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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

सूर्योपनिषत् [ ५३६ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । सूर्याद्वै खल्विमानि भूतानि जायन्ते । सूर्याद्यज्ञः पर्जन्योऽन्नमात्मा ॥ ३ ॥ नमस्त आदित्य । त्वमेव प्रत्यक्षं कर्मकर्ताऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षं विष्णुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं रुद्रोऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षमृगसि । त्वमेव प्रत्यक्ष यजुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं सामासि । त्वमेव प्रत्यक्षमथर्वाऽसि । त्वमेव सर्वं छन्दोऽसि ॥ ४ ॥ • आदित्याद्वायुर्जायते । आदित्याद्भूमिर्जायते । आदित्य- दापो जायन्ते । आदित्याज्ज्योतिर्जायते । आदित्याद्व्योम दिशो जायन्ते । आदित्याद्देवा जायन्ते । आदित्याद्वेदा जायन्ते । आदित्यो वा एष एतन्मण्डलं तपति । असावादित्यो ब्रह्म । आदित्योऽन्तःकरणमनोबुद्धिचित्ताहङ्काराः । आदित्यो वै व्यानः समानोदानोऽपानः प्राणः । आदित्यो वै श्रोत्रत्वक्चक्षूरसन- घ्राणः । आदित्यो वै वाक्पाणिपादपायूपस्थाः । आदित्यो वै शब्दस्पर्शरूप रसगन्धाः । आदित्यो वै वचनादानागमनविसर्गा- नन्दाः । आनन्दमयो विज्ञानमयो विज्ञानमय आदित्यः ॥ ५ ॥ अब सूर्य-सम्बन्धी अथर्ववेदीय मन्त्रों की व्याख्या की जाती है । इस मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा, छन्द गायत्री, देवता सूर्य हैं । 'हंसः' 'सोऽहं' अग्निनारायण युक्त बीज तथा हृल्लेखा शक्ति है । कीलक वियत् आदि सृष्टि से संयुक्त है । इसका विनियोग चारों प्रकार की पुरुषार्थ-सिद्धि में करते हैं । छः स्वरों पर प्रतिष्ठित बीज सहित षडाङ्ग रक्तकमल पर स्थित, सात अश्वों से युक्त रथ पर आरूढ़, हिरण्यवर्ण, चार भुजाओं में दो कमल, वरमुद्रा और अभयमुद्राधारी कालचक्र के विधायक सूर्य को इस भांति जानने वाला ही ब्राह्मण है, ॥ १ ॥ जो सूर्य नारायण प्रणव के अर्थभूत सत्-चित्-आनन्दमयं तथा भूः भुवः स्वः रूप से त्रैलोक्य रूप

५४० ] [ सूर्योपनिषत्

हैं, उन्हीं विश्व-रचयिता के महान् तेज का हम चिन्तन करते हैं। वे भगवान हमारी बुद्धियों के प्रेरक हैं ॥ २ ॥ सूर्य सम्पूर्ण स्थावर जङ्गम के आत्मा हैं। इन्हीं से इन भूतों की उत्पत्ति होती है। उन्हीं से यज्ञ, मेघ और आत्मा आविर्भूत होते हैं ॥ ३ ॥ हे आदित्य ! हम तुम्हें नम- स्कार करते हैं। तुम्हीं कर्म और कर्त्ता हो, तुम्हीं ब्रह्मा और विष्णु हो। तुम्हीं रुद्र एवं ऋक्, यजु, साम और अथर्व हो। तुम सम्पूर्ण छन्द रूप हो ॥ ४ ॥ आदित्य से वायु, भूमि, जल, ज्योति, आकाश और दिशाएँ उत्पन्न होती हैं। उन्हीं से देवता प्रकट होते हैं। उन्हीं से वेदों की उत्पत्ति है। इस ब्रह्माण्ड को आदित्य ही तपाते हैं। वही ब्रह्म हैं। वही अन्तःकरण रूप हैं। वही पाँचों प्राण के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वही पंचेन्द्रिय के रूप में कार्य करते हैं। वही पंच कर्मेन्द्रिय हैं। ज्ञानेन्द्रियों के पञ्च विषय भी वही हैं। कर्मेन्द्रियों के पाँच विषय आदित्य ही हैं। वे ही ज्ञान-विज्ञान से युक्त एवं आनन्दमय हैं ॥ ५ ॥

नमो मित्राय भानवे मृत्योर्मा पाहि। भ्राजिष्णवे विश्व- हेतवे नमः । सूर्याद्भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु । सूर्ये लयं प्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च ॥ चक्षुर्नो देवः सविता चक्षुर्न उत पर्वतः । चक्षुर्धाता दधातु नः ॥ आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि । तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् । सविता पुरस्तात् सविता पश्चात्तात् सवितोत्तरात्तात् सविताऽधरात्तात् । सविता नः सुवतु सर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायुः ॥६

यः सदाऽहरहर्जपति स वै ब्राह्मणो भवति स वै ब्राह्मणो

सूर्योपनिषत् [ ५४१ ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म । घृणिरिति द्वे अक्षरे । सूर्य इत्यक्षरद्वयम् । आदित्य । इति त्रीण्यक्षराणि । एतस्यैव सूर्यस्याष्टाक्षरो मनुः ॥७॥ यः सदाऽहरहर्जपति स वै ब्राह्मणो भवति स वै ब्राह्मणो भवति । सूर्याभिमुखो जप्त्वा महाव्याधिभयात् प्रमुच्यते । अलक्ष्मीर्नश्यति । अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति । अगम्यागमनात् पूतो भवति । पतितसंभाषणात् पूतो भवति । असत्संभाषणात् पूतो भवति । मध्याह्ने सूर्याभिमुखः पठेत् । सद्योत्पन्नपञ्चमहा- पातकात् प्रमुच्यते । सैषा सावित्री विद्यां (द्या) न किंचिदपि न कस्मैचित् प्रशंसयेत् । य एतां महाभागः प्रातः पठति स भाग्यवान् जायते । पशून् विन्दति । वेदार्थं लभते । त्रिकाल- मेतज्जप्त्वा ऋतुशतफलमवाप्नोति । हस्तादित्ये जपति स महामृत्युं तरति स महामृत्युं तरति य एवं वेद । इत्युपनिषत् ।८। मित्र देवता और भगवान् सूर्य को नमस्कार है। भगवन् ! मृत्यु से मेरी रक्षा करो ! विश्व के कारण रूप एवं तेजस्वी सूर्य को नमस्कार है । सूर्य से ही सब चराचर प्राणियों की उत्पत्ति है । वे ही उनका पालन करते हैं तथा अन्त में सब जीव उन्हीं में लीन हो जाते हैं। जो सूर्य हैं, वही मैं हूँ। सविता देव हमारे चक्षु हैं। सब के धारण करने वाले सूर्य हमारे नेत्रों को देखने की शक्ति प्रदान करने वाले बनें । 'हम आदित्य को जानते हैं। इस सहस्ररश्मि वाले भगवान् भास्कर का ध्यान करते हैं। वे सूर्य हमें प्रेरणा दें।' पीछे-आगे, इधर-उधर सब ओर सविता देव हैं । वे सविता देव हमारे निमित्त सब कुछ उत्पन्न करें। वे हमें दीर्घायु दें। ॐ रूप एकाक्षर मन्त्र ब्रह्म है। 'घृणि' और 'सूर्य' दो-दो अक्षरों के मन्त्र हैं। 'आदित्य' में तीन अक्षर हैं। इन सब के योग से सूर्य नारायण का अष्टाक्षर महामन्त्र हो जाता है ॥ ७ ॥ इस

५४२ ] [ सूर्योपनिषत् मन्त्र को नित्य प्रति जपने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। सूर्य की ओर मुख करके जाप करने से घोर रोग से छुटकारा मिलता है। दरिद्रता दूर होती और पाप नष्ट होते हैं। मध्याह्न काल में सूर्याभिमुख जप करने से हाल में उत्पन्न हुए पञ्च महापापों से मुक्त होता है। इस सावित्री विद्या की कहीं कुछ प्रशंसा न करे। प्रातःकाल पाठ करने वाले की भाग्यवृद्धि होती है। उसे पशु, धन आदि के साथ ही वेदार्थ ज्ञान की उपलब्धि होती है। त्रिकाल जप से सैकड़ों यज्ञों का फल मिलता है। सूर्य के हस्त नक्षत्र पर रहते हुए इसका जप करने वाला महामृत्यु से पार होता है तथा इस प्रकार जानने वाला भी महामृत्यु को लाँघ जाता है। ॥ सूर्योपनिषद् समाप्त ॥

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भावनोपनिषत्

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥ शान्तिपाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें। महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥ श्री गुरुः परम कारणभूता शक्तिः ॥ १ ॥ केन ! नवरन्ध्ररूपो देहो नवशक्तिमयं श्रीचक्रम् । वाराही पितृरूपा कुरुकुल्ला बली देवता माता । पुरुषार्थाः सागराः । देहो नवरत्नद्वीपः । आधारनवमुद्राः शक्तयः । त्वगादिसप्तधातुभिरनेकैः संयुक्ताः संकल्पा कल्पतरवः । तेजः कल्पकोद्यानम् । रसनया भाव्यमाना मधुराम्लतिक्तकटुकषायलवणरसा षडृतवः । क्रिया- शक्तिः पीठम् । कुण्डलिनी ज्ञानशक्तिर्गुहम् । इच्छाशक्तिर्महात्रि- पुरसुन्दरी ज्ञाता होता । ज्ञानमर्घ्यम् ज्ञेयं हविः । ज्ञातृज्ञान- ज्ञेयानामभेदभावनं श्रीचक्रपूजनम् । नियतिसहितशृङ्गारादयो नव रसा अणिमादयः । कामक्रोधलोभमोहमात्सर्यपुण्यपापमया

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५४४ ] [ भावनोपनिषत् ब्राह्माद्यष्टशक्तयः । पृथिव्यापस्तेजोवाय्वाकाशश्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वा- घ्राणवाक्पाणिपादपायूपस्थविकाराः षोडश शक्तयः । वचनादान- गमनविसर्गानन्दहानोपादानोपेक्षाबुद्धयोऽनङ्गकुसुमादिशक्तयोऽष्टौ । अलम्बुसा कुहूविश्वोदरी वरुणा हस्तिजिह्वा यशस्वत्यश्विनी गान्धारी पूषा शङ्खिनी सरस्वतीडा पिङ्गला सुषुम्ना चेति चतुर्दश नाड्यः सर्वसंक्षोभिण्यादिचतुर्दशारदेवताः । प्राणापानव्यानोदान- समाननागकूर्मकृकरदेवदत्तधनंजया दश वायवः सर्वसिद्धि प्रदाऽऽ- दिवहिर्दशारदेवताः । एतद्वायुतशसंसर्गोपाधिभेदेन रेचकपूरकशो- षकदाहकपावका अमृतमिति प्राणमुख्यत्वेन पञ्चविधोऽस्तिं । मनुष्याणां मोहको देहको भक्ष्यभोज्यलेह्यचोष्यपेयात्मकं चतुर्विध- मन्नं पाचयंति । एता दश धनकलाः सर्वज्ञत्वाद्यन्तर्दशारदेवताः । शीतोष्णसुखदुःखेच्छासत्वरजस्तमोगुणा वशिन्यादिशक्तयोऽष्टौ । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पञ्चतन्मात्राः पञ्च पुष्पबाणा मन इक्षु- धनुः । वश्यो बाणो रागः पाशो द्वेषोऽङ्कुशः । अव्यक्तमहत्तत्वा- हंकारकामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिन्योऽन्तस्त्रिकोणाग्रगा देवताः । पञ्चदशतिथिरूपेण कालस्य परिणामावलोकनं पञ्चदश नित्या श्रद्धाऽनुरूपाधिदेवता । तयोः कामेश्वरी सदानन्दघना पूर्णा स्वात्मैक्यरूपा देवता ॥ २ ॥ श्री गुरु ही सर्व प्रधानभूत शक्ति हैं । (गुरु शब्द का अर्थ है गु अर्थात् अपने अज्ञान को रु अर्थात् अपने ज्ञान से जो नष्ट करदे ।) (इन्हीं की कृपा से ईशत्व की प्राप्ति होती है)। १। किस कारण से देह में श्रीचक्रत्व सिद्ध होता है ? नौ छेदों से युक्त शरीर है और विमल से लेकर ईशान तक नौ शक्तियों से युक्त श्रीचक्र है। इसकी माता कुरु कुल्ला देवी तथा वाराही पिता के रूप में हैं। पुरुषार्थ उद्योग (परिश्रम) चारों पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ही इसके चार समुद्र हैं । देह ही नवरत्न द्वीप है। इस द्वीप की आधारभूत शक्तियाँ योनिमुद्रा आदि

भावनोपनिषत् ] [ ५४५ सर्व संक्षोभिणी पर्यन्तवर्णित महात्रिपुरसुन्दरी आदि नौ हैं। त्वचा, आदि सात धातुओं से मुक्त संकल्प-विकल्प ही कल्पवृक्ष है। उस परमात्मा से भिन्न प्रतीयमान तेज स्वरूप-सा जीव ही उद्यान है। जीभ के द्वारा आस्वादित किये जाने वाले मधुर, अम्ल, तिक्त (खट्टा, तीखा) कड़वा, कषैला और नमकीन रस छः ऋतुयें हैं। क्रिया नामक जो शक्ति वही पीठ है। कुण्डलिनी रूप ज्ञान शक्ति ही घर है। इच्छा शक्ति ही महा- त्रिपुरसुन्दरी नामक आराध्य भगवती है। जानने वाला, ही हवन करने वाला, ज्ञान ही अर्घ्य एवं जानने लायक वस्तुयें ही हविरूप (हवन करने का द्रव्य) हैं। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय को अभेद मानना ही श्रीचक्र का पूजन है। नियति (भाग्य) से मुक्त शृङ्गार, वीर, करुणा आदि नौ रस ही अणिमा, महिमा, गरिमा आदि दश सिद्धियां हैं। काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य पुण्य तथा पाप से युक्त ब्राह्मी आदि आठ शक्तियां हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, कान, त्वचा, आंख, जीभ, नाक, वाणी, हाथ, मूलमूत्रेन्द्रियां आदि विकार ही सोलह शक्तियां हैं। वाचनादान, गमन, विसर्ग, आनन्द, दान, उपादान, उपेक्षा, बुद्धि तथा अनङ्ग कुसुम आदि आठ शक्तियां हैं। आलम्बुसा, कुहू, विश्वोदरी, वरुणा, हस्तिजिह्वा, यशस्विनी, अश्विनी, गान्धारी पूषा, शंखिनी, सरस्वती, इडा, पिङ्गला, सुषुम्ना ये चौदह नाड़ियां सर्व संक्षोभिणी आदि चौदह देवतात्मक हैं। प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय ये दश वायु सर्व सिद्धिप्रद आदि बाह्यमुख दशारदेवता प्रधान हैं इन दश वायुओं के सम्पर्क एवं स्थान भेद से, रेचक, पूरक, शोषक, दाहक, प्लावक अमृत ये पांच रूप में वायु प्रधान हैं अर्थात् इन पाँच नाम से ये वायु प्रधानतया गृहीत होते हैं, तथा मनुष्यों के मोहक, तथा दाहक होते हुए चबाये जाने वाले, चाटे जाने वाले, चूसे जाने वाले तथा पिये जाने वाले इन चार प्रकार के अन्न को पकाते हैं। ये दश अग्नि की कला स्वरूप वायु ही सर्वज्ञत्व आदि अन्तर्दशारदेवतात्मक हैं। शीत, उष्ण, सुख, दुःख,

५४६ ] [ भावनोपनिषत् इच्छा, सत्त्व, रज, तम आदि ही वशिनी आदि आठ शक्तियां हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि पंच तन्मात्रायें ही पाँच पुष्पों के बाण हैं और मन ही ईख का बना धनुष है (अर्थात् मन से ये रूपादि फेंके जाते हैं।) वश में होना ही वाण है, राग (प्रेम) ही पाश (बन्धन) है, द्वेष ही अंकुश है। अव्यक्त, महत्तत्व, अहंकार, कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी आदि आन्तरिक त्रिकोण के अग्रस्थित देवता हैं। पन्द्रह तिथियों के रूप से काल के परिणाम को देखना, पन्द्रह नित्य श्रद्धानुरूप अधिदेवता हैं। उनमें (वज्रेश्वरी तथा भगमालिनी में) आद्या प्रधान कामेश्वरी हैं जो कि सत्, चित्, आनन्द घनस्वरूप हैं। तथा परमा मैंक रूपादेवता हैं ॥ १ ॥ (सारांश यह हुआ कि इन आयु के वशीकरण से रूपादि को वश में रखने से कुण्डलिनी, जीव, आत्मा आदि के ज्ञान को भली भाँति प्राप्त कर सर्वत्र एकभाव-भावना ही भावनोपनिषद है जो कि मोक्ष का खुला द्वार है ) ॥ २ ॥ सलिलं सौहित्यकारणं सत्त्वं कर्तव्यमकर्तव्यमिति भावना- युक्त उपचारः । अस्ति नास्तीति कर्तव्यता उपचारः । बाह्या- भ्यन्तःकरणानां रूपग्रहणयोग्यताऽस्त्वित्यावाहनम् । तस्य बाह्या- भ्यन्तःकरणानामेकरूपविषयग्रहणमासनम् । रक्तशुक्लपदैकीकरणं पाद्यम् । उज्ज्वलदामोदानन्दासनं दानमर्घ्यम् । स्वच्छं स्वतः- सिद्धमित्याचमनीयम् । चिच्चन्द्रमयीसर्वाङ्गस्रवणं स्नानम् । चिदग्निस্বরূপपरमानन्दशक्तिस्फुरणं वस्त्रम् । प्रत्येक सप्तविंश- तिधा भिन्नत्वेनेच्छाज्ञानक्रियाऽऽत्मब्रह्मग्रन्थिभद्रसतन्तुब्रह्मनाडी ब्रह्मसूत्रम् । स्वव्यतिरिक्तवस्तुसङ्गरहितस्मरणं विभूषणम् । स्वच्छस्वपरिपूर्णानुस्मरणं गन्धः । समस्तविषयाणां मनसः स्थैर्येणानुसंधानं कुसुमम् । तेषामेव सर्वदा स्वीकरणं धूपः । पवनावच्छिन्नोर्ध्वज्वलनसच्चिदुल्काऽऽकाशदेहो दीपः । समस्त- यातायतवर्ज्यं नैवेद्यम् । अवस्थात्रयैकीकरणं ताम्बूलम् ! मूला-

भावनोपनिषत् ] [ ३४७ धारादाब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं ब्रह्मरन्ध्रादामूलाधारपर्यन्तं गतागतरूपेण प्रादक्षिणम् । तुर्यावस्था नमस्कारः । देहशून्यप्रमातृतानिमज्जनं बलिहरणम् । सत्वमस्ति कर्तव्यमकर्तव्यमौदासीन्यनित्यात्म- विलापनं होमः । स्वयं तत्पादुका निमज्जनं परिपूर्णध्यानम् ॥३॥ सलिल तथा गुह मन्त्रात्मक देवताओं का एकीकरण रुद्र जो सत्व ही कर्तव्य है इस भावना से युक्त ही इसका उपचार है (पूजा) है । ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं है, यह जो कर्तव्यता यह भी उपचार है । ब्रह्म तथा आभ्यन्तर के कारणों की रूप ग्रहण की योग्यता ही यही आवाहन है । उसका बाह्य तथा आभ्यन्तर कारणों का एक रूप विषयों का ग्रहण करना ही आसन है । केवल-कुम्भक से सुषुम्ना प्रवेश के अनन्तर मूलाधार तथा भौंहों के मध्य में स्थित प्रत्येक ओर पर-नाम के लाल तथा सफेद पदों का एकीकरण ही पाद्य है । अपने शिष्यों को यह उपदेश करना कि ब्रह्माभिन्न सदोज्वल दामोदानन्द रूप से स्थिति हमेशा करनी चाहिये यह अर्घ्य है । स्वयं स्वच्छ तथा स्वतः सिद्ध ही आचमनी है । चिद्रूप चन्द्रमयी के सर्वाङ्गों का स्मरण ही स्नान है । चिद् अग्नि स्वरूप परमात्मक शक्ति का स्फुरण ही (प्रकाशित होना) वस्त्र है । इच्छा आदि तीन शक्तियों के त्रिगुणात्मक होने से प्रत्येक के जो सत्ताईस भेद तथा इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया शक्ति स्वरूप ब्रह्मग्रन्थि मन्द्रस्स नाड़ी सुषुम्ना यही ब्रह्मसूत्र हैं । क्योंकि यही ब्रह्म की द्योतिका हैं । अपने से भिन्न वस्तु का स्मरण न करना ही आभूषण है । स्वच्छ स्वरूप जो ब्रह्म उससे भिन्न कुछ नहीं हैं यही स्मरण करना गन्ध है । सब विषयों का मन की स्थिरता से अनुसन्धान ही फूल हैं और उन्हीं को स्वीकार करना धूप है । वाय्वात्मक (वायु युक्त) योग के समय प्राण अपान की एकता से सुषुम्ना में सत्, चित्, आनन्द, उल्कारूप जो (प्रकाश है) आकाश देह है वही दीप है । अपने से भिन्न सभी विषयों में मन की गति का जाना-आना रुक जाना (न होना) ही नैवेद्य है । तीनों

५४८ ] [ भावनोपनिषत् अवस्थाओं का एकीकरण ही पान है । मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त तथा ब्रह्मरन्ध्र से मूलाधार बार-बार गतागत करना ( आना-जाना ) ही प्रदक्षिणा है । चतुर्था अवस्था में स्थित रहना ही नमस्कार है । देह की जड़ता में डूबना (अर्थात् आत्मा को चैतन्य मानकर देह को जड़ मानकर स्थित रहना ही ) बलि है । अपनी आत्मा सत्व स्वरूप है, यह निश्चित करके कर्तंग्य, अकर्त्तव्य, उदासीनता, नित्यात्मक, विलापन (अत्म-चिन्तना- सक्ति) ही यज्ञ (होम) है। तथा स्वयं उस परब्रह्म की पादुकाओं में डूवे रहना ही परिपूर्ण ध्यान है। सारांश यह हुआ कि जैसे पूजा के लिये धूप, दीप, गन्ध, नैवेद्य, दक्षिणा, नमस्कार, प्रदक्षिणादि आदि अपे- क्षित होती हैं वैसे ही परब्रह्म की प्राप्ति के लिये ऊपर बताई गई वस्तुओं का साधन कर लेना ही तद्तद् धूप दीप आदि हैं। इन्हीं से वह ब्रह्म दृष्टिगोचर हो जाता है ॥ ३ ॥ एवं मुहूर्त्तत्रयं भावनापरो जीवन्मुक्तो भवति । तस्य देवताऽऽत्मैक्यसिद्धिः । चिन्तितकार्याण्ययत्नेन सिध्यन्ति । एव शिवयोगीति कथ्यते ॥ ४ ॥ इस प्रकार तीन मुहूर्त भी भावना पर जो रहता है वह जीवन्मुक्त होता है । वह ब्रह्मं के स्वरूप हो जाता है, तथा चाहे हुए काम बिना यत्न के ही सिद्ध हो जाते हैं, और वही शिवयोगी कहलाता है ॥ ४ ॥ ॥ भावनोपनिषद् समाप्त ॥

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चतुर्वेदोपनिषत्

ॐ अथातो मनोपनिषदमेव तदाहुः । एको ह वै नारायण आसीत् । न ब्रह्मा न ईशानो नापो नाग्निः न वायुः नेमे द्यावा- पृथिवी न नक्षत्राणि व सूर्यः । स एकाकी नर एव । तस्य ध्याना- न्तस्तस्थस्य ललाटात् स्वेदोऽपतत् । ता इमा आपः । ता एते नो हिरण्मयमन्नम् । तत्र ब्रह्मा चतुर्मुखोऽजायत । स ध्यातपूर्वा- मुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिः गायत्रं छन्द ऋग्वेदः । पश्चिमामुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिस्त्रैष्टुभं छन्दः यजुर्वेदः । उत्तरामुखो भूत्वा भुवरिति व्याहृतिर्जगतं छन्दः सामवेदः । दक्षिणामुखो भूत्वा जनदिति व्याहृतिरानुष्टुभं छन्दोऽथर्ववेदः ॥ १ ॥

हाँ तो इसे महोपनिषत् ही कहा जाता है। सर्वप्रथम एक नारा- यण ही था। न तो ब्रह्मा ही न ईशान (शिव) ही था, और न वायु पृथ्वी, आकाश, नक्षत्र एवं सूर्य में से कोई था। वह अकेला नर ही था। ध्यान में स्थित उस नर के मस्तक से पसीना गिरा। वही यह जलराशि है। यही वह हमारे सुनहरे अन्न हैं। वही ब्रह्मा चार मुख वाला हुआ। उसने पूर्वाभिमुख होकर 'भूः' इस व्याहृति गायत्री छन्द एवं ऋग्वेद, पश्चिमा- भिमुख होकर 'भूः' इस व्याहृति त्रिष्टुप छन्द एवं यजुर्वेद, उत्तराभिमुख होकर 'भुवः' इस व्याहृति जगती छन्द तथा सामवेद, और अन्त में दक्षिणा- भिमुख होकर जनद् इस व्याहृति अनुष्टुप छन्द तथा अथर्ववेद का उच्चारण किया ॥ १ ॥

सहस्रशीर्षं देवं सहस्राक्षं विश्वसम्भवम् । विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ॥२ विश्वमेवेदं पुरुषं तं विश्वमुपजीवति । ऋषिं विश्वेश्वरं देवं समुद्रं तं विश्वरूपिणम् ॥३ पद्मकोशप्रतीकाशं लम्बत्याकोशसन्निभम् ।

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५५० ] [ चतुर्वेदोपनिषत् हृदये चाप्यधोमुखं सतस्यत्यैशीतकराभिश्च ॥४ तस्य मध्ये महानग्निर्विश्वार्चिर्विश्वतोमुखः । तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥५ तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः । स ब्रह्मा स ईशानः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । ६ हजारों शिर वाले हजारों आँखों वाले, विश्व की उत्पत्ति करने वाले परमदेव जो कि सर्वत्र व्यापक हैं हमेशा सर्वत्र विद्यमान एवम् नारायण, हरि आदि शब्दों से प्रसिद्ध हैं । उस ऋषि स्वरूप संसार के स्वामी समुद्र- शायी विश्वरूप परम-पुरुष का आश्रय लेकर ही यह संसार जीता है। कमलकोश के समान आकाश की तरह हृदय में अधोमुख होकर लटका है जो अपनी शक्तियों से सर्व कुछ करता है। उसके बीच में महान् अग्नि- जिनकी ज्वाला चारों ओर लपट मारती है एवम् चारों मुख वाली (लप- कने वाली) है। उसके बीच में ही वह्निशिखा है जो कि अणीय के ऊपर स्थित है। उस शिखा के मध्य में ही परमात्मा स्थित है कि स्वयं ही ब्रह्म शिव अक्षर (ब्रह्म) एवम् परम प्रभुः स्वयं प्रकाश है ॥२-६॥ य इमां महोपनिषदं ब्राह्मणोऽधीते अश्रोत्रियः श्रोत्रियो भवति । अनुपनीतः उपनीतो भवति । सोऽग्निपूतो भवति । स वायुपूतो भवति । स सूर्यपूतो भवति । स सोमपूतो भवति । स सत्यपूतो भवति । सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवति । सर्वैषु तीर्थेषु स्नातो भवति । तेन सर्वैः ऋतुभिरिष्टं भवति । गायत्र्याः षष्टि सहस्राणि जप्तानि भवन्ति । इतिहासपुराणानां सहस्राणि जप्ताति भवन्ति । प्रणवानामयुतं जप्तं भवति । आचक्षुषः पङ्क्तिं पुनाति आसप्तमात् पुरुषं पुनाति । जाप्येन अमृतत्त्वं च गच्छति अमृतत्त्वं च गच्छति इत्याह भगवान् हिरण्यगर्भः ॥ ७ ॥ जो ब्राह्मण इस महोपनिषद् को पढ़ता है वह यदि अश्रोत्रीय हो तो श्रोत्रीय (कर्मकाण्डी हो जाता है। अनुपनीत हो तो उपनीत (यज्ञोप- वीती) होता जाता है। वह अग्नि-पवित्र, वायु-पवित्र, सूर्य-पवित्र, सोम-

पवित्र, सत्य से पवित्र माना जाता है, हो जाता है। उसे सभी देव जानते हैं। उसने सभी तीर्थों का स्नान कर लिया, तथा सभी यज्ञ भी कर चुका । उसने तो गायत्री के साठ हजार जप कर लिए । इतिहास तथा पुराणों के हजारों जप वह कर चुका । दस हजार ॐकार का जप वह कर चुका । वह पुरुष अपनी दृष्टमात्र से मनुष्यों की पंक्तियों को (हजारों मनुष्यों को) पवित्र कर देता है। सातवीं पीढ़ी तक के मनुष्यों को पवित्र कर देता है एवम् जो इसे पढ़ता है वह अमृतत्व को निश्चित ही प्राप्त कर लेता है, ऐसा भगवान् हिरण्यगर्भ ने कहा है ॥७॥ देवा ह वै स्वर्गं लोकमायंस्ते देवा रुद्रमपृच्छंस्ते देवा ऊर्ध्वबाहवो रुद्रं स्तुवन्ति । भूस्तवादिर्मध्यं भुवस्ते स्वस्ते शीर्षं विश्वरूपोऽसि ब्रह्मैकस्त्वं द्विधा त्रिधा शान्तिस्त्वं हुतमहुतं दत्त- मदत्तं सर्वमसर्वं विश्वमविश्वं कृतमकृतं परमपरं परायणं च त्वम् । अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवा नमस्याम धूर्तेरमृतं मृत मर्त्यं च सोमसूर्यपूर्वजगदधीतं वा यदक्षरं प्राजापत्यं सौम्यं सूक्ष्मं ग्राहं ग्राहेण भावं भावेन- सौम्यं सौम्येन सूक्ष्मं सूक्ष्मेण ग्रसति तस्मै महाग्रासाय नमः ॥ ८ ॥ देवता स्वर्ग लोक में आये तथा हाथ उठाकर रुद्र की स्तुति करते हुए उनसे पूछा (कहा) तेरा आदि भूः, मध्य भुवः, शिर स्वः है, तू विश्व- रूप है, तू ही एक ब्रह्म है। द्विविध, त्रिविध शक्तिहुत (होम किया गया) अहुत, दिया, न दिया, सर्वं (सब कुछ) असर्व, विश्व (संसार) अविश्व, किया न किया, पर, अपर परायण सब तू ही है। हम सोम पान अमृत होवें, हमें ज्ञान प्राप्त हो, हम देव आपको नमस्कार करते हैं, अमृत, मृत, मर्त्य, सोम, सूर्य, पूर्व संसार, अधीत या जो अक्षर (अविनाशी) प्राजा- पत्य, सौम्य सूक्ष्म है उसे ग्राह को ग्राह से, भाव को भाव से, सौम्य को सौम्य से, सूक्ष्म को सूक्ष्म से ग्रसित करते हैं। उस महाग्रास को (ग्रसित करने वाले को) नमस्कार है ॥ ४ ॥ ॥ चतुर्वेदोपनिषद् समाप्त ॥

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri चाक्षुषोपनिषत् ॐ अथातश्चाक्षुषीं पठितसिद्धविद्यां चक्षुरोगहरां व्याख्या- स्यामः। यच्चक्षू रोगाः सर्वतो नश्यति । चाक्षुषो दीप्तिर्भविष्य- तीति । तस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषिः । गायत्री छन्दः । सूर्यो देवता । चक्षूरोगनिवृत्तये जपे विनियोगः । ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव । मां पाहि पाहि । त्वरितं चक्षूरोगान् शमय शमय । मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय । यथाऽहं अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय । कल्याणं कुरु कुरु । यानि मम पूर्व- जन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय । ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय । ॐ नमः करुणाकरायामृताय । ॐ नमः सूर्याय । ॐ नमो भगवते सूर्याया- क्षितेजसे नमः । खेचराय नमः । महते नमः रजसेः नमः । तमसे नमः । असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । उष्णो भगवान्छुचिरूपः । हंसो भगवान् शुचि- प्रतिरूपः । य इमां चक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्या- क्षिरोगो भवति । न तस्य कुले अन्धो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति ॥ अब पाठ मात्र से सिद्ध हो जाने वाली चाक्षुषी विद्या का वर्णन करते हैं । यह विद्या नेत्र-रोगों का नाश करने वाली है तथा नेत्रों को तेजयुक्त करने में समर्थ है । इस विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य, छन्द गायत्री, देवता सूर्य हैं । इसका विनियोग नेत्र-रोगों के शमनार्थ होता है । हे सूर्यदेव ! तुम चक्षु के अभिमानी देवता हो । तुम चक्षु में चक्षु Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

चाक्षुषोपनिषत् ] [ ५५३ के तेज रूप से स्थिर होओ । मेरी रक्षा करो, रक्षा करो, रक्षा करो । मेरे नेत्र-रोग को शीघ्र शान्त करो, शान्त करो । मुझे अपने स्वर्ण के समान तेज के दर्शन कराओ । जिससे मैं अन्धा न होऊँ ऐसा उपाय करो, उपाय करो । कल्याण करो । मेरे जितने ऐसे पाप हैं जिनके द्वारा देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है उन सबको समूल नष्ट कर दो । नेत्रों को तेज देने वाले दिव्य स्वरूप भगवान् भास्कर को मेरा नमस्कार है । करुणा करने वाले अमृतस्वरूप को मेरा नमस्कार है । सूर्य भगवान् को नमस्कार है । नेत्रों के प्रकाश रूप सूर्य नारायण को नमस्कार है । आकाश में विहार करने वाले सूर्य को नमस्कार है । अत्यन्त श्रेष्ठ रूप को नमस्कार, रजोगुणमय सूर्य को नमस्कार है । तमोगुण के आश्रय- भूत सूर्य को नमस्कार है । हे प्रभो ! मुझे असत् से सत् की ओर ले चलो, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलो । उष्णता युक्त भगवान् सूर्य शुचि रूप हैं । हंस रूप भगवान् सूर्य शुचि रूप तथा अप्रतिरूप हैं । जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्या का पाठ नित्य करता है उसे नेत्रों से सम्बन्धित कोई रोग नहीं होता । उसके कुल में कोई अन्धा नहीं होता । यह विद्या आठ ब्राह्मणों को उपदेशित करने पर इसकी सिद्धि प्राप्त होती है । ॐ विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं हिरण्मयं पुरुषं ज्योतिरूपं तपन्तम् । विश्वस्य योनिं प्रतपन्तमुग्रं पुरः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः । ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिन्यहोवाहिनी स्वाहा । ॐ वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियेमेधा ऋषयो नाध- मानाः । अपध्वान्तमूर्णुहि पूर्द्धि चक्षुर्मु मुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान् । पुण्डरीकाक्षाय नमः । पुष्करेक्षणाय नमः । अमलेक्षणाय नमः । कमलेक्षणाय नमः । विश्वरूपाय नमः । महाविष्णवे नमः ।

५५४ ] [ चाक्षुषोपनिषत् जो भगवान् सूर्य सच्चिदानन्द रूप हैं तथा यह विश्व जिनका रूप है, जो सबके जानने वाले अपनी किरणों से सुशोभित हैं, जो ज्योति स्वरूप, हिरण्यमय, जगत के उत्पत्ति स्थान, पुरुष रूप में तपने वाले हैं, उन प्रचण्ड तेज वाले सूर्य नारायण को हम नमस्कार करते हैं । यह भगवान् सूर्य सम्पूर्ण प्राणियों के सामने प्रत्यक्ष उदय को प्राप्त हो रहे हैं । छः प्रकार के ऐश्वर्यों से सम्पन्न भगवान् सूर्य को नमस्कार है । उनकी प्रभा दिवस की भारवाहिनी है । हम उन सूर्य भगवान् के लिए श्रेष्ठ आहुतियाँ देते हैं । जिन्हें मेधा से अत्यन्त प्रेम है वे ऋषिगण श्रेष्ठ पंखों वाले पक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के समीप जाकर निवेदन करने लगे—‘भगवन् ! इस अन्धकार को दूर करो । हमारे नेत्रों को प्रकाशमय करो । हम सब प्राणी तमोमय बन्धन में पड़े हुए-से हैं, हमें अपना दिव्य प्रकाश प्रदान कर मुक्त करो । पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार ! पुष्करेक्षण को नमस्कार । अमलेक्षण को नमस्कार । कमलेक्षण को नमस्कार । विश्व स्वरूप को नमस्कार । भगवान् महाविष्णु को नमस्कार । :! चाक्षुषोपनिषद् समाप्त ॥

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कलिसंतरणोपनिषत्

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, हम दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शांति, शांति, शांति । हरिः ओ३म् द्वापरान्ते नारदो ब्रह्माणं जगाम कथं भगवन् गां पर्यटन्कलि संतरेमिति । स होवाच ब्रह्मा साधु पृष्टोऽस्मि सर्वश्रुतिरहस्यं गोप्यं तच्छृणु येन कलिसंसारं तरिष्यसि । भग- वत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलि- र्भवति । नारदः पुनः पप्रच्छ तन्नाम किमिति । स होवाच हिर- ण्यगर्भः । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । द्वापर युग के अन्त की बात है। नारद मुनि ब्रह्माजी के पास जाकर बोले—'प्रभु ! भूलोक में घूमता हुआ किस तरह से कलि काल से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकता हूं। ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और बोले— "वत्स ! आज तुमने अत्यन्त प्रिय बात पूछी है। समस्त वेद, मन्त्रों का गुप्त रहस्य मैं तुझे बताता हूं। कलि के दोषों को नाश करने का उपाय भगवान आदिपुरुष नारायण के पवित्र नाम का उच्चारण करना है। नारदजी ने वह नाम पूछा, जिस पर ब्रह्माजी ने कहा— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५५६                                                      कलिसंतरणोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम् । नातः परत रोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते । इति षोडशकलाऽवृतस्य जीव- स्यावरणविनाशनम् । ततः प्रकाशते । परं ब्रह्म मेघापाये रवि- रश्मिमण्डलीवेति । पुनर्नारदः पप्रच्छ भगवन्कोऽस्य विधिरिति । तं होवाच नास्व विधिरिति । सर्वदा शुचिरशुचिर्वा पठन्ब्राह्मणः सलोकतां समीपतां सरूपतां सायुज्यतामेति । यदास्य षोडशीकस्य सार्धत्रिकोटीर्जपति तदा ब्रह्महत्यां तरति । तरति वीरहत्याम् । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । पितृदेवमनुष्याणामपकारात्पूतो भवति सर्वधर्मपरित्यागपापात्सद्यः शुचितामाप्नुयात् । सद्यो मुच्यते सद्यो मुच्यते इत्युपनिषत् ॥ हरिः ओ३म् तत्सत् ॥ कलि के पापों को यह सोलह नाम नाश करते हैं । वेद शास्त्रों में भी इससे अच्छा उपाय दिखाई नहीं देता । इसकी सहायता से सोलह कलाओं से सम्पन्न जीव के पर्दे कट जाते हैं, तभी उस परब्रह्म का वास्तविक स्वरूप साफ-साफ भासने लगता है, जैसे बादल के चले जाने पर सूर्य की किरणों का प्रकाश आ जाता है । इस पर नारदजीं ने जप की विधि पूछी । ब्रह्माजी ने उत्तर देते हुए कहा कि इसकी कोई विशेष विधि नहीं है । पवित्र या अपवित्र जिस हालत में हो इसका जप किया जा सकता है । इसके जप करने से चारों प्रकार की ( सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य ) मुक्ति प्राप्त होती है । साधक इस मन्त्र के साढ़े तीन करोड़ जप के पश्चात् ब्रह्महत्या के कोष से निवृत्त हो जाता है । वह वीरहत्या के दोष से छूट जाता है । सोने की चोरी के दोष से मुक्त हो जाता है । मनुष्य, देवता और पिता के प्रति किए गए अपकार के पाप से भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है । सब धर्मों को छोड़ने के दोष से तुरन्त ही छूट जाता है, शीघ्र ही निवृत्त हो जाता है, शीघ्र ही निवृत्त हो जाता है—यह उपनिषद् है । ॥ कलिसंतरणोपनिषद् समाप्त ॥ ॥ १०८ उपनिषद् का साधना खण्ड समाप्त ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

चारों वेदों का सरल हिन्दी भाष्य ऋग्वेद—में सृष्टि रचना, प्रकृति, आत्मा और जीव का स्वरूप, धर्म- नीति, चरित्र, सदाचार, परोपकार और मनुष्य के वास्तविक कर्तव्य का सुन्दर दिग्दर्शन है। साथ ही समाज-नीति, राजनीति, अर्थनीति, अंक- गणित, रेखागणित, बीज-गणित, ज्योतिष, भूगोल, खगोल, रसायन-शास्त्र, भूगर्भ-विद्या, धातु-विज्ञान व मनोविज्ञान के मूल, सिद्धान्तों का स्पष्टी- करण किया गया है। ४ खण्डों का मूल्य २४) मात्र अथर्ववेद—में अन्न-सिद्धि, बुद्धि बढ़ाने के उपाय, वीर्य रक्षा, ब्रह्मचर्य, धन-धान्य, समय पर वृष्टि, व्यापार की वृद्धि, दीर्घ आयु और सुदृढ़ स्वास्थ्य के साधन, राज्याधिकारियों का नियन्त्रण, युद्ध में विजय, शत्रु सेना में मोह व भ्रम उत्पन्न करना आदि विषयों का विज्ञान है। २ खण्ड—मूल्य १२) मात्र यजुर्वेद—कर्मकाण्ड प्रधान वेद है। इसमें यज्ञों के विधि-विधान व विज्ञान पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, शिल्प, व्यवसाय, राज्य, स्वराज्य, साम्राज्य आदि के सम्बन्ध में कल्याणकारी ज्ञान प्रदान किया गया है। मूल्य ६) मात्र सामवेद—यद्यपि चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है, फिर भी उसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है। सामवेद के मन्त्र अमूल्य रत्नों की खान हैं। इसकी भक्तिरसपूर्ण काव्य धारा में अवगाहन करने से तुरन्त ही मनुष्य का अन्तरतम निर्मल, विशुद्ध, पवित्र और रससिक्त हो जाता है। मूल्य ६) गायत्री तपोभूमि, मथुरा के संचालक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा प्राचीन सायणभाष्य के आधार पर यह हिन्दी संस्करण सम्पादित हुआ है। इसमें मूल वेदमन्त्रों के साथ-साथ हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। प्रकाशकः संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतब बरेली (उ० प्र०)

१०८ उपनिषदें-हिंदी टीका सहित वेद के दुरूह रहस्यों का सरल रीति से विस्तार पूर्वक विवेचन उप- निषदों में हुआ है। प्राचीन-काल में ऋषि, मुनि मानव-जीवन की व्यक्ति- गत व सामाजिक सभी प्रकार की उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने के लिए लाखों वर्षों से जो चिन्तन और मनन करते रहे हैं, उनका सार उप- निषदों में संचित है। आत्म-विद्या, ब्रह्मविद्या के रहस्य का उपनिषदों में विवेचन हुआ है। यह जीवन का सर्वांगपूर्ण दर्शन ही हैं। प्रमुख उपनिषदें १०८ हैं। उनमें से अब तक बहुत थोड़ी उपनिषदों का भाष्य उपलब्ध था। शेष कठिन संस्कृत में होने के कारण सर्वसाधारण के लिए दुरूह ही बनी हुई थी। प्रसन्नता की बात है कि गायत्री तपोभूमि, मथुरा के सञ्चालक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा १०८ उपनिषदों का मूल मन्त्रों से साथ सरल व सुबोध हिन्दी भाष्य किया गया है। यह अपने ढंग का सर्व प्रथम प्रकाशन है। इसके तीन भाग हैं (१) ज्ञान खण्ड (२) ब्रह्मविद्या खण्ड (३) साधना खण्ड । ज्ञान खण्ड में विचारात्मक व आचारात्मक उपनिषदें हैं। ब्रह्मविद्या खण्ड में आध्यात्मिक रहस्यों का विवेचन है। साधना खण्ड में योग साधनों का मार्ग दर्शन है। प्रत्येक खण्ड का मूल्य ७) रु० । ३ खण्डों के सम्पूर्ण सेट का २१), रु० डाक खर्च इसके अतिरिक्त । भारत के महामान्य राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन् की सम्मति है— “यह एक महत्वपूर्ण प्रकाशन है और मुझे विश्वास है कि उसे बहुत लोग पढ़ना पसन्द करेंगे।” दैनिक हिन्दुस्तान नई दिल्ली की सम्मति—“वस्तुतः उपनिषदों ने इस संकलन में सरलता, सरसता और सुरुचिता की ज्ञान गंगा प्रवाहित की गई है। भारत के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध पुस्तक विक्रेताओं और संस्थाओं द्वारा जो प्रकाशन हमारे देखने में आए हैं, उन सबसे बढ़कर उपनिषदों का रहस्य समझने में आचार्य जी ही अधिक सफल हुए हैं।” प्रकाशक :— संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब, बरेली (उ०प्र०)