१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ४ खण्ड १७ मन्त्र १० १३१
अध्याय ४ खण्ड १७ मन्त्र १० १३१ एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टः संदधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति ॥ ८ ॥ उसी प्रकार इन लोकों, देवों और तीनों वेदों के सार से यज्ञ के छिद्र (दोष) का सुधार किया जाता है। जिस यज्ञ में इस प्रकार जानने वाला ब्रह्मा होता है, वह यज्ञ निश्चय ही ओषधियों (आहुतियों) से संस्कारित (प्रभावयुक्त) होता है ॥ ८ ॥ एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवत्येवंविदः ह वा एषा ब्रह्माणमनु गाथा यतो यत आवर्तते तत्तद्गच्छति ॥ ९ ॥ जिस यज्ञ में इस प्रकार जानने वाला ब्रह्मा होता है, वह यज्ञ उत्तर मार्ग को प्राप्त कराता है। इस प्रकार ज्ञान-सम्पन्न ब्रह्मा के प्रति यह उक्ति कही गई है- जहाँ भी वह यज्ञ में प्रवृत्त होता है, वह यज्ञ के अभीष्ट को प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानः सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ १० ॥ इस प्रकार ब्रह्मा मनन करने वाला एक ऋत्विक् होता है। जिस प्रकार घोड़ी सब योद्धाओं की रक्षा करती है, उसी प्रकार ब्रह्मा यज्ञ की, यजमान की और सब ऋत्विजों की सब ओर से रक्षा करता है। अतः इस प्रकार ज्ञान-सम्पन्न को ही ब्रह्मा बनाएँ, ऐसा न जानने वाले को न बनाएँ, कभी न बनाएँ ॥ १० ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
१४० छान्दोग्योपनिषद् ॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ इस अध्याय में प्राण की सर्वश्रेष्ठता एवं पञ्चाग्नि विद्या का वर्णन किया गया है- यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥ जो ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ (आयु में प्रथम और गुणों में अधिक) को जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥ जो वसिष्ठ (समग्र श्रेष्ठता) को जानता है, वह स्वजातियों में वसिष्ठ (श्रेष्ठ धन से सम्पन्न) होता है। निश्चय ही वाक् (वाणी) वसिष्ठ है ॥ २ ॥ यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ जो कोई प्रतिष्ठा को जानता है, वह लोक, परलोक (स्थूल शरीर एवं सूक्ष्म शरीर) में प्रतिष्ठित होता है। निश्चय ही चक्षु प्रतिष्ठा है ॥ ३ ॥ यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव संपत् ॥ ४ ॥ जो कोई सम्पद् को जानता है, उसे दैव और मानुष दोनों ही काम (भोग) सभी प्रकार से प्राप्त होते हैं। श्रोत्र ही सम्पत्ति है ॥ ४ ॥ यो ह वा आयतनं वेदायतनँ ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ जो कोई आयतन को जानता है, वह स्वजनों का आयतन होता है अर्थात् उनका आश्रय बन जाता है। निश्चय ही मन आयतन है ॥ ५ ॥ अथ ह प्राणा अहँ श्रेयसि व्यूदिरेऽहँ श्रेयानस्म्यहँ श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ एक बार प्राण (विभिन्न इन्द्रियों में स्थित प्राण) अपनी श्रेष्ठता के लिए परस्पर विवाद करने लगे कि मैं श्रेष्ठ हूँ - मैं श्रेष्ठ हूँ ॥ ६ ॥ ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ तब उन प्राणों ने अपने पिता प्रजापति के पास जाकर पूछा 'भगवन् ! हममें से श्रेष्ठ कौन है?' तब प्रजापति ने उत्तर दिया कि 'तुममें से जिस तत्त्व के निकल जाने पर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ (जीवित रहते हुए भी प्राणहीन एवं उससे भी निकृष्ट जैसा) दिखाई देने लगे, वही तत्त्व श्रेष्ठ है' ॥ ७ ॥ सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवंमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ (तब) वाक् इन्द्रिय ने उत्क्रमण किया, अर्थात् शरीर से बाहर चली गयी। उसने एक वर्ष तक प्रवास में रहने के बाद वापस लौटकर पूछा- 'मेरे बिना तुम जीवित रहने में कैसे समर्थ रह सके?' तब इन्द्रियों ने कहा- जिस प्रकार गूँगा वाणी से बिना बोले हुए भी प्राण से श्वासोच्छ्वास करता है, नेत्रों से देखता है,
अध्याय ५ खण्ड १ मन्त्र १३ १४१
अध्याय ५ खण्ड १ मन्त्र १३ १४१ कानों से सुनता है और मन से चिन्तन करते हुए जीवनयापन करता है। उसी प्रकार (हम भी जीवित रहे) ऐसा सुनकर वागिन्द्रिय ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ ८ ॥ चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैबमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ (फिर) चक्षु (नेत्र) ने उत्क्रमण किया। एक वर्ष तक प्रवास में रहने के पश्चात् वापस लौटकर पूछा- ‘मेरे बिना तुम जीवित कैसे रह सके?, (तब अन्य इन्द्रियों ने कहा) ‘जिस प्रकार नेत्रहीन नेत्रों से देख नहीं सकता, तो भी प्राणों से श्वासोच्छ्वास करते, वाणी से बोलते, कानों से श्रवण करते और मन से चिन्तन करते हुए जीवित रहता है, उसी प्रकार [हम भी जीवित रहे], ऐसा सुनकर नेत्र ने पुनः प्रवेश किया ॥ ९ ॥ श्रोत्रः होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिरा अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ (इसके पश्चात्) श्रोत्र (कान) ने उत्क्रमण किया। एक वर्ष तक प्रवास में रहने के उपरान्त पुनः लौटकर पूछा- हमारे बिना तुम कैसे जीवित रहे ? तब अन्य इन्द्रियों ने कहा- ‘जिस प्रकार बधिर बिना सुने, प्राण से प्राणन करते, वाणी से बोलते, चक्षु से देखते और मन से चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, वैसे ही हम भी जीवित रहे।’ यह सुन करके श्रोत्र ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ १० ॥ मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ (श्रोत्र के बाद) मन ने बाह्य गमन किया। एक वर्ष तक प्रवास में रहने के बाद लौटकर उसने वाक् आदि इन्द्रियों से पूछा कि ‘मेरे बिना तुम किस प्रकार जीवित रहे ?’ (तब उन सभी ने कहा) ‘जिस प्रकार छोटे बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राण द्वारा श्वासोच्छ्वास करते, वाणी से बोलते, चक्षु से देखते, कर्णों से श्रवण करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार (हम भी जीवित रहे)।’ यह सुनकर मन ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ ११ ॥ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथासुहयः पड्वीशशङ्कन्संखिदेदेवमित- रान्प्राणान्समखिदत्तः हाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ फिर प्राण बहिर्गमन करने के लिए तत्पर होता है। जिस तरह शक्तिशाली अश्व पैर बाँधने की कीलों को उखाड़ देता है, उसी प्रकार प्राण ने समस्त इन्द्रियों के बन्धन से अपने आप को मुक्त किया। तब उन सबने प्राण से निवेदन किया कि ‘भगवन्! आप अपने ही स्थान पर रहें, आप ही हम सब में श्रेष्ठ हैं, आप बाहर न जाएँ' ॥ १२ ॥ अथ हैन वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैन चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥ १३ ॥ तत्पश्चात् उस वागिन्द्रिय ने मुख्य प्राण से कहा- ‘मैं जो वसिष्ठ हूँ, वह वसिष्ठ आप ही हैं।’ चक्षु ने कहा- ‘‘मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो (वह) प्रतिष्ठा आप ही हैं।‘’ ॥ १३ ॥
१४२ छान्दोग्योपनिषद् अथ हैनꣳ श्रोत्रमुवाच यदहꣳ संपदस्मि त्वं तत्संपदसीत्यथ हैन मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४॥ फिर उस श्रोत्र ने कहा कि 'मैं जो सम्पद्' (श्रेष्ठ सम्पत्ति) हूँ, सो वह सम्पद् आप ही हैं। (इसके बाद) उस मुख्य प्राण से मन ने कहा- 'मैं जो आयतन (आश्रय) हूँ, वह आश्रय आप ही हैं॥ १४ ॥ न वै वाचो न चक्षूꣳषि न श्रोत्राणि न मनाꣳसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ इसलिए लोक में वाक् आदि समस्त इन्द्रियों को न वाणी, न नेत्र, न श्रोत्र और न ही मन; बल्कि सबको 'प्राण' नाम से ही सम्बोधित करते हैं, क्योंकि ये सभी प्राण ही हैं ॥ १५ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किंचिदिदमा श्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किंचनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥ उस मुख्य प्राण ने प्रश्न किया कि मेरा अन्न क्या होगा ? तब वाक् आदि इन्द्रियों ने उत्तर देते हुए कहा- 'कुत्तों और पक्षियों से लेकर सभी प्राणियों का यह जो कुछ भी अन्न है, वह सब तुम्हारा ही है।' 'अन्' यह प्राण का नाम प्रसिद्ध है। इस प्रकार जानने वाले के लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं होता है ॥ १ ॥ [ प्राणियों में जब तक प्राण रहते हैं, तभी तक उन्हें अन्न की आवश्यकता पड़ती है। प्राण जाते ही अन्न की माँग समाप्त हो जाती है, इसीलिए सारे अन्न प्राण के लिए ही हैं।] स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥ उस मुख्य प्राण ने पुनः प्रश्न किया कि 'मेरा वास (वस्त्र)क्या होगा ?' तब वाक् आदि इन्द्रियों ने कहा -'जल'। (प्राण को) भोजन करने से पूर्व और पश्चात् आच्छादित करते हैं। (ऐसा करने से) वह वस्त्र धारण करने वाला और अनग्न होता है ॥ २ ॥ तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥ इस प्राणोपासना पद्धति का विवरण सत्यकाम जाबाल ने व्याघ्रपद के पुत्र गोश्रुति नामक वैयाघ्रपद को सुनाया- "यदि कोई इस प्राणोपासना को शुष्क ठूँठ से भी कहेगा, तो उसमें भी शाखाएँ उत्पन्न हो जाएँगी और पत्ते प्रस्फुटित हो आएँगे।"'॥ ३ ॥ [ मन्त्र क्र० १ में प्राण-प्रक्रिया को जानने वाले तथा क्र० ३ में सुनने वाले को असाधारण लाभ प्राप्त होने की बात कही गयी है। उस काल में जानने का अर्थ उस प्राण-प्रक्रिया को चलाने की क्षमता होना तथा सुनने का अर्थ उस प्राण-प्रक्रिया को आत्मसात् करना ही रहा होगा। उसी स्थिति में किसी अन्न से पोषण पाने तथा सूखे ठूँठ में भी नये प्राण का संचार होने की बात सिद्ध होती है।] अथ यदि महज्जिगमिषेदामावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्याꣳ रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्रावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ४ ॥
अध्याय ५ खण्ड २ मन्त्र १ १४३
अध्याय ५ खण्ड २ मन्त्र १ १४३ इसके बाद अब यदि वह महत्त्व का अभिलाषी हो, तो उसे अमावस्या को दीक्षा प्राप्त करके पूर्णिमा की रात्रि को सभी औषधियों, दही और शहद सम्बन्धी मन्थ (मथकर तैयार किया गया हव्य) का मंथन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' के मन्त्र द्वारा अग्नि में घृत की आहुति देकर मन्थ में उसका अवशेष डालना चाहिए॥ वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्संपदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ५ ॥ (इसी प्रकार) 'वसिष्ठाय स्वाहा' के मन्त्र से अग्नि में घृताहुति समर्पित कर मन्थ में भी घृत के स्राव को डाले, 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्र से अग्नि को घृताहुति समर्पित करके मन्थ में घृत के अवशेष को डाले, 'संपदे स्वाहा' मन्त्र के द्वारा अग्नि में हवन करके अवशिष्ट घृत को मंथ में डाले तथा 'आयतनाय स्वाहा' इस मंत्र से अग्नि में घृत की आहुति देकर शेष घृत को मन्थ में समर्पित करे॥ ५॥ अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदं स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यं श्रेष्ठ्यं राज्यमाधिपत्यं गमयत्वहमेवेदं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥ (तत्पश्चात्) अग्नि से कुछ दूर हटकर अञ्जलि में मन्थ को लेकर इस मन्त्र का उच्चारण करे-'अमो नामसि' हे मन्थ ! तू 'अम' (प्राण) नाम वाला है, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् (अपने प्राणभूत) तेरे साथ अवस्थित है। तू ही ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, राजा (प्रकाशमान) और सबका अधिपति है। वह तुम मुझे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ तत्त्व, राज्य और आधिपत्य को प्राप्त कराओ। मैं ही सर्वरूप हो जाऊँ॥ ६॥ अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति ॥ ७॥ तदनन्तर वह इस ऋचा से (हम प्रकाशमान सविता के उस सर्वविषयक श्रेष्ठतम भोजन की प्रार्थना करते हैं और शीघ्र ही सविता देवता के स्वरूप का ध्यान करते हैं) पादशः (उस मन्थ का) एक-एक पद को कहकर मध्य के एक-एक ग्रास का भक्षण करता है। 'तत्सवितुर्वृणीमहे' ऐसा कहकर एक ग्रास का भक्षण करता है। 'वयं देवस्य भोजनम्' ऐसा कहकर एक ग्रास का भक्षण करता है। 'श्रेष्ठं सर्वधातमम्' मन्त्र कहकर पुनः एक ग्रास को ग्रहण करता है तथा 'तुरं भगस्य धीमहि' ऐसा कहकर कंस अथवा चमस के आकार वाले पात्र को धोकर सम्पूर्ण मंथ लेप को पी जाता है॥ ७॥ निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत्ससमृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ८ ॥ इसके बाद अग्नि के पृष्ठ भाग पर पीछे की ओर पवित्र मृग चर्म आदि बिछाकर अथवा स्थण्डिल (पवित्र यज्ञ भूमि) में ही वाणी का संयम रखते हुए शयन करता है। उस समय यदि वह स्वप्न में स्त्री का दर्शन करे, तो यह समझे कि मेरा यह अनुष्ठान सफलता को प्राप्त हो गया ॥ ८ ॥ तदेष श्लोकः । यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने तस्मिन्स्वप्ननिदर्शन इति ॥ ९ ॥ इससे सम्बन्धित यह श्लोक है- 'काम्य कर्मों में जब स्त्री को देखे, तो उस स्वप्न के दर्शन होने पर उस कार्य की सफलता समझे ॥ ९॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
१४४ छाान्दोग्योपनिषद् ॥ तृतीयः खण्डः ॥ श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालानाꣳसमितिमेयाय तꣳह प्रवाहणो जैवलिरुवाच कुमारानु त्वाशिषत्पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥ पाञ्चाल नरेश की सभा में (एक बार) आरुणि पुत्र श्वेतकेतु आया। वहाँ उससे जीवल पुत्र प्रवाहण ने प्रश्न करते हुए कहा कि 'कुमार ! क्या तुम्हारे पिताजी ने तुमको शिक्षा प्रदान की है'। तब उसने कहा- हाँ, भगवन् ! हमने अपने पिताजी से शिक्षा प्राप्त की है ॥ १ ॥ वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्त ३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥ प्रवाहण ने पुनः प्रश्न किया कि क्या तुम्हें यह ज्ञात है कि प्रजा इस लोक से जाने के बाद कहाँ जाती है ? श्वेतकेतु ने कहा- ' भगवन् ! यह जानकारी मुझे नहीं है। उसने फिर पूछा कि क्या तुम्हें यह ज्ञात है कि वह प्रजा पुनः इस लोक में किस प्रकार आती है ? श्वेतकेतु ने पुनः नकारात्मक उत्तर दिया कि मुझे यह भी नहीं मालूम है। प्रवाहण पुनः अगला प्रश्न पूछता है कि देवयान और पितृयान मार्गों का एक दूसरे से अलग होने का स्थान क्या तुम्हें ज्ञात है ?' श्वेतकेतु ने कहा- नहीं भगवन् ! मैं यह भी नहीं जानता ॥ २ ॥ वेत्थ यथासौ लोको न संपूर्यत ३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति नैव भगव इति ॥ ३ ॥ प्रवाहण ने पुनः प्रश्न किया कि क्या तुम्हें ज्ञात है कि यह पितर लोक क्यों नहीं भरता है ? श्वेतकेतु ने कहा- 'नहीं भगवन् ! उसने फिर पूछा कि 'पाँचवीं आहुति के यजन कर दिये जाने पर घृत सहित सोमादि रस 'पुरुष' संज्ञा को कैसे प्राप्त करते हैं' ? श्वेतकेतु ने कहा- नहीं भगवन् ! मैं यह भी नहीं जानता ॥ ३ ॥ अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात्कथꣳ सोऽनुशिष्टो ब्रुवीतेति स हायस्तः पितुरर्धमेयाय तꣳहोवाचाऽननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाशिषमिति ॥ ४ ॥ ''तो फिर तुमने स्वयं के सम्बन्ध में ऐसा क्यों कहा कि मुझे शिक्षा प्रदान की गयी है ?'' जो इन सभी विद्याओं की जानकारी नहीं रखता है, वह अपने को पूर्ण शिक्षित कैसे कह सकता है ? उपर्युक्त सभी प्रश्नों के उत्तर न दे पाने से त्रस्त होकर वह अपने पिता आरुणि के पास गया और बोला कि आपने मुझे शिक्षा दिये बगैर ही आश्वस्त कर दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा प्रदान कर दी है ॥ ४ ॥ पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदैतानवदो यथाहमेषां नैकंचन वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥ श्वेतकेतु ने अपने पिता से कहा कि 'उस क्षत्रिय कुमार ने मुझसे अग्निविद्या से सम्बन्धित पाँच प्रश्न किये। मैं उनमें से एक का भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सका। तब उसके पिता ने कहा कि 'तुमने ये जितने प्रश्न मुझसे कहे, मैं भी उनमें से एक प्रश्न का उत्तर नहीं जानता। यदि मुझे जानकारी होती, तो भला तुम्हें क्यों नहीं इसकी जानकारी देता ॥ ५ ॥
अध्याय ५ खण्ड ४ मन्त्र २ १४५
अध्याय ५ खण्ड ४ मन्त्र २ १४५ स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तꣳहोवाच मानुषस्य भगवन्गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन्मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्रीबभूव ॥ ६ ॥ तब वह पिता और पुत्र (आरुणि और श्वेतकेतु) पुनः उस पाञ्चाल नरेश के समीप प्रश्नों की जिज्ञासा को लिए हुए आये। राजा ने अपने यहाँ आये उन दोनों (पिता और पुत्र) को सम्मानित किया। दूसरे दिन प्रातःकाल गौतम गोत्रोत्पन्न वे दोनों राजा की सभा में गये। उस राजा ने कहा कि 'हे भगवन् गौतम! आप सांसारिक धन का वरदान हमसे प्राप्त कर लें। तब उन मुनि ने कहा- राजन्! ये मनुष्य सम्बन्धी धन आपके ही पास रहें; आपने मेरे पुत्र के प्रति जो बात (प्रश्नरूप से) कही थी, वही मुझे बताने की कृपा करें। यह सुनकर वह राजा अत्यन्त संकट में पड़ गया॥ ६॥ तꣳह चिरं वसेत्याज्ञापयांचकार तꣳ होवाच यथा मा त्वं गौतमवदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥ पाञ्चाल नरेश ने उन दोनों (पिता और पुत्र) को अपने पास चिरकाल तक रहने की आज्ञा प्रदान की। उसने कहा- 'हे गौतम! जिस प्रकार आपने मुझसे कहा है, उसे आप यह समझें कि प्राचीन काल में यह अग्निविद्या ब्राह्मण के पास नहीं गयी। इसी कारण से सभी लोकों में इस विद्या पर क्षत्रियों का ही अनुशासन रहा है। इस प्रकार कहकर उस राजा ने गौतम को अग्निविद्या का उपदेश दिया॥ ७॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ श्वेतकेतु से प्रवाहण ने जो प्रश्न पूछे थे, उनमें से पहले 'पाँचवीं आहुति में आपः पुरुष वाचक कैसे बन जाता है' इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है। इस प्रश्न के समाधान के साथ ही अन्य प्रश्नों के समाधान का मार्ग भी खुलता है। वेद ने इस सृष्टि को यज्ञमय कहा है। ऋषि स्थूल यज्ञ की उपमा देते हुए सृष्टिचक्र के विभिन्न चरणों को समझाते हैं। द्युलोक में पहली आहुति से सोम, अंतरिक्ष में दूसरी आहुति से वर्षा, पृथ्वी पर तीसरी आहुति से अन्न, पुरुष में चौथी आहुति से वीर्य तथा नारी में पाँचवीं आहुति से पुरुषवाची जीव की उत्पत्ति होती है। प्रश्न था 'आपः' पुरुष वाची कैसे बन जाता है। प्रथम आहुति श्रद्धा की कही गयी है। 'श्रद्धा = आपः' अर्थात् श्रद्धा और आपः पर्यायवाची शब्द हैं। वेद ने आपः को ब्रह्म के तप से उत्पन्न सृष्टि का मूल क्रियाशील पदार्थ माना है। प्रकारान्तर से यह चक्र 'ब्राह्मी चेतना' के 'जीव चेतना' के रूप में प्रकट होने तक के रहस्यात्मक चरणों को प्रकट करता है- असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ हे महर्षि गौतम! यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है। आदित्य ही उस अग्नि की समिद् (ईंधन) है, किरणें ही धूम हैं, दिन ही ज्वाला है, चन्द्रमा ही अङ्गार और नक्षत्र ही विस्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) हैं॥ १॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥ २ ॥ उस द्युलोक रूप अग्नि में देवगण श्रद्धा का यजन करते हैं। उस आहुति से राजा सोम का प्रादुर्भाव होता है॥ २॥ [ सृष्टि यज्ञ के प्रथम चरण में श्रद्धा अथवा आपः तत्त्व के यजन से सोम अर्थात् आधारभूत पोषक प्रवाह की उत्पत्ति होती है।]
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
१४६ छान्दोग्योपनिषद् ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ हे गौतम ! (इस अग्नि विद्या के अन्तर्गत) पर्जन्य ही अग्नि है, वायु ही समिधायें हैं, बादल ही धूम्र है, विद्युत् ही उसकी ज्वालाएँ हैं, वज्र (उसका) अङ्गार और गर्जन ही विस्फुलिंग अर्थात् चिनगारियाँ हैं ॥१॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमꣳ राजानं जुह्वति तस्या आहुतेर्वर्षꣳ संभवति ॥ २ ॥ इस दिव्याग्नि में ही देवगण सामूहिक रूप से राजा सोम के निमित्त यजन करते हैं, उस विशेषाहुति से वर्षा का प्राकट्य होता है ॥ २ ॥ [ पर्जन्य उस लोक की उत्पादक क्षमता है। यजन के दूसरे चरण में सोम से वर्षा की उत्पत्ति होती है। ] ॥ षष्ठः खण्डः ॥ पृथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ हे गौतम ! (इस क्रम में) पृथिवी ही अग्नि है। संवत्सर ही उसकी समिधाएँ हैं, आकाश ही धूम्र (धुआँ) है, रात्रि ही ज्वालाएँ हैं, दिशाएँ ही अङ्गारे और अवान्तर दिशाएँ अर्थात् कोने ही (विस्फुलिङ्ग) चिनगारियाँ हैं ॥ १ ॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नꣳ संभवति ॥ २ ॥ उस श्रेष्ठ दिव्याग्नि में समस्त देवता वर्षा के निमित्त दिव्य आहुतियाँ समर्पित करते हैं; उस विशेष आहुति से अन्न का प्रादुर्भाव होता है ॥ २ ॥ [ यजन के तीसरे चरण में पृथिवी में दी गयी इस आहुति से जीवन तत्त्व अन्न के रूप में परिवर्तित हो जाता है।] ॥ सप्तमः खण्डः ॥ पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित्प्राणो धूमो जिह्वार्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ हे गौतम ! पुरुष ही दिव्याग्नि है। उस (अग्नि विद्या) की वाक् ही समिधाएँ (ईंधन) हैं। प्राण ही धूम्र (धुआँ) है। जिह्वा ही ज्वाला है, नेत्र अङ्गारे हैं तथा श्रोत्र (कान) ही विस्फुलिङ्ग अर्थात् चिनगारियाँ हैं ॥ १ ॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः संभवति ॥ २ ॥ उस दिव्याग्नि में सभी देवता मिलकर अन्न के निमित्त आहुति समर्पित करते हैं, उस विशेष आहुति से वीर्य अर्थात् पुरुषार्थ की उत्पत्ति होती है ॥ २ ॥ [ इस चौथे चरण की आहुति के बाद अन्तःस्थ जीवन तत्त्व वीर्य में पोषक तत्त्व ( आपः ) शुक्राणु रूप में प्रकट हो जाता है।] ॥ अष्टमः खण्डः ॥ योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिद्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ हे गौतम ! उस अग्नि विद्या की स्त्री ही दिव्याग्नि है। उसका उपस्थ (जननांग) ही समिधा अर्थात्
अध्याय ५ खण्ड १० मन्त्र २ १४७
अध्याय ५ खण्ड १० मन्त्र २ १४७ ईंधन है, विचार विमर्श ही उसका धूम्र है, योनि ही ज्वाला है। स्त्री-पुरुष का सान्निध्य ही उस दिव्याग्नि के अङ्गारे हैं और आनन्दानुभूति ही (विस्फुलिङ्ग) चिनगारियाँ हैं॥ १ ॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः संभवति॥ २॥ उस दिव्याग्नि में देवगण वीर्य का यजन करते हैं, उस विशिष्ट यजन कार्य से श्रेष्ठ गर्भ का अवतरण होता है॥ [ इस पाँचवी आहुति के पकने पर प्रथम आहुति में होमा गया 'आपः (मूल जीवन) तत्त्व' काया में स्थित पुरुष वाचक 'जीव या प्राणी' के रूप में विकसित हो जाता है।] ॥ नवमः खण्डः ॥ इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा नव वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते॥ १॥ इस तरह से अग्नि विद्या की पाँचवीं आहुति के प्रदान किये जाने पर आपः (प्रथम आहुति में होमा गया श्रद्धारूप सृष्टि का मूल सक्रिय प्रवाह) पुरुष रूप हो जाता है। वह गर्भ जरायु से ढका हुआ नौ या दस महीने अथवा जब तक पूर्ण अङ्ग विकसित नहीं होता, तब तक गर्भ के भीतर ही शयन करने के पश्चात् पुनः प्रादुर्भूत होता है॥ १॥ [ यहाँ तक अग्निविद्या का रहस्य प्रकट हो जाने पर पूछे गये पाँचवें प्रश्न का उत्तर स्पष्ट हो जाता है। इसके बाद पुरुष रूप में उत्पन्न प्रजा की गति सम्बन्धी अन्य प्रश्नों के समाधान प्रकट किये जाते हैं।] स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति॥ २॥ इस प्रकार से जन्म होने पर वह अपनी निश्चित आयु तक जीवित रहता है। इसके बाद शरीर त्याग करने पर कर्मवश परलोक को गमन करते हुए उस प्राणी को अग्नि के समीप ले जाते हैं, जहाँ से वह आया था और जिससे प्रकट हुआ था॥ २॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ इस खण्ड में अग्निविद्या के पाँचों प्रश्नों के उत्तर दिये गये हैं- तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते तेऽर्चिषमभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासाँस्तान् ॥ १ ॥ जो इस पञ्चाग्नि विद्या को जानकर वन में रहते हुए श्रद्धा एवं तपपूर्वक उपासना करते हैं, वे सभी प्राण -प्रयाण के उपरान्त अर्चि (तेज या किरण) के अभिमानी देवताओं को प्राप्त करते हैं। अर्चि से दिवसाभिमानी देवताओं को, दिन से शुक्ल पक्षाभिमानी देवताओं को और शुक्ल पक्ष से उत्तरायण (जिनमें सूर्य उत्तर मार्ग में गमन करता है) के छः मासों को प्राप्त करते हैं॥ १ ॥ मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो - ऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ॥ २ ॥ उन उत्तरायण के छः मासों के माध्यम से संवत्सर को प्राप्त करते हैं, आदित्य को संवत्सर से, चन्द्रमा को आदित्य से और विद्युत् (द्युतिमान्) को चन्द्रमा से प्राप्त करते हैं। वहाँ पर एक अतीन्द्रिय सामर्थ्य से युक्त पुरुष है। वह उसे परब्रह्म को प्राप्त करा देता है। वही देवयान मार्ग है॥ २॥
१४८ छान्दोग्योपनिषद् अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिं रात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद्यान्षड्दक्षिणैति मासाँस्तान्नैते संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ॥ ३ ॥ इसके बाद जो यह सभी गृहस्थ लोग ग्राम में निवास करते हुए इष्ट, पूर्त और दत्त (अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म- इष्ट; वापी, कूप, तड़ाग एवं बगीचे आदि पूर्त के अन्तर्गत और वेदी आदि से बाहर सत्पात्र व्यक्तियों को यथाशक्ति दान देना ही 'दत्त' कहलाता है।) ऐसी उपासना करते हैं। वे धूम को प्राप्त करते हैं, धूम से रात को, रात से कृष्ण पक्ष को और कृष्ण पक्ष से दक्षिणायन के ( जिनमें सूर्य दक्षिण मार्ग से गमन करता है) छः मासों को प्राप्त करते हैं। ये लोग संवत्सर को नहीं प्राप्त कर पाते हैं ॥ ३ ॥ मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४ ॥ दक्षिणायन के महीनों से पितर लोक को प्राप्त होते हैं। पितृलोक से आकाश को और आकाश से चन्द्रमा को प्राप्त करते हैं। यह चन्द्रमा ही राजा सोम है। वह सभी देवों का अन्न है, समस्त देव गण उसका भक्षण करते हैं ॥ ४ ॥ तस्मिन्यावत्संपातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाभ्रं भवति ॥ ५ ॥ वहाँ जब तक कर्मों का क्षय होता है, तब तक उस चन्द्र-मण्डल में निवास करने के बाद इस आगे कहे गये मार्ग से ही पुनः वापस लौट आते हैं। वे पहले आकाश को प्राप्त होते हैं। आकाश से वायु को प्राप्त करने के उपरान्त, वायुभूत होकर वे धूम होते हैं और धूम होकर ही अभ्र (मेघरूप) हो जाते हैं ॥ ५ ॥ अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पत- यस्तिलमाषा इति जायन्तेऽतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥ वह अभ्ररूप होकर मेघ होता है, मेघ होकर वृष्टि करता है, तब वे सभी प्राणी इस लोक में धान, यव (जौ), ओषधि, वनस्पति, उड़द और तिल आदि होकर प्रादुर्भूत होते हैं। इस भाँति यह निष्क्रमण निश्चित ही अत्यन्त कष्टप्रद है। उस अन्न को जो-जो भक्षण करता है और जो-जो उससे उत्पन्न वीर्य का सेवन करता है, वह जीव तद्रूप ही हो जाता है ॥ ६ ॥ तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥ उन सभी जीवों में जो श्रेष्ठ, सुन्दर आचरण वाले होते हैं, वे शीघ्र ही उत्कृष्ट योनि को प्राप्त होते हैं। वे सभी जीव ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य आदि श्रेष्ठ योनि को प्राप्त करते हैं। जो अशुभ अपवित्र आचरण वाले होते हैं, वे तत्क्षण ही अशुभ योनि को प्राप्त होते हैं। ऐसे जीव कुत्ते की योनि या सूकर योनि अथवा चाण्डाल (क्रूर कर्मी) योनि को प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥ अथैतयोः पथोर्न कतरेण च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयः स्थानं तेनासौ लोको न संपूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेष श्लोकः ॥ ८ ॥
अध्याय ५ खण्ड ११ मन्त्र ३ १४९
अध्याय ५ खण्ड ११ मन्त्र ३ १४९ वे प्राणी जो इनसे पूर्व कहे गये किसी अन्य मार्ग से गमन नहीं करते है, वे सभी (निम्न प्राणी मच्छर और कीड़े-मकोड़े आदि) बारम्बार जन्मने-मरने वाले प्राणी ही होते है। जीवन धारण करना और शरीर त्याग करना ही उनका मुख्य तृतीय स्थान कहा गया है। इसलिए इस प्रकार की सांसारिक गति में अत्यधिक आसक्ति नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार घोर संसाररूपी महासागर से पतन को रक्षा स्वयं करने के लिए उद्यत होना चाहिए। इसी हेतु पञ्चाग्नि विद्या को प्रार्थना के लिए यह श्लोक प्रयुक्त किया गया है॥ स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबँश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्महा च। एते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तैरिति ॥ ९ ॥ सोने (स्वर्ण) का हरण करने वाले, मद्यपान करने वाले, गुरु को स्त्री से गमन करने वाले, ब्रह्म विद्या को जानने वालों की हत्या करने वाले - ये चार प्रकार के कृत्य व्यक्ति के पतन का कारण बनते हैं और पाँचवाँ कारण उन सभी के साथ किया गया संसर्ग (व्यवहार या आचरण) है॥ ९॥ अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद न स ह तैरप्याचरन्पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यलोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १०॥ इस प्रकार से उपर्युक्त मन्त्रों में कही गई पञ्चाग्नि विद्या के महत्त्व को जो जानने में समर्थ है, वह उन सभी (लौकिक कर्मों) के साथ व्यवहार (संसर्ग) करता हुआ भी पापकृत कार्यों में लिप्त नहीं होता। इस विद्या को जो जानता है, वह श्रेष्ठ, शुद्ध और पवित्र पुण्यलोक का अधिकारी होता है॥ १०॥ ॥ एकादशः खण्डः ॥ प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसां चक्रुः को नु आत्मा किं ब्रह्मेति ॥ १॥ प्राचीनशाल के नाम से प्रख्यात उपमन्यु के पुत्र औपमन्यव, पुलुष के पुत्र पौलुषि, जो सत्ययज्ञ के नाम से जाने जाते है, भल्लवि के पुत्र भाल्लवि और उसका पुत्र भाल्लवेय जो इन्द्रद्युम्न के नाम से प्रतिष्ठित है, शर्कराक्ष का पुत्र जन शार्कराक्ष्य और अश्वतराश्व का पुत्र बुडिल-ये पाँचों सद्गृहस्थ शास्त्र अध्ययन और सदाचार से युक्त आपस में विचार विमर्श करने लगे कि हमारी आत्मा कौन है और ब्रह्म क्या है ? ॥ १॥ ते ह संपाद्यांचक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः संप्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ २ ॥ विचार विमर्श करने के उपरान्त भी जब किसी ठोस निश्चय पर नहीं पहुँचे, तब उन पूज्य जनों ने अपना उपदेशक नियुक्त किया कि इस समय यह अरुण का पुत्र उद्दालक ही इस वैश्वानर आत्मा को भली- भाँति जानता है, इसलिए हम सभी उसी के पास चलें। ऐसा सोचकर वे सभी आरुणि के पास आये ॥ २ ॥ स ह संपाद्यांचकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३ ॥ इस प्रकार आरुणि ने उन महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय जनों को देखकर यह निश्चय किया कि मैं इनको पूर्णरूपेण आश्वस्त नहीं कर सकता, ऐसा अपने मन में निश्चय करते हुए उसने उन सभी को दूसरा अन्य उपदेष्टा बतला दिया ॥ ३ ॥
१५० छान्दोग्योपनिषद् [ उस समय कोई भी जानकार होने का दम्भ नहीं करता था। स्वयं की कमियाँ अपने प्रशंसकों के बीच भी स्वीकार करके, योग्य पुरुषों के सान्निध्य लाभ का प्रयास किया जाता था। ] तान्होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः संप्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्यति तग् हन्ताभ्यागच्छामेति तग् हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् आरुणि ने उनसे कहा कि हे पूजनीय गण ! इस समय केकय के पुत्र कैकेय कुमार अश्वपति इस आत्मरूप वैश्वानर को पूर्णरूपेण जानते हैं। अतः हम सब उन्हीं के पास चलें। इस प्रकार कहते हुए वे सभी श्रेष्ठ महागृहस्थ एवं परम श्रोत्रिय कैकेय कुमार (अश्वपति) के पास चले गये ॥ ४ ॥ तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयांचकार स ह प्रातःसंजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ॥ ५ ॥ राजा अश्वपति ने अपने पास उपस्थित हुए उन सभी श्रेष्ठ ऋषियों का अलग-अलग स्वागत-सत्कार किया। दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही राजा अश्वपति ने उनसे कहा कि 'मेरे राज्य में न कोई चोर है, न कोई मद्यपान करने वाला है, न कोई अनाहिताग्नि है, न कोई यहाँ अल्पज्ञानी है और न ही कोई पर स्त्री गमन करने वाला है, तो कुलटा स्त्री कैसे हो सकती है। हे पूज्य ऋषियो ! मैं (स्वयं) भी यज्ञ करने वाला हूँ। अतः आपसे प्रार्थना है कि हमारे यज्ञानुष्ठान तक यहीं निवास करने की कृपा करें। शास्त्रानुसार मैंने एक-एक ऋत्विक् को जितना धन प्रदान करने का संकल्प लिया है, उतना ही धन आप सभी को भी प्रदान करूँगा ॥ ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्तग् हैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरग् संप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥ वे समस्त ऋषिगण राजा अश्वपति से बोले कि 'जिस कार्य विशेष से कोई व्यक्ति कहीं प्रस्थान करता है, तो वहाँ उसे अपने उसी उद्देश्य को पूर्ण करना चाहिए'। अतः इस समय तो आप कृपा करके वैश्वानर आत्मा के सम्बन्ध में ही बताएँ ॥ ६ ॥ तान्होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान्हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥ तब उन ऋषियों से राजा अश्वपति ने कहा कि 'अच्छा, मैं कल प्रातःकाल आप सभी को इसके सन्दर्भ में बताऊँगा। दूसरे दिन पूर्वाह्नकाल में वे सभी ऋषि हाथ में समिधाएँ ग्रहण किये हुए पहुँचे। उन सभी का बिना उपनयन किये ही (सुपात्र समझकर) राजा ने उन्हें वैश्वानर विज्ञान से युक्त उस विद्या को बताया ॥ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ राजा अश्वपति ने उपमन्यु कुमार औपमन्यव से प्रश्न किया कि हे औपमन्यव ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? उत्तर देते हुए ऋषिकुमार प्राचीनशाल ने राजा से कहा कि हे भगवन् ! मैं द्युलोक की ही उपासना करता हूँ। राजा ने कहा कि "आप जिस आत्मा की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही 'सुतेजा'
अध्याय ५ खण्ड १४ मन्त्र १ १५१
अध्याय ५ खण्ड १४ मन्त्र १ १५१ नाम से प्रसिद्ध श्रेष्ठ तेज युक्त वैश्वानर रूप आत्मा ही है, इसीलिए आपके कुल में सुत (अभिषुत सोम), प्रसूत (विशेषरूप से अभिषुत सोम) और आसुत (सर्वतोभावेन अभिषुत सोम) दृष्टिगोचर होते हैं, अर्थात् आपके परिवारी जन बड़े ही कर्मनिष्ठ (यज्ञनिष्ठ) हैं ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ राजा अश्वपति ने इसी क्रम में आगे फिर कहा कि आप अन्न का भक्षण करते हैं और पुत्र-पौत्रादि अपने प्रिय को देखते हैं। जो भी इस वैश्वानर रूप आत्मा की इस प्रकार उपासना करते हैं, वे अन्न का भक्षण और अपने श्रेष्ठ इष्ट का दर्शन करते हुए अपने कुल में ब्रह्मतेज से युक्त होते हैं। राजा ने यह भी कहा कि 'यदि आप हमारे पास न आये होते, तो आपका मस्तक गिर जाता' ॥ २ ॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलूषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ तत्पश्चात् राजा अश्वपति ने सत्ययज्ञ से प्रश्न किया कि हे प्राचीन योग्य ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? तब उस ऋषिकुमार ने कहा- 'हे पूज्य भगवन् ! मैं आदित्य की उपासना करता हूँ। राजा ने आश्वस्त होते हुए कहा कि अवश्य ही वह विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिसकी कि आप स्वयं उपासना करते हैं। यही कारण है कि आपके वंश में पर्याप्त मात्रा में विश्वरूप साधन दृष्टिगोचर होते हैं ॥ १ ॥ प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्टे तदात्मन इति होवाचान्धो- ऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ राजा ने कहा कि आपके पास हार से सुसज्जित दासियाँ एवं खच्चरों से जुता हुआ रथ भी विद्यमान है। आप अन्न का भक्षण और प्रिय-इष्ट का दर्शन करते हैं। ऐसे श्रेष्ठ वंश में ब्रह्मतेज का निवास रहता है, लेकिन यह आत्मा का ही चक्षु है। राजा अश्वपति ने पुनः कहा कि यदि आप मेरे पास न आये होते, तो निश्चित ही अपने दोनों नेत्रों से रहित हो जाते ॥ २ ॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥ इसके बाद राजा अश्वपति ने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्न से पूछा कि- हे वैयाघ्रपद्य ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? उसने कहा- 'हे भगवन् ! मैं वायुदेव की उपासना करता हूँ।' राजा ने पुनः कहा कि आप जिस श्रेष्ठ आत्मा की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही पृथग्वर्त्मा (अलग-अलग मार्गों वाला आवह, उद्वह आदि भेदों से युक्त) वैश्वानर आत्मा है। इस कारण से आपके पास भिन्न- भिन्न (अन्न, वस्त्र आदि) उपहार आते हैं तथा आपके पीछे अलग-अलग रथ की श्रेणियाँ चलती हैं ॥ १ ॥
१५२ छान्दोग्योपनिषद अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ राजा ने उस ऋषि कुमार से कहा कि आप अन्न का भक्षण और अपने प्रिय-इष्ट का दर्शन करते हैं। जो भी कोई उचित रीति से इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह प्रिय का दर्शन एवं अन्न का भक्षण करता है तथा उसके कुल में ब्रह्मतेज का निवास रहता है। यह आत्मा का प्राण ही है, ऐसा कहते हुए राजा अश्वपति ने कहा कि यदि आप मेरे पास न आते, तो आपका प्राण ही निकल जाता' ॥ २ ॥ ॥ पञ्चदशः खण्डः॥ अथ होवाच जनः शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥ इसके अनन्तर राजा अश्वपति ने शार्कराक्ष के पुत्र जन से कहा- हे शार्कराक्ष्य! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? तब उस ऋषिकुमार ने कहा- 'हे पूज्य राजन्! मैं आकाश तत्त्व की ही उपासना करता हूँ। राजा ने पुन: कहा कि यह निश्चय ही बहुल संज्ञक (विभिन्न संज्ञाओं से युक्त) वैश्वानर आत्मा है। इसी से आप पुत्र -पौत्रादि के रूप में प्रजा और स्वर्णादि धन से परिपूर्ण हैं ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते संदेहस्त्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ राजा ने फिर कहा कि आप अन्न का भक्षण और अपने प्रिय अर्थात् इष्ट का दर्शन करते हैं। जो इस वैश्वानर आत्मा की इस भाँति से उपासना करता है, वह अन्न का भक्षण एवं प्रिय का दर्शन करता है और उसके कुल में ब्रह्मतेज का निवास होता है। यह आत्मा का उदर (शरीर का मध्य भाग) ही है। आगे राजा अश्वपति ने यह भी कहा कि 'यदि आप मेरे पास न आते, तो आपका संदेह (शरीर का मध्य भाग अर्थात् उदर) ही नष्ट हो जाता' ॥ २ ॥ ॥ षोडशः खण्डः॥ अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वꣳ रयिमान्पुष्टिमानसि ॥ १ ॥ इसके पश्चात् राजा अश्वपति ने बुडिल से प्रश्न किया कि हे वैयाघ्रपद्य ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? तब उन ऋषि कुमार ने कहा- हे पूज्य भगवन् ! मैं तो जल तत्त्व की उपासना करता हूँ। राजा ने पुन: कहा कि 'आप जिस जल तत्त्व की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही रयिवान् (धनवान् ) वैश्वानर आत्मा है। इसी कारण आप (धनवान्) रयिमान् एवं पुष्टिमान् हैं ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ आप अन्न का भक्षण एवं प्रिय (इष्ट) का दर्शन करते हैं। जो मनुष्य इस वैश्वानर रूप आत्मा की उपासना इस तरह से करता है, वह अन्न का भक्षण एवं प्रिय का दर्शन करता है। उसके कुटुम्ब में ब्रह्मतेज का सान्निध्य होता है, किन्तु यह आत्मा का बस्ति (मूत्राशय) ही है। राजा अश्वपति ने यह भी कहा कि 'यदि आप हमारे पास न आते. तो आपका बस्ति स्थान (मत्राशय) ही फटकर नष्ट हो जाता' ॥२॥
अध्याय ५ खण्ड १८ मन्त्र २ १५३
अध्याय ५ खण्ड १८ मन्त्र २ १५३ ॥ सप्तदशः खण्डः ॥ अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १॥ तदनन्तर राजा अश्वपति ने अरुण के पुत्र उद्दालक से प्रश्न किया कि 'हे गौतम ! आपने किस आत्मा की उपासना की है'? तब उन ऋषिकुमार ने उत्तर दिया कि हे राजन् ! मैं पृथ्वी तत्त्व की उपासना करता हूँ। राजा ने फिर कहा कि आप जिस तत्त्व की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही प्रतिष्ठा संज्ञक (पगरूप) वैश्वानर आत्मा है। इसकी कृपा से आपको प्रजा एवं पशुओं की प्राप्ति हुई ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ राजा ने कहा कि हे ऋषि कुमार ! आप अन्न का भक्षण करते हैं और प्रिय (इष्ट) का दर्शन करते हैं। आत्मा रूप वैश्वानर की जो इस भाँति उपासना करता है। वह अन्न का भक्षण और प्रिय का दर्शन करता है। उसके कुल में ब्रह्मतेज भी रहता है, किन्तु यह आत्मा के चरण ही हैं, इस प्रकार अश्वपति ने कहते हुए आगे यह भी कहा- यदि आप मेरे समक्ष न आते, तो आपके चरण अत्यन्त निष्क्रिय हो जाते ॥ २॥ ॥ अष्टादशः खण्डः ॥ तान्होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वाꣳसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥ राजा अश्वपति ने उन सभी ऋषि कुमारों की संबोधित करते हुए कहा कि आप सभी इस वैश्वानर स्वरूप आत्मा को पृथक्-पृथक् जानते हुए अन्न खाते हैं। जो भी मनुष्य 'यही मैं हूँ' इस प्रकार अपने अहं का हेतु होने वाले इस प्रादेश मात्र (अर्थात् द्यु मूर्धा से लेकर पृथ्वी पाद पर्यन्त) अर्थात् वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह सभी लोकों में, सभी प्राणियों में और सभी आत्माओं में अन्न का भक्षण करता है॥ १ ॥ तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥ आगे राजा ने कहा कि इस वैश्वानर आत्मा का मस्तक ही द्युलोक है, नेत्र ही सूर्य है, प्राण ही वायु है, शरीर के बीच का भाग ही आकाश है, बस्ति ही जल है, पृथ्वी ही दोनों पैर हैं, वक्ष ही वेदी है, रोमकूप ही दर्भ (कुश) हैं, हृदय ही गार्हपत्याग्नि है, मन ही दक्षिणाग्नि है और मुँह ही आहवनीय अग्नि के समान है, क्योंकि इसी में अन्न का हवन होता है ॥ २ ॥ [ऋषि पुत्र विराट् वैश्वानर के एक-एक अंग की ही उपासना करते थे। किसी एक अंग में स्थित आत्मा की उपासना से आत्म तत्त्व की अनुभूति तो की जा सकती है, किन्तु उसे वहीं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उस विराट् को यदि किसी अंग में सीमित करने की भूल की जायेगी, तो वह विराट् अपने सतत प्रवाह को बनाए रखने के लिए उस अंग विशेष को क्षति पहुँचा सकता है। इसीलिए राजा अश्वपति द्वारा ऋषि पुत्रों के अंग-विशेषों की हानि की संभावना व्यक्त की गयी थी।]
॥ एकोनविंशः खण्डः ॥
१५४ छान्दोग्योपनिषद् ॥ एकोनविंशः खण्डः ॥ तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीय०स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥ इस प्रकार जो पक्वान्न (पकाया हुआ भोजन) भोजनार्थ सर्वप्रथम आये, उससे यज्ञ करना चाहिए। वह प्रथम आहुति जो "प्राणाय स्वाहा" मन्त्र के साथ समर्पित की जाती है, उससे प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥ प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किंच द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ प्राण के तृप्त होते ही चक्षु तृप्त होते हैं, चक्षुओं के तृप्त होने पर सूर्य तृप्त होता है, सूर्य के तृप्त होते ही द्युलोक तृप्त होता है। द्युलोक के तृप्त होते ही जिस किसी पर द्युलोक और आदित्य (स्वामिभाव से) प्रतिष्ठित हैं, वह भी तृप्त होता है। उसके तृप्त होने पर स्वयं भोजन करने वाला प्रजा, पशु, अन्न आदि के साथ तेज (शारीरिक) कान्ति और ब्रह्मतेज (ज्ञानजन्य तेज) द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥ ॥ विंशः खण्डः ॥ अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ इसके पश्चात् जो दूसरी आहुति समर्पित की जाए, उस समय 'व्यानाय स्वाहा' मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। इस प्रकार से व्यान को तृप्ति प्राप्त होती है ॥ १ ॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किंच दिशश्च चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ व्यान के तृप्त होते ही कर्णेन्द्रिय तृप्त होती है, श्रोत्र के तृप्त होने पर चन्द्रमा तृप्त होता है, चन्द्रमा के तृप्त होने पर दिशाएँ एवं दिशाओं के तृप्त होने पर जिस किसी पर चन्द्रमा एवं दिशाएँ (स्वामिभाव से) स्थित हैं, वह निश्चय ही तृप्त होता है। उसकी तृप्ति के बाद वह भोक्ता (भोजन करने वाला) प्रजा, पशु, अन्न आदि के साथ तेज एवं ब्रह्मतेज द्वारा तृप्ति को प्राप्त करता है ॥ २ ॥ ॥ एकविंशः खण्डः ॥ अथ यां तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय स्वाहेत्यपानस्तृप्यति ॥ १ ॥ तत्पश्चात् तृतीय आहुति 'अपानाय स्वाहा' मंत्र के साथ देनी चाहिए। इससे अपान तृप्त होता है ॥ १ ॥ अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किंच पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ 'अपान' के तृप्त होते ही वागिन्द्रिय तृप्ति को प्राप्त होती है, वाणी के तृप्त होने पर अग्नि को तृप्ति मिलती है, अग्नि के तृप्त होते ही पृथ्वी को तृप्ति प्राप्त होती है एवं पृथ्वी के तृप्त होने पर जिस किसी पर पृथिवी और अग्नि (स्वामिभाव से) स्थित हैं, वह तृप्त होता है, तत्पश्चात् प्रजा, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज के द्वारा तृप्ति को प्राप्त करता है ॥ २ ॥
अध्याय ५ खण्ड २४ मन्त्र ३ १५५
अध्याय ५ खण्ड २४ मन्त्र ३ १५५ ॥ द्वाविंशः खण्डः ॥ अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥ तत्पश्चात् चतुर्थ आहुति 'समानाय स्वाहा' मन्त्र के साथ देनी चाहिए। इससे 'समान' तृप्त होता है ॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किंच विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ समान के तृप्त होते ही मन को तृप्ति मिलती है, मन के तृप्त होते ही पर्जन्य तृप्त होता है और पर्जन्य के तृप्त होने पर विद्युत् को तृप्ति प्राप्त होती है। विद्युत् के तृप्त होने पर वह स्वयं भी तृप्त हो जाता है, जिस पर पर्जन्य एवं विद्युत् आश्रित हैं। उसकी तृप्ति के पश्चात् प्रजा, पशु, अन्न के साथ तेज एवं ब्रह्मतेज द्वारा उपभोग करने वाला (भोक्ता) भी तृप्त हो जाता है ॥ २ ॥ ॥ त्रयोविंशः खण्डः ॥ अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ तदनन्तर पाँचवीं आहुति समर्पित की जाए। यह आहुति 'उदानाय स्वाहा' मंत्र से देनी चाहिए। इस प्रकार के यजन कृत्य से उदान तृप्त होता है ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक् तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाश- स्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किंच वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ तदनन्तर उदान के तृप्त होने से त्वचा की तृप्ति होती है, त्वचा के तृप्त होने से वायु तृप्त होता है, वायु के तृप्त होने पर आकाश को तृप्ति मिलती है और आकाश के तृप्त होने से जिस किसी पर वायु और आकाश (स्वामिभाव से) स्थित होते हैं, वह निश्चय ही तृप्त हो जाता है। उसके तृप्त होने पर वह स्वयं भोक्ता (भोजन करने वाला) प्रजा, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज द्वारा तृप्त हो जाता है ॥ २ ॥ ॥ चतुर्विंशः खण्डः ॥ स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात् ॥ १ ॥ जो कोई इस उपर्युक्त वैश्वानर विद्या को बिना जाने ही यजन कृत्य करता है, उसके द्वारा किया हुआ यजन कृत्य ठीक उसी प्रकार है, जैसे कि आग के अंगारों को हटाकर भस्म में किया गया यज्ञ कार्य ॥ १ ॥ अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥ उपर्युक्त बताये हुए क्रम के अनुसार जो इस वैश्वानर विद्या को भली-भाँति जानकर यज्ञ कार्य (अग्निहोत्र) सम्पन्न करता है, उसके द्वारा सभी लोक, समस्त प्राणिसमुदाय एवं सम्पूर्ण आत्माओं के निमित्त यजन कार्य सम्पन्न हो जाता है ॥ २ ॥ तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥ ३ ॥
१५६ छान्दोग्योपनिषद् इस सन्दर्भ में यह उल्लेख भी है कि जिस तरह सींक का अग्रभाग अग्नि में प्रवेश करा देने से अतिशीघ्र जल जाता है, ठीक उसी तरह से जो यजमान इस भाँति जानने में समर्थ होकर यज्ञ कृत्य सम्पन्न करता है, उसके सभी प्रकार के पाप जलकर नष्ट हो जाते हैं ॥ ३ ॥ तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतꣳस्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥ इस विद्या का जानकार यदि भोजन से उच्छिष्ट (बचा हुआ) पदार्थ चाण्डाल को दे, तो वह कृत्य आत्मा रूप वैश्वानर में यज्ञ करने के समान है। प्रस्तुत विषय में यह मन्त्र कहा गया है॥ ४ ॥ यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते। एवꣳसर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ॥ ५ ॥ जिस भाँति इस संसार में क्षुधित बालक सब प्रकार से माँ की उपासना (प्रतीक्षा) करते हैं। ठीक उसी भाँति संसार के समस्त प्राणि-समुदाय इस ज्ञानी के हव्य रूप यजन कृत्य की उपासना करते हैं ॥ ५ ॥ ॥ अथ षष्ठोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ पाँचवें अध्याय में यह बताया गया है कि अग्निहोत्र के यथार्थ स्वरूप की जानकारी रखने वाले एक विशेषज्ञ के कार्य से सभी प्राणि-समुदाय तृप्त हो जाते हैं; किन्तु ऐसी सम्भावना तभी की जा सकती है, जब समस्त प्राणियों में एक ही आत्मा का आधिपत्य स्थापित हो। प्रस्तुत विषय का विस्तार से इस छठे अध्याय में उल्लेख किया गया है- श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तꣳ ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यम्। न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥ अरुण के पौत्र श्वेतकेतु को उसके पिता (उद्दालक) ने ब्रह्मचर्य के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उसे ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश की अनुमति प्रदान की। उसके पिता ने उसे संबोधित करते हुए कहा कि हमारे वंश में जन्म लेने वाला कोई भी बालक ब्रह्म विद्या के अध्ययन के बिना ब्रह्मबन्धु की भाँति नहीं होता ॥ [ ब्रह्म बन्धु उसे कहते हैं, जो ब्राह्मणों जैसा आचरण नहीं कर पाता; किन्तु उनसे सम्बद्ध होता है। ऋषि के कथन का भाव है कि उनके कुल में सभी आचरण निष्ठा ब्रह्मज्ञ होते हैं। ] स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तꣳ ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ इस प्रकार से उसके पिता द्वारा उपदेश दिये जाने पर श्वेतकेतु ने मात्र १२ वर्ष की उम्र में ही अपने आचार्य के सान्निध्य में उपस्थित रहकर २४ वर्ष की उम्र तक वेदों का अध्ययन-अनुशीलन किया। तत्पश्चात् वह स्वयं को बड़ा अध्ययनरत एवं विद्वान् अनुभव करते हुए स्वाभिमान के साथ पिता के सामने उपस्थित हुआ। पिता ने विपरीत स्वभाव वाले उद्दण्ड श्वेतकेतु से कहा- “क्या तुमने अपने आचार्य से परब्रह्म का उपदेश (ज्ञान) प्राप्त कर लिया है।" ॥ २ ॥ येनाश्रुतꣳ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति। कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥
अध्याय ६ खण्ड २ मन्त्र २ १५७
अध्याय ६ खण्ड २ मन्त्र २ १५७ श्वेतकेतु के पिता उद्दालक ने पुनः उससे पूछा कि जिसके द्वारा अश्रुत (न सुना हुआ) श्रुत (सुना हुआ) हो जाता है, तर्क न करने वाला तर्क की विद्या में पारंगत हो जाता है; अविज्ञात (रहस्य से युक्त) विशेष रूप से ज्ञात हो जाता है, क्या यह सभी उपदेश तुम्हारे आचार्य ने तुम्हें प्रदान किए हैं। यह सुनकर श्वेतकेतु ने पूछा- भगवन् ! यह उपदेश कैसा है? ॥ ३ ॥ यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ उसके पिता ने पुनः कहा - हे सोम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिका पिण्ड से समस्त मिट्टी के बने हुए पदार्थों का बोध हो जाता है। वस्तुतः विभिन्न प्रकार के नाम तो केवल वाणी के ही विकार हैं। सत्य तो केवल एक मृत्तिका ही है॥ ४॥ यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातँस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥ उन्होंने कहा- हे सोम्य ! जैसे एक सुवर्ण पिण्ड द्वारा दूसरे अन्य सुवर्ण के पदार्थों (आभूषणों) का विशेष ज्ञान प्राप्त हो जाता है, क्योंकि विकार तो केवल वाणी के आश्रित नाम मात्र ही हैं, सुवर्ण ही एक मात्र सत्य है॥ ५ ॥ यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातः स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवँ सोम्य स आदेशो भवतीति ॥ ६ ॥ हे सोम्य ! जिस तरह एक नख कर्तन करने वाली लोहे की नहनी के ज्ञान से समस्त लौह पदार्थों को भली- भाँति जान लिया जाता है। विकार (नाम) तो वाणी के निमित्त विषय हैं, सत्य तो केवल एक लोहा ही है॥ ६ ॥ न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्ध्येतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवाँस्त्वेवमेतद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७॥ अपने पिता के इस प्रकार के वचनों को सुन कर श्वेतकेतु ने कहा- हे भगवन् ! वे मेरे पूज्य गुरुदेव इस ज्ञान को निश्चित ही नहीं जानते। यदि वे जानते, तो मुझसे क्यों न कहते। अतः हे भगवन् ! आप ही इसका उपदेश करें। तब उद्दालक ने कहा- ' अच्छा सोम्य ! मैं तुम्हें बतलाता हूँ' ॥ ७॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेक- मेवाद्बितीयं तस्मादसत: सज्जायत ॥ १ ॥ उद्दालक ने श्वेतकेतु को उपदेश करते हुए कहा- हे प्रिय सोम्य ! प्रारम्भ में एक मात्र अद्वितीय सत् ही था। उसके संदर्भ में कुछ लोग इस प्रकार कहते हैं कि आरम्भ में मात्र अद्वितीय असत् ही था और उस असत् से ही सत् की उत्पत्ति हुई ॥ १ ॥ कुतस्तु खलु सोम्यैव ः स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति। सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥ उद्दालक ने कहा- हे सोम्य ! परन्तु यह कैसे हो सकता है? असत् से सत् की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? हे सोम्य ! वास्तव में प्रारम्भिक अवस्था में यह एक मात्र अद्वितीय सत् ही था ॥ २ ॥
१५८ छान्दोग्योपनिषद् तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत। तत्तेज ऐक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत। तस्माद्यत्र क्वच शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥ आगे उसके पिता ने कहा- "उस (सत्) ने संकल्प किया कि मैं विभिन्न रूपों में उत्पन्न हो जाऊँ।" इस प्रकार इच्छा करते ही उस (सत्) से तेज की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् उस तेज ने संकल्प किया कि 'मैं भी बहुत हो जाऊँ।" ऐसा संकल्प लेते ही उस (तेज) ने अप् तत्त्व (जल) की रचना की। अतः जब किसी को सन्ताप होता है, तो पसीना आ जाता है। उस समय उस तेज से ही जल की उत्पत्ति हो जाती है ॥ ३ ॥ ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त। तस्माद्यत्र क्वच वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ तदनन्तर उस आपः (जल) ने अपनी इच्छा व्यक्त की "मैं बहुत होकर उत्पन्न हो जाऊँ।" उस (जल) ने पृथ्वी रूपी अन्न की रचना की। इस कारण से जहाँ- कहीं वर्षा होती है, वहीं बहुत से अन्न की उत्पत्ति होती है। अतः विभिन्न प्रकार के अन्न जल से ही उत्पन्न होते हैं ॥ ४ ॥ [ऋषि पहले (अध्याय ५ में) स्पष्ट कर चुके हैं कि सृष्टि सृजनक्रम में पहली आहुति द्युलोक में हुई। सत् तेज बना- द्युलोक तेजस् का ही लोक कहा गया है। इस सृजन संकल्प युक्त तेजस् को ही वेद ने हिरण्यगर्भ कहा है। संकल्प पूर्वक उस तेजस् के विभाजन से अप् तत्त्व का प्रादुर्भाव हुआ। इसे वेद ने सृष्टि का मूल क्रियाशील प्रवाह माना है। जिसे द्युलोक का जल भी कह सकते हैं। इस अप् प्रवाह के संकल्प से अति सूक्ष्म पदार्थ कण (सब एटामिक पार्टिकल्स) बने, जिन्हें द्युलोक का पृथ्वी तत्त्व कह सकते हैं। दूसरे चरण में तेजस् सूर्यादि के रूप में व्यक्त हुआ। उस तेजस् के अप् तत्त्व में संघात से अन्तरिक्ष में परमाणु कणों और जल की उत्पत्ति हुई। उस जल और सूक्ष्म कणों के संयोग से स्थूल कणों के रूप में पृथ्वी तत्त्व बना। ऋषि दोनों चरणों की प्रक्रिया देखते हैं, इसलिए उनके कथन में, तेज, अप्, पृथ्वी आदि के सूक्ष्म-स्थूल, दृश्य-अदृश्य दोनों भाव मिले हुए हैं। उसी दृष्टि से उनके कथन का अर्थ स्पष्ट हो सकता है।] ॥ तृतीयः खण्डः ॥ तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्याण्डजं जीवजमुद्भिज्जमिति ॥ १ ॥ (तदनन्तर उद्दालक ने सृष्टि क्रम समझाते हुए श्वेतकेतु से और स्पष्ट करते हुए कहा-) इन ख्याति प्राप्त प्राणियों के तीन ही बीज अण्डज, जरायुज और उद्भिज्ज होते हैं ॥ १ ॥ सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥ उस (सत्रूपी) देवता ने अपनी प्रचण्ड इच्छाशक्ति के माध्यम से संकल्प किया कि मैं इस "जीवात्मरूप से" इन तीनों (तेज, अप् एवं पृथ्वी) देवताओं में अनुप्रवेश कर नाम एवं उसके रूप को प्रकट करूँ ॥ २ ॥ तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ॥ ३ ॥ और उन सभी में से एक-एक देवता को त्रिवृत् अर्थात् तीन-तीन भागों में विभाजित करूँ। इस प्रकार का संकल्प करते हुए इस देवता ने जीवात्मरूप से उन तीनों देवों में प्रवेश करते हुए उनके नाम एवं रूप को स्पष्ट किया ॥ ३ ॥