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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पहला अध्याय । २१

पहला अध्याय । २१ एवमाचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम् । सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहुः परम् ॥ ११० ॥ अपने आचार से हीन ब्राह्मण वेदफल को नहीं पाता । और जो आचारयुक्त है वह फलभागी होता है । इस प्रकार मुनियों ने, आचार से धर्म प्राप्ति देखकर, धर्ममूल आचारं को ग्रहण किया है ॥ १०६-११० ॥ जगतश्च समुत्पत्तिं संस्कारविधिमेव च । व्रतचर्योपचारं च स्नानस्य च परं विधिम् ॥ १११ ॥ दाराधिगमनं चैव विवाहानां च लक्षणम् । महायज्ञविधानं च श्राद्धकल्पश्च शाश्वतः ॥ ११२ ॥ वृत्तीनां लक्षणं चैव स्नातकस्य व्रतानि च । भक्ष्याभक्ष्यं च शौचं च द्रव्याणां शुद्धिमेव च ॥११३॥ स्त्रीधर्मयोगतापस्यं मोक्षं संन्यासमेव च । राज्ञश्च धर्ममखिलङ्कार्याणां च विनिर्णयम् ॥ ११४ ॥ साक्षिप्रश्नविधानं च धर्मं स्त्रीपुंसयोरपि । विभागधर्मं द्यूतं च कण्टकानां च शोधनम् ॥ ११५ ॥ अब इस धर्मशास्त्र में मनु ने, किन किन विषयों को कहे हैं, उस की संख्या बतलाते हैं-जगत् की उत्पत्ति, संस्कारों की विधि, ब्रह्म- चारियों के व्रताचरण, गुरुवन्दन, उपासना आदि, स्नानविधि, स्त्रीगमन, विवाहों का लक्षण, महायज्ञ-वैश्वदेवादि, श्राद्धविधि, जीव्नोपाय, गृहस्थ के व्रतनियम, भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार, आ- शौचनिर्णय, द्रव्यशुद्धि, स्त्रियों के धर्मोपाय, वानप्रस्थ आदि तपों के धर्म, मोक्ष और संन्यासधर्म, राजाओं के संपूर्ण धर्म, कार्यों का निर्णय-साखी-गवाहियों से प्रश्नविधि, स्त्री पुरुषों के धर्म, हिस्सा-बाँट और जुआरी, चोरोंका शोधन कह।गयाहै॥१११-११५॥

२२ मनुस्मृति । वैश्यशूद्रोपचारं च सङ्कीर्णानां च सम्भवम् । आपद्धर्मं च वर्णानां प्रायश्चित्तविधिं तथा ॥ ११६ ॥ संसारगमनं चैव त्रिविधं कर्मसम्भवम् । निःश्रेयसं कर्मणां च गुणदोषपरीक्षणम् ॥ ११७ ॥ देशधर्मान् जातिधर्मान् कुलधर्मांश्च शाश्वतान् । पाखण्डगणधर्मांश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुक्तवान् मनुः॥ ११८ ॥ वैश्य और शूद्रों के धर्मानुष्ठान का प्रकार, वर्णसङ्करों की उत्पत्ति, वर्णों का आपद्धर्म और प्रायश्चित्तविधि, उत्तम, मध्यम, अधम इन तीन प्रकार के कर्मों से देहगति का निर्णय, मोक्ष का स्वरूप, और कर्मों के गुण दोष की परीक्षा, देश धर्म, जाति का धर्म, कुल का धर्म जो परंपरा से चला आता है । पाखण्डियों के कर्म, गण-वैश्य आदि के धर्म इस शास्त्र में भगवान् मनु ने कहा है ॥ ११६-११८ ॥ यथेदमुक्तवान् शास्त्रं पुरा पृष्टो मनुर्मया । तथेद्ं यूयमप्यद्य मत्सकाशान्निबोधत ॥ ११९ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां प्रथमोऽध्यायः ॥ जिस प्रकार, मनु से पूर्वकाल में मैंने पूछा, तब यह शास्त्र उन्हों ने उपदेश किया । उसी प्रकार अब आप मेरे से सुनिये ॥ ११९ ॥ पहला अध्याय समाप्त ॥

दूसरा अध्याय ।

अथ द्वितीयोऽध्यायः । विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः । हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत ॥ १ ॥ कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता । काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः ॥ २ ॥ दूसरा अध्याय । धर्म का लक्षण । अब धर्म का सामान्य लक्षण कहते हैं-वेदविशारद, धार्मिक, राग द्वेष से रहित, महात्माओं ने जिस धर्म का पालन किया और हृदय से स्वीकार किया उस को सुनो । पुरुष को कामफल का अभिलाषी होना अच्छा नहीं है और न बिल्कुल इच्छा का त्याग ही श्रेष्ठ है। क्योंकि बिना इच्छा, वेदाध्ययन और वैदिक कर्मों का अनुष्ठान नहीं होसकता ॥ १-२ ॥ सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसम्भवाः । व्रता नियमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ॥ ३ ॥ अकामस्य क्रिया काचिद्दृश्यते नेह कर्हिचित् । यद्यद्धि कुरुते किंचित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥ ४ ॥ तेषु सम्यग्वर्तमानो गच्छत्यमरलोकताम् । यथा सङ्कल्पितांश्चेह सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ५ ॥ इस कर्म से यह इष्टफल होगा-यही संकल्प है । इसलिए सब कामों का मूल संकल्प है। यज्ञादि सब संकल्प से ही होते हैं। व्रत, नियम, धर्म सब संकल्प से किये जाते हैं अर्थात् बिना संकल्प

२४ मनुस्मृति । कुछ नहीं होसकता । संसार में कोई कर्म बिना इच्छा के होते नहीं देखा गया । शास्त्रोक्त कर्मों का भलीभांति अनुष्ठान करने से स्वर्ग- लोक की प्राप्ति और इष्टकाम पूरे होते हैं ॥ ३-५ ॥ वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥ ६ ॥ संपूर्ण वेद, धर्ममूल हैं-वेदवेत्ताओं की स्मृति और शील- ब्रह्मज्ञता, साधु पुरुषों का आचार, और आत्म-सन्तोष ये धर्म में प्रमाण माने जाते हैं ॥ ६ ॥ यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ ७ ॥ सर्वं तु समवेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा । श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥ ८ ॥ श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः । इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ६ ॥ जिस वर्ण का जो धर्म मनु ने कहा है, वह सब वेदोक्त है । वेद संपूर्ण ज्ञान का भण्डार है । विद्वान्, ज्ञानदृष्टिसे, वेदप्रमाण द्वारा धर्मशास्त्र को जानकर, अपने धर्म में श्रद्धा करे । जो पुरुष, वेद और स्मृतियों में कहे धर्मों का पालन करताहै, वह संसार में कीर्ति पाकर, परलोक में अक्षय सुख पाता है ॥ ७-६ ॥ श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥ १०॥ योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः । स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ ११ ॥ वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥

दूसरा अध्याय । २५

दूसरा अध्याय । २५ श्रुति वेद को और स्मृति धर्मशास्त्र को कहते हैं। ये दोनों. सब विषयों में निर्विवाद, तर्क-कुतर्क रहित हैं। क्योंकि, इन्हीं से धर्म का प्रकाश हुआ है। जो द्विज, कुतर्कों से इनकी निन्दा करते हैं, वे नास्तिक हैं, वेदनिन्दक हैं। वे शिष्टसमाज से निकाल देने योग्य हैं। वेद, स्मृति, सदाचार, और अपना सन्तोष, ये चार प्रकार के धर्मलक्षण, मुनियों ने कहे हैं ॥ १०–१२ ॥ अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते । धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥ १३ ॥ श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ । उभावपि हि तौ धर्मौ सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ १४ ॥ उदितेऽनुदिते चैव समयाध्युषिते तथा । सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकीश्रुतिः ॥ १५ ॥ निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः । तस्यशास्त्रेऽधिकारोऽस्मिन ज्ञेयोनान्यस्यकस्यचित् ॥१६॥ जो पुरुष, अर्थ-प्रयोजन, काम-अभिलाष में नहीं फँसे हैं उनको धर्म ज्ञान होता है। धर्म जाननेवालों के लिए, सब से श्रेष्ठ प्रमाण श्रुति है। जहां श्रुति दो प्रकार की हो अर्थात् एक ही विषय को दो तरह से कहें, वहां दोनों वचन धर्म में प्रमाण हैं * यह ऋषियों ने कहा है । श्रुतिभेद की मान्यता दिखलाते हैं-उदितकाल-सूर्यो- दयकाल में, अनुदित-सूर्योदय से पूर्व में, समयाध्युषित-सूर्य, नक्षत्र- वर्जितकाल में, सर्वथा यज्ञ-होम होता है, यह वैदिकी श्रुति है † । यों ज्ञात होता है एकही श्रुति कालभेद कहती है और उन में

  • जावालिवचन है-‘श्रुतिस्मृतिविरोघे तु श्रुतिरेव गरीयसी । अविरोधे सदा कार्य स्मार्त वैदिकवत्सदा ॥’ जैमिनि ने मीमांसा में ‘औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्’ ‘औदुम्बरी सर्वावेष्टयितव्या’ इन दो श्रुति-स्मृति वाक्यों के विरोध में ज्योतिष्टोम के प्रसङ्ग में श्रुति प्रामाण्यही माना है । † उदिते जुहोति । अनुदिते जुहोति । समयाध्युषिते जुहोति । ४

२६ मनुस्मृति । अलग अलग यज्ञकर्म किया जाता है। गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक जिस वर्ण (द्विजाति) के लिए वेदमन्त्रों से कर्म लिखे हैं उसी का इस शास्त्र को पढ़ने सुनने का अधिकार है दूसरों का नहीं है ॥ १३-१६ ॥ सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ॥ १७ ॥ तस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः । वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ॥ १८ ॥ देशविभाग । सरस्वती और दृषद्वती इन देवनदियों के बीच जो देश है उस को 'ब्रह्मावर्त' कहते हैं‡ जिस देशमें, परंपरा से, जो आचार चला आता है, वही वर्णों का और सङ्कीर्ण जातियों का 'सदाचार' कहा जाता है ॥ १७-१८ ॥ कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनकाः । एष ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादनन्तरः ॥ १६ ॥ एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ २० ॥ हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विनशनादपि । प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥ २१ ॥ आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त्तं विदुर्बुधाः ॥ २२ ॥ ‡ महाभारत में लिखा है-शुतुद्रि और यमुना के मध्यगत 'लक्षप्रस्रवण' नामक पर्वत से 'सरस्वती' नदी की उत्पत्ति है । कुरुक्षेत्र की उत्तर सीमा में, इसका प्रवाह प्रायः वर्षा में देखा जाता है । ऋग्वेद में भी 'इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि...'* इत्यादि वर्णन है । और दृषद्वती नदी, हास्तिनपुर के पश्चिम-उत्तर दिशा में, अम्बाला के पास कहीं नदियों में मिली है । इन दोनों के बीच में, प्राचीन आर्य ब्राह्मणों के निवास और उत्पत्ति से 'ब्रह्मावर्त' नाम प्रसिद्ध हुआ ।

दूसरा अध्याय । २७

दूसरा अध्याय । २७ कुरुक्षेत्र और मत्स्यदेश पञ्चाल और शूरसेनक * ये ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त के समीप हैं । कुरुक्षेत्रादि देशों में उत्पन्न ब्राह्मणों से सब मनुष्य अपने अपने उचित सदाचारों की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये हिमवान् पर्वत और विन्ध्याचल के बीच में, सरस्वती के पूर्व और प्रयाग के पश्चिम में, जो देश हैं, उनको 'मध्यदेश' कहते हैं । पूर्वसमुद्रसे पश्चिमसमुद्र तक, और हिमाचलसे विन्ध्या- चल के बीच में जो देश हैं, उनको 'आर्यावर्त' कहते हैं † ॥१६-२२॥ कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः । स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतःपरः ॥ २३ ॥ एतान् द्विजातयो देशान् संश्रयेरन् प्रयत्नतः । शूद्रस्तु यस्मिन् कस्मिन् वा निवसेद्वृत्तिकर्शितः॥२४॥ जिस देश में कृष्णसार मृग स्वभाव से विचरता है, वह यज्ञ क- रने योग्य देश है। इसके सिवा जो देश हैं, वे म्लेच्छ देश हैं-अ- र्थात् यज्ञ लायक नहीं हैं। इन देशों में, द्विजातियों को यत्नपूर्वक निवास करना चाहिये । और शूद्र, अपनी जीविकावश, चाहे जिस देश में निवास कर सकता है ॥ २३-२४ ॥ एषा धर्मस्य वो योनिः समासेन प्रकीर्तिता । संभवश्चास्य सर्वस्य वर्णधर्मांन्निबोधत ॥ २५ ॥ वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥ २६ ॥

  • मत्स्यदेश, राजां विराटकी राजधानी थी। जहां पाण्डवों ने एक वर्ष अज्ञात- वास किया था। पञ्चाल, दो भागों में बटा है, दक्षिण पञ्चाल और उत्तर पञ्चाल । यह आज कल का रोहिल खण्ड है । इसी के भीतर, कान्यकुब्ज देश भी है । इस देश का राजा द्रुपद था । शूरसेन देश, श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है । इसके साथ, आज कल मथुरा, वृन्दावन, आगरा मिले हैं। † आर्यों के वर्त्तन-गमागंम से अर्थात् आने जाने से, आर्यावर्त नाम पड़ा है। शेष बातें इतिहास में, प्रसिद्ध हैं ।

३८ मनुस्मृति । गार्भैर्होमैर्जातकर्मचौडमौञ्जीनिबन्धनैः । वैजिकं गार्भिकं चैनो द्विजानामपमृज्यते ॥ २७ ॥ स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः । महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ २८ ॥ वर्णधर्म । इस प्रकार, धर्म जानने का कारण और जगत् की उत्पत्ति संक्षेप से कही गई है । अब वर्णधर्म कहे जाते हैं । जो वैदिक पुण्यकर्म हैं, उनसे द्विजातियों का गर्भाधानादि शरीरसंस्कार करना चाहिये । जो कि, दोनों लोक में, पवित्र करनेवाला है । गर्भाधान संस्कार, जातकर्म, चूडाकर्म, मौञ्जीबन्धन, इन संस्कारों से, शुक्र और गर्भसम्बन्धि दोष, द्विजातियों के निवृत्त होते हैं । वेदाध्ययन, व्रत, होम, इज्या-ब्रह्मचारिदशा में देव-पितृतर्पण, पुत्रोत्पादन, महा- यज्ञ-पञ्चमहायज्ञ, यज्ञ-ज्योतिष्टोमादि, इन सब कर्मों के करने से, यह शरीर ब्रह्मभाव पानेयोग्य होता है ॥ २५-२८ ॥ प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते । मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिषाम् ॥ २९ ॥ नामधेयं दशम्यान्तु द्वादश्यां वास्य कारयेत् । पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ ३० ॥ बालक का, नाभिछेद के पूर्व, जातकर्म-संस्कार करे, और अपने गृह्यसूत्रोक्त विधि के अनुसार, सुवर्ण, मधु और घृत का प्राशन (चटाना) करावे । फिर आशौच निवृत्त होजाने पर, दशवें या बारहवें दिन, शुभतिथि-मुहूर्त-नक्षत्र में, बालक का नाम- करण करे ॥ २९-३० ॥ मङ्गल्यं ब्राह्मणस्य स्यात् क्षत्रियस्य बलान्वितम् । वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् ॥ ३१ ॥

दूसरा अध्याय । २६

दूसरा अध्याय । २६ शर्मवद्ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम् । वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रैष्यसंयुतम् ॥ ३२ ॥ स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम् । मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ॥ ३३ ॥ ब्राह्मण का नाम मङ्गलवाचक शब्द, क्षत्रिय का बलवाचक, वैश्य का धनयुक्त और शूद्र का दासयुक्त नाम होना चाहिये । ब्राह्मणों के नाम में शर्मा, क्षत्रियों के वर्मा, वैश्यों के भूति और शूद्रों के दास लगाना चाहिए । जैसे शिवशर्मा, रामवर्मा आदि । स्त्रियों के नाम सुख से उच्चारण योग्य, क्रूर न हो, वह साफ़, सुन्दर मङ्गलवाची, अन्त में दीर्घाक्षरवाला और आशीर्वाद-शब्द से मिला हो, जैसा सरला, विमला, यशोदा इत्यादि ॥ ३१-३३ ॥ चतुर्थे मासि कर्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् । षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मङ्गलं कुले ॥ ३४ ॥ चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः । प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्तव्यं श्रुतिचोदनात् ॥ ३५ ॥ गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम् । गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः ॥ ३६ ॥ बालक को चौथे महीने घर से बाहर निकाले । छठे महीने में उसको अन्न खिलावे, या जैसी रीति अपने कुल में हो वैसा करे । चूडाकर्म, पहले या तीसरे वर्ष* करे, यह वेद की आज्ञा है । ब्राह्मण बालक का गर्भवर्ष से आठवें वर्ष यज्ञोपवीत करे, क्षत्रिय का ग्यारहवें वर्ष और वैश्य का बारहवें वर्ष करना चाहिये † ॥३४-३६॥

  • आश्वलायनगृह्यसूत्र में लिखा है-' तृतीये वर्षे चूडाकरणं यथा कुलधर्मं वा।' प्रत्येक संस्कारों का विवरण, गृह्यसूत्रों में किया गया है । अपने अपने गृह्यसूत्रों के अनुसार, संस्कार करना चाहिए । † 'अष्टमे वर्षे ब्राह्मणमुपनयेद् गर्भाष्टमे वैकादशे क्षत्रियं द्वादशे वैश्यम् । ' आश्वलायनगृह्यसूत्र १ । २० ।

३० मनुस्मृति । ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे । राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ॥ ३७ ॥ आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते । आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः ॥ ३८ ॥ अत ऊर्ध्वं त्रयोप्येते यथाकालमसंस्कृताः । सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ ३६ ॥ नैतैःपूतैर्विधिवदापद्यपि हि कर्हिचित् । ब्राह्मान्यौनांश्च सम्बन्धानाचरेद्ब्राह्मणः सह ॥ ४० ॥ वेदाध्ययन और उसके अर्थज्ञान से बढ़ा तेज ब्रह्मवर्चस है। उसकी इच्छावाले ब्राह्मण का पांचवें वर्ष, बलार्थी क्षत्रिय का छठे वर्ष, धनी होना चाहनेवाले वैश्य का आठवें वर्ष यज्ञोपवीत संस्कार करे। सोलह वर्ष तक ब्राह्मण की सावित्री नहीं जाती। क्षत्रिय की बाइस वर्ष तक और वैश्य की चौबीस वर्ष तक नहीं जाती*। अर्थात् यह उपनयन समय की परमावधि है। इस काल के बाद, ये तीनों, समय में संस्कार न होने से, सावित्रीपतित 'व्रात्य' नामक होजाते हैं और शिष्टों से निन्दित होते हैं। इन अशुद्ध व्रात्यों के साथ आपत्तिकाल में भी ब्राह्मण को, विद्या वा विवाह का सम्बन्ध न करना चाहिए ॥ ३७-४० ॥ कार्ष्णीरौरववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः । वसीरन्नानुपूर्वेण शाणक्षौमाविकानि च ॥ ४१ ॥ मौञ्जी त्रिवृत्समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला । क्षत्रियस्य तु मौर्वीज्या वैश्यस्य शणतान्तवी ॥ ४२ ॥ मुञ्जालाभे तु कर्तव्यः कुशश्मान्तकबल्वजैः । त्रिवृता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव वा ॥ ४३ ॥

  • 'आषोडशाद्ब्राह्मणस्यानतीतः काल आद्वाविंशात् क्षत्रियस्य आचतुर्विंशा- द्वैश्यस्य । यत ऊर्ध्वं पतितसावित्रीका भवन्ति ।' आश्वलायन-गृह्यसूत्र १ । २० ।

दूसरा अध्याय । ३१

दूसरा अध्याय । ३१ कृष्णमृग, रुरुमृग और अज इनके चर्म को क्रम से तीनों वर्ण के ब्रह्मचारी धारण करें और सन, क्षौम (अलसी) और ऊन का वस्त्र धारण करें। मूंज की तिलड़ी और चिकनी मेखला ब्राह्मण की बनावे, क्षत्रिय की मूर्वा नामक वेल के रेसे की गुणसी बनावे, और वैश्य की सन के डोरे की बनाना चाहिए। यदि मूँज न मिले तो कुश, अश्मन्तक, बल्वज तृणों से तीनों वर्णों की मेखला बनावे। यह तीन लर की एक, तीन, वा पाँच गांठ लगाकर धारण करना चाहिए ॥ ४१-४३ ॥ कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् । शणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसौत्रिकम् ॥ ४४ ॥ ब्राह्मणो बैल्वपालाशौ क्षत्रियो वाटखादिरौ । पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः ॥ ४५ ॥ केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणतः । ललाटसंमितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ ४६ ॥ ऋजवस्ते तु सर्वे स्युरव्रणाः सौम्यदर्शनाः । अनुद्वेगकरा नॄणां सत्वचो नाग्निदूषिताः ॥ ४७ ॥ ब्राह्मण का यज्ञोपवीत सूत का, क्षत्रिय का सन का और वैश्य का भेड़ की ऊन का, ऊपर को बटा हुआ (दाहिने हाथ से) तीन लर का होना चाहिए । धर्मशास्त्र के अनुसार, ब्राह्मण बेल वा पलाश का दण्ड, क्षत्रिय वट वा खैर की लकड़ी का, वैश्य पीलू वा गूलर का धारण करे। ब्राह्मण का दण्ड ऊंचाई में शिखा तक, क्षत्रिय का मस्तक तक और वैश्य का नाक तक होना चाहिए । ये सब दण्ड सीधे, छेदरहित, देखने में सुन्दर, दूसरे को भय न करनेवाले, वकले के सहित और आग में न जले हुए, होने चाहिए ॥ ४४-४७ ॥ प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम् । प्रदक्षिणं परीत्याग्निं चरेद्भैक्ष्यं यथाविधि ॥ ४८ ॥

३२ : मनुस्मृति । भवत्पूर्वं चरेद्भैक्ष्यमुपनीतो द्विजोत्तमः । भवन्मध्यं तु राजन्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम् ॥ ४६ ॥ मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् । भिक्षेत भिक्षां प्रथमं याचैनं नावमानयेत् ॥ ५० ॥ ब्रह्मचारी दण्ड लेकर, सूर्य का आराधन और अग्नि की प्रद्- क्षिणा करके विधिपूर्वक भिक्षा मांगे । ब्राह्मण ब्रह्मचारी भिक्षा मांगते समय, ‘भवति भिक्षां देहि’ क्षत्रिय ‘भिक्षां भवति देहि,’ वैश्य ‘भिक्षां देहि भवति’ ऐसा बोले । ब्रह्मचारी को, पहले माता से, माता की बहन से, बहन से और जो ब्रह्मचारी का अपमान न करती हो उस से भिक्षा मांगना चाहिए ॥ ४८-५० ॥ समाहृत्य तु तद्भैक्ष्यं यावदर्थममायया । निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ॥ ५१ ॥ आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः । श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते ह्युदङ्मुखः॥५२॥ उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः । भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत्॥५३॥ पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् । दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः ॥ ५४ ॥ पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं प्रयच्छति । अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम् ॥ ५५ ॥ अपने प्रयोजन भर को निष्कपटभाव से भिक्षा लाकर, गुरु को निवेदन करे और पवित्रता से पूर्वदिशा को मुख करके आचमन- पूर्वक भोजन करे । आयु के लिए पूर्वमुख, यश के लिए दक्षिण मुख, संपत्ति के लिए पश्चिम मुख, सत्य के लिए उत्तरमुख होकर भोजन करे। द्विजों को नित्य सावधानी से आचमनपूर्वक भोजन

दूसरा अध्याय । ३३

दूसरा अध्याय । ३३ करके फिर आचमन और जल के हाथ से आँख, कान, नाक का स्पर्श करना चाहिए। अन्न को आदर से ग्रहण करे, उसकी निन्दा न करे। उसको देखकर हर्षित, पुलकित होकर सर्वथा प्रशंसा करे। यों आदर से किया हुआ भोजन शरीर और प्राणों को बल देता है नहीं तो दोनों का नाश करता है ॥ ५१-५५ ॥ नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा । न चैवाध्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद्व्रजेत् ॥ ५६ ॥ अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् । अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ ५७ ॥ उच्छिष्ट-जूंठा अन्न किसी को न दे, भोजन के बीच ठहर ठहर कर भोजन न करे, अधिक भोजन न करे और जूंठे मुंह कहीं न जाय । अतिभोजन से आरोग्य और आयु में बाधा होती है, यह स्वर्ग और धर्म का विरोधी है। लोक में भी अच्छा नहीं माना जाता, इसलिए अतिभोजन न करना चाहिए ॥ ५६-५७ ॥ ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत् । कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ॥ ५८ ॥ अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्मं तीर्थं प्रचक्षते । काय मङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः ॥ ५६ ॥ त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यांत्ततो मुखम् । खानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मानं शिर एव च ॥ ६० ॥ अनुष्णाभिरफेनाभिरद्भिस्तीर्थेन धर्मवित् । शौचेप्सुः सर्वदाचामेदेकान्ते प्रागुदङ्मुखः ॥ ६१ ॥ हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठगाभिस्तु भूमिपः । वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ॥ ६२ ॥ ब्राह्मण सदा ब्राह्मतीर्थ से आचमन करे, या प्रजापतितीर्थ

३४ मनुस्मृति । और देवतीर्थ से करे परन्तु पितृतीर्थ से कभी आचमन न करे। अँगूठे के मूल को ब्राह्मतीर्थ कहते हैं । अँगुलीयों के मूलभाग को प्रजापतितीर्थ अग्रभाग को देवतीर्थ और अँगूठा-तर्जनी के मध्य भाग को पितृतीर्थ कहते हैं। आचमन के समय तीन वार आचमन करके दो वार मुख धोवे और आँख, कान, नाक, मुख आदि इन्द्रिय, हृदय और शिर का जल से स्पर्श करे। धर्मज्ञ पुरुष, पवित्र होने की इच्छा से, नित्य, एकान्त में पूर्व या उत्तरमुख बैठकर, शीतल और फेन (झाग) रहित जल से, ब्राह्म आदि तीर्थों से आचमन करे। यह आचमन जल हृदय तक पहुँच जाने से ब्राह्मण, कण्ठतक क्षत्रिय, मुख गीला होने से वैश्य और ओठ स्पर्श से शूद्र पवित्र होता है—अर्थात् इसी हिसाब से जल लेकर अपना अपना आच- मन करना चाहिए ॥ ५८-६२ ॥ उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीतीत्युच्यते द्विजः । सव्ये प्राचीनावीती निवीती कण्ठसज्जने ॥ ६३ ॥ मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम् । अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवत् ॥ ६४ ॥ बायें कांध पर जनेऊ रखकर, दाहने हाथ को बाहर निकालने से द्विज 'उपवीती' कहा जाता है। दाहने कांध पर से बायें तरफ़ लटकाने से 'प्राचीन आवीती' और गले में मालासी पहनने से 'निवीती' कहा जाता है। यदि मेखला, मृगचर्म, दण्ड, जनेऊ और कमण्डलु पुराने होजायँ या टूट जायँ तो इनको जल में फेंककर और अपने गृह्यसूत्र के मन्त्रों को पढ़कर, दूसरा धारण करना चाहिए ॥ ६३-६४ ॥ केशान्तः षोडशे वर्षे ब्राह्मणस्य विधीयते । राजन्यबन्धोर्द्वाविंशे वैश्यस्य द्वयधिके ततः ॥ ६५ ॥ अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः । संस्कारार्थं शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम् ॥ ६६ ॥

दूसरा अध्याय। ३५

दूसरा अध्याय। ३५ वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः । पतिसेवा गुरौवासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥ ६७ ॥ एष प्रोक्तो द्विजातीनामौपनायनिको विधिः । उत्पत्तिव्यञ्जकः पुण्यः कर्मयोगं निबोधत ॥ ६८ ॥ उपनीय गुरुः शिष्यं शिक्षयेच्छौचमादितः । आचारमग्निकार्यं च सन्ध्योपासनमेव च ॥ ६९ ॥ ब्राह्मण का गर्भ से सोलहवें वर्ष, क्षत्रिय का बीसवें वर्ष, और वैश्य का चौबीसवें वर्ष केशान्त-संस्कार कियाजाता है । स्त्रियों की शरीर-शुद्धि के लिए, सब संस्कार (उपनयन छोड़कर) स- मय पर क्रम से होते हैं, पर वेदमन्त्रों को न पढ़ना चाहिए । विवाह-संस्कार ही स्त्रियों का उपनयन संस्कार है, पतिसेवा ही गुरुकुल वास है, घर का काम-काज ही हवनकर्म है । यह द्विजों के द्विजत्व को करनेवाले उपनयन-संस्कार को कहा है, अब उन के कर्तव्य कर्मों को सुनो ॥ ६५-६९ ॥ अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः । ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लघुवासा जितेन्द्रियः ॥ ७० ॥ ब्रह्मारम्भेऽवसाने च पादौ ग्राह्यौ गुरोः सदा । संहत्य हस्तावध्येयं स हि ब्रह्माञ्जलिः स्मृतः ॥ ७१ ॥ शिष्य के यज्ञोपवीत संस्कारके बाद, गुरु पहले शुद्धि, आचार, प्रातःकाल और सायंकाल हवन और सन्ध्या सिखावे । पढ़नेवाले शिष्य को, छोटा वस्त्र धारण और शास्त्रविधि से उत्तरमुख आचमन करके, जितेन्द्रिय होकर, ब्रह्माञ्जलिपूर्वक पढ़ना चाहिए ॥ ७०-७१ ॥ व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः ।

३६ · मनुस्मृति । सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः ॥ ७२ ॥ अध्येष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः । अधीष्व भो इति ब्रूयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत् ॥ ७३ ॥ ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा । स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्च विशीर्यति ॥ ७४ ॥ प्राक्कूलान्पर्युपासीनः पवित्रैश्चैव पावितः । प्राणायामैस्त्रिभिः पूतस्तत ओंकारमर्हति ॥ ७५ ॥ वेदाध्ययन के आरम्भ और अन्त में सदा गुरु के चरण छुवे और हाथ जोड़कर पढ़े, इसीको 'ब्रह्माञ्जलि' कहते हैं । अलग अलग हाथसे गुरु के पैर छुवे, दहने से दहना और बायेंसे बायाँ । गुरु निरालस होकर शिष्य को पहले 'हे शिष्य पढ़ो' कहकर वेद पढ़ावे और अन्तमें 'विरामोऽस्तु' (पाठ रुक जाय) कहकर विश्राम करे । वेदाध्ययन के आदि और अन्त में 'ॐ' का उच्चारण सदा करे । यदि आदि में 'ॐ' न कहे तो विद्या में प्रेम नहीं होता और अन्त में न कहे तो पढ़ी विद्या भूल जाती है । पूर्वदिशा को कुशा- सन का अग्रभाग करके, उस पर वेदाध्यायी बैठकर, तीन प्राणा- याम करके, पवित्रता से, स्वाध्याय करने के पूर्व ॐकार का उच्चा- रण करे ॥ ७२-७५ ॥ अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीति च ॥ ७६ ॥ त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादंपादम्दूदुहत् । तदित्यृचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः॥ ७७॥ प्रजापति ने, अकार, उकार, मकार और भूः, भुवः, स्वः, इन तीन व्याहृतियों को ऋक्, यजु, और साम वेद से दुहकर सार

दूसरा अध्याय । ३७

दूसरा अध्याय । ३७ निकाला है* और तीनों वेदों से, गायत्रीऋचा के एक एक पाद को दुहा है ॥ ७६ ७७ ॥ एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ ७८ ॥ सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्त्रिकं द्विजः । महतोऽप्येनसो मासात्त्वचेवाहिविमुच्यते ॥ ७९ ॥ एतयर्चाविसंयुक्तः काले च क्रियया स्वया । ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां याति साधुषु ॥ ८० ॥ वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रातः और सायंकाल समय, ॐकार, और भूः, भुवः, स्वः, इन व्याहृतियों को पूर्व लगाकर गायत्री जपने से, वेद पढ़ने का फल पाता है । जो द्विज, ग्राम वा नगर के बाहर एकान्त में, ॐकार, तीन व्याहृति और गायत्री इन तीनों का एक हजार जप करता है, वह केंचुल से सांप की भांति, महापापों से छूट जाता है । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य गायत्री न जपता हो और समय पर अपनी अग्निहोत्रादि क्रिया न करता हो तो वह सत्पुरुषों में निन्दा पाता है ॥ ७८-८० ॥ ओंकारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः । त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ ८१ ॥ योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः । स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ॥ ८२ ॥

  • शतपथ ब्राह्मण ( ११ । ५ । = ) में लिखा है। प्रजापति ने सृष्टि की इच्छा की तो पहले पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश उत्पन्न हुआ । उसके बाद, तीनों लोकों से, क्रम से, अग्नि, वायु और सूर्य ये प्रकाशमान तीन पदार्थ प्रकट हुए। फिर इन तीनों से क्रम से ऋक्, साम और यजुर्वेद को उत्पन्न किया। अनन्तर, तीनों वेदों का बीजस्वरूप, भूः, भुवः, स्वः, का प्रादुर्भाव हुआ। प्रथमा- ध्याय के ( २३ ) श्लोक की टिप्पणी में, वेदोत्पत्ति विषय देखो।

३८ मनुस्मृति । एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परंतपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥ ८३ ॥ क्षरन्ति सर्वा वैदिक्यो जुहोति यजति क्रियाः । अक्षरं त्वक्षरं ज्ञेयं ब्रह्म चैव प्रजापतिः ॥ ८४ ॥ ॐकार, तीनों व्याहृति और तीन चरण की गायत्री इनको वेद का मुख जानना चाहिए । जो पुरुष, निरालस तीन वर्ष तक गायत्री जप करता है, वह अन्त में वायु तुल्य व्यापक होकर, परब्रह्म को पहुँचता है। 'ॐ' यह परब्रह्म का वाचक है, प्राणायाम बड़ा तप है, गायत्री से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं है और मौन रहने से सत्य बोलना उत्तम होता है। वेदोक्त होम, यज्ञ, क्रिया सब नाशवान् हैं-या उनका स्वर्गादि फलभी नाशवान् है। केवल ॐकार परब्रह्म-प्रजापतिका रूपही अविनाशी जानना चाहिए ॥८१-८४॥ विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः । उपांशु स्याच्छतगुणः साहस्त्रो मानसः स्मृतः ॥ ८५ ॥ ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः । सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ८६ ॥ जप्येनैव तु संसिद्ध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ ८७ ॥ इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु । संयमे यत्नमातिष्ठेद्विद्वान् यन्तेव वाजिनाम् ॥ ८८ ॥ विधियज्ञ-दर्शपौर्णमास से जपयज्ञ दशगुना श्रेष्ठ है । जिसमें पास में बैठा भी न सुने ऐसा उपांशुजप सौगुना श्रेष्ठ है और जिस में ओठ भी न हिलै, ऐसा मानसिक जप हज़ारगुना अच्छा कहा है। विधियज्ञ और चारों पाकयज्ञ-वैश्वदेव, बलिकर्म, नित्यश्राद्ध और अतिथिपूजन, जपयज्ञ के सोलहवें भाग के समान भी नहीं

दूसरा अध्याय । ३६

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होसकते। ब्राह्मण, गायत्रीजप से ही मुक्ति पाताहै, और यज्ञ आदि करे चाहे न करे। वह गायत्रीद्वारा मैत्र (सूर्य) की उपासना क- रने से 'मैत्र' कहा जाता है। विवेकी पुरुष को, मन को खींचने वाले विषयों से, इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए, जैसे सारथि घोड़ों को रखता है ॥ ८५-८८ ॥ एकादशेन्द्रियाण्याहुर्यानि पूर्वे मनीषिणः। तानि सम्यक् प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ८६ ॥ श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी। पायूपस्थं हस्तपादं वाक् चैव दशमी स्मृता ॥ ६० ॥ बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैषां श्रोत्रादीन्यनुपूर्वशः। कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैषां पाय्वादीनि प्रचक्षते ॥ ६१ ॥ पूर्वाचार्यों ने ग्यारह इन्द्रियां कही हैं, उनके नाम ये हैं-कान, आंख, नाक, जीभ, खाल, गुदा, मूत्रेन्द्रिय, हाथ, पैर और वाणी इन दश इन्द्रियों में पहली पांच "ज्ञानेन्द्रिय" और पिछली "कर्मेन्द्रिय" कहलाती हैं ॥ ८६-६१ ॥ एकादशं मनो ज्ञेयं स्वगुणेनोभयात्मकम् । यस्मिञ्जिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणौ ॥ ६२ ॥ इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम्। सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ ६३ ॥ न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्द्धते ॥ ६४ ॥ यश्चैतान्प्राप्नुयात् सर्वान् यश्चैनान् केवलान् त्यजेत्। प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥ ६५ ॥ ग्यारहवाँ मन है, वह अपने संकल्प-विकल्परूप गुण से दशों इ- न्द्रियों को विषयों में प्रवृत्त करता है। इसी मन को रोकने से इतर

४० मनुस्मृति। इन्द्रियां वश में होजाती हैं। इन्द्रियों के विषयों में फँसने से, अवश्य दोष होता है, पर उनको वश में रखने से मोक्ष होजाता है। विषय भोग की इच्छा उसके भोगने से कभी शान्त नहीं होती जैसे घृत से अग्नि कभी शान्त नहीं होता, बढ़ता ही है। जो पुरुष सब काम- नाओं को भोगता है और जो उन सब को छोड़ता है, इन दोनों में उनका छोड़ना ही अच्छा है ॥ ९२-९५ ॥ न तथैतानि शक्यन्ते संनियन्तुमसेवया । विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः ॥ ९६ ॥ वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च। न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ॥ ९७ ॥ श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः । न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥ ९८ ॥ विषयों में फँसी इन्द्रियों को, जैसा ज्ञान से वश में किया जास- कता है, वैसा विषयों के त्याग से नहीं किया जा सकता है। जिस का मन विषयों में लगा होता है, उसको वेदाध्ययन, दान, यज्ञ, नि- यम और तप कभी फल नहीं देते। जिसको कोई चीज़ सुनकर, या छूकर, या देखकर, या खाकर, या सूंघकर हर्ष वा शोक नहीं होता, उसको जितेन्द्रिय जानना चाहिए ॥ ९६-९८ ॥ इन्द्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतीन्द्रियम् । तेनास्य क्षरति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम् ॥ ९९ ॥ वशे कृत्वेन्द्रियग्रामं संनियम्य मनस्तथा । सर्वान् संसाधयेदर्थानक्षिएवन् योगतस्तनुम् ॥ १०० ॥ पानी की मशक में छेद होजाने से उसका पानी बाहर निकल जाता है; ऐसेही यदि इन्द्रियों में से एक भी इन्द्रिय निकल कर वि- षय में लग जावे तो मनुष्य की बुद्धि में विकार होजाता है । इस लिए इन्द्रियों को और मन को वश में करके, शरीर को क्लेश न