BharatKosha
Back to the archive

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—१५७ देवता—विश्वेदेव

Page 1831Permalink

हे अग्नि! तुम सदा चलने वाले जरारहित तथा लोगों को प्रकाश देने वाले सूर्य को आकाश में स्थित करो. (४) अग्ने केतुर्विशामसि प्रेष्ठः श्रेष्ठ उपस्थसत्. बोधा स्तोत्रे वयो दधत्.. (५) हे अग्नि! तुम प्रजाओं का ज्ञान कराने वाले, अतिशय प्रिय एवं श्रेष्ठ हो. तुम यज्ञशाला में बैठो, स्तुतियां और अन्न धारण करो. (५) सूक्त—१५७ देवता—विश्वेदेव इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवा:.. (१) हम सारे लोकों को शीघ्र ही वश में करें तथा इंद्र एवं सभी देवों द्वारा सुख प्राप्त करें. (१) यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह चीक्लृपाति.. (२) इंद्र आदित्यों के साथ मिलकर हमारे यज्ञ, शरीर और प्रजा की रक्षा करें. (२) आदित्यैरिन्द्रः सगणो मरुद्भिरस्माकं भूत्वविता तनूनाम्.. (३) हे इंद्र! तुम आदित्यों और मरुतों की सहायता लेकर हमारे शरीरों के रक्षक बनो. (३) हत्वाय देवा असुरान्यदायन्देवा देवत्वमभिरक्षमाणा:.. (४) देवगण शत्रुओं को मारकर जब लौटे, तब उनकी अमरता की रक्षा हुई. (४) प्रत्यञ्चमर्कमनयञ्छचीभिरादित्स्वधामिषिरां पर्यपश्यन्.. (५) स्तोताओं ने सेवाओं के साथ स्तुतियों को इंद्र के समीप भेजा. इसके बाद उन्होंने आकाश से होने वाली वर्षा देखी. (५) सूक्त—१५८ देवता—सूर्य सूर्यो नो दिवस्पातु वातो अन्तरिक्षात्. अग्निर्नः पार्थिवेभ्य:.. (१) सूर्य द्युलोक की बाधाओं से, वायु अंतरिक्ष की बाधाओं से तथा अग्नि पृथ्वी की बाधाओं से हमारी रक्षा करें. (१) जोषा सवितर्यस्य ते हरः शतं सवाँ अर्हति. पाहि नो दिद्युतः पतन्त्या:.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

सविता देव, पर्वत एवं विधाता हमें आंखें प्रदान करें. (३)

Page 1832Permalink

हे सविता! हमारी स्तुतियां स्वीकार करो. तुम्हारा तेज अनेक यज्ञों को पाने की योग्यता रखता है. तुम शत्रुओं के गिरते हुए उज्ज्वल आयुधों से हमारी रक्षा करो. (२) चक्षुर्नो देवः सविता चक्षुर्न उत पर्वतः. चक्षुर्धाता दधातु नः.. (३) सविता देव, पर्वत एवं विधाता हमें आंखें प्रदान करें. (३) चक्षुर्नो धेहि चक्षुषे चक्षुर्विख्यै तनूभ्यः. सं चेदं वि च पश्येम.. (४) हे सूर्य! हमारी आंखों को देखने की शक्ति दो. हम सारी वस्तुओं को देख सकें, इसके लिए हमें आंखें दो. हम सभी चीजों को सामूहिक रूप से देखें. (४) सुसन्दृशं त्वा वयं प्रति पश्येम सूर्य. वि पश्येम नृचक्षसः.. (५) हे सूर्य! हम तुम्हें भली प्रकार देख सकें. तुम सबको भली प्रकार देखने वाले हो. हम मानव की आंखों से सब कुछ विशेष रूप से देखें. (५) सूक्त—१५९ देवता—शची उदसौ सूर्यो अगादुदयं मामको भगः. अहं तद्विद्वला पतिमभ्यसाक्षि विषासहिः.. (१) इस सूर्य का उदय मेरे भाग्य का उदय करेगा, यह मैं जान गई हूं. मैंने सब सौतों को पराजित करके पति को वश में कर लिया है. (१) अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचनी. ममेदनु क्रतुं पतिः सेहानाया उपाचरेत्.. (२) मैं ही केतु हूं, मैं ही मस्तक हूं, मैं ही प्रबल होकर स्वामी के मुख से मीठा वचन बुलवाती हूं. मेरे पति मेरे कार्यों की प्रशंसा करते हैं, मेरी सौतों के कार्यों की नहीं. मैंने सब सौतों को हरा दिया है. (२) मम पुत्राः शत्रुहणोऽथो मे दुहिता विराट्. उताहमस्मि सञ्जया पत्यौ मे श्लोक उत्तमः.. (३) मेरे पुत्र शत्रुहंता हैं एवं मेरी पुत्री विशेष रूप से शोभित होती है. मैं सबको विजय करती हूं और मेरे पति के समीप मेरी ही कीर्ति सर्वश्रेष्ठ है. (३) येनेन्द्रो हविषा कृत्व्यभवद् द्युम्न्युत्तमः. इदं तदक्रि देवा असपत्न किलाभुवम्.. (४) हे देवो! इंद्र जिस यज्ञ के द्वारा शक्तिशाली एवं उत्तम अन्न वाले बने हैं, मैंने वही किया है. इससे मैं शत्रुविहीन हो गई हूं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1833Permalink

असपत्ना सपत्नघ्नी जयन्त्यभिभूवरी. आवृक्षमन्‍यासां वर्चो राधो अस्‍थेयसामिव.. (५) मैं शत्रुरहित एवं शत्रुओं का हनन करने वाली हूं. मैं शत्रुओं पर विजय पाती एवं उन्हें पराजित करती हूं. जिस प्रकार अस्थिर चित्त वालों का धन दूसरे ले जाते हैं, उसी प्रकार मैं दूसरी नारियों का तेज समाप्त कर देती हूं. (५) समजैषमिमा अहं सपत्नीरभिभूवरी. यथाहमस्य वीरस्य विराजानि जनस्य च.. (६) मैं अपनी सब सौतों को जीतती हूं. मैं उन्हें पराजित करने वाली हूं, इसी कारण मैं इन वीर इंद्र एवं परिवार के अन्य लोगों पर अधिकार करती हूं. (६) सूक्त—१६० देवता—इंद्र तीव्रस्याभिवयसो अस्य पाहि सर्वरथा वि हरी इह मुञ्च. इन्द्र मा त्वा यजमानासो अन्य नि रीरमन्तुभ्यमिमे सुतास:.. (१) हे इंद्र! तुम शीघ्र नशा करने वाला व चरु पुरोडाश युक्त सोमरस पिओ. तुम अपने गतिशील घोड़ों को इधर आने के लिए छोड़ो. अन्य यजमान तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पाए. हमने तुम्हारे लिए यह सोमरस निचोड़ा है. (१) तुभ्यं सुतास्तुभ्यमु सोत्वासस्त्वां गिर: श्वात्र्या आ ह्वयन्ति. इन्द्रेदमद्य सवनं जुषाणो विश्वस्य विद्वाँ इह पाहि सोमम्.. (२) हे इंद्र! जो सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है, वह तुम्हारे लिए ही रहेगा. उच्चारण की जाती हुई स्तुतियां तुम्हें बुलाती हैं. तुम हमारा यह यज्ञ स्वीकार करके सोमपान करो. तुम सब जानते हो. (२) य उशता मनसा सोममस्मै सर्वहृदा देवकाम: सुनोति. न गा इन्द्रस्तस्य परा ददाति प्रशस्तमिच्चारुमस्मै कृणोति.. (३) जो व्यक्ति अभिलाषापूर्ण मन से, संपूर्ण हृदय से एवं देवाभिलाषी बनकर इस इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ता है, इंद्र उसकी गाएं नष्ट नहीं करते. वे उसके लिए प्रशंसनीय एवं सुंदर धन देते हैं. (३) अनुस्पष्टो भवत्येषो अस्य यो अस्मै रेवान् सुनोति सोमम्. निररत्नौ मघवा तं दधाति ब्रह्मद्विषो हन्त्यनानुदिष्ट:.. (४) जो धनवान् यजमान इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ता है, इंद्र उसके सामने प्रत्यक्ष होते हैं. धनी इंद्र उसका हाथ पकड़ लेते हैं एवं यज्ञविरोधियों को बिना किसी के कहे हुए नष्ट कर देते

Page 1834Permalink

हैं. (४) अश्वायन्तो गव्यन्तो वाज॒यन्तो हवामहे त्वोपगन्तवा उ. आभूषन्तस्ते सुमतौ नवायां वयमिन्द्र त्वा शुनं हुवेम.. (५) हे इंद्र! हम घोड़े, गायों एवं अन्न की अभिलाषा से तुम्हारे आगमन की प्रार्थना करते हैं. हम तुम्हें सुखदाता जानते हैं, इसलिए यह नवीन स्तोत्र बनाकर तुम्हें बुलाते हैं. (५) सूक्त— १६१ देवता— इंद्र मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्. ग्राहिर्जग्राह यदि वैतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्.. (१) हे रोगी! यज्ञसामग्री द्वारा मैं तुम्हें यक्ष्मा एवं राजयक्ष्मा रोग से छुड़ाता हूं. मैं तुम्हारे जीवन के लिए ऐसा करता हूं. इस रोगी को यदि किसी दुष्ट ग्रह ने पकड़ा हो तो इंद्र एवं अग्नि इसे उससे छुड़ावें. (१) यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव. तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्षमेनं शतशारदाय.. (२) यदि इस रोगी की आयु समाप्त हो चुकी है, यह इस लोक से गया हुआ सा है अथवा यह मृत्यु के समीप पहुंच चुका है, तब भी मैं मृत्यु की देवता निर्ऋति के पास से इसे लौटा सकता हूं. मैंने सौ वर्ष जीने के लिए इसको छुआ है. (२) सहस्राक्षेण शतशारदेन शतायुषा हविषाहार्षमेनम्. शतं यथेमं शरदो नयातीन्द्रो विश्वस्य दुरितस्य पारम्.. (३) मैंने हजार आंखों वाले, सौ वर्ष वाले एवं सौ वर्ष की आयु वाले यज्ञ से इसका रोग नष्ट किया है. इंद्र इस रोगी को सौ वर्ष तक सभी पापों के पार ले जावें. (३) शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्ताञ्छतमु वसन्तान्. शतमिन्द्राग्नी सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषेमं पुनर्दुः... (४) हे रोगविमुक्त व्यक्ति! तुम सुखपूर्वक सौ शरद, सौ वसंत एवं सौ हेमंत ऋतुओं तक वृद्धि पाकर जीवित रहो. इंद्र, अग्नि, सविता और बृहस्पति यज्ञ से प्रसन्न होकर इसके लिए सौ वर्ष की आयु दें. (४) आहार्षं त्वाविदं त्वा पुनरागाः पुनर्नव. सर्वाङ्ग सर्वं ते चक्षुः सर्वमायुश्च तेऽविदम्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1835Permalink

हे रोगी! तुम्हें मैं मृत्यु के मुख से पुनः वापस ले आया हूं. तुम नवीन अंगों वाले हो. तुम मेरे समीप आओ. मैंने तुम्हारे लिए सभी अंगों, नेत्रों और पूर्ण आयु को प्राप्त किया है. (५) सूक्त—१६२ देवता—गर्भ की रक्षा ब्रह्मणाग्निः संविदानो रक्षोहा बाधतामितः. अमीवा यस्ते गर्भं दुर्णामा योनिमाशये.. (१) राक्षसहंता अग्नि मंत्रों के साथ मिलकर यहां से राक्षसों को नष्ट करें. हे नारी! तुम्हारी योनि का आश्रय जो बाधाएं एवं रोग ले रहे हैं एवं तुम्हारे गर्भ को हानि पहुंचाते हैं, वे नष्ट हों. (१) यस्ते गर्भममीवा दुर्णामा योनिमाशये. अग्निष्टं ब्रह्मणा सह निष्क्रव्यादमनीनशत्.. (२) हे नारी! जो रोग अथवा उपद्रव तुम्हारे मार्ग एवं तुम्हारी योनि में आश्रित हैं, राक्षसनाशक अग्नि स्तुतिमंत्रों के साथ उसे समाप्त करें. (२) यस्ते हन्ति पतयन्तं निषत्स्नं यः सरीसृपम्. जातं यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि.. (३) हे नारी! जो राक्षस आदि तुम्हारे पति के वीर्य स्खलन के समय, गर्भ में वीर्य के स्थित होने पर, गर्भ के चलने पर अथवा संतानोत्पत्ति के समय नष्ट करने की अभिलाषा करता है, उसे हम यहां से दूर भगाते हैं. (३) यस्त ऊरू विहरत्यन्तरा दम्पती शये. योनिं यो अन्तरारेळ्ढि तमितो नाशयामसि.. (४) हे नारी! जो राक्षस आदि गर्भनाश के लिए तुम्हारी जंघाओं को फैला देता है, तुम पति- पत्नी के बीच में सो जाता है अथवा जो योनि के भीतर घुस कर गिरे हुए पुरुषवीर्य को चाट लेता है, उसे हम यहां से दूर भगाते हैं. (४) यस्त्वा भ्राता पतिर्भूत्वा जारो भूत्वा निपद्यते. प्रजां यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि.. (५) हे नारी! जो राक्षसादि तुम्हारा भाई, पति अथवा प्रेमी बनकर तुम्हारे समीप जाता है एवं तुम्हारी संतान को नष्ट करना चाहता है, उसे हम यहां से भगाते हैं. (५) यस्त्वा स्वप्नेन तमसा मोहयित्वा निपद्यते. प्रजां यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१६३ देवता—यक्ष्मा का नाश

Page 1836Permalink

हे नारी! जो राक्षसादि स्वप्न या सुषुप्ति की अवस्था में तुम्हें मोहित करके तुम्हारे पास जाता है एवं तुम्हारी संतान को मारना चाहता है, उसे हम यहां से दूर भगाते हैं. (६) सूक्त—१६३ देवता—यक्ष्मा का नाश अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुबुकादधि. यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिह्वाया वि वृहामि ते.. (१) हे रोगी! तुम्हारी दोनों आंखों, नाक, कानों, ठोड़ी, शीश, मस्तिष्क एवं जीभ से मैं यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (१) ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्यात्. यक्ष्मं दोषण्य१मंसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते.. (२) हे रोगी! मैं तुम्हारी गरदन की नसों, नाड़ियों, हड्डियों के जोड़ों, हाथों और कंधों से यक्ष्मा के दूषित रोग को दूर भगाता हूं. (२) आन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोर्हृदयादधि. यक्ष्मं मतस्नाभ्यां यक्नः प्लाशिभ्यो वि वृहामि ते.. (३) हे रोगी! मैं तुम्हारी आंतों, गुदा, बड़ी आंत, हृदय, गुर्दों, जिगर एवं अन्य अंगों से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (३) ऊरुभ्यां ते अष्ठीवद्भ्यां पार्ष्णिभ्यां प्रपदाभ्याम्. यक्ष्मं श्रोणिभ्यां भासदाद्बंघससो वि वृहामि ते.. (४) हे रोगी! मैं तुम्हारी जंघाओं, घुटनों, टखनों, पंजों, नितंबों, कमर एवं गुदा से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (४) मेहनाद्वनंकरणाल्लोमभ्यस्ते नखेभ्यः. यक्ष्मं सर्वस्मादात्मनस्तमिदं वि वृहामि ते.. (५) हे रोगी! मैं तुम्हारी मूत्रेंद्रिय, बालों, नाखूनों आदि शरीर के सभी भागों से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (५) अङ्गादङ्गाल्लोम्नोलोम्नो जातं पर्वणिपर्वणि. यक्ष्मं सर्वस्मादात्मनस्तमिदं वि वृहामि ते.. (६) हे रोगी! मैं तुम्हारे प्रत्येक अंग, प्रत्येक रोम, प्रत्येक जोड़ एवं अंग के किसी भी भाग में स्थित रोग को बाहर निकालता हूं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1837Permalink

सूक्त—१६४ देवता—बुरे सपने का नाश अपेहि मनसस्पतेऽप क्राम परश्चर. परो निर्ऋत्या आ चक्ष्व बहुधा जीवतो मनः.. (१) हे मेरे मन पर अधिकार करने वाले दुःस्वप्न देव! तुम यहां से हटो, भाग जाओ और दूर घूमो. हे दूरस्थित पाप देवता! निर्ऋति से तुम कहो कि जीवित व्यक्ति के मनोरथ अनेक होते हैं. (१) भद्रं वै वरं वृणते भद्रं युञ्जन्ति दक्षिणम्. भद्रं वैवस्वते चक्षुर्बहुत्रा जीवतो मनः.. (२) जीवित व्यक्ति के मनोरथ विस्तृत, उत्तम एवं अभिलाषायोग्य वस्तु को चाहने वाले एवं उत्तम फल के इच्छुक होते हैं. यम अपने कल्याणकारी नेत्र से उसे देखते हैं. (२) यदाशसा निःशसाभिशसोपारिम जाग्रतो यत्स्वपन्तः. अग्निर्विश्वान्यप दुष्कृतान्यजुष्टान्यारे अस्मद्दधातु.. (३) हे अग्नि! हम आशावान् होकर, आशारहित होकर अभिलाषा पूरी करने पर जागते समय एवं सोते समय जो बुरे कर्म करते हैं, उन्हें तुम हमसे दूर ले जाओ. वे क्लेश देने वाले पाप हैं. (३) यदिन्द्र ब्रह्मणस्पतेऽभिद्रोहं चरामसि. प्रचेता न आङ्गिरसो द्विषतां पात्वंहसः.. (४) हे इंद्र एवं ब्रह्मणस्पति! हमने जो पाप किया है, अंगिरा के पुत्र प्रचेता उस शत्रुरूप पाप से हमें बचावें. (४) अजैष्माद्यासनाम चाभूमानागसो वयम्. जाग्रत्स्वप्नः सङ्कल्पः पापो यं द्विष्मस्तं स ऋच्छतु यो नो द्वेष्टि तमृच्छतु.. (५) आज हमने विजयी बनकर प्राप्त करने योग्य वस्तुएं पा ली हैं. हम आज पापरहित हो गए हैं. हमने जागते में, सोते में अथवा संकल्परूप में जो पाप किया है, वह हमारे द्वेषियों अथवा हमसे द्वेष करने वालों के समीप पहुंचे. (५) सूक्त—१६५ देवता—विश्वेदेव देवाः कपोत इषितो यदिच्छन्दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम. तस्मा अर्चाम कृणवाम निष्कृतिं शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१) हे देवो! यह कबूतर निर्ऋति का दूत है एवं बाधा पहुंचाने की इच्छा से हमारे पास आया ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1838Permalink

है. उसकी पूजा करके हम यह अमंगल दूर करते हैं. हमारे दासदासियों एवं गो, अश्व आदि का कल्याण हो. (१) शिवः कपोत इषितो नो अस्त्वनागा देवाः शकुनो गृहेषु. अग्निर्हि विप्रो जुषतां हविर्नः परि हेतिः पक्षिणी नो वृणक्तु.. (२) हे देवो! हमारे घरों में जो कबूतर भेजा गया है, वह हमारे लिए शुभ हो एवं कोई अमंगल न करे. विद्वान् अग्नि हमारा हव्य ग्रहण करें. यह पंखों वाला आयुध हमें छोड़ जावे. (२) हेतिः पक्षिणी न दभात्यस्मानाष्ट्र्यां पदं कृणुते अग्निधाने. शं नो गोभ्यश्च पुरुषेभ्यश्चास्तु मा नो हिंसीदिह देवाः कपोतः.. (३) यह कपोतरूपिणी पंखों वाली तलवार हमें न मारे. यह विस्तृत अग्निस्थापना वाले स्थान पर बैठे. हमारे मानवों और गायों का कल्याण हो तथा यह कपोतदेव हमारी हिंसा न करें. (३) यदुलूको वदति मोघमेतद्यत्कपोतः पदमग्नौ कृणोति. यस्य दूतः प्रहित एष एतत्तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे.. (४) उल्लू जो कहता है, वह व्यर्थ हो. यह कबूतर अग्नि के स्थान में बैठता है. यह जिसका दूत बनकर आया है, उस मृत्यु देव यम को नमस्कार है. (४) ऋचा कपोतं नुदत प्रणोदमिषं मदन्तः परि गां नयध्वम्. संयोपयन्तो दुरितानि विश्वा हित्वा न ऊर्जं प्र पतात्पतिष्ठः.. (५) हे देवो! मंत्रों द्वारा इस भगाने योग्य कबूतर को भगाओ. आनंद के साथ गाय को घास की ओर ले चलो. अत्यंत शीघ्र उड़ने वाला यह कबूतर हमारे सभी पापों को अदृश्य करता हुआ हमारा अन्न छोड़कर उड़ जावे. (५) सूक्त—१६६ देवता—शत्रुनाश ऋषभं मा समानानां सपत्नानां विषासहिम्. हन्तारं शत्रूणां कृधि विराजं गोपतिं गवाम्.. (१) हे इंद्र! मुझे समान व्यक्तियों का प्रमुख, शत्रुओं का पराजयकर्त्ता, विरोधियों का नाशक एवं गायों का स्वामी तथा विशेषरूप से सुशोभित बनाओ. (१) अहमस्मि सपत्नहेन्द्र इवारिष्टो अक्षतः. अधः सपत्ना मे पदोरिमो सर्वे अभिष्ठिताः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1839Permalink

मैं शत्रुओं को नष्ट करने वाला हूं एवं इंद्र के समान अपराजित तथा अहिंसित हूं. ये सभी शत्रु मेरे चरणों में पड़े हुए हैं. (२) अत्रैव वोऽपि नह्याम्युभे आर्त्नी इव ज्यया. वाचस्पते नि षेधेमान्यथा मदधरं वदान्.. (३) हे शत्रुओ! जिस प्रकार धनुष के दोनों सिरे डोरी से बांधे जाते हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हें पाशों से बांधता हूं. हे वाचस्पति! इन्हें मना कर दो कि मेरी बात के बीच में न बोलें. (३) अभिभूरहमागमं विश्वकर्मेण धाम्ना. आ वश्चित्तमा वो व्रतमा वोऽहं समितिं ददे.. (४) मैं इस समस्त कार्य करने वाले अपने तेज से शत्रुओं को पराजित करने आया हूं. हे शत्रुओ! मैं तुम्हारे मन, कार्य एवं संगठन को छीनता हूं. (४) योगक्षेमं व आदायाहं भूयासमुत्तम आ वो मूर्धानमक्रमीम्. अधस्पदान्म उद्गदत मण्डूका इवोदकान्मण्डूका उदकादिव.. (५) हे शत्रुओ! मैं तुम्हारा योगक्षेम छीनकर तुम्हारी अपेक्षा उत्तम हुआ हूं. मैं तुम्हारे सिर पर चढ़ गया हूं. जिस प्रकार मेंढक पानी में बोलते हैं, उसी प्रकार तुम मेरे पैरों के नीचे चीत्कार करो. (५) सूक्त—१६७ देवता—इंद्र तुभ्येदमिन्द्र परि षिच्यते मधु त्वं सुतस्य कलशस्य राजसि. त्वं रयिं पुरुवीरामु नस्कृधि त्वं तपः परितप्याजयः स्वः.. (१) हे इंद्र! यह मधुर सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. इस सोमरस भरे कलश के स्वामी तुम ही हो. तुम हमें अधिक संतान वाला धन दो. तुमने तपस्या करके स्वर्ग को जीता है. (१) स्वर्जितं महि मन्दानमन्धसो हवामहे परि शक्रं सुताँ उप. इमं नो यज्ञमिह बोध्या गहि स्पृधो जयन्तं मघवानमीमहे.. (२) हम स्वर्ग को जीतने वाले व सोमपान से प्रसन्न इंद्र को निचोड़े हुए सोमरस के समीप बुलाते हैं. हे इंद्र! हमारे इस यज्ञ को जानो तथा यहां आओ. हम शत्रुविजयी इंद्र की शरण में आए हैं. (२) सोमस्य राज्ञो वरुणस्य धर्मणि बृहस्पतेरनुमत्या उ शर्मणि. तवाहमद्य मघवन्नुपस्तुतौ धातर्विधातः कलशाँ अभक्षयम्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1840Permalink

हे धनी इंद्र! राजा सोम एवं वरुण के धर्म तथा बृहस्पति संबंधी यज्ञशाला में वर्तमान मैं तुम्हारी स्तुति में संलग्न हूं. हे धाता और विधाता! मैंने तुम्हारी आज्ञा से कलश में रखा सोम पिया है. (३) प्रसूतो भक्षमकरं चरावपि स्तोमं चेमं प्रथमः सूरिरुन्मृजे. सुते सातेन यद्यागमं वां प्रति विश्वामित्रजमदग्नी दमे.. (४) हे इंद्र! मैंने तुमसे प्रेरित होकर यज्ञ में पुरोडाश तैयार किया है. मैं सर्वप्रथम स्तोता के रूप में यह स्तोत्र बोलता हूं. (इंद्र का उत्तर) हे विश्वामित्र एवं जमदग्नि! सोमरस तैयार होने पर मैं जिस समय तुम्हारे पास आऊं, उस समय तुम अपने घर में मेरी स्तुति करना. (४) सूक्त—१६८ देवता—वायु वातस्य नु महिमानं रथस्य रुजन्नेति स्तनयन्नस्य घोषः. दिविस्पृग्यात्यरुणानि कृण्वन्नुतो एति पृथिव्या रेणुमस्यन्.. (१) मैं रथ के समान वेग से दौड़ने वाले वायु की महिमा का वर्णन करता हूं. वायु का शब्द सभी स्थानों में गुंजित होता हुआ एवं वृक्षादि को कंपाता हुआ चलता है. वायु आकाशमार्ग का स्पर्श करके सभी स्थलों को लाल करते हुए एवं धरती की धूल उड़ाते हुए चलते हैं. (१) सं प्रेरते अनु वातस्य विष्ठा ऐनं गच्छन्ति समनं न योषाः. ताभिः सयुक्सरथं देव ईयतेऽस्य विश्वस्य भुवनस्य राजा.. (२) वायु के चलने से पर्वत भी कांपते हैं. जिस प्रकार घोड़ी युद्ध की ओर जाती है, उसी प्रकार पर्वतादि वायु की ओर आते हैं. वायु घोड़ियों से युक्त रथ पर चढ़कर एवं इस सकल भुवन के स्वामी बनकर चलते हैं. (२) अन्तरिक्षे पथिभिरीयमानो न नि विशते कतमच्चनाहः. अपां सखा प्रथमजा ऋतावा क्व स्विज्जातः कुत आ बभूव.. (३) वायु आकाशस्थित मार्गों से चलते हुए किसी भी दिन शांति से नहीं बैठते. जलों के मित्र, सबसे प्रथम उत्पन्न एवं शक्तियुक्त वायु कहां जन्मे हैं और कहां से आए हैं? (३) आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः. घोषा इदस्य शृण्विरे न रूपं तस्मै वाताय हविषा विधेम.. (४) देवों की आत्मा एवं भुवन के गर्भरूप वायु इच्छा के अनुसार विचरण करते हैं. जिस वायु का शब्द ही सुना जाता है, रूप नहीं देखा जाता, उसकी पूजा मैं हव्य द्वारा करता हूं. (४)

सूक्त—१६९ देवता—गौ

Page 1841Permalink

सूक्त—१६९ देवता—गौ मयोभूर्वातो अभि वातूस्त्रा ऊर्जस्वतीरोषधीरा रिशन्ताम्. पीवस्वतीर्जीवधन्याः पिबन्त्ववसाय पद्धते रुद्र मृळ.. (१) आनन्ददायिनी वायु गायों की ओर चलें. गाएं शक्ति देने वाली घास खावें एवं अधिक मात्रा में जल पिएं. हे इंद्र! चरणों वाली तथा अन्नरूपिणी गायों की रक्षा करो. (१) याः सरूपा विरूपा एकरूपा यासामग्निरिष्ट्या नामानि वेद. या अङ्गिरसस्तपसेह चक्रुस्ताभ्यः पर्जन्य महि शर्म यच्छ.. (२) जो गाएं समान रूप वाली, विभिन्न रूप वाली तथा एक रूप वाली हैं, उन गायों के नाम अग्नि यज्ञ के कारण जानते हैं. अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने तपस्या के द्वारा धरती पर गायों का निर्माण किया है. हे पर्जन्य! उन गायों को सुख प्रदान करो. (२) या देवेषु तन्व१मैरयन्त यासां सोमो विश्वा रूपाणि वेद. ता अस्मभ्यं पयसा पिन्वमानाः प्रजावतीरिन्द्र गोष्ठे रिरीहि.. (३) हे इंद्र! जो गाएं देवसंबंधी यज्ञों के निमित्त अपना शरीर देती हैं एवं सोम जिनके दूध, दही, घृत आदि रूपों को जानते हैं, उन्हें दूध से भरकर तथा संतान युक्त बनाकर हमारे यज्ञ में भेजो. (३) प्रजापतिर्मह्यमेता रराणो विश्वैर्देवैः पितृभिः संविदानः. शिवाः सतीरुप नो गोष्ठमाकस्तासां वयं प्रजया सं सदेम.. (४) प्रजापति ने समस्त देवों एवं पितरों से सलाह करके मुझे ये गाएं प्रदान की हैं. वे इन गायों को कल्याणरूपिणी बनाकर हमारी गोशाला में रखते हैं, जिससे हम गायों के बच्चे पा सकें. (४) सूक्त—१७० देवता—सूर्य विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्. वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा वि राजति.. (१) विशेष दीप्ति वाले सूर्य यजमान को अकुटिल आयु देते हुए मधुर सोमरस अधिक मात्रा में पिएं. सूर्य वायु द्वारा प्रेरित होकर प्रजा की रक्षा करते हैं एवं उसका पोषण करते हुए विशेष रूप से सुशोभित होते हैं. (१) विभ्राड् बृहत्सुभृतं वाजसातमं धर्मन्दिवो धरुणे सत्यमर्पितम्. ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1842Permalink

अमित्रहा वृत्रहा दस्युहंतमं ज्योतिर्जज्ञे असुरहा सपत्नहा.. (२) दीप्तिशाली, विस्तृत, भली-भांति पुष्ट, अन्न का अतिशय दाता, वायु द्वारा धारित, सूर्यमंडल में स्थित, विनाशनरहित, शत्रुघातक, वृत्रहननकर्त्ता, राक्षसों को मारने वालों में श्रेष्ठ, आयुध फेंकने वालों का घातक एवं सहज विरोधियों को समाप्त करने वाला सूर्यरूप तेज प्रकट होता है. (२) इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमं विश्वजिद्धनजिदुच्यते बृहत्. विश्वभ्राड् भ्राजो महि सूर्यो दृश उरु पप्रथे सह ओजो अच्युतम्.. (३) सूर्य ज्योतियों में उत्तम ज्योति, श्रेष्ठ, विश्व को जीतने वाले, धन विजय करने वाले एवं विशाल कहलाते हैं. विश्वप्रकाशक, दीप्तिशाली एवं महान् सूर्य देखने के लिए विस्तृत अंधकारनाशक एवं अविनाशी तेज का विस्तार करते हैं. (३) विभ्राजञ्ज्योतिषा स्वर्अगच्छो रोचनं दिवः. येनेमा विश्वा भुवनान्याभृता विश्वकर्मणा विश्वदेव्यावता.. (४) हे सूर्य! तुम अपने तेज से सारे जगत् को प्रकाशित करते हुए दिव्य स्थान में गए थे. सभी कार्यों के हेतु व सभी यज्ञों के अनुकूल सूर्य प्रकाश के द्वारा सारे लोक को भर जाते हैं. (४) सूक्त—१७१ देवता—इंद्र त्वं त्यमिततो रथमिन्द्र प्रावः सुतावतः. अशृणोः सोमिनो हवम्.. (१) हे इंद्र! तुमने सोमरस निचोड़ने वाले त्यट् ऋषि के रथ की रक्षा की एवं सोमधारणकर्त्ता त्यट् की पुकार सुनी. (१) त्वं मखस्य दोधतः शिरोऽव त्वचो भरः. अगच्छः सोमिनो गृहम्.. (२) तुमने भय से कांपते हुए यज्ञ का सिर शरीर से अलग कर दिया. तुम सोमरसधारी त्यट् के घर गए. (२) त्वं त्यमिन्द्र मर्त्यमास्त्रबुध्नाय वेन्यम्. मुहुः श्रथ्ना मनस्यवे.. (३) हे इंद्र! तुमने अस्त्रबुध्न की स्तुति बार-बार सुनकर वेनपुत्र पृथु को उसके वश में कर दिया था. (३) त्वं त्यमिन्द्र सूर्यं पश्चा सन्तं पुरस्कृधि. देवानां चित्तिरो वशम्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१७२ देवता—उषा

Page 1843Permalink

हे इंद्र! तुम सायंकाल के समय पश्चिम में डूबे हुए एवं देवों द्वारा भी अज्ञात सूर्य को अगले दिन पूर्व में ले जाते हो. (४) सूक्त—१७२ देवता—उषा आ याहि वनसा सह गावः सचन्त वर्तनिं यदूधभिः.. (१) हे उषा! तुम शोभन तेज के साथ आओ. भरे हुए थनों वाली गाएं मार्ग पर चल रही हैं. (१) आ याहि वस्व्या धिया मंहिष्ठो जारयन्मखः सुदानुभिः.. (२) हे उषा! तुम प्रशंसनीय स्तुतियां लेकर आओ. यह काल शोभन दान वाले पुरुषों द्वारा दानयुक्त एवं यज्ञसमाप्ति का होता है. (२) पितृभृतो न तन्तुमित्सुदानवः प्रति दध्मो यजामसि.. (३) अन्न के स्वामियों के समान शोभन दान वाले हम धागों के समान इस यज्ञ का विस्तार करते हैं एवं उस यज्ञ से उषा की पूजा करते हैं. (३) उषा अप स्वसुस्तमः सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता.. (४) उषा अपनी बहिन रात का अंधकार मिटाती है एवं अपना रथ भली प्रकार चलाती है. (४) सूक्त—१७३ देवता—राजा की स्तुति आ त्वाहार्षमन्तरेधि ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलिः. विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्.. (१) हे राजन्! मैंने तुम्हें अपने राष्ट्र का स्वामी बनाया है. तुम हमारे बीच अधिकारी बनो एवं दृढ़ तथा अविचल होकर रहो. सभी प्रजाएं तुम्हें चाहें. तुम्हारे पास से राज्य का अधिकार भ्रष्ट न हो. (१) इहैवैधि माप च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलिः. इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय.. (२) हे राजन्! तुम पर्वत के समान अविचल होकर बढ़ो एवं राज्य से च्युत न बनो. तुम इंद्र के समान ध्रुव होकर यहां ठहरो एवं राष्ट्र को धारण करो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे.

Page 1844Permalink

इममिन्द्रो अदीधरद् ध्रुवं ध्रुवेण हविषा. तस्मै सोमो अधि ब्रवत्तस्मा उ ब्रह्मणस्पतिः.. (३) इंद्र ने ध्रुव हवि पाकर इस राजा को स्थिर बनाया है. सोम एवं ब्रह्मणस्पति ने उसे आशीर्वाद दिया है. (३) ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे. ध्रुवं विश्वमिदं जगद् ध्रुवो राजा विशामयम्.. (४) जिस प्रकार द्युलोक, धरती, ये पर्वत एवं सारा विश्व ध्रुव है, उसी प्रकार प्रजाओं के बीच यह राजा भी अविचल रहे. (४) ध्रुवं ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः. ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम्.. (५) हे राजन्! राजा वरुण, देव बृहस्पति, इंद्र एवं अग्नि तुम्हारे राज्य ध्रुव रूप में धारण करें. (५) ध्रुवं ध्रुवेण हविषाभि सोमं मृशामसि. अथो त इन्द्रः केवलीर्विशो बलिहृतस्करत्.. (६) हे राजन्! हम अविनाशी पुरोडाश के साथ स्थिर सोमरस को मिलाते हैं इसलिए इंद्र ने तुम्हारी प्रजाओं को भक्त एवं कर देने वाली बनाया है. (६) सूक्त—१७४ देवता—राजस्तुति अभीवर्तेन हविषा येनेन्द्रो अभिवावृते. तेनास्मान्ब्रह्मणस्पतेऽभि राष्ट्राय वर्तय.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! जिस हवि से इंद्र ने सब कुछ प्राप्त किया है, हम उसी हवि से यज्ञ करते हैं. तुम हमें राज्यप्राप्ति में लगाओ. (१) अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरातयः. अभि पृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो न इरस्यति.. (२) हे राजन्! शत्रुओं, सेना लेकर चढ़ाई करने वालों, दानरहित लोगों एवं हमसे द्वेष करने वालों को पराजित करो. (२) अभि त्वा देवः सविताभि सोमो अवीवृतत्. अभि त्वा विश्वा भूतान्यभीवर्तो यथाससि.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1845Permalink

हे राजन्! सविता देव, सोम एवं सभी प्राणी तुम्हारे अनुकूल हो गए हैं. इस प्रकार तुम सबका आश्रय पा गए हो. (३) येनेन्द्रो हविषा कृत्व्यभवद् द्युम्न्युत्तमः. इदं तदक्रि देवा असपत्नः किलाभुवम्.. (४) हे देवो! जिस हवि द्वारा इंद्र यज्ञकर्म वाले यशस्वी एवं उत्तम बने हैं, उसी हव्य द्वारा मैंने यज्ञ किया है. मैं इसीसे शत्रुरहित बना हूं. (४) असपत्नः सपत्नहाभिराष्ट्रो विषासहिः. यथाहमेषां भूतानां विराजानि जनस्य च.. (५) शत्रुरहित, शत्रुनाशक एवं शत्रुपराभवकारी मैं इन प्रजाओं एवं मंत्री आदि सेवकों का स्वामी बना हूं. (५) सूक्त—१७५ देवता—सोमरस निचोड़ने के पत्थर प्र वो ग्रावाणः सविता देवः सुवतु धर्मणा. धूर्षु युज्यध्वं सुनुत.. (१) हे पथरो! सविता देव अपने प्रेरणात्मक कर्म से तुम्हें सोमरस निचोड़ने में लगावें. तुम सभी स्थानों में नियुक्त होकर सोमरस निचोड़ो. (१) ग्रावाणो अप दुच्छुनामप सेधत दुर्मतिम्. उस्राः कर्तन भेषजम्.. (२) हे पथरो! दुःख पहुंचाने वाली प्रजा एवं दुर्बुद्धि को हमसे दूर करो. तुम गायों को हमारे लिए ओषधि तुल्य बनाओ. (२) ग्रावाण उपरेष्वा महीयन्ते सजोषसः. वृष्णे दधतो वृष्ण्यम्.. (३) छोटे पत्थर आपस में मिलकर बड़े पत्थर पर शोभा पा रहे हैं. ये पत्थर रस बरसाने वाले सोम के प्रति अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं. (३) ग्रावाणः सविता नु वो देवः सुवतु धर्मणा. यजमानाय सुन्वते.. (४) हे पथरो! सविता देव सोमयज्ञ करने वाले यजमान के लिए सोमरस निचोड़ने के काम में तुम्हें लगावें. (४) सूक्त—१७६ देवता—ऋभु एवं अग्नि प्र सूनव ऋभूणां बृहन्नवन्त वृजना. क्षामा ये विश्वधायसोऽश्रन्धेनुं न मातरम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1846Permalink

ऋभुओं के पुत्र विशाल युद्ध करने के लिए निकले. बछड़ा जिस प्रकार दुधारू गाय के दूध को पीता है, उसी प्रकार ऋभुगण सारी धरती पर फैल गए. (१) प्र देवं देव्या धिया भरता जातवेदसम्. हव्या नो वक्षदानुषक् .. (२) हे ऋत्विजो! ज्ञानी अग्नि देव को दिव्य स्तोत्र से प्रसन्न करो. अग्नि विधि के अनुसार हमारा हव्य वहन करें. (२) अयमु ष्य प्र देवयुर्होता यज्ञाय नीयते. रथा न योरभीवृतो घृणीवाञ्चेतति त्मना.. (३) ये वही अग्नि हैं, जो देवों के यजन की अभिलाषा रखते हैं एवं होता हैं. यज्ञ के लिए इन्हें स्थापित किया जाता है. अग्नि रथ के समान हव्यवहनकर्त्ता, ऋत्विज्, यजमान आदि से घिरे हुए, किरणों से युक्त एवं स्वयं ही यज्ञ पूरा करने वाले हैं. (३) अयमग्निरुरुष्यत्यमृतादिव जन्मनः सहसश्चित्सहीयान्देवो जीवातवे कृतः.. (४) ये अग्नि देवों के समान मानवों के भय से भी रक्षा करते हैं. यह अतिशय शक्तिशाली एवं आयुवृद्धि के लिए उत्पन्न हुए हैं. (४) सूक्त—१७७ देवता—माया पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति विपश्चितः. समुद्रे अन्तः कवयो वि चक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः.. (१) विद्वानों ने विचार करके मन की आंखों से जीवात्मारूपी पक्षी को देखा. उसे असुरों की माया घेर चुकी थी. उन विद्वानों ने सूर्यमंडल के मध्य में देखा. उन विधाताओं ने सूर्यकिरणों के स्थान में जाने की अभिलाषा की. (१) पतङ्गो वाचं मनसा बिभर्ति तां गन्धर्वोऽवदद् गर्भे अन्तः. तां द्योतमानां स्वर्यं मनीषामृतस्य पदे कवयो नि पान्ति.. (२) वह आत्मारूपी पक्षी मन ही मन वचन को धारण करता है. गंधर्व ने यह बात उसे गर्भ में ही बताई है. विद्वान् लोग सत्य के मार्ग में उस दीप्तिशालिनी, स्वर्ग देने वाली एवं वृद्धि की स्वामिनी वाणी की रक्षा करते हैं. (२) अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्. स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (३) मैंने रक्षक सूर्य को कभी पतित होते नहीं देखा, वे कभी समीपवर्ती और कभी दूरवर्ती मार्ग से चलते हैं. वे कभी बहुत से वस्त्र एक साथ और कभी अलग-अलग पहनते हैं. वे ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१७८ देवता—गरुड़

Page 1847Permalink

संसार में बार-बार आते हैं. (३) सूक्त—१७८ देवता—गरुड़ त्यमू षु वाजिनं देवजूतं सहावानं तरुतारं रथानाम्. अरिष्टनेमिं पृतनाजमाशुं स्वस्तये तार्क्ष्यमिहा हुवेम.. (१) हम शक्तिशाली, देवों द्वारा सोम लाने के लिए प्रेरित बलयुक्त, संग्राम में शत्रुओं के रथों के विजेता, आक्रमणरहित रथ वाले एवं सेनाओं को युद्ध के लिए प्रेरित करने वाले गरुड़ को बुलाते हैं. (१) इन्द्रस्येव रातिमाजोहुवानाः स्वस्तये नावमिवा रुहेम. उर्वी न पृथ्वी बहुले गभीरे मा वामेतौ मा परेतौ रिषाम.. (२) इंद्र की दानशक्ति के समान गरुड़ की दानशक्ति को आह्वान करने वाले हम इस पर कल्याण के लिए नाव के समान चढ़ते हैं. हे विस्तृत, विशाल, व्यापक एवं गंभीर द्यावा- पृथिवी! हम आतेजाते समय में नष्ट न हों. (२) सद्यश्चिद्यः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान. सहस्रसाः शतसा अस्य रंहिर्न स्मा वरन्ते युवतिं न शर्याम्.. (३) जिस प्रकार सूर्य अपने तेज से जल का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार गरुड़ ने अपने बल से पांच वर्णों का शीघ्र विस्तार किया. गरुड़ की गति हजारों एवं सैकड़ों प्रकार का धन देने वाली है. जिस प्रकार लक्ष्य की ओर जाने वाले बाण को कोई नहीं रोक पाता है, उसी प्रकार गरुड़ की गति में बाधा नहीं पड़ती. (३) सूक्त—१७९ देवता—इंद्र उत्तिष्ठताव पश्यतेन्द्रस्य भागमृत्वियम्. यदि श्रातो जुहोतन यद्यश्रातो ममत्तन.. (१) हे ऋत्विजो! उठो एवं इंद्र के ऋतु अनुकूल भाग के लिए प्रयत्न करो. इंद्र का भाग यदि पक चुका है तो उसका होम करो और यदि वह नहीं पका है तो उसे पकाओ. (१) श्रातं हविरो ष्विन्द्र प्र याहि जगाम सूरो अध्वनो विमध्यम्. परि त्वास्ते निधिभिः सखायः कुलपा न व्राजपतिं चरन्तम्.. (२) हे इंद्र! हव्य का पाक हो चुका है. तुम हमारे पास आओ. सूर्य अपने मार्ग के मध्य में पहुंच चुके हैं. वंश के रक्षक पुत्र जिस प्रकार इधर-उधर घूमते हुए गृहपति की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार अनेक सखा यज्ञ की सामग्री लेकर तुम्हारी उपासना करते हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१८० देवता—इंद्र

Page 1848Permalink

श्रातं मन्य ऊधनि श्रातमग्नौ सुश्रातं मन्ये तदृतं नवीयः. माध्यन्दिनस्य सवनस्य दध्नः पिबेन्द्र वज्रिन्पुरुकृज्जुषाणः.. (३) गाय के थन में यह दुग्धरूप हवि सबसे पहले पकता है, हम लोग ऐसा मानते हैं. अग्नि में पककर वह अति पवित्र एवं नवीन बनता है, यह हमारा विचार है. हे वज्रधारी एवं अधिक धनदान करने वाले इंद्र! माध्यंदिन सवन नामक यज्ञ के उस दूध को तुम पिओ. (३) सूक्त—१८० देवता—इंद्र प्र ससाहिषे पुरुहूत शत्रूञ्ज्येष्ठस्ते शुष्म इह रातिरस्तु. इन्द्रा भर दक्षिणेना वसूनि पतिः सिन्धूनामसि रेवतीनाम्.. (१) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम शत्रुओं को हराते हो. तुम्हारा तेज श्रेष्ठ है. इस यज्ञ में तुम्हारा दान हमें मिले. तुम दाहिने हाथ से हमें धन दो. तुम जल वाली सरिताओं के पति हो. (१) मृगो न भीमः कुचरो गविष्ठाः परावत आ जगन्था परस्याः. सृकं संशाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून्ताळ्हि वि मृधो नुदस्व.. (२) हे इंद्र! तुम भयानक पैरों एवं पर्वतवासी पशु के समान भयानक हो. तुम दूरवर्ती स्वर्गलोक से आए हो. तुम गतिशील एवं तीखे वज्र पर सान चढ़ाकर शत्रुओं को मारो और विरोधियों को दूर भगाओ. (२) इन्द्र क्षत्रमभि वाममोजोऽजायथा वृषभ चर्षणीनाम्. अपानुदो जनममित्रयन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम्.. (३) हे इंद्र! तुम कष्ट से रक्षा करने वाले एवं सुंदर तेज को लेकर उत्पन्न हुए हो. हे कामपूरक इंद्र! तुम हमारे प्रति शत्रुता रखने वाले लोगों का नाश करो एवं देवों के लिए संसार को विस्तृत बनाओ. (३) सूक्त—१८१ देवता—विश्वेदेव प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत्. धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः.. (१) वसिष्ठ के पुत्र पृथु हैं और भरद्वाज के सुप्रथ हैं. इन में से वसिष्ठ धाता, दीप्तिशाली सविता और विष्णु के समीप से अनुष्टुप् छंद वाला एवं हवि को शुद्ध करने वाला साममंत्र लाए थे. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1849Permalink

अविन्दन्ते अतिहितं यदासीद्यज्ञस्य धाम परमं गुहा यत्. धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णोर्भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः.. (२) धाता आदि ने छिपा हुआ, हव्य का संस्कार करने वाला व गुफा में सुरक्षित साममंत्र पाया. भरद्वाज ऋषि धाता, दीप्तिशाली सविता, विष्णु और अग्नि के पास से उस बृहत् साममंत्र को लाए. (२) तेऽविन्दन्मनसा दीध्याना यजुः ष्फन्नं प्रथमं देवयानम्. धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णोरा सूर्याद्भरन्घर्ममेते.. (३) धाता आदि ने ध्यान करते हुए मन में यज्ञसाधक, अभिषेकक्रिया संपन्न करने वाले, मुख्य एवं देवों को प्राप्त करने के साधन उस धर्ममंत्र को पाया. पुरोहितों ने धाता, तेजस्वी सविता, विष्णु और सूर्य से इस मंत्र को प्राप्त किया. (३) सूक्त—१८२ देवता—बृहस्पति बृहस्पतिर्नयतु दुर्गहा तिरः पुनर्नेषदघशंसाय मन्म. क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः.. (१) दुर्दशा को नष्ट करने वाले बृहस्पति हमारे पापों को नष्ट करें व हमारा अनर्थ चाहने वाले व्यक्ति के ऊपर आयुध उठावें. वे शत्रु का नाश करें, दुर्बुद्धि का नाश करें एवं यजमान को रोग से बचाकर निर्भय करें. (१) नराशंसो नोऽवतु प्रयाजे शं नो अस्त्वनुयाजो हवेषु. क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः.. (२) पांच प्रयाजों में नराशंस अग्नि हमारी रक्षा करें. आह्वानाें में अनुयाज हमारी रक्षा करें. वे शत्रु का नाश करें, दुर्बुद्धि को मिटावें एवं यजमान को रोग से बचाकर निर्भय करें. (२) तपुर्मूर्धा तपतु रक्षसो ये ब्रह्मद्विषः शरवे हन्तवा उ. क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः.. (३) जो स्तोत्रों से द्वेष करने वाले राक्षस हैं, उन्हें हिंसक असुरों के नाश हेतु तप्त शिर वाले बृहस्पति कष्ट दें. वे अमंगल का नाश करें, दुर्बुद्धि को मिटावें एवं यजमान को रोगमुक्त करके निर्भय बनावें. (३) सूक्त—१८३ देवता—यजमान और उसकी पत्नी ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1850Permalink

अपश्यं त्वा मनसा चेकितानं तपसो जातं तपसो विभूतम्. इह प्रजामिह रयिं रराणः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकाम.. (१) हे कर्मों के ज्ञानी, तप से उत्पन्न एवं तपस्या से उन्नत यजमान! मैंने अपने मन की आंखों से तुम्हें देखा है. तुम यहां संतान एवं धन पाकर प्रसन्न बनो एवं पुत्र की कामना से संतान के रूप में जन्म लो. (१) अपश्यं त्वा मनसा दीध्यानां स्वायां तनू ऋत्व्ये नाधमानाम्. उप मामुच्चा युवतिर्बभूयाः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकामे.. (२) हे पत्नी! मैंने मन की आंखों से तुम्हें दीप्तिशालिनी व ऋतु के अनुसार अपने शरीर में गर्भाधान की कामना करती हुई देखा है. हे पुत्र की कामना करने वाली! मेरे समीप तुम उत्तम तरुणी बनो एवं पुत्र उत्पन्न करो. (२) अहं गर्भमदधामोषधीष्वहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः. अहं प्रजा अजनयं पृथिव्यामहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान्.. (३) मैं होता हूं, ओषधियों में गर्भ धारण करता हूं एवं सभी प्राणियों में गर्भ धारण का कारण बनता हूं. मैंने धरती पर प्रजा को जन्म दिया है. मैं यज्ञ करके सब नारियों में पुत्र उत्पन्न कर सकता हूं. (३) सूक्त—१८४ देवता—विष्णु आदि विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु. आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते.. (१) विष्णु नारी की योनि को गर्भाधान के योग्य बनावें. त्वष्टा उस में स्त्री एवं पुरुष के चिह्नों का भाग सम्मिलित करें. प्रजापति योनि को वीर्य से सींचें एवं धाता तेरा गर्भ धारण करें. (१) गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति. गर्भं ते अश्विनौ देवावा धत्तां पुष्करस्रजा.. (२) हे सिनीवाली! तुम गर्भ धारण कराओ. हे सरस्वती! तुम गर्भ की रक्षा करो. हे स्त्री! सुनहरे कमलों की माला पहनने वाले अश्विनीकुमार देव तुम्हारे शरीर में गर्भ धारण करें. (२) हिरण्ययी अरणी यं निर्मन्थतो अश्विना. तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतवे.. (३) हे पत्नी! अश्विनीकुमार जिस स्वनिर्मित अरणि का मंथन करते हैं, हम दशम मास में तुम्हारे गर्भ के जन्म के लिए उसी अरणि को बुलाते हैं. (३)