१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
॥ महावाक्योपनिषद् ॥ यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल १२ मन्त्र हैं, जिसमें भगवान् ब्रह्मा ने देवों के समक्ष उस रहस्यज्ञान को प्रकट किया है, जो नितान्त गोपनीय है। इसे केवल उन्हीं जिज्ञासुओं के समक्ष प्रकट करना चाहिए, जो सात्त्विक गुणों से ओत-प्रोत, अन्तर्मुखी तथा गुरुजनों की सेवा में संलग्न रहते हों। इस उपनिषद् का प्रमुख प्रतिपाद्य आत्मतत्त्व है, जो अविद्यारूपी 'तम' से आच्छन्न है। इस ज्ञान के उदय होने के साथ ही आत्मतत्त्व का वास्तविक रूप-आदित्य वर्ण सदृश प्रकट हो जाता है और परमार्क- (आदित्य), परम ज्योति, परमशिव, परम शुक्र, परम ब्रह्मरूप का बोध हो जाता है। जिससे परम आनन्द की अनुभूति-अमृतत्व को प्राप्ति हो जाती है। अन्त में उपनिषद् को महिमा बताते हुए इस रहस्यात्मक ज्ञान का उपसंहार किया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः...........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिरउपनिषद्) अथ होवाच भगवान्ब्रह्मापरोक्षानुभवपरोपनिषदं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ गुह्याद्गुह्यतर मेषा न प्राकृतायोपदेष्टव्या । सात्त्विकायान्तर्मुखाय परिशुश्रूषवे ॥ २ ॥ एक समय भगवान् ब्रह्मा जी ने (समस्त देवताओं के समक्ष) कहा कि (हे देवो!) अपरोक्षानुभव (इन्द्रियातीत अनुभूति) परक उपनिषद् की व्याख्या करते हैं। इस उपनिषद् को सामान्य मनुष्यों के समक्ष प्रकट नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह गूढ़ से गूढ़तर (गोपनीय) है; किन्तु सात्त्विक गुणों से ओत-प्रोत, अन्तर्मुखी तथा अपने गुरुजनों की सेवादि में संलग्न मनुष्यों को ही इस उपनिषद् का उपदेश करना चाहिए ॥ अथ संसृतिबन्धमोक्षयोर्विद्याविद्ये चक्षुषी उपसंहृत्य विज्ञायाविद्यालोकाण्डस्तमोदृक् ॥ ३ ॥ तदनन्तर संसार के बन्धन और मोक्ष को कारणभूता विद्या-अविद्या रूपी नेत्रों को बन्द करके (अहं ब्रह्मास्मि की अनुभूति करता हुआ) साधक (सम्यक् ज्ञानानुभूति के साथ ही) अविद्या रूप संसार के प्रति तमोमयी दृष्टि-अज्ञानदृष्टि से मुक्त हो जाता है ॥ ३ ॥ तमो हि शारीरप्रपञ्चमाब्रह्मस्थावरान्तमन्ताखिलाजाण्डभूतम् । निखिलनिगमोदितसकामकर्मव्यवहारो लोकः ॥ ४ ॥ यह आत्मतत्त्व को आच्छादित करने वाला अज्ञानान्धकार रूपी तम है, अविद्या है, यही चर और अचर जगत् का इस देह से लेकर ब्रह्मपर्यन्त अखण्ड मण्डल का कारण स्वरूप है। इस तम से ही इन सभी वस्तुओं की ब्रह्म से भिन्न एक अलग सत्ता का ज्ञान प्राप्त होता है। वेदों में जो धर्म-कर्तव्य का निर्देश है, उसका प्राकट्य करने वाला कारण स्वरूप भी वह तमरूपी अविद्या ही है ॥ ४ ॥ नैषोऽन्धकारोऽयमात्मा। विद्या हि काण्डान्तरादित्यो ज्योतिर्मण्डलं ग्राह्यं नापरम् ॥ ५ ॥ जब तक अपनी आत्मा के सन्दर्भ में ऐसा ज्ञान न हो जाए-कि यह आत्मा अन्धकार रूप नहीं है, अपितु प्रकाश रूप ब्रह्म से प्रकट होने के कारण स्वयं प्रकाशस्वरूप है, तब तक पुरुष को सद्ज्ञान रूपी विद्या का सतत अभ्यास करते रहना चाहिए। विद्या ही अज्ञानरूपी अविद्या से भिन्न, चिद् आदित्यस्वरूप, स्वप्रकाशित,
२४३ महावाक्योपनिषद् ज्योतिरूप है। उसका मण्डल परम ज्योति से सम्पन्न है, वही ग्रहणीय है; क्योंकि वह ब्रह्ममात्र पर ही आश्रित है, स्वयं ब्रह्म का स्वरूप ही है, अन्य और कुछ भी नहीं है ॥ ५ ॥ असावादित्यो ब्रह्मेत्यजपयोपहितं हंसः सोऽहम्। प्राणापानाभ्यां प्रतिलोमानुलोमाभ्यां समुपलभ्यैवं सा चिरं लब्ध्वा त्रिवृदात्मनि ब्रह्मण्यभिध्यायमाने सच्चिदानन्दः परमात्मा- विर्भवति ॥ ६ ॥ यह (आत्मा) आदित्यरूप ब्रह्म श्वास-प्रश्वास रूप अजपाजप से युक्त हर एक देह में प्रतिष्ठित रहने वाला 'हंस' नाम से युक्त परमात्मा है। इसी हंसरूपी परमात्मा का अंश अपने आपको मानकर और प्राण- अपान, श्वास-प्रश्वास का ज्ञान प्राप्त करके चिरकाल तक साधना करने से इस विद्या द्वारा समष्टि, व्यष्टि एवं तदैक्य रूप आत्म-ब्रह्म में रत रहने पर ही सत्, चित् एवं आनन्द स्वरूप परब्रह्म का प्रादुर्भाव होता है ॥ ६ ॥ सहस्रभानुमच्छुरिता पूरितत्वादलीया पारावारपूर इव। नैषा समाधिः। नैषा योगसिद्धिः। नैषा मनोलयः। ब्रह्मैक्यं तत् ॥ ७॥ आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे। सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरः। नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते ॥ ८ ॥ वह श्रेष्ठ तत्त्वज्ञान वृत्ति सहस्रों सूर्यों के प्रकाश से परिपूर्ण, निस्तरंग (तरंगरहित) समुद्र की जलराशि के सदृश, ब्रह्मभाव रस से युक्त एवं सदैव रहने वाली अर्थात् लय से रहित है। ऐसी स्थिति न तो समाधि की है और न ही योगसिद्धि की ही है; न ही मनोलय है; अपितु वह जीव-ब्रह्म की एकता ही है। वह ब्रह्म (आत्म तत्त्व) अज्ञान से परे आदित्य (शुक्ल) वर्ण है। धीर (विद्वान्) पुरुष नाम और रूप (की नश्वरता) पर विचार करके जिस परात्पर ब्रह्म की अनुभूति करते हैं, वे तद्रूप (ब्रह्मरूप) ही हो जाते हैं ॥ ७-८ ॥ धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार। शक्रः प्रविद्वान्प्रदिशश्चतस्रः तमेवं विद्वानमृत इह भवति। नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ॥ ९ ॥ इस स्थिति (स्वरूप) को ब्रह्माजी ने सबसे पहले कहा और ऐसा ही सर्वातिशायी, देवों में अनुपम, अतिश्रेष्ठ देवराज इन्द्र ने भी कहा है। ऐसे अविनाशी उस ब्रह्म को इस प्रकार से जानने वाला विद्वान् पुरुष परमात्मा के रूप को (अमृतत्व को) प्राप्त कर लेता है, इससे भिन्न अन्य कोई भी दूसरा मार्ग मुक्ति के लिए नहीं है ॥ ९ ॥ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः। तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्ते। यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ १० ॥ पुरातन कालीन श्रेष्ठ धर्मावलम्बी इन्द्रादि देवों ने ज्ञान-यज्ञ द्वारा यज्ञरूप विराट् का यजन किया। वे ही यज्ञीय जीवनयापन करने वाले (याजक) प्राचीन काल से सिद्ध-साध्यगणों एवं देवों के निवास स्थल महिमामण्डित देवलोक को प्राप्त करते हुए प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १० ॥ सोऽहमर्कः परं ज्योतिरर्कज्योतिरहं शिवः। आत्मज्योतिरहं शुक्रः सर्वज्योतिरसावदोम् ॥ ११ ॥ मैं ही वह चिद् आदित्य हूँ, मैं ही आदित्यरूप वह परम ज्योति हूँ, मैं ही वह शिव (कल्याणकारी तत्त्व) हूँ। मैं ही वह श्रेष्ठ आत्म-ज्योति हूँ। सभी को प्रकाश प्रदान करने वाला शुक्र (ब्रह्म) मैं ही हूँ तथा उस (परमसत्ता) से कभी भी अलग नहीं रहता हूँ ॥ ११ ॥
मन्त्र १२ २४४ य एतदथर्वशिरोऽधीते। प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। तत्सायं प्रातः प्रयुञ्जानः पापोऽपापो भवति। मध्यन्दिनमादित्याभिमुखो- ऽधीयानः पञ्चमहापातकोपपातकात्प्रमुच्यते। सर्ववेदपारायणपुण्यं लभते। श्रीमहाविष्णुसा- युज्यमवाप्नोतीत्युपनिषत् ॥ १२॥ इस उपनिषद् को प्रातःकाल पाठ करने से रात्रि में हुए पापों से मुक्ति मिल जाती है तथा सायंकालीन वेला में इसका पाठ करने वाला (मनुष्य) दिन में हुए पापों से मुक्त हो जाता है। प्रातः-सायं (दोनों सन्ध्याओं) में पाठ करने से व्यक्ति को बड़े से बड़े पाप से भी मुक्ति मिल जाती है। मध्याह्न कालीन वेला में सूर्य के समक्ष इस उपनिषद् का पाठ करने वाला मनुष्य पाँच महापातक (ब्रह्महत्या, परस्त्रीगमन, सुरापान, द्यूतक्रीड़ा और मांसादि भक्षण) तथा अन्य और दूसरे जघन्य पापों से भी मुक्त हो जाता है। वह चारों वेदों के पारायण का पुण्य-फल प्राप्त करता हुआ भगवान् विष्णु के स्वरूप को प्राप्त हो जाता है ॥ १२ ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः ...... इति शान्तिः ॥ ॥ इति महावाक्योपनिषत्समाप्ता ॥
॥ मैत्रेय्युपनिषद् ॥ यह सामवेदीय उपनिषद् है। इसमें कुल तीन अध्याय हैं। राजा बृहद्रथ को अपने शरीर के नाशवान् होने का बोध होने पर उन्होंने अपने ज्येष्ठपुत्र को राजा बना दिया और आत्मज्ञान की प्राप्ति के उद्देश्य से घोर तप करने के लिए वन चले गये। जहाँ उनके उग्रतप से प्रसन्न होकर महातेजस्वी शाकायन्य मुनि पधारे और वर माँगने को कहा। आत्मतत्त्व का वर माँगने वाले राजा से मुनि का लम्बा कथोपकथन चला, जिसमें पहले शरीर की नश्वरता और उसके वीभत्स स्वरूप का उल्लेख है और बाद में आत्मतत्त्व की प्राप्ति के उपाय पर प्रकाश डाला गया है। इतना सब प्रथम अध्याय में है। द्वितीय में भगवान् मैत्रेय और कैलासपति महादेव का संवाद वर्णित है, जिसमें सर्वप्रथम महादेव शिव ने ज्ञान, ध्यान, स्नान आदि के यथार्थ स्वरूप को स्पष्ट किया है और बाद में संन्यास द्वारा मुक्ति प्राप्ति का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया। तृतीय अध्याय में विशुद्ध आत्मतत्त्व की अनुभूति का विस्तृत विवेचन करते हुए उपनिषद् की महिमा के वर्णन के साथ समापन किया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ आप्यायन्तु ................. इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-आरुण्युपनिषद्) ॐ बृहद्रथो वै नाम राजा राज्ये ज्येष्ठं पुत्रं निधापयित्वेदमशाश्वतं मन्यमानः शरीरं वैराग्यमुपेतोऽरण्यं निर्जगाम। स तत्र परमं तप आPrivateआदित्यमीक्षमाण ऊर्ध्वबाहुस्तिष्ठत्यन्ते सहस्रस्य मुनेरन्तिकमाजगामाग्निरिवाधूमकस्तेजसा निर्दहन्निवात्मविद्भगवाञ्छाकायन्य उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वरं वृणीष्वेति राजानमब्रवीत्स तस्मै नमस्कृत्योवाच भगवन्नाहमात्मवित्त्वं तत्त्वविच्छृणुमो वयं स त्वं नो ब्रूहीत्येतद्वृत्तं पुरस्तादशक्यं मा पृच्छ प्रश्नमैक्ष्वाकान्यान्कामा- न्वृणीष्वेति शाकायन्यस्य चरणावभिमृश्यमानो राजेमां गाथां जगाद ॥ १ ॥ बृहद्रथ नामक राजा को यह अनुभव हुआ कि यह शरीर नाशवान् है। ऐसी अनुभूति होने पर उन्हें वैराग्य हो गया। इस कारण वह अपने बड़े पुत्र को राज्य देकर तपस्या करने वन को चले गये। वहाँ उस राजा ने उग्र तपश्चर्या की। वह सूर्य के समक्ष अपनी दृष्टि स्थिर करके तथा हाथ ऊपर करके खड़े रहे। एक सहस्र वर्ष पर्यन्त तपस्या के फल स्वरूप एक बार निर्धूम अग्नि के सदृश तेजस्वी शाकायन्य नामक आत्मवेत्ता महामुनि उनके समीप आये। उन्होंने राजा बृहद्रथ से कहा- 'उठो-उठो ! वर माँगो।' तदनन्तर ऐसा सुनकर एवं देखकर राजा ने उन्हें नमन करते हुए कहा- हे भगवन् ! मैं आत्मवेत्ता नहीं हूँ। आप तत्त्वज्ञाता हैं, ऐसा हमने सुना है। अतः आप मुझे 'तत्त्व' का उपदेश करने की कृपा करें। इस पर महामुनि शाकायन्य ने इस विषय को अति कठिन बताकर अन्य कोई वर माँगने के लिए कहा। ऐसा सुनकर बृहद्रथ राजा ने शाकायन्य मुनि के चरणों का स्पर्श करते हुए कहा ॥ १ ॥ अथ किमेतैर्वान्यानां शोषणं महार्णवानां शिखरिणां प्रपतनं ध्रुवस्य प्रचलनं स्थानं वा तरूणां निमज्जनं पृथिव्याः स्थानादपसरणं सुराणां सोऽहमित्येतद्विधेऽस्मिन्संसारे किं कामोपभोगैर्यैरेवाश्रितस्यासकृदुपावर्तनं दृश्यत इत्युद्धर्तुमर्हसीत्यन्धोदपानस्थो भेक इवाहमस्मिन्संसारे भगवंस्त्वं नो गतिरिति ॥२॥
२४६ मैत्रेय्युपनिषद् बड़े-बड़े समुद्र शुष्क पड़ जाते हैं, पर्वत शिखर टूट-फूट जाते हैं, ध्रुव भी अपने स्थान से चलायमान हो जाते हैं, वृक्ष गिर जाते हैं, पृथ्वी डूब जाती है, देव भी (सदैव स्वर्ग में) स्थित नहीं रह पाते, तो फिर ऐसे नाशवान् संसार के विषय-भोगों से क्या लाभ? विषयों में डूबे हुए प्राणियों को बार-बार जन्म-मरण के चक्र में भ्रमण करना पड़ता है। इसलिए हे मुनि प्रवर! अँधेरे कुएँ में मेंढक की भाँति पड़े हुए मेरा उद्धार करने में आप ही समर्थ हैं। हे भगवन्! इस संसार में मुझे शरण प्रदान करने वाले आप ही हैं॥२॥ भगवञ्छरीरमिदं मैथुनादेवोद्भूतं संविदपेतं निरय एव मूत्रद्वारेण निष्क्रान्तमस्थिभिश्रितं मांसेनानुलिप्तं चर्मणावबद्धं विण्मूत्रवातपित्तकफमज्जामेदोवसाभिरन्यैश्च मलैर्बहुभिः परिपूर्णमेतादृशे शरीरे वर्तमानस्य भगवंस्त्वं नो गतिरिति ॥ ३॥ हे भगवन् ! स्त्री-पुरुष जन्य यह शरीर यदि ज्ञान रहित हो, तो इसे नरक ही समझना चाहिए; क्योंकि यह मूत्र के द्वार से बाहर निःसृत हुआ है, अस्थियों के द्वारा निर्मित है, मांस द्वारा लेपन किया गया है, चमड़े के द्वारा मढ़ा गया है एवं विष्ठा-मूत्र-वात-पित-कफ-मज्जा-मेद (चर्बी) तथा अन्य कई तरह के मलों से भरा हुआ है। इस प्रकार के (बीभत्स) शरीर वाले मुझको शरण प्रदान करने में आप ही समर्थ हैं॥३॥ अथ भगवाञ्छाकायन्यः सुप्रीतोऽब्रवीद्राजानं महाराज बृहद्रथैक्ष्वाकुवंशध्वजशीर्षात्मज्ञः कृतकृत्यस्त्वं मरुन्नाम्नो विश्रुतोऽसीत्ययं खल्वात्मा ते कतमो भगवन्वर्ण्य इति तं होवाच ॥४॥ ऐसा कहे जाने पर भगवान् शाकायन्य मुनि ने अति प्रसन्न होकर राजा से कहा - 'हे महाराज बृहद्रथ ! तुम इक्ष्वाकु वंशीय श्रेष्ठ पुरुष हो, आत्मज्ञ हो, कृतकृत्य हो, मरुत् नाम से प्रख्यात हो, यही तुम्हारी आत्मा है।' तदनन्तर राजा बृहद्रथ ने कहा - 'हे भगवन् ! आत्मा (का स्वरूप) क्या है? इस आत्मतत्त्व का वर्णन करने की कृपा करें ? यह सुनकर मुनि ने कहा - ॥ ४॥ शब्दस्पर्शादयो येऽर्था अनर्था इव ते स्थिताः । येषां सक्तस्तु भूतात्मा न स्मरेच्च परं पदम् ॥५॥ शब्द, स्पर्शादि विषय अनर्थ उत्पन्न करने वाले हैं तथा उसमें आसक्त हुए जीवात्मा को परम (श्रेष्ठ) पद का स्वरूप स्मृति में नहीं आता ॥५॥ तपसा प्राप्यते सत्त्वं सत्त्वात्संप्राप्यते मनः। मनसा प्राप्यते ह्यात्मा ह्यात्मापत्त्या निवर्तते ॥६॥ तप के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती है, ज्ञान के वश में होने से मन वशीभूत होता है, मन वश में होने से आत्मा की प्राप्ति होती है और आत्मा के प्राप्त हो जाने पर इस नश्वर संसार से मुक्ति मिल जाती है॥ ६॥ यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति । तथा वृत्तिलयाच्चित्तं स्वयोनावुपशाम्यति ॥७॥ जैसे ईंधन (लकड़ी) के समाप्त हो जाने पर अग्नि स्वयमेव बुझ जाती है, वैसे ही वृत्तियों के नष्ट होने पर चित्त अपने कारण रूप आत्मा में शान्त रूप हो जाता है॥७॥ स्वयोनावुपशान्तस्य मनसः सत्यगामिनः । इन्द्रियार्थविमूढस्यानृताः कर्मवशानुगाः ॥८॥ अपने मूल कारण में शान्त एवं सत्य की ओर उन्मुख हुए मन को, इन्द्रियों के विषय-सम्बन्धी मूढ़ता (आसक्ति) के दूर होते ही, कर्मों के वशीभूत ये विषय झूठे (असत्य) मालूम होते हैं॥८॥ चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् । यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत्सनातनम् ॥९॥ चित्त ही संसार है, अतः प्रयत्नपूर्वक उस (चित्त) का शोधन करना चाहिए। जिस प्रकार का जिसका चित्त होगा, उसकी उसी प्रकार की गति होती है, यह एक गूढ़ सनातन सिद्धान्त है ॥९॥ चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमक्षयमश्नुते ॥१०॥
अध्याय १ मन्त्र १८ २४७
अध्याय १ मन्त्र १८ २४७ चित्त के शान्त होने पर शुभाशुभ कर्मों का शमन हो जाता है तथा शान्त बना मनुष्य, जब-जब आत्मा में लीन होता है, तब-तब उसे अक्षय एवं असीम आनन्द की प्राप्ति होती है ॥१०॥ समासक्तं यदा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरम्। यद्येवं ब्रह्मणि स्यात्तत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥११॥ मनुष्यों का चित्त जितना बाह्य विषय-भोगों में आसक्त रहता है, उतना यदि ब्रह्म में आसक्त हो जाए, तो फिर बन्धनों से कौन मुक्त न हो जाए ? (अर्थात् सभी मुक्त हो जाएँ) ॥११॥ हृत्पुण्डरीकमध्ये तु भावयेत्परमेश्वरम्। साक्षिणं बुद्धिवृत्तस्य परमप्रेमगोचरम् ॥१२॥ हृदय कमल के मध्य, बुद्धि के समस्त कर्मों के साक्षी रूप एवं परम-अनुपम प्रेम के विषयभूत परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ॥१२॥ अगोचरं मनोवाचामवधूताधिसंप्लवम्। सत्तामात्रप्रकाशैकप्रकाशं भावनातिगम् ॥१३॥ यह अविनाशी परमात्मा मन एवं वाणी से नहीं जाना जा सकता। यह आदि तथा अन्त से रहित है। यह एक मात्र सत् रूपी प्रकाश से सतत प्रकाशित होता है और कल्पनातीत है ॥१३॥ अहेयमनुपादेयमसामान्यविशेषणम्। ध्रुवं स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम्। निर्विकल्पं निराभासं निर्वाणमयसंविदम् ॥१४॥ उस परमात्म तत्त्व को स्वीकार करने एवं छोड़ने के लिए सामान्य भाव की अथवा विशेष भाव की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वह परमात्मा तो शान्त, स्थिर एवं गम्भीर है। वह प्रकाश युक्त भी नहीं है और अन्धकार रूप में फैला हुआ भी नहीं है; बल्कि संकल्परहित, आभासरहित एवं मुक्त-चैतन्य रूप है ॥१४॥ नित्यः शुद्धो बुद्धमुक्तस्वभावः सत्यः सूक्ष्मः संविभुश्चाद्वितीयः। आनन्दाब्धिर्यः परः सोऽहमस्मि प्रत्यग्धातुर्नात्र संशीतिरस्ति ॥१५॥ वह परमात्मा नित्य, शुद्ध, ज्ञान स्वरूप, मुक्त स्वभाव, सत्यरूप, सूक्ष्म, सर्वत्र व्यापक और अद्वितीय है। इस परमानन्द सागर एवं प्रत्येक स्वरूप का धारण करने वाला मैं ही हूँ, इसमें कोई संशय नहीं है ॥१५॥ आनन्दमन्तर्निजमाश्रयं तमाशापिशाचीमवमानयन्तम्। आलोकयन्तं जगदिन्द्रजालमापत्कथं मां प्रविशेदसङ्गम् ॥१६॥ अन्तःकरण में प्राप्त होने वाले आनन्द के आश्रित रहने वाली आशारूपी पिशाचिनी को दूर धकेलने वाले, सम्पूर्ण जगत् को मदारी के खेल की भाँति देखने वाले एवं असंग (आसक्ति रहित) रहने वाले (ऐसे) मेरे अन्तःकरण में दुःखों का प्रवेश कहाँ से हो सकता है ? ॥१६॥ वर्णाश्रमाचारयुता विमूढाः कर्मानुसारेण फलं लभन्ते। वर्णादिधर्मं हि परित्यजन्तः स्वानन्दतृप्ताः पुरुषा भवन्ति ॥१७॥ वर्ण एवं आश्रम धर्म का पालन करने वाले अज्ञानी जन ही अपने कर्मों का फल भोगते हैं; लेकिन वर्ण आदि के धर्मों को त्यागकर आत्मा में ही स्थिर रहने वाले मनुष्य अन्तः के आनन्द से ही पूर्ण सन्तुष्ट रहते हैं ॥ वर्णाश्रमं सावयवं स्वरूपमाद्यन्तयुक्तं ह्यतिकृच्छ्रमात्रम्। पुत्रादिदेहेष्वभिमानशून्यं भूत्वा वसेत्सौख्यतमे ह्यनन्त इति ॥१८॥ वर्ण एवं आश्रम के धर्म तथा वैसे ही अंग-अवयवों से युक्त यह शरीर-ये सभी आदि-अन्त वाले होने के कारण अत्यन्त कष्टप्रद ही हैं। अतः पुत्र आदि के शरीरों पर मोह न रखते हुए परमानन्द रूप अनन्त में प्रतिष्ठित रहना चाहिए ॥१८॥
२४८ मैत्रेय्युपनिषद्
॥ द्वितीयोऽध्यायः ॥
अथ भगवान्मैत्रेयः कैलासं जगाम तं गत्वोवाच भो भगवन्परमतत्त्वरहस्यमनुब्रूहीति। स होवाच महादेवः। देहो देवालयः प्रोक्तः स जीवः केवलःशिवः। त्यजेदज्ञाननिर्माल्यं सोऽहं- भावेन पूजयेत् ॥ १ ॥ एक बार भगवान् मैत्रेय कैलास पर्वत पर गये। वहाँ जाकर महादेव जी से उन्होंने कहा—'हे भगवन्! मुझे परम तत्त्व का रहस्य बताने की कृपा करें।' महादेव जी ने कहा— 'शरीर देवालय है तथा उसमें रहने वाला जीव ही केवल शिव-परमात्मा है।' अतः अज्ञान रूप निर्माल्य को (पुरानी (बासी) माला की तरह से) छोड़ देना चाहिए तथा परमात्मा मैं ही हूँ, ऐसा समझकर ही उसकी पूजा करनी चाहिए ॥ १ ॥ अभेददर्शनं ज्ञानं ध्यानं निर्विषयं मनः। स्नानं मनोमलत्यागः शौचमिन्द्रियनिग्रहः ॥२॥ जीव तथा ब्रह्म एक है, ऐसा मानना ही ज्ञान है और मन को विषयों से अलग रखना ही ध्यान है, मन के मैल को छुड़ाना ही स्नान तथा इन्द्रियों को वश में रखना ही पवित्रता है ॥ २ ॥ ब्रह्मामृतं पिबेद्भैक्षमाचरेद्देहरक्षणे। वसेदेकान्तिको भूत्वा चैकान्ते द्वैतवर्जिते। इत्येवमाचरेद्धीमान्स एवं मुक्तिमाप्नुयात् ॥ ३ ॥ ब्रह्मरूपी अमृत का पान करना, शरीर रक्षा के उद्देश्य से ही भिक्षा माँगना, स्वयं अकेला रहकर एकान्त में निवास करना, इस प्रकार से जीवनयापन करता हुआ ज्ञानवान् मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है ॥ ३ ॥ जातं मृतमिदं देहं मातापितृमलात्मकम्। सुखदुःखालयामेध्यं स्पृष्ट्वा स्नानं विधीयते ॥ ४ ॥ माता-पिता के मलरूप (शुक्रशोणित) से उत्पन्न, जन्म-मृत्यु वाले, सुख-दुःख के भण्डार-रूप एवं अपवित्र इस शरीर को स्पर्श करने के पश्चात् स्नान किया जाता है ॥ ४ ॥ धातुबद्धं महारोगं पापमन्दिरमध्रुवम्। विकाराकारविस्तीर्णं स्पृष्ट्वा स्नानं विधीयते ॥ ५ ॥ सात धातुओं मे निर्मित, महारोग से युक्त, पाप के घर की भाँति, सतत चलायमान (अस्थिर), विकारों से भरे हुए इस शरीर को स्पर्श करने के उपरान्त स्नान अवश्य करना चाहिए ॥ ५ ॥ नवद्वारमलस्रावं सदा काले स्वभावजम्। दुर्गन्धं दुर्मलोपेतं स्पृष्ट्वा स्नानं विधीयते ॥ ६ ॥ आँख, कान आदि नौ द्वारों से युक्त इस शरीर से सदा स्वाभाविक रीति से हर समय मल-स्रवित होता (निकलता) रहता है तथा इस मल की दुर्गन्ध से यह शरीर हमेशा परिपूर्ण रहता है, ऐसे इस दुर्गन्धयुक्त, मलिन शरीर का स्पर्श करने के बाद स्नान अवश्य करना चाहिए ॥ ६ ॥ मातृसूतकसंबंधं सूतके सह जायते। मृतसूतकजं देहं स्पृष्ट्वा स्नानं विधीयते ॥ ७ ॥ माता के सूतक से सम्बन्धित होने से मनुष्य के साथ ही सूतक भी जन्म ले लेता है तथा मरण काल का सूतक भी इस देह के साथ ही लगा रहता है। अतः शरीर का स्पर्श होने पर स्नान अवश्य करना चाहिए ॥ ७ ॥ अहम्ममेति विण्मूत्रलेपगन्धादिमोचनम्। शुद्धशौचमिति प्रोक्तं मृज्जलाभ्यां तु लौकिकम् ॥ ८ मल, मूत्रादि दुर्गन्धयुक्त शरीर की शुद्धि तो मिट्टी एवं जल आदि से होती है; लेकिन वह सब तो लौकिक शुद्धि है। वास्तविक पवित्रता तो 'मैं और मेरा' का परित्याग करने से ही होती है ॥ ८ ॥ चित्तशुद्धिकरं शौचं वासनात्रयनाशनम्। ज्ञानवैराग्यमृत्तोयैः क्षालनाच्छौचमुच्यते ॥ ९ ॥ पवित्रता चित्त का शोधन करती है और वासनाओं को नष्ट करती है; परन्तु ज्ञानरूपी मिट्टी और वैराग्य रूपी जल से प्रक्षालन के द्वारा जो पवित्रता होती है, वही वास्तविक पवित्रता है ॥ ९ ॥
अध्याय २ मन्त्र २१ २४९
अध्याय २ मन्त्र २१ २४९ अद्वैतभावना भैक्षमभक्ष्यं द्वैतभावनम्। गुरुशास्त्रोक्तभावेन भिक्षोर्भैक्षं विधीयते ॥१०॥ अद्वैत की भावना ही वास्तव में सच्ची भिक्षावृत्ति है एवं द्वैत की भावना ही अभक्ष्य वस्तु है। भिक्षुक को गुरु तथा शास्त्र के आदेशानुसार भिक्षा माँगनी चाहिए॥ १०॥ विद्वान्स्वदेशमुत्सृज्य संन्यासानन्तरं स्वतः। कारागारविनिर्मुक्तचोरवद्दूरतो वसेत् ॥११॥ जिस तरह से चोर कैदखाने से छूटकर दूर जाकर निवास करता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष को संन्यास ग्रहण कर अपने देश से दूर निवास के लिए चले जाना चाहिए॥ ११॥ अहंकारसुतं वित्तभ्रातरं मोहमन्दिरम्। आशापत्नीं त्यजेद्यावत्तावान्मुक्तो न संशयः ॥१२॥ अहंकार रूपी पुत्र का, वित्त (धन) रूपी भाई का, मोहरूपी घर का तथा आशा रूपी पत्नी का परित्याग कर देने वाला शीघ्र ही मुक्त हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥ १२॥ मृता मोहमयी माता जातो बोधमयः सुतः। सूतकद्वयसंप्राप्तौ कथं संध्यामुपास्महे ॥१३॥ मोहरूपी माँ मृत्यु को प्राप्त हो गयी और ज्ञानरूपी पुत्र उत्पन्न हो गया है, इस कारण मरण और जन्म के दो सूतक लगे हुए हैं, तो फिर सन्ध्या-वन्दन आदि कार्य किस प्रकार किये जा सकते हैं?॥ १३॥ हृदाकाशे चिदादित्यः सदा भासति भासति। नास्तमेति न चोदेति कथं संध्यामुपास्महे ॥१४॥ हृदयरूपी आकाश में चैतन्य रूप सूर्य सदैव प्रकाशित रहता है और फिर वह न अस्त होता है न उदय ही। तब फिर सन्ध्या किस प्रकार (कब) करे?॥ १४॥ एकमेवाद्वितीयं यद्गुरोर्वाक्येन निश्चितम्। एतदेकान्तमित्युक्तं न मठो न वनान्तरम् ॥१५॥ यहाँ पर सभी कुछ एक ही है, दूसरा कुछ भी नहीं है, ऐसा गुरु के उपदेश द्वारा निश्चय हो गया है। यह भावना ही एकान्त स्वरूप है, मठ अथवा वन का मध्य भाग एकान्त नहीं है॥ १५॥ असंशयवतां मुक्तिः संशयाविष्टचेतसाम्। न मुक्तिर्जन्मजन्मान्ते तस्माद्विश्वासमाप्नुयात्। ॥१६॥ जो मनुष्य संशयरहित हैं,वे ही मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं तथा जिन लोगों को संशय है,वे अनेक जन्मों के अन्त में भी मुक्त नहीं हो सकते। इसलिए गुरु एवं शास्त्र के वचनों पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए॥ कर्मत्यागान्न संन्यासो न प्रैषोच्चारणेन तु। संधौ जीवात्मनोरैक्यं संन्यासः परिकीर्तितः ॥१७॥ कर्मों को छोड़ देना ही संन्यास नहीं है। इसी प्रकार 'मैं संन्यासी हूँ' ऐसा कह देने से भी कोई संन्यासी नहीं हो सकता। समाधि अवस्था में जीव-परमात्मा की एकता का भान होना ही संन्यास कहा जाता है॥ १७॥ वमनाहारवद्यस्य भाति सर्वेषणादिषु। तस्याधिकारः संन्यासे त्यक्तदेहाभिमानिनः ॥१८॥ जिस मनुष्य को समस्त एषणाएँ-इच्छायें वमन किये हुए (उगले हुए) आहार के समान लगती हैं और जिसने शरीर की ममता त्याग दी है, उसको संन्यास का अधिकार है॥ १८॥ यदा मनसि वैराग्यं जातं सर्वेषु वस्तुषु। तदैव संन्यसेद्विद्वानन्यथा पतितो भवेत् ॥१९॥ जब सभी वस्तुओं से मन में वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तभी विद्वान् मनुष्य को संन्यास-धर्म ग्रहण करना चाहिए, अन्यथा उसका अवश्य ही पतन हो जाता है॥ १९॥ द्रव्यार्थमन्नवस्त्रार्थं यः प्रतिष्ठार्थमेव वा। संन्यसेदुभयभ्रष्टः स मुक्तिं नाप्तुमर्हति ॥२०॥ जो मनुष्य द्रव्य (धन) के, अन्न के, वस्त्रों के अथवा ख्याति के लोभ में संन्यास-धर्म ग्रहण कर लेता है, वह दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ, कभी भी मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता॥ २०॥ उत्तमा तत्त्वचिन्तैव मध्यमं शास्त्रचिन्तनम्। अधमा मन्त्रचिन्ता च तीर्थभ्रान्त्यधमाधमा ॥२१॥
२५० मन्त्र्युपनिषद् तत्त्व का चिन्तन ही उत्तम (श्रेष्ठ) है, शास्त्र का चिन्तन मध्यम है, मन्त्रों का चिन्तन (साधना) अधम है और तीर्थों में भ्रमण करना अधम से भी अधम है ॥ २१ ॥ अनुभूतिं विना मूढो वृथा ब्रह्मणि मोदते । प्रतिबिम्बितशाखाग्रफलास्वादनमोदवत् ॥ २२ ॥ जिस प्रकार कोई भी मनुष्य शाखा के अग्र भाग में प्रतिबिम्ब के रूप में दिखाई देने वाले फल का रसास्वादन कर आनन्द प्राप्त करना चाहे, उसी प्रकार वास्तविक अनुभव के बिना अज्ञानी मनुष्य ब्रह्म का आनन्द पाने की व्यर्थ कल्पना करता है ॥ २२ ॥ न त्यजेच्चेद्यतिर्मुक्तो यो माधूकरमान्तरम् । वैराग्यजनकं श्रद्धाकलत्रं ज्ञाननन्दनम् ॥ २३ ॥ जो संन्यासी मुक्त हो चुका है, वह वैराग्य रूपी पिता को, श्रद्धा रूपी पत्नी को और ज्ञान रूपी पुत्र को न छोड़ते हुए अन्तःकरण में स्थित अद्वैतभावना का आनन्दमय रूप में चिन्तन करे ॥ २३ ॥ धनवृद्धा वयोवृद्धा विद्यावृद्धास्तथैव च । ते सर्वे ज्ञानवृद्धस्य किंकराः शिष्यकिंकराः ॥ २४ जो (मनुष्य) धन में बड़ा है, जो आयु में बड़ा है अथवा जो विद्या में बड़ा है, वे सब अनुभव में बड़े के समक्ष नौकर अथवा शिष्य की भाँति ही हैं ॥ २४ ॥ यन्मायया मोहितचेतसो मामात्मानमापूर्णमलब्धवन्तः । परं विदग्धोदरपूरणाय भ्रमन्ति काका इव सूरयोऽपि ॥ २५ ॥ जो माया के प्रभाव से मूढ़ चित्त वाले होकर के 'मैं' रूपी आत्मा को सम्यक् रूप से नहीं जानते, वे यदि बुद्धिमान् भी हों, तो कौए की भाँति अभागे पेट को भरने के लिए जहाँ-तहाँ मारे-मारे फिरते हैं ॥ २५ ॥ पाषाणलोहमणिमृण्मयविग्रहेषु पूजा पुनर्जननभोगकरी मुमुक्षोः । तस्माद्यतिः स्वहृदयार्चनमेव कुर्याद्वाह्यार्चनं परिहरेदपुनर्भवाय ॥ २६ ॥ प्रस्तर खण्ड, स्वर्ण अथवा मिट्टी द्वारा निर्मित मूर्तियों की पूजा, मोक्ष की इच्छा वाले को पुनः जन्म एवं भोग प्राप्त कराने वाली होती है। इस कारण पुनः जन्म न ग्रहण करना पड़े, इस उद्देश्य से संन्यासी को इस प्रकार बाह्य जगत् की पूजा का परित्याग करके हृदय में ही (आत्मा की) पूजा करनी चाहिए ॥ २६ ॥ अन्तःपूर्णो बहिःपूर्णः पूर्णकुम्भ इवार्णवे । अन्तःशून्यो बहिःशून्यः शून्यकुम्भ इवाम्बरे ॥ २७ ॥ समुद्र में रखा हुआ घड़ा अन्दर और बाहर जल से पूर्ण है तथा बाहर शून्य में स्थित घड़ा अन्दर और बाहर खाली ही है ॥ २७ ॥ मा भव ग्राह्यभावात्मा ग्राहकात्मा च मा भव । भावनामखिलां त्यक्त्वा यच्छिष्टं तन्मयो भव ॥ २८ आप ग्रहण करने वाले न बनें। इसी तरह से ग्रहण करने योग्य विषयरूप भी न बनें। इस प्रकार की सभी कल्पनाओं का त्याग करके शेष जो कुछ भी रहे, उसी में तन्मय रहें ॥ २८ ॥ द्रष्टदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह । दर्शनप्रथमाभासमात्मानं केवलं भज ॥ २९ ॥ द्रष्टा, दृश्य एवं दर्शन को वासना के साथ ही त्याग करके, जिसमें से दर्शन का सर्वप्रथम आभास होता है, उस आत्मा का ही तुम भजन करो ॥ २९ ॥ संशान्तसर्वसंकल्पा या शिलावदवस्थितिः । जाग्रन्निद्राविनिर्मुक्ता सा स्वरूपस्थितिः परा ॥ ३० सभी संकल्प जिसमें शान्त हो गये हैं, जागृति तथा निद्रा जिससे परे हो गयी है, ऐसी जो प्रस्तर खण्ड की भाँति (दृढ़ एवं निश्चेष्ट) अवस्था है, वही चरम स्वरूप की अवस्था है ॥ ३० ॥
अध्याय ३ मन्त्र ९ २५१
अध्याय ३ मन्त्र ९ २५१
॥ तृतीयोऽध्यायः ॥ अहमस्मि परश्चास्मि ब्रह्मास्मि प्रभवोऽस्म्यहम्। सर्वलोकगुरुश्चास्मि सर्वलोकेऽस्मि सोऽस्म्यहम् ॥ १ ॥ (अन्तः स्थित ब्रह्म) मैं हूँ और (बाह्य स्थित) पर (ब्रह्म) भी मैं ही हूँ, मैं ब्रह्म हूँ, उत्पत्ति हूँ, समस्त लोकों का गुरु हूँ और सभी लोकों में जो भी कुछ है, वह मैं ही हूँ ॥ १ ॥ अहमेवास्मि सिद्धोऽस्मि शुद्धोऽस्मि परमोऽस्म्यहम्। अहमस्मि सदासोऽस्मि नित्योऽस्मि विमलोऽस्म्यहम् ॥ २ ॥ मैं ही सिद्ध हूँ, मैं ही शुद्ध हूँ तथा परम तत्त्व भी मैं ही हूँ। मैं सदैव (विद्यमान रहता) हूँ, मैं नित्य हूँ एवं मलरहित भी मैं ही हूँ ॥ २ ॥ विज्ञानोऽस्मि विशेषोऽस्मि सोमोऽस्मि सकलोऽस्म्यहम्। शुभोऽस्मि शोकहीनोऽस्मि चैतन्योऽस्मि समोऽस्म्यहम् ॥ ३ ॥ मैं विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न हूँ, मैं विशेष हूँ, सोम मैं हूँ, सभी कुछ मैं ही हूँ। मैं शुभ हूँ, शोकरहित हूँ, सम हूँ तथा चैतन्य भी मैं ही हूँ ॥ ३ ॥ मानावमानहीनोऽस्मि निर्गुणोऽस्मि शिवोऽस्म्यहम्। द्वैताद्वैतविहीनोऽस्मि द्वन्द्वहीनोऽस्मि सोऽस्म्यहम् ॥ ४ ॥ मैं मान एवं अपमान से रहित हूँ, निर्गुण (गुणरहित) हूँ, मैं ही शिव हूँ, द्वैत एवं अद्वैत के भाव से रहित हूँ, सुख तथा दुःख आदि द्वन्द्वों से रहित हूँ तथा वह (ब्रह्म) मैं ही हूँ ॥ ४ ॥ भावाभावविहीनोऽस्मि भासाहीनोऽस्मि भास्म्यहम्। शून्याशून्यप्रभावोऽस्मि शोभनाशोभनोऽस्म्यहम् ॥ ५ ॥ भाव-अभाव अर्थात् उत्पत्ति और विनाश से परे हूँ। भासा (प्रकाश) से अलग हूँ, किन्तु प्रकाश भी मैं ही हूँ। मैं शून्य और अशून्य रूप हूँ तथा मैं ही सुन्दर और असुन्दर भी हूँ ॥ ५ ॥ तुल्यातुल्यविहीनोऽस्मि नित्यः शुद्धः सदाशिवः। सर्वासर्वविहीनोऽस्मि सात्त्विकोऽस्मि सदास्म्यहम् ॥ ६ ॥ तुल्य-अतुल्य अर्थात् समता एवं विषमता से रहित हूँ, नित्य हूँ, शुद्ध हूँ एवं सदाशिव हूँ। मैं सर्व- असर्व की कल्पना से रहित हूँ, सात्त्विक हूँ और मैं सदैव (विद्यमान रहने वाला) हूँ ॥ ६ ॥ एकसंख्याविहीनोऽस्मि द्विसंख्यावानहं न च। सदसद्भेदहीनोऽस्मि संकल्परहितोऽस्म्यहम् ॥ ७ मैं एक संख्या विहीन (अद्वैतरहित) और दो संख्या रहित (द्वैतरहित) हूँ, सत् और असत् के भेद से रहित हूँ तथा मैं संकल्प से रहित हूँ ॥ ७ ॥ नानात्मभेदहीनोऽस्मि ह्यखण्डानन्दविग्रहः। नाहमस्मि न चान्योऽस्मि देहादिरहितोऽस्म्यहम् ॥ ८ मैं विविधता से रहित तथा अखण्ड आनन्द स्वरूप हूँ। न मैं (अहं रूप) हूँ और अन्य भी नहीं हूँ। मैं शरीरादि से रहित हूँ ॥ ८ ॥ आश्रयाश्रयहीनोऽस्मि आधाररहितोऽस्म्यहम्। बन्धमोक्षादिहीनोऽस्मि शुद्धब्रह्मास्मि सोऽस्म्यहम् ॥ ९ ॥
२५२ मैत्रेय्युपनिषद्
मैं आश्रय-निराश्रय से रहित हूँ, मैं आधार रहित हूँ, बन्ध एवं मोक्ष से भी रहित हूँ तथा मैं ही शुद्ध ब्रह्म स्वरूप हूँ॥ ९॥ चित्तादिसर्वहीनोऽस्मि परमोऽस्मि परात्परः। सदा विचाररूपोऽस्मि निर्विचारोऽस्मि सोऽस्म्यहम् ॥१०॥ मैं चित्त आदि सभी से रहित हूँ, मैं परात्पर (ब्रह्म) हूँ। मैं सर्वदा विचार रूप हूँ, साथ ही विचार से परे भी हूँ॥ १०॥ अकारोकाररूपोऽस्मि मकारोऽस्मि सनातनः। ध्यातृध्यानविहीनोऽस्मि ध्येयहीनोऽस्मि सोऽस्म्यहम्॥ ११॥ 'अकार', 'उकार' एवं 'मकार' रूप सनातन मैं ही हूँ। मैं ध्याता, ध्यान एवं ध्येय से परे भी हूँ॥ ११॥ सर्वत्रपूर्णरूपोऽस्मि सच्चिदानन्दलक्षणः। सर्वतीर्थस्वरूपोऽस्मि परमात्मास्म्यहं शिवः ॥ १२॥ मैं सर्वत्र पूर्णरूप हूँ, सच्चिदानन्द के लक्षणों से युक्त हूँ। सम्पूर्ण तीर्थों का स्वरूप भी मैं हूँ और परमात्म स्वरूप कल्याणकारी भगवान् शिव भी मैं ही हूँ॥ १२॥ लक्ष्यालक्ष्यविहीनोऽस्मि लयहीनरसोऽस्म्यहम्। मातृमानविहीनोऽस्मि मेयहीनः शिवोऽस्म्यहम्॥ मैं लक्ष्य एवं अलक्ष्य से विहीन हूँ तथा लय न होने वाला रस स्वरूप हूँ। मैं ही प्रमाण, प्रमेय और प्रमाता से रहित तथा मैं ही शिव स्वरूप हूँ॥ १३॥ न जगत्सर्वद्रष्टास्मि नेत्रादिरहितोऽस्म्यहम्। प्रवृद्धोऽस्मि प्रबुद्धोस्मि प्रसन्नोऽस्मि हरोऽस्म्यहम्॥१४ मैं इस संसार का सर्वद्रष्टा नहीं हूँ। मैं आँख आदि समस्त इन्द्रियों से रहित हूँ। मैं ही वृद्धि को प्राप्त करता हुआ, ज्ञानवान्, प्रसन्न एवं हर (पापों को हरने वाला) हूँ॥ १४॥ सर्वेन्द्रियविहीनोऽस्मि सर्वकर्मकृदप्यहम्। सर्ववेदान्ततृप्तोऽस्मि सर्वदा सुलभोऽस्म्यहम्॥ १५॥ मैं सभी इन्द्रियों से रहित हूँ, तब भी समस्त कर्म करने वाला मैं स्वयं ही हूँ। समस्त वेदान्त द्वारा सर्वदा तृप्त एवं सर्व सुलभ मैं ही हूँ॥ १५॥ मुदितामुदिताख्योऽस्मि सर्वमौनफलोऽस्म्यहम्। नित्यचिन्मात्ररूपोऽस्मि सदा सच्चिन्मयोऽस्म्यहम्॥ १६॥ मैं आनन्द एवं शोक रूप हूँ, सर्वदा मौन रहने का फल रूप हूँ। नित्य चिद् रूप हूँ तथा मैं ही सच्चिद् रूप भी हूँ॥ १६॥ यत्किंचिदपि हीनोऽस्मि स्वल्पमप्यति नास्म्यहम्। हृदयग्रन्थिहीनोऽस्मि हृदयाम्बुजमध्यगः ॥१७ जो कुछ भी है, मैं उससे रहित हूँ, मैं अति अल्प और अत्यधिक भी नहीं हूँ। (मैं) हृदय की ग्रन्थि से रहित हूँ तथा हृदय कमल के मध्य में रहने वाला भी हूँ॥ १७॥ षड्विकारविहीनोऽस्मि षट्कोशरहितोऽस्म्यहम्। अरिषड्वर्गमुक्तोऽस्मि अन्तरादन्तरोऽस्म्यहम्॥ १८॥ मैं (जन्म, अस्तित्व, विपरिणमन, विकास, अपक्षय और विनाश) छः विकारों से रहित, चर्म आदि छः कोशों (चर्म, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद और मज्जा) से रहित तथा काम, क्रोधादि षड् रिपुओं से हीन हूँ और नितान्त अन्तः स्थान में रहने वाला हूँ॥ १८॥
अध्याय ३ मन्त्र २५ २५३
अध्याय ३ मन्त्र २५ २५३ देशकालविमुक्तोऽस्मि दिगम्बरसुखोऽस्म्यहम्। नास्ति नास्ति विमुक्तोऽस्मि नकाररहितोऽस्म्यहम्॥ १९ ॥ मैं देश और काल से रहित हूँ, दिगम्बर एवं आनन्द स्वरूप हूँ। यह नहीं है, यह नहीं है-इससे मैं मुक्त हूँ अर्थात् मैं अभावशून्य हूँ तथा 'नकार' से रहित भी मैं ही हूँ॥ १९ ॥ अखण्डाकाशरूपोऽस्मि ह्यखण्डाकारमस्म्यहम्। प्रपञ्चमुक्तचित्तोस्मि प्रपञ्चरहितोऽस्म्यहम्॥ २० ॥ मैं अखण्ड आकाश स्वरूप हूँ, अखण्डाकार भी मैं ही हूँ, मैं सांसारिक प्रपञ्चों से परे चित्त वाला हूँ तथा संसार प्रपञ्चादि से रहित हूँ॥ २० ॥ सर्वप्रकाशरूपोऽस्मि चिन्मात्रज्योतिरस्र्यहम्। कालत्रयविमुक्तोऽस्मि कामादिरहितोऽस्म्यहम्॥ २१ ॥ मैं सर्वप्रकाश स्वरूप हूँ तथा चैतन्य रूपी ज्योति भी मैं ही हूँ। तीनों कालों से परे अर्थात् मुक्त हूँ एवं मैं काम-क्रोधादि से रहित हूँ॥ २१ ॥ कायिकादिविमुक्तोऽस्मि निर्गुणः केवलोऽस्म्यहम्। मुक्तिहीनोऽस्मि मुक्तोऽस्मि मोक्षहीनोऽस्म्यहं सदा ॥ २२ ॥ मैं देह-अदेह (शरीर-अशरीर) से मुक्त हूँ, निर्गुण हूँ तथा मैं केवल एक हूँ। मुक्ति रहित होते हुए भी मुक्त हूँ तथा मैं सदैव मोक्षरहित हूँ॥ २२ ॥ सत्यासत्यादिहीनोऽस्मि सन्मात्रान्नास्म्यहं सदा। गन्तव्यदेशहीनोऽस्मि गमनादिविवर्जितः ॥ २३ ॥ (मैं) सत्य-असत्य से रहित हूँ, केवल मैं ही सत्य स्वरूप से (भिन्न) सभी कालों में नहीं हूँ। मैं गमनागमन से रहित हूँ अर्थात् मुझे कहीं जाना अथवा न जाना नहीं है एवं मेरा गन्तव्य (जाने का स्थान) भी नहीं है॥ २३ ॥ सर्वदा समरूपोऽस्मि शान्तोऽस्मि पुरुषोत्तमः। एवं स्वानुभवो यस्य सोऽहमस्मि न संशयः ॥ २४ ॥ (मैं) सर्वदा समरूप एवं शान्त परमात्मा (पुरुषोत्तम) हूँ। जिसका इस प्रकार से स्वानुभव है, वह (ब्रह्म) निश्चित ही मैं हूँ। इसमें किसी भी तरह का संशय नहीं है॥ २४ ॥ यः शृणोति सकृद्वापि ब्रह्मैव भवति स्वयमित्युपनिषत् ॥२५ ॥ जो (मनुष्य) एक बार भी इस (मैत्रेयी) उपनिषद् का श्रवण करता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। ऐसी ही यह उपनिषद् है॥ २५ ॥ ॐ आप्यायन्तु .....................इति शान्तिः ॥ ॥ इति मैत्रेय्युपनिषत्समाप्ता ॥
॥ याज्ञवल्क्यापनिषद् ॥ यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें राजा जनक और याज्ञवल्क्य का संवाद वर्णित है, जिसमें संन्यास धर्म की विस्तृत विवेचना हुई है। संन्यास धर्म की जिज्ञासा रखने वाले राजा जनक से याज्ञवल्क्य जी ने कहा कि ब्रह्मचारी के बाद गृहस्थ, गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ तथा वानप्रस्थ के बाद संन्यास का क्रम है; किन्तु भावप्रवणता की स्थिति में-वैराग्य भाव की प्रचुरता की स्थिति में कभी भी संन्यास लिया जा सकता है। संन्यास ग्रहण करने वाले को शिखा, यज्ञोपवीत आदि के त्याग का विधान है। यज्ञोपवीत के बिना ब्राह्मण कैसे कहा जाएगा ? इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य जी ने कहा कि ॐकार ही संन्यासी का यज्ञोपवीत होता है। आगे क्रमशः संन्यासी के गुणों, आचार-विचार आदि की विस्तृत चर्चा है। साथ ही संन्यासी को उसके पथ से विचलित करने वाली स्त्री के दोषों का बीभत्स चित्रण भी किया गया है। सन्तान भी दुःखदायी ही है-यह कहते हुए संन्यासी को लोभ, मोह, काम-क्रोध से बचने का निर्देश है। अन्त में संन्यासी को जितेन्द्रिय बने रहने की सलाह देते हुए उसे अपने एक मात्र लक्ष्य 'परब्रह्म' के चिन्तन-मनन करने का निर्देश है, क्योंकि इसी से उसे मोक्ष की प्राप्ति होना सम्भव है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः ........... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद्) अथ जनको ह वैदेहो याज्ञवल्क्यमुपसमेत्योवाच भगवन्संन्यासमनुब्रूहीति। स होवाच याज्ञवल्क्यो ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा। अथ पुनर्व्रती वाऽव्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वा उत्सन्नाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ॥ १ ॥ एक समय विदेहराज जनक महर्षि याज्ञवल्क्य जी के समक्ष जाकर बोले- "हे भगवन्! आप कृपा करके हमें संन्यास-धर्म समझाने का कष्ट करें।" तब याज्ञवल्क्य जी ने कहा-हे राजन्! ब्रह्मचर्याश्रम की विधि-विधान से पूर्ण करके, गृहस्थ आश्रम को ग्रहण करना चाहिए। गृहस्थ धर्म में पुत्र-कलत्रादि का सुख भोगकर वन में निवास करे। वानप्रस्थ आश्रम के बाद संन्यास आश्रम को धारण कर लेना चाहिए। यदि जितेन्द्रिय हो जाये, तो ब्रह्मचर्याश्रम से ही संन्यास ले ले या फिर अपनी इच्छानुसार गृहस्थ आश्रम के पश्चात् ले लेना चाहिए। वस्तुतः वानप्रस्थ के पश्चात् या फिर जिस दिन संसार से सर्वथा वैराग्य हो जाए, उसी दिन संन्यास ले लेना चाहिए। चाहे व्रती हो या नहीं, स्नातक हो अथवा न हो, अग्नि की सेवा कर चुका हो अथवा नहीं, जिस क्षण वैराग्य उत्पन्न हो जाए, उसी क्षण संन्यास ले लेना चाहिए॥ १॥ तदेके प्राजापत्यामेवेष्टिं कुर्वन्ति। अथवा न कुर्यादाग्नेय्यामेव कुर्यात्। अग्निर्हि प्राणः। प्राणमेवैतया करोति। त्रैधातवीयामेव कुर्यात्। एतयैव त्रयो धातवो यदुत सत्त्वं रजस्तम इति। अयं ते योनिर्ऋत्विजो यतो जातो अरोचथाः। तं जानन्नग्र आरोहाथा नो वर्धया रयिमित्यनेन मन्त्रेणाग्निमाजिघ्रेत्। एष वा अग्नेर्योनिर्यः प्राणं गच्छ स्वां योनिं गच्छ स्वाहेत्येवमेवैतदाह ॥ इसके पश्चात् कुछ लोग प्राजापत्य यज्ञ करते हैं। या फिर इस यज्ञ को न कर आग्नेय यज्ञ ही कर ले, क्योंकि अग्नि ही प्राण है। इस यज्ञ द्वारा प्राण का ही पोषण होता है या सत, रज, तम त्रिधातुओं से सम्बन्धित यजन करे। तब इस मंत्र से अग्नि का आघ्राण करे-'हे अग्निदेव! जिस मूल कारण से आप प्रादुर्भूत होकर प्रकाशित हो रहे हैं, उसको जानते हुए आप खूब प्रज्वलित हों एवं हमारे ऐश्वर्य को बढ़ाएँ।' यही अग्नि का
२५५ याज्ञवल्क्योपनिषद् मूल कारण है-यही प्राण है। अतः हे अग्निदेव ! आप अपने योनि रूप प्राण में प्रतिष्ठित हो जाएँ ॥ २ ॥ ग्रामादग्निमाहृत्य पूर्ववदग्निमाजिघ्रेत् । यदग्निं न विन्देदप्सु जुहुयादापो वै सर्वा देवताः सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नीयात् साज्यं हविरनामयम्। मोक्षमन्त्रैस्त्रय्येवं वेद तद्ब्रह्म तदुपासितव्यम् । शिखां यज्ञोपवीतं छित्त्वा संन्यस्तं मयेति त्रिवारमुच्चरेत् । एवमेवैतद्भगवन्निति वै याज्ञवल्क्यः ॥ ३ ॥ ग्राम (गाँव) से अग्नि को लाकर पूर्व को भाँति ही उसका आघ्राण करे। यदि अग्नि न मिल सके,तो जल में ही यजन कृत्य सम्पन्न करे; क्योंकि जल को सर्वदेवमय कहा गया है। मैं सभी देवों के प्रति हवन करता हूँ,'स्वाहा 'यह आहुति उन्हें प्राप्त हो। इस प्रकार हवन करके उसका प्राशन करे अर्थात् उसे खा ले। यह रोगनाशक घृतयुक्त हवि है। मोक्ष मंत्रों के द्वारा इस तरह से वेदत्रयी की प्राप्ति करे। वह ही ब्रह्म है,उसकी उपासना करनी चाहिए। चोटी एवं यज्ञोपवीत का परित्याग करके 'मैने संन्यास ग्रहण कर लिया है, ' इस प्रकार से इसका तीन बार उच्चारण करे। हे विदेहराज जनक जी! यह विधि ऐसी ही है, ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा ॥३ ॥ अथ हैनमंत्रिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्यं अयज्ञोपवीती कथं ब्राह्मण इति । स होवाच याज्ञवल्क्य इदं प्रणवमेवास्य तद्यज्ञोपवीतं य आत्मा । प्राश्याचम्यायं विधिः ॥ ४ ॥ इसके पश्चात् याज्ञवल्क्य जी से अत्रि ऋषि ने पूछा- 'हे महर्षे ! यज्ञोपवीत के बिना कोई ब्राह्मण कैसे रह सकता है ? याज्ञवल्क्य ऋषि ने कहा कि यह ॐकार ही उस संन्यासी का यज्ञोपवीत है, यही आत्मा है। जो पूर्वोक्त प्रकार से हवन करके उसका प्राशन कर आचमन कर लेता है। उस के लिए मात्र यही विधि है ॥ ४ ॥ अथ वा परिव्राड्विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः शुचिरद्रोही भैक्षमाणो ब्रह्मभूयाय भवति । एष पन्थाः परिव्राजकानां वीराध्वाने वाऽनाशके वाप्रां प्रवेशे वाग्निप्रवेशे वा महाप्रस्थाने वा। एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनेति स संन्यासी ब्रह्मविदिति। एवमेवैष भगवन्निति वै याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥ इस प्रकार गेरुवे वस्त्र धारण करने वाला संन्यासी मुण्डनयुक्त, अपरिग्रही, पवित्रतायुक्त, किसी से द्रोह (ईर्ष्या-द्वेष) न करने वाला, भिक्षाचरण करता हुआ ब्रह्मपद को प्राप्त होता है, वह ब्रह्मस्वरूप है अर्थात् ब्रह्म की प्राप्ति के लिए समर्थ है। संन्यासियों के लिए यही मार्ग है-यही विधि है। जल प्रवेश, अग्नि प्रवेश, वीरगति, महाप्रस्थान (मृत्युमोक्ष) आदि में परिव्राजकों (संन्यासियों) के लिए यह रास्ता निर्दिष्ट किया है। इसी कारण से संन्यासी ब्रह्म का ज्ञाता (जानकार) होता है। यह विधि ऐसी ही है महाराज; ऐसा याज्ञवल्क्य जी ने कहा ॥ ५ ॥ तत्र परमहंसा नाम संवर्तकारुणिश्वेतकेतुदुर्वासऋभुनिदाघदत्तात्रेयशुकवामदेवहारी- तक प्रभृतयोऽव्यक्तलिङ्गाऽव्यक्ताचारा अनुन्मत्ता उन्मत्तवदाचरन्तः ॥ ६ ॥ यहाँ इन संन्यासियों में श्रेष्ठ परमहंस नाम वाले, अव्यक्त चिह्न को धारण करने वाले, अव्यक्त स्वभाव वाले, अनुन्मत्त होते हुए भी उन्मत्त (पागलों की भाँति) आचरण करने वाले हैं। (इनके नाम इस प्रकार हैं-) संवर्तक, आरुणि, श्वेतकेतु, दुर्वासा, ऋभु, निदाघ, दत्तात्रेय, शुक, वामदेव, हारीतक आदि-आदि ॥ ६ ॥ परस्त्रीपुरपराङ्मुखास्तत्रिदण्डं कमण्डलुं भुक्तपात्रं जलपवित्रं शिखां यज्ञोपवीतं बहिरन्तश्चेत्येतत्सर्वं भूः स्वाहेत्यप्सु परित्यज्यात्मानमन्विच्छेत् ॥ ७ ॥ संन्यासी को चाहिए कि वह दूसरों की स्त्रियों को न देखता हुआ तथा नगर में न रहता हुआ, त्रिदण्ड, कमण्डलु, भुक्तपात्र (भोजन पात्र), जल पवित्र, शिखा, यज्ञोपवीत आदि सभी बाह्य एवं आन्तरिक प्रतीक चिह्नों को 'भूः स्वाहा' कहकर जल में विसर्जित करता हुआ निरन्तर आत्मा का अनुसंधान करता रहे ॥ ७ ॥
मन्त्र १३ २५६ यथा जातरूपधरा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहास्तत्त्वब्रह्ममार्गे सम्यक्संपन्नाः शुद्धमानसाः प्राणसंधारणार्थं यथोक्तकाले विमुक्तो भैक्षमाचरन्नुदरपात्रेण लाभालाभौ समौ भूत्वा करपात्रेण वा कमण्डलूदकपो भैक्षमाचरन्नुदरमात्रसंग्रहः पात्रान्तरशून्यो जलस्थलक मण्डलपुरबाधकरहः स्थलनिकेतनो लाभालाभौ समौ भूत्वा शून्यागार देवगृहतृणकूट वल्मीकवृक्षमूलकुलाल- शालाग्निहोत्र शालानदीपुलिनगिरि कुहरकोटर कन्दरनिर्झर स्थण्डिलेष्वनिकेतनिवास्यप्रयत्नः शुभाशुभकर्मनिर्मूलनपरः संन्यासेन देहत्यागं करोति स परमहंसो नामेति ॥ ८ ॥ दिगम्बर, (शीत-उष्ण, सुख-दुःखादि) द्वन्द्वों से रहित, परिग्रहरहित, ब्रह्मरूप तत्त्व की प्राप्ति के मार्ग में सम्यक् रूप से लगे हुए शुद्ध हृदय वाले, केवल प्राण तत्त्व को धारण करने के लिए यथा समय स्वच्छन्दतापूर्वक भिक्षा द्वारा उदर-पूर्ति करने वाले, लाभ-हानि की चिन्ता न करते हुए, हाथ के पात्र अथवा खप्पर में माँगकर भोजन ग्रहण करते हुए तथा कमण्डलु का जल पीकर आनन्दपूर्वक विचरण करे। भोजन मात्र इतना ही माँगे, जिससे कि उदर पूर्ति हो जाये, संग्रह करके रखने की आवश्यकता न हो। अपने निवास के लिए बाधारहित कोई एकान्त गुप्त स्थल का चुनाव करे। खाली खण्डहर, देवमन्दिर, तृण आदि की झोपड़ी, वल्मीक, वृक्ष की जड़ के समीप, कुम्हारों की झोपड़ी, यज्ञशाला, नदी का तट, गुफा (खोह) अथवा झरनों के बड़े-बड़े पत्थरों पर हमेशा के लिए घर न बनाते हुए भी निवास करता हुआ, अपने शुभाशुभ समस्त कर्मों को निर्मूल करता हुआ जो संन्यास धर्म से शरीर को त्याग देता है, वह परमहंस के रूप में जाना जाता है ॥ ८ ॥ आशाम्बरो न नमस्कारो न दारपुत्राभिलाषी लक्ष्यालक्ष्यनिर्वर्तकः परिव्राट् परमेश्वरो भवति। अत्रैते श्लोका भवन्ति ॥ ९ ॥ वस्त्रादि से रहित, सभी में एक मात्र ब्रह्म को देखता हुआ किसी भी व्यक्ति को नमन के योग्य न समझते हुए, स्त्री-पुत्रादिकों के प्रति आसक्ति से हीन, लक्ष्य (लक्षणादि से ज्ञात) तथा अलक्ष्य (समाहित व असमाहित अवस्थाओं द्वारा) दोनों का निर्वर्तक (सब कुछ त्याग देने वाला) संन्यासी ही परमेश्वर होता है। इस सम्बन्ध में ये श्लोक कहे गये हैं ॥ ९ ॥ यो भवेत्पूर्वसंन्यासी तुल्यो वै धर्मतो यदि। तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतराय कदाचन ॥ १० ॥ जिस मनुष्य ने अपने से पूर्व (पहले ही) संन्यास ग्रहण कर लिया हो अथवा जो धर्म तुल्य हो अर्थात् आचार-विचार एवं सम्प्रदाय से जो श्रेष्ठ हो, उसे ही प्रणाम करना चाहिए, किसी अन्य को नहीं ॥ १० ॥ प्रमादिनो बहिश्चित्ताः पिशुनाः कलहोत्सुकाः। संन्यासिनोऽपि दृश्यन्ते वेदसंदूषिताशयाः ॥ प्रमादी, बहिर्मुखी, विषयों में आसक्त रहने वाले, नीच, कलह प्रिय एवं वेद के आशय (विचार) को दोषपूर्ण प्रतिपादित करने वाले संन्यासी भी देखने में आते हैं ॥ ११ ॥ नामादिभ्यः परे भूम्नि स्वाराज्ये चेत्स्थितोऽद्वये। प्रणमेत्कं तदात्मज्ञो न कार्यं कर्मणा तदा ॥ नाम, धाम, काम एवं अवस्था आदि से परे, ऊँचे श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित, अद्वय रूप स्वाराज्य में (जिसमें अपने से भिन्न कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता) स्थित, स्थिर मति, आत्म तत्त्व में निष्णात संन्यासी भला कैसे किसी को प्रणाम करे; क्योंकि वह तो सभी में अपना ही रूप देखता है। उसके लिए तो कोई भी कार्य संसार में शेष नहीं रहता ॥ १२ ॥ ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति। प्रणमेद्दण्डवद्भूमावाश्वचण्डालगोखरम् ॥ १३ ॥ (आत्म-तत्त्वज्ञ तो किसी व्यक्ति विशेष को भी प्रणाम नहीं करता अथवा फिर) ईश्वर को यह समझकर कि वह जीव के रूप में इस संसार के समस्त प्राणियों में स्थित है, घोड़े, चाण्डाल, गौ तथा गधे आदि सभी को दण्डवत् प्रणाम करता है ॥ १३ ॥
२५७ याज्ञवल्क्यापनिषद् मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोकेऽङ्गपञ्जरे । स्नाव्वस्थिग्रन्थिशालिन्याः स्त्रियाः किमिव शोभनम् ॥ १४ ॥ मांस-मेदा आदि द्वारा निर्मित, यत्र-तत्र गमन करने वाली पिटारी रूप नारी के शरीर में, जिसमें कि नसें, हड्डी एवं ग्रन्थियाँ ही स्थित हैं, कौन-सी वस्तु शोभनीय है ॥ १४ ॥ त्वङ्मांसरक्तवाष्पाम्बु पृथक्कृत्वा विलोचने । समालोकय रम्यं चेत्किं मुधा परिमुह्यसि ॥१५ ॥ इस (देवी स्वरूपा नारी) की त्वचा, मांस, रक्त, अश्रु एवं नेत्र आदि पृथक्-पृथक् करके (उसके शरीर के आन्तरिक अवयवों को ) तो देखो। क्या वे शोभनीय लगते हैं? यदि नहीं, तो फिर क्यों इस पर व्यर्थ में इतने मुग्ध (आसक्त) हुए जाते हो ॥ १५ ॥ मेरुशृङ्गतटोल्लासिगङ्गाजलरयोपमा। दृष्टा यस्मिन्मुने मुक्ताहारस्योल्लासशालिता ॥ १६ ॥ जिसके स्तनों पर लटकने वाले हार को मेरुपर्वत के शिखरों के बीच से गिरने वाली गंगाजल की धारा की उपमा दी गई है और वैसे ही वह हार परिलक्षित भी होता है ॥ १६ ॥ श्मशानेषु दिगन्तेषु स एव ललनास्तनः । श्वभिरास्वाद्यते काले लघुपिण्ड इवान्धसः ॥ १७ ॥ श्मशान में तथा यत्र-तत्र दिशाओं में कटकर गिरा हुआ वही नारी का स्तन समय आने पर कुत्तों द्वारा इस तरह से खाया जाता हुआ दिखाई पड़ता है, जैसे कि एक सामान्य-सा खाद्य पदार्थ का टुकड़ा ॥ १७ ॥ केशकज्जलधारिण्यो दुःस्पर्शा लोचनप्रियाः । दुष्कृताग्निशिखा नार्यो दहन्ति तृणवन्नरम् ॥ सुन्दर केशों को सुव्यवस्थित किये हुए, नेत्रों में कज्जल (काजल) लगाने वाली, दुःस्पर्श (स्पर्श के लिए दुष्प्राप्य), नेत्रों को प्रिय लगने वाली, प्रज्वलित अग्नि शिखा के सदृश जो स्त्रियाँ हैं; वे मनुष्य को तृणवत् क्षणभर में जला देती हैं ॥ १८ ॥ ज्वलिता अतिदूरेऽपि सरसा अपि नीरसाः । स्त्रियो हि नरकाग्नीनामिन्धनं चारु दारुणम् ॥१९ ये स्त्रियाँ दूर से ही दग्ध कर देने वाली, अत्यन्त रसयुक्त लगती हुई भी रसहीन कर देने वाली, नरक की अग्नि की लकड़ियाँ हैं, जो कि चारु दारुण (सुन्दर होने पर भी अत्यन्त दुःख दायी) प्रतीत होती हैं १९ ॥ कामनाम्रा किरातेन विस्तीर्णा मुग्धचेतसः । नार्यो नरविहङ्गानामङ्गबन्धनवागुराः ॥ २० ॥ कामदेव रूपी बहेलिये ने मानव रूपी पक्षियों को आबद्ध करने के लिए हृदय को मुग्ध (मोहित) कर देने वाला स्त्रीरूपी जाल बिछा रखा है ॥ २० ॥ जन्मपल्वलमत्स्यानां चित्तकर्दमचारिणाम् । पुंसां दुर्वासनारज्जुर्नारी बडिशपिण्डिका ॥ २१ जन्म रूपी तलैया में निवास करने वाली, कलुषित हृदय रूपी कीचड़ में चलने वाले मनुष्य रूपी मछलियों के लिए दुर्वासना रूपी रस्सी से बँधी ये स्त्रियाँ मछली पकड़ने वाले काँटे की भाँति हैं ॥ २१ ॥ सर्वेषां दोषरत्नानां सुसमुद्रिकयानया । दुःखशृङ्खलया नित्यमलम्स्तु मम स्त्रिया ॥ २२ ॥ सभी तरह के दोष रत्नों की पिटारी रूप इन दुःखों की जंजीर रूपी स्त्री से तो भगवान ही बचाये ॥ २२ ॥ यस्य स्त्री तस्य भोगेच्छा निःस्त्रीकस्य क्व भोगभूः । स्त्रियं त्यक्त्वा जगत्त्यक्तं जगत्त्यक्त्वा सुखी भवेत् ॥ २३ ॥ जिसके पास स्त्री है, उसी के पास भोग की इच्छा है तथा जिसके पास स्त्री ही नहीं, वह कहाँ किसके साथ भोगे ? यदि कोई मनुष्य स्त्री का त्याग कर दे, तो यह समझना चाहिए कि उसने संसार को ही छोड़ दिया। संसार छोड़ देने पर तो प्रत्येक व्यक्ति सुखी हो ही जाता है ॥ २३ ॥ अलभ्यमानस्तनयः पितरौ क्लेशयेच्चिरम् । लब्धो हि गर्भपातेन प्रसवेन च बाधते ॥ २४ ॥ वैसे पुत्र भी कष्ट देने वाला ही होता है; क्योंकि पुत्र न होने पर माता-पिता को बहुत क्लेश होता है। यदि
मन्त्र ३३ २५८ किसी तरह से प्राप्त भी हो जाए, तो गर्भपात हो जाने अथवा प्रसव पीड़ा का कष्ट ही देता है ॥ २४ ॥ जातस्य ग्रहरोग्रादि कुमारस्य च धूर्तता । उपनीतेऽप्यविद्यत्वमनुद्वाहश्च पण्डिते ॥ २५ ॥ यदि किसी प्रकार से (पुत्र) हो भी जाता है, तो उसे ग्रह, रोग आदि हो जाते हैं या फिर बालक ही नालायक हो जाता है। वह यज्ञोपवीत हो जाने के बाद भी अज्ञानी रह जाता है और यदि पढ़-लिख जाये, तो विवाह होना दुष्कर हो जाता है ॥ २५ ॥ यूनश्च परदारादि दारिद्र्यं च कुटुम्बिनः । पुत्रदुःखस्य नास्त्यन्तो धनी चेन्म्रियते तदा ॥ २६ ॥ इसके अतिरिक्त जवान लड़के का 'पर नारी से बुरा सम्पर्क न हो जाये' आदि भय बना रहता है या फिर यदि विवाह हो जाये, तो बालकों की इतनी संख्या हो जाती है कि परिवार का भरण-पोषण भी कठिन हो जाता है। इस तरह से पुत्र से होने वाले दुःखों की कोई गणना नहीं। इसके अलावा यह भी देखने में आता है कि सेठ लोगों के बच्चे ही नहीं होते और यदि होते भी हैं, तो मर जाते हैं आदि-आदि। (अतः इन समस्त दुःखों की कारण-भूत स्त्री का परित्याग कर देना चाहिए या विवाह ही न करे) ॥ २६ ॥ न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो यतिः । न च वाक्चपलश्चैव ब्रह्मभूतो जितेन्द्रियः ॥ २७॥ यति को हाथ, पैर, आँखों और वाणी का चंचल नहीं होना चाहिए अर्थात् उसे पूर्ण जितेन्द्रिय होना चाहिए। तभी वह ब्रह्मचर्य-धर्म का पालन कर सकता है ॥ २७ ॥ रिपौ बद्धे स्वदेहे च समैकात्म्यं प्रपश्यतः । विवेकिनः कुतः कोपः स्वदेहावयवेष्विव ॥ २८ शत्रु एवं सांसारिक बन्धनों से युक्त शरीर में जो एक भाव से देखने वाला ज्ञानशील यति होता है, उसे किसी पर भी क्रोध नहीं आता। जिस प्रकार कि व्यक्ति को अपने हाथ-पैर आदि अंगों पर क्रोध नहीं आता ॥ अपकारिणि कोपश्चेत्कोपे कोपः कथं न ते । धर्मार्थकाममोक्षाणां प्रसहा परिपन्थिनि ॥ २९ क्रोध करने वाले आदमी से पूछना चाहिए कि क्रोध पर ही तुम क्रोध क्यों नहीं करते हो; जो समस्त वस्तुओं का मूल कारण है। साथ ही जो धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष का बलवान् बैरी है ॥ २९ ॥ नमोऽस्तु मम कोपाय स्वाश्रयज्वालिने भृशम् । कोपस्य मम वैराग्यदायिने दोषबोधिने ॥ अपने स्वयं के आधार को ही भस्म कर देने वाले क्रोध के लिए मेरा बारम्बार नमस्कार है। मुझे वैराग्य प्रदान करने वाले एवं दोषों का बोध कराने वाले कोप को बारम्बार नमन-वंदन है ॥ ३० ॥ यत्र सुप्ता जना नित्यं प्रबुद्धस्तत्र संयमी । प्रबुद्धा यत्र ते विद्वान्सुषुप्तिं याति योगिराट् ॥ ३१ ॥ जहाँ (जब) सामान्य जन शयन करते हैं, वहाँ (तब) संयमी पुरुष जागता है (संयमी पुरुष पूर्ण सावधान रहता है) तथा जब अन्य सामान्य जन जागते हैं, तब योगी पुरुष सुषुप्ति का आश्रय प्राप्त कर लेता है ॥ ३१ ॥ चिदिहास्तीति चिन्मात्रमिदं चिन्मयमेव च । चित्त्वं चिदहमेते च लोकाश्चिदिति भावय ॥ ३२ यति को यही भावना करनी चाहिए कि मैं इस संसार में चित्स्वरूप ही हूँ। अखण्ड ब्रह्माण्ड चिन्मय है तथा सभी कुछ चिद्रूप ही है। मैं भी चिद् ही हूँ एवं सम्पूर्ण सृष्टि चिद्रूप ही है ॥ ३२ ॥ यतीनां तदुपादेयं पारहंस्यं परं पदम् । नातः परतरं किंचिद्विद्यते मुनिपुङ्गव इत्युपनिषत् ॥ ३३ हे मुनि श्रेष्ठ ! परमहंस का परम श्रेष्ठ पद मोक्ष ही यतियों के लिए उपादेय (अर्थात् आवश्यक वस्तु) है। इससे बढ़कर और कुछ भी नहीं है। यही सर्वोत्कृष्ट है। इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥ ३३ ॥ ॐ पूर्णमदः ............ इति शान्तिः ॥ ॥ इति याज्ञवल्क्योपनिषत्समाप्ता ॥
॥ योगतत्त्वोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें योग विषयक विविध उपादानों का विस्तृत वर्णन किया गया है। भगवान् विष्णु के द्वारा पितामह ब्रह्मा के लिए योग विषयक गूढ़ तत्त्वों के निरूपण के साथ उपनिषद् का शुभारम्भ हुआ है। कैवल्य रूपी परमपद की प्राप्ति के लिए योग मार्ग ही श्रेष्ठ साधन बताया गया है। मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग एवं राजयोग के क्रम में इनकी चार अवस्थाओं (आरम्भ, घट, परिचय एवं निष्पत्ति) का वर्णन हुआ है। आगे चलकर योगी के आहार-विहार एवं दिनचर्या का उल्लेख किया गया है। उसी क्रम में योगसिद्धि के प्रारम्भिक लक्षणों का वर्णन तथा उससे सावधान रहने का निर्देश भी दिया गया है। पूर्णमनोयोग से की गयी योगसाधना निःसन्देह सफल होती है, जो योगी साधक को सभी सिद्धियों (अणिमा, गरिमा, महिमा आदि) से सम्पन्न कर देती है, वह ईश्वरीय शक्तियों का अधिकारी बन जाता है। अन्ततः वह आत्मतत्त्व का निर्वात दीपशिखा की तरह अन्तःकरण में साक्षात्कार करके आवागमन से मुक्त हो जाता है। इसी फलश्रुति के साथ योगतत्त्व उपनिषद् का समापन हुआ है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु.......... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद् ) योगतत्त्वं प्रवक्ष्यामि योगिनां हितकाम्यया। यच्छ्रुत्वा च पठित्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १ योगियों की हित-कामना की दृष्टि से मैं योगतत्त्व का वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवण-अध्ययन तथा आचरण में धारण करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १॥ विष्णुर्नाम महायोगी महाभूतो महातपाः। तत्त्वमार्गे यथा दीपो दृश्यते पुरुषोत्तमः ॥२॥ विष्णु नामक महायोगी ही समस्त (भूत) प्राणियों के आदि महाभूत एवं महातपस्वी हैं। वे पुरुषोत्तम तत्त्वमार्ग में दीपक के सदृश प्रकाशमान हैं॥ २॥ तमाराध्य जगन्नाथं प्रणिपत्य पितामहः। पप्रच्छ योगतत्त्वं मे ब्रूहि चाष्टाङ्गसंयुतम् ॥ ३॥ पितामह ब्रह्माजी ने उन जगत् के स्वामी (भगवान् विष्णु) की आराधना एवं प्रणाम करके, कहा-हे जगन्नाथ ! आप अष्टाङ्ग युक्त योग का उपदेश मुझे प्रदान करें॥ ३॥ तमुवाच हृषीकेशो वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः। सर्वे जीवाः सुखैर्दुःखैर्मायाजालेन वेष्टिताः ॥४॥ यह सुनकर उन भगवान् हृषीकेश ने कहा कि मैं उस तत्त्व का वर्णन करता हूँ, तुम ध्यानयुक्त हो कर श्रवण करो। ये सभी जीव सुख-दुःख के माया रूपी जाल में आबद्ध हैं ॥ ४॥ तेषां मुक्तिकरं मार्गं मायाजालनिकृन्तनम्। जन्ममृत्युजरा व्याधिनाशनं मृत्युतारकम्॥ ५॥ इस सुख-दुःख रूप माया के जाल को काटकर उन (समस्त जीवों) को मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला तथा जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि से छुटकारा दिलाने वाला यही मृत्युतारक मार्ग है॥५॥ नानामार्गैस्तु दुष्प्रापं कैवल्यं परमं पदम्। पतिताः शास्त्रजालेषु प्रज्ञया तेन मोहिताः ॥ ६॥ कैवल्य रूपी परम पद, अन्य दूसरे मार्गों का आश्रय लेने से कठिनता से प्राप्त होता है। भिन्न-भिन्न शास्त्रों के मतों में पड़कर ज्ञानी जनों की बुद्धि मोह-ग्रस्त हो जाती है॥ ६॥ अनिर्वाच्यं पदं वक्तुं न शक्यं तैः सुरैरपि । स्वात्मप्रकाशरूपं तत्किं शास्त्रेण प्रकाश्यते ॥ ७॥ उस अनिर्वचनीय पद का उल्लेख देवगण भी नहीं कर सकते, तब उस स्वप्रकाशित आत्मा के रूप का वर्णन शास्त्रों में कैसे किया जा सकता है ? ॥ ७॥
२६० योगतत्त्वोपनिषद् निष्कलं निर्मलं शान्तं सर्वातीतं निरामयम्। तदेव जीवरूपेण पुण्यपापफलैर्वृतम् ॥८॥ वह निष्कल (कलारहित), मल रहित, शान्त, सर्वातीत (सबसे परे), निरामय (रोगरहित) तत्त्व जीव रूप में पुण्य और पाप के फलों से पूर्ण हो जाता है ॥८॥ परमात्मपदं नित्यं तत्कथं जीवतां गतम्। सर्वभावपदातीतं ज्ञानरूपं निरञ्जनम् ॥९॥ (यहाँ यह प्रश्न उठता है कि) जब वह परमात्मा सभी भाव और पद से परे, नित्य, ज्ञानरूप एवं मायारहित है, तब वह जीव भाव को कैसे प्राप्त हो जाता है ॥ ९॥ वारिवत्स्फुरितं तस्मिंस्तत्राहंकृतिरुत्थिता। पञ्चात्मकम्भूतिपिण्डं धातुबद्धं गुणात्मकम् ॥१०॥ उस परमात्म तत्त्व में जल के सदृश स्फुरण हुआ और उसमें अहंकार की उत्पत्ति हुई। तब पञ्च महाभूत रूप, धातु से आबद्ध, गुणात्मक पिण्ड उत्पन्न हुआ ॥ १०॥ सुखदुःखैः समायुक्तं जीवभावनया कुरु। तेन जीवाभिधा प्रोक्ता विशुद्धैः परमात्मनि ॥११॥ उस विशुद्ध परमात्मा ने सुख-दुःख से युक्त होकर जीव-भावना की, इससे उसे जीव नाम दिया गया॥ कामक्रोधभयं चापि मोहोलोभमदो रजः। जन्म मृत्युश्च कार्पण्यं शोकस्तन्द्रा क्षुधा तृषा ॥१२ तृष्णा लज्जा भयं दुःखं विषादो हर्ष एव च। एभिर्दोषैर्विनिर्मुक्तः स जीवः केवलो मतः ॥१३ काम, क्रोध, भय, मोह, लोभ, मद, रजोगुण, जन्म-मृत्यु, कार्पण्य (कंजूसी), शोक, तन्द्रा, क्षुधा, तृष्णा, लज्जा, भय, दुःख, विषाद, हर्ष आदि समस्त दोषों से मुक्ति मिल जाने पर जीव को 'केवल' (विशुद्ध) माना गया है ॥ तस्माद्दोषविनाशार्थमुपायं कथयामि ते। योगहीनं कथं ज्ञानं मोक्षदं भवति ध्रुवम् ॥ १४ ॥ योगो हि ज्ञानहीनस्तु न क्षमो मोक्षकर्मणि। तस्माज्ज्ञानं च योगं च मुमुक्षुर्दृढमभ्यसेत् ॥ १५ ॥ अब उन दोषों को दूर करने का उपाय कहता हूँ। योग-विहीन ज्ञान मोक्ष देने वाला कैसे हो सकता है ? ज्ञानरहित योग से भी मोक्ष नहीं प्राप्त हो सकता। इस कारण मोक्ष के अभिलाषी को ज्ञान और योग दोनों का ही दृढ़ अभ्यास करना चाहिए ॥ १४-१५ ॥ अज्ञानादेव संसारो ज्ञानादेव विमुच्यते। ज्ञानस्वरूपमेवादौ ज्ञानं ज्ञेयैकसाधनम् ॥ १६ ॥ अज्ञान से ही यह संसार बन्धन स्वरूप है तथा ज्ञान के द्वारा ही इस संसार से निवृत्ति हो सकती है। ज्ञान स्वरूप ही आदि में है और ज्ञान के माध्यम से ही ज्ञेय को प्राप्त किया जा सकता है ॥ १६ ॥ ज्ञातं येन निजं रूपं कैवल्यं परमं पदम्। निष्कलं निर्मलं साक्षात्सच्चिदानन्दरूपकम् ॥ १७ ॥ उत्पत्तिस्थितिसंहारस्फूर्तिज्ञानविवर्जितम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमथ योगं ब्रवीमि ते ॥ १८ ॥ जिसके द्वारा अपने स्वरूप का ज्ञान हो और कैवल्यपद, परमपद, निष्कल (कलारहित), निर्मल, सच्चिदानन्द स्वरूप, उत्पत्ति, स्थिति, संहार एवं स्फुरण का ज्ञान हो, वही वास्तविक ज्ञान है। अब इसके आगे योग के सन्दर्भ में वर्णन करते हैं ॥ १७-१८॥ योगो हि बहुधा ब्रह्मन्भिद्यते व्यवहारतः। मन्त्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगतः ॥ १९ ॥ हे ब्रह्मन् ! व्यवहार की दृष्टि से योग के अनेकानेक भेद बताये गये हैं, जैसे- मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग एवं राजयोग आदि ॥ १९॥ आरम्भश्च घटश्चैव तथा परिचयः स्मृतः। निष्पत्तिश्चेत्यवस्था च सर्वत्र परिकीर्तिता ॥ २० ॥ योग की चार अवस्थायें सर्वत्र वर्णित की गई हैं। ये अवस्थायें-आरम्भ, घट, परिचय एवं निष्पत्ति हैं ॥२०॥ एतेषां लक्षणं ब्रह्मन्वक्ष्ये शृणु समासतः। मातृकादियुतं मन्त्रं द्वादशाब्दं तु यो जपेत् ॥ २१ ॥ क्रमेण लभते ज्ञानमणिमादिगुणान्वितम्। अल्पबुद्धिरिमं योगं सेवते साधकाधमः ॥ २२ ॥
मन्त्र ३५ २६१ इन (चारों अवस्थाओं) के लक्षण संक्षेप में वर्णित किये जाते हैं-(मन्त्रयोग) जो मातृका आदि से युक्त मन्त्र को बारह वर्ष जप करता है, वह क्रमशः अणिमा आदि का ज्ञान प्राप्त कर लेता है; परन्तु इस तरह का योग अल्प बुद्धि वाले लोग करते हैं तथा वे अधम कोटि के साधक होते हैं ॥ २१-२२ ॥ लययोगश्चित्तलयः कोटिशः परिकीर्तितः। गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्भुञ्जन्ध्यायेन्निष्कलमीश्वरम् ॥ २३ चित्त का लय ही लययोग है, वह करोड़ों तरह का कहा गया है, चलते, बैठते, रुकते, शयन करते, भोजन करते, कलारहित परमात्मा का निरन्तर चिन्तन करता रहे ॥ २३ ॥ स एव लययोगः स्याद्धठयोगमतः शृणु। यमश्च नियमश्चैव आसनं प्राणसंयमः ॥ २४ ॥ प्रत्याहारो धारणा च ध्यानं भ्रूमध्यमे हरिम्। समाधिः समतावस्था साष्टाङ्गो योग उच्यते ॥ २५ इस प्रकार वह तो लययोग हुआ। अब हठयोग का श्रवण करो-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, भृकुटी के मध्य में श्रीहरि का ध्यान तथा समाधि-साम्यावस्था को अष्टांग योग कहते हैं ॥ महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खेचरी। जालंधरोड्डियाणश्च मूलबन्धस्तथैव च ॥ २६ ॥ दीर्घप्रणवसंधानं सिद्धान्तश्रवणं परम्। वज्रोली चामरोली च सहजोली त्रिधा मता ॥ २७ ॥ महामुद्रा, महाबन्ध, महावेध और खेचरी मुद्रा, जालन्धर बन्ध, उड्डियान बन्ध, मूलबन्ध, दीर्घ प्रणव संधान, परम सिद्धान्त का सुनना तथा वज्रोली, अमरोली एवं सहजोली ये तीन मुद्रायें हैं ॥ २६-२७ ॥ एतेषां लक्षणं ब्रह्मन्प्रत्येकं शृणु तत्त्वतः। लघ्वाहारो यमेष्वेको मुख्यो भवति नेतरः ॥ २८ ॥ अहिंसा नियमेष्वेका मुख्या वै चतुरानन। सिद्धं पद्मं तथा सिंहं भद्रं चेति चतुष्टयम् ॥ २९ ॥ हे ब्रह्मन् ! अब आप इनमें से प्रत्येक के लक्षणों को सुनें। यमों में एक मात्र सूक्ष्म आहार ही प्रमुख है तथा नियमों के अन्तर्गत अहिंसा प्रधान है। सिद्ध, पद्म, सिंह तथा भद्र ये चार मुख्य आसन हैं ॥ २८-२९ ॥ प्रथमाभ्यासकाले तु विघ्नाः स्युश्चतुरानन। आलस्यं कथनं धूर्तगोष्ठी मन्त्रादिसाधनम् ॥ ३० ॥ हे चतुरानन ! सर्वप्रथम अभ्यास के प्रारम्भिक काल में ही विघ्न उपस्थित होते हैं, जैसे आलस्य, अपनी बड़ाई, धूर्तपने की बातें करना तथा मन्त्रादिक का साधन ॥ ३० ॥ धातुस्त्रीलौल्यकादीनि मृगतृष्णामयानि वै। ज्ञात्वा सुधीस्त्यजेत्सर्वान् विघ्नान्युण्यप्रभावतः ॥ श्रेष्ठ, बुद्धिमान् साधक को धातु (रुपया आदि धन), स्त्री, लौल्यता (चंचलता) आदि को मृगतृष्णा रूप समझकर तथा विघ्न रूप जानकर त्याग देना चाहिए ॥ ३१ ॥ प्राणायामं ततः कुर्यात्पद्मासनगतः स्वयम्। सुशोभनं मठं कुर्यात्सूक्ष्मद्वारं तु निर्व्रणम् ॥ ३२ ॥ तदनन्तर उस श्रेष्ठ साधक को पद्मासन लगाकर प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले एक छोटी-सी पर्णकुटी छोटे द्वार से युक्त तथा बिना छिद्र वाली विनिर्मित करे ॥ ३२ ॥ सुष्ठु लिप्तं गोमयेन सुधया वा प्रयत्नतः । मत्कुणैर्मशकैर्लूतैर्वर्जितं च प्रयत्नतः ॥ ३३ ॥ तत्पश्चात् उस कुटी को गाय के गोबर से लीपकर शोभनीय बनाये तथा ठीक तरह से स्वच्छ करे और प्रयत्नपूर्वक खटमल, मच्छर, मकड़ी आदि जीवों से रहित करे ॥ ३३ ॥ दिने दिने च संमृष्टं संमार्जन्या विशेषतः। वासितं च सुगन्धेन धूपितं गुग्गुलादिभिः ॥ ३४ ॥ प्रतिदिन उस (कुटिया) को झाड़-बुहार करके स्वच्छ करता रहे एवं साथ ही उसे धूप, गूगल आदि की धूनी देकर सुवासित भी करता रहे ॥ ३४ ॥ नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्। तत्रोपविश्य मेधावी पद्मासनसमन्वितः ॥ ३५ ॥