श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५- ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि, नौ प्रकारकी सृष्टि (नवविध सर्ग)-की संरचना, मरीचि आदि ऋषियोंकी उत्पत्ति, मनु-शतरूपाका प्रादुर्भाव तथा दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन
अध्याय ५ ] ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि···दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन २७
| सुषुष्वापाम्भसि यस्तस्मान्नारायण इति स्मृतः।<br>शर्वर्यन्ते प्रबुद्धो वै दृष्ट्वा शून्यं चराचरम्॥ ५९ | ब्रह्माजी उसी जलराशिमें शयन करते हैं; इसीलिये उन्हें नारायण कहा जाता है॥ ५८ १/२॥<br>प्रलयकालीन रातके बीतनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी उठे और चराचर जगत्को शून्य देखकर उन्होंने सृष्टि करनेका विचार किया॥ ५९ १/२॥ |
| स्रष्टुं तदा मतिञ्चक्रे ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।<br>उदकैराप्लुतां क्ष्मां तां समादाय सनातनः॥ ६०<br><br>पूर्ववत् स्थापयामास वाराहं रूपमास्थितः।<br>नदीनदसमुद्रांश्च पूर्ववच्चाकरोत्प्रभुः॥ ६१ | उन सनातन ब्रह्माने वाराहका रूप धारण करके जलमें डूबी हुई पृथ्वीको निकालकर उसे पुनः पूर्वकी भाँति स्थापित कर दिया और उसपर नदी, नद तथा समुद्रोंको उन प्रभुने पूर्वकी भाँति पुनः कर दिया॥ ६०-६१॥ |
| कृत्वा धरां प्रयत्नेन निम्नोन्नतिविवर्जिताम्।<br>धरायां सोऽचिनोत् सर्वान् गिरीन् दग्धान् पुराग्निना॥ ६२ | ब्रह्माजीने प्रयत्नपूर्वक पृथ्वीतलपर दबे हुए तथा उठे भागोंको ठीक करके उन्हें समतल किया और उन्होंने पूर्वकालमें अग्निसे दग्ध सभी पर्वतोंको धरापर पुनः पूर्ववत् बना दिया॥ ६२॥ |
| भूराद्यांश्चतुरो लोकान् कल्पयामास पूर्ववत्।<br>स्रष्टुञ्च भगवान् चक्रे तदा स्रष्टा पुनर्मतिम्॥ ६३ | इस प्रकार भगवान् ब्रह्माने जब भूः आदि चारों लोकोंकी पूर्वकी भाँति रचना कर ली, तब उन सृष्टिकर्ताने पुनः सृष्टि करनेका विचार किया॥ ६३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सृष्टिप्रारम्भवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘सृष्टिप्रारम्भवर्णन’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि, नौ प्रकारकी सृष्टि (नवविध सर्ग)-की संरचना, मरीचि आदि ऋषियोंकी उत्पत्ति, मनु-शतरूपाका प्रादुर्भाव तथा दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले—हे ब्राह्मणो! जब ब्रह्माजीने |
|---|---|
| यदा स्रष्टुं मतिं चक्रे मोहश्चासीन्महात्मनः।<br>द्विजाश्चाबुद्धिपूर्वं तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ १ | अबुद्धिपूर्वक अर्थात् सम्यक् विचार किये बिना सृष्टिरचनाका विचार किया, तब उन अव्यक्तजन्मा महात्मा ब्रह्माको मोहने व्याप्त कर लिया॥ १॥ |
| तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः।<br>अविद्या पञ्चधा ह्येषा प्रादुर्भूता स्वयम्भुवः॥ २ | उन स्वयम्भूसे प्रथम तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) तथा अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामवाली—ये पाँच प्रकारकी [पंचपर्वा] अविद्याएँ उत्पन्न हो गयीं॥ २॥ |
| अविद्यया मुनेर्ग्रस्तः सर्गो मुख्य इति स्मृतः।<br>असाधक इति स्मृत्वा सर्गो मुख्यः प्रजापतिः॥ ३ | ब्रह्माजीका वह मुख्य [प्रथम] सर्ग (सृष्टि) अविद्यासे ग्रस्त कहा गया है, तब उन्होंने इस प्रथम |
| २८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अभ्यमन्यत सोऽन्यं वै नगा मुख्योद्भवाः स्मृताः।<br>त्रिधा कण्ठो मुनेस्तस्य ध्यायतो वै ह्यवर्तत ॥ ४ | सर्गको सृष्टि-विस्तारका असाधक मानकर वृक्षादिरूप (वृक्ष, गुल्म, लता, वीरुध्, तृणरूप—पाँच प्रकारका सर्ग) मुख्यसर्गका सृजन किया, तदनन्तर ध्यानपूर्वक मनन करते हुए उन ब्रह्माजीका कण्ठ (चिन्तन) त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज तथा तमोगुणसे युक्त) हो गया॥ ३-४॥ |
| प्रथमं तस्य वै जज्ञे तिर्यक्स्रोतो महात्मनः।<br>ऊर्ध्वस्रोतः परस्तस्य सात्त्विकः स इति स्मृतः॥ ५ | पहले उन महात्मा ब्रह्माने तिर्यक्स्रोत पशु आदि उत्पन्न किये, तत्पश्चात् उन्होंने ऊर्ध्वस्रोतकी रचना की, जो सात्त्विकरूप कहा गया। इसके अनन्तर अर्वाक्स्रोत (मनुष्य आदि), पुनः सत्त्व, तमप्रधान अनुग्रह-सर्ग, तदुपरान्त भूतादिकोंका सर्ग रचा गया॥ ५१/२ ॥ |
| अर्वाक्स्रोतोऽनुग्रहश्च तथा भूतादिकः पुनः।<br>ब्रह्मणो महतस्त्वाद्यो द्वितीयो भौतिकस्तथा॥ ६<br><br>सर्गस्तृतीयश्चैन्द्रियस्तूरीयो मुख्य उच्यते।<br>तिर्यग्योन्यः पञ्चमस्तु षष्ठो दैविक उच्यते॥ ७ | ब्रह्माजीद्वारा रचित पहला सर्ग महत्तत्वादिका है, दूसरा भौतिक सर्ग है, जो भूततन्मात्राओंका है, तीसरा ऐन्द्रियसर्ग है [ये बुद्धिपूर्वक उत्पन्न हुए तीन सर्ग प्राकृत सर्ग हैं] और चौथा मुख्य सर्ग वृक्ष आदिका कहा जाता है। तिर्यक् योनिवाले पशु-पक्षियोंवाला सर्ग पाँचवाँ सर्ग है तथा छठा देवताओंकी सृष्टिवाला [ऊर्ध्वस्रोताओंका] देवसर्ग कहा जाता है॥ ६-७॥ |
| सप्तमो मानुषो विप्रा अष्टमोऽनुग्रहः स्मृतः।<br>नवमश्चैव कौमारः प्राकृता वैकृतास्त्विमे॥ ८ | सातवाँ [अर्वाक्स्रोताओंका] सर्ग मनुष्योंका, आठवाँ अनुग्रहसर्ग है, [ये पाँच वैकृतसर्ग हैं] नौवाँ कौमार सर्ग कहा जाता है। हे विप्रो! प्राकृत तथा वैकृत ये ही नौ सर्ग हैं; जिनमें प्रारम्भके तीन सर्ग प्राकृत हैं तथा पाँच सर्ग वैकृत हैं तथा नौवाँ कौमारसर्ग प्राकृत तथा वैकृत दोनों है॥ ८॥ |
| पुरस्तादसृजद्देवः सनन्दं सनकं तथा।<br>सनातनं मुनिश्रेष्ठा नैष्कर्म्येण गताः परम्॥ ९ | तदुपरान्त भगवान् ब्रह्माने सनक, सनन्दन तथा सनातन [एवं सनत्कुमार] मुनि उत्पन्न किये। ये श्रेष्ठ मुनिगण निष्काम कर्मयोगसे परमपदको प्राप्त हुए॥ ९॥ |
| मरीचिभृग्वङ्गिरसः पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठञ्च सोऽसृजद्योगविद्यया॥ १०<br><br>नवौते ब्रह्मणः पुत्रा ब्रह्मज्ञा ब्राह्मणोत्तमाः।<br>ब्रह्मवादिन एवैते ब्रह्मणः सदृशाः स्मृताः॥ ११<br><br>सङ्कल्पश्चैव धर्मश्च ह्यधर्मो धर्मसन्निधिः।<br>द्वादशैव प्रजास्त्वेता ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ १२ | तत्पश्चात् उन्होंने अपनी योगविद्यासे मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—इन ऋषियोंको उत्पन्न किया। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ब्रह्माजीके ये नौ [मानस] पुत्र ब्रह्मको जाननेवाले थे। ये ब्रह्मवादी ऋषि ब्रह्माके ही तुल्य कहे गये हैं। संकल्प, धर्म तथा अधर्म भी उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी ये बारह सन्तानें कहलायीं॥ १०-१२॥ |
| ऋभुं सनत्कुमारञ्च ससर्जादौ सनातनः।<br>तावूर्ध्वरेतसौ दिव्यौ चाग्रजौ ब्रह्मवादिनौ॥ १३ | उन सनातन ब्रह्माने आदिमें ऋभु तथा सनत्कुमारको |
अध्याय ५] ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन २९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुमारौ ब्रह्मणस्तुल्यौ सर्वज्ञौ सर्वभाविनौ।<br>वक्ष्ये भार्याकुलं तेषां मुनीनामग्रजन्मनाम्॥ १४ | उत्पन्न किया था। अग्रजन्मा वे दोनों दिव्य पुत्र नैष्ठिक ब्रह्मचारी, ब्रह्मवादी, सर्वज्ञ, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले तथा ब्रह्माके ही समान थे॥ १३ १/२॥ |
| समासतो मुनिश्रेष्ठाः प्रजासम्भूतिमेव च।<br>शतरूपां तु वै राज्ञीं विराजमसृजत् प्रभुः॥ १५ | हे श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं उन अग्रजन्मा मुनियोंकी भार्याओंका कुल तथा प्रजाओंकी उत्पत्तिका संक्षेपमें वर्णन करूँगा॥ १४ १/२॥ |
| स्वायम्भुवात्तु वै राज्ञी शतरूपा त्वयोनिजा।<br>लेभे पुत्रद्वयं पुण्या तथा कन्याद्वयं च सा॥ १६ | भगवान् ब्रह्माने स्वायम्भुव मनु तथा रानी शतरूपाका सृजन किया। उस अयोनिया तथा पुण्यशालिनी रानी शतरूपाने स्वायम्भुव मनुसे दो पुत्र एवं दो कन्याएँ* उत्पन्न कीं॥ १५-१६॥ |
| उत्तानपादो ह्यवरो धीमान् ज्येष्ठः प्रियव्रतः।<br>ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वाकूतिः प्रसूतिश्चानुजा स्मृता॥ १७ | उनमें बुद्धिसम्पन्न प्रियव्रत ज्येष्ठ तथा उत्तानपाद कनिष्ठ पुत्र थे। श्रेष्ठ गुणोंवाली आकूति ज्येष्ठ तथा प्रसूति छोटी कन्या थी॥ १७॥ |
| उपयेमे तदाकूतिं रुचिर्नाम प्रजापतिः।<br>प्रसूतिं भगवान् दक्षो लोकधात्रीं च योगिनीम्॥ १८ | रुचि नामक प्रजापतिने आकूतिको तथा दक्षप्रजापतिने जगद्धात्री योगमयी प्रसूतिको भार्याके रूपमें ग्रहण किया॥ १८॥ |
| दक्षिणासहितं यज्ञमाकूतिः सुषुवे तथा।<br>दक्षिणा जनयामास दिव्या द्वादशपुत्रिकाः॥ १९ | आकूतिने दक्षिणासहित यज्ञ नामक पुत्रको जन्म दिया और दक्षिणाने दिव्य बारह कन्याओंको उत्पन्न किया॥ १९॥ |
| प्रसूतिः सुषुवे दक्षाच्चतुर्विंशति कन्यकाः।<br>श्रद्धां लक्ष्मीं धृतिं पुष्टिं तुष्टिं मेधां क्रियां तथा॥ २०<br><br>बुद्धिं लज्जां वपुः शान्तिं सिद्धिं कीर्तिं महातपाः।<br>ख्यातिं शान्तिं च सम्भूतिं स्मृतिं प्रीतिं क्षमां तथा॥ २१<br><br>सन्नतिं चानसूयां च ऊर्जां स्वाहां सुरारणिम्।<br>स्वधां चैव महाभागां प्रददौ च यथाक्रमम्॥ २२ | प्रसूतिने दक्षप्रजापतिसे श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि, कीर्ति, ख्याति, शान्ति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, देवताओंके लिये अरणिरूपा स्वाहा तथा स्वधा—इन तपोमयी चौबीस कन्याओंको उत्पन्न किया तथा इन महाभाग्यवती कन्याओंको आगे बताये गये क्रमके अनुसार महात्माजनोंको समर्पित कर दिया॥ २०—२२॥ |
| श्रद्धाद्याश्चैव कीर्त्यन्तास्त्रयोदश सुदारिकाः।<br>धर्मं प्रजापतिं जग्मुः पतिं परमदुर्लभाः॥ २३<br><br>उपयेमे भृगुर्धीमान् ख्यातिं तां भार्गवारणिम्।<br>सम्भूतिञ्च मरीचिस्तु स्मृतिं चैवाङ्गिरा मुनिः॥ २४ | श्रद्धासे लेकर कीर्तिपर्यन्त तेरह परम दुर्लभ सुन्दर कन्याओंने प्रजापति धर्मको पतिरूपमें प्राप्त किया। बुद्धिसम्पन्न भृगुने ख्यातिको, भार्गव शुक्राचार्यने अरणि [शान्ति]-को, मरीचिने सम्भूतिको तथा मुनि अंगिराने स्मृतिको पत्नीरूपमें ग्रहण किया॥ २३-२४॥ |
| प्रीतिं पुलस्त्यः पुण्यात्मा क्षमां तां पुलहो मुनिः।<br>ऋतुश्च सन्नतिं धीमान् अत्रिस्ताञ्चानसूयकाम्॥ २५<br><br>ऊर्जां वसिष्ठो भगवान् वरिष्ठो वारिजेक्षणाम्।<br>विभावसुस्तथा स्वाहां स्वधां वै पितरस्तथा॥ २६ | पुण्यात्मा पुलस्त्यने प्रीतिको, मुनि पुलहने क्षमाको, बुद्धिसम्पन्न क्रतुने सन्नतिको, अत्रिने उस अनसूयाको, श्रेष्ठ वसिष्ठने कमलके समान नेत्रोंवाली ऊर्जाको, |
* यहाँ मनुकी दो पुत्रियाँ कही हैं, जबकि भागवत आदिमें 'तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे' मनुकी तीन पुत्रियाँ प्रसिद्ध हैं। लिङ्गपुराणका वर्णन ईशानकल्पका आख्यान है और भागवतका वर्णन श्वेतवाराहकल्पका है। पुराणपठित (पुराणोक्त) सभी आख्यान सत्य हैं, कल्पभेदसे ही भिन्नताकी प्रतीति है।
| ३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| | भगवान् अग्निने स्वाहादेवीको तथा पितरोंने स्वधादेवीको पत्नीरूपमें स्वीकार किया॥ २५-२६॥ | | पुत्रीकृता सती या सा मानसी शिवसम्भवा।<br>दक्षेण जगतां धात्री रुद्रमेवास्थिता पतिम्॥ २७ | दक्षप्रजापतिकी शिवसम्भवा (शिवांगसम्भूता) मानसी पुत्री सती, जो सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली हैं, ने भगवान् रुद्रको पतिरूपमें प्राप्त किया॥ २७॥ | | अर्धनारीश्वरं दृष्ट्वा सर्गादौ कनकाण्डजः।<br>विभजस्वेति चाहादौ यदा जाता तदाभवत्॥ २८ | सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माजीने शिवजीको अर्धनारीश्वर देखकर कहा कि आप स्त्री-पुरुषका विभाग कीजिये, तब शिवजीकी देहसे सतीजी अलग हो गयीं॥ २८॥ | | तस्याश्चैवांशजाः सर्वाः स्त्रियस्त्रिभुवने तथा।<br>एकादशविधा रुद्रास्तस्य चांशोद्भवस्तथा॥ २९<br>स्त्रीलिङ्गमखिलं सा वै पुंलिङ्गं नीललोहितः। | उन्हीं सतीके अंशसे तीनों लोकमें सभी स्त्रियोंकी उत्पत्ति हुई है तथा ग्यारह प्रकारके रुद्र भी उन शिवके अंशसे उत्पन्न हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण स्त्रीजातिके रूपमें वे सतीजी तथा पुरुषजातिके रूपमें नीललोहित शिवजी अधिष्ठित हैं॥ २९ १/२ ॥ | | तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा दक्षमालोक्य सुव्रताम्॥ ३०<br>भजस्व धात्रीं जगतां ममापि च तवापि च।<br>पुन्नाम्नो नरकात्त्राति इति पुत्री त्विहोक्तितः॥ ३१ | भगवान् ब्रह्माने सुव्रता सतीको देखकर पुनः दक्षप्रजापतिकी ओर देखकर उनसे कहा कि ये सती हमारी, आपकी तथा सम्पूर्ण जगत्की धात्री हैं, अतएव इनकी सेवा करो। पुन्नामक नरकसे पुत्री ही रक्षा करती है, यहाँपर ऐसी ही उक्ति है॥ ३०-३१॥ | | प्रशस्ता तव कान्तेयं स्यात्पुत्री विश्वमातृका।<br>तस्मात्पुत्री सती नाम्ना तवैषा च भविष्यति॥ ३२ | यह परम सुन्दरी एवं प्रशस्त तथा विश्वकी जननी आपकी ही पुत्री है। अतएव अबसे यह सती नामसे तुम्हारी पुत्री होगी॥ ३२॥ | | एवमुक्तस्तदा दक्षो नियोगाद् ब्रह्मणो मुनिः।<br>लब्ध्वा पुत्रीं ददौ साक्षात् सतीं रुद्राय सादरम्॥ ३३ | तत्पश्चात् ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर दक्षप्रजापतिने उनके आदेशसे पुत्रीरूपमें प्राप्त उन साक्षात् सतीको आदरपूर्वक भगवान् रुद्रको सौंप दिया॥ ३३॥ | | धर्मस्य पत्न्यः श्रद्धाद्याः कीर्तिताः वै त्रयोदश।<br>तासु धर्मप्रजां वक्ष्ये यथाक्रममनुत्तमम्॥ ३४ | प्रजापति धर्मकी श्रद्धा आदि जिन तेरह पत्नियोंका वर्णन किया जा चुका है, उनसे तथा धर्मसे उत्पन्न उत्तम सन्तानोंके विषयमें अब मैं यथाक्रम कह रहा हूँ॥ ३४॥ | | कामो दर्पोऽथ नियमः सन्तोषो लोभ एव च।<br>श्रुतस्तु दण्डः समयो बोधश्चैव महाद्युतिः॥ ३५<br>अप्रमादश्च विनयो व्यवसायो द्विजोत्तमाः।<br>क्षेमं सुखं यशश्चैव धर्मपुत्राश्च तासु वै॥ ३६<br>धर्मस्य वै क्रियायां तु दण्डः समय एव च।<br>अप्रमादस्तथा बोधो बुद्धेर्धर्मस्य तौ सुतौ॥ ३७<br>तस्मात् पञ्चदशैवैते तासु धर्मात्मजास्त्विह। | हे उत्तम ब्राह्मणो! काम, दर्प, नियम, सन्तोष, लोभ, श्रुत, दण्ड, समय, महान् द्युतिसम्पन्न बोध, अप्रमाद, विनय, व्यवसाय, क्षेम, सुख और यश—इन पुत्रोंको उन तेरह पत्नियोंने प्रजापति धर्मसे उत्पन्न किया था। धर्मके दो पुत्र दण्ड तथा समय उनकी क्रिया नामक पत्नीसे उत्पन्न हुए और अप्रमाद तथा बोध नामक ये दो पुत्र धर्मकी बुद्धि नामक पत्नीसे उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन तेरह पत्नियोंसे धर्मके ये पन्द्रह पुत्र उत्पन्न | | भृगुपत्नी च सुषुवे ख्यातिर्विष्णोः प्रियां श्रियम्॥ ३८ | |
अध्याय ५ ] ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन ३१
| धातारञ्च विधातारं मेरोजामातरौ सुतौ।<br>प्रभूतिर्नाम या पत्नी मरीचेः सुषुवे सुतौ॥ ३९<br><br>पूर्णमासं तु मारीचं ततः कन्याचतुष्टयम्।<br>तुष्टिर्ज्येष्ठा च वै दृष्टिः कृषिश्चापचितिस्तथा॥ ४०<br><br>क्षमा च सुषुवे पुत्रान् पुत्रीं च पुलहाच्छुभाम्।<br>कर्दमं च वरीयांसं सहिष्णुं मुनिसत्तमाः॥ ४१<br><br>तथा कनकपीतां स पीवरीं पृथिवीसमाम्।<br>प्रीत्यां पुलस्त्यश्च तथा जनयामास वै सुतान्॥ ४२<br><br>दत्तोर्णं वेदबाहुञ्च पुत्रीं चान्यां दृषद्वतीम्।<br>पुत्राणां षष्टिसहस्रं सन्नतिः सुषुवे शुभा॥ ४३<br><br>क्रतोस्तु भार्या सर्वे ते बालखिल्या इति श्रुताः।<br>सिनीवालीं कुहूञ्चैव राकां चानुमतिं तथा॥ ४४<br><br>स्मृतिश्च सुषुवे पत्नी मुनेश्चाङ्गिरसस्तथा।<br>लब्ध्वानुभावमग्निञ्च कीर्तिमन्तञ्च सुव्रताः॥ ४५<br><br>अत्रेर्भार्यानसूया वै सुषुवे षट् प्रजास्तु याः।<br>तास्त्वेका कन्यका नाम्ना श्रुतिः सा सूनुपञ्चकम्॥ ४६<br><br>सत्यनेत्रो मुनिर्भव्यो मूर्तिरापः शनैश्चरः।<br>सोमश्च वै श्रुतिः षष्ठी पञ्चात्रेयास्तु सूनवः॥ ४७<br><br>ऊर्जा वसिष्ठाद्वै लेभे सुतांश्च सुतवत्सला।<br>ज्यायसी पुण्डरीकाक्षान् वासिष्ठान् वरलोचना॥ ४८<br><br>रजः सुहोत्रो बाहुश्च सवनश्चानघस्तथा।<br>सुतपाः शुक्र इत्येते मुनेर्वै सप्त सूनवः॥ ४९<br><br>यश्चाभिमानी भगवान् भवात्मा<br>पैतामहो वह्निरसुः प्रजानाम्।<br>स्वाहा च तस्मात् सुषुवे सुतानां<br>त्रयं त्रयाणां जगतां हिताय॥ ५० | हुए। भृगुकी पत्नी ख्यातिने ‘श्री’ (लक्ष्मी)-को जन्म दिया, जो भगवान् विष्णुकी परम प्रिया हुई तथा धाता एवं विधाता नामक दो पुत्र भी उत्पन्न हुए, जो मेरुपर्वतके जामाता बने। मरीचिकी प्रभूति नामक पत्नीने पूर्णमास तथा मारीच नामक दो पुत्रों तथा तुष्टि, दृष्टि, कृषि एवं अपचिति नामक चार पुत्रियोंको जन्म दिया; इनमें तुष्टि ज्येष्ठ थी॥ ३५-४०॥<br><br>हे श्रेष्ठ मुनियो! क्षमाने पुलहमुनिसे कर्दम, वरीयांस तथा सहिष्णु नामक तीन पुत्र तथा स्वर्णसदृश कान्तिवाली और पृथ्वीके समान क्षमाशील पीवरी नामकी एक पुत्रीको उत्पन्न किया था॥ ४१ ॥<br><br>पुलस्त्यऋषिने अपनी प्रीति नामक पत्नीसे दत्तोर्ण तथा वेदबाहु नामक पुत्रों तथा एक अन्य दृषद्वती नामक पुत्रीको उत्पन्न किया। क्रतुकी प्रिय पत्नी सन्नतिने साठ हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया; वे सभी बालखिल्य नामसे प्रसिद्ध हुए। हे सुव्रतो! अंगिरामुनिकी पत्नी स्मृतिसे सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति—इन चार कन्याओं तथा प्रिय स्वभाववाले कीर्तिमान् पुत्र अग्निकी उत्पत्ति हुई॥ ४२-४५॥<br><br>अत्रिकी भार्या अनसूयाने छः सन्ततियोंको जन्म दिया था। उनमें श्रुति नामधारिणी एक कन्या थी। सत्यनेत्र, मुनिर्भव्य, मूर्तिराप, शनैश्चर एवं सोम—ये पाँच पुत्र हुए, जो आत्रेय कहलाये। सभी सन्तानोंमें श्रुति छठी थी॥ ४६-४७॥<br><br>सुन्दर नेत्रोंवाली तथा पुत्रोंके प्रति स्नेहभाव रखनेवाली महिमामयी वसिष्ठपत्नी ऊर्जाने कमलके समान नेत्रवाले सात पुत्र उत्पन्न किये। रज, सुहोत्र, बाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र—ये सात पुत्र मुनि वसिष्ठसे हुए॥ ४८-४९॥<br><br>परम अभिमानी, रुद्ररूप, ब्रह्माके पुत्र तथा प्रजाओंके प्राणस्वरूप जो भगवान् अग्नि हैं, उनसे स्वाहाने तीनों लोकोंके कल्याणार्थ तीन पुत्र उत्पन्न किये॥ ५०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे प्रजासृष्टिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'प्रजासृष्टिवर्णन' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥
६- अग्नि तथा पितरोंके वंशका वर्णन, ब्रह्माजीसे रुद्रोंका प्रादुर्भाव, परमेष्ठी सदाशिवकी महिमा
३२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
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छठा अध्याय
अग्नि तथा पितरोंके वंशका वर्णन, ब्रह्माजीसे रुद्रोंका प्रादुर्भाव, परमेष्ठी सदाशिवकी महिमा
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| पवमानः पावकश्च शुचिरग्निश्च ते स्मृताः।<br>निर्मथ्यः पवमानस्तु वैद्युतः पावकः स्मृतः॥ १ | अग्निके वे तीन पुत्र पवमान, पावक तथा शुचि नामसे विख्यात हुए। अरणी आदिमें घर्षणसे पवमान, विद्युत्से पावक तथा सूर्य-प्रभासे शुचिका आविर्भाव हुआ। ये तीनों स्वाहाके पुत्र हैं। अब यहाँ पुत्रों तथा पौत्रोंको मिलाकर इनकी संख्या संक्षेपमें बतायी जाती है॥ १-२॥ |
| शुचिः सौरस्तु विज्ञेयः स्वाहा पुत्रास्त्रयस्तु ते।<br>पुत्रैः पौत्रैस्त्विहैतेषां संख्या सङ्क्षेपतः स्मृता॥ २ | |
| विसृज्य सप्तकं चादौ चत्वारिंशन्नवैव च।<br>इत्येते वह्नयः प्रोक्ताः प्रणीयन्तेऽध्वरेषु च॥ ३ | आदिमें सप्तकका त्याग करके कुल उनचास अग्नियाँ कही गयी हैं। ये यज्ञोंमें आराधित की जाती हैं॥ ३॥ |
| सर्वे तपस्विनस्त्वेते सर्वे व्रतभृतः स्मृताः।<br>प्रजानां पतयः सर्वे सर्वे रुद्रात्मकाः स्मृताः॥ ४ | ये सभी तपस्वी, व्रतधारी, प्रजाओंके पति तथा रुद्रस्वरूप कहे गये हैं॥ ४॥ |
| अयज्वानश्च यज्वानः पितरः प्रीतिमानसाः।<br>अग्निष्वात्ताश्च यज्वानः शेषा बर्हिषदः स्मृताः॥ ५ | अयज्वा तथा यज्वा—ये दो प्रकारके प्रसन्न मनवाले पितर हैं। उनमें यज्वा (यज्ञ करनेवाले) पितरोंको अग्निष्वात्त तथा अयज्वा पितरोंको बर्हिषद कहा जाता है॥ ५॥ |
| मेनां तु मानसीं तेषां जनयामास वै स्वधा।<br>अग्निष्वात्तात्मजा मेना मानसी लोकविश्रुता॥ ६ | स्वधाने उन अग्निष्वात्त पितरोंसे मेना नामक मानसी कन्या उत्पन्न की। अग्निष्वात्त पितरोंकी वह मानसी पुत्री मेना लोकमें अतीव प्रसिद्ध हुई॥ ६॥ |
| असूत मेना मैनाकं क्रौञ्चं तस्यानुजामुमाम्।<br>गङ्गां हैमवतीं जज्ञे भवाङ्गाश्लेषपावनीम्॥ ७ | मेनाने मैनाक, क्रौञ्च, उसकी अनुजा उमा तथा शिवजीके अंग-श्लेषके कारण (मस्तकपर विराजमान रहनेके कारण) जगत्को पवित्र करनेका गुण रखनेवाली हैमवती गंगाको उत्पन्न किया॥ ७॥ |
| धरणीं जनयामास मानसीं यज्ञयाजिनीम्।<br>स्वधा सा मेरुराजस्य पत्नी पद्मममानना॥ ८ | कमलके समान मुखवाली मेरुराजपत्नी स्वधाने यज्ञानुष्ठानमें प्रवृत्त रहनेवाली धरणी नामक मानसी पुत्रीको जन्म दिया। यहाँ अमृतपान करनेवाले पितरों तथा ऋषियोंके कुलका विस्तार दिया जा रहा है; आप लोग उसे विस्तारपूर्वक सुनिये॥ ८-९॥ |
| पितरोऽमृतपाः प्रोक्तास्तेषां चैवेह विस्तरः।<br>ऋषीणाञ्च कुलं सर्वं शृणुध्वं तत्सुविस्तरम्॥ ९ | |
| वदामि पृथगध्यायसंस्थितं वस्तुदूर्ध्वतः।<br>दाक्षायणी सती याता पार्श्वं रुद्रस्य पार्वती॥ १० | अब मैं आप सबसे पूर्वनिरूपित विषयका पुनः पृथक् अध्यायमें वर्णन करता हूँ। दक्षकन्या सतीका विवाह रुद्रके साथ हुआ और वे उनके साथ चली गयीं। फिर इन्हीं सतीने दक्षके यज्ञका विध्वंस करके अपना देहत्याग कर दिया। इसके बाद पार्वतीरूपमें पुनः शिवजीको पतिके रूपमें प्राप्त किया॥ १०<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| पश्चाद्दक्षं विनिन्द्यैषा पतिं लेभे भवं तथा।<br>तां ध्यात्वा ह्यसृजद्रुद्राननेकान्नीललोहितः॥ ११ |
अध्याय ६ ] अग्नि तथा पितरोंके वंशका वर्णन...परमेष्ठी सदाशिवकी महिमा ३३
| आत्मनस्तु समान् सर्वान् सर्वलोकनमस्कृतान्।<br>याचितो मुनिशार्दूला ब्रह्मणा प्रहसन् क्षणात् ॥ १२<br><br>तैस्तु संच्छादितं सर्वं चतुर्दशविधं जगत्।<br>तान्दृष्ट्वा विविधान् रुद्रान्निर्मलानीललोहितान् ॥ १३ | हे मुनिशार्दूलो! उन (पार्वती)-का ध्यान करके ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर नीललोहित महादेवजीने क्षण-भरमें लीलापूर्वक अपने ही तुल्य तथा समस्त लोकोंके वन्दनीय अनेक रुद्र उत्पन्न कर दिये। उन रुद्रोंने सभी चौदह भुवनोंको पूर्णरूपेण व्याप्त कर लिया॥ ११-१२ १/२॥ |
| जरामरणनिर्मुक्तान् प्राह रुद्रान् पितामहः।<br>नमोऽस्तु वो महादेवास्त्रिनेत्रा नीललोहिताः ॥ १४<br><br>सर्वज्ञाः सर्वगा दीर्घा ह्रस्वा वामनकाः शुभाः।<br>हिरण्यकेशा दृष्टिघ्ना नित्या बुद्धाश्च निर्मलाः ॥ १५<br><br>निर्द्वन्द्वा वीतरागाश्च विश्वात्मानो भवात्मजाः।<br>एवं स्तुत्वा तदा रुद्रान् रुद्रं चाह भवं शिवम्।<br>प्रदक्षिणीकृत्य तदा भगवान् कनकाण्डजः ॥ १६ | जरा-मरणसे मुक्त तथा निर्मल आत्मावाले उन विविध नीललोहित रुद्रोंको देखकर पितामह ब्रह्माजीने उनसे कहा॥ १३ १/२॥<br>हे त्रिनेत्रधारी नीललोहित महादेबो! आप सभीको नमस्कार है। आप सभी सर्वज्ञ हैं, सर्वव्यापी हैं, दीर्घ-ह्रस्व-वामन (बौना)-रूप धारण करनेवाले हैं, शुभ हैं, हिरण्यकेश हैं, दृष्टिघ्न हैं, नित्य हैं, चेतनायुक्त हैं, निर्मल आत्मावाले हैं, द्वन्द्वरहित हैं, वीतराग हैं, विश्वकी आत्मा हैं तथा शिवजीके आत्मज हैं। इस प्रकार उन रुद्रोंकी अनेकविध स्तुति करके कनकाण्डज (हिरण्यगर्भ) भगवान् ब्रह्माने शिवजीकी प्रदक्षिणाकर उन भवरूप शिवसे कहा॥ १४-१६॥ |
| नमोऽस्तु ते महादेव प्रजा नार्हसि शङ्कर।<br>मृत्युहीना विभोः स्रष्टुं मृत्युयुक्ताः सृज प्रभो ॥ १७ | हे महादेव! आपको नमस्कार है। हे प्रभो! हे शंकर! आपने तो अमर प्रजाओंको उत्पन्न कर दिया; ऐसी मृत्युहीन प्रजाकी सृष्टि उचित नहीं है। अतएव हे विभो! अब आप मरणधर्मा प्रजाओंका सृजन करनेकी कृपा करें॥ १७॥ |
| ततस्तमाह भगवान् नहि मे तादृशी स्थितिः।<br>स त्वं सृज यथाकामं मृत्युयुक्ताः प्रजाः प्रभो ॥ १८ | तब भगवान् शंकरने ब्रह्मासे कहा—हे प्रभो! उस प्रकारकी (मरणधर्मा) सृष्टि करनेकी मेरी स्थिति नहीं है। अतएव आप ही मृत्युसे युक्त रहनेवाली प्रजाका अपने इच्छानुसार सृजन कीजिये॥ १८॥ |
| लब्ध्वा ससर्ज सकलं शङ्कराच्चतुराननः।<br>जरामरणसंयुक्तं जगदेतच्चराचरम् ॥ १९ | भगवान् शंकरकी ऐसी आज्ञा प्राप्तकर चतुरानन ब्रह्माने जरा-मरणसे युक्त इस सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्की रचना की॥ १९॥ |
| शङ्करोऽपि तदा रुद्रैर्निवृत्तात्मा ह्यधिष्ठितः।<br>स्थाणुत्वं तस्य वै विप्राः शङ्करस्य महात्मनः ॥ २० | भगवान् शंकर भी उस समय रुद्रों (रुद्रात्मक सृष्टिके सृजन)-से निवृत्त आत्मावाले होकर अधिष्ठित हो गये। हे विप्रो! निष्कल आत्मावाले तथा अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले उन महात्मा शंकरका |
| निष्कलस्यात्मनः शम्भोः स्वेच्छाधृतशरीरिणः।<br>शं रुद्रः सर्वभूतानां करोति घृणया यतः ॥ २१ |
| ३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| | स्थाणुत्व हो गया। इसीलिये वे भगवान् रुद्र दयार्द्र होकर सभी प्राणियोंका कल्याण करते हैं॥२०-२१॥ | | शङ्करश्चाप्रयत्नेन तदात्मा योगविद्यया।<br>वैराग्यस्थं विरक्तस्य विमुक्तिर्यच्छमुच्यते॥ २२ | भगवान् शंकरकी आत्मा बिना प्रयत्नके ही कल्याण करनेवाली है। वे योगविद्याके द्वारा वैराग्यमें स्थित रहते हैं। विरक्त पुरुषकी मुक्तिको ही कल्याण कहा जाता है॥२२॥ | | अणोस्तु विषयत्यागः संसारभयतः क्रमात्।<br>वैराग्याज्जायते पुंसो विरागो दर्शनान्तरे॥ २३ | स्वल्प विषयोंका त्याग करके प्राणी सांसारिक भयसे मुक्त होकर क्रमसे वैराग्यको प्राप्त होता है और उस वैराग्यसे उस विरागी पुरुषको अन्तमें शिवजीका साक्षात् दर्शन प्राप्त होता है॥२३॥ | | विमुख्यो विगुणत्यागो विज्ञानस्याविचारतः।<br>तस्य चास्य च सन्धानं प्रसादात् परमेष्ठिनः॥ २४ | संसारनिवर्तक आत्मानात्मविवेकरूप विशिष्ट ज्ञानका विचार किये बिना जो क्षणिक विषयत्याग है, वह ज्ञानरहित होनेसे अस्थायी है, अतएव विमुख्य [अप्रशस्य] है। उस सत्, असत् वस्तु-विवेकरूप विचार तथा इस (सांसारिक) विषयोंके त्यागका एक साथ होना परमेष्ठी सदाशिवके कृपाप्रसादसे ही सम्भव है॥२४॥ | | धर्मो ज्ञानञ्च वैराग्यमैश्वर्यं शङ्करादिह।<br>स एव शङ्करः साक्षात् पिनाकी नीललोहितः॥ २५ | इस लोकमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य शिवजीकी कृपासे प्राप्त होते हैं। वे कल्याण करनेके कारण शंकर हैं, पिनाक नामक धनुष धारण करनेके कारण पिनाकी हैं तथा उनका कण्ठ नीला एवं देह लाल होनेके कारण नीललोहित हैं॥२५॥ | | ये शङ्कराश्रिताः सर्वे मुच्यन्ते ते न संशयः।<br>न गच्छन्त्येव नरकं पापिष्ठा अपि दारुणम्॥ २६<br><br>आश्रिताः शङ्करं तस्मात्प्राप्नुवन्ति च शाश्वतम्। | जो प्राणी शंकरजीका आश्रय ग्रहण करते हैं अर्थात् उनके शरणागत होते हैं, वे सभी मुक्ति प्राप्त करते हैं। भगवान् शंकरके आश्रित महान् पापी भी अत्यन्त भयावह नरकको नहीं प्राप्त होते हैं। वे शिवजीके शाश्वत पदको पा जाते हैं। इस विषयमें कोई भी संदेह नहीं है॥२६ १/२॥ | | ऋषय ऊचुः<br>मायान्ताश्चैव घोराद्या ह्यष्टाविंशतिरेव च॥ २७<br><br>कोटयो नरकाणान्तु पच्यन्ते तासु पापिनः।<br>अनाश्रिताः शिवं रुद्रं शङ्करं नीललोहितम्॥ २८ | **ऋषिगण बोले—**अहंकार (घोर)-से लेकर मायापर्यन्त विभिन्न प्रकारके कुल अट्ठाईस करोड़ नरक हैं; उनमें जाकर पापी प्राणी अपने द्वारा किये गये कर्मोंके फल भोगते हैं। ये वही प्राणी होते हैं, जो शिव, रुद्र, शंकर, नीललोहित, सभी प्राणियोंके आश्रय, | | आश्रयं सर्वभूतानामव्ययं जगतां पतिम्।<br>पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्॥ २९ | अव्यय, जगत्पति, विराट् पुरुष, परमात्मा, पुरुहूत, |
७- माहेश्वरयोगका प्रतिपादन, अट्ठाईस व्यासों तथा चौदह मनुओंकी नामावली, विभिन्न युगोंमें हुए माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन
अध्याय ७ ] माहेश्वरयोगका प्रतिपादन···माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन [ ३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकाण्डजम्।<br>सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं निर्गुणत्वे महेश्वरम्॥ ३० | पुरुष्टुत, तमोगुणकी प्रधानता होनेपर कालरुद्ररूप, रजो-गुणकी प्रधानता होनेपर ब्रह्मारूप, सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेपर सर्वव्यापी विष्णुरूप तथा गुणरहित होनेपर महेश्वर-रूप भगवान् महादेवजीका आश्रय ग्रहण नहीं किये होते हैं॥ २७–३०॥ |
| केन गच्छन्ति नरकं नराः केन महामते।<br>कर्मणाकर्मणा वापि श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ ३१ | हे महामते! अब हम लोगोंकी यह सुननेकी उत्कट अभिलाषा है कि किन-किन कर्मोंके करने अथवा न करनेसे मनुष्य नरकको प्राप्त होते हैं॥ ३१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शङ्करमाहात्म्यवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शंकरमाहात्म्यवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
माहेश्वरयोगका प्रतिपादन, अट्ठाईस व्यासों तथा चौदह मनुओंकी नामावली, विभिन्न युगोंमें हुए माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>रहस्यं वः प्रवक्ष्यामि भवस्यामिततेजसः।<br>प्रभावं शङ्करस्याद्यं सङ्क्षेपात् सर्वदर्शिनः॥ १ | सूतजी बोले—[हे मुनीश्वरो!] अब मैं संक्षेपमें अमित तेजवाले, सर्वतत्त्वदर्शी भगवान् शंकरके रहस्य तथा श्रेष्ठ प्रभावका वर्णन करूँगा॥ १॥ |
| योगिनः सर्वतत्त्वज्ञाः परं वैराग्यमास्थिताः।<br>प्राणायामादिभिश्चाष्टसाधनैः सहचारिणः॥ २<br><br>करुणादिगुणोपेताः कृत्वापि विविधानि ते।<br>कर्माणि नरकं स्वर्गं गच्छन्त्येव स्वकर्मणा॥ ३ | सभी तत्त्वोंको जाननेवाले, परम वैराग्यको प्राप्त, प्राणायाम आदि योगके आठ साधनोंसे युक्त तथा करुणा आदि गुणोंसे सम्पन्न बड़े-बड़े योगिजन नानाविध कर्म करके भी अपने कर्मानुसार नरक तथा स्वर्गमें जाते हैं॥ २-३॥ |
| प्रसादाज्जायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते।<br>योगेन जायते मुक्तिः प्रसादादखिलं ततः॥ ४ | भगवान् शंकरकी अनुकम्पासे ज्ञान उत्पन्न होता है, ज्ञानसे योगमें प्रवृत्ति होती है और योगसे मुक्तिकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार उन्हें शिवजीकी कृपासे सब कुछ सिद्ध होता है॥ ४॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>प्रसादाद् यदि विज्ञानं स्वरूपं वक्तुमर्हसि।<br>दिव्यं माहेश्वरञ्चैव योगं योगविदां वर॥ ५ | **ऋषिगण बोले—**हे योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! शिवजीकी कृपासे ही यदि विशिष्ट ज्ञान तथा योग होता है, तो उस ज्ञानस्वरूप दिव्य माहेश्वरयोगका आप वर्णन कीजिये॥ ५॥ |
| कथं करोति भगवान् चिन्तया रहितः शिवः।<br>प्रसादं योगमार्गेण कस्मिन् काले नृणां विभुः॥ ६ | विभुतासम्पन्न तथा चिन्तारहित भगवान् शिव योगमार्गके द्वारा किस प्रकार तथा किस कालमें प्राणियोंके ऊपर अनुग्रह करते हैं?॥ ६॥ |
| रोमहर्षण उवाच<br>देवानाञ्च ऋषीणाञ्च पितॄणां सन्निधौ पुरा।<br>शैलादिना तु कथितं शृण्वन्तु ब्रह्मसूनवे॥ ७ | **सूतजी बोले—**प्राचीनकालमें देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंकी सन्निधिमें शिलादपुत्र नन्दीके द्वारा ब्रह्मा-पुत्र सनत्कुमारसे जिस योगके विषयमें कहा गया था, उसे आपलोग सुनें॥ ७॥ |
| ३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| व्यासावताराणि तथा द्वापरान्ते च सुव्रताः।<br>योगाचार्यावताराणि तथा तिष्ये तु शूलिनः॥ ८<br>तत्र तत्र विभोः शिष्याश्चत्वारः शमभाजनाः।<br>प्रशिष्या बहवस्तेषां प्रसीदत्येवमीश्वरः॥ ९<br>एवं क्रमागतं ज्ञानं मुखादेव नृणां विभोः।<br>वैश्यान्तं ब्राह्मणाद्यं हि घृणया चानुरूपतः॥ १० | हे सुव्रत ऋषियो! द्वापरके अन्तमें व्यासके अवतार, योगाचार्योंके अवतार तथा कलियुगमें शिवजीके अवतार, प्रभुके पवित्र अन्तःकरणवाले चार शिष्य और बहुतसे प्रशिष्य हुए—वे सब महेश्वरकी कृपासे ही योगमें प्रवृत्त हुए॥ ८-९॥<br>इस प्रकार वह ज्ञान क्रमशः शिष्य-परम्पराके माध्यमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्योंको भगवान् शिवकी कृपासे उनके मुखसे प्राप्त हुआ॥ १०॥ | | ऋषय ऊचुः<br>द्वापरे द्वापरे व्यासाः के वै कुत्रान्तरेषु वै।<br>कल्पेषु कस्मिन् कल्पे नो वक्तुमर्हसि चात्र तान्॥ ११ | **ऋषिगण बोले—**प्रत्येक द्वापरमें, किन-किन कल्पोंमें तथा किन मन्वन्तरोंमें कौन-कौन व्यास हुए हैं? आप उनके विषयमें हमलोगोंको बताइये॥ ११॥ | | सूत उवाच<br>शृण्वन्तु कल्पे वाराहे द्विजा वैवस्वतान्तरे।<br>व्यासांश्च साम्प्रतं रुद्रांस्तथा सर्वान्तरेषु वै॥ १२<br>वेदानाञ्च पुराणानां तथा ज्ञानप्रदर्शकान्।<br>यथाक्रमं प्रवक्ष्यामि सर्वावर्तेषु साम्प्रतम्॥ १३ | **सूतजी बोले—**हे द्विजो! वर्तमान वाराह कल्प तथा वैवस्वत मन्वन्तरमें एवं अन्य मन्वन्तरोंमें भी जो व्यास तथा रुद्र हुए हैं, उन सभी ज्ञानप्रदर्शक महात्माओंके विषयमें वेदों तथा पुराणोंके अनुसार मैं यथाक्रम कहता हूँ; आपलोग सुनिये॥ १२-१३॥ | | ऋतुः सत्यो भार्गवश्च अङ्गिराः सविता द्विजाः।<br>मृत्युः शतक्रतुर्धीमान् वसिष्ठो मुनिपुङ्गवः॥ १४<br>सारस्वतस्त्रिधामा च त्रिवृतो मुनिपुङ्गवः।<br>शततेजाः स्वयं धर्मो नारायण इति श्रुतः॥ १५<br>तरक्षुश्चारुणिर्धीमांस्तथा देवः कृतञ्जयः।<br>ऋतञ्जयो भरद्वाजो गौतमः कविसत्तमः॥ १६<br>वाचःश्रवाः मुनिः साक्षात्तथा शुष्मायणिः शुचिः।<br>तृणबिन्दुर्मुनी रुक्षः शक्तिः शाक्तेय उत्तरः॥ १७<br>जातूकण्योँ हरिः साक्षात् कृष्णद्वैपायनो मुनिः।<br>व्यासास्त्वेते च शृण्वन्तु कलौ योगेश्वरान् क्रमात्॥ १८<br>असंख्याता हि कल्पेषु विभोः सर्वान्तरेषु च।<br>कलौ रुद्रावताराणां व्यासानां किल गौरवात्॥ १९<br>वैवस्वतान्तरे कल्पे वाराहे ये च तान् पुनः।<br>अवतारान् प्रवक्ष्यामि तथा सर्वान्तरेषु वै॥ २० | हे द्विजो! ऋतु, सत्य, भार्गव, अंगिरा, सविता, मृत्यु, बुद्धिसम्पन्न शतक्रतु, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, मुनिवर त्रिवृत, शततेजा, साक्षात् धर्मस्वरूप नारायण, तरक्षु, बुद्धियुक्त अरुणि, देव, कृतंजय, ऋतंजय, भरद्वाज, कविश्रेष्ठ गौतम, साक्षात् मुनिस्वरूप वाचःश्रवा, परम पावन शुष्मायणि, मुनि तृणबिन्दु, रुक्ष, शक्ति, शक्तिपुत्र पराशर, जातूकर्ण्य तथा साक्षात् विष्णुस्वरूप मुनि कृष्णद्वैपायन—ये अट्ठाईस व्यास हुए। इसी प्रकार कलियुगमें क्रमसे जो योगेश्वर हुए, कल्पोंमें तथा सभी मन्वन्तरोंमें महेश्वरके जो असंख्य अवतार हुए, कलिमें विशेष महिमाके कारण रुद्रों तथा व्यासोंके जो अवतार हुए एवं श्वेतवाराह कल्पके वैवस्वत मन्वन्तरमें तथा अन्य मन्वन्तरोंमें जो अवतार हुए—उन सभीके विषयमें मैं आप लोगोंको बताऊँगा; आप सब सुनें॥ १४-२०॥ | | ऋषय ऊचुः<br>मन्वन्तराणि वाराहे वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्।<br>तथैव चोर्ध्वकल्पेषु सिद्धान् वैवस्वतान्तरे॥ २१ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] सर्वप्रथम आप वाराह कल्प तथा अन्य कल्पोंके मन्वन्तरोंका वर्णन कीजिये। तत्पश्चात् वैवस्वत मन्वन्तरमें हो चुके सिद्धोंके विषयमें बताइये॥ २१॥ | | रोमहर्षण उवाच<br>मनुः स्वायम्भुवस्त्वाद्यास्ततः स्वारोचिषो द्विजाः।<br>उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा॥ २२ | **सूतजी बोले—**हे द्विजो! आदिमनु स्वायम्भुव मनु हैं, उनके बाद स्वारोचिष मनु हुए। इसी प्रकार |
अध्याय ७ ] माहेश्वरयोगका प्रतिपादन···माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन ३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वैवस्वतश्च सावर्णिर्धर्मः सावर्णिणकः पुनः।<br>पिशङ्गश्चापिशङ्गाभः शबलो वर्णकस्तथा॥ २३<br>औकारान्ता अकाराद्या मनवः परिकीर्तिताः।<br>श्वेतः पाण्डुस्तथा रक्तस्ताम्रः पीतश्च कापिलः॥ २४<br>कृष्णः श्यामस्तथा धूम्रः सुधूम्रश्च द्विजोत्तमाः।<br>अपिशङ्गः पिशङ्गश्च त्रिवर्णः शबलस्तथा॥ २५<br>कालन्धुरस्तु कथिता वर्णतो मनवः शुभाः।<br>नामतॊ वर्णतश्चैव वर्णतः पुनरेव च॥ २६ | क्रमसे उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, धर्म, सावर्णिणक, पिशंग, अपिशंगाभ, शबल तथा वर्णक—ये अकारसे लेकर औकारपर्यन्त चौदह स्वरोंके रूपवाले चौदह मनु कहे गये हैं। हे उत्तम ब्राह्मणो ! श्वेत, पाण्डु, रक्त, ताम्र, पीत, कापिल, कृष्ण, श्याम, धूम्र, सुधूम्र, अपिशंग, पिशंग, त्रिवर्ण शबल तथा कालन्धुर—ये चौदह वर्ण (रंग) उन पवित्र मनुओके कहे गये हैं। इस प्रकार वे चौदह मनु स्वायम्भुव आदि नामोंसे, अकार आदि वर्णोंसे तथा श्वेत आदि वर्णों (रंगों)-से अभिहित किये गये हैं॥ २२—२६॥ |
| स्वरात्मानः समाख्याताश्चान्तरे॒शाः समासतः।<br>वैवस्वत ऋकारस्तु मनुः कृष्णः सुरेश्वरः॥ २७<br>सप्तमस्तस्य वक्ष्यामि युगावर्तेषु योगिनः।<br>समतीतेषु कल्पेषु तथा चानागतेषु वै॥ २८ | सभी मन्वन्तराधिपति संक्षेपमें स्वरात्मक कहे गये हैं। ये वर्तमान सुरेश्वर वैवस्वत मनु ऋकाररूप, कृष्णवर्ण तथा क्रममें सातवें हैं। बीते हुए तथा अनागत कल्पोंमें युगके आवर्तनोंपर आनेवाले योगिरूप उस वैवस्वत मनुके बारेमें मैं बताता हूँ॥ २७-२८॥ |
| वाराहः साम्प्रतं ज्ञेयः सप्तमान्तरतः क्रमात्।<br>योगावतांराश्च विभोः शिष्याणां सन्ततिस्तथा॥ २९ | वर्तमान कल्पको श्वेतवाराह कल्प जानना चाहिये। अब मैं इस कल्पके सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें महेश्वरके योगावतारों तथा शिष्यों-प्रशिष्योंका वर्णन करता हूँ॥ २९॥ |
| सम्प्रेक्ष्य सर्वकालेषु तथावर्तेषु योगिनाम्।<br>आद्ये श्वेतः कलौ रुद्रः सुतारो मदनस्तथा॥ ३०<br>सुहोत्रः कङ्कणश्चैव लोगाक्षिर्मुनिंसत्तमाः।<br>जैगीषव्यो महातेजा भगवान् दधिवाहनः॥ ३१<br>ऋषभश्च मुनिर्धीमानुग्रश्चात्रिः सुबालकः।<br>गौतमश्चाथ भगवान् सर्वदेवनमस्कृतः॥ ३२<br>वेदशीर्षश्च गोकर्णो गुहावासी शिखण्डभृत्।<br>जटामाल्यट्टहासश्च दारुको लाङ्गली तथा॥ ३३<br>महाकायमुनिः शूली दण्डी मुण्डीश्वरः स्वयम्।<br>सहिष्णुः सोमशर्मा च नकुलीशो जगद्गुरुः॥ ३४ | सभी कालोंमें तथा युगावर्तनोंमें योगावतारोंको भलीभाँति समझकर उन्हें बताता हूँ। आदि कलि अर्थात् स्वायम्भुव मनुके प्रथम कलिमें रुद्रका ‘श्वेत’ नामक अवतार हुआ; इसके बाद हे श्रेष्ठ मुनियो ! क्रमसे सुतार, मदन, सुहोत्र, कंकण, लोगाक्षि, जैगीषव्य, महातेजस्वी भगवान् दधिवाहन, ऋषभ, मुनि, मेधासम्पन्न उग्र, अत्रि, सुबालक, सभी देवोंके वन्दनीय भगवान् गौतम, वेदशीर्ष, गोकर्ण, गुहावासी, शिखण्डभृत्, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लांगली, महाकायमुनि, शूली, दण्डधारी मुण्डीश्वर, सहिष्णु, सोमशर्मा तथा जगद्गुरु नकुलीश—ये अट्ठाईस योगाचार्य अवतरित हुए॥ ३०—३४॥ |
| वैवस्वतेऽन्तरे सम्यक् प्रोक्ता हि परमात्मनः।<br>योगाचार्यावतारा ये सर्वावर्तेषु सुव्रताः॥ ३५<br>व्यासाश्चैवं मुनिश्रेष्ठा द्वापरे द्वापरे त्विमे।<br>योगेश्वराणां चत्वारः शिष्याः प्रत्येकमव्ययाः॥ ३६ | हे सुव्रतो ! सभी युगावर्तोंमें महेश्वरके जो योगाचार्यावतार हुए हैं, वे वैवस्वत मन्वन्तरमें भी भलीभाँति कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो ! इस प्रकार प्रत्येक द्वापरमें ये व्यास भी हुए हैं। उन योगेश्वरोंमें सभीके चार-चार शिष्य हुए, जो काम-क्रोधादि विकारोंसे रहित थे॥ ३५-३६॥ |
| श्वेतः श्वेतशिखण्डी च श्वेताश्वः श्वेतलोहितः।<br>दुन्दुभिः शतरूपश्च ऋचीकः केतुमांस्तथा॥ ३७ | श्वेत, श्वेतशिखण्डी, श्वेताश्व, श्वेतलोहित, दुन्दुभि, |
| ३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| विशोकश्च विकेशश्च विपाशः पापनाशनः। <br> सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुर्दम्यो दुरतिक्रमः॥ ३८ <br> सनकश्च सनन्दश्च प्रभुर्यश्च सनातनः। <br> ऋभुः सनत्कुमारश्च सुधामा विरजास्तथा॥ ३९ <br> शङ्खपा द्वैरजश्चैव मेघः सारस्वतस्तथा। <br> सुवाहनो मुनिश्रेष्ठो मेघवाहो महाद्युतिः॥ ४० <br> कपिलश्चासुरिश्चैव तथा पञ्चशिखो मुनिः। <br> वाल्कलश्च महायोगी धर्मात्मानो महौजसः॥ ४१ <br> पाराशरश्च गर्गश्च भार्गवश्चाङ्गिरास्तथा। <br> बलबन्धुर्निरामित्रः केतुशृङ्गस्तपोधनः॥ ४२ <br> लम्बोदरश्च लम्बश्च लम्बाक्षो लम्बकेशकः। <br> सर्वज्ञः समबुद्धिश्च साध्यः सर्वस्तथैव च॥ ४३ <br> सुधामा काश्यपश्चैव वासिष्ठो विरजास्तथा। <br> अत्रिर्देवसदश्चैव श्रवणोऽथ श्रविष्ठकः। <br> कुणिश्च कुणिबाहुश्च कुशीरिः कुनेत्रकः॥ ४४ <br> कश्यपोऽप्युशनाश्चैव च्यवनोऽथ बृहस्पतिः। <br> उतथ्यो वामदेवश्च महायोगो महाबलः॥ ४५ <br> वाचःश्रवा सुधीकश्च श्यावाश्वश्च यतीश्वरः। <br> हिरण्यनाभः कौशल्यो लोगाक्षिः कुथुमिस्तथा॥ ४६ <br> सुमन्तुर्बर्बरी विद्वान् कबन्धः कुशिकन्धरः। <br> प्लक्षो दाल्भायणििश्चैव केतुमान् गोपनस्तथा॥ ४७ <br> भल्लावी मधुपिङ्गश्च श्वेतकेतुस्तपोनिधिः। <br> उशिको बृहदश्वश्च देवलः कविरेव च॥ ४८ <br> शालिहोत्रोऽग्निवेशश्च युवनाश्वः शरद्वसुः। <br> छागलः कुण्डकर्णश्च कुम्भश्चैव प्रवाहकः॥ ४९ <br> उलूको विद्युतश्चैव मण्डूको ह्याश्वलायनः। <br> अक्षपादः कुमारश्च उलूको वत्स एव च॥ ५० <br> कुशिकश्चैव गर्भश्च मित्रः कौरुष्य एव च। <br> शिष्यास्त्वेते महात्मानः सर्वावर्तेषु योगिनाम्॥ ५१ <br> विमला ब्रह्मभूयिष्ठा ज्ञानयोगपरायणाः। <br> एते पाशुपताः सिद्धा भस्मोद्धूलितविग्रहाः॥ ५२ | शतरूप, ऋचीक, केतुमान्, विशोक, विकेश, विपाश, पापनाशन, सुमुख, दुर्मुख, दुर्दम, दुरतिक्रम, सनक, सनन्द, दिव्यशक्तिसम्पन्न सनातन, ऋभु, सनत्कुमार, सुधामा, विरजा, शंखपा, द्वैरज, मेघ, सारस्वत, मुनिवर सुवाहन, महातेजस्वी मेघवाह, कपिल, आसुरि, मुनि पंचशिख तथा महायोगी वाल्कल—ये सभी धर्मात्मा तथा महान् ओजस्वी शिष्य हुए। इसी क्रममें पुनः पराशर, गर्ग, भार्गव, अंगिरा, बलबन्धु, निरामित्र, केतुशृंग, तपोधन, लम्बोदर, लम्ब, लम्बाक्ष, लम्बकेशक, सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य, सर्व, सुधामा, काश्यप, वासिष्ठ, विरजा, अत्रि, देवसद, श्रवण, श्रविष्ठक, कुणि, कुणिबाहु, कुशीर, कुनेत्रक, कश्यप, उशना, च्यवन, बृहस्पति, उतथ्य, वामदेव, महायोग, महाबल, वाचःश्रवा, सुधीक, श्यावाश्व, यतीश्वर, हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोगाक्षि, कुथुमि, सुमन्तु, विद्वान् बर्बरी, कबन्ध, कुशिकन्धर, प्लक्ष, दाल्भ्याायणि, केतुमान्, गोपन, भल्लावी, मधुपिंग, श्वेतकेतु, तपोनिधि, उशिक, बृहदश्व, देवल, कवि, शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व, शरद्वसु, छागल, कुण्डकर्ण, कुम्भ, प्रवाहक, उलूक, विद्युत्, मण्डूक, आश्वलायन, अक्षपाद, कुमार, उलूक, वत्स, कुशिक, गर्भ, मित्र तथा कौरुष्य नामवाले शिष्य भी हुए। सभी युगावर्तोमें योगाचार्योंके ये महात्मा शिष्य कहे गये हैं। ये सब विमल आत्मावाले, सिद्ध, ब्रह्मनिष्ठ, ज्ञान तथा योगमें निरत रहनेवाले भस्म-विभूषित शरीरवाले तथा शैवी दीक्षासे सम्पन्न हैं॥ ३७-५२॥ | | शिष्याः प्रशिष्याश्चैतेषां शतशोऽथ सहस्रशः। <br> प्राप्य पाशुपतं योगं रुद्रलोकाय संस्थिताः॥ ५३ | इनके भी सैकड़ों-हजारों शिष्य तथा प्रशिष्य पाशुपत योग प्राप्तकर शिवलोकके अधिकारी हुए॥ ५३॥ | | देवाद्यः पिशाचान्ताः पशवः परिकीर्तिताः। <br> तेषां पतित्वात्सर्वेशो भवः पशुपतिः स्मृतः॥ ५४ | देवतासे लेकर पिशाचपर्यन्त सभी प्राणी पशु कहे गये हैं, उनका पति अर्थात् स्वामी होनेके कारण सर्वेश्वर शिवको पशुपति कहा जाता है॥ ५४॥ | | तेन प्रणीतो रुद्रेण पशूनां पतिना द्विजाः। <br> योगः पाशुपतो ज्ञेयः परावरविभूतये॥ ५५ | हे द्विजो! सभीको परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेहेतु उन पशुपति रुद्रके द्वारा प्रवर्तित योग 'पाशुपतयोग' के नामसे जाना जाता है॥ ५५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मनुव्यासयोगेश्वरतच्छिष्यकथनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मनुव्यासयोगेश्वरतच्छिष्यकथन' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७॥
८- शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन, योगका स्वरूप, अष्टांगयोगका वर्णन, विषयभोगोंकी निस्सारता, प्राणायामकी महिमा, सदाशिवके ध्यानका स्वरूप
अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप [ ३९
आठवाँ अध्याय
शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन, योगका स्वरूप, अष्टांगयोगका वर्णन, विषयभोगोंकी निस्सारता, प्राणायामकी महिमा, सदाशिवके ध्यानका स्वरूप
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>सङ्क्षेपतः प्रवक्ष्यामि योगस्थानानि साम्प्रतम्।<br>कल्पितानि शिवेनैव हिताय जगतां द्विजाः॥ १॥ | **सूतजी बोले—**हे द्विजो! अब मैं भगवान् शंकरके द्वारा जगत्के हितार्थ कल्पित किये गये योगस्थानोंका संक्षेपमें वर्णन करूँगा॥ १॥ |
| गलादधो वितस्त्या यन्नाभेरुपरि चोत्तमम्।<br>योगस्थानमधो नाभेरावर्तं मध्यमं भ्रुवोः॥ २॥ | गलेसे नीचे तथा नाभिसे ऊपरका वितस्ति (बारह अँगल) परिमाणवाला [हृत्कमल नामक] स्थान योगके लिये उत्तम स्थान है। इसी प्रकार नाभिसे नीचे मूलाधार नामक तथा दोनों भृकुटियोंके मध्यमें आवर्त [आज्ञाचक्र] नामक स्थान भी योगस्थान है॥ २॥ |
| सर्वार्थज्ञाननिष्पत्तिरात्मनो योग उच्यते।<br>एकाग्रता भवेच्चैव सर्वदा तत्प्रसादतः॥ ३॥ | जीवको परमार्थ तत्त्वका ज्ञान प्राप्त होना ही योग कहा जाता है और चित्तकी एकाग्रता सर्वदा उन्हीं शिवके अनुग्रहसे होती है॥ ३॥ |
| प्रसादस्य स्वरूपं यत्स्वसंवेद्यं द्विजोत्तमाः।<br>वक्तुं न शक्यं ब्रह्माद्यैः क्रमशो जायते नृणाम्॥ ४॥ | हे श्रेष्ठ द्विजो! उस अनुग्रहका स्वरूप स्वसंवेद्य है अर्थात् स्वानुभूतिका विषय है। ब्रह्मा आदि भी उस स्वरूपका वर्णन नहीं कर सकते। मनुष्य धीरे-धीरे उस स्वरूपको योगके माध्यमसे जान लेता है॥ ४॥ |
| योगशब्देन निर्वाणं माहेशं पदमुच्यते।<br>तस्य हेतुर्ऋषेर्ज्ञानं ज्ञानं तस्य प्रसादतः॥ ५॥ | योगसाधनासे प्राप्त निर्वाण माहेश्वर पद कहा जाता है। उस निर्वाणका हेतु रुद्रका ज्ञान हो जाना ही है और वह ज्ञान उन्हींकी कृपासे होता है॥ ५॥ |
| ज्ञानेन निर्दहेत्पापं निरुध्य विषयान् सदा।<br>निरुद्धेन्द्रियवृत्तेस्तु योगसिद्धिर्भविष्यति॥ ६॥ | जो सभी इन्द्रियोंको नियन्त्रित करके उस ज्ञानसे पापोंको जला डालता है, इन्द्रियोंकी वृत्तियोंपर नियन्त्रण रखनेवाले उस प्राणीको योगकी सिद्धि अवश्य होती है॥ ६॥ |
| योगो निरोधो वृत्तेषु चित्तस्य द्विजसत्तमाः।<br>साधनान्यष्टधा चास्य कथितानीह सिद्धये॥ ७॥ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चित्तकी वृत्तियोंपर नियन्त्रण करना ही योग है। सिद्धिप्राप्तिके लिये इस योगके आठ प्रकारके साधन यहाँ बताये गये हैं॥ ७॥ |
| यमस्तु प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो नियमस्तथा।<br>तृतीयमासनं प्रोक्तं प्राणायामस्ततः परम्॥ ८॥<br><br>प्रत्याहारः पञ्चमो वै धारणा च ततः परा।<br>ध्यानं सप्तममित्युक्तं समाधिस्त्वष्टमः स्मृतः॥ ९॥ | पहला साधन यम, दूसरा नियम, तीसरा आसन, चौथा प्राणायाम, पाँचवाँ प्रत्याहार, छठाँ धारणा, सातवाँ ध्यान तथा आठवाँ साधन समाधि कहा गया है॥ ८-९॥ |
| तपस्युपरमश्चैव यम इत्यभिधीयते।<br>अहिंसा प्रथमो हेतुर्यमस्य यमिनां वराः॥ १०॥<br><br>सत्यमस्तेयमपरं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ।<br>नियमस्यापि वै मूलं यम एव न संशयः॥ ११॥ | तपमें प्रवृत्ति तथा विषय-भोगोंसे निवृत्तिको यम कहते हैं। यमकी साधना करनेवालोंमें श्रेष्ठ हे मुनियो! यमका प्रथम हेतु अहिंसा है। पुनः सत्य, अस्तेय (चोरी |
| ४० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह भी यमके आधार हैं। नियमका भी मूल यही यम है; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ १०-११॥ | |
|---|---|
| आत्मवत्सर्वभूतानां हितायैव प्रवर्तनम्।<br>अहिंसैषा समाख्याता या चात्मज्ञानसिद्धिदा॥ १२ | सभी प्राणियोंमें आत्मवत् दृष्टि रखकर उनके हितके लिये प्रवृत्त रहनेको अहिंसा कहा गया है। इस अहिंसासे आत्मज्ञानकी सिद्धि प्राप्त होती है॥ १२॥ |
| दृष्टं श्रुतं चानुमितं स्वानुभूतं यथार्थतः।<br>कथनं सत्यमित्युक्तं परपीडाविवर्जितम्॥ १३ | जैसा देखा गया हो, सुना गया हो, अनुमान किया गया हो तथा स्वयं अनुभव किया गया हो—उसे ठीक उसी तरहसे दूसरोंको कष्ट न पहुँचाते हुए कह देना ही 'सत्य' कहा जाता है॥ १३॥ |
| नाश्लीलं कीर्तयेदेवं ब्राह्मणानामिति श्रुतिः।<br>परदोषान् परिज्ञाय न वदेदिति चापरम्॥ १४ | ब्राह्मण तथा वेद ऐसा कहते हैं कि अश्लील बातें नहीं करनी चाहिये और दूसरोंके दोष जानकर भी उसे अन्य व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिये॥ १४॥ |
| अनादानं परस्वानामापद्यपि विचारतः।<br>मनसा कर्मणा वाचा तदस्तेयं समासतः॥ १५ | विपत्तिकालमें भी विचारपूर्वक मन, वचन तथा कर्मसे दूसरोंका द्रव्य न लेना ही संक्षेपमें अस्तेय (चोरी न करना) कहा जाता है॥ १५॥ |
| मैथुनस्याप्रवृत्तिर्हि मनोवाक्कायकर्मणा।<br>ब्रह्मचर्यमिति प्रोक्तं यतीनां ब्रह्मचारिणाम्॥ १६<br><br>इह वैखानसानां च विदाराणां विशेषतः।<br>सदाराणां गृहस्थानां तथैव च वदामि वः॥ १७<br><br>स्वदारे विधिवत्कृत्वा निवृत्तिश्चान्यतः सदा।<br>मनसा कर्मणा वाचा ब्रह्मचर्यमिति स्मृतम्॥ १८ | यतियों, ब्रह्मचारियों तथा विशेष रूपसे पत्नीरहित संन्यासियोंके द्वारा मन, वचन तथा कर्मसे मैथुनमें प्रवृत्ति न रखना—उनके लिये ब्रह्मचर्य कहा गया है। पत्नीयुक्त गृहस्थोंके (ब्रह्मचर्यके) विषयमें मैं अब आपलोगोंको बताता हूँ। मन, वाणी तथा कर्मसे परनारीमें सदा भोगकी प्रवृत्ति न रखते हुए अपनी पत्नीके साथ उचित समयपर प्रसंग करना ब्रह्मचर्य कहा गया है॥ १६—१८॥ |
| मेध्या स्वनारी सम्भोगं कृत्वा स्नानं समाचरेत्।<br>एवं गृहस्थो युक्तात्मा ब्रह्मचारी न संशयः॥ १९ | यद्यपि अपनी स्त्री भोगकालमें पवित्र होती है, फिर भी उसके साथ संभोगके अनन्तर स्नान कर लेना चाहिये। ऐसा करनेवाला पवित्रात्मा गृहस्थ निःसंदेह ब्रह्मचारी ही कहा जाता है॥ १९॥ |
| अहिंसाप्येवमेवैषा द्विजगुरुवग्निपूजने।<br>विधिना तादृशी हिंसा सा त्वहिंसा इति स्मृता॥ २० | [जैसे शास्त्रविहित स्वदाराप्रवृत्त गृहस्थ ब्रह्मचारी ही है, ठीक वैसे ही] द्विज, गुरु, अग्नि (यज्ञ), पूजनके निमित्त शास्त्रविहित की गयी हिंसा भी अहिंसा ही मानी जाती है॥ २०॥ |
| स्त्रियः सदा परित्याज्याः सङ्गं नैव च कारयेत्।<br>कुणपेषु यथा चित्तं तथा कुर्याद्विचक्षणः॥ २१ | स्त्रियोंका सदैव त्याग करना चाहिये। उनके सान्निध्यसे बचना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको स्त्रियोंमें वही वृत्ति रखनी चाहिये, जैसी चित्तवृत्ति शवमें रखी जाती है॥ २१॥ |
अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों ( चक्रों )-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४१
| विण्मूत्रोत्सर्गकालेषु बहिर्भूमौ यथामतिः।<br>तथा कार्या रतौ चापि स्वदारे चान्यतः कुतः॥ २२ | जमीनपर मल तथा मूत्रके त्यागके समय जैसी मनःस्थिति होती है, वैसी ही मनोदशा अपनी पत्नीके साथ संभोगकालमें बनानी चाहिये, फिर अन्यकी तो बात ही क्या!॥ २२॥ |
|---|---|
| अङ्गारसदृशी नारी घृतकुम्भसमः पुमान्।<br>तस्मान्नारीषु संसर्गं दूरतः परिवर्जयेत्॥ २३ | स्त्री प्रज्वलित अंगारके समान तथा पुरुष घीके घड़ेके समान होता है, अतएव दूरसे ही नारियोंका संसर्ग छोड़ देना चाहिये॥ २३॥ |
| भोगेन तृप्तिर्नैवास्ति विषयाणां विचारतः।<br>तस्माद्विरागः कर्तव्यो मनसा कर्मणा गिरा॥ २४ | विषयोंके भोगसे इन्द्रियोंकी तृप्ति नहीं होती, अतएव विचारपूर्वक मन, वाणी तथा कर्मसे भोगोंके प्रति विरक्तिका भाव रखना चाहिये॥ २४॥ |
| न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।<br>हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ २५ | विषयोंके उपभोगसे कामनाओंकी शान्ति कभी भी नहीं होती है। यह कामना आहुति डालनेपर अग्निकी भाँति पुनः बढ़ती ही जाती है॥ २५॥ |
| तस्मात्त्यागः सदा कार्यस्त्वमृतत्वाय योगिना।<br>अविरक्तो यतो मर्त्यो नानायोनिषु वर्तते॥ २६ | अतः योगीको अमृतत्व-प्राप्तिके निमित्त भोगोंका सदाके लिये त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि मनुष्य वैराग्य-वृत्ति न रखनेके कारण अनेक योनियोंमें जन्म लेता रहता है॥ २६॥ |
| त्यागेनैवामृतत्वं हि श्रुतिस्मृतिविदां वराः।<br>कर्मणा प्रजया नास्ति द्रव्येण द्विजसत्तमाः॥ २७ | श्रुतियों तथा स्मृतियोंके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ हे मुनीश्वरो! त्यागसे ही अमृतत्वकी प्राप्ति सम्भव है। कर्मसे, सन्तानसे तथा द्रव्य आदि किसी भी साधनसे अमृतत्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती॥ २७॥ |
| तस्माद्विरागः कर्तव्यो मनोवाक्कायकर्मणा।<br>ऋतौ ऋतौ निवृत्तिस्तु ब्रह्मचर्यमिति स्मृतम्॥ २८ | इसीलिये सद्गृहस्थ प्राणीको चाहिये कि वह मनसा, वाचा, कर्मणा विषयोंसे राग-निवृत्ति करें; क्योंकि ऋतुकालको छोड़कर समागमकी अनाकांक्षाको भी ब्रह्मचर्य कहा गया है॥ २८॥ |
| यमाः सङ्क्षेपतः प्रोक्ता नियमांश्च वदामि वः।<br>शौचमिज्या तपो दानं स्वाध्यायोपस्थनिग्रहः॥ २९ | [हे मुनियो!] मैंने संक्षेपमें यमोंके विषयमें बता दिया और अब आपलोगोंसे नियमोंका वर्णन करता हूँ। शौच, यज्ञ, तप, दान, स्वाध्याय, इन्द्रियनिग्रह, व्रत, उपवास, मौन तथा स्नान—ये दस प्रकारके नियम हैं॥ २९ १/२॥ |
| व्रतोपवासमौनं च स्नानं च नियमा दश।<br>नियमः स्यादनीहा च शौचं तुष्टिस्तपस्तथा॥ ३० | आकांक्षाराहित्य, शुचिता, सन्तुष्टि, तप, जप एवं भगवान् शिवसे सम्बन्ध स्थापित करना तथा पद्मासन आदि—ये नियम हैं॥ ३० १/२॥ |
| जपः शिवप्रणीधानं पद्मकाद्यं तथासनम्।<br>बाह्यामाभ्यन्तरं प्रोक्तं शौचमाभ्यन्तरं वरम्॥ ३१ |
४२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बाह्यशौचेन युक्तः संस्थथा चाभ्यन्तरं चरेत्।<br>आग्नेयं वारुणं ब्राह्मं कर्तव्यं शिवपूजकैः॥ ३२ | शुचिता बाह्य तथा आभ्यन्तर-भेदसे दो प्रकारकी कही गयी है, उसमें भी आन्तरिक शुचिता श्रेष्ठ है। साधकको बाह्य पवित्रतासे युक्त होकर आन्तरिक पवित्रताके लिये प्रयास करना चाहिये॥ ३११/२॥ |
| स्नानं विधानतः सम्यक् पश्चादाभ्यन्तरं चरेत्।<br>आदेहान्तं मृदालिप्य तीर्थतोयेषु सर्वदा॥ ३३<br><br>अवगाह्यापि मलिनो ह्यन्तश्शौचविवर्जितः।<br>शैवला झषका मत्स्याः सत्त्वा मत्स्योपजीविनः॥ ३४ | शिवपूजकोंको चाहिये कि वे विधिपूर्वक भस्मस्नान, जलस्नान तथा मन्त्रस्नान सम्पन्न करनेके पश्चात् आभ्यन्तर शुचिताका सम्पादन करें; क्योंकि सम्पूर्ण शरीरमें पवित्र मृत्तिकाका लेपन करके सर्वदा पवित्र तीर्थके जलमें अवगाहन करनेवाला भी अन्तःशौचके बिना मलिन ही रहता है॥ ३२-३३१/२॥ |
| सदावगाह्यः सलिले विशुद्धाः किं द्विजोत्तमाः।<br>तस्मादाभ्यन्तरं शौचं सदा कार्यं विधानतः॥ ३५ | हे द्विजोत्तमो! सदा जलमें रहनेपर भी शैवाल, झषक (मगरमच्छ), मत्स्य और मत्स्यजीवी (मछुआरे) क्या कभी पवित्र हुए हैं? इसीलिये सदा विधिपूर्वक आन्तरिक पवित्रताका सम्पादन करना चाहिये॥ ३४-३५॥ |
| आत्मज्ञानाम्भसि स्नात्वा सकृदालिप्य भावतः।<br>सुवैराग्यमृदा शुद्धः शौचमेवं प्रकीर्तितम्॥ ३६ | शरीरपर एक बार श्रद्धापूर्वक वैराग्यरूपी मृत्तिकाका लेपन करके आत्म-ज्ञानरूपी जलमें स्नान करके शुद्ध हो जानेको अन्तःशौच कहा गया है। शुद्ध पुरुषको ही सिद्धियाँ मिलती हैं, अशुद्ध पुरुषको कभी नहीं मिलतीं॥ ३६१/२॥ |
| शुद्धस्य सिद्धयो दृष्टा नैवाशुद्धस्य सिद्धयः।<br>न्यायेनागतया वृत्त्या सन्तुष्टो यस्तु सुव्रतः॥ ३७<br><br>सन्तोषस्तस्य सततमतीतार्थस्य चास्मृतिः।<br>चान्द्रायणादिनिपुणस्तपांसि सुशुभानि च॥ ३८ | जो व्रती पुरुष न्यायपूर्वक अर्जित किये गये धनसे संतुष्ट रहता है और गये धनके विषयमें चिन्तन नहीं करता, वह सन्तोषी कहा जाता है। चान्द्रायण आदि व्रतोंका निपुणतापूर्वक आचरण करना शुभ तप कहा गया है॥ ३७-३८॥ |
| स्वाध्यायस्तु जपः प्रोक्तः प्रणवस्य त्रिधा स्मृतः।<br>वाचिकश्चाधमो मुख्य उपांशुश्चोत्तमोत्तमः॥ ३९<br><br>मानसो विस्तरेणैव कल्पे पञ्चाक्षरे स्मृतः।<br>तथा शिवप्रणीधानं मनोवाक्कायकर्मणा॥ ४०<br><br>शिवज्ञानं गुरोर्भक्तिरचला सुप्रतिष्ठिता।<br>निग्रहो ह्यपहृत्याशु प्रसक्तानीन्द्रियाणि च॥ ४१<br><br>विषयेषु समासेन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः।<br>चित्तस्य धारणा प्रोक्ता स्थानबन्धः समासतः॥ ४२ | प्रणवका जप स्वाध्याय कहा जाता है और वह जप तीन प्रकारका कहा गया है। वाचिक जप अधम, उपांशु (मन्द स्वरात्मक) जप मुख्य (उत्तम) तथा मानस जप उत्तमोत्तम है, जो पंचाक्षर कल्पमें विस्तारसे बताये गये हैं। इस प्रकार मन, वचन तथा शारीरिक क्रियाओंसे शिवका प्रणीधान और गुरुके प्रति निश्चल तथा प्रतिष्ठित भक्तिको शिव-ज्ञान कहा गया है। विषयोंमें आसक्त इन्द्रियोंको शीघ्र ही उनसे हटाकर इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करनेको संक्षेपमें प्रत्याहार कहा गया है और हृदय आदि स्थानोंमें चित्तको रोकनेकी क्रिया संक्षेपमें धारणा कही गयी है॥ ३९-४२॥ |
अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप [ ४३
| तस्याः स्वास्थ्येन ध्यानं च समाधिश्च विचारतः।<br>तत्रैकचित्तता ध्यानं प्रत्ययान्तरवर्जितम्॥ ४३ | स्वस्थचित्ततासे उसी धारणाकी स्थिरता ही ध्यान है, जो विचारणापूर्वक समाधिमें परिणत हो जाता है। ध्येय विषयमें चित्तकी एकाग्रता ही ध्यान है और इस स्थितिमें चित्त अन्य वृत्तियोंसे रहित हो जाता है॥ ४३॥ |
| चिद्भासमर्थमात्रस्य देहशून्यमिव स्थितम्।<br>समाधिः सर्वहेतुश्च प्राणायाम इति स्मृतः॥ ४४ | चैतन्यस्वरूप ध्येयमात्रसे भासित होनेवाला और इस प्रकार देहशून्यताकी स्थितिको प्राप्त वह ध्यान ही समाधि है और प्राणायामको इन समस्त ध्यान-समाधि आदिका हेतु कहा गया है॥ ४४॥ |
| प्राणः स्वदेहजो वायुर्यमस्तस्य निरोधनम्।<br>त्रिधा द्विजैर्यमः प्रोक्तो मन्दो मध्योत्तमस्तथा॥ ४५ | अपने शरीरसे जायमान वायु ही प्राण है और उसे रोकनेको यम कहते हैं। द्विजोंने मन्द, मध्य तथा उत्तम—ये तीन प्रकारके यम बतलाये हैं॥ ४५॥ |
| प्राणापाननिरोधस्तु प्राणायामः प्रकीर्तितः।<br>प्राणायामस्य मानं तु मात्राद्वादशकं स्मृतम्॥ ४६<br><br>नीचो द्वादशमात्रस्तु उद्घातो द्वादशः स्मृतः।<br>मध्यमस्तु द्विरुद्घातश्चतुर्विंशतिमात्रकः॥ ४७<br><br>मुख्यस्तु यस्त्रिरुद्घातः षट्त्रिंशन्मात्र उच्यते।<br>प्रस्वेदकम्पनोत्थानजनकश्च यथाक्रमम्॥ ४८ | प्राण और अपान वायुका निरोध ही प्राणायाम कहलाता है। मन्द प्राणायामका मान बारह मात्राओंका कहा गया है। बारह लघु अक्षरोंके उच्चारणकालतक प्राणवायुको रोकना मन्द प्राणायाम या द्वादशमात्रात्मक प्राणायाम बताया गया है। उसके दुगुने उच्चारणकाल अर्थात् चौबीस मात्राओंके समयतक प्राणवायुके निरोधनको मध्यम प्राणायाम कहते हैं। इसी प्रकार तीन गुने उच्चारणकाल अर्थात् छत्तीस मात्राओंके उच्चारणकालतक प्राणवायुको रोकनेको उत्तम प्राणायाम कहा जाता है। मन्द, मध्य तथा उत्तम प्राणायाम शरीरमें क्रमशः प्रस्वेद (पसीना), कम्पन तथा उत्थान (ऊपर उठनेकी क्रिया) उत्पन्न करनेवाले हैं॥ ४६-४८॥ |
| आनन्दोद्भवयोगार्थं निद्राघूर्णिस्तथैव च।<br>रोमाञ्चध्वनिसंविद्धस्वाङ्गमोटनकम्पनम् ॥ ४९ | आनन्दकी उत्पत्ति करनेवाले योगकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले प्राणायामसे निद्रा, घूर्णन, रोमांच तथा ध्वनिसे व्याप्त कम्पन शरीरके अंगोंमें उत्पन्न हो जाता है॥ ४९॥ |
| भ्रमणं स्वेदजन्या सा संविन्मूर्च्छा भवेद्यदा।<br>तदोत्तमोत्तमः प्रोक्तः प्राणायामः सुशोभनः॥ ५० | जब निरन्तर प्राणायामके अभ्याससे [उत्पन्न उष्णतावश] स्वेदबिन्दु [पसीना] झलकने लगे, संविन्मूर्च्छा—ज्ञानमयी उन्मनी अवस्था आने लगे, सहसा शरीर हलका होकर प्लवन [जलमें तैरने-जैसी स्थिति]-जैसी अवस्थाका अनुभव करे, तब इस सुशोभन अवस्थाको उत्तमोत्तम प्राणायाम कहा गया है॥ ५०॥ |
| सगर्भोऽगर्भ इत्युक्तः सजपो विजपः क्रमात्।<br>इभो वा शरभो वापि दुराधर्षोऽथ केसरी॥ ५१ | सगर्भ तथा अगर्भ—यह दो प्रकारका होता है। जपसहित प्राणायाम सगर्भ तथा जपरहित प्राणायाम अगर्भ कहा जाता है। हाथी, शरभ* तथा सिंह अत्यन्त |
* आठ पैरवाला जीव, जो सिंहसे भी बलवान् होता है—‘अष्टपादः शरभः सिंहघाती।'
| ४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गृहीतो दम्यमानस्तु यथास्वस्थस्तु जायते।<br>तथा समीरणोऽस्वस्थो दुराधर्षश्च योगिनाम् ॥ ५२ | दुराधर्ष होते हैं। जैसे उन्हें पकड़कर उनका दमन किये जानेपर वे अस्वस्थ हो जाते हैं, उसी प्रकार यह दुराधर्ष प्राणवायु भी योगियोंके द्वारा वशमें किये जानेपर अस्वस्थ हो उठता है अर्थात् अव्यवस्थित हो जाता है॥ ५१-५२॥ |
| न्यायतः सेव्यमानस्तु स एवं स्वस्थतां व्रजेत् ।<br>यथैव मृगराड् नागः शरभो वापि दुर्मदः ॥ ५३ | नियमपूर्वक अभ्यास किये जानेपर वह वायु उसी प्रकार स्वस्थताको प्राप्त हो जाता है, जैसे मतवाले सिंह, हाथी तथा शरभ अभ्यासपूर्वक युक्तिसे दमित किये जानेपर अपने अधीन हो जाते हैं॥ ५३॥ |
| कालान्तरवशाद्योगाद्गम्यते परमादरात् ।<br>तथा परिचयात्स्वास्थ्यं समत्वं चाधिगच्छति ॥ ५४ | जैसे नियमतः नियन्त्रण करनेपर शनैः-शनैः अपनी उग्रताको त्यागकर ये सिंहादि आदरपूर्वक वशमें हो जाते हैं, वैसे ही यह प्राणवायु भी शनैः-शनैः अभ्याससे अपनी अस्वस्थताको छोड़कर समत्वभावको प्राप्त हो जाता है॥ ५४॥ |
| योगादभ्यस्यते यस्तु व्यसनं नैव जायते ।<br>एवमभ्यस्यमानस्तु मुनेः प्राणो विनिर्दहेत् ॥ ५५<br><br>(चित्र)<br><br>मनोवाक्कायजान् दोषान् कर्तुर्देहं च रक्षति।<br>संयुक्तस्य तथा सम्यक्प्राणायामेन धीमतः ॥ ५६ | जो पुरुष योगपूर्वक अभ्यास करता है, उसके चित्तमें व्यसन उत्पन्न नहीं होता है। इस प्रकार सततं अभ्यास करनेपर प्राणायामसे उस योगीके मन-वचन तथा कर्मसे जायमान सभी दोष नष्ट हो जाते हैं और इस प्राणायामसे इसे करनेवाले उस बुद्धिमान् योगीके देहकी भलीभाँति रक्षा भी होती है॥ ५५-५६॥ |
| दोषात्तस्माच्च नश्यन्ति निःश्वासस्तेन जीर्यते।<br>प्राणायामेन सिध्यन्ति दिव्याः शान्त्यादयः क्रमात् ॥ ५७ | उस प्राणायामके सतत अभ्याससे सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। साथ ही श्वास (प्रश्वास)-की गति भी न्यून होती जाती है। इस प्रकार प्राणोंके [श्वासोंके] नियन्त्रणसे क्रमशः दिव्य शान्ति आदि सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं॥ ५७॥ |
| शान्तिः प्रशान्तिर्दीप्तिश्च प्रसादश्च तथा क्रमात् ।<br>आदौ चतुष्टयस्येह प्रोक्ता शान्तिरिह द्विजाः ॥ ५८<br>सहजागन्तुकानां च पापानां शान्तिरुच्यते ।<br>प्रशान्तिः संयमः सम्यग्वचसामिति संस्मृता ॥ ५९ | हे द्विजो! अब मैं क्रमसे शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसादका वर्णन करूँगा। आरम्भमें इन चारोंमेंसे यहाँ पहले शान्तिके विषयमें कहता हूँ। सहज तथा आगन्तुक पापोंका नाश शान्ति कहा जाता है तथा वाणीपर भली-भाँति संयम प्रशान्ति कहा गया है॥ ५८-५९॥ |
| प्रकाशो दीप्तिरित्युक्तः सर्वतः सर्वदा द्विजाः ।<br>सर्वेन्द्रियप्रसादस्तु बुद्धेर्वै मरुतामपि ॥ ६०<br>प्रसाद इति सम्प्रोक्तः स्वान्ते त्विह चतुष्टये ।<br>प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ॥ ६१ | हे द्विजो! सभी तरहसे सर्वदा प्रकाशकी स्थितिको दीप्ति कहा गया है। सभी इन्द्रियों, बुद्धि तथा प्राणवायु आदिकी प्रसन्नताको इस चतुष्टयमें 'प्रसाद' कहा गया है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, |
अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४५
| नागः कूर्मस्तु कृकलो देवदत्तो धनञ्जयः।<br>एतेषां यः प्रसादस्तु मरुतामिति संस्मृतः॥ ६२ | देवदत्त तथा धनंजय—इनकी जो प्रसन्नता है, उसे मरुतोंका प्रसाद कहा गया है॥ ६०—६२॥ |
| प्रयाणं कुरुते तस्माद्वायुः प्राण इति स्मृतः।<br>अपानयत्यपानस्तु आहारादीन् क्रमेण च॥ ६३<br><br>व्यानो व्यानामयत्यङ्गं व्याध्यादीनां प्रकोपकः।<br>उद्वेजयति मर्माणि उदानोऽयं प्रकीर्तितः॥ ६४<br><br>समं नयति गात्राणि समानः पञ्च वायवः।<br>उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने तु सः॥ ६५<br><br>कृकलः क्षुत्कायैव देवदत्तो विजृम्भणे।<br>धनञ्जयो महाघोषः सर्वगः स मृतेऽपि हि॥ ६६ | जो वायु प्रयाण करता है, इसी कारण उस वायुको प्राणवायु कहा गया है। जो वायु आहार आदिको नीचेकी ओर क्रमसे ले जाता है, उसे अपान, सभी अंगोंमें जो वायु व्याप्त रहता है उसे व्यान तथा व्याधि आदिका प्रकोप जो वायु मर्मोंमें उद्वेजन पैदा करता है उसे उदान एवं जो वायु गात्रोंमें समता करता है, उसे समान वायु कहा गया है। इस प्रकार ये पाँच वायु हुए। इसी तरह उद्गार (डकार आदि)-के समय क्रियाशील वायुको नाग, उन्मीलन-अवस्थामें क्रियाशील वायुको कूर्म, छींक आदिमें आनेवाली वायुको कृकल, जम्हाईमें क्रियाशील वायु देवदत्त तथा महाघोष करनेवाले वायुका नाम धनंजय है, वह मरनेपर भी सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त रहता है॥ ६३—६६॥ |
| इति यो दशवायूनां प्राणायामेन सिध्यति।<br>प्रसादोऽस्य तुरीया तु संज्ञा विप्राश्चतुष्टये॥ ६७ | हे विप्रो! जो इन दस वायुओंको प्राणायामसे सिद्ध कर लेता है, वह शान्ति आदि चतुष्टयके प्रसादकी प्राप्ति कर लेता है। इन वायुओंका प्रसाद ही (शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसाद नामक सिद्धियोंमें चतुर्थ प्रसाद नामक सिद्धिको) 'तुरीया' सिद्धि कहा जाता है॥ ६७॥ |
| विस्वरस्तु महान् प्रज्ञा मनो ब्रह्मा चितिः स्मृतिः।<br>ख्यातिः संवित्ततः पश्चादीश्वरो मतिरेव च॥ ६८<br><br>बुद्धेरेताः द्विजाः संज्ञा महतः परिकीर्तिताः।<br>अस्या बुद्धेः प्रसादस्तु प्राणायामेन सिद्ध्यति॥ ६९ | विस्वर, महान्, प्रज्ञा, मन, ब्रह्मा, चिति, स्मृति, ख्याति, संवित्, ईश्वर तथा मति—ये सब महत्तत्त्वस्वरूप बुद्धिके नाम हैं। हे विप्रो! इस बुद्धिका प्रसाद प्राणायामसे ही सिद्ध होता है॥ ६८-६९॥ |
| विस्वरो विस्वरीभावो द्वन्द्वानां मुनिसत्तमाः।<br>अग्रजः सर्वतत्त्वानां महान् यः परिमाणतः॥ ७०<br><br>यत्प्रमाणगुहा प्रज्ञा मनस्तु मनुते यतः।<br>बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च ब्रह्मा ब्रह्मविदां वराः॥ ७१ | हे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनियो! यह बुद्धि शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंका उपतापन न होनेसे विस्वर, सभी तत्त्वोंके पहले उत्पन्न होनेसे महान्, प्रमाणोंका आश्रय होनेसे प्रज्ञा, मनन करनेसे मन तथा बृहत् होने एवं वृद्धि करनेसे ब्रह्मा—ऐसी कही गयी है॥ ७०-७१॥ |
| सर्वकर्माणि भोगार्थं यच्चिनोति चितिः स्मृता।<br>स्मरते यत्स्मृतिः सर्वं संविद्वै विन्दते यतः॥ ७२ | जो भोगोंके लिये समस्त कर्मोंका चयन करती है, उसे चिति कहा गया है। जो स्मरण करती है, उसे स्मृति तथा जो जानती है, उसे संवित् कहा गया है॥ ७२॥ |
| ख्यायते यत्त्विति ख्यातिर्ज्ञानादिभिरनेकशः।<br>सर्वतत्त्वाधिपः सर्वं विजानाति यदीश्वरः॥ ७३ | ज्ञान आदि अनेक उपायोंसे प्रतिष्ठित करनेसे ख्यातिसंज्ञक तथा सभी तत्त्वोंका स्वामी एवं सब कुछ |
| ४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मनुते मन्यते यस्मान्मतिर्मतिमतां वराः।<br>अर्थं बोधयते यच्च बुद्ध्यते बुद्धिरुच्यते॥ ७४ | जाननेके कारण ईश्वर संज्ञावाली बुद्धि कही गयी है। हे मतिमानोंमें श्रेष्ठ मुनियो ! माननेके कारण मति कही गयी है एवं अर्थको जानने तथा बोध करानेसे बुद्धि कही गयी है॥ ७३-७४॥ |
| अस्या बुद्धेः प्रसादस्तु प्राणायामेन सिद्ध्यति।<br>दोषान् विनिर्दहेत्सर्वान् प्राणायामादसौ यमी॥ ७५ | इस बुद्धिका भी प्रसाद प्राणायामसे सिद्ध होता है। योगीको प्राणायामके द्वारा सभी दोषोंको दग्ध कर डालना चाहिये॥ ७५॥ |
| पातकं धारणाभिस्तु प्रत्याहारेण निर्दहेत्।<br>विषयान् विषवद् ध्यात्वा ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥ ७६<br><br>समाधिना यतिश्रेष्ठाः प्रज्ञावृद्धिं विवर्धयेत्।<br>स्थानं लब्ध्वैव कुर्वीत योगाष्टाङ्गानि वै क्रमात्॥ ७७<br><br>लब्ध्वासनानि विविधद्योगसिद्ध्यर्थमात्मवित्।<br>अदेशकाले योगस्य दर्शनं हि न विद्यते॥ ७८ | हे यतिश्रेष्ठ विप्रो! योगीको चाहिये कि वह धारणासे पापोंको तथा प्रत्याहारसे विषयोंको विष समझकर दग्ध कर डाले। ध्यानके द्वारा [काम-क्रोधादि] अनीश्वर गुणोंको जला डाले तथा समाधिसे बुद्धिकी वृद्धि करे। उत्तम स्थान प्राप्त करके तथा उचित आसनोंमें होकर आत्मवित् योगीको विधिपूर्वक योगके आठों अंगोंका क्रमसे अभ्यास करना चाहिये। समुचित स्थान तथा समयके बिना योगसिद्धि नहीं होती है॥ ७६-७८॥ |
| अग्न्यभ्यासे जले वापि शुष्कपर्णचये तथा।<br>जन्तुव्याप्ते श्मशाने च जीर्णगोष्ठे चतुष्पथे॥ ७९<br><br>सशब्दे सभये वापि चैत्यवल्मीकसञ्चये।<br>अशुभे दुर्जनाक्रान्ते मशकादिसमन्विते॥ ८०<br><br>नाचरेद्देहबाधायां दौर्मनस्यादिसम्भवे।<br>सुगुप्ते तु शुभे रम्ये गुहायां पर्वतस्य तु॥ ८१<br><br>भवक्षेत्रे सुगुप्ते वा भवारामे वनेऽपि वा।<br>गृहे तु सुशुभे देशे विजने जन्तुवर्जिते॥ ८२<br><br>अत्यन्तनिर्मले सम्यक् सुप्रलिप्ते विचित्रिते।<br>दर्पणोदरसङ्काशे कृष्णागुरुसुधूपिते॥ ८३ | अग्निके समीप, जलमें, सूखे पत्तोंके ढेरवाले स्थानोंमें, जन्तुओंसे व्याप्त जगहपर, श्मशानपर, जीर्ण गोशालामें, चौराहेपर, शोरगुलवाले स्थानमें, डरावने स्थानमें, पत्थरों तथा वल्मीक मिट्टीके ढेरपर, अपवित्र स्थानपर, दुष्टोंके आतंकवाले स्थानपर, मच्छर आदिसे युक्त स्थानपर तथा देहबाधा और दौर्मनस्य (मानसिक कष्ट) उत्पन्न करनेवाले स्थानपर योगका अभ्यास नहीं करना चाहिये। अपितु अत्यन्त गुप्त (एकान्त), पवित्र तथा रमणीक स्थानपर, पर्वतकी गुफामें, शिवक्षेत्रमें, एकान्तमें, शिव-उद्यानमें, वनमें, पवित्र घरमें, जन्तुओंसे रहित तथा निर्जन स्थानमें योग-साधन करना चाहिये॥ ७९-८२॥ |
| नानापुष्पसमाकीर्णे वितानोपरि शोभिते।<br>फलपल्लवमूलाढ्ये कुशपुष्पसमन्विते॥ ८४<br><br>समासनस्थो योगाङ्गान्यभ्यसेद्धृषितः स्वयम्।<br>प्रणिपत्य गुरुं पश्चाद्भवं देवीं विनायकम्॥ ८५<br><br>योगीश्वरान् सशिष्यांश्च योगं युञ्जीत योगवित्।<br>आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्ममर्धासनं तु वा॥ ८६ | अत्यन्त स्वच्छ, भलीभाँति लिपे हुए, विशेष रूपसे चित्रित, दर्पणके समान स्वच्छ, कृष्ण अगरुके धूपसे सुगन्धित, अनेक प्रकारके पुष्पोंसे मण्डित, ऊपरसे चँदोवा आदिसे अलंकृत, फल-पल्लवोंसे सुशोभित तथा कुश और फूलसे युक्त दिव्य स्थानमें ठीक आसनसे बैठकर प्रसन्नतापूर्वक योगके अंगोंका अभ्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् गुरु, शिव, पार्वती, गणेश तथा शिष्योंसहित योगीश्वरोंको प्रणाम करके स्वस्तिक अथवा |