रहते हैं, मनमाना बर्ताव करते हैं और सब प्रकारके भोगोंकी समृद्धिसे आनन्द मानते हैं, वे मनुष्य रजोगुणसे आवृत हैं, उन्हें अर्वाक्स्रोता कहते हैं ॥ १५-१६ ॥ अस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते जायमानाः पुनः पुनः ।

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प्रेत्य भाविकमीहन्ते ऐहलौकिकमेव च ।
ददति प्रतिगृह्णन्ति तर्पयन्त्यथ जुह्वति ॥ १७ ॥

ऐसे लोग इस लोकमें बार-बार जन्म लेकर विषयजनित आनन्दमें मग्न रहते हैं और इहलोक तथा परलोकमें सुख पानेका प्रयत्न किया करते हैं। अतः वे सकाम भावसे दान देते हैं, प्रतिग्रह लेते हैं तथा तर्पण और यज्ञ करते हैं ॥ १७ ॥
रजोगुणा वो बहुधानुकीर्तिता
यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च ।
नरोऽपि यो वेद गुणानिमान् सदा
स राजसैः सर्वगुणैर्विमुच्यते ॥ १८ ॥

मुनिवरो! इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे नाना प्रकारके राजस गुणों और तदनुकूल बर्तावोंका यथावत् वर्णन किया। जो मनुष्य इन गुणोंको जानता है, वह सदा इन समस्त राजस गुणोंके बन्धनोंसे दूर रहता है ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे
सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः

सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल

ब्रह्मोवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि तृतीयं गुणमुत्तमम् ।
सर्वभूतहितं लोके सतां धर्ममनिन्दितम् ॥ १ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महर्षियो! अब मैं तीसरे उत्तम गुण (सत्त्वगुण)-का वर्णन करूँगा, जो जगत्में सम्पूर्ण प्राणियोंका हितकारी और श्रेष्ठ पुरुषोंका प्रशंसनीय धर्म है ॥ १ ॥

आनन्दः प्रीतिरुद्रेकः प्राकाश्यं सुखमेव च ।
अकार्पण्यमसंरम्भः सन्तोषः श्रद्दधानता ॥ २ ॥
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् ।
अक्रोधश्चानसूया च शौचं दाक्ष्यं पराक्रमः ॥ ३ ॥
आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति, प्रकाश, सुख, कृपणताका अभाव, निर्भयता, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, किसीके दोष न देखना, पवित्रता, चतुरता और पराक्रम—ये सत्त्वगुणके कार्य हैं ॥ २-३ ॥

मुधा ज्ञानं मुधा वृत्तं मुधा सेवा मुधा श्रमः ।
एवं यो युक्तधर्मः स्यात् सोऽमुत्रात्यन्तमश्नुते ॥ ४ ॥
नाना प्रकारकी सांसारिक जानकारी, सकाम व्यवहार, सेवा और श्रम व्यर्थ है—ऐसा समझकर जो कल्याणके साधनमें लग जाता है, वह परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ४ ॥

निर्ममो निरहङ्कारो निराशीः सर्वतः समः ।
अकामभूत इत्येव सतां धर्मः सनातनः ॥ ५ ॥
ममता, अहंकार और आशासे रहित होकर सर्वत्र समदृष्टि रखना और सर्वथा निष्काम हो जाना ही श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है ॥ ५ ॥

विश्रम्भो ह्रीस्तितिक्षा च त्याग शौचमतन्द्रिता ।
आनृशंस्यमसंमोहो दया भूतेष्वपैशुनम् ॥ ६ ॥
हर्षस्तुष्टिर्विस्मयश्च विनयः साधुवृत्तिता ।
शान्तिकर्मणि शुद्धिश्च शुभा बुद्धिर्विमोचनम् ॥ ७ ॥
उपेक्षा ब्रह्मचर्यं च परित्यागश्च सर्वशः ।
निर्ममत्वमनाशीष्ट्वमपरिक्षतधर्मता ॥ ८ ॥
विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना, कोमलता, मोहका अभाव, प्राणियोंपर दया करना, चुगली न खाना, हर्ष, संतोष, गर्वहीनता, विनय, सद्वर्ताव,

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शान्तिकर्ममें शुद्धभावसे प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्तिसे छूटना, जगत्‌के भोगोंसे उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सब प्रकारका त्याग, निर्ममता, फलकी कामना न करना तथा धर्मका निरन्तर पालन करते रहना—ये सब सत्त्वगुणके कार्य हैं॥ ६–८ ॥

मुधा दानं मुधा यज्ञो मुधाऽधीतं मुधा व्रतम् । मुधा प्रतिग्रहश्चैव मुधा धर्मो मुधा तपः ॥ ९ ॥ एवंवृत्तास्तु ये केचिल्लोकेऽस्मिन् सत्त्वसंश्रयाः । ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्थास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ १० ॥ सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, धर्म और तप—ये सब व्यर्थ हैं—ऐसा समझकर जो उपर्युक्त बर्तावका पालन करते हुए इस जगत्‌में सत्यका आश्रय लेते हैं और वेदकी उत्पत्तिके स्थानभूत परब्रह्म परमात्मामें निष्ठा रखते हैं, वे ब्राह्मण ही धीर और साधुदर्शी माने गये हैं ॥ ९-१० ॥

हित्वा सर्वाणि पापानि निःशोका ह्यथ मानवाः । दिवं प्राप्य तु ते धीराः कुर्वते वै ततस्तनूः ॥ ११ ॥ वे धीर मनुष्य सब पापोंका त्याग करके शोकसे रहित हो जाते हैं और स्वर्गलोकमें जाकर वहाँके भोग भोगनेके लिये अनेक शरीर धारण कर लेते हैं ॥ ११ ॥

ईशित्वं च वशित्वं च लघुत्वं मनसश्च ते । विकुर्वते महात्मानो देवास्त्रिदिवगा इव ॥ १२ ॥ ऊर्ध्वस्रोतस इत्येते देवा वैकारिकाः स्मृताः । सत्त्वगुणसम्पन्न महात्मा स्वर्गवासी देवताओंकी भाँति ईशित्व, वशित्व और लघिमा आदि मानसिक सिद्धियोंको प्राप्त करते हैं। वे ऊर्ध्वस्रोता और वैकारिक देवता माने गये हैं ॥ १२ ½ ॥

विकुर्वन्तः प्रकृत्या वै दिवं प्राप्तास्ततस्ततः ॥ १३ ॥ यद् यदिच्छन्ति तत् सर्वं भजन्ते विभजन्ति च । (योगबलसे) स्वर्गको प्राप्त होनेपर उनका चित्त उन-उन भोगजनित संस्कारोंसे विकृत होता है। उस समय वे जो-जो चाहते हैं, उस-उस वस्तुको पाते और बाँटते हैं ॥ १३ ½ ॥

इत्येतत् सात्त्विकं वृत्तं कथितं वो द्विजर्षभाः । एतद् विज्ञाय लभते विधिवद् यद् यदिच्छति ॥ १४ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे सत्त्वगुणके कार्योंका वर्णन किया। जो इस विषयको अच्छी तरह जानता है, वह जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसीको पा लेता है ॥ १४ ॥

प्रकीर्तिताः सत्त्वगुणा विशेषतो यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च । नरस्तु यो वेद गुणानिमान् सदा