श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५६- सोम (चन्द्रमा)-की स्थिति एवं गतिका निरूपण, चन्द्रकलाओंके ह्रास तथा वृद्धिका वर्णन
२४० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग छप्पनवाँ अध्याय सोम (चन्द्रमा)-की स्थिति एवं गतिका निरूपण, चन्द्रकलाओंके ह्रास तथा वृद्धिका वर्णन सूत उवाच वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि निशाकरः। त्रिचक्रोभयतोऽश्वश्च विज्ञेयस्तस्य वै रथः॥ १ शतारैश्च त्रिभिश्चक्रैर्युक्तः शुक्लैर्हयोत्तमैः। दशभिस्त्वकृशैर्दिव्यैरसङ्गैस्तैर्मनोजवैः ॥ २ रथेनानेन देवैश्च पितृभिश्चैव गच्छति। सोमो ह्यम्बुमयैर्गोभिः शुक्लैः शुक्लगभस्तिमान्॥ ३ क्रमते शुक्लपक्षादौ भास्करात्परमास्थितः। आपूर्यते परस्यान्तः सततं दिवसक्रमात्॥ ४ देवैः पीतं क्षये सोममाप्याययति नित्यशः। पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनैकेन भास्करः॥ ५ आपूर्यन् सुषुम्नेन भागं भागमनुक्रमात्। इत्येषा सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः॥ ६ स पौर्णमास्यां दृश्येत शुक्लः सम्पूर्णमण्डलः। एवमाप्यायितं सोमं शुक्लपक्षे दिनक्रमात्॥ ७ ततो द्वितीयाप्रभृति बहुलस्य चतुर्दशीम्। पिबन्त्यम्बुमयं देवा मधु सौम्यं सुधामृतम्॥ ८ सम्भृतं त्वर्धमासेन ह्यमृतं सूर्यतेजसा। पानार्थममृतं सोमं पौर्णमास्यामुपासते॥ ९ एकरात्रं सुराः सर्वे पितृभिस्त्वृषिभिः सह। सोमस्य कृष्णपक्षादौ भास्कराभिमुखस्य च॥ १० प्रक्षीयन्ते परस्यान्तः पीयमानाः कलाः क्रमात्। त्रयस्त्रिंशच्छताश्चैव त्रयस्त्रिंशत्तथैव च॥ ११ त्रयस्त्रिंशत्सहस्त्राणि देवाः सोमं पिबन्ति वै। एवं दिनक्रमात्पीते विबुधैस्तु निशाकरे॥ १२ पीत्वार्धमासं गच्छन्ति अमावास्यां सुरोत्तमाः। पितरश्चोपतिष्ठन्ति अमावास्यां निशाकरम्॥ १३ सूतजी बोले—चन्द्रमा वीथियोंमें स्थित नक्षत्रोंमें चलता है। उसके रथको तीन पहियोंवाला तथा दोनों ओर घोड़ोंसे युक्त जानना चाहिये। यह सौ अरों (तीलियों)-वाले तीन पहियोंसे युक्त है एवं श्वेतवर्णवाले, उत्तम, पुष्ट, दिव्य जुएसे बिना नथे हुए और मनके समान वेगवाले दस घोड़ोंसे समन्वित है। श्वेत किरणोंवाले चन्द्रमा श्वेत रंगके अम्बुमय दस घोड़ोंसहित देवताओं तथा पितरोंके साथ इस रथसे चलते हैं॥ १-३॥ सूर्यसे दूरस्थित यह शुक्लपक्षके आदिसे क्रमशः बढ़ता है। दिनके क्रमसे यह निरन्तर शुक्लपक्षसे अन्ततक वृद्धिको प्राप्त होता है। सूर्य इस चन्द्रमाको विकसित करता है। देवतागण [कृष्णपक्षमें] इसको पीते हैं। देवताओंके द्वारा यह पन्द्रह दिनतक पीया जाता है। सूर्य [अपनी] सुषुम्ना नामक एक किरणके द्वारा क्रमशः इसके एक-एक भागको पूर्ण करते हैं। इन सूर्यके तेजसे चन्द्रमाका शरीर विकसित होता है। ये पूर्णिमा तिथिको पूर्णमण्डलवाले होकर श्वेतवर्णके दिखायी पड़ते हैं। इस शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे चन्द्रमा बढ़ते रहते हैं॥ ४-७॥ तत्पश्चात् कृष्णपक्षकी द्वितीयासे प्रारम्भ करके चतुर्दशी तिथितक देवतालोग चन्द्रमाके जलमय मधुर सुधामृतका पान करते हैं। वह अमृत सूर्यके तेजसे आधे महीनेतक चन्द्रमामें भरा रहता है। उस अमृतको पीनेके लिये पूर्णिमा तिथिको पूरी रात सभी देवता पितरों तथा ऋषियोंके साथ चन्द्रमाके पास स्थित रहते हैं। कृष्णपक्षके आदिसे सूर्याभिमुख चन्द्रमाकी पी जाती हुई कलाएँ क्रमशः क्षीण होती जाती हैं। वसु (८), रुद्र (११), आदित्य (१२) तथा अश्विनीद्वय (२)—ये तैंतीस देवता एवं इनके पुत्र-पौत्ररूप तैंतीस सौ तथा तैंतीस हजार देवता चन्द्रमाका पान करते हैं। इस प्रकार दिनके क्रमसे देवताओंके द्वारा चन्द्रमाका पान किये जानेपर
५७- बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप, ग्रह-नक्षत्रों एवं तारागणोंद्वारा ध्रुवका परिभ्रमण, ग्रहोंका स्वरूप-विस्तार तथा उनकी गतिका निरूपण
अध्याय ५७] बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप तथा उनकी गतिका निरूपण २४१ ततः पञ्चदशे भागे किञ्चिच्छिष्टे कलात्मके। आधे महीनेतक पान करके वे श्रेष्ठ देवता अमावास्या अपराह्ने पितृगणा जघन्यं पर्युपासते॥ १४ तिथिको चले जाते हैं, उसके बाद उसी अमावास्या तिथिको पितृगण चन्द्रमाके पास स्थित होते हैं और पिबन्ति द्विकलां कालं शिष्टा तस्य कला तु या। शुक्लपक्षकी प्रतिपदातक बचे हुए अमृतका पान करते निःसृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्॥ १५ हैं। अन्तिम कलाके रूपमें पन्द्रहवें भागके शेष रहनेपर अपराह्नमें पितृगण चन्द्रमाके पास आ जाते हैं और मासतृप्तिमवाप्याग्र्यां पीत्वा गच्छन्ति तेऽमृतम्। उसकी जो कला बची रहती है, उसका पान दो पितृभिः पीयमानस्य पञ्चदश्यां कला तु या॥ १६ कलावाले समय (दो घड़ी)-तक करते हैं। अमावास्या तिथिको किरणोंसे निकले हुए स्वधामृतको पीते हैं। इस यावत्तु क्षीयते तस्य भागः पञ्चदशस्तु सः। प्रकार अमृत पीकर महीनेभरकी तृप्ति प्राप्त करके वे अमावास्यां ततस्तस्या अन्तरा पूर्यते पुनः॥ १७ चले जाते हैं। प्रत्येक पक्षके आरम्भमें सोलहवें दिन चन्द्रमाकी वृद्धि तथा क्षयका होना बताया गया है। इस वृद्धिक्षयौ वै पक्षादौ षोडश्यां शशिनः स्मृतौ। प्रकार पक्षमें चन्द्रमामें होनेवाली यह वृद्धि सूर्यके कारण एवं सूर्यनिमित्तैषा पक्षवृद्धिर्निशाकरे॥ १८ होती है॥ ८-१८॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवर्णनं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सोमवर्णन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥ सत्तावनवाँ अध्याय बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप, ग्रह-नक्षत्रों एवं तारागणोंद्वारा ध्रुवका परिभ्रमण, ग्रहोंका स्वरूप-विस्तार तथा उनकी गतिका निरूपण सूत उवाच सूतजी बोले- [हे ऋषियो!] चन्द्रमाके पुत्र अष्टभिश्च हयैर्युक्तः सोमपुत्रस्य वै रथः। [बुध]-का रथ जल-अग्निमय और पिशांगवर्णवाले वारितेजोमयश्चाथ पिशाङ्गैश्चैव शोभनैः ॥ १ सुन्दर आठ घोड़ोंसे युक्त है। दैत्योंके आचार्य बुद्धिमान् दशभिश्चाकृशैश्शश्वैर्नानावर्णै रथः स्मृतः। शुक्रका रथ पुष्ट, विभिन्न वर्णोंवाले तथा पृथ्वीयम दस शुक्रस्य क्षमामयैर्युक्तो दैत्याचार्यस्य धीमतः ॥ २ घोड़ोंसे युक्त कहा गया है। मंगलका रथ सुवर्णमय, परम अष्टाश्वश्चाथ भौमस्य रथो हैमः सुशोभनः। सुन्दर एवं आठ घोड़ोंवाला है। बृहस्पतिका रथ सुवर्णमय जीवस्य हैमश्चाष्टाश्वो मन्दस्यायसनिर्मितः ॥ ३ है तथा आठ घोड़ोंसे युक्त है। शनैश्चरका रथ लोहेका बना हुआ है और वह काले वर्णवाले जलमय दस रथ आपोमयैरश्वैर्दशभिस्तु सितेतरैः। घोड़ोंसे युक्त है। राहु-केतुका रथ आठ घोड़ोंवाला कहा स्वर्भानोर्भास्करारेश्च तथा चाष्टहयः स्मृतः॥ ४ गया है ॥ १-४॥ सर्वे ध्रुवनिबद्धा वै ग्रहास्ते वातरश्मिभिः। वे सभी ग्रह वायुरश्मियोंके द्वारा ध्रुवसे बँधे हुए एतेन भ्राम्यमाणाश्च यथायोगं व्रजन्ति वै॥५ हैं। इसके द्वारा घुमाये जाते हुए वे यथायोग चलते हैं। यावन्त्यश्चैव ताराश्च तावन्तश्चैव रश्मयः। जितने तारे हैं, उतनी ही [वात] रश्मियाँ हैं। वे सब सर्वे ध्रुवनिबद्धाश्च भ्रमन्तो भ्रामयन्ति तम्॥ ६ ध्रुवसे बँधे हुए हैं और [स्वयं] घूमते हुए उस ध्रुवको
| २४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत (मूल श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| अलातचक्रवद्यान्ति वातचक्रेरितानि तु।<br>यस्माद्वहति ज्योतींषि प्रवहस्तेन स स्मृतः॥ ७ | घुमाते हैं। वातचक्रसे प्रेरित तारागण अंगारचक्रके समान घूमते हैं। चूँकि इन ग्रह-नक्षत्रोंका वहन वायु करता है, इसलिये उसे प्रवह कहा गया है॥ ५-७॥ |
| नक्षत्रसूर्य्याश्च तथा ग्रहतारागणैः सह।<br>उन्मुखाभिमुखाः सर्वे चक्रभूताः श्रिता दिवि॥ ८<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चैव ध्रुवमेव प्रदक्षिणम्।<br>प्रयान्ति चेश्वरं द्रष्टुं मेढीभूतं ध्रुवं दिवि॥ ९ | ग्रहों तथा तारागणोंके साथ नक्षत्र तथा सूर्य सब-के-सब चक्ररूपमें उन्मुख एवं अभिमुख होकर आकाशमें स्थित हैं। ध्रुवके द्वारा नियन्त्रित वे सब ध्रुवकी प्रदक्षिणा करते हैं। वे धुरीरूप ईश्वर ध्रुवको देखनेके लिये आकाशमें भ्रमण करते हैं॥ ८-९॥ |
| नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ १०<br>द्विगुणः सूर्य्यविस्ताराद्विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाधस्तात्प्रसर्पति॥ ११<br>उद्धृत्य पृथिवीछायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत्स्थानं तृतीयं यत्तमोमयम्॥ १२ | सूर्यका व्यास नौ हजार योजन कहा गया और इस प्रमाणके अनुसार उनके मण्डलका विस्तार तीन गुना है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना बताया गया है। उन दोनोंके बराबर होकर राहु नीचेसे चलता है। मण्डलाकार बनी हुई पृथ्वीछायाको लेकर राहुका तीसरा बड़ा स्थान है, जो अन्धकारमय है॥ १०-१२॥ |
| चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनाच्च प्रमाणतः॥ १३<br>भार्गवात्पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः।<br>पादहीनौ वक्रसौरी तथायामप्रमाणतः॥ १४<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः।<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै॥ १५<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्तारान्मण्डलादपि।<br>प्रायशश्चन्द्रयोगीनि विद्यादृक्षाणि तत्त्ववित्॥ १६ | योजनके प्रमाणसे शुक्रका व्यास तथा मण्डल चन्द्रमाके व्यास एवं मण्डलका सोलहवाँ भाग कहा गया है। [आकारमें] बृहस्पतिको शुक्रसे एक चौथाई कम कहा गया है। विस्तारके प्रमाणसे मंगल तथा शनि बृहस्पतिसे एक चौथाई कम हैं। [अर्थात् मंगल एवं शनि विस्तारमें बृहस्पतिके तीन चौथाई हैं] बुध विस्तार तथा मण्डलमें उन दोनोंका तीन चौथाई है। तारा-नक्षत्ररूप जो पिण्ड हैं, वे विस्तार तथा मण्डलमें बुधके तुल्य हैं, तत्त्ववेत्ताको चन्द्रमासे युक्त उन नक्षत्रोंको 'ऋक्ष' नामसे जानना चाहिये॥ १३-१६॥ |
| तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्।<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने॥ १७<br>सर्वोपरि निकृष्टानि तारकामण्डलानि तु।<br>योजनद्वयमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते॥ १८<br>उपरिष्टात्रयस्तेषां ग्रहा ये दूरसर्पिणः।<br>सौरौऽङ्गिराश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः॥ १९<br>तेभ्योऽधस्तात्तु चत्वारः पुनरन्ये महाग्रहाः।<br>सूर्यः सोमो बुधश्चैव भार्गवश्चैव शीघ्रगाः॥ २० | छोटे-छोटे असंख्य तारे तथा नक्षत्र परस्पर पाँच, चार, तीन एवं दो योजनकी दूरीपर हैं। सबसे ऊपर अत्यन्त छोटे तारामण्डल हैं, जो केवल दो योजन विस्तारवाले हैं, उनसे छोटे तारे नहीं हैं। उनके ऊपर तीन ग्रह शनि, बृहस्पति तथा मंगल; जो दूरकी यात्रा करनेवाले हैं, उन्हें मन्दगतिवाला जानना चाहिये। उनके नीचे चार अन्य बड़े ग्रह सूर्य, चन्द्रमा, बुध तथा शुक्र हैं, जो तेजीसे चलनेवाले हैं॥ १७-२०॥ |
| तावन्त्यस्तारकाः कोट्यो यावन्त्यृक्षाणि सर्वशः।<br>ध्रुवात्तु नियमाच्चैषामृक्षमार्गे व्यवस्थितिः॥ २१<br>सप्ताश्वस्यैव सूर्यस्य नीचोच्चत्वमनुक्रमात्।<br>उत्तरायणमार्गस्थो यदा पर्वसु चन्द्रमाः॥ २२ | तारागण उतने ही करोड़ हैं, जितने सभी ऋक्ष (नक्षत्र) हैं। ऋक्षमार्गमें उनकी भी स्थिति ध्रुवके नियन्त्रणसे ही है। सात घोड़ोंवाले सूर्यका अनुक्रमसे |
अध्याय ५७ ] बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप तथा उनकी गतिका निरूपण २४३
| श्लोक (संस्कृत) | अर्थ (हिन्दी) |
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| उच्चत्वाद दृश्यते शीघ्रं नातिव्यक्तैर्गभस्तिभिः।<br>तदा दक्षिणमार्गस्थो नीचां वीथीमुपाश्रितः॥ २३<br><br>भूमिरेखावृतः सूर्यः पौर्णिमावास्ययोस्तदा।<br>ददृशे च यथाकालं शीघ्रमस्तमुपैति च॥ २४<br><br>तस्मादुत्तरमार्गस्थो ह्यमावास्यां निशाकरः।<br>ददृशे दक्षिणे मार्गे नियमाद् दृश्यते न च॥ २५ | नीचोच्चत्व (नीचा तथा ऊँचा होना) होता रहता है। जब सूर्य उत्तरायणमार्गमें स्थित होते हैं और चन्द्रमा पूर्ण मण्डलमें होते हैं, तब सूर्य कुछ अस्पष्ट किरणोंके साथ उच्चत्वके कारण शीघ्र दिखायी पड़ते हैं। जब सूर्य दक्षिणायनमार्गमें स्थित होते हैं, तब वे नीचेवाली वीथीमें रहते हैं। पृथ्वीकी रेखाद्वारा ढँका हुआ सूर्य उससे नीचे होता है। पूर्णिमा तथा अमावास्याके दिनोंमें यथासमय दिखायी देता है; क्योंकि यह शीघ्र अस्त हो जाता है। अतः नये चन्द्रमाकी तिथि [अमावास्या]-पर चन्द्रमा उत्तरायणमें होता है। यह दक्षिण मार्गमें दिखायी नहीं पड़ता; क्योंकि नक्षत्रोंके गतियोगके कारण यह [चन्द्रमा] सूर्यके अन्धकारसे ढँका हुआ होता है॥ २१—२५ १/२ ॥ |
| ज्योतिषां गतियोगेन सूर्यस्य तमसा वृतः।<br>समानकालास्तमयौ विषुवत्सु समोदयौ॥ २६<br><br>उत्तरासु च वीथीषु व्यन्तरास्तमनोदयौ।<br>पौर्णिमावास्ययोर्ज्ञेयौ ज्योतिष्चक्रानुवर्तिनौ॥ २७<br><br>दक्षिणायनमार्गस्थौ यदा चरति रश्मिवान्।<br>ग्रहाणां चैव सर्वेषां सूर्योऽधस्तात्प्रसर्पति॥ २८<br><br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति॥ २९<br><br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः।<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः॥ ३०<br><br>तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं तस्मात्सप्तर्षिमण्डलम्।<br>ऋषीणां चैव सप्तानां ध्रुवस्योर्ध्वं व्यवस्थितिः॥ ३१<br><br>तं विष्णुलोकं परमं ज्ञात्वा मुच्येत किल्बिषात्। | सूर्य तथा चन्द्रमा विषुवत् स्थानोंपर समान कालमें अस्त एवं उदय होते हैं। उत्तरायणमें पूर्णिमा तथा अमावास्या तिथियोंपर ज्योतिष्चक्रका अनुसरण करनेवाले इन दोनोंको बिना किसी अन्तरके उदय तथा अस्त होनेवाला जानना चाहिये। जब सूर्य दक्षिणायनमार्गमें स्थित होकर चलता है, तब वह सभी ग्रहोंके नीचेसे गुजरता है, उस समय चन्द्रमा अपने मण्डलको विस्तृत करके उस [सूर्य]-के ऊपर चलते हैं और सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है। नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल, मंगलसे ऊपर बृहस्पति, उस बृहस्पतिसे ऊपर शनि और उससे ऊपर सप्तर्षिमण्डल विद्यमान है। सात ऋषियोंके ऊपर ध्रुवकी स्थिति है। उस परम विष्णुलोकको जानकर मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है॥ २६—३१ १/२ ॥ |
| द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च॥ ३२<br><br>ग्रहनक्षत्रतारासु उपरिष्टाद्यथाक्रमम्।<br>ग्रहाश्च चन्द्रसूर्यौ च युतौ दिव्येन तेजसा॥ ३३<br><br>नित्यमृक्षेषु युज्यन्ते गच्छन्तोऽहर्निशं क्रमात्।<br>ग्रहनक्षत्रसूर्यास्ते नीचोच्चऋजुसंस्थिताः॥ ३४<br><br>समागमे च भेदे च पश्यन्ति युगपत्प्रजाः।<br>ऋतवः षट् स्मृताः सर्वे समागच्छन्ति पञ्चधा॥ ३५<br><br>परस्परास्थिता ह्येते युज्यन्ते च परस्परम्।<br>असङ्करेण विज्ञेयस्तेषां योगस्तु वै बुधैः॥ ३६ | दो सौ हजार योजन दूरीपर ग्रह-नक्षत्र-तारोंसे ऊपर यथाक्रम सभी ग्रह और दिव्य तेजसे युक्त चन्द्रमा-सूर्य दिन-रात भ्रमण करते हुए सदा नक्षत्रोंसे जुड़े रहते हैं। वे ग्रह, नक्षत्र तथा सूर्य कभी नीचे, कभी ऊँचे एवं कभी सीधी रेखामें स्थित रहते हैं। समागम तथा भेद दोनों स्थितियोंमें वे प्रजाओंको एक साथ देखते हैं। ऋतुएँ छः कही गयी हैं, वे सब पाँच प्रकारसे आती हैं। एक-दूसरेपर आश्रित होनेके कारण ये परस्पर जुड़ी |
५८- ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों, नक्षत्रों, जलों आदिके अधिपतिके रूपमें सूर्य, चन्द्रमा, वरुण आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण
| २४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| एवं सङ्क्षिप्य कथितं ग्रहाणां गमनं द्विजाः।<br>भास्करप्रमुखानां च यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ३७<br><br>ग्रहाधिपत्ये भगवान् ब्रह्मणा पद्मयोनिना।<br>अभिषिक्तः सहस्रांशू रुद्रेण तु यथा गुहः॥ ३८<br><br>तस्माद् ग्रहार्थना कार्या अग्नौ चोद्यं यथाविधि।<br>आदित्यग्रहपीडायां सद्भिः कार्यार्थसिद्धये॥ ३९ | होती हैं, किंतु उनका यह योग एक-दूसरेके साथ बिना संकर (मिश्रण)-के ही होता है—ऐसा विद्वानोंको जानना चाहिये॥ ३२–३६॥<br><br>हे द्विजो! इस प्रकार मैंने जैसा देखा तथा सुना है, उसके अनुसार संक्षेपमें सूर्य आदि ग्रहोंकी गतिका वर्णन किया। पद्मयोनि ब्रह्माने ग्रहोंके अधिपतिके रूपमें हजार किरणोंवाले भगवान् सूर्यको अभिषिक्त किया है। जैसे रुद्रने कार्तिकेयको अभिषिक्त किया है। अतः सज्जनोंको [अपने] कार्यकी सिद्धिके लिये सूर्य ग्रहकी पीड़ाके समय कहे गये विधानके अनुसार यथाविधि अग्निमें ग्रहर्चन करना चाहिये॥ ३७–३९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ज्योतिषचक्रे ग्रहचारकथनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ज्योतिषचक्रमें ग्रहचारकथन' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५७॥
अट्टावनवाँ अध्याय
ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों, नक्षत्रों, जलों आदिके अधिपतिके रूपमें सूर्य, चन्द्रमा, वरुण आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण
| ऋषय ऊचुः<br>अभ्यषिञ्चत्कथं ब्रह्मा चाधिपत्ये प्रजापतिः।<br>देवदैत्यमुखान् सर्वान् सर्वात्मा वद साम्प्रतम्॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] सर्वात्मा प्रजापति ब्रह्माजीने सभी प्रमुख देवताओं तथा दैत्योंको अधिपतिके रूपमें किस प्रकार अभिषिक्त किया, इस समय [हमलोगोंको] बताइये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>ग्रहाधिपत्ये भगवानभ्यषिञ्चद्दिवाकरम्।<br>ऋक्षाणामोषधीनां च सोमं ब्रह्मा प्रजापतिः॥ २ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] भगवान् ब्रह्माने ग्रहोंके अधिपतिके रूपमें सूर्यका और नक्षत्रों तथा औषधियोंके अधिपतिके रूपमें चन्द्रमाका अभिषेक किया॥ २॥ |
| अपां च वरुणं देवं धनानां यक्षपुङ्गवम्।<br>आदित्यानां तथा विष्णुं वसूनां पावकं तथा॥ ३<br><br>प्रजापतीनां दक्षं च मरुतां शक्रमेव च।<br>दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादं दैत्यपुङ्गवम्॥ ४<br><br>धर्मं पितॄणामधिपं निर्ऋतिं पिशिताशिनाम्।<br>रुद्रं पशूनां भूतानां नन्दिनां गणनायकम्॥ ५<br><br>वीराणां वीरभद्रं च पिशाचानां भयङ्करम्।<br>मातॄणां चैव चामुण्डां सर्वदेवनमस्कृताम्॥ ६ | उन पितामहने वरुणदेवको जलोंका अधिपति, यक्षोंमें श्रेष्ठ कुबेरको धनोंका अधिपति, विष्णुको आदित्योंका अधिपति, अग्निको वसुओंका अधिपति, दक्षको प्रजापतियोंका अधिपति, इन्द्रको मरुतोंका अधिपति, दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादको दैत्यों तथा दानवोंका अधिपति, धर्मको पितरोंका अधिपति, निर्ऋतिको राक्षसोंका अधिपति, रुद्रको पशुओंका अधिपति, गणोंके नायक नन्दीको भूतोंका अधिपति, भयंकर वीरभद्रको वीर पिशाचोंका अधिपति, सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत चामुण्डाको |
| अध्याय ५८ ] | ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण | २४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रुद्राणां देवदेवेशं नीललोहितमीश्वरम्।<br>विघ्नानां व्योमजं देवं गजास्यं तु विनायकम्॥ ७<br>स्त्रीणां देवीमुमादेवीं वचसां च सरस्वतीम्।<br>विष्णुं मायाविनां चैव स्वात्मानं जगतां तथा॥ ८<br>हिमवन्तं गिरीणां तु नदीनां चैव जाह्नवीम्।<br>समुद्राणां च सर्वेषामधिपं पयसां निधिम्॥ ९<br>वृक्षाणां चैव चाश्वत्थं प्लक्षं च प्रपितामहः॥ १० | मातृगणोंका अधिपति, देवदेवेश ईश्वर नीललोहितको रुद्रोंका अधिपति, व्योमसे उत्पन्न तथा हाथीके समान मुखवाले विनायकको विघ्नोंका अधिपति, देवी उमाको स्त्रियोंका अधिपति, देवी सरस्वतीको वाणीका अधिपति, विष्णुको मायावियोंका अधिपति, स्वयं अपनेको सम्पूर्ण जगत्का अधिपति, हिमालयको पर्वतोंका अधिपति, गंगाको नदियोंका अधिपति, जलनिधि (महासागर)-को सभी समुद्रोंका अधिपति और अश्वत्थ तथा प्लक्षको वृक्षोंका अधिपति बनाया॥ ३-१०॥ |
| गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मीशं पुनश्चित्ररथं चकार।<br>नागाधिपं वासुकिमुग्रवीर्यं<br>सर्पाधिपं तक्षकमग्रवीर्यम्॥ ११ | उन्होंने चित्ररथको गन्धर्वों-विद्याधरों तथा किन्नरोंका अधिपति, उग्र तेजवाले वासुकिको नागोंका अधिपति और उग्र वीर्यवाले तक्षकको सर्पोंका अधिपति बनाया॥ ११॥ |
| दिग्वारणानामधिपं चकार<br>गजेन्द्रमैरावतमुग्रवीर्यम् ।<br>सुपर्णमीशं पततामथाश्व-<br>राजानमुच्चैःश्रवसं चकार॥ १२ | उन्होंने उग्र पराक्रमवाले गजेन्द्र ऐरावतको दिग्गजोंका स्वामी, गरुड़को पक्षियोंका स्वामी और उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका स्वामी बनाया॥ १२॥ |
| सिंहं मृगाणां वृषभं गवां च<br>मृगाधिपानां शरभं चकार।<br>सेनाधिपानां गुहमप्रमेयं<br>श्रुतिस्मृतीनां लकुलीशमीशम्॥ १३ | उन्होंने सिंहको मृगोंका स्वामी, वृषभको गौओंका स्वामी, शरभको सिंहोंका स्वामी, अतुलनीय गुह (कार्तिकेय)-को सेनाधिपोंका स्वामी और लकुलीशको श्रुतियों तथा स्मृतियोंका स्वामी बनाया॥ १३॥ |
| अभ्यषिञ्चत्सुधर्माणं तथा शङ्खपदं दिशाम्।<br>केतुमन्तं क्रमेणैव हेमरोमाणमेव च॥ १४<br>पृथिव्यां पृथुमीशानं सर्वेषां तु महेश्वरम्।<br>चतुर्मूर्तिषु सर्वज्ञं शङ्करं वृषभध्वजम्॥ १५ | उन्होंने सुधर्मा, शंखपद, केतुमान् तथा हेमरोमको क्रमशः सभी दिशाओंके अधिपति रूपमें अभिषिक्त किया। उन्होंने पृथुको पृथ्वीका स्वामी, महेश्वरको सबका स्वामी और सब कुछ जाननेवाले वृषभध्वज शंकरको चारों (विश्व, प्राज्ञ, तैजस, तुरीय) मूर्तियोंका स्वामी बनाया॥ १४-१५॥ |
| प्रसादाद्गगवाञ्छम्भोश्चाभ्यषिञ्चद्यथाक्रमम्।<br>पुराभिषिच्य पुण्यात्मा रराज भुवनेश्वरः॥ १६ | इस प्रकार भगवान् ब्रह्माने शम्भुकी कृपासे पूर्वकालमें [इन सभीको] क्रमसे अभिषिक्त किया। इन्हें अभिषिक्त करके लोकोंके स्वामी पुण्यात्मा ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हो गये॥ १६॥ |
| एतद्वो विस्तरेणैव कथितं मुनिपुङ्गवाः।<br>अभिषिक्तास्ततस्वेते विशिष्टा विश्वयोनिना॥ १७ | हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने आपलोगोंको यह विस्तारसे बता दिया; विश्वको उत्पन्न करनेवाले ब्रह्माने [इसी तरहसे] विशिष्ट गुणोंसे युक्त इन सबको अभिषिक्त किया था॥ १७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्याद्याभिषेककथनं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्य आदिका अभिषेककथन' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥
५९- पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नामसे अग्निके तीन रूपोंका वर्णन, बारह मासके बारह सूर्योंका नामनिर्देश एवं सूर्यरश्मियोंका वर्णन
| २४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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उनसठवाँ अध्याय
पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नामसे अग्निके तीन रूपोंका वर्णन, बारह मासके बारह सूर्योंका नामनिर्देश एवं सूर्यरश्मियोंका वर्णन
| सूत उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा तु मुनयः पुनस्तं संशयान्विताः।<br>पप्रच्छुरुत्तरं भूयस्तदा ते रोमहर्षणम्॥ १ | **सूतजी बोले—**यह सुनकर मुनिलोग संशयमें पड़ गये और उन्होंने उन रोमहर्षण (सूतजी)-से पुनः यह बात पूछी॥ १॥ |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>यदेतदुक्तं भवता सूतेह वदतां वर।<br>एतद्विस्तरतो ब्रूहि ज्योतिषां च विनिर्णयम्॥ २ | **ऋषिगण बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ हे सूतजी! आपने यहाँ जो कहा है, उसे तथा ग्रहोंके निर्णयको विस्तारसे बताइये॥ २॥ |
| श्रुत्वा तु वचनं तेषां तदा सूतः समाहितः।<br>उवाच परमं वाक्यं तेषां संशयनिर्णये॥ ३ | तब उनका वचन सुनकर उनके सन्देहको दूर करनेके लिये सूतजी एकाग्रचित्त होकर उत्तम बात कहने लगे॥ ३॥ |
| अस्मिन्नर्थे महाप्राज्ञैर्यदुक्तं शान्तबुद्धिभिः।<br>एतद्वोऽहं प्रवक्ष्यामि सूर्यचन्द्रमसोर्गतिम्॥ ४<br><br>यथा देवगृहाणीह सूर्यचन्द्रादयो ग्रहाः।<br>अतः परं तु त्रिविधमग्नेर्वक्ष्ये समुद्भवम्॥ ५<br><br>दिव्यस्य भौतिकस्याग्नेस्तथोऽग्नेः पार्थिवस्य च। | इस विषयमें शान्तबुद्धिवाले महाज्ञानियोंने जो कुछ बताया है, उसे मैं आपलोगोंसे कहूँगा और चन्द्रमा तथा सूर्यकी गतिका वर्णन करूँगा। मैं यह बताऊँगा कि सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह किस प्रकार देवताओंके निवासस्थान हैं, इसके बाद मैं अग्निकी तीन प्रकारकी उत्पत्तिका वर्णन करूँगा। दिव्य अग्नि, भौतिक अग्नि तथा पार्थिव अग्निके विषयमें बताऊँगा॥ ४-५ १/२॥ |
| व्युष्टायां तु रजन्यां च ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ ६<br><br>अव्याकृतमिदं त्वासीन्नैशेन तमसा वृतम्।<br>चतुर्भागावशिष्टेऽस्मिन् लोके नष्टे विशेषतः॥ ७<br><br>स्वयंभूर्भगवान्स्तत्र लोकसर्वार्थसाधकः।<br>खद्योतवत्स व्यचरदाविर्भावचिकीर्षया॥ ८ | अव्यक्तसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माकी रात्रि बीत जानेपर यह दृश्य जगत् अस्पष्ट था और घोर अन्धकारसे आच्छन्न था। इस लोकके विशेष रूपसे नष्ट हो जानेपर तथा इसका चौथाई भाग अवशिष्ट रहनेपर संसारका कार्य सिद्ध करनेवाले वे भगवान् ब्रह्मा सृष्टिकी कामनासे खद्योतकी भाँति वहाँ विचरण करने लगे॥ ६-८॥ |
| सोऽग्निं सृष्ट्वाथ लोकादौ पृथिवीजलसंश्रितः।<br>संहृत्य तत्प्रकाशार्थं त्रिधा व्यभजदीश्वरः॥ ९<br><br>पवनो यस्तु लोकेऽस्मिन् पार्थिवो वह्निरुच्यते।<br>यश्चासौ तपते सूर्ये शुचिरग्निस्तु स स्मृतः॥ १०<br><br>वैद्युतोऽब्जस्तु विज्ञेयस्तेषां वक्ष्ये तु लक्षणम्।<br>वैद्युतो जाठरः सौरो वारिगर्भस्त्रयोऽग्नयः॥ ११ | तदनन्तर पृथ्वी तथा जलमें संश्रित उन जगदीश्वरने लोकके आदिमें अग्निका सृजन करके पृथ्वीके जलका संहरणकर उसके प्रकाशके लिये अग्निको तीन भागोंमें विभक्त किया। इस लोकमें जो पवन है, वह पार्थिव अग्नि कहा जाता है और जो अग्नि सूर्यमें तपती है, उसे शुचि अग्नि कहा गया है। विद्युत्से उत्पन्न अग्निको अब्ज जानना चाहिये। इस प्रकार जलके गर्भसे उत्पन्न वैद्युत, जाठर तथा सौर—ये तीन अग्नियाँ हैं। अब मैं उनके लक्षणोंको बताऊँगा॥ ९-११॥ |
अध्याय ५९] पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नामसे अग्निके तीन रूपोंका वर्णन २४७
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तस्मादपः पिबन् सूर्यो गोभिर्दीप्यत्यसौ विभुः।<br>जले चाब्जः समाविष्टो नाद्भिरग्निः प्रशाम्यति॥ १२<br><br>मानवानां च कुक्षिस्यो नाद्भिः शाम्यति पावकः।<br>अर्चिष्मान् पवनः सोऽग्निर्निष्प्रभो जाठरः स्मृतः॥ १३<br><br>यश्चायं मण्डली शुक्ली निरूष्मा सम्प्रजायते।<br>प्रभा सौरी तु पादेन ह्यास्तं याते दिवाकरे॥ १४<br><br>अग्निमाविशते रात्रौ तस्माद्दूरात्प्रकाशते।<br>उद्यन्तं च पुनः सूर्यमौष्ण्यमग्नेः समाविशेत्॥ १५<br><br>पादेन पार्थिवस्याग्नेस्तस्मादग्निस्तपत्यसौ।<br>प्रकाशोष्णस्वरूपे च सौराग्नेये तु तेजसी॥ १६ | विभु सूर्य अपनी किरणोंसे जलको पीते हुए चमकते हैं। जलसे उत्पन्न अग्नि जलमें समाविष्ट रहती है और वह जलसे नहीं बुझती है। मनुष्योंके उदरमें रहनेवाली अग्नि प्रशान्त नहीं होती। वह पवन अग्नइज्वलायुक्त होती है, किंतु निष्प्रभ होती है, उसे जाठर अग्नि कहा गया है। यह जो अग्नि है, वह एक मण्डलके रूपमें, शुक्ल वर्णवाली तथा ऊष्मारहित होती है। सूर्यके अस्त हो जानेपर उनकी सम्पूर्ण प्रभा एक पाद (चौथाई) रह जाती है। वह प्रभा रात्रिके समय अग्निमें प्रविष्ट हो जाती है, इसलिये वह दूरसे प्रकाश दिया करती है। जब सूर्य पुनः उगता है, तब पार्थिव अग्निकी उष्णता एक चरणसे सूर्यमें प्रवेश कर जाती है, इसलिये अग्नि तपती है॥ १२-१५ १/२॥ |
| परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते परस्परम्।<br>उत्तरे चैव भूम्यर्धे तथा ह्यग्निश्च दक्षिणे॥ १७<br><br>उत्तिष्ठति पुनः सूर्यः पुनर्वै प्रविशत्यपः।<br>तस्मात्ताम्रा भवन्त्यापो दिवा रात्रिप्रवेशनात्॥ १८<br><br>अस्तं याति पुनः सूर्यो अहर्वै प्रविशत्यपः।<br>तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला आपो दृश्यन्ति भास्वराः॥ १९<br><br>एतेन क्रमयोगेन भूम्यर्धे दक्षिणोत्तरे।<br>उदयास्तमने नित्यमहोरात्रं विशत्यपः॥ २० | सूर्य तथा अग्निके तेज प्रकाश एवं उष्ण गुण-स्वरूपवाले हैं, ये दोनों परस्पर अनुप्रवेशके कारण एक-दूसरेको आप्यायित करते हैं। मेरुके दक्षिणी तथा उत्तरी भूम्यर्धमें, जब सूर्य उदित होता है, तब रात्रि जलमें प्रवेश कर जाती है, इसलिये दिनके समय रात्रिके [जलमें] प्रवेश करनेके कारण जल ताम्रवर्ण हो जाता है। जब सूर्य अस्त होता है, तब दिन जलमें प्रवेश कर जाता है, इसलिये रातमें जल पुनः शुक्ल वर्णवाला तथा चमकीला दिखायी पड़ता है। इसी क्रमयोगसे उदय एवं अस्त दोनों समयोंमें दिन और रात दक्षिणोत्तर भूम्यर्धमें जलमें प्रवेश किया करते हैं॥ १६-२०॥ |
| यश्चासौ तपते सूर्यः पिबन्नम्भो गभस्तिभिः।<br>पार्थिवाग्निविमिश्रोऽसौ दिव्यः शुचिरिति स्मृतः॥ २१<br><br>सहस्रपादसौ वह्निर्वृत्तकुम्भनिभः स्मृतः।<br>आदत्ते स तु नाडीनां सहस्रेण समन्ततः॥ २२<br><br>नादेयीश्चैव सामुद्रीः कूपाश्चैव तथा घनाः।<br>स्थावरा जङ्गमाश्चैव वापीकुल्यादिका अपः॥ २३<br><br>तस्य रश्मिसहस्रं तच्छीतवर्षोष्णनिःस्रवम्।<br>तासां चतुःशता नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः॥ २४<br><br>भजनाश्चैव माल्याश्च केतनाः पतनास्तथा।<br>अमृता नामतः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः॥ २५ | जो यह सूर्य [अपनी] किरणोंसे जलको पीता हुआ तपता रहता है, उसे पार्थिवाग्निमिश्रित दिव्य शुचि (अग्नि) कहा गया है। हजार पाद (किरण)-वाली यह अग्नि वृत्तकुम्भके तुल्य कही गयी है। वह अपनी हजार नाड़ियों (किरणों)-से चारों ओरसे नदियों, समुद्रों, कूपों, बावलियों, नालों आदि स्थावर-जंगमसे जलोंको ग्रहण करती है। उसकी एक हजार नाड़ियाँ हैं; जो शीत, उष्ण और वर्षासे युक्त हैं। उनमेंसे विचित्र रूपोंवाली चार सौ नाड़ियाँ वर्षा करती हैं। वे भजना, माल्या, केतना तथा पतना हैं; अमृता नामवाली ये सभी रश्मियाँ वृष्टि करनेवाली हैं॥ २१-२५॥ |
| २४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हिमोद्वाहाश्च ता नाड्यो रश्मयस्त्रिशताः पुनः।<br>रेशा मेघाश्च वात्याश्च ह्रादिन्यो हिमसर्जनाः॥ २६<br><br>चन्द्रभा नामतः सर्वाः पीताभाश्च गभस्तयः।<br>शुक्लाश्च ककुभाश्चैव गावो विश्वभृतस्तथा॥ २७<br><br>शुक्लास्ता नामतः सर्वास्त्रिशतीर्घर्मसर्जनाः।<br>सोमो बिभर्ति ताभिस्तु मनुष्यपितृदेवताः॥ २८<br><br>मनुष्यानौषधेनेह स्वधया च पितॄनपि।<br>अमृतेन सुरान् सर्वांस्तिसृभिस्तर्पयत्यसौ॥ २९ | तीन सौ हिमवाहिनी नाड़ियाँ हैं। वे रेशा, मेघा, वात्या तथा ह्रादिनी हैं; चन्द्रभा नामवाली वे सभी रश्मियाँ हिमका सर्जन करनेवाली हैं और पीत आभावाली हैं। शुक्ला, ककुभा, गौ तथा विश्वभृत्—ये रश्मियाँ शुक्ला नामवाली हैं; वे सब तीन सौ रश्मियाँ ऊष्मा उत्पन्न करनेवाली हैं। चन्द्रमा उन तीनों किरणोंके द्वारा मनुष्य, पितृगणों तथा देवताओंका भरण करता है। वह मनुष्योंको औषधिसे, पितरोंको स्वधासे और सभी देवताओंको अमृतसे तृप्त करता है॥ २६–२९॥ |
| वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शतैः स तपते त्रिभिः।<br>वर्षास्वथो शरदि च चतुर्भिः सम्प्रवर्षति॥ ३०<br><br>हेमन्ते शिशिरे चैव हिममुत्सृजते त्रिभिः।<br>इन्द्रो धाता भगः पूषा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा॥ ३१<br><br>अंशुर्विवस्वांस्त्वष्टा च पर्जन्यो विष्णुरेव च।<br>वरुणो माघमासे तु सूर्य एव तु फाल्गुने॥ ३२<br><br>चैत्रे मासि भवेदंशुर्धाता वैशाखतापनः।<br>ज्येष्ठे मासि भवेदिन्द्र आषाढे चार्यमा रविः॥ ३३<br><br>विवस्वान् श्रावणे मासि प्रोष्ठपादे भगः स्मृतः।<br>पर्जन्योऽश्वयुजे मासि त्वष्टा वै कार्तिके रविः॥ ३४<br><br>मार्गशीर्षे भवेन्मित्रः पौषे विष्णुः सनातनः।<br>पञ्चरश्मिसहस्राणि वरुणस्यार्ककर्मणि॥ ३५ | वह [सूर्य] वसन्त तथा ग्रीष्ममें तीन सौ किरणोंसे तपता है, वर्षा तथा शरदमें चार सौ किरणोंसे वर्षा करता है और हेमन्त तथा शिशिरमें तीन सौ किरणोंसे हिम छोड़ता है। इन्द्र, धाता, भग, पूषा, मित्र, वरुण, अर्यमा, अंशु, विवस्वान्, त्वष्टा, पर्जन्य और विष्णु—ये [बारह] सूर्य हैं। वरुण माघमासमें सूर्य है एवं पूषा फाल्गुनमासमें सूर्य है। अंशु चैत्रमासमें सूर्य होता है और धाता वैशाखमासमें सूर्य होता है। इन्द्र ज्येष्ठमासमें सूर्य होता है और अर्यमा आषाढ़मासमें सूर्य होता है। विवस्वान् श्रावणमासमें और भग भाद्रपदमासमें सूर्य कहा गया है। पर्जन्य आश्विन मासमें सूर्य होता है और त्वष्टा कार्तिकमासमें सूर्य होता है। मित्र मार्गशीर्षमासमें सूर्य होता है और सनातन विष्णु पौषमासमें सूर्य होता है॥ ३०–३४१/२॥ |
| षड्भिः सहस्रैः पूषा तु देवोंऽशुः सप्तभिस्तथा।<br>धाताष्टभिः सहस्रैस्तु नवभिस्तु शतक्रतुः॥ ३६<br><br>विवस्वान् दशभिर्याति यात्येकादशभिर्भगः।<br>सप्तभिस्तपते मित्रस्त्वष्टा चैवाष्टभिः स्मृतः॥ ३७<br><br>अर्यमा दशभिर्याति पर्जन्यो नवभिस्तथा।<br>षड्भी रश्मिसहस्रैस्तु विष्णुस्तपति मेदिनीम्॥ ३८ | सूर्यसम्बन्धी कर्ममें वरुणकी पाँच हजार रश्मियाँ होती हैं। पूषा छः हजार किरणोंसे, अंशुदेव सात हजार किरणोंसे, धाता आठ हजार किरणोंसे और इन्द्र नौ हजार किरणोंसे सूर्यकर्म करते हैं। विवस्वान् दस हजार किरणोंसे गमन करता है और भग ग्यारह हजार किरणोंसे गमन करता है। मित्र सात हजार रश्मियोंसे तपता है। त्वष्टा आठ हजार किरणोंसे युक्त कहा गया है। अर्यमा दस हजार किरणोंसे तथा पर्जन्य नौ हजार किरणोंसे गमन करता है। विष्णु [नामक सूर्य] छः हजार रश्मियोंसे पृथ्वीपर तपता है॥ ३५–३८॥ |
| वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मे काञ्चनसप्रभः।<br>श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुः शरदि भास्करः॥ ३९ | सूर्य वसन्त-ऋतुमें कपिल वर्णके और ग्रीष्म-ऋतुमें स्वर्णकी प्रभावाले होते हैं। वे सूर्य वर्षाऋतुमें |
६०- मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन
अध्याय ६० ] मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन २४९
| हेमन्ते ताम्रवर्णस्तु शिशिरे लोहितो रविः ।<br>इति वर्णाः समाख्याता मया सूर्यसमुद्भवाः ॥ ४० | श्वेतवर्ण और शरद्-ऋतुमें पाण्डुवर्णके होते हैं। रवि हेमन्त-ऋतुमें ताम्र वर्णवाले और शिशिर-ऋतुमें लोहित वर्णवाले होते हैं। इस प्रकार मैंने सूर्यमें होनेवाले रंगोंका वर्णन किया ॥ ३९-४० ॥ |
|---|---|
| ओषधीषु बलं धत्ते स्वधया च पितृष्वपि ।<br>सूर्योऽमरेष्वप्यमृतं त्रयं त्रिषु नियच्छति ॥ ४१ | सूर्य औषधियोंको बल देते हैं, स्वधासे पितरोंको तृप्त करते हैं और देवताओंको अमृत प्रदान करते हैं, इस प्रकार वे उन तीनोंको तीन वस्तुएँ देते हैं। इस प्रकार सूर्यकी वे हजारों किरणें लोककल्याण करती हैं। शीत, उष्ण तथा वर्षा करनेवाली ये किरणें लोकमें पहुँचकर भिन्न-भिन्न रूप धारण करती हैं ॥ ४१-४२ ॥ |
| एवं रश्मिसहस्रं तत्सौरं लोकार्थसाधकम् ।<br>भिद्यते लोकमासाद्य जलशीतोष्णनिःस्रवम् ॥ ४२ | |
| इत्येतन्मण्डलं शुक्लं भास्करं सूर्यसंज्ञितम् ।<br>नक्षत्रग्रहसोमानां प्रतिष्ठायानिरैव च ॥ ४३ | शुक्ल वर्णवाला तथा देदीप्यमान यह मण्डल सूर्य नामवाला है। यह नक्षत्रों, ग्रहों एवं चन्द्रमाकी प्रतिष्ठाका कारण है। चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रह—इन सभीको सूर्यसे उत्पन्न जानना चाहिये। चन्द्रमा नक्षत्रोंका अधिपति है और शिवजीका बायाँ नेत्र है। स्वयं सूर्य शिवजीके दाहिने नेत्र हैं। वे इस लोकमें लोगोंको ले जाते हैं, इसीलिये ये नयन कहे जाते हैं ॥ ४३-४५ ॥ |
| चन्द्रर्क्षग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः ।<br>नक्षत्राधिपतिः सोमो नयनं वाममीशितुः ॥ ४४ | |
| नयनं चैवमीशस्य दक्षिणं भास्करः स्वयम् ।<br>तेषां जनानां लोकेऽस्मिन्नयनं नयते यतः ॥ ४५ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्यरश्मिस्वरूपकथनं नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्यरश्मिस्वरूपकथन' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥
साठवाँ अध्याय
मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन
| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**सूर्य अग्निके रूपमें पढ़ा जाता है और चन्द्रमाको जल कहा गया है। शेष [भौम आदि] पाँच ग्रहोंको ईश्वर तथा इच्छाके अनुसार भ्रमण करनेवाला जानना चाहिये ॥ १ ॥ |
|---|---|
| शेषाः पञ्च ग्रहा ज्ञेया ईश्वराः कामचारिणः ।<br>पठ्यते चाग्निरदित्य उदकं चन्द्रमाः स्मृतः ॥ १ | |
| शेषाणां प्रकृतिं सम्यग् वक्ष्यमाणां निबोधत ।<br>सुरसेनापतिः स्कन्दः पठ्यतेऽङ्गारको ग्रहः ॥ २ | [हे ऋषियो!] मैं शेष ग्रहोंकी प्रकृति भलीभाँति बताता हूँ, आपलोग सुनिये। भौम (मंगल) ग्रहको देवताओंका सेनापति स्कन्द कहा जाता है। ज्ञानीलोग बुधको नारायण देव कहते हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! मन्द गतिवाला महाग्रह शनैश्चर समस्त लोकोंका स्वामी तथा लोकप्रभु साक्षात् यम है। देवताओं और असुरोंके गुरु भानुमान् महाग्रह बृहस्पति तथा शुक्र प्रजापतिके पुत्र कहे गये हैं। आदित्य ही सम्पूर्ण त्रैलोक्यका मूल है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २–५ ॥ |
| नारायणं बुधं प्राहुर्देवं ज्ञानविदो जनाः ।<br>सर्वलोकप्रभुः साक्षाद्यमो लोकप्रभुः स्वयम् ॥ ३ | |
| महाग्रहो द्विजश्रेष्ठा मन्दगामी शनैश्चरः ।<br>देवासुरगुरू द्वौ तु भानुमन्तौ महाग्रहौ ॥ ४ | |
| प्रजापतिसुतावुक्तौ ततः शुक्रबृहस्पती ।<br>आदित्यमूलमखिलं त्रैलोक्यं नात्र संशयः ॥ ५ |
| २५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| भवत्यस्माज्जगत्कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्।<br>रुद्रेन्द्रोपेन्द्रचन्द्राणां विप्रेन्द्राग्निदिवौकसाम्॥ ६<br><br>द्युतिर्द्युतिमRetainतां कृत्स्नं यत्तेजः सार्वलौकिकम्।<br>सर्वात्मा सर्वलोकेशो महादेवः प्रजापतिः॥ ७<br><br>सूर्य एव त्रिलोकेशो मूलं परमदैवतम्।<br>ततः सञ्जायते सर्वं तत्रैव प्रविलीयते॥ ८ | देवता, असुर तथा मनुष्यसहित सम्पूर्ण जगत् इसी [सूर्य]-से उत्पन्न होता है। वे सूर्य रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्रमा, श्रेष्ठ ब्राह्मणों, अग्नि एवं देवताओं—इन सब द्युतिसम्पन्न देवोंकी द्युति हैं। उनका जो सम्पूर्ण तेज है, वह सार्वलौकिक है। वे सबकी आत्मा, सभी लोकोंके ईश्वर, महादेव और प्रजापति हैं। सूर्य ही तीनों लोकोंके ईश, सबके कारणस्वरूप एवं परम देवता हैं। उन्हींसे सब कुछ उत्पन्न होता है और उन्हींमें विलीन हो जाता है॥ ६-८॥ | | भावाभावौ हि लोकानामादित्यान्निःसृतौ पुरा।<br>अविज्ञेयो ग्रहो विप्रा दीप्तिमान् सुप्रभो रविः॥ ९ | लोकोंके भाव तथा अभाव पूर्वकालमें आदित्यसे ही निकले थे। हे विप्रो! उत्तम प्रभाववाला दीप्तिमान् सूर्य [नामक] ग्रह अविज्ञेय है॥ ९॥ | | अत्र गच्छन्ति निधनं जायन्ते च पुनः पुनः।<br>क्षणा मुहूर्ता दिवसा निशाः पक्षाश्च कृत्स्नशः॥ १०<br><br>मासाः संवत्सराश्चैव ऋतवोऽथ युगानि च।<br>तदादित्यादृते ह्येषा कालसंख्या न विद्यते॥ ११<br><br>कालादृते न नियमो न दीक्षा नाह्निकक्रमः।<br>ऋतूनां च विभागश्च पुष्पं मूलं फलं कुतः॥ १२<br><br>कुतः सस्यविनिष्पत्तिस्तृणौषधिगणोऽपि च।<br>अभावो व्यवहाराणां जन्तूनां दिवि चेह च॥ १३<br><br>जगत्प्रतापनमृते भास्करं रुद्ररूपिणम्।<br>स एष कालश्चाग्निश्च द्वादशात्मा प्रजापतिः॥ १४ | क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, संवत्सर (वर्ष), ऋतु तथा युग इन्हीं सूर्यसे बार-बार उत्पन्न होते हैं और इन्हींमें समाप्त होते हैं। इसलिये सूर्यके बिना यह कालगणना नहीं होती है। कालके बिना न नियम हो सकता है, न दीक्षा हो सकती है और न दैनिक कृत्य ही हो सकता है। [इनके बिना] ऋतुओंका विभाजन, पुष्प, मूल तथा फल कैसे हो सकते हैं? धान्यकी उत्पत्ति कैसे सम्भव है और तृण तथा औषधियाँ भी कैसे हो सकती हैं? जगत्को तपानेवाले रुद्ररूप भास्करके बिना इस लोकमें तथा स्वर्गमें प्राणियोंके व्यवहारका अभाव हो जायगा। वे ही काल, अग्नि, द्वादश आत्मा तथा प्रजापति हैं॥ १०-१४॥ | | तपत्येष द्विजश्रेष्ठास्त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>स एष तेजसां राशिः समस्तः सार्वलौकिकः॥ १५<br><br>उत्तमं मार्गमास्थाय रात्र्यहोभिरिदं जगत्।<br>पार्श्वतोर्ध्वमधश्चैव तापयत्येष सर्वशः॥ १६<br><br>यथा प्रभाकरो दीपो गृहमध्येऽवलम्बितः।<br>पार्श्वतोर्ध्वमधश्चैव तमो नाशयते समम्॥ १७<br><br>तद्वत्सहस्रकिरणो ग्रहराजो जगत्प्रभुः।<br>सूर्यो गोभिर्जगत्सर्वमादीपयति सर्वतः॥ १८ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ये ही सूर्य चराचरसहित त्रैलोक्यको प्रकाश देते हैं। ये ही तेजोंकी राशि, सम्पूर्ण स्वरूपवाले तथा सार्वलौकिक हैं। उत्तम मार्गका आश्रय लेकर ये [सूर्य] ही इस जगत्को पार्श्वभागसे, ऊपरसे, नीचेसे, सभी ओरसे दिन-रात ताप प्रदान करते हैं। जिस प्रकार घरमें रखा हुआ प्रभा करनेवाला दीपक पार्श्वभागमें, ऊपर तथा नीचे समान रूपसे अन्धकारका नाश करता है, उसी तरह हजार किरणोंवाले ग्रहोंके राजा एवं जगत्के स्वामी सूर्य [अपनी] किरणोंसे सारे जगत्को सभी ओरसे प्रकाशित करते हैं॥ १५-१८॥ |
६१- ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूप तथा नक्षत्रों और ग्रहोंकी पारस्परिक स्थितिका वर्णन
| अध्याय ६१ ] | ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूपका वर्णन | २५१ |
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| रवे रश्मिसहस्रं यत्प्राङ्मया समुदाहृतम्।<br>तेषां श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मयो ग्रहयोनयः॥ १९<br>सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च।<br>विश्वव्यचाः पुनश्चाद्यः सन्नद्धश्च ततः परः॥ २०<br>सर्वावसुः पुनश्चान्यः स्वराडन्यः प्रकीर्तितः।<br>सुषुम्नः सूर्यरश्मिस्तु दक्षिणां राशिमैधयत्॥ २१<br>न्यगूर्ध्वाधः प्रचारोऽस्य सुषुम्नः परिकीर्तितः।<br>हरिकेशः पुरस्ताद्यो ऋक्षयोनिः प्रकीर्त्यते॥ २२<br>दक्षिणे विश्वकर्मा च रश्मिर्वर्धयते बुधम्।<br>विश्वव्यचास्तु यः पश्चाच्छुक्रयोनिः स्मृतो बुधैः॥ २३<br>सन्नद्धश्च तु यो रश्मिः स योनिर्लोहितस्य तु।<br>षष्ठः सर्वावसू रश्मिः स योनिस्तु बृहस्पतेः॥ २४<br>शनैश्चरं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते स्वराट्।<br>एवं सूर्यप्रभावेन नक्षत्रग्रहतारकाः॥ २५<br>दृश्यन्ते दिवि ताः सर्वाः विश्वं चेदं पुनर्जगत्।<br>न क्षीयन्ते यतस्तानि तस्मान्नक्षत्रता स्मृता॥ २६ | मैं सूर्यकी जिन हजार किरणोंको पहले बता चुका हूँ, उनमें सात श्रेष्ठ किरणें ग्रहोंको उत्पन्न करनेवाली हैं। वे सुषुम्ना, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, सन्नद्ध, सर्वावसु और स्वराट् [नामवाली] कही गयी हैं। सूर्यकी सुषुम्ना [नामका] रश्मि दक्षिण राशिकी वृद्धि करती है। इस सुषुम्नाका गमन पार्श्व, ऊपर तथा नीचे सभी ओर कहा गया है। सामनेकी ओर जो हरिकेश [रश्मि] है, उसे नक्षत्रोंकी योनि कहा जाता है। विश्वकर्मा [नामक] रश्मि दक्षिणमें बुधको विकसित करती है। पीछेकी ओर जो विश्वव्यचा [नामक रश्मि] है, उसे विद्वानोंने शुक्रकी योनि कहा है। जो सन्नद्ध [नामक] रश्मि है, वह मंगलकी योनि है। छठी जो सर्वावसु रश्मि है, वह बृहस्पतिकी योनि है। इसके बाद स्वराट् रश्मि शनैश्चरको पोषित करती है। इस प्रकार सूर्यके ही प्रभावसे सभी नक्षत्र, ग्रह और तारे अन्तरिक्षमें दिखायी देते हैं और यह सम्पूर्ण जगत् दिखायी देता है। चूँकि वे नष्ट नहीं होते, इसलिये उन्हें नक्षत्र कहा गया है॥ १९-२६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्यप्रभाववर्णनं नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्यप्रभाववर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६०॥
इकसठवाँ अध्याय
ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूप तथा नक्षत्रों और ग्रहोंकी पारस्परिक स्थितिका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| क्षेत्राण्येतानि सर्वाणि आतपन्ति गभस्तिभिः।<br>तेषां क्षेत्राण्यथादत्ते सूर्यो नक्षत्रतारकाः॥ १<br>चीर्णेन सुकृतेनेह सुकृतान्ते ग्रहाश्रयाः।<br>तारणात्तारका ह्येताः शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥ २ | [हे ऋषियो!] रात्रिमें सूर्यकिरणोंसे प्रकाशित होनेवाले ये सभी क्षेत्र भारतवर्षमें अनुष्ठित पुण्योंद्वारा पुण्यात्माओंके होते हैं, तदनन्तर सूर्य सुकृतोंके पूर्ण होनेपर ग्रहोंके आश्रयमें रहनेवाले [ग्रहाश्रित] नक्षत्र-तारोंको [अपने प्रभामण्डलमें] ले लेते हैं। शुक्ल होनेसे तथा तारक होनेसे ये तारे कहलाते हैं॥ १-२॥ |
| दिव्यानां पार्थिवानां च नैशानां चैव सर्वशः।<br>आदानान्नित्यमादित्यस्तेजसां तमसामपि॥ ३<br>सवने स्यन्दनेऽर्थे च धातुरेष विभाव्यते।<br>सवनात्तेजसोऽपां च तेनासौ सविता मतः॥ ४<br>बहुलश्चन्द्र इत्येष ह्लादने धातुरुच्यते।<br>शुक्लत्वे चामृतत्वे च शीतत्वे च विभाव्यते॥ ५ | दिव्य, पार्थिव तथा रात्रिमें होनेवाले अन्धकारोंको अपने तेजसे ग्रहण कर लेनेके कारण वह आदित्य [नामवाला] है। फैलाने तथा बहाने अर्थमें यह [सु] धातु पढ़ी जाती है। अतः तेजको फैलाने तथा जलको बहानेके कारण इसे 'सविता' कहा गया है। यह [चदि] धातु आह्लाद करनेके अर्थमें कही जाती है, आह्लाद |
| २५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| | करनेके कारण चन्द्रमाका नाम बहुल भी है। [इसके अतिरिक्त] यह शुक्लत्व, अमृतत्व तथा शीतत्वको भी प्रकट करता है॥ ३-५॥ | | सूर्याचन्द्रमसोर्दिव्ये मण्डले भास्वरे खगे।<br>जलतेजोमये शुक्ले वृत्तकुम्भनिभे शुभे॥ ६<br><br>घनतोयात्मकं तत्र मण्डलं शशिनः स्मृतम्।<br>घनतेजोमयं शुक्लं मण्डलं भास्करस्य तु॥ ७ | सूर्य तथा चन्द्रमाके मण्डल दिव्य, प्रकाशमान्, आकाशगामी, जल-तेजसे युक्त, शुक्लवर्णवाले, गोल घड़ेके समान तथा शुभ हैं। उनमें चन्द्रमाका मण्डल घने जलके स्वरूपवाला तथा सूर्यका मण्डल घने तेजके स्वरूपवाला शुक्लवर्णका कहा गया है॥ ६-७॥ | | वसन्ति सर्वदेवाश्च स्थानान्येतानि सर्वशः।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु ऋक्षसूर्यग्रहाश्रयाः॥ ८<br><br>तेन ग्रहा गृहाण्येव तदाख्यास्ते भवन्ति च।<br>सौरं सूर्योऽविशत्स्थानं सौम्यं सोमस्तथैव च॥ ९<br><br>शौक्रं शुक्लोऽविशत्स्थानं षोडशार्चिः प्रतापवान्।<br>बृहद् बृहस्पतिश्चैव लोहितश्चैव लोहितम्॥ १०<br><br>शनैश्चरं तथा स्थानं देवश्चापि शनैश्चरः।<br>बौधं बुधस्तु स्वर्भानुः स्वर्भानुस्थानमाश्रितः॥ ११<br><br>नक्षत्राणि च सर्वाणि नक्षत्राणि विशन्ति च।<br>गृहाण्येतानि सर्वाणि ज्योतींषि सुकृतात्मनाम्॥ १२<br><br>कल्पादौ सम्प्रवृत्तानि निर्मितानि स्वयम्भुवा।<br>स्थानान्येतानि तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १३<br><br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु देवस्थानानि तानि वै।<br>अभिमानिनोऽवतिष्ठन्ते देवाः स्थानं पुनः पुनः॥ १४<br><br>अतीतैस्तु सहैतानि भाव्याभाव्यैः सुरैः सह।<br>वर्तन्ते वर्तमानैश्च स्थानिभिस्तैः सुरैः सह॥ १५ | सभी देवता इन स्थानोंमें भलीभाँति निवास करते हैं। वे सभी मन्वन्तरोंमें नक्षत्रों, सूर्य तथा ग्रहोंका आश्रय ग्रहण करते हैं। इसलिये ग्रह [एक तरहसे] गृह ही हैं, और वे उन्हींके नामवाले होते हैं। सूर्यने सौरस्थानमें प्रवेश किया एवं सोम (चन्द्रमा)-ने सौम्यस्थानमें प्रवेश किया। सोलह किरणोंवाला प्रतापी शुक्र शौक्रस्थानमें प्रविष्ट हुआ। बृहस्पति बृहत् स्थानमें तथा लोहित (भौम) लोहितस्थानमें स्थित हुए। शनैश्चरदेव शनैश्चरस्थानमें, बुध बौधस्थानमें तथा स्वर्भानु (राहु) स्वर्भानुस्थानमें स्थित हुए। सभी नक्षत्र (अपने-अपने) नक्षत्र-स्थानोंमें प्रवेश करते हैं। ये सब ज्योतिस्थान पुण्यात्माओंके गृह हैं। ब्रह्माने इन स्थानोंको निर्मित किया है। ये कल्पके आदिमें प्रवृत्त हुए और प्रलयपर्यन्त बने रहते हैं। वे सभी मन्वन्तरोंमें देवताओंके निवासस्थान हुआ करते हैं। अभिमानी देवतालोग उनमें बार-बार निवास करते हैं। ये स्थान अतीत, भाव्य तथा अभाव्य देवताओंके साथ और वर्तमान स्थानी देवताओंके साथ विद्यमान रहते हैं॥ ८-१५॥ | | अस्मिन् मन्वन्तरे चैव ग्रहा वैमानिकाः स्मृताः।<br>विवस्वानदितेः पुत्रः सूर्यो वैवस्वतेऽन्तरे॥ १६<br><br>द्युतिमानृषिपुत्रस्तु सोमो देवो वसुः स्मृतः।<br>शुक्रो देवस्तु विज्ञेयो भार्गवोऽसुरयाजकः॥ १७<br><br>बृहत्तेजाः स्मृतो देवो देवाचार्योऽङ्गिरासुतः।<br>बुधो मनोहरश्चैव ऋषिपुत्रस्तु स स्मृतः॥ १८<br><br>शनैश्चरो विरूपस्तु संज्ञापुत्रो विवस्वतः।<br>अग्निर्विकेश्यां जज्ञे तु युवासौ लोहितार्चिषः॥ १९ | इस मन्वन्तरमें ग्रहोंको वैमानिक कहा गया है। वैवस्वत मन्वन्तरमें अदितिका पुत्र विवस्वान् सूर्य है। ऋषिपुत्र द्युतिमान् देवता वसुको सोम (चन्द्र) कहा गया है। असुरोंके याजक शुक्रदेवको भृगुका पुत्र जानना चाहिये। महातेजस्वी देवाचार्य बृहस्पतिको अंगिरारृषिका पुत्र कहा गया है। जो सुन्दर बुध है, उसे ऋषिपुत्र कहा गया है। विकृतरूपवाला शनैश्चर संज्ञाका पुत्र है; वह विवस्वान्से उत्पन्न हुआ है। लोहित आभावाला यह युवा भौम अग्निरूप रुद्रके द्वारा उनकी पत्नी विकेशीसे उत्पन्न |
| अध्याय ६१ ] | ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूपका वर्णन | २५३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नक्षत्रऋक्षनामिन्यो दाक्षायण्यस्तु ताः स्मृताः।<br>स्वर्भानुः सिंहिकापुत्रो भूतसन्तापनोऽसुरः॥ २०<br><br>सोमर्क्षग्रहसूर्येषु कीर्तितास्त्वभिमानिनः।<br>स्थानान्येतान्यथोक्तानि स्थानिन्यश्चैव देवताः॥ २१ | हुआ है। नक्षत्र-ऋक्ष नामवाली जो भी हैं, वे दक्षकी पुत्रियाँ कही गयी हैं। प्राणियोंके लिये कष्टकारी असुर राहु सिंहिकापुत्र है। इस प्रकार सोम, ऋक्ष, ग्रह तथा सूर्यमें उनके निवासस्थान हैं। इन स्थानोंका वर्णन मैंने कर दिया और अपने-अपने स्थानका अभिमान करनेवाले स्थानी देवताओंका भी वर्णन कर दिया॥ १६-२१॥ |
| सौरमग्निमयं स्थानं सहस्रांशोर्विवस्वतः।<br>हिमांशोस्तु स्मृतं स्थानमम्मयं शुक्लमेव च॥ २२<br><br>आप्यं श्यामं मनोज्ञं च बुधरश्मिगृहं स्मृतम्।<br>शुक्लस्याप्यम्मयं शुक्लं पदं षोडशरश्मिवत्॥ २३<br><br>नवरश्मि तु भौमस्य लोहितं स्थानमुत्तमम्।<br>हरिद्राभं बृहच्चापि षोडशार्चिर्बृहस्पतेः॥ २४<br><br>अष्टरश्मिगृहं चापि प्रोक्तं कृष्णं शनैश्चरे।<br>स्वर्भानोस्तामसं स्थानं भूतसन्तापनालयम्॥ २५<br><br>विज्ञेयास्तारकाः सर्वास्त्वृषयस्त्वेकरश्मयः।<br>आश्रयाः पुण्यकीर्तीनां शुक्लाश्चापि स्ववर्णतः॥ २६<br><br>घनतोयात्मिका ज्ञेयाः कल्पादावेव निर्मिताः।<br>आदित्यरश्मिसंयोगात्सम्प्रकाशात्मिकाः स्मृताः॥ २७ | हजार किरणोंवाले सूर्यका अग्निमय सौरस्थान है। चन्द्रमाका स्थान जलमय तथा शुक्लवर्णका कहा गया है। बुधग्रहका निवासस्थान जलमय, श्याम तथा मनोहर बताया गया है। शुक्रका निवासस्थान भी जलमय, शुक्लवर्णवाला तथा सोलह किरणोंसे युक्त है। भौम (मंगल)-का स्थान उत्तम, लोहितवर्णवाला तथा नौ रश्मियोंसे युक्त है। बृहस्पतिका स्थान हरिद्रा (हल्दी)-की आभावाला, विशाल तथा सोलह रश्मियोंसे युक्त है। शनैश्चरका स्थान आठ रश्मियोंसे युक्त तथा कृष्ण वर्णवाला कहा गया है। राहुका स्थान अन्धकारमय है; यह प्राणियोंके लिये कष्टकारी स्थान है। सभी तारागणोंको ऋषिरूप तथा एक रश्मिवाला जानना चाहिये, ये पुण्यकीर्तिवालोंके आश्रय हैं तथा अपने वर्णसे शुक्ल हैं। इन्हें घने जलके स्वरूपवाला जानना चाहिये। ये कल्पके प्रारम्भमें ही निर्मित किये गये थे; ये सूर्यकी रश्मियोंके संयोगके कारण उत्तम प्रकाशसे युक्त कहे गये हैं॥ २२-२७॥ |
| नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ २८<br><br>द्विगुणः सूर्यविस्ताराद्विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाधस्तात्प्रसर्पति॥ २९<br><br>उद्धृत्य पृथिवीछायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत्स्थानं तृतीयं यत्तमोमयम्॥ ३०<br><br>आदित्यात्तच्च निष्क्रम्य समं गच्छति पर्वसु।<br>आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु॥ ३१<br><br>स्वर्भानुं नुदते यस्मात्तस्मात्स्वर्भानुरुच्यते। | सूर्यका विष्कम्भ (व्यास) नौ हजार योजन बताया गया है और मण्डलके प्रमाणसे उसका विस्तार तीन गुना है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना कहा गया है। उन दोनोंके समान [विस्तारवाला] होकर राहु उनके नीचे गमन करता है। मण्डलके आकारकी बनी हुई पृथ्वी-छायाको लेकर राहुका तीसरा बड़ा स्थान है, जो अन्धकारमय है। वह राहु [चन्द्र] पर्वोंमें सूर्यसे निकलकर चन्द्रमाकी ओर जाता है और सौर पर्वोंमें चन्द्रमासे [निकलकर] सूर्यकी ओर जाता है। चूँकि राहु भानु (सूर्य)-को प्रेरित करता है, अतः इसे स्वर्भानु कहा जाता है॥ २८-३११/२॥ |
| चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते॥ ३२ | शुक्रका विस्तार योजनके प्रमाणसे विष्कम्भ तथा |
| २५४ | श्रीलिङ्गमहापुराणं | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनाग्रात्प्रमाणतः।<br>भार्गवात्पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः॥ ३३<br>बृहस्पतेः पादहीनौ वक्रसौरी उभौ स्मृतौ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः॥ ३४<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै।<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्तारान्मण्डलाच्च वै॥ ३५ | मण्डल (घेरा)-में चन्द्रमाका सोलहवाँ भाग कहा गया है। बृहस्पतिको शुक्रसे एक चौथाई कम जानना चाहिये। बृहस्पतिसे एक चौथाई कम मंगल तथा शनि—ये दोनों बताये गये हैं। बुध विस्तार तथा मण्डलमें उन दोनोंसे एक चौथाई कम है। तारा-नक्षत्ररूपवाले जो पिण्ड हैं, वे विस्तार तथा मण्डलमें बुधके बराबर हैं॥ ३२—३५॥ |
| प्रायशश्चन्द्रयोगीनि विद्यादृक्षाणि तत्त्ववित्।<br>तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्॥ ३६<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने।<br>सर्वोपरि निकृष्टानि तारकामण्डलानि तु॥ ३७<br>योजनान्यर्धमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।<br>उपरिष्टात्त्रयस्तेषां ग्रहास्ते दूरसर्पिणः॥ ३८<br>सौरोऽङ्गिरसश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः।<br>पूर्वमेव समाख्याता गतिस्तेषां यथाक्रमम्॥ ३९ | तत्त्ववेत्ताको प्रायः सभी नक्षत्रोंको चन्द्रमासे सम्बद्ध जानना चाहिये। तारा-नक्षत्ररूपवाले वे परस्पर बहुत छोटे हैं। वे [छोटे तारे] पाँच, चार, तीन तथा दो योजन विस्तारवाले हैं। इन सबके ऊपर अत्यन्त छोटे तारा-मण्डल हैं, जो केवल आधे योजनके हैं, उनसे छोटा कोई तारा नहीं है। उनके ऊपर तीन ग्रह हैं, वे दूर-दूर भ्रमण करनेवाले हैं। वे सौर, अंगिरा (बृहस्पति) तथा वक्र (भौम) हैं, इन्हें मन्दगतिसे भ्रमण करनेवाला जानना चाहिये। उनकी गतिके विषयमें पहले ही क्रमसे बता दिया गया है॥ ३६—३९॥ |
| एतेष्वेव ग्रहाः सर्वे नक्षत्रेषु समुत्थिताः।<br>विवस्वानदितेः पुत्रः सूर्यो वै मुनिसत्तमाः॥ ४०<br>विशाखासु समुत्पन्नो ग्रहाणां प्रथमो ग्रहः।<br>त्विषिमान् धर्मपुत्रस्तु सोमो देवो वसुस्तु सः॥ ४१<br>शीतरश्मिः समुत्पन्नः कृत्तिकासु निशाकरः।<br>षोडशार्चिर्भृगोः पुत्रः शुक्रः सूर्यादनन्तरम्॥ ४२<br>ताराग्रहाणां प्रवरस्तिष्ये क्षेत्रे समुत्थितः।<br>ग्रहश्चाङ्गिरसः पुत्रो द्वादशार्चिर्बृहस्पतिः॥ ४३<br>फाल्गुनीषु समुत्पन्नः पूर्वाख्यासु जगद्गुरुः।<br>नवार्चिर्लोहिताङ्गश्च प्रजापतिसुतो ग्रहः॥ ४४<br>आषाढास्विह पूर्वांसु समुत्पन्न इति स्मृतः।<br>रेवतीष्वेव सप्ताचिःस्थाने सौरिः शनैश्चरः॥ ४५<br>सौम्यो बुधो धनिष्ठासु पञ्चार्चिरुदितो ग्रहः।<br>तमोमयो मृत्युसुतः प्रजाक्षयकरः शिखी॥ ४६<br>आश्लेषासु समुत्पन्नः सर्वहारी महाग्रहः।<br>तथा स्वनामधेयेषु दाक्षायण्यः समुत्थिताः॥ ४७<br>तमोवीर्यमयो राहुः प्रकृत्या कृष्णमण्डलः।<br>भरणीषु समुत्पन्नो ग्रहश्चन्द्रार्कमर्दनः॥ ४८ | सभी ग्रह इन्हीं नक्षत्रोंमें उत्पन्न हुए हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! अदितिका पुत्र विवस्वान् सूर्य, जो ग्रहोंमें प्रथम है, विशाखा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। धर्मका पुत्र ओजस्वी सोम वसु देवता है, वह शीत रश्मिवाला चन्द्रमा कृत्तिका नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। सोलह रश्मियोंवाला भृगुपुत्र शुक्र जो ताराग्रहोंमें श्रेष्ठ है, सूर्यके बाद तिष्य नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। बारह किरणोंवाला अंगिरापुत्र जगद्गुरु बृहस्पति ग्रह पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। नौ किरणोंसे युक्त तथा लोहित अंगवाला प्रजापतिपुत्र भौमग्रह पूर्वाषाढ नक्षत्रमें उत्पन्न होनेवाला कहा गया है। सात किरणोंसे युक्त सूर्यपुत्र शनैश्चर रेवती नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। पाँच किरणोंवाला चन्द्रपुत्र बुध ग्रह धनिष्ठा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। अन्धकारमय, प्रजाका क्षय करनेवाला तथा सबका विनाशक महाग्रह मृत्युपुत्र शिखी (केतु) आश्लेषा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। दक्षकी पुत्रियाँ अपने-अपने नामवाले नक्षत्रोंमें उत्पन्न हुई हैं। अन्धकार तथा ओजसे परिपूर्ण, प्रकृतिसे काले मण्डलवाला और सूर्य-चन्द्रका मर्दन करनेवाला ग्रह राहु भरणी नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है॥ ४०—४८॥ |
अध्याय ६१] ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूपका वर्णन २५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एते तारा ग्रहाश्चापि बोद्धव्या भार्गवादयः।<br>जन्मनक्षत्रपीडासु यान्ति वैगुण्यतां यतः॥ ४९<br>मुच्यते तेन दोषेण ततस्तद् ग्रहभक्तितः।<br>सर्वग्रहाणामेतेषामादिरादित्य उच्यते॥ ५०<br>ताराग्रहाणां शुक्रस्तु केतूनां चापि धूमवान्।<br>ध्रुवः किल ग्रहाणां तु विभक्तानां चतुर्दिशम्॥ ५१<br>नक्षत्राणां श्रविष्ठा स्यादयनानां तथोत्तरम्।<br>वर्षाणां चैव पञ्चानामाद्यः सम्वत्सरः स्मृतः॥ ५२<br>ऋतूनां शिशिरश्चापि मासानां माघ उच्यते।<br>पक्षाणां शुक्लपक्षस्तु तिथीनां प्रतिपत्तथा॥ ५३<br>अहोरात्रविभागानामहश्चादिः प्रकीर्तितः।<br>मुहूर्तानां तथैवादिर्मुहूर्तो रुद्रदैवतः॥ ५४ | इन शुक्र आदि ग्रहोंको ताराके नामसे भी जानना चाहिये। ये अपने-अपने जन्म-नक्षत्रोंमें उत्पन्न पीड़ाओंमें वैगुण्यताको प्राप्त होते हैं, तब उस ग्रहकी पूजा करनेसे मनुष्य उस दोषसे मुक्त हो जाता है। इन सभी ग्रहोंमें आदित्य (सूर्य) आदि (प्रधान) ग्रह कहा जाता है। ताराग्रहोंमें शुक्र, केतुओंमें धूमवान् तथा चारों दिशाओंमें विभक्त ग्रहोंमें ध्रुव प्रधान है। नक्षत्रोंमें धनिष्ठा और अयनोंमें उत्तरायण प्रधान है। पाँचों वर्षोंमें संवत्सरको प्रधान कहा गया है। ऋतुओंमें शिशिर तथा मासोंमें माघको आदिमास कहा जाता है। पक्षोंमें शुक्लपक्ष और तिथियोंमें प्रतिपदा प्रधान है। दिन तथा रातके विभागोंमें दिनको आदि कहा गया है। मुहूर्तोंमें रुद्रदैवत आदिमुहूर्त है॥ ४९—५४॥ |
| क्षणश्चापि निमेषादिः कालः कालविदां वराः।<br>श्रवणान्तं धनिष्ठादि युगं स्यात्पञ्चवार्षिकम्॥ ५५<br>भानोर्गतिविशेषेण चक्रवत्परिवर्तते।<br>दिवाकरः स्मृतस्तस्मात्कालकृद्भूरिश्वरः॥ ५६<br>चतुर्विधानां भूतानां प्रवर्तकनिवर्तकः।<br>तस्यापि भगवान् रुद्रः साक्षाद्देवः प्रवर्तकः॥ ५७<br>इत्येष ज्योतिषामेवं सन्निवेशोऽर्थनिश्चयः।<br>लोकसंव्यवहारार्थं महादेवेन निर्मितः॥ ५८<br>बुद्धिपूर्वं भगवता कल्पादौ सम्प्रवर्तितः।<br>स आश्रयोऽभिमानी च सर्वस्य ज्योतिरात्मकः॥ ५९ | हे कालवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! क्षणोंमें निमेष आदिकाल है। धनिष्ठासे श्रवणपर्यन्त पाँच वर्षोंका युग होता है। भानुकी विशेष गतिके कारण जगत् चक्रकी भाँति परिवर्तित होता रहता है, इसलिये सूर्यको कालकी रचना करनेवाला, व्यापक तथा ईश्वर कहा गया है। सूर्य चारों प्रकारके प्राणियोंका प्रवर्तक एवं निवर्तक है और साक्षात् भगवान् रुद्रदेव उस (सूर्य)-के भी प्रवर्तक हैं। इस प्रकार महादेवने लोकव्यवहारके लिये नक्षत्रोंका अर्थनिश्चयवाला यह सन्निवेश निर्मित किया है। उन भगवान्ने ही कल्पके आरम्भमें बुद्धिपूर्वक इनका प्रवर्तन किया है। वे सबके आश्रय, अभिमानी तथा ज्योतिस्वरूप हैं॥ ५५—५९॥ |
| एकरूपप्रधानस्य परिणामोऽयमद्भुतः।<br>नैष शक्यः प्रसंख्यातुं याथातथ्येन केनचित्॥ ६०<br>गतागतं मनुष्येण ज्योतिषां मांसचक्षुषा।<br>आगमादनुमानाच्च प्रत्यक्षादुपपत्तितः॥ ६१<br>परीक्ष्य निपुणं बुद्ध्या श्रद्धातव्यं विपश्चिता।<br>चक्षुः शास्त्रं जलं लेख्यं गणितं मुनिसत्तमाः॥ ६२<br>पञ्चैते हेतवो ज्ञेया ज्योतिर्मानविनिर्णये॥ ६३ | एक रूपवाले उन प्रधानका यह अद्भुत परिणाम है। यथार्थरूपसे इसका वर्णन किसीके द्वारा नहीं किया जा सकता है। भौतिक दृष्टिवाले विद्वान् मनुष्यको इन ज्योतिर्गणोंके प्रमाण तथा गतिके विषयमें आगम (वेद, शास्त्र), अनुमान, प्रत्यक्ष और उपपत्तिके द्वारा सावधानीपूर्वक बुद्धिसे परीक्षण करके इनपर श्रद्धा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! चक्षु, शास्त्र, जल, लेख्य तथा गणित—इन पाँचोंको नक्षत्रोंके प्रमाणके निर्णयमें साधन समझना चाहिये॥ ६०—६३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ग्रहसंख्यावर्णनं नामैकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ग्रहसंख्यावर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६१॥
६२- उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन
| २५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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बासठवाँ अध्याय
उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>कथं विष्णोः प्रसादाद्वै ध्रुवो बुद्धिमतां वरः।<br>मेढीभूतो ग्रहाणां वै वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ध्रुव भगवान् विष्णुकी कृपासे ग्रहोंके मेढ़ीभूत (मध्य स्थानवाले) किस प्रकार हुए, [हमलोगोंको] इस समय बताइये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>एतमर्थं मया पृष्टो नानाशास्त्रविशारदः।<br>मार्कण्डेयः पुरा प्राह मह्यं शुश्रूषवे द्विजाः॥ २ | **सूतजी बोले—**हे द्विजो! मैंने पूर्वकालमें अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता मार्कण्डेयजीसे इसी बातको पूछा था, तब उन्होंने सुननेकी इच्छावाले मुझको बताया था॥ २॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>सार्वभौमो महातेजाः सर्वशस्त्रभृतां वरः।<br>उत्तानपादो राजा वै पालयामास मेदिनीम्॥ ३<br>तस्य भार्याद्वयमभूत्सुनीतिः सुरुचिस्तथा।<br>अग्रजायामभूत्पुत्रः सुनीत्यां तु महायशाः॥ ४<br>ध्रुवो नाम महाप्राज्ञः कुलदीपो महामतिः।<br>कदाचित्सप्तवर्षोऽपि पितुरङ्कमुपाविशत्॥ ५<br>सुरुचिस्तं विनिर्धूय स्वपुत्रं प्रीतिमानसा।<br>निवेशयत्तं विप्रेन्द्रा ह्यङ्कं रूपेण मानिता॥ ६ | मार्कण्डेयजी बोले—[प्राचीन कालमें] सार्वभौम (चक्रवर्ती सम्राट्), महान् तेजस्वी तथा सभी शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ राजा उत्तानपाद पृथ्वीका पालन करते थे। सुनीति तथा सुरुचि—ये उनकी दो भार्याएँ थीं। उनकी ज्येष्ठ भार्या सुनीतिसे ध्रुव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था; वह महायशस्वी, महाज्ञानी, कुलका दीपक तथा महाबुद्धिमान् था। जब वह सात वर्षका था, तब किसी समय अपने पिताकी गोदमें बैठ गया। हे विप्रेन्द्रो! उस समय अपने रूपपर गर्व करनेवाली सुरुचिने उसे [गोदसे] उतारकर प्रसन्नचित्त होकर अपने पुत्रको [राजाकी] गोदमें बैठा दिया॥ ३-६॥ |
| अलब्ध्वा स पितुर्धीमानङ्कं दुःखितमानसः।<br>मातुः समीपमागम्य रुरोद स पुनः पुनः॥ ७ | तदनन्तर पिताकी गोद न पाकर उस बुद्धिमान् [ध्रुव]-के हृदयमें दुःख हुआ और वह [अपनी] माताके पास आकर बार-बार रोने लगा॥ ७॥ |
| रुदन्तं पुत्रमाहेदं माता शोकपरिप्लुता।<br>सुरुचिर्दयिता भर्तुस्तस्याः पुत्रोऽपि तादृशः॥ ८<br>मम त्वं मन्दभाग्याया जातः पुत्रोऽप्यभाग्यवान्।<br>किं शोचसि किमर्थं त्वं रोदमानः पुनः पुनः॥ ९<br>सन्तप्तहृदयो भूत्वा मम शोकं करिष्यसि।<br>स्वस्थस्थानं ध्रुवं पुत्र स्वशक्त्या त्वं समाप्नुयाः॥ १० | तब शोकमें डूबी हुई माताने रोते हुए पुत्रसे कहा—सुरुचि [अपने] पतिकी प्रिय पत्नी है और उसका पुत्र भी उसी प्रकार उन्हें प्रिय है। तुम मुझ अभागिनके अभागे पुत्र उत्पन्न हुए हो। तुम क्यों चिन्ता करते हो और बार-बार किसलिये रो रहे हो? तुम दुःखितचित्त होकर मेरे शोकको ही बढ़ाओगे। हे पुत्र! तुम्हें अपनी शक्तिसे शान्त तथा अटल स्थान प्राप्त करना चाहिये॥ ८-१०॥ |
| इत्युक्तः स तु मात्रा वै निर्जगाम तदा वनम्।<br>विश्वामित्रं ततो दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि॥ ११<br>उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा भगवन् वक्तुमर्हसि।<br>सर्वेषामुपरिस्थानं केन प्राप्स्यामि सत्तम॥ १२ | तब माताके इस प्रकार कहनेपर वह वनमें चला गया। वहाँ [ऋषि] विश्वामित्रको देखकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उसने कहा—हे |
अध्याय ६२ ] उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन | २५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितुरङ्के समासीनं माता मां सुरुचिर्मुने।<br>व्यधूनयत्तस् तां राजा पिता नोवाच किञ्चन॥ १३<br><br>एतस्मात्कारणाद् ब्रह्मंस्त्रस्तोऽहं मातरं गतः।<br>सुनीतिराह मे माता मा कृथाः शोकमृत्तमम्॥ १४<br><br>स्वकर्मणा परं स्थानं प्राप्तुमर्हसि पुत्रक।<br>तस्या हि वचनं श्रुत्वा स्थानं तव महामुने॥ १५<br><br>प्राप्तो वनमिदं ब्रह्मन्नद्य त्वां दृष्टवान् प्रभो।<br>तव प्रसादात्प्राप्स्येऽहं स्थानमद्भुतमुत्तमम्॥ १६ | भगवन्! हे सत्तम! आप कृपा करके मुझे बतायें कि मैं किस उपायसे सबके ऊपर स्थान प्राप्त करूँगा? हे मुने! माता सुरुचिने पिताकी गोदमें बैठे हुए मुझको [गोदसे] उतार दिया और उन राजाने उन्हें कुछ नहीं कहा। हे ब्रह्मन्! इस कारणसे दुःखी होकर मैं माताके पास गया। तब मेरी माता सुनीतिने कहा—हे पुत्र! शोक मत करो, तुम अपने कर्मसे उत्तम तथा परम स्थान प्राप्त कर सकते हो। हे महामुने! उनका वचन सुनकर मैं इस वनमें आपके स्थानपर आया हूँ। हे ब्रह्मन्! आज मैंने आपका दर्शन किया, अतः हे प्रभो! आपकी कृपासे मैं अद्भुत तथा उत्तम स्थान [अवश्य] प्राप्त करूँगा॥ ११—१६॥ |
| इत्युक्तः स मुनिः श्रीमान् प्रहसन्निदमब्रवीत्।<br>राजपुत्र शृणुष्वेदं स्थानमुत्तममाप्स्यसि॥ १७<br><br>आराध्य जगतामीशं केशवं क्लेशनाशनम्।<br>दक्षिणाङ्गभवं शम्भोर्महादेवस्य धीमतः॥ १८<br><br>जप नित्यं महाप्राज्ञ सर्वपापविनाशनम्।<br>इष्टदं परमं शुद्धं पवित्रममलं परम्॥ १९<br><br>ब्रूहि मन्त्रमिमं दिव्यं प्रणवेन समन्वितम्।<br>नमोऽस्तु वासुदेवाय इत्येवं नियतेन्द्रियः॥ २०<br><br>ध्यायन् सनातनं विष्णुं जपहोमपरायणः।<br>इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं विश्वामित्रं महायशाः॥ २१ | [ध्रुवके द्वारा] इस प्रकार कहे गये श्रीमान् मुनिने हँसते हुए यह कहा—हे राजपुत्र! सुनो, तुम जगत्के स्वामी, कष्टोंका नाश करनेवाले तथा बुद्धिमान् महादेव शम्भुके दक्षिण* अंगसे उत्पन्न केशव (विष्णु)-की आराधना करके इस श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त कर सकोगे। हे महाप्राज्ञ! तुम सभी पापोंका नाश करनेवाले, अभीष्ट प्रदान करनेवाले, परम शुद्ध, पवित्र, दोषरहित तथा श्रेष्ठ मन्त्रका नित्य जप करो। तुम इन्द्रियोंको वशमें करके प्रणवसहित नमोऽस्तु वासुदेवाय [अर्थात् ॐ नमोऽस्तु वासुदेवाय] इस दिव्य मन्त्रको जपो और सनातन विष्णुका ध्यान करते हुए जप-होममें संलग्न रहो॥ १७—२० १/२॥ |
| प्राङ्मुखो नियतो भूत्वा जजाप प्रीतमानसः।<br>शाकमूलफलाहारः संवत्सरमतन्द्रितः॥ २२<br><br>जजाप मन्त्रमनिशमजस्रं स पुनः पुनः।<br>वेताला राक्षसा घोराः सिंहाद्याश्च महामृगाः॥ २३<br><br>तमभ्ययुर्महात्मानं बुद्धिमोहाय भीषणाः।<br>जपन् स वासुदेवेति न किञ्चित्प्रत्यपद्यत॥ २४ | उनके ऐसा कहनेपर महान् यशवाले ध्रुवने उन विश्वामित्रको प्रणाम करके पूर्वकी ओर मुख करके ध्यानमग्न होकर प्रसन्नचित्त हो जप आरम्भ किया। शाक, मूल तथा फलका आहार करते हुए उसने आलस्यरहित होकर दिन-रात निरन्तर एक वर्षतक मन्त्रका बार-बार जप किया। वेताल, भयंकर राक्षस तथा भयानक सिंह आदि बड़े जानवर बुद्धिको मोहित करनेके लिये उस महात्माके पास आये, किंतु वासुदेवका जप करता हुआ वह तनिक |
* यहाँ मूलमें विष्णुको भगवान् शंकरके दक्षिणांग से उत्पन्न बताया गया है, किंतु इसी लिङ्गपुराणके ३८वें अध्यायमें भगवान् विष्णुने स्वयंको भगवान् शिवके वामांगसे और ब्रह्माजीको दक्षिणांगसे प्रादुर्भूत बताया है—'अहं वामाङ्गजो ब्रह्मन् शङ्करस्य महात्मनः। भवान् भवस्य देवस्य दक्षिणाङ्गभवः स्वयंम् ॥' अतः यहाँ दक्षिणांगसे 'वामांग' अर्थ लेना चाहिये।
| २५८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भी विचलित नहीं हुआ॥ २१—२४॥ | |
| सुनीतिरस्य या माता तस्या रूपेण संवृता।<br>पिशाची समनुप्राप्ता रुरोद भृशदुःखिता॥ २५<br><br>मम त्वमेकः पुत्रोऽसि किमर्थं क्लिश्यते भवान्।<br>मामनाथामपहाय तप आस्थितवानसि॥ २६<br><br>एवमादीनि वाक्यानि भाषमाणां महातपाः।<br>अनिरीक्ष्यैव हृष्टात्मा हरेर्नाम जजाप सः॥ २७ | इसकी माता जो सुनीति थी, उसका रूप धारण करके एक पिशाची उसके पास आयी और अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगी—तुम मेरे एकमात्र पुत्र हो, तुम कष्ट क्यों सह रहे हो, मुझे अनाथ छोड़कर तुम तपमें लग गये हो—इस प्रकारके वचन बोलती हुई उस स्त्रीकी ओर बिलकुल न देखकर वह महातपस्वी प्रसन्नचित्त होकर हरिका नाम जपता रहा॥ २५—२७॥ |
| ततः प्रशेमुः सर्वत्र विघ्नरूपाणि तत्र वै।<br>ततो गरुडमारुह्य कालमेघसमद्युतिः॥ २८<br><br>सर्वदेवैः परिवृतः स्तूयमानो महर्षिभिः।<br>आययौ भगवान् विष्णुः ध्रुवान्तिकमरातिहा॥ २९ | तदनन्तर वहाँ सर्वत्र विघ्नोंके स्वरूप शान्त हो गये। तब गरुड़पर सवार होकर कालमेघके समान (श्याम) कान्तिवाले, समस्त देवताओंसे घिरे हुए तथा महर्षियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए शत्रुसंहारक भगवान् विष्णु ध्रुवके पास आये॥ २८—२९॥ |
| समागतं विलोक्याथ कोसावित्येव चिन्तयन्।<br>पिबन्निव हृषीकेशं नयनाभ्यां जगत्पतिम्॥ ३०<br><br>जपन् स वासुदेवेति ध्रुवस्तस्थौ महाद्युतिः।<br>शङ्खप्रान्तेन गोविन्दः पस्पर्शास्यं हि तस्य वै॥ ३१ | उनको आया हुआ देखकर यह कौन है—ऐसा सोचता हुआ तथा अपने नेत्रोंसे जगत्पति हृषीकेशका पान करता हुआ-सा वह महान् प्रभाववाला ध्रुव 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—इस मन्त्रका जप करता रहा। तब गोविन्दने [अपने] शंखके अग्रभागसे उसके मुखका स्पर्श किया॥ ३०—३१॥ |
| ततः स परमं ज्ञानमवाप्य पुरुषोत्तमम्।<br>तुष्टाव प्राञ्जलिर्भूत्वा सर्वलोकेश्वरं हरिम्॥ ३२<br><br>प्रसीद देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधर।<br>लोकात्मन् वेदगुह्यात्मन् त्वां प्रपन्नोऽस्मि केशव॥ ३३<br><br>न विदुस्त्वां महात्मानं सनकाद्या महर्षयः।<br>तत्कथं त्वामहं विद्यां नमस्ते भुवनेश्वर॥ ३४ | उसके बाद वह [ध्रुव] परम ज्ञान प्राप्त करके हाथ जोड़कर सभी लोकोंके स्वामी पुरुषोत्तम हरिकी [इस प्रकार] स्तुति करने लगा—हे देवदेवेश! हे शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले! हे लोकात्मन्! हे वेदगुह्यात्मन् (वेदोंके द्वारा अज्ञातस्वरूपवाले)! प्रसन्न होइये। हे केशव! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। सनक आदि महर्षि भी आप महात्माको नहीं जान सके, तब मैं आपको कैसे जान सकता हूँ। हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है॥ ३२—३४॥ |
| तमाह प्रहसन् विष्णुरेहि वत्स ध्रुवो भवान्।<br>स्थानं ध्रुवं समासाद्य ज्योतिषामग्रभुग्भव॥ ३५<br><br>मात्रा त्वं सहितस्तत्र ज्योतिषां स्थानमाप्नुहि।<br>मत्स्थानमेतत्परमं ध्रुवं नित्यं सुशोभनम्॥ ३६<br><br>तपसाराध्य देवेशं पुरा लब्धं हि शङ्करात्।<br>वासुदेवेति यो नित्यं प्रणवेन समन्वितम्॥ ३७ | तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने उससे हँसते हुए कहा—हे वत्स! आओ, तुम ध्रुव हो, तुम ध्रुव (अटल) स्थान प्राप्त करके ज्योतिर्गणोंमें अग्रणी हो जाओ। तुम अपनी मातासहित वहाँ ग्रहोंमें स्थान प्राप्त करो, यह मेरा स्थान है, जो उत्कृष्ट, अचल, शाश्वत तथा अत्यन्त सुन्दर है। पूर्वकालमें मैंने तपस्याके द्वारा देवेशकी आराधना करके शंकरसे इसे (मन्त्रको) प्राप्त |
६३- दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा तथा ऋषिवंश-वर्णन
अध्याय ६३] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव…ऋषिवंशवर्णन २५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमस्कारसमायुक्तं भगवच्छब्दसंयुक्तम्।<br>जपेदेवं हि यो विद्वान् ध्रुवं स्थानं प्रपद्यते॥ ३८<br><br>ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>मात्रा सह ध्रुवं सर्वे तस्मिन् स्थाने न्यवेशयन्॥ ३९<br><br>विष्णोराज्ञां पुरस्कृत्य ज्योतिषां स्थानमाप्तवान्।<br>एवं ध्रुवो महातेजा द्वादशाक्षरविद्यया॥ ४०<br><br>अवाप महतीं सिद्धिमेतत्ते कथितं मया॥ ४१ | किया था। प्रणव (ॐ) तथा नमःसे युक्त और भगवत्—इस शब्दसे संयुक्त वासुदेव मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-को जो विद्वान् जपता है, वह ध्रुवस्थान प्राप्त करता है॥ ३५-३८॥<br>तदनन्तर सभी देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों तथा महर्षियोंने मातासहित ध्रुवको उस स्थानपर स्थापित किया। इस प्रकार महातेजस्वी ध्रुवने विष्णुकी आज्ञा स्वीकार करके द्वादशाक्षरमन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-के द्वारा ज्योतिर्गणोंमें स्थान प्राप्त किया तथा महती सिद्धि प्राप्त की। मैंने यह [वृत्तान्त] आपलोगोंसे कह दिया॥ ३९-४१॥ |
| सूत उवाच<br>तस्माद्यो वासुदेवाय प्रणामं कुरुते नरः।<br>स याति ध्रुवसालोक्यं ध्रुवत्वं तस्य तत्तथा॥ ४२ | **सूतजी बोले—**अतः जो मनुष्य वासुदेवको प्रणाम करता है, वह ध्रुवलोकको जाता है और उसे भी वह ध्रुवत्व प्राप्त हो जाता है॥ ४२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशे ध्रुवसंस्थानवर्णनं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः॥ ६२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशमें ध्रुवसंस्थानवर्णन' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६२॥
तिरसठवाँ अध्याय
दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा तथा ऋषिवंशवर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं ब्रूहि सूताद्य यथाक्रममनुत्तमम्॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! अब आप देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, उरगों और राक्षसोंकी उत्पत्तिका उत्तम विधिसे यथाक्रम वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>सङ्कल्पाद्दर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते।<br>दक्षात्प्राचेतसादूर्ध्वं सृष्टिर्मैथुनसम्भवा॥ २<br>यदा तु सृजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान्।<br>न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः॥ ३<br>दक्षः पुत्रसहस्राणि पञ्च सूत्यामजीजनत्।<br>तांस्तु दृष्ट्वा महाभागान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः॥ ४ | **सूतजी बोले—**पूर्व पुरुषोंकी सृष्टि संकल्पसे, दर्शनसे तथा स्पर्शसे कही जाती है। प्रचेतसके पुत्र दक्षके बाद [स्त्री-पुरुषके] संयोगसे सृष्टि प्रारम्भ हुई। जब देवताओं, ऋषियों और पन्नगोंका सृजन करते हुए उन प्रजापतिसे लोक वृद्धिको प्राप्त नहीं हुआ, तब दक्षने मैथुनयोगसे [अपनी भार्या] सूतिसे पाँच हजार पुत्र उत्पन्न किये। तत्पश्चात् उन महाभाग्यवालोंको देखकर वे अनेक प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टिके इच्छुक हो गये॥ २-४॥ |
| नारदः प्राह हर्यश्वान् दक्षपुत्रान् समागतान्।<br>भुवः प्रमाणं सर्वं तु ज्ञात्वोर्ध्वमध एव च॥ ५ | तब नारदजीने उत्पन्न हुए [उन] हर्यश्व नामवाले दक्ष-पुत्रोंसे कहा—ऊपर तथा नीचे पृथ्वीका प्रमाण |