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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages
Page 768Permalink
७६६श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
करता है अर्थात् भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४९॥
ईश्वर उवाच<br>गोप्रेक्ष्यस्योत्तरेणाथ अनसूयाख्यलिङ्गकम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि गतिं च लभते पराम्॥ ५०<br>पश्चान्मुखं च तल्लिङ्गमनसूयाप्रतिष्ठितम्।ईश्वर बोले—हे देवि! गोप्रेक्षके उत्तरमें अनसूया नामक लिङ्ग है; उसका दर्शन करके मनुष्य परा गतिको प्राप्त करता है। पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग [देवी] अनसूयाके द्वारा स्थापित किया गया है॥ ५० १/२॥
अनसूयेश्वरस्याग्रे गणेश्वरमिति स्मृतम्॥ ५१<br>तेन दृष्टेन लभते गणेशस्य सलोकताम्।अनसूयेश्वर-लिङ्गके आगे गणेश्वर [लिङ्ग] बताया गया है, उसके दर्शनसे मनुष्य गणेशजीका सालोक्य प्राप्त करता है॥ ५१ १/२॥
गणेश्वरात् पश्चिमेन हिरण्यकशिपुः पुरा॥ ५२<br>स्थापयामास मे लिङ्गं कूपस्यैव समीपतः।<br>तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गं सिद्धेश्वरं स्मृतम्॥ ५३<br>दर्शनादेव मे लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।हिरण्यकशिपुने पूर्वकालमें गणेश्वरके पश्चिममें कूपके पासमें ही मेरे लिङ्गकी स्थापना की थी। हे देवि! उसीके पश्चिममें सिद्धेश्वरलिङ्ग बताया गया है; दर्शन-मात्रसे मेरा वह लिङ्ग सर्वसिद्धि प्रदान करनेवाला है॥ ५२-५३ १/२॥
अन्यदायतनं भद्रे शृणुष्व गदतो मम॥ ५४<br>वृषभेश्वरनामानं लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति।<br>पूर्वामुखं महेशानि गोप्रेक्ष्यस्य तु नैर्ऋते।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि अभीष्टं फलमाप्नुयात्॥ ५५हे भद्रे! अन्य आयतन (लिङ्ग)-के विषयमें सुनिये; मैं बता रहा हूँ। हे महेशानि! वहींपर वृषभेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, जो पूर्वकी ओर मुखवाला है तथा गोप्रेक्षके नैर्ऋत (दक्षिण-पश्चिम)-में स्थित है। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है॥ ५४-५५॥
गोप्रेक्ष्यस्य दक्षिणतः स्थापितं लिङ्गमुत्तमम्।<br>दधीचेश्वरनामानं सर्वकामफलप्रदम्॥ ५६गोप्रेक्षके दक्षिणमें सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला दधीचेश्वर नामक उत्तम लिङ्ग स्थापित है॥ ५६॥
दधीचेश्वरसामीप्ये दक्षिणे वरवर्णिनि।<br>अत्रिणा स्थापितं लिङ्गं दैवमार्तिहरं शुभम्॥ ५७हे वरवर्णिनि! दधीचेश्वरलिङ्गके समीपमें दक्षिण दिशामें [मुनि] अत्रिके द्वारा शिवजीका लिङ्ग स्थापित किया गया है; यह दैविक कष्टको दूर करनेवाला तथा मंगलकारक है॥ ५७॥
अत्रीश्वराद्दक्षिणतः सूर्यखण्डमुखेऽपि च।<br>मधुकैटभाभ्यां सुश्रोणि लिङ्गसंस्थापनं कृतम्॥ ५८<br>तत्र पश्चान्मुखो देवि विसमन्थाः प्रपठ्यते।<br>पूर्वामुखं कैटभस्य लिङ्गं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ ५९हे सुश्रोणि! अत्रीश्वरके दक्षिणमें सूर्यखण्डमुखमें भी मधु तथा कैटभके द्वारा लिङ्गकी स्थापना की गयी है। हे देवि! वहाँपर मधुके द्वारा स्थापित लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला कहा जाता है और कैटभके द्वारा स्थापित त्रिलोक-प्रसिद्ध लिङ्ग पूर्वकी ओर मुखवाला है॥ ५८-५९॥
गोप्रेक्षकस्य पूर्वेण लिङ्गं वै बालकेश्वरम्।<br>बालकेश्वरसामीप्ये विज्ज्वरेश्वरसंज्ञितम्॥ ६०<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि ज्वरो नश्यति तत्क्षणात्।गोप्रेक्षके पूर्वमें बालकेश्वरलिङ्ग है। बालकेश्वरके समीपमें विज्ज्वरेश्वर नामक लिङ्ग है; हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे ज्वर तत्काल नष्ट हो जाता है॥ ६० १/२॥
विज्ज्वरेश्वरपूर्वेण वेदेश्वरमिति श्रुतम्॥ ६१<br>ईशानाभिमुखं लिङ्गं कोणे तस्य मुखानि वै।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि चतुर्वेदो भवेद्द्विजः॥ ६२विज्ज्वरेश्वरके पूर्वमें वेदेश्वर लिङ्ग है—ऐसा कहा गया है; वह लिङ्ग ईशानकी ओर मुखवाला है, उसके कोणमें [अनेक] मुख हैं। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे
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अध्याय १] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनोंका वर्णन ७६७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्विज चारों वेदोंका ज्ञाता हो जाता है॥ ६१-६२॥
वेदेश्वरस्योत्तरतः स्वयं तिष्ठति केशवः।<br>क्षेत्रस्य कारणं चास्य क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते॥ ६३<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि सर्वं दृष्टं चराचरम्।वेदेश्वरके उत्तरमें स्वयं केशव विराजमान हैं; वे इस क्षेत्रके कारणभूत क्षेत्रज्ञ कहे जाते हैं। हे सुश्रोणि! उनके दर्शनसे समस्त चराचर [जगत्] दृष्टिगत हो जाता है॥ ६३ १/२॥
तत्समीपे तु सुश्रोणि लिङ्गं मे सङ्गमेश्वरम्।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि शिष्टैः सह समागमः॥ ६४हे सुश्रोणि! उनके समीपमें मेरा संगमेश्वरलिङ्ग विद्यमान है; उसके दर्शनसे हे सुश्रोणि! सज्जनोंके साथ समागम होता है॥ ६४॥
सङ्गमेशस्य पूर्वेण लिङ्गं चैव चतुर्मुखम्।<br>ब्रह्मणा स्थापितं भद्रे प्रयागमिति कीर्त्यते॥ ६५<br>तेन दृष्टेन लभते ब्रह्मणः पदमुत्तमम्।<br>तत्र सा शाङ्करी देवी ब्रह्मवृक्षेऽवतिष्ठते॥ ६६<br>शान्तिं करोति सर्वेषां ये च तीर्थनिवासिनः।<br>अतः परं तु संवेद्यं गङ्गावरणसङ्गमम्॥ ६७संगमेश्वरके पूर्वमें चारमुखवाला लिङ्ग है; हे भद्रे! ब्रह्माके द्वारा स्थापित किया गया वह प्रयाग नामसे पुकारा जाता है। उसके दर्शनसे मनुष्य उत्तम ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। वहाँपर वे शांकरीदेवी ब्रह्मवृक्षमें विद्यमान हैं और जो लोग तीर्थमें निवास करनेवाले हैं, उन सबको वे शान्ति प्रदान करती हैं। इसके बाद गंगा तथा वरणाके संगमको जानना चाहिये॥ ६५-६७॥
श्रवणद्वादशीयोगो बुधवारे यदा भवेत्।<br>तदा तस्मिन्नरः स्नात्वा सन्निहत्या फलं लभेत्॥ ६८<br>श्राद्धं कृत्वा तु यस्तत्र तस्मिन् काले यशस्विनि।<br>तारयित्वा पितॄन् सर्वान् विष्णुलोकं स गच्छति॥ ६९जब बुधवारके दिन श्रवण-द्वादशीका योग उपस्थित हो, उस समय उसमें स्नान करके मनुष्य क्षेत्रसन्निधिका फल प्राप्त करता है। हे यशस्विनि! उस कालमें वहाँपर जो [मनुष्य] श्राद्ध करता है, वह समस्त पितरोंका उद्धार करके विष्णुलोक जाता है॥ ६८-६९॥
वरणायास्तटे पूर्वे कुम्भीश्वरमिति स्मृतम्।<br>कुम्भीश्वरात्तु पूर्वेण कालेश्वरमिति स्मृतम्॥ ७०<br>कालेश्वरस्योत्तरतो महातीर्थं वरानने।<br>कपिलाह्रदनामानं ख्यातं सर्वसुरासुरैः॥ ७१<br>तस्मिन् हृदे तु यः स्नानं कुर्याद्भक्तिपरायणः।<br>वृषध्वजं च वै दृष्ट्वा राजसूयफलं लभेत्॥ ७२वरणाके पूर्व-तटपर कुम्भीश्वर [लिङ्ग] बताया गया है। कुम्भीश्वरके पूर्वमें कालेश्वर [लिङ्ग] कहा गया है। हे वरानने! कालेश्वरके उत्तरमें सभी देवताओं तथा असुरोंके द्वारा कपिलाह्रद नामक महातीर्थ कहा गया है। जो [मनुष्य] उस ह्रद (सरोवर) में भक्ति-परायण होकर स्नान करता है और वृषध्वजका दर्शन करता है, वह राजसूय [यज्ञ]-का फल प्राप्त करता है॥ ७०-७२॥
नरकस्थास्ततो देवि पितरः सपितामहाः।<br>पितृलोकं प्राप्नुवन्ति तस्मिन् श्राद्धे कृते तु वै॥ ७३<br>गयायां चाष्टगुणितं पुण्यं प्रोक्तं महर्षिभिः।<br>तस्मिन् श्राद्धे कृते भद्रे पितॄणामनृणो भवेत्॥ ७४हे देवि! वहाँ श्राद्ध किये जानेपर नरकमें स्थित पितामहसहित सभी पितर पितृलोक प्राप्त करते हैं। महर्षियोंने वहाँ किये गये श्राद्धको गयामें किये गये श्राद्धसे आठ गुना पुण्यप्रद बताया है। हे भद्रे! वहाँ श्राद्ध करनेपर मनुष्य पितरोंके ऋणसे मुक्त हो जाता है॥ ७३-७४॥
पश्चिमे तु दिशाभागे महादेवस्य भामिनि।<br>स्कन्देन स्थापितं लिङ्गं मम भक्त्या सुरेश्वरि॥ ७५<br>तेन दृष्टेन गच्छन्ति स्कन्दस्यैव सलोकताम्।<br>तत्र शाखैर्विशाखैश्च नैगमेयैश्च सुन्दरि।<br>स्थापितानि च लिङ्गानि गणैः सर्वैर्बहूनि च॥ ७६हे भामिनि! हे सुरेश्वरि! महादेवके पश्चिम दिशाभागमें स्कन्दने भक्तिपूर्वक मेरा लिङ्ग स्थापित किया है; उसके दर्शनसे लोग स्कन्दका सालोक्य प्राप्त करते हैं। हे सुन्दरि! वहाँ शाख, विशाख तथा नैगमेय—
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७६८श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इन सभी गणोंके द्वारा मेरे बहुत-से लिङ्ग स्थापित किये गये हैं॥ ७५-७६॥
स्कन्देश्वरस्योत्तरतो बलभद्रप्रतिष्ठितम्।<br>तेन दृष्टेन देवेशि अनन्तफलमाप्नुयात् ॥ ७७<br><br>स्कन्देश्वराद्दक्षिणतो महालिङ्गं प्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं स्थापितं नन्दिना पुरा ॥ ७८<br><br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि नन्दिलोकमवाप्नुयात्।हे देवेशि! स्कन्देश्वरके उत्तरमें बलभद्रजीके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है; उसके दर्शनसे मनुष्य अनन्त फल प्राप्त करता है। स्कन्देश्वरके दक्षिणमें महालिङ्ग विराजमान है; पूर्वकालमें नन्दीने पश्चिमकी ओर मुखवाले उस लिङ्गको स्थापित किया था। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य नन्दीका लोक प्राप्त करता है॥ ७७-७८ १/२ ॥
नन्दीश्वरात् पश्चमतो लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम् ॥ ७९<br><br>स्वर्लीनसदृशं भद्रे नन्दिपित्रा प्रतिष्ठितम्।<br>शिलाक्षेश्वरनामानं सुरसङ्घैः प्रपूजितम् ॥ ८०नन्दीश्वरके पश्चिममें पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! स्वर्लीनसदृश शिलाक्षेश्वर नामक वह लिङ्ग नन्दीके पिताके द्वारा स्थापित किया गया है, जो देवसमुदायके द्वारा पूजित है॥ ७९-८०॥
अन्यत्तत्र तु विख्यातं हिरण्याक्षेश्वरं विभुम्।<br>हिरण्याक्षेण दैत्येन स्थापितं मम भक्तितः ॥ ८१<br><br>हिरण्याख्यस्य सामीप्ये अन्यैर्देवैः सहस्रशः।<br>स्थापितानि च लिङ्गानि भक्त्या चैव फलार्थिभिः ॥ ८२वहाँपर हिरण्याक्षदैत्यने मेरी भक्तिसे हिरण्याक्षेश्वर नामक अन्य प्रसिद्ध तथा सर्वव्यापी लिङ्गकी भी स्थापना की है। फलकी आकांक्षावाले अन्य देवताओंके द्वारा हिरण्याक्षेश्वरके समीपमें भक्तिपूर्वक हजारों लिङ्ग स्थापित किये गये हैं॥ ८१-८२॥
अन्यद्वै देवदेवस्य स्थितं पश्चान्मुखं स्मृतम्।<br>तत्र स्थाने वरारोहे हिरण्याक्षस्य दक्षिणे ॥ ८३हे वरारोहे! उस स्थानपर हिरण्याक्षके दक्षिणमें देवदेव [शिव]-का अन्य पश्चिममुखवाला लिङ्ग भी बताया गया है॥ ८३॥
तेषां पश्चिमदिग्भागे अट्टहासं स्थितं शुभम्।<br>मुखं लिङ्गं तु तद्देवि पश्चिमाभिमुखं स्थितम् ॥ ८४<br><br>प्रसन्नवदने देवि सर्वपातकनाशकम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि ऐशानं लोकमाप्नुयात् ॥ ८५उनके पश्चिम दिशाभागमें अट्टहास नामक शुभ लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह मुखलिङ्ग पश्चिमकी ओर मुख किये हुए विराजमान है, हे प्रसन्न मुखवाली देवि! वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है; हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ईशानलोक प्राप्त करता है॥ ८४-८५॥
अट्टहाससमीपेन पश्चिमेन यशस्विनि।<br>मित्रावरुणनामानौ पूर्वद्वारे व्यवस्थितौ ॥ ८६<br><br>मित्रावरुणलोकस्तु तयोः सन्दर्शनाद्भवेत्।<br>अन्यत्तत्रैव विख्यातं वसिष्ठेशमिति स्थितम् ॥ ८७हे यशस्विनि! अट्टहासके समीप पश्चिममें पूर्वद्वारपर मित्रावरुण नामक दो लिङ्ग स्थित हैं; उन दोनोंके दर्शनसे मित्रावरुणलोक प्राप्त होता है। वहींपर वसिष्ठेश नामक अन्य प्रसिद्ध लिङ्ग भी विराजमान है॥ ८६-८७॥
स्थापितं तत्र तल्लिङ्गं याज्ञवल्क्येन वै पुरा।<br>चतुर्मुखं च तल्लिङ्गं सर्वपापक्षयकरम् ॥ ८८पूर्वकालमें [महर्षि] याज्ञवल्क्यने भी लिङ्गको स्थापित किया था; चार मुखोंवाला वह लिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है॥ ८८॥
अन्यत्तत्रैव संलग्नं मैत्रेय्या स्थापितं शुभम्।<br>तेन दृष्टेन लभते परं ज्ञानं सुदुर्लभम् ॥ ८९वहींपर समीपमें मैत्रेयीके द्वारा स्थापित अन्य शुभ लिङ्ग विद्यमान है; उसके दर्शनसे मनुष्य अति दुर्लभ परम ज्ञान प्राप्त करता है॥ ८९॥
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अध्याय १ ] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनौंका वर्णन ७६९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
याज्ञवल्क्येश्वरस्यापि पश्चिमे पश्चिमाननम्।<br>प्रह्लादेश्वरनामानमद्वैतफलदायकम् ।<br>प्रह्लादेश्वरात् पुरतः स्वयँलीनं तु तिष्ठति॥ ९०<br><br>स्वर्लीनेश्वरनामानं सुमहाफलदायकम्।<br>ज्ञानविज्ञाननिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम्॥ ९१याज्ञवल्क्येश्वरके भी पश्चिम भागमें पश्चिमकी ओर मुखवाला प्रह्लादेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है; यह अद्वैत फल देनेवाला है। प्रह्लादेश्वरके सामने स्वयंलीन स्वर्लीनेश्वर नामक लिङ्ग विराजमान है; यह अत्यधिक फल प्रदान करनेवाला है। ज्ञान-विज्ञानमें निष्ठ तथा परम आनन्दकी अभिलाषा करनेवालोंकी जो गति होती है, वह गति स्वर्लीन [तीर्थ]-में मरनेवालेकी होती है॥ ९०-९१ १/२॥
या गतिर्विहिता तेषां स्वर्लीने तु मृतस्य च।<br>स्वर्लीनात् पुरतो लिङ्गं स्थितं पूर्वमुखं शुभम्॥ ९२स्वर्लीनके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला वैरोचनेश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थित है; यह दैत्य-पुत्रद्वारा स्थापित किया गया है॥ ९२ १/२॥
वैरोचनेश्वरं नाम स्थापितं दैत्यसूनुना।<br>तस्य चैवोत्तरे देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्मृतम्॥ ९३<br><br>बलिना स्थापितं तत्तु शिवालोकपरायणम्।<br>अन्यच्चैतत् स्थिरं लिङ्गं बाणेश्वर इति स्थितम्॥ ९४हे देवि! उसके उत्तरमें भी पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग बताया गया है; शिवालोक प्रदान करनेवाला वह [लिङ्ग] बलिके द्वारा स्थापित किया गया है। वहाँ बाणेश्वर नामक अन्य स्थिर लिङ्ग भी विराजमान है॥ ९३-९४॥
राक्षसी तु महाभीमा नाम्ना शालकटङ्कटा।<br>तया च स्थापितं भद्रे तस्य चोत्तरतः शुभम्॥ ९५हे भद्रे! शालकटंकटा नामक [एक] महाभयंकर राक्षसी थी, उसके द्वारा उस [बाणेश्वर]-के उत्तरमें शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ९५॥
अन्यदायतनं पुण्यं तस्मिन् स्थाने यशस्विनि।<br>हिरण्यगर्भं विख्यातं पुण्यं तस्यापि दर्शनम्॥ ९६हे यशस्विनि! हिरण्यगर्भ नामसे प्रसिद्ध अन्य पुण्यप्रद आयतन [लिङ्ग] भी उस स्थानपर विद्यमान है; उसका भी दर्शन पुण्य प्रदान करनेवाला है॥ ९६॥
मोक्षेश्वरं तु तत्रैव स्वर्गेश्वरमतः परम्।<br>एतौ दृष्ट्वा सुरेशाने स्वर्गं मोक्षं च विन्दति॥ ९७हे सुरेशाने! इसके बाद वहींपर मोक्षेश्वर तथा स्वर्गेश्वर विद्यमान हैं; इनका दर्शन करके स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है॥ ९७॥
वासुकीश्वरनामानं तयोश्चोत्तरतः शुभम्।<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वकामफलप्रदम्॥ ९८उन दोनोंके उत्तरमें वासुकीश्वर नामक चार मुखवाला शुभ लिङ्ग स्थित है; वह लिङ्ग समस्त कामनाओंका फल देनेवाला है॥ ९८॥
तस्यैव पूर्वखण्डे तु वासुकेस्तीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नातो वरारोहे रोगैर्नैवाभिभूयते॥ ९९उसीके पूर्वभागमें वासुकिका उत्तम तीर्थ विद्यमान है; हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्य रोगोंसे आक्रान्त नहीं होता है॥ ९९॥
तस्यैव च समीपे तु चन्द्रेण स्थापितं शुभम्।<br>चन्द्रेश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं विद्येश्वरं शुभम्॥ १००<br><br>लभेद्द्याधरं लोकं तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ १०१उसीके समीपमें चन्द्रमाके द्वारा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। चन्द्रेश्वरके पूर्वमें विद्येश्वर नामक शुभ लिङ्ग विद्यमान है; उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य विद्याधरका लोक प्राप्त करता है॥ १००-१०१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्यवर्णन' नामक प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥

२- मातृमण्डल और आकाशलिङ्गका वर्णन

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७७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट ]


दूसरा अध्याय

मातृमण्डल और आकाशलिङ्गका वर्णन

संस्कृत मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
देव्युवाच<br>कथं वीरेश्वरो देव एतदिच्छामि वेदितुम्।<br>कथयस्व प्रसादेन देवदेव महेश्वर॥ १देवी बोलीं—हे देव! वीरेश्वर कैसे उत्पन्न हुए, मैं यह जानना चाहती हूँ; हे देवदेव! हे महेश्वर! आप कृपापूर्वक यह बतायें॥ १॥
ईश्वर उवाच<br>इह आसीत्पुरा राजा नियुक्तिर्नाम विश्रुतः।<br>तस्य भार्या महादेवि अरजा नाम विश्रुता॥ २ईश्वर बोले—हे महादेवि! इस लोकमें पूर्वकालमें नियुक्ति नामसे प्रसिद्ध [एक] राजा था, उसकी भार्या अरजा नामसे विख्यात थी॥ २॥
एकः पुत्रस्तया जातः कालेन बहुना तदा।<br>पादे द्वितीये सम्भूते मूलनक्षत्रसंज्ञके॥ ३<br>मन्त्रिभिश्च तदा देवि उक्ता तत्रेशभामिनी।<br>जातोऽयं दारको देवि पापनक्षत्रसम्भवः॥ ४<br>तस्मात्त्याज्यस्तु बालोऽयं राज्ञा चैव हितार्थिना।बहुत समयके बाद उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। मूल नक्षत्रके दूसरे चरणमें उसके उत्पन्न होनेपर मन्त्रियोंने राजाकी पत्नीसे कहा—हे देवि! यह बालक पापनक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है, अतः [अपने] कल्याणकी इच्छावाले राजाको इस बालकका त्याग कर देना चाहिये॥ ३-४१/२॥
एवमुक्ता तु सा देवि मन्त्रिभिर्हितकाम्यया॥ ५<br>ध्यात्वा चाधोमुखी दीना प्रतिपेदे महेश्वरीम्।हे देवि! हितकी कामनासे मन्त्रियोंके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर दुःखी होकर नीचेकी ओर मुख की हुई उस रानीने ध्यान करके महेश्वरीकी शरण ली॥ ५१/२॥
प्रोवाचेदं तदा धात्रीं बालं गृहीष्व मा चिरम्॥ ६<br>स्वर्लीनस्योत्तरे पार्श्वे मातृभ्यश्च समर्पितम्।<br>रक्षतामिति बालोऽयं मम पुत्र इत्यब्रवीत्॥ ७तब उसने धात्रीसे यह कहा—तुम बालकको शीघ्र ग्रहण करो और स्वर्लीनके उत्तरभागमें इसे मातृकाओंको समर्पित कर दो तथा [उनसे] कहो कि मेरे इस पुत्रकी रक्षा कीजिये॥ ६-७॥
राज्ञ्यास्तु वचनं सर्वं कृतं धातुकया तदा।<br>मातृणां हि तदा बालं निक्षेप्तुमुपचक्रमे॥ ८तदनन्तर धात्रीने रानीके समस्त वचनका पालन किया और उस बालकको मातृकाओंके पास रखनेका उपक्रम किया॥ ८॥
कदाचित्कालपर्याये मातृभिः परिचिन्तितम्।<br>अस्माकं पुत्रतां प्राप्त एष बालो न संशयः॥ ९तब किसी समय कालपर्यायसे मातृकाओंने सोचा कि यह बालक हमलोगोंके पुत्रत्वको प्राप्त हो चुका है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ९॥
अस्माभिर्गन्तुमारब्धं खेचरीचक्रमुत्तमम्।<br>ब्रह्माणी चाब्रवीद्देवि योगपीठं तु नीयताम्॥ १०<br>योगपीठेन दृष्टेन बालो राज्यक्षमो भवेत्।<br>सर्वाभिर्मातृभिश्चाथ तद्वाक्यमभिनन्दितम्॥ ११अब हमलोग उत्तम खेचरीचक्रको जाना आरम्भ करें। इसके बाद हे देवि! ब्रह्माणीने कहा कि इसे योगपीठ ले जाओ, योगपीठके दर्शनसे [यह] बालक राज्य प्राप्त करनेमें समर्थ होगा। तत्पश्चात् सभी मातृकाओंने उस बातका समर्थन किया॥ १०-११॥
नीतो विद्याधरं लोकं योगपीठं च दर्शितम्।<br>आश्वासितो मातृगणैः स्पृष्टः तत्र स बालकः॥ १२<br>कथ्यतां पूर्ववृत्तान्तः पुत्र बालकुमारक।वे उसे विद्याधरलोक ले गयीं और उसे योगपीठका दर्शन कराया। इसके बाद मातृगणोंने उसे आश्वस्त किया और उस बालकसे पूछा—हे पुत्र! हे बालकुमार! अपना पूर्ववृत्तान्त बताओ॥ १२१/२॥
कस्य त्वं पूर्णचन्द्राभ कथं प्राप्तोऽसि नो गृहम्।<br>एवमुक्तस्तदा बालो न किञ्चित्प्रत्यभाषत॥ १३हे पूर्णचन्द्रके समान आभावाले! तुम किसके पुत्र हो और हमलोगोंके घर कैसे आये? तब उनके ऐसा कहनेपर उस बालकने कुछ नहीं कहा॥ १३॥
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अध्याय २ ] मातृमण्डल और आकाशलिङ्गका वर्णन ७७१

पञ्चमुद्रोवाचपंचमुद्रा बोली—
तथा राज्यक्षमो बालस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>एवं श्रुत्वा तु तत्सर्वा मातरोऽभिमुखाभवन्॥ १४—यह बालक जिस भी तरह राज्य करनेमें समर्थ हो, वैसा तुम करो। यह सुनकर वे सभी माताएँ अभिमुख हुईं और बोलीं—'ऐसा ही होगा'—यह कहकर खेचरीसमुदाय प्रसन्न हो गया॥ १४ १/२ ॥
एवं भविष्यतीत्युक्त्वा तुष्टो वै खेचरीगणः।<br>गच्छ पुत्र स्वयं राज्यं पालयस्व यथासुखम्॥ १५उन्होंने कहा—'हे पुत्र! अब जाओ और सुखपूर्वक अपने राज्यका पालन करो'॥ १५॥
बालेन प्रार्थिताः सर्वाः प्रजाकामेन सुन्दरि।<br>यदाहं भविता चोर्व्यां सर्वलोकेषु पार्थिवः॥ १६<br>अवतारस्तदा कार्यो मद्भक्त्या परया तदा।हे सुन्दरि! तब प्रजाकी कामनावाले बालकने सभी माताओंसे प्रार्थना की कि जब मैं पृथ्वीपर सभी लोकोंका राजा बनूँ, तब मेरी परम भक्तिसे आपलोग अवतार ग्रहण करें॥ १६ १/२ ॥
एवं वै प्रार्थिताः सर्वा मातरो लोकमातरः॥ १७<br>अवतेरुर्यथायोगं कृष्णपक्षे चतुर्दशीम्।<br>पञ्चमुद्रा तु बालं तमनयन्नगरं पुनः॥ १८इस प्रकार [उसके द्वारा] प्रार्थित सभी लोकमातृस्वरूपा मातृकाओंने समयानुसार कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको अवतार लिया। पंचमुद्रा उस बालकको पुनः नगरमें ले गयीं॥ १७-१८॥
आगत्य च यथायोगमर्धरात्रे व्यवस्थितम्।<br>अवतेरुस्तदा हृष्टाः पञ्चमुद्रा विमातरः॥ १९वहाँ आ करके वे यथायोग अर्धरात्रिमैं व्यवस्थित हो गयीं। तब पंचमुद्रा तथा विमाताओंने प्रसन्न होकर अवतार लिया॥ १९॥
बालेन पूजिताः सर्वाः प्रतिष्ठाप्य यथाविधि।<br>पूजां गृहीत्वा बालस्य आकाशं तु पुनर्गताः॥ २०इसके बाद उस बालकने विधिपूर्वक प्रतिष्ठा करके सभी माताओंकी पूजा की और बालककी पूजा ग्रहण करके वे पुनः आकाशमें चली गयीं॥ २०॥
अद्यापि दृश्यते व्योम्नि मातृणां गणमण्डलम्।<br>निरीक्ष्यते पुण्यकर्मा उत्तराभिमुखं स्थितम्॥ २१मातृगणोंका समूहमण्डल आज भी आकाशमें देखा जाता है। पुण्यकर्मवाला व्यक्ति उत्तराभिमुखस्थित उस मण्डलको देख सकता है॥ २१॥
यदेतद्दृश्यते व्योम्नि मातृणां तु समीपतः।<br>आकाशलिङ्गमित्युक्तमयं स्वर्लीन उच्यते॥ २२मातृकाओंके समीप आकाशमें जो यह देखा जाता है, उसे आकाशलिङ्ग कहा गया है; इसीको स्वर्लीन कहा जाता है॥ २२॥
यथाकाशे तथा भूमौ एवं सर्वत्र दृश्यते।<br>एवमालोक्य तं सर्वं गगने मातृमण्डलम्॥ २३<br>मातृणां तु प्रभावेण नरो भवति सिद्धिभाक्।जैसे यह आकाशमें वैसे ही पृथ्वीपर दिखायी पड़ता है; इस प्रकार यह सर्वत्र दिखायी देता है। इस तरह उस सम्पूर्ण मातृमण्डलको आकाशमें देखकर मनुष्य मातृगणोंके प्रभावसे सिद्धिका भागी हो जाता है॥ २३ १/२ ॥
ततः प्रभृति देवेशि अस्मिन् क्षेत्रे व्यवस्थिता॥ २४<br>विपद्भियागता यस्माद्विकटा प्रोच्यते बुधैः।<br>बालो वीरत्वमापन्नो मत्प्रसादाद्यशस्विनि॥ २५<br>बालेन चाप्यहं देवि अस्मिन् देशे सुखोषितः॥ २६हे देवेशि! उसी समयसे वे देवी इस क्षेत्रमें विराजमान हो गयीं; वे विपत्तिके भयसे आयीं, अतः विद्वान् लोग उन्हें विकटा कहते हैं। हे यशस्विनि! वह बालक मेरी कृपासे वीरत्वसे युक्त हो गया और मैं भी बालकके साथ इस स्थानपर सुखपूर्वक रहने लगा॥ २४–२६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥

३- सगेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन

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७७२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

तीसरा अध्याय

सगरेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
वायव्ये तु दिशाभागे तस्य पीठस्य सुन्दरि।<br>सगरेण पुरा देवि तस्मिन् देशे प्रतिष्ठितम्॥ १<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वपापप्रणाशनम्।हे सुन्दरि! हे देवि! उस पीठके वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशाभागमें उस स्थानपर पूर्वकालमें सगरके द्वारा चार मुखवाला लिङ्ग स्थापित किया गया है; वह लिङ्ग समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ १<sup></sup>/<sub></sub>
तस्यैवोत्तरपूर्वेण नाम्ना वालीश्वरं शुभम्॥ २<br>वालिना स्थापितं लिङ्गं कपिना सुमहात्मना।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि तिर्यग्योनिं न गच्छति॥ ३उसीके उत्तर-पूर्वमें परम महात्मा कपि वालिके द्वारा वालीश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य तिर्यक् (पशु-पक्षी)-योनि नहीं प्राप्त करता है॥ २-३॥
तस्य चोत्तरदिग्भागे सुग्रीवस्य महात्मनः।<br>लिङ्गं तस्य शुभं भद्रे सर्वकिल्बिषनाशनम्॥ ४<br>तथा हनुमतात्रैव स्थापितं लिङ्गमुत्तमम्।उसके उत्तर दिशाभागमें महात्मा सुग्रीवके द्वारा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है; हे भद्रे! वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है और यहींपर हनुमान्जीने भी उत्तम लिङ्गकी स्थापना की है॥ ४<sup></sup>/<sub></sub>
सगरात्पश्चिमेनैव लिङ्गं तत्र प्रतिष्ठितम्॥ ५<br>मम भक्त्या च सुश्रोणि अश्विभ्यां परमेश्वरि।हे सुश्रोणि! हे परमेश्वरि! वहींपर सगरेश्वरके पश्चिममें दोनों अश्विनीकुमारोंने भक्तिपूर्वक मेरे लिङ्गकी स्थापना की है॥ ५<sup></sup>/<sub></sub>
तस्यैवोत्तरपार्श्वे तु भद्रदोहमिति स्मृतम्॥ ६<br>गवां क्षीरेण सञ्जातं सर्वपातकनाशनम्।<br>कपिलानां सहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम्।<br>तत्फलं लभते मर्त्यः स्नातस्तत्र न संशयः॥ ७उसीके उत्तरभागमें भद्रदोह [लिङ्ग] बताया गया है; गायोंके दुग्धसे निर्मित वह लिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है। उसमें स्नान किया हुआ मनुष्य हजार कपिला गायोंके दानका जो फल होता है, उस फलको प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६-७॥
पूर्वभाद्रपदायुकता पौर्णमासी यदा भवेत्।<br>तदा पुण्यतमः कालो ह्यश्वमेधफलप्रदः॥ ८पूर्वभाद्रपदसे युक्त पूर्णिमा जब हो, उस समयका पुण्यतम काल अश्वमेधयज्ञका फल देनेवाला होता है॥ ८॥
ह्रदस्य पश्चिमे तीरे भद्रेश्वरमिति स्थितम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो भद्रे गोलोकं लभते ध्रुवम्॥ ९[उस] ह्रद (सरोवर)-के पश्चिम तटपर भद्रेश्वर [लिङ्ग] स्थित है; हे भद्रे! उसका दर्शन करके मनुष्य निश्चित रूपसे गोलोक प्राप्त करता है॥ ९॥
भद्रेश्वरस्य दिग्भागे नैर्ऋते तु यशस्विनि।<br>उपशान्तशिवं नाम ख्यातं सर्वसुरासुरैः॥ १०<br>उपशान्तस्य देवस्य उत्तरे वरवर्णिनि।<br>चक्रेश्वरमिति ख्यातं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ११<br>पश्चिमाभिमुखं देवि ह्रदस्तस्यैव चाग्रतः।<br>तस्मिन् ह्रदे नरः स्नात्वा पूजयित्वा महेश्वरम्॥ १२<br>शिवलोकमवाप्नोति भावितेनान्तरात्मना।हे यशस्विनि! भद्रेश्वरके नैर्ऋत्य दिशाभागमें उपशान्तशिव नामक लिङ्ग बताया गया है। हे वरवर्णिनि! उपशान्तदेवके उत्तरमें सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत पश्चिमकी ओर मुखवाला चक्रेश्वरलिङ्ग कहा गया है। हे देवि! उसीके आगे [एक] सरोवर है; उस सरोवरमें स्नान करके तथा भक्तियुक्त मनसे महेश्वरकी पूजा करके मनुष्य शिवलोक प्राप्त करता है॥ १०-१२<sup></sup>/<sub></sub>
तस्य पश्चिमदिग्भागे शूलेश्वरमिति स्थितम्॥ १३उसके पश्चिम दिशाभागमें शूलेश्वरलिङ्ग विराजमान
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अध्याय ३ ] सगरेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन ७७३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शूलयन्त्रं पुरा न्यस्तं स्नानार्थं वरवर्णिनि।<br>ह्रदस्तत्र समुत्पन्नो देवदेवस्य चाग्रतः॥ १४<br>स्नानं कृत्वा ह्रदे तस्मिन् दृष्ट्वा शूलेश्वरं प्रभुम्।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति त्यक्त्वा संसारसागरम्॥ १५है; पूर्वकालमें वहाँ शूलयन्त्र स्थापित किया गया है। हे वरवर्णिनि! वहाँ देवदेवके समक्ष स्नानके लिये ह्रद उत्पन्न हुआ है; उस ह्रदमें स्नान करके तथा भगवान् शूलेश्वरका दर्शनकर मनुष्य संसार-सागरका त्याग करके रुद्रलोक प्राप्त करता है॥ १३-१५॥
शूलेश्वरस्य पूर्वेण अन्यदायतनं शुभम्।<br>तप्तं तत्र तपस्तीव्रं नारदेन सुरर्षिणा॥ १६<br>स्थापितं मम लिङ्गं तु कुण्डस्य पुरतः शुभम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै नारदेश्वरम्॥ १७<br>संसारमाया या घोरा तां तरेन्नात्र संशयः।<br>नारदेशस्य पूर्वेण नाम्ना धर्मेश्वरं शुभम्॥ १८शूलेश्वरके पूर्वमें दूसरा शुभ आयतन (तीर्थ) स्थित है, देवर्षि नारदने वहाँ घोर तपस्या की थी। कुण्डके सामने मेरा [एक] शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। उस कुण्डमें स्नान करके नारदेश्वरका दर्शन करके मनुष्य जो घोर संसारमाया है, उसे पार कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १६-१७ १/२॥
स्थापितं मम लिङ्गं तु कुण्डस्य पुरतः शुभे।<br>वायव्ये तु दिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि॥ १९<br>विनायकमिति ख्यातं कुण्डं तत्र शुभोदकम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चैव विनायकम्॥ २०<br>सर्वविघ्नविनिर्मुक्तो ह्यस्मिन् क्षेत्रे वसेच्चिरम्।<br>विनायकस्य संलग्न उत्तरेण यशस्विनि॥ २१हे शुभे! नारदेश्वरके पूर्वमें तथा कुण्डके सामने ही धर्मेश्वर नामक मेरा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। हे सुन्दरि! उन देवके वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशाभागमें विनायक बताये गये हैं, वहाँपर पवित्र जलवाला एक कुण्ड है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा विनायकका दर्शनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर इस क्षेत्रमें चिरकालतक वास करता है॥ १८-२० १/२॥
ह्रदस्तत्र सुविख्यातोऽमरको नाम नामतः।<br>दक्षिणेन तु कुण्डस्य मुखलिङ्गं तु तिष्ठति॥ २२<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चामरकेश्वरम्।<br>अज्ञानाच्चैव यत्किञ्चिदिह क्षेत्रे तु यत्कृतम्॥ २३<br>विलयं याति तत्सर्वं दृष्ट्वा तल्लिङ्गमुत्तमम्।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे नातिदूरे यशस्विनि॥ २४हे यशस्विनि! विनायकके समीपमें उत्तर दिशामें वहाँपर अति प्रसिद्ध ह्रद है और उस कुण्डके दक्षिणमें अमरक नामसे विख्यात मुखलिङ्ग स्थित है; उस कुण्डमें स्नान करके और उस उत्तम अमरकेश्वरलिङ्गका दर्शन करके [मनुष्यके द्वारा] इस क्षेत्रमें अज्ञानपूर्वक जो भी [पाप] किया गया रहता है, वह सब नष्ट हो जाता है॥ २१-२३ १/२॥
वरणायास्तटे शुद्धे लिङ्गं तत्रैव संस्थितम्।<br>वरणेश्वरं तु विख्यातं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ २५<br>तस्मिन् पाशुपतः सिद्ध अश्वपादो यशस्विनि।<br>अनेनैव शरीरेण शाश्वतीं सिद्धिमङ्गतः॥ २६हे यशस्विनि! उसके उत्तर दिशामें वहींपर समीपमें ही वरणाके पवित्र तटपर एक लिङ्ग स्थित है; वरणेश्वर नामसे विख्यात वह लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है॥ २४-२५॥<br>हे यशस्विनि! अश्वपाद नामक सिद्ध पाशुपत उसमें इसी शरीरसे शाश्वत सिद्धिको प्राप्त हुए हैं॥ २६॥
ममापि तत्र सान्निध्यं तस्मिँल्लिङ्गे यशस्विनि।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि गन्धर्वत्वं च विन्दति॥ २७हे यशस्विनि! वहाँ उस लिङ्गमें [सदा] मेरा भी सान्निध्य रहता है; हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे गन्धर्वत्वकी प्राप्ति होती है॥ २७॥
तस्य पश्चिमदिग्भागे नाम्ना शैलेश्वरं शुभम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि पूर्वोक्तं लभते फलम्॥ २८हे देवि! उसके पश्चिम दिशाभागमें शैलेश्वर नामक शुभ लिङ्ग है; उसका दर्शन करके मनुष्य पूर्वोक्त [समस्त] फल प्राप्त करता है॥ २८॥

४- कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य

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७७४श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
दक्षिणे चापि तस्यैव कोटीश्वरमिति स्थितम्।<br>यत्र सा दृश्यते देवि विश्रुता भीष्मचण्डिका॥ २९हे देवि! उसीके दक्षिणमें कोटीश्वर [नामक] लिङ्ग भी स्थित है, जहाँ वे प्रसिद्ध भीष्मचण्डिका दिखायी देती हैं॥ २९॥
बीभत्सविकृते भीमे श्मशाने वसते सदा।<br>तेन सा प्रोच्यते देवि विश्रुता भीष्मचण्डिका॥ ३०हे देवि! वे सदा बीभत्स रूपवाले भयानक श्मशानमें वास करती हैं, इसलिये वे प्रसिद्ध भीष्मचण्डिका कही जाती हैं॥ ३०॥
कोटितीर्थेषु यः स्नात्वा कोटीश्वरमथार्चयेत्।<br>गवां कोटिप्रदानेन यत्फलं लभते नरः॥ ३१कोटितीर्थोंमें स्नान करके कोटीश्वरका पूजन करना चाहिये। हे सुन्दरि! मनुष्य करोड़ों गायोंके दानसे जो फल प्राप्त करता है, वह सम्पूर्ण फल उसे यहाँपर मात्र एक बार स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है॥ ३१ १/२॥
तत्फलं सकलं तस्य स्नानेनैकेन सुन्दरि।<br>कोटीश्वरस्य पूर्वेण ऋषिभिश्चैः प्रतिष्ठितम्॥ ३२कोटीश्वरके पूर्वमें ऋषियोंके द्वारा एक लिङ्ग स्थापित किया गया है; उस लिङ्गके दर्शनसे चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् दृष्टिगत हो जाता है॥ ३२-३३॥
तेन लिङ्गेन दृष्टेन दृष्टं स्यात् सचराचरम्॥ ३३

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥


चौथा अध्याय

कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
कोटीश्वरस्य देवस्य आग्नेय्यां दिशि संस्थितः।<br>श्मशानस्तम्भसंज्ञेति विख्यातः सुप्रतिष्ठितः॥ १देवकोटीश्वरके आग्नेय दिशामें प्रसिद्ध तथा सुप्रतिष्ठित श्मशानस्तम्भ स्थित है। वहाँपर वे मनुष्य गिराये जाते हैं, जिन्होंने इस लोकमें बुरा कर्म किया है॥ १ १/२॥
मानवास्तत्र पात्यन्ते इह यैर्दुष्कृतं कृतम्।<br>यत्र स्तम्भे सदा देवि अहं तिष्ठामि भामिनि॥ २हे भामिनि! हे देवि! मैं उस स्तम्भमें सदा विराजमान हूँ। हे देवि! वहाँ जाकर जो मेरी पूजा करेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा और परम गति प्राप्त करेगा॥ २-३॥
तत्र गत्वा तु यः पूजां मम देवि करिष्यति।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो गच्छेच्च परमां गतिम्॥ ३
अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि महातीर्थं यशस्विनि।<br>कपालमोचनं नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ ४हे यशस्विनि! अब मैं तुम्हें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध कपालमोचन नामक महातीर्थके विषयमें बताऊँगा॥ ४॥
कपालं पतितं तत्र स्नातस्य मम सुन्दरि।<br>तस्मिन् स्नातो वरारोहे ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ ५हे सुन्दरि! वहाँ स्नान करते हुए मेरा कपाल गिर पड़ा था; हे वरारोहे! उसमें स्नान करनेवाला ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है॥ ५॥
कपालेश्वरनामानं तस्मिंस्तीर्थे व्यवस्थितम्।<br>अश्वमेधमवाप्नोति दर्शनात्तस्य सुन्दरि॥ ६उस तीर्थमें कपालेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है; हे सुन्दरि! उसके दर्शनसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है॥ ६॥
तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे ऋणैर्मुक्त्तो भवेन्नरः॥ ७उसीके उत्तरमें पासमें ही त्रैलोक्यप्रसिद्ध एक तीर्थ है, हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्य [सभी] ऋणोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७॥
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अध्याय ४] कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य [७७५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋणमोचनकं नाम्ना विख्यातं भुवि सुन्दरि।<br>त्रीणि लिङ्गानि तिष्ठन्ति तत्रैव मम सुन्दरि॥ ८<br>तानि दृष्ट्वा तु सुश्रोणि नश्यति त्रिविधम् ऋणम्।हे सुन्दरि! वह [तीर्थ] ऋणमोचन नामसे पृथ्वीलोकमें विख्यात है। हे सुन्दरि! वहींपर मेरे तीन लिङ्ग स्थित हैं; हे सुश्रोणि! उनका दर्शन करनेसे तीनों प्रकारके ऋण विनष्ट हो जाते हैं॥ ८ १/२॥
दक्षिणे तु दिशाभागे तस्य तीर्थस्य सुन्दरि॥ ९<br>अङ्गारेश्वरनामानं मुखलिङ्गं व्यवस्थितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवि कुण्डस्य पुरतः स्थितम्॥ १०हे सुन्दरि! उस तीर्थके दक्षिण दिशाभागमें अंगारेश्वर नामक मुखलिङ्ग विराजमान है। हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके सामने स्थित है॥ ९-१०॥
अङ्गारेण यदा योगश्चतुर्थ्यामष्टमीषु वा।<br>तीर्थे तस्मिन्नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै मङ्गलेश्वरम्॥ ११<br>व्याधिभिश्च विनिर्मुक्तो यत्र तत्राभिजायते।जब अंगार [मंगल]-के साथ चतुर्थी अथवा अष्टमीका योग हो, तब उस तीर्थमें स्नान करके तथा मंगलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य जहाँ-कहीं भी रहे, व्याधियोंसे पूर्णतः मुक्त हो जाता है॥ ११ १/२॥
तस्यैव च समीपस्थमुत्तरेण यशस्विनि॥ १२<br>लिङ्गं तु सुमहत् पुण्यं विश्वकर्मप्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं दृष्ट्वा सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात्॥ १३हे यशस्विनि! इसीके समीप उत्तर दिशामें विश्वकर्माके द्वारा स्थापित महापुण्यप्रद पश्चिमाभिमुख लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य सर्वज्ञत्व प्राप्त कर लेता है॥ १२-१३॥
बुधेश्वरं तु तत्रैव दृष्ट्वा भक्त्या दृढव्रतः।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति दृष्ट्वा देवं बुधेश्वरम्॥ १४वहींपर देव बुधेश्वरका भक्तिपूर्वक दर्शन करके दृढ व्रतवाला भक्त सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ १४॥
बुधेश्वराद्दक्षिणतो लिङ्गं चैव चतुर्मुखम्।<br>महामुण्डेश्वरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ १५बुधेश्वरके दक्षिणमें सभी सिद्धियोंको देनेवाला महामुण्डेश्वर नामक चतुर्मुखलिङ्ग है॥ १५॥
तस्य देवस्य पुरतः कूपस्तिष्ठति वै शुभः।<br>तस्य कूपस्य सा देवी उपरिष्टात् स्थिता शुभा॥ १६<br>स्नानार्थं तत्र सा क्षिप्ता माला मुण्डमयी मया।<br>तेन सम्प्रोच्यते देवि महामुण्डेति मानवैः॥ १७उन देवके समक्ष [एक] शुभ कूप विद्यमान है, उस कूपके ऊपर वे कल्याणमयी देवी विराजमान हैं। स्नानके लिये वहाँ मेरे द्वारा वह मुण्डमयी माला प्रक्षिप्त की गयी है, अतः हे देवि! मनुष्य उन्हें महामुण्डा कहते हैं॥ १६-१७॥
खट्वाङ्गं तत्र वै क्षिप्तं स्नानार्थं वरवर्णिनि।<br>खट्वाङ्गेश्वर नाम्ना तु स्थितं तत्रैव सुव्रते॥ १८हे वरवर्णिनि! स्नानहेतु वहींपर खट्वांग भी प्रक्षिप्त किया गया है; हे सुव्रते! वहींपर खट्वांगेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है॥ १८॥
भुवनेश्वरनाम्ना तु लिङ्गं देवि फलप्रदम्।<br>उत्तराभिमुखं लिङ्गं कुण्डाद्वै दक्षिणे तटे॥ १९<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै भुवनेश्वरम्।<br>न दुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते॥ २०हे देवि! वहाँ कुण्डके दक्षिण तटपर भुवनेश्वर नामक फलदायक लिङ्ग विराजमान है; वह लिङ्ग उत्तरकी ओर मुखवाला है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा भुवनेश्वरका दर्शन करके मनुष्य दुर्गति नहीं प्राप्त करता है और पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १९-२०॥
दक्षिणे भुवनेशस्य कुण्डमन्यच्च तिष्ठति।<br>नाम्ना विमलमीशं च लिङ्गं तस्यैव पूर्वतः॥ २१भुवनेश्वरके दक्षिणमें एक अन्य कुण्ड भी स्थित है, उसीके पूर्वमें विमलेश नामक लिङ्ग है॥ २१॥
वैमल्यं तु नरा यान्ति तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे मोदते दिवि देवतैः॥ २२उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं। हे वरारोहे! वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्दित रहता है॥ २२॥
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७७६श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

| तस्मिन् पाशुपतः सिद्धस्त्र्यम्बको नाम वै मुनिः।<br>अनेनैव शरीरेण रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥ २३ | उस स्थानपर त्र्यम्बक नामक सिद्ध पाशुपतमुनिने इसी शरीरसे रुद्रलोक प्राप्त किया था॥ २३॥ | | तस्याङ्गारककुण्डस्य पश्चिमेन यशस्विनि।<br>महदायतनं पुण्यं भृगुणा स्थापितं पुरा॥ २४<br>यस्तदायतनं दृष्ट्वा अर्चितं स्तुतिपूर्वकम्।<br>शिवलोकाच्च ते पुण्यान्न च्यवन्ति कदाचन॥ २५ | हे यशस्विनि! उस अंगारककुण्डके पश्चिममें पूर्व-कालमें महर्षि भृगुके द्वारा [एक] पुण्यप्रद विशाल आयतन (लिङ्ग) स्थापित किया गया है। उस लिङ्गका दर्शन करके जो लोग स्तुतिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं, वे पुण्यमय शिवलोकसे कभी च्युत नहीं होते हैं॥ २४-२५॥ | | दक्षिणेन तु तस्यैव अन्यदायतनं शुभम्।<br>नन्दीश्वरवरात्मानं देवानामपि दुर्लभम्॥ २६<br>तस्य दर्शनमात्रेण व्रतं पाशुपतं लभेत्।<br>तत्र सिद्धो महात्मा वै कपिलर्षिर्महातपाः॥ २७<br>त्रिकालमर्चयद्देवं गुहाशायी यतात्मवान्।<br>एवं वर्षसहस्रेण तस्य तुष्टोऽस्म्यहं प्रिये॥ २८<br>मम देवि प्रसादेन साङ्ख्यवेत्ता महायशाः।<br>कपिलेश्वरस्याधस्ताद्गुहा तत्रैव संस्थिता।<br>तां गुहां वीक्षते यो वै न स पापेन लिप्यते॥ २९ | उसीके दक्षिणमें देवताओंके लिये भी दुर्लभ नन्दीश्वर नामक अन्य शुभ लिङ्ग स्थित है; उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पाशुपतव्रत प्राप्त करता है। वहाँपर सिद्ध, महात्मा तथा महातपस्वी ऋषि कपिलने गुहामें रहकर जितेन्द्रिय होकर शिवजीकी त्रिकाल पूजा की थी, हे प्रिये! इस प्रकार एक हजार वर्षके अनन्तर मैं उनपर प्रसन्न हो गया और हे देवि! मेरी कृपासे वे महायशस्वी सांख्यवेत्ता हो गये। वहींपर कपिलेश्वरके नीचे [वह] गुहा स्थित है; जो उस गुहाका दर्शन करता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता है॥ २६—२९॥ | | देव्युवाच<br>कपिलेश्वरं कथं देवमोङ्कारेश्वरसंज्ञितम्।<br>कथयस्व प्रसादेन देवदेव महेश्वर॥ ३० | देवी बोलीं—हे देवदेव! हे महेश्वर! देव कपिलेश्वर किस प्रकार ओंकारेश्वर नामवाले हुए? कृपापूर्वक इसे बताइये॥ ३०॥ | | ईश्वर उवाच<br>त्रीणि लिङ्गानि गुह्यानि वाराणस्यां मम प्रिये।<br>येषां चैव तु सान्निध्यं मम चैव सुरेश्वरि॥ ३१ | ईश्वर बोले—हे प्रिये! हे सुरेश्वरि! वाराणसीमें मेरे तीन गुह्य लिङ्ग हैं, जिनमें मेरा सदा सान्निध्य रहता है॥ ३१॥ | | एवं चान्यप्रकारेण ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>क्रमान्मात्रा समुद्दिष्टा नन्दीशस्य तु सुन्दरि॥ ३२ | हे सुन्दरि! इस प्रकार क्रमसे ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वररूप तीन मात्राएँ नन्दीश्वरकी कही गयी हैं॥ ३२॥ | | अकारे च स्थितो विष्णुः पञ्चायतनसंस्थितः।<br>उकारो ब्रह्मणो रूपं तस्य दक्षिणतः प्रिये॥ ३३ | पंचायतनमें विराजमान विष्णु अकारमें स्थित हैं और हे प्रिये! ब्रह्माका रूप उकार उनके दक्षिणमें है॥ ३३॥ | | नन्दीशेश्वरनामाहमुत्तरेण व्यवस्थितः।<br>तं च देवि तदोङ्कारं मम रूपं सुरेश्वरि॥ ३४<br>मानवानां हितार्थाय तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्।<br>मत्स्योदर्यास्तु कूलेऽहमुत्तरे चोत्तरे प्रिये॥ ३५ | मैं नन्दीशेश्वर नामसे उत्तरमें स्थित हूँ। हे देवि! हे सुरेश्वरि! वही ओंकार मेरा रूप है, मनुष्योंके कल्याणके लिये मैं उस स्थानपर विराजमान हूँ॥ ३४ १/२॥ | | नन्दीशेश्वरनामाहमुत्तरेण व्यवस्थितः।<br>नन्दीशं परमं ब्रह्म नन्दीशं परमा गतिः॥ ३६<br>नन्दीशं परमं स्थानं दुःखसंसारमोचनम्।<br>अप्रकाशयमिदं कान्ते तव स्नेहात् प्रकाशितम्॥ ३७ | हे प्रिये! मैं मत्स्योदरीके उत्तर तटपर उत्तर दिशामें नन्दीशेश्वर नामसे स्थित हूँ। नन्दीश परम ब्रह्म हैं, नन्दीश परम गति हैं, नन्दीश परम पद हैं और वे दुःखरूप सागरसे मुक्ति दिलानेवाले हैं॥ ३५-३६ १/२॥ | | अन्यथा गोपनीयं तु मम भक्तिविवर्जिते।<br>युगे सप्तदशे देवि कृत्वा चैकां वसुन्धराम्॥ ३८ | हे कान्ते! यह रहस्य [सर्वथा] अप्रकाश्य है, मैंने तुम्हारे स्नेहके कारण इसे बताया है, मेरी भक्तिसे रहित व्यक्तिसे इसे गुप्त रखना चाहिये। हे देवि! सत्रहवें युगमें |

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अध्याय ४ ] कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य ७७७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
संहारं तु तपः कृत्वा अस्मिन् देशे समागतः।<br>ओङ्कारमूर्तिमास्थाय त्रिभेदेन स्थितो ह्यहम्॥ ३९सम्पूर्ण पृथ्वीको एक करके (जलाप्लावित करके) तथा संहाररूप तप करके मैं इस स्थानपर आ गया और ओंकाररूप धारणकर तीन रूपोंमें स्थित हो गया हूँ॥ ३७-३९॥
सर्वेषामेव सिद्धानां तत् स्थानं परिकीर्तितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गं शिवः साक्षात् स्वयमेव व्यवस्थितः॥ ४०वह सभी सिद्धोंका स्थान कहा गया है। उस लिङ्गमें स्वयं साक्षात् शिव विराजमान हैं॥ ४०॥
पूर्वामुखं तु तं देवं सिद्धसङ्घैः प्रपूजितम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं देवानामपि दुर्लभम्॥ ४१पूर्वकी ओर मुखवाला वह ओंकारेश्वर नामक लिङ्ग सिद्धोंके द्वारा पूजित है तथा देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥ ४१॥
वामदेवस्तु सावर्णिर्घोरः कपिलस्तथा।<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्ता योगे पाशुपते स्थिताः॥ ४२वहाँपर वामदेव, सावर्णि, अघोर तथा कपिल पाशुपतयोगमें स्थित होकर परम सिद्धिको प्राप्त हुए॥ ४२॥
अन्ये च ऋषयो देवा यक्षगन्धर्वगुह्यकाः।<br>युगे युगे गमिष्यन्ति तस्मिन् स्थाने स्थितः सदा॥ ४३अन्य ऋषि, देवता, यक्ष, गन्धर्व तथा गुह्यक युग-युगमें उस स्थानपर जायँगे, मैं सदा वहाँ स्थित रहूँगा।
दिव्या हि सा परा मूर्तिः कपिलेश्वरसंज्ञिता।<br>कदाचिदस्य देवस्य दर्शने जाह्नवी प्रिये॥ ४४कपिलेश्वर नामक वह मूर्ति परम दिव्य है॥ ४३<sup></sup>/<sub></sub><br>हे प्रिये! कभी-कभी इन प्रभुके दर्शनके लिये गंगा मत्स्योदरी स्थानपर आती हैं, वहाँ स्नान करना मोक्षदायक होता है॥ ४४<sup></sup>/<sub></sub>
मत्स्योदरीं समायाति तत्र स्नानं तु मोक्षदम्।<br>आराध्य कपिलेशं तु त्रैलोक्यपालनक्षमाः॥ ४५<br><br>भवन्ति पुरुषा देवि मम नित्यं च वल्लभाः।<br>ओङ्कारं तत्परं ब्रह्म सकलं निष्कलं स्थितम्॥ ४६हे देवि! कपिलेश्वरकी आराधना करके मनुष्य तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हो जाते हैं और सदा मेरे प्रिय बने रहते हैं। वे ओंकारेश्वर परब्रह्म हैं और निष्कल होते हुए भी सकल (साकार)-रूपमें स्थित हैं॥ ४५-४६॥
रुद्रलोकस्य तद्द्वारं रहस्यं परिकीर्तितम्।<br>कपिलेश्वरस्याधस्ताद्दक्षिणे वरवर्णिनि॥ ४७<br><br>मत्स्योदरीं समेष्यन्ति तीर्थानि सह सागरैः।<br>षष्टिकोटिसहस्राणि षष्टिकोटिशतानि च॥ ४८वह लिङ्ग रुद्रलोकका रहस्यमय द्वार कहा गया है। हे वरवर्णिनि! कपिलेश्वरके नीचे दक्षिणमें मत्स्योदरीमें साठ हजार करोड़ तथा साठ सौ करोड़ तीर्थ सभी सागरोंके साथ प्रत्येक पक्षकी अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथिको आते हैं॥ ४७-४८<sup></sup>/<sub></sub>
पक्षे पक्षे समेष्यन्ति चतुर्दश्यष्टमीषु च।<br>मत्स्योदर्यां यदा गङ्गा पश्चिमे कपिलेश्वरे॥ ४९<br><br>समायाति महादेवि स च योगः सुदुर्लभः।<br>तस्मिन् स्नानं महाभागे अश्वमेधसहस्रदम्॥ ५०हे महादेवि! जब कपिलेश्वरके पश्चिममें मत्स्योदरीमें गंगा आती हैं, तब वह योग परम दुर्लभ होता है, हे महाभागे! उसमें [किया गया] स्नान हजार अश्वमेधयज्ञका फल देनेवाला होता है॥ ४९-५०॥
तस्य लिङ्गस्य माहात्म्यं कपिलेशस्य कीर्तितम्।<br>न कस्यचिद्देयं च गोपनीयं प्रयत्नतः॥ ५१<br><br>तत्रैव अक्षरं ब्रह्म नादेयं परिकीर्तितम्॥ ५२[हे देवि!] उस कपिलेश्वरलिङ्गका माहात्म्य कह दिया गया। इसे जिस किसीको नहीं बताना चाहिये, अपितु प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिये, वहींपर नादेय अक्षर ब्रह्म कहा गया है॥ ५१-५२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे कपिलेश्वरमाहात्म्ये ओङ्कारनिर्णयो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'कपिलेश्वरमाहात्म्यमें ओंकारनिर्णय' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥

५- कपिलेश्वरमें सिद्धि प्राप्त करनेवाले मुनियोंका वर्णन

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७७८श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

पाँचवाँ अध्याय

कपिलेश्वरमें सिद्धि प्राप्त करनेवाले मुनियोंका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ईश्वर उवाच<br>तत्र स्थाने तु ये सिद्धास्तान् प्रवक्ष्याम्यहं पुनः।<br>महापाशुपता श्रेष्ठा मम पुत्रा महौजसः॥ १<br>अनन्यमनसः शुद्धाः सेवितोऽहं पुरा सदा।ईश्वर बोले—[हे देवि!] उस स्थानमें जो सिद्ध हुए हैं, अब मैं उनके विषयमें बताऊँगा। महापाशुपत, श्रेष्ठ, महातेजस्वी, अनन्य चित्तवाले तथा विशुद्धात्मा मेरे पुत्र वहाँ रहते हैं, उन्होंने पूर्वकालमें सदा मेरी सेवा की थी॥ १ १/२॥
शीतातपविनिर्मुक्तं प्रासादैरुपशोभितम्॥ २<br>कैलासपृष्ठे देवस्य यादृग्देवि गृहं शुभम्।<br>तदभ्यधिकरूपं तु कृत्वा देवस्य मन्दिरम्॥ ३<br>सेव्यते सिद्धतुल्यैस्तु सर्वसिद्धानुकम्पिभिः।<br>तदा सिद्धिरनुप्राप्ता निर्वाणाया गतिः पुरा॥ ४हे देवि! कैलासशिखरपर शीत-आतपसे रहित तथा महलोंसे सुशोभित भगवान् शिवका जैसा सुन्दर भवन है, उससे भी अधिक रूपवाला शिवमन्दिर बनाकर सिद्धतुल्य तथा सभी सिद्धोंपर अनुकम्पा करनेवालोंके द्वारा वह स्थान सेवित होता है, उस समय जो निर्वाणगति है, उन्होंने उस सिद्धिको प्राप्त किया॥ २–४॥
कपिलेश्वरस्य चैवाग्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्मृतम्।<br>उद्दालक ऋषिस्तत्र सिद्धिं परमिकां गतः॥ ५कपिलेश्वरके आगे पश्चिमाभिमुख लिङ्ग बताया गया है, वहाँ ऋषि उद्दालक परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे॥ ५॥
अन्यत् पश्चान्मुखं लिङ्गं स्थितं तत्र तथोत्तरे।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धः पाराशर्यो महामुनिः॥ ६वहाँ उत्तर दिशामें पश्चिमकी ओर मुखवाला दूसरा लिङ्ग भी स्थित है, उस लिङ्गमें महामुनि पाराशर्य (व्यास) पूर्ण रूपसे सिद्ध हुए॥ ६॥
अन्यत्तत्रैव संलग्ने स्थितं पश्चान्मुखं शुभम्।<br>तस्मिन्नायतने सिद्धो महाज्ञानी हि बाष्कलिः॥ ७वहींपर समीपमें पश्चिमकी ओर मुखवाला दूसरा शुभ लिङ्ग विराजमान है, उस स्थानपर बाष्कलि [मुनि] सिद्ध तथा महाज्ञानी हुए॥ ७॥
तस्यैव तु समीपस्थं स्थितं पूर्वामुखं प्रिये।<br>तत्र पाशुपतः सिद्धो भाववृत्तस्तु वै मुनिः॥ ८हे प्रिये! उसीके समीपमें [अन्य] पूर्वमुख लिङ्ग स्थित है, वहाँ पशुपतिके भक्त मुनि भाववृत्त सिद्ध हुए॥ ८॥
तस्यैव पश्चिमे देवि मुखलिङ्गं तु तिष्ठति।<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्त अरुणिर्नाम नामतः॥ ९हे देवि! उसीके पश्चिममें मुखलिङ्ग स्थित है, वहाँ अरुणि नामवाले ऋषिने परम सिद्धि प्राप्त की॥ ९॥
पश्चिमे अरुणीशस्य अन्यल्लिङ्गं तु तिष्ठति।<br>अस्मिन् पाशुपताचार्यो योगसिद्धो महामुनिः॥ १०<br>अन्यत्तत्रैव संलग्नं दक्षिणे लिङ्गमुत्तमम्।<br>तत्र सिद्धिं गतो देवि कौस्तुभो नाम वै ऋषिः॥ ११अरुणीशके पश्चिममें दूसरा लिङ्ग भी स्थित है, यहाँपर महामुनि पाशुपताचार्य योगमें सिद्ध हुए। वहींपर दक्षिण दिशामें समीपमें ही एक दूसरा उत्तम लिङ्ग विराजमान है, हे देवि! वहाँपर कौस्तुभ नामक ऋषिने सिद्धि प्राप्त की॥ १०-११॥
तस्य दक्षिणपार्श्वे तु लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>महापाशुपतः सिद्धः सावणिस्तत्र वै मुनिः॥ १२उसके दक्षिण भागमें पूर्वकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, वहाँ महापाशुपत मुनि सावणि सिद्ध हुए॥ १२॥
तस्याग्रे तु महल्लिङ्गं स्थितं पूर्वामुखं शुभम्।<br>अस्मिँल्लिङ्गे शिवः साक्षात् स्वयमेव व्यवस्थितः॥ १३उसके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला महान् तथा

६- श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन

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अध्याय ६ ] श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन ७७९

ओङ्कारमूर्तिमास्थाय स्थितोऽहं तत्र सुव्रते।<br>चत्वारो मुनयः सिद्धास्तस्मिँल्लिङ्गे यशस्विनि॥ १४<br><br>वामदेवस्तु सावर्णिर्घोरः कपिलस्तथा।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धा नन्दीशस्य प्रभावतः॥ १५उत्तम लिङ्ग स्थित है। इस लिङ्गमें स्वयं साक्षात् शिव व्यवस्थित हैं, हे सुव्रते! मैं ओंकारमूर्ति धारण करके वहाँ स्थित हूँ। हे यशस्विनि! उस लिङ्गमें चार मुनि सिद्ध हुए हैं। वामदेव, सावर्णि, अघोर तथा कपिल उस लिङ्गमें नन्दीशके प्रभावसे सिद्ध हुए॥ १३-१५॥
तस्य देवस्य चाधस्ताद्गुहा सिद्धैस्तु वन्दिता।<br>श्रीमुखी नाम सा ज्ञेया योगसिद्धैस्तु सेविता॥ १६उन प्रभुके नीचे सिद्धोंद्वारा वन्दित एक गुहा है, योगसिद्धोंके द्वारा सेवित उस गुहाको श्रीमुखी नामवाली जानना चाहिये॥ १६॥
तत्र पाशुपताः श्रेष्ठा मम लिङ्गार्चने रताः।<br>तेषां चैव निवासार्थं सा गुहा निर्मिता मया॥ १७वहाँ श्रेष्ठ पाशुपत [भक्त] मेरे लिङ्गार्चनमें संलग्न रहते हैं, मैंने उन्हींके निवासके लिये उस गुहाका निर्माण किया है॥ १७॥
तस्य द्वारे तु सुश्रोणि सिद्ध अघोरो महामुनिः।<br>अनेनैव शरीरेण रुद्रत्वं गतवान् मुनिः॥ १८हे सुश्रोणि! उसके द्वारपर महामुनि अघोर सिद्ध हुए हैं, वे मुनि इसी शरीरसे रुद्रत्वको प्राप्त हुए॥ १८॥
तत्र गत्वा त्रिरात्रं तु क्षपयेदेकमानसः।<br>नरो वा यदि वा नारी संसारं न विशेत् पुनः॥ १९वहाँ जाकर कोई पुरुष अथवा स्त्री यदि एकाग्रचित्त होकर [उपवासपूर्वक] तीन रात व्यतीत करे, तो वह पुनः संसारमें प्रवेश नहीं करता है॥ १९॥
अघोरेश्वरदेवस्य चोत्तरे कूपमुत्तमम्।<br>तस्योपस्पर्शनाद्देवि वाजपेयं च विन्दति॥ २०अघोरेश्वरदेवके उत्तरमें एक उत्तम कूप स्थित है, हे देवि! उसमें स्नान करनेसे वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है॥ २०॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥


छठा अध्याय

श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
अन्यदायतनं वक्ष्ये वाराणस्यां सुरेश्वरि।<br>यत्र साक्षात्स्वयं भद्रे रममाणं तु सर्वदा॥ १हे सुरेश्वरि! हे भद्रे! अब मैं वाराणसीमें स्थित अन्य आयतनका वर्णन करूँगा, जहाँ सर्वदा साक्षात् स्वयं मैं विहार करता हूँ॥ १॥
मत्स्योदरीतटे रम्ये सुरसिद्धनमस्कृते।<br>रोचते मे सदा वासस्तस्मिन्नायतने शुभे॥ २मत्स्योदरीके मनोहर तटपर देवताओं तथा सिद्धोंद्वारा नमस्कृत उस शुभ आयतनमें सदा निवास करना मुझे अच्छा लगता है॥ २॥
स्थानानामेव सर्वेषामतिरम्यं मम प्रियम्।<br>यत्र पाशुपता देवि मम लिङ्गार्चने रताः॥ ३<br><br>मम पुत्रास्तु ते सर्वे ब्रह्मचर्येण संयुताः।<br>शान्ता दान्ता जितक्रोधा सिद्धास्तत्र न संशयः॥ ४हे देवि! वह सभी स्थानोंसे अधिक रम्य तथा मुझे [अत्यन्त] प्रिय है, जहाँ पशुपतिके भक्त मेरे लिङ्गार्चनमें रत रहते हैं। वहाँ ब्रह्मचर्यसे युक्त, शान्त, जितेन्द्रिय तथा क्रोधपर विजय प्राप्त किये हुए वे मेरे सभी पुत्र सिद्ध हुए हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ३-४॥
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७८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट ---|--- लोभादिविषयासक्तो नरकाच्च निवर्तते।<br>मम लिङ्गानि पुण्यानि पूजयति सदात्र यः॥ ५ | यहाँपर जो सदा मेरे पुण्यप्रद लिङ्गकी पूजा करता है, वह लोभ आदि विषयोंमें आसक्त होनेपर भी नरकसे छूट जाता है॥ ५॥ तेषां मध्ये तु तत्रैव लिङ्गं वै पश्चिमामुखम्।<br>श्रीकण्ठनाम विख्यातं कपिलेश्वरदक्षिणे॥ ६<br>तस्मिन् पाशुपतः सिद्धः ऋतुध्वज इति स्मृतः।<br>मम चैव प्रसादेन योगैश्वर्यमवाप्नुयात्॥ ७ | उनके मध्यमें वहींपर कपिलेश्वरके दक्षिणमें श्रीकण्ठ नामसे विख्यात पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसमें पाशुपत ऋतुध्वज सिद्ध हुए हैं—ऐसा कहा गया है, और उन्होंने मेरी कृपासे योगैश्वर्य प्राप्त किया था॥ ६-७॥ तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पूर्वमुखं स्थितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु जाबालः सिद्धिं परमिकां गतः॥ ८ | हे भद्रे! उसीके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गमें [ऋषि] जाबाल परम सिद्धिको प्राप्त हुए॥ ८॥ अपरं चैव लिङ्गं तु तस्य दक्षिणतः स्थितम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं देवाना मपि दुर्लभम्॥ ९<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्तो मुनिः कालिकवृक्षिकः।<br>सर्वेषामेव सिद्धानामुत्तमोत्तमसंस्थितः॥ १० | उसके दक्षिणमें देवताओंके लिये भी दुर्लभ ओंकारेश्वर नामक दूसरा लिङ्ग स्थित है, वहाँ मुनि कालिकवृक्षिक परम सिद्धिको प्राप्त हुए और सभी सिद्धोंमें श्रेष्ठतम हो गये॥ ९-१०॥ तस्यैव दक्षिणे भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धो गार्ग्यश्च सुमहातपाः॥ ११ | हे भद्रे! उसीके दक्षिणमें पश्चिमकी ओर मुखवाला [एक] लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गमें परम तपस्वी गार्ग्य सिद्ध हुए हैं॥ ११॥ पञ्चायतनमेतं ते मया च कथितं शुभे।<br>न कस्यचिन्मयाख्यातं रहस्यं परमाद्भुतम्॥ १२ | हे शुभे! मैंने तुमसे इस पंचायतनका वर्णन किया, मैंने इस अत्यन्त अद्भुत रहस्यको किसीको भी नहीं बताया है॥ १२॥ पञ्चब्रह्मेति विख्यातमेतदद्यापि सुन्दरि।<br>एतस्मात्कारणाद्देवि पञ्चायतनमुच्यते॥ १३ | हे सुन्दरि! यह आज भी पंचब्रह्म नामसे विख्यात है, हे देवि! इसी कारणसे इसे पंचायतन कहा जाता है॥ १३॥ चतुराश्रमिणां पुण्यं यत्फलं प्रतिपद्यते।<br>तत्फलं सकलं प्रोक्तं पञ्चायतनदर्शनात्॥ १४ | चारों आश्रमियोंके लिये जो भी पुण्यफल कहा गया है, वह समस्त फल पंचायतनका दर्शन करनेमात्रसे बताया गया है॥ १४॥ इदं पाशुपतं श्रेष्ठं मदीयव्रतचारिणाम्।<br>योगिनां मोक्षलिप्सूनां संसारभयनाशनम्॥ १५ | मेरा व्रत करनेवालोंके लिये यह श्रेष्ठ पाशुपतव्रत है और मोक्षकी इच्छावाले योगियोंके लिये संसारभयका नाश करनेवाला है॥ १५॥ नराणामल्पबुद्धीनां पापोपहतचेतसाम्।<br>भेषजं परमं प्रोक्तं पञ्चायतनमुत्तमम्॥ १६ | यह उत्तम पंचायतन अल्प बुद्धिवाले तथा पापसे नष्ट चित्तवाले मनुष्योंके लिये महान् औषध कहा गया है। तस्माद्यत्नं सदा कुर्यात्पञ्चायतनदर्शने।<br>पञ्चायतनसामीप्ये कूपस्तिष्ठति सुन्दरि॥ १७ | अतः पंचायतनके दर्शनका सदा प्रयत्न करना चाहिये। हे सुन्दरि! पंचायतनके समीपमें एक कूप स्थित है, उस तस्मिन् कूप उपस्पृश्य दीक्षाफलमवाप्नुयात्।<br>तस्मिन् दक्षिणदिग्भागे रुद्रवासः प्रकीर्तितः॥ १८ | कूपमें मार्जन-स्नान करके मनुष्य [शिव-] दीक्षाका फल

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अध्याय ६ ] श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन ७८१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्राप्त करता है। उसके दक्षिण दिशाभागमें रुद्रवास कहा गया है॥ १६-१८॥
रुद्रस्योत्तरपार्श्वे तु पञ्चायतनदक्षिणे।<br>तत्र कुण्डं महत् प्रोक्तं महापातकनाशनम्॥ १९<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा अभीष्टं फलमाप्नुयात्।<br>चतुर्दश्यां यदा योग आर्द्रानक्षत्रसंयुतः॥ २०<br>तदा पुण्यतमः कालस्तस्मिन् स्नाने महाफलम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा रुद्रं च भामिनि॥ २१<br>यत्र तत्र मृतो देवि रुद्रलोकं तु गच्छति।वहॉँपर रुद्रके उत्तरभागमें तथा पंचायतनके दक्षिणमें महापापोंका नाश करनेवाला एक विशाल कुण्ड बताया गया है, उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है। जब चतुर्दशी तिथिमें आर्द्रा नक्षत्रसे संयुक्त योग हो, तब पुण्यतम काल होता है, उस समय उस [कुण्ड]-में स्नान करनेसे महान् फल होता है। हे भामिनि! हे देवि! उस तीर्थमें स्नान करके तथा रुद्रका दर्शन करके जहाँ कहीं भी मनुष्य मरता है, [तत्काल] रुद्रलोकको जाता है॥ १९-२१ १/२॥
पूर्वामुखस्थितश्चाहं तस्मिँल्लिङ्गे महेश्वरि॥ २२<br>रुद्राणां कोटिजप्येन यत्फलं प्रतिपद्यते।<br>तत्फलं लभते भद्रे तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ २३हे महेश्वरि! मैं उस लिङ्गमें पूर्वकी ओर मुख किये हुए स्थित हूँ। हे भद्रे! करोड़ों रुद्रोंका जप करनेसे जो फल होता है, वह फल उस लिङ्गके दर्शनसे प्राप्त हो जाता है॥ २२-२३॥
रुद्रस्य च समीपे तु ऋषिभिः स्थापितानि च।<br>लिङ्गानि मम सुश्रोणि सर्वकामफलानि च॥ २४<br>रुद्रस्य नैर्ऋते भागे महालयमिति स्मृतम्।<br>दर्शनाच्च पदं तस्य महाभाग्यस्य सुन्दरि॥ २५हे सुश्रोणि! रुद्रके समीपमें समस्त वांछित फल प्रदान करनेवाले [अनेक] लिङ्ग ऋषियोंके द्वारा स्थापित किये गये हैं। रुद्रके नैर्ऋत्य दिशामें महालय बताया गया है, हे सुन्दरि! उसके दर्शनसे महाभाग्यका पद प्राप्त होता है॥ २४-२५॥
तत्र स्थाने शुभे रम्ये स्वयं तिष्ठति पार्वती।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि कूपस्तिष्ठति निर्मलम्॥ २६<br>पितरस्तत्र तिष्ठन्ति ये दिव्या ये च मानुषाः।<br>तस्मिन् कूप उपस्पृश्य जलं सङ्गृह्य भामिनि॥ २७उस शुभ तथा रम्य स्थानपर स्वयं पार्वती विराजमान हैं। हे देवि! उसीके आगे निर्मल कूप स्थित है। जो दिव्य तथा मानुष पितर हैं, वे वहाँ रहते हैं। हे भामिनि! हे देवि! मेरे लोककी इच्छा रखनेवालेको चाहिये कि उस कूपमें स्नान करके जल लेकर वहाँ पिण्डदान करे॥ २६-२७ १/२॥
पिण्डस्तत्र प्रदातव्यो मम देवि पदस्पृहः।<br>श्राद्धं तत्र प्रकुर्वीत अन्नाद्येनोदकेन च॥ २८<br>पिण्डः कूपे तु तत्रैव प्रेक्षप्तव्यः शुभानने।<br>एवं कृत्वा तु यस्तस्मिंस्तीर्थे रुद्रमहाालये॥ २९<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोकं स गच्छति।<br>तत्र वैतरणी नाम दीर्घिका पश्चिमामुखी॥ ३०<br>तस्यां स्नात्वा वरारोहे नरकं न च पश्यति।हे शुभानने! अन्न आदिसे तथा उस जलसे श्राद्ध करना चाहिये और वहींपर कूपमें पिण्डको छोड़ देना चाहिये। जो उस रुद्रमहालय तीर्थमें इस प्रकारसे [श्राद्ध] करता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंसहित रुद्रलोकको जाता है। वहाँपर पश्चिमकी ओर मुखवाली वैतरणी नामक दीर्घिका (बावली) है, हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्यको नरक नहीं देखना पड़ता है॥ २८-३० १/२॥
खण्डस्फुटितसंस्कारं यस्तत्र कुरुते शुभे॥ ३१<br>रुद्रलोकोऽक्षयस्तस्य सर्वकालं यशस्विनि।<br>महाालयस्योत्तरेण लिङ्गानि सुमहन्ति च॥ ३२हे शुभे! हे यशस्विनि! जो वहाँपर खण्डस्फुटित-संस्कार करता है, उसे सदाके लिये अक्षय रुद्रलोक प्राप्त होता है। महालयके उत्तरमें अति महान् लिङ्ग विद्यमान

७- कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेश्वर, दधीचेश्वर तथा कालेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन

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७८२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
देवैः सर्वैर्महाभागैः स्थापितानि शुभार्थिभिः।हैं, जो मंगलकी कामनावाले सभी महाभाग्यशाली देवताओंके द्वारा स्थापित किये गये हैं॥ ३१-३२१/२॥
पश्चिमे तु दिशाभागे रुद्रकुण्डस्य भामिनि॥ ३३<br><br>लिङ्गं तत्र स्थितं शुभ्रं देवाचार्य प्रतिष्ठितम्।<br>बृहस्पतीश्वरं नाम सर्वदुःखविनाशनम्॥ ३४हे भामिनि! वहाँ रुद्रकुण्डके पश्चिम दिशाभागमें एक शुभ्र लिङ्ग स्थित है, सभी दुःखोंका नाश करनेवाला बृहस्पतीश्वर नामक वह लिङ्ग देवताओंके आचार्य (बृहस्पति)-के द्वारा स्थापित किया गया है॥ ३३-३४॥
पितृभिः स्थापितं लिङ्गं तटे कूपस्य दक्षिणे।<br>तेन पूजितमात्रेण पितरस्तृप्तिमाप्नुयुः॥ ३५कूपके दक्षिण तटपर पितरोंके द्वारा [एक] लिङ्ग स्थापित किया गया है, उसके पूजनमात्रसे पितर तृप्त हो जाते हैं॥ ३५॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६॥


सातवाँ अध्याय

कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, दधीचेश्वर तथा कालेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
अन्यदायतनं श्रेष्ठं कालिपुर्य्यां सुरेश्वरि।<br>दक्षिणेन स्थितं देवं रुद्रवासस्य सुन्दरि॥ १<br><br>कामेश्वरमिति ख्यातं सर्वकामफलप्रदम्।—हे सुरेश्वरि! हे सुन्दरि! कालिपुरीमें रुद्रवासके दक्षिणमें दूसरा श्रेष्ठ आयतन भी स्थित है, कामेश्वर नामसे विख्यात वह लिङ्ग सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है॥ १ १/२ ॥
तप्तं तत्र तपस्तीव्रं कामदेवेन वै पुरा॥ २<br><br>कुण्डं तदुद्भवं देवि पद्मोत्पलसमन्वितम्।<br>कुण्डस्यैव तटे रम्ये उत्तमे वरवर्णिनि॥ ३<br><br>लिङ्गं तत्र स्थितं दिव्यं पश्चिमाभिमुखं प्रिये।<br>गन्धधूपनमस्कारैर्मुखवाद्यैश्च सर्वशः॥ ४<br><br>यो मामर्चयते तत्र तस्य तुष्याम्यहं सदा।<br>तुष्टे तु मयि देवेशि सर्वान् कामाँल्लभेत सः॥ ५पूर्वकालमें वहाँ कामदेवने घोर तपस्या की थी, इससे हे देवि! कमलोंसे युक्त एक कुण्ड वहाँ उत्पन्न हो गया। हे वरवर्णिनि! हे प्रिये! वहाँ कुण्डके ही रम्य तथा उत्तम तटपर पश्चिमकी ओर मुखवाला दिव्य लिङ्ग स्थित है। वहाँपर जो [व्यक्ति] गन्ध, धूप, नमस्कार तथा मुखवादनके द्वारा विधिवत् मेरा अर्चन करता है, उसके ऊपर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ, हे देवेशि! मेरे प्रसन्न हो जानेपर वह सभी इच्छित फलोंको प्राप्त कर लेता है॥ २—५॥
ततः प्रभृति वै तस्मिन्नन्येऽपि सुरपुङ्गवाः।<br>आराधयन्तो मां तस्मिंस्तीर्थं वक्तुं महातपाः॥ ६उसी समयसे दूसरे श्रेष्ठ देवता भी उस लिङ्गमें मेरी आराधना करते हुए वहाँ निवास करते हैं, महान् तपस्वी भी उस तीर्थके माहात्म्यका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं॥ ६॥
यस्य यस्य यदा कामस्तत्र तं तं ददाम्यहम्।<br>ददामि सर्वकामांश्च धर्मं मोक्षं तथैव च॥ ७जिस किसीकी भी जो कामना होती है, मैं उस कामनाको पूर्ण करता हूँ। मैं सभी कामनाओं, धर्म तथा मोक्षको प्रदान करता हूँ॥ ७॥
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अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन७८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मादन्येऽपि ये केचित्तीर्थे तस्मिन् जनाः स्थिताः।<br>आराधयन्ते देवेशं कामेशं चैव सर्वदा॥ ८अतः अन्य जो कोई भी लोग उस तीर्थमें रहते हैं, वे देवेश कामेश्वरकी सदा आराधना करते हैं॥ ८॥
यो यस्य मनसः कामः तं तमाप्नोति निश्चितम्।<br>कामेश्वरसमीपे तु दक्षिणे वरवर्णिनि॥ ९<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे रुद्रस्यानुचरो भवेत्।<br>चैत्रे मासि सिते पक्षे त्रयोदश्यां तु मानवाः॥ १०<br>स्नानं ये च प्रकुर्वन्ति ते कामसदृशा नराः।उस समय जिसकी जो भी कामना होती है, वह [व्यक्ति] उस-उस कामनाको निश्चित रूपसे प्राप्त करता है। हे वरवर्णिनि! कामेश्वरके समीपमें दक्षिणमें जो कुण्ड है, हे वरारोहे! चैत्रमासमें शुक्लपक्षकी त्रयोदशीको उसमें स्नान करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है। जो मनुष्य उसमें स्नान करते हैं, वे कामदेवके समान हो जाते हैं॥ ९-१०१/२॥
कामेश्वरं सदा लिङ्गं योऽर्चयतीह मानवः॥ ११<br>लभेद्विद्याधरं लोकमेवमेव न संशयः।जो मनुष्य यहाँपर कामेश्वरलिङ्गकी सदा पूजा करता है, वह विद्याधरलोक प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ १११/२॥
कामेश्वरस्य पूर्वेण नाम्ना पञ्चालकेश्वरम्॥ १२<br>धनदस्य तु पुत्रेण पूजितोऽहं सुरेश्वरि।<br>क्षेत्रं मम प्रियं ज्ञात्वा तस्मिन् देशे व्यवस्थितः॥ १३<br>आराधयति मां नित्यं मम पूजारतः सदा।<br>पञ्चालेश्वरनामाहं तस्मिन् देशे व्यवस्थितः॥ १४<br>नराणां धनदानं तु करिष्यामि यशस्विनि।कामेश्वरके पूर्वमें पंचालकेश्वर नामक लिङ्ग है, हे सुरेश्वरि! मैं वहाँ धनद (कुबेर)-के पुत्रके द्वारा पूजित हूँ। मेरा प्रिय क्षेत्र जानकर वह उस देशमें स्थित रहकर प्रतिदिन मेरी आराधना करता है और सदा मेरी पूजामें संलग्न रहता है। हे यशस्विनि! मैं उस स्थानमें पंचालश्वर नामसे स्थित हूँ और मनुष्योंको धनका दान करता हूँ॥ १२-१४१/२॥
तत्र पूर्वमुखं देवि मुखलिङ्गं तु तिष्ठति॥ १५<br>पञ्चकेशवरनामाहं तत्र देवि प्रतिष्ठितः।<br>कूपस्तस्यैव चाग्रे तु पावनः सर्वदेहिनाम्॥ १६हे देवि! वहाँ पूर्वकी ओर मुखवाला मुखलिङ्ग विराजमान है, हे देवि! मैं वहाँ पंचकेश्वर नामसे स्थित हूँ। उसीके आगे सभी देहधारियोंको पवित्र करनेवाला एक कूप स्थित है॥ १५-१६॥
तस्मिन् स्थाने स्थिता देवि अघोरेशेति नामतः।<br>मानवानां हितार्थाय स्वयं तत्र व्यवस्थिता॥ १७<br>नव लिङ्गानि गुह्यानि स्थापितानि तु किन्नरैः।<br>पञ्चकेशवरपूर्वेण दिवाकरनिशाकरौ॥ १८हे देवि! उस स्थानपर अघोरेशा—इस नामसे भगवती स्थित हैं, वे मनुष्योंके कल्याणके लिये वहाँ स्वयं विराजमान हैं। वहाँ किन्नरोंके द्वारा नौ गुह्य लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। पंचकेश्वरके पूर्वमें सूर्य-चन्द्रलिङ्ग स्थित हैं॥ १७-१८॥
लिङ्गानि तानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च।<br>दक्षिणेन तु तस्यैव अन्धकेशेति नामतः॥ १९<br>तत्र लिङ्गं महत्पुण्यमन्धकेन प्रतिष्ठितम्।<br>मम चैव प्रसादेन गतोऽसौ परमां गतिम्॥ २०वे लिङ्ग पुण्यप्रद तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाले हैं। वहाँपर उसीके दक्षिणमें अन्धकेश—इस नामवाला महापुण्यप्रद लिङ्ग है, यह अन्धकके द्वारा स्थापित किया गया है, मेरी कृपासे वह [अन्धक] वहाँ परम गतिको प्राप्त हुआ था॥ १९-२०॥
पश्चिमे तु दिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि।<br>नाम्ना देवेश्वरं लिङ्गं कामकुण्डस्य दक्षिणे॥ २१<br>अहमेव सदा भद्रे तस्मिन् स्थाने व्यवस्थितः।<br>भीष्मेश्वरं तु तत्रैव सिद्धेश्वरमतः परम्॥ २२हे सुन्दरि! उस देवके पश्चिम दिशाभागमें तथा कामकुण्डके दक्षिणमें देवेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! मैं ही उस स्थानपर सदा विराजमान हूँ। वहींपर भीष्मेश्वर तथा सिद्धेश्वर स्थित हैं॥ २१-२२॥
गङ्गेश्वरं तु तत्रैव यमुनेश्वरमेव च।<br>मण्डलेश्वरं तु तत्रैव उर्वशीलिङ्गमुत्तमम्॥ २३वहींपर गंगेश्वर तथा यमुनेश्वर हैं। वहींपर
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७८४श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मण्डलेश्वर तथा उत्तम उर्वशीलिङ्ग विद्यमान हैं॥ २३ ॥
अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि महात्मभिः ।<br>तानि दृष्ट्वा तु मनुजः सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २४[हे देवि!] वहाँपर महात्माओंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं, उनका दर्शन करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ २४॥
मण्डलेश्वरसामीप्ये मुखलिङ्गं च तिष्ठति ।<br>शान्तेन स्थापितं लिङ्गं सर्वपापहरं शुभम् ॥ २५मण्डलेश्वरके समीपमें मुखलिङ्ग स्थित है, सभी पापोंका नाश करनेवाला वह शुभ लिङ्ग 'शान्त' के द्वारा स्थापित किया गया है॥ २५॥
वायव्ये तु दिशाभागे द्रोणेश्वरसमीपतः ।<br>वालखिल्येश्वरं नाम सुखदं सर्वदेहिनाम् ॥ २६वायव्य दिशाभागमें द्रोणेश्वरके समीप वालखिल्येश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह सभी प्राणियोंको सुख देनेवाला है॥ २६॥
तच्च पश्चान्मुखं लिङ्गं कामकुण्डस्य पश्चिमे ।<br>वालखिल्येश्वरं दृष्ट्वा सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २७<br><br>तस्यैव चाग्रतो भद्रे मुखलिङ्गं च तिष्ठति ।<br>वाल्मीकेश्वरनामानं तं च दृष्ट्वा न शोचति ॥ २८कामकुण्डके पश्चिममें स्थित वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है, वालखिल्येश्वरका दर्शन करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। हे भद्रे! उसीके आगे वाल्मीकेश्वर नामक मुखलिङ्ग स्थित है, उसका दर्शन करके मनुष्य शोकयुक्त नहीं होता है॥ २७-२८॥
तस्यैव कामकुण्डस्य पुरा संस्थापितं तटे ।<br>लिङ्गं तत्र महापुण्यं च्यवनेन प्रतिष्ठितम् ॥ २९<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण ज्ञानवान् जायते नरः ।उसी कामकुण्डके तटपर पूर्वकालमें [महर्षि] च्यवनके द्वारा स्थापित किया गया महापुण्यप्रद लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य ज्ञानी हो जाता है॥ २९ १/२॥
वालखिल्येश्वरस्यैव दक्षिणे वरवर्णिनि ॥ ३०<br><br>नाम्ना वातेश्वरं देवं सर्वपातकनाशनम् ।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि वायुलोकं च गच्छति ॥ ३१हे वरवर्णिनि! वालखिल्येश्वरके दक्षिणमें सभी पापोंका नाश करनेवाला वातेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य वायुलोकको जाता है॥ ३०-३१॥
अग्नीश्वरं तु तत्रैव भरतेशं तथैव च ।<br>वरुणेशं तथा चैव सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ ३२<br><br>एतान् दृष्ट्वा महादेवि यथेष्टां गतिमाप्नुयात् ।<br>अन्यदायतनं पुण्यं सनकेन प्रतिष्ठितम् ॥ ३३<br><br>सनकेश्वरनामानं सर्वसिद्धामरार्चितम् ।<br>तेन दृष्टेन देवेशि राजसूयफलं लभेत् ॥ ३४वहींपर अग्नीश्वर, भरतेश तथा सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला वरुणेश—ये लिङ्ग स्थित हैं, हे महादेवि! इनका दर्शन करके मनुष्य अभीष्ट गति प्राप्त करता है। वहाँ दूसरा पुण्यप्रद लिङ्ग भी स्थित है, जो [महामुनि] सनकके द्वारा स्थापित किया गया है, सनकेश्वर नामक वह लिङ्ग सभी सिद्धों तथा देवताओंके द्वारा पूजित है। हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य राजसूययज्ञका फल प्राप्त करता है॥ ३२-३४॥
धर्मेश्वरं तु तत्रैव दक्षिणे वरवर्णिनि ।<br>नाम्ना धर्मेश्वरं देवं सर्वकामफलप्रदम् ॥ ३५हे वरवर्णिनि! वहींपर दक्षिण दिशामें धर्मेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह धर्मेश्वरलिङ्ग सभी वांछित फलोंको प्रदान करनेवाला है।
अन्यत्तत्रैव लिङ्गं तु ऋषिभिः स्थापितं पुरा ।<br>सनकेश्वरस्योत्तरतो नाम्ना गरुडकेश्वरम् ॥ ३६<br><br>सिद्धिकामेन सुश्रोणि स्थापितं गरुडेन तु ।<br>गरुडेश्वरस्य पुरतः स्थापितं ब्रह्मसूनुना ॥ ३७वहींपर पूर्वकालमें ऋषियोंके द्वारा स्थापित किया गया अन्य लिङ्ग भी स्थित है। हे सुश्रोणि! सनकेश्वरके उत्तरमें गरुडकेश्वर नामक लिङ्ग है, जो सिद्धिकी इच्छावाले गरुडके द्वारा
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अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन७८५
स्थापित किया गया है॥ ३५-३६१/२॥
भक्त्या सनत्कुमारेण स्थापितोऽहं वरानने।<br>तेन दृष्टेन देवेशि ज्ञानवान् जायते नरः॥ ३८गरुडेश्वरके सामने एक लिङ्ग स्थित है, हे वरानने! ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमारने भक्तिपूर्वक [वहाँ] मुझे स्थापित किया था, हे देवेशि! उस [लिङ्ग]-के दर्शनसे मनुष्य ज्ञानसम्पन्न हो जाता है॥ ३७-३८॥
तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे सनन्देन प्रतिष्ठितम्।<br>तस्य दर्शनमात्रेण प्राप्यते सिद्धिरुत्तमा॥ ३९उसीके उत्तरभागमें [मुनि] सनन्दके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग है, उसके दर्शनमात्रसे उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है॥ ३९॥
तस्यैव दक्षिणे पार्श्वे स्थापितं ह्यासुरिश्वरम्।<br>तथैव पञ्चशिखिना स्थापितं च महात्मना॥ ४०उसीके दक्षिण भागमें आसुरीश्वर लिङ्ग स्थापित है, वह महात्मा पंचशिखिके द्वारा स्थापित किया गया है॥ ४०॥
तस्य दक्षिणपार्श्वे तु नातिदूरे व्यवस्थितम्।<br>शनैश्चरेण तत्रैव मुखलिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ ४१<br><br>शनैश्चरेश्वरं नाम सर्वलोकनमसकृतम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि रोगैर्नैवाभिभूयते॥ ४२वहींपर उसके दक्षिणभागमें समीपमें ही शनैश्चरके द्वारा स्थापित किया गया मुखलिङ्ग स्थित है, वह शनैश्चरेश्वर नामक लिङ्ग सभी लोकोंद्वारा नमस्कृत है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य रोगोंसे पीड़ित नहीं होता है॥ ४१-४२॥
अन्यच्चैव महापुण्यं काशीपुर्यां महाशये।<br>मार्कण्डेयस्तु विख्यातो मम चैव सदा प्रियः॥ ४३हे महाशये! काशीपुरीमें अन्य महापुण्यप्रद लिङ्ग भी है, वह मार्कण्डेय नामसे विख्यात है और सर्वदा मेरा प्रिय है॥ ४३॥
तस्य लिङ्गस्य चाग्रे तु पश्चिमेन यशस्विनि।<br>मार्कण्डेयह्रदो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ ४४<br><br>मार्कण्डेयह्रदे स्नात्वा किं भूयः परिशोचति।<br>स्नानं दानं जपो होमः श्राद्धं च पितृतर्पणम्॥ ४५<br><br>तत्सर्वमक्षयं तत्र भवतीति न संशयः।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चैव चतुर्मुखम्॥ ४६<br><br>रुद्रलोकः सदा तस्य पुनरावृत्तिदुर्लभः।हे यशस्विनि! उस लिङ्गके आगे पश्चिममें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध मार्कण्डेयह्रद (कुण्ड) है, मार्कण्डेयह्रदमें स्नान करके मनुष्य किसी प्रकारके शोकसे सन्तप्त नहीं रहता है। वहाँ किया गया स्नान, दान, जप, होम, श्राद्ध तथा पितृतर्पण—सब कुछ अक्षय होता है, इसमें सन्देह नहीं है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा चतुर्मुखका दर्शन करके मनुष्य पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करानेवाले रुद्रलोकको जाता है॥ ४४-४६१/२॥
मार्कण्डेश्वरसामीप्ये उत्तरेण यशस्विनि॥ ४७<br><br>कूपो वै तिष्ठते तत्र सर्वतीर्थवरोऽनघे।<br>कूपस्य चोत्तरेणैव कुण्डमध्ये यशस्विनि॥ ४८<br><br>कुण्डेश्वरमिति ख्यातं सर्वसिद्धैस्तु वन्दितम्।हे यशस्विनि! हे अनघे! मार्कण्डेश्वरके समीपमें उत्तर दिशामें वहाँ सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ एक कूप विद्यमान है। हे यशस्विनि! कूपके उत्तरमें ही कुण्डके मध्यमें सभी सिद्धोंसे वन्दित कुण्डेश्वर—इस नामसे विख्यात लिङ्ग स्थित है॥ ४७-४८१/२॥
दीक्षां पाशुपतीं तीर्त्वा द्वादशाक्षरेण यत्फलम्॥ ४९<br><br>तत्फलं लभते देवि ब्राह्मणस्तु न संशयः।<br>कुण्डस्य पश्चिमे तीरे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ५०<br><br>स्कन्देन स्थापितं देवि ब्रह्मलोकगतिप्रदम्।<br>मार्कण्डेयस्य पूर्वेण नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ५१हे देवि! द्वादशाक्षरके द्वारा पाशुपत दीक्षा प्राप्त करके ब्राह्मण जो फल पाता है, उस फलको उसके दर्शनमात्रसे प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। कुण्डके पश्चिम तटपर पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, हे देवि! वह [लिङ्ग] स्कन्दके द्वारा स्थापित किया गया है, वह ब्रह्मलोककी गति प्रदान