१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पटियाला, नाभा और जींद की सहायता मिलना पक्का होते ही अंग्रेजों में विलक्षण धीरज आ गया। पटियाला के राजा ने अपने भाई के साथ उत्तम सेना और तोपें देकर उसे ठाणेश्वर का रास्ता रोकने भेज दिया और जींद के राजा ने पानीपत को चौकी पर कब्जा जमाया। ये दो अति महत्त्वपूर्ण चौकियां इस तरह परस्पर रोकी जाने से अंबाला से दिल्ली तक के मार्ग और पंजाब का निरंतर यातायात-ये दो बहुत नाजुक बातें संरक्षित हो गईं और कमांडर-इन-चीफ ने 25 मई को अंबाला छोड़ दिल्ली की ओर स्वयं कूच किया। पर दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का समाचार सुनने के पश्चात् उसके धक्के से ॲन्सन पूरी तरह हताशा से भर गया था। उसमें भी शिमला की ठंडी हवा में जो आज तक कभी अनुभव नहीं हुई, ऐसी गरमी में उसे झुलसना पड़ा था। इन मानसिक और शारीरिक चिंताओं से कृश हुआ वह कमांडर-इन-चीफ करनाल तक आते-आते 27 मई को कालरा की बीमारी से मर गया। उस दिन उसके अधीनस्थ अधिकारी बर्नार्ड ने कमांडर-इन-चीफ के अधिकारों को संभाला। इस तरह पुराने कमांडर-इन-चीफ को गाड़कर अंग्रेजी सेना नए कमांडर के नेतृत्व में दिल्ली की ओर बढ़ी। उस समय उस अंग्रेजी सेना में इतना उत्साह था कि सुबह लड़ाई आरंभ कर शाम को दिल्ली शहर में शत्रु का रक्त गटगट पिएंगे, ऐसी घमंड भरी बातें वे खुलेआम करने लगे। गोरे सिपाहियों के काले हृदय में कितना हलाहल भरा हुआ है, यह सेना अंबाला से दिल्ली आ रही थी उस समय वे पूरे जग को यह दिखा रहे थे कि मेरठ की नेटिव सेना का क्या? वे तो हर तरह से काफिर (Heathen) थे। उन्होंने कारतूसों के निर्माण में हड्डियों का चूरा मिलाने की गप पर विश्वास कर मेरठ और दिल्ली में निरपराध अंग्रेजों को कत्ल किया। यह नेटिव के देश और धर्म का जंगलीपन था; परंतु इसके नीचे जो ढका हुआ है, संभव है, वह कभी स्पष्टता से प्रकट भी न हो। क्योंकि काफिरों की अपेक्षा ईसाई गप्पों की विश्वसनीय बातों और जंगलीपन में सुधार को ही परमेश्वर अधिक धिक्कारेगा और उस गंदगी को धोने के लिए उसे रक्त की वर्षा करनी पड़ेगी। अंबाला से दिल्ली की ओर आते समय हजारों गांवों में से जिन-जिनपर हाथ डाला जा सका, उन सारे भारतीय आदमियों को एक साथ पकड़ा जाता और तुरंत आधे घंटे में उनका कोर्ट मार्शल कर पंक्ति में खड़ा कर, सबको फांसी का दंड देकर, तरह-तरह की यंत्रणाएं देकर मार डाला जाता। मेरठ में नेटिवों ने भी अंग्रेजों को मार डाला 55 1857 का स्वातंत्र्य समर – 119 55 स्वकीयों को केवल रास्ता भी न मिले! इतना ही नहीं अपितु उनमें के हजारों लोगों को शत्रु से भी अधिक यंत्रणा देकर मा डाला जाए! इस अमानुषकि पाप का प्रायश्चित्त हिंदुस्थान के इतिहास में कभी हो तो हो। इस यंत्रणा का वर्णन –'टू नेटिव नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी इन दिल्ली' में देखने को मिलेगा।
था। परंतु वह जंगलीपन से अर्थात् एक आघात से मारा गया था। परंतु अंग्रेजों ने उस त्रुटि को सुधारकर बहुत अच्छा किया। वे कोर्ट मार्शल के आगे केवल दृष्टिपात होते ही फांसी का दंड दिए गए सैकड़ो लोगों को, उनके फांसी के खंभे खड़े करते हुए ही पैशाचिक यंत्रनाएं देने लगते, उनके सिर के बाल तड़ातड़ तोड़ते, उनके शरीर में बैनेट के सिरे से आर-पार छेद किए जाते और तत्पश्चात् इन सारी यंत्रणाओं और प्रत्यक्ष मृत्यु को भी जिसके उन गरीब, निर्दोष और निरपराध हिंदू लोगों के मुंह में, उनके फांसी पर चढ़ने सिपाही उन गरीब, निर्दोष और निरपराध हिंदू लोगों के मुंह में, उनके फांसी पर चढ़ने को तैयार होने पर भी, जबरन गाय का कच्चा मांस कुचल-कुचलकर भरते।56
वह कोर्ट मार्शल क्या झमेला था, यह जंगली पाठक वर्ग को बताना रह ही गया। गांवों के निरपराध लोगों को सैकड़ों की संख्या में पकड़कर उनका ‘न्याय’ किया जाता। यह न्याय की घुट्टी यूरोपियन राष्ट्र पहले से ही पिए होते हैं। नीदरलैंड की राज्य क्रांति में अल्वा ने भी ऐसा ही एक न्यायसन स्थापित किया था। उस न्यायसन की कार्यवाही इतने ध्यान से चलती कि वहां के न्यायाधीश बीच में ही सो जाते और दंड देने का समय आने पर उन्हें हिलाकर जगाए जाने पर जितने कैदी सामने दिखते उतनों की ओर एक गंभीर नज़र डालकर वह कहते, “चढ़ाओ इन्हें फांसी पर!” नीदरलैंड के इतिहास में अंकित इस ‘यमासन’ को अंग्रेजों ने सुधरकर विकसित किया था, इसमें कोई शंका नहीं, क्योंकि इनके न्यायाधीश कभी भी सोते नहीं थे। इतना ही नहीं, कोर्ट मार्शल पर नियुक्त होने के पूर्व उन्हें यह शपथ लेनी पड़ती थी की हम निरपराध या अपराधी यह भेद न करके सबको फांसी का दंड देंगे। यह पवित्र शपथ लेकर अंग्रेज लोग निरपराध नेटिव को फांसी पर चढ़ाने के लिए जहां न्याय करते हैं उस स्थान को अंग्रेजी भाषा में ‘कोर्ट मार्शल’ कहा जाता है।
मेरठ और दिल्ली में मारे गए मुट्ठी भर अंग्रेज लोगों के लिए हजारों निरपराध लोगों से ऐसा पैशाचिक प्रतिशोध लेते हुए कमांडर बर्नार्ड दिल्ली के पास पहुंचने के पहले मेरठ में शेष बची गोरी सेना से मिलने का अवसर देख रहा था। मेरठ में अंग्रेजों की बड़ी सेना थी, यह पहले कहा जा चुका है। वह सेना अंबाला से निकली सेना से
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56 1. होम्स कृत-‘हिस्ट्री ऑफ द सीज ऑफ दिल्ली’। 2. ‘सैनिक पंच न्यायालय के आसन को ग्रहण करने के पूर्व प्रत्येक पंच द्वारा यह शपथ ग्रहण की जाती थी कि मैं बंदी के अपराध अथवा निर्दोष होने की चिंता न करते हुए उसे प्राणदंड दूंगा। और यदि उनमें से कोई इस विवेकहीन निर्णय के विरूद्ध अपना मुख खोलता भी था तो उसके अन्य साथी उसका मुख बंद कर देते थे। निर्णय के तत्काल उपरांत ही फांसी के फंडों पर जाते हुए बंदियों को प्रताड़ना दी जाती थी और उनका उपहास भी किया जाता था। उन्हें अनाड़ी-हत्यारे भांति-भांति की यंत्रणाएं देते थे और पड़े-लिखे अधिकारी मनोरंजन करते थे।’ —होम्स कृत-‘हिस्ट्री ऑफ द सेपॉय वार’ पृष्ठ 124
मिलने नीचे उतर रही थी। परंतु इन सेनाओं के मिलने के पहले ही उनसे दो-दो हाथ करने क्रांतिकारी दिल्ली से आगे आए हुए थे। हिंडन नदी के किनारे दोनों 30 मई को मिले। क्रांतिकारियों का दायां बाजू तोपों से सुरक्षित था। अतः उस ओर मुंह मारने का प्रयास करने में अंग्रेजों को सफलता नहीं मिल रही थी। दाई ओर तोपों और संगीनों की लड़ाई अच्छी जम रही थी, इतने में अंग्रेजों की मार के सामने बिल्कुल न टिकते हुए क्रांतिकारियों का बायां बाजू उखड़ने लगा। यह देखते ही उनकी पंक्तियों में भगदड़ मच गई और पांच तोपों को शत्रु के हाथों छोड़कर वे दिल्ली लौट आए। इस पहली लड़ाई में तत्काल मृत्यु गले लगाई। अन्य अपने कर्तव्य करें न करें, परंतु स्वयं मरने के पहले अपना जीवन किसी तरह सार्थक कर जाऊं ऐसी उदात्त स्फूर्ति से उस 11वीं रेजिमेंट के सिपाही ने अंग्रेजों के हाथों तोप पड़ेगी, यह जानते ही जान-बूझकर तोप और बारूदखाने में बंदूक चलाई। उसके जगी धमाके में कैप्टन एंड्रयूज और उसके सारे साथी जलकर सिरकमल अर्पित करने के बाद उस देशवीर ने अपना भी सिरकलम उसकी सेवा में जिस तरह अंग्रेज इतिहासकार रम जाते हैं, वैसे ही केवल राष्ट्र-कार्य के लिए प्राण निछावर करनेवाले उस शूर सिपाही के स्तुति स्तोत्र गाने में क्या उसके देशबंधुओं को नहीं रंगना चाहिए? पर इस शहीद का नाम भी इतिहास को ज्ञात नहीं। इस देशवीर के लिए 'के' कहता है-“विद्रोहियों में भी ऐसे अनेक शूरवीर विद्यमान थे जो अपने राष्ट्र-कार्य की सफलता हेतु प्रसन्न वदन मृत्यु का आलिंगन करने को तत्पर रहते थे तथा काल को भी चुनौती देते थे।57 इस पहली लड़ाई में अंग्रेजों की पूर्ण विजय हो जाने से कलकत्ता तक इस अनुमान से डाक द्वारा यह पूछताछ होने लगी कि अब एक-दो दिन में दिल्ली गिरने को है; परंतु वास्तविक स्थिति कितनी अलग थी। इस अभूतपूर्व, आकस्मिक और अस्त-व्यस्त क्रांतियुद्ध का विकराल स्वरूप देखकर भी वह पहला धक्का सहकर उस पर अंकुश लगाने की खूबी और हिम्मत यद्यपि उत्पन्न नहीं हुई थी, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रुकना नहीं, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रुकना नहीं, यह इच्छा अवश्य अति उत्कटता से दिल्ली के हजारों नागरिकों के हृदय में उछल रही थी और इसीलिए दिनांक 30 मई की पराजय के लिए सारी रात नागरिकों द्वारा धिक्कारे गए सिपाही फिर से 31 मई को बाहर निकले। क्रांतिकारियों की तोपों की भारी मार शुरू होते ही अंग्रेजों ने भी अपनी तोपें दागनी शुरू की। क्रांतिकारियों की तोपें आज अच्छे अनुशासन और बड़ी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 121 57 के कृत-'हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्युटिनी', खंड 2, पृष्ठ 138।
जिद से हमला कर रही थीं, इसलिए अंग्रेजों को प्राणहानि भी बहुत होने लगी। मई माह की धूप अंग्रेजों को असह्य थी सो अलग। फिर भी अंग्रेजों ने कल की तरह हमला करने का प्रयास किया, पर वह सफल नहीं हो रहा था। अंत में शाम को अंग्रेज अंतिम हमला करने निकले। इसके आगे उन्हें रोकना कठिन होगा, यह देखते ही क्रांतिकारियों ने तोपों का एक भयानक हमला किया और उस हमले से अंग्रेजों की तितर-बितर हुई सेना फिर से एकत्रित हो तब तक अपनी तोपें संभालते हुए रणांगण छोड़ दिया। कोई बात नहीं एक दिन में स्थिति कुछ सुधरी ही है। कल और ऐसी तीसरी पराजय झेली तो भी अंग्रेजों की दुर्दशा होगी, क्योंकि अब उनमें क्रांतिकारियों से छोटी हाथापाई करने लायक भी शक्ति नहीं है। जून की पहली तारीख को ऐसी चिंता में पड़े अंग्रेजी कैंप के पीछे से एक सेना आती दिखी। अपनी पिछाड़ी पर चली आ रही यह सेना काले रंग की है, यह देखते ही अंग्रेजों में हड़बड़ी मच गई और वे किसी तरह संरक्षण के लिए तैयार होते, तभी उनके ध्यान में आया कि वह क्रांतिकारियों की सेना नहीं है। अपितु मेजर रीड की अधीनता में अंग्रेजों की ओर से लड़ने गुरखे आ रहे हैं। अंबाला से नीचे आ रही अंग्रेजी ऐसी स्थिति में बेचारे गरीब क्रांतिकारी क्या करेंगे? ये दोनों अंग्रेजी सेनाएं 7 जून को एक-दूसरे से मिल गईं। इस समय दिल्ली पर घेरा डालने के लिए तैयार करवाई गई सीजट्रेन भी नाभा के राजा की सहायता से सही-सलामत आ पहुंची। इस सीजट्रेन के अंबाला पहुंचते ही उसे साथ लेकर 5वीं रेजिमेंट सहित अंग्रेजों की इकट्ठी हुई वह सेना हमला करने के लिए दिल्ली के पास के अलीपुर गांव तक आ पहुंची। अंग्रेजी सेना क अलीपुर पहुंचने का समाचार सुनते ही क्रांतिकारी फिर से दिल्ली के बाहर निकले और उनका बुंदेल की सराय नामक स्थान पर अंग्रेजी सेना से सामना हुआ। इस समय अंग्रेजों की सेना भरपूर सामग्री, उत्तम सेनापति, ताजा दम सैनिकों और लाभ का स्थान-इतनी बातों से युक्त थी तो क्रांतिकारियों की ओर उनकी सदिच्छा के सिवाय दूसरी कोई शक्ति नहीं थी। जिसने रणभूमि का कभी मुंह भी नहीं देखा, ऐसे एक राजपुत्र पर सेनापतित्व का दायित्व था। उनकी संख्या में सिपाहियों से असैनिक ही अधिक थे और उसमें भी अपने ही देशबंधु सिख और गुरखा-फिरंगियों की ओर हाने से उनका मन निरूत्साहित था। ऐसी स्थिति में यह लड़ाई एक बहुत बड़ा तमाशा होगा, की विलक्षण चेतना उन सिपाहियों के मन में उत्पन्न हो गई थी, जिससे उन्होंने अंग्रेजी सेना को टक्कर देने में ऐसा कमाल किया कि अंग्रेजों को जल्दी ही समझ में आ गया, यह तमाशा न होकर वास्तव में जान लेने या देनेवाली लड़ाई है। दिल्ली की सेना की तोपें इतनी जिद और जोर से जोर मार करने लगीं कि ऐसा लगने लगा जैसे उसके सामने अंग्रेजी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 122
सेना की कुछ भी नहीं चलेगी। अंग्रेजी तोपखाने के गोलंदाज और अधिकारी चट-पट मरने लगे और क्रांतिकारियों की तोपों की मार और भी तेज हो गई। यह देखते ही अंग्रेजों ने अपनी पैदल सेना को तोपों पर हमला करने का कड़ा आदेश दिया। अंग्रेजी पैदलों का वह हल्ला देखते-ही-देखते क्रांतिकारियों के तोपखाने से आकर भिड़ गया, फिर भी उस दिन क्रांतिकारी तोपें छोड़कर एक इंच भी इधर-उधर नहीं हुए। स्वराज्य और स्वदेश के लिए लड़नेवाले वीरों को शोभा दे, ऐसी ही अटल रीति से अंग्रेजी सेना की संगीन छाती में घुसने तक उन्होंने अपना स्थान नहीं छोड़ा। परंतु ऐसे शूर मर्दों को अपनी कृति से उत्तेजना देना तो दूर, उनके साथ अंत तक केवल खड़ा रहनेवाला सेनापति भी उन्हें नहीं मिला था, बल्कि जब अंग्रेजों की संगीन छाती में घुसने के बाद भी अपना स्थान छोड़कर एक पैर भी पीछे न हटानेवाले वीर स्वदेश और स्वधर्म के लिए प्राण न्योछावर कर रहे थे तो उनका कमांडर-इन-चीफ तोप की पहली आवाज होते ही सिर पर पांव रखकर दिल्ली भाग गया था। इतने में उस अभागी सेना क बाई ओर अंग्रेजों के घुड़सवार टूट पड़े और उनपर पीछे से होपग्रांट ने घुड़सवार-तोपखाने से हमला किया। इस तरह अपनों और परायों द्वारा अनाथ हुई वह सेना दिन भर लड़ी गई लड़ाई का कुछ भी श्रेय न मिलने पर तितर-बितर होकर दिल्ली में घुसने लगी। वैसे ही धकियाते जाने का आदेश दिय और वह अंग्रेजी सेना उस दिन शाम तक दिल्ली की दीवारों से आ भिड़ी। उस दिन की लड़ाई में क्रांतिकारियों का शहर-बाहर का सारा कब्जा नष्ट हो गया और अंग्रेजों को दिल्ली पर मोरचा लगाने के लिए अति उत्तम स्थान मिल गये। यहां यह कहना आवश्यक है कि उस दिन की लड़ाई में सीमूर की गुरखा पलटन ने बड़ा पराक्रम दिखाया, इसलिए अंग्रेजी इतिहासकार उन्हें बहुत शाबासी देते हैं। स्वदेश स्वतंत्रता के गले पर छुरी चलाने सदा-सर्वदा के लिए शापित शूरता दिखाने के कारण उन गुरखों के नाम सदा-सर्वदा के लिए शापित हुए हैं, इसमें तिल भर भी शंका नहीं। इन देशद्रोही गुरखों की सहायता से अंग्रेजों ने बुंदेल का सराय की लड़ाई जीती अवश्य, परंतु इस जय ने उनके मनोराज्य को धूल में मिला दिया; क्योंकि दिल्ली के बाहर दोपहर लड़ाई लड़कर उस दिन की रात दिल्ली के राजमहल में रिपुरक्त का प्राशन करते बिताएंगे, ऐसी जो अंग्रेज सैनिकों को आशा ही नहीं भरे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के रक्षणार्थ म्यान में केवल असैनिक लोग ही नहीं भरे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के रक्षणार्थ म्यान से बाहर निकली तलवारें भी सिद्धांतनिष्ठा के संकल्प के साथ उस प्राचीर पर बीच-बीच में झलकती हैं, यह अप्रिय सत्य अंग्रेजों की नजर में इस लड़ाई ने ला दिया। इस लड़ाई में अंग्रेजों के एक सौ चौंतीस लोग घायल हुए तथा चार अधिकारी और सैंतालीस लोग मारे गए। परंतु इन सब मृतकों में अंग्रेजी लश्कर में दुःख और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 123
उदासीनता फैलानेवाली जो मृत्यु हुई वह ऍडज्यूटंट जनरल कर्नल चेस्टर की थी। लड़ाई की भीड़ में यह मृत्यु हुई। क्रांतिकारियों की ओर की हानि बताते हुए अंग्रेज इतिहासकार उपन्यासकारों से भी बढ़-चढ़कर कैसा वर्णन करते हैं, यह आगे दिखेगा। परंतु इस प्रथम महत्त्वपूर्ण लड़ाई की गड़बड़ में भी विशेष रूप से उल्लेखनीय एक बात अवश्य कहनी है कि उस दिन अंग्रेजों के हाथ लगी क्रांतिकारियों की तोपों की संख्या एक 13 कहता है और दूसरा पूरी 26, जबकि ये दोनों ही वहां उपस्थित सरकारी अधिकारी थे। इस तरह दिनांक 98 जून को संध्या समय अंग्रेजी सेना ने दिल्ली की प्राचीर तक आकर तंबू ठोंके। अंबाला और मेरठ से दिल्ली की ओर अंग्रेजी सेना को अबाधित रीति से लाने का कार्य-पंजाब की स्थिति पर पूरी तरह अवलंबित होने से उस महत्त्वपूर्ण प्रांत में मेरठ के विद्रोह के क्या परिणाम हुए, वहां के स्वदेशी लोगों ने क्या प्रयास किए और उनका प्रतिकार करने के लिए अंग्रेजों के सोचे हुए उपायों को कितनी सफलता प्रांत को पूर्णतया ब्रिटिशों के अधीन लाने के बाद डलहौजी ने उन लोगों का सैनिकी बाना और स्वतंत्रता प्रेम, इन दो सद्गुणों का नाश करनेवाली अपनी राज्य व्यवस्था की नीति रखी। सर हेनरी लॉरेंस और सर लॉरेंस इन दो प्रमुख कूटनीतिज्ञों को प्राप्त इन नवीन प्रांत की राज्य व्यवस्था मिलते ही उन्होंने पंजाब के लोगों को पूरी तरह निःशस्त्र कर दिया। उनमें से अधिकतर सिख सिपाहियों को उन्होंने अपनी सेना में मिला लिया। उत्तरी हिंदुस्थान की अंग्रेजी सेना का अधिकांश ऊपर लाकर उसके डेरे पूरे पंजाब भर में फैला दिए और इस योजना से सारे सूत्र चलाए कि सब लोग खेती की ओर ध्यान देकर अपनी उपजीविका कमाने के नशे में गर्क हो जाएं। लोगों के किसान हो जाने पर उनके सैनिकी गुण घुटते जाते हैं, वे शांति के बहुत भूखे हो जाते हैं और उनकी खेती में बाधक राज्य क्रांतियों की लहरों को उनकी अनुमति सहज नहीं मिलती। ऐसी गहरी राजनीति सिंह का साम्राज्य और स्वतंत्रता नष्ट हुए दस वर्ष बीतते-बीतते पंजाब में हर कोई तलवार छोड़कर हल की मूंठ पकड़ने लगा और जिसने स्वयं हल नहीं पकड़ा ऐसे सिख सिपाहियों ने अंग्रेजी लश्कर में प्रवेश क रवह (हल) अंग्रेजों की ओर से अपनी मातृभूमि पर चलाया। ऐसी स्थिति में पंजाब में वास्तव में कुछ भी गड़बड़ नहीं होगी, ऐसा उस प्रांत के मुख्य अधिकारी जॉन लॉरेंस को विश्वास था। मई माह प्रारंभ होने तक अन्य अंग्रेज कूटनीतिज्ञों की तरह उस प्रांत के मुख्य अधिकारी सर जॉन लॉरेंस 'मरी' हिल्स की ठंडी हवा में जाने को तैयार हुआ कि तभी 10 मई को मेरठ के विद्रोह की और 11 मई को दिल्ली स्वतंत्र होने का विद्युत समाचार पंजाब पर आ गिरा। यह सुनते ही पंजाब के उस 1857 का स्वातंत्र्य समर - 124
चाणक्य (धूर्त) चीफ कमिश्नर को समाचार की भयंकरता पूरी तरह समझ में आ गई और अंग्रेजी साम्राज्य को उलट देनेवाले इस आघात से निपटने वह रावलपिंडी में ही जमकर बैठ गया। इस समय पंजाब की अंग्रेजी सेना का अधिकतर हिस्सा मियां मीर में था। मियां मीर की छावनी, लाहौर के बहुत पास थी, अतः लाहौर के किले पर उन्हीं सिपाहियों में से चुने हुए सिपाही सुरक्षा के लिए रखे गए थे। इस छावनी में देशी सिपाही यूरोपियन सोल्जर से चार गुना अधिक होते हुए भी मेरठ का सामचार आने तक उनके लिए अंगेजी अधिकारियों के मन में कोई विशेष आशंका नहीं थी और इसीलिए वे क्रांतिकारियों से मिले हुए हैं या नहीं, यह एकाएक निश्चित करना बहुत कठिन हो गया। उस समय लाहौर में रॉबर्ट मोंटगुमरी मुख्य अधिकारी था। मोंटगुमरी ओर जॉन लॉरेंस ये दोनों ही डलहौजी की प्रशिक्षा में तैयार हुए थे, अतः त्वरित बुद्धि और अकस्मात् आ पड़े संकट से पर पाने में आवश्यक साहस और धैर्य में प्रवीण थे। फिर भी पंजाब के सिपाहियों में स्वतंत्रता की चेतना कहां तक उत्पन्न हुई है, इसकी सही जानकारी प्राप्त करना आवश्यक था। इस कार्य पर एक ब्राह्मण ने अपना देशद्रोही कार्य उत्तम रीति से सिद्ध करके मोंटगुमरी से निवेदन किया कि "साहब, वे सारे फसादी हैं और फसाद में बुरी तरह डूबे हुए हैं।" ऐसा कहकर उसने अपना हाथ अपने गले से लगाकर दिखाया। इस ब्राह्मण की यह वार्त्ता सुनकर अंग्रेजों की आंखों का भ्रम-पटल हट गया। विद्रोह की गुप्त तैयारी केवल उत्तरी हिंदुस्थान में ही नहीं अपितु उसकी ज्वालाएं सारे पंजाब में उचित अवसर पर उफन पड़ने तक दबी बैठी हैं, यह उन्हें स्पष्ट नजर आ गया और यह भयानक रहस्य प्रकट करनेवाले मेरठ के विद्रोह को धन्यवाद देते हुए मोंटगुमरी ने मियां मीर की नेटिव सेना को तत्काल निःशस्त्र करने का आदेश दिया। मई माह की तेरहवीं तारीख को सुबह के समय मियां मीर में एक जनरल परेड बुलाई गई। सिपाहियों को इसकी कोई पूर्व सूचना न मिले, इसलिए उस सुबह के पहले दिन सारे अंग्रेज लोगों के लिए एक जंगी सिपाहियों के ध्यान में आने के पूर्व ही उन्हें अचानक यूरोपियन सोल्जरों, घुड़सवारों ओर तोपखाने के घेरे में ले लिया गया और इस कपट नाटक का नेटिव सिपाहियों को पता चलते ही हमेशा की तरह परेड के बीच ही एकाएक तोपखाने को बत्ती लेकर तैयार रहने का आदेश हुआ और यह विचित्र सुनकर चकित उन रेजिमेंटों को हथियार नीचे रखने के आदेश दिए गए। गुस्से से गुर्राए पर प्रदीप्त तोपखाने के कारण हताश उन हजारों नेटिव सिपाहियों ने अपने-अपने हथियार नीचे डाले और एक अक्षर भी बोले बिना अपनी-अपनी लाइनों की ओर लौट गए। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 125
अति शूर और जिसके पराक्रम से ही अफगानिस्तान में अंग्रेजों के प्राण बचे थे, उसी पंजाबी सेना को मयां मीर में निःशस्त्र करने की इस विधि-प्रक्रिया में ही वहां की सेना की एक टुकड़ी लाहौर के किले पर भेजी गई। उस टुकड़ी ने लाहौर किले के तोपखाने पर नियुक्त अंग्रेजी सोल्जर की सहायता से वहां के नेटिव सिपाहियों को निःशस्त्र कर किले से निकाल दिया ओर किला अपने कब्जे में ले लिया। 13 मई को अंग्रेजों ने जिस फुरती से यह साहस भरा कृत्य पूरा किया उस फुरती से यदि एक अणु मात्र भी ढील हुई होती तो उस दिन से पंद्रह दिन के अंदर सारा पंजाब विद्रोह की आग में जलने लगा होता; क्योंकि पेशावर, अमृतसर, फिल्लौर, जालंधर इन अलग-अलग स्थानों पर स्थित पलटनें बड़ी उत्सुकता से इसकी प्रतीक्षा कर रही थी कि मियां मीर के सिपाही लाहौर के किले पर कब टूट पड़ते हैं। फिरंगियों द्वारा मियां मीर के सिपाहियों को निःशस्त्र कर लाहौर का किला कब्जे में लेने का समाचार फैलते ही पंजाब भर में अंग्रेजों का दबदबा फिर बढ़ने लगा।^{58} परंतु लाहौर के दुर्ग से भी अति महत्त्वपूर्ण स्थान अमृतसर का गोविंदगढ़ था। अमृतसर नगर सिखों के लिए काशी क्षेत्र होने से यहां किसी प्रकार की गड़बड़ी होने पर उन सारे लोगों के संतप्त हो जाने की संभावना थी, इसलिए क्रांतिकारी सिपाहियों की उस पर अधिक नजर थी। मियां मीर के निःशस्त्र सिपाही गोविंदगढ़ जीतने के लिए अमृतसर की ओर आ रहे हैं, यह अफवाह उठ जाने से अंग्रेजों में दहशत फैल गई और उन्होंने अमृतसर को बचाने के लिए सिख और जाट किसानों से विनती की। इस विनती को उन राजनिष्ठ देशद्रोहियों ने माना और अमृतसर का किला-लाहौर के किले की तरह ही अंग्रेजों ने पूरी तरह अपने अधिकार में ले लिया। इस तरह 15 मई के पहले ही लाहौर और अमृतसर, ये दो शहर तात्कालिक रूप से क्रांति की ज्वालाओं से सुरक्षित कर लिए गए। इतनी सुरक्षा होते ही सर जॉन लॉरेंस केवल अपने मातहत प्रदेश की चिंता नहीं कर रहा था; दिल्ली का समाचार मिलते ही उसने कहा कि यह सिर्फ विद्रोह नहीं है अपितू राज्य क्रांति होनेवाली है। फिर भी उसका अनुमान था कि दिल्ली यदि झटके में वापस आ गई तो फिर भी उसका अनुमान था कि दिल्ली यदि झटके में वापस आ गई तो फिर और कहीं विद्रोह नहीं होगा। इसी आधार पर उसने जनरल अॅन्सन को जून माह के पहले दिल्ली जीत लेने के लिए पत्र-पर-पत्र लिखे। इतना ही नहीं अपतुि पंजाब में सब ओर शांति बनाए रखने का काम अपने जिम्मे लेकर दिल्ली 1857 का स्वातंत्र्य समर – 126 58 “यदि पंजाब हाथ से चला जाता तो हमारा सर्वनाश हो जाना निश्चित था। ऊपरी प्रदेश में सेना पहुंचने से पहले ही सभी अंग्रेजों की अस्थियां धूप में सूखने के लिए डाल दी गई होतीं। इस संकट से बचकर पूरब में अपनी सत्ता पुनः स्थापित करना तथा गर्व से माथा ऊंचा उठाना इंग्लैंड के लिए असंभव ही हो जाता। –लाइफ ऑफ लॉर्ड लॉरेंस
पर हमला करने के लिए और अंबाला में सेना की कमी को पूरी करने के लिए पंजाब से लश्कर भेजना प्रारंभ किया। इस सहायता की पहली खेप डॉली के अधीन भेजी गइ गाइड कोर रेजिमेंट थी। जॉन लॉरेंस का डॉली की बहादुरी पर बहुत विश्वास था और इसीलिए दिल्ली पर चढ़ाई करने के लिए उसने उसी को चुनां डॉली अपनी रेजिमेंट लेकर मंजिल-दर-मंजिल दिल्ली की ओर बढ़ा और बुंदेल की सराय की लड़ाई के दूसरे दिन वहां की अंग्रेजी सेना से आकर मिल गया। दिल्ली के घेरे में अब दो नेटिव रेजिमेंट हो गई थी-एक गुरखों की रीड के अधीन और दूसरी डॉली के अधीन पंजाब से आई हुई। इन दोनों रेजिमेंटों पर अंग्रेजों की बड़ी कृपा थी और वह अनुचित थी, यह कौन कहे? इन नेटिव रेजिमेंटों ने उस कृपा के बदले वैसा ही देशद्रोह किया था। डॉली की रेजिमेंट के दिल्ली की ओर रवाना होने के बाद सर जॉन लॉरेंस ने पंजाब की कुल परिस्थिति का सूक्ष्म निरिक्षण किया। उस प्रदेश में हिंदू, सिख और मुसलमानों का आपस में अखंड द्वेष शुरू था। उत्तर हिंदुस्थान में हिंदू और मुसलमान दोनों को ही स्वदेशाभिमान का जैसा चैतन्य मिला हुआ था वैसा पंजाब के लोगों को उस समय मिला नहीं था। वास्तव में उनकी स्वतंत्रता गए दस वर्ष भी नहीं हुए थे। अंग्रेजों के कंठनाल पर सन् 1949 में जो सिख सिपाही कुल्हाड़ी चला रहे थे वे ही 1857 में उनके गले क्यों लगे क्यों लगने लगे, इस विलक्षण कूट प्रश्न का खुलासा इसी बात में होनेवाला है कि उनकी स्वतंत्रता जाते-न-जाते ही सन् 1857 की क्रांति आ गई थी। मुसलमानों की परतंत्रता पर जिस शूर और स्वाभिमानी जाति को इतना गुस्सा आया था कि सौ वर्ष तक अखंड लड़ाई कर अंत में पंजाब को स्वतंत्र किए बिना उन्होंने तलवार नीचे नहीं रखी, उसी 'खालसा' पंथ के अनुयायियों ने अंग्रेजों की गुलामी को इतना चाहा हो, ऐसा बिलकुल नहीं है। पर अंग्रेजों का राज गुलामी है या नहीं, यह उन सिपाहियों की बुद्धि में पूर्णता से आ भी नहीं पाया कि सन् 18567 आ गया। अंग्रेजों का राज हिंदुस्थान पर ऐसे ही समय आया जिस समय हिंदुस्थान में एक ऐतिहासिक जल प्रलय शुरू हो गया था। अनेक सदियों के बाद स्थान-स्थान पर अलग-अलग जमा जलसर अपने-अपने अपेक्षित बांधों को फोड़कर एक प्रचंड महानदी में विलीन हो रहे थे। यह महानदी थी हिंदुस्थान की एकराष्ट्रीय प्रवत्ति। आज विश्व में जो-जो राष्ट्र एकीकृत और संगठित हुए हैं उन सबको वह एकीकृत अस्तित्व आने के पहले, और आने के लिए ही ऐसी अराजकता और गृह कलह की अग्नि में पिघलना पड़ा था। इटली का गृहयुद्ध, जर्मनी का गृहयुद्ध-उनमें उनके विभिन्न प्रांतों और विविध जातियों की कड़ी शत्रुता और प्रतिशोध लेने के लिए एक-दूसरे पर किए गए अत्याचार-आदि की ओर देखें तो ऐसा लगता है जैसे हिंदुस्थान का यह गृहयुद्ध कुछ भी नहीं था। परंतु उपर्युक्त देशों को गृह कलह की भयानक आग में तथा 1857 का स्वातंत्र्य समर - 127
गुलामीगिरी की अत्यंत तीव्र उष्णता में पिघलना पड़ा, इसीलिए आज उनका एक संगठित सुंदर और सबल व्यक्तित्व बना है, यह भी कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। वैसी ही ऐतिहासिक उत्क्रांति से भारतभूमि की घटना गुजर रही थी। गुलामी की आंच हिंदुस्थानी लोगों को अच्छी तरह लग जाने से वे संगठित होने लगे थे। परंतु पंजाब को यह गुलामगिरी की आंच पूरी तरह लगने में दस वर्ष की अवधिंक कम थी और इसीलिए विशेषतः सिख सन् 1857 के उबलते राष्ट्र-तेज में विलीन न हो सके थे। 59 पंजाब के अंग्रेज अधिकारियों के ध्यान में यह सत्य आ गया था और इसीलिए उन्होंने सिखों और जाटों में मुसलमानों के प्रति द्वेष अधिक-से-अधिक भड़का देने का कार्य शुरू किया। सिख लोगों में मान्य एक पुराने भविष्य कथन का उन्हें स्मरण कराया गया। पहले मुगल बादशाह ने जहां अपने गुरु को मार डाला था उसी दिल्ली पर 'खालसा साहब' एक बार हमला कर उसे धूल में मिला देनेवाले हैं, ऐसा भविष्य संदेश हर सिख को दिया गया था। उस भविष्य कथन की पूर्णता का 'कंपनी साहब' को क्या लाभ? बहादुरशाह के स्थान पर कोई रणजीत सिंह दिल्ली पर राज्य करने लगेगा? हिंदुस्थान में रणजीत सिंह और बहादुरशाह दोनों ही न हों, इस हेतु जो प्रयास कर रहे थे उनको एकांगी भविष्य में कुछ संशोधन करना आवश्यक और सहज था। संशोधन करके जारी किए गए भविष्य के नए संस्करण में ऐसा लिखा हुआ था कि दिलली मिट्टी में तब ही मिलेगी जब खालसा साहब और कंपनी साहब एक होंगे। भविष्य तो भविष्य ही है। एक बात बुरी है, वह यह कि आज के भविष्य कल भूत हो जाते हैं। पर कम-से-कम आज जितना हो सके उतना लाभ ले लेना बुद्धिमानी है। इस भविष्य के अतिरिक्त सिख लोगों में दिल्ली के प्रति अधिक गुस्सा दिलाने के लिए एक झूठी घोषणा की गइ कि दिल्ली में बादशाह ने यह आदेश जारी किया है कि 'सारे सिखों को एक साथ कत्ल किया जाए!' अरे रे! बेचारा गरीब बादशाह!! इसी समय वह दिल्ली की सड़कों पर स्वयं घूम-घूमकर यह कह रहा था कि यह युद्ध केवल फिरंगियों के विरूद्ध है, अतः स्वदेशी लोगों को खरोंच तक न लगने दी जाए। परंतु क्रांतिकारियों के बहुत जोर लगाने पर भी सिख अंग्रेजों की ओर ही रहे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 128 59 1. सर जॉन लॉरेंस ने अपने 21 अक्तूबर, 1857 को लिखे गए एक पत्र में लिखा था-“यदि सिख हमारे विरूद्ध क्रांतिकारियों के साथ मिल जाते तो हमारी रक्षा करना मानवी शक्ति से परे था। किसी को यह आशा नहीं थी, न ही कोई यह कल्पना ही कर पाया था कि अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता को हड़पनेवालों से प्रतिशोध लेने का अवसर ये लोग गंवा देंगे और इस लोभ का संवरण कर लेंगे।।” 2. मेटकॉफ कृत-‘टू नेटिव नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी’।
पंजाब में जहां-जहां सेना की रेजिमेंट थीं वे अधिकतर हिंदुस्थानी लोगों की थी। इस कारण उन सबने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए कमर कसी हुई थी और वे अपने नियत संकेत-समय की प्रतीक्षा में रूके थे। केवल हिंदुस्थानी सिपाही ही पंजाब में स्वातंत्र्य को ललचाए थे, ऐसा बिल्कुल नहीं था; लश्कर के बाहर हर तरह के व्यवसायी नागरिक भी राज्य क्रांति के ‘बीज’ यहां-वहां छितराए हुए थे। मियां मीर के सिपाहियों को निःशस्त्र करने के बाद जल्दी ही ज्ञात हुआ कि वे जिस पर्वत पर शांति से सो रहे थे उसमें कितने विस्फोटक पदार्थ भरे पड़े हैं। लाहौर और अमृतसर के किले यद्यपि अंग्रेजों ने सुरक्षित कर लिये, तब भी फिरोजपुर में रखा गोला-बारूद का भंडार अभी सुरक्षित ही था। उस भंडार के लालच में वहां के नेटिव सिपाही विद्रोह करने को तैयार हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए 13 मई को एक परेड की गई। सिपाहियों ने परेड पर अपना व्यवहार इतना शांत रखा कि उस समय उनके हृदय में भड़क रही क्रोधाग्नि की एक चिंगारी भी बाहर नहीं आई। अतः उनको निःशस्त्र करने के बाद जल्दी ही ज्ञात हुआ कि वे जिस पर्वत पर शांति से सो रहे थे उसमें कितने विस्फोटक पदार्थ भरे पड़े हैं। लाहौर और अमृतसर के किसी यद्यपि अंग्रेजों ने सुरक्षित कर लिये, तब भी फिरोजपुर में रखा गोला-बारूद का भंडार अभी असुरक्षित ही था। उस भंडार के लालच में वहां के नेटिव सिपाही विद्रोह करने को तैयार हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए 13 मई को एक परेड की गई। सिपाहियों ने परेड पर अपना व्यवहार इतना शांत रखा कि उस समय उनके हृदय में भड़क रही क्रोधाग्नि की एक चिंगारी भी बाहर नहीं आई। अतः उनको निःशस्त्र करने का विचार त्यागकर तथा उनको केवल अलग-अलग रखने का निर्णय लेकर उनमें से एक पलटन को शहर के बाजार में से ले जाया गया। परंतु किस लेन-देन के लिए वह फिरोजपुर का बाजार से चले तो उन्हें दुकानदारों और दूसरे लोगों ने स्वराज्य की हवा बेचना प्रारंभ किया, जिससे बाजार से निकलते-निकलते सिपाहियों के मन की चंचलता नष्ट हो गई; दृढ़ निश्चय हो गया और 'हर-हर महादेव' की घोषणा हो गई। सिपाहियों के आक्रमण से गोला-बारूद का भंडार बचाना कठिन लगते ही उसे उड़ा देने के सिवाए अंग्रेजों का अन्य उपाय ही न रहा। बारूद का भंडार उड़ा देखकर स्वराज्य का निशान जिस दिल्ली की प्राचीर पर स्वदेश वीरों को बुला रहा था उस प्राचीर की ओर सिपाही दौड़ चले। इसी समय फिरोजपुर शहर भी विद्रोही हो गया और यूरोपियन लोगों के बंगले, तंबू, भोजनालय, प्रोस्टेंट चर्च कैथोलिक चर्च जलाते, गिराते, लूटते, नष्ट करते लोग यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन पहले ही बैरकों के पीछे जाकर सुरक्षित बैठे थे। सिपाहियों का पीछा करने जो अंग्रेजी सेना भेजी गई थी वह, जो सामने आया उसे मारते और अपनी क्रूरता पर घमंड करते हुए लौट आई। पंजाब में अंग्रेजों की सत्ता को जैसे अंदरूनी असंतोष का डर था वैसे ही उसे सरहद पार के अफगानी डकैतों का भी डर था। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध की गुप्त चर्चा के समय लखनऊ की गुप्त समिति ने काबुल के अमीर की सहायता मांगने का प्रयास किया था। क्योंकि सन् 1856 के अगस्त माह में मि. फारसिथ के हाथ एक पत्र पड़ा था जिसमें यह स्पष्ट लिखा था- “लखनऊ के मुसलमानों ने अमीर दोस्त मोहम्मद से संबंध जोड़े हैं। अवध का राज्य अधिगृहीत हो गया है और अब हैदराबाद पर एक 1857 का स्वातंत्र्य समर - 129
कुल्हाड़ी चलते ही मुसलमानी सत्ता का नाम भी फिर से सुनाई न देगा। इसका समय पर ही कुछ उपचार करना होगा। यदि लखनऊ के इस प्रश्न का उस राजनितिपटु अमीर ने अस्पष्ट उत्तर दिया-‘‘जो होगा, देख लेंगे।‘’ परंतु काबुल के अमीर से अंग्रेजों का हाल ही में समझौता हो जाने के कारण उन्हें अमीर से अधिक पेशावर के नजदीक की स्वतंत्र मुसलमान जमातों से अधिक डर था और मुसलमानी जमातों में कोई अंग्रेजों से मिल न जाए, यह उपदेश करते सैकड़ों मुल्ला यात्रा पर निकले थे। पेशावर में इस समय जो अंग्रेज अधिकारी थे वे सारे ही साहसी, राजनीतिपटु और युद्ध-विशारद थे, इसमें कोई शंका नहीं। निकल्सन, एडवर्ड्स, चेंबरलेन आदि अधिकारियों के उत्साह के कारण और उन्हें जॉन लॉरेंस जैसे वरिष्ठ अधिकारी से प्राप्त अचूक सहायता के कारण पेशावर की ओर का यह संकट बड़े धैर्य से टाला गया। उन्होंने तत्काल ही जान लिया कि विद्रोह करना चाहनेवाली मुसलमान जमातों को किस तरह अपनी ओर करना चाहिए और धन का लालच मिलते ही वे सारे पहाड़ी लोग अंग्रेजी सेना में नौकरी पाने की जल्दी करने लगे। पहाड़ी लोगों को धनबल पर खरीदते ही जॉन लॉरेंस ने पंजाब में इधर-उधर सुलगते असंतोष को वहीं-का-वही दबा देने के लिए एक घुमंतू सेना का निर्माण किया। इस सेना में अनुभवी, कसे हुए, जिनकी ईमानदारी पर अंग्रेजों को पूरा विश्वास था, ऐसे नेटिव सिपाही एवं अंग्रेज सोल्जर लिये जाते। इस`सेना का गठन होते-होते ही उसके लिए एक काम तैयार हो गया, क्योंकि पेशावर की ओर के भारतीय सिपाहियों में मियां मीर की निःशस्त्रता की घटना का समाचार पहुंचते ही बडी खलबली मच गई थी, इसलिए इस भारतीय सेना पर स्वयं पहली चोट करने की योजना पेशावर के साहसी अंग्रेज अधिकारियों ने बनाई और वे इस सारी सेना को निःशस्त्र करने को तैयार हो गए। परंतु उस भारतीय सेना के अंग्रेज कमांडर आदि अधिकारियों को अपने सिपाहियों का यह अमपान बहुत बुरा लगा। सन् 1857 में जो एक विलक्षण गुप्तता चारों ओर रखी गई थी उसी के जाल में फंसे ये अंग्रेज अधिकारी यह मानने को बिल्कुल तैयार नहीं थे कि उनके अधीनस्थ सिपाही विद्रोह पर उतारू हैं। फिर भी कॉटन और निकल्सन ने इस नेटिव सिपाहियों को 21 मई को सुबह के समय यूरोपियन सेना से घेरकर निःशस्त्र करने का आदेश दिया। इस अकस्मात् हुए हमले से बच पाना असंभव है, यह देखकर सारे सिपाहियों ने अपने हथियार नीचे रखे और यह अपमान भरा कृत्य देखकर क्रोधित उनके अंग्रेज अधिकारी भी अपने सिपाहियों के साथ कंपनी को धिक्कारने लगे। पेशावर की नेटिव सेना को निःशस्त्र करने के बाद पंजाब सरकार को होती-मर्दानी में रखी 55वीं नेटिव रेजिमेंट की ओर देखने की फुरसत मिली। यह 55वीं नेटिव 1857 का स्वातंत्र्य समर - 130
रेजिमेंट विद्रोही हो गई है, इस संबंध में सरकार को विश्वास हो गया था। परंतु उन सिपाहियों के मुख्य सैनिक अधिकारी कर्नल स्पॉटिस वुड को सरकार के इस संदेह पर बहुत खेद हुआ। हमारे सिपाही सरकार से कभी भी बेईमानी नहीं करेंगे, यह वह जी तोड़कर कहता रहा, फिर भी जब सरकार पर सवार खून नहीं उतरा तो उसका हृदय टूट गया। 24 मई को सिपाहियों के नेताओं ने कर्नल के पास आकर पूछा, "अंग्रेजी सेना पेशावर से हमपर हमला करने आ रही है, क्या यह समाचार सच है?" इस प्रश्न का कर्नल ने गोलमोल उत्तर दिया। सिपाहियों को उससे संतोष न होते हुए भी वे लौट गए। उस 55वीं नेटिव रेजिमेंट का पेशावर की सेना की तरह खात्मा करने के लिए अंग्रेजों सेना वास्तव में चढ़ी चली आ रही थी। वह दुष्टतापूर्ण कार्य देखते बैठने की अपेक्षा कर्नल स्पॉटिस वुड ने अपने कमरे में जाकर आत्महत्या कर ली। यह समाचार 55वीं रेजिमेंट को ज्ञात होते ही उसने खजाने पर हमला किया और अपने-अपने शस्त्र, निशान और वह खजाना लेकर वे सारे सिपाही फिरंगियों की गुलामी को लात-मारकर आगे चले। परंतु होती-मर्दान से दिल्ली कोई पास नहीं थी। सारा पंजाब यूरोपियनों की सुसज्ज सेना से अटा पड़ा था और यूरोपियन सेना पिछाड़ी पर टूटी पड़ रही थी। ऐसी स्थिति में सफलता इतनी कठिन थी कि पेशावर के सिपाहियों की तरह ही चुपचाप शस्त्र नीचे रखकर फिरंगियों की शरण जाने की बात भी उनके मन में आने लगी। परंतु अब फिरंगी दासता की बेड़ियां पैरों में डाल लेने की अपेक्षा यमपाश गले में डलवा लेना उन वीरों को पसंद आया और अपने पीछे लगी अंग्रेजी सेना को उसने यह बात कह दी कि - अब लड़ते-लड़ते प्राण दिए। इस 55वीं रेजिमेंट की कहानी भी इतनी हृदयद्रावक है कि उसे सुनने पर-'अपि ग्रावा रोदत्यपि दलति वज्रस्य हृदयम!' उनका पीछा करने के लिए निकल्सन इतना कठोर हो गया था कि वह चौबीस घंटे तक घोड़े से नीचे नहीं उतरा। सैंकड़ों लोग उस लड़ाई में मारे गए और शेष लड़ते-लड़ते सरहद के बाहर निकल गए। परंतु वहां भी उन्हें आश्रय कौन दें? वहां की मुसलमान जमातों ने उनका स्वागत बहुत ही भयंकर तरीके से किया। उनमें से हिंदुओं को अकेले-अकेले पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया जाने लगा। उनमें से हिंदुओं को अकेले-अकेले पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया जाने लगा। तब वे अभागे सिपाही यह सोचकर कि अपने हिंदुत्व की रक्षा करने में कश्मीर का हिंदू राजा समर्थ होगा, आश्रय पाने, धर्म-रक्षण करने एवं देश-सेवा करने गुलाब सिंह के प्रदेश की ओर चल पड़े। रास्ता पथरीला, वहां अन्न नहीं, वस्त्र नहीं, विश्राम नहीं-ऐसे संकटों और कठिनाइयों से जूझते वे सैकड़ों हिंदू सिपाही-अपने धर्म का आज तीनों लोकों में कोई त्राता नहीं, इस दुःख के अश्रु बहाते कश्मीर की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्हें चींटियों, कीड़ों की तरह मसल डालने को अंग्रेजों ने हर कदम 1857 का स्वातंत्र्य समर -131
पर तलवार चलाई। परंतु फिर भी अपने धर्म का त्राता कश्मीर में है, ऐसी उत्कट भावना से वे हजारों सिपाही कश्मीर की ओर बढ़ ही रहे थे। धर्म का त्राता! हाय!! यह ज्ञात होते ही ि कवे कश्मीर की ओर आ रहे हैं, वहां के राजा राजपूत कुलोत्पन्न गुलाब सिंह ने उन अनाथ हुए और धर्मरक्षा के लिए मृत्यु से भी बच निकलनेवाले हिंदू लोगों को अपने राज्य में प्रवेश करने से मना किया। इतना ही नहीं अपितू इन हिंदुओं में से जो कोई जहां कहीं भी मिल जाए उसे वहीं काट डालने का कड़ा आदेश अपने लश्कर को देकर उसने अपना यह 'सुकृत्य' अंग्रेजों के दरबार में बड़े गर्व से सूचित किया। अब या तो धर्मांतरण करना या फिर गुलामी स्वीकार करना या मृत्यु का आलिंगन करना, यही कुछ करना था उन्हें। इन तीनों में से उन हिंदू शूरों ने तीसरा रास्ता अपनाया। अंग्रेजों ने कदम-कदम पर निष्ठुरता से इतने कत्ल किए कि मैदानों में स्थित वध-स्तंभ निरपराध हिंदू रक्त से भीगकर सड़ने लगे। फिर भी अंग्रेजों को उस रक्तपात से घृणा नहीं हुई। वध-स्तंभ-स्थायी वध-स्तंभ-जब रात-दिन काम करते वधिक थक गए तब तोपों के मुंह खोले गए। और जिस 55वीं रेजिमेंट ने अंग्रेजों के रक्त की एक बूंद भी नहीं बहाई थी उसका हर सिपाही तोप से उड़ा दिया गया। एक हजार हिंदू चुटकी बजाते गारद कर दिए गए। परंतु उस अंतिम समय में भी उन हिंदू वीरों ने अपना वीरत्व नहीं त्यागा। क्योंकि फांसी या तोप के प्रश्न के उत्तर में वे अटल होकर उत्तर देते-“कुत्ते फांसी पर नहीं मरेंगे-हमें तो तोप से उड़ाया जाना ही इष्ट है।|”60 घोर जंगली आदमी से लज्जित हो जाए, ऐसी क्रूरता से उपर्युक्त शूरवीरों को काट डालने के लिए अंग्रेजी इतिहासकार कहते हैं-"यह दंड क्रूरतम था, इसमें कोई शंका नहीं; परंतु उस समय की क्रूरता ही सर्वकालीन भूतदया है। भूतदया के लिए ही वह क्रूरता करना इष्ट था।” अंग्रेजी इतिहासकारों, तुम अपने ये बोल ध्यान में रखना, अच्छा! “घड़ी भर की क्रूरता में सदैव के लिए मानवता का मंगल निहित था।” इस वाक्य का जो अर्थ तुम अभी कर रहे हो वैसा ही वह तुम्हें क्या और थोड़ी देर बाद भी स्मरण रहेगा? सार्वकालिक भूतदया के लिए यह तात्कालिक क्रूरता कर रहे हो वह तो ठीक है, पर उधर कानपुर में हिंदुओं का नाना साहब बैठा हुआ है, यह भी थोड़ा ध्यान में रखना। यहां एक बात और कहनी चाहिए कि क्रांतिकारियों द्वारा की गई मार-काट का वर्णन जो अंग्रेजी इतिहासकार कमाल की नाटकीयता से करते हैं वे ही (अंग्रेजी इतिहासकार) अंग्रेजों द्वारा किए गए अक्षम्य, अनन्वित एवं अमानुषिक अत्याचारों को जान-बूझकर छिपाने का प्रयास करने लगते हैं। उपर्युक्त दुर्दैवग्रस्त परंतु स्वाभिमानी रेजिमेंट का कत्लेआम जब चल रहा था तब उनके मृत्यु पूर्व तक अंग्रेजों के राक्षसी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 132 60 के द्वारा प्रस्तुत वृत्तांत।
विद्वेष ने उन्हें कैसी-कैसी यंत्रणाएं दी होंगी, वह केवल ईश्वर को ही ज्ञात होगा। क्योंकि उन भयानक कहानियों को इतिहास से पोंछ डालने के लिए अंग्रेजी इतिहासकारों ने उसका कोई संकेत भी अब रहने नहीं दिया है। स्वयं ‘के’, जो प्रमुख अंग्रेज लेखक है, कहता है-‘‘यद्यपि मेरे सामने अंग्रेजों द्वारा की गई भयंकर क्रूरतापूर्ण यंत्रणाओं के वर्णन के ढेर सारे पत्र पड़े हैं, फिर भी यह विषय फिर से विश्व के सामने न आ पाए, इसलिए मैं उस हेतु एक अक्षर भी नहीं लिखता।’’ ये हैं इतिहासकार! जिन लोगों ने दिल्ली के रास्ते पर गरीब और निरपराध ग्रामीणों के मुंह में मरने के पहले गाय का मांस ठूंसा, उन लोगों ने 55वीं रेजिमेंट के धर्मनिष्ठ सिपाहियों के मुंह में मरने के पहले गाय का मांस ठूंसा, उन लोगों ने 55वीं रेजिमेंट के धर्मनिष्ठ सिपाहियों के मुंह में गाय का मांस ठूसकर ही उन्हें तोप से उड़ाया होगा, इसमें शंका की गुंजाइश कहां। पेशावर की ओर ऐसी अमानवीय घटनाएं हो रही थी और इधर जालंधर की ओर विद्रोह की आग चेत रही थी। पंजाब में जॉन लॉरेंस नेटिव सिपाहियों को लगातार सपाटे से निःशस्त्र करता जा रहा था और उसी सपाटे में अब तक जालंधर और फिल्लौर भी पड़ जानेवाला था। परंतु फिल्लौर के नेटिव सिपाहियों ने जो आत्मसंयम और घटना चातुर्य दिखाया वह वास्तव में बड़ी चालाकी का था। पंजाब में सारे नेटिव सिपाहियों की जैसी एकदम उठने की तैयारी हुई थी वैसी ही जालंधर-दोआब में भी नेटिव सिपाहियों की जैसी एकदम उठने की तैयारी हुई थी वैसी ही जालंधर-दोआब में भी नेटिव सिपाहियों की थी। दिल्ली जीतते समय उस लड़ाई में घायल पड़े एक देशभक्त हवलदार ने स्पष्ट कहा है और सरकारी रिपोर्ट में यही मान्य है कि सारे जालंधर-दोआब भर में एकाएक विद्रोह करने का पक्का निर्णय हो चुका था। जालंधर की सेना ने एक टुकड़ी होशियारपुर भेजी और यह संदेश भी कि वहां 33वीं पैदल रेजिमेंट विद्रोह करे और वह न हो सके तो 33वीं पैदल रेजिमेंट वहीं रहे। (उसी तरह वे रहे भी) बाद में उन सब लोगों के फिल्लौर की ओर आते ही फिल्लौर की तीसरी रेजिमेंट विद्रोह करे और फिर सब मिलकर दिल्ली की ओर चलें। अन्य स्थानों पर भी ऐसी ही योजनाएं चल रही थीं। परंतु उसपर कार्यवाही का समय आने के पहले ही सब बात फूटने से अंग्रेज सावधान हो जाते। हां, फिल्लौर के रेजिमेंट ने अंत तक आश्चर्यजनक गोपनीयता बनाए रखी। दिल्ली के लिए जब सीजट्रेन ले जाई गई उस समय उसके टुकड़े कर देना। उनके हाथ में था। परंतु इससे सारी योजना ही न फूट जाए, इसलिए इस रेजिमेंट ने अंत तक ऊपरी शांति बनाए रखकर कमाल किया। आखिर में 9 जून को जालंधर की ओर पक्की सूचना दी गई-क्वींस रेजिमेंट के कर्नल के बंगले को आग लगाई गई। यह संकेत होते ही आधी रात को जालंधर के सिपाहियों का विद्रोह इतना अचूक और तेजी से हुआ कि उनकी कर्कश रणध्वनि होते ही अंग्रेजों का साहस टूट गया। अंग्रेज महिला, बच्चे, पुरूष अपनी-अपनी जान बचाने के लिए तेजी से भागने लगे। परंतु जालंधर के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 133
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में बाधा न बनने देकर यद्यपि अपनी रेजिमेंट पर सरकार खुश थी, तब भी मातृभूमि की स्वतंत्रता के युद्ध का शंखनाद होते ही उस उदात्त कर्तव्य पर उन्होंने कैसा आत्मार्पण किया, यह पूर्वोक्त वर्णन से स्पष्ट दृष्टिगत होता है। उस आधी रात को विद्रोह शुरू करने के पहले ह ीवह समाचार फिल्लौर के देशवीरों को बताने के लिए एक घुड़सवार दौड़ता गया था। जालंधर से स्वतंत्रता के इस दूत के आते ही फिल्लौर के सैनिकों ने विद्रोह किया। अब केवल जालंधर के लोगों के फिल्लौर पहुंचाने भर की देरी थी। पर अंग्रेजों के तोपखाने और घुड़सवारों को अनदेखा कर जालंधर से फिल्लौर आना कोई सरल काम नहीं था। परंतु अंग्रेजों में इतना गड़बड़ घोटाला फैल गया था और विद्रोहियों का नक्शा इतना सही था कि जालंधर के सारे सिपाही अपना अनुशासन बनाए हुए फिल्लौर पहुंच गए। अपने इन हजारों स्वदेश बंधुओं को अपनी ओर आते देखकर फिल्लौर पहुंच गए। अपने इन हजारों स्वदेश बंधुओं को अपनी ओर आते देखकर फिल्लौर के सिपाही प्रेम से उमड़ पड़े तथा अपनी लाइनें छोड़ भागकर आलिंगनबद्ध हुए और वह विशाल सेना स्वदेशी जमादारों, सूबेदारों की आज्ञा में दिल्ली की ओर चल पड़ी। रास्ते में एक नदी थी और उसके पर लुधियाना शहर था, जो उन देशवीरों की चरणधूलि की बाट जोह रहा था। लुधियाना शहर में उस दिन प्रातः ही अंग्रेज अधिकारियों के पास जालंधर विद्रोह का तार आ गया था। पर वह जब तक मिले तब तक उस शहर के सिपाहियों को कब्जे में रखने की सारी आशा नष्ट हो चुकी थी; क्योंकि यह तार आने के पहले ही अपने भाइयों के जालंधर छोड़कर निकल पड़ने का समाचार उन्हें मिल गया था। लुधियाना के अंग्रेज अधिकारियों ने फिल्लौर से आ रही सेना को दोनों शहरों के मध्य स्थित सतलुज नदी पर रोकने का निश्चय किया। उस नदी का नावोंवाला पुल तोड़कर यूरोपियन, सिख और नाभा द्वारा सहायता के लिए भेजा लश्कर-ये सब नदी किनारे की सुरक्षा करने लगे। क्रांतिकारियों को जब पुल तोड़े जाने का समाचार मिला तो वे वहां से चार मील दूर जाकर नदी के पर उतरने लगे। उनकी कुछ सेना नावों द्वारा उस पार हो गई थी, कुछ हो रही थी और कुछ किनारे पर ही खड़ी थी। यह अवसर उचित व अनुकूल समझकर अंग्रेजों और सिखों ने उन पर तोपखाने से हमला शुरू कर दिया। यह समय रात के दस बजे का था, इसलिए अंग्रेजों की सेना निकट ही है, इस बात का क्रांतिकारियों को अनुमान नहीं लग रहा था। उनकी तोपें भी अभी नदी पर नहीं हुई थीं। ऐसी कठिन परिस्थिति में फंसे उन क्रांतिकारियों पर तोपखाने के साथ अंग्रेज और सिख अचानक आ टूटे थे। परंतु उनके हमले का पहला जोर समाप्त होते ही सिपाहियों ने तनिक भी पीछे न हटते हुए उन पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। अंग्रेजी तोपों और सिखों की मार के सामने नदी उतरते वे बिखरे हुए सैनिक अडिग होकर लड़ रहे थे। इतने में अंग्रेज सेनापति विलियम के सीने में एक सिपाही की सनसनाती हुई गोली आ धंसी और वह 1857 का स्वातंत्र्य समर – 135
मरणासन्न हो गिर पड़ा। तभी उस भयंकर रणभूम में आधी रात का अंधियारा दूर करने और स्वतंत्रता-भक्तों के संतप्त सिरों पर शीतल चंद्रिका की वर्षा करने हेतु रजनीनाथ का आकाश में उदय हो गया था। इस चंद्र प्रकाश से क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की सारी व्यूह रचना समझ में आ गई और वे अपना स्थान छोड़कर अंग्रेजों पूरी शक्ति से टूट पड़े। इस अद्भूत आक्रमण के सामने अंग्रेजी सेना, सिख और अन्य राजनिष्ठ अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। अपनी इस आधी रात की विजय और जल्दी ही उदित उषःकाल की सुंदर प्रभा से और अधिक खिली वीरश्री से वे सारे क्रांतिकारी सैनिक दूसरे दिन दोपहर के लगभग लुधियाना शहर में घुसने लगे। लुधियाना में एक मौलवी अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होकर स्वराज्य-संस्थापना करने के लिए लगातार उपदेश करता घूमता रहता था। उस मौलवी के प्रचार से लुधियाना शहर पंजाब में क्रांतिकारियों का एक सशक्त केंद्र बन गया था। गुलामी की बेडियां तोडने के लिए अंतिम चोट करने का समय आ गया है, ऐसी सूचना मिलते ही वह सारा शहर 'दीन' की गर्जना करता उठ खड़ा हुआ। सरकारी भंडार लूटे गए; येरोपियन चर्च, यूरोपियन के घर, अंग्रेजी अखबारों के छापाखाने-ऐसे सारे स्थान जलाकर खाक कर दिए गए और जब सिपाही अंदर घुसने लगे तो उन्हें साथ लेकर यूरोपियनों के प्रमुख स्थानों और विशेष रूप से सरकार के आगे दुम हिलानेवाले सारे नेटिव कुत्ते खोज निकालने के लिए नागरिकों में स्पर्धा शुरू हो गई। कारावास तोड़े गए। जो कुछ भी सरकारी था या जो कुछ अंग्रेजों का था वह वह अग्नि की भेंट न चढ़ पाया तो चूर-चूर कर दिया गया और इस तरह लुधियाना शहर विद्रोह की आग में जलने लगा। विद्रोहियों का दिल्ली जाना आवश्यक था; जबकि लुधियाना के किले पर रहकर पंजाब का वह नाका पकड़े रहना भी आत्यावश्यक था। यदि दिल्ली की भांत लुधियाना भी विद्रोह का केंद्र हो जाता तो उससे अंग्रेजी सत्ता को जोरदार धक्का लगा होता । हालांकि विद्रोही यह समझते नहीं थे, सिपाही; न उनका कोई सेनापति था, न ही कोई नेता। उनके पास यात्रा हेतु आवश्यक सामग्री भी नहीं थी। ऐसे समय में वहां कोई नाना साहब, खान बहादुर या मौलवी अहमद शाह होता तो उसने लुधियाना को कभी न छोड़ा होता। परंतु उन सबके न होने के कारण उन्हें दिल्ली की ओर जाने के सिवाय दूसरा मार्ग ही नहीं था और इसीलिए-स्वराज्य या गुलामी, इसका अंतिम निर्णय अब दिल्ली की प्राचीर पर ही होगा-ऐसी गर्जना करते हुए वे दिल्ली की ओर दिन-दहाड़े गाते-बजाते जा रहे थे, फिर भी उनका पीछा करने की किसी में हिम्मत नहीं थी। मेरठ के विद्रोह के कोई तीन हफ्ते बाद तक क्रांतिकारियों को जो शांति बनाए 1857 का स्वातंत्र्य समर – 136
रखना अनिवार्य हो गया था, उस शांति का लाभ अंग्रेजों ने पंजाब में पूरी तरह उठाया। पंजाब में यूरोपियन सेना अधिक होने के कारण वहां की नेटिव रेजिमेंटों को या तो निःशस्त्र करना या असमय और अपरिपक्व अवस्था में विद्रोह करने को बाध्य करके उनका सहज नाश करना बहुता ही सुलभ हो गया। राज्य क्रांति के पक्ष से सिख रियासतदार और अन्य सिख लोग मिलकर अपने से ही मिल रहे हैं, यह देखकर ही वे सरहद से सतलज तक पंजाब में जितने भी हिंदुस्थानी थे उन्हें वहां से भगाकर पंजाब में विद्रोह का बीज समाप्त कर सके। इस समय लश्कर में ही नहीं अपितु गांवों और शहरों में आराम से रह रहे हजारों हिंदुस्थानी लोग पंजाब से अंग्रेजों की इच्छा के कारण सीमा पार कराए गए और इस तरह पंजाब हाथ में आते ही वहां की यूरोपियन सेनाओं को दिल्ली की ओर तीव्रता से भेजा जाने लगा। पंजाब के अंग्रेजों के पूर्ण नियंत्रण में रहने के दो मुख्य कारण थे। एक तो यह कि सिखों ने अंग्रेजों का साथ दिया। इन लोगों ने उस समय केवल चुप्पी ही साध ली होती तो अंग्रेजों के हाथों में पंजाब एक दिन भी नहीं रह पाता। इन सिख लोगों को क्रांतिकारियों ने अपनी ओर करने के लिए प्रयास नहीं किए, ऐसा भी नहीं था। दिल्ली के स्वतंत्र होते ही बादशाह के एक 'ईमानदार सेवक' ने उन्हें पंजाब के सारे समाचार सूचित करने के लिए एक लंबा, विस्तृत एवं बहुत ही मार्मिक पत्र लिखा था। उसमें वह ईमानदार पत्र-लेखक ताजुद्दीन लिखता है-“पंजाब के सारे सिख सरदार कायर, डरपोक और हिंदुस्थानी लोगों का साथ न देकर फिरंगियों के कुत्ते बने हुए हैं। मैं स्वयं उनसे मिला, उनसे संवाद किया और उनको जी-जान से कहा कि फिरंगियों से मिलकर जो तुम देशद्रोह कर रहे हो वह किसलिए? स्वराज्य में तुम्हारा लाभ नहीं है? फिर अपने इस लाभ के लिए ही तुम्हें बादशाह से मिलना चाहिए। इसपर वे मेरे सामने कहते हैं-देखिए, हमस ब अवसर की प्रतीक्षा में हैं। दिल्ली के बादशाह का आदेश लेकर घुड़सवार सिख राजाओं के पास आए तब उन्होंने उन्हें मरवा दिया। पंजाब पर नियंत्रण रखना अंग्रजों को सुलभ हुआ, उसका यह पहला और विशेष कारण है। सिखों के इस विरोध की परवाह न कर पंजाब से अंग्रेजों को भगाना किसी तरह भी संभव नहीं, ऐसा नहीं था। अंग्रेज जिस विलक्षण ढीलेपन से मई माह तक रहते थे उस ढीलेपन का लाभ उठाकर पूर्व संकल्प के अनुसार सब ओर एक साथ विद्रोह हुआ होता तो सिखों पर भी क्रांतिकारियों का आतंक छाने से कम-से-कम उनमें फूट तो निश्चित ही पड़ जाती। विशेषकर पंजाब के नेटिव सिपाहियों को एक-एक कर पकड़कर अंग्रेज जिस तरह उन्हें नरम कर सके वैसा बिल्कुल नहीं हो पाता। पंजाब में स्वराज्य की इच्छा नहीं थी। ठाणेश्वर के ब्राह्मण, लुधियाना के मौलवी, फिरोजपुर के दुकानदार और पेशावर के मुसलमान-सभी 'स्वराज्य 1857 का स्वातंत्र्य समर – 137
और स्वधर्म के लिए जंगी जेहाद करो', ऐसा उपदेश देते हुए घूम रहे थे। उपर्युक्त पत्र लेखक भी लिखता है- "बादशाह के दरबार से यदि कोई सरदार सेना के साथ इधर भेजा जाए तो पंजाब चुटकी बजाते ही स्वतंत्र हो जाएगा। सारी हिंदुस्थानी सेना विद्रोह कर उनके झंडे के नीचे आ जाती और सिखों का भागना मुश्किल हो जाता। मेरा ऐसा विश्वास है कि सारे हिंदू और मुसलमान आपके भाग्यशाली सिंहासन का प्रेम मुजरा करेंगे। और यह भी कि जून माह में ही विद्रोह करना इष्ट है, क्योंकि अंग्रेज सोल्जरों को धूप की गरमी में लड़ना बहुत कठिन होता है। वे लड़ने के पहले ही चटाचट मरने लगते हैं। इसलिए पत्र देखते ही आप कोई सरदार पंजाब में भेजे। पंजाब के लोकमत का झुकाव दिल्ली की ओर होते हुए भी वह दिल्ली का लाभ नहीं ले सका, इसका कारण यह था कि दिल्ली में विद्रोह हो जाने के बाद तीन सप्ताह तक क्रांति की लहर का ठहरी रहना अपरिहार्य हो गया था। यही विद्रोह यदि पहले से निश्चित संकेतों के अनुसार एक सप्ताह में होता तो अंग्रेज कहीं भी हलचल नहीं कर सकते थे। पंजाब में अकेली एक-एक और अनाथ सेनाएं निःशस्त्र नहीं की जा सकती थीं। क्रांति की लहर निरंतर उबलने से सिखों जैसे अनिश्चित विचार के लोग भी उसमें बह सकते थे और प्रारंभ में ही विजय प्राप्त हो जाने पर जिनके मन क्रांति की ओर झुके हुए थे, पर क्रांति में सम्मिलित होने से डरते थे, उन्हें भी जोश आ जाता। सारांश यह है कि सिख लोगों के देशद्रोह के कारण और अधपकी स्थिति में अंग्रेजों ने इन तीन सप्ताहों में चारों ओर यथासंभव बंदोबस्त करके कलकत्ता से इलाहाबाद तक यूरोपियन सेनाओं का निरंतर प्रवाह चालू रखा था। बंबइ, मद्रास, राजपूताना और सिंध प्रांत में विद्रोह से सहानुभूति रखनेवाले कोई हैं या नहीं, इसकी बारीकी से जांच कर उनको पंजाब की भांति ही समय रहते पूरी तरह नष्ट कर डालने के प्रयास आरंभ हो गए थे। और इस अग्रिम सूचना के लिए ईश्वर का आभार मानते हुए अब विद्रोह की ज्वालाएं स्थान-स्थान पर समाप्त कर दी गई हैं, यह विश्वास भी उन्हें होने लगा। इन तीन हफ्तों में अंग्रेजों की कार्यवाहियों के चलते क्रांति पक्ष की ओर से इक्का-दुक्का विद्रोह को छोड़कर सब ओर यथासंभव गोपनीयता रखी गई थी। 30 मई तक दोनों पक्षों की ऐसी स्थिति थी। यह स्थिति मई की 30 तारीख के बाद किस तरह पलट गई, अंग्रेजों के मन में उत्पन्न होता विश्वास कैसे चकनाचूर हुआ और तीन हफ्तों में हुई हानि की परवाह न करते हुए क्रांति की ज्वालाएं कैसे एकाएक भड़क उठी, यह देखना आवश्यक है। राज्य क्रांतियां किसी सूत्रबद्ध नियम से नहीं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 138