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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पहला अध्याय । ७

पहला अध्याय । ७ हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते । यद्यस्य सोऽदधात्सर्गे तत्तस्य स्वयमाविशत् ॥ २६ ॥ सृष्टि की इच्छा करके ब्रह्मा ने तप, वाणी, रति, काम और क्रोध को उत्पन्न किया । भले और बुरे कर्मों के विचार के लिये धर्म और अधर्म को बनाया । सुख, दुःख, काम, क्रोध आदि द्वन्द्वधर्मों के अधीन संसार के प्राणियों को किया । पञ्चमहाभूतों की सूक्ष्ममात्रा-पञ्चतन्मात्राओं के साथ यह सारी सृष्टि क्रम से पैदा हुई है । सृष्टि के आदि में उस प्रभु ने, जिस स्वाभाविक कर्म में, जिसकी योजना की उसका जब जब जन्म हुआ उसी कर्म को उसने स्वयं किया। हिंस्रकर्म-अहिंस्रकर्म, मृदु-दया, क्रूर-कठोरता, धर्म-ब्रह्मचर्य, गुरुसेवा, अधर्म-झूठ बोलना आदि जो पूर्वकल्प में जिसका था वही सृष्टि के समय उसमें प्रविष्ट होगया ॥ २५-२६ ॥ यथर्तुलिङ्गान्यृतवः स्वयमेवर्तुपर्यये । स्वानि स्वान्यभिपद्यन्ते तथा कर्माणि देहिनः ॥ ३० ॥ लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरुपादतः । ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्त्तयत् ॥ ३१ ॥ द्विधाकृत्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोभवत् । अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत्प्रभुः ॥ ३२ ॥ तपस्तप्त्वासृजद्यं तु स स्वयं पुरुषो विराट् । तं मां वित्तस्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमाः ॥ ३३ ॥ अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । पतीन्प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश ॥ ३४ ॥ मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । प्रचेतसं वशिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ॥ ३५ ॥

८ मनुस्मृति। जिस प्रकार वसन्त आदि ऋतु अपने स्वाभाविक चिह्नों को जैसे आम की मञ्जरी (बौर) धारण करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य अपने अपने पूर्व कर्मों को प्राप्त होते हैं। परमात्मा ने लोक की वृद्धि के लिये, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को पैदा किया। इनमें विराट्‌रूप परमात्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, ऊरु से वैश्य और पैर से शूद्र उत्पन्न हुए। इस संसार के दो भाग करके एक पुरुष और दूसरा स्त्री बनाया।* स्त्रीभाग से विराट्‌पुरुष पैदा किया। उस विराट्‌पुरुषरूप प्रजापति ने तप करके जिस पुरुष को उत्पन्न किया वही मैं, सारे विश्व का बनानेवाला हूं-ऐसा आपलोग जानिये। मैंने प्रजासृष्टि की इच्छा से कठिन तप करके पहले दश महर्षियों को उत्पन्न किया। उनके नाम इस प्रकार हैं-मरीचि, अत्रि, अङ्गिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेतस, वशिष्ठ, भृगु और नारद ॥ ३०-३५ ॥ एते मनूंस्तु सप्तान्यानसृजन् भूरितेजसः । देवान् देवनिकायांश्च महर्षींश्चामितौजसः ॥ ३६ ॥ यक्षरक्षःपिशाचांश्च गन्धर्वाप्सरसोऽसुरान् । नागान्सर्पान्सुपर्णांश्च पितॄणां च पृथग्गणान् ॥ ३७ ॥ विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च । उल्कानिर्घातकेतूंश्च ज्योतींष्युच्चावचानि च ॥ ३८ ॥ किन्नरान्वानरान्मत्स्यान् विविधांश्च विहंगमान् । पशून्मृगान्मनुष्यांश्च व्यालांश्चोभयतोदतः ॥ ३९ ॥

  • शुक्लयजुर्वेदीय वाजसनेयीसंहिता के पुरुषसूक्त में लिखा है-'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृतः । ऊरू यदस्य तद्वैश्यः पद्भ्यां २४ शूद्रो अजायत ।' तैत्तिरीयब्राह्मण में लिखा हैः-'अथो अर्धो वै एष आत्मनो यत्पत्नी । अयज्ञो वै एष योऽपत्नीकः ।' ३ । ३ । ३ । ५ । शतपथब्राह्मण में, प्रजापति द्वारा सृष्टि- प्रक्रिया का विवरण विस्तारपूर्वक है । मनुकी सृष्टिप्रक्रिया उससे मिलती है ।

पहला अध्याय । ६

पहला अध्याय । ६ कृमिकीटपतङ्गांश्च यूकामक्षिकमत्कुणम् । सर्वञ्च दंशमशकं स्थावरञ्च पृथग्विधम् ॥ ४० ॥ एवमेतैरिदं सर्वं मन्नियोगान्महात्मभिः । यथाकर्म तपोयोगात् सृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ ४१ ॥ इन दश प्रजापतियों ने दूसरे प्रकाशमान सात मनुओं को, देवता और उनके निवासस्थानों को, ब्रह्मर्षियों को पैदा किया । और यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, नाग, सर्प, सुपर्ण- गरुड़ादि, और पितरों को * उत्पन्न किया । विद्युत्-बिजली, अशनि- एक तरह की बिजली, मेघ, रोहित-एक विचित्र वर्ण दण्डाकार आकाश का चिह्न, इन्द्रधनुष, उल्का जो आकाश से रेखाकार ज्योति गिरती है, निर्घात-उत्पातशब्द, केतु-पूंछदार तारा, और नाना भांति के ज्योति ध्रुव, अगस्त्य आदि को उत्पन्न किया । किं- नर-अश्वमुख-नरदेह, वानर, मत्स्य, तरह तरह के पक्षिगण, पशु, मृग, मनुष्य, सर्प, ऊपर, नीचे दांतवाले जीव, कृमि, कीट, पतङ्ग, जूका, मक्खी, खटमल और संपूर्ण काटनेवाले छोटे जीव मच्छर आदि, मेरी आज्ञा और अपनी तपस्या से मरीचि आदि महात्माओं ने इस स्थावर, जङ्गम विश्व को कर्मानुसार रचा है ॥ ३६-४१ ॥ येषां तु यादृशं कर्म भूतानामिह कीर्तितम् । तत्तथा वोऽभिधास्यामि क्रमयोगं च जन्मनि ॥ ४२ ॥ पशवश्च मृगाश्चैव व्यालाश्चोभयतोदतः । रक्षांसि च पिशाचाश्च मनुष्याश्च जरायुजाः ॥ ४३ ॥

  • तैत्तिरीय ब्राह्मण में लिखा है-प्रजापति ने अपने निश्वास-असुसे असुरों की सृष्टि करके, क्रमसे पितृगण, देवगण आदिकी सृष्टि की है । 'प्रजातिरकामयत 'प्रजायेय' इति । स 'तपोऽम्यतप्यत । तेनासून्रा असुगनसृ- जत । तदनु पितॄनसृजत । तदनु मनुष्यानसृजत । तदनु देवानसृजत ।' तैत्तिरीय ब्राह्मण, २ । ३ । = । २

उद्भिज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्डप्ररोहिणः ।

० मनुस्मृतिः। अण्डजाः पक्षिणः सर्पा नक्रा मत्स्याश्च कच्छपाः । यानि चैवं प्रकाराणि स्थलजान्यौदकानि च ॥ ४४ ॥ स्वेदजं दंशमशकं यूकामक्षिकमत्कुणम् । ऊष्मणश्चोपजायन्ते यच्चान्यत्किञ्चिदीदृशम् ॥ ४५ ॥ उद्भिज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्डप्ररोहिणः । ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः ॥ ४६ ॥ अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्मृताः । पुष्पिणः फलिनश्चैव वृक्षास्तूभयतः स्मृताः ॥ ४७ ॥ गुच्छगुल्मं तु विविधं तथैव तृणजातयः । बीजकाण्डरुहाण्येव प्रताना वल्ल्य एव च ॥ ४८ ॥ इस जगत् में जिन प्राणियों का जो कर्म कहा है वैसा ही हम कहेंगे और उनके जन्म का क्रम भी वर्णन करेंगे । सृष्टि चार प्रकार की है, उनको क्रम से कहते हैं-पशु, सिंह, ऊपर नीचे दाँतवाले, सब राक्षस, पिशाच और मनुष्य ये सब 'जरायुज' कहलाते हैं। पक्षी, साँप, नाक, मच्छली, कछुआ और जो ऐसेही भूमि या जल में पैदा होनेवाले जीव हैं वे सब 'अण्डज' हैं । मच्छर, दंश, जूँ, मक्खी, खटमल आदि पसीने की गर्मी से पैदा होनेवाले 'स्वेदज' होते हैं। वृक्ष आदि को 'उद्भिज्ज' कहते हैं। ये दो तरहके हैं, बीज से पैदा होनेवाले और शाखा से पैदा होनेवाले। जो वृक्ष फलोंके पकजाने पर सूख जाते हैं और जो बहुत फल, फूलवाले होते हैं उनको 'ओषधि' कहते हैं। जिन में फल आवें पर फूल नहीं उनको 'वनस्पति' कहते हैं। और जो फल, फूलवाले हैं वे 'वृक्ष' कहे जाते हैं। जिस में जड़ से ही लता का मूलहो, शाखा न हो उसको 'गुच्छ' कहते हैं। गुल्म-ईख वगैरह, तृणजाति-कई भांति के बीज और शाखा से पैदा होनेवाले, प्रतान-जिस में सूतला निकले और वल्ली- गुर्च आदि सब 'उद्भिज्ज' हैं ॥ ४२-४८ ॥

पहला अध्याय । ११

पहला अध्याय । ११ तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्महेतुना । अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः ॥ ४६ ॥ एतदन्तास्तु गतयो ब्रह्माद्याः समुदाहृताः । घोरेऽस्मिन् भूतसंसारे नित्यं सततयायिनि ॥ ५० ॥ एवं सर्वं स सृष्ट्वेदं मां चाचिन्त्यपराक्रमः । आत्मन्यन्तर्दधे भूयः कालं कालेन पीडयन् ॥ ५१ ॥ यदा स देवो जागर्ति तदेदं चेष्टते जगत् । यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्वं निमीलति ॥ ५२ ॥ तस्मिन् स्वपति तु स्वस्थे कर्मात्मानः शरीरिणः । स्वकर्मभ्यो निवर्तन्ते मनश्च ग्लानिमृच्छति ॥ ५३ ॥ युगपत्तु प्रलीयन्ते यदा तस्मिन्महात्मनि । तदायं सर्वभूतात्मा सुखं स्वपिति निर्वृतः ॥ ५४ ॥ ये सब वृक्ष अज्ञानवश अपने पूर्व जन्म के बुरे कर्मों से घिरे हुए हैं। इनके भीतर छिपा हुआ ज्ञानहै और इनको सुख दुःख भी होता है। इस नाशवान् संसार में ब्रह्मासे लेकर स्थावर तक यही उत्पत्ति का नियम कहा गया है। उस अचिन्त्य प्रभावशाली परमात्मा ने यह विश्व और मेरे को उत्पन्न करके सृष्टिकाल को प्रलयकाल में मिलाकर अपने में लीन करलिया। अर्थात् प्राणियों के कर्मवश बार बार सृष्टि और प्रलय किया करता है। जब परमात्मा जागता है अर्थात् सृष्टि की इच्छा करता है उस समय यह सारा जगत् चेष्टायुक्त होजाता है और जब सोता है याने प्रलय इच्छा करता है, तब विश्व का लय होजाता है। यही परमात्मा का जागना और सोना है। जब वह सोता है-निर्व्यापार रहता है तब कर्मात्मा प्राणी अपने अपने कर्मों से निवृत्त होजाते हैं और मन भी सब इन्द्रियों सहित शान्तभाव को पा जाता है। एकही काल में, जब सारे प्राणी परमात्मा में लय को पाते हैं, तब यह सुख से शयन करता हुआ कहा जाता है ॥ ४६-५४ ॥

१२ मनुस्मृति। तमोऽयं तु समाश्रित्य चिरं तिष्ठति सेन्द्रियः । न च स्वं कुरुते कर्म तदोत्क्रामति मूर्त्तितः ॥ ५५ ॥ यदाणुमात्रिको भूत्वा बीजं स्थास्नु चरिष्णु च । समाविशति संसृष्टस्तदा मूर्त्तिं विमुञ्चति ॥ ५६ ॥ एवं स जाग्रत्स्वप्नाभ्यामिदं सर्वं चराचरम् । संजीवयति चाजस्रं प्रमापयति चाव्ययः ॥ ५७ ॥ उस दशा में यह जीव इन्द्रियों के साथ बहुतकाल तक तम (सु- षुप्ति) को आश्रय करके रहता है। और अपना कर्म नहीं करता, किंतु पूर्व देहसे जुदा रहा करताहै। फिर अणुमात्रिक-शरीर बनने की आठ सामग्री हैं-जीव, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, वासना, कर्म, वायु, अविद्या-इन को शास्त्र में 'पुर्यष्टक' कहते हैं * यों पहले अणु- मात्रिक अचर और चर के हेतुभूत बीजमें प्रविष्ट होकर पुर्यष्टक में मिलकर शरीर को धारण करता है। इसप्रकार अविनाशी परमात्मा जागरण और शयन से, इस चराचर जगत् को उत्पन्न और नष्ट किया करता है ॥ ५५-५७ ॥ इदं शास्त्रं तु कृत्वासौ मामेव स्वयमादितः । विधिवद्ग्राहयामास मरीच्यादींस्त्वहं मुनीन् ॥५८॥ एतद्वोऽयं भृगुः शास्त्रं श्रावयिष्यत्यशेषतः । एतद्धि मत्तोऽधिजगे सर्वमेषोऽखिलं मुनिः ॥ ५६ ॥ ततस्तथा स तेनोक्तो महर्षिर्मनुना भृगुः । तानब्रवीदृषीन्सर्वान् प्रीतात्मा श्रूयतामिति ॥ ६० ॥

  • सनन्दन ने कहा है— 'भूतेन्द्रियमनोबुद्धिवासनाकर्मवायवः । अविद्या चाष्टकं प्रोक्तं पुर्यष्टमृषिसत्तमैः ॥' गरुडपुराण में लिखा है— 'पुर्यष्टकेन लिङ्गेन प्राणाद्येन स युज्यते । तेन बद्धस्य वै बन्धो मोक्षो मुक्तस्य तेन तु ॥'

पहला अध्याय । १३

पहला अध्याय । १३ मनुजी कहते हैं-प्रजापति ने सृष्टिके पूर्व इस धर्मशास्त्र को बना कर मेरे को उपदेश दिया । फिर मैंने मरीचि आदि को बताया । यह समग्र शास्त्र भृगु आप लोगों को सुनावेंगे, जो कि मेरे से सं- पूर्ण पढ़ा है । उसके बाद मनुकी आज्ञा पाकर महर्षि भृगु ने सब ऋषियों को कहा कि सुनो ॥ ५८-६० ॥ स्वायम्भुवस्यास्य मनोः षड्वंश्या मनवोऽपरे । सृष्टवन्तः प्रजाःस्वाः स्वा महात्मानो महौजसः॥ ६१ ॥ स्वारोचिषश्चौत्तमश्च तामसो रैवतस्तथा । चाक्षुषश्च महातेजा विवस्वत्सुत एव च ॥ ६२ ॥ स्वायम्भुव मनु के वंश में, छः मनु और हैं। उन्होंने अपने अपने काल में प्रजाकी सृष्टि, पालन आदि किया है। उनका नाम-स्वारो- चिष, औत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष और वैवस्वत है ॥ ६१-६२ ॥ स्वायम्भुवाद्याः सत्तैते मनवो भूरितेजसः । स्वे स्वेन्तरे सर्वमिदमुत्पाद्यायुश्चराचरम् ॥ ६३ ॥ निमेषा दश चाष्टौ च काष्ठात्रिंशत्तु ताः कलाः । त्रिंशत्कला मुहूर्तः स्यादहोरात्रं तु तावतः ॥ ६४ ॥ अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषदैविके । रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः ॥ ६५ ॥ पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तु पक्षयोः । कर्मचेष्टास्वहः कृष्णः शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी ॥ ६६ ॥ अब मन्वन्तर आदि काल का मान कहते हैं-आँख की पलक गिरने का समय निमेष कहलाता है, १८ निमेष की एक काष्ठा ना- मक काल होता है। ३० काष्ठा की कला, ३० कलाका मुहूर्त, ३० मुहूर्त का अहोरात्र होता है । मानुष और दैव अहोरात्र-दिन, रात का विभाग सूर्य करता है । उसमें प्राणियों के सोने के लिए रात और कर्म करने के लिए दिन होता है । मनुष्यों के एक मास

१४ मनुस्मृति । का, पितरों का एक अहोरात्र होता है । उसमें कृष्णपक्ष का दिन कर्म करने और शुक्लपक्ष की रात्रि शयन करने के लिएहै ॥ ६३-६६ ॥ दैवे राज्यहनी वर्ष प्रविभागस्तयोः पुनः । अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद्दक्षिणायनम् ॥ ६७ ॥ ब्राह्मस्य तु क्षयाहस्य यत्प्रमाणं समासतः । एकैकशो युगानां तु क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ६८ ॥ चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् । तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥ ६६ ॥ इतरेषु ससंख्येषु ससंध्यांशेषुच त्रिषु । एकापायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ॥ ७० ॥ यदेतत्परिसंख्यातमादावेव चतुर्युगम् । एतद्द्वादशसाहस्रं देवानां युगमुच्यते ॥ ७१ ॥ दैविकानां युगानान्तु सहस्रं परिसंख्यया । ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च ॥ ७२ ॥ मनुष्यों के एक वर्ष में देवताओं का अहोरात्र होता है । उस में उत्तरायण दिन और दक्षिणायन रात है । ब्राह्म अहोरात्र और चारों युगों का प्रमाण इस प्रकार है-मनुष्यों के ३६० वर्ष का १ देव- वर्ष होता है । ऐसे चार हजार वर्षों को कृतयुग कहते हैं और उसकी संध्या (युग का आरम्भकाल) और सन्ध्यांश (युग का अन्तकाल) दोनों चारसौ ४०० वर्ष का है । यों सन्ध्या और सन्ध्यांश मिलकर ४८०० दैववर्ष का कृतयुग होता है । अर्थात् ४८०० × ३६० = १७२८००० वर्ष उसका मान है । बाकी त्रेता, द्वापर और कलि इन तीनों के सन्ध्या और सन्ध्यांश के साथ जो संख्या होती है, उस में हजार में की और सैकड़े में की एक एक संख्या घटाने से तीनों की संख्या पूरी होती है । इस प्रकार, त्रेतायुग ३६००=१२९६००० । द्वापर = २४०० = ८६४०००

पहला अध्याय। १५

पहला अध्याय। १५ कलि १२००=४३२०००; मान होते हैं । यह जो पहले चारों युगों की बारह हजार १२००० दैववर्ष संख्या कही है, यह एक दैवयुग का मान है । ऐसे हज़ार दैवयुगों का ब्रह्मा का १ दिन और उतनी ही रात होती है । अर्थात् दो हजार दैववर्षों का ब्रह्मा का अहो- रात्र होता है । १२००० दैववर्ष का १ युग, इसको १००० गुणा करने से १,२०००००० दैववर्षों का ब्राह्मदिन और इतनी ही रात्रि हुई । इसे ३६० गुणने से ४३२००००००० मानुषवर्षों का ब्राह्मदिन और उतनी ही रात्रि हुई * ॥ ६७-७२ ॥ तद्वै युगसहस्रान्तं ब्राह्मं पुण्यमहर्विदुः । रात्रिं च तावतीमेव तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ ७३ ॥ तस्य सोहर्निशस्यान्ते प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते । प्रतिबुद्धश्च सृजति मनः सदसदात्मकम् ॥ ७४ ॥ मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया । आकाशाज्जायते तस्मात्तस्य शब्दं गुणं विदुः ॥ ७५ ॥ आकाशात्तु विकुर्वाणात्सर्वगन्धवहः शुचिः । बलवाञ्जायते वायुः स वै स्पर्शगुणो मतः ॥ ७६ ॥ वायोरपि विकुर्वाणाद्विरोचिष्णु तमोनुदम् । ज्योतिरुत्पद्यते भास्वत्तद्रूपगुणमुच्यते ॥ ७७ ॥ ज्योतिषश्च विकुर्वाणादापोरसगुणाः स्मृताः । अद्भ्योगन्धगुणा भूमिरित्येषा सृष्टिरादितः ॥ ७८ ॥ एक हज़ार युग का ब्रह्मा का पुण्यदिन और उतनी ही रात्रि है । उस रात्रि के अन्त में ब्रह्मा सोकर जागता है और अपने मन को सृष्टि में प्रेरित करता है । परमात्मा की इच्छा से प्रेरित मन, सृष्टि को करता है । मनस्तत्त्व से आकाश पैदा होता है जिस का

  • ये सब युगों के मान सूर्यसिद्धान्त में भी इसी प्रकार हैं । इसी आधार से ग्रहभगण आदि के मान सिद्धान्तों में लिखे गये हैं । जो आधुनिक मत से प्रायः मिलते हैं ।

१६ मनुस्मृति । गुण शब्द है। आकाश के विकार से, गन्ध को धारण करनेवाला, पवित्र वायु उत्पन्न हुआ है, उसका स्पर्शगुण है। वायु के विकार से, अन्धकार को नाश करनेवाला, प्रकाशमान अग्नि पैदा हुआ है, उसका गुण रूप है। अग्नि से जल, जिसका गुण रस है और जल से पृथिवी, जिसका गुण गन्ध है। यही आदि से सृष्टि का क्रम है * ॥ ७३-७८ ॥ यत्प्राग् द्वादशसाहस्रमुदितं दैविकं युगम् । तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ ७९ ॥ मन्वन्तराण्यसंख्यानि सर्गः संहार एव च । क्रीडन्निवैतत्कुरुते परमेष्ठी पुनः पुनः ॥ ८० ॥ चतुष्पात्सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे । नाधर्मेणागमः कश्चिन्मनुष्यान् प्रतिवर्तते ॥ ८१ ॥ इतरेष्वागमाद्धर्मः पादशस्त्ववरोपितः । चौरिकानृतमायाभिर्धर्मश्चापैति पादशः ॥ ८२ ॥ अरोगाः सर्वसिद्धार्थाश्चतुर्वर्षशतायुषः । कृते त्रेतादिषु ह्येषामायुर्ह्रसति पादशः ॥ ८३ ॥ वेदोक्तमायुर्मर्त्यानामाशिषश्चैव कर्मणाम् । फलन्त्यनुयुगं लोके प्रभावश्च शरीरिणाम् ॥ ८४ ॥ अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरे परे । अन्ये कलियुगे नृणां युगह्रासानुरूपतः ॥ ८५ ॥ पूर्व जो बारह हजार वर्ष का एक दैवयुग कहा है, ऐसे ७१ युगों का एक मन्वन्तरकाल होता है । मन्वन्तर असंख्य हैं, सृष्टि और संहार भी असंख्य हैं। परमात्मा यह सब बिना श्रम-खेल के

  • इसी प्रकार तैत्तिरीय श्रुतिहै-‘आकाशाद्वायुः वायोरग्निरग्नेरापोऽद्द्भ्यः पृथिवी’ इत्यादि ।

पहला अध्याय । १७

पहला अध्याय । १७ मुवाफ़िक़ किया करता है । कृतयुग में धर्म पूरा, चार पैर का और सत्यमय होता है क्योंकि उस समय में अधर्म से मनुष्यों का कोई कार्य न बनता था । दूसरे युगों में धर्म क्रमसे चोरी, झूठ, माया इन से धर्म चौथाई चौथाई घटता है । सत्ययुग में सब रोग रहित होते हैं । सारे मनोरथ पूरे होते हैं । ४०० वर्ष की आयु होती है । आगे त्रेता आदि में चतुर्थांश घटती जाती है । मनुष्यों को, वेदानुसार आयु, कर्मों के फल और देह का प्रभाव, सब युगानुसार फल देते हैं युगों के अनुसार, कृतयुग में दूसरे धर्म, त्रेता में उससे दूसरा, द्वापर में उस से जुदा, कलिमें कुछ दूसरे ही प्रकार का, यों बदला करता है और आपस में विलक्षण होता है ॥ ७६-८५ ॥ तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते । द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥ ८६ ॥ सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थं स महाद्युतिः । मुखबाहूरुपज्जानां पृथक् कर्माण्यकल्पयत् ॥ ८७ ॥ अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥ ८८ ॥ प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च । विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः ॥ ८९ ॥ पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च । वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ ९० ॥ एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ ९१ ॥ कृतयुग में तप मुख्य धर्म है, त्रेतायुग में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलियुग में एक दान देना मुख्य धर्म है । परमात्मा ने, संसार की रक्षा के लिये ब्राह्मण आदि चारों वर्णों के काम, अलग अलग ३

१८ .मनुस्मृति । नियत किये। पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, ये छः कर्म ब्राह्मणों के हैं। प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, पढ़ना और इन्द्रियों के विषयों में न फँसना, ये क्षत्रियों के कर्म हैं। पशुओं को पालना, दान देना, यज्ञ करना, पढ़ना, व्यापार करना, व्याज लेना और खेती करना, ये सब काम वैश्य के हैं। परमात्माने शूद्रों का एक ही काम बतलाया है-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य की भक्ति से, सेवा करना ॥ ८८-९१ ॥ ऊर्ध्वं नाभेर्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्तितः । तस्मान्मेध्यतमं तस्य मुखमुक्तं स्वयम्भुवा ॥ ९२ ॥ उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्यैष्ठ्याद्ब्राह्मण्याश्चैव धारणात् । सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ९३ ॥ पुरुष नाभि के ऊपर अतिपुनीत माना गया है । उससे भी उस का मुख अतिपवित्र है । परमात्मा के मुखतुल्य होने से, चारों वर्णों में बड़ा होने से, और वेद पढ़ाने से, ब्राह्मण सारे जगत् का प्रभु है ॥ ९२-९३ ॥ तं हि स्वयम्भूः स्वादास्यात्तपस्तप्त्वादितोऽसृजत् । हव्यकव्याभिवाह्याय सर्वस्यास्य च गुप्तये ॥ ९४ ॥ यस्यास्येन सदाश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः । कव्यानि चैव पितरः किम्भूतमधिकं ततः ॥ ९५ ॥ भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥ ९६ ॥ ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः । कृतबुद्धिषु कर्त्तारः कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः ॥ ९७ ॥ उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्त्तिर्धर्मस्य शाश्वती । स हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ९८ ॥

पहला अध्याय। १६

पहला अध्याय। १६ ब्रह्मा ने अपने मुख से देव और पितृकार्य संपादनार्थ और लोक की भलाई के लिए, ब्राह्मण को उत्पन्न किया है। जिस के मुखद्वारा देवगण हव्य और पितृगण कव्य ( श्राद्धादि में ) को ग्रहण करते हैं उससे श्रेष्ठ कौन है ? भूतों ( स्थावर, जङ्गम ) में प्राणी ( कीटादि ) श्रेष्ठ हैं। इन में भी बुद्धिजीवी ( पशु आदि ) इनसे भी मनुष्य श्रेष्ठ है उन में ब्राह्मण अधिक है। और ब्राह्मणों में विद्वान्, विद्वानों में कर्म जाननेवाले, उन में कर्म करनेवाले और उन से भी ब्रह्मज्ञानी श्रेष्ठ होता है। ब्राह्मण का शरीर ही धर्म की अविनाशी मूर्ति है। क्योंकि, वह धर्मद्वारा मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ६४-६८ ॥ ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामधिजायते । ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये ॥ ६६ ॥ सर्वं स्वं ब्राह्मणस्येदं यत्किञ्चिज्जगतीगतम् । श्रैष्ठ्येनाभिजनेनेदं सर्वं वै ब्राह्मणोर्हति ॥ १०० ॥ ब्राह्मण का उत्पन्न होना पृथिवी में सब से उत्तम है। क्योंकि सब जीवों के धर्मरूपी ख़ज़ाने की रक्षार्थ वह समर्थ है। जो कुछ जगत् के पदार्थ हैं वे सब ब्राह्मणों के हैं। ब्रह्ममुख से उत्पत्ति होने से ब्राह्मण, सब ग्रहण करने योग्य है ॥ ६६-१०० ॥ स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च । आनृशंस्याद्ब्राह्मणस्य भुञ्जते हीतरे जनाः ॥ १०१ ॥ तस्य कर्मविवेकार्थं शेषाणामनुपूर्वशः । स्वायम्भुवो मनुर्द्धीमानिदं शास्त्रमकल्पयत् ॥ १०२ ॥ विदुषा ब्राह्मणेनेदमध्येतव्यं प्रयत्नतः । शिष्येभ्यश्च प्रवक्तव्यं सम्यग् नान्येन केनचित् ॥ १०३ ॥ इदं शास्त्रमधीयानो ब्राह्मणः संशितव्रतः । मनोवाग्देहजैर्नित्यं कर्मदोषैर्न लिप्यते ॥ १०४ ॥

२० मनुस्मृति। पुनाति पङ्क्तिं वंश्यांश्च सप्त सप्त परावरान् । पृथिवीमपि चैवेमां कृत्स्नामेकोपि सोर्हति ॥ १०५ ॥ ब्राह्मण, यदि दूसरे का दिया अन्न भोजन करे, या वस्त्र पहने, या दान देवे, तौभी वह सब ब्राह्मण का अपना ही है। और लोग तो ब्राह्मणों की कृपा से भोजन पाते हैं। ब्राह्मण और क्षत्रियों के कर्म विवेक के लिये स्वायम्भुव मनु ने यह धर्मशास्त्र बनाया। वि- द्वान् ब्राह्मण को यह धर्मशास्त्र पढ़ना और शिष्यों को पढ़ाना चाहियें। और किसी को उपदेश न करना चाहिये । नियमनिष्ठ ब्राह्मण जो इस शास्त्र का अध्ययन करता है वह मन, वाणी, देह के पापों से लिप्त नहीं होता । धर्मशास्त्रविशारद, अपवित्र पंक्ति को पवित्र कर देता है और अपने वंशके सात पिता, पितामह आदि और पुत्र, पौत्र आदि को पवित्र करदेता है । और सारी पृथिवी को भी वह लेने योग्य है ॥ १०१-१०५ ॥ इदं स्वस्त्ययनं श्रेष्ठमिदं बुद्धिविवर्धनम् । इदं यशस्यमायुष्यमिदं निःश्रेयसं परम् ॥ १०६ ॥ अस्मिन् धर्मोखिलेनोक्तो गुणदोषौ च कर्मणाम् । चतुर्णामपि वर्णानामाचारश्चैव शाश्वतः ॥ १०७ ॥ आचारः परमोधर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त्त एव च । तस्मादस्मिन्सदायुक्तोनित्यंस्यादात्मवान्द्विजः॥१०८॥ यह शास्त्र, कल्याणदायक, बुद्धिवर्धक, यशदायक, आयुवर्धक और मोक्ष का सहायक है। इस स्मृति में सारे धर्म कर्म कहे हैं। कर्मों के गुण दोष भी कहे हैं । और चारों वर्णों का परंपरा से प्राप्त आचार कथन किया गया है। श्रुति और स्मृति में कहा आचार परमधर्म है, इस लिए इस में ब्राह्मणों को सदा तत्पर रहना चाहिए ॥ १०६-१०८ ॥ आचाराद्विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते । आचारेण तु संयुक्तः संपूर्णफलभाग्भवेत् ॥ १०६ ॥

पहला अध्याय । २१

पहला अध्याय । २१ एवमाचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम् । सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहुः परम् ॥ ११० ॥ अपने आचार से हीन ब्राह्मण वेदफल को नहीं पाता । और जो आचारयुक्त है वह फलभागी होता है । इस प्रकार मुनियों ने, आचार से धर्म प्राप्ति देखकर, धर्ममूल आचारं को ग्रहण किया है ॥ १०६-११० ॥ जगतश्च समुत्पत्तिं संस्कारविधिमेव च । व्रतचर्योपचारं च स्नानस्य च परं विधिम् ॥ १११ ॥ दाराधिगमनं चैव विवाहानां च लक्षणम् । महायज्ञविधानं च श्राद्धकल्पश्च शाश्वतः ॥ ११२ ॥ वृत्तीनां लक्षणं चैव स्नातकस्य व्रतानि च । भक्ष्याभक्ष्यं च शौचं च द्रव्याणां शुद्धिमेव च ॥११३॥ स्त्रीधर्मयोगतापस्यं मोक्षं संन्यासमेव च । राज्ञश्च धर्ममखिलङ्कार्याणां च विनिर्णयम् ॥ ११४ ॥ साक्षिप्रश्नविधानं च धर्मं स्त्रीपुंसयोरपि । विभागधर्मं द्यूतं च कण्टकानां च शोधनम् ॥ ११५ ॥ अब इस धर्मशास्त्र में मनु ने, किन किन विषयों को कहे हैं, उस की संख्या बतलाते हैं-जगत् की उत्पत्ति, संस्कारों की विधि, ब्रह्म- चारियों के व्रताचरण, गुरुवन्दन, उपासना आदि, स्नानविधि, स्त्रीगमन, विवाहों का लक्षण, महायज्ञ-वैश्वदेवादि, श्राद्धविधि, जीव्नोपाय, गृहस्थ के व्रतनियम, भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार, आ- शौचनिर्णय, द्रव्यशुद्धि, स्त्रियों के धर्मोपाय, वानप्रस्थ आदि तपों के धर्म, मोक्ष और संन्यासधर्म, राजाओं के संपूर्ण धर्म, कार्यों का निर्णय-साखी-गवाहियों से प्रश्नविधि, स्त्री पुरुषों के धर्म, हिस्सा-बाँट और जुआरी, चोरोंका शोधन कह।गयाहै॥१११-११५॥

२२ मनुस्मृति । वैश्यशूद्रोपचारं च सङ्कीर्णानां च सम्भवम् । आपद्धर्मं च वर्णानां प्रायश्चित्तविधिं तथा ॥ ११६ ॥ संसारगमनं चैव त्रिविधं कर्मसम्भवम् । निःश्रेयसं कर्मणां च गुणदोषपरीक्षणम् ॥ ११७ ॥ देशधर्मान् जातिधर्मान् कुलधर्मांश्च शाश्वतान् । पाखण्डगणधर्मांश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुक्तवान् मनुः॥ ११८ ॥ वैश्य और शूद्रों के धर्मानुष्ठान का प्रकार, वर्णसङ्करों की उत्पत्ति, वर्णों का आपद्धर्म और प्रायश्चित्तविधि, उत्तम, मध्यम, अधम इन तीन प्रकार के कर्मों से देहगति का निर्णय, मोक्ष का स्वरूप, और कर्मों के गुण दोष की परीक्षा, देश धर्म, जाति का धर्म, कुल का धर्म जो परंपरा से चला आता है । पाखण्डियों के कर्म, गण-वैश्य आदि के धर्म इस शास्त्र में भगवान् मनु ने कहा है ॥ ११६-११८ ॥ यथेदमुक्तवान् शास्त्रं पुरा पृष्टो मनुर्मया । तथेद्ं यूयमप्यद्य मत्सकाशान्निबोधत ॥ ११९ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां प्रथमोऽध्यायः ॥ जिस प्रकार, मनु से पूर्वकाल में मैंने पूछा, तब यह शास्त्र उन्हों ने उपदेश किया । उसी प्रकार अब आप मेरे से सुनिये ॥ ११९ ॥ पहला अध्याय समाप्त ॥

दूसरा अध्याय ।

अथ द्वितीयोऽध्यायः । विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः । हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत ॥ १ ॥ कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता । काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः ॥ २ ॥ दूसरा अध्याय । धर्म का लक्षण । अब धर्म का सामान्य लक्षण कहते हैं-वेदविशारद, धार्मिक, राग द्वेष से रहित, महात्माओं ने जिस धर्म का पालन किया और हृदय से स्वीकार किया उस को सुनो । पुरुष को कामफल का अभिलाषी होना अच्छा नहीं है और न बिल्कुल इच्छा का त्याग ही श्रेष्ठ है। क्योंकि बिना इच्छा, वेदाध्ययन और वैदिक कर्मों का अनुष्ठान नहीं होसकता ॥ १-२ ॥ सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसम्भवाः । व्रता नियमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ॥ ३ ॥ अकामस्य क्रिया काचिद्दृश्यते नेह कर्हिचित् । यद्यद्धि कुरुते किंचित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥ ४ ॥ तेषु सम्यग्वर्तमानो गच्छत्यमरलोकताम् । यथा सङ्कल्पितांश्चेह सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ५ ॥ इस कर्म से यह इष्टफल होगा-यही संकल्प है । इसलिए सब कामों का मूल संकल्प है। यज्ञादि सब संकल्प से ही होते हैं। व्रत, नियम, धर्म सब संकल्प से किये जाते हैं अर्थात् बिना संकल्प

२४ मनुस्मृति । कुछ नहीं होसकता । संसार में कोई कर्म बिना इच्छा के होते नहीं देखा गया । शास्त्रोक्त कर्मों का भलीभांति अनुष्ठान करने से स्वर्ग- लोक की प्राप्ति और इष्टकाम पूरे होते हैं ॥ ३-५ ॥ वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥ ६ ॥ संपूर्ण वेद, धर्ममूल हैं-वेदवेत्ताओं की स्मृति और शील- ब्रह्मज्ञता, साधु पुरुषों का आचार, और आत्म-सन्तोष ये धर्म में प्रमाण माने जाते हैं ॥ ६ ॥ यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ ७ ॥ सर्वं तु समवेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा । श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥ ८ ॥ श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः । इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ६ ॥ जिस वर्ण का जो धर्म मनु ने कहा है, वह सब वेदोक्त है । वेद संपूर्ण ज्ञान का भण्डार है । विद्वान्, ज्ञानदृष्टिसे, वेदप्रमाण द्वारा धर्मशास्त्र को जानकर, अपने धर्म में श्रद्धा करे । जो पुरुष, वेद और स्मृतियों में कहे धर्मों का पालन करताहै, वह संसार में कीर्ति पाकर, परलोक में अक्षय सुख पाता है ॥ ७-६ ॥ श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥ १०॥ योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः । स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ ११ ॥ वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥

दूसरा अध्याय । २५

दूसरा अध्याय । २५ श्रुति वेद को और स्मृति धर्मशास्त्र को कहते हैं। ये दोनों. सब विषयों में निर्विवाद, तर्क-कुतर्क रहित हैं। क्योंकि, इन्हीं से धर्म का प्रकाश हुआ है। जो द्विज, कुतर्कों से इनकी निन्दा करते हैं, वे नास्तिक हैं, वेदनिन्दक हैं। वे शिष्टसमाज से निकाल देने योग्य हैं। वेद, स्मृति, सदाचार, और अपना सन्तोष, ये चार प्रकार के धर्मलक्षण, मुनियों ने कहे हैं ॥ १०–१२ ॥ अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते । धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥ १३ ॥ श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ । उभावपि हि तौ धर्मौ सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ १४ ॥ उदितेऽनुदिते चैव समयाध्युषिते तथा । सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकीश्रुतिः ॥ १५ ॥ निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः । तस्यशास्त्रेऽधिकारोऽस्मिन ज्ञेयोनान्यस्यकस्यचित् ॥१६॥ जो पुरुष, अर्थ-प्रयोजन, काम-अभिलाष में नहीं फँसे हैं उनको धर्म ज्ञान होता है। धर्म जाननेवालों के लिए, सब से श्रेष्ठ प्रमाण श्रुति है। जहां श्रुति दो प्रकार की हो अर्थात् एक ही विषय को दो तरह से कहें, वहां दोनों वचन धर्म में प्रमाण हैं * यह ऋषियों ने कहा है । श्रुतिभेद की मान्यता दिखलाते हैं-उदितकाल-सूर्यो- दयकाल में, अनुदित-सूर्योदय से पूर्व में, समयाध्युषित-सूर्य, नक्षत्र- वर्जितकाल में, सर्वथा यज्ञ-होम होता है, यह वैदिकी श्रुति है † । यों ज्ञात होता है एकही श्रुति कालभेद कहती है और उन में

  • जावालिवचन है-‘श्रुतिस्मृतिविरोघे तु श्रुतिरेव गरीयसी । अविरोधे सदा कार्य स्मार्त वैदिकवत्सदा ॥’ जैमिनि ने मीमांसा में ‘औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्’ ‘औदुम्बरी सर्वावेष्टयितव्या’ इन दो श्रुति-स्मृति वाक्यों के विरोध में ज्योतिष्टोम के प्रसङ्ग में श्रुति प्रामाण्यही माना है । † उदिते जुहोति । अनुदिते जुहोति । समयाध्युषिते जुहोति । ४

२६ मनुस्मृति । अलग अलग यज्ञकर्म किया जाता है। गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक जिस वर्ण (द्विजाति) के लिए वेदमन्त्रों से कर्म लिखे हैं उसी का इस शास्त्र को पढ़ने सुनने का अधिकार है दूसरों का नहीं है ॥ १३-१६ ॥ सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ॥ १७ ॥ तस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः । वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ॥ १८ ॥ देशविभाग । सरस्वती और दृषद्वती इन देवनदियों के बीच जो देश है उस को 'ब्रह्मावर्त' कहते हैं‡ जिस देशमें, परंपरा से, जो आचार चला आता है, वही वर्णों का और सङ्कीर्ण जातियों का 'सदाचार' कहा जाता है ॥ १७-१८ ॥ कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनकाः । एष ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादनन्तरः ॥ १६ ॥ एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ २० ॥ हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विनशनादपि । प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥ २१ ॥ आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त्तं विदुर्बुधाः ॥ २२ ॥ ‡ महाभारत में लिखा है-शुतुद्रि और यमुना के मध्यगत 'लक्षप्रस्रवण' नामक पर्वत से 'सरस्वती' नदी की उत्पत्ति है । कुरुक्षेत्र की उत्तर सीमा में, इसका प्रवाह प्रायः वर्षा में देखा जाता है । ऋग्वेद में भी 'इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि...'* इत्यादि वर्णन है । और दृषद्वती नदी, हास्तिनपुर के पश्चिम-उत्तर दिशा में, अम्बाला के पास कहीं नदियों में मिली है । इन दोनों के बीच में, प्राचीन आर्य ब्राह्मणों के निवास और उत्पत्ति से 'ब्रह्मावर्त' नाम प्रसिद्ध हुआ ।