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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

७७- शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल, शिवक्षेत्रों तथा शिव-तीर्थोंके सेवनकी महिमा, शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य

३७४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| गङ्गया सहितं चैव वामोत्सङ्गेऽम्बिकान्वितम्।<br>विनायकं तथा स्कन्दं ज्येष्ठं दुर्गां सुशोभनाम्॥ ५६<br>भास्करं च तथा सोमं ब्रह्माणीं च महेश्वरीम्।<br>कौमारीं वैष्णवीं देवीं वाराहीं वरदां तथा॥ ५७<br>इन्द्राणीं चैव चामुण्डां वीरभद्रसमन्विताम्।<br>विघ्नेशेने च यो धीमान् शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ ५८ | चन्द्रमाको सिरपर धारण किये हुए; गंगासहित; बाएँ गोदमें पार्वतीको बैठाये हुए और विनायक, ज्येष्ठ कार्तिकेय, सुन्दरी दुर्गा, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्माणी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवीदेवी, वरदायिनी वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा, वीरभद्र तथा विघ्नेशसहित शिवको [मूर्तिरूपमें] जो बुद्धिमान् स्थापित करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है॥ ५५-५८॥ | | लिङ्गमूर्तिं महाज्वालामालासांवृतमव्ययम्।<br>लिङ्गस्य मध्ये वै कृत्वा चन्द्रशेखरमीश्वरम्॥ ५९<br>व्योम्नि कुर्यात्तथा लिङ्गं ब्रह्माणं हंसरूपिणम्।<br>विष्णुं वराहरूपेण लिङ्गस्याधस्त्वधोमुखम्॥ ६०<br>ब्रह्माणं दक्षिणे तस्य कृताञ्जलिपुटं स्थितम्।<br>मध्ये लिङ्गं महाघोरं महाम्भसि च संस्थितम्॥ ६१<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>क्षेत्रसंरक्षकं देवं तथा पाशुपतं प्रभुम्॥ ६२<br>कृत्वा भक्त्या यथान्यायं शिवलोके महीयते॥ ६३ | ऐसी मूर्ति जिसमें अव्यय शिवजी लिङ्गके रूपमें हों, बड़ी-बड़ी ज्वालाओंके समूहोंसे घिरे हुए हों, लिङ्गके मध्यमें चन्द्रमाको धारण किये हुए स्थित हों, हंसरूपधारी ब्रह्मा उनके दाहिने भागमें हाथ जोड़े हुए विराजमान हों, वाराहरूपधारी विष्णु नीचेकी ओर मुख किये हुए लिङ्गके अधोभागमें स्थित हों, अघोर महान् लिङ्ग अत्यधिक जलके मध्यमें स्थित हो—उसे बनाकर तथा भक्तिपूर्वक स्थापित करके भक्त शिवसायुज्य प्राप्त करता है। क्षेत्रकी रक्षा करनेवाले क्षेत्रपाल तथा प्रभु पशुपति शिवको [मूर्तिरूपमें] बनाकर भक्तिपूर्वक विधानके अनुसार उनको स्थापित करके भक्त शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ ५९-६३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवमूर्तिप्रतिष्ठाफलकथनं नाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः॥ ७६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवमूर्तिप्रतिष्ठाफलकथन' नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७६॥


सतहत्तरवाँ अध्याय

शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल, शिवक्षेत्रों तथा शिवतीर्थोंके सेवनकी महिमा, शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले—
लिङ्गप्रतिष्ठापुण्यं च लिङ्गस्थापनमेव च।<br>लिङ्गानां चैव भेदाश्च श्रुतं तव मुखादिह॥ १<br>मृदादिरत्नपर्यन्तैर्द्रव्यैः कृत्वा शिवालयम्।<br>यत्फलं लभते मर्त्यस्तत्फलं वक्तुमर्हसि॥ २[हे सूतजी!] हमलोगोंने आपके मुखसे लिङ्गकी स्थापना, लिङ्गप्रतिष्ठाके फल तथा लिङ्गोंके भेदोंको सुना; अब आप मिट्टीसे लेकर रत्नोंतक द्रव्योंसे शिवालयका निर्माण करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, उस फलको कृपापूर्वक बतायें॥ १-२॥
सूत उवाचसूतजी बोले—
यस्य भक्तोऽपि लोकेऽस्मिन् पुत्रदारगृहादिभिः।<br>बाध्यते ज्ञानयुक्तश्चेन्न च तस्य गृहैस्तु किम्॥ ३[हे ऋषियो!] जिन शिवका ज्ञानसम्पन्न भक्त इस लोकमें पुत्र, स्त्री, घर आदिसे बन्धनको प्राप्त नहीं होता, उसे गृहोंसे क्या प्रयोजन?

अध्याय ७७ ] शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल... शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य ३७५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तथापि भक्ताः परमेश्वरस्य<br>कृत्वेष्टलोष्टैरपि रुद्रलोकम्।<br>प्रयान्ति दिव्यं हि विमानवर्यं<br>सुरेन्द्रपद्मोद्भववन्दितस्य ॥ ४फिर भी इन्द्र तथा ब्रह्माके द्वारा नमस्कृत परमेश्वरके भक्त ईंटों अथवा पत्थरोंसे उनका उत्तम मन्दिर बनवाकर दिव्य रुद्रलोकको जाते हैं॥ ३-४॥
बाल्यात्तु लोष्टेन शिवं च कृत्वा<br>मृदापि वा पांसुभिरादिदेवम्।<br>गृहं च तादृग्विधमस्य शम्भोः<br>सम्पूज्य रुद्रत्वमवाप्नुवन्ति ॥ ५बालभावसे भी पत्थर, मिट्टी अथवा धूलसे इन शम्भुका उस प्रकारका आलय (मन्दिर) बनाकर आदिदेव शिवका विधिपूर्वक पूजन करके वे रुद्रत्व प्राप्त करते हैं॥ ५॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भक्त्या भक्तैः शिवालयम्।<br>कर्तव्यं सर्वयत्नेन धर्मकामार्थसिद्धये ॥ ६अतः भक्तोंको धर्म, अर्थ, कामकी सिद्धिके लिये पूर्ण प्रयत्नसे भक्तिपूर्वक शिवालयका निर्माण करना चाहिये ॥ ६॥
केशरं नागरं वापि द्राविडं वा तथापरम्।<br>कृत्वा रुद्रालयं भक्त्या शिवलोके महीयते ॥ ७केसर, नागर, द्राविड़ अथवा अन्य प्रकारका शिवालय भक्तिपूर्वक बनाकर भक्त शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ७॥
कैलासाख्यं च यः कुर्यात्प्रासादं परमेष्ठिनः।<br>कैलासशिखराकारैर्विमानैर्मोदते सुखी ॥ ८जो [भक्त] कैलास नामक शिवालयका निर्माण करता है, वह कैलासशिखरके आकारवाले विमानोंमें सुखपूर्वक आनन्द मनाता है॥ ८॥
मन्दरं वा प्रकुर्वीत शिवाय विधिपूर्वकम्।<br>भक्त्या वित्तानुसारेण उत्तमाधममध्यमम् ॥ ९<br><br>मन्दराद्रिप्रतीकाशैर्विमानैर्विश्वतोमुखैः ।<br>अप्सरोगणसङ्कीर्णैर्देवदानवदुर्लभैः ॥ १०<br><br>गत्वा शिवपुरं रम्यं भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्।<br>ज्ञानयोगं समासाद्य गाणपत्यं लभेन्नरः ॥ ११जो मनुष्य शिवके लिये अपने सामर्थ्यके अनुसार भक्तिके साथ विधिपूर्वक उत्तम, मध्यम अथवा अधम [श्रेणीका] मन्दरनामक शिवालय बनाता है, वह मन्दरपर्वतके सदृश, सभी ओर मुखवाले, अप्सराओंसे युक्त तथा देवदानवोंके लिये दुर्लभ विमानोंसे रम्य शिवलोकमें जाकर अभीष्ट सुखोंका उपभोग करके ज्ञानयोग प्राप्तकर गणाधिपति पद प्राप्त करता है॥ ९-११॥
यः कुर्यान्मेरुनामानं प्रासादं परमेष्ठिनः।<br>स यत्फलमवाप्नोति न तत्सर्वैर्महामखैः ॥ १२<br><br>सर्वयज्ञतपोदानतीर्थवेदेषु यत्फलम्।<br>तत्फलं सकलं लब्ध्वा शिववन्मोदते चिरम् ॥ १३जो मेरु नामक शिवालय बनाता है, वह जो फल प्राप्त करता है, वह फल सभी महायज्ञोंके द्वारा भी सम्भव नहीं है; सभी प्रकारके यज्ञ, तप, दान, तीर्थ तथा वेदाध्ययन करनेसे जो फल होता है, उस समस्त फलको प्राप्त करके वह [मनुष्य] शिवकी भाँति चिरकालतक आनन्दित रहता है॥ १२-१३॥
निषधं नाम यः कुर्यात्प्रासादं भक्तितः सुधीः।<br>शिवलोकमनुप्राप्य शिववन्मोदते चिरम् ॥ १४जो बुद्धिमान् [मनुष्य] भक्तिपूर्वक निषध नामक शिवालय बनाता है, वह शिवलोक प्राप्त करके शिवके समान चिरकालतक आनन्दित रहता है॥ १४॥
कुर्याद्वा यः शुभं विप्रा हिमशैलमनुत्तमम्।<br>हिमशैलोपमैर्यानैर्गत्वा शिवपुरं शुभम् ॥ १५हे विप्रो! जो [मनुष्य] हिमशैल नामक अत्युत्तम शुभ शिवालय बनाता है, वह हिमशैलके समान
३७६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ज्ञानयोगं समासाद्य गाणपत्यमवाप्नुयात्।<br>नीलाद्रिशिखराख्यं वा प्रासादं यः सुशोभनम्॥ १६<br>कृत्वा वित्तानुसारेण भक्त्या रुद्राय शम्भवे।<br>यत्फलं लभते मर्त्यस्तत्फलं प्रवदाम्यहम्॥ १७<br>हिमशैले कृते भक्त्या यत्फलं प्राक्तवोदितम्।<br>तत्फलं सकलं लब्ध्वा सर्वदेवनमस्कृतः॥ १८<br>रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रैः सार्धं प्रमोदते।<br>महेन्द्रशैलनामानं प्रासादं रुद्रसम्मतम्॥ १९विमानोंसे दिव्य शिवलोक पहुँचकर ज्ञानयोग प्राप्त करके गणाधिपति पद प्राप्त करता है॥ १५ १/२॥<br>जो मनुष्य अपने सामर्थ्यके अनुसार रुद्र शिवके लिये भक्तिपूर्वक नीलाद्रिशिखर नामक परम सुन्दर शिवालय बनाता है, वह जो फल प्राप्त करता है, उसे मैं बता रहा हूँ। भक्तिपूर्वक हिमशैल [नामक शिवालय]-का निर्माण करनेपर जो फल पहले बताया गया है, उस सम्पूर्ण फलको प्राप्त करके वह सभी देवताओंसे नमस्कृत होता हुआ रुद्रलोक प्राप्त करके रुद्रोंके साथ आनन्द मनाता है॥ १६—१८ १/२॥
कृत्वा यत्फलमाप्नोति तत्फलं प्रवदाम्यहम्।<br>महेन्द्रपर्वताकारैर्विमानैर्वृषसंयुतैः ॥ २०<br>गत्वा शिवपुरं दिव्यं भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान्।<br>ज्ञानं विचारितं रुद्रैः सम्प्राप्य मुनिपुङ्गवाः॥ २१<br>विषयान् विषवत्त्यक्त्वा शिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>हेम्ना यस्तु प्रकुर्वीत प्रासादं रत्नशोभितम्॥ २२रुद्रका अत्यन्त प्रिय महेन्द्रशैल नामक शिवालय बनाकर मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, उस फलको मैं बता रहा हूँ—हे मुनिश्रेष्ठो! वह [मनुष्य] महेन्द्रपर्वतके आकारवाले तथा वृषभोँसे जुते हुए विमानोंसे दिव्य शिवलोकमें जाकर [वहाँ] यथेष्ट सुखोंको भोगकर रुद्रोंसे पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके विषयोंको विषकी भाँति त्यागकर शिवसायुज्य प्राप्त करता है॥ १९—२१ १/२॥
द्राविडं नागरं वापि केसरं वा विधानतः।<br>कूटं वा मण्डपं वापि समं वा दीर्घमेव च॥ २३<br>न तस्य शक्यते वक्तुं पुण्यं शतयुगैरपि।<br>जीर्णं वा पतितं वापि खण्डितं स्फुटितं तथा॥ २४<br>पूर्ववत्कारयेद्यस्तु द्वाराद्यैः सुशुभं द्विजाः।<br>प्रासादं मण्डपं वापि प्राकारं गोपुरं तु वा॥ २५<br>कर्तुर्य्यधिकं पुण्यं लभते नात्र संशयः।<br>वृत्त्यर्थं वा प्रकुर्वीत नरः कर्म शिवालये॥ २६जो [मनुष्य] रत्नजटित सोनेका द्राविड़, नागर अथवा केसर कोटिका शिवालय विधानपूर्वक बनवाता है अथवा सम अथवा दीर्घ शिखर (चोटी) या मण्डप बनवाता है, उसके पुण्यका वर्णन सैकड़ों युगोंमें भी नहीं किया जा सकता है। हे द्विजो! जो [मनुष्य] जीर्ण (पुराने), गिरे हुए, टूटे हुए अथवा फूटे हुए शिवालय, उसके मण्डप, चहारदीवारी, फाटक अथवा द्वार आदिको पूर्वकी भाँति अत्यन्त सुन्दर करा देता है; वह [वास्तविक] निर्मातासे भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २२—२५ १/२॥
यः स याति न सन्देहः स्वर्गलोकं सबान्धवः।<br>यश्चात्मभोगसिद्ध्यर्थमपि रुद्रालये सकृत्॥ २७<br>कर्म कुर्याद्यदि सुखं लब्ध्वा चापि प्रमोदते।<br>तस्मादायतनं भक्त्या यः कुर्यान्मुनिसत्तमाः॥ २८जो मनुष्य आजीविकाके लिये शिवालयमें कार्य करता है, वह [अपने] बान्धवोंसहित स्वर्गलोक जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। जो अपने सुखकी सिद्धिके लिये शिवालयमें एक बार भी [कुछ] कार्य कर देता है, वह सुख प्राप्त करके प्रसन्न रहता है॥ २६—२७ १/२॥
काष्ठेष्टकादिभिर्मर्त्यः शिवलोके महीयते।<br>प्रसादार्थं महेशस्य प्रासादो मुनिपुङ्गवाः॥ २९अतः हे उत्तम मुनियो! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक काष्ठ, पत्थर आदिसे शिवालय बनवाता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! महेशकी प्रसन्नताके

अध्याय ७७ ] शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल... शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य [ ३७७


श्लोकअर्थ
कर्तव्यः सर्वयत्नेन धर्मकामार्थमुक्तये।<br>अशक्तश्चेन्मुनिश्रेष्ठाः प्रासादं कर्तुमुत्तमम्॥ ३०लिये तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्षके लिये पूर्ण प्रयत्नके साथ शिवालयका निर्माण करना चाहिये॥ २८-२९ १/२ ॥
सम्मार्जनादिभिर्वापि सर्वान् कामानवाप्नुयात्।<br>सम्मार्जनं तु यः कुर्यान्मार्जन्या मृदुसूक्ष्मया॥ ३१<br><br>चान्द्रायणसहस्रस्य फलं मासेन लभ्यते।<br>यः कुर्याद्वस्त्रपूतेन गन्धगोमयवारिणा॥ ३२<br><br>आलेपनं यथान्यायं वर्षचान्द्रायणं लभेत्।हे श्रेष्ठ मुनियो! यदि कोई उत्तम शिवालय बनानेमें असमर्थ हो, तो वह [शिवालयमें] सम्मार्जन (बुहारना) आदिके द्वारा भी समस्त वांछित फलोंको प्राप्त कर लेता है। जो [व्यक्ति] कोमल तथा सूक्ष्म झाड़ूसे सफाई करता है, वह महीने भरमें हजार चान्द्रायण व्रतका फल प्राप्त करता है। जो [मनुष्य] पवित्र वस्त्रसे छने हुए गन्ध तथा गोमयके जलसे विधानके अनुसार आलेपन (लीपनेका कार्य) करता है, वह वर्षपर्यन्त चान्द्रायणव्रत करनेका फल प्राप्त करता है॥ ३०-३२ १/२ ॥
अर्धक्रोशं शिवक्षेत्रं शिवलिङ्गात्समन्ततः॥ ३३<br><br>यस्त्यजेद्दुस्त्यजान् प्राणाञ्छिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>स्वायम्भुवस्य मानं हि तथा बाणस्य सुव्रताः॥ ३४<br><br>स्वायम्भुवे तदर्धं स्यात्स्यादार्षे च तदर्धकम्।<br>मानुषे च तदर्धं स्यात्क्षेत्रमानं द्विजोत्तमाः॥ ३५<br><br>एवं यतीनामावासे क्षेत्रमानं द्विजोत्तमाः।<br>रुद्रावतारे चाद्यं यच्छिष्ये चैव प्रशिष्यके॥ ३६शिवलिङ्गके चारों ओर आधा कोशका क्षेत्र शिवक्षेत्र होता है। जो [अपने] दुस्त्यज प्राणोंको [इस क्षेत्रमें] छोड़ता है, वह शिव-सायुज्य प्राप्त करता है। हे सुव्रतो! यह [अर्धकोश] मान स्वयम्भू बाणलिङ्ग अर्थात् केवल ज्योतिर्लिङ्गका है। हे द्विजोत्तमो! अन्य स्वयम्भू लिङ्गके लिये शिवक्षेत्रका मान उसका आधा (कोशका चतुर्थांश), ऋषिस्थापित लिङ्गके लिये उसका आधा (कोशका आठवाँ भाग) और मनुष्यके द्वारा स्थापित लिङ्गके लिये उसका भी आधा (कोशका सोलहवाँ) भाग होता है। हे द्विजोत्तमो! इसी प्रकार यतियोंके निवासस्थानसे कोशके सोलहवें भागका क्षेत्र शिवक्षेत्र है। रुद्रोंके अवतारस्थल, उनके शिष्यों-प्रशिष्योंके अवतारस्थल, योगाचार्योंके अवतारस्थल, उनके शिष्योंके अवतारस्थल तथा उनके भी शिष्य-प्रशिष्योंके अवतारस्थलसे आधे कोशका मण्डल शिवक्षेत्र होता है॥ ३३-३६ १/२ ॥
नरावतारे तच्छिष्ये तच्छिष्ये च प्रशिष्यके।<br>श्रीपर्वते महापुण्ये तस्य प्रान्ते च वा द्विजाः॥ ३७<br><br>तस्मिन् वा यस्त्यजेत्प्राणाञ्छिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>वारणस्यां तथाप्येवमविमुक्ते विशेषतः॥ ३८<br><br>केदारे च महाक्षेत्रे प्रयागे च विशेषतः।<br>कुरुक्षेत्रे च यः प्राणान् सन्त्यजेद्याति निर्वृतिम्॥ ३९<br><br>प्रभासे पुष्करेऽवन्त्यां तथा चैवामरेश्वरे।<br>वणीशेलाकुले चैव मृतो याति शिवात्मताम्॥ ४०<br><br>वारणस्यां मृतो जन्तुर्न जातु जन्तुतां व्रजेत्।<br>त्रिविष्टपे विमुक्ते च केदारे सङ्गमेश्वरे॥ ४१हे द्विजो! महापुण्यप्रद श्रीपर्वत तथा उसके प्रान्तभाग—इस शिवक्षेत्रमें जो प्राणोंका त्याग करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है। जो [मनुष्य] वाराणसीमें तथा विशेषकर वहाँ अविमुक्त क्षेत्रमें, केदारमें, विशेषकर महाक्षेत्र प्रयागमें तथा कुरुक्षेत्रमें प्राणत्याग करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है। प्रभास, पुष्कर, अवन्ती, अमरेश्वर तथा वणीशेलाकुलमें मृत प्राणी शिवात्मताको प्राप्त होता है। वाराणसीमें मरनेवाला प्राणी पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता है। जो [प्राणी]
३७८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
शालके वा त्यजेत्प्राणांस्तथा वै जम्बुकेश्वरे।<br>शुक्रेश्वरे वा गोकर्णे भास्करेशे गुहेश्वरे ॥ ४२<br>हिरण्यगर्भे नन्दीशे स याति परमां गतिम्।<br>नियमैः शोष्य यो देहं त्यजेत्क्षेत्रे शिवस्य तु ॥ ४३<br>स याति शिवतां योगी मानुषे दैविकेऽपि वा।<br>आर्षे वापि मुनिश्रेष्ठास्तथा स्वायम्भुवेऽपि वा ॥ ४४<br>स्वयम्भूते तथा देवे नात्र कार्या विचारणा।त्रिविष्टप, विमुक्त, केदारक्षेत्र, संगमेश्वर, शालक, जम्बुकेश्वर, शुक्रेश्वर, गोकर्ण, भास्करेश, गुहेश्वर, हिरण्यगर्भ तथा नन्दीशक्षेत्रमें प्राण छोड़ता है, वह परम गति प्राप्त करता है। हे श्रेष्ठ मुनियो ! [अपने] शरीरको नियमोंसे सुखाकर जो योगी मानुष (मानवस्थापित), दैविक (देवस्थापित), आर्ष (मुनि-स्थापित) या स्वयम्भू (स्वयं उत्पन्न) किसी भी शिवक्षेत्रमें प्राणत्याग करता है, वह शिवत्वको प्राप्त होता है। ज्योतिर्लिङ्ग-क्षेत्र तथा देवक्षेत्रके विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ३७-४४ १/२ ॥
आधायाग्निं शिवक्षेत्रे सम्पूज्य परमेश्वरम् ॥ ४५<br>स्वदेहपिण्डं जुहुयाद्यः स याति परां गतिम्।<br>यावत्तावन्निराहारो भूत्वा प्राणान् परित्यजेत् ॥ ४६<br>शिवक्षेत्रे मुनिश्रेष्ठाः शिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>छित्त्वा पादद्वयं चापि शिवक्षेत्रे वसेत्तु यः ॥ ४७<br>स याति शिवतां चैव नात्र कार्या विचारणा।शिवक्षेत्रमें भलीभाँति परमेश्वरकी पूजा करके आग जलाकर जो [प्राणी] अपने शरीरको उसमें होम कर देता है, वह परम गति प्राप्त करता है। हे श्रेष्ठ मुनियो ! जो [मनुष्य] निराहार रहकर शिवक्षेत्रमें प्राणका त्याग करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है। जो [अपने] दोनों पैरोंको काटकर भी शिवक्षेत्रमें निवास करता है, वह शिवत्वको प्राप्त होता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४५-४७ १/२ ॥
क्षेत्रस्य दर्शनं पुण्यं प्रवेशस्तच्छताधिकः ॥ ४८<br>तस्माच्छतगुणं पुण्यं स्पर्शनं च प्रदक्षिणम्।<br>तस्माच्छतगुणं पुण्यं जलस्नानमतः परम् ॥ ४९<br>क्षीरस्नानं ततो विप्राः शताधिकमनुत्तमम्।<br>दध्ना सहस्रमाख्यातं मधुना तच्छताधिकम् ॥ ५०<br>घृतस्नानेन चानन्तं शार्करे तच्छताधिकम्।शिवक्षेत्रका दर्शन पुण्यदायक होता है, वहाँपर प्रवेश करना उससे सौ गुना अधिक पुण्यदायक होता है और उसका स्पर्श तथा प्रदक्षिणा उससे भी सौ गुना पुण्यप्रद होता है। वहाँपर [मूर्तिको] जल-स्नान करानेसे उससे भी सौ गुना पुण्य होता है। हे विप्रो ! दुग्धसे स्नान करानेसे उससे सौ गुना, दहीसे स्नान करानेसे उससे हजार गुना, मधुसे स्नान करानेसे उससे सौ गुना, घृतसे स्नान करानेसे उससे अनन्त गुना और शर्करासे स्नान करानेसे उससे भी सौ गुना अधिक पुण्य कहा गया है ॥ ४८-५० १/२ ॥
शिवक्षेत्रसमीपस्थां नदीं प्राप्यावगाह्य च ॥ ५१<br>त्यजेद्देहं विहायान्नं शिवलोके महीयते।<br>शिवक्षेत्रसमीपस्था नद्यः सर्वाः सुशोभनाः ॥ ५२<br>वापीकूपतडागाश्च शिवतीर्था इति स्मृताः।<br>स्नात्वा तेषु नरो भक्त्या तीर्थेषु द्विजसत्तमाः ॥ ५३<br>ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः।शिवक्षेत्रके समीपमें स्थित [किसी] नदीपर जाकर उसमें स्नान करके और अन्नका त्याग करके जो [अपना] शरीर छोड़ता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। शिवक्षेत्रके समीपमें स्थित सभी सुन्दर नदियाँ, बावलियाँ, कुएँ तथा तालाब शिवतीर्थ कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो ! उन तीर्थोंमें श्रद्धापूर्वक स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५१-५३ १/२ ॥
प्रातः स्नात्वा मुनिश्रेष्ठाः शिवतीर्थेषु मानवः ॥ ५४

अध्याय ७७ ] शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल... शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य [ ३७९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोकं स गच्छति।<br>मध्याह्ने शिवतीर्थेषु स्नात्वा भक्त्या सकृन्नरः॥ ५५<br><br>गङ्गास्नानसमं पुण्यं लभते नात्र संशयः।<br>अस्तं गते तथा चार्के स्नात्वा गच्छेच्छिवं पदम्॥ ५६<br><br>पापकञ्चुकमुत्सृज्य शिवतीर्थेषु मानवः।<br>द्विजास्त्रिषवणं स्नात्वा शिवतीर्थे सकृन्नरः॥ ५७<br><br>शिवसायुज्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।<br>पुराथ सूकरः कश्चित् श्वानं दृष्ट्वा भयात्पथि॥ ५८<br><br>प्रसङ्गाद्वारमेकं तु शिवतीर्थेऽवगाह्य च।<br>मृतः स्वयं द्विजश्रेष्ठा गाणपत्यमवाप्तवान्॥ ५९हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवतीर्थोंमें प्रातःकाल स्नान करके वह मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करके रुद्रलोकको जाता है। मध्याह्नकालमें शिवतीर्थोंमें एक बार भी भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य गंगास्नानके समान पुण्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है। सूर्यके अस्त हो जानेपर शिवतीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य पापकंचुक छोड़कर शिवपद प्राप्त करता है। हे द्विजो! शिवतीर्थोंमें एक बार भी त्रिस्त्रवण (तीनों कालोंमें) स्नान करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! पूर्वकालमें कोई सुअर मार्गमें कुत्तेको देखकर डरके मारे संयोगवश शिवतीर्थमें गिर पड़ा और वह एक बार डुबकी लगाकर स्वयं मर गया; इससे उसने गणाधिपति पदको प्राप्त किया॥ ५४–५९॥
यः प्रातर्देवदेवेशं शिवं लिङ्गस्वरूपिणम्।<br>पश्येत्स याति सर्वस्मादधिकां गतिमेव च॥ ६०<br><br>मध्याह्ने च महादेवं दृष्ट्वा यज्ञफलं लभेत्।<br>सायाह्ने सर्वयज्ञानां फलं प्राप्य विमुच्यते॥ ६१<br><br>मानसैर्वाचिकैः पापैः कायिकैश्च महत्तरैः।<br>तथोपपातकैश्चैव पापैश्चैवानुपातकैः॥ ६२<br><br>सङ्क्रमे देवमीशानं दृष्ट्वा लिङ्गाकृतिं प्रभुम्।<br>मासेन यत्कृतं पापं त्यक्त्वा याति शिवं पदम्॥ ६३<br><br>अयने चार्थमासेन दक्षिणे चोत्तरायणे।<br>विषुवे चैव सम्पूज्य प्रयाति परमां गतिम्॥ ६४जो प्रातःकाल लिङ्गस्वरूपी देवदेवेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सबसे उच्च पद प्राप्त करता है; मध्याह्नमें महादेवका दर्शन करके वह यज्ञका फल प्राप्त करता है और सायंकाल दर्शन करके सभी यज्ञोंका फल प्राप्तकर मानसिक तथा वाचिक पापों, बड़े-से-बड़े शारीरिक पापों, उपपातकों और अनुपातकोंसे मुक्त हो जाता है। सूर्यकी सभी संक्रान्तियोंमें लिङ्गके आकारवाले महादेव प्रभु ईशानका दर्शन करके मनुष्य महीनेभरमें किये गये पापका त्याग करके शिवलोकको जाता है। दक्षिणायन (कर्कसंक्रान्ति) तथा उत्तरायण (मकरसंक्रान्ति) तथा विषुवत् (मेष-तुला)-संक्रान्तिमें अर्धमासपर्यन्त विधिवत् शिवकी पूजा करके मनुष्य परम गति प्राप्त करता है॥ ६०–६४॥
प्रदक्षिणात्रयं कुर्याद्यः प्रासादं समन्ततः।<br>सव्यापसव्यन्यायेन मृदुगत्या शुचिर्नरः॥ ६५<br><br>पदे पदेऽश्वमेधस्य यज्ञस्य फलमाप्नुयात्।<br>वाचा यस्तु शिवं नित्यं संरौति परमेश्वरम्॥ ६६<br><br>सोऽपि याति शिवं स्थानं प्राप्य किं पुनरेव च।पवित्रावस्थामें जो मनुष्य सव्य-अपसव्य-विधिसे अर्थात् सोमसूत्रका उल्लंघन किये बिना धीमी गतिसे चारों ओरसे शिवालयकी तीन प्रदक्षिणा करता है, वह प्रत्येक पदपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है। जो [मनुष्य] वाणीसे नित्य परमेश्वर शिवका जप करता है, वह भी शिवलोकको जाता है; उसे पाकर [उसके लिये] फिर क्या शेष रह जाता है॥ ६५–६६१/२॥
कृत्वा मण्डलकं क्षेत्रं गन्धगोमयवारिणा॥ ६७<br><br>मुक्ताफलमयैश्चूर्णैरिन्द्रनीलमयैस्तथा ।<br>पद्मरागमयैश्चैव स्फाटिकैश्च सुशोभनैः॥ ६८<br><br>तथा मारकतैश्चैव सौवर्णै राजतैस्तथा।<br>तद्वर्णैर्लौकिकैश्चैव चूर्णैर्वित्तविवर्जितैः॥ ६९हे महाभागो! गन्ध तथा गोमय-मिश्रित जलसे मण्डलाकार क्षेत्र बनाकर उसमें मोती, इन्द्रनील, पद्मराग, स्फटिक, मरकत, स्वर्ण तथा रजत (चाँदी)-के अति सुन्दर चूर्णोंके द्वारा अथवा धनके अभावमें उसी वर्णके
३८०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| आलिख्य कमलं भद्रं दशहस्तप्रमाणतः।<br>सकर्णिकं महाभागा महादेवसमीपतः॥ ७०<br>तत्रावाह्य महादेवं नवशक्तिसमन्वितम्।<br>पञ्चभिश्च तथा षड्भिरष्टाभिश्चेष्टदं परम्॥ ७१<br>पुनरष्टाभीरीशानं दशारे दशभिस्तथा।<br>पुनर्बाह्ये च दशभिः सम्पूज्य प्रणिपत्य च॥ ७२<br>निवेद्य देवदेवाय क्षितिदानफलं लभेत्।<br>शालिपिष्टादिभिर्वापि पद्मालिख्य निर्धनः॥ ७३<br>पूर्वोक्तमखिलं पुण्यं लभते नात्र संशयः। | लौकिक चूर्णोंके द्वारा महादेवके समीप कर्णिकासहित दस हाथ परिमापका शुभ कमल बनाकर वहाँ पाँच, छः, आठ तथा नौ वाम आदि शक्तियोंके सहित परम इष्ट प्रदान करनेवाले महादेवका आवाहन करके पुनः आठ शक्तियोंसहित ईशानका आवाहन करके दस कोणोंमें दस शक्तियोंके सहित एवं उसके बाहर दस शक्तियोंके सहित शिवजीका पूजन करके तथा उन्हें प्रणाम करके देवदेवके लिये उसे निवेदित करनेसे पृथ्वीदानका फल प्राप्त होता है। निर्धन [भक्त] शालि चावलके चूर्ण आदिसे भी कमल बनाकर [पूजन करके] पूर्वोक्त समस्त पुण्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६७—७३ १/२॥ | | द्वादशारं तथालिख्य मण्डले पद्ममुत्तमम्॥ ७४<br>रत्नचूर्णादिborder/चूर्णैस्तथा द्वादशमूर्तिभिः।<br>मण्डलस्य च मध्ये तु भास्करं स्थाप्य पूजयेत्॥ ७५<br>ग्रहैश्च संवृतं वापि सूर्यसायुज्यमुत्तमम्। | मण्डलमें रत्नोंके चूर्ण आदिसे अथवा अन्य चूर्णोंसे बारह दलोंवाला उत्तम कमल बनाकर मण्डलके मध्यमें बारह मूर्तियोंके साथ सूर्यको स्थापित करके ग्रहोंसे घिरे हुए सूर्यकी पूजा करनी चाहिये; इससे वह [भक्त] उत्तम सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है॥ ७४-७५ १/२॥ | | एवं प्राकृतमप्यार्यां षडस्रं परिकल्प्य च॥ ७६<br>मध्यदेशे च देवेशीं प्रकृतिं ब्रह्मरूपिणीम्।<br>दक्षिणे सत्त्वमूर्तिं च वामतश्च रजोगुणम्॥ ७७<br>अग्रतस्तु तमोमूर्तिं मध्ये देवीं तथाम्बिकाम्।<br>पञ्चभूतानि तन्मात्रापञ्चकं चैव दक्षिणे॥ ७८<br>कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा बुद्धीन्द्रियाणि च।<br>उत्तरे विधिवत्पूज्य षडस्रे चैव पूजयेत्॥ ७९<br>आत्मानं चान्तरात्मानं युगलं बुद्धिमेव च।<br>अहङ्कारं च महता सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ ८०<br>एवं वः कथितं सर्वं प्राकृतं मण्डलं परम्। | इसी प्रकार प्राकृत मण्डल बनाकर उसमें छः दलोंवाला कमल बनाकर इसके मध्य भागमें आर्या ब्रह्मरूपिणी देवेशी प्रकृति, दाहिनी ओर सत्त्वमूर्ति, बायीं ओर रजोगुण, सामने तमोमूर्ति, मध्यमें देवी अम्बिका, दक्षिणमें पाँच भूतों तथा पाँच तन्मात्राओं और उत्तरमें पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंकी विधिवत् पूजा करके उस षट्दलकमलमें आत्मा-अन्तरात्मा इन दोनोंकी, बुद्धिकी तथा महत्सहित अहंकारकी पूजा करनी चाहिये; इससे वह समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। [हे मुनियो!] इस प्रकार मैंने आप लोगोंको सम्पूर्ण उत्तम प्राकृत मण्डल बता दिया॥ ७६—८० १/२॥ | | अतो वक्ष्यामि विप्रेन्द्राः सर्वकामार्थसाधनम्॥ ८१<br>गोचर्ममात्रमालिख्य मण्डलं गोमयेन तु।<br>चतुरस्रं विधानेन चाद्भिरभ्युक्ष्य मन्त्रवित्॥ ८२<br>अलङ्कृत्य वितानाद्यैश्छत्रैर्वापि मनोरमैः।<br>बुद्बुदैर्धचन्द्रैश्च हैमैरश्वत्थपत्रकैः॥ ८३ | हे श्रेष्ठ विप्रो! अब मैं सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाले साधनका वर्णन करूँगा। मन्त्रको जाननेवाला [भक्त] विधानपूर्वक गायके गोबरसे गोचर्म* के बराबर चौकोर मण्डल बनाकर जलसे अभ्युक्षण (छिड़काव) करके उसे वितान आदि अथवा मनोहर छत्रोंसे, स्वर्णनिर्मित अर्धचन्द्राकार बुद्बुदोंसे, सुवर्णमय पीपलकी पत्तियोंसे, |


* जितने स्थानपर एक हजार गौएँ और दस बैल बिना बाँधे इधर-उधर स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण कर सकें, उतना स्थान गोचर्म कहलाता है—गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम्। तत्क्षेत्रं दशगुणितं गोचर्म परिकीर्तितम्॥ (पराशरस्मृति १२।४६)

अध्याय ७७ ]शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल... शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य३८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सितैर्विकसितैः पद्मै रक्तैर्नीलोत्पलैस्तथा।<br>मुक्तादामैर्वितानान्ते लम्बितैस्तु सितैर्ध्वजैः ॥ ८४<br><br>सितमृत्पात्रकैश्चैव सुशलक्ष्णैः पूर्णकुम्भकैः।<br>फलपल्लवमालाभिर्वैजयन्तीभिरंशुकैः ॥ ८५<br><br>पञ्चाशद्दीपमालाभिर्धूपैः पञ्चविधैस्तथा।<br>पञ्चाशद्दळसंयुक्तमालिखेत्पद्ममुत्तमम् ॥ ८६<br><br>तत्तद्वर्णैस्तथा चूर्णैः श्वेतचूर्णैरथापि वा।<br>एकहस्तप्रमाणेन कृत्वा पद्मं विधानतः ॥ ८७<br><br>कर्णिकायां न्यसेद्देवं देव्या देवेश्वरं भवम्।<br>वर्णानि च न्यसेत्पत्रे रुद्रैः प्रागाद्यनुक्रमात् ॥ ८८<br><br>प्रणवादिन्मोऽन्तानि सर्ववर्णानि सुव्रताः।<br>सम्पूज्यैवं मुनिश्रेष्ठा गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् ॥ ८९<br><br>ब्राह्मणान् भोजयेत्तत्र पञ्चाशद्विधिपूर्वकम्।<br>अक्षमालोपवीतं च कुण्डलं च कमण्डलुम् ॥ ९०<br><br>आसनं च तथा दण्डमुष्णीषं वस्त्रमेव च।<br>दत्त्वा तेषां मुनीन्द्राणां देवदेवाय शम्भवे ॥ ९१<br><br>महाचरुं निवेद्यं च कृष्णां गोमिथुनं तथा।<br>अन्ते च देवदेवाय दापयेच्चूर्णमण्डलम् ॥ ९२<br><br>यागोपयोगद्रव्याणि शिवाय विनिवेदयेत्।<br>ओङ्काराद्यं जपेद्धीमान् प्रतिवर्णमनुक्रमात् ॥ ९३खिले हुए श्वेत कमलों तथा लाल कमलों और नीलकमलोंसे, वितानके किनारे लटकती हुई मोतियोंकी मालाओंसे, श्वेत ध्वजोंसे, श्वेत मिट्टीके पात्रोंसे, मनोहर जलपूरित घड़ोंसे, फल-पल्लव-मालाओंसे, वैजयन्तियोंसे, अंशुकों (रेशमी वस्त्र)-से, पचास दीप मालाओंसे तथा पाँच प्रकारके [सुगन्धित] धूपोंसे अलंकृत करके पचास दलोंसे युक्त उत्तम कमल बनाये। इस प्रकार विविध रंगके चूर्णोंसे अथवा सफेद चूर्णोंसे विधानपूर्वक एक हाथ परिमापका कमल बनाकर [उसकी] कर्णिकामें देवीसहित देवेश्वर शिवकी स्थापना करे। हे सुव्रतो! [कमलके] पत्रोंमें पूर्व दिशा आदिके क्रमसे रुद्रोंके साथ [अकार आदि] वर्णोंको स्थापित करे, जो आदिमें प्रणव (ॐ) तथा अन्तमें नमः से युक्त हों। हे श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार [भक्त] क्रमसे गन्ध, पुष्प आदिसे पूजन करके वहाँ विधिपूर्वक पचास ब्राह्मणोंको भोजन कराये। तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जपमाला, यज्ञोपवीत, कुण्डल, कमण्डलु, आसन, छड़ी, पगड़ी तथा वस्त्र प्रदान करके देवदेव शम्भुको महाचरु निवेदित करके एक काली गाय तथा काला वृषभ प्रदान करे; अन्तमें चूर्वनिर्मित मण्डल तथा पूजनके उपयोगके द्रव्योंको देवदेव शिवको समर्पित कर दे और आदिमें 'ओम्' लगाकर बुद्धिमान् [भक्त] प्रत्येक वर्णको अनुक्रमसे जपे॥ ८१-९३॥
एवमालिख्य यो भक्त्या सर्वमण्डलमूत्तमम्।<br>यत्फलं लभते मर्त्यस्तद्वदामि समासतः ॥ ९४<br><br>साङ्गान् वेदान् यथान्यायमधित्य विधिपूर्वकम्।<br>इष्ट्वा यज्ञैर्यथान्यायं ज्योतिष्टोमादिभिः क्रमात् ॥ ९५<br><br>ततो विश्वजिदन्तैश्च पुत्रानुत्पाद्य तादृशान्।<br>वानप्रस्थाश्रमं गत्वा सदारः साग्निरेव च ॥ ९६<br><br>चान्द्रायणादिकाः सर्वाः कृत्वा न्यस्य क्रिया द्विजाः।<br>ब्रह्मविद्यामधीत्यैव ज्ञानमासाद्य यत्नतः ॥ ९७<br><br>ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य योगी यत्काममाप्नुयात्।<br>तत्फलं लभते सर्वं वर्णमण्डलदर्शनात् ॥ ९८[हे विप्रो!] इस प्रकार जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक उत्तम सम्पूर्ण मण्डल बनाकर जिस फलको प्राप्त करता है, उसे मैं संक्षेपमें बता रहा हूँ। समुचित रूपसे विधिपूर्वक अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन करके विधानके अनुसार क्रमसे ज्योतिष्टोम आदिसे लेकर विश्वजित्तक सभी यज्ञोंको करके अपने सदृश पुत्रोंको उत्पन्न करके पत्नीसहित वानप्रस्थ-आश्रममें प्रविष्ट होकर अग्निकर्म करके; पुनः हे द्विजो! चान्द्रायण आदि सभी व्रत सम्पन्न करके और इसके बाद सभी क्रियाओंका त्याग करके ब्रह्मविद्याका अध्ययनकर यत्नपूर्वक ज्ञान प्राप्तकर पुनः उस ज्ञानके द्वारा ज्ञेयका दर्शन करके वह योगी जो फल पाता है, उस फलको वह सम्पूर्ण वर्णमण्डलके दर्शनमात्रसे प्राप्त कर लेता है॥ ९४-९८॥

७८- शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य

३८२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
येन केनापि वा मर्त्यः प्रलिप्यायतनाग्रतः ।<br>उत्तरे दक्षिणे वापि पृष्ठतो वा द्विजोत्तमाः ॥ ९९<br><br>चतुष्कोणं तु वा चूर्णैरलङ्कृत्य समन्ततः ।<br>पुष्पाक्षतादिभिः पूज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १००<br><br>यस्तु गर्भगृहं भक्त्या सकृदालिप्य सर्वतः ।<br>चन्दनाद्यैः सकर्पूरैर्गन्धद्रव्यैः समन्ततः ॥ १०१<br><br>विकीर्य गन्धकुसुमैर्धूपैर्धूप्य चतुर्विधैः ।<br>प्रार्थयेद्देवमीशानं शिवलोकं स गच्छति ॥ १०२<br><br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् कल्पकोटिशतं नरः ।<br>स्वदेहगन्धकुसुमैः पूरयञ्छिवमन्दिरम् ॥ १०३<br><br>क्रमाद् गान्धर्वमासाद्य गन्धर्वैश्च सुपूजितः ।<br>क्रमादागत्य लोकेऽस्मिन् राजा भवति वीर्यवान् ॥ १०४हे श्रेष्ठ द्विजो! जिस किसी भी प्रकार शिवालयको लीपकर सामने, पीछे, उत्तरमें तथा दक्षिणमें चतुष्कोण मण्डल बनाकर उसे चारों ओरसे चूर्णोंसे सजाकर पुष्प, अक्षत आदिसे पूजन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो [मनुष्य] एक बार भी भक्तिपूर्वक गर्भगृहको चन्दन आदि तथा कपूरसहित गन्धद्रव्योंसे चारों ओरसे लीपकर सभी ओर सुगन्धित पुष्प बिखेरकर चार प्रकारके धूपोंसे उसे धूपित करके भगवान् ईशान (शिव)-की प्रार्थना करता है, वह शिवलोकको जाता है। वह मनुष्य वहाँ सौ करोड़ कल्पोंतक महान् सुखोंको भोगकर अपने देहरूपी सुगन्धित पुष्पोंसे शिवमन्दिरको पूरित करता हुआ क्रमसे गन्धर्वलोक पहुँचकर वहाँ गन्धर्वोंसे भलीभाँति पूजित होता है, [पुनः] क्रमसे इस लोकमें आकर पराक्रमी राजा होता है॥ ९९-१०४॥
आदिदेवो महादेवः प्रलयस्थितिकारकः ।<br>सर्गश्च भुवनाधीशः सर्वव्यापी सदाशिवः ।<br>शिवब्रह्मामृतं ग्राह्यं मोक्षसाधनमुत्तमम् ॥ १०५<br><br>व्यक्ताव्यक्तं सदा नित्यमचिन्त्यमर्चयेत्प्रभुम् ॥ १०६वे सदाशिव आदिदेव, महादेव, सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले, जगत्के स्वामी तथा सर्वव्यापी हैं। शिवरूपी ब्रह्मसे [मोक्षसुखरूपी] अमृतको ग्रहण करना चाहिये और मोक्षके साधनस्वरूप उत्तम, व्यक्त, अव्यक्त, नित्य तथा अचिन्त्य प्रभुका सदा अर्चन करना चाहिये ॥ १०५-१०६ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उपलेपनादिकथनं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उपलेपनादिकथन' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥


अठहत्तरवाँ अध्याय

शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>वस्त्रपूतेन तोयेन कार्यं चैवोपलेपनम् ।<br>शिवक्षेत्रे मुनिश्रेष्ठा नान्यथा सिद्धिरिष्यते ॥ १<br><br>आपः पूता भवन्त्येता वस्त्रपूताः समुद्धृताः ।<br>अफेना मुनिशार्दूला नादेयाश्च विशेषतः ॥ २**सूतजी बोले—**हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवक्षेत्रमें वस्त्रके द्वारा छाने हुए पवित्र जलसे ही उपलेपन-कार्य करना चाहिये; अन्यथा सिद्धि नहीं मिलती है। हे श्रेष्ठ मुनियो! विशेषकर नदीसे ग्रहण किया गया फेनरहित जल, जो पुनः वस्त्रसे छाना गया हो—ऐसा जल पवित्र होता है॥ १-२॥
तस्माद्वै सर्वकार्याणि दैविकानि द्विजोत्तमाः ।<br>अद्भिः कार्याणि पूताभिः सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥ ३अतः हे उत्तम द्विजो! समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये सभी देवकार्योंको पवित्र जलसे करना चाहिये।

अध्याय ७८ ] शिवाचारके परिपालनमें अहिंसाधर्मकी महिमा एवं शिवभक्तिका माहात्म्य ३८३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जन्तुभिर्मिश्रिता ह्यापः सूक्ष्माभिस्तान्निहत्य तु।<br>यत्पापं सकलं चाद्भिरपूताभिश्चिरं लभेत्॥ ४<br><br>सम्मार्र्जने तथा नॄणां मार्जने च विशेषतः।<br>अग्नौ कण्डनके चैव पेषणे तोयसङ्ग्रहे॥ ५<br><br>हिंसा सदा गृहस्थानां तस्माद्धिंसां विवर्जयेत्।<br>अहिंसेयं परो धर्मः सर्वेषां प्राणिनां द्विजाः॥ ६<br><br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वस्त्रपूतं समाचरेत्।जल सूक्ष्म कीटाणुओंसे युक्त रहता है, अतः निश्चय ही अपवित्र जलसे देवकार्य करनेपर वही सारा पाप होता है, जो उन्हें मारनेसे होता है। झाड़ू लगाने, सफाई करने, विशेष करके अग्निकर्ममें, कूटने-पीसनेमें तथा जलके संग्रहमें गृहस्थ मनुष्योंसे हिंसा हो जाती है, अतः हिंसासे बचना चाहिये। हे द्विजो! सभी प्राणियोंके प्रति यह अहिंसा [भाव] सबसे बड़ा धर्म है, अतः पूर्ण प्रयत्नसे वस्त्रसे पवित्र किया हुआ (छाना हुआ) जल प्रयोग करना चाहिये॥ ३—६ १/२॥
तद्दानमभयं पुण्यं सर्वदानोत्तमोत्तमम्॥ ७<br><br>तस्मात्तु परिहर्तव्या हिंसा सर्वत्र सर्वदा।<br>मनसा कर्मणा वाचा सर्वदामिंसकं नरम्॥ ८<br><br>रक्षन्ति जन्तवः सर्वे हिंसकं बाधयन्ति च।<br>त्रैलोक्यमखिलं दत्त्वा यत्फलं वेदपारगे॥ ९<br><br>तत्फलं कोटिगुणितं लभतेऽहिंसको नरः।वह दान पुण्यप्रद तथा सभी दानोंमें उत्तमोत्तम है, जो अभय देनेवाला होता है, अतः सभी जगह सर्वदा हिंसाका त्याग करना चाहिये। मन-वाणी तथा कर्मसे जो किसीकी हिंसा नहीं करता अर्थात् उन्हें दुःख नहीं पहुँचाता, ऐसे अहिंसक व्यक्तिकी सभी प्राणी सदा रक्षा करते हैं और हिंसकको कष्ट पहुँचाते हैं। वेदके पारगामी विद्वान्को सम्पूर्ण त्रिलोकका दान देकर मनुष्य जो फल पाता है, उसका करोड़ों गुना फल अहिंसक मनुष्य प्राप्त करता है॥ ७—९ १/२॥
मनसा कर्मणा वाचा सर्वभूतहिते रताः॥ १०<br><br>दयादर्शितपन्थानो रुद्रलोकं व्रजन्ति च।<br>स्वामिवत्परिरक्षन्ति बहूनि विविधानि च॥ ११<br><br>ये पुत्रपौत्रवत्स्नेहाद्रुद्रलोकं व्रजन्ति ते।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वस्त्रपूतेन वारिणा॥ १२<br><br>कार्यमभ्युक्षणं नित्यं स्त्रपनं च विशेषतः।<br>त्रैलोक्यमखिलं हत्वा यत्फलं परिकीर्त्यते॥ १३<br><br>शिवालये निहत्यैकमपि तत्सकलं लभेत्।मन, वचन तथा कर्मसे सभी प्राणियोंके हितमें संलग्न और दयादृष्टिके मार्गपर चलनेवाले रुद्रलोकको जाते हैं। जो लोग स्वामीके समान विभिन्न प्राणियोंको अपने पुत्र-पौत्रके समान समझकर स्नेहपूर्वक उनकी रक्षा करते हैं, वे रुद्रलोकको जाते हैं। अतः पूरे प्रयत्नसे वस्त्रसे पवित्र किये गये जलके द्वारा सदा अभ्युक्षण तथा विशेषरूपसे स्नान कराना चाहिये। सम्पूर्ण त्रिलोकका संहार करनेपर जो [पापका] फल कहा गया है, उस सम्पूर्ण पापको मनुष्य शिवालयमें मात्र एक प्राणीकी हत्या करके प्राप्त करता है॥ १०—१३ १/२॥
शिवार्यं सर्वदा कार्या पुष्पहिंसा द्विजोत्तमाः॥ १४<br><br>यज्ञार्थं पशुहिंसा च क्षत्रियैर्दुष्टशासनम्।<br>विहिताविहितं नास्ति योगिनां ब्रह्मवादिनाम्॥ १५<br><br>यतस्तस्मान्न हन्तव्या निषिद्धानां निषेवणात्।<br>सर्वकर्माणि विन्यस्य संन्यस्ताद् ब्रह्मवादिनः॥ १६हे श्रेष्ठ द्विजो! शिवके निमित्त सदा पुष्पहिंसा की जानी चाहिये। यज्ञके लिये पशुहिंसा दुष्ट शासन है; यह क्षत्रियोंके द्वारा की जा सकती है। ब्रह्मवादी योगियोंके लिये [कोई] विधिनिषेध नहीं है। अतः निषिद्धका सेवन करनेपर भी वे वध्य नहीं हैं। सभी कर्मोंका त्याग करके संन्यास
३८४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लिये हुए ब्रह्मवादी लोगोंका वध नहीं करना चाहिये; वे पापकर्ममें लगे रहनेपर भी सदा पूज्य हैं॥ १४—१६ १/२॥
न हन्तव्याः सदा पूज्याः पापकर्मरता अपि।<br>पवित्रास्तु स्त्रियः सर्वा अत्रेश्च कुलसम्भवाः॥ १७<br><br>ब्रह्महत्यासमं पापमात्रेयीं विनिहत्य च।<br>स्त्रियः सर्वा न हन्तव्याः पापकर्मरता अपि॥ १८<br><br>न यज्ञार्थं स्त्रियो ग्राह्याः सर्वैः सर्वत्र सर्वदा।<br>सर्ववर्णेषु विप्रेन्द्राः पापकर्मरता अपि॥ १९<br><br>मलिना रूपवत्यश्च विरूपा मलिनाम्बराः।<br>न हन्तव्याः सदा मर्त्यैः शिववच्छ्रद्धया तथा॥ २०अत्रिके कुलमें उत्पन्न सभी स्त्रियाँ पवित्र होती हैं। अत्रिवंशकी स्त्रीकी हत्या करनेपर ब्रह्महत्याके समान पाप लगता है, अतः पापकर्ममें रत होनेपर भी उन स्त्रियोंकी हत्या नहीं करनी चाहिये। सभी लोगोंको चाहिये कि यज्ञहेतु सर्वत्र सर्वदा स्त्रियोंको ग्रहण न करें; हे विप्रेन्द्रो! सभी वर्णोंकी स्त्रियाँ चाहे वे पापकर्ममें रत हों, मलिन हों, रूपवती हों, कुरूप हों अथवा मलिन वस्त्रोंवाली हों, मनुष्योंके द्वारा वध्य नहीं हैं; उनमें शिवभाव रखना चाहिये॥ १७—२०॥
वेदबाह्यव्रताचाराः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः।<br>पाषण्डिन इति ख्याता न सम्भाष्या द्विजातिभिः॥ २१<br><br>न स्प्रष्टव्या न द्रष्टव्या दृष्ट्वा भानुं समीक्षते।<br>तथापि ते न वध्याश्च नृपैरन्यैश्च जन्तुभिः॥ २२वेदविरुद्ध व्रत तथा आचारवाले और श्रुति तथा स्मृतिसे विमुख लोग पाखण्डरी कहे गये हैं। द्विजातियोंको उनके साथ बातचीत नहीं करनी चाहिये, उनका स्पर्श नहीं करना चाहिये और उन्हें देखना नहीं चाहिये; उन्हें देखनेपर सूर्यका दर्शन करना चाहिये; फिर भी राजाओं तथा अन्य प्राणियोंको चाहिये कि उनका वध न करें॥ २१–२२॥
प्रसङ्गादपि यो मर्त्यः सतां सकृदहो द्विजाः।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति समभ्यर्च्य महेश्वरम्॥ २३<br><br>भवन्ति दुःखिताः सर्वे निर्दया मुनिसत्तमाः।<br>भक्तिहीना नराः सर्वे भवे परमकारणे॥ २४<br><br>ये भक्ता देवदेवस्य शिवस्य परमेष्ठिनः।<br>भाग्यवन्तो विमुच्यन्ते भुक्त्वा भोगानिहैव ते॥ २५हे द्विजो! मनुष्य सज्जनोंके संसर्गवश एक बार भी महेश्वरका पूजन करके रुद्रलोक प्राप्त कर लेता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! सभी दयारहित लोग तथा परमकारण शिवमें भक्तिसे हीन सभी मनुष्य दुःख भोगते हैं। जो लोग देवदेव परमेष्ठी शिवके भक्त हैं, वे भाग्यशाली हैं और इस लोकमें सुखोंको भोगकर मुक्त हो जाते हैं॥ २३–२५॥
पुत्रेषु दारेषु गृहेषु नृणां<br>भक्तं यथा चित्तमथादिदेवे।<br>सकृत्प्रसङ्गाद्यतितापसानां<br>तेषां न दूरः परमेशलोकः॥ २६जैसे [गृहस्थ] मनुष्योंका चित्त पुत्रों, स्त्रियों तथा घरोंमें आसक्त रहता है, उसी प्रकार उनका चित्त यदि यतियों तथा तपस्वियोंके सान्निध्यसे एक बार भी आदिदेवमें लग जाय तो परमेश्वरका लोक उनके लिये दूर नहीं है॥ २६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भक्तिमहिमावर्णनं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भक्तिमहिमावर्णन' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥

७९- शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि एवं शिवमन्दिरमें दीपदानकी महिमा

अध्याय ७९ ] शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि...दीपदानकी महिमा ३८५

उन्यासीवाँ अध्याय

शिवपूजासे सभीका कल्याण, शिवपूजाकी विधि एवं शिवमन्दिरमें दीपदानकी महिमा

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>कथं पूज्यो महादेवो मर्त्यैर्मन्दैर्महामते।<br>अल्पायुषैरल्पवीर्यैरल्पसत्त्वैः प्रजापतिः ॥ १<br>संवत्सरसहस्रैश्च तपसा पूज्य शङ्करम्।<br>न पश्यन्ति सुराश्चापि कथं देवं यजन्ति ते॥ २ऋषिगण बोले— हे महामते! मन्दबुद्धिवाले, अल्प आयुवाले, अल्प पराक्रमवाले तथा अल्प सामर्थ्यवाले मनुष्योंको प्रजापति महादेवकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? हजार वर्षोंतक तपस्याके द्वारा शंकरकी पूजा करके देवता भी उनका दर्शन नहीं कर पाते; तो फिर वे [मनुष्य] भगवान् शिवकी पूजा कैसे करें? ॥ १-२ ॥
सूत उवाच<br>कथितं तथ्यमेवात्र युष्माभिर्मुनिपुङ्गवाः।<br>तथापि श्रद्धया दृश्यः पूज्यः सम्भाष्य एव च॥ ३<br>प्रसङ्गाच्चैव सम्पूज्य भक्तिहीनैरपि द्विजाः।<br>भावानुरूपफलदो भगवानिति कीर्तितः॥ ४सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ मुनियो! आपलोगोंने यथार्थ बात कही है, फिर भी श्रद्धापूर्वक [शिवकी] पूजा करनेपर उनका दर्शन हो सकता है और उनसे सम्भाषण किया जा सकता है। हे द्विजो! प्रसंगवश भक्तिहीन लोगोंके द्वारा भी पूजित होकर वे भगवान् उनके भावके अनुरूप फल देनेवाले कहे गये हैं॥ ३-४॥
उच्छिष्टः पूजयन् याति पैशाचं तु द्विजाधमः।<br>सङ्क्रुद्धो राक्षसं स्थानं प्राप्नुयान्मूढधीर्द्विजाः॥ ५<br>अभक्ष्यभक्षी सम्पूज्य याक्षं प्राप्नोति दुर्जनः।<br>गानशीलश्च गान्धर्वं नृत्यशीलस्तथैव च॥ ६<br>ख्यातिशीलस्तथा चान्द्रं स्त्रीषु सक्तो नराधमः।<br>मदार्तः पूजयन् रुद्रं सोमस्थानमवाप्नुयात्॥ ७हे द्विजो! उच्छिष्ट अधम ब्राह्मण शिवकी पूजा करके पिशाचलोकको जाता है और क्रोधमें भरकर पूजन करनेवाला मूढ़बुद्धि राक्षसका स्थान (लोक) प्राप्त करता है। अभक्ष्य [भोजन]-का भक्षण करनेवाला दुष्ट मनुष्य [शिवकी] पूजा करके यक्षलोक प्राप्त करता है और नृत्य-गान करनेवाला उनकी पूजा करके गन्धर्वलोक प्राप्त करता है। प्रसिद्धिका इच्छुक और स्त्रियोंमें आसक्त नराधम बुधलोक प्राप्त करता है। मदोन्मत्त व्यक्ति रुद्रकी पूजा करता हुआ सोमलोक प्राप्त करता है॥ ५-७॥
गायत्र्या देवमभ्यर्च्य प्राजापत्यमवाप्नुयात्।<br>ब्राह्मं हि प्रणवेनैव वैष्णवं चाभिनन्द्य च॥ ८<br>श्रद्धया सकृदेवापि समभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रैः सार्धं प्रमोदते॥ ९[रुद्र] गायत्री [मन्त्र] द्वारा शिवका पूजन करके मनुष्य प्रजापतिलोकको और प्रणवके द्वारा पूजन करके ब्रह्मलोक तथा विष्णुलोकको प्राप्त करता है। श्रद्धापूर्वक एक बार भी महेश्वरका पूजन करके मनुष्य रुद्रलोकमें पहुँचकर रुद्रोंके साथ आमोद-प्रमोद करता है॥ ८-९॥
संशोध्य च शुभं लिङ्गममरासुरपूजितम्।<br>जलैः पूतैस्तथा पीठे देवमावाह्य भक्तितः॥ १०<br>दृष्ट्वा देवं यथान्यायं प्रणिपत्य च शङ्करम्।<br>कल्पिते चासने स्थाप्य धर्मज्ञानमये शुभे॥ ११<br>वैराग्यैश्वर्यसम्पन्ने सर्वलोकनमस्कृते।<br>ओङ्कारपद्ममध्ये तु सोमसूर्याग्निसम्भवे॥ १२देवताओं तथा असुरोंसे पूजित शुभ लिङ्गको पवित्र जलसे स्वच्छ करके पीठमें भक्तिपूर्वक शिवका आवाहन करके उन्हें देखकर विधिपूर्वक प्रणाम करके धर्मज्ञानमय, उत्तम, वैराग्य-ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सभी लोगोंसे नमस्कृत, ओंकार पद्मसे युक्त मध्यभागवाले तथा चन्द्र-सूर्य-अग्निसे उत्पन्न कल्पित आसनपर स्थापित करके रुद्र शम्भुको
३८६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पाद्यमाचमनं चार्घ्यं दत्त्वा रुद्राय शम्भवे।<br>स्नापयेद्दिव्यतोयैश्च घृतेन पयसा तथा॥ १३<br>दध्ना च स्नापयेद् रुद्रं शोधयेच्च यथाविधि।<br>ततः शुद्धाम्बुना स्नाप्य चन्दनाद्यैश्च पूजयेत्॥ १४<br>रोचनाद्यैश्च सम्पूज्य दिव्यपुष्पैश्च पूजयेत्।<br>बिल्वपत्रैरखण्डैश्च पद्मैर्नानाविधैस्तथा॥ १५<br>नीलोत्पलैश्च राजीवैर्नन्द्यावर्तैश्च मल्लिकैः।<br>चम्पकैर्जातिपुष्पैश्च बकुलैः करवीरकैः॥ १६<br>शमीपुष्पैर्बृहत्पुष्पैरून्मत्तागस्त्यजैरपि ।<br>अपामार्गकदम्बैश्च भूषणैरपि शोभनैः॥ १७<br>दत्त्वा पञ्चविधं धूपं पायसं च निवेदयेत्।<br>दधिभक्तं च मध्वाज्यपरिल्लुतमतः परम्॥ १८<br>शुद्धान्नं चैव मुद्गान्नं षड्विधं च निवेदयेत्।<br>अथ पञ्चविधं वापि सघृतं विनिवेदयेत्॥ १९<br>केवलं चापि शुद्धान्नमाढकं तण्डुलं पचेत्।<br>कृत्वा प्रदक्षिणं चान्ते नमस्कृत्य मुहुर्मुहुः॥ २०<br>स्तुत्वा च देवमीशानं पुनः सम्पूज्य शङ्करम्।<br>ईशानं पुरुषं चैव अघोरं वाममेव च॥ २१<br>सद्योजातं जपंश्चापि पञ्चभिः पूजयेच्छिवम्।<br>अनेन विधिना देवः प्रसीदति महेश्वरः॥ २२पाद्य-आचमन-अर्घ्य प्रदान करके उन्हें दिव्य जलोंसे स्नान कराना चाहिये। पुनः घी, दूध तथा दहीसे रुद्रको स्नान कराना चाहिये एवं विधिपूर्वक स्वच्छ करना चाहिये। तत्पश्चात् शुद्ध जलसे स्नान कराकर चन्दन आदिसे पूजन करना चाहिये; पुनः रोचन आदिसे पूजन करके दिव्य पुष्पों, अखण्ड बिल्वपत्रों, अनेक प्रकारके पद्द्मों, नीलकमलों, रक्तकमलों, नन्द्यावर्तपुष्पों, मल्लिका, चम्पक, जातिपुष्पों, बकुलों, कनैंरके पुष्पों, शमीपुष्पों, बृहत्पुष्पों, धतूरके पुष्पों, अगस्त्यके उदित होनेपर खिलनेवाले पुष्पों, अपामार्ग-कदम्बके गुच्छों तथा सुन्दर आभूषणोंसे पूजन करके पाँच प्रकारके धूप प्रदान करके पायस (खीर) निवेदित करना चाहिये। तदनन्तर दधिमिश्रित भात, मधु-घृत मिला हुआ भात, पका हुआ अन्न और मूँगका पका हुआ अन्न—यह छः प्रकारका अन्न निवेदित करे; अथवा पाँच प्रकारका घृतमिश्रित अन्न निवेदित करे; अथवा केवल एक आढक (चार प्रस्थ) शुद्ध चावल पकाये और उसे निवेदित करे। अन्तमें प्रदक्षिणा करके बार-बार नमस्कारकर देवता ईशानकी स्तुति करके पुनः शंकरजीकी विधिवत् पूजा करके ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात मन्त्रोंका जप करते हुए इन पाँच मन्त्रोंसे शिवकी पूजा करे। इस विधिसे [पूजा करनेपर] देव महेश्वर प्रसन्न होते हैं॥ १०—२२॥
वृक्षाः पुष्पादिपत्राद्यैरुपयुक्ताः शिवार्चने।<br>गावश्चैव द्विजश्रेष्ठाः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ २३<br>पूजयेद्यः शिवं रुद्रं शर्वं भवमजं सकृत्।<br>स याति शिवसायुज्यं पुनरावृत्तिवर्जितम्॥ २४<br>अर्चितं परमेशानं भवं शर्वमुमापतिम्।<br>सकृत्प्रसङ्गाद्वा दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २५<br>पूजितं वा महादेवं पूज्यमानमथापि वा।<br>दृष्ट्वा प्रयाति वै मर्त्यो ब्रह्मलोकं न संशयः॥ २६हे श्रेष्ठ द्विजो! शिवपूजनमें उपयोग किये गये पुष्प, पत्र आदिके साथ वृक्ष और गायें—ये सब परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो एक बार भी शिव, रुद्र, शर्व, भव, अजकी पूजा करता है; वह पुनर्जन्मरहित शिवसायुज्यको प्राप्त कर लेता है। एक बार अथवा प्रसंगवश भी पूजित परमेश्वर, भव, उमापतिका दर्शन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पूजित किये गये अथवा पूजित होते हुए महादेवका दर्शनकर मनुष्य ब्रह्मलोकको जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २३—२६॥
श्रुत्वानुमोदयेच्चापि स याति परमां गतिम्।<br>यो दद्याद् घृतदीपं च सकृल्लिङ्गस्य चाग्रतः॥ २७<br>स तां गतिमवाप्नोति स्वाश्रमैर्दुर्लभां स्थिराम्।<br>दीपवृक्षं पार्थिवं वा दारवं वा शिवालये॥ २८जो [शिवके सम्बन्धमें] कुछ भी सुनकर उसका अनुमोदन करता है, वह परमगति प्राप्त करता है। जो शिवके समक्ष एक बार भी घृतका दीपक अर्पित करता है, वह वर्णाश्रमी लोगोंके लिये दुर्लभ स्थिर गति प्राप्त

८०- देवताओंका कैलासपुरी आकर वहाँ विराजमान उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना तथा भगवान् शिवद्वारा देवताओंको पाशुपतव्रतका उपदेश प्रदान करना

अध्याय ८० ] देवताओंका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना ३८७


| दत्त्वा कुलशतं साग्रं शिवलोके महीयते।<br>आयसं ताम्रजं वापि रौप्यं सौवर्णिकं तथा॥ २९<br><br>शिवाय दीपं यो दद्याद्विधिना वापि भक्तितः।<br>सूर्यायुतसमैः श्लक्ष्णैर्यानैः शिवपुरं व्रजेत्॥ ३०<br><br>कार्तिके मासि यो दद्याद् घृतदीपं शिवाग्रतः।<br>सम्पूज्यमानं वा पश्येद्विधिना परमेश्वरम्॥ ३१<br><br>स याति ब्रह्मणो लोकं श्रद्धया मुनिसत्तमाः।<br>आवाहनं सुसान्निध्यं स्थापनं पूजनं तथा॥ ३२<br><br>सम्प्रोक्तं रुद्रगायत्र्या आसनं प्रणवेन वै।<br>पञ्चभिः स्नपनं प्रोक्तं रुद्राद्यैश्च विशेषतः॥ ३३<br><br>एवं सम्पूजयेन्नित्यं देवदेवमुमापतिम्।<br>ब्रह्माणं दक्षिणे तस्य प्रणवेन समर्चयेत्॥ ३४<br><br>उत्तरे देवदेवेशं विष्णुं गायत्रिया यजेत्।<br>वह्नौ हुत्वा यथान्यायं पञ्चभिः प्रणवेन च॥ ३५<br><br>स याति शिवसायुज्यमेवं सम्पूज्य शङ्करम्।<br>इति सङ्क्षेपतः प्रोक्तो लिङ्गार्चनविधिक्रमः॥ ३६<br><br>व्यासेन कथितः पूर्वं श्रुत्वा रुद्रमुखात्स्वयम्॥ ३७ | करता है। शिवालयमें मिट्टी अथवा लकड़ीका बना हुआ दीपवृक्ष (दीवट) प्रदान करके मनुष्य आगेके सौ कुलोंसहित शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो विधानके अनुसार भक्तिपूर्वक लोहे, ताँबे, चाँदी अथवा सोनेका बना हुआ दीपक शिवको समर्पित करता है, वह दस हजार सूर्योंके समान देदीप्यमान विमानोंसे शिवलोकको जाता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! जो कार्तिक महीनेमें शिवके सामने घृतका दीपक समर्पित करता है अथवा विधानके साथ पूजित होते हुए परमेश्वरका दर्शन श्रद्धापूर्वक करता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है॥ २७-३१½॥<br><br>[शिवका] आवाहन, उत्तम सान्निध्य, स्थापन तथा पूजन रुद्रगायत्री [मन्त्र]-द्वारा और आसन प्रणव-द्वारा बताया गया है। [सद्योजात आदि] पाँच मन्त्रोंसे तथा विशेषरूपसे रुद्रमन्त्रोंसे उनका स्नान बताया गया है। इस प्रकार देवदेव उमापतिकी पूजा नित्य करे। उनके दक्षिणमें ब्रह्माकी पूजा प्रणवसे करे और उत्तरमें देवदेवेश विष्णुकी पूजा गायत्री [मन्त्र]-से करे। विधिके अनुसार [सद्योजात आदि] पाँच मन्त्रोंसे तथा प्रणवसे अग्निमें होम करे। इस प्रकार शंकरकी भलीभाँति पूजा करके वह [मनुष्य] शिवसायुज्य प्राप्त करता है। [हे ऋषियो!] मैंने संक्षेपमें लिङ्गार्चनविधिका क्रम बता दिया; पहले स्वयं रुद्रके मुखसे इसे सुनकर व्यासजीने मुझको बताया था॥ ३२-३७॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवार्चनविधिर्नमैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवार्चनविधि' नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७९ ॥


अस्सीवाँ अध्याय

देवताओंका कैलासपुरी आकर वहाँ विराजमान उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना तथा भगवान् शिवद्वारा देवताओंको पाशुपतव्रतका उपदेश प्रदान करना

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले—
कथं पशुपतिं दृष्ट्वा पशुपाशविमोक्षणम्।<br>पशुत्वं तत्यजुर्देवास्तन्नो वक्तुमिहार्हसि॥ १[हे सूतजी!] पशुपतिका दर्शन करके पशुपाशसे मुक्ति किस प्रकार होती है; देवताओंने पशुत्वका कैसे त्याग किया? इसे आप कृपा करके हम लोगोंको बतायें॥ १॥
सूत उवाचसूतजी बोले—
पुरा कैलासशिखरे भोग्याख्ये स्वपुरे स्थितम्।<br>समेत्य देवाः सर्वज्ञमाजग्मुस्तत्प्रसादतः॥ २पूर्वकालमें कैलास-शिखरपर भोग्य नामक अपने पुरमें स्थित सर्वज्ञ शिवके पास सभी देवता
३८८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| हिताय सर्वदेवानां ब्रह्मणा च जनार्दनः ।<br>गरुडस्य तथा स्कन्धमारुह्य पुरुषोत्तमः ॥ ३<br>जगाम देवताभिर्वै देवदेवान्तिकं हरिः ।<br>सर्वे सम्प्राप्य देवस्य सार्धं गिरिवरं शुभम् ॥ ४<br>सेन्द्राः ससाध्याः सयमाः प्रणेमुर्गिरिमुत्तमम् ।<br>भगवान् वासुदेवोऽसौ गरुडाद् गरुडध्वजः ।<br>अवतीर्य गिरिं मेरुमारुरोह सुरोत्तमैः ॥ ५<br>सकलदुरितहीनं सर्वदं भोगमुख्यं<br>मुदितकुररवन्दं नादितं नागवृन्दैः ।<br>मधुररणितगीतं सानुकूलाथकारं<br>पदरचितवनान्तं कान्तवातान्ततोयम् ॥ ६<br>भवनशतसहस्रैर्जुष्टमादित्यकल्पै-<br>र्ललितगतिविदर्घैर्हंसवृन्दैश्च भिन्नम् ।<br>धवकदिरपलाशैश्चन्दनाद्यैश्च वृक्षै-<br>र्द्विजवरगणवृन्दैः कोकिलाद्यैर्द्विरेफैः ॥ ७<br>क्वचिदशेषसुरद्रुमसङ्कुलं<br>कुरबकैः प्रियकैस्तिलकैस्तथा ।<br>बहुकदम्बतमाललतावृतं<br>गिरिवरं शिखरैर्विविधैस्तथा ॥ ८ | उनकी कृपासे एक साथ मिलकर आये। सभी देवताओंके हितके लिये जनार्दन पुरुषोत्तम विष्णु भी गरुड़के स्कन्धपर बैठकर ब्रह्मा तथा सभी देवताओंके साथ देवदेव शिवके पास पहुँचे॥ २-३ १/२॥<br>इन्द्र, साध्यगण तथा यमसहित सभी लोगोंने एक साथ शिवके गिरिश्रेष्ठ, शुभ तथा उत्तम पर्वतश्रेष्ठ मेरुपर आकर उस गिरिको प्रणाम किया। वे गरुड़ध्वज भगवान् वासुदेव गरुड़से उतरकर उत्तम देवताओंके साथ मेरु पर्वतपर चढ़ गये; वह समस्त पापोंसे रहित, सबकुछ देनेवाला, उत्तम भोगोंसे युक्त, आनन्दित कुरर पक्षियोंसे समन्वित, हाथियोंकी ध्वनियोंसे निनादित, मधुर गीतोंसे गुंजित, अन्य पर्वतोंके पृष्ठभागको अपने छायारूपी अन्धकारसे युक्त करनेवाला, पदचिह्नोंसे युक्त वन-प्रदेशवाला, सुन्दर हवाओं तथा जलसे परिपूर्ण, सूर्यके समान प्रदीप्त सैकड़ों-हजारों भवनोंसे युक्त, मनोहर गतिवाले हंससमूहोंसे मण्डित, धव-खदिर-पलाश-चन्दन आदि वृक्षोंसे परिपूर्ण, उत्तम पक्षियोंके समूहोंसे युक्त, कोकिल आदि तथा भौरोंसे शोभायमान, कहीं-कहीं बहुत-से दिव्य वृक्षोंसे भरा हुआ, कुरबक-प्रियक-तिलक पुष्पवृक्षोंसे सम्पन्न, बहुत-से कदम्ब-तमाल-लताओंसे घिरा हुआ तथा अनेक प्रकारके शिखरोंसे युक्त श्रेष्ठ पर्वत है॥ ४-८॥ | | गिरेः पृष्ठे पुरं शार्वं कल्पितं विश्वकर्मणा ।<br>क्रीडार्थं देवदेवस्य भवस्य परमेष्ठिनः ॥ ९<br>अपश्यंस्तत्पुरं देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समाहिताः ।<br>प्रणेमुर्दूरताश्चैव प्रभावादेव शूलिनः ॥ १० | [इस] पर्वतके पृष्ठपर देवदेव परमेश्वर शिवके विहारके लिये विश्वकर्माने एक शिवपुरका निर्माण किया है। इन्द्र तथा उपेन्द्रसहित सभी देवताओंने उस पुरको ध्यानपूर्वक देखा और शिवजीके प्रभावसे दूरसे ही उसे प्रणाम किया॥ ९-१०॥ | | सहस्रसूर्यप्रतिमं महान्तं<br>सहस्रशः सर्वगुणैश्च भिन्नम् ।<br>जगाम कैलासगिरिं महात्मा<br>मेरुप्रभागे पुरमादिदेवः ॥ ११<br>ततोऽथ नारीगजवाजिसङ्कुलं<br>रथैरनेकैर्मरारिसूदनः ।<br>गणैर्गणेशैश्च गिरीन्द्रसन्निभं<br>महापुरद्वारमजो हरिश्च ॥ १२ | महात्मा आदिदेव [विष्णु] मेरुके एक भागमें [स्थित] हजारों सूर्योंके समान देदीप्यमान, हजारों तरहसे महान्, सभी गुणोंसे युक्त कैलासगिरिपर गये। तदनन्तर ब्रह्मा तथा देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले विष्णु उस महान् पुरके द्वारपर पहुँचे; जो स्त्रियों, हाथियों, घोड़ों, अनेक रथों, गणों तथा गणेश्वरोंसे भरा हुआ था और महापर्वतके समान प्रतीत हो रहा था॥ ११-१२॥ |

अध्याय ८० ]देवताओंका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना३८९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथ जाम्बूनदमयैर्भवनैर्मणिभूषितैः ।<br>विमानैर्विविधाकारैः प्राकारैश्च समावृतम् ॥ १३<br>दृष्ट्वा शम्भोः पुरं बाह्यं देवैः सब्रह्मकैर्हरिः ।<br>प्रहृष्टवदनो भूत्वा प्रविवेश ततः पुरम् ॥ १४<br>हर्म्यप्रासादसम्बार्धं महाट्टालसमन्वितम् ।<br>द्वितीयं देवदेवस्य चतुर्द्वारं सुशोभनम् ॥ १५<br>वज्रवैडूर्यमाणिक्यमणिजालैः समावृतम् ।<br>दोलाविक्षेपसंयुक्तं घण्टाचामरभूषितम् ॥ १६<br>मृदङ्गमुरजैर्जुष्टं वीणावेणुनिनादितम् ।<br>नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैर्भूतसङ्घैश्च संवृतम् ।<br>देवेन्द्रभवनाकारैर्भवनैर्दृष्टिमोहनैः ॥ १७तदनन्तर सुवर्णमय भवनों, मणिभूषित विमानों तथा अनेक आकारवाले प्राकारों (चहारदीवारियों)-से घिरे हुए शिवके बाहरी पुरको देखकर प्रसन्नमुख होकर विष्णुने ब्रह्मसहित सभी देवताओंके साथ देवदेवके उस दूसरे पुरमें प्रवेश किया; जो विशाल भवनों तथा महलोंसे अवरुद्ध, ऊँची अट्टालिकाओंसे समन्वित, चार द्वारोंवाला, परम सुन्दर, हीरा-वैडूर्य-माणिक्य-मणियोंके जालोंसे आवृत, आन्दोलित हो रहे हिण्डोलोंसे समन्वित, घण्टा तथा चामरसे विभूषित, मृदंग-मुरज आदि वाद्ययन्त्रोंसे परिपूर्ण, वीणा-वेणुसे निनादित, नृत्य करती हुई अप्सराओं तथा भूतगणोंसे घिरा हुआ और दृष्टिको मोह लेनेवाले देवेन्द्रभवनके आकारवाले भवनोंसे मण्डित था॥ १३–१७॥
प्रासादशृङ्गेष्वथ पौरनार्यः<br>सहस्रशः पुष्पफलाक्षताद्यैः ।<br>स्थिताः करैस्तस्य हरेः समन्तात्<br>प्रचिक्षिपुर्मूर्ध्नि यथा भवस्य ॥ १८<br>दृष्ट्वा नार्यस्तदा विष्णुं मदाघूर्णितलोचनाः ॥ १९<br>विशालजघनाः सद्यो ननृतुर्मुमुदुर्जगुः ।<br>काश्चिद् दृष्ट्वा हरिं नार्यः किञ्चित्प्रहसिताननाः ॥ २०<br>किञ्चिद्विस्रस्तवस्त्राश्च स्रस्तकाञ्चीगुणा जगुः ।[तीसरे पुरमें प्रवेश करनेपर] महलोंके शिखरोंपर विराजमान हजारों पुरस्त्रियाँ [अपने] हाथोंसे सभी ओरसे शिवकी भाँति विष्णुके मस्तकपर भी पुष्प, फल, अक्षत आदिकी वर्षा करने लगीं। उस समय विष्णुको देखकर मदसे घूर्णित नेत्रोंवाली तथा विशाल जाँघोंवाली स्त्रियाँ शीघ्र ही आनन्दमग्न हो गयीं और वे नाचने तथा गाने लगीं। विष्णुको देखकर कुछ स्त्रियोंका मुखमण्डल मन्द मुसकानसे भर गया, कुछके वस्त्र शिथिल हो गये और कुछकी करधनी ढीली पड़ गयी; वे सब गीत गाने लगीं॥ १८–२०१/२॥
चतुर्थं पञ्चमं चैव षष्ठं च सप्तमं तथा ॥ २१<br>अष्टमं नवमं चैव दशमं च पुरोत्तमम् ।<br>अतीत्यासाद्य देवस्य पुरं शम्भोः सुशोभनम् ॥ २२<br>सुवृत्तं सुतरां शुभ्रं कैलासशिखरे शुभे ।<br>सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैश्च विभूषितम् ॥ २३<br>स्फाटिकैर्मण्डपैः शुभ्रैर्जाम्बूनदमयैस्तथा ।<br>नानारत्नमयैश्चैव दिग्विधिक्षु विभूषितम् ॥ २४<br>गोपुरैर्गोपतेः शम्भोर्नानाभूषणभूषितैः ।<br>अनेकैः सर्वतोभद्रैः सर्वरत्नमयैस्तथा ॥ २५<br>प्राकारैर्विविधाकारैरष्टाविंशतिभिर्वृतम् ।<br>उपद्वारैर्महाद्वारैर्विदिक्षु विविधैर्दृढैः ॥ २६<br>गुह्यालयैर्गुह्यगृहैर्गुह्यस्य भवनैः शुभैः ।<br>ग्राम्यैर्नयैर्महाभागा मौक्तिकैर्दृष्टिमोहनैः ॥ २७हे महाभागो! तदनन्तर चौथे, पाँचवें, छठें, सातवें, आठवें, नौवें तथा दसवें उत्तम पुरोंको क्रमसे पार करके शुभ कैलास-शिखरपर [स्थित] देवदेव गोपति परमेश्वर भगवान् शिवके परम सुन्दर; पूर्ण गोलाकार; सूर्यमण्डलके समान भवनोंसे विभूषित; स्फटिकके शुभ्र मण्डपोंसे शोभायमान; सभी दिशाओंमें सुवर्णमय तथा विविध रत्नमय फाटकोंसे विभूषित; विविध आभूषणोंसे अलंकृत, अनेक सर्वतोभद्रोंसे युक्त; अनेक आकारवाले रत्नजटित अट्ठाईस प्राकारों (चहारदीवारियों)-से घिरे हुए; उपदिशाओंमें अनेक प्रकारके दृढ़ उपद्वारों तथा महाद्वारोंसे युक्त; गुह (कार्तिकेय)-के गुप्त भवनों
३९०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| गणेशायतनैर्दिव्यैः पद्मरागमयैस्तथा।<br>चन्दनैर्विविधाकारैः पुष्पोद्यानैश्च शोभनैः॥ २८<br>तडागैर्दीर्घिकाभिश्च हेमसोपानपङ्क्तिभिः।<br>स्त्रीणां गतिजितैर्हंसैः सेविताभिः समन्ततः॥ २९<br>मयूरैश्चैव कारण्डैः कोकिलैश्चक्रवाकैः।<br>शोभिताभिश्च वापीभिर्दिव्यामृतजलैस्तथा॥ ३०<br>संलापालापकुशलैः सर्वाभरणभूषितैः।<br>स्तनभारावनम्रैश्च मदाघूर्णितलोचनैः॥ ३१<br>गेयनादरतैर्दिव्यै रुद्रकन्यासहस्रकैः।<br>नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैरमरैरपि दुर्लभैः॥ ३२<br>प्रफुल्लाम्बुजवृन्दाद्यैस्तथा द्विजवरैरपि।<br>रुद्रस्त्रीगणसङ्कीर्णैर्जलक्रीडारतैस्तथा ॥ ३३<br>रतोत्सवरतैश्चैव ललितैश्च पदे पदे।<br>ग्रामरागानुरक्तैश्च पद्मरागसमप्रभैः॥ ३४<br>स्त्रीसङ्गैर्देवदेवस्य भवस्य परमात्मनः।<br>दृष्ट्वा विस्मयमापन्नास्तस्थुर्देवाः समन्ततः॥ ३५ | तथा गुप्त कक्षोंसे सुशोभित; दृष्टिको मोह लेनेवाले मोतीके बने हुए अन्य सुन्दर ग्राम्य भवनोंसे युक्त; पद्मरागसे बने हुए दिव्य गणेश्वर-मन्दिरोंसे विभूषित; चन्दनके वृक्षोंसहित अनेक आकारवाले सुन्दर पुष्प-उद्यानोंसे सुशोभित; सोनेकी सीढ़ियोंकी पंक्तियोंसे युक्त और स्त्रियोंकी चालको तिरस्कृत करनेवाले हंसोंसे सभी ओरसे सेवित सरोवरों तथा बावलियोंसे विभूषित; मयूर, कारण्ड, कोकिल तथा चक्रवाकसे सुशोभित और दिव्य अमृतमय जलसे युक्त वापियोंसे विभूषित; वार्तालापमें कुशल, सभी आभूषणोंसे अलंकृत, वक्षःस्थलके भारसे झुकी हुई, मदसे घूर्णित नेत्रोंवाली, गाने-बजानेमें तल्लीन तथा नृत्य करती हुई देवदुर्लभ दिव्य हजारों रुद्र-कन्याओं एवं अप्सराओंसे सुशोभित; विकसित कमल आदिसे युक्त; उत्तम पक्षियोंसे परिपूर्ण; रुद्रस्त्रीगणोंसे भरे हुए; जलक्रीड़ामें रत, रतोत्सवमें तल्लीन, प्रत्येक पदपर ललित, संगीतमें अनुरक्त तथा पद्मरागके समान कान्तिवाली स्त्रियोंसे सुशोभित पुरको देखकर सभी देवता पूर्णरूपसे आश्चर्यचकित होकर वहीं खड़े हो गये॥ २१–३५॥ | | तत्रैव ददृशुर्देवा वृन्दं रुद्रगणस्य च।<br>गणेश्वराणां वीराणामपि वृन्दं सहस्रशः॥ ३६<br>सुवर्णकृतसोपानान् वज्रवैदूर्यभूषितान्।<br>स्फाटिकान् देवदेवस्य ददृशुस्ते विमानकान्॥ ३७ | वहींपर देवताओंने रुद्रगणों, हजारों वीर गणेश्वरों, हीरे तथा वैदूर्यमणिसे जटित सुवर्णमय सीढ़ियों और देवदेवके स्फटिकनिर्मित भवनोंको देखा॥ ३६–३७॥ | | तेषां शृङ्गेषु हृष्टाश्च नार्यः कमललोचनाः।<br>विशालजघना यक्षा गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥ ३८<br>किन्नर्यः किन्नराश्चैव भुजङ्गाः सिद्धकन्यकाः।<br>नानावेषधराश्चान्या नानाभूषणभूषिताः॥ ३९<br>नानाप्रभावसंयुक्ता नानाभोगरतिप्रियाः।<br>नीलोत्पलदलप्रख्याः पद्मपत्रायतेक्षणाः॥ ४०<br>पद्मकिञ्जल्कसङ्काशैरंशुकैरतिशोभनाः ।<br>वलयैनूपुरैर्हारैश्छत्रैश्चित्रैस्तथांशुकैः ।<br>भूषिता भूषितैश्चान्यैर्मण्डिता मण्डनप्रियाः॥ ४१ | उन [भवनों]-के शिखरोंपर हृष्ट, कमलके समान नेत्रोंवाली तथा विशाल जाँघोंवाली स्त्रियाँ, यक्ष, गन्धर्व, अप्सराएँ, किन्नरियाँ, किन्नर, नाग, सिद्धगणोंकी कन्याएँ, तथा अन्य स्त्रियाँ विराजमान थीं; वे अनेक वेष धारण की हुई थीं, अनेक आभूषणोंसे अलंकृत थीं, अनेक हाव-भावोंसे युक्त थीं, अनेक भोग तथा रतिसे प्रेम करनेवाली थीं, नील कमलके पत्रके समान शोभावाली थीं, कमल-पत्रके समान विशाल नेत्रोंवाली थीं, कमलकी पंखुड़ीके समान [कोमल] वस्त्रोंसे सुशोभित थीं, कंकण-नूपुर-हार-रंग-बिरंगे छत्र तथा वस्त्रोंसे भूषित थीं, अन्य प्रकारके आभूषणोंसे मण्डित थीं और सजावटसे प्रीति करनेवाली थीं॥ ३८–४१॥ |

अध्याय ८०] देवताओँका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना ३९१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्ट्वाथ वृन्दं सुरसुन्दरीणां गणेश्वराणां सुरसुन्दरीणाम्।<br>जग्मुर्गणेशस्य पुरं सुरेशाः पुरद्विषः शक्रपुरोगमाश्च॥ ४२देवताओंकी सुन्दर स्त्रियों तथा गणेश्वरोंकी सुन्दर स्त्रियोंको देखकर इन्द्र आदि प्रमुख देवता त्रिपुरके शत्रु गणाधीशके पुरमें गये॥ ४२ ॥
दृष्ट्वा च तस्थुः सुरसिद्धसङ्घाः पुरस्य मध्ये पुरुहूतपूर्वाः।<br>भवस्य बालार्कसहस्रवर्णं विमानमाद्यं परमेश्वरस्य॥ ४३[उस] पुरके मध्यमें स्थित परमेश्वर शिवके हजारों उगते हुए सूर्यके समान आभावाले भवनको देखकर इन्द्रसहित देवता तथा सिद्धगण वहाँ रुक गये॥ ४३ ॥
अथ तस्य विमानस्य द्वारि संस्थं गणेश्वरम्।<br>नन्दिनं ददृशुः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः॥ ४४इसके बाद इन्द्र आदि सभी देवताओंने उस भवनके द्वारपर स्थित गणेश्वर नन्दीको देखा॥ ४४ ॥
तं दृष्ट्वा नन्दिनं सर्वे प्रणम्याहुर्गणेश्वरम्।<br>जयेति देवास्तं दृष्ट्वा सोऽप्याह च गणेश्वरः॥ ४५<br>भो भो देवा महाभागाः सर्वे निर्धूतकल्मषाः।<br>सम्प्राप्ताः सर्वलोकेशा वक्तुमर्हथ सुव्रताः॥ ४६उन गणेश्वर नन्दीको देखकर सभी देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और कहा—'जय हो'। तब गणेश्वरने भी उन्हें देखकर कहा—'हे महाभाग्यशाली देवताओ! हे सुव्रतो! निष्पाप तथा सभी लोकोंके स्वामी आपलोग किसलिये आये हैं; कृपा करके बतायें॥ ४५-४६॥
तमाहुर्वरदं देवं वारणेन्द्रसमप्रभम्।<br>पशुपशविमोक्षार्थं दर्शयास्मान् महेश्वरम्॥ ४७तत्पश्चात् देवताओंने उनसे कहा—'पशुपाश (जीवभाव)-से मुक्तिके लिये आप हमलोगोंको गजराज (ऐरावत)-के समान शुभ्र कान्तिवाले एवं वर प्रदान करनेवाले देव महेश्वरका दर्शन कराइये॥ ४७॥
पुरा पुरत्रयं दग्धुं पशुत्वं परिभाषितम्।<br>शङ्किताश्च वयं तत्र पशुत्वं प्रति सुव्रत॥ ४८हे सुव्रत! पूर्वकालमें तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये पशुत्व स्वीकार किया गया था; उस पशुत्वके विषयमें हमलोग शंकाग्रस्त हैं॥ ४८॥
व्रतं पाशुपतं प्रोक्तं भवेन परमेष्ठिना।<br>व्रतेनानेन भूतेश पशुत्वं नैव विद्यते॥ ४९<br>अथ द्वादशवर्षं वा मासद्वादशकं तु वा।<br>दिनद्वादशकं वापि कृत्वा तद् व्रतमुत्तमम्॥ ५०<br>मुच्यन्ते पशवः सर्वे पशुपाशैर्भवस्य तु।परमेश्वर शिवके द्वारा पाशुपतव्रत कहा गया है; हे भूतेश! इस व्रतके करनेसे पशुत्व नहीं रहता है। बारह वर्षोंतक, बारह महीनोंतक अथवा बारह दिनोंतक भी उस उत्तम व्रतको करके समस्त पशु [भगवान्] शिवके पशुपाशोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ४९-५० १/२॥
दर्शयामास तान् देवान्नारायणपुरोगमान्॥ ५१<br>नन्दी शिलादतनयः सर्वभूतगणाग्रणीः।<br>तं दृष्ट्वा देवमीशानं साम्बं सगणमव्ययम्॥ ५२<br>प्रणेमुस्तुष्टुवुश्चैव प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>विज्ञाप्य शितिकण्ठाय पशुपाशविमोक्षणम्॥ ५३<br>तस्थुस्तदग्रतः शम्भोः प्रणिपत्य पुनः पुनः।तदनन्तर सभी भूतगणोंमें अग्रणी शिलादपुत्र नन्दीने नारायण आदि उन देवताओंको [शिवका] दर्शन कराया। तब उमा तथा गणोंसहित उन सनातन प्रभु ईशानका दर्शन करके प्रीतिके कारण रोमांचित देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति की तथा [उन] शितिकण्ठ (शिव)-से पशुपाशसे मुक्तिका निवेदन करके बार-बार प्रणामकर उन शम्भुके सामने वे खड़े हो गये॥ ५१—५३ १/२॥
ततः सम्प्रेक्ष्य तान् सर्वान् देवदेवो वृषध्वजः॥ ५४तत्पश्चात् उन सबकी ओर देखकर देवदेव, वृषभध्वज, परमेश्वर भगवान् महेश्वर उन देवताओं तथा

८१- विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपशविमोचक लिङ्ग-व्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य

| ३१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| विशोध्य तेषां देवानां पशुत्वं परमेश्वरः।<br>व्रतं पाशुपतं चैव स्वयं देवो महेश्वरः॥ ५५<br>उपदिश्य मुनीनां च सहास्ते चाम्बया भवः।<br>तदाप्रभृति ते देवाः सर्वे पाशुपताः स्मृताः॥ ५६<br>पशूनां च पतिर्यस्मात्तेषां साक्षाद्धि देवताः।<br>तस्मात्पाशुपताः प्रोक्तास्तपेस्तेपुश्च ते पुनः॥ ५७<br>ततो द्वादशवर्षान्ते मुक्तपाशाः सुरोत्तमाः।<br>ययुर्यथागतं सर्वे ब्रह्मणा सह विष्णुना॥ ५८<br>एतद्वः कथितं सर्वं पितामहमुखाच्छ्रुतम्।<br>पुरा सनत्कुमारेण तस्माद् व्यासेन धीमता॥ ५९<br>यः श्रावयेच्छुचिर्विप्राञ्छृणुयाद्वा शुचिर्नरः।<br>स देहभेदमासाद्य पशुपाशैः प्रमुच्यते॥ ६० | मुनियोंके पशुत्वभावका शोधनकर उन्हें पाशुपतव्रतका स्वयं उपदेश करके उमाके साथ बैठ गये। तभीसे वे सब देवता पाशुपत कहे जाने लगे। वे शिव उन पशुओंके साक्षात् पति हैं, अतः देवता पाशुपत कहे गये हैं। इसके बाद उन सबने पुनः तपस्या की। तदनन्तर बारह वर्षके अन्तमें सभी श्रेष्ठ देवता पशुपाशसे मुक्त हो गये और जैसे आये थे, वैसे ही ब्रह्मा तथा विष्णुके साथ वापस लौट गये॥ ५४–५८॥<br><br>[हे मुनियो!] मैंने आप लोगोंसे यह सब कह दिया; पूर्वकालमें इसे सनत्कुमारने ब्रह्माजीके मुखसे तथा बुद्धिमान् व्यासजीने उन [सनत्कुमार]-से सुना था। जो मनुष्य शुद्ध होकर इसे ब्राह्मणोंको सुनाता है अथवा शुद्ध होकर [स्वयं] सुनता है, वह दूसरा शरीर प्राप्त करके पशुपाशोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५९-६०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यं नामाशीतितमोऽध्यायः॥ ८०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्य' नामक अस्सीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८०॥


इक्यासीवाँ अध्याय

विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य

| ऋषय ऊचुः<br>व्रतमेतत्त्वया प्रोक्तं पशुपाशविमोक्षणम्।<br>व्रतं पाशुपतं लैङ्गं पुरा देवैरनुष्ठितम्॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथापूर्वं त्वया श्रुतम्।<br><br>सूत उवाच<br>पुरा सनत्कुमारेण पृष्टः शैलादिरादरात्॥ २<br>नन्दी प्राह वचस्तस्मै प्रवदामि समासतः।<br>देवैर्दैत्यैस्तथा सिद्धैर्गन्धर्वैः सिद्धचारणैः॥ ३<br>मुनिभिश्च महाभागैरनुष्ठितमनुत्तमम्।<br>व्रतं द्वादशलिङ्गाख्यं पशुपाशविमोक्षणम्॥ ४<br>भोगदं योगदं चैव कामदं मुक्तिदं शुभम्।<br>अवियोगकरं पुण्यं भक्तानां भयनाशनम्॥ ५<br>षडङ्गसहितान् वेदान् मथित्वा तेन निर्मितम्।<br>सर्वदानोत्तमं पुण्यमश्वमेधायुताधिकम्॥ ६ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] आपने पशुपाशसे मुक्त करनेवाले इस व्रतको बता दिया; पूर्वकालमें देवताओंने लिङ्गसम्बन्धी पाशुपतव्रतका अनुष्ठान किया था, अतः आपने पहले [इसके विषयमें] जैसा भी श्रवण किया था, उसे हम लोगोंको बताइये॥ १ १/२॥<br><br>सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] पूर्वकालमें सनत्कुमारने [इस सम्बन्धमें] शिलादपुत्र नन्दीसे आदरपूर्वक पूछा था; तब नन्दीने उनसे जो बात कही थी, वही मैं भी आप लोगोंको संक्षेपमें बताता हूँ—देवताओं, दैत्यों, सिद्धों, गन्धर्वों, चारणों तथा महाभाग्यवान् मुनियोंने पशुपाशसे मुक्त करनेवाले इस अत्युत्तम द्वादश लिङ्ग नामक व्रतको किया था। यह भोग (सुख) प्रदान करनेवाला, योग देनेवाला, मनोरथ पूर्ण करनेवाला, मुक्ति देनेवाला, शिवसे सदा अवियोग करानेवाला, पुण्य देनेवाला, भक्तोंके भयका नाश करनेवाला, छः अंगोंसहित वेदोंका मंथन करके उन [शिव]-के द्वारा निर्मित, समस्त |

अध्याय ८१ ] विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान ३९३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वमङ्गलदं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।<br>संसारार्णवमग्नानां जन्तूनामपि मोक्षदम्॥ ७<br>सर्वव्याधिहरं चैव सर्वज्वरविनाशनम्।<br>देवैरनुष्ठितं पूर्वं ब्रह्मणा विष्णुना तथा॥ ८दानोंमें उत्तम, दस हजार अश्वमेध यज्ञोंसे अधिक पुण्य देनेवाला, सभी मंगल प्रदान करनेवाला, पवित्र, समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला, संसार-सागरमें डूबे हुए प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला, सभी रोगोंको नष्ट करनेवाला तथा सभी ज्वरोंका विनाश करनेवाला है; इसे पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओंने किया था॥ २–८॥
कृत्वाकनीयसं लिङ्गं स्नाप्य चन्दनवारिणा।<br>चैत्रमासादि विप्रेन्द्राः शिवलिङ्गव्रतं चरेत्॥ ९<br>कृत्वा हैमं शुभं पद्मं कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>नवरत्नैश्च खचितमष्टपत्रं यथाविधि॥ १०<br>कर्णिकायां न्यसेल्लिङ्गं स्फाटिकं पीठसंयुतम्।<br>तत्र भक्त्या यथान्यायमार्चयेद् बिल्वपत्रकैः॥ ११<br>सितैः सहस्त्रकमलै रक्तैर्नीलोत्पलैरपि।<br>श्वेतार्ककर्णिकारैश्च करवीरैर्बकैरपि॥ १२<br>एतैरन्यैर्यथालाभं गायत्र्या तस्य सुव्रताः।<br>सम्पूज्य चैव गन्धाद्यैर्धूपैर्दीपैश्च मङ्गलैः॥ १३<br>नीराजनाद्यैश्चान्यैश्च लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्।<br>अगरुं दक्षिणे दद्यादघोरेण द्विजोत्तमाः॥ १४<br>पश्चिमे सद्यमन्त्रेण दिव्यां चैव मनःशिलाम्।<br>उत्तरे वामदेवेन चन्दनं वापि दापयेत्॥ १५<br>पुरुषेण मुनिश्रेष्ठा हरितालं च पूर्वतः।<br>सितागरूद्भवं विप्रास्तथा कृष्णागरूद्भवम्॥ १६<br>तथा गुग्गुलुधूपं च सौगन्धिकमनुत्तमम्।<br>सितारं नाम धूपं च दद्यादीशाय भक्तितः॥ १७<br>महाचरुर्निवेद्यः स्यादाढकान्नमथापि वा।<br>एतद्वः कथितं पुण्यं शिवलिङ्गमहाव्रतम्॥ १८हे विप्रेन्द्रो! एक विशाल लिङ्ग बनाकर इसे चन्दनमिश्रित जलसे स्नान कराकर चैत्र महीनेसे प्रारम्भ करके इस शिवलिङ्गव्रतको करना चाहिये। केसरकी कर्णिकासे युक्त, नौ रत्नोंसे जटित तथा आठ दलोंवाले एक सुन्दर सुवर्णमय कमलकी रचना करके उसकी कर्णिकामें विधिके अनुसार वेदीयुक्त स्फटिकके लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। हे सुव्रतो! उसमें भक्तिपूर्वक विधिके अनुसार बिल्वपत्रोंसे, हजार श्वेत-लाल-नीले कमलोंसे, श्वेतमदारके कर्णिकारोंसे, कनैल पुष्पोंसे, कुरबकपुष्पोंसे तथा अन्य उपलब्ध पुष्पोंसे रुद्रगायत्री मन्त्रद्वारा उस लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। हे उत्तम द्विजो! गन्ध, धूप, दीप, नीराजन आदि मंगल उपचारोंसे लिङ्गमूर्ति महेश्वरका पूजन करके अघोर मन्त्रसे दक्षिणभागमें अगरु देना चाहिये, सद्योजात मन्त्रसे पश्चिम भागमें दिव्य मनःशिला और वामदेव मन्त्रसे उत्तर भागमें चन्दन अर्पित करना चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! तत्पुरुष मन्त्रसे पूर्व भागमें हरिताल प्रदान करना चाहिये। हे विप्रो! श्वेत अगरुसे तथा कृष्ण अगरुसे उत्पन्न धूप, सुगन्धित तथा उत्तम गुग्गुलधूप और सितार नामक धूप भक्तिपूर्वक महेश्वरको अर्पित करना चाहिये। तत्पश्चात् महाचरुका नैवेद्यके रूपमें अर्पित करना चाहिये अथवा आढक-परिमाणमें अन्न निवेदित करना चाहिये। [हे विप्रो!] मैंने आप लोगोंको यह पुण्यदायक शिवलिङ्ग महाव्रत बता दिया॥ ९–१८॥
सर्वमासेषु सामान्यं विशेषोऽपि च कीर्त्यते।<br>वैशाखे वज्रलिङ्गं च ज्येष्ठे मारकतं तथा॥ १९<br>आषाढे मौक्तिकं लिङ्गं श्रावणे नीलनिर्मितम्।<br>मासि भाद्रपदे लिङ्गं पद्मरागमयं शुभम्॥ २०<br>आश्विने चैव विप्रेन्द्राः गोमेदकमयं शुभम्।<br>प्रवालेनैव कार्त्तिक्यां तथा वै मार्गशीर्षके॥ २१यह सभी महीनोंमें सामान्य शिवलिङ्गव्रत है; अब मैं विशेषका वर्णन करता हूँ। हे विप्रेन्द्रो! वैशाखमें वज्र (हीरा)-निर्मित लिङ्ग, ज्येष्ठमें मरकतनिर्मित लिङ्ग, आषाढ़में मोतीसे निर्मित लिङ्ग, सावनमें नीलमणिसे निर्मित लिङ्ग, भाद्रपदमासमें पद्मरागसे निर्मित सुन्दर लिङ्ग, आश्विन (क्वार)-में गोमेदसे निर्मित शुभ लिङ्ग, कार्त्तिकमें प्रवाल