भारतकोश
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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

दशवां अध्याय। ३८६

दशवां अध्याय। ३८६ शस्त्र, अस्त्र धारण करना क्षत्रिय की और व्यापार, पशुपालन, खेती वैश्य की आजीविका के लिए हैं और दान देना, वेद पढ़ना, यज्ञकरना, इन दोनों का धर्म है ॥ ७२-७९ ॥ वेदाभ्यासो ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य च रक्षणम् । वार्ता कर्मैव वैश्यस्य विशिष्टानि स्वकर्मसु ॥ ८० ॥ अजीवंस्तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा । जीवेत्क्षत्रियधर्मेण स ह्यस्य प्रत्यनन्तरः ॥ ८१ ॥ उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति चेद्भवेत् । कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम् ॥ ८२ ॥ वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा । हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ॥ ८३ ॥ कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा वृत्तिः सद्भिगर्हिता । भूमिं भूमिशयांश्चैव हन्ति काष्ठमयोमुखम् ॥ ८४ ॥ इदं तु वृत्तिवैकल्यात्त्यजतो धर्मनैपुणम् । विट्पण्यमुद्धृतोद्धारं विक्रेयं वित्तवर्धनम् ॥ ८५ ॥ सर्वान् रसानपोहेत कृतान्नं च तिलैः सह । अश्मनो लवणं चैव पशवो ये च मानुषाः ॥ ८६ ॥ सर्वं च तान्तवं रक्तं शाणक्षौमाविकानि च । अपि चेत्स्युररक्तानि फलमूले तथौषधीः ॥ ८७ ॥ ब्राह्मण का वेदाभ्यास करना, क्षत्रिय का रक्षा करना और वैश्य का व्यापार करना ये अपने अपने कर्मों में विशेष कर्म हैं। ब्राह्मण यदि वेद पढ़ाकर अपनी जीविका न करसके तो क्षत्रिय के कर्म से जीविका करे । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय दोनों के कर्मों से जीविका न

३६० मनुस्मृति । करसके तो खेती, गोरक्षा आदि वैश्यजीविका से निर्वाह करे। ब्राह्मण और क्षत्रिय वैश्य जीविका से निर्वाह करता हुआ भी खेती को कभी न करे। कोई खेती को अच्छी मानते हैं, पर यह सत्पुरुषों में निन्दित है। क्योंकि इसमें हलसे जीव हिंसा, अवर्षा- सूखा आदि का डर है, पराधीन कर्म है। ब्राह्मण और क्षत्रिय की जीविका अपने कर्मों से न चले तो निन्दित कर्मों को छोड़कर, वे वैश्य वृत्ति, व्यापार का आश्रय लेवें। ब्राह्मण सब भांति के रस, सब अन्न, तिल, पत्थर, निमक, पशुओं को न बेंचे। सब प्रकार के लाल वस्त्र, सन-अलसी-ऊन के विनारँगे वस्त्र, फल, कंद, औषधों को न बेंचे ॥ ८०-८७ ॥ अपःशस्त्रं विषं मांसं सोमं गन्धांश्च सर्वशः । क्षीरं क्षौद्रं दधि घृतं तैलं मधु गुडं कुशान् ॥ ८८ ॥ आरण्यांश्च पशून् सर्वान् दंष्ट्रिणश्च वयांसि च । मद्यं नीलिं च लाक्षां च सर्वांश्चैकशफांस्तथा ॥८६॥ काममुत्पाद्य कृष्यां तु स्वयमेव कृषीवलः । विक्रीणीत तिलाञ्छुद्धान् धर्मार्थमचिरस्थितान् ॥६०॥ भोजनाभ्यञ्जनादानाद्यदन्यत्कुरुते तिलैः । कृमिभूतःश्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति ॥ ६१ ॥ सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च । त्र्यहेण शूद्रो भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयात् ॥ ६२ ॥ इतरेषां तु पण्यानां विक्रयादिह कामतः । ब्राह्मणः सप्तरात्रेण वैश्यभावं नियच्छति ॥ ६३ ॥ जल, हथियार, विष, मांस, सोमरस, सब तरहकी सुगन्धि, दूध, शहद, दही, घी, तेल, मद्य, गुड़, कुश, जंगली पशु, दाढ़वाले पशु, पक्षी, भांग, गांजा, नील, लाख और एक खुरके पशु, इन सबका

दशवां अध्याय। ३६१

दशवां अध्याय। ३६१ व्यापार न करे। ब्राह्मण किसान खेती करके तिल पैदा किये हो तो उसको यज्ञादि के लिए बेंच डाले। जो पुरुष भोजन, दान और स्नान के सिवा, दूसरे कामों में तिलका उपयोग करता है वह कीड़ा होकर पितरों के साथ कुत्ते की विष्ठा में डूबता है। मांस, लाख और लोन बेंचने से ब्राह्मण तुरंत पतित होजाता है। और दूध बेंचने से तीन दिनमें शूद्र होजाता है ॥ ८८-९३ ॥ रसा रसैर्निसातव्या न त्वेव लवणं रसैः । कृतान्नं चाकृतान्नेन तिला धान्येन तत्समाः ॥ ९४॥ जीवेदेतेन राजन्यः सर्वेणाप्यनयं गतः । न त्वेव ज्यायसीं वृत्तिमभिमन्येत कर्हिचित् ॥ ९५ ॥ ऊपर गिनाये पदार्थों को छोड़कर, दूसरे शास्त्र में निषिद्ध पदार्थों को यदि ब्राह्मण इच्छा से बेंचता है, तो वह सात रात्रि के बाद, वैश्यपने को पाता है। गुड़ आदि रसोंका घी आदि रसोंसे बदला करे, किन्तु लोन का रसों से बदला न करे। पका अन्न, कच्चा अन्न से और तिल दूसरे अन्न से बदल लेवे। इन विधियों से आपत्ति में पड़ा क्षत्रिय भी वैश्यवृत्ति से जीवन निर्वाह करे। परन्तु ब्राह्मण की जीविका से कभी जीविका न करे ॥ ९४-९५ ॥ यो लोभादधमो जात्या जीवेदुत्कृष्टकर्मभिः । तं राजा निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ ९६ ॥ वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः । परधर्मेण जीवन् हि सद्यः पतति जातितः ॥ ९७ ॥ वैश्योऽजीवन् स्वधर्मेण शूद्रवृत्त्यापि वर्तयेत् । अनाचरन्नकार्याणि निवर्तेत च शक्तिमान् ॥ ९८ ॥ अशक्नुवंस्तु शुश्रूषां शूद्रः कर्तुं द्विजन्मनाम् । पुत्रदारात्ययं प्राप्तो जीवेत्कारुककर्मभिः ॥ ९९ ॥

३६२ मनुस्मृति । यैः कर्मभिः प्रचरितैः शुश्रूष्यन्ते द्विजातयः । तानि कारुककर्माणि शिल्पानि विविधानि च ॥१००॥ वैश्यवृत्तिमनातिष्ठन् ब्राह्मणः स्वेपथि स्थितः । अवृत्तिकर्शितः सीदन्निमं धर्मं समाचरेत् ॥ १०१ ॥ सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद् ब्राह्मणस्त्वनयं गतः । पवित्रं दुष्यतीत्येतद्धर्मतो नोपपद्यते ॥ १०२ ॥ नाध्यापनाद्याजनाद्वा गर्हिताद्वा प्रतिग्रहात् । दोषो भवति विप्राणां ज्वलनाम्बुसमाहिते ॥ १०३ ॥ जो नीचजाति का पुरुष लोभ से, उत्तम जाति के कर्म से जी- विका करे, उसका धन छीनकर राजा देश से निकाल दे । अपना धर्म किसी अंश में न्यून हो तो भी अच्छा है । पर दूसरे का धर्म सर्वांग पूर्ण भी अच्छा नहीं । क्योंकि दूसरे के धर्म से जीविका करने वाला तत्काल जाति से भ्रष्ट होजाता है । यदि वैश्य अपनी वृत्ति से जीविका न कर सके तो शूद्रवृत्ति से भी निर्वाह कर सकता है । पर जूठा खाना आदि न करे और दुःख के दिन बीत जाने पर उसको छोड़ देवे । यदि शूद्र द्विजोंकी सेवा न कर सके औरउसके पुत्र, स्त्री भूखों मरते हों तो शिल्प कार्य से जीविका करे। जिन कार्यों के करने से द्विजातियों की सेवा के लिए, अवकाश मिल सके, ऐसे शिल्पकार्यों को करे । यदि ब्राह्मण धर्म मार्ग में स्थित, जीविका की कमी से दुःखी हो तो सब से दान लेवे । क्योंकि पवित्र दूषित होता हो, यह धर्म से सिद्ध नहीं होता । आपत्तिकाल में, निंदित को वेद पढ़ाने, यज्ञ कराने और उनसे दान लेने से ब्राह्मणों को दोष नहीं लगता । क्योंकि वे अग्नि और जल के समान पवित्र हैं ॥ ९६-१०३ ॥ जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः । आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ॥ १०४.॥

दशवां अध्याय। ३६३

दशवां अध्याय। ३६३ अजीगर्तः सुतं हन्तुमुपासर्पद् बुभुक्षितः । न चालिप्यत पापेन क्षुत्प्रतीकारमाचरन् ॥ १०५ ॥ श्वमांसमिच्छन्नार्त्तोऽत्तुं धर्माधर्मविचक्षणः । प्राणानां परिरक्षार्थं वामदेवो न लिप्तवान् ॥ १०६ ॥ भरद्वाजः क्षुधार्तस्तु सपुत्रो विजने वने । बह्वीर्गाः प्रतिजग्राह वृधोस्तक्षणो महातपाः ॥ १०७ ॥ क्षुधार्त्तश्चात्तुमभ्यागाद्विश्वामित्रः श्वजाघनीम् । चण्डालहस्तादादाय धर्माधर्मविचक्षणः ॥ १०८ ॥ प्राणान्त दुःख न पड़कर, जो पुरुष मनमाना अन्न खाता है, वह कीच से आकाश के समान, पाप से लिप्त नहीं होता। भूखसे दुःखी अजीगर्त ऋषि (सौ गो के लोभ से) पुत्र मारने को तैयार हुए थे पर उन्हें दोष नहीं लगा। धर्माधर्म के ज्ञाता वामदेव ऋषि क्षुधा से प्राणरक्षार्थ कुत्ता का मांस खाना चाहा। महातपस्वी भरद्वाज पुत्रसहित निर्जन वन में क्षुधा से पीड़ित होकर, वृधु- नामक बढ़ई से बहुत गौ दान में लीथीं। धर्माधर्म के ज्ञाता, विश्वा- मित्र भूख से दुःखी होकर, चाण्डाल के हाथ से कुत्ता की जाँघ लेकर, खाने को उद्यत हुए थे ॥ १०४-१०८ ॥ प्रतिग्रहाद्याजनाद्वा तथैवाध्यापनादपि । प्रतिग्रहः प्रत्यंवरः प्रेत्य विप्रस्य गर्हितः ॥ १०६ ॥ याजनाध्यापने नित्यं क्रियेते संस्कृतात्मनाम् । प्रतिग्रहस्तु क्रियते शूद्रादप्यन्त्यजन्मनः ॥ ११० ॥ जपहोमैरपैत्येनो याजनाध्यापनैः कृतम् । प्रतिग्रहनिमित्तं तु त्यागेन तपसैव च ॥ १११ ॥ ५०

३६४ मनुस्मृति । दान लेना, यज्ञ कराना और वेद पढ़ाना इनमें दान लेना अधम है और ब्राह्मण को मृत्यु के बाद परलोक में दुःख देता है। क्योंकि याजन और अध्यापन संस्कार वालों को कराये जाते हैं। और प्रतिग्रह शूद्र से भी लिया जाता है । अनुचित-याजन और अध्यापन का पाप जप, होम से दूर होता है और प्रतिग्रह का पाप वस्तु के त्याग से या तप से दूर होता है ॥ १०६-१११ ॥ शिलोञ्छमप्याददीत विप्रोऽजीवन्यतस्ततः । प्रतिग्रहाच्छिलः श्रेयांस्ततोऽप्युञ्छः प्रशस्यते ॥११२॥ सीदद्भिः कुप्यमिच्छद्भिर्धनं वा पृथिवीपतिः । याच्यः स्नातकैर्विप्रैरदित्संस्त्यागमर्हति ॥ ११३ ॥ अकृतं च कृतात्क्षेत्राद्गौरजाविकमेव च । हिरण्यं धान्यमन्नं च पूर्वं पूर्वमदोषवत् ॥ ११४ ॥ सप्तवित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः । प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ ११५ ॥ विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्यं विपणिः कृषिः । धृतिर्भैक्ष्यं कुसीदं च दश जीवनहेतवः ॥ ११६ ॥ ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वृद्धिं चैव प्रयोजयेत् । कामं तु खलु धर्मार्थं दद्यात्पापीयसेऽल्पिकाम् ॥११७॥ चतुर्थमाददानोऽपि क्षत्रियो भागमापदि । प्रजा रक्षन् परं शक्त्या किल्बिषात् प्रतिमुच्यते ॥११८॥ स्वधर्मो विजयस्तस्य नाहवे स्यात्पराङ्मुखः । शस्त्रेण वैश्यान् रक्षित्वा धर्म्यमाहारयेद्बलिम्॥११९॥ किसी उपाय से जीविका न कर सके तो ब्राह्मण शिल, उञ्छको

दशवां अध्याय। ३६५

दशवां अध्याय। ३६५ भी ले लेय। क्योंकि प्रतिग्रहसे शिल श्रेष्ठहै और उञ्छ उससे भी श्रेष्ठ माना जाता है। जो स्नातक ब्राह्मण निर्धनता से दुःख भोगता हो वह राजा से अन्न, वस्त्र या धन मांगे यदि न दे तो उसको त्यागदे। बिना जोता खेत, गौ, बकरा, मेढ़ा, सोना, कच्चा और पक्का अन्न इनमें अगले अगले से पहले पहले निर्दोष माने जाते हैं। दायभाग का दावा आदि से मिले, बेचने में मिले, विजय से मिले, ब्याज में मिले, परिश्रम से मिले या सत्पुरुषों से दान मिले ये सात प्रकार की धन की प्राप्ति धर्मानुकूलहै। विद्या, कारीगरी, नौकरी, सेवा, पशुपालन, व्यापार, खेती, सन्तोष, भिक्षा और ब्याज ये दश जीविका के साधनहैं। ब्राह्मण और क्षत्रिय आपत्ति में भी ब्याजपर धन न दें। परन्तु धर्मार्थ किसान वगैरह को थोड़े ब्याजपर कुछ द्रव्य दे देवे। राजा आपत्ति में भी चौथा भाग ले- कर यदि प्रजा की पूरी रक्षा करे तो पातकों से छूट जाता है। युद्ध करना क्षत्रिय का निजधर्म है, इसलिए युद्ध से मुँह न फेरे। वैश्यों की शस्त्र से रक्षा करके, अपने राजकीय-कर को ग्रहण करे ॥ ११२-११६ ॥ धान्येऽष्टमं विंशं शुल्कं विंशं कार्षापणावरम् । कर्मोपकरणाः शूद्राः कारवः शिल्पिनस्तथा ॥ १२० ॥ शूद्रस्तु वृत्तिमाकांक्षन् क्षत्रमाराधयेद्यदि । धनिनं वाप्युपाराध्य वैश्यं शूद्रो जिजीविषेत् ॥१२१॥ स्वर्गार्थमुभयार्थं वा विप्रानाराधयेत्तु सः । जातब्राह्मणशब्दस्य सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ १२२ ॥ विप्रसेवैव शूद्रस्य विशिष्टं कर्म कीर्त्यते । यदतोऽन्यद्धि कुरुते तद्भवत्यस्य निष्फलम् ॥ १२३ ॥ प्रकल्प्या अस्य तैर्वृत्तिः स्वकुटुम्बाद्यथार्हतः । शक्तिं चावेक्ष्य दाक्ष्यं च भृत्यानां च परिग्रहम् ॥१२४॥

३६६ मनुस्मृति । उच्छिष्टमन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च । पुल्काश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदाः॥१२५॥ न शूद्रे पातकं किञ्चिन्न च संस्कारमर्हति । नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति न धर्मात्प्रतिषेधनम् ॥१२६॥ राजा वैश्यों से अन्नका आठवां भाग लेय और कार्षापण तक सराफ़ी के लाभ पर बीसवां भाग ले और शूद्र मज़दूर, कारी- गरोंसे काम कराले। ब्राह्मण की सेवासे शूद्र जीविका न करसके तो क्षत्रिय वा धनी वैश्य की सेवा करके, जीविका करे । परन्तु लोक परलोक दोनों में सुख चाहनेवाला शूद्र ब्राह्मण की सेवा करे । अमुक शूद्र अमुक ब्राह्मण का आश्रित है, ऐसा कहलाने से ही शूद्र कृतार्थ होता है। ब्राह्मणसेवाही शूद्र का प्रधान कर्म है । इस के सिवा उसके कर्म निष्फल हैं । ब्राह्मण सेवकों की काम करनेकी शक्ति, बुद्धिमानी और परिवार को देखकर योग्यतानुसार अन्न, वस्त्र, पुराने ओढ़ने, बिछौने वगैरह देवे । सेवक शूद्र को लसुन आदि अभक्ष्य-भक्षण से कोई पातक नहीं लगता । उनका उपनयन आदि संस्कार भी नहीं होता । अग्निहोत्रादि धर्म में उनका अधि- कार नहीं है और बिना मन्त्र होम आदि का निषेध भी नहीं है । वह भक्तिसे करसकता है ॥ १२०-१२६ ॥ धर्मेप्सवस्तु धर्मज्ञाः सतां वृत्तमनुष्ठिताः । मन्त्रवर्ज्यं न दुष्यन्ति प्रशंसां प्राप्नुवन्ति च ॥ १२७ ॥ यथा यथा हि सद्वृत्तमातिष्ठत्यनसूयकः । तथा तथेमं चामुं च लोकं प्राप्नोत्यनिन्दितः ॥१२८॥ शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसंचयः । शूद्रोऽपि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते ॥ १२६ ॥ एते चतुर्णां वर्णानामापद्धर्माः प्रकीर्तिताः ।

दशवां अध्याय । ३६७

दशवां अध्याय । ३६७ यान् सम्यगनुतिष्ठन्तो व्रजन्ति परमां गतिम् ॥ १३०॥ एष धर्मविधिः कृत्स्नश्चातुर्वर्ण्यस्य कीर्तितः । अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिं शुभम् ॥ १३१ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ धर्मज्ञ शूद्र धर्म संपादन की इच्छा से मन्त्र के विना सत्पुरुषों के आचरण करते हुए दोष नहीं किन्तु प्रशंसा को प्राप्त होते हैं। शूद्र जैसे जैसे सदाचार का पालन करता है वैसे वैसे लोक में प्रशंसा पाता है और मरकर उत्तम लोक का भागी होता है। समर्थ भी शूद्र धनसंग्रह न करे, क्योंकि शूद्र धन पाकर ब्राह्मणों को दुःख देता है। इसप्रकार ये सब चारों वर्णों के आपत्काल के धर्म कहे गए हैं। जो अपने अपने धर्म का भलीभांति सेवन करते हैं वे परमगति को पाते हैं। यह चारों वर्गों की धर्मविधि पूरी हुई। अब प्रायश्चित्त की विधि कहेंगे ॥ १२७-१३१ ॥ दशवां अध्याय समाप्त ॥

३६८ मनुस्मृति। अथ एकादशोऽध्यायः। सान्तानिकं यक्ष्यमाणमध्वगं सर्ववेदसम् । गुर्वर्थं पितृमात्रर्थं स्वाध्यायार्थ्युपतापिनौ ॥ १ ॥ नवैतान् स्नातकान् विद्याद्ब्राह्मणान् धर्मभिक्षुकान् । निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्याविशेषतः ॥ २ ॥ एतेभ्योऽपि द्विजाग्र्येभ्यो देयमन्नं सदक्षिणम् । इतरेभ्यो बहिर्वेदि कृतान्नं देयमुच्यते ॥ ३ ॥ सर्वरत्नानि राजा तु यथार्हं प्रतिपादयेत् । ब्राह्मणान् वेदविदुषो यज्ञार्थं चैव दक्षिणाम् ॥ ४ ॥ कृतदारोऽपरान् दारान् भिक्षित्वा योऽधिगच्छति । रतिमात्रं फलं तस्य द्रव्यदातुस्तु संततिः ॥ ५ ॥ धनानि तु यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत् । वेदवित्सु विविक्तेषु प्रेत्य स्वर्गं समश्नुते ॥ ६ ॥ यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये । अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ ७ ॥ ग्यारहवां अध्याय। धर्म-भिक्षुक ! सन्तानार्थ विवाह करनेवाला, यज्ञ करने की इच्छावाला, मार्ग चलनेवाला, यज्ञ में सर्वस्व दक्षिणा देनेवाला, गुरु, माता और पिता के लिए धन का अर्थी, विद्यार्थी और रोगी इन नौ स्नातक ब्राह्मणों को धर्मभिक्षुक जानना चाहिए । ये सब निर्धन हों तो विद्या के अनुसार इनको दान देना चाहिए । इन ब्राह्मणों को

ग्यारहवां अध्याय । ३६६

ग्यारहवां अध्याय । ३६६ दक्षिणा के साथ अन्न देना और दूसरों को यज्ञ वेदी के बाहर पकाया अन्न देना कहा है। राजा यज्ञ-दक्षिणा में उत्तम वस्तुओं को योग्यता के अनुसार देवे। जो विवाहित पुरुष भीख मांगकर दूसरा विवाह करता है उसको रतिमात्र फल है और उसकी सन्तान द्रव्य देनेवाले की होती है। जो लोग विरक्त-वेदज्ञ-ब्रा- ह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा देते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं। जिस के पास कुटुम्बियों के निर्वाहार्थ तीन साल तक का या अधिकं अन्न हो, वह सोमयाग करने योग्य होता है ॥ १-७ ॥ अतः स्वल्पीयसि द्रव्ये यः सोमं पिबति द्विजः । स पीतसोमपूर्वोऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम् ॥ ८ ॥ शक्तः परजने दाता स्वजने दुःखजीविनि । मध्वापातो विषास्वादः स धर्मप्रतिरूपकः ॥ ६ ॥ भृत्यानामुपरोधेन यत्करोत्यौर्ध्वदैहिकम् । तद्भवत्यसुखोदर्कं जीवितस्य मृतस्य च ॥ १० ॥ यज्ञश्चेत्प्रतिरुद्धः स्यादेकेनाङ्गेन यज्वनः । ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ॥ ११ ॥ यो वैश्यः स्याद्बहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः । कुटुम्बात्तस्य तद् द्रव्यमाहरेद्यज्ञसिद्धये ॥ १२ ॥ आहरेत् त्रीणि वा द्वे वा कामं शूद्रस्य वेश्मनः । नहि शूद्रस्य यज्ञेषु कश्चिदस्ति परिग्रहः ॥ १३ ॥ इससे कम द्रव्य होने में जो द्विज सोमयाग करता है उसका पहला सोमयज्ञ भी नहीं पूरा पड़ता। इसलिए दूसरा कभी न करे। जो कुटुम्ब को दुःखी होते दूसरों को धन देता है, वह पहले तो अच्छा लगता है, परन्तु परिणाम में विष के स्वाद सा भयानक मालूम होता है। यह केवल धर्म का झूंडारूप है। कुटुम्बियों को

४०० मनुस्मृति । दुःख देकर, जो पुरुष परलोक के लिए दानादि करता है, वह लोक-परलोक में दुःख फल को करता है । धार्मिक राजा के होते हुए क्षत्रियादि यजमानों का विशेष करके ब्राह्मण का यज्ञ किसी अङ्ग से रुका हो तो धनी वैश्य से जो सोमयज्ञ से रहित हो, उस के धन से मदद ले लेनी चाहिए। यज्ञ में दो वा तीन अङ्ग अधूरे हों और वैश्य से उतना धन न मिले तो शूद्र के घर से यथेच्छ धन ले लेय, क्योंकि शूद्र का यज्ञ से कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ ८-१३ ॥ योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः । तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन् ॥ १४ ॥ आदाननित्याच्चादातुराहरेदप्रयच्छतः । तथा यशोऽस्य प्रथते धर्मश्चैव प्रवर्धते ॥ १५ ॥ तथैव सप्तमे भक्ते भक्तानि षडनश्नता । अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः ॥ १६ ॥ जो अग्निहोत्री नहीं है ओर सौ १०० गौ का धन रखता है और जिसने यज्ञ न किया हो, पर हज़ार १००० गौ का धन हो, उन दोनों के घर से भी धन लेना चाहिए । जो ब्राह्मण नित्य दान लेता हो पर दान देता न हो, वहभी यज्ञार्थ धन दे तो ले लेना चाहिए । इस कर्म से उसका यश और धर्म बढ़ता है । जिसने तीन दिन तक भोजन न किया हो वह सातवीं खुराक धर्महीन पुरुष से भी अन्न ले लेवे तो कोई दोष नहीं है ॥ १४-१६ ॥ खलात्क्षेत्राद्गाराद्वा यतो वाप्युपलभ्यते । आख्यातव्यं तु तत्तस्मै पृच्छते यदि पृच्छति ॥ १७ ॥ ब्राह्मणस्वं न हर्तव्यं क्षत्रियेण कदाचन । दस्युनिष्क्रिययोस्तु स्वमजीवन् हर्तुमर्हति ॥ १८ ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४०१

ग्यारहवां अध्याय । ४०१ योऽसाधुभ्योर्थमादाय साधुभ्यः संप्रयच्छति । स कृत्वा प्लवमात्मानं संतारयति तावुभौ ॥ १६ ॥ यद्धनं यज्ञशीलानां देवस्वं तद्विदुर्बुधाः । अयज्वनां तु यद्वित्तमासुरस्वं तदुच्यते ॥ २० ॥ न तस्मिन् धारयेद्दण्डं धार्मिकः पृथिवीपतिः । क्षत्रियस्य हि बालिश्याद् ब्राह्मणः सीदति क्षुधा ॥ २१ ॥ तस्य भृत्यजनं ज्ञात्वा स्वकुटुम्ब्वान् महीपतिः । श्रुतशीले च विज्ञाय वृत्तिं धर्म्यां प्रकल्पयेत् ॥ २२ ॥ कल्पयित्वास्य वृत्तिं च रक्षेदेनं समन्ततः । राजा हि धर्मषड्भागं तस्मात्प्राप्नोति रक्षितात् ॥ २३॥ न यज्ञार्थं धनं शूद्राद्विप्रो भिक्षेत कर्हिचित् । याजमाना हि भिक्षित्वा चण्डालः प्रेत्य जायते ॥ २४॥ खल (खरिहान) खेत या घर से या कहीं से अन्न लावे और उसका स्वामी पूछे तो उससे सत्य बात कह देवे । क्षत्रिय को ब्रा- ह्मण का धन कभी न छीनना चाहिए । यदि निर्वाह न होसके तो दूसरे कुकर्मियों से धन ले लेय । जो पुरुष यज्ञादि धर्म न करने वालों से धन लेकर धर्माचारी सत्पुरुषों को देता है वह अपने को नौका बनाकर उन दोनों को तार देता है । यज्ञादि करनेवालों के धन को देवधन कहते हैं और यज्ञादि धर्म-कर्म न करनेवालों का धन आसुरीधन कहलाता है । ब्राह्मण निर्वाह के लिए कोई दोष भी करे तो भी उसको राजा दण्ड न करे । क्योंकि राजाही के दोषों से ब्राह्मण भूख से दुःख उठाते हैं। ब्राह्मण के परिवार, विद्या, शील आदि को जानकर राजा धर्मार्थ जीविका कायम कर देवे । और चोर वगैरह दुष्टों से रक्षा करे क्योंकि उसके धर्म का छठा भाग राजा पाता है । ब्राह्मण यज्ञ के लिए शूद्र से धन कभी न ५१

४०२ . मनुस्मृति । मांगे। क्योंकि शूद्रभिक्षा से यज्ञ करनेवाला मरकर चण्डाल होता है ॥ १७-२४ ॥ यज्ञार्थमर्थं भिक्षित्वा यो न सर्वं प्रयच्छति । स याति भासतां विप्रः काकतां वा शतं समाः ॥ २५॥ देवस्वं ब्राह्मणस्वं वा लोभेनोपहिनास्ति यः । स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिष्टेन जीवति ॥ २६ ॥ इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदब्दपर्यये । क्लृप्तानां पशुसोमानां निष्कृत्यर्थमसम्भवे ॥ २७ ॥ आपत्कल्पेन यो धर्मं कुरुतेऽनापदि द्विजः । स नाप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचारितम् ॥ २८ ॥ विश्वैश्च देवैः साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः । आपत्सु मरणाद्भीतैर्विधेः प्रतिनिधिः कृतः ॥ २६ ॥ जो ब्राह्मण यज्ञ के लिए धन मांगकर यज्ञ में नहीं लगाता वह मरकर सौ वर्ष भास वा कौआ की योनि में रहता है । जो देवा- र्पण या ब्रह्मार्पण किये धन को लोभ से खाजाता है वह पापात्मा परलोक में गीध की जूठन से जीता है । पशुयाग या सोमयाग न होसके तो उस दोष की शान्ति के लिए ब्राह्मण को शूद्र से भी धन लेकर वैश्वानरी इष्टि करनी चाहिए । जो द्विज आपत्काल के न होते आपत्काल के धर्म से बर्ताव करता है वह परलोक में उसका फल नहीं पाता । विश्वेदेव, साध्यदेव, महर्षि और ब्राह्मणों ने मृत्यु से डरकर, आपत्काल में मुख्य विधि के स्थान में प्रतिनिधि की कल्पना की है ॥ २५-२६ ॥ प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते । न साम्परायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम् ॥ ३० ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४०३

ग्यारहवां अध्याय । ४०३ न ब्राह्मणोऽवेदयेत किञ्चिद्राजनि धर्मवित् । स्ववीर्येणैव ताञ्छिष्यान् मानवानपकारिणः ॥ ३१ ॥ स्ववीर्याद्राजवीर्याच्च स्ववीर्यं बलवत्तरम् । तस्मात्स्वेनैव वीर्येण निगृह्णीयादरीन् द्विजः ॥ ३२ ॥ मुख्य विधि की शक्ति होने पर भी जो पुरुष प्रतिनिधि से कर्म करता है उस दुर्बुद्धि को उस धर्म का फल परलोक में नहीं मि- लता । धर्मज्ञ ब्राह्मण अपने थोड़े नुकसान को राजा से न कहे । उन अपकारियों को अपने सामर्थ्य सेही दण्ड देवे । तपशक्ति और राजशक्ति इनमें अपनी तपशक्ति अधिक प्रभावशाली है। इसलिए द्विजों को अपनी ही शक्ति से शत्रु दमन करना चाहिए ॥ ३०-३२ ॥ श्रुतीरथर्वाङ्गिरसीः कुर्यादित्यविचारयन् । वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्यादरीन् द्विजः ॥ ३३ ॥ क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः । धनेन वैश्यशूद्रौ तु जपहोमैर्द्विजोत्तमः ॥ ३४ ॥ विधाता शासिता वक्ता मैत्रो ब्राह्मण उच्यते । तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत् ॥ ३५ ॥ न वै कन्या न युवतिर्नाल्पविद्यो न बालिशः । होता स्यादग्निहोत्रस्य नार्त्तो नासंस्कृतस्तथा ॥ ३६ ॥ नरके हि पतन्त्येते जुह्वतः स च यस्य तत् । तस्माद्वैतानकुशलो होता स्याद्वेदपारगः ॥ ३७ ॥ ब्राह्मण अथर्ववेद के आङ्गिरस मन्त्रों को पढ़कर अभिचार करे । मन्त्रोच्चारण ही ब्राह्मण का शस्त्र है । उसीसे द्विज शत्रुओं का नाश करे । क्षत्रिय अपने भुजबल से, वैश्य और शूद्र धन से और

४०४ , मनुस्मृति । ब्राह्मण मन्त्र जप, हवन से आपत्ति को दूर भगावैं । ब्राह्मण विहित कर्मों का अनुष्ठान करनेवाला, पुत्र-शिष्यों का शासन करनेवाला, प्रायश्चित्तादि को बतानेवाला और सब का मित्र कहा गया है। उसको कोई बुरी बात या रूखी बात न कहे। कन्या, युवती, थोड़ा पढ़ा, मूर्ख, रोगी और यज्ञोपवीत-संस्काररहित पुरुष अग्निहोत्र न करे। यदि ये सब होता किये जायँ तो खुद और जिसका अग्नि- होत्र हो वह दोनों नरकगामी होते हैं । इस कारण श्रौतकर्म में प्रवीण, वेदविशारद ही अग्निहोत्र का होता बन सकता है॥३३-३७॥ प्राजापत्यमदत्त्वाऽश्वमग्न्याधेयस्य दक्षिणाम् । अनाहिताग्निर्भवति ब्राह्मणो विभवे सति ॥ ३८ ॥ पुण्यान्यन्यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । नत्वल्पदक्षिणैर्यज्ञैर्यजन्ते हि कथं च न ॥ ३६ ॥ इन्द्रियाणि यशः स्वर्गमायुः कीर्ति प्रजाः पशून् । हन्त्यल्पदक्षिणो यज्ञस्तस्मान्नाल्पधनो यजेत् ॥ ४० ॥ जो ब्राह्मण वैभव होने पर अग्न्याधान स्वीकार करके प्रजा- पति देवतावाले अश्व का दान नहीं करता वह अग्न्याधान फल को नहीं पाता। श्रद्धावान्, जितेन्द्रिय पुरुष, पुण्य के दूसरे कर्मों को करे। पर न्यून दक्षिणा देकर कोई यज्ञ न करें अर्थात् विना पूरी दक्षिणा यज्ञ न करना चाहिए। कम दक्षिणा देकर यज्ञ कराने से यज्ञ इन्द्रियाँ, यश, स्वर्ग, आयु, कीर्ति, प्रजा और पशुओं का नाश करती है। इस कारण थोड़े धनवाला यज्ञ न करे ॥३८-४०॥ अग्निहोत्र्यपविध्याग्नीन् ब्राह्मणः कामकारतः । चान्द्रायणं चरेन् मासं वीरहत्यासमं हि तत् ॥ ४१ ॥ ये शूद्रादधिगम्यार्थमग्निहोत्रमुपासते । ऋत्विजस्ते हि शूद्राणां ब्रह्मवादिषु गर्हिताः ॥ ४२ ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४०५

ग्यारहवां अध्याय । ४०५ तेषां सततमज्ञानां वृषलाग्न्युपसेविनाम् । पदा मस्तकमाक्रम्य दाता दुर्गाणि संतरेत् ॥ ४३ ॥ अकुर्वन् विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन् । प्रसञ्जंश्चेन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः ॥ ४४ ॥ अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः । कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात् ॥ ४५ ॥ अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्ध्यति । कामतस्तु कृतं मोहात्प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः ॥ ४६ ॥ अग्निहोत्री ब्राह्मण यदि जान-बूझकर दोनों काल हवन न करे तो एक मास चान्द्रायण करे। क्योंकि अग्निहोत्र का होम लोप करना पुत्रहत्या के समान है । जो ब्राह्मण शूद्र से धन लेकर अग्निहोत्र की उपासना करते हैं वे शूद्र ऋत्विज् हैं और वेदपा- ठियों में निंदित होते हैं । शूद्रधन से अग्निउपासना करनेवाले मूर्ख ब्राह्मणों के मस्तक पर धनदाता-शूद्र पैर रखकर परलोक में संकटों को तरजाता है। शास्त्रोक्त कर्मों को न करने और दूषित कर्मों को करने से और विषयों में आसक्ति से मनुष्य प्रायश्चित्त लायक होता है। अनजान में पाप करने पर विद्वानों ने प्रायश्चित्त कहा है । कोई श्रुतिप्रमाण से जानकर पाप करने पर प्रायश्चित्त का विधान कहा है। अज्ञान से किया पाप वेदाभ्यास से शुद्ध होता है । और ज्ञान से किया पाप विविध प्रायश्चित्तों से शुद्ध होता है ॥ ४१-४६ ॥ प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य दैवात्पूर्वकृतेन वा । न संसर्गं व्रजेत्सद्भिः प्रायश्चित्तेऽकृते द्विजः ॥ ४७ ॥ इह दुश्चरितैः केचित्केचित्पूर्वकृतैस्तथा । प्राप्नुवन्ति दुरात्मानो नरा रूपविपर्ययम् ॥ ४८ ॥

४०६ मनुस्मृति । विविध-प्रायश्चित्त । दैववश अथवा पूर्वजन्म के पाप से द्विज प्रायश्चित्त योग्य होकर बिना उसको किये सज्जनों के साथ संसर्ग न करे । कोई यहां के कोई पूर्वजन्म के दुराचार से दुष्टात्मा मनुष्य, विविधरूप- विकारों को पाते हैं ॥ ४७-४८ ॥ सुवर्णचौरः कौर्नख्यं सुरापः श्यावदन्तताम् । ब्रह्महा क्षयरोगित्वं दौश्चर्म्यं गुरुतल्पगः ॥ ४६ ॥ पिशुनः पौतिनासिक्यं सूचकः पूतिवक्रताम् । धान्यचौरोऽङ्गहीनत्वमातिरेक्यं तु मिश्रकः ॥ ५० ॥ अन्नहर्त्तामयावित्वं मौक्यं वागपहारकः । वस्त्रपहारकः श्वैत्र्यं पङ्गुतामश्वहारकः ॥ ५१ ॥ दीपहर्त्ता भवेदन्धः काणो निर्वापको भवेत् । हिंसया व्याधिभूयस्त्वमरोगित्वमहिंसया ॥ ५२ ॥ एवं कर्मविशेषेण जायन्ते सद्भिर्गर्हिताः । जडमूकन्धवधिरा विकृताकृतयस्तथा ॥ ५३ ॥ सोना का चोर बुरे नखोंवाला, शराबी काले दांतोंवाला, ब्रह्म- हत्यारा, क्षयरोगी और गुरु स्त्री-गामी चर्मरोगी होता है । चुगल की नाक सड़ती है, झूठे निंदक का मुख दुर्गन्धयुक्त होता है । अन्नचोर अङ्गहीन और अन्न में मिलावट करनेवाला अधिकाङ्ग होता है । पक्वान्न चोर को मन्दाग्नि, विद्याचोर गूंगा, वस्त्रचोर श्वेतकुष्ठी और घोड़े का चोर लूला होता है । दीप चुरानेवाला अंधा, दीप बुझानेवाला काना, हिंसा से अधिक रोगी और अहिंसा से नीरोग होता है । इस प्रकार अनेक पापकर्मों से मनुष्य जड़बुद्धि, गूँगे, अंधे, बहिरे और कुरूप होजाते हैं ॥ ४६-५३ ॥ चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुंद्धये ।

ग्यारहवां अध्याय । ४०७

ग्यारहवां अध्याय । ४०७ निन्द्यैर्हि लक्षणैर्युक्ता जायन्तेऽनिष्कृतैनसः ॥ ५४ ॥ ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः । महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ॥ ५५ ॥ अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् । गुरोश्चालीकनिर्वन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥ ५६ ॥ इसलिए पापशुद्धि के लिये नित्य प्रायश्चित्त करना चाहिएं । जो लोग नहीं करते वे दूषित लक्षणयुक्त होजाते हैं । ब्रह्महत्या, मद्यपान, सुवर्ण की चोरी, गुरुस्त्री से व्यभिचार और इन महा- पापों के करनेवाले का संसर्ग ये सब महापातक कहे हैं । अपनी बड़ाई में झूठ कहना, राजा से किसी की चुगली करना और गुरु को झूठा दोष लगाना—ये पाप ब्रह्महत्या के समान हैं ॥५४—५६॥ ब्रह्मोञ्झता वेदनिंदा कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः । गर्हितान्नाद्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट् ॥ ५७ ॥ निक्षेपस्यापहरणं नराश्वरजतस्य च । भूमिवज्रमणीनां च रुक्मस्तेयसमं स्मृतम् ॥ ५८ ॥ रेतः सेकः स्वयोनीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च । सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु गुरुतल्पसमं विदुः ॥ ५९ ॥ गोवधोऽयाज्यसंयाज्यपारदार्यात्मविक्रयाः । गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्न्योः सुतस्य च ॥ ६० ॥ परिवित्तितानुजेऽनूढे परिवेदनमेव च । तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम् ॥ ६१ ॥ कन्याया दूषणं चैव वार्धुष्यं व्रतलोपनम् । तडागारामदाराणामपत्यस्य च विक्रयः ॥ ६२ ॥

४०८ मनुस्मृति । व्रात्यता बान्धवत्यागो भृत्याध्यापनमेव च । भृत्या चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः ॥ ६३ ॥ सर्वाकरेष्वधीकारो महायन्त्रप्रवर्तनम् । हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च ॥ ६४ ॥ वेद को भूलजाना, वेद की निंदा करना, झूठी गवाही देना, मित्र का वध करना और अभक्ष्य को खाना, ये छः मद्यपान के समान हैं । धरोहर का मारना, मनुष्य, घोड़ा, चांदी, भूमि, हीरा और मणि चुराना सुवर्णचोरी के माफिक है । सहोदर बहन, कुमारी कन्या, चाण्डालिनी, मित्र और पुत्र की स्त्री से समागम करना गुरुपत्नी के साथ समागम के समान हैं । गोहत्या करना, व्रात्य, शूद्रों को यज्ञ कराना, परस्त्री से व्यभिचार, अपने को दास- रूप से बेचना, योग्य गुरु को त्यागना, निर्दोष माता-पिता को त्यागना, स्वाध्याय न करना, स्मार्त्ताग्नि को छोड़ना ये सब उप- पातक हैं। छोटा भाई पहले विवाह करके अग्निहोत्र धारण करे तो बड़ा भाई 'परिवित्ति' कहाता है, उस बड़े और छोटे भाई को कन्या देना, उनको ऋत्विज् बनाना, कन्या को दूषण लगाना, शास्त्रमर्यादा से ब्याज अधिक लेना, व्रत को तोड़ना, तालाब, बगीचा, स्त्री और सन्तान को बेचना, समय पर संस्कार न करना, बांधवों का पालन न करना, शिष्यों से मासिक लेकर पढ़ाना, नौकरी देकर पढ़ना, न बेचने योग्य घी-दूध आदि बेचना, सोने की खानों पर राजाज्ञा से अधिकारी होना, बड़े यन्त्र-कलों का चलाना, हरी जड़ी बूटियों को काटना, स्त्री से जीविका करना, अभिचार करना और वशीकरण करना-ये सब उपपातक हैं॥५७-६४॥ इन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम् । आत्मार्थं च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा ॥ ६५ ॥ अनाहिताग्निता स्तेयमृणानामनपक्रिया । असच्छास्त्राधिगमनं कौशीलव्यस्य च क्रिया ॥ ६६ ॥