श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९६- भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन और नृसिंहके तेजको शमन करनेके लिये भेजना, वीरभद्र तथा नृसिंहका संवाद, भगवान् शिवका शरभावतार धारणकर नृसिंहतेजको शान्त करना एवं नृसिंहद्वारा शिवस्तुति
| ५०२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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छानबेवाँ अध्याय
भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन और नृसिंहके तेजको शमन करनेके लिये भेजना, वीरभद्र तथा नृसिंहका संवाद, भगवान् शिवका शरभावतार धारणकर नृसिंहतेजको शान्त करना एवं नृसिंहद्वारा शिवस्तुति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>कथं देवो महादेवो विश्वसंहारकारकः।<br>शरभाख्यं महाघोरं विकृतं रूपमास्थितः ॥ १<br>किं किं धैर्यं कृतं तेन ब्रूहि सर्वमशेषतः। | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] विश्वका संहार करनेवाले भगवान् महादेवने अत्यन्त भयंकर तथा विकृत शरभनामक रूप कैसे धारण किया और उन्होंने कौन-सा साहसपूर्ण कृत्य किया; यह सब पूर्णरूपसे बताइये ॥ १ १/२ ॥ |
| सूत उवाच<br>एवमभ्यर्थितो देवैर्मतिं चक्रे कृपालयः॥ २<br>यत्तेजस्तु नृसिंहाख्यं संहर्तुं परमेश्वरः।<br>तदर्थं स्मृतवान् रुद्रो वीरभद्रं महाबलम् ॥ ३ | सूतजी बोले— इस प्रकार देवताओंके प्रार्थना करनेपर कृपानिधान शिवने नृसिंहसंज्ञक तेजको नष्ट करनेका निश्चय किया और इसके लिये रुद्रने महाप्रलय करनेवाले अपने भैरवरूप महाबली वीरभद्रका स्मरण किया ॥ २-३ १/२ ॥ |
| आत्मनो भैरवं रूपं महाप्रलयकारकम्।<br>आजगाम पुरा सद्यो गणानामग्रतो हसन् ॥ ४<br>साट्टहासैर्गणवरैरुत्पतद्भिरितस्ततः।<br>नृसिंहरूपैरत्युग्रैः कोटिभिः परिवारितः ॥ ५<br>तावद्भिरभितो वीरैर्नृत्यद्भिश्च मुदान्वितैः।<br>क्रीडद्भिश्च महाधीरैर्ब्रह्माद्यैः कन्दुकैरिव ॥ ६<br>अदृष्टपूर्वैर्न्यैश्च वेष्टितो वीरवन्दितः।<br>कल्पान्तज्वलनज्वालो विलसल्लोचनत्रयः ॥ ७<br>आत्तशस्त्रो जटाजूटे ज्वलद्बालेन्दुमण्डितः।<br>बालेन्दुद्वितयाकारतीक्ष्णदंष्ट्राङ्कुरद्वयः ॥ ८<br>आखण्डलधनुः खण्डसन्निभभ्रूलतायुतः।<br>महाप्रचण्डहुङ्कारबधिरीकृतदिङ्मुखः ॥ ९<br>नीलमेघाञ्जनाकारभीषणश्मश्रुरद्भुतः।<br>वादखण्डमखण्डाभ्यां भ्रामयंस्त्रिशिखं मुहुः ॥ १०<br>वीरभद्रोऽपि भगवान् वीरशक्तिविजृम्भितः।<br>स्वयं विज्ञापयामास किमत्र स्मृतिकारणम् ॥ ११<br>आज्ञापय जगत्स्वामिन् प्रसादः क्रियतां मयि। | तब वे [वीरभद्र] गणोंके आगे होकर हँसते हुए शीघ्र ही वहाँ आये। वे करोड़ों श्रेष्ठ गणोंसे घिरे हुए थे, जो अट्टहास कर रहे थे, इधर-उधर उछल रहे थे, नृसिंहके रूपवाले थे तथा अत्यन्त उग्र थे। वे नृत्य करते हुए तथा महाधीर ब्रह्मा आदिके साथ गेंदकी भाँति खेलते हुए प्रसन्न वीरोंसे घिरे हुए थे। वे वीरवन्द्य [वीरभद्र] कभी न देखे गये अन्य वीरोंसे भी आवृत थे। वे [वीरभद्र] प्रलयाग्निकी ज्वालाके समान थे, वे तीन नेत्रोंसे विभूषित थे, वे शस्त्र धारण किये हुए थे, उनके जटाजूटमें देदीप्यमान बालचन्द्रमा शोभा दे रहा था, वे बालचन्द्रके समान आकारवाले अति शुभ्र तथा तीक्ष्ण दो दाँतोंसे सुशोभित थे, वे इन्द्रधनुषके समान भौंहोंसे युक्त थे, वे अपने महाप्रचण्ड हुंकारसे दिशाओंको वधिर बना दे रहे थे, वे नील मेघ तथा अंजनके समान आकारवाले भयंकर श्मश्रु (दाढ़ी)-से युक्त थे, वे अद्भुत रूपवाले थे और अपनी अपराजित भुजाओंसे विवादका शमन करनेवाले त्रिशूलको बार-बार घुमा रहे थे। इस प्रकारकी वीरताकी शक्तिसे परिपूर्ण भगवान् वीरभद्रने स्वयं निवेदन किया—‘हे जगत्स्वामिन्! यहाँपर मुझको स्मरण करनेका क्या कारण है? आज्ञा प्रदान |
अध्याय ९६ ] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन... नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५०३
| श्लोक (मूल संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कीजिये और मुझपर कृपा कीजिये॥ ४-११ १/२॥ | |
| श्रीभगवानुवाच<br>अकाले भयमुत्पन्नं देवानापि भैरव॥ १२<br>ज्वलितः स नृसिंहाग्निः शमयैनं दुरासदम्।<br>सान्त्वयन् बोधयादौ तं तेन किं नोपशाम्यति॥ १३<br>ततो मत्परमं भावं भैरवं सम्प्रदर्शय।<br>सूक्ष्मं सूक्ष्मेण संहृत्य स्थूलं स्थूलेन तेजसा॥ १४<br>वक्त्रमानय कृत्तिं च वीरभद्र ममाज्ञया। | श्रीभगवान् बोले—हे भैरव! असमयमें देवताओंके समक्ष भय उत्पन्न हो गया है; वह नृसंहरूपी अग्नि प्रज्वलित हो रही है; इस अति भयंकर अग्निको शान्त करो। उसे सान्त्वना देते हुए पहले समझाओ, यदि उससे वह शान्त नहीं होती है, तब मेरे महाभयंकर भैरवरूपको दिखाओ। हे वीरभद्र! मेरी आज्ञासे सूक्ष्मरूपको सूक्ष्म तेजसे तथा स्थूलरूपको स्थूल तेजसे विनष्ट करके उसके मुख तथा उसकी त्वचाको [मेरे पास] ले आओ॥ १२-१४ १/२॥ |
| इत्यादिष्टो गणाध्यक्षः प्रशान्तवपुरास्थितः॥ १५<br>जगाम रंहसा तत्र यत्रास्ते नरकेसरी।<br>ततस्तं बोधयामास वीरभद्रो हरो हरिम्॥ १६<br>उवाच वाक्यमीशानः पितापुत्रमिवौरसम्। | इस प्रकार आज्ञा प्राप्त किये हुए गणेश्वर वीरभद्र शान्तस्वरूप धारण करके वेगपूर्वक वहाँ पहुँच गये, जहाँ नृसिंह विराजमान थे। तदनन्तर भगवान् वीरभद्रने नृसंहरूपधारी उन विष्णुको समझाया और जैसे पिता औरस पुत्रसे कहता है, उसी प्रकार ईशान [वीरभद्र] उनसे यह वचन कहने लगे॥ १५-१६ १/२॥ |
| श्रीवीरभद्र उवाच<br>जगत्सुखाय भगवन्नवतीर्णोऽसि माधव॥ १७<br>स्थित्यर्थेन च युक्तोऽसि परेण परमेष्ठिना।<br>जन्तुचक्रं भगवता रक्षितं मत्स्यरूपिणा॥ १८<br>पुच्छेनैव समाबध्य भ्रमन्नेकार्णवे पुरा।<br>बिभर्षि कूर्मरूपेण वाराहेणोद्धृता मही॥ १९<br>अनेन हरिरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>वामनेन बलिर्बद्धस्त्वया विक्रमता पुनः॥ २० | श्रीवीरभद्र बोले—हे भगवन्! हे माधव! आप तो जगत्के सुखके लिये अवतीर्ण हुए हैं; श्रेष्ठ ब्रह्माने [संसारकी] स्थितिके कार्यमें आपको लगाया है। पूर्वकालमें अपनी पूँछमें [नावको] बाँधकर विशाल सागरमें भ्रमण करते हुए मत्स्यरूपधारी आप भगवान् [विष्णु]-ने जीव-समुदायकी रक्षा की थी। आप कूर्मके रूपसे जगत्को धारण करते हैं और वाराहरूपके द्वारा आपने पृथ्वीका उद्धार किया है। आपने इस सिंहरूपसे हिरण्यकशिपुका वध किया है। आपने वामनरूप धारणकर तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको मापकर बलिको बाँध लिया था॥ १७-२०॥ |
| त्वमेव सर्वभूतानां प्रभवः प्रभुरव्ययः।<br>यदा यदा हि लोकस्य दुःखं किञ्चित्प्रजायते॥ २१<br>तदा तदावतीर्णस्त्वं करिष्यसि निरामयम्।<br>नाधिकस्त्वत्समोऽप्यस्ति हरे शिवपरायण॥ २२<br>त्वया धर्माश्च वेदाश्च शुभे मार्गे प्रतिष्ठिताः।<br>यदर्थमवतारोऽयं निहतः सोऽपि केशव॥ २३ | आप ही सभी प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, सबके स्वामी और अविनाशी हैं। जब-जब संसारपर कोई विपत्ति पड़ी है, तब-तब आपने अवतार लेकर उसे दुःखरहित किया है। हे हरे! हे शिवपरायण! आपसे बढ़कर अन्य कोई भी नहीं है। आपने [समस्त] धर्मों तथा वेदोंको उत्तम मार्गपर प्रतिष्ठित किया है। हे केशव! जिसके लिये आपने यह अवतार लिया है, वह [हिरण्यकशिपु भी] आपके द्वारा मारा जा चुका है। |
| ५०४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| अत्यन्तघोरं भगवन्नरसिंहवपुस्तव।<br>उपसंहर विश्वात्मंस्त्वमेव मम सन्निधौ॥ २४ | अतः हे भगवन्! हे विश्वात्मन्! हे नरसिंह! आप मेरी उपस्थितिमें अपने इस अत्यन्त भयानक रूपको समेट लीजिये॥ २१-२४॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्तो वीरभद्रेण नृसिंहः शान्तया गिरा।<br>ततोऽधिकं महाघोरं कोपं प्रज्वालयद्धरिः॥ २५ | **सूतजी बोले—**वीरभद्रके द्वारा शान्त वाणीमें इस प्रकार कहे जानेपर नृसिंहरूपधारी विष्णुने पहलेसे भी अधिक तथा महाभयानक कोपको प्रज्वलित किया॥ २५॥ | | श्रीनृसिंह उवाच<br>आगतोऽसि यतस्तत्र गच्छ त्वं मा हितं वद।<br>इदानीं संहरिष्यामि जगदेतच्चराचरम्॥ २६<br>संहर्तुर्न हि संहारः स्वतो वा परतोऽपि वा।<br>शासितं मम सर्वत्र शास्ता कोऽपि न विद्यते॥ २७<br>मत्प्रसादेन सकलं समर्यादं प्रवर्त्तते।<br>अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्त्तकनिवर्त्तकः॥ २८ | श्रीनृसिंह बोले—[हे वीरभद्र!] तुम जहाँसे आये हो, वहाँ चले जाओ; हितकी बात मत बोलो। मैं इस समय इस चराचर जगत्का संहार कर डालूँगा। संहारकर्ताका संहार अपनेसे अथवा दूसरेसे भी नहीं हो सकता है। सभी जगह मेरा ही शासन है; अन्य कोई भी शासन करनेवाला नहीं है। मेरी कृपासे सम्पूर्ण जगत् मर्यादायुक होकर क्रियाशील है; मैं ही सभी शक्तियोंका प्रवर्त्तक तथा निवर्त्तक हूँ॥ २६-२८॥ | | यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।<br>तत्तद्विद्धि गणाध्यक्ष मम तेजोविजृम्भितम्॥ २९<br>देवतापरमार्थज्ञा ममैव परमं विदुः।<br>मदंशाः शक्तिसम्पन्ना ब्रह्मांशक्रादयः सुराः॥ ३०<br>मन्नाभिपङ्कजाज्जातः पुरा ब्रह्मा चतुर्मुखः।<br>तल्ललाटसमुत्पन्नो भगवान् वृषभध्वजः॥ ३१ | हे गणाध्यक्ष! जो-जो विभूतिसम्पन्न, सत्त्वमय, श्रीयुक्त तथा ऊर्जासे परिपूर्ण है, उसे मेरे ही तेजसे परिवर्धित जानो। देवताओंके परम अर्थको जाननेवाले मेरे महान् सामर्थ्यको जानते हैं। शक्तिसम्पन्न ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता मेरे ही अंश हैं। पूर्वकालमें चतुर्मुख ब्रह्मा मेरे नाभिकमलसे उत्पन्न हुए थे और उनके ललाटसे भगवान् वृषभध्वज (शिव) उत्पन्न हुए थे॥ २९-३१॥ | | रजसाधिष्ठितः स्रष्टा रुद्रस्तामस उच्यते।<br>अहं नियन्ता सर्वस्य मत्परं नास्ति दैवतम्॥ ३२<br>विश्वाधिकः स्वतन्त्रश्च कर्ता हर्ताखिलेश्वरः।<br>इदं तु मत्परं तेजः कः पुनः श्रोतुमिच्छति॥ ३३<br>अतो मां शरणं प्राप्य गच्छ त्वं विगतज्वरः।<br>अवेहि परमं भावमिदं भूतमहेश्वरः॥ ३४ | ब्रह्मा रजोगुणसे अधिष्ठित हैं। रुद्र तमोगुणसे युक्त कहे जाते हैं। मैं सबका नियन्ता हूँ; मुझसे श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है। मैं सबसे बढ़कर हूँ, स्वतन्त्र हूँ, सबका स्रष्टा हूँ, संहार करनेवाला हूँ तथा सबका स्वामी हूँ। मेरे इस [नृसिंह नामक] परम तेजके विषयमें कौन सुनना चाहता है? अतः मेरी शरण प्राप्त करके तुम संतापरहित होकर [यहाँसे] जाओ; भूतोंके महेश्वर तुम मेरे इस परम भावको समझो॥ ३२-३४॥ | | कालोऽस्म्यहं कालविनाशहेतु-<br>र्लोकान् समाहर्तुमहं प्रवृत्तः।<br>मृत्योर्मृत्युं विद्धि मां वीरभद्र<br>जीवन्त्येते मत्प्रसादेन देवाः॥ ३५ | मैं काल हूँ, मैं कालके भी विनाशका कारण हूँ। मैं लोकोंका संहार करनेमें प्रवृत्त हूँ। हे वीरभद्र! तुम मुझको मृत्युकी भी मृत्यु जानो; ये देवता भी मेरी कृपासे जी रहे हैं॥ ३५॥ | | सूत उवाच<br>साहङ्कारमिदं श्रुत्वा हरेरमितविक्रमः।<br>विहस्योवाच सावज्ञं ततो विस्फुरिताधरः॥ ३६ | **सूतजी बोले—**विष्णुका यह अहंकारपूर्ण वचन सुनकर असीम पराक्रमवाले वीरभद्र स्फुरित ओठोंवाले |
अध्याय ९६] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन... नृसिंहद्वारा शिवस्तुति [५०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रीवीरभद्र उवाच<br><br>किं न जानासि विश्वेशं संहर्तारं पिनाकिनम्।<br>असद्वादो विवादश्च विनाशस्त्वयि केवलः ॥ ३७<br><br>तवान्योन्यावताराणि कानि शेषाणि साम्प्रतम्।<br>कृतानि येन केनापि कथाशेषो भविष्यति ॥ ३८<br><br>दोषं त्वं पश्य एतत्त्वमवस्थामीदृशीं गतः।<br>तेन संहारदक्षेण क्षणात्सङ्क्षयमेष्यसि ॥ ३९ | होकर तिरस्कारपूर्ण भावसे हँसकर नृसिंहसे कहने लगे ॥ ३६ ॥<br><br>श्रीवीरभद्र बोले—क्या आप संहारकर्ता, पिनाकधारी विश्वेश्वर (शिव)-को नहीं जानते हैं? मिथ्या वाद-विवाद आपके लिये केवल विनाशस्वरूप ही है। जिस किसी प्रकारसे आपके द्वारा लिये गये विभिन्न अवतारोंमें कौन शेष रह गये हैं; अब तो केवल आप ही बचे हुए हैं। आप इस दोषको देखिये, जो आप इस दशाको प्राप्त हुए हैं। संहारमें दक्ष उन [शिव]-के द्वारा आप क्षणभरमें विनाशको प्राप्त हो जायेंगे ॥ ३७—३९ ॥ |
| प्रकृतिस्त्वं पुमान् रुद्रस्त्वयि वीर्यं समाहितम्।<br>त्वन्नाभिपङ्कजाज्जातः पञ्चवक्त्रः पितामहः ॥ ४०<br><br>सृष्ट्यर्थेन जगत्पूर्वं शङ्करं नीललोहितम्।<br>ललाटे चिन्तयामास तपस्युग्रे व्यवस्थितः ॥ ४१<br><br>तल्ललाटाद्भूच्छम्भोः सृष्ट्यर्थं तन्न दूषणम्।<br>अंशोऽहं देवदेवस्य महाभैरवरूपिणः ॥ ४२<br><br>त्वत्संहारे नियुक्तोऽस्मि विनयेन बलेन च।<br>एवं रक्षो विदार्यैव त्वं शक्तिकलया युतः ॥ ४३<br><br>अहङ्कारावलेपेन गर्जसि त्वमतन्द्रितः।<br>उपकारो ह्यसाधूनामपकाराय केवलम् ॥ ४४<br><br>यदि सिंह महेशानं स्वपुनर्भूतं मन्यसे।<br>न त्वं स्रष्टा न संहर्ता न स्वतन्त्रो हि कुत्रचित् ॥ ४५ | आप प्रकृति हैं, रुद्र पुरुष हैं; आपमें [सम्पूर्ण] तेज समाहित है। पाँच मुखवाले पितामह (ब्रह्मा) आपके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत हुए हैं। घोर तपस्यामें लीन उन्होंने पूर्वकालमें जगत्की सृष्टिके लिये अपने ललाटमें नीललोहित शंकरका चिन्तन किया। तब सृष्टिके लिये उनके ललाटसे शम्भु आविर्भूत हुए, अतः यह शिवका दूषण नहीं है। महाभैरवरूप देवदेव रुद्रका अंशस्वरूप मैं विनय तथा बलसे आपके संहारके लिये नियुक्त किया गया हूँ। इस प्रकार शक्तिकी कलासे युक्त आप इस राक्षसको विदीर्ण करके अहंकारके वशीभूत होकर निरालस्य हो गर्जन कर रहे हैं। दुष्टोंके लिये किया गया उपकार केवल अपकारके लिये होता है। हे सिंह! यदि आप महेश्वरको अपनेसे बादमें उत्पन्न समझते हैं, तो यह आपका भ्रम है। आप न तो सृष्टिकर्ता हैं, न संहारकर्ता हैं और न तो किसी प्रकार स्वतन्त्र ही हैं; आप कुम्हारके चक्रकी भाँति शिवके द्वारा प्रेरित हैं ॥ ४०—४५ १/२ ॥ |
| कुलालचक्रवच्छक्त्या प्रेरितोऽसि पिनाकिना।<br>अद्यापि तव निक्षिप्तं कपालं कूर्मरूपिणः ॥ ४६<br><br>हरहारलतामध्ये मुग्ध कस्मान्न बुध्यसे।<br>विस्मृतं किं तदंशेन दंष्ट्रोत्पातनपीडितः ॥ ४७<br><br>वाराहविग्रहस्तेऽद्य साक्रोशं तारकारिणा।<br>दग्धोऽसि यस्य शूलाग्रे विष्वक्सेनच्छलाद्द्रवान् ॥ ४८ | कूर्मरूपधारी आपका कपाल आज भी शिवके गलेके हारके मध्य स्थित है; हे मुग्ध! इसे आप क्यों नहीं याद कर रहे हैं? उनके अंशसे उत्पन्न तारकासुरशत्रु स्कन्दके द्वारा आक्रोशपूर्वक आपके वाराहविग्रहसे दाँत उखाड़ लिये जानेसे आपको बहुत कष्ट हुआ था; क्या इसे भी आप भूल गये हैं? विष्वक्सेनरूपसे आप उन रुद्रके त्रिशूलके अग्रभागसे छलपूर्वक जला दिये गये थे ॥ ४६—४८ ॥ |
| ५०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दक्षयज्ञे शिरश्छिन्नं मया ते यज्ञरूपिणः।<br>अद्यापि तव पुत्रस्य ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः ॥ ४९<br><br>छिन्नं तमेनाभिसन्ध्यं तदंशं तस्य तद्बलम्।<br>निर्जितस्त्वं दधीचेन सङ्ग्रामे समरुद्गणः ॥ ५०<br><br>कण्डूयमाने शिरसि कथं तद्विस्मृतं त्वया।<br>चक्रं विक्रमतो यस्य चक्रपाणे तव प्रियम् ॥ ५१<br><br>कुतः प्राप्तं कृतं केन त्वया तदपि विस्मृतम्।<br>ते मया सकला लोका गृहीतास्त्वं पयोनिधौ ॥ ५२<br><br>निद्रापरवशः शेषे स कथं सात्त्विको भवान्।<br>त्वदादिस्तम्बपर्यन्तं रुद्रशक्तिविजृम्भितम् ॥ ५३ | मैंने दक्षके यज्ञमें यज्ञरूपधारी आपके सिरको काट दिया था। आपके पुत्र ब्रह्माका तमोमय कटा हुआ उनका अंशभूत पाँचवाँ सिर आज भी विद्यमान है; क्या आप उन रुद्रके उस बलको नहीं जानते हैं? ऋषि दधीचने सिर खुजलाते हुए आपको मरुद्गणोंसहित संग्राममें पराजित कर दिया था; इसे आप कैसे भूल गये? हे चक्रपाणे! आपका प्रिय चक्र उन्हींके पराक्रमके कारण है; आपने उसे कहाँसे प्राप्त किया, उसे किसने बनाया—यह सब भी आप भूल गये! मैंने आपके सभी लोकोंको छीन लिया था और उस समय आप निद्राके वशीभूत होकर क्षीरसागरमें शयन करते रहे; आप सात्त्विक (पालकमूर्ति) कैसे हो सकते हैं, आप [विष्णु]–से लेकर तृणपर्यन्त सब कुछ रुद्रशक्तिसे समन्वित है॥ ४९–५३॥ |
| शक्तिमानभितस्त्वं च ह्यानलस्त्वं च मोहितः।<br>तत्तेजसोऽपि माहात्म्यं युवां द्रष्टुं न हि क्षमौ ॥ ५४<br><br>स्थूला ये हि प्रपश्यन्ति तद्विष्णोः परमं पदम्।<br>द्यावापृथिव्या इन्द्राग्नियमस्य वरुणस्य च ॥ ५५<br><br>ध्वान्तोदरे शशाङ्कस्य जनित्वा परमेश्वरः।<br>कालोऽसि त्वं महाकालः कालकालो महेश्वरः ॥ ५६<br><br>अतस्त्वमुग्रकलया मृत्योर्मृत्युर्भविष्यसि।<br>स्थिरधन्वाक्षयोऽवीरो वीरो विश्वाधिकः प्रभुः ॥ ५७<br><br>उपहस्ता ज्वरं भीमो मृगपक्षहिरण्मयः।<br>शास्ताशेषस्य जगतो न त्वं नैव चतुर्मुखः ॥ ५८<br><br>इत्थं सर्वं समालोक्य संहरात्मानमात्मना।<br>नो चेदिदानीं क्रोधस्य महाभैरवरूपिणः ॥ ५९<br><br>वज्राशनिरिव स्थाणोस्त्वेवं मृत्युः पतिष्यति। | मोहको प्राप्त आप तथा अग्नि दोनों ही रुद्रकी शक्तिसे सामर्थ्ययुक्त हैं; उनके तेजके प्रभावको देखनेमें आप दोनों (विष्णु, अग्नि) समर्थ नहीं हैं। जो स्थूल दृष्टिवाले हैं, वे ही विष्णुके परम पदको देखते हैं। स्वर्ग-पृथ्वीके वामनरूपसे, इन्द्रके जयन्तरूपसे, अग्निके कार्तिकेय-रूपसे, धर्मराजके नारायणरूपसे, वरुणके भृगुरूपसे और चन्द्रमाके कलंकित उदरमें बुधरूपसे उत्पन्न होकर आप परमेश्वरके रूपमें प्रतिष्ठित हैं। आप काल, महाकाल एवं कालके भी काल महेश्वर हैं; अतः आप शिवके अंशसे कालके भी काल होंगे। वे स्थिर धनुषवाले शिव अनश्वर, सबसे अधिक पराक्रमी, वीर, सर्वश्रेष्ठ तथा सबके स्वामी हैं। वे रोगको नष्ट करनेवाले, भयानक तथा सुवर्णमय मृगाकार पक्षी (शरभरूप) हैं। सम्पूर्ण जगत्के शासक न तो आप हैं और न चतुर्मुख ब्रह्मा। इस प्रकार सब कुछ सोचकर अपने रूपको पूर्णरूपसे समेट लीजिये, अन्यथा महाभैरवरूपी रुद्रके क्रोधका शरभरूपी वज्र आपकी मृत्यु बनकर उसी तरह गिरेगा, जैसे पर्वतपर वज्र गिरता है॥ ५४–५९ १/२ ॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तो वीरभद्रेण नृसिंहः क्रोधविह्वलः ॥ ६०<br><br>ननाद तनुवेगेन तं गृहीतुं प्रचक्रमे।<br>अत्रान्तरे महाघोरं विपक्षभयकारणम् ॥ ६१ | **सूतजी बोले—**वीरभद्रके इस प्रकार कहनेपर नृसिंह क्रोधसे व्याकुल होकर गरजने लगे और तीव्र वेगसे |
अध्याय ९६] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन... नृसिंहद्वारा शिवस्तुति | ५०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गगनव्यापि दुर्धर्षंशैवतेजः समुद्भवम्।<br>वीरभद्रस्य तद्रूपं तत्क्षणादेव दृश्यते॥ ६२<br><br>न तद्धिरण्मयं सौम्यं न सौरं नाग्निसम्भवम्।<br>न तडिच्चन्द्रसदृशमनौपम्यं महेश्वरम्॥ ६३<br><br>तदा तेजांसि सर्वाणि तस्मिन् लीनानि शाङ्करे।<br>ततोऽव्यक्तो महातेजा व्यक्ते सम्भवतस्ततः॥ ६४ | उसे पकड़नेका प्रयास करने लगे। इसी बीच विपक्षमें भय उत्पन्न करनेवाला, महाभयंकर, गगनव्यापी तथा दुर्धर्ष शिव-तेज उत्पन्न हुआ। उस क्षण वीरभद्रका जो रूप दिखायी पड़ा; वह न सुवर्णमय था, न चन्द्रमासे उत्पन्न था, न सूर्यसे उत्पन्न था, न अग्निसे उत्पन्न था, न विद्युत्के समान था और न चन्द्रके तुल्य था। वह शिवसे सम्बन्धित अनुपम रूप था। उस समय सभी तेज उस शिव-रूपमें विलीन हो गये; इससे वह महातेज अव्यक्तरूपमें स्थित हो गया और शरभ-नृसिंह—ये दो व्यक्तरूप प्रकट हुए॥ ६०—६४॥ |
| रुद्रसाधारणं चैव चिह्नितं विकृताकृति।<br>ततः संहाररूपेण सुव्यक्तः परमेश्वरः॥ ६५<br><br>पश्यतां सर्वदेवानां जयशब्दादिमङ्गलैः।<br>सहस्रबाहुर्जटिलश्चन्द्रार्धकृतशेखरः ॥ ६६<br><br>स मृगार्धशरीरेण पक्षाभ्यां चञ्चुना द्विजाः।<br>अतितीक्ष्णमहादंष्ट्रो वज्रतुल्यनखायुधः॥ ६७<br><br>कण्ठे कालो महाबाहुश्चतुष्पादग्निसम्भवः।<br>युगान्तोद्यतजीमूतभीमगम्भीरनिःस्वनः ॥ ६८<br><br>समं कुपितवृत्ताग्निव्यावृत्तनयनत्रयः।<br>स्पष्टदंष्ट्रोऽधरोष्ठश्च हुङ्कारेण युतो हरः॥ ६९ | उस समय भयंकर आकृतिवाला तथा रुद्रके विशिष्ट चिह्नोंसे युक्त रूप प्रकट हुआ। तदनन्तर वे परमेश्वर महाप्रलयकालिक रूपसे व्यक्त (प्रकट) हो गये। हे द्विजो! सभी देवताओंके देखते-देखते जयशब्द आदि मंगलोंसे युक्त होकर वे शिव हजार भुजाओंवाले, जटाधारी, सिरपर अर्धचन्द्र धारण किये हुए, पशुके आधा भाग शरीरसे, दो पंखोंसे तथा चोंचसे युक्त हो गये। उनके दाँत विशाल तथा अति तीक्ष्ण थे। वे वज्रतुल्य नखरूपी अस्त्रसे सुशोभित हो रहे थे। उनका कण्ठ कृष्णवर्णका था। वे चार भुजाओंवाले तथा चार पैरोंवाले और अग्निसे उत्पन्न प्रतीत हो रहे थे। वे युगके अन्तमें उत्पन्न मेघके समान भयंकर तथा गम्भीर ध्वनि कर रहे थे। उनके तीनों नेत्र क्रोधसे फैले हुए विशाल आगके गोले हो गये थे। उनके दाँत, अधर तथा ओष्ठ स्पष्ट दिखायी पड़ रहे थे। वे हर हुंकारसे युक्त थे॥ ६५—६९॥ |
| हरिस्तद्दर्शनादेव विनष्टबलविक्रमः।<br>बिभ्रदौर्म्यं सहस्त्रांशोरधः खद्योतविभ्रमम्॥ ७०<br><br>अथ विभ्रम्य पक्षाभ्यां नाभिपादेऽभ्युदारयन्।<br>पादावाबध्य पुच्छेन बाहुभ्यां बाहुमण्डलम्॥ ७१<br><br>भिदन्नुरसि बाहुभ्यां निजग्राह हरो हरिम्।<br>ततो जगाम गगनं देवैः सह महर्षिभिः॥ ७२<br><br>सहसैव भयाद्विष्णुं विहगश्च यथोरगम्।<br>उत्क्षिप्योत्क्षिप्य सङ्गृह्य निपात्य च निपात्य च॥ ७३<br><br>उड्डीयोड्डीय भगवान् पक्षाघातविमोहितम्।<br>हरिं हरं तं वृषभं विश्वेशानं तमीश्वरम्॥ ७४ | उन्हें देखते ही विष्णुका बल तथा पराक्रम नष्ट हो गया। वे सूर्यके सम्मुख खद्योत (जुगनू)-के समान प्रकाश धारण किये हुए प्रतीत होने लगे। इसके बाद हररूप शरभने अपने पंखोंसे उन्हें जकड़कर नाभि तथा पैरको विदीर्ण करते हुए अपनी पूँछसे पैरोंको बाँधकर भुजाओंसे उनके भुजाओंको कसकर उनके वक्षपर प्रहार करते हुए उन हरिको अपनी भुजाओंमें जकड़ लिया। तदनन्तर वे भगवान् [शरभ] जैसे गरुड़ सर्पपर आक्रमण करता है, वैसे ही उड़-उड़कर उन्हें ऊपरकी ओर उछालकर बार- |
| ५०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनुयान्ति सुराः सर्वे नमोवाक्येन तुष्टुवुः।<br>नीयमानः परवशो दीनवक्त्रः कृताञ्जलिः॥ ७५<br>तुष्टाव परमेशानं हरिस्तं ललिताक्षरैः।<br><br>श्रीनृसिंह उवाच<br><br>नमो रुद्राय शर्वाय महाग्रासाय विष्णवे॥ ७६<br>नम उग्राय भीमाय नमः क्रोधाय मन्यवे।<br>नमो भवाय शर्वाय शङ्कराय शिवाय ते॥ ७७<br>कालकालाय कालाय महाकालाय मृत्यवे।<br>वीराय वीरभद्राय क्षयद्वीराय शूलिने॥ ७८<br>महादेवाय महते पशूनां पतये नमः।<br>एकाय नीलकण्ठाय श्रीकण्ठाय पिनाकिने॥ ७९<br>नमोऽनन्ताय सूक्ष्माय नमस्ते मृत्युमन्यवे।<br>पराय परमेशाय परात्परतराय ते॥ ८०<br>परात्पराय विश्वाय नमस्ते विश्वमूर्तये।<br>नमो विष्णुकलत्राय विष्णुक्षेत्राय भानवे॥ ८१<br>कैवर्ताय किराताय महाव्याधाय शाश्वते।<br>भैरवाय शरण्याय महाभैरवरूपिणे॥ ८२<br>नमो नृसिंहसंहर्त्रे कामकालपुरारये।<br>महापाशौघसंहर्त्रे विष्णुमायान्तकारिणे॥ ८३<br>त्र्यम्बकाय त्र्यक्षराय शिपिविष्टाय मीढुषे।<br>मृत्युञ्जयाय शर्वाय सर्वज्ञाय मखारये॥ ८४<br>मखेशाय वरेण्याय नमस्ते वह्निरूपिणे।<br>महाघ्राणाय जिह्वाय प्राणापानप्रवर्तिने॥ ८५<br>त्रिगुणाय त्रिशूलाय गुणातीताय योगिने।<br>संसाराय प्रवाहाय महायन्त्रप्रवर्तिने॥ ८६<br>नमश्चन्द्राग्निसूर्याय मुक्तिवैचित्र्यहेतवे।<br>वरदायावताराय सर्वकारणहेतवे॥ ८७<br>कपालिने करालाय पतये पुण्यकीर्तये।<br>अमोघायाग्निनेत्राय लकुलीशाय शम्भवे॥ ८८<br>भिषक्तमाय मुण्डाय दण्डिने योगरूपिणे।<br>मेघवाहाय देवाय पार्वतीपतये नमः॥ ८९ | बार उन्हें गिराकर पंखोंके आघातसे मूर्छित तथा डरे हुए विष्णुको लेकर देवताओं तथा महर्षियोंके साथ आकाशमण्डलमें चले गये॥ ७०—७३ १/२॥<br><br>सभी देवता विष्णु तथा उन श्रेष्ठ [शरभरूप] विश्वेश ईश्वरके पीछे-पीछे चलने लगे और 'नमः' वाक्यसे उनकी स्तुति करने लगे। परवश होकर ले जाये जाते हुए विष्णु दीनमुख होकर हाथ जोड़कर ललित अक्षरोंद्वारा उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ७४-७५ १/२॥<br><br>**श्रीनृसिंह बोले—**शर्व, महाग्रास (जगत् जिनका ग्रास है) तथा विष्णु (सर्वव्यापी) एवं रुद्रको नमस्कार है। उग्र तथा भीमको नमस्कार है। क्रोध तथा मन्युको नमस्कार है। आप भव, शर्व, शंकर तथा शिवको नमस्कार है। कालके भी काल, कालरूप, महाकाल, मृत्युरूप, वीर, वीरभद्र, पापके विनाशक, शूलधारी, महादेव, महान् तथा पशुपतिको नमस्कार है। एक, नीलकण्ठ, श्रीकण्ठ, पिनाकी तथा अनन्तको नमस्कार है। आप सूक्ष्मको नमस्कार है। आप मृत्युमन्यु (मृत्यु ही जिसका क्रोध है), पर, परमेश तथा परात्परतरको नमस्कार है। आप परात्पर, विश्व तथा विश्वमूर्तिको नमस्कार है। विष्णुकलत्र, विष्णुक्षेत्र तथा भानुको नमस्कार है। कैवर्त (संसाररूपी सागरसे तारनेवाले), किरात, महाव्याध, शाश्वत, भैरव, शरण्य (शरणदाता) तथा महाभैरवरूपको नमस्कार है। नृसिंहसंहर्ता, कामकालपुरारि (कामदेव-यम-त्रिपुर)-के शत्रु, महापाशौघ-संहर्ता, विष्णुमायान्तकारी, त्र्यम्बक (तीन नेत्रोंवाले), त्र्यक्षर (भूत, भविष्य, वर्तमानमें नाशरहित), शिपिविष्ट, मीढुष, मृत्युंजय, शर्व, सर्वज्ञ, मखारि, मखेश, वरेण्य, अग्निरूप, महाघ्राण, (महानासिकावाले), जिह्व (बड़ी जिह्वावाले) तथा प्राणापानप्रवर्ती (प्राण-अपान वायुको गति देनेवाले)-को नमस्कार है। त्रिगुण-त्रिशूल, गुणातीत, योगी, संसार, प्रवाह, महायन्त्रप्रवर्तीको नमस्कार है। चन्द्र-अग्नि-सूर्य, मुक्ति-विचित्र्यहेतु, वरद, अवतार (अभिमानियोंका पतन करनेवाले), सर्वकारणहेतु, कपाली, कराल, पति, पुण्यकीर्ति, अमोघ, अग्निनेत्र, लकुलीश, शम्भु (कल्याण करनेवाले), भिषक्तम, |
अध्याय १६] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन···नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अव्यक्ताय विशोकाय स्थिराय स्थिरधन्विने।<br>स्थाणवे कृत्तिवासाय नमः पञ्चार्थहेतवे॥ ९०<br><br>वरदायैकपादाय नमश्चन्द्रार्धमौलिने।<br>नमस्तेऽध्वरराजाय वयसां पतये नमः॥ ९१<br><br>योगीश्वराय नित्याय सत्याय परमेष्ठिने।<br>सर्वात्मने नमस्तुभ्यं नमः सर्वेश्वराय ते॥ ९२<br><br>एकद्वित्रिचतुःपञ्चकृत्वस्तेऽस्तु नमो नमः।<br>दशकृत्वस्तु साहस्त्रकृत्वस्ते च नमो नमः॥ ९३<br><br>नमोऽपरिमितं कृत्वानन्तकृत्वो नमो नमः।<br>नमो नमो नमो भूयः पुनर्भूयो नमो नमः॥ ९४ | मुण्ड, दण्डी, योगरूपी, मेघवाह, देव तथा पार्वतीपतिको नमस्कार है। अव्यक्त, विशोक (शोकरहित), स्थिर, स्थिरधन्वी, स्थाणु (जगत्के आधाररूप), कृत्तिवास तथा पंचार्थहेतुको नमस्कार है। वर तथा एकपाद (एकमात्र ज्ञानियोंके द्वारा प्राप्य)-को नमस्कार है। चन्द्रार्धमौलिको नमस्कार है। अध्वरराज तथा वयसाम्पति (शरभरूप)-को नमस्कार है। आप योगीश्वर, नित्य, सत्य, परमेष्ठी तथा सर्वात्माको नमस्कार है। आप सर्वेश्वरको नमस्कार है। आपको एक, दो, तीन, चार, पाँच बार नमस्कार है। आपको दस बार तथा हजार बार नमस्कार है। आपको अपरिमित बार, अनन्त बार नमस्कार है। आपको बार-बार नमस्कार है; पुनः बार-बार नमस्कार है॥ ७६—९४॥ |
| सूत उवाच<br>नाम्नामष्टशतेनैवं स्तुत्वामृतमयेन तु।<br>पुनस्तु प्रार्थयामास नृसिंहः शरभेश्वरम्॥ ९५<br><br>यदा यदा ममाज्ञानमत्यहङ्कारदूषितम्।<br>तदा तदापनेतव्यं त्वयैव परमेश्वर॥ ९६<br><br>एवं विज्ञापयन् प्रीतः शङ्करं नरकेसरी।<br>नन्वशक्तो भवान् विष्णो जीवितान्तं पराजितः॥ ९७<br><br>तद्वक्त्रशेषमात्रान्तं कृत्वा सर्वस्य विग्रहम्।<br>शुक्तिशित्यं तदा मङ्गं वीरभद्रः क्षणात्ततः॥ ९८ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इस प्रकार नृसिंह [विष्णु]-ने एक सौ आठ अमृतमय नामोंसे शरभरूप ईश्वर (शिव)-की स्तुति करके पुनः उनसे प्रार्थना की—हे परमेश्वर! जब-जब अति अहंकारसे दूषित अज्ञान मुझमें उत्पन्न हो, तब-तब आप उसे दूर करें। इस प्रकार शंकरसे प्रार्थना करते हुए वे नृसिंह प्रसन्न हो गये; तब वीरभद्रने कहा—'हे विष्णो! आप वास्तवमें अशक्त हैं और जीवनके अन्तमें पराजित हुए हैं।' इसके बाद वीरभद्रने क्षणभरमें ही [नृसिंहरूपधारी] विष्णुके विग्रहको बचे हुए मुखवाला करके शेष विग्रहसे त्वचा खींचकर उसे मात्र हड्डियोंसे युक्त कर दिया और इस प्रकार वह विग्रह अति श्वेत वर्णवाला हो गया॥ ९५—९८॥ |
| देवा ऊचुः<br>अथ ब्रह्मादयः सर्वे वीरभद्र त्वया दृशा।<br>जीविताः स्मो वयं देवाः पर्जन्येनेव पादपाः॥ ९९ | **देवता बोले—**हे वीरभद्र! ब्रह्मा आदि हम सभी देवता आपकी दृष्टिसे उसी प्रकार जीवित हैं, जैसे वृक्ष मेघसे जीवन प्राप्त करते हैं॥ ९९॥ |
| यस्य भीषा दहत्यग्निरुदेति च रविः स्वयम्।<br>वातो वाति च सोऽसि त्वं मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ १०० | जिसके भयसे अग्नि जलती है, साक्षात् सूर्य उगता है, वायु बहती है और पाँचवीं* मृत्यु दौड़ती है; वह आप ही हैं॥ १००॥ |
| यदव्यक्तं परं व्योम कलातीतं सदाशिवम्।<br>भगवंस्त्वामेव भवं वदन्ति ब्रह्मवादिनः॥ १०१ | हे भगवन्! ब्रह्मवादी लोग आपको ही अनिर्वाच्य, चिदाकाश, कलातीत, सदाशिव तथा भव कहते हैं॥ १०१॥ |
* कठोपनिषद् २।३।३, तैत्तिरीयोपनिषद् २।८।१
| ५१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| के वयमेव धातुर्ये वेदने परमेश्वरः।<br>न विद्धि परमं धाम रूपलावण्यवर्णने ॥ १०२ | आप जगदाधारके विषयमें जाननेमें हम असमर्थ हैं। आप हमारे परमेश्वर हैं। आपके रूपलावण्यवर्णनका अन्त नहीं है—ऐसा जानिये ॥ १०२ ॥ | | उपसर्गेषु सर्वेषु त्रायस्वास्मान् गणाधिप।<br>एकादशात्मन् भगवान् वर्तते रूपवान् हरः ॥ १०३ | हे गणाधिप! सभी विपत्तियोंमें हमलोगोंकी रक्षा कीजिये। हे एकादशरुद्ररूप! आप भगवान् हर विशिष्ट विग्रहवाले हैं ॥ १०३ ॥ | | ईदृशान् तेऽवताराणि दृष्ट्वा शिव बहूंस्तमः।<br>कदाचित्सन्दिहेनास्मांस्त्वच्चिन्तास्तमया तथा ॥ १०४<br><br>गुञ्जागिरिवरतटामितरूपाणि सर्वशः।<br>अभ्यसंहर गम्यं ते न नीतव्यं परापरा ॥ १०५<br><br>द्वे तनू तव रुद्रस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः।<br>घोराप्यन्या शिवाप्यन्या ते प्रत्येकमनेकधा ॥ १०६<br><br>इहास्मान् पाहि भगवन्नित्याहतमहाबलः।<br>भवता हि जगत्सर्वं व्याप्तं स्वेनैव तेजसा ॥ १०७ | हे शिव! आपके इस प्रकारके अनेक अवतारोंको देखकर हमारा अज्ञान हममें कदाचित् सन्देह न उत्पन्न करे तथा आपका ध्यान नष्ट न हो। जैसे गुंजाके महान् पर्वतके प्रान्तभागसे गुंजाओंकी अमित संख्या होती है, वैसे ही आपके अनन्त रूप हैं, जिन्हें आप चारों ओरसे उपसंहृत कर लीजिये। यह संसार आपके प्रवेशयोग्य हो, इसका संहार मत कीजिये। वेदवेत्ता ब्राह्मण कहते हैं कि आप रुद्रके पर-अपर दो शरीर हैं—एक घोर तथा दूसरा शिव (शान्त); उनमें प्रत्येकके अनेक प्रकार हैं। हे भगवन्! कभी भी हत न होनेवाले महान् बलसे युक्त आप यहाँपर हम लोगोंकी रक्षा कीजिये। आपने अपने ही तेजसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ १०४-१०७ ॥ | | ब्रह्मविष्ण्वीन्द्रचन्द्रादि वयं च प्रमुखाः सुराः।<br>सुरासुराः सम्प्रसूतास्त्वत्तः सर्वे महेश्वर ॥ १०८ | हे महेश्वर! ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र-चन्द्र आदि हम प्रमुख देवतागण तथा अन्य देवता और असुर—सभी लोग आपसे उत्पन्न हुए हैं ॥ १०८ ॥ | | ब्रह्मा च इन्द्रो विष्णुश्च यमाद्या न सुरासुरान्।<br>ततो निगृह्य च हरिं सिंह इत्युपचेतसम् ॥ १०९<br><br>यतो बिभर्षि सकलं विभज्य तनुमष्टधा।<br>अतोऽस्मान् पाहि भगवन्सुरान् दानैरभीप्सितैः ॥ ११० | ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, यम आदि देवता, असुर तथा भ्रान्त अन्तःकरणवाले नृसिंह हरिका निग्रह करके अपने शरीरको आठ प्रकारसे [सूर्य आदि रूपमें] विभाजित करके आप सभीका धारण-पोषण करते हैं; अतः हे भगवन्! अभीष्ट दानोंके द्वारा हम देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ १०९-११० ॥ | | उवाच तान् सुरान् देवो महर्षींश्च पुरातनान्।<br>यथा जले जलं क्षिप्तं क्षीरं क्षीरे घृतं घृते ॥ १११ | तत्पश्चात् देव [वीरभद्र]-ने उन देवताओं तथा प्राचीन ऋषियोंसे कहा—जैसे जलमें जल, दूधमें दूध तथा घृतमें घृत डाले जानेपर एक हो जाता है; वैसे ही | | एक एव तदा विष्णुः शिवलीनो न चान्यथा।<br>एष एव नृसिंहात्मा सदर्पश्च महाबलः ॥ ११२ | विष्णु शिवमें लीन हैं; इसमें सन्देह नहीं है। ये गर्वयुक्त तथा महाबली नृसिंह जगत्का संहार करनेवाले रूपसे प्रकट हुए हैं। मेरी भक्तिकी सिद्धिकी इच्छा रखनेवालोंको | | जगत्संहारकारेण प्रवृत्तो नरकेसरी।<br>याजनीयो नमस्तस्मै मद्भक्तिसिद्धिकाङ्क्षिभिः ॥ ११३ | नृसिंहकी पूजा करनी चाहिये; उन [नृसंहरूपधारी |
अध्याय ९६] भगवान् महेश्वरद्वारा वीरभद्रका आवाहन... नृसिंहद्वारा शिवस्तुति ५११
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| विष्णु]-को नमस्कार है॥१११-११३॥ | |
| एतावदुक्त्वा भगवान् वीरभद्रो महाबलः।<br>अपश्यन् सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत॥ ११४<br><br>नृसिंहकृत्तिवसनस्तदाप्रभृति शङ्करः।<br>वक्त्रं तन्मुण्डमालायां नायकत्वेन कल्पितम्॥ ११५ | इतना कहकर महाबली भगवान् वीरभद्र सभी देवताओंके देखते-देखते वहींपर अन्तर्धान हो गये। उसी समयसे शंकरजी नृसिंहके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करने लगे और [नृसिंहका] मुण्ड उनकी मुण्डमालामें मणिके रूपमें शोभा पाने लगा॥ ११४-११५॥ |
| ततो देवा निरातङ्काः कीर्तयन्तः कथामिमाम्।<br>विस्मयोत्फुल्लनयना जग्मुः सर्वे यथागतम्॥ ११६ | तदनन्तर विस्मयसे प्रसन्न नेत्रवाले सभी देवतागण भयरहित होकर इस कथाको कहते हुए जैसे आये थे, वैसे ही वापस चले गये॥ ११६॥ |
| य इदं परमाख्यानं पुण्यं वेदैः समन्वितम्।<br>पठित्वा शृणुते चैव सर्वदुःखविनाशनम्॥ ११७<br><br>धन्यं यशस्यमायुष्यमारोग्यं पुष्टिवर्धनम्।<br>सर्वविघ्नप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनम्॥ ११८<br><br>अपमृत्युप्रशमनं महाशान्तिकरं शुभम्।<br>अरिचक्रप्रशमनं सर्वाधिप्रविनाशनम्॥ ११९<br><br>ततो दुःस्वप्नशमनं सर्वभूतनिवारणम्।<br>विषग्रहक्षयकरं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्॥ १२०<br><br>योगसिद्धिप्रदं सम्यक् शिवज्ञानप्रकाशकम्।<br>शेषलोकस्य सोपानं वाञ्छितार्थैकसाधनम्॥ १२१<br><br>विष्णुमायानिरसनं देवतापरमार्थदम्।<br>वाञ्छासिद्धिप्रदं चैव ऋद्धिप्रज्ञादिसाधनम्॥ १२२ | जो [मनुष्य] इस पुण्यप्रद तथा वेदमय श्रेष्ठ आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है, उसके सभी दुःखोंका नाश हो जाता है। यह [आख्यान] धन्य बनानेवाला, यश देनेवाला, आयु प्रदान करनेवाला, रोगरहित करनेवाला, पुष्टिकी वृद्धि करनेवाला, सभी विघ्नोंको शान्त करनेवाला, सभी व्याधियोंको नष्ट करनेवाला, अकाल मृत्युका शमन करनेवाला, परमशान्ति प्रदान करनेवाला, मंगलकारक, शत्रु-समूहका दमन करनेवाला, सभी मानसिक रोगोंका विनाश करनेवाला, बुरे स्वप्नोंका निवारण करनेवाला, सभी भूत-प्रेतको दूर करनेवाला, दुष्ट ग्रहोंका क्षय करनेवाला, पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला, योग-सिद्धि प्रदान करनेवाला, भली-भाँति शिवज्ञानको प्रकाशित करनेवाला, शेषलोकका सोपानस्वरूप, वांछित फलोंको सिद्ध करनेवाला, विष्णुमायाको दूर करनेवाला, देवताओंके परमार्थको देनेवाला, वांछाकी सिद्धि प्रदान करनेवाला और ऋद्धि, प्रज्ञा आदि देनेवाला है॥ ११७-१२२॥ |
| इदं तु शरभाकारं परं रूपं पिनाकिनः।<br>प्रकाशितव्यं भक्तेषु चिरेषूद्यमितेषु च॥ १२३<br><br>तैरैव पठितव्यं च श्रोतव्यं च शिवात्मभिः।<br>शिवोत्सवेषु सर्वेषु चतुर्दश्यष्टमीषु च॥ १२४<br><br>पठेत्प्रतिष्ठाकालेषु शिवसन्निधिकारणम्।<br>चोरव्याघ्रादिसिंहान्तकृतो राजभयेषु च॥ १२५<br><br>अत्रान्योत्पातभूकम्पदावाग्निपांसुवृष्टिषु ।<br>उल्कापाते महावाते विना वृष्ट्यातिवृष्टिषु॥ १२६ | पिनाकधारी [शिव]-के इस शरभकी आकृतिवाले श्रेष्ठ रूपको स्थिर प्रज्ञावाले उत्सुक भक्तोंमें प्रकाशित करना चाहिये और उन्हीं शिवसमर्पित मनवाले भक्तोंके द्वारा शिवके सभी उत्सवोंमें और अष्टमी तथा चतुर्दशीके दिन इसका पाठ तथा श्रवण किया जाना चाहिये। शिव-प्रतिष्ठाके अवसरोंपर शिवकी सन्निधि प्राप्त करनेवाले इस स्तोत्रको पढ़ना चाहिये। अतः चोर-बाघ-सर्प-सिंह आदिसे भय होनेपर, राजासे भय उत्पन्न होनेपर, इस लोकमें अन्य उत्पात-भूकम्प-दावाग्नि, धूलवृष्टि (आँधी) |
९७- जलन्धर-वधकी कथा
| ५१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| अतस्तत्र पठेद्द्विज्ञाच्छिवभक्तो दृढव्रतः ।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि स्तवं सर्वमनुत्तमम् ॥ १२७<br>स रुद्रत्वं समासाद्य रुद्रस्यानुचरो भवेत् ॥ १२८ | होनेपर, उल्कापात होनेपर, तेज हवा चलनेपर, अनावृष्टि तथा अतिवृष्टि होनेपर दृढ़ व्रतवाले विद्वान् शिवभक्तको इस [शरभचरित]-को पढ़ना चाहिये। जो इस सर्वोत्तम स्तोत्रको पढ़ता अथवा सुनता है, वह रुद्रत्व प्राप्त करके रुद्रका अनुचर हो जाता है॥ १२३—१२८ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शरभप्रादुर्भावो नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शरभप्रादुर्भाव' नामक छानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९६ ॥
सत्तानबेवाँ अध्याय
जलन्धर-वधकी कथा
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| जलन्धरं जटामौलिः पुरा जम्भारिविक्रमम् ।<br>कथं जघान भगवान् भग्ननेत्रहरो हरः ॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं रोमहर्षण सुव्रत । | हे रोमहर्षण ! हे सुव्रत ! सिरपर जटाधारण करनेवाले तथा भगके नेत्रोंका हरण करनेवाले भगवान् शिवने इन्द्रके समान पराक्रमी जलन्धरका वध कैसे किया; हम लोगोंको यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १ १/२ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| जलन्धर इति ख्यातो जलमण्डलसम्भवः ॥ २<br>आसीद्दन्तकसङ्काशस्तपसा लब्धविक्रमः ।<br>तेन देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः ॥ ३<br>निर्जिताः समरे सर्वे ब्रह्मा च भगवानजः ।<br>जित्वाैव देवसङ्घातं ब्रह्माणं वै जलन्धरः ॥ ४ | [हे ऋषियो !] जलमण्डलसे उत्पन्न जलन्धर नामसे प्रसिद्ध यमराजतुल्य एक असुर था; वह अपनी तपस्यासे बड़ा पराक्रमी हो गया था। उसने युद्धमें गन्धर्व, यक्ष, उरग तथा राक्षसोंसहित सभी देवताओंको और अजन्मा भगवान् ब्रह्माको भी जीत लिया था ॥ २-३ १/२ ॥ |
| जगाम देवदेवेशं विष्णुं विश्वहरं गुरुम् ।<br>तयोः समभवद्युद्धं दिवारात्रमविश्रमम् ॥ ५<br>जलन्धरेशयोस्तेन निर्जितो मधुसूदनः ।<br>जलन्धरोऽपि तं जित्वा देवदेवं जनार्दनम् ॥ ६ | देवसमुदाय तथा ब्रह्माको जीत करके वह जलन्धर विश्वविनाशक देवदेवेश्वर गुरु विष्णुके यहाँ पहुँचा। उन दोनोंमें दिन-रात निरन्तर युद्ध होता रहा और उसने मधुसूदन (विष्णु)-को भी पराजित कर दिया ॥ ४-५ १/२ ॥ |
| प्रोवाचेदं दितेः पुत्रान् न्यायधीर्जेतुमीश्वरम् ।<br>सर्वे जिता मया युद्धे शङ्करो ह्यजितो रणे ॥ ७<br>तं जित्वा सर्वमीशानं गणपैर्नन्दिना क्षणात् ।<br>अहमेव भवत्वं च ब्रह्मत्वं वैष्णवं तथा ॥ ८<br>वासवत्वं च युष्माकं दास्ये दानवपुङ्गवाः ।<br>जलन्धरवचः श्रुत्वा सर्वे ते दानवाधमाः ॥ ९ | उन देवदेव जनार्दनको भी जीतकर न्यायबुद्धिवाले जलन्धरने ईश्वर (शिव)-को जीतनेके लिये दितिके पुत्रोंसे कहा—'मैंने युद्धमें सबको जीत लिया है, केवल शंकर ही अजित रह गये हैं। हे श्रेष्ठ दानवो! गणेश्वरों तथा नन्दीसहित उन सर्व ईशानको क्षणभरमें जीतकर मैं तुम लोगोंको शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रका पद प्रदान कर दूँगा' ॥ ६-८ १/२ ॥ |
| जगर्जुरुच्चैः पापिष्ठा मृत्युदर्शनतत्पराः ।<br>दैत्यैरैतैस्तथान्यैश्च रथनागतुरङ्गमैः ॥ १० | तब जलन्धरका वचन सुनकर वे सभी अधम, पापी तथा मृत्युके दर्शनमें तत्पर दानव उच्च स्वरमें |
| अध्याय ९७ ] | जलन्धर-वधकी कथा | ५१३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनद्धैः सह सन्नह्य शर्वं प्रति ययौ बली।<br>भवोऽपि दृष्ट्वा दैत्येन्द्रं मेरुकूटमिव स्थितम्॥ ११ | गरजने लगे। इसके बाद वह बलशाली जलन्धर रथ, हाथी तथा घोड़ोंपर सवार शस्त्रयुक्त इन दैत्यों तथा अन्य [सैनिकों]-के साथ सावधान होकर शिवजीकी ओर चल पड़ा॥ ९-१०१/२॥ |
| अवध्यत्वमपि श्रुत्वा तथान्यैर्भगनेत्रहा।<br>ब्रह्मणो वचनं रक्षन् रक्षको जगतां प्रभुः॥ १२<br><br>साम्बः सनन्दी सगणः प्रोवाच प्रहसन्निव।<br>किं कृत्यमसुरेशान युद्धेनानेन साम्प्रतम्॥ १३ | तब मेरुके शिखरके समान स्थित उस दैत्यराजको देखकर तथा उसके अवध्यत्वको दूसरोंसे सुनकर भगके नेत्रका हरण करनेवाले तथा लोकोंकी रक्षा करनेवाले प्रभु शिवने, जो पार्वती, नन्दी तथा गणोंसहित वहाँ थे, ब्रह्माके वचनकी रक्षा करते हुए हँसते हुए [उस दैत्यसे] कहा—'हे असुरेश्वर! अब इस युद्धसे कौन-सा कार्य सिद्ध होगा? मेरे बाणोंके द्वारा छिन्न-भिन्न अंगोंवाला होकर प्रसन्नतापूर्वक मरनेके लिये तैयार हो जाओ'॥ ११–१३१/२॥ |
| मद्बाणैर्भिन्नसर्वाङ्गो मर्तुमभ्युद्यतो मुदा।<br>जलन्धरोऽपि तद्वाक्यं श्रुत्वा श्रोत्रविदारणम्॥ १४<br><br>सुरेश्वरमुवाचेदं सुरेतरबलेश्वरः।<br>वाक्येनालं महाबाहो देवदेव वृषध्वज॥ १५ | कानोंको विदीर्ण करनेवाले उस वचनको सुनकर असुरसेनाके स्वामी जलन्धरने भी सुरेश्वर [शिव]-से यह [वचन] कहा—हे महाबाहो, हे देवदेव! हे वृषभध्वज! ऐसी बात मत बोलिये; हे हर! मैं चन्द्रकिरणोंके समान [चमकते हुए] शस्त्रोंसे युद्ध करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥ १४-१५१/२॥ |
| चन्द्रांशुसन्निभैः शस्त्रैर्हर योद्धुमिहागतः।<br>निशम्यास्य वचः शूली पादाङ्गुष्ठेन लीलया।<br>महाम्भसि चकाराशु रथाङ्गं रौद्रमायुधम्॥ १६ | उसके वचनको सुनकर शिवजीने शीघ्र ही लीलापूर्वक [अपने] पैरके अँगूठेसे महासागरमें भयानक चक्ररूपी आयुध निर्मित कर दिया॥ १६॥ |
| कृत्वाणर्वाम्भसि सितं भगवान् रथाङ्गं<br>स्मृत्वा जगतत्रयमनेन हताः सुराश्च।<br>दक्षान्धकान्तकपुरत्रययज्ञहर्ता<br>लोकत्रयान्तककरः प्रहसंस्तदाह॥ १७<br><br>पादेन निर्मितं दैत्यजलन्धरमहार्णवे।<br>बलवान् यदि चोद्धर्तुं तिष्ठ योद्धुं न चान्यथा॥ १८ | तब समुद्रजलमें इस शुभ्र चक्रको स्थित करके और यह सोचकर कि 'इसके द्वारा तीनों लोक तथा देवतागण मार दिये जायेंगे' दक्ष, अन्धक, अन्तक और त्रिपुरके यज्ञको नष्ट करनेवाले तथा तीनों लोकोंका संहार करनेवाले भगवान् [शिव] हँसते हुए कहने लगे—हे दैत्य! हे जलन्धर! महासागरमें [मेरे] पादांगुष्ठसे निर्मित किये गये अस्त्रको उठानेमें यदि तुम समर्थ हो जाओ, तब तो युद्ध करनेके लिये ठहरो; अन्यथा नहीं॥ १७-१८॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधेनादीप्तलोचनः।<br>प्रदहन्निव नेत्राभ्यां प्राहालोक्य जगत्त्रयम्॥ १९ | उनके उस वचनको सुनकर क्रोधसे प्रदीप्त नेत्रोंवाला वह [जलन्धर] तीनों लोकोंको [अपने] नेत्रोंसे दग्ध-सा करता हुआ शिवजीकी ओर देखकर कहने लगा॥ १९॥ |
| ५१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| जलन्धर उवाच | **जलन्धर बोला—**हे शंकर! जिस प्रकार गरुड़ [विषहीन] डुंडुभ सर्पोंको मार डालता है, वैसे ही अपनी गदा उठाकर नन्दीको तथा तुमको मारकर पुनः देवताओंसहित सभी लोकोंका संहार करके मैं इन्द्रसहित सम्पूर्ण चराचर जगत्का संहार करनेमें समर्थ हूँ। हे महेश्वर! तीनों लोकोंमें ऐसा कौन है, जो मेरे बाणोंद्वारा छेदनके योग्य न हो! मैंने बचपनमें तपस्यासे भगवान् विष्णुको जीत लिया था और युवावस्थामें बलशाली ब्रह्माको तथा बड़े-बड़े देवताओंसहित मुनियोंको जीत लिया था॥ २०—२२॥ | | गदामुद्धृत्य हत्वा च नन्दिनं त्वां च शङ्कर।<br>हत्वा लोकान् सुरैः सार्धं डुण्डुभान् गरुडो यथा॥ २०<br>हन्तुं चराचरं सर्वं समर्थोऽहं सवासवम्।<br>को महेश्वर मद्बाणैरच्छेद्यो भुवनत्रये॥ २१<br>बालभावे च भगवान् तपसैव विनिर्जितः।<br>ब्रह्मा बली यौवने वै मुनयः सुरपुङ्गवैः॥ २२ | | | दग्धं क्षणेन सकलं त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>तपसा किं त्वया रुद्र निर्जितो भगवानपि॥ २३<br>इन्द्राग्नियमवित्तेशवायुवारीश्वरादयः।<br>न सेहिरे यथा नागा गन्धं पक्षिफ्तेरिव॥ २४<br>न लब्ध्वा दिवि भूमौ च बाहवो मम शङ्कर।<br>समस्तान् पर्वतान् प्राप्य घर्षिताश्च गणेश्वर॥ २५<br>गिरीन्द्रो मन्दरः श्रीमान्नीलो मेरुः सुशोभनः।<br>घर्षितो बाहुदण्डेन कण्डूनोदार्थमापतत्॥ २६ | मैंने चराचरसहित त्रिलोकीको क्षणभरमें दग्ध कर दिया था। हे रुद्र! क्या तुमने तपस्यासे भगवान् विष्णुको पराजित किया है? जैसे सर्प गरुड़की गन्धको सहन नहीं कर सकते, उसी प्रकार इन्द्र, अग्नि, यम, कुबेर, वायु, वरुण आदि भी मेरी गन्धको सहन नहीं कर सकते हैं। हे शंकर! स्वर्गमें तथा पृथ्वीपर अपना प्रतिद्वन्द्वी न पाकर सभी पर्वतोंपर जाकर मैंने अपनी भुजाओंको घर्षित किया था। हे गणेश्वर! खुजलाहट मिटानेके लिये मैंने अपने बाहुदण्डसे गिरिराज मन्दर, श्रीसम्पन्न नीलपर्वत और अति सुन्दर मेरु पर्वतको घर्षित किया था और वे गिर पड़े थे॥ २३—२६॥ | | गङ्गा निरुद्धा बाहुभ्यां लीलार्थं हिमवद्गिरौ।<br>नारीणां मम भृत्यैश्च वज्रो बद्धो दिवौकसाम्॥ २७<br>वडवाया मुखं भग्नं गृहीत्वा वै करेण तु।<br>तत्क्षणादेव सकलं चैकार्णवमभूदिदम्॥ २८<br>ऐरावतादयो नागाः क्षिप्ताः सिन्धुजलोपरि।<br>सरथो भगवानिन्द्रः क्षिप्तश्च शतयोजनम्॥ २९<br>गरुडोऽपि मया बद्धो नागपाशेन विष्णुना।<br>उर्वश्याद्या मया नीता नार्यः कारागृहान्तरम्॥ ३०<br>कथञ्चिल्लब्धवान् शक्रः शचीमेकां प्रणम्य माम्।<br>मां न जानासि दैत्येन्द्रं जलन्धरमुमापते॥ ३१ | हिमालय पर्वतपर लीलावश मेरी भुजाओंके द्वारा गंगा रोक ली गयी थी और मेरी स्त्रियोंके सेवकोंद्वारा देवताओंका वज्र बाँध लिया गया था। मैंने हाथसे पकड़कर बड़वाग्निके मुखको भंग कर दिया था; उसी क्षण यह सब एकार्णव हो गया था। मैंने ऐरावत आदि हाथियोंको समुद्रजलके ऊपर फेंक दिया था और भगवान् इन्द्रको रथसहित सौ योजन दूर फेंक दिया था। मैंने विष्णुसहित गरुड़को भी नागपाशसे बाँध लिया था। मैंने उर्वशी आदि नारियोंको कारागृहके अन्दर डाल दिया था और इन्द्रने मुझको प्रणाम करके किसी प्रकार केवल शचीको वापस प्राप्त किया था। हे उमापते! [क्या] आप मुझ दैत्यराज जलन्धरको नहीं जानते हैं?॥ २७—३१॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्तो महादेवः प्रादहद्वै रथं तदा।<br>तस्य नेत्राग्निभागैककलार्धार्धेन चाकुलम्॥ ३२ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तब उसके इस प्रकार कहनेपर महादेवने अपने नेत्रकी अग्निके एक |
अध्याय ९७ ] जलन्धर-वधकी कथा ५१५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भागकी कलाके आधेके भी आधे भागसे उसके समूचे रथको जला दिया॥ ३२॥ | |
| दैत्यानामतुलबलैर्हयैश्च नागै-<br>दैत्येन्द्रास्त्रिपुररिपोर्निरीक्षणेन ।<br>नागाद्रैशसमनुसंवृतश्च नागै-<br>दैवेशं वचनमुवाच चाल्पबुद्धिः॥ ३३<br><br>किं कार्यं मम युधि देवदैत्य-<br>सङ्घैर्हन्तुं यत्सकलमिदं क्षणात्समर्थः।<br>यत्तस्माद्भयमिह नास्ति योद्धु-<br>मीश वाञ्छैषा विपुलतरा न संशयोऽत्र॥ ३४<br><br>तस्मात्त्वं मम मदनारिदक्षशत्रो<br>यज्ञारे त्रिपुररिपो ममैव वीरैः।<br>भूतैर्नन्दैर्हरिवदनेन देवसङ्घैर्योद्धुं<br>ते बलमिह चास्ति चेद्धि तिष्ठ॥ ३५ | त्रिपुरशत्रु शिवके देखनेमात्रसे दैत्योंकी विशाल सेनाओं, घोड़ों तथा हाथियोंके साथ सभी दैत्येन्द्र दग्ध हो गये। गजोंसे चारों ओरसे घिरा हुआ वह अल्पबुद्धि जलन्धर हाथीसे उतरकर विनाशके लिये उद्यत देवेश [शिव]-से बोला—मुझे युद्ध करनेसे क्या प्रयोजन; क्योंकि मैं देवदैत्य-सहित इस समस्त जगत्को क्षणभरमें नष्ट करनेमें समर्थ हूँ। अतः हे ईश! मुझे कोई भय नहीं है, किंतु आपसे युद्ध करनेकी मेरी तीव्र इच्छा है; इसमें सन्देह नहीं है। अतएव हे मदनारि! हे दक्षशत्रु! हे यज्ञशत्रु! हे त्रिपुरशत्रु! यदि भूतगणों, नन्दी, देवसमुदायसहित मेरे वीरोंके साथ युद्ध करनेका तुम्हारा सामर्थ्य है, तो यहाँ ठहरो॥ ३३—३५॥ |
| इत्युक्त्वाथ महादेवं महादेवारिनन्दनः।<br>न चचाल न सस्मार निहतान् बान्धवान् युधि॥ ३६<br><br>दुर्मदेनाविनीतात्मा दोर्भ्यामास्फोट्य दोर्बलात्।<br>सुदर्शनाख्यं यच्चक्रं तेन हन्तुं समुद्यतः॥ ३७<br><br>दुर्धरेण रथाङ्गेन कृच्छ्रेणापि द्विजोत्तमाः।<br>स्थापयामास वै स्कन्धे द्विधाभूतश्च तेन वै॥ ३८<br><br>कुलिशेन यथा छिन्नो द्विधा गिरिवरो द्विजाः।<br>पपात दैत्यो बलवानञ्जनाद्रिरिवापरः॥ ३९ | महादेवसे ऐसा कहकर महादेवके शत्रुओंको आनन्दित करनेवाला वह [जलन्धर] न तो हिला-डुला और न तो उसने युद्धमें मारे गये बान्धवोंका स्मरण किया। अभिमानके कारण उद्दण्ड स्वभाववाला जलन्धर भुजाओंसे शब्द करके [शिवको] मारनेके लिये उद्यत हुआ और उसने [रुद्रनिर्मित] जो सुदर्शन नामक चक्र था, उसे अपने भुजाबलसे बड़े प्रयासके द्वारा अपने कन्धेपर रखा; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसी समय उस दुर्धर (भयानक) चक्रसे उस जलन्धरके दो टुकड़े उसी प्रकार हो गये, जैसे वज्रके द्वारा काटा गया कोई महापर्वत दो भागोंमें हो जाता है। हे द्विजो! वह बलवान् दैत्य दूसरे अंजन पर्वतकी भाँति गिर पड़ा॥ ३६—३९॥ |
| तस्य रक्तेन रौद्रेण सम्पूर्णमभवत्क्षणात्।<br>तद्रक्तमखिलं रुद्रनियोगान्मांसमेव च॥ ४०<br><br>महारौरवमासाद्य रक्तकुण्डमभूदहो।<br>जलन्धरं हतं दृष्ट्वा देवगन्धर्वपार्षदाः॥ ४१<br><br>सिंहनादं महत्कृत्वा साधु देवेति चाब्रुवन्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि जलन्धरविमर्दनम्॥ ४२<br><br>श्रावयेद्वा यथान्यायं गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ ४३ | उसके भयानक रक्तसे उसी क्षण वह स्थान भर गया; अहो, रुद्रकी आज्ञासे उसका सारा रक्त तथा मांस महारौरव नरकमें पहुँचकर रक्तकुण्ड बन गया। उस समय जलन्धरको मरा हुआ देखकर देवता, गन्धर्व तथा पार्षद महान् सिंहनाद करके 'हे देव! बहुत अच्छा हुआ'—ऐसा कहने लगे। जो [व्यक्ति] जलन्धर-वधकी इस कथाको विधिपूर्वक पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा सुनाता है, वह गणपतिपद प्राप्त करता है॥ ४०—४३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे जलन्धरवधो नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः॥ ९७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'जलन्धर-वध' नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९७॥
९८- भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना तथा प्रसन्न होकर महेश्वरद्वारा उन्हें सुदर्शनचक्र प्रदान करना
| ५१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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अठानबेवाँ अध्याय
भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना तथा प्रसन्न होकर महेश्वरद्वारा उन्हें सुदर्शनचक्र प्रदान करना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— हे सूतजी! भगवान् विष्णुने देवदेव महेश्वरसे सुदर्शन नामक चक्र कैसे प्राप्त किया; इसे आप बतानेकी कृपा करें॥ १॥ |
|---|---|
| कथं देवेन वै सूत देवदेवान्महेश्वरात्।<br>सुदर्शनाख्यं वै लब्धं वक्तुमर्हसि विष्णुना ॥ १ | |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] देवताओं तथा महान् असुरोंके बीच सभी प्राणियोंके लिये विनाशकारी अति भयंकर तथा महान् युद्ध हुआ। शक्ति, मुसलों, झुके पर्वोंवाले बाणों तथा भालोंसे प्रहार किये जानेपर वे देवतागण भयसे व्याकुल होकर भाग गये॥ २-३॥ |
| देवानामसुरेन्द्राणामभवच्च सुदारुणः।<br>सर्वेषामेव भूतानां विनाशकरणो महान् ॥ २ | |
| ते देवाः शक्तिमुशलैः सायकैर्नतपर्वभिः।<br>प्रभिद्यमानाः कुन्तैश्च दुद्रुवुर्भयविह्वलाः ॥ ३ | |
| पराजितास्तदा देवा देवदेवेश्वरं हरिम्।<br>प्रणेमुस्तं सुरेशानं शोकसंविग्नमानसाः ॥ ४ | तदनन्तर पराजित होकर शोकसंतप्त मनवाले देवताओंने देवदेवेश्वर सुरेशान विष्णुके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया॥ ४॥ |
| तान् समीक्ष्याथ भगवान् देवदेवेश्वरो हरिः।<br>प्रणिपत्य स्थितान् देवानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ | प्रणाम करके स्थित हुए उन देवताओंकी ओर देखकर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुने यह वचन कहा— |
| वत्साः किमिति वै देवाश्च्युतालङ्कारविक्रमाः।<br>समागताः ससन्तापाः वक्तुमर्हथ सुव्रताः ॥ ६ | हे वत्स देवतागण! हे सुव्रतो! अलंकार तथा पराक्रमसे विहीन आप लोग दुःखी होकर यहाँपर किसलिये आये हैं; इसे बताइये॥ ५-६॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तथाभूताः सुरोत्तमाः।<br>प्रणम्याहुर्यथावृत्तं देवदेवाय विष्णवे ॥ ७ | उनके उस वचनको सुनकर वैसी दशाको प्राप्त श्रेष्ठ देवतागण प्रणाम करके जैसा घटित हुआ था, वह सब उन देवदेव विष्णुसे कहने लगे॥ ७॥ |
| भगवन् देवदेवेश विष्णो जिष्णो जनार्दन।<br>दानवैः पीडिताः सर्वे वयं शरणमागताः ॥ ८ | हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे विष्णो! हे जिष्णो! हे जनार्दन! दानवोंसे पीड़ित होकर हम सभी आपकी शरणमें आये हैं। हे देवदेवेश! हे पुरुषोत्तम! आप ही हमलोगोंकी गति हैं, आप ही परमात्मा हैं और आप ही सभी लोकोंके पिता भी हैं। हे जनार्दन! आप ही भर्ता (भरण करनेवाले), हर्ता (संहार करनेवाले), भोक्ता तथा दाता हैं; अतः हे दैत्यमर्दन! आप दानवोंका वध करनेकी कृपा कीजिये॥ ८—१०॥ |
| त्वमेव देवदेवेश गतिर्नः पुरुषोत्तम।<br>त्वमेव परमात्मा हि त्वं पिता जगतामपि ॥ ९ | |
| त्वमेव भर्ता हर्ता च भोक्ता दाता जनार्दन।<br>हन्तुमर्हसि तस्मात्त्वं दानवान् दानवार्दन ॥ १० | |
| दैत्याश्च वैष्णवैर्ब्राह्मै रौद्रैर्याम्यैः सुदारुणैः।<br>कौबेरैश्चैव सौम्यैश्च नैर्ऋत्यैर्वारुणैर्दृढैः ॥ ११ | हे कमलनयन! वे सभी दैत्य वर प्राप्त कर लेनेके कारण विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, यम, कुबेर, चन्द्र, निर्ऋति, वरुण, वायु, अग्नि, ईशान, पर्जन्य तथा सूर्यके अत्यन्त दृढ़-दारुण-भयानक-कँपा देनेवाले तथा शक्तिरहित कर |
| वायव्यैश्च तथाग्नेयैरैशान्यैर्वाषिँकैः शुभैः।<br>सौरै रौद्रैस्तथा भीमैः कम्प्यैर्जृम्भणैर्दृढैः ॥ १२ | |
| अवध्या वरलाभात्ते सर्वे वारिजलोचन।<br>सूर्यमण्डलसम्भूतं त्वदीयं चक्रमुद्यतम् ॥ १३ |
| अध्याय १८ ] | भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना | ५१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुण्ठितं हि दधीचेन च्यावनेन जगद्गुरो।<br>दण्डं शार्ङ्गं तवास्त्रं च लब्धं दैत्यैः प्रसादतः ॥ १४<br>पुरा जलन्धरं हन्तुं निर्मितं त्रिपुरारिणा।<br>रथाङ्गं सुशितं घोरं तेन तान् हन्तुमर्हसि ॥ १५<br>तस्मात्तेन निहन्तव्या नान्यैः शस्त्रशतैरपि।<br>ततो निशम्य तेषां वै वचनं वारिजेक्षणः ॥ १६<br>वाचस्पतिमुखानाह स हरिश्चक्रभृत्स्वयम्। | देनेवाले अस्त्रोंसे भी अवध्य हो गये हैं। हे जगद्गुरो ! च्यवनपुत्र दधीचने सूर्यमण्डलसे उत्पन्न आपके उठे हुए चक्रको कुण्ठित कर दिया था। आपकी कृपासे दैत्योंने आपके दण्ड, धनुष तथा अस्त्रको प्राप्त कर लिया है। पूर्वकालमें त्रिपुरशत्रु [शिव]-के द्वारा जलन्धरका संहार करनेके लिये एक भयानक तथा तेज धारवाले चक्रका निर्माण किया गया था; उसीसे आप उन [दानवों]-का वध कर सकते हैं। उसी अस्त्रसे ये दानव मारे जा सकते हैं, अन्य सैकड़ों अस्त्रोंसे नहीं ॥ ११—१५ १/२ ॥<br><br>तदनन्तर उनका वचन सुनकर कमलके समान नेत्रवाले चक्रधारी वे विष्णु वाचस्पति आदि प्रधान देवताओंसे स्वयं कहने लगे ॥ १६ १/२ ॥ |
| श्रीविष्णुरुवाच<br>भो भो देवा महादेवं सर्वैर्देवैः सनातनैः ॥ १७<br>सम्प्राप्य साम्प्रतं सर्वं करिष्यामि दिवौकसाम्।<br>देवा जलन्धरं हन्तुं निर्मितं हि पुरारिणा ॥ १८<br>लब्ध्वा रथाङ्गं तेनैव निहत्य च महासुरान्।<br>सर्वान् धुन्धुमुखान् दैत्यानष्टषष्टिशतान् सुरान् ॥ १९<br>सबान्धवान् क्षणादेव युष्मान् सन्तारयाम्यहम्। | श्रीविष्णु बोले— हे देवताओ ! मैं इस समय सभी सनातन देवताओंके साथ महादेवके पास पहुँचकर [ आप ] देवताओंका सम्पूर्ण कार्य करूँगा। हे देवताओं ! जलन्धरका वध करनेके लिये शिवजीके द्वारा बनाये गये चक्रको प्राप्त करके उसीके द्वारा सभी महान् असुरों, धुन्धु आदि दैत्यों तथा अरसठ सौ अन्य असुरोंको बान्धवोंसहित क्षणभरमें मारकर मैं आप देवताओंका उद्धार करूँगा ॥ १७—१९ १/२ ॥ |
| सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा सुरश्रेष्ठान् सुरश्रेष्ठमनुस्मरन् ॥ २०<br>सुरश्रेष्ठस्तदा श्रेष्ठं पूजयामास शङ्करम्।<br>लिङ्गं स्थाप्य यथान्यायं हिमवच्छिखरे शुभे ॥ २१<br>मेरुपर्वतसङ्काशं निर्मितं विश्वकर्मणा।<br>त्वरिताख्येन रुद्रेण रौद्रेण च जनार्दनः ॥ २२<br>स्नाप्य सम्पूज्य गन्धाद्यैर्ज्वालाकारं मनोरमम्।<br>तुष्टाव च तदा रुद्रं सम्पूज्याग्नौ प्रणम्य च ॥ २३<br>देवं नाम्नां सहस्रेण भवाद्येन यथाक्रमम्।<br>पूजयामास च शिवं प्रणवाद्यं नमोऽन्तकम् ॥ २४<br>देवं नाम्नां सहस्रेण भवाद्येन महेश्वरम्।<br>प्रतिनाम सपद्मेन पूजयामास शङ्करम् ॥ २५<br>अग्नौ च नामभिर्देवं भवाद्यैः समिदादिभिः।<br>स्वाहान्तैर्विधिवद्धुत्वा प्रत्येकमयुतं प्रभुम् ॥ २६ | सूतजी बोले— [ हे ऋषियो ! ] श्रेष्ठ देवताओंसे यह कहकर देवताओंमें श्रेष्ठ विष्णुने सुरश्रेष्ठ शिवका स्मरण करते हुए उन श्रेष्ठ शंकरकी पूजा की। विश्वकर्माद्वारा निर्मित मेरुपर्वत-सदृश लिङ्गको हिमवान्के उत्तम शिखरपर विधिपूर्वक स्थापित करके त्वरितरुद्र तथा रुद्रसूक्तके द्वारा अभिषेक करके गन्ध आदिके द्वारा पूजा करके जनार्दनने ज्योतिरूप मनोरम शिवकी स्तुति की। पुनः अग्निमें देव रुद्रकी पूजा करके और उन्हें प्रणाम करके आदिमें भव नामवाले सहस्रनामके द्वारा क्रमसे आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमः लगाकर शिवकी पूजा की। प्रारम्भमें भव नामवाले सहस्रनामके द्वारा प्रत्येक नामका उच्चारण करते हुए उन्होंने कमलपुष्पसे महेश्वर भगवान् शंकरकी पूजा की। तदनन्तर उन्होंने अन्तमें स्वाहावाले भव आदि नामोंसे समिधा आदिके द्वारा विधिपूर्वक अग्निमें प्रत्येक नामकी दस हजार आहुति |
| ५१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| तुष्टाव च पुनः शम्भुं भवाद्यैर्भवमीश्वरम्। <br> श्रीविष्णुरुवाच | देकर पुनः भव आदि नामोंसे [उन] प्रभु भव ईश्वर शम्भुकी इस प्रकार स्तुति की—॥ २०—२६१/२॥ <br> श्रीविष्णु बोले—भव-शिव, हर-रुद्र, पुरुष, | | भवः शिवो हरो रुद्रः पुरुषः पद्मलोचनः ॥ २७ <br> अर्थितव्यः सदाचारः सर्वशम्भुर्महेश्वरः । <br> ईश्वरः स्थाणुरीशानः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २८ | पद्मलोचन, अर्थितव्य, सदाचार, सर्वशम्भुमहेश्वर, ईश्वर, स्थाणु, ईशान, सहस्राक्ष-सहस्रपात् ॥ २७-२८ ॥ | | वरीयान् वरदो वन्द्यः शङ्करः परमेश्वरः । <br> गङ्गाधरः शूलधरः परार्थैकप्रयोजनः ॥ २९ | वरीयान् वरद-वन्द्य, शङ्कर, परमेश्वर, गंगाधर, शूलधर, परार्थैकप्रयोजन ॥ २९ ॥ | | सर्वज्ञः सर्वदेवादिगिरिधन्वा जटाधरः । <br> चन्द्रापीडश्चन्द्रमौलिर्विद्वान् विश्वामरेश्वरः ॥ ३० | सर्वज्ञ, सर्वदेवादिगिरिधन्वा, जटाधर, चन्द्रापीड, चन्द्रमौलि, विद्वान्, विश्वामरेश्वर ॥ ३० ॥ | | वेदान्तसारसन्दोहः कपाली नीललोहितः । <br> ध्यानाधारोऽपरिच्छेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वरः ॥ ३१ | वेदान्तसारसन्दोह, कपालीनीललोहित, ध्यानाधार, अपरिच्छेद्य, गौरीभर्ता, गणेश्वर ॥ ३१ ॥ | | अष्टमूर्तिर्विश्वमूर्तिस्त्रिवर्गः स्वर्गसाधनः । <br> ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञो देवदेवस्त्रिलोचनः ॥ ३२ | अष्टमूर्ति-विश्वमूर्ति, त्रिवर्ग, स्वर्गसाधन, ज्ञानगम्य, दृढप्रज्ञ, देवदेव, त्रिलोचन ॥ ३२ ॥ | | वामदेवो महादेवः पाण्डुः परिदृढोऽदृढः । <br> विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीशः शुचिरन्तरः ॥ ३३ | वामदेव, महादेव, पाण्डु, परिदृढ, अदृढ, विश्वरूप, विरूपाक्ष, वागीश, शुचि, अन्तर ॥ ३३ ॥ | | सर्वप्रणयसंवादी वृषाङ्को वृषवाहनः । <br> ईशः पिनाकी खट्वाङ्गी चित्रवेषश्चिरन्तनः ॥ ३४ | सर्वप्रणयसंवादी, वृषांक, वृषवाहन, ईश-पिनाकी, खट्वाङ्गी, चित्रवेष, चिरन्तन ॥ ३४ ॥ | | तमोहरो महायोगी गोप्ता ब्रह्माङ्गहज्जटी । <br> कालकालः कृत्तिवासाः सुभगः प्रणवात्मकः ॥ ३५ | तमोहर, महायोगी-गोप्ता, ब्रह्मांगहज्जटी, कालकाल, कृत्तिवासा, सुभग, प्रणवात्मक ॥ ३५ ॥ | | उन्मत्तवेषश्चक्षुष्यो दुर्वासाः स्मरशासनः । <br> दृढायुधः स्कन्दगुरुः परमेष्ठीपरायणः ॥ ३६ | उन्मत्तवेष, चक्षुष्य, दुर्वासा, स्मरशासन, दृढायुध-स्कन्दगुरु, परमेष्ठीपरायण ॥ ३६ ॥ | | अनादिमध्यनिधनो गिरिशो गिरिबान्धवः । <br> कुबेरबन्धुः श्रीकण्ठो लोकवर्णोत्तमोत्तमः ॥ ३७ | अनादिमध्यनिधन, गिरिश-गिरिबान्धव, कुबेरबन्धु-श्रीकण्ठ, लोकवर्णोत्तमोत्तम ॥ ३७ ॥ | | सामान्यदेवः कोदण्डी नीलकण्ठः परश्वधी । <br> विशालाक्षो मृगव्याधः सुरेशः सूर्यतापनः ॥ ३८ | सामान्यदेव, कोदण्डी, नीलकण्ठ, परश्वधी, विशालाक्ष, मृगव्याध, सुरेश, सूर्यतापन ॥ ३८ ॥ | | धर्मकर्माक्षमः क्षेत्रं भगवान् भगनेत्रभित् । <br> उग्रः पशुपतिस्तार्क्ष्यप्रियभक्तः प्रियंवदः ॥ ३९ | धर्मकर्माक्षम, क्षेत्र-भगवान्, भगनेत्रभिद्-उग्र, पशुपति, तार्क्ष्यप्रियभक्त, प्रियंवद ॥ ३९ ॥ | | दान्तोदयाकरो दक्षः कपर्दी कामशासनः । <br> श्मशाननिलयः सूक्ष्मः श्मशानस्थो महेश्वरः ॥ ४० | दान्तोदयाकर, दक्ष, कपर्दी, कामशासन, श्मशाननिलय-सूक्ष्म, श्मशानस्थ, महेश्वर ॥ ४० ॥ | | लोककर्ता भूतपतिर्महाकर्ता महौषधी । <br> उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ॥ ४१ | लोककर्ता, भूतपति, महाकर्ता, महौषधी, उत्तर, गोपति, गोप्ता, ज्ञानगम्य, पुरातन ॥ ४१ ॥ | | नीतिः सुनीतिः शुद्धात्मा सोमसोमरतः सुखी । <br> सोमपोऽमृतपः सोमो महानीतिर्महामतिः ॥ ४२ | नीति, सुनीति, शुद्धात्मा, सोमसोमरत, सुखी, सोमप, अमृतप, सोम, महानीति, महामति ॥ ४२ ॥ | | अजातशत्रुरालोकः सम्भाव्यो हव्यवाहनः । <br> लोककारो वेदकारः सूत्रकारः सनातनः ॥ ४३ | अजातशत्रु, आलोक, सम्भाव्य, हव्यवाहन, लोककार, वेदकार, सूत्रकार, सनातन ॥ ४३ ॥ |
अध्याय ९८ ] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५१९
| महर्षिः कपिलाचार्यो विश्वदीप्तिस्त्रिलोचनः।<br>पिनाकपाणिर्भूदेवः स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्सदा॥ ४४॥ | महर्षि कपिलाचार्य, विश्वदीप्ति, त्रिलोचन, पिनाकपाणिभूदेव, स्वस्तिद, सदास्वस्तिकृत् ॥ ४४॥ |
|---|---|
| त्रिधामा सौभगः शर्वः सर्वज्ञः सर्वगोचरः।<br>ब्रह्मधृग्विborder ब्रह्मधृग्विश्वसृक्स्वर्गः कर्णिकारः प्रियः कविः॥ ४५॥ | त्रिधामा, सौभग, शर्व-सर्वज्ञ, सर्वगोचर,<br>ब्रह्मधृग्विश्वसृक्स्वर्ग, कर्णिकार, प्रिय, कवि ॥ ४५ ॥ |
| शाखो विशाखो गोशाखः शिवो नैकः क्रतुः समः।<br>गङ्गाप्लवोदको भावः सकलः स्थपतिःस्थिरः॥ ४६॥ | शाख-विशाख, गोशाख, शिव, नैक, क्रतु, सम,<br>गंगाप्लवोदक, भाव, सकल, स्थपतिस्थिर ॥ ४६ ॥ |
| विजितात्मा विधेयात्मा भूतवाहनसारथिः।<br>सगणो गणकार्यश्च सुकीर्तिश्छिन्नसंशयः॥ ४७॥ | विजितात्मा, विधेयात्मा, भूतवाहनसारथि, सगण,<br>गणकार्य, सुकीर्ति, छिन्नसंशय ॥ ४७ ॥ |
| कामदेवः कामपालो भस्मोद्धूलितविग्रहः।<br>भस्मप्रियो भस्मशायी कामी कान्तः कृतागमः॥ ४८॥ | कामदेव, कामपाल, भस्मोद्धूलितविग्रह, भस्मप्रिय,<br>भस्मशायी, कामी-कान्त, कृतागम ॥ ४८ ॥ |
| समायुक्तो निवृत्तात्मा धर्मयुक्तः सदाशिवः।<br>चतुर्मुखश्चतुर्बाहुर्दुरावासो दुरासदः॥ ४९॥ | समायुक्त, निवृत्तात्मा, धर्मयुक्त, सदाशिव,<br>चतुर्मुखचतुर्बाहु, दुरावास, दुरासद ॥ ४९ ॥ |
| दुर्गमो दुर्लभो दुर्गः सर्वायुधविशारदः।<br>अध्यात्मयोगनिलयः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः॥ ५०॥ | दुर्गमदुर्लभ, दुर्ग, सर्वायुधविशारद, अध्यात्म-<br>योगनिलय, सुतन्तु, तन्तुवर्धन ॥ ५० ॥ |
| शुभाङ्गो लोकसारङ्गो जगदीशोडमृताशनः।<br>भस्मशुद्धिकरो मेरुरोजस्वी शुद्धविग्रहः॥ ५१॥ | शुभाङ्ग, लोकसारंग, जगदीश, अमृताशन,<br>भस्मशुद्धिकर, मेरु, ओजस्वी, शुद्धविग्रह ॥ ५१ ॥ |
| हिरण्यरेतास्तरणिर्मरीचिर्महिमालयः।<br>महाह्रदो महागर्भः सिद्धवृन्दारवन्दितः॥ ५२॥ | हिरण्यरेता, तरणि-मरीचि, महिमालय, महाह्रद,<br>महागर्भ, सिद्धवृन्दारवन्दित ॥ ५२ ॥ |
| व्याघ्रचर्मधरो व्याली महाभूतो महानिधिः।<br>अमृताङ्गोऽमृतवपुः पञ्चयज्ञः प्रभञ्जनः॥ ५३॥ | व्याघ्रचर्मधर, व्याली, महाभूत, महानिधि, अमृतांग,<br>अमृतवपु, पंचयज्ञ, प्रभंजन ॥ ५३ ॥ |
| पञ्चविंशतितत्त्वज्ञः पारिजातः परावरः।<br>सुलभः सुव्रतः शूरो वाङ्मयैकनिधिर्निधिः॥ ५४॥ | पंचविंशतितत्त्वज्ञ, पारिजात, परावर, सुलभ,<br>सुव्रतशूर, वाङ्मयैकनिधि, निधि ॥ ५४ ॥ |
| वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः।<br>आश्रमः क्षपणः क्षामो ज्ञानवानचलाचलः॥ ५५॥ | वर्णाश्रमगुरु, वर्णी, शत्रुजिच्छत्रुतापन, आश्रम, क्षपण,<br>क्षाम, ज्ञानवान्, अचलाचल ॥ ५५ ॥ |
| प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः सुपर्णो वायुवाहनः।<br>धनुर्धरो धनुर्वेदो गुणराशिर्गुणाकरः॥ ५६॥ | प्रमाणभूत, दुर्ज्ञेय, सुपर्ण, वायुवाहन, धनुर्धरधनुर्वेद,<br>गुणराशि, गुणाकर ॥ ५६ ॥ |
| अनन्तदृष्टिरानन्दो दण्डो दमयिता दमः।<br>अभिवाद्यो महाचार्यो विश्वकर्मा विशारदः॥ ५७॥ | अनन्तदृष्टि, आनन्द, दण्डदमयिता, दम, अभिवाद्य,<br>महाचार्य, विश्वकर्मा, विशारद ॥ ५७ ॥ |
| वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भूतभावनः।<br>उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नो जितकामोऽजितप्रियः॥ ५८॥ | वीतराग, विनीतात्मा, तपस्वी, भूतभावन,<br>उन्मत्तवेषप्रच्छन्न, जितकाम, अजितप्रिय ॥ ५८ ॥ |
| कल्याणप्रकृतिः कल्पः सर्वलोकप्रजापतिः।<br>तपस्वी तारको धीमान् प्रधानप्रभुरव्ययः॥ ५९॥ | कल्याणप्रकृति, कल्प, सर्वलोकप्रजापति,<br>तपस्वीतारक, धीमान्, प्रधानप्रभु, अव्यय ॥ ५९ ॥ |
| लोकपालोऽन्तर्हितात्मा कल्पादिः कमलेक्षणः।<br>वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो नियमो नियमाश्रयः॥ ६०॥ | लोकपाल, अन्तर्हितात्मा, कल्पादि, कमलेक्षण,<br>वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ, नियम, नियमाश्रय ॥ ६० ॥ |
| चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्विरामो विद्रुमच्छविः।<br>भक्तिगम्यः परं ब्रह्म मृगबाणार्पणोऽनघः॥ ६१॥ | चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, विराम, विद्रुमच्छवि, |
| ५२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | नाम/पदच्छेद |
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| भक्तिगम्य, परं-ब्रह्ममृगबाणार्पण, अनघ॥ ६१॥ | |
| अद्रिराजालयः कान्तः परमात्मा जगद्गुरुः।<br>सर्वकर्माचलस्त्वष्टा मङ्गल्यो मङ्गलावृतः॥ ६२ | अद्रिराजालय, कान्त, परमात्मा, जगद्गुरु, सर्वकर्माचल, त्वष्टा, मंगल्यमंगलावृत॥ ६२॥ |
| महातपा दीर्घतपाः स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः।<br>अहः संवत्सरो व्याप्तिः प्रमाणं परमं तपः॥ ६३ | महातपा, दीर्घतपा, स्थविष्ठ, स्थविर, ध्रुव, अहः, संवत्सर, व्याप्ति, प्रमाण, परम, तप॥ ६३॥ |
| संवत्सरकरो मन्त्रः प्रत्ययः सर्वदर्शनः।<br>अजः सर्वेश्वरः स्निग्धो महारेता महाबलः॥ ६४ | संवत्सरकर, मन्त्र-प्रत्यय, सर्वदर्शन, अज, सर्वेश्वर, स्निग्ध, महारेतामहाबलः॥ ६४॥ |
| योगी योग्यो महारेताः सिद्धः सर्वादििरग्निदः।<br>वसुर्वसुमनाः सत्यः सर्वपापहरो हरः॥ ६५ | योगी, योग्य, महारेता, सिद्ध, सर्वादि, अग्निदः, वसु, वसुमना, सत्यसर्वपापहर, हर॥ ६५॥ |
| अमृतः शाश्वतः शान्तो बाणहस्तः प्रतापवान्।<br>कमण्डलुधरो धन्वी वेदाङ्गो वेदविन्मुनिः॥ ६६ | अमृतशाश्वत, शान्त, बाणहस्तप्रतापवान्, कमण्डलुधर, धन्वी, वेदाङ्ग, वेदविद्, मुनि॥ ६६॥ |
| भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता लोकनेता दुराधरः।<br>अतीन्द्रियो महामायः सर्वावासश्चतुष्पथः॥ ६७ | भ्राजिष्णु, भोजनभोक्ता, लोकनेता, दुराधर, अतीन्द्रिय, महामाय, सर्वावास, चतुष्पथ॥ ६७॥ |
| कालयोगी महानादो महोत्साहो महाबलः।<br>महाबुद्धिर्महावीर्यो भूतचारी पुरन्दरः॥ ६८ | कालयोगी, महानाद, महोत्साह, महाबल, महाबुद्धि, महावीर्य, भूतचारी, पुरन्दर॥ ६८॥ |
| निशाचरः प्रेतचारिमहाशक्तिर्महाद्युतिः।<br>अनिर्देश्यवपुः श्रीमान् सर्वहार्यमितो गतिः॥ ६९ | निशाचर, प्रेतचारिमहाशक्ति, महाद्युति, अनिर्देश्यवपु, श्रीमान्, सर्वहार्यमित, गति॥ ६९॥ |
| बहुश्रुतो बहुमयो नियतात्मा भवोद्भवः।<br>ओजस्तेजोद्युतिकरो नर्तकः सर्वकामकः॥ ७० | बहुश्रुत, बहुमय, नियतात्मा, भवोद्भव, ओजस्तेजोद्युतिकर, नर्तक, सर्वकामक॥ ७०॥ |
| नृत्यप्रियो नृत्यनृत्यः प्रकाशात्मा प्रतापनः।<br>बुद्धस्पष्टाक्षरो मन्त्रः सन्मानः सारसम्प्लवः॥ ७१ | नृत्यप्रिय, नृत्यनृत्य, प्रकाशात्माप्रतापन, बुद्धस्पष्टाक्षर, मन्त्र, सन्मान, सारसंप्लव॥ ७१॥ |
| युगादिकृद्युगावर्तो गम्भीरो वृषवाहनः।<br>इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शरभः शरभो धनुः॥ ७२ | युगादिकृद्युगावर्त, गम्भीर, वृषवाहन, इष्ट, विशिष्ट-शिष्टेष्ट, शरभ, शरभधनुः॥ ७२॥ |
| अपां निधिरधिष्ठानं विजयो जयकालवित्।<br>प्रतिष्ठितः प्रमाणज्ञो हिरण्यकवचो हरिः॥ ७३ | अपांनिधि, अधिष्ठानविजय, जयकालवित्, प्रतिष्ठित, प्रमाणज्ञ, हिरण्यकवच, हरि॥ ७३॥ |
| विरोचनः सुरगणो विद्येशो विबुधाश्रयः।<br>बालरूपो बलोन्माथी विवर्तो गहनो गुरुः॥ ७४ | विरोचन, सुरगण, विद्येशविबुधाश्रय, बालरूप, बलोन्माथी, विवर्त, गहनगुरु॥ ७४॥ |
| करणं कारणं कर्ता सर्वबन्धविमोचनः।<br>विद्वत्तमो वीतभयो विश्वभर्ता निशाकरः॥ ७५ | करण, कारण, कर्ता, सर्वबन्धविमोचन, विद्वत्तमवीतभय, विश्वभर्ता, निशाकर॥ ७५॥ |
| व्यवसायो व्यवस्थानः स्थानदो जगदादिजः।<br>दुन्दुभो ललितो विश्वो भवात्मात्मनि संस्थितः॥ ७६ | व्यवसाय, व्यवस्थान, स्थानद, जगदादिज, दुन्दुभ, ललित, विश्व, भवात्मात्मनिसंस्थित॥ ७६॥ |
| वीरेश्वरो वीरभद्रो वीरहा वीरभृद्विराट्।<br>वीरचूडामणिर्वेत्ता तीव्रनादो नदीधरः॥ ७७ | वीरेश्वरवीरभद्र, वीरहा, वीरभृद्विराट्, वीरचूड़ामणि, वेत्ता, तीव्रनाद, नदीधर॥ ७७॥ |
| आज्ञाधारस्त्रिशूली च शिपिविष्टः शिवालयः।<br>वालखिल्यो महाचापस्तिग्मांशुर्निधिरव्ययः॥ ७८ | आज्ञाधार, त्रिशूली, शिपिविष्ट, शिवालय, वालखिल्य, महाचाप, तिग्मांशु, निधि-अव्यय॥ ७८॥ |
| अध्याय ९८ ] | भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना | ५२१ |
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| श्लोक | नाम-सूची |
|---|---|
| अभिरामः सुशरणः सुब्रह्मण्यः सुधापतिः।<br>मघवान् कौशिको गोमान् विश्रामः सर्वशासनः ॥ ७९ | अभिराम, सुशरण, सुब्रह्मण्य, सुधापति, मधवान्कौशिक, गोमान्, विश्राम, सर्वशासन ॥ ७९ ॥ |
| ललाटाक्षो विश्वदेहः सारः संसारचक्रभृत्।<br>अमोघदण्डी मध्यस्थो हिरण्यो ब्रह्मवर्चसी ॥ ८० | ललाटाक्ष, विश्वदेह, सार, संसारचक्रभृत्, अमोघदण्डी, मध्यस्थ, हिरण्य, ब्रह्मवर्चसी ॥ ८० ॥ |
| परमार्थः परमयः शम्बरो व्याघ्रकोऽनलः।<br>रुचिर्वररुचिर्वन्द्यो वाचस्पतिरहर्पतिः ॥ ८१ | परमार्थ, परमय, शम्बर, व्याघ्रक, अनल, रुचि, वररुचि, वन्द्य, वाचस्पति, अहर्पति ॥ ८१ ॥ |
| रविर्विरोचनः स्कन्धः शास्ता वैवस्वतोऽजनः।<br>युक्तिरुन्नतकीर्तिश्च शान्तरागः पराजयः ॥ ८२ | रविविरोचन, स्कन्ध, शास्तावैवस्वत, अजन, युक्ति, उन्नतकीर्ति, शान्तराग, पराजय ॥ ८२ ॥ |
| कैलासपतिकामारिः सविता रविलोचनः।<br>विद्वत्तमो वीतभयो विश्वहर्तानिवारितः ॥ ८३ | कैलासपतिकामारि, सविता, रविलोचन, विद्वत्तम, वीतभय, विश्वहर्तानिवारित ॥ ८३ ॥ |
| नित्यो नियतकल्याणः पुण्यश्रवणकीर्तनः।<br>दूरश्रवा विश्वसहो ध्येयो दुःस्वप्ननाशनः ॥ ८४ | नित्य, नियतकल्याण, पुण्यश्रवणकीर्तन, दूरश्रवा, विश्वसह, ध्येय, दुःस्वप्ननाशन ॥ ८४ ॥ |
| उत्तारको दुष्कृतिहा दुर्धर्षो दुःसहोऽभयः।<br>अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः किरीटीत्रिदशाधिपः ॥ ८५ | उत्तारक, दुष्कृतिहा, दुर्धर्ष, दुःसह, अभय, अनादि, भू, भुवो लक्ष्मी, किरीटीत्रिदशाधिप ॥ ८५ ॥ |
| विश्वगोप्ता विश्वभर्ता सुधीरो रुचिराङ्गदः।<br>जननो जनजन्मादिः प्रीतिमान्नीतिमान्नयः ॥ ८६ | विश्वगोप्ता, विश्वभर्ता, सुधीर, रुचिरांगद, जनन, जनजन्मादि, प्रीतिमान्, नीतिमान्, नय ॥ ८६ ॥ |
| विशिष्टः काश्यपो भानुर्भीमो भीमपराक्रमः।<br>प्रणवः सप्तधाचारो महाकायो महाधनुः ॥ ८७ | विशिष्ट, काश्यप, भानु, भीम, भीमपराक्रम, प्रणव, सप्तधाचार, महाकायमहाधनु ॥ ८७ ॥ |
| जन्माधिपो महादेवः सकलागमपारगः।<br>तत्त्वात्तत्त्वविवेकात्मा विभूष्णुर्भूतिभूषणः ॥ ८८ | जन्माधिप, महादेव, सकलागमपारग, तत्त्वात्तत्त्वविवेकात्मा, विभूष्णु, भूतिभूषण ॥ ८८ ॥ |
| ऋषिर्ब्राह्मणविज्जिष्णुर्जन्ममृत्युजरातिगः ।<br>यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञान्तोऽमोघविक्रमः ॥ ८९ | ऋषि, ब्राह्मणविज्जिष्णु, जन्ममृत्युजरातिग, यज्ञयज्ञपति, यज्वा, यज्ञान्त, अमोघविक्रम ॥ ८९ ॥ |
| महेन्द्रो दुर्भरः सेनी यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः।<br>पञ्चब्रह्मसमुत्पत्तिर्विश्वेशो विमलोदयः ॥ ९० | महेन्द्र, दुर्भर, सेनी, यज्ञांगयज्ञवाहन, पंचब्रह्मसमुत्पत्ति, विश्वेश, विमलोदय ॥ ९० ॥ |
| आत्मयोनिरनाद्यन्तो षड्विंशत्सप्तलोकधृक्।<br>गायत्रीवल्लभः प्रांशुर्विश्वावासः प्रभाकरः ॥ ९१ | आत्मयोनि, अनाद्यन्त, षड्विंशत्सप्तलोकधृक्, गायत्रीवल्लभ, प्रांशु, विश्वावास, प्रभाकर ॥ ९१ ॥ |
| शिशुर्गिरिरतः सम्राट् सुषेणः सुरशत्रुहा।<br>अमोघोऽरिष्टमथनो मुकुन्दो विगतज्वरः ॥ ९२ | शिशु, गिरिरत, सम्राट्सुषेण, सुरशत्रुहा, अमोघ, अरिष्टमथन, मुकुन्द, विगतज्वर ॥ ९२ ॥ |
| स्वयंज्योतिरनुज्योतिरारत्मज्योतिश्चञ्चलः ।<br>पिङ्गलः कपिलश्मश्रुः शास्त्रनेत्रस्त्रयीतनुः ॥ ९३ | स्वयंज्योति, अनुज्योति, आत्मज्योति, अचंचल, पिंगल, कपिलश्मश्रु, शास्त्रनेत्रत्रयीतनु ॥ ९३ ॥ |
| ज्ञानस्कन्धो महाज्ञानी निरुत्पत्तिरुपप्लवः।<br>भगो विवस्वानादित्यो योगाचार्यो बृहस्पतिः ॥ ९४ | ज्ञानस्कन्ध, महाज्ञानी, निरुत्पत्ति, उपप्लव, भग, विवस्वान्-आदित्य, योगाचार्य, बृहस्पति ॥ ९४ ॥ |
| उदारकीर्तिरुद्योगी सद्योगी सदसन्मयः।<br>नक्षत्रमाली राकेशः साधिष्ठानः षडाश्रयः ॥ ९५ | उदारकीर्ति, उद्योगी, सद्योगी, सदसन्मय, नक्षत्रमालीराकेश, साधिष्ठान, षडाश्रय ॥ ९५ ॥ |
| पवित्रपाणिः पापारिर्मणिपूरो मनोगतिः।<br>हृत्पुण्डरीकमासीनः शुक्लः शान्तो वृषाकपिः ॥ ९६ | पवित्रपाणि, पापारि, मणिपूर, मनोगति, |