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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

षट् दर्शनों की हिन्दी टीका भारतीय दर्शन को प्राचीन काल से संसार में सर्वोच्च स्थान प्राप्त रहा है। वेद और उपनिषदों में जिन आध्यात्मिक तत्त्वों का उपदेश दिया गया है, दर्शनों में उसे तर्क तथा युक्ति के अनुकूल एवं व्यवस्थित रूप दे दिया गया है, जिससे मनुष्य की बुद्धि उसे भली प्रकार ग्रहण करके उस पर आचरण करने की सामर्थ्य प्रदान कर सके । मनुष्य क्या है .? उसके जीवन का लक्ष्य क्या है ? इसका कोई सृष्टा है या नहीं ? मनुष्य को अपना जीवन किस तरह व्यतीत करना चाहिए ? भारतीय दर्शनों ने इन्हीं प्रश्नों पर बड़ी व्यापक दृष्टि से विचार किया है और इस बात को स्पष्ट रूप से समझा दिया है कि संसार के दुःखों का कारण क्या है और उनका नाश किस प्रकार किया जा सकता है। इससे मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य को समझ सकता है और तदनुसार आचरण करके उन दुःखों से छुटकारा पा सकता है । वैशेषिक दर्शन की रचना कणादि मुनि ने की है। इस दर्शन के सूत्र भारतीय दर्शन सूत्रों में सबसे प्राचीनतम हैं। कणाद ने इस दर्शन में सृष्टि रचना में परमाणुवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है । कणादन का मत है कि धर्म के बिना अन्तःकरण शुद्ध नहीं हो सकता । अशुद्ध अन्तः- करण में प्रकाश नहीं होता । न्याय दर्शन के रचयिता गौतम हैं । यह मानव को मुक्ति का मार्ग प्रस्तुत करता है। इसमें अपने विषय को सम- झाने के लिए तर्क और बुद्धि का सहारा लिया गया है। न्याय की यह नीति सभी दर्शनों की पथप्रदर्शक है। कपिल का सांख्य दर्शन प्रधानतः ज्ञान मार्ग से मानव व्यक्तित्व के चरम विकास की योजना प्रस्तुत करता है। योग दर्शन जीवन की पवित्रता और चिन्तन, मन्त्र और निदिध्यासन के द्वारा उपर्युक्त उद्देश्य की पूर्ति करता है । महर्षि जैमिनी के मीमांसा दर्शन का प्रतिपादक विषय कर्मकाण्ड है । वैदिक काल में यज्ञ सम्बन्धी प्रक्रियाओं के रूप नियत करने में जो तर्क वितर्क उपस्थित किए गए, उन्हीं से इस दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ । यज्ञीय कर्मों से ही स्वर्ग अर्थात् ब्रह्म की प्राप्ति हो सकती है, यह दर्शन की मूल धारणा है। महर्षि बाद- रायण व्यास द्वारा रचित वेदान्त दर्शन वैदिक साहित्य की सारी दार्शनिक शिक्षाओं का निचोड़ ही है । प्रत्येक दर्शन का मूल्य ४) प्रकाशक : संस्कृति संस्थान, ख्वाजाकुतुब, बरेली (उ० प्र०)

सांस्कृतिक विचारधारा के प्रसार का प्रतिनिधि मासिकपत्र "युग-संस्कृति" 'युग-संस्कृति' युग की वाणी व पुकार है। इसका उद्देश्य नवीन, आधुनिक, वैज्ञानिक ढंग से भारतीय संस्कृति की विशेषताओं, विचार- धाराओं व परम्पराओं का बौद्धिक आधार पर प्रतिपादन करना है। भारतीय तत्वज्ञान के मूलाधार तत्वों का स्पष्टीकरण करके संस्कृति के विशुद्ध व परिष्कृत रूप को जनता के सम्मुख रखना है। व्रत, त्यौहार, रीतिरिवाजों, आचार विचार, पूजा उपासना पद्धति की मनोवैज्ञानिक उपयोगिता को प्रस्तुत करना है। वेद-विज्ञान, संस्कार-विज्ञान, योग- विज्ञान, परलोक-विज्ञान, तुलसी-विज्ञान, पुराण-विज्ञान पर प्रकाश डालना है। ऋषि चरित्रों, व्रत कथाओं व पुराणों में असम्भव दिखाई देने वाली कथाओं में निहित वास्तविक तथ्यों का अनुसन्धान करना है। उपनिषदों की ज्ञान गंगा का प्रवाह, स्मृतियों की नीति, रामायण की पारिवारिक शिक्षा व गीता का तात्विक विवेचन इसकी विशेषता है। धर्म व संस्कृति की भावना का व्यापक विस्तार, समाज का नव-निर्माण, व नैतिक पुनरु- त्थान इसका लक्ष्य है। यदि आप अपने धर्म के प्रत्येक अंग को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता देखना चाहते हैं तो युग-संस्कृति को पढ़ें। पत्रिका साइज के ३६ पृष्ठों व बढ़िया ग्लेज कागज के दोरंगे टाइटल से सुसज्जित होने पर भी मूल्य केवल ३) वार्षिक है। नमूने की प्रति मुफ्त मँगाइये प्रकाशक : संस्कृति संस्थान, ख्वाजाकुतुब, बरेली (उ० प्र०)

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठतम धर्मग्रंथ १. चारों वेद ८ जिल्दों में— ऋग्वेद ४ खण्ड ... २४) अथर्व वेद २ खण्ड ... १२) यजुर्वेद १ खण्ड ... ६). सामवेद १ खण्ड ... ६) २. १०८ उपनिषदें (३ खण्डों में) ज्ञान खण्ड ... ७) ब्रह्मविद्या खण्ड ... ७) साधना खण्ड ... ७) ३. षट् दर्शन (६ जिल्दों में) वेदान्त दर्शन ... ४) सांख्य दर्शन ... ४) योग दर्शन ... ४) वैशेषिक दर्शन ... ४) न्याय दर्शन ... ४) मीमांसा दर्शन ... ५) ४. २० स्मृतियां २ खंड ... १४) ५. शिव पुराण ... १२)७५ वायु पुराण २ खण्ड ... १४) विष्णु पुराण २ खण्ड ... १४) अग्नि पुराण २ खण्ड ... १४) मार्कण्डेय पुराण २ खण्ड ... १४) संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब, बरेली जागरण बुक-कम्पनी प्रिन्टिंग प्रेस, मथुरा।