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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

वश पाद की व्यवस्था की जाय वह ऋक्; जहां गान के अनु-

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६ मनुस्मृति । की रचना के अनुरोध से हुआ और चौथे अथर्व-वेद का नाम अध्ययन के कारण से हुआ । आशय यह है कि जहांपर छन्दके वश पाद की व्यवस्था की जाय वह ऋक्; जहां गान के अनु- कूल व्यवस्था हो वह साम; और जहां छन्द तथा गानसे अतिरिक्त गद्यभाग हो वह यजु कहलाता है । यह ऋक्, साम तथा यजु का लक्षण जैमिनि-मुनि ने कहाहै— 'ऋग्यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था । गीतिषु सामाख्या । शेषे यजुः शब्दः ।' और इसी कारण से उक्त तीन वेद ऋग्वेद आदि के नाम से कहे जाते हैं । और ब्रह्मा जीने जिन मन्त्र-ब्राह्मणों को अपने पुत्र अथर्वा नामक ऋषि को पढ़ाया उनका संग्रह अथर्ववेद नाम से प्रसिद्ध हुआ । यह बात मुण्डकोपनिषद् में कही है । ' ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा - मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ ' उक्त चारों वेदोंके मन्त्रभाग, जो संहिता वा मन्त्रसंहिता नाम से प्रसिद्ध हैं; उनमें और उनके ब्राह्मणभाग में जो ज्ञानकाण्ड है वह उपनिषद् कहलाता है । सुप्रसिद्ध चारों वेदों की मन्त्रसंहिताओं में से केवल यजुर्वेदही की मन्त्रसंहिता का अन्तिम चालीसवां अध्याय ईशावास्यनामक उपनिषद् है, बाकी उपनिषद् ब्राह्मणभाग के अन्तर्गत हैं । और वेद का कोई भाग विशेष आरण्यक नाम से कहाजाता है । वह अरण्य १ ऋक्संहिता, यजुःसंहिता, सामसंहिता और अथर्वसंहिता ।

' ऐतरेयब्राह्मणेऽस्ति काण्डमारण्यकाभिधम् ।

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[Header] भूमिका । ७ [/Header]

अर्थात् जंगलही में पढ़ने पढ़ाने योग्य है इसलिये आरण्यक कहा गया । यह ऐतरेयारण्यक के भाष्यारम्भ में लिखा है- ' ऐतरेयब्राह्मणेऽस्ति काण्डमारण्यकाभिधम् । अरण्य एव पाठ्यत्वादाराण्यकमितीर्यते ॥ ' और ब्राह्मण-भागके अन्तर्गत एक तापिनी नामक विभाग है जिसमें विशेषतः उपासना की चर्चा की गई है ।

१ । ऋग्वेद के शाखाभेद ।

ऋग्वेद की इक्कीस शाखाएं थीं यह व्याकरण महाभाष्य के पहले आह्निक में लिखा है । वेद का अध्ययन अध्यापन के कारण जो पाठभेद होगया है वही शाखाभेद है । और वह पाठभेद कालवश न्यूनाधिकरूप से वर्तमान होकर शाखाभेद का प्रवर्त्तक हुआ। शौनक ऋषिकृत प्रातिशाख्य नामक ग्रन्थसे ऋग्वेद की ये पांच शाखा ज्ञात होती हैं-शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शाङ्खायन और माण्डूक । और विष्णुपुराण से शाकलों के ये पांच शाखाभेद प्राप्त होते हैं-मुद्गल, गोकुल, वात्स्य, शैशिर और शिशिर । शौनक का वचन- 'ऋञ्चां समूह ऋग्वेदस्तमभ्यस्य प्रयत्नतः । पठितः शाकलेनादौ चतुर्भिस्तदनन्तरम् ॥ शाङ्ख्याश्वलायनौ चैव माण्डूको वास्कलस्तथा । बह्वृचा ऋषयः सर्वे पञ्चैत एकवेदिनः ॥' विष्णुपुराण का वचन- 'मुद्गलो गोकुलो वात्स्यः शैशिरः शिशिरस्तथा । पञ्चैते शाकलाः शिष्याः शाखाभेदप्रवर्त्तकाः ॥'

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= मनुस्मृति । . इसी प्रकार ऐतरेयी, कौषीतकी, पैङ्गी आदि कितने एक शाखाभेद ग्रन्थान्तरों से और प्राप्त होते हैं । ऋग्वेदकी शाकल- संहिता और ऐतरेय तथा कौषीतक ये दो ब्राह्मणग्रन्थ उपलब्ध हैं। २। यजुर्वेद के शाखाभेद । यजुर्वेद कृष्ण और शुक्लभेद से दो प्रकार का है जिसका कारण आगे लिखा जायगा । यजुर्वेद की एकसौ एक शाखाएं थीं यह व्याकरण महाभाष्य के पहले आह्निक में लिखा है । कृष्णयजुर्वेद के बारह शाखाभेद प्राप्त होते हैं—चरक, आह्वरक, कठ, प्राच्य कठ, कापिष्ठलकठ, चारायणीय, वारतन्तवीय, श्वेत, श्वेततर, औपमन्यव, पात्यण्डिनेय और मैत्रायणीय । और मैत्रायणियों के छः शाखाभेद उपलब्ध होते हैं—मानव, वाराह, दुन्दुभ, छागलेय, हारिद्रवीय और श्यामायनीय । और चरकविशेष तैत्तिरीयों के दो शाखाभेद प्राप्त होते हैं— औखीय और खाण्डिकीय । खाण्डिकीयों के पांच शाखा- भेद मिलते हैं—आपस्तम्बी, बौधायनी, सत्याषाढ़ी, हिरण्य- केशी और शास्त्यायनी । कृष्णयजुर्वेद की कृष्ण-यजुःसंहिता, तैत्तिरीय-ब्राह्मण और तैत्तिरीय-आरण्यक सांप्रत में प्रचलित हैं । शुक्लयजुर्वेद के पंद्रह शाखाभेद हैं—काण्व, माध्यंदिन, जाबाल, बुधेय, शाकेय, तापनीय, कपोल, पौण्ड्र, वत्स, आवारिक, परमावारिक, पाराशरीय, बैनेय, वैधेय, औधेय और गालव । ये सब शाखा-प्रवर्तक वाजसनेय याज्ञवल्क्य के शिष्य होने के कारण वाजसनेयी कहलाते हैं । १ वाजसनेरपत्यं वाजसनेयः=वौजसनिका संतान वाजसनेय ।

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भूमिका । ६ शुक्लयजुर्वेद की माध्यंदिनीय-संहिता और शतपथ ब्राह्मण, प्रसिद्ध है। संहितान्तर्गत ईशावास्य, ब्राह्मणान्तर्गत बृहदारण्यक ये दो उपनिषद् प्रसिद्ध हैं । भगवान् याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति के प्रायश्चित्ताध्याय में लिखा है कि मैंने जो सूर्य से आरण्यक पाया वह आत्मज्ञानार्थ विचारने योग्य है । ‘ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान्’ ( ११० श्लो० ) यजुर्वेद के शुक्लत्व में यह कारण है- व्यास के शिष्य वैशंपायन ने याज्ञवल्क्य आदि अपने शिष्यों को यजुर्वेद पढ़ाया । एक समय किसी कारण से क्रुद्ध हो वैशंपायन ने याज्ञवल्क्य से कहा कि तुम हमारे से जो पढ़ा है उसको वापस करदो । तब याज्ञवल्क्य ने पढ़ी हुई विद्याको योगबल से मूर्तिमती बनाकर उगल दिया । उगली हुई अङ्गार के समान ) यजुर्विद्या को वैशंपायन की आज्ञा से अन्य शिष्यगण तित्तिर बनकर चुनलिया । तबसे ये यजु- र्मन्त्र उगल देनेके कारण कृष्णयजु और उनको चुननेवाले शिष्यगण तैत्तिरीय कहाये । वाद विद्यावियोग से दुःखित याज्ञवल्क्य ने सूर्य की आराधना से जो दूसरे यजुर्मन्त्र पाये उनकी शुक्लयजुः संज्ञा पड़ी । योगीश्वर-याज्ञवल्क्य ने शुक्ल- यजुर्वेद को उक्त कण्व, मध्यंदिन आदि पंद्रह शिष्यों को पढ़ाया । ३ । सामवेद के शाखाभेद । सामवेद की हज़ार शाखा थीं यह व्याकरण-महाभाष्यमें लिखा है । उनमें से ये शाखाभेद ज्ञात हैं-राणायनीय, १ योग की शक्ति जानने के लिये पातञ्जलदर्शन का विभूतिपाद देखो । २ यह वृत्त शुक्लयजुर्वेद के भाष्यारम्भ में लिखा है ।

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१० मनुस्मृति । शाख्यमुग्र, कापोल, महाकापोल, लाङ्गलिक, शार्दूल और कौथुम। कौथुमों के ये शाखाभेद हैं-आसुरायण, वातायन, प्राञ्ज, बैनधृत, प्राचीनयोग्य और नैतेय । छन्द, आरण्य, माहानाम्न और उत्तर-ये चार आर्चिक ग्रन्थ । स्तोभग्रन्थ एक । गेय, आरण्य, ऊह और ऊह्य ये चार प्रधान ग्रन्थ । माहानाम्न, भारण्ड, तवश्यायनीय और गायत्र-ये चार परिशिष्टग्रन्थ । इस प्रकार आठ ग्रन्थ गान के और छन्द आदि पांच ग्रन्थ पहले के मिलकर तेरह ग्रन्थ संहिता नाम से कहेजाते हैं। ताण्ड्य, षड्विंश, सामविधान, आर्षेय, देवताध्याय, उपनिषद्, संहितोपनिषद् और वंश, ये आठ ब्राह्मण ग्रन्थ हैं। इनका साधारण नाम छान्दोग्य ब्राह्मण है। ४ । अथर्ववेद के शाखाभेद । अथर्ववेद की नौ शाखा थीं यह व्याकरण-महाभाष्य में लिखा है। वे ये हैं-पैप्पलाद, शौनकीय, दामोद, तोतायन, जायन, ब्रह्मपलाश, कुनखी, देवदर्शी और चारणविद्य । अथर्ववेद की शौनकसंहिता और गोपथब्राह्मण प्रसिद्ध हैं। वेदों के षडङ्ग । वेदों के शिक्षाआदि छः अङ्ग हैं। जैसे अङ्ग अङ्गी के उपकारक होते हैं इसी प्रकार वेद के शिक्षा आदि उपकारक होने से अङ्ग कहलाते हैं। १ । शिक्षा । सर्वसाधारण पाणिनीय-शिक्षा है । और याज्ञवल्क्य

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भूमिका । ११ शिक्षा, कात्यायन शिक्षा, वशिष्ठ शिक्षा आदि अनेक शिक्षा- ग्रन्थ हैं । २ । कल्प । वेदोक्त कर्मों का यथावत् कल्पना जिसमें हो वह कल्प कहलाता है । कल्प दो प्रकार का है-एक श्रौतकल्प, दूसरा स्मार्तकल्प । ये दोनों ग्रन्थ वेदभेद अथवा शाखाभेद से भिन्न भिन्न हैं । श्रौतकल्प श्रौतसूत्र नाम से और स्मार्तकल्प स्मार्तसूत्र नाम से अथवा गृह्यसूत्र नाम से कहा जाता है । ३ । व्याकरण । वार्तिककार-कात्यायन और भाष्यकार पतञ्जलि द्वारा उन्नत पाणिनीय ( पाणिनिप्रोक्त अष्टाध्यायी ) व्याकरण । और वैदिक शब्दानुशासन के उपयोगी प्रातिशाख्य ग्रन्थ । ४ । निरुक्त । वेदार्थ के ज्ञान में अत्यन्त उपकारी यास्कमुनि कृत- निरुक्त । जिसके नैघण्टुक, नैगम और दैवत संज्ञक तीन काण्ड हैं । 'आद्यं नैघण्टुकं काण्डं द्वितीयं नैगमं तथा । तृतीयं दैवतं चेति समाम्नायस्त्रिधा मतः ॥' ५ । छन्द । पिङ्गल-मुनिप्रणीत छन्द, जो वैदिक तथा लौकिक भेदसे दो प्रकार का है ।

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१२ मनुस्मृति । ६ । ज्योतिष । ज्योतिष, सूर्य आदि देवता तथा ऋषियों का बनाया हुआ। जिसके सिद्धान्त, संहिता और होरा नामक तीन विशाल स्कन्ध हैं। ज्योतिःशास्त्र के कर्त्ताओं के नाम कश्यप ने अपनी संहिता में यों लिखे हैं— 'सूर्यः पितामहो व्यासो वशिष्ठोऽत्रिः पराशरः । कश्यपो नारदो गर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः ॥ लोमशः ( रोमशः ) पुलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः । शौनकोऽष्टादशैवैते ज्योतिःशास्त्रप्रवर्त्तकाः ॥' अङ्गों की कल्पना । वेद और वेदाङ्गों का जिस क्रम से उल्लेख किया गया है वह अथर्ववेदीय-मुण्डकोपनिषद् के अनुसार है। और रूपक के अनुसार शब्दब्रह्म-वेद को पुरुषकल्पना करके उसके उपकारक शिक्षा आदि छः अङ्ग नासिका आदि अवयव (अङ्ग) कल्पना किये गये हैं। जैसा— 'छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते । ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ॥ शिक्षाघ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् ॥' शिक्षा आदि छः अङ्गों की वेदोपकारकता सूर्यसिद्धान्त- समीक्षा¹ में यों दिखलाई है— 'स च यथा शिक्षया शिक्ष्यते स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रक्रियया समुपदिश्यते, व्याकरणेन व्याक्रियते तत्तच्छब्दार्थान्वाख्यानेन व्युत्पाद्यते, निरुक्तेन निरुच्यते पदपदार्थनिर्धारणेन निरूप्यते, छन्दसां छाद्यते त्रयीत्वव्यपदेशबीजेन पद्यगद्यगानरूपेण ऋग्यजुः- १-यह ग्रन्थ उक्त द्विवेदी जी का बनाया है।

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भूमिका । १३ सामबन्धेन बध्यते, कल्पेन कल्प्यते कर्मकाण्डानुपूर्व्या संपाद्यते, तथैव ज्योतिषेण द्योत्यते प्रकृतिविकृत्युभयानुभयात्मनां यज्ञाना- मनुष्ठानकालादेशेन प्रकाश्यते । ' वेदों के चार उपाङ्ग । वेद, वेदाङ्ग के समान वेदों के उपाङ्ग की नियत गणना नहीं है उसका क्रम भिन्न भिन्न प्राप्त होता है । याज्ञवल्क्योक्त क्रम पहले लिखा जा चुका है और यह दूसरा क्रम है— ‘अथ चत्वार्युपाङ्गानि वेदानां संप्रचक्षते । धर्मशास्त्रं पुराणं च मीमांसान्यायविस्तरः ॥’ ऐसी दशा में नाम क्रम की एकता नहीं हो सकती और यहांपर मीमांसा से पूर्व तथा उत्तरमीमांसा का ग्रहण किया जाता है न्याय से वैशेषिक का ग्रहण हो सकैगा; परंतु सांख्य और योग का भी ग्रहण करना उचित है क्योंकि वह भी न्याय आदि के समान आस्तिक-दर्शन हैं तो पुराण से सांख्य- योग का ग्रहण हो सकेगा । अथवा वैशेषिक-न्याय, सांख्य- योग, पूर्वमीमांसा-उत्तरमीमांसा, यह दार्शनिक विभाग स्वतन्त्र है और यही षट्शास्त्र के नाम से प्रसिद्ध है । षट्शास्त्रों का संग्राहक श्लोक । ‘न्यायवैशेषिके पूर्वं सांख्ययोगौ ततः परम् । मीमांसाद्वितयं पश्चादित्याहुर्दर्शनानि षट् ॥’ १। न्यायविस्तर । प्रमाणों से अर्थपरीक्षा के लिये शास्त्र । वह दो प्रकार का । एक न्याय दूसरा वैशेषिक । प्रमाणादि षोडश-पदार्थवादी पञ्चाध्यायी गौतम मुनिकृत न्यायशास्त्र ।

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१४ मनुस्मृति ।

द्रव्यादि सप्तपदार्थवादी दशाध्यायी कणाद मुनिकृत वैशे- षिकशास्त्र । इन दोनों का साधारणनाम 'आन्वीक्षिकी' है । न्यायभाष्य के आरम्भ में वात्स्यायन मुनिने लिखा है कि— 'प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तितः ॥' और भगवान् मनु ने भी बारहवें अध्याय के १०५-१०६ श्लोकों में उक्तविद्या की प्रशंसा की है । कपिल मुनिकृत षडध्यायी सांख्यशास्त्र और पतञ्जलि मुनिकृत चतुष्पादी योगशास्त्र कहलाता है । सांख्ययोग की महिमा श्वेताश्वतरोपनिषद् में यों कही है— 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥' २ । मीमांसा । वेद के वाक्यार्थों का बोधक शास्त्र । मीमांसा दो प्रकार की । एक पूर्वमीमांसा दूसरी उत्तर- मीमांसा (वेदान्त शास्त्र; वा वेदान्तदर्शन) पूर्वमीमांसा जैमिनि मुनिकृत बारह अध्याय । उत्तरमीमांसा व्यास मुनिकृत चार अध्याय । पहली में कर्म का दूसरी में ज्ञान का विचार है । पाराशरोपपुराण में उक्त छहः दर्शनों में से पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा की सर्वांश में प्रशंसा की है । जैसा— 'अक्षपादप्रणीते च काणादे सांख्ययोगयोः । त्याज्यः श्रुतिविरुद्धोऽशः श्रुत्येकशरणैर्नृभिः ॥

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भूमिका । १५

जैमिनीये च वैयासे विरुद्धांशो न कश्चन । श्रुत्या वेदार्थविज्ञाने श्रुतिपारं गतौ हि तौ॥' उत्तरमीमांसा और अद्वैतवाद । उत्तरमीमांसा के द्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत और द्वैताद्वैत वाद का आलम्बन करके चार प्रकार के भाष्य बनाडाले गये हैं। इन्हीं के बनानेवाले चतुःप्रस्थानी वैष्णव कहलाये जिससे आज चार संप्रदाय परस्पर विरुद्ध चल रहे हैं। इन संप्रदायों में विशिष्टाद्वैत-संप्रदाय सब से प्राचीन मालूम होता है जिसका स्थापनकाल विक्रमकी बारहवीं शताब्दी है । संप्र- दायों के विषय में यह श्लोक प्रसिद्ध है— 'रामानुजं श्रीः स्वीचक्रे मध्वाचार्यं चतुर्मुखः । श्रीविष्णुस्वामिनं रुद्रो निम्बादित्यं चतुःसनः ॥' उक्त द्वैत आदि चार वादों के अनुसारी उत्तरमीमांसा के भाष्य वेदादिविरुद्ध हैं अर्थात् अपने अपने संप्रदाय की पुष्टि के लिये श्रुति-स्मृतियों के आशयों को पलट कर वे सब भाष्य बनाये गये हैं । वेद-तथा वेदव्याससम्मत अर्थ को प्रकाश करनेवाला उत्तर- मीमांसा का 'शारीरक' नामक भाष्य है, जिसके बनाने वाले वेदव्यास के वचनानुसारी और वेदव्यास ही के शिष्य परम्परा में परिगणित आचार्य-श्री ६ शङ्कर स्वामी हैं। वेदव्यास ने कूर्मपुराण के तीसवें अध्याय में कहा है— 'कलौ रुद्रो महादेवो लोकानामीश्वरः परः । करिष्यत्यवतारं स्वं शङ्करो नीललोहितः ॥ श्रौतस्मार्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया ।

और ये शिष्यपरम्पराबोधक श्लोक हैं—

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१६ मनुस्मृति । उपदेक्ष्यति तज्ज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मसंमितम् ॥ सर्ववेदान्तसारं च धर्मान् वेद निदर्शनान् ॥ ' इति । और ये शिष्यपरम्पराबोधक श्लोक हैं— ' नारायणं पद्मभुवं वशिष्ठं शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च । व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम् ॥ श्रीशङ्कराचार्यमथास्य पद्म- पादं च हस्तामलकं च शिष्यम् । तं तोटकं वार्त्तिककारमन्या- नस्मद्गुरून् संततमानतोऽस्मि ॥ ' इति । और दादूपंथी विद्वच्छिरोमणि निश्चलदास ने अपने विचारसागर के पांचवें तरंग में लिखा है— ' चारि यार मध्वादिक जे हैं वेदविरुद्ध कहत सब ते हैं । यामें व्यासवचन सुनि लीजे शंकर मतहि प्रमान करीजे ॥ कलिमें वेद अर्थ बहु करिहैं श्रीशंकर शिव तब अवतरिहैं । जैन बुद्ध मत मूल उखारै गंगा ते प्रभु मूर्ति निकारै ॥ जैसे भानु उदय उजियारो दूरि करै जग में अंधियारो । सब वस्तुहिं ज्योंको त्यों भासै संशौ और विपर्यय नासै ॥

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भूमिका । १७ वेद अर्थ में त्यों अज्ञाना । नशिहै श्रीशंकर व्याख्याना ॥ करिहैं ते उपदेश यथारथ । नाशिहि संशय अरु अयथारथ ॥ और जु वेद अर्थ को करिहैं । ते सब वृथा परिश्रम धरिहैं ॥ यौं पुरान में व्यास कही है । शंकर मत में मान यही है ॥ मध्वादिक को मत न प्रमानी । यह हम ब्यासवचन तें जानी ॥ और प्रमान कहौं सो सुनिये । वालमीकि ऋषि मुख्य जु गिनिये॥ तिन मुनि कियो ग्रन्थ वाशिष्ठा । तामें मत अद्वैत स्पष्टा ॥ श्रीशंकर अद्वैतहि गान्यो । तिनको मत यह हेतु प्रमान्यो ॥ वाल्मीकि ऋषिवचन विरुद्धं । भेद वाद लखि सकल अशुद्धम् ॥ ’ इत्यादि । १ । आदिकवि-वाल्मीकि ऋषि ने उत्तर रामायण वासिष्ठ नाम ग्रन्थ बनाया है, वहां अद्वैत मत में प्रधान जो दृष्टि सृष्टिवाद है उसको अनेक इतिहासों से प्रतिपादन किया है, इसलिये वाल्मीकिवचन के अनुसार भी अद्वैतमत प्रमाण है और वाल्मीकिवचनविरुद्ध भेदवाद अप्रमाण है । २ । और खण्डनखण्डखाद्य तथा भेदधिक्कार आदि ग्रन्थों में अनेक युक्ति से भेदवाद का खण्डन है । किं बहुना, वेदान्तसार विष्णु शिव शक्ति आदि किसी ब्रह्मविभूति के उपासक क्यों न हों उन सब को अद्वैतमत इष्ट है । अतएव वैष्णवशिरोमणि तुलसीदास ने यह कहा है— ‘ यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषेव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः । ’ इत्यादि ।

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१८ मनुस्मृति । परमार्थ-दशा में अद्वैत वाद ही मान्य है, जिसके विषय में नानाविध श्रुति-स्मृति-पुराण वचन प्रमाण हैं जिनमें से कुछ वाक्य लिखते हैं— ‘ मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ’ इत्यादि-श्रुति । ‘ अत्रात्मव्यतिरेकेण द्वितीयं यो न पश्यति । ब्रह्मभूतः स एवेह दक्षपक्ष उदाहृतः ॥’ ‘ सर्वभूतान्तरस्थाय नित्यशुद्धचिदात्मने । प्रत्यक्चैतन्यरूपाय मह्यमेव नमोनमः ॥ ’ इत्यादि-स्मृति । उक्त विषय का उल्लेख ब्राह्मपुराण में इस प्रकार किया है— ‘ धर्माधर्मौ जन्ममृत्यू सुखदुःखेषु कल्पना । वर्णाश्रमास्तथा वासः स्वर्गे नरक एव च ॥ पुरुषस्य न सन्त्येते परमार्थस्य कुत्रचित् । दृश्यते च जगद्रूपमसत्यं सत्यवन्मृषा ॥ तोयवन्मृगतृष्णा तु यथा मरुमरीचिका । रौप्यवत्कीकसम्भूतं कीकसं शुक्तिरेव च ॥ सर्पवद्रज्जुखण्डश्च निशायां वेश्ममध्यगः । एक एवेन्दुद्वौ व्योम्नि तिमिराहतचक्षुषः ॥ आकाशस्य घनीभावो नीलत्वं स्निग्धता तथा । एकश्च सूर्यो बहुधा जलाधारेषु दृश्यते ॥ आभाति परमात्मापि सर्वोपाधिषु संस्थितः । द्वैतभ्रान्तिरविद्याख्या विकल्पो न च तत्तथा ॥ परत्र बन्धागारः स्यात्तेषामात्माभिमानिनाम् ।

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भूमिका। १६ आत्मभावनया भ्रान्त्या देहं भावयतः सदा ॥ आद्यैरादिमध्यान्तैर्भ्रमभूतैस्त्रिभिः सदा । जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तैस्तुच्छादितं विश्वतैजसम् ॥ स्वमायया स्वमात्मानं मोहयेद्द्वैतरूपया । गुहागतं स्वमात्मानं लभते च स्वयं हरिम् ॥ व्योम्नि वज्रानलज्वालाकलापो विविधाकृतिः । आभाति विष्णोः सृष्टिश्च स्वभावो द्वैतविस्तरः ॥ शान्ते मनसि शान्तश्च घोरे मूढे च तादृशः । ईश्वरो दृश्यते नित्यं सर्वत्र ननु तत्त्वतः ॥ लोहमृत्पिण्डहेम्नां च विकारो न च विद्यते । चराचराणां भूतानां द्वैतता न च सत्यतः ॥ सर्वगे तु निराधारे चैतन्यात्मनि संस्थिता । अविद्या द्विगुणां सृष्टिं करोत्यात्मावलम्बनात् ॥ सर्पस्य रज्जुता नास्ति नास्ति रज्जौ भुजङ्गता । उत्पत्तिनाशयोर्नास्ति कारणं जगतोऽपि च ॥ लोकानां व्यवहारार्थमविद्येयं विनिर्मिता । एषा विमोहिनीत्युक्ता द्वैताद्वैतस्वरूपिणी ॥ अद्वैतं भावयेद् ब्रह्म सकलं निष्कलं सदा । आत्मज्ञशोकसंतीर्णो न बिभेति कुतश्चन ॥ मृत्योः सकाशान्मरणादथवान्यकृताद्भयात् । न जायते न म्रियते न वध्यो न च घातकः ॥ न बद्धो बन्धकारी वा न मुक्तो न च मोक्षदः । पुरुषः परमात्मा तु यदतोऽन्यदसच्च तत् ॥ नहीं है एवं बुद्ध्वा जगद्रूपं विष्णोर्मायां ... वचनानुसार भोगात्सङ्गाद्भवेन्मुक्तस्त्यक्त्वा ... १ क्षादयस्तनु, २ अङ्गिरा,

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२० मनुस्मृति । त्यक्तसर्वविकल्पश्च स्वात्मसंस्थं निश्चलं मनः । कृत्वा शान्तो भवेद् योगी दग्धेन्धन इवानलः ॥ एषा चतुर्विंशतिभेदभिन्ना मायापरा प्रकृतिस्तत्समुत्थौ । कामक्रोधौ लोभमोहौ भयं च विषादशोकौ च विकल्पजालम् ॥ धर्माधर्मौ सुखदुःखे च सृष्टि- विनाशपाकौ नरके गतिश्च । वासः स्वर्गे जातयश्चाश्रमाश्च रागद्वेषौ विविधा व्याधयश्च ॥ कौमारतारुण्यजरावियोग- संयोगभोगानशनव्रतानि । इतीदमीहग्हृदयं निधाय तूष्णीमासीनः सुमतिं विविद्धि ॥' और इसी प्रकार श्रीविष्णुधर्म में कहा है— 'अनादिसंबन्धवत्या क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया । युक्तः पश्यति भेदेन ब्रह्मतत्त्वात्मनि स्थितम् ॥ पश्यत्यात्मानमन्यच्च यावद्वै परमात्मनः । तावत्संभ्राम्यते जन्तुर्मोहितो निजकर्मणा ॥ संक्षीणाशेषकर्मा तु परंब्रह्म प्रपश्यति । अभेदेनात्मनः शुद्धं शुद्धत्वादक्षयो भवेत् ॥ अविद्या च क्रियाः सर्वा विद्या ज्ञानं प्रचक्षते । ... जायते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते ॥ द्वैतभ्रान्ति... स्तौ तद्भिन्न उच्यते । परत्र बन्धागारः स्याद्यैव नृप नारकम् ॥

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भूमिका । २१ चतुर्विधोऽपि भेदोयं मिथ्याज्ञाननिबन्धनः । अहमन्योऽपरश्चायममी चात्र तथापरे ॥ अज्ञानमेतद् द्वैताख्यमद्वैतं श्रूयतां परम् । मम त्वहमिति प्रज्ञाविमुक्तमविकल्पवत् ॥ अविकार्यमनाख्येयमद्वैतमनुभूयते । मनोवृत्तिमयं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥ मनसो वृत्तयस्तस्माद्धर्माधर्मनिमित्तजाः । निरोद्धव्यास्तन्निरोधे द्वैतं नैवोपपद्यते ॥ मनोदृष्टमिदं सर्वं यत्किंचित्सचराचरम् । मनसो शमनीभावेऽद्वैतभावं तदामुयात् ॥ कर्मणां भावना येयं सा ब्रह्मपरिपन्थिनी । कर्मभावनया तुल्यं विज्ञानमुपजायते ॥ तद्वा भवति विज्ञप्तिर्यादृशी खलु भावना । क्षये तस्याः परब्रह्म स्वयमेव प्रकाशते ॥ परात्मनो मनुष्येन्द्र विभागो ज्ञानकल्पितः । क्षये तस्यात्मपरयोरविभागोऽत एव हि ॥ आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञो हि संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । तैरेव विगतः शुद्धः परमात्मा निगद्यते ॥ इत्यादि अन्यान्य पुराण वचन हैं । पुराण । भगवान् वेदव्यास के निर्मित अठारह पुराण हैं उनके नाम—१ ब्राह्म, २ पाद्म, ३ वैष्णव, ४ शैव ५ भागवत, ६ भविष्य, ७ नारदीय, ८ मार्कण्डेय- । तहाँ है १० ब्रह्मवैवर्त, ११ लैङ्ग, १२ वाराह नराक्यः। वचनानुसार १५ कौर्म, १६ मात्स्य, १७ गारु- क्षादयस्ततः मनु, २ अङ्गिरा,

‘ ब्राह्मं पुराणं प्रथमं द्वितीयं पाद्ममुच्यते ।

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[Page Header] २२ मनुस्मृति ।

‘ ब्राह्मं पुराणं प्रथमं द्वितीयं पाद्ममुच्यते । तृतीयं वैष्णवं प्रोक्तं चतुर्थं शैवमुच्यते ॥ ततो भागवतं प्रोक्तं भविष्यदाख्यं ततः परम् । सप्तमं नारदीयं च मार्कण्डेयं तथाष्टमम् ॥ आग्नेयं नवमं पश्चाद् ब्रह्मवैवर्तमेव च । ततो लैङ्गं वराहं च ततः स्कान्दमनुत्तमम् ॥ वामनाख्यं ततः कौर्मं मात्स्यं तत्परमुच्यते । गरुडाख्यं ततः प्रोक्तं ब्रह्माण्डं तत्परं विदुः ॥ ग्रन्थतश्च चतुर्लक्षं पुराणं मुनिपुङ्गवाः । अष्टादशपुराणानां कर्ता सत्यवतीसुतः ॥’ सूतसंहिता । उपपुराण । मुनियों के बनाये उपपुराण हैं उनके नाम— १ सनत्कुमारपुराण, २ नारसिंह, ३ नान्दपुराण, ४ शिव- धर्म, ५ दौर्वासस, ६ नारदीय, ७ कापिल, ८ मानव, ९ औश- नस, १० ब्रह्माण्ड, ११ वारुण, १२ कालीपुराण, १३ वासिष्ठ- लैङ्ग, १४ माहेश्वर, १५ साम्ब, १६ सौर, १७ पाराशर, १८ मारीच, १९ भार्गव । ‘ अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कीर्त्तितानि तु । आद्यं सनत्कुमारेण प्रोक्तं वेदविदां वराः ॥ द्वितीयं नारसिंहाख्यं तृतीयं नान्दमेव च । चतुर्थं शिवधर्माख्यं दौर्वासं पञ्चमं विदुः ॥ षष्ठं तु नारदीयाख्यं कापिलं सप्तमं विदुः । .....मानवं प्रोक्तं ततश्चोशनसेरितम् ॥ ..... वारुणाख्यं ततः परम् । .....वासिष्ठं मुनिपुङ्गवाः ॥

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[Header] भूमिका । २३

ततो वासिष्ठलैङ्गाख्यं प्रोक्तं माहेश्वरं परम् । ततः साम्बपुराणाख्यं ततः सौरं महाद्भुतम् ॥ पाराशरं ततः प्रोक्तं मारीचाख्यं ततः परम् । भार्गवाख्यं ततः प्रोक्तं सर्वधर्मार्थसाधकम् ॥' सूतसंहिता । पुराण और उपपुराण। विष्णुपुराण के गणनानुसार भी यही पुराण हैं केवल इतना भेद है—छठा नारदीय, सातवां मार्कण्डेय, आठवां आग्नेय, नववां भविष्य । और देवीभागवत के अनुसार वायु- पुराण, पुराणों में शिवपुराण, उपपुराणों में है । प्रमाणवाक्य स्मरण रखने योग्य है— 'मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् । अनापलिङ्कस्कानि पुराणानि पृथक् पृथक् ॥' भागवत दो प्रकार के हैं । एक विष्णुभागवत, दूसरा देवीभागवत । इनमें से एक पुराण, दूसरा उपपुराण है; क्योंकि दोनों के पुराण होने में कोई प्रमाण वाक्य नहीं प्राप्त होता । इस दशा में कौन पुराण है ? कौन उपपुराण है ? इस निर्णय के लिये महाभारत का आश्रय लेकर दोनों भागवतों का पूर्वापर देख उनके प्रारम्भिक श्लोकों को देखो और एक को पुराण दूसरे को उपपुराण मान लो । सिद्धान्त से जब ब्रह्म के विष्णु-शिव आदि नाम हैं तब पुराण अथवा उपपुराण में कहीं किसी देव के प्रतिपादन से उसका उत्कर्ष वा अपकर्ष नहीं है । और यहां— हीं है 'ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् प्रधानाब्रह्मशक्तयः । वचनानुसार ततो न्यूनाश्च मैत्रेय देवा दक्षादयस्ततः' १ मनु, २ अङ्गिरा,

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२४ मनुस्मृति । ब्रह्मविष्णुशिवादीनां यः परः स महेश्वरः ॥ ' इत्यादि वचन भी सूक्ष्मदृष्टि से विचारणीय हैं ॥ उपपुराणों के विषय में कौर्म वचन— ' आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहं ततः परम् । तृतीयं नान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम् ॥ चतुर्थं शिवधर्माख्यं साक्षान्नन्दीशभाषितम् । दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदीयमतः परम् ॥ कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम् । ब्रह्माण्डं वारुणं चैव कालिकाद्वयमेव च ॥ माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसंचयम् । पाराशरोक्तमपरं मारीचं भार्गवाह्वयम् ॥' तथा ब्रह्मवैवर्त वचन— ' आद्यं सनत्कुमारं च नारदीयं द्वितीयकम् । तृतीयं नारसिंहाख्यं शैवधर्मं चतुर्थकम् ॥ दौर्वासं पञ्चमं षष्ठं कापिलेयमतः परम् । सप्तमं मानवं प्रोक्तं शौक्रमष्टममेव च ॥ वारुणं नवमं प्राहुर्ब्रह्माण्डं दशमं स्मृतम् । कालीपुराणं च तत एकादशमुच्यते ॥ वासिष्ठलैङ्गं द्वादशं माहेशं तु त्रयोदशम् । साम्बं चतुर्दशं प्रोक्तं सौरं पञ्चदशं स्मृतम् ॥ पाराशर्यं षोडशमं मारीचं तु ततः परम् । अष्टादशं भार्गवाख्यं सर्वधर्मप्रवर्तकम् ॥' ...नसंहिता के अनुसार १६ उपपुराण हैं। कूर्म के अनु- द्वपुराण हैं उनमें 'वासिष्ठलैङ्ग' की गणना नहीं परन्त्र कूर्म के अनुसार भी १८ उपपुराण हैं उनमें...

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भूमिका । ६५ ‘ नान्द ’ की गणना नहीं की। देवीभागवत में ‘वायुपुराण ’ पुराणों में परिगणित है, परंतु सूतसंहिता आदि के अनुसार वायुपुराण न तो पुराणों में और न उपपुराणों में है। इसी प्रकार एक ‘ भागवत ’ की दशा है। विचार करने से उप- पुराणों की संख्या अष्टादशमात्र नहीं है इस कारण उक्त और तादृश अनुक्त उपपुराण ही हैं। और उपपुराणों के अन्तर्गत ‘नारदीय ’ तथा ‘ब्रह्माण्ड’ भिन्न हैं। उपपुराण पुराण ही से निकले हैं यह मात्स्यपुराण में लिखा है— ‘ पाद्मे पुराणे यत्प्रोक्तं नरसिंहोपवर्णनम् । तदष्टादशसाहस्रं नारसिंहमिहोच्यते ॥ नन्दाया यत्र माहात्म्यं कार्तिकेयेन वर्णितम् । नन्दापुराणं तल्लोके नन्दाख्यमिति कीर्तितम् ॥ यत्तु साम्बं पुरस्कृत्य भविष्येऽपि कथानकम् । प्रोच्यते तत्पुनर्लोके साम्बमेव मुनिव्रताः ॥ एवमादित्यसंज्ञं च तत्रैव परिगण्यते । अष्टादशभ्यस्तु पृथक् पुराणं यत्तु दृश्यते ॥ विजानीध्वं द्विजश्रेष्ठास्तदेतेभ्यो विनिर्गतम् ॥ ’ धर्मशास्त्र वा स्मृति । ४ । धर्मशास्त्र । ‘ श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ’ इस मनु वचन के अनुसार धर्मशास्त्र का दूसरा नाम स्मृति है। मनु आदि कई एक स्मृतियां अपने अपने कर्ता के नाम से प्रसिद्ध हैं। स्मृतियों के नामों का क्रम नियत नहीं है वह भिन्न भिन्न प्राप्त होता है। यहां पैठीनसि के वचनानुसार छत्तीस स्मृतियों का उल्लेख करते हैं- १. मनु, २ अङ्गिरा,