मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
ग्यारहवां अध्याय । ४०५
ग्यारहवां अध्याय । ४०५ तेषां सततमज्ञानां वृषलाग्न्युपसेविनाम् । पदा मस्तकमाक्रम्य दाता दुर्गाणि संतरेत् ॥ ४३ ॥ अकुर्वन् विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन् । प्रसञ्जंश्चेन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः ॥ ४४ ॥ अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः । कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात् ॥ ४५ ॥ अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्ध्यति । कामतस्तु कृतं मोहात्प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः ॥ ४६ ॥ अग्निहोत्री ब्राह्मण यदि जान-बूझकर दोनों काल हवन न करे तो एक मास चान्द्रायण करे। क्योंकि अग्निहोत्र का होम लोप करना पुत्रहत्या के समान है । जो ब्राह्मण शूद्र से धन लेकर अग्निहोत्र की उपासना करते हैं वे शूद्र ऋत्विज् हैं और वेदपा- ठियों में निंदित होते हैं । शूद्रधन से अग्निउपासना करनेवाले मूर्ख ब्राह्मणों के मस्तक पर धनदाता-शूद्र पैर रखकर परलोक में संकटों को तरजाता है। शास्त्रोक्त कर्मों को न करने और दूषित कर्मों को करने से और विषयों में आसक्ति से मनुष्य प्रायश्चित्त लायक होता है। अनजान में पाप करने पर विद्वानों ने प्रायश्चित्त कहा है । कोई श्रुतिप्रमाण से जानकर पाप करने पर प्रायश्चित्त का विधान कहा है। अज्ञान से किया पाप वेदाभ्यास से शुद्ध होता है । और ज्ञान से किया पाप विविध प्रायश्चित्तों से शुद्ध होता है ॥ ४१-४६ ॥ प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य दैवात्पूर्वकृतेन वा । न संसर्गं व्रजेत्सद्भिः प्रायश्चित्तेऽकृते द्विजः ॥ ४७ ॥ इह दुश्चरितैः केचित्केचित्पूर्वकृतैस्तथा । प्राप्नुवन्ति दुरात्मानो नरा रूपविपर्ययम् ॥ ४८ ॥
४०६ मनुस्मृति । विविध-प्रायश्चित्त । दैववश अथवा पूर्वजन्म के पाप से द्विज प्रायश्चित्त योग्य होकर बिना उसको किये सज्जनों के साथ संसर्ग न करे । कोई यहां के कोई पूर्वजन्म के दुराचार से दुष्टात्मा मनुष्य, विविधरूप- विकारों को पाते हैं ॥ ४७-४८ ॥ सुवर्णचौरः कौर्नख्यं सुरापः श्यावदन्तताम् । ब्रह्महा क्षयरोगित्वं दौश्चर्म्यं गुरुतल्पगः ॥ ४६ ॥ पिशुनः पौतिनासिक्यं सूचकः पूतिवक्रताम् । धान्यचौरोऽङ्गहीनत्वमातिरेक्यं तु मिश्रकः ॥ ५० ॥ अन्नहर्त्तामयावित्वं मौक्यं वागपहारकः । वस्त्रपहारकः श्वैत्र्यं पङ्गुतामश्वहारकः ॥ ५१ ॥ दीपहर्त्ता भवेदन्धः काणो निर्वापको भवेत् । हिंसया व्याधिभूयस्त्वमरोगित्वमहिंसया ॥ ५२ ॥ एवं कर्मविशेषेण जायन्ते सद्भिर्गर्हिताः । जडमूकन्धवधिरा विकृताकृतयस्तथा ॥ ५३ ॥ सोना का चोर बुरे नखोंवाला, शराबी काले दांतोंवाला, ब्रह्म- हत्यारा, क्षयरोगी और गुरु स्त्री-गामी चर्मरोगी होता है । चुगल की नाक सड़ती है, झूठे निंदक का मुख दुर्गन्धयुक्त होता है । अन्नचोर अङ्गहीन और अन्न में मिलावट करनेवाला अधिकाङ्ग होता है । पक्वान्न चोर को मन्दाग्नि, विद्याचोर गूंगा, वस्त्रचोर श्वेतकुष्ठी और घोड़े का चोर लूला होता है । दीप चुरानेवाला अंधा, दीप बुझानेवाला काना, हिंसा से अधिक रोगी और अहिंसा से नीरोग होता है । इस प्रकार अनेक पापकर्मों से मनुष्य जड़बुद्धि, गूँगे, अंधे, बहिरे और कुरूप होजाते हैं ॥ ४६-५३ ॥ चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुंद्धये ।
ग्यारहवां अध्याय । ४०७
ग्यारहवां अध्याय । ४०७ निन्द्यैर्हि लक्षणैर्युक्ता जायन्तेऽनिष्कृतैनसः ॥ ५४ ॥ ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः । महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ॥ ५५ ॥ अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् । गुरोश्चालीकनिर्वन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥ ५६ ॥ इसलिए पापशुद्धि के लिये नित्य प्रायश्चित्त करना चाहिएं । जो लोग नहीं करते वे दूषित लक्षणयुक्त होजाते हैं । ब्रह्महत्या, मद्यपान, सुवर्ण की चोरी, गुरुस्त्री से व्यभिचार और इन महा- पापों के करनेवाले का संसर्ग ये सब महापातक कहे हैं । अपनी बड़ाई में झूठ कहना, राजा से किसी की चुगली करना और गुरु को झूठा दोष लगाना—ये पाप ब्रह्महत्या के समान हैं ॥५४—५६॥ ब्रह्मोञ्झता वेदनिंदा कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः । गर्हितान्नाद्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट् ॥ ५७ ॥ निक्षेपस्यापहरणं नराश्वरजतस्य च । भूमिवज्रमणीनां च रुक्मस्तेयसमं स्मृतम् ॥ ५८ ॥ रेतः सेकः स्वयोनीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च । सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु गुरुतल्पसमं विदुः ॥ ५९ ॥ गोवधोऽयाज्यसंयाज्यपारदार्यात्मविक्रयाः । गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्न्योः सुतस्य च ॥ ६० ॥ परिवित्तितानुजेऽनूढे परिवेदनमेव च । तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम् ॥ ६१ ॥ कन्याया दूषणं चैव वार्धुष्यं व्रतलोपनम् । तडागारामदाराणामपत्यस्य च विक्रयः ॥ ६२ ॥
४०८ मनुस्मृति । व्रात्यता बान्धवत्यागो भृत्याध्यापनमेव च । भृत्या चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः ॥ ६३ ॥ सर्वाकरेष्वधीकारो महायन्त्रप्रवर्तनम् । हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च ॥ ६४ ॥ वेद को भूलजाना, वेद की निंदा करना, झूठी गवाही देना, मित्र का वध करना और अभक्ष्य को खाना, ये छः मद्यपान के समान हैं । धरोहर का मारना, मनुष्य, घोड़ा, चांदी, भूमि, हीरा और मणि चुराना सुवर्णचोरी के माफिक है । सहोदर बहन, कुमारी कन्या, चाण्डालिनी, मित्र और पुत्र की स्त्री से समागम करना गुरुपत्नी के साथ समागम के समान हैं । गोहत्या करना, व्रात्य, शूद्रों को यज्ञ कराना, परस्त्री से व्यभिचार, अपने को दास- रूप से बेचना, योग्य गुरु को त्यागना, निर्दोष माता-पिता को त्यागना, स्वाध्याय न करना, स्मार्त्ताग्नि को छोड़ना ये सब उप- पातक हैं। छोटा भाई पहले विवाह करके अग्निहोत्र धारण करे तो बड़ा भाई 'परिवित्ति' कहाता है, उस बड़े और छोटे भाई को कन्या देना, उनको ऋत्विज् बनाना, कन्या को दूषण लगाना, शास्त्रमर्यादा से ब्याज अधिक लेना, व्रत को तोड़ना, तालाब, बगीचा, स्त्री और सन्तान को बेचना, समय पर संस्कार न करना, बांधवों का पालन न करना, शिष्यों से मासिक लेकर पढ़ाना, नौकरी देकर पढ़ना, न बेचने योग्य घी-दूध आदि बेचना, सोने की खानों पर राजाज्ञा से अधिकारी होना, बड़े यन्त्र-कलों का चलाना, हरी जड़ी बूटियों को काटना, स्त्री से जीविका करना, अभिचार करना और वशीकरण करना-ये सब उपपातक हैं॥५७-६४॥ इन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम् । आत्मार्थं च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा ॥ ६५ ॥ अनाहिताग्निता स्तेयमृणानामनपक्रिया । असच्छास्त्राधिगमनं कौशीलव्यस्य च क्रिया ॥ ६६ ॥
ग्यारहवां अध्याय । ४०६
ग्यारहवां अध्याय । ४०६ धान्यकुप्यपशुस्तेयं मद्यपस्त्रीनिषेवणम् । स्त्रीशूद्रविद्विक्षत्रवधो नास्तिक्यं चोपपातकम् ॥ ६७ ॥ ब्राह्मणस्य रुजःकृत्या घ्रातिरघ्रेयमद्ययोः । जैह्यं च मैथुनं पुंसि जातिभ्रंशकरं स्मृतम् ॥ ६८ ॥ खराश्वोष्ट्रमृगेभानामजाविकवधस्तथा । संकरीकरणं ज्ञेयं मीनाहिमहिषस्य च ॥ ६६ ॥ निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् । अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् ॥ ७० ॥ कृमिकीटवयोहत्या मद्यानुगतभोजनम् । फलैधःकुसुमस्तेयमधैर्यं च मलावहम् ॥ ७१ ॥ एतान्येनांसि सर्वाणि यथोक्तानि पृथक् पृथक् । यैर्यैर्व्रतैरपोह्यन्ते तानि सम्यङ्निबोधत ॥ ७२ ॥ ईंधन के लिए हरे वृक्षों को काटना, अपने ही लिए भोजन बनाना, दूषित अन्न को खाना, समर्थ होकर भी अग्निहोत्र न लेना, चोरी करना, ऋणों को न चुकाना, असत् शास्त्रों का पढ़ना, नाच- गान में लगना, धान्य, कुप्य और पशुओं की चोरी, मद्यप स्त्री का संग, स्त्री, शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय का वध और नास्तिकता, ये सब उपपातक हैं। ब्राह्मण को पीड़ा देना, न सूंघने योग्य वस्तु को और मद्य को सूंघना, कुटिलता और पुरुष से मैथुन, ये जाति- से भ्रष्ट करनेवाले पाप हैं। गधा, घोड़ा, ऊंट, मृग, हाथी, बकरा, मेढ़ा, मछली, सांप और भैंस का वध करना, इन कर्मों को ' संकरी- करण ' पाप कहते हैं। निन्दितों से धन लेना, व्यापार, शूद्रसेवा और असत्य बोलना ये ' अपात्रीकरण ' पाप हैं। कृमि, कीट और पक्षियों का वध, मद्य के साथ भोजन, फल, काठ और फूल चुराना और अधीरता ये ' मलिनीकरण ' पाप हैं । ये सब ब्रह्म- ५२
४१० मनुस्मृति। हत्यादि पाप जो अलग अलग कहे गये हैं वे जिन जिन व्रतों से नष्ट होते हैं-उनको सावधान होकर सुनो ॥ ६५-७२ ॥ ब्रह्महा द्वादशसमाः कुटीं कृत्वा वने वसेत् । भैक्षाश्यात्मविशुद्ध्यर्थं कृत्वा शवशिरोध्वजम् ॥७३॥ लक्ष्यं शस्त्रभृतां वा स्याद्विदुषामिच्छयात्मनः । प्रास्येदात्मानमग्नौ वा समिद्धे त्रिरवाक्शिराः॥ ७४ ॥ यजेत वाश्वमेधेन स्वर्जिता गोसवेन वा । अभिजिद्विश्वजिद्भ्यां वा त्रिवृताग्निष्टुतापि वा ॥७५॥ जपन् वान्यतमं वेदं योजनान्तं शतं व्रजेत् । ब्रह्महत्यापनोदाय मितभुङ्नियतेन्द्रियः ॥ ७६ ॥ सर्वस्वं वेदविदुषे ब्राह्मणायोपपादयेत् । धनं वा जीवनायालं गृहं वा सपरिच्छदम् ॥ ७७ ॥ हविष्यभुग्वाऽनुसरेत् प्रतिस्रोतः सरस्वतीम् । जपेद्वा नियताहारस्त्रिर्वे वेदस्य संहिताम् ॥ ७८ ॥ कृतावपनो निवसेद् ग्रामान्ते गोव्रजेऽपि वा । आश्रमे वृक्षमूले वा गोब्राह्मणहितेरतः ॥ ७९ ॥ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा सद्यः प्राणान् परित्यजेत् । मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता गोर्ब्राह्मणस्य च ॥ ८० ॥ ब्रह्महत्या—प्रायश्चित्त । ब्रह्महत्या-पातक से निवृत्ति के लिए बारह वर्ष तक वन में कुटी बनाकर रहे, भिक्षा मांगकर खावे और झोपड़ी में मुरदे की खोपड़ी टांगे । अथवा शस्त्रधारियों की इच्छानुसार पातक ज़ाहिर होने
ग्यारहवां अध्याय । ४११
ग्यारहवां अध्याय । ४११ का निशान करे, या जलती आग में नीचा शिर करके तीनबार कूदे । अथवा अश्वमेध, स्वर्गजित्, अभिजित्, गोसव, विश्वजित्, त्रिवृत् और अग्निष्टुत् इन यज्ञों में कोईसा करे । अथवा मिता- हारी जितेन्द्रिय होकर, किसी वेद का पाठ करता हुआ सौ योजन तक चलाजाय । अथवा वेदज्ञ ब्राह्मण को अपना सर्वस्व या जी- विका योग्य धन, वा सब सामग्री सहित घर देदेवे । अथवा हविष्य भोजन करता हुआ सरस्वती नदी के सोते की तरफ़ गमन करे। या नियमित भोजन करके तीनों वेद संहिताओं का पाठ करे। या दाढ़ी, मूंछ मुड़ाकर, गांव के बाहर गौगोठ में, आश्रम में, या वृक्ष के जड़ में रहकर, गो-ब्राह्मण के हितसाधन में लगा रहे । अथवा ब्राह्मण और गौ के निमित्त तुरंत प्राण त्याग देने से ब्रह्म- हत्या से मुक्त होजाता है ॥ ७३-८० ॥ त्रिवारं प्रतिरोद्धा वा सर्वस्वमवजित्य वा । विप्रस्य तन्निमित्ते वा प्राणालाभे विमुच्यते ॥ ८१ ॥ एवं दृढव्रतो नित्यं ब्रह्मचारी समाहितः । समाप्ते द्वादशे वर्षे ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ८२ ॥ शिष्ट्वा वा भूमिदेवानां नरदेवसमागमे । स्वमेनोऽवभृथस्नातो हयमेधे विमुच्यते ॥ ८३ ॥ धर्मस्य ब्राह्मणो मूलमग्रं राजन्य उच्यते । तस्मात्समागमे तेषामेनो विख्याप्य शुध्यति ॥ ८४ ॥ कोई चोर ब्राह्मण का धन चुराकर लिये जाता हो तो उस पर तीन बार चढ़ाई करके धन को लौटालावे या न लावे तो भी ब्रह्म- हत्या से छूट जाता है। अथवा जब धन के लिए यह ब्राह्मण युद्ध करके मरने को तैयार हो, तब उतना धन देकर उसका प्राण बचाने से भी ब्रह्महत्या से छूटजाता है। इस प्रकार, ब्रह्मचर्य से दृढ़तापूर्वक व्रत ठाननेवाला बारह वर्ष में ब्रह्महत्या से छूटजाता
४१२ मनुस्मृति ।
है। या अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मण और राजा के सामने अपना पाप कहकर, अवभृथ-स्नान करने पर ब्रह्महत्या से मुक्त होता है। ब्राह्मण धर्म का मूल और क्षत्रिय अग्रभाग कहलाता है, इस लिए उनके सामने पाप कहकर शुद्ध होजाता है ॥ ८१-८४ ॥
ब्राह्मणः संभवेनैव देवानाम्पि दैवतम् । प्रमाणं चैव लोकस्य ब्रह्माचैव हि कारणम् ॥ ८५ ॥ तेषां वेदविदो ब्रूयुस्त्रयोऽप्येनः सुनिष्कृतिम् । सा तेषां पावना यस्मात्पवित्रा विदुषां हि वाक् ॥ ८६ ॥ अतोऽन्यतममास्थाय विधिं विप्रः समाहितः । ब्रह्महत्याकृतं पापं व्यपोहत्यात्मवत्तया ॥ ८७ ॥ हत्वा गर्भमविज्ञातमेतदेव व्रतं चरेत् । राजन्यवैश्यौ चेजानावत्रेयीमेव च स्त्रियम् ॥ ८८ ॥
ब्राह्मण जन्म से ही देवों का भी देव है, और उसका उपदेश वेदमूलक होने से लोक में प्रमाण माना जाता है। वेदज्ञों में तीन ब्राह्मण जो प्रायश्चित्त पाप का बतलावें, वह पापियों को पवित्र करता है। क्योंकि, ब्राह्मणों की वाणीही पावन है। इस लिए सावधान होकर कहे प्रायश्चित्तों में कोई भी करने से ब्राह्मण पाप-मुक्त होजाता है। अज्ञान में गर्भहत्या, यज्ञ करते क्षत्रिय, वैश्य और गर्भवती स्त्री का वध करके भी यही ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥ ८५-८८ ॥
उक्त्वा चैवानृतं साक्ष्ये प्रतिरुध्य गुरुं तथा । अपहृत्य च निक्षेपं कृत्वा च स्त्रीसुहृद्वधम् ॥ ८६ ॥ इयं विशुद्धिरुदिता प्रमाप्याकामतौ द्विजम् । कामतो ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते ॥ ६० ॥
साक्षी में झूठ बोलकर, गुरुको झूठा दोष लगाकर, धरोहर मार कर और स्त्री वा मित्र का वध करके ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करे। अज्ञान में द्विज का वध किया हो तो ये प्रायश्चित्त कहे हैं। परन्तु जानकर हत्या करने पर कोई प्रायश्चित्त नहीं है ॥८६-६०॥ सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णां सुरां पिबेत् । तया सकाये निर्दग्धे मुच्यते किल्बिषात्ततः ॥ ६१ ॥ गोमूत्रमग्निवर्णां वा पिबेदुदकमेव वा । पयो घृतं वाऽऽमरणाद्गोशकृद्रसमेव वा ॥ ६२ ॥ कणान् वा भक्षयेदब्दं पिण्याकं वा सकृन्निशि । सुरापानापनुत्त्यर्थं बालवासा जटी ध्वजी ॥ ६३ ॥ सुरा वै मलमन्नानां पाप्मा च मलमश्नुते । तस्माद्ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत् ॥ ६४ ॥ गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा । यथैवैका तथा सर्वा न पातव्या द्विजात्तमैः ॥ ६५ ॥ यक्षरक्षःपिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम् । तद्ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हविः ॥ ६६ ॥ मद्यपान-प्रायश्चित्त। द्विज अज्ञान से मद्य पीकर, आग के मुवाफ़िक़ तपाकर मद्य पीवे, उससे शरीर जलजाने पर पाप से छूटता है अथवा गोमूत्र, जल, गौ का दूध, घी, गोबर का रस इनमें किसी पदार्थ को आग के मुवाफ़िक़ लाल करके मरणान्त पिया करे । या अन्नकण या तिलं की खली एक साल तक रात में एक बार खाय । कम्बल ओढ़कर, बाल रखकर और मद्यपात्र का चिह्न धारण करे । सुरा अन्न का मल है और मल को पाप कहते हैं। इस कारण ब्राह्मण-क्षत्रिय-
४१४ मनुस्मृति । वश्य को सुरा-मद्य न पीनी चाहिए । गुड़ की, पीठे की, और महुवे की ये तीन प्रकार की मद्य होती हैं । जैसी गुड़ की है, वैसी ही दूसरी भी है । इस लिए द्विजों को न पीनी चाहिए । मद्य यक्षों का, मांस राक्षसों का और सुरा-आसव पिशाचों का भोजन है। देव-हवि खानेवालें द्विजों को यह कभी न सेवन करनी चाहिए ॥ ६१-६६ ॥ अमेध्ये वा पतेन्मत्तो वैदिकं वाप्युदाहरेत् । अकार्यमन्यत्कुर्याद्वा ब्राह्मणो मदमोहितः ॥ ६७ ॥ यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत् । तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वं च स गच्छति ॥ ६८ ॥ एषा विचित्राभिहिता सुरापानस्य निष्कृतिः । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सुवर्णस्तेयनिष्कृतिम् ॥ ६६ ॥ ब्राह्मण मद्यपान करके उसके नशे में अपवित्र स्थान में गिरता है, गोप्य वेदमन्त्र पढ़ता है और अकार्य करता है । जिस ब्राह्मण के शरीर में रहनेवाला वेदज्ञान एकबार भी मद्य से मिल जाता है उसका ब्राह्मणत्व नष्ट होजाता है और शूद्रता को प्राप्त होजाता है। यह सुरापान का प्रायश्चित्त नानाप्रकार का कहा है। अब सोना चुराने का प्रायश्चित्त कहा जायगा ॥ ६७-६६ ॥ सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो राजानमभिगम्य तु । स्वकर्म ख्यापयन् ब्रूयान् मांभवाननुशास्त्विति ॥१००॥ गृहीत्वा मुसलं राजा सकृद्धन्यात्तु तं स्वयम् । वधेन शुध्यति स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव तु ॥ १०१ ॥ तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम् । चीरवासा द्विजोऽरण्ये चरेद्ब्रह्महणो व्रतम् ॥ १०२ ॥
ग्यारहवां अध्याय । ४१५
ग्यारहवां अध्याय । ४१५ एतैर्व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः । गुरुस्त्रीगमनियं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ॥ १०३ ॥ सुवर्ण चोरी का प्रायश्चित्त । सुवर्णचोरी करनेवाला ब्राह्मण राजा के पास जाकर अपना कर्म प्रकट करे और कहे कि मेरे को आप शिक्षा दें—तब राजा उसके कंधे पर से मूसल लेकर उसको एकवार मारे । चोर मारने से शुद्ध होता है और ब्राह्मण तप से शुद्ध होजाता है । जो तप से शुद्ध होना चाहे वह चीर पहन कर वन में ब्रह्महत्या का व्रत करे । इन व्रतों से चोरी के पाप को दूर करे और गुरुपत्नीगमन के पाप को आगे लिखे व्रतों से दूर करे ॥ १००-१०३ ॥ गुरुतल्प्यभिभाष्यैनस्तप्ते स्वप्यादयोमये । सूर्मीं ज्वलन्तीं स्वाश्लिष्येन्मृत्युना स विशुध्यति १०४ स्वयं वा शिश्नवृषणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ । नैर्ऋतीं दिशमातिष्ठेदानिपातादजिह्मगः ॥ १०५ ॥ खट्वाङ्गी चीरवासा वा श्मश्रुलो विजने वने । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रमब्दमेकं समाहितः ॥ १०६ ॥ चान्द्रायणं वा त्रीन्मासानभ्यस्येन्नियतेन्द्रियः । हविष्येण यवाग्वा वा गुरुतल्पापनुत्तये ॥ १०७ ॥ एतैर्व्रतैरपोहेयुर्महापातकिनो मलम् । उपपातकिनस्त्वेवमेभिर्नानाविधैर्व्रतैः ॥ १०८ ॥ गुरुपत्नीगमन-प्रायश्चित्त । गुरुपत्नीगामी अपने पाप को कहकर लोहे की जलती हुई शय्या पर सोवे । या लोह की बनी स्त्री मूर्ति जलती हुई को चिं- पट कर मरने से पाप शुद्ध होता है । अथवा खुदही अपने लिङ्ग
४१६ मनुस्मृति । और अण्डकोशों को काटकर अंजलि में रखकर मरण तक नैऋत्य दिशा में चला जाय । या हाथ में खाट का पाया रखे, चीथड़े पहने, दाढ़ी मूंछों को बढ़ाकर निर्जन वन में एक वर्ष तक सावधानी से निवास करे। और प्राजापत्य व्रत करे । अथवा जितेन्द्रिय होकर, हविष्यान्न, जौ की लपसी खाकर तीन मास तक चान्द्रायण व्रत करे । इन व्रतों से महापातकीपुरुष अपने पापों को दूर करें और उपपातकी लोग आगे लिखे विविध व्रतों से अपने पापों का नाश करें ॥ १०४-१०८ ॥ उपपातकसंयुक्तो गोघ्नो मासं यवान् पिबेत् । कृतवापो वसेद्गोष्ठे चर्मणा तेन संवृतः ॥ १०६ ॥ चतुर्थकालमश्नीयादक्षारलवणं मितम् । गोमूत्रेणाचरेत्स्नानं द्वौ मासौ नियतेन्द्रियः ॥ ११० ॥ दिवानुगच्छेद्गास्तास्तु तिष्ठन्नूर्ध्वं रजः पिबेत् । शुश्रूषित्वा नमस्कृत्य रात्रौ वीरासनं वसेत् ॥ १११ ॥ तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वप्यनुव्रजेत् । आसीनासु तथासीनो नियतो वीतमत्सरः ॥ ११२ ॥ उपपातकों का प्रायश्चित्त । गोवध करनेवाला मुण्डन कराकर, गोचर्म ओढ़कर एक मास गौगोष्ठमें रहे और जौकी लपसी चाटे। दो मास तक गोमूत्र से स्नान करे, जितेन्द्रिय रहे, चौथे काल (दूसरे दिन सायंकाल) विना नमक का थोड़ा भोजन करे । दिन में गौओं के पीछे फिरे और खड़ा होकर उनके खुर से उड़ी धूर को पिये । गो-सेवा करे, उनको प्रणाम करे, रात में वीरासन से बैठा रहे । सदा गौओं के बैठने पर बैठे और खड़ी होने पर खड़ा हो, चलने पर चले और फिर बैठने पर बैठ जाय । यह सब प्रेमभाव से करे ॥ १०६-११२ ॥
ग्यारहवां अध्याय । ४१७
ग्यारहवां अध्याय । ४१७ आतुरामभिशस्तां वा चौरव्याघ्रादिभिर्भयैः । पतितां पङ्कलग्नां वा सर्वोपायैर्विमोचयेत् ॥ ११३ ॥ उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् । न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥ ११४ ॥ आत्मनो यदि वान्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवा खले । भक्षयन्तीं न कथयेत्पिबन्तं चैव वत्सकम् ॥ ११५ ॥ अनेन विधिना यस्तु गोघ्नो गामनुगच्छति । स गोहत्याकृतं पापं त्रिभिर्मासैर्व्यपोहति ॥ ११६ ॥ वृषभैकादशा गाश्च दद्यात्सुचरितव्रतः । अविद्यमाने सर्वस्वं वेदविद्भ्यो निवेदयेत् ॥ ११७ ॥ रोगी, चोर, वाघ के भय से व्याकुल गिरीहुई कीचड़ में फंसी हुई गौ को सब उपायों से मुक्त करे। धूप में, वर्षा में, शीत में और आंधी चलने पर यथाशक्ति गौ की रक्षा करे फिर अपनी रक्षा करे। अपने वा दूसरे के घर में, खेत में, खरिहान में चरती गौ को और दूध पीते बछड़े को किसी से न कहे। जो गोवध करने वाला पुरुष इस विधि से गोसेवा करता है वह तीन मास में गो- हत्या के पाप से मुक्त होजाता है। इसभांति व्रत करनेवाला एक बैल और दश गौ दान करे। यह पास न हो तो वेदज्ञ-ब्राह्मण को सर्वस्व अर्पण कर देवे ॥ ११३-११७ ॥ एतदेव व्रतं कुर्यु रुपपातकिनो द्विजाः । अवकीर्णिवर्ज्यं शुद्ध्यर्थं चान्द्रायणमथापिवा ॥ ११८॥ अवकीर्णी तु काणेन गर्दभेन चतुष्पथे । पाकयज्ञविधानेन यजेत निर्ऋतिं निशि ॥ ११९ ॥ ५३
खण्डित करनेवाला अवकीर्णी होता है । वह रात को काने गधे
४१८ मनुस्मृति। हुत्वाग्नौ विधिवद्धोमानन्ततश्च समेत्यृचा । वातेन्द्रगुरुवह्नीनां जुहुयात् सर्पिषाहुतीः ॥ १२० ॥ अवकीर्णी को छोड़कर दूसरे उपपातकी द्विज अपनी शुद्धि के लिए इसी व्रत को या चान्द्रायण व्रतको करें। परस्त्री से ब्रह्मचर्य खण्डित करनेवाला अवकीर्णी होता है । वह रात को काने गधे पर चढ़कर चौराहा में जाकर पाकयज्ञ के विधान से निर्ऋति देवता का यज्ञ करे। अग्नि में विधि से होम करके 'सं मा सि- ञ्चन्तु मरुतः—'* इत्यादि ऋचा से, मरुत, इन्द्र, गुरु, और अग्नि को घृत की आहुति करे ॥ ११८-१२० ॥ कामतो रेतसः सेकं व्रतस्थस्य द्विजन्मनः । अतिक्रमं व्रतस्याहुर्धर्मज्ञा ब्रह्मवादिनः ॥ १२१ ॥ मारुतं पुरुहूतं च गुरुं पावकमेव च । चतुरो व्रतिनोऽभ्येति ब्राह्मं तेजोऽवकीर्णिनः ॥ १२२॥ एतस्मिन्नेनसि प्राप्ते वसित्वा गर्दभाजिनम् । सप्तागारांश्चरेद्भैक्षं स्वकर्मपरिकीर्तयन् ॥ १२३ ॥ तेभ्यो लब्धेन भैक्षेण वर्तयेन्नेककालिकम् । उपस्पृशंस्त्रिषवणं त्वब्देन स विशुध्यति ॥ १२४ ॥ जातिभ्रंशकरं कर्म कृत्वान्यतममिच्छया । चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं प्राजापत्यमनिच्छया ॥ १२५ ॥ संकरापात्रकृत्यासु मासं शोधनमैन्दवम् । मलिनीकरणीयेषु तप्तः स्याद्यावकैस्त्र्यहम् ॥ १२६ ॥
- 'सं मा सिञ्चन्तु मरुतः सं पूषा सं बृहस्पतिः । सं मायमग्निः सिञ्चतु प्रजया च धनेन च दीर्घमायुः कृणोतु मे ।' अथर्व०, ७ । ३ । ३३ । १.
ग्यारहवां अध्याय । ४१६
ग्यारहवां अध्याय । ४१६ तुरीयो ब्रह्महत्यायाः क्षत्रियस्य वधे स्मृतः । वैश्येऽष्टमांशो वृत्तस्थे शूद्रे ज्ञेयस्तु षोडशः ॥ १२७ ॥ अकामतस्तु राजन्यं विनिपात्य द्विजोत्तमः । वृषभैकसहस्रा गा दद्यात्सुचरितव्रतः ॥ १२८ ॥ ज्ञानधारी इच्छा से वीर्यपात करे तो उसका व्रत भङ्ग होजाता है। यह धर्मज्ञ-ब्राह्मणादियों का मत है। व्रतभङ्ग से उसका तेज वायु, इन्द्र, बृहस्पति और अग्नि इन चार व्रतधारियों को प्राप्त होता है। इस व्रतभङ्ग का पाप लगे तो गधे का चमड़ा ओढ़कर अपना कर्म करे और सात घरों से भीख मांगे और उस भिक्षा से एक बार भोजननिर्वाह करे। और तीन बार स्नान करे। इस प्रकार एक वर्ष में शुद्ध होता है। जानकर कोई जातिभ्रंश कर पाप करे तो 'सान्तपन व्रत' और अनजान में करे तो 'प्राजापत्य व्रत' करे। संकर और अपात्र करनेवाले कर्मों में एक मास चान्द्रायण व्रत शुद्ध करता है। और मलिनीकरण कर्मों में तीन दिन जौ की लपसी खाने से शुद्ध होता है। सदाचारी क्षत्रिय के वध में ब्रह्म- हत्या का चौथाई वैश्य वध में आठवां हिस्सा और शूद्रवध में सोलहवां हिस्सा-प्रायश्चित्त जानना चाहिए । यदि श्रेष्ठ द्विज अनजान में क्षत्रिय का वध करे तो विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करके बाद में एक हज़ार गौ और एक बैल का दान करे ॥ १२१-१२८ ॥ त्र्यब्दं चरेद्वा नियतो जटी ब्रह्महणो व्रतम् । वसन्दूरतरे ग्रामाद्वृक्षमूलनिकेतनः ॥ १२६ ॥ एतदेव चरेदब्दं प्रायश्चित्तं द्विजोत्तमः । प्रमाप्य वैश्यं वृत्तस्थं दद्याच्चैकशतं गवाम् ॥ १३० ॥ एतदेव व्रतं कृत्स्नं षण्मासाञ्शूद्रहा चरेत् । वृषभैकादशा वापि दद्याद्विप्राय गाः सिताः ॥ १३१ ॥
४२० मनुस्मृति। मार्जारनकुलौ हत्वा चाषं मण्डूकमेव च । श्वगोधोलूककाकांश्च शूद्रहत्या व्रतं चरेत् ॥ १३२ ॥ पयः पिवेत् त्रिरात्रं वा योजनं वाध्वनो व्रजेत् । उपस्पृशेत्स्रवन्त्यां वा सूक्तं वाब्दैवतं जपेत् ॥ १३३ ॥ अस्त्रिं कार्ष्णायसीं दद्यात् सर्पं हत्वा द्विजोत्तमः । पलालभारकं षण्ढे सैसकञ्चैक्रमाषकम् ॥ १३४ ॥ घृतकुम्भं वराहे तु तिलद्रोणन्तु तित्तिरौ । शुके द्विहायनं वत्सं क्रौञ्चं हत्वा त्रिहायनम् ॥ १३५ ॥ हत्वा हंसं बलाकां च बकं बर्हिणमेव च । वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेद्ब्राह्मणाय गाम् १३६ ॥ अथवा वह पुरुष ग्राम से दूर वृक्ष के नीचे जटा रखकर एक वर्ष तक ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करे। और यहीं प्रायश्चित्त अ- ज्ञान में सदाचारी वैश्य के वध में भी जानना चाहिए। और एकसौ गौ का दान करना चाहिए। शूद्रवध में भी यही सब प्रायश्चित्त छः मास तक करना दश श्वेतगौ और एक बैल दान करना चाहिए। विलाव, नौला, पपीहा, मेंडक, कुत्ता, छिपकली, उल्लू और कौआ को अनजान में मारकर शूद्रहत्या का व्रत करे। अथवा तीन रात तक दूध पीकर रहे या एक योजन तक मार्ग चले या तीनबार नदी में स्नान करे या ‘आपोहिष्ठा’ इत्यादि वरुणसूक्त का पाठ करे। द्विज सर्प का वध करे तो तीखे नोक का-लोह का दण्डा दान करे। नपुंसक का वध करने पर एक भार पयाल वा एक मासा सीसा देय। सूअर के वध में घी भरा घड़ा, तीतर मारने पर एक द्रोण तेल, तोता की हत्या में दो वर्ष का बछड़ा, क्रौञ्च- वध में तीन वर्ष का बछड़ा दान करे। हंस, बगली, बगला, मोर, वानर, बाज और भास इन पक्षियों को मारकर ब्राह्मण को गो- दान करे तब पाप से शुद्ध होता है ॥ १२६-१३६॥
ग्यारहवां अध्याय । ४२१
[हेडर] ग्यारहवां अध्याय । ४२१
वासो दद्याद्धयं हत्वा पञ्च नीलान् वृषान् गजम् । अजमेषावनड्वाहं खरं हत्वैकहायनम् ॥ १३७ ॥ क्रव्यादांस्तु मृगान् हत्वा धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् । अक्रव्यादान् वत्सतरीमुष्ट्रं हत्वा तु कृष्णलम् ॥ १३८ ॥ घोड़े की हत्या में वस्त्र, हाथी की हत्या में पांच नीले बैल, बकरा और मेढ़ा के लिए सांड़ और गर्दभ के वध में एक वर्ष का बछड़ा दान करे। मांसाहारी पशुओं की हत्या में दूध देनेवाली गौ, मांस न खानेवाले पशुओं की हिंसा में बछड़ी और ऊंट की हिंसा में रत्तीभर सोने का दान करना चाहिए ॥ १३७-१३८ ॥ जिनकार्मुकवस्तावीन् पृथग्दद्याद्विशुद्धये । चतुर्णामपि वर्णानां नारीर्हत्वाऽनवस्थिताः ॥ १३६ ॥ दानेन वधनिर्णैकं सर्पादीनामशक्नुवन् । एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं द्विजः पापापनुत्तये ॥ १४० ॥ अस्थिमतां तु सत्त्वानां सहस्रस्य प्रमापणे । पूर्णे चानस्यनस्थ्नां तु शूद्रहत्याव्रतं चरेत् ॥ १४१ ॥ किञ्चिदेव तु विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे । अनस्थ्नां चैव हिंसायां प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥ १४२॥ फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम् । गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम् ॥ १४३ ॥ अन्नाद्यजानां सत्त्वानां रसजानां च सर्वशः । फलपुष्पोद्भवानां च घृतप्राशोविशोधनम् ॥ १४४ ॥ चारों वर्ण की व्यभिचारिणी स्त्रियों की हत्या होने पर क्रम से मृगचर्म, धनुष, बकरा और मेढ़े का दान करे । पूर्व कहे हुए सर्प
४२२ मनुस्मृति।
आदि के प्रायश्चित्तों को न करसके तो एक एक कृच्छ्र व्रत करे। हजार हड्डीवाले जीवों की हत्या और बिना हड्डीवाले गाड़ी भर जीवों की हत्या में शूद्रहत्या का प्रायश्चित्त करे। अस्थि-हड्डी वाले प्राणियों की हत्या में ब्राह्मण को कुछ दक्षिणा दे और अस्थि- रहितों की हत्या में प्राणायाम से शुद्ध होता है। फल देनेवाले वृक्ष, गुल्म, बेल, लता और फूलवाले पौधों को व्यर्थ काटने पर सौ ऋचाओं का पाठ करे। सब भांति के अन्न, रस, फल-पुष्पादिमें पैदा हुए जीवों के वध में 'घृत-प्राशन' शुद्ध करता है ॥ १३६-१४४॥ कृष्टजानामोषधीनां उत्पन्नानां स्वयं वने । वृथालम्भेऽनुगच्छेद्रां दिनमेकं पयोव्रतः ॥ १४५ ॥ एतैर्व्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम् । ज्ञानाज्ञानकृतं कृत्स्नं शृणुतानाद्यभक्षणे ॥ १४६ ॥ खेत में या वन में स्वयं उत्पन्न औषधियों को व्यर्थ काटने पर एक दिन दूध पीकर गौ के पीछे फिरे। जान या अनजान में हिंसा से हुए सब पाप इन व्रतों से नष्ट होजाते हैं। अब अभक्ष्य-भक्षण का प्रायश्चित्त सुनो ॥ १४५-१४६ ॥ अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा संस्कारेणैव शुध्यति । मतिपूर्वमनिर्देश्यं प्राणान्तिकमिति स्थितिः ॥ १४७॥ अपः सुराभाजनस्था मद्यभाण्डस्थितास्तथा । पञ्चरात्रं पिबेत्पीत्वा शंखपुष्पीसृतं पयः ॥ १४८ ॥ स्पृष्ट्वा दत्त्वा च मदिरां विधिवत्प्रतिगृह्य च। शूद्रोच्छिष्टाश्च पीत्वापः कुशावारि पिबेत्त्र्यहम् ॥ १४६॥ ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमाघ्राय सोमपः । प्राणानप्सु त्रिरायम्य घृतं प्राश्य विशुध्यति ॥ १५० ॥
ग्यारहवां अध्याय । ४२३
ग्यारहवां अध्याय । ४२३ अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंसृष्टमेव च । पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ १५१ ॥ वपनं मेखलादण्डो भैक्षचर्या व्रतानि च । निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कार कर्मणि ॥ १५२ ॥ अभक्ष्य-भक्षणप्रायश्चित्त। अज्ञान में मद्यपान से संस्कार से शुद्धि होती है। जानकर पीने का कोई प्रायश्चित्त नहीं कहा है। मरणान्त में शुद्धि होती है-यही मर्यादा है। जिसने सुरा और मद्य के पात्र का जल पिया हो वह पांच दिन शंखपुष्पी का काढ़ा पिये । मद्य छूकर, देकर और विधि से ग्रहण करके और शूद्र का जूठा जल पीकर, तीन दिन कुशका उबाला जल पीये। सोमपान करनेवाला ब्राह्मण, मद्यप के मुखगंध को सूंघकर तीन प्राणायाम जलका और घृतप्राशन करने से शुद्ध होता है। अज्ञान से विष्ठा, मूत्र और मद्यका स्पर्श हुआ पदार्थ खाकर द्विजातियों का फिर संस्कार होना उचित है। द्वितीयवार संस्कार में द्विजातियों को मुण्डन, मेखला, दण्ड, भिक्षा और व्रत धारण नहीं करना होता ॥ १४७-१५२ ॥ अभोज्यानां तु भुक्त्वान्नं स्त्रीशूद्रोच्छिष्टमेव च । जग्ध्वा मांसमभक्ष्यं च सप्तरात्रं यवान् पिबेत् ॥ १५३॥ शुक्तानि च कषायांश्च पीत्वामेध्यान्यपि द्विजः । तावद्भवत्यप्रयतो यावत्तन्न व्रजत्यधः ॥ १५४ ॥ विड्वराहखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः । प्राश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥ १५५ ॥ शुष्काणि भुक्त्वा मांसानि भौमानि कवकानि च । अज्ञातं चैव सूनास्थमेतदेव व्रतं चरेत् ॥ १५६ ॥
४२४ मनुस्मृति । क्रव्यादांस्सूकरोष्ट्राणां कुक्कुटानां च भक्षणे । नरकाकखराणां च तप्तकृच्छ्रं विशोधनम् ॥ १५७ ॥ मासिकान्नं तु योऽश्नीयादसमावर्तको द्विजः । स त्रीण्यह्रान्युपवसेदेकाहं चोदके वसेत् ॥ १५८ ॥ ब्रह्मचारी तु योऽश्नीयान्मधुमांसं कथंचन । स कृत्वा प्राकृतं कृच्छ्रं व्रतशेषं समापयेत् ॥ १५६ ॥ विडालकाकाखूच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्य च । केशकीटावपन्नं च पिबेद् ब्रह्मसुवर्चलाम् ॥ १६० ॥ अभोज्यों का अन्न, स्त्री और शूद्र का जूठन खाकर और अभक्ष्य मांस खाकर सात रात जव की लपसी खावे । सिरका आदि सड़ी भोज्य वस्तु और काढ़ा पीकर बिना वमन किये द्विज शुद्ध नहीं होता। गांव का सुअर, गधा, ऊंट, सियार, वानर और कौआ का मूत्र, विष्ठा खाजाने पर, चान्द्रायण व्रत करे। सूखा मांस, ज़मीन के फूल, अज्ञात और कसाईखाने का मांस खाकर भी चान्द्रायण ही करे। कच्चे मांस खानेवाले, सुअर, ऊंट, मुरगा, मनुष्य, कौआ और गधे का मांस खाने में आजाय तो तप्तकृच्छ्र से शुद्ध होता है। बिना समावर्तन के जो ब्रह्मचारी द्विज, मा- सिक श्राद्ध का अन्न खाय वह तीन दिन उपवास करे और एक दिन जल में बैठे। जो ब्रह्मचारी किसी प्रकार मांस सेवन करले, वह प्राजापत्य व्रत करे और बाक़ी ब्रह्मचर्य को खतम करदे। बिल्ली, कौआ, चूहा, कुत्ता और नौला का जूठा और बाल, कीड़ा पड़ा अन्न खाकर 'ब्रह्मसुवर्चला' का काढ़ा पीवे ॥१५३-१६०॥ अभोज्यमन्नं नात्तव्यमात्मनः शुद्धिमच्छता । अज्ञानभुक्तं तूत्तार्यं शोध्यं वाऽप्याशु शोधनैः ॥१६१॥