अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
(१५८) अद्भुतरामायण [ षड्विंशति-
प्रकृत्या नीलरूपस्त्वं लोहितो रावणार्र्दितः ।। नीललोहितरूपेण त्वया सहवसाम्यहम् ।। ४१ ।। गृहाण च वरं राम सखो यदभिकां- क्षितम् ।। तच्छ्रुत्वा राघवो वीरः प्रतिश्रुत्य गिरौ स्थितिम् ।। ४२ ।।
हे राम तुम प्रकृतिसे नीलरूप हो रावणसे अर्दित होनेसे लोहितवर्ण हुए सो नीललोहित रूपसे तुम्हारे साथ में निवास करूँगी ॥ ४१ ॥ हे राम ! जिस वरकी इच्छा हो सो आप मुझसे मांगिये, यह वचन सुन रामचन्द्र उस पर्वतकी स्थितिको अङ्गीकार कर ॥ ४२ ॥
भारद्वाजांशभागेन ययाचे परमेश्वरीम् ।। देवि सीते महाभागे दर्शितं रूपमैश्वरम् ।। ४३ ।। हृदयान्नापगच्छेतदिति मे दीयतां वरः ।। भ्रातरो मम कल्याणि वानरोः सविभिषणाः ।। ४४ ।।
हे भारद्वाज ! अंश भागद्वारा परमेश्वरीसे मांगने लगे, हे महाभागे देवि सीते ! यह जो तुमने ईश्वर सम्बन्धी रूप दिखाया है ॥ ४३ ॥ यह कभी मेरे हृदयसे न जाय यही वर मुझे दीजिये । हे कल्याणी ! मेरे भ्राता वानर और विभीषणादि सुहृद् ॥ ४४ ॥
सेनान्यो मम वैदेहि अयोध्यायोधमुख्यकाः ।। सुपुनस्ते संगताः संतु मया रावणतर्जिताः ।। ४५ ।। एतस्मिन्नंतरे चाभूदाकाशे दुंदुभि- स्वनः ।। पपात पुष्पवृष्टिश्च रामसीतोपरि द्विज ।। ४६ ।।
हमारे सब सेनाके लोग अयोध्याके मुख्य जो रावणसे तर्जित हो गये हैं वे सब मुझसे फिर मिल जायँ ॥ ४५ ॥ उसी समय आकासे दुन्दुभीका शब्द होने लगा, राम सीताके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ४६ ॥
प्रहस्य सीता पुनराह रामं तथेति रामोऽपि विरिंचिमुख्यान् ।। स तान्विसृज्य प्रतिगृह्य सीतां गंतुं स्वकं देशमसावियेष ।। ४७ ।।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीराम- विजयो नामषड्विंशतितमः सर्गः ।। २६ ।।
तब हँसकर जानकी रघुनाथजीसे कहने लगीं कि, ऐसाही होगा तब रघुनाथजी ब्रह्मादिक देवताओंको बिदा कर सीता ले अपने देश जानेकी इच्छा करने लगे ॥ ४७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां श्रीरामविजयो नाम षड्विंशतितम सर्गः ।। २६ ।।
सर्ग हिन्दीटीकासहित (१५९)
सर्ग हिन्दीटीकासहित (१५९)
सप्तविंशति सर्ग
श्रीरामका अयोध्याजीमें आना
रामस्तु पुष्पकारूढः सीतामालिग्य बाहुना ॥ अयोध्यामगमद्वीरः काकुत्स्थकुलनन्दनः ॥ १ ॥ रथनेमिस्वनं श्रुत्वा रामदर्शनलालसाः ॥ भ्रातरो भरताद्यास्ते योधमुख्याश्च ते तथा ॥ २ ॥
पुष्पकपर चडे हुए राम भुजासे जानकीको आलिंगन कर वह काकुत्स्थ- कुलप्रकाश अयोध्याको चले ॥ १ ॥ उस पुष्पकका शब्द सुनकर रामके दर्शनकी लालसावाले भरतादिक भ्राता और मुख्य योधा ॥ २ ॥
राममागतमाज्ञाय ससीतं सन्नृषिव्रजम् ॥ प्रणेमुः सहसागत्य आनन्दाश्रुकणा कुलाः ॥ ३ ॥ वानराज्ञाक्षसान्सर्वानानाय्य स्वपुरं हि सः ॥ सर्वं तत्कथयामास रामः कमललोचनः ॥ ४ ॥
सीता और ऋषियोंके साथ रामको आया जानकर आनन्दके आंसू भरे सहसा रामसे आकर प्रणाम करने लगे ॥ ३ ॥ सब वानर राक्षसोंको अपने पुरमें लाकर कमललोचन रामने रावणवधका सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा विस्मिताः सर्वे साधुसाध्विति वादिनः ॥ सीतां तत्त्वेन विज्ञाय रामं च मधुसूदनम् ॥ ५ ॥ तदेव चिंतयंतस्ते स्वं स्वं स्थानं ययुर्मुदा ॥ विसृष्टा रामभद्रेण सांत्वपूर्वं महात्मना ॥ ६ ॥
यह सुनकर सब विस्मित हो धन्य धन्य कहने लगे, तत्त्वसे सीतांको जानकर और मधुसूदनरूप रामको जानकर ॥ ५ ॥ यही विचार करते वे अपने २ स्थानोंको चले गये, उन महात्माओंको रामचन्द्रने सत्कारपूर्वक बिदा किये । ६ ।
ऋषयश्चाभिनंद्यैनं ससीतं रघुनंदनम् ॥ आशीर्भिर्वर्धयामासुर्ययु- श्चापि यथागतम् ॥ ७ ॥ रामोऽपि सीतया सार्द्धं भ्रातृभिश्च महा- त्मभिः ॥ चक्रे निष्कंटकां पृथ्वीं देवानां च महद्धितम् ॥ ८ ॥
( १६० ) अद्भुत रामायण [ सप्तविंशति-
सीतासहित रघुनाथको ऋषिजन अभिनन्दन कर आशीर्वादोंसे बडाकर अपने २ स्थानोंको गये ॥ ७ ॥ रामचन्द्रभी सीता और महात्मा भ्राताओंके साथमें देवताओंके हितके निमित्त पृथ्वीको निष्कंटक करते हुए ॥ ८ ॥
यज्ञान् बहुविधांश्चक्रे सरयूतीर उत्तमे । दशवर्षसहस्राणि दशवर्ष- शतानि च ॥ किंचिदभ्यधिकं चैव रामो राज्यमकारयत् ॥ ९ ॥ देवकिन्नरगंधर्वा विद्याधरमहोरगाः ॥ रामं नमंति सततं गुणारासं रमापतिम् ॥ १० ॥ एतत्ते कथितं भद्र भारद्वाज महामते ॥ तेषु किंचिदिहाश्चर्यमुक्तं रामकथाश्रयम् ॥ ११ ॥ सर्वं न वक्तुमिच्छामि पुनरुक्तिभयाद्विज ॥ ब्रह्मणा गोपितं तच्च अतोपि न तदुक्तवान् ॥ १२ ॥
सरयूके किनारे उत्तमोत्तम बहुतसे यज्ञ किये. इस प्रकार ग्यारह सहस्र वर्षसे कुछ अधिक रामने राज्य किया ॥ ९ ॥ देव किन्नर गन्धर्व विद्याधर महासर्प गुणोंके खान रामको सदा प्रणाम करते रहे ॥ १० ॥ हे भारद्वाज महामते ! यह सब आपके प्रति कथन किया, रामचरित्र अनेक हैं उनमें कुछेक रामकथाके आश्रयके चरित्र वर्णन किये हैं ॥ ११ ॥ पुनरुक्तिके भयसे मैं सम्पूर्ण कहनेको समर्थ नहीं हूं, ब्रह्माजीने गुप्त कर रक्खा था इस कारण मैंने तुमसे वर्णन नहीं किया था ॥ १२ ॥
अद्भुतोत्तरकाण्डे तत्कथितं वेदसंमितम् ॥ शृणोत्यधीते यश्चै- तत्स ब्रह्म परमाप्नुयात् ॥ १३ ॥ श्लोकमेकं तदर्थं वा शृणुयाद्यश्च मानवः ॥ प्रातर्मध्याह्नयोगे वा स याति परमां गतिम् ॥ १४ ॥
यह वेद संम्मत अद्भुतोत्तरकाण्ड वर्णन किया है जो इसको पढते सुनते हैं, वे पर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ १३ ॥ जो मनुष्य इसका एक वा आधा श्लोक सुनते हैं, उनको प्रातः मध्याह्न योगमें पढनेसे परम पदकी प्राप्ति होती है । १४ ।
पञ्चविंशतिसाहस्रं रामायणमधीत्य यत् ॥ फलमाप्नोति पुरुषस्तदस्य श्लोकमात्रतः ॥ १५ ॥ न श्रुतं नाप्यधीतं वा येन श्रुत- मिदं द्विज ॥ स गर्भान्निःसृतो नैव यथा भ्रूणस्तथैव सः ॥ १६ ॥
पचीस सहस्र रामायण पढकर जो पुण्य प्राप्त होता है, वह इसके एक श्लोकसे मिलता है ॥ १५ ॥ जिसने इसको न पढा न सुना वह गर्भसे नहीं निकला भ्रूण (गर्भ) के समान है ॥ १६ ॥
सग १ ] हिन्दीटीकासहित ( १६१)
रामायणमिदं श्रुत्वा न मातुर्जठरे विशेत् ॥ वेदाश्चत्वार एकत्र तुलया चेदमेकतः ॥ १७ ॥ विधात्रा तुलितं शास्त्रं सर्वदेवाग्रतो द्विज ॥ इदं तु सर्ववेदेभ्यो गौरवादतिरिच्यते ॥ १८ ॥
इस रामायणको सुनकर फिर माताके उदरमें प्रवेश करना नहीं पड़ता, चार वेद एक ओर और रामायण एक ओर रखकर ॥ १७ ॥ विधाताने देवताओंके सामने इसको तोला तो यह गौरवमें वेदोंसे अधिक पाई गई ॥ १८ ॥
शक्राय स्वर्णदीतीरे पुरा पृष्टोऽहमब्रुवम् ॥ तदेव तव चाख्यात- मद्भुतोत्तरकाण्डकम् ॥ १९ ॥ रामायणं महारत्नं ब्राह्महृत्क्षीरधाव- भूत् ॥ नारदान्तः समासाद्य क्रमान्मम हृदि स्थितम् ॥ २० ॥
स्वर्णके किनारे पहले मैंने इन्द्रके पूंछनेपर यह कथा कही थी वही अद्भुतोत्तर काण्ड तुमसे वर्णन किया है ॥ १९ ॥ यह रामायणरूपी महारत्न ब्रह्माजीके हृदय रूपी क्षीर समुद्रमें स्थित था, फिर वह नारदके अन्तरमें प्राप्त हो क्रमसे मेरे हृदयमें प्राप्त हुआ है ॥ २० ॥
तत्सर्वं ब्रह्मणो लोके निःशेषमवतिष्ठते ॥ किंचिदुर्व्यां च पाताले त्रिदिवे शक्रसन्निधौ ॥ २१ ॥ विरिंचिनारदोऽहं च त्रय एवास्य पारगाः ॥ चतुर्थो नोपपद्येत बुद्ध्वेदं सुस्थिरो भव ॥ २२ ॥ यदुक्तमद्भुते काण्डे पुनस्ते कथयाम्यहम् ॥ श्रीरामजन्मवृत्तान्तः श्रीमतीचरितं महत् ॥ २३ ॥ दण्डकारण्यकस्थानां शोणितेन महा त्मनाम् ॥ नारदस्य च शापेन लक्ष्म्याश्चैवापराधतः ॥ २४ ॥
यह सब चरित्र तो ब्रह्मलोकमें स्थित है, कुछ पृथ्वी पातालमें और स्वर्गमें इन्द्रके समीप स्थित है ॥ २१ ॥ ब्रह्मा नारद और मैं यह तीनही इसके परगामी हैं चौथा नहीं है ऐसा जानकर स्थिर हो ॥ २२ ॥ जो कुछ इस अद्भुतोत्तर काण्डमें कहा है उसकी सूची तुमसे कहता हूं, रामजन्मका वृत्तान्त, श्रीमतीका चरित्र ॥ २३ ॥ दण्डकारण्यमें रहनेवाले महात्मा ऋषियोंका रुधिर लेना, नारदके शापसे और लक्ष्मीके अपराधसे ॥ २४ ॥
मंदोदरीगर्भनिष्ठा वैदेही जन्म चोक्तवान् ॥ रामस्य विश्वरूपं च भार्गवेण च वीक्षितम् ॥ २५ ॥ ऋष्यमूके हनुमता चतुर्बाहूरघू- त्तमः ॥ दृष्टो भिक्षुस्वरूपेण सुग्रीवसख्यमुक्तवान् ॥ २६ ॥ ११
(१६२) अद्भुतरामायण [ सप्तविंशति
मन्दोदरीके गर्भसे जानकीका जन्म, रामचन्द्रका भार्गवको विश्वरूप दिखाना ॥ २५ ॥ ऋष्यमूकमें हनुमानजीको चतुर्बाहुरूप दर्शन देना और भिक्षुरूपसे महाराजसे मिलकर सुग्रीवकी मित्रता करानी ॥ २६ ॥
लक्ष्मणांगजतापेन शोषणं वारिधेः पुनः ॥ प्राप्तराज्यस्य रामस्य मुनीना सन्निधौ तथा ॥ २७ ॥ सीतायाः कथनं श्रुत्वा सहस्रास्यस्य रक्षसः ॥ मानसोत्तरशैलेदे स्थितिं ज्ञात्वा रघूद्वहः ॥ २८ ॥
फिर लक्ष्मणके अंगसे उत्पन्न हुए तापसे सागरको सुखाना, फिर राज्य प्राप्त होकर मुनियोंके निकटमें ॥ २७ ॥ जानकीसे सहस्रमुखी रावणका वृत्तान्त सुनकर और उसकी स्थिति मानसके उत्तर भागमें जानकर ॥ २८ ॥
जगाम पुष्करद्वीपं भ्रातृभि सह वानरैः ॥ सीताया ऐश्वरं रूपं रावणस्य वधस्तथा ॥ २९ ॥ अयोध्यागमनं रामस्यैष वृत्तान्त संग्रहः ॥ वृत्तान्तसंग्रहं चापि पठित्वा रामभक्तिमान् ॥ जायते मुनिशार्दूल नात्र कार्या विचारणा ॥ ३० ॥
रामचन्द्र भाइयों सहित पुष्करद्वीपको गये, सीताका ईश्वर सम्बन्धी रूप और सहस्रमुख रावणका वध ॥ २९ ॥ फिर अयोध्यामें आगमन रामवृत्तांत-संग्रह है, राममें भक्ति करनेवाला इसही वृत्तान्तको पाठकर रघुनाथमें भक्ति-मान् होता है, हे मुनिराज ! इसमें सन्देह नहीं ॥ ३० ॥
पठेच्च यो रामचरित्र मेतत्पुनाति पापात्सुकृतं लभेत ॥ तीर्था-भिषेकं समरे जयं च स सर्वयज्ञस्य महत्फलं च ॥ ३१ ॥ भजेत यो राममर्चित्यरूपमेकेन भावेन च भूमिपुत्रीम् ॥ एतत्सुपुण्यं शृणुयात्प-ठेद्वा भूयो भवेन्नो जठरे जनन्याः ॥ ३२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीसीता-रामयोरयोध्यागमनं नाम सप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २७ ॥
जो कोई इस रामचरित्रको पढता हैं, वह तरकर सुकृत को प्राप्त होता है; तीर्थका अभिषेक, समरमें जय और सब यज्ञका महाफल प्राप्त करता है ॥ ३१ ॥ जो अचिन्त्यरूप रामका भजन करता है वा एक भावसे जानकीका भजन करता है, इस पवित्र ग्रन्थको सुनता व पढता हैं वह फिर माताके गर्भमें स्थित नहीं होता, मुक्त हो जाता है ॥ ३२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डेमुरादाबादनिवासी पं. सुखानन्दमिश्रात्मज पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां श्रीसीता-रामयोरयोध्यागमनं नाम सप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २७ ॥
श्लोकसंख्या १३५३.
वाल्मीकी नारद ऋषी, महावीर शिर नाय ॥
बूझी कुलगुरु शिव शिवा, गणपति गिरा मनाय ॥ १ ॥
रामचरित भाषा कियो, द्विज ज्वालापरसाद ॥
पढहिं सुनहिं सुख लहहिं जन, ऋषियनको संवाद ॥ २ ॥
राम लषण सीता भरत, रिपुहन पवनकुमार ॥
प्रेम सहित वन्दहुँ चरण, हितकृत वारंवार ॥ ३ ॥
कृपादृष्टिकी वृष्टि जिमि, करत हमारी ओर ॥
तैंसिय कीजै नित्य प्रति, दयादृगनकी कोर ॥ ४ ॥
संवत गुणशरअंकविधु, भाद्रशुक्ल रविवार ॥
सुखदायक तिथि सप्तमी, पूरचो ग्रन्थविचार ॥ ५ ॥
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
| खेमराज श्रीकृष्णदास, <br> 'श्रीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, <br> खेतवाड़ी-बम्बई. | गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, <br> 'लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, <br> कल्याण-बम्बई. |
श्री १०८ अवधड़ पीर बाबा नारायण
का धर्म पूत बाबा भूतनाथ अवधड़
श्री गुरु स्थान- ग्राम मल्हापुर
डा० सिरसगंज
जि० मैनपुरी
जन्म तिथि पूर्णिमा अगहन १९६५
बुद्धवार
बुक-पोस्ट
शुभविवाह
तिलकोत्सव एवं प्रीतिभोज
दिनांक-11 मई 2013, शनिवार
(सायं 6 बजे से आपके आगमन तक)
सपरिवार
[श्री]राम पोरेवाल जी (कामरेड)
इटावा
R.P.B.
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