श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१३- भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत तथा ब्रह्माजीद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन
अध्याय १३ ] भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत आदिद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन । ८९९
| तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>कचेन स्थापितं भद्रे देवाचार्यस्य सूनुना॥ ३० | हे भद्रे! उसीके आगे पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे भद्रे! देवताओंके आचार्य बृहस्पति के पुत्र कचके द्वारा वह स्थापित किया गया है॥ ३०॥ |
| तस्यैव च समीपे तु कूपस्तिष्ठति सुव्रते।<br>तस्योपस्पर्शनाद्देवि सर्वमेधफलं लभेत्॥ ३१ | हे सुव्रते! उसीके समीपमें एक कूप स्थित है, हे देवि! उसमें स्नान करनेसे मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ ३१॥ |
| तस्यैव पश्चिमे भागे देवो देवी च तिष्ठतः।<br>भक्तिदौ तौ तु सर्वेषां येऽपि दुष्कृतिनो नराः॥ ३२ | उसीके पश्चिमभागमें देव (शिव) तथा देवी (पार्वती) स्थित हैं। जो बुरा कर्म करनेवाले मनुष्य हैं, उन सबको भी वे भक्ति देनेवाले हैं॥ ३२॥ |
| शुक्रेश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>अनर्केश्वरनामानं मोक्षदं सर्वदेहिनाम्॥ ३३ | शुक्रेश्वरके पूर्वमें सभी प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला अनर्केश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। |
| तस्यैव पूर्वतो भागे गणैस्तु परिवारितम्।<br>गणेश्वरमिति ख्यातं सर्वहर्षप्रदायकम्॥ ३४ | उसीके पूर्वभागमें गणोंसे घिरा हुआ गणेश्वर नामसे प्रसिद्ध लिङ्ग विद्यमान है, वह सभीको हर्ष प्रदान करनेवाला है॥ ३३-३४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनावर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यायतनावर्णनं' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत तथा ब्रह्माजीद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| अन्यदायतनं वक्ष्ये वाराणस्यां सुरेश्वरि।<br>रामेण स्थापितं लिङ्गं लङ्कायाश्चागतेन हि॥ १ | अब मैं वाराणसीमें स्थित अन्य लिङ्गोंका वर्णन करूँगा। लंकासे लौटकर श्रीरामचन्द्रजीने एक लिङ्ग स्थापित किया है॥ १॥ |
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>त्रिपुरान्तकरं नाम सर्वपापप्रणाशनम्॥ २ | उसके दक्षिणभागमें सभी पापोंका नाश करनेवाला त्रिपुरान्तकर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २॥ |
| तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं दत्तात्रेयप्रतिष्ठितम्।<br>ज्ञानं चोत्पद्यते देवि तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ ३ | उसीके दक्षिणमें [महर्षि] दत्तात्रेयद्वारा स्थापित लिङ्ग है, हे देवि! उस लिङ्गके दर्शनसे ज्ञान उत्पन्न होता है॥ ३॥ |
| तस्य पश्चिमदिग्भागे हरिकेशेश्वरं शुभम्।<br>तत्रैवाराधितो देवि हरिकेशेन सुव्रते॥ ४ | उसके पश्चिम दिशाभागमें हरिकेशेश्वर नामक शुभ लिङ्ग है। हे देवि! हे सुव्रते! हरिकेशने वहाँपर मेरी आराधना की थी। |
| हरिकेशेश्वरं देवं सर्वकिल्विषनाशनम्।<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे गोकर्णं नाम विश्रुतम्॥ ५ | हरिकेशेश्वरलिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है। उसके पश्चिम-दिशाभागमें गोकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ विद्यमान है॥ ४-५॥ |
| तत्र स्नातो वरारोहे राजते देवि चन्द्रवत्।<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं काशिपुर्यां च सुव्रते॥ ६ | हे वरारोहे! हे देवि! वहाँ स्नान किया हुआ मनुष्य चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होता है। हे सुव्रते! काशीपुरीमें |
८२० श्रीलिङ्गमहापुराण [ परिशिष्ट ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उत्तरं सर्वसिद्धानामनन्तफलदायकम्।<br>देवदेवस्य चैवाग्रे तडागं देवविश्रुतम्॥ ७ | उत्तरकी ओर सभी सिद्धोंको अनन्त फल देनेवाला पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। उस देवदेवके आगे देवविश्रुत तडाग विद्यमान है॥ ६-७॥ |
| तत्र स्नातो वरारोहे राजते देवि चन्द्रवत्।<br>तस्यैव पश्चिमे तीरे लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ८ | हे वरारोहे! हे देवि! वहाँ स्नान किया हुआ मनुष्य चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशमान् हो जाता है। हे भद्रे! उसीके पश्चिम तटपर मेरी भक्तिसे युक्त देवताके द्वारा स्थापित पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ८ १/२॥ |
| देवेन स्थापितं भद्रे मम भक्तिपरेण वै।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि कुण्डं तिष्ठति भामिनि॥ ९<br><br>तस्मिन् स्नातो वरारोहे देवलोकमवाप्नुयात्।<br>देवेश्वरस्योत्तरेण पिशाचैः स्थापितं पुरा॥ १०<br><br>पिशाचेश्वरनामानं मोक्षदं सर्वदेहिनाम्। | हे देवि! हे भामिनि! उसीके आगे एक कुण्ड स्थित है। हे वरारोहे! उसमें स्नान करनेवाला देवलोक प्राप्त करता है। देवेश्वरके उत्तरमें पूर्वकालमें पिशाचोंके द्वारा स्थापित पिशाचेश्वर नामक लिङ्ग है, वह सभी प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है॥ ९-१० १/२॥ |
| ध्रुवेशस्याग्रतो देवि मुखलिङ्गं च तिष्ठति॥ ११<br><br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं तीरे कुण्डस्य भामिनि।<br>वैद्यनाथं तु तं विद्यात् सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ १२ | हे देवि! ध्रुवेशके आगे पश्चिमाभिमुख मुखलिङ्ग स्थित है, हे भामिनि! वह लिङ्ग कुण्डके तटपर विद्यमान है। सभी प्रकारका सुख प्रदान करनेवाले उस लिङ्गको वैद्यनाथ नामवाला जानना चाहिये॥ ११-१२॥ |
| तस्यैव नैर्ऋते भागे मनुना स्थापितं पुरा।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं तस्य कुण्डस्य दक्षिणे॥ १३<br><br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि सर्वपापक्षयो भवेत्। | उसीके नैर्ऋतकोणमें पूर्वकालमें मनुके द्वारा स्थापित पूर्वाभिमुख लिङ्ग है, वह लिङ्ग कुण्डके दक्षिणमें स्थित है। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे सभी पापोंका नाश हो जाता है॥ १३ १/२॥ |
| वैद्यनाथस्य पूर्वेण लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ १४<br><br>मुचुकुन्देश्वरं नाम देवानां तु वरप्रदम्।<br>प्रियव्रतस्य तद्देवि सर्वयज्ञफलप्रदम्॥ १५ | वैद्यनाथके पूर्वमें देवताओंको वर प्रदान करनेवाला मुचुकुन्देश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह लिङ्ग [राजा] प्रियव्रतके सभी यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाला है॥ १४-१५॥ |
| तस्यैव दक्षिणे देवि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>सर्वपापप्रशमनं गौतमेशं च नामतः॥ १६<br><br>तेन दृष्टेन देवेशि सामवेदफलं लभेत्।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि विभाण्डेश्वरसंज्ञितम्॥ १७ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें समस्त पापोंका नाश करनेवाला गौतमेश नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य सामवेदका फल प्राप्त करता है। हे देवि! उसीके दक्षिणमें विभाण्डेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है॥ १६-१७॥ |
| ऋष्यशृङ्गेश्वरं नाम तस्य दक्षिणतः स्थितम्।<br>तस्यैव पूर्वतो देवि ब्रह्मोश्वरमिति स्मृतम्॥ १८ | उसके दक्षिणमें ऋष्यशृंगेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे देवि! उसीके पूर्वमें ब्रह्मोश्वरलिङ्ग बताया गया है॥ १८॥ |
| ब्रह्मोश्वराच्च कोणेन पिशाचेश्वरसंज्ञितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवि पर्जन्येश्वरनामतः॥ १९ | ब्रह्मोश्वरके कोणमें पिशाचेश्वर नामक लिङ्ग है। हे देवि! पर्जन्येश्वर नामसे प्रसिद्ध लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है॥ १९॥ |
अध्याय १३] भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत आदिद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन | ८२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पर्जन्येश्वरनामानं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।<br>पर्जन्येश्वरपूर्वेण नाम्ना तु नहुषेश्वरम्॥ २०<br><br>नहुषेश्वरपूर्वेण देवदेवी च तिष्ठति।<br>विशालाक्षीति विख्याता भक्तानां तु फलप्रदा॥ २१ | पर्जन्येश्वर नामक लिङ्ग भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। पर्जन्येश्वरके पूर्वमें नहुषेश्वर नामक लिङ्ग है। नहुषेश्वरके पूर्वमें देव-देवी स्थित हैं, विशालाक्षी नामसे विख्यात वे [सभी] भक्तोंको फल प्रदान करनेवाली हैं॥ २०-२१॥ |
| तस्यैव दक्षिणे भागे जरासन्धेश्वरं स्थितम्।<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं दृष्ट्वा देवि फलप्रदम्॥ २२ | उसीके दक्षिणभागमें जरासन्धेश्वर नामक चतुर्मुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! उस लिङ्गका दर्शन करनेसे वह [समस्त] फल प्रदान करता है॥ २२॥ |
| तस्यैव दक्षिणे देवि भोगदा सर्वदेहिनाम्।<br>भोगा ललितका देवि सर्वसिद्धिप्रदायिका॥ २३ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें सभी प्राणियोंको सुख प्रदान करनेवाली भोगा ललितका स्थित हैं, हे देवि! वे सभी सिद्धियाँ देनेवाली हैं॥ २३॥ |
| जरासन्धेश्वरस्याग्रे लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>हिरण्याक्षेश्वरं नाम हिरण्यफलदायकम्॥ २४ | जरासन्धेश्वरके आगे सुवर्णका फल प्रदान करनेवाला हिरण्याक्षेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २४॥ |
| तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं ययातीश्वरनामतः।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं सर्वकामफलप्रदम्॥ २५ | उसीके दक्षिणमें ययातीश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग विद्यमान है, वह लिङ्ग सभी कामनाओंका फल देनेवाला है॥ २५॥ |
| तस्यैव पश्चिमे भागे ब्रह्मोशस्य समीपतः।<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं दृष्ट्वा वेदफलं लभेत्॥ २६ | उसीके पश्चिमभागमें ब्रह्मोशके समीप पश्चिमकी ओर मुखवाला एक लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य वेदोंका फल प्राप्त करता है॥ २६॥ |
| अगस्त्यस्य समीपे तु मुखलिङ्गं तु तिष्ठति।<br>विश्वावसुस्तु गन्धर्वो लिङ्गं स्थापितवान् पुरा॥ २७ | अगस्त्यके समीपमें एक मुखलिङ्ग स्थित है, पूर्वकालमें गन्धर्व विश्वावसुने उस लिङ्गको स्थापित किया था॥ २७॥ |
| अगस्त्येश्वरपूर्वेण मुण्डेशो नाम नामतः।<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं वीरसिद्धिप्रदं नृणाम्॥ २८ | अगस्त्येश्वरके पूर्वमें मुण्डेश नामसे प्रसिद्ध पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग विद्यमान है, वह लिङ्ग मनुष्योंको वीरसिद्धि प्रदान करनेवाला है॥ २८॥ |
| तस्यैव दक्षिणे देवि विधिस्तिष्ठति पार्वति।<br>विधिना स्थापितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ २९ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें विधि [लिङ्ग] स्थित है, हे पार्वति! विधि (ब्रह्मा)-के द्वारा स्थापित वह लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है॥ २९॥ |
| विधीश्वराद्दक्षिणेन तीर्थं सर्वत्र विश्रुतम्।<br>दशाश्वमेधिकं नाम लिङ्गं तत्र स्वयं स्थितम्॥ ३०<br><br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि अश्वमेधफलं लभेत्। | विधीश्वरके दक्षिणमें सर्वत्र प्रसिद्ध एक तीर्थ है, वहाँपर दशाश्वमेधिक नामक लिङ्ग स्वयं स्थित है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है॥ ३० १/२॥ |
| दशाश्वमेधाच्चोत्तरतो मातरस्तत्र संस्थिताः॥ ३१<br><br>तासां मुखे तु तत्कुण्डं तिष्ठते वरवर्णिनि।<br>तत्र स्नानं नरः कुर्यान्नारी वा पुरुषोऽपि वा॥ ३२ | दशाश्वमेधके उत्तरमें वहाँपर मातृकाएँ स्थित हैं, हे वरवर्णिनि! उनके मुखमें एक कुण्ड स्थित है। वहाँ जो |
१४- हरिश्चन्द्रेश्वर, नैर्ऋतेश्वर, अम्बरीषेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, कपर्दीश्वर, अंगारेश्वर तथा छागलेश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन
| ८२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| ईप्सितं फलमाप्नोति मातृणां च प्रसादतः।<br>अगस्त्येशाद्दक्षिणतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ३३<br><br>पुलस्त्येश्वरनामानं सर्वरोगविवर्धनम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गमन्यच्च तिष्ठति॥ ३४ | मनुष्य, चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष हो, स्नान करता है, वह मातृकाओंकी कृपासे वांछित फल प्राप्त करता है। अगस्त्येशके दक्षिणमें सभी प्रकारके आरोग्यकी वृद्धि करनेवाला पुलस्त्येश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ३१-३३१/२॥ | | पुष्पदन्तेश्वरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्।<br>तस्यैवाग्रे तु कोणे तु लिङ्गानि सुमहन्ति च॥ ३५<br><br>देवर्षिगणपुष्टानि सर्वसिद्धिकराणि च।<br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे महदाश्चर्यदायकम्॥ ३६<br><br>पञ्चोपचारपूजायां स्वप्नसिद्धिं करिष्यति।<br>लिङ्गं सिद्धेश्वरं नाम पूर्वाभिमुखसंस्थितम्॥ ३७ | उसके दक्षिण दिशाभागमें सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला पुष्पदन्तेश्वर नामक एक अन्य लिङ्ग स्थित है। उसीके आगे कोणमें महान् लिङ्ग विद्यमान हैं; वे देवर्षियोंके द्वारा स्थापित किये गये हैं और सभी प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाले हैं। उसीके पूर्व दिशाभागमें महान् आश्चर्यजनक लिङ्ग विद्यमान हैं। सिद्धेश्वर नामक पूर्वाभिमुख स्थित वह लिङ्ग पंचोपचारपूजाके द्वारा स्वप्नसिद्धि प्रदान करता है॥ ३४-३७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनावर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यातनवर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३॥
चौदहवाँ अध्याय
हरिश्चन्द्रेश्वर, नैर्ऋतेश्वर, अम्बरीषेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, कपर्दीश्वर, अंगारेश्वर तथा छागलेश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| अन्यच्चैव प्रवक्ष्यामि हरिश्चन्द्रेश्वरं शुभम्।<br>यत्र सिद्धो महात्मा वै हरिश्चन्द्रो महाबलः॥ १ | अब मैं हरिश्चन्द्रेश्वर नामक अन्य शुभ लिङ्गका वर्णन करूँगा, जहाँपर महाबली हरिश्चन्द्र सिद्ध महात्मा हुए थे॥ १॥ |
| तं दृष्ट्वा मानवो देवि रुद्रस्य पदमाप्नुयात्।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं स्वर्गलोकप्रदायकम्॥ २ | हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य रुद्रका पद प्राप्त करता है। वह पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्वर्गलोक प्रदान करनेवाला है॥ २॥ |
| हरिश्चन्द्रेश्वराद्देवि अन्यल्लिङ्गं तु पश्चिमे।<br>पूर्वामुखं तु तं देवि नाम्ना वै नैर्ऋतेश्वरम्॥ ३<br><br>तस्य सन्दर्शनाद्देवि कैवल्यं ज्ञानमाप्नुयात्।<br>तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं पूर्वामुखमवस्थितम्॥ ४<br><br>नाम्ना ह्याङ्गिरसेशं तद्वैराग्यसुखदायकम्।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि क्षेमेश्वरमनुत्तमम्॥ ५ | हे देवि! हरिश्चन्द्रेश्वरके पश्चिममें दूसरा पूर्वाभिमुख एक लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह नैर्ऋतेश्वर नामसे प्रसिद्ध है। हे देवि! उसके दर्शनसे मनुष्य कैवल्यज्ञान प्राप्त करता है। उसीके दक्षिणमें आंगिरसेश नामसे प्रसिद्ध पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह वैराग्यसुख प्रदान करनेवाला है॥ ३-४१/२॥ |
| तस्य दक्षिणदिग्भागे केदारं नाम विश्रुतम्।<br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि रुद्रस्यानुचरो भवेत्॥ ६ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें अत्युत्तम क्षेमेश्वर [लिङ्ग] विद्यमान है। उसके दक्षिण दिशाभागमें केदार नामक प्रसिद्ध लिङ्ग है। हे देवि! उसका दर्शन |
अध्याय १४ ] हरिश्चन्द्रेश्वर, नैर्ऋतेश्वर, अम्बरीषेश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन [ ८२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| केदाराद्दाक्षिणे चैव लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>नीलकण्ठेति नामानं सुरलोकप्रदायकम्॥ ७ | करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है॥ ५-६॥<br>केदारके ही दक्षिणमें देवलोक प्रदान करनेवाला नीलकण्ठ नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ७॥ |
| तस्यैव वायवे कोणे अम्बरीषेश्वरं शुभम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गं वै दक्षिणामुखम्॥ ८<br>नाम्ना कालञ्जरं देवं सर्वपातकनाशनम्।<br>तस्यैव दक्षिणे भागे लोलार्को नाम वै रविः॥ ९ | उसीके वायव्य कोणमें अम्बरीषेश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थित है। उसके दक्षिण दिशाभागमें कालेंजर नामक दक्षिणाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है॥ ८½॥<br>उसीके दक्षिण भागमें लोलार्क नामक सूर्यदेव विद्यमान हैं, उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सूर्यलोक प्राप्त करता है। |
| तस्य दर्शनमात्रेण सूर्यलोकमवाप्नुयात्।<br>लोलार्कात् पश्चिमे भागे दुर्गादेवी च तिष्ठति॥ १०<br>मानवानां हितार्थाय कूटे क्षेत्रस्य दक्षिणे।<br>दुर्गायाः पश्चिमे देवि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ११<br>असितेन च तद्देवि भक्त्या वै संप्रतिष्ठितम्। | लोलार्कके पश्चिमभागमें तथा क्षेत्रके दक्षिणमें कूटपर मनुष्योंके हितके लिये दुर्गादेवी स्थित हैं। हे देवि! दुर्गाके पश्चिममें पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह लिङ्ग महात्मा असितके द्वारा भक्तिपूर्वक स्थापित किया गया है॥ ९-११½॥ |
| शुष्कनद्यास्तु नाम्ना वै शुष्केश्वरमिति स्मृतम्॥ १२<br>शुष्केश्वरात् पश्चिमेन नाम्ना तु जनकेश्वरम्।<br>जनकेन महाभागे भक्त्या चापि प्रतिष्ठितम्॥ १३<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं दर्शनाद्व्यथः शुभे। | शुष्क नदीके नामसे शुष्केश्वर लिङ्ग भी बताया गया है। शुष्केश्वरके पश्चिममें जनकेश्वर नामक लिङ्ग विद्यमान है। हे महाभागे! जनकके द्वारा भक्तिपूर्वक उसे स्थापित किया गया है। हे शुभे! वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है, उसके दर्शनसे मनुष्य व्यथारहित हो जाता है॥ १२-१३½॥ |
| तस्यैव चोत्तरे भागे नातिदूरे यशस्विनि॥ १४<br>शङ्कुकर्णेश्वरं नाम लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति।<br>तस्य दर्शनमात्रेण व्रतसिद्धिर्भवेन्नृणाम्॥ १५ | हे यशस्विनि! उसीके उत्तरभागमें समीपमें वहींपर शंकुकर्णेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्योंके व्रतकी सिद्धि हो जाती है॥ १४-१५॥ |
| शुष्केश्वराच्चोत्तरेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>सिद्धेश्वरेति नामानं कुण्डस्यैव तटस्थितम्॥ १६<br>तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा सिद्धेश्वरं तु वै।<br>सर्वासामेव सिद्धीनां पारं गच्छति मानवः॥ १७ | शुष्केश्वरके उत्तरमें सिद्धेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह कुण्डके तटपर ही स्थित है। वहाँपर कुण्डमें स्नान करके तथा सिद्धेश्वरका दर्शन करके मनुष्य समस्त सिद्धियोंके पार चला जाता है॥ १६-१७॥ |
| वायव्ये तु दिशाभागे शङ्कुकर्णेश्वरस्य तु।<br>माण्डव्येशमिति ख्यातं सुरसिद्धैस्तु वन्दितम्॥ १८ | शंकुकर्णेश्वरके वायव्य दिशाभागमें देवताओं तथा सिद्धोंसे वन्दित माण्डव्येश नामक लिङ्ग विद्यमान है॥ १८॥ |
| तस्य चैव समीपे तु स्वयं देवश्च तिष्ठति।<br>गणैः परिवृतो देवि देव्या सह महाप्रभुः॥ १९<br>द्वारे स्वे तिष्ठते देवि स्वयं क्षेत्रं च रक्षति।<br>देवस्य चोत्तरे भागे नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ २० | उसके समीपमें स्वयं देव [शिवजी] स्थित हैं। हे देवि! वे महाप्रभु [वहाँ] गणों तथा देवी [पार्वती]-से घिरे रहकर अपने द्वारपर विराजमान रहते हैं और स्वयं क्षेत्रकी रक्षा करते हैं॥ १९½॥ |
| मुखलिङ्गं तु तत्रैव लिङ्गं पूर्वामुखं शुभे।<br>तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे छागलेश्वरसंज्ञितम्॥ २१ | देवके उत्तरभागमें समीपमें ही वहाँपर एक मुख-लिङ्ग है, हे शुभे! वह लिङ्ग पूर्वाभिमुख है। उसीके उत्तरभागमें छागलेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग |
| ८२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।<br>अन्यदायतनं देवि पश्चिमेन यशस्विनि॥ २२<br>कपर्दीश्वरनामानमुत्तमं सर्वदायकम्। | स्थित है। वह सभी सिद्धियाँ देनेवाला है। हे देवि! उसके पश्चिममें अन्य आयतन स्थित है। हे यशस्विनि! कपर्दीश्वर नामक वह उत्तम आयतन (लिङ्ग) सब कुछ प्रदान करनेवाला है॥ २०-२२ १/२॥ | | तस्य पूर्वेण सुश्रोणि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ २३<br>हरितेश्वरनामानं सर्वपापक्षयङ्करम्।<br>कात्यायनेश्वरं नाम तस्य दक्षिणतः स्थितम्।<br>तेन दृष्टेन मनुजः सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ २४ | हे सुश्रोणि! उसके पूर्वमें सभी पापोंका नाश करनेवाला हरितेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। उसके दक्षिणमें कात्यायनेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनसे मनुष्य समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ २३-२४॥ | | अन्यत्तस्यैव पार्श्वे तु अङ्गारेस्वरसंज्ञितम्।<br>तडागं चापि तत्रस्थमङ्गारेस्वरसंज्ञितम्॥ २५ | उसीके पासमें अंगारेश्वर नामक अन्य लिङ्ग विद्यमान है और वहींपर अंगारेश्वर नामक तडाग भी स्थित है॥ २५॥ | | तस्य दक्षिणदिग्भागे नातिदूरे व्यवस्थितम्।<br>मुकुरेश्वरनामानं सर्वयात्राफलप्रदम्॥ २६<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं कुण्डस्य पुरतः स्थितम्।<br>तस्य कुण्डस्य पार्श्वे तु छागलेश्वरसंज्ञितम्॥ २७<br>तस्य दर्शनमात्रेण योगैश्वर्यं प्रवर्तते।<br>अन्यानि सन्ति लिङ्गानि शतशोऽथ सहस्रशः॥ २८<br>न मया तानि चोक्तानि बहुत्वान्नामधेयतः।<br>सप्तकोट्यस्तु लिङ्गानि अस्मिन् स्थाने स्थिता भुवि॥ २९<br>तेषां दर्शनमात्रेण ज्ञानं चोत्पद्यते क्षणात्। | उसके दक्षिण दिशाभागमें समीपमें ही सभी यात्राओंका फल प्रदान करनेवाला मुकुरेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। पश्चिमाभिमुख वह लिङ्ग कुण्डके सामने स्थित है। उस कुण्डके पासमें छागलेश्वर नामक लिङ्ग विद्यमान है, उसके दर्शनमात्रसे योगैश्वर्य प्राप्त होता है। वहाँपर अन्य सैकड़ों-हजारों लिङ्ग स्थित हैं, बहुत-से होनेके कारण नाम लेकर मैंने उन्हें नहीं बताया। पृथिवीपर इस स्थानमें सात करोड़ लिङ्ग हैं, उनके दर्शनमात्रसे क्षणभरमें ज्ञान उत्पन्न हो जाता है॥ २६-२९ १/२॥ | | उद्देशमात्रं कथितं मया तुभ्यं वरानने॥ ३०<br>न शक्यं विस्तराद्वक्तुं वर्षकोटिशतैरपि।<br>एतानि सिद्धलिङ्गानि कूपाः पुण्या हृदास्तथा॥ ३१<br>वाप्यो नद्योऽथ कुण्डानि मया ते परिकीर्तिताः।<br>एतेषु चैव यः स्नानं करिष्यति समाहितः॥ ३२<br>लिङ्गानि स्पर्शयित्वा च संसारे न विशेत् पुनः। | हे वरानने! मैंने संक्षेपमें आपको बताया है, सौ करोड़ वर्षोंमें भी विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया जा सकता है। मैंने आपसे इन सिद्धलिङ्गों, कूपों, पवित्र हदों, वापियों, नदियों तथा कुण्डोंका वर्णन कर दिया। जो एकाग्रचित्त होकर इन [कुण्ड आदि]-में स्नान करता है तथा लिङ्गोंका स्पर्श करता है, वह संसारमें पुनः प्रवेश नहीं करता है॥ ३०-३२ १/२॥ | | पृथिव्यां यानि तीर्थानि अन्तरिक्षचराणि च॥ ३३<br>तेषां मध्ये तु ये श्रेष्ठा मया ते कथिता शुभे।<br>तीर्थयात्रा वरारोहे कथिता पापनाशिनी॥ ३४<br>येन चैषा कृता देवि सोऽवश्यं मुक्तिभाग्भवेत्॥ ३५ | हे शुभे! पृथिवीपर तथा अन्तरिक्षमें जो तीर्थ हैं, उनमें जो श्रेष्ठ हैं, उनका वर्णन मैंने कर दिया। हे वरारोहे! मैंने पापोंका नाश करनेवाली तीर्थयात्राको भी बता दिया, हे देवि! जिसने इसे कर लिया, वह अवश्य ही मुक्तिका भागी होता है॥ ३३-३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुहायतनवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुहायतनवर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥
१५- चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन
अध्याय १५ ] चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन [ ८२५
पन्द्रहवाँ अध्याय
चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ईश्वर उवाच<br>अन्यच्चैव प्रवक्ष्यामि महाभाग्यं वरानने।<br>चतुर्दशायतनं कृत्वा अष्टायतनमेव च॥ १<br>पञ्चायतनमेवं तु ललिता च विनायकः।<br>नवदुर्गास्तथा प्रोक्ता एतत् कृत्यं वरानने॥ २<br>रहस्यमेतत् कथितं न देयं यस्य कस्यचित्। | **ईश्वर बोले—**हे वरानने! अब मैं अन्य महाभाग्यप्रद लिङ्गोंका वर्णन करूँगा। चतुर्दशायतन, अष्टायतन, पंचायतन, ललिता, विनायक तथा जो नौ दुर्गा हैं—इन सबको मैं बता चुका हूँ। हे वरानने! इस यात्राको करना चाहिये और इस बताये गये रहस्यको जिस-किसीसे प्रकाशित नहीं करना चाहिये॥ १-२ १/२॥ |
| शैलेशं प्रथमं दृष्ट्वा स्नात्वा वै वरणां नदीम्॥ ३<br>स्नानं तु सङ्गमे कृत्वा दृष्ट्वा वै सङ्गेश्वरम्।<br>स्वर्लीने तु कृतस्नानो दृष्ट्वा स्वर्लीनमीश्वरम्॥ ४<br>मन्दाकिन्यां नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै मध्यमेश्वरम्।<br>हिरण्यगर्भे स्नातस्तु दृष्ट्वा चैव तु ईश्वरम्॥ ५<br>मणिकर्ण्यां नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चेशानमीश्वरम्।<br>तस्मिन् कूप उपस्पृश्य दृष्ट्वा गोप्रेक्षमीश्वरम्॥ ६<br>कपिलायां ह्रदे स्नात्वा दृष्ट्वा वै वृषभध्वजम्।<br>उपशान्तस्य देवस्य दक्षिणे कूपमुत्तमम्॥ ७<br>तस्मिन् कूपे उपस्पृश्य दृष्ट्वोपशान्तमीश्वरम्।<br>पञ्चचूडाह्रदे स्नात्वा ज्येष्ठस्थानं ततोऽर्चयेत्॥ ८ | सर्वप्रथम शैलेशका दर्शन करके तथा वरणानदीमें स्नान करके पुनः संगममें स्नानकर तथा संगमेश्वरका दर्शन करके, इसके बाद स्वर्लीनमें स्नान करके तथा स्वर्लीनेश्वरका दर्शन करके पुनः मन्दाकिनीमें स्नान करके तथा मध्यमेश्वरका दर्शन करके पुनः हिरण्यगर्भमें स्नान करके तथा ईश्वरका दर्शन करके इसके बाद मणिकर्णीमें स्नान करके तथा भगवान् ईशानका दर्शन करके पुनः [वहाँपर] उस कूपमें स्नान करके तथा गोप्रेक्षेश्वरका दर्शन करके, पुनः कपिलाह्रदमें स्नान करके तथा वृषभध्वजका दर्शन करके उपशान्तदेवके दक्षिणमें स्थित जो उत्तम कूप है, उस कूपमें स्नान करके तथा उपशान्तेश्वरका दर्शन करनेके अनन्तर पंचचूडाह्रदमें स्नान करके मनुष्यको ज्येष्ठस्थानका अर्चन करना चाहिये॥ ३-८॥ |
| चतुःसमुद्रकूपे तु स्नात्वा देवं ततोऽर्चयेत्।<br>देवस्याग्रे तु कूपस्य तत्रोपस्पर्शनं कृते॥ ९<br>ततोऽर्चयेत देवेशं शुद्धेश्वरमतः परम्।<br>दण्डखाते नरः स्नात्वा व्यादेशं तु ततोऽर्चयेत्॥ १० | इसके बाद चतुःसमुद्रकूपमें स्नान करके देव (लिङ्ग)-का दर्शन-पूजन करना चाहिये। देवके आगे स्थित कूपके जलसे स्नान करनेके बाद देवेश शुद्धेश्वरका अर्चन करना चाहिये। इसके पश्चात् दण्डखातमें स्नान करके मनुष्यको व्यादेशका पूजन करना चाहिये॥ ९-१०॥ |
| शौनकेश्वरकुण्डे तु स्नानं कृत्वा ततोऽर्चयेत्।<br>जम्बुकेश्वरनामानं दृष्ट्वा चैव यशस्विनि॥ ११<br>दृष्ट्वा न जायते मर्त्यः संसारे दुःखसागरे।<br>प्रतिपत्प्रभृति देवेशि यावत् कृष्णचतुर्दशीम्॥ १२ | पुनः शौनकेश्वरकुण्डमें स्नान करके उस लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। हे यशस्विनि! जम्बुकेश्वर नामक लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य दुःखसागररूपी संसारमें पुनः जन्म नहीं लेता है। हे देवेशि! हे शुभे! प्रतिपदासे आरम्भ करके कृष्णचतुर्दशीतक क्रमसे इस महान् |
| ८२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| चतुर्दशायतनको सम्पन्न करना चाहिये॥ ११-१२१/२॥ | |
|---|---|
| एतत्क्रमेण कर्तव्यं महदायतनं शुभे।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि अष्टायतनमुत्तमम्॥ १३<br><br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि लाङ्गलीशं ततो व्रजेत्।<br>तं दृष्ट्वा तु ततो देवि आषाढीशं ततोऽर्चयेत्॥ १४ | अब मैं उत्तम अष्टायतनको बताऊँगा। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्यको लांगलीशके स्थानमें जाना चाहिये। हे देवि! उसका दर्शन करनेके बाद आषाढीशका अर्चन करना चाहिये॥ १३-१४॥ |
| दृष्ट्वा चाषाढिनं देवि भारभूतं ततो व्रजेत्।<br>तं दृष्ट्वा तु ततो देवं गच्छेद्वै त्रिपुरान्तकम्॥ १५ | हे देवि! आषाढीशका दर्शन करनेके बाद भारभूतेश्वरके पास जाना चाहिये। उसका दर्शन करके त्रिपुरान्तकदेवके पास जाना चाहिये॥ १५॥ |
| तं दृष्ट्वापि ततो देवि नकुलीशं ततो व्रजेत्।<br>दक्षिणे नकुलीशस्य त्र्यम्बकं च ततो व्रजेत्॥ १६ | हे देवि! उसका दर्शन करके नकुलीशके पास जाना चाहिये। इसके बाद नकुलीशके दक्षिणमें स्थित त्र्यम्बकके पास जाना चाहिये॥ १६॥ |
| अष्टायतनमेवं हि मया ते परिकीर्तितम्।<br>अष्टायतनमेतद्धि करिष्यन्ति हि ये नराः॥ १७<br><br>ते मृतापि बहिः क्षेत्रे रुद्रलोकस्य भाजनाः॥ १८ | [हे देवि!] इस प्रकार मैंने आपको अष्टायतनके विषयमें बता दिया। जो मनुष्य इस अष्टायतनका दर्शन-पूजन करेंगे, वे इस क्षेत्रके बाहर मरनेपर भी रुद्रलोकके भाजन होंगे॥ १७-१८॥ |
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
| पूर्वं चैव मया देवि पञ्चायतनमुत्तमम्।<br>रोचते मे सदा वासः पञ्चायतन उत्तमे॥ १९ | हे देवि! मैं पहले ही उत्तम पंचायतनका वर्णन कर चुका हूँ। उत्तम पंचायतनमें निवास करना मुझे अच्छा लगता है॥ १९॥ |
| एषां दिगुत्तरा देवि वाराणस्यां सदा प्रिये।<br>मम चोत्तरतो नित्यमस्मिन् स्थाने विशेषतः॥ २०<br><br>एकान्तवासिनो विप्रा भस्मनिष्ठा दृढव्रताः।<br>तेषां तु चोत्तमं स्थानं तद्वदन्ति च केचन॥ २१ | हे देवि! हे प्रिये! वाराणसीमें इनके उत्तर दिशामें और मेरे उत्तरमें इस स्थानपर भस्म धारण करके दृढव्रतमें स्थित होकर विप्रलोग सदा एकान्तवास करते हैं। कुछ लोग उसे उनका उत्तम स्थान बताते हैं॥ २०-२१॥ |
| दिव्या हि सा परा मूर्तिरोङ्कारे ह स्थितः सदा।<br>उत्पत्तिस्थितिकालेऽहं तस्मिन्नायतने स्थितः॥ २२ | वह मूर्ति दिव्य तथा श्रेष्ठ है, मैं सदा उस ओंकारेश्वरमें स्थित हूँ। उत्पत्ति तथा स्थितिके समय मैं उस आयतनमें स्थित रहता हूँ॥ २२॥ |
| एवं च यो विजानाति न स पापेन लिप्यते।<br>सत्यं सत्यं पुनः सत्यं त्रिः सत्यं नान्यथशुभे॥ २३ | जो इस बातको जानता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता है। हे शुभे! यह सत्य है, सत्य है, सत्य है—तीन बार सत्य है, यह अन्यथा नहीं है॥ २३॥ |
| शीघ्रं तत्र च संयातु यदीच्छेन्मामकं पदम्।<br>एवं ते कथितं देवि पुनर्विस्तरतो मया॥ २४ | यदि कोई मेरे लोककी इच्छा करता हो, तो शीघ्र ही वहाँ जाय। हे देवि! इस प्रकार मैंने विस्तारपूर्वक फिरसे आपको यह बता दिया॥ २४॥ |
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
| अविमुक्तं च स्वर्लीनं तथा मध्यमकं शुभम्।<br>एतत् त्रिकण्टकं नाम मृत्युकालेऽमृतप्रदम्॥ २५ | अविमुक्तेश्वर, स्वर्लीनेश्वर तथा शुभ मध्य्मेश्वर—ये त्रिकण्टक नामवाले हैं तथा |
अध्याय १५] चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन ८२७
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मृत्युकालमें अमृत (अमरत्व) प्रदान करनेवाले हैं ॥ २५ ॥ | |
| कारणं तस्य क्षेत्रस्य मया ते कथितं शुभे।<br>इयं वाराणसी पुण्या श्रेष्ठा पाशुपती स्थली।<br>सर्वेषां चैव जन्तूनां हेतुर्मोक्षस्य सुन्दरि॥ २६ | हे शुभे! मैंने उस क्षेत्रके महत्त्वका कारण आपको बता दिया। यह वाराणसी पुण्यमयी, श्रेष्ठ तथा पशुपतिके भक्तोंकी स्थली है और हे सुन्दरि! यह सभी प्राणियोंके मोक्षकी हेतु है॥ २६॥ |
| अविमुक्तं च स्वर्लीनमोङ्कारं चण्डमीश्वरम्।<br>मध्यमं कृत्तिवासं च षडङ्गमीश्वरं स्मृतम्॥ २७ | अविमुक्तेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, ओंकारेश्वर, चण्डेश्वर, मध्यमेश्वर, कृत्तिवासेश्वर—यह षडंग लिङ्ग कहा गया है॥ २७॥ |
| अविमुक्ते महाक्षेत्रे गुह्यमेतत्परं मम।<br>सोपदेशेन ज्ञातव्यं यदीच्छेत् परं पदम्॥ २८ | अविमुक्त महाक्षेत्रमें यह मेरा परम गुह्य स्थान है, यदि कोई परम पद चाहता है, तो उसे उपदेशपूर्वक इसे जानना चाहिये॥ २८॥ |
| एतद्रहस्यमाहात्म्यं न देयं यस्य कस्यचित्।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि यात्राकालं च सर्वदा॥ २९ | इस रहस्यमय माहात्म्यको जिस-किसीसे भी प्रकाशित नहीं करना चाहिये। अब मैं यात्राकालका वर्णन करूँगा॥ २९॥ |
| चैत्रमासे तु देवैस्तु यात्रेयं च कृता शुभा।<br>तस्यैव कामकुण्डे तु स्नानपूजनतत्परैः॥ ३० | उसीके कामकुण्डमें स्नान तथा पूजनमें तत्पर देवताओंने चैत्रमासमें इस शुभ यात्राको किया था॥ ३०॥ |
| वैशाखे दैत्यराजैस्तु यात्रेयं च कृता पुरा।<br>विमलेश्वरकुण्डे तु स्नानपूजनतत्परैः॥ ३१ | विमलेश्वर कुण्डके स्नान-पूजनमें तत्पर दैत्यराजोंने वैशाखमासमें इस यात्राको पूर्वकालमें किया था॥ ३१॥ |
| ज्येष्ठमासेऽपि सिद्धैस्तु यात्रेयं च कृता पुरा।<br>रुद्रवासस्य कुण्डे तु स्नानपूजनतत्परैः॥ ३२ | रुद्रवासकुण्डके स्नान-पूजनमें तत्पर सिद्धोंने ज्येष्ठमासमें पूर्वकालमें इस यात्राको किया था॥ ३२॥ |
| आषाढे चाऽपि गन्धर्वैर्यात्रेयं च कृता मम।<br>श्रिया देव्यास्तु कुण्डस्थैः स्नानपूजनतत्परैः॥ ३३ | श्रीदेवीके कुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर रहनेवाले गन्धर्वोंके द्वारा आषाढ़मासमें मेरी यह यात्रा की गयी थी॥ ३३॥ |
| विद्याधरैस्तु यात्रेयं श्रावणे मासि तत्परैः।<br>लक्ष्मीकुण्डस्य संस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३४ | लक्ष्मीकुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर विद्याधरोंने श्रावण महीनेमें इस यात्राको किया था॥ ३४॥ |
| पितृभिश्चाऽपि यात्रेयमाश्विने मासि तत्परैः।<br>कपिलाह्रदसंस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३५<br><br>ऋषिभिश्चापि यात्रेयं कार्तिके मासि तत्परैः।<br>मार्कण्डेयह्रदस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३६ | कपिलाह्रदमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर पितरोंने आश्विनमासमें इस यात्राको किया था। मार्कण्डेयह्रदमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर ऋषियोंने कार्तिकमासमें यह यात्रा की थी॥ ३५-३६॥ |
| विद्याधरैश्च यात्रेयं मासि मार्गशिरे कृता।<br>कपालमोचनस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३७<br><br>गुह्यकैश्चैव यात्रेयं पुष्यमासे तु तत्परैः।<br>पिशाचैश्चैव यात्रेयं माघमासे च तत्परैः॥ ३८ | कपालमोचनमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर विद्याधरोंने मार्गशीर्षमासमें यह यात्रा की थी। गुह्यकोंने समाहित होकर पौषमासमें यह यात्रा की थी। पिशाचोंने समाहित होकर माघमासमें इस यात्राको किया था॥ ३७-३८॥ |
| ८२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| धनेश्वरकुण्डस्थैः स्नानपूजनतत्परैः।<br>यक्षेशैश्चापि यात्रेयं माघमासे च तत्परैः॥ ३९<br><br>कोटितीर्थे तु संस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः।<br>पिशाचैश्चैव यात्रेयं फाल्गुने मासि तत्परैः॥ ४० | धनेश्वरकुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर यक्षेशोंने भी समाहित होकर माघमासमें यह यात्रा की थी। कोटितीर्थमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर पिशाचोंने समाहित होकर फाल्गुनमासमें इस यात्राको किया था॥ ३९-४०॥ | | गोकर्णकुण्डसंस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः।<br>पिशाचैस्तु यदा यस्मिन् फाल्गुनस्य चतुर्दशीम्॥ ४१<br><br>तेन सा प्रोच्यते देवि पिशाची नाम विश्रुता।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि यात्रायां निष्कृतिः परा॥ ४२ | गोकर्णकुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर पिशाचोंने समाहित होकर फाल्गुनमासकी चतुर्दशी तिथिको यह यात्रा की थी, इसलिये हे देवि! वह प्रसिद्ध पिशाची नामवाली कही जाती है। अब मैं यात्रामें श्रेष्ठ निष्कृतिके विषयमें बताऊँगा॥ ४१-४२॥ | | उदकुम्भास्तु दातव्या मिष्टान्नेन समन्विताः।<br>तेन देवि तदा प्राप्तं पूर्वोक्तं फलमेव च॥ ४३ | हे देवि! [यात्रामें] मिष्टान्नसे युक्त उदकुम्भोंका दान करना चाहिये, उससे पूर्वकथित [समस्त] फल प्राप्त होता है॥ ४३॥ | | अतः परं प्रवक्ष्यामि यात्रायां च वरानने।<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां तव यात्रा महाफला॥ ४४ | हे वरानने! अब मैं यात्राके लिये तिथिको बताऊँगा, शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिमें आपकी यात्रा महाफल प्रदान करती है॥ ४४॥ | | यत्र गौरी तु द्रष्टव्या तां च शृणु वरानने।<br>स्नानं कृत्वा तु गन्तव्यं गोप्रेक्षे तु यशस्विनि॥ ४५<br><br>अहनि कालिका देवी अर्चितव्या प्रयत्नतः।<br>ज्येष्ठस्थाने ततो गौरी अर्चितव्या प्रयत्नतः॥ ४६ | हे वरानने! जहाँ गौरीका दर्शन होता है, उस [यात्रा]-को सुनो। हे यशस्विनि! स्नान करके गोप्रेक्षमें जाना चाहिये और दिनमें प्रयत्नपूर्वक कालिकादेवीकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद ज्येष्ठस्थानमें प्रयत्नपूर्वक गौरीकी पूजा करनी चाहिये॥ ४५-४६॥ | | तस्मात् स्थानात्तु गन्तव्यमविमुक्तस्य चोत्तरे।<br>तत्र देवी सदा गौरी पूजितव्या च भक्तितः॥ ४७ | पुनः उस स्थानसे अविमुक्तके उत्तरमें जाना चाहिये और वहाँ सदा भक्तिपूर्वक देवी गौरीकी पूजा करनी चाहिये॥ ४७॥ | | अन्या वापि परा प्रोक्ता संवर्तललिता शुभा।<br>द्रष्टव्या चापि सा देवी सर्वकामफलप्रदा॥ ४८<br><br>सर्वकामानवाप्नोति यदि ध्यायेत मानवः।<br>ततस्तु भोजयेद्विप्रान् शिवभक्तान् शुचिव्रतान्॥ ४९ | श्रेष्ठ तथा शुभ अन्य संवर्त-ललिता भी बतायी गयी हैं, समस्त कामनाओंका फल देनेवाली उन देवीका भी दर्शन करना चाहिये। यदि मनुष्य उनका ध्यान करता है, तो वह सभी वांछित फल प्राप्त करता है॥ ४८१/२॥ | | वासैः सदक्षिणैश्चैव यथार्हमतिपुष्कलैः।<br>पञ्चगौरीं तु यः कृत्वा भक्त्या देवि समाहितः॥ ५०<br><br>सर्वांश्चैव रसान् गन्धान् गौरीमुद्दिश्य ब्राह्मणे॥ ५१ | तत्पश्चात् शुद्ध व्रतवाले शिवभक्त विप्रोंको अपने सामर्थ्यके अनुसार पर्याप्त दक्षिणा तथा वस्त्रके साथ भोजन कराना चाहिये। हे देवि! जो समाहितचित्त होकर पंचगौरीका दर्शन-पूजन करके गौरीको उद्देश्यकर |
| अध्याय १५ ] | चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन | ८२९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उत्तमं श्रेय आप्नोति सौभाग्येन समन्वितम्।<br>विनायकान् प्रवक्ष्यामि अस्य क्षेत्रस्य विघ्नदान्॥ ५२ | ब्राह्मणको समस्त रस तथा गन्ध समर्पित करता है, वह सौभाग्ययुक्त उत्तम कल्याणकी प्राप्ति करता है। अब मैं इस क्षेत्रके विघ्नदायक विनायकोंका वर्णन करूँगा॥ ४९–५२॥ |
| ढुण्डिं तु प्रथमं दृष्ट्वा तथा कोणविनायकम्।<br>देव्या विनायकं चैव गोप्रेक्षे हस्तिनं स्मृतम्॥ ५३<br><br>विनायकं तथैवान्यं सिन्दूरं नाम विश्रुतम्।<br>चतुर्थो देवि द्रष्टव्य एवं पञ्च विनायकाः॥ ५४<br><br>लड्डुकाश्च प्रदातव्या एतानुद्दिश्य ब्राह्मणे।<br>एतेन चैव धर्मेण सिद्धिमान् जायते नरः॥ ५५ | हे देवि! सर्वप्रथम ढुंढि [विनायक]-का दर्शन करके कोणविनायक, देवीविनायक, गोप्रेक्षमें प्रसिद्ध हस्तीविनायक तथा अन्य चौथे सिन्दूर नामसे विख्यात विनायकका दर्शन करना चाहिये। इस प्रकार ये पाँच विनायक हैं। इन्हें उद्देश्य करके ब्राह्मणोंको मोदक प्रदान करना चाहिये। इस धर्मकृत्यके द्वारा मनुष्य सिद्धिसे युक्त हो जाता है॥ ५३–५५॥ |
| अतः परं प्रवक्ष्यामि चण्डिकाः क्षेत्ररक्षिकाः।<br>दक्षिणे रक्षते दुर्गा नैर्ऋते चोत्तरेश्वरी॥ ५६<br><br>अङ्गारेशी पश्चिमे च वायव्ये भद्रकालिका।<br>उत्तरे भीष्मचण्डी च महामुण्डा च सा ततः॥ ५७ | इसके बाद मैं क्षेत्रकी रक्षा करनेवाली चण्डिकाओंका वर्णन करूँगा। दक्षिणमें दुर्गा, नैर्ऋतकोणमें उत्तरेश्वरी, पश्चिममें अंगारेशी, वायव्यकोणमें भद्रकालिका, उत्तरमें भीष्मचण्डी तथा इसके अनन्तर महामुण्डा रक्षा करती हैं॥ ५६–५७॥ |
| ऊर्ध्वकेशी समायुक्ता शाङ्करी सर्वतः स्मृता।<br>ऊर्ध्वकेशी च आग्नेय्यां चित्रघण्टाथ मध्यतः॥ ५८ | ऊर्ध्वकेशी तथा शांकरी सब ओरसे रक्षा करनेवाली कही गयी हैं। ऊर्ध्वकेशी अग्निकोणमें तथा चित्रघण्टा मध्यमें रक्षा करती हैं॥ ५८॥ |
| एताश्च चण्डिका देवि योऽत्र द्रक्ष्यति मानवः।<br>तस्य तुष्टाश्च ताः सर्वाः क्षेत्रं रक्षन्ति तत्पराः॥ ५९<br><br>विघ्नं कुर्वन्ति सततं पापानां देवि सर्वदा।<br>तस्माच्चैव सदा पूज्याश्चण्डिकाः सविनायकाः॥ ६० | हे देवि! जो मनुष्य इन चण्डिकाओंका दर्शन करता है, उसपर प्रसन्न होकर वे सब [चण्डिकाएँ] तत्पर होकर क्षेत्रकी रक्षा करती हैं और हे देवि! उसके पापोंको निरन्तर नष्ट करती हैं। इसलिये हे देवि! यदि कोई वाराणसीमें सतत शुभ स्थितिको चाहता है, तो उसे विनायकोंसहित चण्डिकाओंकी पूजा सदा करनी चाहिये॥ ५९–६० १/२॥ |
| यदिच्छेत् सततं देवि वाराणस्यां शुभां स्थितिम्।<br>अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि तस्मिन् क्षेत्रे सुरेश्वरि॥ ६१<br><br>तिस्रो नद्यस्तु तत्रस्था वहन्ति च शुभोदकाः।<br>यासां दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्या निवर्तते॥ ६२ | हे सुरेश्वरि! अब मैं उस क्षेत्रमें स्थित अन्य तीर्थोंको बताऊँगा। पवित्र जलवाली तीन नदियाँ वहाँ स्थित हैं और [सदा] प्रवाहित होती रहती हैं, जिनके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्या दूर हो जाती है॥ ६१–६२॥ |
| एका पितामहस्रोता मन्दाकिनी तथापरा।<br>मत्स्योदरी तृतीया च एतास्तिस्रस्तु पुण्यदाः॥ ६३ | पहली पितामहस्रोता, दूसरी मन्दाकिनी, तीसरी मत्स्योदरी—ये तीनों [नदियाँ] पुण्य प्रदान करनेवाली हैं॥ ६३॥ |
१६- काशीमें लिङ्गार्चनकी महिमा
| ८३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| मन्दाकिनी तथा पुण्या मध्यमेश्वरसंस्थिता।<br>पितामहस्रोतिका च अविमुक्ते तु पुण्यदा॥ ६४॥<br><br>मत्स्योदरी च ओङ्कारे पुण्यदा सर्वदैवतैः।<br>तस्मिन् स्थाने यदि गङ्गा आगमिष्यति भामिनि॥ ६५॥<br><br>तदा पुण्यतमः कालो देवानामपि दुर्लभः।<br>वरणासिक्तसलिले जाह्नवी जलमिश्रिते॥ ६६॥<br><br>तत्र नादेश्वरे पुण्ये स्नातः किमनुशोचति।<br>तस्मिन् काले च तत्रैव स्नानं देवि कृतं मया॥ ६७॥ | पुण्यमयी मन्दाकिनी [नदी] मध्यमेश्वरमें स्थित हैं, पुण्यदायिनी पितामहस्रोता अविमुक्तेश्वरमें हैं और पुण्यप्रदा मत्स्योदरी सभी देवताओंके साथ ओंकारेश्वरमें स्थित हैं। हे भामिनि! जब गंगा उस स्थानमें आती हैं, तब देवताओंके लिये भी दुर्लभ वह पुण्यतम काल होता है। वरणाके जलसे सिक्त तथा गंगाके जलसे मिश्रित वहाँ पुण्यप्रद नादेश्वरमें स्नान करके मनुष्यको कौन-सा सन्ताप रह जाता है? हे देवि! उस समय वहींपर मैंने स्नान किया था॥ ६४-६७॥ |
| तेन हस्ततलाद्देवि कपालं पतितं क्षणात्।<br>कपालमोचनं नाम तत्रैव सुमहत्सरः॥ ६८॥ | हे देवि! उस समय हस्ततलसे क्षणभरमें [मेरा] कपाल गिर पड़ा, उससे वहींपर कपालमोचन नामक एक महान् सरोवर हो गया॥ ६८॥ |
| पावनं सर्वसत्त्वानां पुण्यदं सर्वदेहिनाम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं तत्र स्नानं कृतं मया॥ ६९॥<br><br>तेन स प्रोच्यते देव ओङ्कारेश्वरनामतः।<br>मत्स्योदरीजले गङ्गा ओङ्कारेश्वरसन्निधौ॥ ७०॥<br><br>तदा तस्मिन् जले स्नात्वा ब्रह्महत्यां व्यपोहति।<br>मत्स्योदरी जले स्नात्वा दृष्ट्वा चोङ्कारमीश्वरम्॥ ७१॥<br><br>शोकमोहजरामृत्युर्न च तं स्पृशते पुनः॥ ७२॥ | सभी जीवोंको पवित्र करनेवाला तथा सभी देहधारियोंको पुण्य प्रदान करनेवाला ओंकारेश्वर नामक जो तीर्थ है, वहाँ भी मैंने स्नान किया था, इसलिये वह लिङ्ग ओंकारेश्वर नामसे पुकारा जाता है। ओंकारेश्वरकी सन्निधिमें मत्स्योदरीके जलमें जब गंगा मिलती हैं, उस समय उस जलमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। मत्स्योदरीके जलमें स्नान करने तथा ओंकारेश्वरका दर्शन करनेसे उस मनुष्यको शोक, मोह, जरा तथा मृत्यु—ये सब स्पर्श भी नहीं करते हैं॥ ६९-७२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५॥
सोलहवाँ अध्याय
काशीमें लिङ्गार्चनकी महिमा
| विष्णुरुवाच<br>एतच्छ्रुत्वा वचो देवी विस्मयोत्फुल्ललोचना।<br>ओङ्कारदर्शनार्थं वै कपिलेशमुपागता॥ १॥ | विष्णु बोले—यह सुनकर प्रफुल्लित नेत्रोंवाली वे देवी ओंकारेश्वरका दर्शन करनेके लिये कपिलेश्वरमें आ गयीं॥ १॥ |
| तस्मात्त्वमपि देवेशं पूजयस्व सदाशिवम्।<br>एतत्परममानन्दं प्राप्स्यते परमं पदम्॥ २॥ | अतः आप भी देवेश सदाशिवका पूजन कीजिये, इससे आपको परम आनन्द तथा परम पद प्राप्त होगा॥ २॥ |
अध्याय १६ ] काशीमें लिङ्गार्चनकी महिमा ८३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एतच्छ्रुत्वा परं गुह्यं सकाशाच्चक्रपाणिनः ।<br>ओङ्कारमर्चयेद्देवं सदा तद्गतमानसः ॥ ३ | यह परम रहस्य सुनकर चक्रपाणि विष्णुके पाससे आकर वे शिवमें आसक्तचित्त होकर प्रभु ओंकारेश्वरका अर्चन निरन्तर करने लगे ॥ ३ ॥ |
| सूर्य उवाच<br>तस्मात्त्वमपि दुर्धर्षमाराधय सुरेश्वरम् ।<br>तेन तत्पदमाप्नोषि यदन्यैरपि दुर्लभम् ॥ ४ | **सूर्य बोले—**अतः आप भी दुर्धर्ष सुरेश्वरकी आराधना कीजिये, इसके द्वारा आप उस पदको प्राप्त कर लोगे, जो अन्य लोगोंसे दुर्लभ है ॥ ४ ॥ |
| सूर्यस्य वचनं श्रुत्वा वाराणस्यामुपागतः ।<br>तत्र देवि तदोङ्कारं दृष्ट्वा चैव प्रणम्य च ॥ ५<br>आराधनपरो भूत्वा लिङ्गं स्थाप्य चतुर्मुखम् ।<br>देवदेवसकाशाद्वै कृतकृत्यो भवेच्छुचिः ॥ ६<br>यः सम्प्राप्य महत्तत्त्वमीश्वरे कृतनिश्चयः ।<br>तस्मात्त्वमपि गार्गेय यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि ॥ ७<br>आराधयस्व देवेशं मनसः स्थैर्यमात्मनः ।<br>तस्मिंस्तु यः शिवः साक्षादोङ्कारेश्वरसंज्ञितः ॥ ८ | भगवान् सूर्यका वचन सुनकर वे वाराणसीमें आ गये और हे देवि! वहाँपर ओंकारेश्वरका दर्शन करके उन्हें प्रणामकर आराधनापरायण होकर देवदेवके पास चतुर्मुखलिङ्गकी स्थापना करके कृतकृत्य तथा पवित्र हो गये और महत्तत्त्वकी प्राप्ति करके ईश्वरमें निश्चय बुद्धिवाले हो गये। अतः हे गार्गेय! यदि आप भी कल्याण तथा अपने मनकी स्थिरता चाहते हैं, तो देवेशकी आराधना कीजिये। जो साक्षात् शिव हैं, वे ही ओंकारेश्वर नामसे उस स्थानमें विराजमान हैं ॥ ५–८ ॥ |
| एतद्गुह्यस्य माहात्म्यं तव स्नेहान्महामुने ।<br>अकारं च उकारं च मकारं च प्रकीर्तितः ॥ ९<br>अस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धो मुनिकालिकवृक्षयः ।<br>अकारस्तत्र विज्ञेयो विष्णुलोकगतिप्रदः ॥ १० | हे महामुने! मैंने आपके स्नेहके कारण ही इस लिङ्गके माहात्म्यको बताया है। यह अकार, उकार तथा मकारसे युक्त कहा गया है। मुनि कालिकवृक्षिय इस लिङ्गमें सिद्ध हुए हैं। उसमें अकारको विष्णुलोककी गति प्रदान करनेवाला जानना चाहिये ॥ ९–१० ॥ |
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु ओङ्काराख्येति कीर्तितः ।<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्तो देवाचार्यो बृहस्पतिः ॥ ११ | उसके दक्षिणभागमें ही ओंकार नामक लिङ्ग बताया गया है। वहाँ देवाचार्य बृहस्पति परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥ ११ ॥ |
| उकारं तत्र विज्ञेयं ब्रह्मणः पदमव्ययम् ।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे मकारं विष्णुसंज्ञकम् ॥ १२<br>तस्मिँल्लिङ्गे च संसिद्धः कपिलर्षिर्महामुनिः ।<br>तस्मात्त्वमपि गार्गेय मनस्स्थैर्यं यदीच्छसि ॥ १३<br>लिङ्गस्याराधने यत्नं कुरुष्व नियतव्रतः ।<br>विद्यां पाशुपतीं प्राप्य तस्मिन् स्तुत्ये व्यपाश्रयः ॥ १४<br>निर्ममो निरहङ्कारः पदमाप्नोषि शाश्वतम् । | उसमें उकारको ब्रह्माका अव्यय पद देनेवाला जानना चाहिये। उसके उत्तरदिशामें विष्णुसंज्ञक मकारको जानना चाहिये, उस लिङ्गमें महामुनि ऋषि कपिल सिद्ध हुए हैं। अतः हे गार्गेय! यदि आप भी मनकी शान्ति चाहते हैं तो व्रतमें स्थित होकर लिङ्गकी आराधनाके लिये प्रयत्न कीजिये। अनन्यचित्तवाला, मोहरहित तथा अहंकारशून्य होकर उसकी उपासना करनेपर पाशुपतीविद्या प्राप्त करके आप शाश्वत पद प्राप्त कर लेंगे ॥ १२–१४ १/२ ॥ |
| एतच्छ्रुत्वा वचः स्तुत्वा याज्ञवल्क्यस्य दर्शिताः ॥ १५<br>वाराणसीं समभ्येत्य पञ्चायतनमुत्तमम् ।<br>आराध्यमानो देवेशस्तस्मिन् स्थाने स्थितः सदा ॥ १६ | यह वचन सुनकर याज्ञवल्क्यकी मन्त्रसंहिताओंकी स्तुति करके वे वाराणसीमें आकर उत्तम पंचायतनकी |
| ८३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| तस्मादन्येऽपि ये केचिल्लिङ्गस्याराधने रताः ।<br>तेषां वै पश्चिमे काले ज्ञानमुत्पद्यते सदा ॥ १७ | आराधना करने लगे, उस स्थानमें सबके द्वारा आराधित होनेवाले देवेश सदा स्थित रहते हैं॥ १५-१६॥<br><br>अतः जो कोई दूसरे लोग भी लिङ्गकी आराधनामें संलग्न रहते हैं, उन्हें अन्तिम समयमें ज्ञानका उदय हो जाता है॥ १७॥ | | एवं ज्ञात्वा तु यो मर्त्यः सदा लिङ्गार्चने रतः ।<br>न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ १८ | इसे जानकर जो मनुष्य लिङ्गके अर्चनमें सदा रत रहता है, सौ करोड़ कल्पोंमें भी उसका पुनर्जन्म नहीं होता है॥ १८॥ | | तस्माद्वै सम्प्रदायाच्च अर्चितव्यं प्रयत्नतः ।<br>मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य विद्युत्सम्पातचञ्चलम् ॥ १९ | अतः विद्युत्-सम्पातके समान चंचल (अस्थिर) दुर्लभ मानवशरीर प्राप्त करके शैवविधानके अनुसार प्रयत्नपूर्वक लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। जो विप्र लिङ्गका अर्चन करता है, वह अपना उद्धार कर लेता है और जो लिङ्गका अर्चन नहीं करता है, वह अपनेको विनष्ट कर लेता है॥ १९-२०॥ | | लिङ्गं योऽर्चयते विप्र आत्मानं स समुद्धरेत् ।<br>आत्मानं घातयेन्नित्यं यो न लिङ्गं समर्चयेत् ॥ २० | |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्वायतनवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्वायतनवर्णन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥
॥ श्रीलिङ्गमहापुराण-परिशिष्ट पूर्ण हुआ ॥