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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

द्वितीय अङ्क। ५६

द्वितीय अङ्क। ५६

राक्षस।—अहा मित्र ! देखो, कैसा आश्चर्य हुआ—

जो बिषमयी नृप चन्द्र बधहित नारी राखी लाय कै।
तासो हत्यो पर्व्वत उलटि चाणक्य बुद्धि उपाइ कै॥
जिमि करन शक्ति अमोघ अर्जुन हेतु धरी छिपाइ कै।
पै कृष्ण के मत सो घटोत्कच पै परी घहराइ कै॥ ५

विराधगुप्त।—महाराज ! समय की सब उलटी गति है !—क्या कीजियेगा ?

राक्षस।—हा ! तब क्या हुआ ?

विराधगुप्त।—तब पिता का बध सुनकर कुमार मलयकेतु नगर से निकल कर चले गये, और पर्व्वतेश्वर के भाई १० वैरोधक पर उन लोगों ने अपना विश्वास जमा लिया तब उस दुष्ट चाणक्य ने चन्द्रगुप्त का प्रवेशमुहूर्त्त प्रसिद्ध कर के नगर के सब बढ़ई और लोहारों को बुला कर एकत्र किया और उन से कहा कि महाराज के नन्दभवन में गृहप्रवेश का मुहूर्त्त ज्योतिषियों ने आज ही आधी रात १५ का दिया है, इससे बाहर से भीतर तक सब द्वारों को जांच लो, तब उस से बढ़ई लोहारों ने कहा कि “महाराज ! चन्द्रगुप्त का गृहप्रवेश जान कर दारुवर्म्म ने प्रथम द्वार तो पहले ही सोने की तोरनों से शोभित कर रखा है, भीतर के द्वारों को हम लोग ठीक करते हैं।” यह सुन २० कर चाणक्य ने कहा कि बिना कहे ही दारुवर्म्म ने बड़ा काम किया इससे उसको चतुराई का पारितोषिक शीघ्र ही मिलैगा।

राक्षस।—(आश्चर्य से) चाणक्य प्रसन्न हो यह कैसी बात है ? इससे दारुवर्म्म का यत्न या तो उलटा हो या निष्फल २५ होगा, क्योंकि इस ने बुद्धि मोह से या राजभक्ति से बिना

६० मुद्राराक्षस-

समय ही चाणक्य के जी में अनेक सन्देह और विकल्प उत्पन्न कराया। हा फिर ? विराधगुप्त ।—फिर उस दुष्ट चाणक्य ने बुला कर सब को सहेज दिया कि आज आधी रात को प्रवेश होगा, और ५ उसी समय पर्व्वतेश्वर के भाई वैरोधक और चन्द्रगुप्त को एक आसन पर बिठा कर पृथ्वी का आधा २ भाग कर दिया। राक्षस ।—क्यों पर्व्वतेश्वर के भाई वरोधक को आधा राज मिला, यह पहिले ही उसने सुना दिया ? १० विराधगुप्त ।—हा, तो इससे क्या हुआ ? राक्षस ।—(आप ही आप) निश्चय यह ब्राह्मण बडा धूर्त्त है, कि इस ने उस सीधे तपस्वी से इधर-उधर की चार बात बना कर पर्व्वतेश्वर के मारने के अपयश निवारण के हेतु यह उपाय सोचा (प्रकाश) अच्छा कहो—तब ? १५ विराधगुप्त ।—तब यह तो उसने पहले ही प्रकाश कर दिया था कि आज रात को गृह प्रवेश होगा, फिर उसने वैरो धक को अभिषेक कराया और बडे बड़े बहुमूल्य स्वच्छ मोतियों का उसको कवच पहिराया और अनेक रत्नों से जड़ा सुन्दर मुकुट उसके सिर पर रक्खा और गले २० में अनेक सुगन्ध के फूलों की माला पहिराई, जिससे वह एक ऐसे बडे राजा की भांति हो गया कि जिन लोगों ने उसे सर्व्वदा देखा है वे भी न पहिचान सकें, फिर उस दुष्ट चाणक्य की आज्ञा से लोगों ने चन्द्रगुप्त की चन्द्र लेखा नाम की हथिनी पर बिठा कर बहुत से मनुष्य २५ साथ करके बडी शीघ्रता से नन्द मन्दिर में उसका प्रवेश कराया। जब वैरोधक मन्दिर में घुसने लगा तब आप का भेजा दारुवर्म्म बढ़ई उसको चन्द्रगुप्त समझ कर उस

द्वितीय अङ्क। ६१

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के ऊपर गिराने को अपनी कल की बनी तोरन ले कर सावधान हो बैठा। इसके पीछे चन्द्रगुप्त के अनुयायी राजा सब बाहर खड़े रह गये और जिस बर्बर को आप ने चन्द्रगुप्त के मारने के हेतु भेजा था वह भी अपनी सोने की छड़ी की गुप्ती जिसमे एक छोटी कृपाण थी लेकर वहा खड़ा हो गया।

**राक्षस।—**दोनों ने बे ठिकाने काम किया, हा फिर ?

**विराधगुप्त।—**तब उस हथिनो को मार कर बढ़ाया और उस के दौड़ चलने से कल की तोरण का लक्ष, जो चन्द्रगुप्त के धोखे वैरोधक पर किया गया था, चूक गया १० और वहा बर्बर जो चन्द्रगुप्त का आसरा देखता था, वह बचार। उसी कल की तोरन से मारा गया। जब दारुवर्म्मा ने देखा कि लक्ष तो चूक गए, अब मारे जायहीगे तो उस ने उस कल के लोहे की कील से उस ऊंचे तोरन के स्थान ही पर से चन्द्रगुप्त के धोखे तपस्वी १५ वैरोधक को हथिनो ही पर मार डाला।

**राक्षस।—**हाय ! दोनों बात कैसे दुःख की हुई कि चन्द्रगुप्त तो काल से बच गया और दोनों बिचारे बर्बर और वैरोधक मारे गए; (आप ही आप) दैव ने इन दोन के नहो मारा हम लोगों को मारा ।। (प्रकाश) और वह २० दारुवर्म्म बढ़ई क्या हुआ ?

**विराधगुप्त।—**उस को वैरोधक के साथ के मनुष्यों ने मार डाला।

**राक्षस।—**हाय ! बड़ा दुःख हुआ ! हाय ! प्यारे दारुवर्म्म का हम लोगों से वियोग हो गया। अच्छा ! उस वैद्य २५ अभयदत्त ने क्या किया ?

**विराधगुप्त।—**महाराज ! सब कुछ किया।

६२ मुद्राराक्षस—

राक्षस ।—( हर्ष से ) क्या चन्द्रगुप्त मारा गया ? विराधगुप्त ।—देव ने न मरने दिया । राक्षस ।—( शोक से ) तो क्या फूल कर कहते हो कि सब कुछ किया ? ५ विराधगुप्त ।—उस ने औषधि मे विष मिला कर चन्द्रगुप्त को दिया, पर चाणक्य ने उस को देख लिया और सोने के बरतन मे रख कर उस का रग पलटा जान कर चन्द्रगुप्त से कह दिया कि इस औषधि में विष मिला है, इस को न पीना । १० राक्षस ।—अरे वह ब्राह्मण बड़ा ही दुष्ट है । हा, तो वह वैद्य क्या हुआ ? विराधगुप्त ।—उस वैद्य को वही औषधि पिला कर मार डाला । राक्षस ।—( शोक से ) हाय हाय ! बड़ा गुणी मारा गया ! १५ भला शयनघर के प्रबन्ध करनेवाले प्रमोदक ने क्या किया ? विराधगुप्त ।—उस ने सब चौका लगाया । राक्षस ।—( घबड़ा कर ) क्यों ? विराधगुप्त ।—उस मूर्ख को जो आप के यहा से व्यय को धन मिला था उस ने अपना बडा ठाट बाट फैलाया, यह देखतेही २० चाणक्य चौकन्ना हो गया और उस से अनेक प्रश्न किए, जब उस ने उन प्रश्नों के उत्तर अडबण्ड दिये तो उस पर पूरा सन्देह कर के दुष्ट चाणक्य ने उस को बुरी चाल से मार डाला । राक्षस ।—हा ! क्या देव ने यहा भी उलटा हमी लोगों को २५ मारा ! भला वह चन्द्रगुप्त को सोते समय मारने के हेतु जो राजभवन मे नीभत्सकादिक वीर सुरग मे छिपा रक्खे थे उन का क्या हुआ ?

द्वितीय अङ्क । ६३

द्वितीय अङ्क । ६३

विराधगुप्त ।—महाराज ! कुछ न पूछिये। राक्षस ।—( घबड़ाकर ) क्यों क्यों ! क्या चाणक्य ने जान लिया ? विराधगुप्त ।—नही तो क्या ? राक्षस ।—कैसे ? ५ विराधगुप्त ।—महाराज ! चन्द्रगुप्त के सोने जाने के पहिले ही वह दुष्ट चाणक्य उस घर मे गया और उस को चारो ओर से देखा तो भीतर को एक दरार से चिउटी लोग चावल के कने लातां है। यह देख कर उस दुष्ट ने निश्चय कर लिया कि इस घर के भीतर मनुष्य छिपे है, बस, १० यह निश्चय कर उस ने उस घर में आग लगवा दिया और धूंआ से घबड़ा कर निकल तो सके ही नही, इस से वे बीभत्सकादिक वही भीतर ही जल कर राख हो गए । राक्षस ।—( सोच से ) मित्र ! देख, चन्द्रगुप्त का भाग्य कि १५ सब के सब मर गये। ( चिन्ता सहित ) अहा ! सखा ! देख इस दुष्ट चन्द्रगुप्त का भाग्य ! ! ! कन्या जो विष की गई, ताहि हतन के काज । तासों मार्यौ पर्व्वतक, जाको आधो राज ॥ सबै नसे कलबल सहित, जे पठये बघ हेत । २० उलटी मेरी नीति सब, मौर्यहिको फल देत ॥ विराधगुप्त ।—महाराज ! तब भी उद्योग नही छोड़ना चाहिये— प्रारम्भ ही नहि बिघ्न के भय अधम जन उद्यम सजैं। पुनि करहि तौ कोउ विघ्न सों डरि मध्य ही मध्यम तजैं॥ २५ धरि लात विघ्न अनेक पै निरभय न उद्यम ते टरैं। जे पुरुष उत्तम अन्त मैं ते सिद्ध सब कारज करैं ॥

६४ मुद्राराक्षस—

और भी— का सेसहि नहि भार पै, धरती देत न डारि ।
कहा दिवसमनि नहि थकत पै नहि रुकतर बिचारि ॥
सज्जन ताको हित करत, जेहि किय अंगीकार ।
यहै नेम सुकृतीन को, निज जिय करहु विचार ॥

राक्षस ।— मित्र ! यह क्या तू नही जानता कि मै प्रारब्ध के भरोसे नही हूं ? हा, फिर ।
विराधगुप्त ।— नभ से दुष्ट चाणक्य चन्द्रगुप्त की रक्षा मे चौकन्ना रहता है और इधर उधर के अनेक उपाय सोचा करता है और पहिचान २ क नन्द के मन्त्रियों को पकडता है ।
राक्षस ।— ( घबड़ा कर ) हा ! कहो तो, मित्र ! उस ने किसे किसे पकड़ा है ?
विराधगुप्त ।— सब के पहिले तो जीवसिद्धि क्षपणक को निरादर कर के नगर से निकाल दिया ।
राक्षस ।— ( आपही आप ) भला, इतने तक तो कुछ चिन्ता नही क्योंकि वह योगी है उसका घर बिना जी न घबड़ायगा । ( प्रकाश ) मित्र ! उस पर अपराध क्या ठहराया ?
विराधगुप्त ।— कि इसी दुष्ट ने राक्षस की भेजी विषकन्या से पर्व्वतेश्वर को मार डाला ।
राक्षस ।— ( आपही आप ) वाह रे कौटिल्य वाह ! क्यों न हो ?
निज कलंक हम पे धर्यौ, हत्यौ अर्द्ध बटवार ।
नीतिबीज तुव एक ही, फल उपजवत हजार ॥
( प्रकाश ) हा, फिर ?
विराधगुप्त ।— फिर चन्द्रगुप्त के नाश को इस ने दारुवर्म्मा-

द्वितीय अङ्क। ६५

द्वितीय अङ्क। ६५

दिक नियत किये थे यह दोष लगा कर शकटदास को
सूली दे दी।
राक्षस ।—(दु ख से) हा मित्र ! शकटदास ! तुम्हारी
बड़ी अयोग्य मृत्यु हुई। अथवा स्वामी के हेतु तुम्हारे
प्राण गए। इस से कुछ शोच नही है, शोच हमी लोगों ५
का है कि स्वामी के मरने पर भी जीना चाहते है।
**विराधगुप्त ।—**मन्त्री ! ऐसा न सोचिये, आप स्वामी का
काम कीजिये।
**राक्षस ।—**मित्र !
केवल है यह लोक, जीव लोभ अब लौ बचे। १०
स्वामि गयो पर लोक, पै कृतघ्न इतही रहे॥
**विराधगुप्त ।—**महाराज ! ऐसा नही (केवल यह ऊपर
का छन्द फिर से पढ़ता है) *।
**राक्षस ।—**मित्र ! कहो, और भी सैकड़ों मित्र का नाश सुनने
को ये पापी कान उपस्थित है। १५
**विराधगुप्त ।—**यह सब सुन कर चन्दनदास ने बड़े कष्ट से
आप के कुटुम्ब को छिपाया।
**राक्षस ।—**मित्र ! उस दुष्ट चाणक्य के तो चन्दनदास ने
विरुद्ध ही किया।
**विराधगुप्त ।—**तो मित्र का बिगाड़ करना तो अनुचित ही २०
था।
**राक्षस ।—**हा, फिर क्या हुआ ?
**विराधगुप्त ।—**तब चाणक्य ने आप के कुटुम्ब को चन्दनदास
से बहुत मांगा पर उस ने नही दिया, इस पर उस दुष्ट
ब्राह्मण ने— २५


* अर्थात जो लोग जीवलोभ से बचे हैं, वे कृतघ्न हैं, आप तो स्वामी के कार्य्य साधन को जीते हैं, आप क्यो कृतघ्न हैं।

६६ मुद्राराक्षस-

राक्षस ।- (घबड़ा कर) क्या चन्दनदास को मार डाला ? विराधगुप्त ।-नहीं, मारा तो नहीं, पर स्त्री पुत्र धन समेत बाध कर बन्दी घर में भेज दिया। राक्षस ।-तो क्या ऐसा सुखी हो कर कहते हो कि बन्धन ५ मे भेज दिया ? अरे ! यह कहो कि मन्त्री राक्षस को कुटुम्ब सहित बाघ रक्खा है। ( प्रियम्वदक आता है। )

प्रियम्वदक ।-जय जय महाराज ! बाहर शकटदास खड़े हैं। राक्षस ।-( आश्चर्य से ) सच ही ! १० प्रियम्वदक ।-महाराज ! आप के सेवक कभी मिथ्या बोलते हैं ? राक्षस ।-मित्र विराधगुप्त ! यह क्या ? विराधगुप्त ।-महाराज ! होनहार जो बचाया चाहे तो कौन मार सकता है ? १५ राक्षस ।-प्रियम्वदक ! अरे जो सच ही कहता है तो उन को झटपट लाता क्यों नहीं ? प्रियम्वदक ।-जो आज्ञा (जाता है) । (सिद्धार्थक के संग शकटदास आता है) शकटदास ।-देख कर (आप ही आप)

२० वह सूली गड़ी जो बड़ी दृढ़ कै, सोई चन्द्र को राज थिर्यो प्रन तैं। लपटी वह फास की डोर सोई, मनु श्री लपटी वृषलै मन ते ॥ बजी डौड़ी निरादर की नृप नन्द के, २५ सोऊ लख्यो इन आखन ते। नहि जानि परै इतनोहूं भए, केहि हेत न प्रान कढ़े तन तैं ॥

द्वितीय अङ्क । ६७

द्वितीय अङ्क । ६७

( राक्षस को देख कर ) यह मन्त्री राक्षस बैठे हैं। अहा

नन्द गए हू नहि तजन, प्रभुसेवा को स्वाद ।
भूमि बैठि प्रगटत मनहु , स्वामिभक्त मरजाद ॥

( पास जाकर ) मन्त्री की जय हो ।

राक्षस ।— देख कर आनन्द से ) मित्र शकटदास ! आओ, ५
मुझ से मिल लो, क्योंकि तुम दुष्ट चाणक्य के हाथ से
बच के आए हो ।
शकटदास ।—( मिलता है ) ।
राक्षस ।—( मिल कर ) यहां बैठो ।
**शकटदास ।—**जो आज्ञा ( बैठता है ) । १०
**राक्षस ।—**मित्र शकटदास ! कहो तो यह आनन्द की बात
कैसे हुई ?
शकटदास ।—(सिद्धार्थक को दिखा कर) इस प्यारे सिद्धार्थक
ने सूली देनेवाले लोगों को हटा कर मुझ को बचाया।
राक्षस ।—( आनन्द से ) वाह सिद्धार्थक ! तुम ने काम तो १५
अमूल्य किया है, पर भला ! तब भी यह जो कुछ है सो
लो ( अपने अंग से आभरण उतार कर देता है ) ।
सिद्धार्थक ।—( लेकर आप ही आप ) चाणक्य के कहने से मैं
सब करूं गा ( पैर पर गिर के प्रकाश ) महाराज ! यहां मैं
पहिले पहल आयाहूं, इस से मुझे यहां कोई नही जानता २०
कि मै उस के पास इन भूषणों को छोड़ जाऊ । इस से
आप इसी अंगूठी से इस पर मोहर कर के अपने ही पास
रक्खे, मुझे जब काम होगा ले जाऊ गा ।
**राक्षस ।—**क्या हुआ । अच्छा शकटदास ! जो यह कहता है
वह करो। २५
**शकटदास ।—**जो आज्ञा ( मोहर पर राक्षस का नाम देख कर
धीरे से ) मित्र ! यह तो तुम्हारे नाम की मोहर है ।

६८ मुद्राराक्षस—

राक्षस।—(देख कर बड़े शोच से आप ही आप) हाय २ इस को तो जब मै नगर से निकला था तो ब्राह्मणी ने मेरे स्मरणार्थ ले लिया था, वह इस के हाथ कैसे लगी? (प्रकाश) सिद्धार्थक ! तुम ने यह कैसे पाई? ५ सिद्धार्थक।—महाराज ! कुसुमपुर मे जो चन्दनदास जौहरी हे उन के द्वार पर पड़ी पाई। राक्षस।—तो ठीक है। सिद्धार्थक।—महाराज ! ठीक क्या है? राक्षस।—यही कि ऐसे धनिको के घर बिना यह वस्तु और १० कहा मिले? शकटदास।—मित्र ! यह मन्त्री जी के नाम की मोहर है, इस से तुम इस को मन्त्री को दे दो, तो इस के बदले तुम्हे बहुत पुरस्कार मिलेगा। सिद्धार्थक।—महाराज ! मेरे ऐसे भाग्य कहा कि आप इसे लें। १५ (मोहर देता है) राक्षस।—मित्र शकटदास ! इसी मुद्रा से सब काम किया करो। शकटदास।—जो आज्ञा। सिद्धार्थक।—महाराज ! मै कुछ बिनती करू ? २० राक्षस।—हा हा ! अवश्य करो। सिद्धार्थक।—यह तो आप जानते ही है कि उस दुष्ट चाणक्य की बुराई कर के फिर मै पटने मे घुस नही सकता, इससे कुछ दिन आप ही के चरणों की सेवा किया चाहताहू। राक्षस।—बहुत अच्छी बात है, हम लोग तो ऐसा चाहते ही थे, अच्छा है, यही रहो। २५ सिद्धार्थक।—(हाथ जोड कर) बडी कृपा हुई। राक्षस।—मित्र शकटदास ! लेजाओ, इस को उतारो और सब

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द्वितीय अङ्क। ६६

भोजनादिक का ठीक करो।
शकटदास।—जो आज्ञा।
(सिद्धार्थक को ले कर जाता है)
राक्षस। मित्र विराधगुप्त ! अब तुम कुसुमपुर का वृत्तान्त
जो छूट गया था सो कहो। वहा के निवासियों को मेरी ५
बातै अच्छी लगती है कि नही?
विराधगुप्त।—बहुत अच्छी लगती हैं, बरन वे सब तो आप
ही के अनुयायी है।
राक्षस।—ऐसा क्यों?
विराधगुप्त।—इस का कारण यह है कि मलयकेतु के निकलने १०
के पीछे चाणक्य को चन्द्रगुप्त ने कुछ चिढ़ा दिया और
चाणक्य ने भी उस की बात न सह कर चन्द्रगुप्त की
आज्ञा भंग कर के उस को दुखी कर रक्खा है, यह मैं
भली भांति जानता हूं।
राक्षस।—(हर्ष से) मित्र विराधगुप्त ! तो तुम इसी सपेरे के १५
भेस से फिर कुसुमपुर जाओ और वहा मेरा मित्र स्तन-
कलस नामक कवि है उस से कह दो कि चाणक्य के
आज्ञाभगादिकों के कबित्त बना बना कर चन्द्रगुप्त को
बढ़ावा देता रहे और जो कुछ काम हो जाय वह करभक
से कहला भेजे। २०
विराधगुप्त।—जो आज्ञा (जाता है।
(प्रियम्बदक आता है)
प्रियम्बदक।—जय हो महाराज ! शकटदास कहते हैं कि यह
तीन आभूषण बिकते हैं, इन्हें आप देखें।
राक्षस।—(देख कर) अहा यह तो बड़े मूल्य के गहने हैं, २५
अच्छा शकटदास से कह दो कि दाम चुका कर ले ले।
प्रियम्बदक।—जो आज्ञा (जाता है)।

७० मुद्राराक्षस—

राक्षस ।—तो अब हम भी चल कर करभक को कुसुमपुर भेजें (उठता है)। अहा ! क्या उस मृतक चाणक्य से चन्द्रगुप्त से बिगाड़ हो जायगा, क्यों नही ? क्योंकि सबै कामों को सिद्ध ही देखता हूं ।

५ चन्द्रगुप्त निज तेज बल, करत सबन को राज ।
तेहि समझत चाणक्य यह, मेरो दियो समाज ॥
अपनो २ करि चुके, काज रह्यो कछु जौन।
अब जौ आपस मे लडें, तौ बड अचरज कौन ॥
(जाता है)

१० ॥ इति द्वितीयाङ्क ॥

तृतीय अंक

(स्थान—राजभवन की अटारी)

कंचुकी आता है।

कंचुकी।— हे रूप आदिक विषय जो राखे हिये बहु लोभ सों।
सो मिटे इन्द्रीगन सहित ह्वै सिथिल अतिही छोभ सों॥ ५
मानत कह्यौ कोउ नाहि सब अङ्ग अङ्ग ढीले ह्वै गए।
तौहू न तृश्ने ! क्यों तजत तू मोहि बूढोह भए॥

(आकाश की ओर देख कर) अरे। अरे। सुगांगप्रसाद के लोगो! सुनो। महाराज चन्द्रगुप्त ने तुम लोगों को यह आज्ञा दी है कि कौमुदी-महोत्सव के होने से परम शोभित १० कुसुमपुर को मै देखना चाहता हूं, इस से उस अटारी को बिछौने इत्यादि से सज रक्खो, देर क्यों करते हो। (आकाश की ओर देख कर) क्या कहा? कि क्या महाराज चन्द्रगुप्त नही जानते कि कौमुदी-महोत्सव अब की न होगा? दुर दइमारो! क्या मरने को लगे हो? शीघ्रता करो। १५

कवित्त।
बहु फूल की माल लपेट कै खंभन धूप सुगंध सों ताहि धुपाइये। तापे चहुं दिस चंद छुपा से सुसोभित चौर घने लटकाइये॥ भार सों चारु सिहासन के मुरछा मे धरा परी धेनु सी पाइये। छींटि के तापैं गुलाब मिल्यौ जल चन्दन ता २० कह जाइ जगाइये॥

(आकाश की ओर देख कर) क्या कहते हो—कि हम लोग अपने काम मे लग रहे हैं? अच्छा २ झटपट सब सिद्ध करो, देखो! वह महाराज चन्द्रगुप्त आ पहुंचे।

७२ मुद्राराक्षस—

बहु दिन श्रम करि नन्द नृप बह्यो राज धुर जौन ॥
बालेपन ही मे लियो, चन्द सोस निज तौन ॥
डिगत न नेकहु विषम पथ, दृढ़ प्रतिज्ञ दृढ़ गात ॥
गिरत चहत सम्हरत बहुरि, नेकु न जिय घबरात ॥

५ (नेपथ्य मे) इधर महाराज इधर ।
(राजा और प्रतिहारी आते हैं)

राजा ।—(आप ही आप) राज उसी का नाम है जिस में अपनी आज्ञा चले, दूसरे के भरोसे राज करना भी एक बोझा ढोना है। क्योंकि—

१० जो दूजे को हित करै, तौ खोवै निज काज ।
जौ खोयो निज काज तौ, कौन बात को राज ॥
दूजे हो को हित करै, तौ वह परबस मूढ़ ।
कठपुतरी सो स्वाद कछु, पावै कबहु न कूंढ़ ॥

और राज्य पाकर भी इस दुष्ट राजलक्ष्मी का सम्हालना
१५ बहुत कठिन है। क्योंकि—
कूर सदा भाखत पियहि, चञ्चल सहज सुभाव ।
नर गुन औगुन नहि लखत, सजन खल सम भाव ॥
डरत सूर सौं भीरु कह, गिनत न कछु रति*हीन ।
बारनारि अरु लच्छमी, कहौ कौन बस कीन ॥

२० यद्यपि गुरु ने कहा है कि तू झूठी कलह कर के स्वतन्त्र हो कर अपना प्रबन्ध आप कर ले, पर यह तो बड़ा पाप सा है। अथवा गुरुजी क उपदेश पर चलने से हम लोग तो सदा ही स्वतन्त्र हैं।

जब लौं बिगारै काज नहि तब लौं न गुरु कछु तेहि कहै ।
२५ पै शिष्य जाइ कुराह तौ गुरु सीस अंकुस ह्नै रहै ॥


* रति का यहां प्रीति अर्थ है।

तृतीय अङ्क । ७३

तृतीय अङ्क । ७३

तासों सदा गुरु वाक्य बस हम नित्य पर आधीन हैं ।
निर्लोभ गुरु से सन्त जनही जगत मे स्वाधीन हैं ॥
(प्रकाश) अजी बैहीनार ! " सुगांगप्रसाद " का मार्ग दिखाओ ।

कंचुकी ।—इधर आइये महाराज उधर । ५
राजा ।—( आगे बढ़ता है ) ।

कंचुकी ।—महाराज ! सुगांगप्रसाद की यहीं सीढ़ी है ।
राजा ।—( ऊपर चढ़ कर ) अहा ! शरद् ऋतु की शोभा से सब दिशाए कैसी सुन्दर हो रही हैं !

सरद विमल ऋतु सोहई, निरमल नील अकास । १०
निसानाथ पूरन उदित, सोलह कला प्रकास ॥
चारु चमेली बन रही, महमह महँकि सुबास ।
नदी तीर फूले लखौ, सेत सेत बहु कास ॥
कमल कुमोदिनि सरन मे, फूले सोभा देत ।
भौँर वृन्द जापै लखौ, गूंजि गूंजि रस लेत ॥ १५
बसन चांदनी चन्द्रमुख, उडुगन मोती माल ।
कास फूल मधु हास यह, सरद् किधौं नव बाल ॥

( चारो ओर देख कर ) कंचुकी ! यह क्या ? नगर मे "चन्द्रिकोत्सव" कही नही मालूम पड़ता; क्या तू ने सब लोगों से ताकीद कर के नही कहा था कि उत्सव होय ? २०

कंचुकी ।—महाराज ! सब से ताकीद कर दी थी ।
राजा ।—तो फिर क्यों नही हुआ ? क्या लोगों ने हमारी आज्ञा नही मानी ?

कंचुकी ।—( कान पर हाथ रख कर ) राम राम ! भला नगर क्या, इस पृथ्वी में ऐसा कौन है जो आप की आज्ञा न मानै ? २५

७४ मुद्राराक्षस—

राजा।—तो फिर चन्द्रिकोत्सव क्यों नही हुआ ? देख न—

गज रथ बाजि सजे नही, बँधी न बन्दनवार ।
तने बितान न कहुँ नगर, रजित कहूं न द्वार ॥
नर नारी डोलत न कहुँ, फूल माल गल डार ।
५ > नृत्य बाद धुनिगीत नहि, सुनियत श्रवन मंझार ॥

कंचुकी।—महाराज ! ठीक है—ऐसा ही है।
राजा।—क्यो ऐसा ही है ?
कंचुकी।—महाराज योंही है ।
राजा।—स्पष्ट क्यों नही कहता ?
१० कंचुकी।—महाराज ! चन्द्रिकोत्सव बन्द किया गया है।
राजा।—( क्रोध से ) किस ने बन्द किया है ?
कंचुकी।—( हाथ जोड़ कर ) महाराज ! यह मै नही कह सकता ।
राजा।—कही आर्य्य चाणक्य ने तो नही बन्द किया ?
१५ कंचुकी।—महाराज ! और किस को अपने प्राणों से शत्रुता करनी थी ?
राजा।—( अत्यन्त क्रोध से ) अच्छा, अब हम बैठेंगे ।
कंचुकी।—महाराज ! यह सिहासन है, विराजिए ।
राजा।—(बैठ कर क्रोध से) अच्छा, कंचुकी ! आर्य्य चाणक्य से कह कि "महाराज आपका देखा चाहते हे।"
२० कंचुकी।—जो आज्ञा ( बाहर जाता हे )।
( एक ओर परदा उठता है और चाणक्य बैठा हुआ दिखाई पड़ता है । )
चाणक्य।—( आप ही आप ) दुष्ट राक्षस हमारी बराबरी करता है, वह जानता है कि—
२५ > जिमि हम नृप अपमान सों, महा क्रोध उर धारि।

करी प्रतिज्ञा नन्द नृप, नासन की निरधारि ॥

तृतीय अङ्क । ७५

तृतीय अङ्क । ७५

सो नृप नन्द हि पुत्र सह नासि करी हम पूर्ण । चन्द्रगुप्त राजा कियो, करि राक्षस मद चूर्ण ॥ तिमि सोऊ मोहि नीति बल, छलन चहत हति चन्द । पे मो आछुत यह जतन, वृथा तासु अति मन्द ॥ (ऊपर देख कर क्रोध से) अरे राक्षस ! छोड़ छोड़ यह ५ व्यर्थ का श्रम, देख— जिमि नृप नन्दहि मारि कै, वृषलहि दीनों राज । आइ नगर चाणक्य किय, दुष्ट सर्प सो काज ॥ तिमि सोऊ नृप चन्द्र सों, चाहत करन बिगार । निज लघु मति लाघ्यौ चहत, मो बल बुद्धि पहार ॥ १० (आकाश की ओर देख कर) अरे राक्षस ! मेरा पीछा छोड़ क्योंकि— राज काज मन्त्री चतुर, करत बिना अभिमान । जैसो तुव नृप नन्द हो, चन्द्र न तौन समान ॥ तुम कछु नहि चाणक्य जो, साध्यौ कठिनहु काज । १५ तासों हम सों बैर करि, नहि सरि है तुव राज ॥ अथवा इस मे तो मुझे कुछ सोचना ही न चाहिये । क्योंकि— मम भागुरायण आदि भृत्यन मलय राख्यो घेरिकै । तिमि गए सिद्धार्थक ऐहैं तेउ काज निबेरिकै ॥ अब लखहु करि छल कलह नृपसों भेद बुद्धि उपाइकै । २० पर्ब्बत जनन सों हम बिगारत राक्षस हि उलटाइकै ॥ कञ्चुकी ।—हा ! सेवा बड़ी कठिन होती है । नृप सों सचिव सों सब मुसाहेब गनन सों डरते रहै । पुनि विटहु जे अति पास के तिनकौ कह्यौ करते रहै ॥ मुख लखत बीतत दिवस निसि भय रहत सकित प्रानहै । २५ निज उदर पूरन हेतु सेवा श्वान वृत्ति समान है ॥

७६ मुद्राराक्षस—

[ चारों ओर घूम कर देख कर ] अहा ! यही आर्य्य चाणक्य का घर है तो चल (कुछ आगे बढ कर और देख कर)। अहाहा ! यह राजाधिराज श्रीमन्ती जी के घर की सम्पत्ति ५ है। जो— कहु परे गोमय शुष्क कहु सिल परी सोभा दै रही। कहु तिल कह जव रासिलागी बटुन जा भिक्षा लही॥ कहु कुस परे कह समिध सूखत भार सों ताके नयो। यह लखौ छप्पर महा जरजर होइ कैसो झुकि गयो॥ १० महाराज चन्द्रगुप्त के भाग्य से ऐसा मन्त्री मिला है— बिन गुनहु के नृपन कों, धन हित गुरुजन धाइ। सुखो मुख करि झूठही, बहु गुन कहहि बनाइ॥ पै जिन को तृष्णा नही, ते न लबार समान। तिन सों तृन सम धनिक जन, पावत कबहू न मान॥ १५ (देख कर डर से) अरे आर्य्य चाणक्य यहा बैठे हैं, जिन्होंने— लोक धरणि चन्द्रहि कियो, राजा, नन्द गिराइ। होत प्रात रवि के कढत, जिमि ससि तेज नसाइ॥ (प्रगट दण्डवत् कर के) जय हो ! आर्य्य की जय हो ! ! २० चाणक्य ।—(देख कर) कौन है वेहोनर ! क्यो आया है ? कंचुकी ।—आर्य्य ! अनेक राजगण क मुकुट माणिक्य से सर्वदा जिन के पदतल लाल रहते है उन महाराज चन्द्रगुप्त ने आप के चरणो मे दण्डवत् कर के निवेदन किया है कि ‘यदि आप क किसी कार्य्य मे विघ्न न पड तो मै २५ आप का दर्शन किया चाहता हूं।” चाणक्य ।—वेहीनर ! क्या वृषल मुझे देखा चाहता है ? क्या मै ने कौमुदी महोत्सव का प्रतिषेध कर दिया है यह वृषल नही जानता ?

तृतीय अङ्क । ७९

तृतीय अङ्क । ७९

कञ्चुकी ।—आर्य्य, क्यों नही ।
चाणक्य ।—( क्रोध से ) है ? किस ने कहा बोल तो ?
कञ्चुकी ।—( भय से ) महाराज प्रसन्न हों, जब सुगांगप्रसाद की अटारी पर गए थे तो देख कर महाराज ने आप ही जान लिया कि कौमुदी-महोत्सव अबकी नही हुआ । ५
चाणक्य ।—अरे ठहर, मैं ने जाना यह तुम्ही लोगों ने वृषल का जी मेरी ओर से फेर कर उसे चिढ़ा दिया है, और क्या ।
कञ्चुकी ।—( भय से नीचा मुंह कर के चुप रह जाता है । )
चाणक्य ।—अरे राज के कारबारियों का चाणक्य के ऊपर बड़ा ही विद्वेष पक्षपात है । अच्छा, वृषल कहा है ? १० बता ।
कञ्चुकी ।—( डरता हुआ ) आर्य्य ! सुगांगप्रसाद की अटारी पर से महाराज ने मुझे आप के चरणो मे भेजा है ।
चाणक्य ।—(उठकर) कञ्चुकी ! सुगांगप्रसाद का मार्ग बता ।
कञ्चुकी ।—इधर महाराज ( दोनों घूमते हैं ) । १५
कञ्चुकी ।—महाराज ! यह सुगांगप्रसाद की सीढ़ियां हैं, चढ़ें ।
( दोनों सुगांगप्रसाद पर चढते हैं और चाणक्य के घर का परदा गिर के छिप जाता है । )
चाणक्य ।—( चढ़ कर और चन्द्रगुप्त को देख कर प्रसन्नता से आप ही आप ) अहा ! वृषल सिंहासन पर बैठा है— २०
हीन नन्द सो रहित नृप, चन्द्र करत जेहि भोग ।
परम होत सन्तोष लखि, आसन राजा जोग ॥
( पास जाकर ) जय हो वृषल की !
चन्द्रगुप्त ।—(उठ कर और पैरों पर गिर कर ) आर्य्य ! चन्द्रगुप्त दण्डवत् करता है । २५
चाणक्य ।— ( हाथ पकड़ कर उठाकर ) उठो बेटा ! उठो ।
'जहँ लो हिमालय के शिखर सुरधनी कन सीतल रहै ।

७८ मुद्राराक्षस-

जहँ लो विविध मणिखण्ड मंडित समुद्र दक्षिणदिसि बहै ॥
तहँ लो सबै नृप आइ भय सों तोहि सीस झुकावहीँ ।
तिनके मुकुट मणि रँगे तुव पद निरखि हम सुख पावही ॥

चन्द्रगुप्त।—आर्य्य ! आप की कृपा से ऐसा ही हो रहा है।

५ बैठिए।

(दोनों यथास्थान बैठते हैं)

चाणक्य।—वृषल ! कहो, मुझे क्यों बुलाया है ?
चन्द्रगुप्त।—आर्य्य के दर्शन से कृतार्थ होने को।
चाणक्य।—[हस कर] भया, बहुत शिष्टाचार हुआ, अब

१० बताओ क्यो बुलाया है ? क्योंकि राजा लोग किसी को बेकाम नहीं बुलाते।
चन्द्रगुप्त।—आर्य्य ! आप ने कौमुदी महोत्सव के न होने से क्या फल सोचा है ?
चाणक्य।—[हस कर] तो यही उलाहना देने को बुलाया

१५ है न ?
चन्द्रगुप्त।—उलाहना देने को कभी नही।
चाणक्य।—तो क्यों ?
चन्द्रगुप्त।—पूछने को।
चाणक्य।—जब पूछना ही है तब तुम को इससे क्या ? शिष्य

२० को सर्व्वदा गुरु की रुचि पर चलना चाहिए।
चन्द्रगुप्त।—इस मे कोई सन्देह नही पर आप की रुचि बिना प्रयोजन नही प्रवृत्त होती, इस से पूछा।
चाणक्य।—ठीक है तुम ने मेरा आशय जान लिया, बिना प्रयोजन के चाणक्य की रुचि किसी ओर कभी फिरती

२५ ही नही।
चन्द्रगुप्त।—इसी से तो सुनने बिना मेरा जी अकुलाता है।
चाणक्य।—सुनो, अर्थशास्त्रकारों ने तीन प्रकार के राज्य लिखे हैं—एक राजा के भरोसे, दूसरा मन्त्री के भरोसे, तीसरा