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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages
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हे गजयूथनाथ! यूथ से वियोग होने के कारण मुँदे नेत्र वाले। इस प्रकार चिन्ता क्यो कर रहे हो? जो कुछ प्राप्त रहा है वह ग्रास ग्रहण करो और जल पियो। दुःख-सुख तो भाग्यवश आते ही रहते हैं।¹

जो कोई जैसा करे उसके साथ वैसा ही करो-कोई उपकार करता है तुम भी प्रत्युपकार करो, हिंसा करता है तुम प्रतिहिंसा करो। तुमने पंख नोच डाले, मैंने सिर को रोमहीन कर दिया अर्थात् जो कोई जैसा व्यवहार करे उसके साथ वैसा व्यवहार करो।²

बुद्धिमान बिना प्रयोजन समझे अथवा प्रयोजन समझ लेने पर सहसा कोई बात न कहे क्योंकि विधाता अथवा दैव न जाने क्या करना चाहता हो।³

(स) शिक्षाप्रद सूक्तियाँ :

राम स्वर्ण का (मिथ्या) मृग नहीं जान पाये। नहुष ने पालकी में ब्राह्मणों को युक्त कर दिया। कार्तवीर्य को ब्राह्मण जमदग्नि से ही सवत्सा धेनु के हरने का विचार हुआ। युधिष्ठिर ने द्यूतक्रीडा में चारो भाई और रानी को दाँव पर लगा दिया। प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरुष भी बुद्धिभ्रष्ट हो जाते है।⁴

अवश्य तुम जाओ-ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है, क्योंकि प्रिय की ओर जाते मन को तथा नीची भूमि की ओर बहते जल को कौन रोकने में समर्थ है।⁵ संकेत रुप से


1 चिन्तामिमा वहसि कि गजयूथनाथयूथाद्वियोगविनिमीलितनेत्रयुग्म।
पिण्ड गृहाण पिब वारि यथोपनीतं दैवाद्भवन्ति विपद किल सम्पदो वा।।
शुकसप्तति, श्लोक सं० 159, पृष्ठ सं० 127

2 कृते प्रतिकृतं कुर्या हिंसिते प्रतिहिंसितम्।
त्वया लुञ्चापिता पक्षा मया लुञ्चापित शिर ।
शुकसप्तति, श्लोक स० 331, पृष्ठ स० 277

3 प्रयोजनमविज्ञाय ज्ञात्वा चाथ मनीषिणा।
सहसैव न वक्तव्यमचिन्त्यो विधिनिर्णयः।
शुकसप्तति, श्लोक सं० 331, पृष्ठ स० 277

4 रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टय च महिषी धर्मात्मजो दत्तवान्
प्राय. सत्पुरुषोऽयनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 64, पृष्ठसं० 49

5 अवश्यमेव गन्तव्यं त्येत्थ मम निश्चय ।
मनोऽभीष्टे पयो निम्ने गच्छत्क. प्रतिवारयेत्।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 84, पृष्ठसं० 69

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व्यक्त किए भाव को पशु भी ग्रहण कर लेता है। घोडे–हाथी संकेत द्वारा प्रेरित हो (मनुष्य अथवा भार को) एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँचाते हैं पडित बिना कहे भाव को तर्क द्वारा जान लेता है क्योकि दूसरो के संकेतित अभिप्राय को जानना ही बुद्धि का फल है।¹

नीच व्यक्ति के ससर्ग से मनुष्य का कल्याण नहीं होता। क्योंकि दुष्ट अत्यन्तप्रिय के विषय में भी अपना विकार ही दिखाता है।²

मन से विपरीत किए गये को जो सह सकता है और अर्थ त्याग कर सकता है वह मन के अनुकूल कार्य करता हुआ, कभी सज्जनों द्वारा निन्दित नहीं होता।³

(द) राजधर्म सम्बन्धी सूक्तियाँ :

ग्रन्थकार द्वारा "राजनियम" से सम्बन्धित सूक्तियाँ भी दर्शायी गयी हैं। यथा-राजा के प्रसन्न होने पर श्वेत छत्र, मनोरम अश्व, मदशाली गज प्राप्त होते हैं।⁴

राजा कोई साधारण व्यक्ति नही होता, यह अलौकिकरुप धारी होता है और तुम तो हे शत्रुओ को सन्ताप देने वाले! विक्रमादित्य (विक्रम में आदित्य से) यथार्थनामा हो।⁵


  1. उदीरितोऽर्थ पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति नोदिताः।
    अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जन परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धय ।।
    शुकसप्ततिः, श्लोक स० 86, पृष्ठ स० 70.

  2. न नीचजनससर्गान्नरो भद्राणि पश्यति।
    दर्शयत्येव विकृति सुप्रियेऽपि खलो यतः।।
    शुकसप्ततिः, श्लोकसं० 126, पृष्ठसं० 109

  3. सोढु त्यक्तुं च यः शक्तो मनसा कृतमन्यथा।
    मनोऽनुकूलता कुर्वन्न् स निन्यः सदा सताम्।।
    शुकसप्ततिः, श्लोकस० 114, पृष्ठस० 96

  4. धवलान्यातपत्राणि वाजिनश्च मनोरमाः।
    सदा मताश्च मातङ्गा प्रसन्ने सति भूयतौ।।
    शुकसप्ततिः, श्लोकस० 46, पृष्ठसं० 38

  5. इन्द्रात्प्रभुत्व ज्वलनात्प्रताप क्रोध यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम्।
    सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञ क्रियते शरीरम्।।
    शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 49, पृष्ठ सं० 39.

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राजदण्ड तथा विषय कार्य की सिद्धि में संशय होने पर जो सन्दिग्ध मन वाले राजाओं के संशय को दूर करने में समर्थ होते हैं वे प्रधानता (महत्ता) को प्राप्त होते हैं।¹ इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि ग्रंथकार को सामाजिक, राजनीतिक, शिक्षात्मक इत्यादि पक्षों का बहुत ही सूक्ष्मज्ञान था।

(य) <u>अन्य पद्यात्मक सूक्तियाँ :</u>

न पूजयन्ति ये पूज्यान्मान्यन्न मानयन्ति ये।

जीवन्ति निन्द्यमानास्ते मृताः स्वर्गं न यान्ति च।।²।।

जो अपने पूज्य जन की पूजा नहीं करते, जो अपने मान्य जन का सम्मान नहीं करते, वे (संसार में) निन्दित होते हुए जीते हैं और मरने के बाद स्वर्ग नहीं जाते हैं।

व्याधेन बोधितस्तेन स ययौ गृह्मात्मनः।

अभवत्कीर्त्तिमाँल्लोके परतः कीर्तिभाजनम्।।³।।

इस प्रकार उस व्याध से समझाया गया वह अपने घर गया (तदनुसार माता-पिता की सेवा कर) ससार में कीर्तिमान हुआ और मरने के बाद भी अपने यशः शरीर से अमर हो गया।

तावत्पिता तथा बन्धुर्यावज्जीवति मानवः।

मृतो मृत इति ज्ञात्वा श्रणात्स्नेहो निवर्तते।।⁴


1 राजग्रहे समायाते विमये कार्यसंशये।
सन्दिग्धमनसां राज्ञा प्रधानाः संशयच्छिदः।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 47, पृष्ठ सं० 38
2 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 5, पृष्ठ सं० 6
3 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 6, पृष्ठ सं० 6
4 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 7, पृष्ठ सं० 7

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जब तक मनुष्य जीता रहता है तभी तक उसके पिता तथा बन्धु हैं-इन सबका स्नेह तभी तक रहता है। मनुष्य मर गया तो मृत जानकर (पिता बन्धु आदि का) स्नेह तत्क्षण समाप्त हो जाता है।

सम्पदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च भीरुत्वम्।

तं भुवनत्रय तिलकं जननी जनयति सुत विरलम्।।¹

जिसे समृद्धि में हर्ष, विपत्ति में विषाद, रण में कापुरुषता न हो, ऐसे त्रिभुवन श्रेष्ठ विरले पुत्र को माता पैदा करती है।

विद्यावतां महेच्छानां शिल्पविक्रमशालिनाम्।

सेवावृत्तिविदाञ्चैव नाश्रयः पार्थिवं विना।।²।।

विद्वानों, महत्वाकाङ्क्षियों, शिल्पियों, पवराक्रमशालियों, सेवावृत्ति के जानकार व्यक्तियों का, राजा के बिना आश्रय नहीं, राजा ही इनका आश्रय होता है।

ये जात्यादिमहोत्साहा नोपगच्छन्ति पार्थिवम्।

तेषामामरण भिक्षा प्रायश्चित्तं विनिर्मितम्।।³।।

उच्चकुल में उत्पन्न जो शक्तिशाली राजा के समीप नहीं जाता-उसे आश्रय नहीं बनाता, ऐसे व्यक्तियो का मरण पर्यन्त भिक्षा माँगना ही प्रायश्चिश्चत विहित है।

दृष्टिपूतं न्सेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।

सत्यपूतं वदेद्वाक्यं मन पूतं समाचरेत्।।⁴।।

आगे का स्थल नेत्र से देखकर पैर रखना चाहिए, वस्त्र से छना शुद्ध जल पीना चाहिए, सत्य से पवित्र वचन बोलना चाहिए और मन को जो अभीष्ट हो वही करना चाहिए।


1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 31, पृष्ठ स० 32
2 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 41, पृष्ठ स० 36
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 42, पृष्ठ स० 36
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 111, पृष्ठ सं० 93

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सोपचाराणि वाक्यानि शत्रूणामिह लक्षयेत्।
अविचारितगीतार्था मृगा यान्ति पराभवम्।।$^1$।।

संसार में शत्रुओं के सत्कारपूर्वक वचनों को समझना चाहिए। गीत का प्रयोजन न सोचने के कारण ही मृग विपत्ति में फँस जाते है।

चन्दनं शुचिवस्त्रं च पानीयं शुचि शीतलम्।
सेव्यमानोऽपि मधुरः शुचिर्जयति नान्यथा।$^2$

ग्रीष्म ऋतु को सेवन किया जाता हुआ चन्दन, उज्जवल शीतल वस्त्र, पवित्र एवं शीतल जल, ओदन तथा चन्द्रमा ही जीतता है, अन्यथा वह जीता नहीं जा सकता।

नासाहसं समालम्ब्य नरो भद्राणि पश्यति।
साहसी सर्वकार्येषु लक्ष्मीभाजनमुत्तमम्।$^3$

बिना साहस का आश्रय लिए मनुष्य का कल्याण नहीं होता। जो सब कामों में साहसी होता है वही लक्ष्मी को प्राप्त कर पाता है।

भूमेश्च देशस्य गुणान्वितस्य भृत्यस्य वा बुद्धिमread बुद्धिमतः प्रणाशे।
भृत्यप्रणाशे मरणं नृपाणां नष्टापि भूमिः सुलभा न भृत्याः।$^4$

देश की भूमि तथा गुणशाली एवं बुद्धिमान् सेवक के विनाश में (भूमि का विनाश ठीक है किन्तु ऐसे सेवक का नहीं क्योंकि) ऐसे भृत्य का विनाश होने पर राजा का ही विनाश हो जाता है और नष्ट हुई भूमि पुनः मिल सकती है किन्तु ऐसे भृत्यों का विनाश होने पर पुनः मिलना सम्भव नहीं।


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 122, पृष्ठ स० 106
2 शुकसप्तति., श्लोक स० 141, पृष्ठ स० 117
3 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 155, पृष्ठ स० 124
4 शुकसप्तति., श्लोक सं० 231, पृष्ठ स० 199

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न वक्तव्यं ध्रुवं देवि पापं दृष्टं श्रुतं मया।
कथापि खलु पापानामलम श्रेयसे यतः।।¹

मैने जो पाप देखा या सुना है, निश्चय रुप से उसे नहीं कहना चाहिए क्योंकि पापों की चर्चा भी निश्चय अहितकारक होती है।

तस्माद्यो भाषितु वेत्ति धर्मे चार्थे स्मरे तथा।
कस्तं धर्षयितु शक्तो नरेषु कमलानने।।²

हे कमलमुखि! धर्म–अर्थ–काम के विषय में जो मनुष्य बोलना जानता है उसे पुरुषों में कौन ऐसा है जो बल से जीत सकता है? अर्थात कोई नहीं।

मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे कुण्डे नवं पयः।
तुण्डे तुण्डे नवा वाणी गेहे गेहे पतिव्रता।।³

प्रत्येक मस्तिष्क में भिन्न–भिन्न मति होती है, विभिन्न जलाशय में विभिन्न जल होता है, विभिन्न मुख मे विभिन्न वाणी होती है, विभिन्न घर में विभिन्न पतिव्रता होती है।

गजाः सन्ति हयाः सन्ति विचित्राः सन्ति सम्पदः।
त्वदीये च मदीये च दुर्लभं भस्म याज्ञिकम्।।⁴

तुम्हारे तथा हमारे हाथी, घोड़े तथा विचित्र सम्पत्तियाँ हैं किन्तु यज्ञ का भस्म दुर्लभ होता है।

समयोचितमारम्भ कुरुते यस्तु कृत्यवित्।
सर्वदा तु फलं तस्य समयज्ञो हि शिष्यते।।⁵।।


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 237, पृष्ठ सं० 205
2 शुकसप्तति., श्लोक स० 239, पृष्ठ स० 208
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 245, पृष्ठ सं० 213–214
4 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 249, पृष्ठ सं० 219–220
5 शुकसप्तति, श्लोक स० 278, पृष्ठ स० 237

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इस प्रकार जो कृत्यवित् समयोचित कार्य करता है उसका यही फल होता है कि वह समय की परख वाला व्यक्ति कदापि नष्ट नहीं होता सदा जीवित रहता है।

गच्छ देवि न कर्तव्यो विलम्बः पुण्यकर्मणि

यदि वेत्सि भये कर्तुं सुबुद्धिर्हंसराडिव।¹

देवि। यदि भय आ पड़ने पर सुबुद्धि हंसाधिपति की भाँति करना जानती हो तो जाओ, सत्कर्म में विलम्ब नहीं करना चाहिए।

सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।।

पितृक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।²

(श्री राम चन्द्र जी कह रहे हैं) हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्णनिर्मित लङ्का मुझे पसंद नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन रहित भी मुझे सुखकर है।

समुद्रवीचीव चलस्वभावा. सन्ध्याभ्ररेखेव मुहूर्तरागाः।।

स्त्रियः कृतार्थाः पुरुषं निरर्थ निष्पीडितालक्तकवत्त्यजन्ति।।³

समुद्र के तरङ्ग के समान चञ्चलस्वभाव वाली सायंकालीन बादल के समान क्षणिक अनुराग रखने वाली स्त्रियाँ स्वार्थ सिद्ध करने के बाद अर्थ-शून्य पुरुष को निचोडे हुए महावर की भाँति त्याग देती हैं।

एताः प्रविश्य हृदयं सदयं नराणां ।

किं नाम वामनयना न समाचरन्ति।।⁴

ये स्त्रियाँ पुरुषों के दयालु हृदय मे प्रवेश कर मोहती हैं मतवाला बना देती हैं, तिरस्कार करती है, फटकारती हैं, सुख देती हैं, विषाद उत्पन्न करती हैं, ये कुटिल नेत्र वाली स्त्रियाँ क्या नहीं करती ?


1 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 310, पृष्ठ सं० 261
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 314, पृष्ठ सं० 263
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 329, पृष्ठ सं० 275
4 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 330, पृष्ठ स० 276.

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तरुणी रमणी रतिरम्यतरा प्रमदा सुखदा च सदा समदा।
यदि सा सुभगा हृदये निहिता क्व जयः क्व जय. क्व जयः क्व जयः।¹

युवावस्था को प्राप्त, रमण करने योग्य, रति से भी अधिक रम्य, सुख देने वाली, सदा काम-मद से युक्त सुन्दरी प्रमदा यदि हृदय में बस गयी तो फिर जय कहाँ? (तब तो महान व्यक्ति की भी पराजय निश्चित है)।

(र) गद्यात्मक सूक्तियाँ :

निजशरीरस्य कतिचिद्दिनस्थायियौवनस्य पुराषान्तररमणाद् गृहाण फलम्।²

अन्य पुरुष के साथ रमण करती हुई अपने शरीर, जिसका यौवन कतिपय दिनों तक ही स्थिर रहेगा का फल प्राप्त कर ले।

युक्तमिदं कर्तव्यमेव परं दुष्करं निन्दितं च कुलस्त्रीणाम्।³

कुल स्त्रियों (उच्चकुल में उत्पन्न हुई) के लिये यह कर्म दुष्कर एवं निन्दित है।

व्यसनागमे, यदा कस्यचिदुपरि विपद् आपतति तदा दुर्जना. दुष्टाः नित्यम्।⁴

विपत्ति आ पडने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं (कोई सहायता नहीं करता)।

यो दान कुर्यात्स भवेत्सर्वसम्पदां स्थानम्।⁵

जो दान करता है वह सकल सम्पत्तियों का आगार होता है।

यतो राज्ञां दुष्टनिग्रह. शिष्टपालनं च स्वर्गाय।⁶


1 शुकसप्तति., श्लोक स० 338, पृष्ठ स० 280.
2 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 7.
3 शुकसप्तति., पृष्ठ सं० 8.
4 शुकसप्तति., पृष्ठ सं० 9.
5 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 16.
6 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 20.

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दुष्टों का दमन करना तथा शिष्टजनो का पालन करना राजा का धर्म है—इससे उसे स्वर्ग मिलता है।

यतो बालकादपि हितं वाक्य ग्राह्यम्।¹

बालक से भी हितवाक्य ग्रहण करना चाहिए।

विद्वद्भिर्विपद्यप्युच्चैः स्थातव्यम्।²

विद्वानो को विपत्ति में भी प्रसन्न रहना चाहिये।

परं स्वामिरहितानां न क्वापि पूजा।³

राजा के बिना मनुष्य की कहीं पूंजा (सक्रिया, प्रतिष्ठा) नहीं होती।

यतो जनो धनमित्राः।⁴

धन के होने से ही उसके सब मित्र बनते हैं।

यतो हीनपुण्यो बुद्ध्या मुच्यते।⁵

जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है उसे बुद्धि छोड़ देती है।

पित्रार्जित द्रव्यं भोगिनं कं न करोति।⁶

पिता द्वारा अर्जित धन किसे विलासी नहीं बना देता।

एकोऽपि त्वदीयः सुतः श्लाघ्यः।⁷

तुम्हारा एक ही पुत्र प्रशंसनीय है।


1 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 22.
2 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 31.
3 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 34.
4 शुकसप्तति, पृष्ठ सं० 43.
5 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 49.
6 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 52.
7 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 120

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कृतक मन्ये भयं योषिता।¹

स्त्रियो का भय कृत्रिम मानता हूँ।

दुर्लभोऽय बुधः। सुलभाः खलु नार्य।²

यह विद्वान दुर्लभ है, नारियाँ तो सुलभ होती हैं।

ततः स्त्रीणां वशगः को न विडम्बितः।³

स्त्रियों के अधीन होकर कौन तिरस्कृत नहीं होता।

यतः सता सन्नतगात्रि सङ्गतं मनीषिभिः।⁴

सज्जनो के साथ सात पग चलने मात्र से अथवा सात वाक्य बोलने मात्र से मित्रता हो जाती है।

य. कश्चिद्धितं वाक्यं शृणोति करोति च स शर्मभाग्भवति।⁵

जो कोई हितवाक्य सुनता है और तदनुसार कार्य करता है वह इस लोक तथा परलोक मे कल्याण का भागी होता है।

सत्यस्य वाचो वक्ता श्रोता च न लभ्यते।⁶

सत्य की बात कहने वाला और सुनने वाला दोनो नहीं मिलते।

(ल) ‘‘पद्यात्मक सूक्तियाँ ‘‘प्राकृत भाषा में’’ :

छिज्जउ सीसं अह होउ बन्धणं चअउ सव्वहा लच्छी।
पडिवण्णपालणे सुपुरिसाणं जं होउ तं होउ।¹


1 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 233.
2 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 234.
3 शुकसप्तति, पृष्ठ सं० 241
4 शुकसप्ततिः, पृष्ठ स० 265.
5 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 272.
6 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 273.

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सहायक पुस्तकों की सूची

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शीर्षं छिद्यताम् अपभवतु बन्धनं चलतु सर्वथा लक्ष्मीः।
प्रतिपन्नपालने सुपुरुषाणां यद् भवतु तद् भवतु।

अर्थात् स्वीकार किये गये कार्य को पूरा करने में सत्पुरुषों का जो हो वह हो, चाहे शिर कट जाय, बन्धन में पड जायें अथवा लक्ष्मी चली जायें परन्तु स्वीकृत का पालन करते हैं।

पिअर विढत्तइ दव्वइ चुड्डिरि को ण करेइ।
सइँ बिढवइ सइँ भोजअइ विरला जणणि जणेइ।।$^२$

पित्रार्जितं द्रव्य भोगिनं कं न करोति।
स्वयमर्जयति स्वयं भुङ्क्ते विरला जननी जनयति।।

पिता द्वारा अर्जित धन किसे विलासी नहीं बना देता। जो स्वयं धन पैदा कर उसका स्वयम् उपभोग करता है ऐसे पुत्र को कोई विरली माता ही पैदा करती है।

महिलारत्ता पुरिसा छेआ वि ण संभरन्ति अप्पाणं
इअरे उण तरुणीणं पुरिसा सलिलं व हत्थगअं।।"

(महिलारक्ता. पुरुषाश्छेका अपि न सम्भरन्ति आत्मानम्।
इतरे पुनस्तरुणीनां पुरुषा. सलिलमेव हस्तगतम्।।)

स्त्रियो में अनुरक्त नागरिक भी पुरुष अपने पर अधिकार नहीं रख पाते (स्त्री के वश में रहते हैं) और अन्य पुरुष स्त्रियों को हस्तगत जल ही होते हैं-जैसे अञ्जलिगत जल धीरे-धीरे बह जाता है उसी प्रकार वे स्त्रियों के हाथ में नहीं आते और स्वाधीन होते हैं।


1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 11, पृष्ठ स० 11.
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 67, पृष्ठ स० 52.
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 109, पृष्ठ स० 87-88.

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अहरं करं कवोलं थणजुअल णाहिमण्डलं रमणं ।
इत्थिअजणसामण्णं हिअअं जं जस्स तं तस्स ।।$^1$

(अधरः करः कपोलः स्तनयुगलं नाभिमण्डल रमणम् ।
स्त्रीजनसामान्य हृदयं यद् यस्या तत् तस्याः ।।)

अधर, कर, कपोल, स्तनयुगल, नाभिमण्डल और जघन प्रदेश ये सब तो सभी स्त्रियों में समान होते हैं किन्तु हृदय जो है वह जिस किसी के ही होता है—हृदय से प्रेम करने वाली प्रेयसी कोई ही होती है।

अचला चलन्ति पलए मज्जाअं साअरा विलंघन्ति ।
गरुआ वि तह विकाले पडिवण्ण साध सिढिलेन्ति ।$^2$

(अचलाश्चलन्ति प्रलये मर्यादां सागरा विलङ्घन्ते
गुरुका अपि तथा विकाले प्रतिपन्नसाधनं न शिथिलयन्ति ।।)

प्रलय मे पर्वत चलते हैं, सागर भी मर्यादा त्याग देते हैं, किन्तु विपत्ति में भी महान व्यक्ति स्वीकृत के पालन को शिथिल नहीं करते।


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 153, पृष्ठ स० 122.
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 165, पृष्ठ स० 130.

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सहायक पुस्तकों की सूची

क्रसं०पुस्तकलेखक व प्रकाशक
1साहित्य दर्पणविश्वनाथ, स० डा० निरूपण विद्यालंकार, साहित्य भंडार सुभाष बाजार, मेरठ
2.काव्यालंकारभामह
3.काव्यालंकाररूद्रट, व्याख्याकार श्री रामदेव शुक्ल 1966, चौखम्भा प्रकाशन
4काव्यानुशासनहेमचन्द्र 1964, श्री महावीर जैन विद्यालय, मुम्बई
5काव्यादर्शदण्डी
6काव्यालंकार सूत्रवृत्तिवामन व्याख्याकार आचार्य विश्वेश्वर 1954, रामलालपुरी आत्माराम एण्ड सन्स, कश्मीरी गेट, दिल्ली – 6
7ध्वन्यालोकचौखम्भा प्रकाशन, वाराणसी
8.काव्यप्रकाशआचार्य मम्मट, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी
9.नाट्य शास्त्रभरत, चौखम्भा प्रकाशन
10पुराण विमर्शबलदेव उपाध्याय, द्वितीय संस्करण 1978, चौखम्भा प्रकाशन, वाराणसी
11.पुराण पर्यालोचनम्डा० श्रीकृष्ण त्रिपाठी, प्रथम संस्करण 1976, चौखभा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी
12.भविष्य पुराणखेमराज श्रीकृष्ण दास 1959, श्री वेंकटेश्वर प्रेस, मुम्बई
13.मार्कण्डेय पुराण- एकसांस्कृतिक अध्ययनडा० वासुदेवशरण अग्रवाल, प्रथम संस्करण 1961, हिन्दुस्तानी ऐकेडमी, इलाहाबाद
14.महाभारतगीता प्रेस, गोरखपुर

[ 196 ]

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  1. रामायण : गीता प्रेस, गोरखपुर

  2. संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास : डा० कपिलदेव द्विवेदी, संस्कृत साहित्य संस्थान, इलाहाबाद

17 संस्कृत साहित्य का इतिहास : वाचस्पति गैरोला, 1960, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी

  1. संस्कृत साहित्य का इतिहास : ए०बी० कीथ, मङ्गलदेव शास्त्री 1959, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, पटना, वाराणसी

  2. संस्कृत साहित्य का इतिहास : बलदेव उपाध्याय, संवत् 2030, वाराणसी

  3. संस्कृत साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास : रामजी उपाध्याय, विक्रमाब्द 2018, रामनारायण लाल वेणीमाधव, इलाहाबाद

  4. संस्कृत साहित्य का इतिहास : बलदेव उपाध्याय 1953, शारदा मन्दिर, बनारस

  5. संस्कृत साहित्य की रूपरेखा : चन्द्रशेखर पाण्डेय, शान्तिकुमार नानूराम व्यास, पंचदश संस्करण 1982, साहित्य निकेतन, कानपुर

23 संस्कृत साहित्य का सुबोध इतिहास : डा० जयकिशन खण्डेलवाल 1970, रवीन्द्र प्रकाशन पाटनकर बाजार, ग्वालियर - 1

24 संस्कृत साहित्य का नवीन इतिहास : कृष्ण चैतन्य 1965, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी

  1. संस्कृत साहित्य का आलोचनात्मक, इतिहास : डा० बाबूराम त्रिपाठी, विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा

  2. संस्कृत साहित्य का आलोचनात्मक, इतिहास : डा० सत्यनारायण पाण्डेय 1975, साहित्य भंडार, सुभाष बाजार, मेरठ

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  1. हिस्ट्री आफ संस्कृत लिट्रेचर : ए०ए० मैकडानल 1899

28 हिस्ट्री आफ संस्कृत लिट्रेचर : सुशील कुमार डे 1947, कलकत्ता युनिवर्सिटी प्रेस

  1. कहानी का रचना – विधान : डा० जगन्नाथ प्रसाद शर्मा 1975, हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी

  2. कथा के तत्व : डा० देवराज उपाध्याय

  3. आधुनिक संस्कृत साहित्य : डा० हीरालाल शुक्ल, प्रथम संस्करण 1971, रचना प्रकाशन, 45 ए, खुल्दाबाद, इलाहाबाद

  4. अग्नि पुराण : चौखम्भा प्रकाशन

33 शुकसप्तति. : चौखम्भा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, प्रथम संस्करण, संवत् 2023

  1. छन्दोलंकारसौरभवम् : अक्षयवट प्रकाशन, 26 बलरामपुर, हाउस, इलाहाबाद

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