श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९७- जलन्धर-वधकी कथा
| ५१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| अतस्तत्र पठेद्द्विज्ञाच्छिवभक्तो दृढव्रतः ।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि स्तवं सर्वमनुत्तमम् ॥ १२७<br>स रुद्रत्वं समासाद्य रुद्रस्यानुचरो भवेत् ॥ १२८ | होनेपर, उल्कापात होनेपर, तेज हवा चलनेपर, अनावृष्टि तथा अतिवृष्टि होनेपर दृढ़ व्रतवाले विद्वान् शिवभक्तको इस [शरभचरित]-को पढ़ना चाहिये। जो इस सर्वोत्तम स्तोत्रको पढ़ता अथवा सुनता है, वह रुद्रत्व प्राप्त करके रुद्रका अनुचर हो जाता है॥ १२३—१२८ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शरभप्रादुर्भावो नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शरभप्रादुर्भाव' नामक छानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९६ ॥
सत्तानबेवाँ अध्याय
जलन्धर-वधकी कथा
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| जलन्धरं जटामौलिः पुरा जम्भारिविक्रमम् ।<br>कथं जघान भगवान् भग्ननेत्रहरो हरः ॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं रोमहर्षण सुव्रत । | हे रोमहर्षण ! हे सुव्रत ! सिरपर जटाधारण करनेवाले तथा भगके नेत्रोंका हरण करनेवाले भगवान् शिवने इन्द्रके समान पराक्रमी जलन्धरका वध कैसे किया; हम लोगोंको यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १ १/२ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| जलन्धर इति ख्यातो जलमण्डलसम्भवः ॥ २<br>आसीद्दन्तकसङ्काशस्तपसा लब्धविक्रमः ।<br>तेन देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः ॥ ३<br>निर्जिताः समरे सर्वे ब्रह्मा च भगवानजः ।<br>जित्वाैव देवसङ्घातं ब्रह्माणं वै जलन्धरः ॥ ४ | [हे ऋषियो !] जलमण्डलसे उत्पन्न जलन्धर नामसे प्रसिद्ध यमराजतुल्य एक असुर था; वह अपनी तपस्यासे बड़ा पराक्रमी हो गया था। उसने युद्धमें गन्धर्व, यक्ष, उरग तथा राक्षसोंसहित सभी देवताओंको और अजन्मा भगवान् ब्रह्माको भी जीत लिया था ॥ २-३ १/२ ॥ |
| जगाम देवदेवेशं विष्णुं विश्वहरं गुरुम् ।<br>तयोः समभवद्युद्धं दिवारात्रमविश्रमम् ॥ ५<br>जलन्धरेशयोस्तेन निर्जितो मधुसूदनः ।<br>जलन्धरोऽपि तं जित्वा देवदेवं जनार्दनम् ॥ ६ | देवसमुदाय तथा ब्रह्माको जीत करके वह जलन्धर विश्वविनाशक देवदेवेश्वर गुरु विष्णुके यहाँ पहुँचा। उन दोनोंमें दिन-रात निरन्तर युद्ध होता रहा और उसने मधुसूदन (विष्णु)-को भी पराजित कर दिया ॥ ४-५ १/२ ॥ |
| प्रोवाचेदं दितेः पुत्रान् न्यायधीर्जेतुमीश्वरम् ।<br>सर्वे जिता मया युद्धे शङ्करो ह्यजितो रणे ॥ ७<br>तं जित्वा सर्वमीशानं गणपैर्नन्दिना क्षणात् ।<br>अहमेव भवत्वं च ब्रह्मत्वं वैष्णवं तथा ॥ ८<br>वासवत्वं च युष्माकं दास्ये दानवपुङ्गवाः ।<br>जलन्धरवचः श्रुत्वा सर्वे ते दानवाधमाः ॥ ९ | उन देवदेव जनार्दनको भी जीतकर न्यायबुद्धिवाले जलन्धरने ईश्वर (शिव)-को जीतनेके लिये दितिके पुत्रोंसे कहा—'मैंने युद्धमें सबको जीत लिया है, केवल शंकर ही अजित रह गये हैं। हे श्रेष्ठ दानवो! गणेश्वरों तथा नन्दीसहित उन सर्व ईशानको क्षणभरमें जीतकर मैं तुम लोगोंको शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रका पद प्रदान कर दूँगा' ॥ ६-८ १/२ ॥ |
| जगर्जुरुच्चैः पापिष्ठा मृत्युदर्शनतत्पराः ।<br>दैत्यैरैतैस्तथान्यैश्च रथनागतुरङ्गमैः ॥ १० | तब जलन्धरका वचन सुनकर वे सभी अधम, पापी तथा मृत्युके दर्शनमें तत्पर दानव उच्च स्वरमें |
| अध्याय ९७ ] | जलन्धर-वधकी कथा | ५१३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनद्धैः सह सन्नह्य शर्वं प्रति ययौ बली।<br>भवोऽपि दृष्ट्वा दैत्येन्द्रं मेरुकूटमिव स्थितम्॥ ११ | गरजने लगे। इसके बाद वह बलशाली जलन्धर रथ, हाथी तथा घोड़ोंपर सवार शस्त्रयुक्त इन दैत्यों तथा अन्य [सैनिकों]-के साथ सावधान होकर शिवजीकी ओर चल पड़ा॥ ९-१०१/२॥ |
| अवध्यत्वमपि श्रुत्वा तथान्यैर्भगनेत्रहा।<br>ब्रह्मणो वचनं रक्षन् रक्षको जगतां प्रभुः॥ १२<br><br>साम्बः सनन्दी सगणः प्रोवाच प्रहसन्निव।<br>किं कृत्यमसुरेशान युद्धेनानेन साम्प्रतम्॥ १३ | तब मेरुके शिखरके समान स्थित उस दैत्यराजको देखकर तथा उसके अवध्यत्वको दूसरोंसे सुनकर भगके नेत्रका हरण करनेवाले तथा लोकोंकी रक्षा करनेवाले प्रभु शिवने, जो पार्वती, नन्दी तथा गणोंसहित वहाँ थे, ब्रह्माके वचनकी रक्षा करते हुए हँसते हुए [उस दैत्यसे] कहा—'हे असुरेश्वर! अब इस युद्धसे कौन-सा कार्य सिद्ध होगा? मेरे बाणोंके द्वारा छिन्न-भिन्न अंगोंवाला होकर प्रसन्नतापूर्वक मरनेके लिये तैयार हो जाओ'॥ ११–१३१/२॥ |
| मद्बाणैर्भिन्नसर्वाङ्गो मर्तुमभ्युद्यतो मुदा।<br>जलन्धरोऽपि तद्वाक्यं श्रुत्वा श्रोत्रविदारणम्॥ १४<br><br>सुरेश्वरमुवाचेदं सुरेतरबलेश्वरः।<br>वाक्येनालं महाबाहो देवदेव वृषध्वज॥ १५ | कानोंको विदीर्ण करनेवाले उस वचनको सुनकर असुरसेनाके स्वामी जलन्धरने भी सुरेश्वर [शिव]-से यह [वचन] कहा—हे महाबाहो, हे देवदेव! हे वृषभध्वज! ऐसी बात मत बोलिये; हे हर! मैं चन्द्रकिरणोंके समान [चमकते हुए] शस्त्रोंसे युद्ध करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥ १४-१५१/२॥ |
| चन्द्रांशुसन्निभैः शस्त्रैर्हर योद्धुमिहागतः।<br>निशम्यास्य वचः शूली पादाङ्गुष्ठेन लीलया।<br>महाम्भसि चकाराशु रथाङ्गं रौद्रमायुधम्॥ १६ | उसके वचनको सुनकर शिवजीने शीघ्र ही लीलापूर्वक [अपने] पैरके अँगूठेसे महासागरमें भयानक चक्ररूपी आयुध निर्मित कर दिया॥ १६॥ |
| कृत्वाणर्वाम्भसि सितं भगवान् रथाङ्गं<br>स्मृत्वा जगतत्रयमनेन हताः सुराश्च।<br>दक्षान्धकान्तकपुरत्रययज्ञहर्ता<br>लोकत्रयान्तककरः प्रहसंस्तदाह॥ १७<br><br>पादेन निर्मितं दैत्यजलन्धरमहार्णवे।<br>बलवान् यदि चोद्धर्तुं तिष्ठ योद्धुं न चान्यथा॥ १८ | तब समुद्रजलमें इस शुभ्र चक्रको स्थित करके और यह सोचकर कि 'इसके द्वारा तीनों लोक तथा देवतागण मार दिये जायेंगे' दक्ष, अन्धक, अन्तक और त्रिपुरके यज्ञको नष्ट करनेवाले तथा तीनों लोकोंका संहार करनेवाले भगवान् [शिव] हँसते हुए कहने लगे—हे दैत्य! हे जलन्धर! महासागरमें [मेरे] पादांगुष्ठसे निर्मित किये गये अस्त्रको उठानेमें यदि तुम समर्थ हो जाओ, तब तो युद्ध करनेके लिये ठहरो; अन्यथा नहीं॥ १७-१८॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधेनादीप्तलोचनः।<br>प्रदहन्निव नेत्राभ्यां प्राहालोक्य जगत्त्रयम्॥ १९ | उनके उस वचनको सुनकर क्रोधसे प्रदीप्त नेत्रोंवाला वह [जलन्धर] तीनों लोकोंको [अपने] नेत्रोंसे दग्ध-सा करता हुआ शिवजीकी ओर देखकर कहने लगा॥ १९॥ |
| ५१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| जलन्धर उवाच | **जलन्धर बोला—**हे शंकर! जिस प्रकार गरुड़ [विषहीन] डुंडुभ सर्पोंको मार डालता है, वैसे ही अपनी गदा उठाकर नन्दीको तथा तुमको मारकर पुनः देवताओंसहित सभी लोकोंका संहार करके मैं इन्द्रसहित सम्पूर्ण चराचर जगत्का संहार करनेमें समर्थ हूँ। हे महेश्वर! तीनों लोकोंमें ऐसा कौन है, जो मेरे बाणोंद्वारा छेदनके योग्य न हो! मैंने बचपनमें तपस्यासे भगवान् विष्णुको जीत लिया था और युवावस्थामें बलशाली ब्रह्माको तथा बड़े-बड़े देवताओंसहित मुनियोंको जीत लिया था॥ २०—२२॥ | | गदामुद्धृत्य हत्वा च नन्दिनं त्वां च शङ्कर।<br>हत्वा लोकान् सुरैः सार्धं डुण्डुभान् गरुडो यथा॥ २०<br>हन्तुं चराचरं सर्वं समर्थोऽहं सवासवम्।<br>को महेश्वर मद्बाणैरच्छेद्यो भुवनत्रये॥ २१<br>बालभावे च भगवान् तपसैव विनिर्जितः।<br>ब्रह्मा बली यौवने वै मुनयः सुरपुङ्गवैः॥ २२ | | | दग्धं क्षणेन सकलं त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>तपसा किं त्वया रुद्र निर्जितो भगवानपि॥ २३<br>इन्द्राग्नियमवित्तेशवायुवारीश्वरादयः।<br>न सेहिरे यथा नागा गन्धं पक्षिफ्तेरिव॥ २४<br>न लब्ध्वा दिवि भूमौ च बाहवो मम शङ्कर।<br>समस्तान् पर्वतान् प्राप्य घर्षिताश्च गणेश्वर॥ २५<br>गिरीन्द्रो मन्दरः श्रीमान्नीलो मेरुः सुशोभनः।<br>घर्षितो बाहुदण्डेन कण्डूनोदार्थमापतत्॥ २६ | मैंने चराचरसहित त्रिलोकीको क्षणभरमें दग्ध कर दिया था। हे रुद्र! क्या तुमने तपस्यासे भगवान् विष्णुको पराजित किया है? जैसे सर्प गरुड़की गन्धको सहन नहीं कर सकते, उसी प्रकार इन्द्र, अग्नि, यम, कुबेर, वायु, वरुण आदि भी मेरी गन्धको सहन नहीं कर सकते हैं। हे शंकर! स्वर्गमें तथा पृथ्वीपर अपना प्रतिद्वन्द्वी न पाकर सभी पर्वतोंपर जाकर मैंने अपनी भुजाओंको घर्षित किया था। हे गणेश्वर! खुजलाहट मिटानेके लिये मैंने अपने बाहुदण्डसे गिरिराज मन्दर, श्रीसम्पन्न नीलपर्वत और अति सुन्दर मेरु पर्वतको घर्षित किया था और वे गिर पड़े थे॥ २३—२६॥ | | गङ्गा निरुद्धा बाहुभ्यां लीलार्थं हिमवद्गिरौ।<br>नारीणां मम भृत्यैश्च वज्रो बद्धो दिवौकसाम्॥ २७<br>वडवाया मुखं भग्नं गृहीत्वा वै करेण तु।<br>तत्क्षणादेव सकलं चैकार्णवमभूदिदम्॥ २८<br>ऐरावतादयो नागाः क्षिप्ताः सिन्धुजलोपरि।<br>सरथो भगवानिन्द्रः क्षिप्तश्च शतयोजनम्॥ २९<br>गरुडोऽपि मया बद्धो नागपाशेन विष्णुना।<br>उर्वश्याद्या मया नीता नार्यः कारागृहान्तरम्॥ ३०<br>कथञ्चिल्लब्धवान् शक्रः शचीमेकां प्रणम्य माम्।<br>मां न जानासि दैत्येन्द्रं जलन्धरमुमापते॥ ३१ | हिमालय पर्वतपर लीलावश मेरी भुजाओंके द्वारा गंगा रोक ली गयी थी और मेरी स्त्रियोंके सेवकोंद्वारा देवताओंका वज्र बाँध लिया गया था। मैंने हाथसे पकड़कर बड़वाग्निके मुखको भंग कर दिया था; उसी क्षण यह सब एकार्णव हो गया था। मैंने ऐरावत आदि हाथियोंको समुद्रजलके ऊपर फेंक दिया था और भगवान् इन्द्रको रथसहित सौ योजन दूर फेंक दिया था। मैंने विष्णुसहित गरुड़को भी नागपाशसे बाँध लिया था। मैंने उर्वशी आदि नारियोंको कारागृहके अन्दर डाल दिया था और इन्द्रने मुझको प्रणाम करके किसी प्रकार केवल शचीको वापस प्राप्त किया था। हे उमापते! [क्या] आप मुझ दैत्यराज जलन्धरको नहीं जानते हैं?॥ २७—३१॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्तो महादेवः प्रादहद्वै रथं तदा।<br>तस्य नेत्राग्निभागैककलार्धार्धेन चाकुलम्॥ ३२ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तब उसके इस प्रकार कहनेपर महादेवने अपने नेत्रकी अग्निके एक |
अध्याय ९७ ] जलन्धर-वधकी कथा ५१५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भागकी कलाके आधेके भी आधे भागसे उसके समूचे रथको जला दिया॥ ३२॥ | |
| दैत्यानामतुलबलैर्हयैश्च नागै-<br>दैत्येन्द्रास्त्रिपुररिपोर्निरीक्षणेन ।<br>नागाद्रैशसमनुसंवृतश्च नागै-<br>दैवेशं वचनमुवाच चाल्पबुद्धिः॥ ३३<br><br>किं कार्यं मम युधि देवदैत्य-<br>सङ्घैर्हन्तुं यत्सकलमिदं क्षणात्समर्थः।<br>यत्तस्माद्भयमिह नास्ति योद्धु-<br>मीश वाञ्छैषा विपुलतरा न संशयोऽत्र॥ ३४<br><br>तस्मात्त्वं मम मदनारिदक्षशत्रो<br>यज्ञारे त्रिपुररिपो ममैव वीरैः।<br>भूतैर्नन्दैर्हरिवदनेन देवसङ्घैर्योद्धुं<br>ते बलमिह चास्ति चेद्धि तिष्ठ॥ ३५ | त्रिपुरशत्रु शिवके देखनेमात्रसे दैत्योंकी विशाल सेनाओं, घोड़ों तथा हाथियोंके साथ सभी दैत्येन्द्र दग्ध हो गये। गजोंसे चारों ओरसे घिरा हुआ वह अल्पबुद्धि जलन्धर हाथीसे उतरकर विनाशके लिये उद्यत देवेश [शिव]-से बोला—मुझे युद्ध करनेसे क्या प्रयोजन; क्योंकि मैं देवदैत्य-सहित इस समस्त जगत्को क्षणभरमें नष्ट करनेमें समर्थ हूँ। अतः हे ईश! मुझे कोई भय नहीं है, किंतु आपसे युद्ध करनेकी मेरी तीव्र इच्छा है; इसमें सन्देह नहीं है। अतएव हे मदनारि! हे दक्षशत्रु! हे यज्ञशत्रु! हे त्रिपुरशत्रु! यदि भूतगणों, नन्दी, देवसमुदायसहित मेरे वीरोंके साथ युद्ध करनेका तुम्हारा सामर्थ्य है, तो यहाँ ठहरो॥ ३३—३५॥ |
| इत्युक्त्वाथ महादेवं महादेवारिनन्दनः।<br>न चचाल न सस्मार निहतान् बान्धवान् युधि॥ ३६<br><br>दुर्मदेनाविनीतात्मा दोर्भ्यामास्फोट्य दोर्बलात्।<br>सुदर्शनाख्यं यच्चक्रं तेन हन्तुं समुद्यतः॥ ३७<br><br>दुर्धरेण रथाङ्गेन कृच्छ्रेणापि द्विजोत्तमाः।<br>स्थापयामास वै स्कन्धे द्विधाभूतश्च तेन वै॥ ३८<br><br>कुलिशेन यथा छिन्नो द्विधा गिरिवरो द्विजाः।<br>पपात दैत्यो बलवानञ्जनाद्रिरिवापरः॥ ३९ | महादेवसे ऐसा कहकर महादेवके शत्रुओंको आनन्दित करनेवाला वह [जलन्धर] न तो हिला-डुला और न तो उसने युद्धमें मारे गये बान्धवोंका स्मरण किया। अभिमानके कारण उद्दण्ड स्वभाववाला जलन्धर भुजाओंसे शब्द करके [शिवको] मारनेके लिये उद्यत हुआ और उसने [रुद्रनिर्मित] जो सुदर्शन नामक चक्र था, उसे अपने भुजाबलसे बड़े प्रयासके द्वारा अपने कन्धेपर रखा; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसी समय उस दुर्धर (भयानक) चक्रसे उस जलन्धरके दो टुकड़े उसी प्रकार हो गये, जैसे वज्रके द्वारा काटा गया कोई महापर्वत दो भागोंमें हो जाता है। हे द्विजो! वह बलवान् दैत्य दूसरे अंजन पर्वतकी भाँति गिर पड़ा॥ ३६—३९॥ |
| तस्य रक्तेन रौद्रेण सम्पूर्णमभवत्क्षणात्।<br>तद्रक्तमखिलं रुद्रनियोगान्मांसमेव च॥ ४०<br><br>महारौरवमासाद्य रक्तकुण्डमभूदहो।<br>जलन्धरं हतं दृष्ट्वा देवगन्धर्वपार्षदाः॥ ४१<br><br>सिंहनादं महत्कृत्वा साधु देवेति चाब्रुवन्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि जलन्धरविमर्दनम्॥ ४२<br><br>श्रावयेद्वा यथान्यायं गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ ४३ | उसके भयानक रक्तसे उसी क्षण वह स्थान भर गया; अहो, रुद्रकी आज्ञासे उसका सारा रक्त तथा मांस महारौरव नरकमें पहुँचकर रक्तकुण्ड बन गया। उस समय जलन्धरको मरा हुआ देखकर देवता, गन्धर्व तथा पार्षद महान् सिंहनाद करके 'हे देव! बहुत अच्छा हुआ'—ऐसा कहने लगे। जो [व्यक्ति] जलन्धर-वधकी इस कथाको विधिपूर्वक पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा सुनाता है, वह गणपतिपद प्राप्त करता है॥ ४०—४३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे जलन्धरवधो नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः॥ ९७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'जलन्धर-वध' नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९७॥
९८- भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना तथा प्रसन्न होकर महेश्वरद्वारा उन्हें सुदर्शनचक्र प्रदान करना
| ५१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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अठानबेवाँ अध्याय
भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना तथा प्रसन्न होकर महेश्वरद्वारा उन्हें सुदर्शनचक्र प्रदान करना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— हे सूतजी! भगवान् विष्णुने देवदेव महेश्वरसे सुदर्शन नामक चक्र कैसे प्राप्त किया; इसे आप बतानेकी कृपा करें॥ १॥ |
|---|---|
| कथं देवेन वै सूत देवदेवान्महेश्वरात्।<br>सुदर्शनाख्यं वै लब्धं वक्तुमर्हसि विष्णुना ॥ १ | |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] देवताओं तथा महान् असुरोंके बीच सभी प्राणियोंके लिये विनाशकारी अति भयंकर तथा महान् युद्ध हुआ। शक्ति, मुसलों, झुके पर्वोंवाले बाणों तथा भालोंसे प्रहार किये जानेपर वे देवतागण भयसे व्याकुल होकर भाग गये॥ २-३॥ |
| देवानामसुरेन्द्राणामभवच्च सुदारुणः।<br>सर्वेषामेव भूतानां विनाशकरणो महान् ॥ २ | |
| ते देवाः शक्तिमुशलैः सायकैर्नतपर्वभिः।<br>प्रभिद्यमानाः कुन्तैश्च दुद्रुवुर्भयविह्वलाः ॥ ३ | |
| पराजितास्तदा देवा देवदेवेश्वरं हरिम्।<br>प्रणेमुस्तं सुरेशानं शोकसंविग्नमानसाः ॥ ४ | तदनन्तर पराजित होकर शोकसंतप्त मनवाले देवताओंने देवदेवेश्वर सुरेशान विष्णुके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया॥ ४॥ |
| तान् समीक्ष्याथ भगवान् देवदेवेश्वरो हरिः।<br>प्रणिपत्य स्थितान् देवानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ | प्रणाम करके स्थित हुए उन देवताओंकी ओर देखकर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुने यह वचन कहा— |
| वत्साः किमिति वै देवाश्च्युतालङ्कारविक्रमाः।<br>समागताः ससन्तापाः वक्तुमर्हथ सुव्रताः ॥ ६ | हे वत्स देवतागण! हे सुव्रतो! अलंकार तथा पराक्रमसे विहीन आप लोग दुःखी होकर यहाँपर किसलिये आये हैं; इसे बताइये॥ ५-६॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तथाभूताः सुरोत्तमाः।<br>प्रणम्याहुर्यथावृत्तं देवदेवाय विष्णवे ॥ ७ | उनके उस वचनको सुनकर वैसी दशाको प्राप्त श्रेष्ठ देवतागण प्रणाम करके जैसा घटित हुआ था, वह सब उन देवदेव विष्णुसे कहने लगे॥ ७॥ |
| भगवन् देवदेवेश विष्णो जिष्णो जनार्दन।<br>दानवैः पीडिताः सर्वे वयं शरणमागताः ॥ ८ | हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे विष्णो! हे जिष्णो! हे जनार्दन! दानवोंसे पीड़ित होकर हम सभी आपकी शरणमें आये हैं। हे देवदेवेश! हे पुरुषोत्तम! आप ही हमलोगोंकी गति हैं, आप ही परमात्मा हैं और आप ही सभी लोकोंके पिता भी हैं। हे जनार्दन! आप ही भर्ता (भरण करनेवाले), हर्ता (संहार करनेवाले), भोक्ता तथा दाता हैं; अतः हे दैत्यमर्दन! आप दानवोंका वध करनेकी कृपा कीजिये॥ ८—१०॥ |
| त्वमेव देवदेवेश गतिर्नः पुरुषोत्तम।<br>त्वमेव परमात्मा हि त्वं पिता जगतामपि ॥ ९ | |
| त्वमेव भर्ता हर्ता च भोक्ता दाता जनार्दन।<br>हन्तुमर्हसि तस्मात्त्वं दानवान् दानवार्दन ॥ १० | |
| दैत्याश्च वैष्णवैर्ब्राह्मै रौद्रैर्याम्यैः सुदारुणैः।<br>कौबेरैश्चैव सौम्यैश्च नैर्ऋत्यैर्वारुणैर्दृढैः ॥ ११ | हे कमलनयन! वे सभी दैत्य वर प्राप्त कर लेनेके कारण विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, यम, कुबेर, चन्द्र, निर्ऋति, वरुण, वायु, अग्नि, ईशान, पर्जन्य तथा सूर्यके अत्यन्त दृढ़-दारुण-भयानक-कँपा देनेवाले तथा शक्तिरहित कर |
| वायव्यैश्च तथाग्नेयैरैशान्यैर्वाषिँकैः शुभैः।<br>सौरै रौद्रैस्तथा भीमैः कम्प्यैर्जृम्भणैर्दृढैः ॥ १२ | |
| अवध्या वरलाभात्ते सर्वे वारिजलोचन।<br>सूर्यमण्डलसम्भूतं त्वदीयं चक्रमुद्यतम् ॥ १३ |
| अध्याय १८ ] | भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना | ५१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुण्ठितं हि दधीचेन च्यावनेन जगद्गुरो।<br>दण्डं शार्ङ्गं तवास्त्रं च लब्धं दैत्यैः प्रसादतः ॥ १४<br>पुरा जलन्धरं हन्तुं निर्मितं त्रिपुरारिणा।<br>रथाङ्गं सुशितं घोरं तेन तान् हन्तुमर्हसि ॥ १५<br>तस्मात्तेन निहन्तव्या नान्यैः शस्त्रशतैरपि।<br>ततो निशम्य तेषां वै वचनं वारिजेक्षणः ॥ १६<br>वाचस्पतिमुखानाह स हरिश्चक्रभृत्स्वयम्। | देनेवाले अस्त्रोंसे भी अवध्य हो गये हैं। हे जगद्गुरो ! च्यवनपुत्र दधीचने सूर्यमण्डलसे उत्पन्न आपके उठे हुए चक्रको कुण्ठित कर दिया था। आपकी कृपासे दैत्योंने आपके दण्ड, धनुष तथा अस्त्रको प्राप्त कर लिया है। पूर्वकालमें त्रिपुरशत्रु [शिव]-के द्वारा जलन्धरका संहार करनेके लिये एक भयानक तथा तेज धारवाले चक्रका निर्माण किया गया था; उसीसे आप उन [दानवों]-का वध कर सकते हैं। उसी अस्त्रसे ये दानव मारे जा सकते हैं, अन्य सैकड़ों अस्त्रोंसे नहीं ॥ ११—१५ १/२ ॥<br><br>तदनन्तर उनका वचन सुनकर कमलके समान नेत्रवाले चक्रधारी वे विष्णु वाचस्पति आदि प्रधान देवताओंसे स्वयं कहने लगे ॥ १६ १/२ ॥ |
| श्रीविष्णुरुवाच<br>भो भो देवा महादेवं सर्वैर्देवैः सनातनैः ॥ १७<br>सम्प्राप्य साम्प्रतं सर्वं करिष्यामि दिवौकसाम्।<br>देवा जलन्धरं हन्तुं निर्मितं हि पुरारिणा ॥ १८<br>लब्ध्वा रथाङ्गं तेनैव निहत्य च महासुरान्।<br>सर्वान् धुन्धुमुखान् दैत्यानष्टषष्टिशतान् सुरान् ॥ १९<br>सबान्धवान् क्षणादेव युष्मान् सन्तारयाम्यहम्। | श्रीविष्णु बोले— हे देवताओ ! मैं इस समय सभी सनातन देवताओंके साथ महादेवके पास पहुँचकर [ आप ] देवताओंका सम्पूर्ण कार्य करूँगा। हे देवताओं ! जलन्धरका वध करनेके लिये शिवजीके द्वारा बनाये गये चक्रको प्राप्त करके उसीके द्वारा सभी महान् असुरों, धुन्धु आदि दैत्यों तथा अरसठ सौ अन्य असुरोंको बान्धवोंसहित क्षणभरमें मारकर मैं आप देवताओंका उद्धार करूँगा ॥ १७—१९ १/२ ॥ |
| सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा सुरश्रेष्ठान् सुरश्रेष्ठमनुस्मरन् ॥ २०<br>सुरश्रेष्ठस्तदा श्रेष्ठं पूजयामास शङ्करम्।<br>लिङ्गं स्थाप्य यथान्यायं हिमवच्छिखरे शुभे ॥ २१<br>मेरुपर्वतसङ्काशं निर्मितं विश्वकर्मणा।<br>त्वरिताख्येन रुद्रेण रौद्रेण च जनार्दनः ॥ २२<br>स्नाप्य सम्पूज्य गन्धाद्यैर्ज्वालाकारं मनोरमम्।<br>तुष्टाव च तदा रुद्रं सम्पूज्याग्नौ प्रणम्य च ॥ २३<br>देवं नाम्नां सहस्रेण भवाद्येन यथाक्रमम्।<br>पूजयामास च शिवं प्रणवाद्यं नमोऽन्तकम् ॥ २४<br>देवं नाम्नां सहस्रेण भवाद्येन महेश्वरम्।<br>प्रतिनाम सपद्मेन पूजयामास शङ्करम् ॥ २५<br>अग्नौ च नामभिर्देवं भवाद्यैः समिदादिभिः।<br>स्वाहान्तैर्विधिवद्धुत्वा प्रत्येकमयुतं प्रभुम् ॥ २६ | सूतजी बोले— [ हे ऋषियो ! ] श्रेष्ठ देवताओंसे यह कहकर देवताओंमें श्रेष्ठ विष्णुने सुरश्रेष्ठ शिवका स्मरण करते हुए उन श्रेष्ठ शंकरकी पूजा की। विश्वकर्माद्वारा निर्मित मेरुपर्वत-सदृश लिङ्गको हिमवान्के उत्तम शिखरपर विधिपूर्वक स्थापित करके त्वरितरुद्र तथा रुद्रसूक्तके द्वारा अभिषेक करके गन्ध आदिके द्वारा पूजा करके जनार्दनने ज्योतिरूप मनोरम शिवकी स्तुति की। पुनः अग्निमें देव रुद्रकी पूजा करके और उन्हें प्रणाम करके आदिमें भव नामवाले सहस्रनामके द्वारा क्रमसे आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमः लगाकर शिवकी पूजा की। प्रारम्भमें भव नामवाले सहस्रनामके द्वारा प्रत्येक नामका उच्चारण करते हुए उन्होंने कमलपुष्पसे महेश्वर भगवान् शंकरकी पूजा की। तदनन्तर उन्होंने अन्तमें स्वाहावाले भव आदि नामोंसे समिधा आदिके द्वारा विधिपूर्वक अग्निमें प्रत्येक नामकी दस हजार आहुति |
| ५१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| तुष्टाव च पुनः शम्भुं भवाद्यैर्भवमीश्वरम्। <br> श्रीविष्णुरुवाच | देकर पुनः भव आदि नामोंसे [उन] प्रभु भव ईश्वर शम्भुकी इस प्रकार स्तुति की—॥ २०—२६१/२॥ <br> श्रीविष्णु बोले—भव-शिव, हर-रुद्र, पुरुष, | | भवः शिवो हरो रुद्रः पुरुषः पद्मलोचनः ॥ २७ <br> अर्थितव्यः सदाचारः सर्वशम्भुर्महेश्वरः । <br> ईश्वरः स्थाणुरीशानः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २८ | पद्मलोचन, अर्थितव्य, सदाचार, सर्वशम्भुमहेश्वर, ईश्वर, स्थाणु, ईशान, सहस्राक्ष-सहस्रपात् ॥ २७-२८ ॥ | | वरीयान् वरदो वन्द्यः शङ्करः परमेश्वरः । <br> गङ्गाधरः शूलधरः परार्थैकप्रयोजनः ॥ २९ | वरीयान् वरद-वन्द्य, शङ्कर, परमेश्वर, गंगाधर, शूलधर, परार्थैकप्रयोजन ॥ २९ ॥ | | सर्वज्ञः सर्वदेवादिगिरिधन्वा जटाधरः । <br> चन्द्रापीडश्चन्द्रमौलिर्विद्वान् विश्वामरेश्वरः ॥ ३० | सर्वज्ञ, सर्वदेवादिगिरिधन्वा, जटाधर, चन्द्रापीड, चन्द्रमौलि, विद्वान्, विश्वामरेश्वर ॥ ३० ॥ | | वेदान्तसारसन्दोहः कपाली नीललोहितः । <br> ध्यानाधारोऽपरिच्छेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वरः ॥ ३१ | वेदान्तसारसन्दोह, कपालीनीललोहित, ध्यानाधार, अपरिच्छेद्य, गौरीभर्ता, गणेश्वर ॥ ३१ ॥ | | अष्टमूर्तिर्विश्वमूर्तिस्त्रिवर्गः स्वर्गसाधनः । <br> ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञो देवदेवस्त्रिलोचनः ॥ ३२ | अष्टमूर्ति-विश्वमूर्ति, त्रिवर्ग, स्वर्गसाधन, ज्ञानगम्य, दृढप्रज्ञ, देवदेव, त्रिलोचन ॥ ३२ ॥ | | वामदेवो महादेवः पाण्डुः परिदृढोऽदृढः । <br> विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीशः शुचिरन्तरः ॥ ३३ | वामदेव, महादेव, पाण्डु, परिदृढ, अदृढ, विश्वरूप, विरूपाक्ष, वागीश, शुचि, अन्तर ॥ ३३ ॥ | | सर्वप्रणयसंवादी वृषाङ्को वृषवाहनः । <br> ईशः पिनाकी खट्वाङ्गी चित्रवेषश्चिरन्तनः ॥ ३४ | सर्वप्रणयसंवादी, वृषांक, वृषवाहन, ईश-पिनाकी, खट्वाङ्गी, चित्रवेष, चिरन्तन ॥ ३४ ॥ | | तमोहरो महायोगी गोप्ता ब्रह्माङ्गहज्जटी । <br> कालकालः कृत्तिवासाः सुभगः प्रणवात्मकः ॥ ३५ | तमोहर, महायोगी-गोप्ता, ब्रह्मांगहज्जटी, कालकाल, कृत्तिवासा, सुभग, प्रणवात्मक ॥ ३५ ॥ | | उन्मत्तवेषश्चक्षुष्यो दुर्वासाः स्मरशासनः । <br> दृढायुधः स्कन्दगुरुः परमेष्ठीपरायणः ॥ ३६ | उन्मत्तवेष, चक्षुष्य, दुर्वासा, स्मरशासन, दृढायुध-स्कन्दगुरु, परमेष्ठीपरायण ॥ ३६ ॥ | | अनादिमध्यनिधनो गिरिशो गिरिबान्धवः । <br> कुबेरबन्धुः श्रीकण्ठो लोकवर्णोत्तमोत्तमः ॥ ३७ | अनादिमध्यनिधन, गिरिश-गिरिबान्धव, कुबेरबन्धु-श्रीकण्ठ, लोकवर्णोत्तमोत्तम ॥ ३७ ॥ | | सामान्यदेवः कोदण्डी नीलकण्ठः परश्वधी । <br> विशालाक्षो मृगव्याधः सुरेशः सूर्यतापनः ॥ ३८ | सामान्यदेव, कोदण्डी, नीलकण्ठ, परश्वधी, विशालाक्ष, मृगव्याध, सुरेश, सूर्यतापन ॥ ३८ ॥ | | धर्मकर्माक्षमः क्षेत्रं भगवान् भगनेत्रभित् । <br> उग्रः पशुपतिस्तार्क्ष्यप्रियभक्तः प्रियंवदः ॥ ३९ | धर्मकर्माक्षम, क्षेत्र-भगवान्, भगनेत्रभिद्-उग्र, पशुपति, तार्क्ष्यप्रियभक्त, प्रियंवद ॥ ३९ ॥ | | दान्तोदयाकरो दक्षः कपर्दी कामशासनः । <br> श्मशाननिलयः सूक्ष्मः श्मशानस्थो महेश्वरः ॥ ४० | दान्तोदयाकर, दक्ष, कपर्दी, कामशासन, श्मशाननिलय-सूक्ष्म, श्मशानस्थ, महेश्वर ॥ ४० ॥ | | लोककर्ता भूतपतिर्महाकर्ता महौषधी । <br> उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ॥ ४१ | लोककर्ता, भूतपति, महाकर्ता, महौषधी, उत्तर, गोपति, गोप्ता, ज्ञानगम्य, पुरातन ॥ ४१ ॥ | | नीतिः सुनीतिः शुद्धात्मा सोमसोमरतः सुखी । <br> सोमपोऽमृतपः सोमो महानीतिर्महामतिः ॥ ४२ | नीति, सुनीति, शुद्धात्मा, सोमसोमरत, सुखी, सोमप, अमृतप, सोम, महानीति, महामति ॥ ४२ ॥ | | अजातशत्रुरालोकः सम्भाव्यो हव्यवाहनः । <br> लोककारो वेदकारः सूत्रकारः सनातनः ॥ ४३ | अजातशत्रु, आलोक, सम्भाव्य, हव्यवाहन, लोककार, वेदकार, सूत्रकार, सनातन ॥ ४३ ॥ |
अध्याय ९८ ] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५१९
| महर्षिः कपिलाचार्यो विश्वदीप्तिस्त्रिलोचनः।<br>पिनाकपाणिर्भूदेवः स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्सदा॥ ४४॥ | महर्षि कपिलाचार्य, विश्वदीप्ति, त्रिलोचन, पिनाकपाणिभूदेव, स्वस्तिद, सदास्वस्तिकृत् ॥ ४४॥ |
|---|---|
| त्रिधामा सौभगः शर्वः सर्वज्ञः सर्वगोचरः।<br>ब्रह्मधृग्विborder ब्रह्मधृग्विश्वसृक्स्वर्गः कर्णिकारः प्रियः कविः॥ ४५॥ | त्रिधामा, सौभग, शर्व-सर्वज्ञ, सर्वगोचर,<br>ब्रह्मधृग्विश्वसृक्स्वर्ग, कर्णिकार, प्रिय, कवि ॥ ४५ ॥ |
| शाखो विशाखो गोशाखः शिवो नैकः क्रतुः समः।<br>गङ्गाप्लवोदको भावः सकलः स्थपतिःस्थिरः॥ ४६॥ | शाख-विशाख, गोशाख, शिव, नैक, क्रतु, सम,<br>गंगाप्लवोदक, भाव, सकल, स्थपतिस्थिर ॥ ४६ ॥ |
| विजितात्मा विधेयात्मा भूतवाहनसारथिः।<br>सगणो गणकार्यश्च सुकीर्तिश्छिन्नसंशयः॥ ४७॥ | विजितात्मा, विधेयात्मा, भूतवाहनसारथि, सगण,<br>गणकार्य, सुकीर्ति, छिन्नसंशय ॥ ४७ ॥ |
| कामदेवः कामपालो भस्मोद्धूलितविग्रहः।<br>भस्मप्रियो भस्मशायी कामी कान्तः कृतागमः॥ ४८॥ | कामदेव, कामपाल, भस्मोद्धूलितविग्रह, भस्मप्रिय,<br>भस्मशायी, कामी-कान्त, कृतागम ॥ ४८ ॥ |
| समायुक्तो निवृत्तात्मा धर्मयुक्तः सदाशिवः।<br>चतुर्मुखश्चतुर्बाहुर्दुरावासो दुरासदः॥ ४९॥ | समायुक्त, निवृत्तात्मा, धर्मयुक्त, सदाशिव,<br>चतुर्मुखचतुर्बाहु, दुरावास, दुरासद ॥ ४९ ॥ |
| दुर्गमो दुर्लभो दुर्गः सर्वायुधविशारदः।<br>अध्यात्मयोगनिलयः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः॥ ५०॥ | दुर्गमदुर्लभ, दुर्ग, सर्वायुधविशारद, अध्यात्म-<br>योगनिलय, सुतन्तु, तन्तुवर्धन ॥ ५० ॥ |
| शुभाङ्गो लोकसारङ्गो जगदीशोडमृताशनः।<br>भस्मशुद्धिकरो मेरुरोजस्वी शुद्धविग्रहः॥ ५१॥ | शुभाङ्ग, लोकसारंग, जगदीश, अमृताशन,<br>भस्मशुद्धिकर, मेरु, ओजस्वी, शुद्धविग्रह ॥ ५१ ॥ |
| हिरण्यरेतास्तरणिर्मरीचिर्महिमालयः।<br>महाह्रदो महागर्भः सिद्धवृन्दारवन्दितः॥ ५२॥ | हिरण्यरेता, तरणि-मरीचि, महिमालय, महाह्रद,<br>महागर्भ, सिद्धवृन्दारवन्दित ॥ ५२ ॥ |
| व्याघ्रचर्मधरो व्याली महाभूतो महानिधिः।<br>अमृताङ्गोऽमृतवपुः पञ्चयज्ञः प्रभञ्जनः॥ ५३॥ | व्याघ्रचर्मधर, व्याली, महाभूत, महानिधि, अमृतांग,<br>अमृतवपु, पंचयज्ञ, प्रभंजन ॥ ५३ ॥ |
| पञ्चविंशतितत्त्वज्ञः पारिजातः परावरः।<br>सुलभः सुव्रतः शूरो वाङ्मयैकनिधिर्निधिः॥ ५४॥ | पंचविंशतितत्त्वज्ञ, पारिजात, परावर, सुलभ,<br>सुव्रतशूर, वाङ्मयैकनिधि, निधि ॥ ५४ ॥ |
| वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः।<br>आश्रमः क्षपणः क्षामो ज्ञानवानचलाचलः॥ ५५॥ | वर्णाश्रमगुरु, वर्णी, शत्रुजिच्छत्रुतापन, आश्रम, क्षपण,<br>क्षाम, ज्ञानवान्, अचलाचल ॥ ५५ ॥ |
| प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः सुपर्णो वायुवाहनः।<br>धनुर्धरो धनुर्वेदो गुणराशिर्गुणाकरः॥ ५६॥ | प्रमाणभूत, दुर्ज्ञेय, सुपर्ण, वायुवाहन, धनुर्धरधनुर्वेद,<br>गुणराशि, गुणाकर ॥ ५६ ॥ |
| अनन्तदृष्टिरानन्दो दण्डो दमयिता दमः।<br>अभिवाद्यो महाचार्यो विश्वकर्मा विशारदः॥ ५७॥ | अनन्तदृष्टि, आनन्द, दण्डदमयिता, दम, अभिवाद्य,<br>महाचार्य, विश्वकर्मा, विशारद ॥ ५७ ॥ |
| वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भूतभावनः।<br>उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नो जितकामोऽजितप्रियः॥ ५८॥ | वीतराग, विनीतात्मा, तपस्वी, भूतभावन,<br>उन्मत्तवेषप्रच्छन्न, जितकाम, अजितप्रिय ॥ ५८ ॥ |
| कल्याणप्रकृतिः कल्पः सर्वलोकप्रजापतिः।<br>तपस्वी तारको धीमान् प्रधानप्रभुरव्ययः॥ ५९॥ | कल्याणप्रकृति, कल्प, सर्वलोकप्रजापति,<br>तपस्वीतारक, धीमान्, प्रधानप्रभु, अव्यय ॥ ५९ ॥ |
| लोकपालोऽन्तर्हितात्मा कल्पादिः कमलेक्षणः।<br>वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो नियमो नियमाश्रयः॥ ६०॥ | लोकपाल, अन्तर्हितात्मा, कल्पादि, कमलेक्षण,<br>वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ, नियम, नियमाश्रय ॥ ६० ॥ |
| चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्विरामो विद्रुमच्छविः।<br>भक्तिगम्यः परं ब्रह्म मृगबाणार्पणोऽनघः॥ ६१॥ | चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, विराम, विद्रुमच्छवि, |
| ५२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक | नाम/पदच्छेद |
|---|---|
| भक्तिगम्य, परं-ब्रह्ममृगबाणार्पण, अनघ॥ ६१॥ | |
| अद्रिराजालयः कान्तः परमात्मा जगद्गुरुः।<br>सर्वकर्माचलस्त्वष्टा मङ्गल्यो मङ्गलावृतः॥ ६२ | अद्रिराजालय, कान्त, परमात्मा, जगद्गुरु, सर्वकर्माचल, त्वष्टा, मंगल्यमंगलावृत॥ ६२॥ |
| महातपा दीर्घतपाः स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः।<br>अहः संवत्सरो व्याप्तिः प्रमाणं परमं तपः॥ ६३ | महातपा, दीर्घतपा, स्थविष्ठ, स्थविर, ध्रुव, अहः, संवत्सर, व्याप्ति, प्रमाण, परम, तप॥ ६३॥ |
| संवत्सरकरो मन्त्रः प्रत्ययः सर्वदर्शनः।<br>अजः सर्वेश्वरः स्निग्धो महारेता महाबलः॥ ६४ | संवत्सरकर, मन्त्र-प्रत्यय, सर्वदर्शन, अज, सर्वेश्वर, स्निग्ध, महारेतामहाबलः॥ ६४॥ |
| योगी योग्यो महारेताः सिद्धः सर्वादििरग्निदः।<br>वसुर्वसुमनाः सत्यः सर्वपापहरो हरः॥ ६५ | योगी, योग्य, महारेता, सिद्ध, सर्वादि, अग्निदः, वसु, वसुमना, सत्यसर्वपापहर, हर॥ ६५॥ |
| अमृतः शाश्वतः शान्तो बाणहस्तः प्रतापवान्।<br>कमण्डलुधरो धन्वी वेदाङ्गो वेदविन्मुनिः॥ ६६ | अमृतशाश्वत, शान्त, बाणहस्तप्रतापवान्, कमण्डलुधर, धन्वी, वेदाङ्ग, वेदविद्, मुनि॥ ६६॥ |
| भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता लोकनेता दुराधरः।<br>अतीन्द्रियो महामायः सर्वावासश्चतुष्पथः॥ ६७ | भ्राजिष्णु, भोजनभोक्ता, लोकनेता, दुराधर, अतीन्द्रिय, महामाय, सर्वावास, चतुष्पथ॥ ६७॥ |
| कालयोगी महानादो महोत्साहो महाबलः।<br>महाबुद्धिर्महावीर्यो भूतचारी पुरन्दरः॥ ६८ | कालयोगी, महानाद, महोत्साह, महाबल, महाबुद्धि, महावीर्य, भूतचारी, पुरन्दर॥ ६८॥ |
| निशाचरः प्रेतचारिमहाशक्तिर्महाद्युतिः।<br>अनिर्देश्यवपुः श्रीमान् सर्वहार्यमितो गतिः॥ ६९ | निशाचर, प्रेतचारिमहाशक्ति, महाद्युति, अनिर्देश्यवपु, श्रीमान्, सर्वहार्यमित, गति॥ ६९॥ |
| बहुश्रुतो बहुमयो नियतात्मा भवोद्भवः।<br>ओजस्तेजोद्युतिकरो नर्तकः सर्वकामकः॥ ७० | बहुश्रुत, बहुमय, नियतात्मा, भवोद्भव, ओजस्तेजोद्युतिकर, नर्तक, सर्वकामक॥ ७०॥ |
| नृत्यप्रियो नृत्यनृत्यः प्रकाशात्मा प्रतापनः।<br>बुद्धस्पष्टाक्षरो मन्त्रः सन्मानः सारसम्प्लवः॥ ७१ | नृत्यप्रिय, नृत्यनृत्य, प्रकाशात्माप्रतापन, बुद्धस्पष्टाक्षर, मन्त्र, सन्मान, सारसंप्लव॥ ७१॥ |
| युगादिकृद्युगावर्तो गम्भीरो वृषवाहनः।<br>इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शरभः शरभो धनुः॥ ७२ | युगादिकृद्युगावर्त, गम्भीर, वृषवाहन, इष्ट, विशिष्ट-शिष्टेष्ट, शरभ, शरभधनुः॥ ७२॥ |
| अपां निधिरधिष्ठानं विजयो जयकालवित्।<br>प्रतिष्ठितः प्रमाणज्ञो हिरण्यकवचो हरिः॥ ७३ | अपांनिधि, अधिष्ठानविजय, जयकालवित्, प्रतिष्ठित, प्रमाणज्ञ, हिरण्यकवच, हरि॥ ७३॥ |
| विरोचनः सुरगणो विद्येशो विबुधाश्रयः।<br>बालरूपो बलोन्माथी विवर्तो गहनो गुरुः॥ ७४ | विरोचन, सुरगण, विद्येशविबुधाश्रय, बालरूप, बलोन्माथी, विवर्त, गहनगुरु॥ ७४॥ |
| करणं कारणं कर्ता सर्वबन्धविमोचनः।<br>विद्वत्तमो वीतभयो विश्वभर्ता निशाकरः॥ ७५ | करण, कारण, कर्ता, सर्वबन्धविमोचन, विद्वत्तमवीतभय, विश्वभर्ता, निशाकर॥ ७५॥ |
| व्यवसायो व्यवस्थानः स्थानदो जगदादिजः।<br>दुन्दुभो ललितो विश्वो भवात्मात्मनि संस्थितः॥ ७६ | व्यवसाय, व्यवस्थान, स्थानद, जगदादिज, दुन्दुभ, ललित, विश्व, भवात्मात्मनिसंस्थित॥ ७६॥ |
| वीरेश्वरो वीरभद्रो वीरहा वीरभृद्विराट्।<br>वीरचूडामणिर्वेत्ता तीव्रनादो नदीधरः॥ ७७ | वीरेश्वरवीरभद्र, वीरहा, वीरभृद्विराट्, वीरचूड़ामणि, वेत्ता, तीव्रनाद, नदीधर॥ ७७॥ |
| आज्ञाधारस्त्रिशूली च शिपिविष्टः शिवालयः।<br>वालखिल्यो महाचापस्तिग्मांशुर्निधिरव्ययः॥ ७८ | आज्ञाधार, त्रिशूली, शिपिविष्ट, शिवालय, वालखिल्य, महाचाप, तिग्मांशु, निधि-अव्यय॥ ७८॥ |
| अध्याय ९८ ] | भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना | ५२१ |
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| श्लोक | नाम-सूची |
|---|---|
| अभिरामः सुशरणः सुब्रह्मण्यः सुधापतिः।<br>मघवान् कौशिको गोमान् विश्रामः सर्वशासनः ॥ ७९ | अभिराम, सुशरण, सुब्रह्मण्य, सुधापति, मधवान्कौशिक, गोमान्, विश्राम, सर्वशासन ॥ ७९ ॥ |
| ललाटाक्षो विश्वदेहः सारः संसारचक्रभृत्।<br>अमोघदण्डी मध्यस्थो हिरण्यो ब्रह्मवर्चसी ॥ ८० | ललाटाक्ष, विश्वदेह, सार, संसारचक्रभृत्, अमोघदण्डी, मध्यस्थ, हिरण्य, ब्रह्मवर्चसी ॥ ८० ॥ |
| परमार्थः परमयः शम्बरो व्याघ्रकोऽनलः।<br>रुचिर्वररुचिर्वन्द्यो वाचस्पतिरहर्पतिः ॥ ८१ | परमार्थ, परमय, शम्बर, व्याघ्रक, अनल, रुचि, वररुचि, वन्द्य, वाचस्पति, अहर्पति ॥ ८१ ॥ |
| रविर्विरोचनः स्कन्धः शास्ता वैवस्वतोऽजनः।<br>युक्तिरुन्नतकीर्तिश्च शान्तरागः पराजयः ॥ ८२ | रविविरोचन, स्कन्ध, शास्तावैवस्वत, अजन, युक्ति, उन्नतकीर्ति, शान्तराग, पराजय ॥ ८२ ॥ |
| कैलासपतिकामारिः सविता रविलोचनः।<br>विद्वत्तमो वीतभयो विश्वहर्तानिवारितः ॥ ८३ | कैलासपतिकामारि, सविता, रविलोचन, विद्वत्तम, वीतभय, विश्वहर्तानिवारित ॥ ८३ ॥ |
| नित्यो नियतकल्याणः पुण्यश्रवणकीर्तनः।<br>दूरश्रवा विश्वसहो ध्येयो दुःस्वप्ननाशनः ॥ ८४ | नित्य, नियतकल्याण, पुण्यश्रवणकीर्तन, दूरश्रवा, विश्वसह, ध्येय, दुःस्वप्ननाशन ॥ ८४ ॥ |
| उत्तारको दुष्कृतिहा दुर्धर्षो दुःसहोऽभयः।<br>अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः किरीटीत्रिदशाधिपः ॥ ८५ | उत्तारक, दुष्कृतिहा, दुर्धर्ष, दुःसह, अभय, अनादि, भू, भुवो लक्ष्मी, किरीटीत्रिदशाधिप ॥ ८५ ॥ |
| विश्वगोप्ता विश्वभर्ता सुधीरो रुचिराङ्गदः।<br>जननो जनजन्मादिः प्रीतिमान्नीतिमान्नयः ॥ ८६ | विश्वगोप्ता, विश्वभर्ता, सुधीर, रुचिरांगद, जनन, जनजन्मादि, प्रीतिमान्, नीतिमान्, नय ॥ ८६ ॥ |
| विशिष्टः काश्यपो भानुर्भीमो भीमपराक्रमः।<br>प्रणवः सप्तधाचारो महाकायो महाधनुः ॥ ८७ | विशिष्ट, काश्यप, भानु, भीम, भीमपराक्रम, प्रणव, सप्तधाचार, महाकायमहाधनु ॥ ८७ ॥ |
| जन्माधिपो महादेवः सकलागमपारगः।<br>तत्त्वात्तत्त्वविवेकात्मा विभूष्णुर्भूतिभूषणः ॥ ८८ | जन्माधिप, महादेव, सकलागमपारग, तत्त्वात्तत्त्वविवेकात्मा, विभूष्णु, भूतिभूषण ॥ ८८ ॥ |
| ऋषिर्ब्राह्मणविज्जिष्णुर्जन्ममृत्युजरातिगः ।<br>यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञान्तोऽमोघविक्रमः ॥ ८९ | ऋषि, ब्राह्मणविज्जिष्णु, जन्ममृत्युजरातिग, यज्ञयज्ञपति, यज्वा, यज्ञान्त, अमोघविक्रम ॥ ८९ ॥ |
| महेन्द्रो दुर्भरः सेनी यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः।<br>पञ्चब्रह्मसमुत्पत्तिर्विश्वेशो विमलोदयः ॥ ९० | महेन्द्र, दुर्भर, सेनी, यज्ञांगयज्ञवाहन, पंचब्रह्मसमुत्पत्ति, विश्वेश, विमलोदय ॥ ९० ॥ |
| आत्मयोनिरनाद्यन्तो षड्विंशत्सप्तलोकधृक्।<br>गायत्रीवल्लभः प्रांशुर्विश्वावासः प्रभाकरः ॥ ९१ | आत्मयोनि, अनाद्यन्त, षड्विंशत्सप्तलोकधृक्, गायत्रीवल्लभ, प्रांशु, विश्वावास, प्रभाकर ॥ ९१ ॥ |
| शिशुर्गिरिरतः सम्राट् सुषेणः सुरशत्रुहा।<br>अमोघोऽरिष्टमथनो मुकुन्दो विगतज्वरः ॥ ९२ | शिशु, गिरिरत, सम्राट्सुषेण, सुरशत्रुहा, अमोघ, अरिष्टमथन, मुकुन्द, विगतज्वर ॥ ९२ ॥ |
| स्वयंज्योतिरनुज्योतिरारत्मज्योतिश्चञ्चलः ।<br>पिङ्गलः कपिलश्मश्रुः शास्त्रनेत्रस्त्रयीतनुः ॥ ९३ | स्वयंज्योति, अनुज्योति, आत्मज्योति, अचंचल, पिंगल, कपिलश्मश्रु, शास्त्रनेत्रत्रयीतनु ॥ ९३ ॥ |
| ज्ञानस्कन्धो महाज्ञानी निरुत्पत्तिरुपप्लवः।<br>भगो विवस्वानादित्यो योगाचार्यो बृहस्पतिः ॥ ९४ | ज्ञानस्कन्ध, महाज्ञानी, निरुत्पत्ति, उपप्लव, भग, विवस्वान्-आदित्य, योगाचार्य, बृहस्पति ॥ ९४ ॥ |
| उदारकीर्तिरुद्योगी सद्योगी सदसन्मयः।<br>नक्षत्रमाली राकेशः साधिष्ठानः षडाश्रयः ॥ ९५ | उदारकीर्ति, उद्योगी, सद्योगी, सदसन्मय, नक्षत्रमालीराकेश, साधिष्ठान, षडाश्रय ॥ ९५ ॥ |
| पवित्रपाणिः पापारिर्मणिपूरो मनोगतिः।<br>हृत्पुण्डरीकमासीनः शुक्लः शान्तो वृषाकपिः ॥ ९६ | पवित्रपाणि, पापारि, मणिपूर, मनोगति, |
| ५२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| हृत्पुण्डरीकमासीन, शुक्ल, शान्तवृषाकपि ॥ ९६ ॥ | |
|---|---|
| विष्णुर्गृहपतिः कृष्णः समर्थोऽनर्थनाशनः ।<br>अधर्मशत्रुरक्षय्यः पुरुहूतः पुरुष्टुतः ॥ ९७ | विष्णु, गृहपति, कृष्ण, समर्थ, अनर्थनाशन, अधर्मशत्रु, अक्षय्य, पुरुहूतपुरुष्टुत ॥ ९७ ॥ |
| ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः ।<br>जगद्धितैषिसुगतः कुमारः कुशलागमः ॥ ९८ | ब्रह्मगर्भ, बृहद्गर्भ, धर्मधेनु, धनागम, जगद्धितैषिसुगत, कुमार, कुशलागम ॥ ९८ ॥ |
| हिरण्यवर्णो ज्योतिष्मान्नानाभूतधरो ध्वनिः ।<br>अरोगो नियमध्यक्षो विश्वामित्रो द्विजोत्तमः ॥ ९९ | हिरण्यवर्ण, ज्योतिष्मान्, नानाभूतधर, ध्वनि, अरोग, नियमाध्यक्ष, विश्वामित्रद्विजोत्तम ॥ ९९ ॥ |
| बृहज्ज्योतिः सुधामा च महाज्योतिरनुत्तमः ।<br>मातामहो मातरिश्वा नभस्वान्नागहारधृक् ॥ १०० | बृहज्ज्योति, सुधामा, महाज्योति, अनुत्तम, मातामह, मातरिश्वा, नभस्वान्, नागहारधृक् ॥ १०० ॥ |
| पुलस्त्यः पुलहोऽगस्त्यो जातूकर्ण्यः पराशरः ।<br>निरावरणधर्मज्ञो विरिञ्चो विष्टरश्रवाः ॥ १०१ | पुलस्त्य, पुलह, अगस्त्य, जातूकर्ण्य, पराशर, निरावरणधर्मज्ञ, विरिंच, विष्टरश्रवा ॥ १०१ ॥ |
| आत्मभूरनिरुद्धोऽत्रिज्ज्ञानमूर्तिर्महायशाः ।<br>लोकचूडामणिर्वीरः चण्डसत्यपराक्रमः ॥ १०२ | आत्मभू, अनिरुद्ध, अत्रिज्ञानमूर्ति, महायशा, लोकचूडामणि, वीर, चण्डसत्यपराक्रम ॥ १०२ ॥ |
| व्यालकल्पो महाकल्पो महावृक्षः कलाधरः ।<br>अलङ्करिष्णुस्त्वचलो रोचिष्णुर्विक्रमोत्तमः ॥ १०३ | व्यालकल्प, महाकल्प, महावृक्ष, कलाधर, अलंकरिष्णु, अचल, रोचिष्णु, विक्रमोत्तम ॥ १०३ ॥ |
| आशुशब्दपतिर्वेगी प्लवनः शिखिसारथिः ।<br>असंस्पृष्टोऽतिथिः शक्रः प्रमाथी पापनाशनः ॥ १०४ | आशुशब्दपति, वेगी, प्लवन, शिखिसारथि, असंस्पृष्ट, अतिथि, शक्रप्रमाथी, पापनाशन ॥ १०४ ॥ |
| वसुश्रवाः कव्यवाहः प्रतप्तो विश्वभोजनः ।<br>जर्यो जराधिशमनो लोहितश्च तनूनपात् ॥ १०५ | वसुश्रवा, कव्यवाह, प्रतप्त, विश्वभोजन, जर्य, जराधिशमन, लोहित, तनूनपात् ॥ १०५ ॥ |
| पृषदश्वो नभो योनिः सुप्रतीकस्तमिस्रहा ।<br>निदाघस्तपनो मेघः पक्षः परपुरञ्जयः ॥ १०६ | पृषदश्व, नभ, योनि, सुप्रतीक, तमिस्रहा, निदाघतपन, मेघपक्ष, परपुरंजय ॥ १०६ ॥ |
| मुखानिलः सुनिष्पन्नः सुरभिः शिशिरात्मकः ।<br>वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बीजवाहनः ॥ १०७ | मुखानिल, सुनिष्पन्न, सुरभि, शिशिरात्मक, वसन्तमाधव, ग्रीष्म, नभस्य, बीजवाहन ॥ १०७ ॥ |
| अङ्गिरा मुनिरात्रेयो विमलो विश्ववाहनः ।<br>पावनः पुरुजिच्छक्रस्त्रिविद्यो नरवाहनः ॥ १०८ | अंगिरा, मुनिआत्रेय, विमल, विश्ववाहन, पावन, पुरुजित्, शक्र, त्रिविद्य, नरवाहन ॥ १०८ ॥ |
| मनोबुद्धिरहङ्कारः क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालकः ।<br>तेजोनिधिर्ज्ञाननिधिर्विपाको विघ्नकारकः ॥ १०९ | मनोबुद्धि, अहंकार, क्षेत्रज्ञ, क्षेत्रपालक, तेजोनिधि, ज्ञाननिधि, विपाक, विघ्नकारक ॥ १०९ ॥ |
| अधरोऽनुत्तरो ज्ञेयो ज्येष्ठो निःश्रेयसालयः ।<br>शैलो नगस्तनुर्दोहो दानवारिररिन्दमः ॥ ११० | अधर, अनुत्तर, ज्ञेय, ज्येष्ठ, निःश्रेयसालय, शैल, नग, तनु, दोह, दानवारि, अरिन्दम ॥ ११० ॥ |
| चारुधीर्जनकश्चारुविशल्यो लोकशल्यकृत् ।<br>चतुर्वेदश्चतुर्भावश्चतुरश्चतुरप्रियः ॥ १११ | चारुधीर्जनक, चारुविशल्य, लोकशल्यकृत्, चतुर्वेद, चतुर्भाव, चतुरचतुरप्रिय ॥ १११ ॥ |
| आम्नायोऽथ समाम्नायस्तीर्थदेवशिवालयः ।<br>बहुरूपो महारूपः सर्वरूपश्चराचरः ॥ ११२ | आम्नाय, समाम्नाय, तीर्थदेवशिवालय, बहुरूप, महारूप, सर्वरूप, चराचर ॥ ११२ ॥ |
| न्यायनिर्वाहको न्यायो न्यायगम्यो निरञ्जनः ।<br>सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वशस्त्रप्रभञ्जनः ॥ ११३ | न्यायनिर्वाहक, न्याय, न्यायगम्य, निरंजन, सहस्रमूर्धा, देवेन्द्र, सर्वशस्त्रप्रभंजन ॥ ११३ ॥ |
अध्याय ९८] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५२३
| श्लोक | नाम-सूची |
|---|---|
| मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी दान्तो गुणोत्तमः।<br>पिङ्गलाक्षोऽथ हर्यक्षो नीलग्रीवो निरामयः॥ ११४॥ | मुण्ड, विरूप, विकृत, दण्डी, दान्त, गुणोत्तम, पिङ्गलाक्ष, हर्यक्ष, नीलग्रीव, निरामय॥ ११४॥ |
| सहस्रबाहुः सर्वेशः शरण्यः सर्वलोकभृत्।<br>पद्मासनः परंज्योतिः परावरपरंफलः॥ ११५॥ | सहस्रबाहुसर्वेश, शरण्य, सर्वलोकभृत्, पद्मासन, परंज्योति, परावरपरंफल॥ ११५॥ |
| पद्मगर्भो महागर्भो विश्वगर्भो विचक्षणः।<br>परावरज्ञो बीजेशः सुमुखः सुमहास्वनः॥ ११६॥ | पद्मगर्भ, महागर्भ, विश्वगर्भ, विचक्षण, परावरज्ञ, बीजेश, सुमुखसुमहास्वन॥ ११६॥ |
| देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः।<br>देवासुरमहामात्रो देवासुरमहाश्रयः॥ ११७॥ | देवासुरगुरुदेव, देवासुरनमस्कृत, देवासुरमहामात्र, देवासुरमहाश्रय॥ ११७॥ |
| देवादिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः।<br>देवासुरेश्वरो दिव्यो देवासुरमहेश्वरः॥ ११८॥ | देवादिदेव, देवर्षिदेवासुरवरप्रद, देवासुरेश्वर, दिव्य, देवासुरमहेश्वर॥ ११८॥ |
| सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवतात्मात्मसम्भवः।<br>ईड्योऽनीशः सुरव्याघ्रो देवसिंहो दिवाकरः॥ ११९॥ | सर्वदेवमय, अचिन्त्य, देवतात्मा, आत्मसम्भव, ईड्य, अनीश, सुरव्याघ्र, देवसिंह, दिवाकर॥ ११९॥ |
| विबुधाग्रवरश्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः।<br>शिवज्ञानरतः श्रीमान् शिखिश्रीपर्वतप्रियः॥ १२०॥ | विबुधाग्रवरश्रेष्ठ, सर्वदेवोत्तमोत्तम, शिवज्ञानरत, श्रीमान्, शिखिश्रीपर्वतप्रिय॥ १२०॥ |
| जयस्तम्भो विशिष्टम्भो नरसिंहनिपातनः।<br>ब्रह्मचारी लोकचारी धर्मचारी धनाधिपः॥ १२१॥ | जयस्तम्भ, विशिष्टम्भ, नरसिंहनिपातन, ब्रह्मचारी, लोकचारी, धर्मचारी, धनाधिप॥ १२१॥ |
| नन्दी नन्दीश्वरो नग्नो नग्नव्रतधरः शुचिः।<br>लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो युगाध्यक्षो युगावहः॥ १२२॥ | नन्दी, नन्दीश्वर, नग्न, नग्नव्रतधर, शुचि, लिङ्गाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, युगाध्यक्ष, युगावह॥ १२२॥ |
| स्ववशः सवशः स्वर्गस्वरः स्वरमयस्वनः।<br>बीजाध्यक्षो बीजकर्ता धनकृद्धर्मवर्धनः॥ १२३॥ | स्ववश, सवश, स्वर्गस्वर, स्वरमयस्वन, बीजाध्यक्ष, बीजकर्ता, धनकृद्धर्मवर्धन॥ १२३॥ |
| दम्भोऽदम्भो महादम्भः सर्वभूतमहेश्वरः।<br>श्मशाननिलयस्तिष्यः सेतुरप्रतिमाकृतिः॥ १२४॥ | दम्भ, अदम्भ, महादम्भ, सर्वभूतमहेश्वर, श्मशाननिलय, तिष्य, सेतु, अप्रतिमाकृति॥ १२४॥ |
| लोकोत्तरस्फुटालोकस्त्र्यम्बको नागभूषणः।<br>अन्धकारिर्मखद्वेषी विष्णुकन्धरपातनः॥ १२५॥ | लोकोत्तरस्फुटालोक, त्र्यम्बक, नागभूषण, अन्धकारि, मखद्वेषी, विष्णुकन्धरपातन॥ १२५॥ |
| वीतदोषोऽक्षयगुणो दक्षारिः पूषदन्तहृत्।<br>धूर्जटिः खण्डपरशुः सकलो निष्कलोऽनघः॥ १२६॥ | वीतदोष, अक्षयगुण, दक्षारि, पूषदन्तहृत्, धूर्जटि, खण्डपरशु, सकल, निष्कल, अनघ॥ १२६॥ |
| आधारः सकलाधारः पाण्डुराभो मृडो नटः।<br>पूर्णः पूरयिता पुण्यः सुकुमारः सुलोचनः॥ १२७॥ | आधार, सकलाधार, पाण्डुराभ, मृड, नट, पूर्ण, पूरयिता, पुण्य, सुकुमार, सुलोचन॥ १२७॥ |
| सामगेयः प्रियकरः पुण्यकीर्तिर्निरामयः।<br>मनोजवस्तीर्थकरो जटिलो जीवितेश्वरः॥ १२८॥ | सामगेय, प्रियकर, पुण्यकीर्ति, अनामय, मनोजव, तीर्थकर, जटिल, जीवितेश्वर॥ १२८॥ |
| जीवितान्तकरो नित्यो वसुचेता वसुप्रियः।<br>सद्गतिः सत्कृतिः सक्तः कालकण्ठः कलाधरः॥ १२९॥ | जीवितान्तकर, नित्य, वसुचेता, वसुप्रिय, सद्गति, सत्कृति, सक्त, कालकण्ठ, कलाधर॥ १२९॥ |
| मानी मान्यो महाकालः सद्भूतिः सत्परायणः।<br>चन्द्रसञ्जीवनः शास्ता लोकगूढोऽमराधिपः॥ १३०॥ | मानी, मान्य, महाकाल, सद्भूति, सत्परायण, चन्द्रसंजीवन, शास्तालोकगूढ़, अमराधिप॥ १३०॥ |
| लोकबन्धुर्लोकनाथः कृतज्ञः कृतिभूषणः।<br>अनपाय्यक्षरः कान्तः सर्वशास्त्रभृतां वरः॥ १३१॥ | लोकबन्धु, लोकनाथ, कृतज्ञ-कृतिभूषण, |
| ५२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| अनपाय्यक्षर, कान्त, सर्वशास्त्रभृतांवर ॥ १३१ ॥ | |
|---|---|
| तेजोमयो द्युतिधरो लोकमायोऽग्रणीरणुः ।<br>शुचिस्मितः प्रसन्नात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ॥ १३२ | तेजोमयद्युतिधर, लोकमाय, अग्रणी, अणु, शुचिस्मित, प्रसन्नात्मा, दुर्जय, दुरतिक्रम ॥ १३२ ॥ |
| ज्योतिर्मयो निराकारो जगन्नाथो जलेश्वरः ।<br>तुम्बवीणी महाकायो विशोकः शोकनाशनः ॥ १३३ | ज्योतिर्मय, निराकार, जगन्नाथ, जलेश्वर, तुम्बवीणी, महाकाय, विशोक, शोकनाशन ॥ १३३ ॥ |
| त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः शुद्धः शुद्धी रथाक्षजः ।<br>अव्यक्तलक्षणोऽव्यक्तो व्यक्ताव्यक्तो विशाम्पतिः ॥ १३४ | त्रिलोकात्मा, त्रिलोकेश, शुद्ध, शुद्धि, रथाक्षज, अव्यक्तलक्षण, अव्यक्त, व्यक्ताव्यक्तविशाम्पति ॥ १३४ ॥ |
| वरशीलो वर्तलो मानो मानधनो मयः ।<br>ब्रह्मा विष्णुः प्रजापालो हंसो हंसगतिर्यमः ॥ १३५ | वरशील, वर्तुल, मान, मानधनमय, ब्रह्मा, विष्णुप्रजापाल, हंस, हंसगति, यम ॥ १३५ ॥ |
| वेधा धाता विधाता च अत्ताहर्ता चतुर्मुखः ।<br>कैलासशिखरावासी सर्वावासी सतां गतिः ॥ १३६ | वेधा, धाता, विधाता, अत्ताहर्ता, चतुर्मुख, कैलासशिखरावासी, सर्वावासी, सतांगति ॥ १३६ ॥ |
| हिरण्यगर्भो हरिणः पुरुषः पूर्वजः पिता ।<br>भूतालयो भूतपतिर्भूतिदो भुवनेश्वरः ॥ १३७ | हिरण्यगर्भ, हरिण, पुरुष, पूर्वजपिता, भूतालय, भूतपति, भूतिद, भुवनेश्वर ॥ १३७ ॥ |
| संयोगी योगविद्ब्रह्मा ब्रह्मण्यो ब्राह्मणप्रियः ।<br>देवप्रियो देवनाथो देवज्ञो देवचिन्तकः ॥ १३८ | संयोगी, योगविद्ब्रह्मा, ब्रह्मण्य, ब्राह्मणप्रिय, देवप्रिय, देवनाथ, देवज्ञ, देवचिन्तक ॥ १३८ ॥ |
| विषमाक्षः कलाध्यक्षो वृषाङ्को वृषवर्धनः ।<br>निर्मदो निरहङ्कारो निर्मोहो निरुपद्रवः ॥ १३९ | विषमाक्ष, कलाध्यक्ष, वृषांक, वृषवर्धन, निर्मद-निरहंकार, निर्मोह, निरुपद्रव ॥ १३९ ॥ |
| दर्पहा दर्पितो दृप्तः सर्वर्तुपरिवर्तकः ।<br>सप्तजिह्वः सहस्रार्चिः स्निग्धः प्रकृतिदक्षिणः ॥ १४० | दर्पहा, दर्पित, दृप्त, सर्वऋतुपरिवर्तक, सप्तजिह्व, सहस्रार्चि, स्निग्ध, प्रकृतिदक्षिण ॥ १४० ॥ |
| भूतभव्यभवन्नाथः प्रभवो भ्रान्तिनाशनः ।<br>अर्थोऽनर्थो महाकोशः परकार्यैकपण्डितः ॥ १४१ | भूतभव्यभवन्नाथ, प्रभव, भ्रान्तिनाशन, अर्थ, अनर्थ, महाकोश, परकार्यैकपण्डित ॥ १४१ ॥ |
| निष्कण्टकः कृतानन्दो निर्व्याजो व्याजमर्दनः ।<br>सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यकीर्तिस्तम्भकृतागमः ॥ १४२ | निष्कण्टक, कृतानन्द, निर्व्याज, व्याजमर्दन, सत्त्ववान्, सात्त्विक, सत्यकीर्तिस्तम्भकृतागम ॥ १४२ ॥ |
| अकम्पितो गुणग्राही नैकात्मा नैककर्मकृत् ।<br>सुप्रीतः सुमुखः सूक्ष्मः सुकरो दक्षिणोऽनलः ॥ १४३ | अकम्पित, गुणग्राही, नैकात्मा-नैककर्मकृत्, सुप्रीत, सुमुख, सूक्ष्म, सुकर, दक्षिण, अनल ॥ १४३ ॥ |
| स्कन्धः स्कन्धधरो धुर्यः प्रकटः प्रीतिवर्धनः ।<br>अपराजितः सर्वसहो विदग्धः सर्ववाहनः ॥ १४४ | स्कन्ध, स्कन्धधर, धुर्य, प्रकट, प्रीतिवर्धन, अपराजित, सर्वसह, विदग्ध, सर्ववाहन ॥ १४४ ॥ |
| अधृतः स्वधृतः साध्यः पूर्तमूर्तिर्यशोधरः ।<br>वराहशृङ्गधृग्वायुर्बलवानेकनायकः ॥ १४५ | अधृत, स्वधृत, साध्य, पूर्तमूर्ति, यशोधर, वराहशृङ्गधृक्, वायु, बलवान्, एकनायक ॥ १४५ ॥ |
| श्रुतिप्रकाशः श्रुतिमानेकबन्धुरनेकधृक् ।<br>श्रीवल्लभशिवारम्भः शान्तभद्रः समञ्जसः ॥ १४६ | श्रुतिप्रकाश, श्रुतिमान्, एकबन्धु, अनेकधृक्, श्रीवल्लभशिवारम्भ, शान्तभद्र, समंजस ॥ १४६ ॥ |
| भूशयो भूतिकृद्भूतिर्भूषणो भूतवाहनः ।<br>अकायो भक्तकायस्थः कालज्ञानी कलावपुः ॥ १४७ | भूशय, भूतिकृद्भूति, भूषण, भूतवाहन, अकाय, भक्तकायस्थ, कालज्ञानी, कलावपु ॥ १४७ ॥ |
| सत्यव्रतमहात्यागी निष्ठाशान्तिपरायणः ।<br>परार्थवृत्तिर्वरदो विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ १४८ | सत्यव्रतमहात्यागी, निष्ठाशान्तिपरायण, परार्थवृत्ति, वरद, विविक्त, श्रुतिसागर ॥ १४८ ॥ |
अध्याय ९८ ] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५२५
| अनिर्वण्णो गुणग्राही कलङ्काङ्कः कलङ्कहा।<br>स्वभावरुद्रो मध्यस्थः शत्रुघ्नो मध्यनाशकः॥ १४९ | अनिर्वण्ण, गुणग्राही, कलंकांक, कलंकहा, स्वभावरुद्र, मध्यस्थ, शत्रुघ्न, मध्यनाशक॥ १४९॥ |
|---|---|
| शिखण्डी कवची शूली चण्डी मुण्डी च कुण्डली।<br>मेखली कवची खड्गी मायी संसारसारथिः॥ १५० | शिखण्डी, कवची, शूली, चण्डी, मुण्डी, कुण्डली, मेखली, कवची, खड्गी, मायीसंसारसारथि॥ १५०॥ |
| मृत्युः सर्वदृक् सिंहस्तेजोराशिर्महामणिः।<br>असंख्येयोऽप्रमेयात्मा वीर्यवान् कार्यकोविदः॥ १५१ | मृत्युसर्वदृक्, सिंह, तेजोराशि-महामणि, असंख्येय, अप्रमेयात्मा, वीर्यवान्, कार्यकोविद॥ १५१॥ |
| वेद्यो वेदार्थविद्गोप्ता सर्वाचारो मुनीश्वरः।<br>अनुत्तमो दुराधर्षो मधुरः प्रियदर्शनः॥ १५२ | वेद्य, वेदार्थविद्गोप्ता, सर्वाचार, मुनीश्वर, अनुत्तम, दुराधर्ष, मधुर, प्रियदर्शन॥ १५२॥ |
| सुरेशः शरणं सर्वः शब्दब्रह्मसताङ्गतिः।<br>कालभक्षः कलङ्कारिः कङ्कणीकृतवासुकिः॥ १५३ | सुरेश, शरण, सर्व, शब्दब्रह्मसतांगति, कालभक्ष, कलंकारि, कंकणीकृतवासुकि॥ १५३॥ |
| महेष्वासो महीभर्ता निष्कलङ्को विश्रृङ्खलः।<br>द्युमणिस्तरणिर्धन्यः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥ १५४ | महेष्वास, महीभर्ता, निष्कलंक, विश्रृंखल, द्युमणितरणि, धन्य, सिद्धिद, सिद्धिसाधन॥ १५४॥ |
| निवृत्तः संवृतः शिल्पो व्यूढोरस्को महाभुजः।<br>एकज्योतिर्निरातङ्को नरो नारायणप्रियः॥ १५५ | निवृत्त, संवृत, शिल्प, व्यूढोरस्क, महाभुज, एकज्योति, निरातंक, नरनारायणप्रिय॥ १५५॥ |
| निर्लेपो निष्प्रपञ्चात्मा निर्व्यग्रो व्यग्रनाशनः।<br>स्तव्यस्तवप्रियः स्तोता व्यासमूर्तिरनाकुलः॥ १५६ | निर्लेप, निष्प्रपंचात्मा, निर्व्यग्र, व्यग्रनाशन, स्तव्यस्तवप्रिय, स्तोताव्यासमूर्ति, अनाकुल॥ १५६॥ |
| निरवद्यपदोपायो विद्याराशिरविक्रमः।<br>प्रशान्तबुद्धिरक्षुद्रः क्षुद्रहा नित्यसुन्दरः॥ १५७ | निरवद्यपदोपाय, विद्याराशि, अविक्रम, प्रशान्तबुद्धिअक्षुद्र, क्षुद्रहा, नित्यसुन्दर॥ १५७॥ |
| धैर्याग्र्यधुर्यो धात्रीशः शाकल्यः शर्वरीपतिः।<br>परमार्थगुरुर्दृष्टिर्गुरुराश्रितवत्सलः॥ १५८<br>रसो रसज्ञः सर्वज्ञः सर्वसत्त्वावलम्बनः। | धैर्याग्र्यधुर्य, धात्रीश, शाकल्य, शर्वरीपति, परमार्थगुरुदृष्टि, गुरु, आश्रितवत्सल, रस, रसज्ञ, सर्वज्ञ, सर्वसत्त्वावलम्बन॥ १५८१/२॥ |
| सूत उवाच<br>एवं नाम्नां सहस्रेण तुष्टाव वृषभध्वजम्॥ १५९<br>स्नापयामास च विभुः पूजयामास पङ्कजैः।<br>परीक्षार्थं हरेः पूजाकमलेषु महेश्वरः॥ १६० | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] इस प्रकार विष्णुने एक हजार नामोंसे वृषभध्वजकी स्तुति की; पुनः उन्हें स्नान कराया और कमलोंसे उनका पूजन किया। उस समय विष्णुकी परीक्षा लेनेके लिये जगत्के स्वामी महेश्वरने पूजाके कमलोंमेंसे एक कमलको छिपा लिया॥ १५९-१६०१/२॥ |
| गोपायमास कमलं तदैकं भुवनेश्वरः।<br>हतपुष्पो हरिस्तत्र किमिदं त्वभ्यचिन्तयन्॥ १६१<br>ज्ञात्वा स्वनेत्रमुद्धृत्य सर्वसत्त्वावलम्बनम्।<br>पूजयामास भावेन नाम्ना तेन जगद्गुरुम्॥ १६२ | तब हतपुष्पवाले विष्णुने 'यह क्या'—ऐसा सोचते हुए बादमें वास्तविकता समझकर अपने नेत्रको निकाल करके सर्वसत्त्वावलम्बन (सभी प्राणियोंको अवलम्ब देनेवाले) जगद्गुरु [शिव]–की पूजा प्रेमपूर्वक उस [अन्तिम सर्वसत्त्वावलम्बन] नामसे की॥ १६१-१६२॥ |
| ततस्तत्र विभुर्दृष्ट्वा तथाभूतं हरो हरिम्।<br>तस्मादवतताराशु मण्डलात्पावकस्य च॥ १६३<br>कोटिभास्करसङ्काशं जटामुकुटमण्डितम्।<br>ज्वालामालावृतं दिव्यं तीक्ष्णदंष्ट्रं भयङ्करम्॥ १६४ | तत्पश्चात् समर्पित नेत्रवाले विष्णुको देखकर भगवान् शिव उस लिङ्गसे तथा अग्नि-मण्डलसे शीघ्र उतरे। तब करोड़ों सूर्योंके समान तेजसम्पन्न, |
५२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शूलटङ्कगदाचक्रकुन्तपाशधरं हरम्।<br>वरदाभयहस्तं च द्वीपिचर्मोत्तरीयकम्॥ १६५<br><br>इत्थंभूतं तदा दृष्ट्वा भवं भस्मविभूषितम्।<br>हृष्टो नमश्चकाराशु देवदेवं जनार्दनः॥ १६६ | जटारूपी मुकुटसे मण्डित, ज्वालासमूहसे घिरे हुए, दिव्य, तीक्ष्ण दाँतोंवाले, भयंकर, शूल-टंक-गदा-चक्र-भाला-पाश धारण किये हुए, वर तथा अभय मुद्रायुक्त हाथवाले, बाघके चर्मको उत्तरीयके रूपमें धारण किये हुए तथा भस्मसे विभूषित—इस प्रकारके रूपवाले हर भवको देखकर प्रसन्न हुए जनार्दनने उन देवदेव [शिव]-को शीघ्र प्रणाम किया॥ १६५-१६६॥ |
| दुद्रुवुस्तं परिक्रम्य सेन्द्रा देवास्त्रिलोचनम्।<br>चचाल ब्रह्मभुवनं चकम्पे च वसुन्धरा॥ १६७<br><br>ददाह तेजस्तच्छम्भोः प्रान्तं वै शतयोजनम्।<br>अधस्ताच्चोर्ध्वतश्चैव हाहेत्यकृत भूतले॥ १६८ | इन्द्रसहित देवतागण त्रिलोचनकी परिक्रमा करके भागने लगे, ब्रह्मलोक हिल उठा और पृथ्वी काँपने लगी। शिवका वह तेज नीचेसे तथा ऊपरसे सौ योजन स्थानको जलाने लगा; इससे पृथ्वीतलपर हाहाकार मच गया॥ १६७-१६८॥ |
| तदा प्राह महादेवः प्रहसन्निव शङ्करः।<br>सम्प्रेक्ष्य प्रणयाद्विष्णुं कृताञ्जलिपुटं स्थितम्॥ १६९ | तदनन्तर महादेव शंकरने हाथ जोड़कर [सामने] खड़े विष्णुकी ओर प्रेमपूर्वक देखकर हँसते हुए कहा— |
| ज्ञातं मयेदमधुना देवकार्यं जनार्दन।<br>सुदर्शनाख्यं चक्रं च ददामि तव शोभनम्॥ १७० | हे जनार्दन! अब मैं देवताओंके इस कार्यको जान गया और आपको सुदर्शन नामक उत्तम चक्र प्रदान करता हूँ॥ १६९-१७०॥ |
| यद्रूपं भवता दृष्टं सर्वलोकभयङ्करम्।<br>हिताय तव यत्नेन तव भावाय सुव्रत॥ १७१ | हे सुव्रत! आपने सभी लोकोंके लिये भयंकर मेरे जिस रूपको देखा है, वह पूर्णरूपसे आपके हित तथा भक्तिभावके लिये है। |
| शान्तं रणाजिरे विष्णो देवानां दुःखसाधनम्।<br>शान्तस्य चास्त्रं शान्तः स्याच्छान्तेनास्त्रेण किं फलम्॥ १७२ | हे विष्णो! युद्धभूमिमें सौम्यरूप धारण करना देवताओंके लिये दुःखदायक है। शान्त व्यक्तिका अस्त्र यदि शान्त हो, तो उस शान्त अस्त्रसे कोई फल नहीं होता है। |
| शान्तस्य समरे चास्त्रं शान्तिरेव तपस्विनाम्।<br>योद्धुः शान्त्या बलच्छेदः परस्य बलवृद्धिदः॥ १७३ | [केवल] तपस्वीके प्रति युद्धमें शान्त व्यक्तिका अस्त्र शान्त होता है। योद्धाकी शान्तिसे उसकी बलहीनता शत्रुके बलको बढ़ानेवाली होती है। |
| देवैरशान्तैर्यद्रूपं मदीयं भावयाव्ययम्।<br>किमायुधेन कार्यं वै योद्धुं देवारिसूदन॥ १७४ | हे देवशत्रुनाशक! अशान्त देवताओंके साथ आप मेरे अव्यय स्वरूपका ध्यान कीजिये; युद्ध करनेके लिये अस्त्रसे क्या प्रयोजन? |
| क्षमा युधि न कार्या वै योद्धुं देवारिसूदन।<br>अनागते व्यतीते च दौर्बल्ये स्वजनोत्करे॥ १७५<br><br>अकालिके त्वधर्मे च अनर्थे वारिसूदन।<br>एवमुक्त्वा ददौ चक्रं सूर्यायुतसमप्रभम्॥ १७६ | हे देवारिसूदन! युद्धमें क्षमा नहीं करनी चाहिये। युद्धके लिये अनुपस्थित शत्रु तथा बलशाली स्वजनोंके प्रति और अधर्म-अनर्थकी स्थितिमें अनुपयुक्त समयमें भी क्षमाका आश्रय नहीं लेना चाहिये॥ १७१-१७५ १/२॥ |
| नेत्रं च नेता जगतां प्रभुर्वै पद्मसन्निभम्।<br>तदाप्रभृति तं प्राहुः पद्माक्षमिति सुव्रतम्॥ १७७ | ऐसा कहकर लोकनायक प्रभु [शिव]-ने उन्हें दस हजार सूर्योंके समान तेजस्वी [सुदर्शन] चक्र तथा कमलसदृश एक नेत्र भी प्रदान किया; उसी समयसे |
अध्याय ९८ ] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५२७
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उन सुव्रत [विष्णु]-को पद्माक्ष (कमलनयन) कहा जाता है॥ १७६-१७७॥ | |
| दत्तवैवं नयनं चक्रं विष्णवे नीललोहितः।<br>पस्पर्श च कराभ्यां वै सुशुभाभ्यामुवाच ह॥ १७८<br><br>वरदोऽहं वरश्रेष्ठ वरान् वरय चेप्सितान्।<br>भक्त्या वशीकृतो नूनं त्वयाहं पुरुषोत्तम॥ १७९ | विष्णुको चक्र तथा नेत्र प्रदान करके नीललोहित [शिव]-ने अपने परम पवित्र हाथोंसे उनका स्पर्श किया और कहा—'हे वरश्रेष्ठ! मैं वरदाता हूँ, आप अभीष्ट वरोंको माँगिये। हे पुरुषोत्तम! आपने निश्चित रूपसे अपनी भक्तिसे मुझे वशमें कर लिया है'॥ १७८-१७९॥ |
| इत्युक्तो देवदेवेन देवदेवं प्रणम्य तम्।<br>त्वयि भक्तिर्महादेव प्रसीद वरमुत्तमम्॥ १८०<br><br>नान्यमिच्छामि भक्तानामार्तयो नास्ति यत्प्रभो।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दयावान् सुतरां भवः॥ १८१ | देवाधिदेवके इस प्रकार कहनेपर विष्णुने उन देवदेवेश्वरको प्रणाम करके कहा—'हे महादेव! आपमें मेरी [पूर्ण] भक्ति हो, आप मुझपर प्रसन्न होइये। हे प्रभो! मैं अन्य उत्तम वर नहीं चाहता; क्योंकि भक्तोंकी अन्य कामनाएँ नहीं होती हैं'॥ १८० १/२॥ |
| पस्पर्श च ददौ तस्मै श्रद्धां शीतांशुभूषणः।<br>प्राह चैवं महादेवः परमात्मानमच्युतम्॥ १८२<br><br>मयि भक्तश्च वन्द्यश्च पूज्यश्चैव सुरासुरैः।<br>भविष्यसि न सन्देहो मत्प्रसादात्सुरोत्तम॥ १८३<br><br>यदा सती दक्षपुत्री विनिन्द्यैव सुलोचना।<br>मातरं पितरं दक्षं भविष्यति सुरेश्वरी॥ १८४<br><br>दिव्या हैमवती विष्णो तदा त्वमपि सुव्रत।<br>भगिनीं तव कल्याणीं देवीं हैमवतीमुमाम्॥ १८५<br><br>नियोगाद् ब्रह्मणः साध्वीं प्रदास्यसि ममैव ताम्।<br>मत्सम्बन्धी च लोकानां मध्ये पूज्यो भविष्यसि॥ १८६<br><br>मां दिव्येन च भावेन तदाप्रभृति शङ्करम्।<br>द्रक्ष्यसे च प्रसन्नेन मित्रभूतमिवात्मना॥ १८७ | उनका वचन सुनकर परम दयालु शिवने उनका स्पर्श किया और उन्हें [अपनी] भक्ति प्रदान की। तत्पश्चात् चन्द्रमाको भूषणके रूपमें धारण करनेवाले महादेवने परमात्मा अच्युत (विष्णु)-से कहा—'हे सुरोत्तम! मेरी कृपासे आप मुझमें भक्ति रखनेवाले और देवताओं तथा असुरोंके वन्दनीय तथा पूजनीय होंगे; इसमें सन्देह नहीं है। हे विष्णो! हे सुव्रत! जब सुन्दर नेत्रोंवाली दक्षपुत्री सती अपनी माता तथा पिता दक्षकी निन्दा करके सुरेश्वरीके रूपमें हिमवान्की दिव्य कन्या होकर उत्पन्न होंगी; उस समय आप ब्रह्माके आदेशसे अपनी भगिनीरूपा उन हिमवान्की पुत्री कल्याणी साध्वी देवी उमाको मुझे प्रदान करेंगे। तब लोकोंके बीच मेरे सम्बन्धीके रूपमें आप पूज्य होंगे। उस समयसे आप दिव्य भावसे तथा प्रसन्न मनसे मुझ शंकरको मित्रकी भाँति देखेंगे'—ऐसा कहकर नीललोहित भगवान् रुद्र अन्तर्धान हो गये॥ १८१-१८७ १/२॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे रुद्रो भगवान्नीललोहितः।<br>जनार्दनोऽपि भगवान् देवानामपि सन्निधौ॥ १८८<br><br>अयाचत महादेवं ब्रह्माणं मुनिभिः समम्।<br>मया प्रोक्तं स्तवं दिव्यं पद्मयोने सुशोभनम्॥ १८९<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्।<br>प्रतिनाम्नि हिरण्यस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात्॥ १९० | भगवान् जनार्दनने भी देवताओंकी उपस्थितिमें मुनियोंके साथ महान् देवता ब्रह्मासे प्रार्थना की—हे पद्मयोने! जो मेरे द्वारा कहे गये दिव्य तथा परम सुन्दर स्तव (सहस्रनाम स्तोत्र)-को पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है; वह प्रत्येक नामके उच्चारणपर सुवर्णके दानका फल प्राप्त करता है और उसे हजार अश्वमेध यज्ञ करनेसे होनेवाला फल मिलता है। जो घृत |
९९- भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव तथा शिवाका दक्षपुत्री सतीके रूपमें पुनः मेनाकी कन्या पार्वतीके रूपमें प्राकट्य
५२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग ---|---
| अश्वमेधसहस्रेण फलं भवति तस्य वै।<br>घृताद्यैः स्नापयेद् रुद्रं स्थाल्या वै कलशैः शुभैः ॥ १९१<br>नाम्नां सहस्रेणानेन श्रद्धया शिवमिश्वरम्।<br>सोऽपि यज्ञसहस्रस्य फलं लब्ध्वा सुरेश्वरैः ॥ १९२<br>पूज्यो भवति रुद्रस्य प्रीतिर्भवति तस्य वै।<br>तथास्त्विति तथा प्राह पद्मयोनिर्जनार्दनम् ॥ १९३<br>जग्मतुः प्रणिपत्यैनं देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>तस्मान्नाम्नां सहस्रेण पूजयेदनघो द्विजाः ॥ १९४<br>जपेन्नाम्नां सहस्रं च स याति परमां गतिम् ॥ १९५ | आदिसे परिपूर्ण स्थाली अथवा शुभ कलशोंसे इस सहस्रनामके द्वारा भगवान् रुद्र शिवको श्रद्धापूर्वक स्नान कराता है, वह भी हजार यज्ञोंका फल प्राप्त करके सुरेश्वरोंके द्वारा पूजित होता है और उसके प्रति रुद्रकी प्रीति होती है॥ १८८-१९२१/२॥<br>तब ब्रह्माने विष्णुसे कहा—'ऐसा ही हो।' इसके बाद इन जगद्गुरु देवदेव [शिव]-को प्रणाम करके वे दोनों (ब्रह्मा-विष्णु) चले गये। अतः हे द्विजो! जो निष्पाप व्यक्ति [इस] हजार नामोंसे शिवकी पूजा करता है और हजार नामोंका जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥ १९३-१९५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सहस्रनामभिः पूजनाद्विष्णुचक्रलाभो नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सहस्रनामोंद्वारा पूजनसे विष्णुको चक्रलाभ' नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९८ ॥
निन्यानबेवाँ अध्याय
भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव तथा शिवाका दक्षपुत्री सतीके रूपमें पुनः मेनाकी कन्या पार्वतीके रूपमें प्राकट्य
| ऋषय ऊचुः<br>सम्भवः सूचितो देव्यास्त्वया सूत महामते।<br>सविस्तरं वदस्वाद्य सतीत्वे च यथातथम् ॥ १<br>मेनाजत्वं महादेव्या दक्षयज्ञविमर्दनम्।<br>विष्णुना च कथं दत्ता देवदेवाय शम्भवे ॥ २<br>कल्याणं वा कथं तस्य वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्।<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः ॥ ३<br>सम्भवं च महादेव्याः प्राह तेषां महात्मनाम्। | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! हे महामते! आपने देवीकी उत्पत्तिके विषयमें बताया; अब उनके सतीत्वके विषयमें ठीक-ठीक विस्तारपूर्वक बताइये और महादेविका मेनासे उत्पन्न होने तथा दक्षके यज्ञविध्वंसका भी वर्णन कीजिये; विष्णुने देवदेव शम्भुको उन्हें कैसे प्रदान किया और उन विष्णुका कल्याण किस प्रकार हुआ—यह सब इस समय बतानेकी कृपा कीजिये॥ १-२१/२॥<br>उनका यह वचन सुनकर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजी उन महात्माओंसे महादेविके जन्मके विषयमें बताने लगे॥ ३१/२॥ |
| सूत उवाच<br>ब्रह्मणा कथितं पूर्वं दण्डिने तत्सुविस्तरम् ॥ ४<br>युष्माभिर्वै कुमाराय तेन व्यासाय धीमते।<br>तस्मादहमुपश्रुत्य प्रवदामि सुविस्तरम् ॥ ५<br>वचनाद्भो महाभागाः प्रणम्योमां तथा भवम्।<br>सा भगाख्या जगद्धात्री लिङ्गमूर्तेस्त्रिवेदिका ॥ ६ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] आपलोगोंने जो पूछा है, उस विषयमें सर्वप्रथम ब्रह्माने दण्डी सनत्कुमारको विस्तारसे बताया था, पुनः उन सनत्कुमारने बुद्धिमान् व्यासजीको बताया और हे महाभागो! उन [व्यासजी]-से सुन करके मैं आपलोगोंके कहनेपर उमा तथा शिवको प्रणाम करके विस्तारपूर्वक आप लोगोंको बता रहा हूँ॥ ४-५१/२॥<br>वे जगन्माता भग नामवाली और लिङ्गरूप शिवकी |
| अध्याय ९९ ] | भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव | ५२९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लिङ्गस्तु भगवान् द्वाभ्यां जगत्सृष्टिर्द्विजोत्तमाः।<br>लिङ्गमूर्तिः शिवो ज्योतिस्तमसश्चोपरि स्थितः॥ ७<br>लिङ्गवेदिसमायोगादर्धनारीश्वरोऽभवत् ।<br>ब्रह्माणं विदधे देवमग्रे पुत्रं चतुर्मुखम्॥ ८ | त्रिगुणवेदिका प्रकृतिरूपा हैं। लिङ्गरूप शिव सदा भगयुक्त रहते हैं। हे उत्तम द्विजो! इन्हीं दोनों [लिङ्ग तथा भग]-से ही जगत्की सृष्टि होती है। लिङ्गस्वरूप शिव प्रकाशरूप हैं और सदा मायारूपी तम (अन्धकार)-के ऊपर विराजमान हैं। लिङ्ग तथा वेदीके समायोगसे शिव अर्धनारीश्वर हो गये। उन्होंने पहले चतुर्मुख देव ब्रह्माको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ६–८॥ |
| प्राहिणोति स्म तस्यैव ज्ञानं ज्ञानमयो हरः।<br>विश्वाधिकोऽसौ भगवानर्धनारीश्वरो विभुः॥ ९<br>हिरण्यगर्भं तं देवो जायमानमपश्यत।<br>सोऽपि रुद्रं महादेवं ब्रह्मापश्यत शङ्करम्॥ १०<br>तं दृष्ट्वा संस्थितं देवमर्धनारीश्वरं प्रभुम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्वरदं वारिजोद्भवः॥ ११<br>विभजस्वेति विश्वेशं विश्वात्मानमजो विभुः।<br>ससर्ज देवीं वामाङ्गात्पत्नीं चैवात्मनः समाम्॥ १२ | ज्ञानमय तथा विश्वमें सबसे बढ़कर विभु अर्धनारीश्वर भगवान् हरने उन [ब्रह्मा]-को ज्ञान प्रदान किया। शिवजीने उत्पन्न हुए ब्रह्माको देखा और उन ब्रह्माने भी रुद्र शंकर महादेवको देखा। वहाँ स्थित अर्धनारीश्वर प्रभु शिवको देखकर ब्रह्माने अभीष्ट वचनोंसे उन वरदाता [शिव]-की स्तुति की। इसके बाद प्रभु अजने विश्वेश्वर विश्वात्मा [शिव]-से प्रार्थना की—'अपनेको विभक्त कीजिये।' तब उन्होंने अपने बायें अंगसे पत्नीके रूपमें अपने ही समान देवीका सृजन किया॥ ९–१२॥ |
| श्रद्धा ह्यस्य शुभा पत्नी ततः पुंसः पुरातनी।<br>सैवाज्ञया विभोर्देवी दक्षपुत्री बभूव ह॥ १३<br>सतीसंज्ञा तदा सा वै रुद्रमेवाश्रिता पतिम्।<br>दक्षं विनिन्द्य कालेन देवी मैना ह्यभूत्पुनः॥ १४ | इन [आत्मरूप] पुरुषकी पुरातन शुभा पत्नी श्रद्धा हैं; शिवकी आज्ञासे वे देवी दक्षपुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुईं। उस समय उनका नाम सती पड़ा और उन्होंने रुद्रको पतिके रूपमें स्वीकार किया। कुछ समयके बाद दक्षकी निन्दा करके वे देवी पुनः मेनाकी पुत्री हुईं॥ १३-१४॥ |
| नारदस्यैव दक्षोऽपि शापाद्देवं विनिन्द्य च।<br>अवज्ञादुर्मदो दक्षो देवदेवमुमापतिम्॥ १५<br>अनादृत्य कृतिं ज्ञात्वा सती दक्षेण तत्क्षणात्।<br>भस्मीकृत्यात्मनो देहं योगमार्गेण सा पुनः॥ १६<br>बभूव पार्वती देवी तपसा च गिरेः प्रभोः।<br>ज्ञात्वैतद्भगवान् भर्गो ददाह रुषितः प्रभुः॥ १७<br>दक्षस्य विपुलं यज्ञं च्यावनेर्वचनादपि।<br>च्यवनस्य सुतो धीमान् दधीच इति विश्रुतः॥ १८<br>विजित्य विष्णुं समरे प्रसादात् त्र्यम्बकस्य च।<br>विष्णुना लोकपालांश्च शशाप च मुनीश्वरः॥ १९<br>रुद्रस्य क्रोधजेनैव वह्निना हविषा सुराः।<br>विनाशो वै क्षणादेव मायया शङ्करस्य वै॥ २० | नारदके शापके कारण अवज्ञासे दुर्मद दक्षने भी देवदेव उमापतिकी निन्दा करके यज्ञ किया। तब शिवके प्रति अनादरपूर्ण दक्षकृत्यको जानकर सतीने उसी क्षण अपनी देहको योगमार्गसे भस्म करके पुनः पर्वतराज हिमाचलकी तपस्यासे [उनकी पुत्री होकर] देवी पार्वतीके रूपमें जन्म लिया। यह जानकर च्यवनके पुत्रके कहनेसे भगवान् प्रभु भर्गने कुपित होकर दक्षके विस्तृत यज्ञको जला दिया। च्यवनके बुद्धिमान् पुत्र दधीच नामसे प्रसिद्ध थे। शिवकी कृपासे युद्धमें विष्णुको जीतकर उन मुनीश्वरने विष्णुसहित लोकपालोंको यह शाप दे दिया—'हे देवताओ! शंकरकी मायाके कारण रुद्रके क्रोधसे उत्पन्न हविष्याग्निके द्वारा क्षणभरमें [आपलोगोंका] विनाश हो जायगा'॥ १५–२०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवीसम्भवो नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवीकी उत्पत्ति' नामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९९॥
१००- वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह
| ५३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
सौवाँ अध्याय
वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह
| ऋषय ऊचुः<br>विजित्य विष्णुना सार्धं भगवान् परमेश्वरः।<br>सर्वान् दधीचवचनात्कथं भेजे महेश्वरः॥ १ | ऋषिगण बोले— [ हे सूतजी!] परमेश्वर भगवान् महेश्वरने दधीचके कहनेसे विष्णुसहित सबको जीतकर पुनः यज्ञका सेवन कैसे किया ? ॥ १ ॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>दक्षयज्ञे सुविपुले देवान् विष्णुपुरोगमान्।<br>ददाह भगवान् रुद्रः सर्वान् मुनिगणानपि॥ २<br><br>भद्रो नाम गणस्तेन प्रेषितः परमेष्ठिना।<br>विप्रयोगेन देव्या वै दुःसहेनैव सुव्रताः॥ ३<br><br>सोऽसृजद्वीरभद्रश्च गणेशान् रोमजाञ्छुभान्।<br>गणेश्वरैः समारुह्य रथं भद्रः प्रतापवान्॥ ४<br><br>गन्तुं चक्रे मतिं यस्य सारथिर्भगवानजः।<br>गणेश्वराश्च ते सर्वे विविधायुधपाणयः॥ ५<br><br>विमानैर्विश्वतो भद्रैस्तमन्वयुरथो सुराः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये हेमशृङ्गे सुशोभने॥ ६<br><br>यज्ञवाटस्तथा तस्य गङ्गाद्वारसमीपतः।<br>तद्देशे चैव विख्यातं शुभं कनखलं द्विजाः॥ ७ | सूतजी बोले— [ हे ऋषियो!] भगवान् रुद्रने दक्षके अति महान् यज्ञमें विष्णु आदि प्रमुख देवताओं तथा सभी मुनियोंको जला दिया। हे सुव्रतो! देवीके असहनीय वियोगके कारण उन शिवजीने [अपने] भद्र नामक गणको भेजा। उस वीरभद्रने अपने रोमोंसे उत्तम गणेश्वरोंको उत्पन्न किया। तब गणेश्वरोंके साथ रथपर सवार होकर प्रतापशाली वीरभद्रने प्रस्थान करनेका निश्चय किया; जिनके सारथि भगवान् ब्रह्मा थे। हाथोंमें विविध आयुध लिये हुए वे सभी गणेश्वर तथा देवता शुभ विमानोंपर आरूढ़ होकर सभी ओरसे उन वीरभद्रके पीछे-पीछे चले। हे द्विजो! हिमवान्के रमणीय तथा परम सुन्दर सुवर्णमय शिखरपर गंगाद्वारके समीप कनखल नामक शुभ तथा विख्यात स्थान है; उसी स्थानमें उन दक्षकी यज्ञशाला थी ॥ २–७ ॥<br><br>जब शिवजीने भगवान् वीरभद्रको [यज्ञको] दग्ध<br><br>(चित्र)<br><br>करनेके लिये भेजा, उस समय लोकोंको भयभीत |
| दग्धुं वै प्रेषितश्चासौ भगवान् परमेष्ठिना।<br>तदोत्पातो बभूवाथ लोकानां भयशंसनः॥ ८ |
अध्याय १००] वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह ५३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पर्वताश्च व्यशीर्यन्त प्रचकम्पे वसुन्धरा।<br>मरुतश्चाप्यघूर्णन्त चुक्षुभे मकरालयः॥ ९<br>अग्नयो नैव दीप्यन्ति न च दीप्यति भास्करः।<br>ग्रहाश्च न प्रकाशन्ते न देवा न च दानवाः॥ १० | करनेवाला उत्पात होने लगा। पर्वत फटने लगे, पृथ्वी काँप उठी, वायु घूर्णित हो गये, समुद्र क्षुब्ध हो गया, अग्निने जलना बन्द कर दिया, सूर्य दीप्तिरहित हो गया, ग्रह प्रकाशहीन हो गये और देवता तथा दानव कोई भी प्रसन्न नहीं थे॥ ८—१०॥ |
| ततः क्षणात् प्रविश्यैव यज्ञवाटं महात्मनः।<br>रोमजैः सहितो भद्रः कालाग्निरिव चापरः॥ ११<br>उवाच भद्रो भगवान् दक्षं चामिततेजसम्।<br>सम्पर्कादेव दक्षाद्य मुनीन् देवान् पिनाकिना॥ १२<br>दग्धुं सम्प्रेषितश्चाहं भवन्तं समुनीश्वरैः।<br>इत्युक्त्वा यज्ञशालां तां ददाह गणपुङ्गवः॥ १३ | उसी क्षण दूसरी कालाग्निके समान भगवान् वीरभद्रने अपने रोमोंसे उत्पन्न किये गये गणेश्वरोंके साथ महात्मा [दक्ष]-के यज्ञस्थलमें प्रवेश करके अमित तेजवाले दक्षसे कहा—‘हे दक्ष! आज पिनाकधारी शिवने मुनियों, देवताओं तथा मुनीश्वरोंसहित आपको केवल स्पर्शमात्रसे दग्ध करनेके लिये मुझको भेजा है।’—ऐसा कहकर उस श्रेष्ठ गणने उस यज्ञशालाको जला डाला॥ ११-१३॥ |
| गणेश्वराश्च सङ्क्रुद्धा यूपानुत्पाट्य चिक्षिपुः।<br>प्रस्तोत्रा सह होत्रा च दग्धं चैव गणेश्वरैः॥ १४<br>गृहीत्वा गणपाः सर्वान् गङ्गास्रोतसि चिक्षिपुः।<br>वीरभद्रो महातेजाः शक्रस्योद्यच्छतः करम्॥ १५<br>व्यष्टम्भयददीनात्मा तथान्येषां दिवौकसाम्।<br>भगस्य नेत्रे चोत्पाट्य करजाग्रेण लीलया॥ १६<br>निहत्य मुष्टिना दन्तान् पूष्णाश्चैवं न्यपातयत्।<br>तथा चन्द्रमसं देवं पादाङ्गुष्ठेन लीलया॥ १७ | अत्यन्त क्रुद्ध गणेश्वरोंने [यज्ञके] यूपों (स्तम्भों)-को उखाड़कर फेंक दिया। गणेश्वरोंने प्रस्तोता तथा होतासहित सबको जला दिया। उन गणेश्वरोंने सभीको पकड़कर गंगाकी धारामें फेंक दिया। महातेजस्वी तथा अदीन आत्मावाले वीरभद्रने उठे हुए इन्द्रके वज्र-युक्त हाथको स्तम्भित कर दिया और अन्य देवताओंके हाथोंको भी स्तम्भित कर दिया। उन्होंने लीलापूर्वक अपने नाखूनोंके अग्रभागसे भगके नेत्रोंको निकालकर पुनः मुष्टिकासे प्रहार करके पूषाके दाँतोंको तोड़कर गिरा दिया॥ १४-१६ १/२॥ |
| घर्षयामास भगवान् वीरभद्रः प्रतापवान्।<br>चिच्छेद च शिरस्तस्य शक्रस्य भगवान् प्रभोः॥ १८<br>वह्नेर्हस्तद्वयं छित्त्वा जिह्वामुत्पाट्य लीलया।<br>जघान मूर्ध्नि पादेन वीरभद्रो महाबलः॥ १९ | इसके बाद प्रतापी भगवान् वीरभद्रने [अपने] पैरके अँगूठेसे बिना प्रयासके चन्द्रदेवको घर्षित कर दिया और उन प्रभु इन्द्रके सिरको काट दिया। महाबली वीरभद्रने लीलापूर्वक अग्निदेवके दोनों हाथोंको काटकर तथा जीभ उखाड़कर पैरसे उनके सिरपर प्रहार किया॥ १७-१९॥ |
| यमस्य दण्डं भगवान् प्रचिच्छेद स्वयं प्रभुः।<br>जघान देवमीशानं त्रिशूलेन महाबलम्॥ २०<br>त्रयस्त्रिंशत्सुरानेवं विनिहत्याप्रयत्नतः।<br>त्रयश्च त्रिशतं तेषां त्रिसाहस्रं च लीलया॥ २१<br>त्रयं चैव सुरेन्द्राणां जघान च मुनीश्वरान्।<br>अन्यांश्च देवान् देवोऽसौ सर्वान् युद्धाय संस्थितान्॥ २२<br>जघान भगवान् रुद्रः खड्गमुष्ट्यादिसायकैः।<br>अथ विष्णुर्महातेजाश्चक्रमुद्यम्य मूर्च्छितः॥ २३ | तत्पश्चात् प्रभु भगवान् वीरभद्रने स्वयं यमके दण्डको काट दिया और महाबली ईशानदेवको त्रिशूलसे मारा। उन्होंने [वसु, रुद्रादित्यरूप] तैंतीस देवताओं तथा इन्हीं तीनोंके तीन सौ तथा तीन हजार भेदोंको लीलापूर्वक अनायास ही मार करके [इन्द्र, अग्नि, सोमरूप] तीन प्रधान देवों, मुनीश्वरों तथा युद्धके लिये सन्नद्ध अन्य सभी देवताओंको भी मार डाला॥ २०-२२ १/२॥ |