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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

by शार्ङ्गधराचार्य

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished356 pages

226 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे

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226 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे नवीन ज्वर से पीड़ित, नवप्रसूता स्त्री, जिसकी अग्नि मन्द हो, जिसने अधिक मद्यपान किया हो, जिसके शरीर में शल्य चुभ गया हो तथा जिसका कोष्ठ रूक्ष हो। वक्तव्य-इन्हें भी पित्त के बढ़ने पर थोड़ा-थोड़ा विरेचन दिया जा सकता है। विरेचन-योग्य रोगी जीर्णज्वरी गरव्याप्तो वातरक्ती भगन्दरी ।। 8 ।। अर्शःपाण्डूदरग्रन्थिहृद्रोगारुचिपीडिताः । योनिरोगप्रमेहार्ता गुल्मप्लीहव्रणार्दिताः ।। 9 ।। विद्रधिच्छर्दिविस्फोटविसूचीकुष्ठसंयुताः । कर्णनासाशिरोवक्त्रगुदमेढ्रामयान्विताः ।। 10 ।। यकृत्शोथाक्षिरोगार्ताः कृमिक्षीणाानिलार्दिताः । शूलिनो मूत्राघातार्ता विरेकार्हा नरा मताः ।। 11 ।। जिसको जीर्ण ज्वर हो, जिसको गर नामक विष के विकार हों, वातरक्त, भगन्दर, बवासीर, पाण्डुरोग, उदररोग, ग्रन्थिरोग (गण्डमाला आदि), हृद्रोग, अरुचि से पीड़ित, योनिरोग, प्रमेह से पीड़ित, वायुगोला, प्लीहा रोग, व्रण से पीड़ित, विद्रधि (व्रणविशेष), छर्दि (कै), विस्फोट (बड़ी माता), विसूची (इसमें दस्त तो होते ही हैं, अतः जब तक दोष निकल रहे हों, उन्हें रोकना नहीं चाहिये। अलसक और विलम्बिका में विरेचन अत्यावश्यक होता है। कुष्ठ से युक्त, और कान, नाक, सिर, मुख, गुद तथा लिङ्ग के रोगों से पीड़ित, यकृत्-विकार, शोथ, नेत्ररोगों से पीड़ित, क्रिमि, क्षार, वात रोगों से पीड़ित, शूल तथा मूत्राघात से पीड़ित ये मनुष्य विरेचन के योग्य माने जाते हैं। विरेचन के लिए कोष्ठ-भेद बहुपित्तो मृदुः कोष्ठो बहुश्लेष्मा च मध्यमः। बहुवातः क्रूरकोष्ठो दुर्विरेच्यः स कथ्यते ।। 12 ।। 'अधिक पित्तयुक्त कोष्ठ 'मृदु', अधिक कफ से युक्त कोष्ठ 'मध्यम' और अधिक वायु से युक्त कोष्ठ 'क्रूर' होता है और यह (क्रूर) दुर्विरेच्य (जिसका सुख से विरेचन नहीं होता) कहा जाता है। वक्तव्य-कोष्ठ की मृदुता आदि का विचार करके तदनुरूप विरेचन-औषधियों का प्रयोग करना उचित होता है। कोष्ठ-भेद से मात्रा-विचार मृद्वी मात्रा मृदौ कोष्ठे मध्यकोष्ठे च मध्यमा । क्रूरे तीक्ष्णा मता द्रव्याणामुच्यतेऽथ भिषग्वरैः ।। 13 ।। मृदु कोष्ठ में मृदु विरेचन कराने वाले द्रव्यों का मृदु मात्रा, मध्यम कोष्ठ में मध्यम विरेचन कराने वाले द्रव्यों की मध्यम मात्रा तथा क्रूर कोष्ठ में तीक्ष्ण विरेचन कराने वाले द्रव्यों की तीक्ष्ण मात्रा का प्रयोग करना चाहिये। कोष्ठ-भेद से द्रव्यों का विचार मृदुर्दाक्षापयश्चाम्बुतैलैरपि विरिच्यते। मध्यमस्त्रिवृतातिक्ताराजवक्षैर्वरिच्यते ।। 14 ।। क्रूरः स्नुक्पयसा हेमक्षीरीदन्तीफलादिभिः । मृदुकोष्ठ मुनक्का, दूध, गरम पानी तथा एरण्ड के तेल से ही विरक्त हो जाता है। मध्यमकोष्ठ निसोत, कुटकी तथा अमलतास की गुद्दी के सेवन से और क्रूरकोष्ठ सेहुण्ड के दूध, चोक (सत्यानासी की जड़) तथा जमालगोटा आदि के सेवन से विरक्त होता है। वेगभेद से विरेचन-मात्रा मात्रोत्तमा विरेकस्य त्रिंशद्वेगैः कफान्तगा ।। 15 ।। वेगैर्विंशतिभिर्मध्या हीनोक्ता दशवेगिका। विरेचन की 'उत्तम' मात्रा तीस वेगों (30 बार दस्त होने) की होती है, किन्तु अन्तिम वेग में कफ आना चाहिये। बीस वेगों का 'मध्यम' और दस वेगों की 'हीन' मात्रा होती है। विरेचन-द्रव्यों का मान-विचार द्विपलं श्रेष्ठमाख्यातं मध्यमं च पलं भवेत् ।। 16 ।। पलार्धं च कषायाणां कनीयस्तु विरेचनम्। कल्कमोदकचूर्णानां कर्षं मध्वाज्यलेहतः ।। 17 ।। कर्षद्वयं पलं वापि वयोगोगाद्यपेक्षया। विरेचन द्रव्यों के कषायों (स्वरस, क्वाथ आदि) की 'उत्तम' मात्रा दो पल, 'मध्यम' मात्रा एक पल तथा 'कनीयसी या हीन' मात्रा एक पल की होती है और कल्क चूर्ण तथा अवलेहों की मात्रा एक 'कर्ष' (एक तोला) दो कर्ष अथवा एक पल (4 कर्ष) होती है। इसे मधु तथा घी के साथ मिलाकर चाटने योग्य बना लेना चाहिये और उक्त नियम का पालन रोगी की आयु तथा रोग आदि (देश, काल, कोष्ठ तथा औषधि बल) का विचार कर करना चाहिये। दोष-भेद से द्रव्य-विधान पित्तोत्तरे त्रिवृच्चूर्णं द्राक्षाक्वाथादिभिः पिबेत् ।। 18 ।। त्रिफलाक्वाथगोमूत्रैः पिबेद् व्योषं कफार्दितः।

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चतुर्थोऽध्यायः] विरेचनविधिः 227 --- [बायाँ स्तम्भ] --- त्रिवृत्सैन्धवशुण्ठीनां चूर्णमम्लैः पिबेन्नरः ।। १९ ।। वातार्दितो विरेकाय जाङ्गलानां रसेन वा। पित्तोत्तर कोष्ठ में निसोत का चूर्ण, द्राक्षा (मुनक्का), क्वाथ दूध आदि के साथ पीना चाहिये। कफ से पीड़ित मनुष्य त्रिकटुचूर्ण को त्रिफलाक्वाथ अथवा गोमूत्र के साथ पीये तथा वात से पीड़ित कोष्ठ बाला मनुष्य विरेचन के लिये निसोत, सेंधा नमक तथा सोंठ के चूर्ण के अमृत द्रव (काँजी आदि) अथवा जाङ्गल देश के प्राणियों (हरण आदि) के मांसरस के साथ पीये। एरण्ड तैल-प्रयोग एरण्डतैलं त्रिफलाक्वाथेन द्विगुणेन च ।। २० ।। युक्तं पीतं पयोभिर्वा न चिरेण विरिच्यते। एरण्ड का तेल दुगुने त्रिफलाक्वाथ अथवा दूध के साथ विधिवत् पीने से शीघ्र ही विरेचन करा देता है। त्रिवृता कौटजं बीजं पिप्पली विश्वभेषजम् ।। २१ ।। समृद्धीकारसक्षौद्रं वर्षाकाले विरेचनम् । त्रिवृद्दुरालभा मुस्ता शर्करोदीच्यचन्दनम् ।। २२ ।। द्राक्षाम्बुना सयष्टीकं शीतलं च घनात्यये। (त्रिवृतां चित्रकं पाठामजाजीं सरलां वचाम् ।। २३ ।। हेमक्षीरीं च हेमन्ते चूर्णमुष्णाम्बुना पिबेत्।) पिप्पली नागरं सिन्धु श्यामा त्रिवृतया सह ।। २४ ।। लिहेत् क्षौद्रेण शिशिरे वसन्ते च विरेचनम्। त्रिवृता शर्करा तुल्या ग्रीष्मकाले विरेचनम् ।। २५ ।। निसोत, इन्द्रजौ, पीपल तथा सोंठ का चूर्ण, मुनक्का के रस तथा मधु के साथ मिलाकर खाने से 'वर्षा ऋतु' में विरेचन होता है। निसोत, धमासा, मोथा, खाँड़, नेत्रबाला, सफेद चन्दन, मुलेठी का चूर्ण मुनक्का के रस के साथ मिलाकर सेवन करने से 'शरदऋतु' में विरेचन होता है और यह शीतल है। निसोत, चीता, पाठा, जीरा, सरल, वच तथा सत्यानासी की जड़ का चूर्ण उष्ण जल के साथ 'हेमन्तऋतु' में पीना चाहिये। पीपल, सोंठ, सेंधा नमक तथा कालीनिसोत का चूर्ण मधु के साथ मिलाकर खाने से 'शिशिर' तथा 'वसन्त' ऋतु में विरेचन होता है और निसोत का चूर्ण तथा खाँड़ समान भाग में लेकर खाने से 'ग्रीष्म ऋतु' में विरेचन होता है। सब ऋतुओं के योग्य विरेचन त्रिवृतां हपुषां दन्तीं सप्तलां कटुरोहिणीम्। स्वर्णक्षीरीं च सञ्चूर्ण्य गोमूत्रे भावयेत् त्र्यहम् ।। २६ ।। --- [दायाँ स्तम्भ] --- एष सर्वर्तुको योगः स्निग्धानां मलदोषहा। निसोत, दन्ती, हाऊबेर, सप्तपर्णी, कुटकी तथा चोक का चूर्ण बनायें और तीन दिन तक गोमूत्र की भावना दें, यह 'सर्वर्तुक योग' अर्थात् सब ऋतुओं में सेवन करने योग्य योग है। यह स्निग्ध मनुष्यों के मलदोष को दूर करता है। अभयादि मोदक अभया मरिचं शुण्ठीविडङ्गामलकानि च। पिप्पली पिप्पलीमूलं त्वक्पत्रं मुस्तमेव च ।। २७ ।। एतानि समभागानि दन्ती च द्विगुणा भवेत्। त्रिवृदष्टगुणा ज्ञेया षड्गुणा चात्र शर्करा ।। २८ ।। मधुना मोदकान् कृत्वा कषमात्रप्रमाणतः। एकैकं भक्षयेत् प्रातः शीतं चानु पिबेज्जलम् ।। २९ ।। तावद् विरिच्यते जन्तुर्यावदुष्णं न सेवते। पानाहारविहारेषु भवेन्निर्यन्त्रणः सदा ।। ३० ।। विषमज्वरमन्दाग्निपाण्डुकासभगन्दरान् । दुर्नामकूष्ठगुल्मार्शोगलगण्डभ्रमोदरान् ।। ३१ ।। (विदाहप्लीहमेहांश्च यक्ष्माणं नयनामयान्। वातरोगस्तथाध्मानं मूत्रकृच्छ्राणि चाश्मरीम् ।। ३२ ।।) पुष्पपार्श्वोरुजघनजङ्घोदररुजो जयेत्। सततं शीलनादेषां पलितानि प्रणाशयेत् ।। ३३ ।। अभयामोदका ह्येते रसायनवराः स्मृताः। बड़ी हरड़, मरिच, सोंठ, वायविडंग, आँवला, पीपल, पीपलामूल, दालचीनी, तेजपत्ता तथा नागरमोथा-ये सब द्रव्य समभाग (1-1 तोला), दन्ती दो भाग (2 तोला), निसोत आठ भाग (8 तोला) तथा खाँड छह भाग (6 तोला), उक्त सभी द्रव्यों को चूर्ण रूप में लेकर मधु के योग से एक-एक कर्ष (1-1 तोला) के मोदक (लड्डू) बना लें। एक मोदक प्रातःकाल खायें और अनुपान में शीतल जल पीयें। इससे तब तक विरेचन होता जाता है, जब तक उष्ण जल नहीं पी लिया जाता। इस औषध का सेवन करते समय पान, आहार तथा विहार में किसी प्रकार का बन्धन या नियम रखने का आवश्यकता नहीं है। यह औषध विषमज्वर, मन्दाग्नि, पाण्डुरोग, कास, भगन्दर, बवासीर, कुष्ठ, वायुगोला की पीड़ा, गलगण्ड, भ्रम, उदररोग, दाह, प्लीहा-विकार, प्रमेह, राजयक्ष्मा, नेत्ररोग, वातव्याधि, अफरा, मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी (पथरी) तथा पीठ, पार्श्व (पसली एवं फुफ्फुस), ऊरु, जघन या जंघा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

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228 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे


[बायाँ पृष्ठ / Left Column]

(टांग) तथा उदर की पीड़ा को जीतता है। निरन्तर (बहुत दिनों या वर्षों तक) सेवन करने से पलित (युवावस्था में बालों का सफेद हो जाना) का विनाश होता है। ये 'अभयामोदक' उत्तम रसायन माने जाते हैं।

विरेचन-काल में कर्तव्य

पीत्वा विरेचनं शीतजलैः संसिच्य चक्षुषी ।। 34 ।। सुगन्धिं किञ्चिदाघ्राय ताम्बूलं शीलयेन्नरः । निवातस्थो न वेगांश्च धारयेन्न स्वपेत् तथा ।। 35 ।। शीताम्बु न स्पृशेत् क्वापि कोष्णानीरं पिबेन्मुहुः । विरेचन (दस्तावर) औषधि को पीकर आँखों के शीतल जल से सींचकर तथा किसी सुगन्धित पदार्थ (इत्र आदि) को सूंघकर उत्तम ताम्बूल का सेवन करना चाहिये, जिसमें अधिक वायु न लगे ऐसे स्थान में बैठना चाहिये, विरेचन के वेगों को रोकना नहीं चाहिये, इसमें सोना उचित नहीं, किसी भी कार्य में शीतल जल का प्रयोग नहीं करना चाहिये और बार-बार गुनगुना जल पीना चाहिये।

सम्यग् विरेचन का लक्षण

बलासौषधपित्तानि वायुर्वान्ते यथा व्रजेत् ।। 36 ।। रेकात् तथा मलं पित्तं भेषजं च कफो व्रजेत्। जैसे वमन में क्रमशः कफ, औषध (जो वमन करने के लिए पी गयी थी), पित्त तथा वायु निकलती है, उसी प्रकार विरेचन में मल (पुरीष) पित्त, औषधि तथा कफ निकलता है।

दुर्विरिक्त का लक्षण

दुर्विरिक्तस्य नाभेस्तु स्तब्धत्वं कुक्षिशूलता ।। 37 ।। पुरीषवातसङ्गश्च कण्डूमण्डलगौरवाः । विदाहोऽरुचिराध्मानं भ्रमश्छर्दिंश्च जायते ।। 38 ।। दुर्विरिक्त (जिसको भली-भाँति विरेचन नहीं हुआ है) मनुष्य का नाभि में स्तब्धता (कड़ापन), उदर में शूल, मल तथा वायु (अपानवायु) की रुकावट, खुजली, शीतपित्त, शरीर में भारीपन, दाह, अरुचि, आध्मान, भ्रम तथा कै हो जाता है।

दुर्विरिक्त की चिकित्सा

तं पुनः पाचनैः स्नेहैः पक्त्वा संस्नेह्य रेचयेत् । तेनास्योपद्रवा यान्ति दीप्ताऽग्नेर्लघुता भवेत् ।। 39 ।। जिसे उत्तम विरेचन नहीं हुआ हो, उसे फिर पाचन क्रिया द्वारा पकाकर और स्नेहों द्वारा स्निग्ध कर विरेचन कराना


[दायाँ पृष्ठ / Right Column]

चाहिये। इससे उसके उपद्रव शान्त हो जाते हैं, अग्नि दीप्त तथा शरीर में हल्कापन हो जाता है।

अति विरेचन के उपद्रव

विरेकस्यातियोगेन मूर्च्छा भ्रंशो गुदस्य च। शूलं कफातियोगः स्यान्मांसाधावनसन्निभम् ।। 40 ।। मेदोनिभं जलाभासं रक्तं वापि विरिच्यते। विरेचन के अतियोग अर्थात् अधिक होने से मूर्च्छा, गुदभ्रंश (काँच निकलना), उदर में शूल, कफ की अतिप्रवृत्ति और मांस के धोअन जैसा, मेदा जैसा अथवा जल जैसा विरेचन होता है, अथवा रक्त भी निकलने लगता है।

विरेकातियोग में कर्तव्य

तस्य शीताम्बुभिः सिक्त्वा शरीरं तण्डुलाम्बुभिः ।। 41 ।। मधुमिश्रैस्तथा शीतैः कारयेद् वमनं मृदु। सहकारत्वचः कल्को दध्ना सौवीरकेण वा ।। 42 ।। पिष्ट्वा नाभिप्रलेपेन हन्त्यतीसारमुल्बणम्। अजाक्षीरं रसं वापि वैष्किरं हारिणं तथा ।। 43 ।। शालिभिः षष्टिकैः स्वल्पं मसूरैर्वापि भोजयेत्। शीतैः सङ्ग्राहिभिर्द्रव्यैः कुर्यात् सङ्ग्रहणं भिषक् ।। 44 ।। जिसको विरेचन का अतियोग हुआ है, उसके शरीर पर शीतल जल के छींटें देकर मधु-मिश्रित तण्डुलाम्बु (चावलों का धोअन) द्वारा साधारण-सी वमन करवा देनी चाहिये। आम (आम के वृक्ष) की छाल को दही अथवा काँजी के साथ पीसकर कल्क बनाये और यह कल्क नाभि (उदर पर) लेप करने से बढ़े हुये अतिसार को नष्ट करता है। बकरी का दूध अथवा बकरी के मांस का रस (शोरबा) अथवा विष्किर (बिखेर कर खाने वाले मोर, मुरगा आदि) पक्षियों अथवा हरिण के मांस का रस, शाली के चावल अथवा साठी के चावलों के साथ अथवा मसूर की दाल के साथ थोड़ा-सा खिलाना चाहिये। इतना करने पर यदि अतिसार (दस्त) न रुक सके तो चिकित्सक शीतल तथा संग्राही द्रव्यों द्वारा संग्रहण करायें, अर्थात् दस्तों को रोकने का प्रयत्न करें।

सुविरिक्त के लक्षण

लाघवे मनसस्तुष्टावनुलोमे गतेऽनिले। सुविरिक्तं नरं ज्ञात्वा पाचनं पाययेन्निशि ।। 45 ।। शरीर में हल्कापन, मन की प्रसन्नता तथा वायु के अनुलोम (स्वमार्गगामी) हो जाने पर मनुष्य को 'सुविरिक्त' जानकर रात्रि में पाचन (पाचक औषधियों के चूर्ण तथा फाण्ट आदि)

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चतुर्थोऽध्यायः] विरेचनविधिः 229


वक्तव्य-उक्त लक्षण देखने पर समझ लेना चाहिये कि विरेचन भली-भाँति हो गया है, क्योंकि विरेचन का अतियोग हानिकर होता है। अतः अवशिष्ट दोष को शान्त करने के लिए पाचन का विधान किया गया है।

विरेचन से लाभ इन्द्रियाणां बलं बुद्धेः प्रसादो वह्निदीपनम्। धातुस्थैर्यं वयःस्थैर्यं भवेद् रेचनसेवनात् ॥४६॥ विधिपूर्वक 'विरेचन' का सेवन करने से इन्द्रियों का बल बढ़ता है। बुद्धि का प्रसाद (उन्मादादि रोगों का विनाश) होता है, अग्नि दीप्त होती है, धातुएँ स्थिर हो जाती हैं, और आयु का ह्रास नहीं होता है।

विरेचन में परिहार्य प्रवातसेवाशीताम्बुस्नेहाभ्यङ्गमजीर्णताम् । व्यायामं मैथुनं चैव न सेवेत् विरेचितः ॥४७॥


विरेचित (जिसको विरेचन दिया गया है) मनुष्य प्रवात (प्रचण्ड वायु या आँधी) का सेवन, शीतल, जल, स्नेह (तैल आदि) की मालिश, अजीर्ण (अपच), व्यायाम तथा मैथुन का सेवन न करें।

विरेचन में पथ्य शालिषष्टिकमुद्गाद्यैर्यवागूं भोजयेत् कृताम्। जाङ्गलविष्किराणां वा रसैः शाल्योदनं हितम् ॥४८॥ इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे विरेचनविधिः नाम चतुर्थोऽध्यायः

शाली चावल (वासमती), साठी चावल आदि की 'यवागू' (खीर जैसी पतली खिचड़ी) छौंक लगाकर खिलानी चाहिये अथवा शाली चावलों का भात जाङ्गल (हरिण आदि) तथा विष्किर (मुर्गा आदि) प्राणियों के मांसरस के साथ भी लाभदायक होता है।


इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का चौथा अध्याय समाप्त ।। ४ ।।


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पञ्चमोऽध्यायः स्नेहवस्तिविधिः


वस्तियों के दो भेद

वस्तिर्द्विधाऽनुवासाख्यो निरूहश्च ततः परम्। वस्तिभिर्दीयते यस्मात् तस्माद् वस्तिरिति स्मृतः।।1।।

वस्ति दो प्रकार की होती हैं-1. अनुवासन और 2 निरूहण। क्योंकि यह 'वस्ति' द्वारा दी जाती है, इसलिये इसे 'वस्ति' कहते हैं। देखें-च० सि० अ० 3।

वक्तव्य-बूढ़ी गाय, भैंस, सूअर, बकरा तथा भेड़ा की वस्ति या मूत्राशय ही इस उपकरण या यन्त्र में प्रधान होता है, अतः इसे 'वस्ति' कहा जाता है। 'अनुवसन्नपि न दुष्यति, अनुदिवसं वा दीयते इति अनुवासनः'। तथा 'स दोषनिर्हरणात् शरीररोगहरणाद्वा निरूहः'।-सु० चि० अ० 35.18 के अनुसार इसके दो नाम रखे गये हैं।

वस्ति का एक नाम 'पिचकारी' भी है। इससे गुद, भग तथा मूत्रमार्ग में द्रव औषध पहुँचायी जाती है। यद्यपि शरीर के अन्यान्य स्रोतों में तथा सिराओं में इंजेक्शन द्वारा औषधि पहुँचाने के साधन को भी वस्ति कहा जा सकता है, तथापि अगले तीन अध्यायों में उपर्युक्त तीन स्थानों में ही वस्ति देने का विधान लिखा गया है। चरकसंहिता तथा सुश्रुतसंहिता में चिकित्सा की दृष्टि से वस्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है। देखें-च० सि० अ० 1.40 तथा सु० चि० 35.13। आधुनिक भारतीय आयुर्वेद की प्रणाली के चिकित्सक प्रायः वस्ति कर्म का परित्याग कर बैठे हैं। हमारा विचार है कि वे इस कर्म को पुनः अपनायें और यशस्वी बनें।


वस्तियों के लक्षण

यः स्नेहौर्दीयते सः स्यादनुवासननामकः। कषायक्षारतैलैर्यो निरूहः स निगद्यते।।2।।

जो वस्ति स्नेहों द्वारा दी जाती है, वह 'अनुवासन' तथा जो कषाय (क्वाथ आदि), क्षार (सोडा आदि) तथा तैल को मिलाकर दी जाती है, वह 'निरूह' कहलाती है।

वक्तव्य-उक्त दोनों ही वस्तियाँ एक ही प्रकार के यन्त्र द्वारा दी जाती हैं। अन्तर केवल प्रयुक्त किये जाने वाले द्रव्यों का है। उक्त 'कषायक्षीरतैलैः' इस पाठ में 'क्षीर' के स्थान में 'क्षार' पाठ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि सुश्रुत में निरूहवस्ति को शोधन तथा लेखनकारक कहा है। देखें-'सु० चि० अ० 35। उक्त दोनों गुण 'क्षार' में ही होते हैं, 'क्षीर' (दूध) में नहीं। आजकल निरूहवस्ति साबुन के पानी से दी जाती है, जो क्षार तथा तैल का मिश्रण है।


वस्ति-क्रम का निर्देश

तत्रानुवासनाख्यो हि वस्तिरर्यः सोऽत्र कथ्यते। पूर्वमेव ततो वस्तिर्निरूहाख्यो भविष्यति।।3।। निरूहादुत्तरञ्चैव वस्तिः स्यादुत्तराभिधः।

उक्त दोनों प्रकार की वस्तियों में से यहाँ पर पहिले 'अनुवासन-वस्ति' का वर्णन किया जाता है। इसके पश्चात् 'निरूहण-वस्ति' का वर्णन किया जायेगा और निरूह के पश्चात् 'उत्तर' नामक वस्ति का वर्णन किया जायेगा।


अनुवासन का भेद मात्रावस्ति

अनुवासनभेदश्च मात्रावस्तिरुदीरितः।।4।। पलद्वयं तस्य मात्रा तस्मादर्धापि वा भवेत्।

अनुवासन वस्ति का भेद या विकल्प 'मात्रावस्ति' नाम से पुकारा जाता है। इसकी मात्रा दो पल (8 तोला) अथवा इससे भी आधी अर्थात् एक पल (4 तोला) की होती है।

वक्तव्य-अनुवासन तथा मात्रावस्ति में केवल स्नेह की मात्रा का अन्तर है। देखें-शा० सं०, उ० ख० अ० 5 श्लोक 20 और सु० चि० अ० 35 में मात्रावस्ति परिचय। इसमें किसी प्रकार के परहेज की आवश्यकता नहीं होता है और मात्रावस्ति के लिये ही लिखा गया है 'अनुदिवसं वा दीयते'। अर्थात् यह प्रतिदिन भी दी जा सकती है।

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पञ्चमोऽध्यायः ] स्नेहवस्तिविधिः 231 अनुवासन के योग्य रोगी अनुवास्यस्तु रूक्षः स्यात् तीक्ष्णाग्निः केवलानिती ।। 5 ।। रूक्ष (जिसके शरीर में रूक्षता हो), तीक्ष्ण अग्नि वाले तथा केवल वायु के रोगों से पीड़ित मनुष्य को 'अनुवासन- वस्ति' देनी चाहिये। अनुवासन के अयोग्य रोगी नानुवास्यस्तु कुष्ठी स्यान्मेही स्थूलस्तथोदरी। नास्थाप्या नानुवास्याश्चाजीर्णोन्मादतॄडर्दिताः ।। 6 ।। शोकमूर्च्छारुचिभयश्वासकासक्षयातुराः । कुष्ठी (कोढ़ी), प्रमेह रोगी, स्थूल (मोटा) तथा उदररोगी को 'अनुवासन' वस्ति नहीं देनी चाहिये। अजीर्ण, उन्माद तृष्णा, शोक, मूर्च्छा, अरुचि, भय, श्वास, कास तथा क्षयरोग से पीड़ित मनुष्यों को न आस्थापान (निरूहण) वस्ति देनी चाहिये और न अनुवासनवस्ति। वक्तव्य-यद्यपि उक्त पाठ में मूर्च्छित रोगी को अनुवासन तथा आस्थापान वस्ति देने का निषेध किया गया है, किन्तु स्वयं शार्ङ्गधराचार्य ने अग्रिम छठे अध्याय के 8वें श्लोक में मूर्च्छित को निरूहणवस्ति देने का विधान भी किया है। वस्ति-नेत्र के द्रव्य नेत्रं कार्यं सुवर्णादिधातुभिर्वृक्षवेणुभिः ।। 7 ।। नलैर्दन्तैर्विषाणाग्रैर्मणिभिर्वा विधीयते। वस्ति का नेत्र (नलिका) सुवर्ण आदि धातुओं, लकड़ी, बाँस, नल, दन्त (हाथीदाँत) का, सींग अथवा मणि का बनाया जाता है। वक्तव्य-यही नेत्र या नलिका एक ओर से गुद आदि में प्रविष्ट की जाती है और इसके दूसरे सिरे पर वस्ति (थैली) बाँध दी जाती है। वयस्-भेद से नेत्र-परिमाण एकवर्षात् षड्वर्षं यावन्मानं षडङ्गुलम् ।। 8 ।। ततो द्वादशकं यावन्मानं स्यादष्टसम्मितम्। ततः परं द्वादशभिरङ्गुलैर्नेत्रदीर्घता ।। 9 ।। इस नेत्र की लम्बाई रोगी की एक वर्ष से छः वर्ष की अवस्था तक छः अङ्गुल, छः से बारह वर्ष तक आठ अङ्गुल और इसके पश्चात् बारह अङ्गुल होनी चाहिये। वस्ति-नेत्र का छिद्र तथा आकार मुद्गच्छिद्रं कलायाभं छिद्रं कोलास्थिसन्निभम्। यथासङ्ख्यं भवेन्नेत्रं श्लक्ष्णं गोपुच्छसन्निभम् ।। 10 ।। इस नेत्र (नलिका) का छिद्र यथासंख्या अर्थात् छः, आठ तथा बारह अङ्गुल की नलिका में मूँग, मटर तथा बेर (झरबेरी का फल) की गुठली के (प्रविष्ट होने योग्य) होना चाहिये। यह नेत्र श्लक्ष्ण (साफ हो और खुरदरा न हो) तथा गाय की पूँछ के समान (आगे से पतला और मूल में मोटा) होना चाहिये। वस्ति-नेत्र का परिणाह आतुराङ्गुष्ठमानेन मूले स्थूलं विधीयते। कनिष्ठिकापरीणाहमग्रे च गुटिकामुखम् ।। 11 ।। यह नेत्र मूल में रोगी के अँगूठे के समान और अग्रभाग में कनिष्ठिका अंगुली के समान मोटा होना चाहिये और इसका अग्रभाग गुटिका जैसा होना चाहिये। वस्ति-नेत्र की कर्णिका तन्मूले कर्णिके द्वे च कार्ये भागाच्चतुर्थकात्। योजयेत् तत्र बस्तिं च बन्धद्वयविधानतः ।। 12 ।। इस नेत्र के मूल की ओर चौथाई भाग छोड़कर (6 अंगुल की नलिका में 2 अंगुल छोड़कर) दो कर्णिका (अँगूठी जैसी) बनानी चाहिये और इन्हीं कर्णिकाओं पर वस्ति चढ़ाकर दो जगह बन्धन बाँध देने चाहिये। वक्तव्य-यह पाठ चरक तथा सुश्रुत के विरुद्ध होने के कारण भ्रान्त जैसा प्रतीत होता है। क्योंकि 'स्यात् कर्णिकैका- ऽग्रचतुर्थभागे मूलाश्रिते वस्तिनिबन्धने द्वे'। (च०सि० अ० 3 श्लोक 10)। इसमें 'अग्रे त्र्यंगुल' और जोड़ लें। वस्ति के योग्य द्रव्य मृगाजशूकरगवां महिषस्यापि वा भवेत्। मूत्रकोषस्य वस्तिस्तु तदलाभेन चर्मजः ।। 13 ।। कषायरक्तः सुमुदुर्बस्तिः स्निग्धो दृढो हितः। हरिण, बकरा, सूअर, गाय, भैंस, के मूत्रकोश या मूत्राशय की वस्ति होनी चाहिये। इनके अभाव में (यदि मूत्रकोश न मिले तो) चमड़े की भी बनायी जा सकती है और यह वस्ति कषाय रस वाले द्रव्यों (बबूल की छाल आदि) द्वारा रंगी हुई, सुकोमल, चिकनी तथा दृढ़ (मजबूत) होनी चाहिये। वक्तव्य-आजकल बाजार में रबर की वस्ति बनी-बनायी मिलती है, जो इसी प्रमाण से बनी हुई होती है। व्रणवस्ति का नेत्र व्रणवस्तेस्तु नेत्रं स्याच्छ्लक्ष्णमष्टाङ्गुलोन्मितम् ।। 14 ।। मुद्गच्छिद्रं गृध्रपक्षनलिकापरिणाहि च।

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232 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे व्रणवस्ति (इससे व्रण धोये जाते हैं) का नेत्र श्लक्ष्ण, (चिकना) आठ अङ्गुल लम्बा, मूँग के समान छिद्र वाला तथा गिद्ध के पँख की नलिका के समान मोटा होना चाहिये। वस्ति के सम्यग्योग का फल शरीरोपचयं वर्णं बलमारोग्यमायुषः ।। 15 ।। कुरुते परिवृद्धिं च वस्तिः सम्यगुपासितः। विधिपूर्वक सेवन करने से वस्ति शरीर का पुष्टि, वर्ण, बल, आरोग्य तथा आयु की वृद्धि करती है। वस्ति के लिए समय-निर्देश दिवा शीते वसन्ते च स्नेहवस्तिः प्रदीयते ।। 16 ।। ग्रीष्मवर्षाशरत्काले रात्रौ स्यादनुवासनम्। शीतकाल (हेमन्त तथा शिशिर ऋतु) में तथा वसन्त ऋतु में दिन में तथा ग्रीष्म, वर्षा एवं शरद् ऋतु में रात्रि में स्नेहवस्ति (अनुवासन वस्ति) दी जाती है। वक्तव्य-तात्पर्य यह है कि समशीतोष्ण काल में ही वस्ति देना उचित होता है। वस्ति के पूर्व भोजन-निर्देश न चातिस्निग्धमशनं भोजयित्वाऽनुवासयेत् ।। 17 ।। मदं मूर्च्छां च जनयेद् द्विधा स्नेहः प्रयोजितः। रूक्षं भुक्तवतोऽप्यन्नं बलं वर्णञ्च हीयते ।। 18 ।। अत्यन्त स्निग्ध भोजन खिलाकर अनुवासन वस्ति नहीं देनी चाहिये, क्योंकि दोनों ओर (मुख तथा गुद) से प्रयुक्त किया हुआ स्नेह मद तथा मूर्च्छा को उत्पन्न कर देता है। अत्यन्त रूक्ष भोजन कराकर भी वस्ति देने से बल तथा वर्ण की हानि होती है। वस्ति की मात्रा के दोष हीनमात्रावुभौ बस्ती नातिकार्यकरौ स्मृतौ। अतिमात्रौ तथाऽऽनाहक्लमातीसारकारकौ ।। 19 ।। अनुवासन तथा निरूहण ये दोनों ही वस्तियाँ हीनमात्रा (उचित से कम मात्रा) से देने पर उचित कार्य करने वाली नहीं होती और अतिमात्रा से देने पर आनाह, क्लम (सुस्ती) तथा अतिसार को उत्पन्न कर देती हैं। वस्ति-मात्रा-निर्देश उत्तमस्य पलैः षड्भिर्मध्यमस्य पलैस्त्रिभिः। पलास्यार्धेन हीनस्य युक्ता मात्रानुवासने ।। 20 ।। उत्तम (बलवान्) पुरुष के लिए अनुवासन (स्नेह) की मात्रा छः पल की, मध्यम के लिए तीन पल की और हीन (दुर्बल) के लिए डेढ़ पल (6 तोला) मात्रा उचित होती है। अनुवासन-वस्ति के द्रव्य शताह्वासैन्धवाभ्यां च देयं स्नेहे च चूर्णकम्। तन्मात्रोत्तममध्यान्ताः षट्चतुर्द्वयमाषकैः ।। 21 ।। स्नेह में सौंफ तथा सेंधा नमक का चूर्ण अवश्य दिया जाता है। उसकी मात्रा उत्तम पुरुष के लिए 6 माशा, मध्यम के लिए चार माशा तथा हीन के लिए दो माशा होनी चाहिये। वक्तव्य-वस्ति-प्रयोग के लिए स्नेह द्रव्य को गुनगुना कर लेना चाहिये। इससे वह शीघ्र ही लौट आता है। विरेचन के पश्चात् वस्ति विरेचनात् सप्तरात्रे गते जातबलाय च। भुक्तान्नायानुवास्याय वस्तिर्देयोऽनुवासनः ।। 22 ।। विरेचन के पश्चात् सात दिन बीतने पर जब रोगी बलवान् हो जाये, अन्न खाने लग जाये तथा अनुवासन के योग्य समझा जाये, तब उसे अनुवासन वस्ति देनी चाहिये। वस्ति देने की विधि अथानुवास्यं स्वभ्यक्तमुष्णाम्बुस्वेदितं शनैः। भोजयित्वा यथाशास्त्रं कृतचङ्क्रमणं ततः ।। 23 ।। उत्सृष्टानिलविण्मूत्रं योजयेत् स्नेहवस्तिना। सुप्तस्य वामपार्श्वेन वामजङ्घाप्रसारिणः ।। 24 ।। कुञ्चितापरजङ्घस्य नेत्रं स्निग्धगुदे न्यसेत्। बद्ध्वा वस्तिमुखं सूत्रैर्वामहस्तेन धारयेत् ।। 25 ।। पीडयेद् दक्षिणेनैव मध्यवेगेन धीरधीः। जृम्भाकासक्षवार्दींश्च वस्तिकाले न कारयेत् ।। 26 ।। इसके पश्चात् अनुवासन के योग्य मनुष्य को भली-भाँति अभ्यंग (मालिश) करें, फिर उष्ण जल से धीरे-धीरे स्वेदन करें। रोगी को शास्त्रानुसार भोजन कराकर चंक्रमण (टहलना) करायें, इसके पश्चात् अपानवायु, मल तथा मूत्र का परित्याग कराकर स्नेहवस्ति का प्रयोग करें। रोगी को बाँयी करवट लिटा दें और बाँयी टाँग फैलाकर वस्ति का प्रयोग करें तथा दाहिनी टाँग को संकुचित करवा दें, गुद को स्नेह (तैल) द्वारा स्निग्ध करके नेत्र (नलिका) को प्रविष्ट कर दें। इस नेत्र पर वस्ति को धागा या डोरा द्वारा बाँधकर नेत्र को बाँये हाथ से सम्भालकर पकड़े और दाहिने हाथ से स्नेह भरी हुई वस्ति को मध्यवेग से दबाना चाहिये, यह कार्य धैर्यपूर्वक करें।

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पञ्चमोऽध्यायः ] स्नेहवस्तिविधिः 233 वस्ति देते समय जँभाई लेना, खाँसना अथवा छींकना उचित नहीं है। रोगी को यह बात पहले ही समझा देनी चाहिये। वस्ति-प्रयोग में काल-निर्देश त्रिंशन्मात्रामितः कालः प्रोक्तो वस्तेस्तु पीडने। ततः प्रणिहितः स्नेह उत्तानो वाक्शतं भवेत् ।। 27 ।। वस्ति के पीडन में तीस मात्रा (करीब 1 मिनट) परिमित समय लगना चाहिये। इसके पश्चात् नेत्र को धीरे से निकाल लें और रोगी स्नेह को पचाने के लिए उत्तान (चित्त) होकर सौ वाक् परिमित समय तक लेटा रहे। मात्रा-काल-प्रमाण जानुमण्डलमावेष्ट्य कुर्याच्छोटिकया युतम्। एका मात्रा भवेदेषा सर्वत्रैष विनिश्चयः ।। 28 ।। वाक् अथवा मात्रा का परिमाण इस प्रकार है-जानु (घुटना) के सब ओर हाथ घुमाकर चुटकी बजाने में जितना समय लगता है, उतने समय का नाम 'मात्रा' है। यही सभी स्थानों में निश्चय माना जाता है। वस्ति-प्रयोग में पश्चात् कर्म प्रसारितैः सर्वगात्रैर्यथावीर्य विसर्पति। ताडयेत् तलयोरेनं त्रीन् वारांश्च शनैः शनैः ।। 29 ।। स्फिचोश्चैवं ततः श्रोणीं शय्यां चैवोत्क्षिपेत् ततः। जाते विधाने तु ततः कुर्यान्निद्रां यथासुखम् ।। 30 ।। गात्रों (हाथ-पाँवों) को पसार कर लेटने से स्नेह का सार यथावत् शरीर में फैल जाता है और इस रोगा के तलुवों पर तथा स्फिचों (चूतड़ों) तथा कमर पर तीन बार धीरे-धीरे ताड़न करना चाहिये तथा उसकी शय्या (पलंग) को उठाकर (भूमि से एक हाथ भर) फेंकना चाहिये (इस क्रिया से स्नेह शीघ्र नहीं, अपितु विलम्ब से निकलता है)। इस विधान के पूर्ण हो जाने पर सुखपूर्वक सो जाना चाहिये। सम्यक् अनुवासित के लक्षण सानिलः सपुरीषश्च स्नेहः प्रत्येति यस्य वै। उपद्रवं विना शीघ्रं स सम्यगनुवासितः ।। 31 ।। जिस मनुष्य का स्नेह वायु (अपानवायु) तथा पुरीष को साथ लिये हुये शीघ्र (8-9 घण्टा के भीतर) ही लौट आता है और जिसमें कोई उपद्रव भी उत्पन्न न हुआ हो, वह 'सम्यक्-अनुवासित' समझा जाता है। अर्थात् उसको उचित अनुवासन हुआ है, ऐसा समझ लेना चाहिये। वक्तव्य-इसके उपद्रवों का वर्णन इसी अध्याय के 43वें


श्लोक में देखें और उन उपद्रवों की शान्ति का उपाय भी हीं दिया है। वस्ति के पश्चात् पथ्य जीर्णान्नमथ सायाह्ने स्नेहे प्रत्यागते पुनः। लघ्वन्नं भोजयेत् कामं दीप्ताग्निस्तु नरो यदि ।। 32 ।। जीर्णान्न (जिसका भोजन पच चुका है) मनुष्य को स्नेह के लौट आने पर सायंकाल लघु (हल्का) भोजन इच्छापूर्वक खिलाना चाहिये, यदि उसकी जठराग्नि दीप्त हो तो, अन्यथा नहीं खिलाना चाहिये अथवा बहुत थोड़ा खिलाना चाहिये। अनुवासन की व्यापत्ति की चिकित्सा अनुवासिताय दातव्यमितरेऽह्नि सुखोदकम्। धान्यशुण्ठीकषायो वा स्नेहव्यापत्तिनाशनम् ।। 33 ।। अनुवासित (जिसको अनुवासन दिया गया है) मनुष्य को दूसरे दिन उष्ण जल अथवा धनियाँ तथा सोंठ का क्वाथ देना चाहिये, इससे स्नेह की व्यापत्ति (विकृति) का विनाश हो जाता है और अग्नि दीप्त तथा भोजन में रुचि हो जाती है। उष्णोदक के गुण - उष्ण जल मनुष्य के अनुवासन- वस्ति द्वारा दिये गये स्नेह के अनपच को पचाता है, कफ का भेदन करता है और वायु का अनुलोमन करता है। इसलिये वमन, विरेचन, निरूहण तथा अनुवासन में वायु तथा कफ की शान्ति के लिए उष्ण जल देना चाहिये। धान्यशुण्ठी जल का गुण- 'एकान्तरोपयोगेन धान्यशुण्ठीजलं पिबेत्। तेनास्य दीप्यते वह्निर्भक्ताकाङ्क्षा च जायते'। अर्थात् अनुवासन के एक दिन पश्चात् धनियाँ तथा सोंठ द्वारा परिपक्व जल पीना चाहिये, उसे पीने से अग्नि दीप्त हो जाती है और भोजन में रुचि होने लगती है। स्नेह वस्ति के साथ निरूहण-वस्ति अनेन विधिना सप्त चाष्टौ वाथ नवापि वा। विधेया बस्तयस्तेषामन्तरा तु निरूहणम् ।। 34 ।। उक्त विधि से सात आठ अथवा नौ वस्तियाँ देनी चाहिये और उनके बीच-बीच में निरूहण वस्ति भी देते जाना चाहिये। वक्तव्य-अनुवासन-वस्ति के स्नेहन और निरूहण- वस्ति से शोधन होता है। चिकित्सा में सफलता पाने के लिए इन दोनों का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है। वस्तियों के फल दत्तस्तु प्रथमो वस्तिः स्नेहयेद् वस्तिवङ्क्षणौ। सम्यग्दत्तो द्वितीयस्तु मूर्धस्थमनिलं जयेत् ।। 35 ।।

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234 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे

[बायाँ स्तम्भ] बलं वर्णं च जनयेत् तृतीयस्तु प्रयोजितः। चतुर्थपञ्चमौ दत्तौ स्नेहेयतां रसासृजी॥३६॥ षष्ठो मांसं स्नेहयति सप्तमो मेद एव च। अष्टमो नवमश्चापि मज्जानं च यथाक्रमम्॥३७॥ एवं शुक्रगतान् दोषान् द्विगुणः साधु साधयेत्।) अष्टादशाष्टादशकान् बस्तीनां यो निषेवते॥३८॥ स कुञ्जरबलोऽप्यश्वं जयेत् तुल्योऽमरप्रभः। पहली वस्ति (मूत्राशय) तथा वंक्षण (मूत्रवाही के दोनों स्रोतों तथा वृक्कों) को स्निग्ध कर देती है। विधिपूर्वक दी हुई दूसरी वस्ति शिर तक की वायु (दूषित वायु) को जीतती अथवा शान्त करती है, तीसरी वस्ति बल तथा वर्ण (कान्ति) को उत्पन्न कर देती है, चौथी और पाँचवीं रस और रक्त को स्निग्ध कर देती है, छठी मांस को तथा सातवीं मेदा को स्निग्ध कर देती है, आठवीं तथा नौवीं हड्डी तथा मज्जा को स्निग्ध कर देती है। इस प्रकार दुगुनी अर्थात् अठारह वस्तियाँ शुक्रगत दोषों को सिद्ध (शान्त) कर देती है। इसी प्रकार 18 बार वस्ति का प्रयोग करने वाला पुरुष हाथी के समान बलवान् तथा घोड़े के समान वेगवान् होकर देवताओं के सदृश कान्तिमान् हो जाता है। वातरोगाी के लिए स्नेह-वस्ति रूक्षाय बहुवाताय स्नेहबस्तिं दिने दिने॥३९॥ दद्याद्वैद्यस्तथान्येषामग्न्याबाधभयात् त्र्यहात्। कुशल चिकित्सक रूक्ष शरीर वाले तथा वातपीड़ित शरीर वाले मनुष्य के लिए प्रतिदिन स्नेहवस्ति दे सकता है और दूसरे लोगों को अग्निमांद्य के भय से तीसरे दिन वस्ति देना उचित है। स्नेह तथा निरूहवस्ति की प्रशंसा स्नेहोऽल्पमात्रो रूक्षाणां दीर्घकालमनत्ययः॥४०॥ तथा निरूहः स्निग्धानामल्पमात्रः प्रशस्यते।) रूक्ष मनुष्यों को अल्प मात्रा वाली स्नेहवस्ति का दीर्घ (लम्बे) काल (समय) तक सेवन करने पर भी हानिकारक नहीं होती और इसी प्रकार स्निग्ध मनुष्यों को अल्प मात्रा वाली निरूहणवस्ति भी प्रशस्त मानी जाती है। वक्तव्य—उक्त पद्य का तात्पर्य यह है कि आवश्यकतानुसार एक ही वस्ति एक से अधिक बार भी दी जा सकती है।

[दायाँ स्तम्भ] स्नेह-वस्ति के निकलने पर अथवा यस्य तत्कालं स्नेहो निर्याति केवलः॥४१॥ तस्यान्योऽन्यतरो देयो न हि स्निह्यत्यतिष्ठति। अथवा जिस मनुष्य का वस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह तत्काल अकेला ही निकल जाये, उसको दुबारा थोड़ा-सा स्नेह दे देना चाहिये, क्योंकि स्नेह के पक्वाशय में रुके बिना भली-भाँति स्नेहन नहीं होती। स्नेह-वस्ति के उपद्रव और प्रतिकार अशुद्धस्य मलोन्मिश्रः स्नेहो नैति यदा पुनः॥४२॥ तदा शैथिल्यमाध्मानं शूलं श्वासश्च जायते। पक्वाशये गुरुत्वं च तत्र दद्यान्निरूहणम्॥४३॥ तीक्ष्णं तीक्ष्णौषधैर्युक्ता फलवर्त्तिर्हिता तथा। यथानुलोमनं वायुर्मलः स्निग्धश्च जायते॥४४॥ तथा विरेचनं दद्यात् तीक्ष्णं नस्यं च शस्यते। जब अशुद्ध (जिसे शोधन नहीं दिया गया है) मनुष्य का स्नेह मल को लेकर नहीं निकलता है, तब उसको शिथिलता, अफरा, शूल, श्वास तथा पक्वाशय में भारीपन हो जाता है, ऐसी स्थिति में तीक्ष्ण द्रव्यों का निरूहण देना चाहिये अथवा तीक्ष्ण द्रव्यों की 'फलवर्ति' लाभप्रद होती है। इससे वायु का अनुलोमन (स्वमार्गगामी) और मल स्निग्ध हो जाता है। अतः तीक्ष्ण विरेचन और तीक्ष्ण नस्य का प्रयोग करना चाहिये। वक्तव्य—'फलवर्ति', बत्ती नाम से प्रसिद्ध ही इसका निर्माण स्नेह और क्षार के मिश्रण से किया जाता है। यह एलोपैथिक दवाखानों में मिलती है। यह नहाने के साबुन से भी तैयार की जा सकती है। इसे गुदद्वार में चढ़ा देने से तत्काल मल निकल जाता है और सम्बन्धित उपद्रव शान्त हो जाते हैं। फलवर्त्ति का विधान शा०सं०, उ०खं० अ० 7 श्लोक में देखें। उपद्रवहीन स्नेह-वस्ति यस्य नोपद्रवं कुर्यात् स्नेहवस्तिरनिःसृतः॥४५॥ सर्वोऽल्पो वा वृते रौक्ष्यादुपेक्ष्यः स विजानता। जिसको स्नेहवस्ति भीतर रह जाने पर भी शिथिलता आदि उपद्रवों को उत्पन्न न करे, भले ही रूक्षता के कारण सब की सब अथवा थोड़ी-बहुत भीतर रह गयी हो, उसकी उपेक्षा करे देनी चाहिये। वक्तव्य—तात्पर्य यह है कि वस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह यदि कुछ कष्ट न दें, तो उसके निकालने का प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती है।

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पञ्चमोऽध्यायः ] स्नेहवस्तिविधिः 235 स्नेह के न लौटने पर उपाय अनायातं त्वहोरात्रे स्नेहं संशोधनैर्हरेत् ।। 46 ।। स्नेहबस्तावनायाते नान्यः स्नेहो विधीयते। दिन-रात तक (24 घंटे) में यदि स्नेह न निकले तो उसे (दूसरे दिन) संशोधन (निरूहण अथवा फलवर्ति) द्वारा निकाल देना चाहिये, क्योंकि स्नेह के न निकलने पर दुबारा स्नेह देना उचित नहीं है। वक्तव्य—अनुवासन के पश्चात् निरूहण और निरूहण के पश्चात् अनुवासन का प्रयोग करना उचित तथा आवश्यक होता है। इसी अध्याय में ऊपर 35 से 38 तक के श्लोकों द्वारा कहा गया विषय भी इससे प्रमाणित होता है। स्नेह-वस्ति के लिए गुडूच्यादि तैल गुडूच्येरण्डपूतीकभार्ङ्गीवृषकरोहिषम् ।। 47 ।। शतावरीं सहचरं काकनासां पलोन्मिताम्। यवमाषातसीकोलकुलत्थान् प्रसृतोन्मितान् ।। 48 ।। चतुर्द्रोणेऽम्भसः पक्त्वा द्रोणशेषेण तेन च। पचेत् तैलाढकं पेष्यैर्जीवनीयैः पलोन्मितैः ।। 49 ।। अनुवासनमेतद्धि सर्ववातविकारनुत्। गिलोय, एरण्ड की जड़, पूतिकरञ्ज (डिठोरी) को छाल, भारंगी, अडूसा, रोहिषतृण, शतावर, कटसरैया तथा कौवाठोठी प्रत्येक द्रव्य एक-एक (4-4 तोला), जौ, उड़द, अलसी, बेर तथा कुलथी प्रत्येक द्रव्य एक-एक प्रसृत (8-8 तोला) लेकर कूट लें, फिर इन सबको चार द्रोण (51 से 16 तोला) जल में डालकर क्वाथ करें और एक द्रोण (12 सेर 64 तोला) शेष रहने पर छानकर ले लें, इसको एक आढक (3 सेर 16 तोला) तिलतैल में डाल दें तथा जीवनीयगण (देखें शा०सं०, म०खं०अ० 6) के द्रव्यो को एक-एक पल (4-4 तोला) लकर उनका कल्क बनाकर उसी तैल में डाल दें उसके बाद विधिपूर्वक पाक करें। इस तैल द्वारा दिया गया 'अनुवासन' सभी प्रकार के वातविकारों को नष्ट करता है। वक्तव्य—इस तेल के अभाव में नारायण तैल आदि दूसरे तैल अथवा एरण्ड तैल का भी अनुवासन दिया जा सकता है, जो लाभकर होता है। स्नेहपानादि उपचार—स्नेहपान, वमन, विरेचन, रक्तस्राव, तथा निरूहणवस्ति पश्चात् मनुष्य की कायाग्नि (जठराग्नि) मन्द हो जाती है, वह अल्प मात्रा वाले या लघु (हल्के) आहारों के उपयोग से उसी प्रकार बढ़ती है, जिस प्रकार लकड़ी के पतले या हल्के टुकड़ों के उपयोग से अग्नि बढ़ती है। तात्पर्य यह है कि स्नेहपानादि क्रियाओं के पश्चात् थोड़ा तथा हल्का भोजन करना चाहिये, क्योंकि अग्नि के ठीक रहने पर मनुष्य चिरकाल तक जीता है और उसके बिगड़ने पर वह रोगी हो जाते हैं या वह मर जाता है। इसलिये अग्नि ही बल कहा जाता है। धान्यशुण्ठी क्वाथ—जिसे स्नेहवस्ति दी गयी है, उसे दूसरे दिन प्रातःकाल धनियां तथा सौंठ से सिद्ध किया हुआ उष्ण जल पीने को देना चाहिये। इससे उसकी अग्नि दीप्त होती है और भोजन की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। वस्ति-फलश्रुति—जैसे मूल में सींचने से वृक्ष हरा-भरा हो जाता है, वैसे ही 'वस्ति' का प्रयोग करने से मनुष्य कान्तिमान् तथा बलवान् हो जाता है। वस्ति-सेवनक्रम—अकेली स्नेहवस्ति अथवा निरूहवस्ति का ही अत्यन्त सेवन नहीं करना चाहिये, क्योंकि स्नेहवस्ति के अति सेवन से मन्दाग्नि तथा उत्क्लेश (जी मिचलाना) हो सकता है और निरूहणवस्ति के अति सेवन से वायु के कोप होने का भय रहता है। अतः जिसे निरूहण दिया गया है, उसे अनुवासन करना चाहिये और जिसे अनुवासन दिया गया है, उसे निरूहण करना चाहिये। ऐसा करने से पित्त तथा कफ का कोप भी नहीं होता और वायु के कोप का भय भी नहीं रहता। वस्ति-व्यापत्तियाँ षट्सप्ततिव्यापदस्तु जायन्ते वस्तिकर्मणा ।। 50 ।। दूषितात् समुदायेन ताश्चिकित्स्यास्तु सुश्रुतात्। दूषित (विकृत) वस्तिकर्मों के कारण 76 प्रकार की व्यापत्तियाँ हो सकती हैं। उनकी चिकित्सा आचार्य सुश्रुत के कथनानुसार करनी चाहिये। वक्तव्य—शास्त्रोक्त विधि का ध्यान न देकर जो वस्तिकर्म किया जाता है, उससे कुछ हानियाँ भी हो सकती हैं। उनका विशिष्ट परिज्ञान सुश्रुत चिकित्सास्थान अध्याय 35 तथा 36 के अध्ययन से प्राप्त करें। पथ्यापथ्य-निर्देश पानाहारविहाराश्च परिहाराश्च कृत्स्नशः ।। 51 ।। स्नेहपानसमाः कार्या नात्र कार्या विचारणा। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे स्नेहवस्तिविधिः नाम पञ्चमोऽध्यायः ।। 5 ।। अनुवासन वस्ति में पान, आहार, विहार तथा परिहार

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236 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे


(परहेज) सब स्नेहपान के समान ही कहे गये हैं। इसमें सन्देह करने की कोई आवश्यकता नहीं है। वक्तव्य-गुद का दूसरा नाम 'पायु' है जिसका अर्थ है 'पिबति तैलं बस्त्यौषधं वा इति वायुः।' जो तैल अथवा वस्ति द्वारा दी हुई औषध को पी जाये, इससे प्रमाणित हो जाता है कि जिस प्रकार मुख से तैलादिक का सेवन (पान) करने पर हानि अथवा लाभ होता है, उसी प्रकार गुद या पायु से भी। इसीलिए पथ्यापथ्य भी उसी प्रकार का समझना चाहिये। वस्ति के विषय में अधिक परिज्ञान करने के लिए सु० चि० अ० 35 से 38 तक और चरकसंहिता का सिद्धिस्थान भी देखें।


इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्यादि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।। ५ ।।


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षष्ठोऽध्यायः

निरूहणवस्तिविधिः


[वाम स्तम्भ / Left Column]

निरूहण-वस्ति-परिचय निरूहवस्तिर्बहुधा भिद्यते कारणान्तरैः। तैरेव तस्य नामानि कृतानि मुनिपुङ्गवैः॥ 1 ॥ निरूहस्यापरं नाम प्रोक्तमास्थापनं बुधैः। स्वस्थानस्थापनाद्दोषाधातूनां स्थापनं मतम्॥ 2 ॥

कारण-भेद से निरूहवस्ति कई प्रकार का मानी जाती है और उन्हीं कारणों से आचार्यों ने उसके अनेक नाम भी रख दिये हैं। निरूहण का दूसरा नाम 'आस्थापन' है और इसका यह नाम दोष तथा धातुओं को अपने-अपने स्थान पर स्थापित कर देने के कारण रखा गया है।

वक्तव्य— व्यवहार के लिए अथवा उनकी विशेषताओं को सूचित करने के लिए एक वस्तु के अनेक नाम रख दिये जाते हैं, तदनुसार निरूहणवस्ति के भी विविध नाम निश्चित किये गये हैं। यथा—दोषहर, संशमन, शोधन, लेखन तथा पिच्छिलवस्ति।

निरूहण-वस्ति की मात्रा निरूहस्य प्रमाणं च प्रस्थं पादोत्तरं परम्। मध्यमं प्रस्थमुद्दिष्टं हीनं च कुडवास्त्रयः॥ 3 ॥

निरूहणवस्ति का उत्तम परिमाण सवा प्रस्थ (1 सेर), मध्यम एक प्रस्थ (64 तोला) तथा हीन परिमाण तीन कुड़व (48 तोला) कहा गया है।

वक्तव्य— यह उस द्रव्य का परिमाण या तौल है, जो उक्त वस्ति द्वारा गुद के भीतर पहुँचाया जाता है।

निरूहण के अयोग्य रोगी अतिस्निग्धोत्क्लिष्टदोषौ क्षतोरस्कः कृशस्तथा। आध्मानच्छर्दिहिक्कार्शःकासश्वासप्रपीडितः॥ 4 ॥ गुदशोफातिसारार्तो विषूचीकुष्ठसंयुतः। गर्भिणी मधुमेही च नास्थाप्यश्च जलोदरी॥ 5 ॥


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

जिसका शरीर अत्यन्त स्निग्ध है, जिसके दोष उत्क्लिष्ट (वमन द्वारा निकलने को) हों, जिसके उरःक्षत हों, जो कृश हों, जो आध्मान (अफरा), छर्दि (उलटी या कै), हिचकी, बवासीर, कास तथा श्वास से पीड़ित हो, जो गुद, शोथ तथा अतिसार से पीड़ित हो, जो विसूची (हैजा) तथा कुष्ठ से युक्त हो, गर्भवती (सात मास तक का गर्भ हो), मधुमेह का रोगी और जलोदर वाला रोगी, इनको आस्थापन या निरूहण वस्ति देना उचित नहीं है।

वक्तव्य— देखें—सुश्रुतसंहिता चि० अ० 35।

निरूहण-वस्ति के योग्य रोगी वातव्याधावुदावर्ते वातासृग्विषमज्वरे। मूर्च्छावृष्णोदरानहमूत्रकृच्छ्राश्मरीषु च॥ 6 ॥ वृद्धासृग्दरमन्दाग्निप्रमेहेषु निरूहणम्। शूलेऽम्लपित्ते हृद्रोगे योजयेद् विधिवद् बुधः॥ 7 ॥

वातव्याधि, उदावर्त, वातरक्त, विषमज्वर, मूर्च्छा, तृष्णा, उदररोग, अनाह, मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, बढ़े हुये रक्तप्रदर, मन्दाग्नि, प्रमेह, शूल, अम्लपित्त तथा हृदयरोगों में विधिपूर्वक निरूहणवस्ति का प्रयोग करना चाहिये।

वक्तव्य— निरूहणवस्ति देने का प्रकार भी वही है, जो पिछले अध्याय में अनुवासनवस्ति देने का निर्दिष्ट है।

निरूहण की विधि उत्सृष्टानिलविण्मूत्रं स्निग्धस्विन्नमभोजितम्। मध्याह्ने गृहमध्ये च यथायोग्यं निरूहयेत्॥ 8 ॥ स्नेहवस्तिविधानेन बुधः कुर्यान्निरूहणम्। जाते निरूहे च ततो भवेदुकटकासनः॥ 9 ॥ तिष्ठेन्मुहूर्तमात्रं तु निरूहागमनेच्छया। अनायातं मुहूर्तं तु निरूहं शोधनैर्हरेत्॥ 10 ॥ निरूहैरेव मतिमान् क्षारमूत्राम्लसैन्धवैः।

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यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं शुद्ध पाठ (line-by-line transcription) प्रस्तुत है:

[पृष्ठ शीर्ष] 238 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे


[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]

पहले आवश्यकतानुसार स्नेहन-स्वेदन कराकर और अपानवायु, पुरीष तथा मूत्र का परित्याग कराकर तथा भोजन न कराकर रोगी को दोपहर वस्ति के समय पर घर (एकान्त) में निरूहणवस्ति देना उचित है। अनुवासनवस्ति के समान ही निरूहणवस्ति का प्रयोग किया जाता है। निरूहणवस्ति का प्रयोग हो जाने पर उत्कटक आसन (जैसे शौच करते समय बैठा जाता है) से बैठ जाना उचित है और निरूहणवस्ति द्वारा किये हुये द्रव्य के निकलने की प्रतीक्षा करते हुये (इच्छाशक्ति का प्रभाव डालता हुआ) दो घड़ी तक बैठा रहे, यदि दो घड़ी में निरूहण द्रव न निकले तो विद्वान् चिकित्सक उस (निरूहण) को क्षार, मूत्र, अम्ल (काँजी आदि) तथा सेंधा नमक के घोल से बने हुये शोधन निरूहों का प्रयोग करके निकाल दें। **निरूहण के उपद्रव—**विकृत वायु द्वारा अवरुद्ध अतएव अधिक समय तक रुका हुआ निरूहण द्रव उदर में शूल, बेचैनी, ज्वर, आनाह तथा मृत्यु को उत्पन्न कर सकता है। **सावधानी—**भोजन के पश्चात् तत्काल निरूहण का प्रयोग करना उचित नहीं है, क्योंकि इससे विसूची, छर्दि अथवा वात आदि दोषों का प्रकोप हो सकता है। अतः भोजन किये बिना ही निरूहण का प्रयोग करें, यह निश्चित मत है। रोगी तथा रोग आदि की सभी अवस्थाओं (दशाओं) में निरूहण किया जा सकता है, क्योंकि मल निकल जाने पर दोषों का बल क्रमशः घट जाता। सुनिरूढ के लक्षण यस्य क्रमेण गच्छन्ति विट्पित्तकफवायवः ।। ११ ।। लाघवं चोपजायेत सुनिरूढं तमादिशेत्। जिस रोगी के पुरीष, पित्त, कफ तथा वायु क्रमशः निकल जायें और शरीर में हल्कापन उत्पन्न हो जायें, उसको 'सुनिरूढ' (अर्थात् उसको उत्तम प्रकार से निरूहणवस्ति का लाभ प्राप्त हो चुका है) समझना चाहिये। दुर्निरूढ के लक्षण यस्य स्याद् वस्तिरल्पाल्यवेगो हीनमलानिलः ।। १२ ।। मूर्च्छार्त्तिजाड्यारुचिमान् दुर्निरूढं तमादिशेत्। जिसका वस्ति द्वारा दिया हुआ द्रव बहुत थोड़ा-थोड़ा निकले, उसके साथ मल तथा वायु भी बहुत थोड़ी निकले और रोगी को मूर्च्छा, पीड़ा, सुस्ती तथा अरुचि हो जाये तो उसको 'दुर्निरूढ' समझना चाहिये।


[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]

**अतिनिरूढ के लक्षण—**विरेचन का अतियोग होने पर जो लक्षण इसी (शा०सं०, उ०खं०अ० ५) में कहे गये हैं, वे सब लक्षण निरूहणवस्ति का अतियोग होने पर भी होते हैं। **आस्थापन तथा निरूहण का प्रयोग—**भली भाँति ज्ञान (मूर्च्छादि का दूर होना), मन की प्रसन्नता, शरीर का स्निग्ध होना, रोगों का नाश, ये सब आस्थापन (निरूहण) तथा अनुवासन-वस्ति के समुचित प्रयोग का लक्षण है। दोषभेद से वस्ति-विधान—सस्नेह एकः पवने पित्ते द्वौ पयसा सह। कषायकटुरूक्षाद्याः कफे कोष्णास्त्रयो हिताः'।। वायु की प्रधानता में स्नेहमिश्रित एक वस्ति पित्त की प्रधानता में दुग्धमिश्रित दो वस्तियाँ और कफ की प्रधानता में कषायरस युक्त त्रिफला आदि कटुरस युक्त क्षार आदि तथा रूक्ष द्रव्यों से मिश्रित कुछ गर्म-गर्म तीन वस्तियाँ लाभदायक होती हैं। **दोष-भेद से भोजन-व्यवस्था—**इसके पश्चात् सुनिरूढ प्राणी को स्नान कराकर पित्त, कफ तथा वायु से पीड़ित प्राणी को क्रमशः दूध, यूष तथा मांस रस के साथ उचित भोजन खिलाये अथवा सभी को विकाररहित जाङ्गल (हरिण आदि) प्राणियों के मांभरस के साथ भोजन खिलाये और दोष तथा जठराग्नि का विचार कर भोजन की मात्रा त्रिभागहीन (सेर भर खाने वाले को एक पाव), आधा (सेर भर खाने वाले को आधा सेर) और हीन मात्रा (सेर भर खाने वाले को तीन पाव) होनी चाहिये तथा इसके पश्चात् उसी दिन यथायोग्य स्नेहवस्ति का प्रयोग भी करना चाहिये। **विशेष वक्तव्य—**जिस दिन निरूहणवस्ति दी जाती है, उस दिन वातदोष का अधिक भय रहता है। इस कारण उस दिन खाने के लिए मांभरस तथा भात देना उचित है और अनुवासन वस्ति का प्रयोग भी अत्यावश्यक है। फिर जठराग्नि के बल तथा वायु की गति का विचार कर भोजन द्वारा जठराग्नि के बलवान् हो जाने पर आवश्यकतानुसार स्नेह-वस्ति का प्रयोग करना चाहिये। एकाधिक वस्तियों का विधान अनेन विधिना युञ्ज्यान्निरूहं वस्तिदानवित् ।। १३ ।। द्वितीयं वा तृतीयं वा चतुर्थं वा यथोचितम्। वस्ति देने में कुशल चिकित्सक इसी विधि से आवश्यकतानुसार दूसरी तीसरी अथवा चौथी निरूहणवस्ति का प्रयोग कर सकता है। **वक्तव्य—**जिस प्रकार आवश्यकतानुसार एक से अधिक

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षष्ठोऽध्यायः] निरूहणवस्तिविधिः 239 [वाम स्तम्भ / Left Column] भी अनुवासन वस्तियाँ दी जाती हैं, उसी प्रकार निरूहण वस्तियाँ भी एक से अधिक दी जा सकती हैं। सम्यक् निरूढ में 'विविक्तता, मनुस्तुष्टि' आदि लक्षण दिखलायी पड़ने पर वस्ति-विधान रोक देना चाहिये। वस्ति का हीनक्रम, हीनयोग भले ही करें, किन्तु अतियोग न हो। विशेषता सुकुमारों के लिये तो हीनक्रम ही हितकर होता है। दोषभेद से भोजन-व्यवस्था पित्तश्लेष्मानिलाविष्टं क्षीरयूषरसैः क्रमात् ।। 14 ।। निरूढं भोजयित्वा च ततस्तमनुवासयेत् । पित्त, कफ तथा वायु से पीड़ित, निरूढ़ (जिसे निरूहवस्ति दी गयी है) मनुष्य को क्रमशः दूध, यूष तथा मांसरस (शोरवा) के साथ भोजन कराकर फिर अनुवासनवस्ति देनी चाहिये। सुकुमारादि के लिए वस्ति सुकुमारस्य वृद्धस्य बालस्य च मृदुहिंतः ।। 15 ।। वस्तिस्तीक्ष्णः प्रयुक्तस्तु तेषां हन्याद् बलायुषी । सुकुमार, वृद्ध तथा बालक को मृदुवस्ति लाभदायक होती है। तीक्ष्णवस्ति का प्रयोग उनके बल तथा आयु को नष्ट कर देता है। वस्तियों का क्रम दद्यादुत्क्लेशनं पूर्वं मध्ये दोषहरं ततः ।। 16 ।। पश्चात् संशमनीयं च दद्याद् वस्तिं विचक्षणः। कुशल चिकित्सक पहले 'उत्क्लेशन' (दोषों को उभारने वाली) वस्ति का बीच में 'दोषहर' (शोधनकारक) वस्ति का और अन्त में 'संशमनीय' वस्ति का प्रयोग करें। उत्क्लेशन-वस्ति एरण्डबीजं मधुकं पिप्पली सैन्धवं वचा ।। 17 ।। हपुषा फलकल्कञ्च वस्तिरुत्क्लेशनः स्मृतः । एरण्ड के बीज, मुलेठी, पीपल, सेंधा नमक, वच तथा हाऊबेर-इन द्रव्यों का कल्क मिलाकर जो वस्ति दी जाती है, उसे 'उत्क्लेशन' कहा जाता है। दोषहर-वस्ति शताह्वा मधुकं बिल्वं कौटजं फलमेव च ।। 18 ।। सकाञ्जिकः सगोमूत्रो वस्तिर्दोषहरः स्मृतः। सौंफ, मुलेठी, बेलगिरी, इन्द्रजौ, काँजी तथा गोमूत्र के मिश्रण से जो वस्ति दी जाती है, उसे 'दोषहर' कहा जाता है। [दक्षिण स्तम्भ / Right Column] शोधन-वस्ति शोधनद्रव्यनिष्क्वाथैस्तत्कल्कैः स्नेहसैन्धवैः ।। 19 ।। युक्त्या खजेन मथिता बस्तयः शोधनाः स्मृताः । शोधन द्रव्यों के क्वाथ तथा कल्क, स्नेह (तेल) तथा सेंधा नमक इन सबको एक साथ मिलाकर और मथानी से मथकर 'शोधन' वस्तियाँ तैयार कर ली जाती हैं। वक्तव्य-शोधन द्रव्य इस प्रकार हैं-दन्ती, त्रिफला, पठानीलोध, जवाखार, सेहुण्ड (थूहर), शंखिनी, अमलतास, कबीला, चोक तथा दूध आदि। शमन-वस्ति प्रियङ्गु मधुकं मुस्ता तथैव च रसाञ्जनम् ।। 20 ।। सक्षीरः शस्यते वस्तिर्दोषणां शमनः स्मृतः। प्रियंगु, मुलेठी, नागरमोथा, रसवंत तथा दूध का घोल बनाकर जो वस्ति दी जाती है, उसे 'शमन' (दोषों को शान्त करने वाली) कहा जाता है। लेखन-वस्ति त्रिफलाक्वाथगोमूत्रक्षौद्रक्षारसमायुताः ।। 21 ।। ऊषकादिप्रतीवापैर्बस्तयो लेखनाः स्मृताः। त्रिफला का क्वाथ, गोमूत्र, मधु तथा क्षार का घोल तैयार करके और उसमें ऊषकादिगण (देखें-शा० सं० म० खं० अ० 2) का प्रक्षेप मिलाकर जो वस्तियाँ दी जातीं हैं, उनको 'लेखन' कहा जाता है। बृंहण-वस्ति बृंहणद्रव्यनिष्क्वाथाः कल्कैर्मधुरकैर्युताः ।। 22 ।। सर्पिर्मांसरसोपेता बस्तयो बृंहणाः स्मृताः। बृंहण द्रव्यों (जीवनीयगण तथा अश्वगन्धा, शतावरी आदि) के क्वाथ में मधुर द्रव्यों (द्राक्षा, खजूर तथा इस प्रकार के मधुर द्रव्य) का कल्क तथा घृत और मांसरस मिलाकर जो बस्तियाँ दी जाती हैं, उनको 'बृंहण' (शरीर को पुष्ट करने वाला) कहा जाता है। पिच्छिल-वस्ति बदर्यैरावतीशेलुशाल्मलीधन्वनागराः ।। 23 ।। क्षीरसिद्धाः क्षौद्रयुक्ता नाम्ना पिच्छिलसंज्ञिताः । अजोरभ्रैणरुधिरैर्युक्ता देया विचक्षणैः ।। 24 ।। मात्रा पिच्छिलबस्तीनां पलैर्द्वादशभिर्मता । बेरी के पत्ते, नागबला (गंगेरन) के पत्ते, लिसोड़ा के पत्ते या फल, सेमल के फूल, धामिन के पत्ते तथा नागरमोथा- इन सब द्रव्यों को क्षीरपाक-विधि (देखें-शा०सं०, म०खं०

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240 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे अ० २ श्लोक 161) से दूध में पकाकर और उसमें मधु मिलाकर जो वस्ति दी जाती है, उसे 'पिच्छिलवस्ति' कहा जाता है। इसमें बकरा, भेड़ा तथा हरिण का रक्त भी मिलाया जाता है। 'पिच्छिलवस्ति' की मात्रा 12 पल (48 तोला) की मानी जाती है। **वक्तव्य-**इसमें वे द्रव्य डाले जाते हैं, जो पिच्छिल या चिपचिपाहट वाले या लुआबदार हों। यह गुदा के दाह, क्षत तथा रक्तातिसार में बहुत अधिक लाभ करती है। प्रमाणानुसार द्रव्यमिश्रण-विधि दत्त्वादौ सैन्धवस्याक्षं मधुनः प्रसृतिद्वयम् ।। 25 ।। विनिर्मथ्य ततो दद्यात् स्नेहस्य प्रसृतित्रयम् । एकीभूते ततः स्नेहे कल्कस्य प्रसृतिं क्षिपेत् ।। 26 ।। सम्मूर्च्छिते कषायं तु चतुःप्रसृतिसम्मितम् । क्षिप्त्वा विमथ्य दद्याच्च निरूहं कुशलो भिषक् ।। 27 ।। किसी बड़े पात्र में पहले एक तोला सेंधा नमक (पीसा हुआ) डाले और फिर उसमें दो प्रसृति (4 पल) मधु डालकर भली-भाँति मथकर तीन प्रसृति स्नेह उसमें डाल दें। उसे मथकर मिला दें, तत्पश्चात् एक प्रसृति कल्क डालकर मिला दें, फिर चार प्रसूति कषाय मिला दें, अन्त में दो प्रसृति आवाप (दूध तथा काँजी आदि) मिलायें, इस प्रकार बनायी हुई वस्ति का कुशल चिकित्सक प्रयोग करे। यह 'द्वादश- प्रसृतवस्ति' कहलाती है। दोष-भेद से स्नेह, मधु का प्रमाण वाते चतुष्पलं क्षौद्रं दद्यात् स्नेहस्य षट्पलम् । पित्ते चतुष्पलं क्षौद्रं स्नेहं दद्यात् पलत्रयम् ।। 28 ।। कफे च षट्पलं क्षौद्रं क्षिपेत् स्नेहं चतुष्पलम् । उक्त द्वादशप्रसृतिवस्ति में वात की अधिकता में मधु चार पल और स्नेह 6 पल, पित्त की अधिकता में मधु चार पल और स्नेह 3 तथा कफ की अधिकता में मधु 6 पल और स्नेह 4 पल डालना चाहिये। माधुतैलिक-वस्ति एरण्डक्वाथतुल्यांशं मधु तैलं पलांशकम् ।। 29 ।। शतपुष्पापलार्धेन सैन्धवार्धेन संयुतम् । मधुतैलकसंज्ञोऽयं वस्तिः खजविलोडितः ।। 30 ।। मेदोगुल्मकृमिप्लीहमलोदावर्त्तनाशनः । बलवर्णकरश्चैव वृष्यो दीपनबृंहणः ।। 31 ।। एरण्ड क्वाथ 8 पल, मधु 4 पल, तैल 4 पल, सौंफ तीन कर्ष, सैन्धव-लवण 1 कर्ष और मैनफल 1 नग सबको मिलाकर मथानी से मथकर, कुछ गर्म करके वस्ति देनी चाहिये। इसका नाम 'माधुतैलिक' वस्ति है। यह मेदोदोष, गुल्म, कृमि, प्लीहा, मलजनित उदावर्त्त को नष्ट करती है, बल तथा वर्ण को बढ़ाती है। यह वृष्य और दीपन-पाचन है। **वक्तव्य-**राजाओं, राजाओं जैसे तथा बड़े लोगों, नारियों, सुकुमारों, बालकों तथा बूढ़ों के दोषों को निकालने के लिए बल-वर्ण की वृद्धि के लिए 'माधुतैलिक' वस्तियों का संक्षेप से उपदेश किया गया है। इनमें यात्रा, स्त्री-सेवा, भोजन और पान का कोई नियम नहीं है। इसका फल बहुत अधिक देखा जाता है। व्यापत्तियाँ भी नहीं होतीं, इसका प्रयोग इच्छानुसार किया जा सकता है। इस वस्ति की मात्रा 9 प्रसृत (18 पल) होनी चाहिये। देखें-सु०चि०अ० 3 श्लोक 100 की डल्हण- व्याख्या। दीपन-वस्ति क्षौद्राज्यक्षीरतैलानां प्रसृतिः प्रसृतं भवेत् । हपुषासैन्धवाक्षांशो वस्तिः स्याद् दीपनः परः ।। 32 ।। मधु, घृत, दुग्ध तथा तैल प्रत्येक एक-एक प्रसृत (2-2 पल) और हाऊबेर तथा सेंधा नमक एक-एक अक्ष (1-1 तोला) मिलाकर जो वस्ति दी जाती है, वह परम दीपन या अग्निवर्धक है। इसका नाम 'दीपन-वस्ति' है। युक्तरथ-वस्ति एरण्डमूलनिष्क्वाथो मधु तैलं ससैन्धवम् । एष युक्तरथो वस्तिः सवचापिप्पलीफलः ।। 33 ।। एरण्ड की जड़ का क्वाथ, मधु तैल तथा सेंधा नमक मिलाकर और वच, पीपल तथा मैनफल का प्रक्षेप डालकर जो वस्ति दी जाती है, उसका नाम 'युक्तरथ' है। **वक्तव्य-**रथ, हाथी तथा घोड़े की सवारी करते समय भी इस वस्ति का प्रयोग किया जा सकता है। अतः इसका नाम 'युक्तरथ' है। देखें-सु० चि० अ० 38। उक्त वस्तुओं का परिमाण का निश्चय शास्त्रानुसार करें। सिद्ध-वस्ति पञ्चमूलस्य निष्क्वाथस्तैलं मागधिका मधु । ससैन्धवः समधुकः सिद्धवस्तिरिति स्मृतः ।। 34 ।। बिल्वादि पञ्चमूल का क्वाथ, तैल, पीपल, मधु, सेंधा नमक तथा मुलेठी को मिलाकर जो वस्ति दी जाती है, उसे 'सिद्धवस्ति' कहा जाता है।

वक्तव्य-बल, पुष्टि तथा वर्ण की सिद्धि (प्राप्ति) तथा

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षष्ठोऽध्यायः ] निरूहणवस्तिविधिः 241 वक्तव्य-बल, पुष्टि तथा वर्ण की सिद्धि (प्राप्ति) तथा सैकड़ों रोगों की सिद्धि (विनाश) करने के कारण इसे 'सिद्धवस्ति' कहा जाता है। देखें-सु० चि० अ० 38। मुस्तादि-वस्ति-नागरमोथा, पाठा, गिलोय, कुटकी, बला, रास्ना, पुनर्नवा, मजीठ, अमलतास, खस, त्रायमाणा और गोखरू 1-1 पल, लघुपञ्चमूल 1-1 पल, मैनफल 8 नग सबको 4 सेर जल में पकायें, चतुर्थांश शेष रहने पर 1 सेर दूध डालकर पकायें। जब केवल दूध मात्र शेष रह जाये तो उसमें 1 पाव मांसरस, मधु और घृत 1-1 पल, सौंफ, प्रियंगु, मुलेठी, कुरैया की छाल, रसवत तथा सैन्धवलवण 1-1 तोला कल्क बनाकर और सबको मिलाकर वस्ति दें। यह वातरक्त, मोह, सूजन, अर्श, गुल्म, मूत्राघात, विसर्प, ज्वर, मलभेद और रक्तपित्त को नष्ट करती है, यह बलवर्द्धक, सञ्जीवन, वीर्यवर्द्धक, नेत्ररक्षक और शूलनाशक है। यह 'मुस्तादि-वस्ति' सभी वस्तियों का राजा है। वस्ति-कल्पना-बुद्धिमान् चिकित्सक अपनी बुद्धि द्वारा औषधों के प्रभाव को तथा रोग की स्थिति को विचार कर इस निम्नलिखित 'बीज' अर्थात् निर्देश से सैकड़ों वस्तियों की रचना कर सकता है। त्रिदोषहर-वस्तियाँ-वातनाशक औषधों के क्वाथ, सैन्धव लवण, निसोत, काँजी आदि अम्ल द्रव्यों से युक्त कुछ गर्म-गर्म वस्तियों का प्रयोग वायु-विकारों में करना चाहिये। न्यग्रोधादिगण के क्वाथ काकोल्यादिगण से युक्त घी तथा मिश्री मिलाकर वस्तियों का प्रयोग पित्त-विकारों में करना चाहिये। वक्तव्य-उक्त गण क्रमशः शा०सं०म०खं०अ० 2 तथा अ० 6 में देखें। आरग्वधादि-गण के क्वाथ पिप्पल्यादिगण से युक्त मधु तथा गोमूत्र पिलाकर वस्तियों का प्रयोग कफ- विकारों में करना चाहिये। रक्तविकार-वस्ति-बरगद आदि क्षीरीवृक्षों के क्वाथ, मिश्री, ईख का रस, दूध और घी मिलाकर ठण्डी-ठण्डी वस्तियों का प्रयोग रक्तजनित विकारों में करना चाहिये। निरूहण-वस्ति में पथ्यापथ्य स्नान मुष्णोदकैः कुर्याद् दिवास्वप्नमजीर्णताम्। वर्जयेदपरं सर्वमाचरेत् स्नेहवस्तिवत् ।। 35 ।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे निरूहणवस्तिविधिः नाम षष्ठोऽध्यायः ।। 6 ।। निरूहणवस्ति के सेवन-कर्ता को उष्ण जल से स्नान करना चाहिये और दिन में सोना, अजीर्ण का परित्याग तथा शेष सभी स्नेहवस्ति के समान आचार रखना चाहिये। वक्तव्य-इस विषय को समझने के लिए सु० चि० अ० 38 अवश्य देखें। इस विषय से सम्बन्धित अधिकांश पाठ इस प्रकरण में वहीं से उद्धृत किये गये हैं। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का छठा अध्याय समाप्त ।। 6 ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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सप्तमोऽध्यायः उत्तरवस्तिविधिः


[स्तम्भ १ / Column 1]

उत्तरवस्ति-विधान अतः परं प्रवक्ष्यामि वस्तिमुत्तरसंज्ञितम्। द्वादशाङ्गुलकं नेत्रं मध्ये च कृतकर्णिकम् ।। १ ।। मालतीपुष्पवृन्ताभं छिद्रं सर्षपसन्निभम्। अनुवासन तथा निरूहणवस्ति के पश्चात् 'उत्तरवस्ति' का विधि लिखी जायेगी। इसका नेत्र (नली) बारह अंगुल लम्बा होता है और इस (नेत्र) के मध्य में (अर्थात् छः अंगुल पर) कर्णिका बनायी जाती है। इसी कर्णिका पर वस्ति (थैली) बाँधी जाती है। यह नेत्र मालती के फूल के वृन्त (मूलभाग) के सदृश मोटा होना चाहिये और उसमें सरसों के बीज के आने-जाने योग्य छिद्र होना चाहिये। वक्तव्य- जो वस्ति पुरुषों के मूत्रमार्ग में तथा स्त्रियों के भग (गर्भ) मार्ग में दी जाती है, उसका नाम 'उत्तरवस्ति' है। इसमें वस्ति या औषध भरने की थैली वही प्रयुक्त होती है, जो पूर्वोक्त वस्तियों में कही गयी है। देखें—सु० चि० अ० ३८। १००-१०१।

वस्ति-मात्रा-निर्धारण पञ्चविंशतिवर्षाणामधो मात्रा द्विकार्षिका ।। २ ।। तदूर्ध्वं पलमात्रा च स्नेहस्योक्ता भिषग्वरैः। विद्वान् चिकित्सक उत्तरवस्ति में स्नेह की मात्रा २५ वर्ष के नीचे दो कर्ष (२ तोला) तथा उसके ऊपर एक पल (४ तोला) मानते हैं।

पुरुषों में वस्ति-प्रयोग-विधि अथास्थापनशुद्धस्य तृप्तस्य स्नानभोजनैः ।। ३ ।। स्थितस्य जानुमात्रे च पीठेऽन्विष्यशलाकया। स्निग्धया मेढ्रमार्गे च ततो नेत्रं नियोजयेत् ।। ४ ।। शनैः शनैर्घृताभ्यक्तं मेढ्ररन्ध्रेऽङ्गुलानि षट्। ततोऽवपीडयेद् बस्तिं शनैर्नेत्रं च निर्हरेत् ।। ५ ।। ततः प्रत्यागते स्नेहे स्नेहवस्तिक्रमों हितः।


[स्तम्भ २ / Column 2]

आस्थापन (निरूहण) द्वारा शुद्ध होने के पश्चात् और उचित स्नान तथा भोजनों के सेवन से बलवान् हो जाने पर रोगी को जानुभर ऊँचे पीठ (पीढ़े या कुर्सी) पर बैठा दें और मूत्रमार्ग में स्निग्ध (स्नेहलिप्त) तथा श्लक्ष्ण सलाई द्वारा अन्वेषण कर अर्थात् उसमें इसे प्रविष्ट करने के पश्चात् नेत्र का प्रयोग करें। इस नेत्र को घी लगाकर चिकना कर लेना चाहिये और मूत्रमार्ग में बहुत धीरे-धीरे छः अंगुल (कर्णिका) तक चढ़ा दें, इसके पश्चात् वस्ति का पीड़न करें (औषध को मूत्राशय में पहुँचा दें), फिर धीरे-धीरे नेत्र को निकाल लें। इसके थोड़ी देर बाद स्नेह के लौट आने पर स्नेहवस्ति का क्रम उत्तम माना जाता है। वक्तव्य- उक्त पाठ के नीचे इस श्लोक को भी जोड़ना चाहिये—'भोजयेत् पयसा मात्रां यूषेणाथ रसेन वा। अनेन विधिना दद्यात् वस्तींस्त्रींश्चतुरोऽपि वा।।' (सु०चि०अ० ३७.११३)।

स्त्रियों में वस्ति-प्रयोग-विधि स्त्रीणां कनिष्ठिकास्थूलं नेत्रं कुर्याद् दशाङ्गुलम् ।। ६ ।। मुद्गप्रवेशयोग्यं च योन्यन्तश्चतुरङ्गुलम्। द्व्यङ्गुलं मूत्रमार्गे च सूक्ष्मं नेत्रं नियोजयेत् ।। ७ ।। स्त्रियों के लिए नेत्र दस अंगुल लम्बा तथा कनिष्ठिका अंगुली के समान मोटा होना चाहिये और इसका छिद्र मूँग के आने-जाने योग्य होना चाहिये। यह नेत्र योनि (भग) में चार अंगुल प्रविष्ट कराया जाता है और स्त्रियों के मूत्रमार्ग में सूक्ष्म नेत्र (जो प्रथम श्लोक द्वारा कहा गया है) केवल दो अंगुल प्रविष्ट कराया जाता है। वक्तव्य- मूत्रमार्ग में प्रयुक्त किये जाने वाले नेत्र में मूल से चार अंगुल पर कर्णिका बनानी चाहिये।

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सप्तमोऽध्यायः ] उत्तरवस्तिविधिः 243


बालकों में वस्ति-प्रयोग-विधि

मूत्रकृच्छ्रविकारेषु बालानां त्वेकमङ्गुलम् । शनैर्निष्कम्पमाधेयं सूक्ष्मं नेत्रं विचक्षणैः ।। 8 ।।

मूत्रकृच्छ्र आदि मूत्ररोगों में बालिकाओं के मूत्रमार्ग में केवल एक अंगुल नेत्र (जो उक्त मालतीपुष्पवृन्त से भी पतला हो) धीरे-धीरे कम्पनरहित प्रविष्ट कराना चाहिये।


विशेष मात्रा-निर्देश

योनिमार्गेषु नारीणां स्नेहमात्रा द्विपलिकी। मूत्रमार्गे पलोन्माना बालानां च द्विकार्षिकी ।। 9 ।।

स्त्रियों के योनिमार्ग में दी जाने वाली वस्ति में स्नेह की मात्रा दो पल (8 तोला) और मूत्रमार्ग द्वारा दी जाने वाली वस्ति में एक पल (4 तोला) की मात्रा दी जाती है और वही बालिकाओं के मूत्रमार्ग में दो कर्ष (2 तोला) दी जाता है।

वक्तव्य—बालिकाओं का गर्भमार्ग योनिच्छद से अवरुद्ध रहता है और गर्भाशय अपुष्ट रहता है, अतः उसमें वस्ति प्रयोग की सम्भवतः आवश्यकता ही नहीं पड़ती, किन्तु देखा जाता है कि दैवदुर्विपाक से बालिकाओं के भी योनिमार्ग में रोग हो जाते हैं। जैसे—श्वेतद्रव का बहना, माता-पिता के दोष से आतशक के व्रणों का हो जाना तथा कण्डू आदि का उत्पन्न होना। इन दशाओं में प्रक्षालन आदि की आवश्यकता अवश्य पड़ सकती है।


स्त्रियों में वस्ति-प्रयोग-विधि

उत्तानायै स्त्रियै दद्यादूर्ध्वजान्वै विचक्षणः । अप्रत्यागच्छति भिषग्वस्तावुत्तरसंज्ञिते ।। 10 ।। भूयो बस्तिं निदध्याच्च संयुक्तैः शोधनैर्गणैः। फलवर्तिं निदध्याद् वा योनिमार्गे दृढां भिषक् ।। 11 ।। सूत्रैर्विनिर्मितां स्निग्धां शोधनद्रव्यसंयुताम्। दह्यमाने तथा बस्तौ दद्याद् वस्तिं विशारदः ।। 12 ।। क्षीरिवृक्षकषायेण पयसा शीतलेन वा। वस्तिः शुक्ररुजः पुंसां स्त्रीणामात्तर्वजां रुजम् ।। 13 ।। हन्यादुत्तरवस्तिस्तु नोचितो मेहिनां क्वचित्।

स्त्री को लेटाकर तथा उसके जानुओं (घुटनों) को संकुचित कराकर (मोड़कर) विद्वान् चिकित्सक उत्तरवस्ति का प्रयोग करें। यदि एक मुहूर्त (दो घड़ी) तक उत्तरवस्ति द्वारा दिया गया स्नेह न निकले तो फिर चिकित्सक शोधन-द्रव्यों द्वारा प्रस्तुत की हुई निरूहण-वस्ति का प्रयोग करे अथवा योनिमार्ग में फलवर्त्ति का प्रयोग करें। यह फलवर्त्ति (बत्ती) सूत से या कपड़े से बनी हुई, स्नेह से स्निग्ध विरेचनीय स्नेह द्रव्यों से सनी हुई तथा दृढ़ होनी चाहिये। यदि वस्ति के प्रयोग से दाह उत्पन्न हो जाये तो विद्वान् चिकित्सक क्षीरिवृक्षों (बरगद, गूलर आदि) की छाल के क्वाथ से अथवा शीतल जल से वस्ति दें। उत्तर-वस्ति मनुष्यों के शुक्र सम्बन्धी रोगों को तथा स्त्रियों के आर्तव सम्बन्धी रोगों को नष्ट करती है, किन्तु प्रमेह से पीड़ित पुरुषों तथा स्त्रियों को कभी भी उचित नहीं है।

वक्तव्य—स्त्रियों में उत्तरवस्ति का प्रयोग पुरुष-चिकित्सक को कभी भी नहीं करना चाहिये, यह कार्य नर्स, दाई या लेडी-डाक्टर द्वारा ही कराना चाहिये। ग्रन्थकार ने जो यहाँ 'विचक्षणः' शब्द का प्रयोग किया है, वह केवल चिकित्सा-व्यवस्था देने तक के लिये ही है। परिचारक तथा परिचारिका के अपने-अपने स्वतन्त्र विभाग होते हैं, तदनुसार वे अपने विभागों का कार्य स्वयं किया करते हैं।


फलवर्त्ति-प्रयोग-विधि

'फलवर्त्तिं निदध्याद्वा शोधनद्रव्यसम्भृताम् । प्रवेशयेद् वा मतिमान् वस्तिद्वारमथैषणीम् ।। पीडयेद् वाप्यधोनाभेर्बलेनोत्तरमुष्टिना । आरग्वधस्य पत्रेषु निर्गुण्ड्याः स्वरसेषु च ।। कुर्याद् गोमूत्रपिष्टेषु वर्त्तीर्वापि ससैन्धवाः । मुद्गैलाः सर्षपसमाः प्रविभज्य वयांसि तु ।। वस्तेरागमनार्थाय ता निदध्याच्छलाकया। आगारधूमबृहतीपिप्पलीफलसैन्धवैः ।। कृता वा शुक्तगोमूत्रसुरापिष्टैः सनागरैः । अनुवासनसिद्धिं च वीक्ष्य कर्म प्रयोजयेत् ।।'

अर्थात् यदि मूत्रमार्ग में दी गयी वस्ति समय पर स्वयं न लौटे, तो वस्तिद्वार में या मूत्रमार्ग में शोधन-द्रव्यों (आरग्वधादि) द्वारा बनायी हुई 'फलवर्त्ति' का प्रयोग करें, अथवा एषणी (शलाका) का प्रयोग करें अथवा मुट्ठी से बलपूर्वक नाभि के नीचे (पेडू को) दबायें।

फलवर्त्ति-निर्माण-विधि—अमलतास के पत्तों को थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर निर्गुण्डी के स्वरस तथा गोमूत्र में पीसकर मूँग, इलायची, सरसों जैसी बत्तियाँ बनाकर रोगी या रोगिणी के वयस् (बाल्य, यौवन तथा वार्द्धक्य) का विचार करके वस्ति-द्रव्य के लौटने के लिए सलाई की सहायता से मूत्रमार्ग में प्रवेश कराये अथवा गृहधूम, बनभण्टा के फल, पीपल, मैनफल, सेंधा नमक तथा सोंठ का सिरका, गोमूत्र तथा मद्य में पीसकर उक्त प्रकार की बत्तियाँ बनाकर उक्त प्रकार से मूत्रमार्ग में चढ़ाये। यह सब चिकित्सा-क्रम अनुवासन-वस्ति की सिद्धि (सफलता) को ध्यान में रखकर प्रयोग करना चाहिये।

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244 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे

लक्षण-समन्वय | इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां सम्यग्दत्तस्य लिङ्गानि व्यापदः क्रम एव च ।। 14 ।। | शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे उत्तरवस्तिविधिर्नाम बस्तेरुत्तरसंज्ञस्य समानं स्नेहवस्तिना। | सप्तमोऽध्यायः ।। 7 ।। उत्तर-वस्ति का सम्यक् योग तथा व्यापत्तियों (हीनयोग, | गुद में घी लगाकर रोगी के अँगूठे के समान मोटी और मिथ्यायोग तथा अतियोग से उत्पन्न होने वाले उपद्रवों) के | लम्बी वर्त्ति (बत्ती) चढ़ायी जाती है। इसका प्रयोग रुके हुये लक्षण तथा उनकी चिकित्सा स्नेह-वस्ति के ही समान होती | मल को निकालने के लिए किया जाता है, इसका नाम है। | 'मलप्रवर्तिनीवर्ति' तथा 'फलवर्त्ति' है। फलवर्ति का नामभेद | वक्तव्य-गुद में मल को, मूत्रमार्ग में मूत्र को तथा योनि घृताभ्याक्ते गुदे क्षेप्या श्लक्ष्णा स्वाङ्गुष्ठसन्निभा ।। 15 ।। | के मुख में आर्तव को निकालने के लिए इसका प्रयोग किया मलप्रवर्तिनी वर्तिः फलवर्त्तिश्च सा स्मृता। | जाता है। देखें-सु० चि० अ० 17।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का सातवाँ अध्याय समाप्त ।। 7 ।।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अष्टमोऽध्यायः नस्यविधिः


[बायाँ स्तम्भ]

नस्य की निरुक्ति नस्यं तत् कथ्यते धीरैर्नासाग्राह्यं यदौषधम्। नावनं नस्यकर्मेति तस्य नामद्वयं मतम्।।1।। जो औषध नासिका या नाक द्वारा ग्रहण की जाती है, उसको 'नस्य' कहा जाता है। उसके दो नाम हैं—नावन और 2. नस्य कर्म। वक्तव्य—'नस्य' नासिका से सम्बन्धित विकारों के लिए हितकर होती है। हमारे विचार से तो यह 'ऊर्ध्वजत्रुविकारों' में आश्चर्यजनक लाभ करती है, आप भी चिकित्सा काल में प्रयोग करके देखें। ध्यान दें रोगी को रूक्षनस्य की आवश्यकता है कि स्निग्ध नस्य की।

नस्य के भेद नस्यभेदो द्विधा प्रोक्तो रेचनं स्नेहनं तथा। रेचनं कर्षणं प्रोक्तं स्नेहनं बृंहणं मतम् ।। 2 ।। नस्य दो प्रकार का होता है—1. रेचन (शोधन) और 2. स्नेहन (स्निग्ध करने वाला)। रेचन नस्यकर्म (अपतर्पण) और स्नेहन नस्य बृंहण (सन्तर्पण) कहा जाता है।

नस्य-प्रयोग का काल कफपित्तानिलध्वंसे पूर्वमध्यपराह्नके। दिने तु गृह्यते नस्यं रात्रावप्युत्कटे गदे।।3।। कफ, पित्त तथा वायु को नष्ट करने के लिए क्रमशः दिन के पूर्वभाग, मध्यभाग तथा अन्तिम भाग में नस्य का प्रयोग करना चाहिये। यदि अत्यन्त भीषण (संन्यास आदि शीघ्रकारी) रोग हो तो रात्रि में भी नस्य का प्रयोग करना उचित है। **वक्तव्य—**यहाँ पर नस्य प्रयोग के जिन कालों का वर्णन किया गया है, वह इसलिये कि उक्त दोषों का प्रकोप प्रायः उन-उन कालों में अधिक होता है। अतः नस्य प्रयोग से उनका शीघ्र शमन हो जाता है।


[दायाँ स्तम्भ]

नस्य के अयोग्य काल और रोगी नस्यं त्यजेद् भोजनान्ते दुर्दिने चापतर्पिते। तथा नवप्रतिश्यायी गर्भिणी गरदूषितः।।4।। अजीर्णी दत्तवस्तिश्च पतिस्नेहोदकासवः। क्रुद्धः शोकाभिभूतश्च तृषार्तो वृद्धबालकौ ।।5।। वेगावरोधी स्नातश्च स्नातुकामश्च वर्जयेत्। भोजन के पश्चात्, दुर्दिन (जिस दिन आकाश में बादल छाये हों) में तथा अपतर्पित (बुभुक्षित) मनुष्य को नस्य नहीं लेनी चाहिये। नवति प्रतिश्याय (जुकाम) से पीड़ित, गर्भवती गर (कृत्रिम विष) से पीड़ित, अजीर्ण वाला, जिसको वस्ति दी गयी हो, जिसने स्नेह, जल तथा आसव का पान किया हो, क्रोधयुक्त, शोक से सन्तप्त तृष्णा से पीड़ित, वृद्ध, बालक, मल-मूत्रादि के वेग को रोकने वाला, जिसने स्नान किया है और जो स्नान करना चाहता है, ऐसे व्यक्ति नस्य का प्रयोग न करें।

नस्य के योग्य-अयोग्य वय अष्टवर्षस्य बालस्य नस्यकर्म समाचरेत्।।6।। अशीतिवर्षादूर्ध्वं च नावनं नैव दीयते। आठ वर्ष की अवस्था से नस्य का प्रयोग प्रारम्भ करना चाहिये और अस्सी वर्ष के पश्चात् नस्य का प्रयोग नहीं करना चाहिये। **वक्तव्य—**आवश्यकता पड़ने पर इसके पूर्व तथा पश्चात् भी चिकित्सक के परामर्श से नस्य का प्रयोग कराया जा सकता है।

विरेचन-नस्य अथ वैरेचनं नस्य ग्राह्यं तैलैः सुतीक्ष्णकैः।।7।। तीक्ष्णभेषजसिद्धैर्वा स्नेहैः क्वाथै रसैस्तथा। रेचन नस्य तीक्ष्ण (कटु) तैलों (राई आदि के तेल) से