तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
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२ तैत्तिरीयोपनिषद् गीताप्रेस, गोरखपुर CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
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ॐ तैत्तिरीयोपनिषद् सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित गीताप्रेस, गोरखपुर CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
मुद्रक तथा प्रकाशक घनश्यामदास जालान गीताप्रेस, गोरखपुर सं० १९९३ प्रथम संस्करण ३२५० सं० १९९५ द्वितीय संस्करण ३००० सं० २००० तृतीय संस्करण ३००० मूल्य १=)॥
शीक्षावल्ली कहते हैं, सांहिती उपनिषद् कही जाती है और अष्टम तथा
निवेदन कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयारण्यकके प्रपाठक ७-८ और ९ का नाम तैत्तिरीयोपनिषद् है । इनमें सप्तम प्रपाठक, जिसे तैत्तिरीयोपनिषद्की शीक्षावल्ली कहते हैं, सांहिती उपनिषद् कही जाती है और अष्टम तथा नवम प्रपाठक, जो इस उपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली हैं, वारुणी उपनिषद् कहलाती हैं । इनके आगे जो दशम प्रपाठक है उसे नारायणोपनिषद् कहते हैं, वह याज्ञिकी उपनिषद् है । इनमें महत्त्वकी दृष्टिसे वारुणी उपनिषद् प्रधान है; उसमें विशुद्ध ब्रह्मविद्याका ही निरूपण किया गया है । किन्तु उसकी उपलब्धिके लिये चित्तकी एकाग्रता एवं गुरुकृपाकी आवश्यकता है । इसके लिये शीक्षावल्लीमें कई प्रकारकी उपासना तथा शिष्य एवं आचार्यसम्बन्धी शिष्टाचारका निरूपण किया गया है । अतः औपनिषद सिद्धान्तको हृदयंगम करनेके लिये पहले शीक्षावल्ल्युक्त उपासनादिका ही आश्रय लेना चाहिये । इसके आगे ब्रह्मानन्दवल्ली तथा भृगुवल्लीमें जिस ब्रह्मविद्याका निरूपण है उसके सम्प्रदायप्रवर्त्तक वरुण हैं; इसलिये वे दोनों वल्लियाँ वारुणी विद्या अथवा वारुणी उपनिषद् कहलाती हैं । इस उपनिषद्पर भगवान् शङ्कराचार्यने जो भाष्य लिखा है वह बहुत ही विचारपूर्ण और युक्तियुक्त है । उसके आरम्भमें ग्रन्थका
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मतका आचार्यने अनेकों युक्तियोंसे खण्डन किया है और स्वर्ग तथा
( ४ ) उपोद्घात करते हुए भगवान्ने यह बतलाया है कि मोक्षरूप परम- निःश्रेयसकी प्राप्तिका एकमात्र हेतु ज्ञान ही है। इसके लिये कोई अन्य साधन नहीं है। मीमांसकोंके मतमें 'स्वर्ग' शब्दवाच्य निरतिशय प्रीति ( प्रेय ) ही मोक्ष है और उसकी प्राप्तिका साधन कर्म है। इस मतका आचार्यने अनेकों युक्तियोंसे खण्डन किया है और स्वर्ग तथा कर्म दोनोंहीकी अनित्यता सिद्ध की है। इस प्रकार आरम्भ करके फिर इस वल्लीमें बतलायी हुई भिन्न-भिन्न उपासनादिकी संक्षिप्त व्याख्या करते हुए इसके उपसंहारमें भी भगवान् भाष्यकारने कुछ विशद विचार किया है। एकादश अनुवाकमें शिष्यको वेदका स्वाध्याय करानेके अनन्तर आचार्य सत्यभाषण एवं धर्माचरणादिका उपदेश करता है तथा समावर्तन संस्कारके लिये आदेश देते हुए उसे गृहस्थोचित कर्मोंकी भी शिक्षा देता है। वहाँ यह बतलाया गया है कि देवकर्म, पितृकर्म तथा अतिथिपूजनमें कभी प्रमाद न होना चाहिये; दान और स्वाध्यायमें भी कभी भूल न होनी चाहिये, सदाचारकी रक्षाके लिये गुरुजनोंके प्रति श्रद्धा रखते हुए उन्हींके आचरणोंका अनुकरण करना चाहिये—किन्तु वह अनुकरण केवल उनके सुकृतोंका हो, दुष्कृतोंका नहीं। इस प्रकार समस्त वल्लीमें उपासना एवं गृहस्थजनोचित सदाचारका ही निरूपण होनेके कारण किसीको यह आशंका न हो जाय कि ये ही मोक्षके प्रधान साधन हैं इसलिये आचार्य फिर मोक्षके साक्षात् साधनका निर्णय करनेके लिये पाँच विकल्प करते हैं—( १ ) क्या परम श्रेयकी प्राप्ति केवल कर्मसे हो सकती है ? ( २ ) अथवा विद्याकी अपेक्षायुक्त कर्मसे ( ३ ) किंवा कर्म और ज्ञानके समुच्चयसे ( ४ ) या कर्मकी अपेक्षावाले ज्ञानसे ( ५ ) अथवा केवल ज्ञानसे ? इनमेंसे अन्य सब पक्षोंको सदोष सिद्ध करते हुए आचार्यने यही निश्चय किया है कि केवल ज्ञान ही मोक्षका साक्षात् साधन है। इस प्रकार शीक्षावल्लीमें संहितदिविषयक उपासनाओंका निरूपण कर फिर ब्रह्मानन्दवल्लीमें ब्रह्मविद्याका वर्णन किया गया है। इसका पहला CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
निरूपण करनेवाला है। आगेका समस्त ग्रन्थ इस सूत्रभूत मन्त्रकी ही
( ५ )
वाक्य है—'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो यह सूत्रभूत वाक्य ही सम्पूर्ण ब्रह्मविद्याका बीज है। ब्रह्म और ब्रह्मवित्के स्वरूपका विचार ही तो ब्रह्मविद्या है और ब्रह्मवेत्ताकी परप्राप्ति ही उसका फल है; अतः निःसन्देह यह वाक्य फलसहित ब्रह्मविद्याका निरूपण करनेवाला है। आगेका समस्त ग्रन्थ इस सूत्रभूत मन्त्रकी ही व्याख्या है। उसमें सबसे पहिले 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस वाक्यद्वारा श्रुति ब्रह्मका लक्षण करती है। इससे ब्रह्मके स्वरूपका निश्चय हो जानेपर उसकी उपलब्धिके लिये पञ्चकोशका विवेक करनेके अभिप्रायसे उसने पक्षीके रूपकद्वारा पाँचों कोशोंका वर्णन किया है और उन सबके आधार- रूपसे सर्वान्तरतम परब्रह्मका 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इस वाक्यद्वारा निर्णय किया है। इसके पश्चात् ब्रह्मकी असत्ता माननेवाले पुरुषकी निन्दा करते हुए उसका अस्तित्व स्वीकार करनेवाले पुरुषकी प्रशंसा की है और उसे 'सत्' बतलाया है। फिर ब्रह्मका सर्वात्म्य प्रतिपादन करनेके लिये 'सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेय' इत्यादि वाक्यद्वारा उसीको जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बतलाया है।
इस प्रकार सत्संज्ञक ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति दिखलाकर फिर सप्तम अनुवाकमें असत्से ही सत्की उत्पत्ति बतलायी है। किन्तु यहाँ 'असत्' का अर्थ अभाव न समझकर अव्याकृत ब्रह्म समझना चाहिये और 'सत्'का व्याकृत जगत् ; क्योंकि अत्यन्ताभावसे किसी भावपदार्थकी उत्पत्ति नहीं हो सकती और उत्पत्तिसे पूर्व सारे पदार्थ अव्यक्त थे ही। इसलिये 'असत्' शब्द अव्याकृत ब्रह्मका ही वाचक है। वह ब्रह्म रसस्वरूप है; उस रसकी प्राप्ति होनेपर यह जीव रसमय—आनन्दमय हो जाता है। उस रसके लेशसे ही सारा संसार सजीव देखा जाता है। जिस समय साधनाका परिपाक होनेपर पुरुष इस अदृश्य अशरीर अनिर्वाच्य और अनाश्रय परमात्मामें स्थिति लाभ करता है उस समय वह सर्वथा निर्भय हो जाता है; और जो उसमें थोड़ा-सा भी अन्तर करता है उसे भय प्राप्त होता है।
( ६ ) अतः ब्रह्ममें स्थित होना ही जीवकी अभयस्थिति है; क्योंकि वहाँ भेदका सर्वथा अभाव है और भय भेदमें ही होता है 'द्वितीयाद्वै भयं भवति' । इस प्रकार ब्रह्मनिष्ठकी अभयप्राप्तिका निरूपण कर ब्रह्मके सर्वान्तर्यामित्व और सर्वशासकत्वका वर्णन करते हुए ब्रह्मवेत्ताके आनन्दकी सर्वोत्कृष्टता दिखलायी है। वहाँ मनुष्य, मनुष्यगन्धर्व, देवगन्धर्व, पितृगण, आजानज- देव, कर्मदेव, देव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति और ब्रह्मा—इन सबके आनन्दोंको उत्तरोत्तर शतगुण बतलाते हुए यह दिखलाया है कि निष्काम ब्रह्मवेत्ताको वे सभी आनन्द प्राप्त हैं। क्यों न हो ? सबके अधिष्ठानभूत परब्रह्मसे अभिन्न होनेके कारण क्या वह इन सभीका आत्मा नहीं है । अतः सर्वरूपसे वही तो सारे आनन्दोंका भोक्ता है। भोक्ता ही क्यों, सर्व-आनन्दस्वरूप भी तो वही है, सारे आनन्द उसीके स्वरूपभूत आनन्द-महोदधिके क्षुद्रातिक्षुद्र कण ही तो हैं। इसके पश्चात् हृदयपुण्डरीकस्थ पुरुषका आदित्यमण्डलस्थ पुरुषके साथ अभेद करते हुए यह बतलाया है कि जो इन दोनोंका अभेद जानता है वह इस लोक अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट विषयसमूहसे निवृत्त होकर इस समष्टि अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय आत्माको प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सारा प्रपञ्च उसका अपना शरीर हो जाता है—उसके लिये अपनेसे भिन्न कुछ भी नहीं रहता। उस निर्भय और अनिर्वाच्य स्वात्मतत्त्वकी जिसे प्राप्ति हो जाती है, उसे न तो किसीका भय रहता है और न किसी कृत या अकृतका अनुताप ही। जब अपनेसे भिन्न कुछ है ही नहीं तो भय किसका और क्रिया कैसी ? क्रिया तो देश, काल या वस्तुका परिच्छेद होनेपर ही होती है; उस एक, अखण्ड, अमर्यादित, अद्वितीय वस्तुमें किसी प्रकारकी क्रियाका प्रवेश कैसे हो सकता है ? इस प्रकार ब्रह्मानन्दवल्लीमें ब्रह्मविद्याका निरूपण कर भृगुवल्लीमें उसकी प्राप्तिका मुख्य साधन पञ्चकोश-विवेक दिखलानेके लिये वरुण और भृगुका आख्यान दिया गया है। आत्मतत्त्वका जिज्ञासु भृगु अपने CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
( ७ ) पिता वरुणके पास जाता है और उससे प्रश्न करता है कि जिससे ये सब भूत उत्पन्न हुए हैं, जिससे उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं और अन्तमें जिसमें ये लीन हो जाते हैं उस तत्त्वका मुझे उपदेश कीजिये । इसपर वरुणने अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और वाणी--ये ब्रह्मोपलब्धिके छः मार्ग बतलाकर उसे तप करनेका आदेश किया और कहा कि 'तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्म'--तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है । भृगुने जाकर मनःसमाधानरूप तप किया और इन सबमें अन्नको ही ब्रह्म जाना । किन्तु फिर उसमें सन्देह हो जानेपर उसने फिर वरुणके पास आकर वही प्रश्न किया और वरुणने भी फिर वही उत्तर दिया । इसके पश्चात् उसने प्राणको ब्रह्म जाना और इसी प्रकार पुनः-पुनः सन्देह होने और पुनः-पुनः वरुणके वही आदेश देनेपर अन्तमें उसने आनन्दको ही ब्रह्म निश्चय किया । यहाँ ब्रह्मज्ञानका प्रथम द्वार अन्न था । इसीसे श्रुति यह आदेश करती है कि अन्नकी निन्दा न करे-यह नियम है, अन्नका तिरस्कार न करे-यह नियम है और खूब अन्नसंग्रह करे-यह भी नियम है । यदि कोई अपने निवासस्थानपर आवे तो उसकी उपेक्षा न करे; सामर्थ्यानुसार अन्न, जल एवं आसनादिसे उसका अवश्य सत्कार करे । ऐसा करनेसे वह अन्नवान्, कीर्तिमान् तथा प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होता है। इस प्रकार अन्नकी महिमाका वर्णन कर भिन्न-भिन्न आश्रयोंमें भिन्न-भिन्न रूपसे उसकी उपासनाका विधान किया गया है। उस उपासनाके द्वारा जब उसे अपने सर्वात्म्यका अनुभव होता है उस समय उस लोकोत्तर आनन्दसे उन्मत्त होकर वह अपनी कृतकृत्यताको व्यक्त करते हुए अत्यन्त विस्मयपूर्वक गा उठता है--"अहमन्नमहमन्नम- हमन्नम् । अहमन्नादो ३ऽहमन्नादो ३ऽहमन्नादः ! अहꣳश्लोककृदहꣳश्लोक- कृदहꣳश्लोककृद्" इत्यादि । उसकी यह उन्मत्तोक्ति उसके कृतकृत्य हृदयका उद्गार है, यह उसका अनुभव है और यही है उसके आध्यात्मिक संग्रामके अयत्नसाध्य भगवत्कृपालभ्य विजयका उद्घोष । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
( ८ ) इस प्रकार हम देखते हैं कि इस उपनिषद्का प्रधान लक्ष्य ब्रह्म- ज्ञान ही है। इसकी वर्णन-शैली बड़ी ही मर्मस्पर्शिनी और शृङ्खलाबद्ध है। भगवान् शङ्कराचार्यने इसके ऊपर जो भाष्य लिखा है वह भी बहुत विचारपूर्ण है। आशा है, विज्ञजन उससे यथेष्ट लाभ उठानेका प्रयत्न करेंगे। इस उपनिषद्के प्रकाशनके साथ प्रथम आठ उपनिषदोंके प्रकाशनका कार्य समाप्त हो जाता है। हमें इनके अनुवादमें श्रीविष्णु- वापटशास्त्रीकृत मराठी-अनुवाद, श्रीदुर्गाचरण मजूमदारकृत बंगला- अनुवाद, ब्रह्मनिष्ठ पं० श्रीपीताम्बरजीकृत हिन्दी-अनुवाद और महा- महोपाध्याय डा० श्रीगंगानाथजी झा एवं पं० श्रीसीतारामजी शास्त्रीकृत अंग्रेजी अनुवादसे यथेष्ट सहायता मिली है। अतः हम इन सभी महानुभावोंके अत्यन्त कृतज्ञ हैं। फिर भी हमारी अल्पज्ञताके कारण इनमें बहुत-सी त्रुटियाँ रह जानी स्वाभाविक हैं। उनके लिये हम कृपालु पाठकोंसे सविनय क्षमा-प्रार्थना करते हैं और आशा करते हैं कि वे उनकी सूचना देकर हमें अनुगृहीत करेंगे, जिससे कि हम अगले संस्करणमें उनके संशोधनका प्रयत्न कर सकें। हमारी इच्छा है कि हम शीघ्र ही छान्दोग्य और बृहदारण्यक भी हिन्दी-संसारके सामने रख सकें। यदि विचारशील वाचकवृन्दने हमें प्रोत्साहित किया तो बहुत सम्भव है कि हम इस सेवामें शीघ्र ही सफल हो सकें। अनुवादक
शीक्षावल्ली
श्रीहरिः विषय-सूची विषय पृष्ठ १. शान्तिपाठ ... ... १३ शीक्षावल्ली · प्रथम अनुवाक २. सम्बन्ध-भाष्य ... ... १४ ३. शीक्षावल्लीका शान्तिपाठ ... ... २१ द्वितीय अनुवाक ४. शीक्षाकी व्याख्या ... ... २५ तृतीय अनुवाक ५. पाँच प्रकारकी संहितोपासना ... ... २७ चतुर्थ अनुवाक ६. श्री और बुद्धिकी कामनावालोंके लिये जप और होम-सम्बन्धी मन्त्र ३३ पञ्चम अनुवाक ७. व्याहृतिरूप ब्रह्मकी उपासना ... ... ४१ षष्ठ अनुवाक ८. ब्रह्मके साक्षात् उपलब्धिस्थान हृदयाकाशका वर्णन ... ४७ सप्तम अनुवाक ९. पाङ्क्तरूपसे ब्रह्मकी उपासना ... ... ५४ अष्टम अनुवाक १०. ओङ्कारोपासनाका विधान ... ... ५७ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
( १० ) नवम अनुवाक ११. ऋतादि शुभ कर्मोंकी आवश्यककर्त्तव्यताका विधान ... ६१ दशम अनुवाक १२. त्रिशङ्कुका वेदानुवचन ... ... ६५ एकादश अनुवाक १३. वेदाध्ययनके अनन्तर शिष्यको आचार्यका उपदेश ... ६८ १४. मोक्ष-साधनकी मीमांसा ... ... ७८ द्वादश अनुवाक ... ... ९३ ब्रह्मानन्दवल्ली प्रथम अनुवाक १५. ब्रह्मानन्दवल्लीका शान्तिपाठ ... ... ९४ १६. ब्रह्मज्ञानके फल, सृष्टिक्रम और अन्नमय कोशरूप पक्षीका वर्णन ... ९६ द्वितीय अनुवाक १७. अन्नकी महिमा तथा प्राणमय कोशका वर्णन ... १२४ तृतीय अनुवाक १८. प्राणकी महिमा और मनोमय कोशका वर्णन ... १३० चतुर्थ अनुवाक १९. मनोमय कोशकी महिमा तथा विज्ञानमय कोशका वर्णन ... १३८ पञ्चम अनुवाक २०. विज्ञानकी महिमा तथा आनन्दमय कोशका वर्णन ... १४१ षष्ठ अनुवाक २१. ब्रह्मको सत् और असत् जाननेवालोंका भेद, ब्रह्मज्ञ और अब्रह्मज्ञकी ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें शङ्का तथा सम्पूर्ण प्रपञ्चरूपसे ब्रह्मके स्थित होनेका निरूपण ... ... १५० सप्तम अनुवाक २२. ब्रह्मकी सुकृतता एवं आनन्दरूपताका तथा ब्रह्मवेत्ताकी अभय- प्राप्तिका वर्णन ... ... १७३ अष्टम अनुवाक २३. ब्रह्मानन्दके निरतिशयत्वकी मीमांसा ... ... १८२ २४. ब्रह्मात्मैक्य-दृष्टिका उपसंहार ... ... १९१ नवम अनुवाक २५. ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले विद्वान्की अभयप्राप्ति ... २०८
भृगुवल्ली
( ११ ) भृगुवल्ली प्रथम अनुवाक २६. भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मविद्याविषयक प्रश्न करना तथा वरुणका ब्रह्मोपदेश ... ... २१३ द्वितीय अनुवाक २७. अन्न ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २१८ तृतीय अनुवाक २८. प्राण ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसीमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २२० चतुर्थ अनुवाक २९. मन ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २२१ पञ्चम अनुवाक ३०. विज्ञान ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना ... ... २२२ षष्ठ अनुवाक ३१. आनन्द ही ब्रह्म है—ऐसा भृगुका निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल ... २२३ सप्तम अनुवाक ३२. अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रत तथा शरीर और प्राणरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... २२६ अष्टम अनुवाक ३३. अन्नका त्याग न करनारूप व्रत तथा जल और ज्योतिरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... २२८ नवम अनुवाक ३४. अन्नसञ्चयरूप व्रत तथा पृथिवी और आकाशरूप अन्नब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... २२९ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
( १२ ) दशम अनुवाक ३५. गृहागत अतिथिको आश्रय और अन्न देनेका विधान एवं उससे प्राप्त होनेवाला फल तथा प्रकारान्तरसे ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन ... ... २३० ३६. आदित्य और देहोपाधिक चेतनकी एकता जाननेवाले उपासक- को मिलनेवाला फल ... ... २४१ ३७. ब्रह्मवेत्ताद्वारा गाया जानेवाला साम ... २४५ ३८. शान्तिपाठ ... ... २४९
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वरुण और भृगु
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः तैत्तिरीयोपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित सर्व्वाशाध्वान्तनिर्मुक्तं सर्व्वाशाभास्करं परम्। चिदाकाशावतंसं तं सद्गुरुं प्रणमाम्यहम्॥ शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु । अवतु माम्। अवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
शिक्षावल्ली
शिक्षावल्ली —•1•|००|•1•— प्रथम अनुवाक सम्बन्ध-भाष्य यस्माज्जातं जगत्सर्वं यस्मिन्नेव प्रलीयते । येनेदं धार्यते चैव तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥ १ ॥ जिससे सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें ही यह लीन होता है और जिसके द्वारा यह धारण किया जाता है उस ज्ञानस्वरूपको मेरा नमस्कार है । यैरिमे गुरुभिः पूर्वं पदवाक्यप्रमाणतः । व्याख्याताः सर्ववेदान्तास्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ २ ॥ पूर्वकालमें जिन गुरुजनोंने पद, वाक्य और प्रमाणोंके विवेचनपूर्वक इन सम्पूर्ण वेदान्तों (उपनिषदों) की व्याख्या की है उन्हें मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ । तैत्तिरीयकसारस्य मयाचार्यप्रसादतः । विस्पष्टार्थरुचीनां हि व्याख्येयं संप्रणीयते ॥ ३ ॥ जो स्पष्ट अर्थ जाननेके इच्छुक हैं उन पुरुषोंके लिये मैं श्रीआचार्यकी कृपासे तैत्तिरीयशाखाके सारभूत इस उपनिषद्की व्याख्या करता हूँ । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri