स्वदेशी उत्पाद बनाने की विधि (भाग 2)
Swadeshi Utpad Banane Ki Vidhi (Bhag 2)
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Utpad Series Part 2 · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
एक शक्तिशाली भारत की ओर..
स्वदेशी उत्पाद बनाने कि विधि
भाग - 2
बिना केमिकल उत्पाद
स्वावलम्बी बने और स्वदेशी की ओर चले....
श्री राजीव दीक्षित जी
इस पुस्तिका के लिखने के पीछे उद्देश्य यह रहा है कि लोग अपनी जरूरत की अधिकांश वस्तुएं अपने घर में ही बना सकें या चाहें तो थोड़ी सी पूँजी लगाकर अपना उद्योग-धन्धा शुरू कर सकें और स्वावलंबी बनें। मेरी उत्कृष्ट इच्छा है कि भारत की धरती से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का साम्राज्य नेस्तनाबूद हो और यह देश स्वावलंबी और उद्योगी राष्ट्र बनकर एक बार फिर से सारे संसार का सरताज बने। परंतु यह तभी हो सकता है जबकि हम लोग विदेशी सामानों के मोहपाश से छूटकर अपने जीवन में स्वदेशी अपनाने का संकल्प धारण करें।
आज इस देश में बेरोजगारों की एक विशालकाय फौज खड़ी हो गई है। यह हरकत में आएगी तो देश का ही विनाश करेगी। सरकारों के पास इस समस्या का कोई समाधान नहीं है। वे समाधान के प्रति ईमानदार भी नहीं हैं, क्योंकि बेरोजगारी जैसे मुद्दे के सहारे उनकी राजनीति सधती है। ऐसे में देश के बेरोजगार युवकों से मेरी अपील यही है कि वे नौकरियों के पीछ बहुत समय न गँवाते हुए स्वदेशी उद्योग-धन्धे खड़े करने के काम में लगे तो उनका और राष्ट्र, दोनों का भला होगा। इस देश में स्वावलम्बन की अपार संभावनाएं हैं। प्राकृतिक संसाधनों की भरभार है व पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं, फसलों की विविधताएं है, खनिज संसाधन है, काम करने वाले अनगिनत हाथ है, और असली बात यह है कि हमारे देश में प्रतिभा है। जरूरत सिर्फ दृढ़ संकल्प जगाने की है, हम बहुत कुछ कर सकते हैं। सचमुच आज देश में स्वदेशी व्यवस्था कायम करने की महती आवश्यकता है, अन्यथा, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खतरनाक किस्म की आर्थिक गुलामी से हम बच नहीं पाएंगे।
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❖ सुखडी
घटक -
| 1. गेहूँ का आटा | - | 1 किलो |
|---|---|---|
| 2. गुड़ | - | 500 ग्राम |
| 3. घी | - | 500 ग्राम |
| 4. गोद | - | 500 ग्राम |
| 5. सोप | - | 20 ग्राम |
विधि -
- • गेहूँ का आटा और घी कढ़ाई में डालें
- • बढामी रंग होने पर गुड़ डालें, मिस्र होने दे।
- • गोद डाल के हिलायें, उतार के थाली में ढाल दो, ऊपर सोप डाल दो।
❖ मोहनथाण
घटक -
| 1. चने का आटा(बेसन) | - | 1 किलो |
|---|---|---|
| 2. घी देशी गाय का | - | 700 ग्राम |
| 3. चारोली | - | 50 ग्राम |
| 4. शक्कर | - | 1 किलो |
| 5. दूध | - | 200 ग्राम |
विधि -
बेसन को धीमे आँच पर डालकर हिलाये, बादामी रंग होने पर उतार लीजिए, शक्कर में गीला होने तक पानी डालिए, ताकी चासनी बनजाये, आटा डालके उतार लीजिए, थाली में ढाल दो, ऊपर चारोली छीटक दो।
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❖ मुखवास गोली
घटक -
| 1. अमचूर पाउडर | - | 100 ग्राम |
|---|---|---|
| 2. शहद | - | 50 ग्राम |
| 3. काली मिर्च पाउडर | - | 20 ग्राम |
| 4. नमक पाउडर | - | 20 ग्राम |
| 5. आंवला पाउडर | - | 50 ग्राम |
विधि -
सबको मिला कर आटा गूँठ लें, गौपूजन गोली मशीन से गोली बनाले बोटल या पाउच में भर लें।
❖ गौमूत्र धनवटी
घटक -
| 1. अर्क बनाने के बाद या धन | - | 100 ग्राम |
|---|---|---|
| 2. त्रिफला चूर्ण | - | आवश्यक |
विधि -
- • दोनो मिला के गोली बनाने लायक आटा तैयार करें,
- • गौपूजन धनवटी मशीन से निकालकर गोली तैयार कर लो, धूप में सुखाले - 1 दिन, बोटल में भर लें।
❖ VIT B12 (पानी के लिए)
घटक -
| 1. गोबर भस्म | - | 1 किलो |
|---|
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| 2. सुंगधी वाणी(मूल) | - | 20 ग्राम |
|---|---|---|
| 3. नागर मोथा पाउडर | - | 20 ग्राम |
विधि - 10 ग्राम का कपड़े का पाउच बना लें, आरओ पानी में हर दिन पाउच डालने से मानव शरीर को जरूरी B12 और 18 तत्वों की कमी की पूर्ति हो जाती है और पानी स्वदिष्ट बनता है।
❖ माउथ फ़्रेशनर
घटक -
| 1. गौमूत्र अर्क | - | 100 ग्राम |
|---|---|---|
| 2. पानी | - | 1 लीटर |
| 3. अमृतधारा | - | 10 ग्राम |
विधि -
तीनों को अच्छे से मिला कर, ये मुहँ की गंध दांत का दर्द, दूर करने के लिए मुहँ में भरके रखे और पेट में जाने दे, कफ और पेट दर्द में लाभ।
❖ गौ - तक्रारिष्ट
घटक -
| 1. गाय की लस्सी | - | 1 लीटर |
|---|---|---|
| 2. हल्दी चूर्ण | - | 50 ग्राम |
| 3. राई का चूर्ण | - | 50 ग्राम |
| 4. सेंधा नमक | - | 50 ग्राम |
| 5. कांच का बर्तन | - | 1 |
| 6. पानी | - | 1 लीटर |
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विधि -
- • गाय की लस्सी में समान मात्रा में पानी मिलाकर बाकी सभी चीजों को इसके अंदर मिला ले और किसी कांच के बर्तन में चार दिन के लिए रख दे, चार दिन बाद किसी सूती कपड़े से छानकर बोतलों में डालकर रख दे।
- • बवासीर के लिए हर सूरत में फायदेमंद है। इसके निरंतर सेवन से बवासीर (piles) में अत्यधिक फायदा होता है। हमने बहुत से बवासीर के मरीजों को इसका सेवन करने को कहा था और उनको इससे बेहद फायदा पहुंचा है।
❖ वैदिक दंतमंजन
घटक: -
| 1. गोमय भस्म | - | 100 ग्राम |
|---|---|---|
| 2. फिटकरी | - | 50 ग्राम |
| 3. गेरू | - | 50 ग्राम |
| 4. लौंग | - | 20 ग्राम |
| 5. काली मिर्च | - | 10 ग्राम |
| 6. त्रिफला | - | 50 ग्राम |
| 7. नीम+जामुन पत्ते की भस्म | - | 20 ग्राम |
| 8. सेंधा नमक | - | 50 ग्राम |
| 9. हल्दी | - | 30 ग्राम |
विधि -
- • कपड़े से छान कर डब्बी में भर लें।
- • वैदिक टूथपेस्ट बनाने के लिए उपरोक्त विधि के पाउडर में सरसों का तेल मिला लें।
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❖ हर्बल (लाल) दंतमंजन
घटक: -
| 1. | गेरु | - | 500 ग्राम |
|---|---|---|---|
| 2. | फिटकरी | - | 15 ग्राम |
| 3. | दालचीनी | - | 15 ग्राम |
| 4. | पिपरमेंट | - | 10 ग्राम |
| 5. | सेंधा नमक | - | 15 ग्राम |
| 6. | काली मिर्च | - | 10 ग्राम |
| 7. | लौंग | - | 10 ग्राम |
| 8. | इलायची | - | 5 नग |
| 9. | कपूर | - | 2 ग्राम |
| 10. | गौमूत्र | - | 100 ग्राम |
| 11. | गोबर भस्म | - | 100 ग्राम |
विधि -
- • फिटकरी को गर्म तवे पर भूने
- • सभी चीजों का अलग पाउडर बना दें, मिल्स कर, बोतल में पैक कर दें।
❖ दिव्य गैसहर चूर्ण के घटक
घटक: -
| 1. | अजवायन | - | 30 ग्राम |
|---|---|---|---|
| 2. | मिर्च काली | - | 10 ग्राम |
| 3. | काला नमक | - | 10 ग्राम |
| 4. | हरड छोटी | - | 20 ग्राम |
| 5. | जीरा | - | 15 ग्राम |
| 6. | मीठा सोडा | - | 5 ग्राम |
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| 7. नीम्बुसत | - | 3 ग्राम |
|---|---|---|
| 8. हींग शुद्ध | - | 2 ग्राम |
विधि – सूखा कर, कूट कर बारीक पाउडर बना कर, शीशी में भर लें।
गैसहर चूर्ण लाभ एवं उपयोग
- • दिव्य गैसहर चूर्ण भोजन की पचाने में सहायक हैं सहायता करता है इसे बनाया ही इसी के लिए गया है, इसका मतलब यह है की यह चूर्ण एसिडिटी और हृदय में जलन जैसी बिमारियों की रोकथाम करने में भी बहुत उपयोगी हैं।
- • दिव्य गैसहर चूर्ण ऐसी जड़ी-बूटियों से बनाया गया है जो कब्ज और दस्त दोनों की रोकथाम के लिए सबसे अच्छी आयुर्वेदिक औषधि हैं।
- • यह पाचन शक्ति को बढ़ाने के लिए उपयोगी हैं और भोजन को पचाने में मदद करता हैं जिससे की गैस जैसी बीमारी से मुक्ति मिलती हैं।
- • दिव्य गैसहर चूर्ण पेट में गैस नहीं बनने देता जिससे पेट में भारीपन नहीं रहता और पेट साफ रहता है।
- • इन बिमारियों के अलावा दिव्य गैसहर चूर्ण अम्लता, पेट दर्द और पेट से सम्बंधित बिकारों को भी दूर करता है। इसके नियमित रूप से सेवन करने से पेट से सम्बंधित सब रोग दूर होते हैं।
❖ पेट सफा
घटक: -
| 1. सनाय की पत्तियाँ | - | 35 ग्राम |
|---|---|---|
| 2. काला नमक | - | 12 ग्राम |
| 3. अजवाइन | - | 10 ग्राम |
| 4. इसबगोल | - | 8 ग्राम |
| 5. त्रिफला चूर्ण (हरड, बहेड़ा, आँवला) | - | 9 ग्राम |
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- | सेंधा नमक | - | 5 ग्राम ---|---|---|---
- | हरितकी | - | 3 ग्राम
- | अमलतास का गूदा | - | 3 ग्राम
- | सौंफ | - | 3 ग्राम
- | सौंठ | - | 3 ग्राम
- | निशोध (त्रिवृत) | - | 2.8 ग्राम
- | जीरा | - | 2 ग्राम
- | एरंड का तेल (अरण्डी का तेल) | - | 1 ग्राम
विधि -
सबको सुखाकर, पीसकर आपस में मिलाकर डिब्बी में भर लें।
पेट सफा में निम्नलिखित औषधीय गुण है:
- • रेचक (उत्तेजक)
- • क्षुधावर्धक – भूख बढ़ाने वाला
- • पाचन – पाचन शक्ति बढ़ाने वाली
- • अनुलोमन – उदर से मल और गैस को बाहर निकालने वाला
- • दीपन – जठराग्नि को प्रदिप्त करता है।
❖ शिलाजीत रसायन वटी
घटक: -
- | अक्षगंधा | - | 60 मिलीग्राम ---|---|---|---
- | त्रिफला चूर्ण | - | 60 मिलीग्राम
- | भूमि आमला | - | 60 मिलीग्राम
- | शुद्ध शिलाजीत | - | 120 मिलीग्राम
विधि -
सभी सामग्री को आपस में कूटकर मिलाकर डिब्बी में भर लें। दिन में 2 बार गर्म पानी या दूध से लें।
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औषधीय लाभ एवं प्रयोग
दिव्य शिलाजीत रसायन वटी के सभी घटकों का प्रभाव मर्दाना रोगों में दिखाई पड़ता है। यह शारीरिक कमजोरी को दूर करती है। यह पुरुषों नई ऊर्जा का संचार करती है और मर्दाना शक्ति की वृधि करती है। यह पुरुषों के स्वास्थ्य के उपयोगी व हितकारी आयुर्वेदिक औषधि है। मर्दाना कमजोरी, अल्पशुक्राणुता (वीर्य में शुक्राणुओं की कमी होना), स्वप्रदोष आदि रोगों को छुटकारा मिलता है।
❖ आयुर्वेदिक देशी गुटखा
सुपारी के टुकड़े 50 ग्राम, तुलसी, कथा मिक्स करें, अड़सी और नागरवेल पत्ते का 5 ग्राम रस निकालें 5 ग्राम दाल चीनी, लवंग, ओलची, 1 चम्मच गौमूत्र अर्क सब मिक्स कर, पैक कर लें।
❖ मुक्ता वटी के घटक
घटक: -
| 1. ब्राह्मी | - | 46 मिली ग्राम |
|---|---|---|
| 2. शंखपुष्पी | - | 46 मिली ग्राम |
| 3. वच | - | 46 मिली ग्राम |
| 4. गाजवॉ | - | 69 मिली ग्राम |
| 5. ज्योतिष्मती | - | 19 मिली ग्राम |
| 6. गिलोय या गुड्डी | - | 20 मिली ग्राम |
| 7. अक्षगंधा | - | 46 मिली ग्राम |
| 8. मुक्ता पिष्टी (मोती पिष्टी) | - | 2 मिली ग्राम |
| 9. प्रवाल पिष्टी | - | 6 मिली ग्राम |
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विधि- उपरोक्त सामग्री के मिश्रण को आगे दी गयी जड़ी बूटियों से तैयार किए हुए काढ़े के साथ संसाधित किया जाता है। ब्राह्मी, शंखपुष्पी, गिलोय या गुडूची, सर्पगंधा और जटामांसी। 1 गोली प्रतिदिन दो बार।
लाभ -
दिव्य मुक्ता वटी उच्च रक्तचाप को संतुलित करने की सबसे अच्छी आयुर्वेदिक औषधि है। मुक्ता वटी अवसाद में भी लाभदायक है और यह मानसिक उत्तेजना और चिड़चिड़ेपन को शांत करती है। ज्यादातर लोग तनाव से प्रेरित उच्च रक्तचाप से ग्रसित होते हैं। इस मामले में यह अधिक प्रभावी है। हालांकि, मुक्ता वटी को सर्पगंधा और जटामांसी के साथ भी संसाधित किया जाता है, जो की एंटीहाइपरटेन्सिव (उच्चरक्तदाबरोधी) जड़ी बूटियां हैं।
❖ वातारि चूर्ण
घटक: -
| 1. सोठ | - | 1 ग्राम |
|---|---|---|
| 2. विधारा | - | 1 ग्राम |
| 3. अक्षगंधा | - | 1 ग्राम |
| 4. मेथी | - | 1 ग्राम |
| 5. कुटकी | - | 1 ग्राम |
विधि -
सभी घटकों को कूटकर, मिलाकर तैयार करें।
वातारि चूर्ण के लाभ एवं उपयोग
- • दिव्य वातारि चूर्ण जोड़ो और माशपेशियों के दर्द के लिए बहुत ही लाभकारी है यह बाजार में उपलब्ध उन कुछ औषधियों में से एक है जो गठिये का बेहतरीन उपचार करती हैं और गठिये के रोगियों
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को सामान्य जीवन जीने के लिए मदद करते हैं। इससे जोड़ो के अन्य रोगों में भी रहत मिलती है।
- • कई महिलायों को रजोनिवृत्ति के बाद ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारी हो जाती है जिसमे भी जोड़ो में समस्या आ जाती है, दिव्य वातारि चूर्ण इस समस्या की रोगग्राम के लिए भी बहुत उपयोगी है।
- • दिव्य वातारि चूर्ण उन बूढ़े लोगों के लिए उपयोगी है जो ठीक से चल पाने में भी असमर्थ हैं क्योंकि उम्र बढ़ने के कारण उनके जोड़ कमजोर हो चुके होते हैं। यह चूर्ण हड्डियों और जोड़ो को मजबूत बनाता है, ताकि वो अपने सामान्य काम कर सके।
- • दिव्य वातारि चूर्ण जोड़ो तक पोषक तत्व पहुंचाता है जिससे इससे सम्बंधित समस्याएं न केवल कम होती हैं बल्कि शरीर को भी ऊर्जा मिलती है।
- • इन सब फायदों के अलावा यह चूर्ण शरीर के अन्य दर्दों जैसे कमर दर्द, पीठ कर दर्द और सभी तरह से बात रोगों से छुटकारा भी दिलाता है।
❖ दिव्य पेय हर्बल टी के घटक
घटक: -
| 1. | छोटी इलाइची | - | 3 ग्राम |
|---|---|---|---|
| 2. | बड़ी इलाइची | - | 4 ग्राम |
| 3. | दालचीनी | - | 1 ग्राम |
| 4. | लौंग | - | 4 ग्राम |
| 5. | सफेद चन्दन | - | 1 ग्राम |
| 6. | रक्त चन्दन | - | 3 ग्राम |
| 7. | जावित्री | - | 4 ग्राम |
| 8. | जायफल | - | 4 ग्राम |
| 9. | काली मिर्च | - | 1 ग्राम |
| 10. | गुलाब फूल | - | 3 ग्राम |
| 11. | कमल फूल | - | 3 ग्राम |
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| 12. | अक्षगंधा | - | 3 ग्राम |
|---|---|---|---|
| 13. | सोमलता | - | 3 ग्राम |
| 14. | गजवान | - | 2 ग्राम |
| 15. | सौफ | - | 2 ग्राम |
| 16. | चित्रक | - | 3 ग्राम |
| 17. | वासा | - | 3 ग्राम |
| 18. | बनपशा | - | 3 ग्राम |
| 19. | चव्य | - | 3 ग्राम |
| 20. | सौठ | - | 3 ग्राम |
| 21. | गिलोय | - | 3 ग्राम |
| 22. | मुलेठी | - | 3 ग्राम |
| 23. | तेजपत्ता | - | 2 ग्राम |
| 24. | गोरखपान | - | 2 ग्राम |
| 25. | आज्ञाघास | - | 4 ग्राम |
| 26. | भूमिआमला | - | 4 ग्राम |
| 27. | पुनर्नवा | - | 4 ग्राम |
| 28. | बला | - | 2 ग्राम |
| 29. | सर्पुनखा | - | 2 ग्राम |
| 30. | ब्राही | - | 4 ग्राम |
| 31. | शंखपुष्पी | - | 4 ग्राम |
| 32. | वनतुलसी | - | 5 ग्राम |
| 33. | अर्जुन | - | 3 ग्राम |
विधि-
इसको बनाने का तरीका साधारण चाय बनाने के जैसा ही हैं। एक कप पानी में एक टीस्पून दिव्य पेय हर्बल टी का एक चम्मच डाल कर इसे धीमी आंच पर पकाएं, इसे पांच से सात मिनट्स पकाएं और इसके बाद इसमें दूध और चीनी डालें और उसके बाद छान कर पिएं।
दिव्य पेय के लाभ एवं उपयोग -
- • खासी-जुकाम में लाभदायक
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- • दिव्य पेय हर्बल टी जड़ी-बूटियों का एक ऐसा मिश्रण हैं, जो खासी जुकाम और उसमे होने वाली परेशानियों को दूर करने में सहायक है।
- • पेट के रोगों में असरकारक
- • यह एक ऐसा पेय हैं जो पेट की तकलीफो से राहत प्रदान करती है और उनकी रोकथाम में सहायक हैं।
- • पाचन की समस्यायों से राहत
- • इस हर्बल चाय से पाचन क्षमता बढ़ती है, इसके अलावा यह साँस से सम्बंधित समस्यायों को भी दूर करती है।
- • वजन कम करने के लिए उपयोगी
- • इसके मौजूद जड़ी- बूटियां शरीर की चर्बी को कम करती हैं और वजन को कम करने में उपयोगी हैं
- • मानसिक परेशानियों के लिए उपयोगी
- • इस चाय में अक्षगंधा ,ब्राह्मी और शंखपुष्पी जैसी जड़ी-बूटियां हैं जो मानसिक बीमारियों, तनाव व अवसाद को दूर करती हैं और व्यक्ति को स्वस्थ रखती हैं।
- • इम्युनिटी बढ़ाती हैं
- • हर्बल चाय इम्युनिटी को बढ़ाती हैं और शरीर के अंगो को भी मजबूत करती हैं। यह शरीर से हानिकारक ऑक्सीडेंट को शरीर से निकालती हैं।
❖ यौवनामृत वटी
घटक: -
| 1. अक्षगंधा | - | 12 मिलीग्राम |
|---|---|---|
| 2. कोंच | - | 12 मिलीग्राम |
| 3. बला | - | 12 मिलीग्राम |
| 4. शतावर | - | 8.25 मिलीग्राम |
| 5. सफ़ेद मूसली | - | 12 मिलीग्राम |
| 6. जावेत्री | - | 12 मिलीग्राम |
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- | जायफल | - | 17.50 मिलीग्राम ---|---|---|---
- | कुचला शुद्ध | - | 2 मिलीग्राम
- | अकरकरा | - | 12 मिलीग्राम
- | जुंदवेस्तर | - | 12 मिलीग्राम
- | बबूल | - | 1.75 मिलीग्राम
- | स्वर्ण भस्म | - | 0.25 मिलीग्राम
- | प्रवाल पिस्टी | - | 0.25 मिलीग्राम
- | वंग भस्म | - | 5.50 मिलीग्राम
- | शिलाजीत शुद्ध | - | 5.50 मिलीग्राम
विधि -
सभी सामग्री को सुखाकर, कूटकर डिब्बे में भर लें।
लाभ एवं प्रयोग -
दिव्य यौवनामृत वटी में सभी घटकों का पुरुषों के यौन स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है।
❖ अर्जुन काथ
- | अर्जुन छाल | - | 10 ग्राम ---|---|---|---
विधि - 400 मिलीलीटर पानी में पाँच से दस ग्राम दिव्य अर्जुन काथ पाउडर डालें और उसे पकाएं, इसे तब तक पकाएं जब तक की इस मिश्रण की मात्रा कम हो कर 100 मिलीलीटर न रह जाये। अब इस मिश्रण को छान लें और पिये। इसका सेवन दिन में दो बार खाली पेट करना चाहिए। 1) सुबह उठ कर खाली पेट 2) रात के खाने से एक घंटे पहले।
हृदय से सम्बंधित रोगों के लिए
- • हृदय के रोगों जैसे उच्च कोलोस्ट्रॉल, उच्च रक्तचाप और हार्ट अटैक की रोकथाम के लिए दिव्य अर्जुन काथ बेहतरीन औषधि
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हैं इसके अलावा इसमें मौजूद जड़ी-बूटियां हृदय की माँसपेशियों का पोषण करता हैं ताकि वो सही से काम कर सके।
- • कमजोर दिल के लिए
- • कमजोर दिल के रोगियों के लिए यह औषधि बहुत लाभदायक है।
- • हार्ट अटैक की रोकथाम के लिए
- • दिव्य अर्जुन काथ धमनियों में जमी वसा को कम करने में मदद करता हैं जिससे हार्ट अटैक की संभावना कम हो जाती हैं।
- • इन सब लाभों के अलावा इसमें मौजूद अर्जुन छाल किडनी से पथरी को बाहर निकालने, दांतों को चमकाने या मजबूत बनाने और अगर इसका सेवन दूध में डाल कर किया जाये तो लगभग हर बीमारी में यह लाभदायक है।
❖ दिव्य उदरकल्प चूर्ण
घटक -
| 2. सोनामुखी | - | 1.5 ग्राम |
|---|---|---|
| 3. सौंफ | - | 0.5 ग्राम |
| 4. हरीतकी छोटी | - | 1 ग्राम |
| 5. सेंधा नमक | - | 0.5 ग्राम |
| 6. सोंठ | - | 0.5 ग्राम |
| 7. गुलाब फूल | - | 0.5 ग्राम |
| 8. काला दाना | - | 0.5 ग्राम |
विधि -
सभी घटकों को सुखाकर पीसकर, डिब्बी में भरे।
लाभ एवं उपयोग -
- • दिव्य उदरकल्प चूर्ण आंतों से सम्बंधित रोगों को दूर करने में सहायक है। इसका नियमित रूप से सेवन करने से आंतरिक
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प्रणाली से गंदगी बाहर निकलती है और इससे खाना पूरी तरह से पच जाता है।
- • दिव्य उदरकल्प चूर्ण पेट से सम्बंधित रोगों की रोकथाम के लिए बहुत उपयोगी है जैसे पेट में होने वाले दर्द से और पेट की गैस को यह चूर्ण पूरी तरह से खत्म करता है।
- • यह चूर्ण पेट की सूजन को कम करता है और शरीर के सारे अंगों को ऊर्जा प्रदान करता है इसके अलावा यह शरीर की पाचन क्रिया को भी सुचारू बनाये रखता है।
- • दिव्य उदरकल्प चूर्ण कुदरती तरीके से शरीर की प्रणाली की सफाई करता है और शरीर के लिए हानिकारक द्रव्यों को बाहर निकालता है, वो भी शरीर के बाकि के अंगों को बिना हानि पहुंचाये।
- • दिव्य उदरकल्प चूर्ण पुरानी कब्ज और बबासीर जैसे रोगों के लिए भी बहुत ही उपयोगी औषधि है। इसमें मौजूद जड़ी-बूटियां इन रोगों के लिए रामबाण दवा है।
- • यह चूर्ण दस्त, पेट फूलना, एसिडिटी, खट्टी डकार जैसी बिमारियों से भी राहत प्रदान करता है।
औषधीय मात्रा निर्धारण एवं व्यवस्था
दिव्य उदरकल्प चूर्ण की दो-पाँच ग्राम मात्रा रोजाना लेने की सलाह दी जाती है। इसे दिन में एक बार रात को सोते समय लेना चाहिए। इस चूर्ण का सेवन हलके गर्म दूध या पानी किसी के साथ भी लेना बेहतर है। इसका सेवन आप कितने भी लंबे समय तक कर सकते हैं क्योंकि इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होता।
❖ शिलाजीत रसायन वटी
घटक: -
| 1. अक्षगंधा | - | 60 मिलीग्राम |
|---|---|---|
| 2. त्रिफला चूर्ण | - | 60 मिलीग्राम |
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| 3. भूमि आमला | - | 60 मिलीग्राम |
|---|---|---|
| 4. शुद्ध शिलाजीत | - | 120 मिलीग्राम |
विधि -
सभी घटकों को सुखाकर, पीसकर तैयार करें।
औषधीय लाभ एवं प्रयोग (Benefits & Uses) -
दिव्य शिलाजीत रसायन वटी के सभी घटकों का प्रभाव मर्दाना रोगों में दिखाई पड़ता है। यह शारीरिक कमजोरी को दूर करती है। यह पुरुषों नई ऊर्जा का संचार करती है और मर्दाना शक्ति की वृधि करती है। यह पुरुषों के स्वास्थ्य के उपयोगी व हितकारी आयुर्वेदिक औषधि है। यह पुरुषों के रोगों के उपचार के लिए एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधि है।
सेवन विधि
- • दवा लेने का उचित समय (कब लें?) - सुबह और शाम
- • दिन में कितनी बार लें? - 2 बार
- • अनुपान - गुनगुने पानी या दूध के साथ
- • उपचार की अवधि (कितने समय तक लें) कम से कम 3 महीने चिकित्सक की सलाह लें
❖ Dr Ortho Oil के घटक द्रव्य
(Ingredients)
घटक: -
| 1. अलसी तेल | - | 5 मिलीलीटर |
|---|---|---|
| 2. कपूर तेल | - | 5 मिलीलीटर |
| 3. पुदीना तेल | - | 5 मिलीलीटर |
| 4. चीड़ तेल | - | 8 मिलीलीटर |
| 5. गंधपुरा तेल | - | 8 मिलीलीटर |
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| 6. निर्गुच्छी तेल | - | 2 मिलीलीटर |
|---|---|---|
| 7. ज्योतिष्मती तेल | - | 2 मिलीलीटर |
| 8. तिल का तेल | - | 65 मिलीलीटर |
विधि- सभी प्रकार के तेलों को आपस में मिलाकर डिब्बी में भर कर प्रयोग करें।
डा. ऑर्थो तेल (Dr Ortho Oil) की मालिश निम्नलिखित व्याधियों में लाभकारी है:
- • घुटने का दर्द
- • पीठ दर्द
- • मांसपेशियों में दर्द और जकड़न
- • जोड़ों के दर्द और जकड़न
- • ऑस्टियोआर्थराइटिस (अस्थिसंधिशोथ)
- • गठिया
- • कंधे में दर्द
- • गृध्रसी या कटिस्नायुशूल (Sciatica)
- • गर्दन का दर्द
❖ दिव्य धारा के घटक
घटक: -
| 1. पिपरमिंट आयल | - | 1मिलीलीटर |
|---|---|---|
| 2. देसी कपूर | - | 1 ग्राम |
| 3. अजवायन सत | - | 1 ग्राम |
| 4. लौंग तेल | - | 0.50 मिलीलीटर |
| 5. नीलगिरी तेल | - | 1.50 मिलीलीटर |
विधि -
सभी को आपस में मिलाकर, दिव्य धारा तैयार करें।
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दिव्य धारा के लाभ एवं प्रयोग
दिव्य धारा में सभी घटकों का सिर दर्द, खोंसी या जुकाम पर प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक घटक के प्रभाव का प्रदर्शन करने के लिए यहाँ कुछ महत्वपूर्ण लाभ लिखे हैं।
- • दिव्य धारा शरीर के विभिन्न दर्द जैसे सिर का दर्द, दांत का दर्द, पेट का दर्द को दूर करने में सहायक है, इसके अलावा यह नाक से खून निकलने की समस्या और त्वचा की किसी भी तरह की समस्या जैसे की संक्रमण से यह राहत देती है। यह औषधि माइग्रेन के लिए भी लाभदायक है।
- • दिव्य धारा का मुख्य घटक पुदीना है इसीलिए यह पेट से सम्बंधित सभी रोगों को रोकथाम के लिए बहुत असरदार है। इसके प्रयोग से पेट दर्द , कब्ज ,पेट का भारीपन, अम्लता, गैस में राहत मिलती है और पाचन क्रिया सही रहती है। यह पाचन शक्ति को बढ़ाती है और अपच नहीं होने देती। दिव्य धारा का प्रयोग बाहरी तरीके से ही किया जाता है।
- • दिव्य धारा सर्दी जुकाम और खोंसी में भी राहत देती है। जुकाम में होने वाली समस्याओं जैसे सिर दर्द, गले की खराश और दर्द, बहती हुई नाक, संक्रमण, आँखों में जलन आदि को दूर करने में भी सहायक है। मांसपेशियों के दर्द में भी दिव्य धारा के प्रयोग से लाभ मिलता है और मांसपेशियों की अकड़न में भी इसका प्रयोग किया जा सकता है।
- • दिव्य धारा हैजा और पुराने अस्थमा जैसे रोगों की रोकथाम के लिए असरदार है। दमा या साँस लेने में मुश्किल होने की समस्या में भी इस औषधि का प्रयोग किया जा सकता है। तनाव और दिमागी कमजोरी की स्थिति में भी दिव्य धारा के इस्तेमाल से अच्छे परिणाम मिलते हैं।
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