अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४८० * अग्निपुराण *
गृहमें निवास करो। अङ्गिरा ऋषिकी पुत्रिप पूर्णे! तुम भी सम्पूर्ण अङ्गोंसे युक्त तथा क्षतिरहित मेरे घरमें रमण करो। इष्टके! मैं गृहप्रतिष्ठा करा रहा हूँ, तुम मुझे अभिलषित भोग प्रदान करो। देशस्वामी, नगरस्वामी और गृहस्वामीके संचयमें मनुष्य, धन, हाथी-घोड़े और पशुओंकी वृद्धि करो'॥ १६-२२ $\frac{१}{२}$ ॥
गृहप्रवेशके समय भी इसी प्रकार शिलान्यास करना चाहिये। घरके उत्तरमें प्लक्ष (पाकड़) तथा पूर्वमें वटवृक्ष शुभ होता है। दक्षिणमें गूलर और पश्चिममें पीपलका वृक्ष उत्तम माना जाता है। घरके वामपार्श्वमें उद्यान बनावे। ऐसे घरमें निवास करना शुभ होता है। लगाये हुए वृक्षोंको ग्रीष्मकालमें प्रातः-सायं, शीतऋतुमें मध्याह्नके समय तथा वर्षाकालमें भूमिके सूख जानेपर सींचना चाहिये। वृक्षोंको बायविडंग और घृतमिश्रित शीतल जलसे सींचे। जिन वृक्षोंके फल लगने बंद हो गये हों, उनको कुलथी, उड़द, मूँग, तिल और जौ मिले हुए जलसे सींचना चाहिये। घृतयुक्त शीतल दुग्धके सेचनसे वृक्ष सदा फल-पुष्पसे युक्त रहते हैं। मत्स्यवाले जलके सेचनसे वृक्षोंकी वृद्धि होती है। भेड़ और बकरीकी लेंड़ीका चूर्ण, जौका चूर्ण, तिल, अन्य गोबर आदि खाद एवं जल—इन सबको सात दिनतक ढककर रखे। इसका सेचन सभी प्रकारके वृक्षोंके फल-पुष्प आदिकी वृद्धि करनेवाला है। आम्रवृक्षोंका शीतल जलसे सेचन उत्तम माना गया है। अशोक वृक्षके विकासके लिये कामिनियोंके चरणका प्रहार प्रशस्त है। खजूर और नारियल आदि वृक्ष लवणयुक्त जलसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं। बायविडंग तथा जलके द्वारा सेचन सभी वृक्षोंके लिये उत्तम दोहद है॥ २३-३१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वास्तुलक्षण-कथन' नामक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४७॥
दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय
विष्णु आदिके पूजनमें उपयोगी पुष्पोंका कथन
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! पुष्पोंसे पूजन करनेपर भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण कार्योंमें सिद्धि प्रदान करते हैं। मालती, मल्लिका, यूथिका, गुलाब, कनेर, पावन्ती, अतिमुक्तक, कर्णिकार, कुरण्टक, कुब्जक, तगर, नीप (कदम्ब), बाण, वनमल्लिका, अशोक, तिलक, कुन्द और तमाल—इनके पुष्प पूजाके लिये उपयोगी माने गये हैं। बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृङ्गराजके पत्र, तुलसी, कृष्णतुलसी तथा वासक (अडूसा)-के पत्र पूजनमें ग्राह्य माने गये हैं। केतकीके पत्र और पुष्प, पद्म एवं रक्तकमल—ये भी पूजामें ग्रहण किये जाते हैं। मदार, धत्तूर, गुञ्जा, पर्वतीय मल्लिका, कुटज, शाल्मलि और कटेरीके फूलोंका पूजामें प्रयोग नहीं करना चाहिये। प्रस्थमात्र घृतसे भगवान् विष्णुका अभिषेक करनेपर करोड़ गौओंके दान करनेका फल मिलता है। एक आढक घृतसे अभिषेक करनेवाला राज्य तथा घृतमिश्रित दुग्धसे अभिषेक करनेवाला स्वर्गको प्राप्त करता है॥ १-६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पुष्पादिसे पूजनके फलका कथन' नामक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४८॥
- अध्याय २४९ *
४८१
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दो सौ उनचासवाँ अध्याय धनुर्वेदका$^१$ वर्णन—युद्ध और अस्त्रके भेद, आठ प्रकारके स्थान, धनुष, बाणको ग्रहण करने और छोड़नेकी विधि आदिका कथन
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! अब मैं चार$^२$ पादोंसे युक्त धनुर्वेदका वर्णन करता हूँ। धनुर्वेद पाँच प्रकारका होता है। रथ, हाथी, घोड़े और पैदल-सम्बन्धी योद्धाओंका आश्रय लेकर इसका वर्णन किया गया है। यन्त्रमुक्त, पाणिमुक्त, मुक्तसंधारित, अमुक्त और बाहुयुद्ध—ये ही धनुर्वेदके पाँच$^३$ प्रकार कहे गये हैं। उसमें भी शस्त्र-सम्पत्ति और अस्त्र-सम्पत्तिके भेदसे युद्ध दो प्रकारका बताया गया है। ऋजुयुद्ध और मायायुद्धके भेदसे उसके पुनः दो भेद हो जाते
१. 'धनुर्वेद' यजुर्वेदका उपवेद है। प्राचीनकालमें प्रायः सभी सभ्य देशोंमें इस विद्याका प्रचार था। भारतवर्षमें इस विद्याके बड़े-बड़े ग्रन्थ थे, जिन्हें क्षत्रियकुमार अभ्यासपूर्वक पढ़ते थे। आजकल वे ग्रन्थ प्रायः लुप्त हो गये हैं। कुछ थोड़े-से ग्रन्थोंमें इस विद्याका संक्षिप्त वर्णन मिलता है। जैसे शुक्रनीति, कामन्दकीय नीतिसार, अग्निपुराण, वीरचिन्तामणि, वृद्ध शार्ङ्गधर, युद्धजयार्णव, युक्तिकल्पतरु तथा नीतिमयूख आदि। 'धनुर्वेद-संहिता' नामक एक अलग भी पुस्तक मिलती है। नेपाल (काठमाण्डू) गोरखनाथ मठके महन्थ योगी नरहरिनाथने भी धनुर्वेदकी एक प्राचीन पुस्तक उपलब्ध की है। कुछ विद्वान् ब्रह्मा और महेश्वरसे इस उपवेदका प्रादुर्भाव मानते हैं, परन्तु मधुसूदन सरस्वतीका कथन है कि 'विश्वामित्रने जिस धनुर्वेदका प्रकाश किया था, यजुर्वेदका उपवेद वही है।' 'वीरचिन्तामणि'में धनुर्वेदकी बड़ी प्रशंसा की गयी है। 'धनुर्वेद-संहिता'में लिखा है कि 'दुष्टों, दस्युओं और चोर आदिसे साधुपुरुषोंका संरक्षण और धर्मानुसार प्रजापालन 'धनुर्वेद'का प्रयोजन है'। अग्निपुराणके इन चार अध्यायोंमें धनुर्वेद-विषयक महत्त्वपूर्ण बातोंपर संक्षेपसे ही प्रकाश डाला गया है। धनुर्वेदपर इस समय जो ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, उनसे अग्निपुराणगत धनुर्वेदका पाठ नहीं मिलता। विश्वकोषमें 'धनुर्वेद' शब्दपर अग्निपुराणके ये ही चार अध्याय उद्धृत किये गये हैं। कतिपय हस्तलिखित प्रतियोंके अनुसार जो पाठ-भेद उपलब्ध हुए हैं, उन्हें दृष्टिमें रखते हुए इन अध्यायोंका अविकल अनुवाद करनेकी चेष्टा की गयी है। साङ्गवेद विद्यालय, काशीके नैयायिक विद्वान् श्रीहेबूबूर शास्त्री काश्मीर-पुस्तकालयसे अग्निपुराणके धनुर्वेद-प्रकरणपर कुछ पाठभेद संग्रह करके लाये थे, उससे भी इस प्रकरणको लगानेमें सहयोग मिला है। तथापि कुछ शब्द अस्पष्ट रह गये हैं। माननीय विद्वानोंको धनुर्वेदके विषयमें विशेष ध्यान देकर अनुसंधान करना-कराना चाहिये, जिससे भारतकी इस प्राचीन विद्याका पुनरुद्धार हो सके। (अनुवादक)
२. महाभारत, आदिपर्व, अध्याय २२०, श्लोक ७२ में लिखा है कि 'शत्रुदमन बालक अभिमन्युने वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके अपने पिता अर्जुनसे चार पादों और दशविध अङ्गोंसे युक्त दिव्य एवं मानुष—सब प्रकारके धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया।' इन चार पादोंको स्पष्ट करते हुए आचार्य नीलकण्ठने 'मन्त्रमुक्त', 'पाणिमुक्त', 'मुक्तामुक्त' और 'अमुक्त'—इन चार नामोंका निर्देश किया है। परंतु मधुसूदन सरस्वतीने अपने 'प्रस्थानभेद'में धनुर्वेदका जो संक्षिप्त विवरण दिया है, उसमें चार पादोंका उल्लेख इस प्रकार हुआ है—दीक्षापाद, संग्रहपाद, सिद्धिपाद और प्रयोगपाद। पूर्वोक्त मन्त्रमुक्त आदि भेद आयुधोंके हैं, वे पादोंके नाम नहीं हैं। अग्निपुराणमें चार पादोंके नामका निर्देश नहीं है। 'मन्त्रमुक्त'के स्थानपर वहाँ 'यन्त्रमुक्त' पाठ है और 'मुक्तामुक्त'के स्थानपर 'मुक्तसंधारित'। इन चारोंके साथ बाहुयुद्धको भी जोड़कर अग्निपुराणमें धनुर्वेद, अस्त्र या युद्धके पाँच प्रकार ही निर्दिष्ट किये गये हैं। अतः धनुर्वेदके चार पाद उपर्युक्त दीक्षा आदि ही ठीक जान पड़ते हैं।
३. महाभारतमें 'चतुष्पादं दशविधम्' कहकर धनुर्वेदके दस प्रकार कहे गये हैं। परंतु अग्निपुराणसे उसका कोई विरोध नहीं है। अग्निपुराणमें अस्त्र या युद्धके पाँच प्रकारोंको दृष्टिमें रखकर ही वे भेद निर्दिष्ट हुए हैं। किंतु महाभारतमें धनुर्वेदके दस अङ्गोंको लेकर ही दस भेदोंका कथन हुआ है। उन दस अङ्गोंके नाम नीलकण्ठने इस प्रकार लिखे हैं—आदान, संधान, मोक्षण, निवर्तन, स्थान, मुष्टि, प्रयोग, प्रायश्चित्त, मण्डल तथा रहस्य। इन सबका परिचय इस प्रकार है—तरकससे बाणको निकालना 'आदान' है। उसे धनुषकी प्रत्यञ्चापर रखना 'संधान' है। लक्ष्यपर छोड़ना 'मोक्षण' कहा गया है। यदि बाण छोड़ देनेके बाद यह मालूम हो जाय कि हमारा विपक्षी निर्बल या शस्त्रहीन है, तो वीर पुरुष मन्त्रशक्तिसे उस बाणको लौटा लेते हैं। इस प्रकार छोड़े हुए अस्त्रको लौटा लेना 'निवर्तन' कहलाता है। धनुष या उसकी प्रत्यञ्चाके धारण अथवा शरसंधानकालमें धनुष और प्रत्यञ्चाके मध्यदेशको 'स्थान' कहा गया है। तीन या चार अँगुलियोंका सहयोग ही 'मुष्टि' है। तर्जनी और मध्यमा अँगुलीसे अथवा मध्यमा और अङ्गुष्ठसे बाणका संधान करना 'प्रयोग' कहलाता है। स्वतः या दूसरेसे प्राप्त होनेवाले ज्याघात (प्रत्यञ्चाके आघात) और बाणके आघातको रोकनेके लिये जो दस्ताने आदिका प्रयोग किया जाता है, उसका नाम 'प्रायश्चित्त' है। चक्राकार घूमते हुए रथके साथ-साथ घूमनेवाले लक्ष्यका वेध 'मण्डल' कहलाता है। शब्दके आधारपर लक्ष्य बाँधना अथवा एक ही समय अनेक लक्ष्योंको बींध डालना—ये सब 'रहस्य'के अन्तर्गत हैं।
४८२ * अग्निपुराण *
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हैं। क्षेपणी (गोफन आदि), धनुष एवं यन्त्र आदिके द्वारा जो अस्त्र फेंका जाता है, उसे 'यन्त्रमुक्त' कहते हैं। (यन्त्रमुक्त अस्त्रका जहाँ अधिक प्रयोग हो, वह युद्ध भी 'यन्त्रमुक्त' ही कहलाता है।) प्रस्तरखण्ड और तोमर-यन्त्र आदिको 'पाणिमुक्त' कहा गया है। भाला आदि जो अस्त्र शत्रुपर छोड़ा जाय और फिर उसे हाथमें ले लिया जाय, उसे 'मुक्तसंधारित' समझना चाहिये। खड्ग (तलवार आदि)-को 'अमुक्त' कहते हैं और जिसमें अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग न करके मल्लोंकी भाँति लड़ा जाय, उस युद्धको 'नियुद्ध' या 'बाहुयुद्ध' कहते हैं॥ १-५॥
युद्धकी इच्छा रखनेवाला पुरुष श्रमको जीते और योग्य पात्रोंका संग्रह करे। जिनमें धनुष- बाणका प्रयोग हो, वे युद्ध श्रेष्ठ कहे गये हैं; जिनमें भालोंकी मार हो, वे मध्यम कोटिके हैं। जिनमें खड्गोंसे प्रहार किया जाय, वे निम्नश्रेणीके युद्ध हैं और बाहुयुद्ध सबसे निकृष्ट कोटिके अन्तर्गत हैं। धनुर्वेदमें क्षत्रिय और वैश्य-इन दो वर्णोंका भी गुरु१ ब्राह्मण ही बताया गया है। आपत्कालमें स्वयं शिक्षा लेकर शूद्रको भी युद्धका अधिकार प्राप्त है। देश या राष्ट्रमें रहनेवाले वर्णसंकरोंको भी युद्धमें राजाकी सहायता करनी चाहिये२॥ ६-८॥
स्थान-वर्णन- अङ्गुष्ठ, गुल्फ, पाष्णिभाग और पैर-ये एक साथ रहकर परस्पर सटे हुए हों तो लक्षणके अनुसार इसे 'समपद' नामक स्थान३ कहते हैं। दोनों पैर बाह्य अङ्गुलियोंके बलपर स्थित हों, दोनों घुटने स्तब्ध हों तथा दोनों पैरोंके बीचका फैसला तीन बित्ता हो, तो यह 'वैशाख'नामक स्थान कहलाता है। जिसमें दोनों घुटने हंसपंक्तिके आकारकी भाँति दिखायी देते हों और दोनोंमें चार बित्तेका अन्तर हो, वह 'मण्डल' स्थान माना गया है। जिसमें दाहिनी जाँघ और घुटना स्तब्ध (तना हुआ) हो और दोनों पैरोंके बीचका विस्तार पाँच बित्तेका हो, उसे 'आलीढ़'नामक स्थान कहा गया है। इसके विपरीत जहाँ बायीं जाँघ और घुटना स्तब्ध हों तथा दोनों पैरोंके बीचका विस्तार पाँच बित्ता हो, वह 'प्रत्यालीढ़'नामक स्थान है। जहाँ बायाँ पैर टेढ़ा और दाहिना सीधा हो तथा दोनों गुल्फ और पाष्णिभाग पाँच अङ्गुलके अन्तरपर स्थित हों तो यह बारह अङ्गुल बड़ा 'स्थानक' कहा गया है। यदि बायें पैरका घुटना सीधा हो और दाहिना पैर भलीभाँति फैलाया गया हो अथवा दाहिना घुटना कुब्जाकार एवं निश्चल हो या घुटनेके साथ ही दायाँ चरण दण्डाकार विशाल दिखायी दे तो ऐसी स्थितिमें 'विकट'नामक स्थान कहा गया है। इसमें दोनों पैरोंका अन्तर दो हाथ बड़ा होता है। जिसमें दोनों घुटने दुहरे
१. 'गुरु' शब्दका अर्थ है-धनुर्वेदकी शिक्षा देनेवाला आचार्य। 'धनुर्वेदसंहिता'में सात प्रकारके युद्धोंका उल्लेख करके उन सातोंके ज्ञाताको 'आचार्य' कहा गया है- 'आचार्यः सप्तयुद्धः स्यात्।' धनुष, चक्र, कुन्त, खड्ग, छुरिका, गदा और बाहु-इन सातोंसे किये जानेवाले युद्धको ही 'सात प्रकारका युद्ध' कहते हैं। २. 'वीरचिन्तामणि'के ६-७ श्लोकोंमें कहा गया है कि 'आचार्य ब्राह्मण शिष्यको धनुष, क्षत्रियको खड्ग, वैश्यको कुन्त (भाला) और शूद्रको गदाकी शिक्षा प्रदान करे।' इससे भी सूचित होता है कि अस्त्र-विद्या और युद्धकी शिक्षा सभी वर्णके लोगोंको दी जाती थी। अग्निपुराणके अनुसार वर्णसंकर भी इसकी शिक्षा पाते थे और युद्धमें राष्ट्रकी रक्षाके लिये राजाकी सहायता करते थे। ३. 'वीरचिन्तामणि' आदि ग्रन्थोंमें आठ प्रकारके 'स्थानों', पाँच प्रकारकी 'मुष्टियों' तथा पाँच तरहके 'व्याम' का वर्णन उपलब्ध होता है। अग्निपुराणमें 'मुष्टि' और 'व्याम'के भेद नहीं हैं। अगले अध्यायके पाँचवें श्लोकमें 'सिंहकर्ण' नामक मुष्टिकी चर्चा अवश्य की गयी है। परंतु स्थानके आठों भेदोंका लक्षणसहित वर्णन उपलब्ध होता है। इस वर्णनको देखते हुए 'स्थान' शब्दका अभिप्राय योद्धाओंके युद्धस्थलमें खड़े होनेका ढंग जान पड़ता है। योद्धाओंको किस-किस ढंगसे खड़ा होना चाहिये और कौन-सा ढंग कब उपयोगी होता है-इसीकी ओर इस प्रसङ्गमें संकेत किया गया है।
- अध्याय २४९ * ४८३
और दोनों पैर उत्तान हो जायें, इस विधानके योगसे जो 'स्थान' बनता है, उसका नाम 'सम्पुट' है। जहाँ कुछ घूमे हुए दोनों पैर समभावसे दण्डके समान विशाल एवं स्थिर दिखायी दें, वहाँ दोनोंके बीचकी लंबाई सोलह अङ्गुलकी ही देखी गयी है। यह स्थानका यथोचित स्वरूप है॥ ९–१८॥
ब्रह्मन्! योद्धाओंको चाहिये कि पहले बायें हाथमें धनुष और दायें हाथमें बाण लेकर उसे चलायें और उन छोड़े हुए बाणोंको स्वस्तिकाकार करके उनके द्वारा गुरुजनोंको प्रणाम करें। धनुषका प्रेमी योद्धा 'वैशाख' स्थानके सिद्ध हो जानेपर 'स्थिति' (वर्तमान) या 'आयति' (भविष्य)-में जब आवश्यकता हो, धनुषपर डोरीको फैलाकर धनुषकी निचली कोटि और बाणके फलदेशको धरतीपर टिकाकर रखे और उसी अवस्थामें मुड़ी हुई दोनों भुजाओं एवं कलाइयोंद्वारा नापे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वसिष्ठ! उस योद्धाके बाणसे धनुष सर्वथा बड़ा होना चाहिये और मुष्टिके सामने बाणके पुङ्ख तथा धनुषके डंडेमें बारह अङ्गुलका अन्तर होना चाहिये। ऐसी स्थिति हो तो धनुर्दण्डको प्रत्यञ्चासे संयुक्त कर देना चाहिये। वह अधिक छोटा या बड़ा नहीं होना चाहिये॥ १९—२३॥
धनुषको नाभिस्थानमें और बाण-संचयको नितम्बपर रखकर उठे हुए हाथको आँख और कानके बीचमें कर ले तथा उस अवस्थामें बाणको फेंके। पहले बाणको मुट्ठीमें पकड़े और उसे दाहिने स्तनाग्रकी सीधमें रखे। तदनन्तर उसे प्रत्यञ्चापर ले जाकर उस मौर्वी (डोरी या प्रत्यञ्चा)-को खींचकर पूर्णरूपसे फैलावे। प्रत्यञ्चा न तो भीतर हो न बाहर, न ऊँची हो न नीची, न कुबड़ी हो न उत्तान, न चञ्चल हो न अत्यन्त आवेष्टित। वह सम, स्थिरतासे युक्त और दण्डकी भाँति सीधी होनी चाहिये। इस प्रकार पहले इस मुष्टिके द्वारा लक्ष्यको आच्छादित करके बाणको छोड़ना चाहिये॥ २४—२७॥
धनुर्धर योद्धाको यत्नपूर्वक अपनी छाती ऊँची रखनी चाहिये और इस तरह झुककर खड़ा होना चाहिये, जिससे शरीर त्रिकोणाकार जान पड़े। कंधा ढीला, ग्रीवा निश्चल और मस्तक मयूरकी भाँति शोभित हो। ललाट, नासिका, मुख, बाहुमूल और कोहनी—ये सम अवस्थामें रहें। ठोढ़ी और कंधेमें तीन अङ्गुलका अन्तर समझना चाहिये। पहली बार तीन अङ्गुल, दूसरी बार दो अङ्गुल और तीसरी बार ठोढ़ी तथा कंधेका अन्तर एक ही अङ्गुलका बताया गया है॥ २८—३०॥
बाणको पुङ्खकी ओरसे तर्जनी एवं अँगूठेसे पकड़े। फिर मध्यमा एवं अनामिकासे भी पकड़ ले और तबतक वेगपूर्वक खींचता रहे, जबतक पूरा-पूरा बाण धनुषपर न आ जाय। ऐसा उपक्रम करके विधिपूर्वक बाणको छोड़ना चाहिये॥ ३१-३२॥
सुव्रत! पहले दृष्टि और मुष्टिसे आहत हुए लक्ष्यको ही बाणसे विदीर्ण करे। बाणको छोड़कर पिछला हाथ बड़े वेगसे पीठकी ओर ले जाय; क्योंकि ब्रह्मन्! यह ज्ञात होना चाहिये कि शत्रु इस हाथको काट डालनेकी इच्छा करते हैं। अतः धनुर्धर पुरुषको चाहिये, धनुषको खींचकर कोहनीके नीचे कर ले और बाण छोड़ते समय उसके ऊपर करे। धनुःशास्त्र-विशारद पुरुषोंको यह विशेष-रूपसे जानना चाहिये। कोहनीका आँखसे सटाना मध्यम श्रेणीका बचाव है और शत्रुके लक्ष्यसे दूर रखना उत्तम है॥ ३३—३५॥
उत्तम श्रेणीका बाण बारह मुष्टियोंके मापका होना चाहिये। ग्यारह मुष्टियोंका 'मध्यम' और दस मुष्टियोंका 'कनिष्ठ' माना गया है। धनुष चार हाथ लंबा हो तो 'उत्तम', साढ़े तीन हाथका हो तो 'मध्यम' और तीन हाथका हो तो 'कनिष्ठ' कहा गया है। पैदल योद्धाके लिये
४८४ * अग्निपुराण *
सदा तीन हाथके ही धनुषको ग्रहण करनेका विधान है। घोड़े, रथ और हाथीपर श्रेष्ठ धनुषका ही प्रयोग करनेका विधान किया गया है॥ ३६-३७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'धनुर्वेदका वर्णन' नामक दो सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४९॥
दो सौ पचासवाँ अध्याय
लक्ष्यवेधके लिये धनुष-बाण लेने और उनके समुचित प्रयोग करनेकी शिक्षा तथा वेध्यके विविध भेदोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— ब्रह्मन्! द्विजको चाहिये कि पूरी लम्बाईवाले धनुषका निर्माण कराकर, उसे अच्छी तरह धो-पोंछकर यज्ञभूमिमें स्थापित करे तथा गदा आदि आयुधोंको भलीभाँति साफ करके रखे॥ १॥
तत्पश्चात् बाणोंका संग्रह करके, कवच-धारणपूर्वक एकाग्रचित्त हो, तूणीर ले, उसे पीठकी ओर दाहिनी काँखके पास दृढ़ताके साथ बाँधे। ऐसा करनेसे विलक्ष्य बाण भी उस तूणीरमें सुस्थिर रहता है। फिर दाहिने हाथसे तूणीरके भीतरसे बाणको निकाले। उसके साथ ही बायें हाथसे धनुषको वहाँसे उठा ले और उसके मध्यभागमें बाणका संधान$^१$ करे॥ २-४॥
चित्तमें विषादको न आने दे—उत्साह-सम्पन्न हो, धनुषकी डोरीपर बाणका पुङ्खभाग रखे, फिर 'सिंहकर्ण'$^२$ नामक मुष्टिद्वारा डोरीको पुङ्खके साथ ही दृढ़तापूर्वक दबाकर समभावसे संधान करे और बाणको लक्ष्यकी ओर छोड़े। यदि बायें हाथसे बाणको चलाना हो तो बायें हाथमें बाण ले और दाहिने हाथसे धनुषकी मुट्ठी पकड़े। फिर प्रत्यञ्चापर बाणको इस तरह रखे कि खींचनेपर उसका फल या पुङ्ख बायें कानके समीप आ जाय। उस समय बाणको बायें हाथकी (तर्जनी और अङ्गुष्ठके अतिरिक्त) मध्यमा अङ्गुलीसे भी धारण किये रहे। बाण चलानेकी विधिको जाननेवाला पुरुष उपर्युक्त मुष्टिके द्वारा धनुषको दृढ़तापूर्वक पकड़कर, मनको दृष्टिके साथ ही लक्ष्यगत करके बाणको शरीरके दाहिने भागकी ओर रखते हुए लक्ष्यकी ओर छोड़े॥ ५-७॥
धनुषका दण्ड इतना बड़ा हो कि भूमिपर खड़ा करनेपर उसकी ऊँचाई ललाटतक आ जाय। उसपर लक्ष्यवेधके लिये सोलह अङ्गुल लंबे चन्द्रक (बाणविशेष)-का संधान करे और उसे भलीभाँति खींचकर लक्ष्यपर प्रहार करे। इस तरह एक बाणका प्रहार करके फिर तत्काल ही तूणीरसे अङ्गुष्ठ एवं तर्जनी अङ्गुलिद्वारा बारंबार बाण निकाले। उसे मध्यमा अङ्गुलिसे भी दबाकर काबूमें करे और शीघ्र ही दृष्टिगत लक्ष्यकी ओर चलावे। चारों ओर तथा दक्षिण ओर लक्ष्यवेधका क्रम जारी रखे। योद्धा पहलेसे ही चारों ओर बाण
$^१$. 'वासिष्ठ-धनुर्वेद'के अनुसार 'संधान' तीन प्रकारके हैं—अध, ऊर्ध्व और सम। इनका क्रमशः तीन कार्योंमें ही उपयोग करना चाहिये। दूरके लक्ष्यको मार गिराना हो तो 'अधःसंधान' उपयोगी होता है। लक्ष्य निश्चल हो तो 'समसंधान' से उसका वेध करना चाहिये तथा चञ्चल लक्ष्यका वेध करनेके लिये 'ऊर्ध्वसंधान'से काम लेना चाहिये।
$^२$. महर्षि वसिष्ठकृत 'धनुर्वेद-संहिता' में 'मुष्टि' के पाँच भेद बताये गये हैं—पताका, वज्रमुष्टि, सिंहकर्ण, मत्सरी तथा काकतुण्डी। वहीं 'सिंहकर्ण'नामक मुष्टिका लक्षण इस प्रकार दिया गया है—'अङ्गुष्ठमध्यदेशे तु तर्जन्यग्रं शुभं स्थितम्। सिंहकर्णः स विज्ञेयो दृढ़लक्ष्यस्य वेधने॥' अर्थात् 'धनुष पकड़ते समय अङ्गुष्ठके मध्यदेशमें तर्जनीके अग्रभागको भलीभाँति टिकाकर जो मुष्टि बाँधी जाती है, उसका नाम 'सिंहकर्ण' जानना चाहिये। वह दृढ़लक्ष्यके वेधके लिये उपयोगी है।'
* अध्याय २५० * ४८५
मारकर सब ओरके लक्ष्यको वेधनेका अभ्यास करे॥ ८—१०॥
तदनन्तर वह तीक्ष्ण, परावृत्त, गत, निम्न, उन्नत तथा क्षिप्र वेधका अभ्यास बढ़ावे।$^१$ वेध्य लक्ष्यके ये जो उपर्युक्त स्थान हैं, इनमें सत्त्व (बल एवं धैर्य)-का पुट देते हुए विचित्र एवं दुस्तर रीतिसे सैकड़ों बार हाथसे बाणोंके निकालने एवं छोड़नेकी क्रियाद्वारा धनुषका तर्जन करे—उसपर टङ्कार$^२$ दे॥ ११-१२॥
विप्रवर! उक्त वेध्यके अनेक भेद हैं। पहले तो दृढ़, दुष्कर तथा चित्र दुष्कर—ये वेध्यके तीन भेद हैं। ये तीनों ही भेद दो-दो प्रकारके होते हैं। ‘नतनिम्न’ और ‘तीक्ष्ण’—ये ‘दृढ़वेध्य’के दो भेद हैं। ‘दुष्करवेध्य’के भी ‘निम्न’ और ‘ऊर्ध्वगत’—ये दो भेद कहे गये हैं तथा ‘चित्रदुष्कर’ वेध्यके ‘मस्तकपन’ और ‘मध्य’—ये दो भेद बताये गये हैं॥ १३-१४$\frac{१}{२}$॥
इस प्रकार इन वेध्यगणोंको सिद्ध करके वीर पुरुष पहले दायें अथवा बायें पार्श्वसे शत्रुसेनापर चढ़ाई करे। इससे मनुष्यको अपने लक्ष्यपर विजय प्राप्त होती है। प्रयोक्ता पुरुषोंने वेध्यके विषयमें यही विधि देखी और बतायी है॥ १५-१६॥
योद्धाके लिये उस वेध्यकी अपेक्षा भ्रमणको अधिक उत्तम बताया गया है। वह लक्ष्यको अपने बाणके पुङ्खभागसे आच्छादित करके उसकी ओर दृढ़तापूर्वक शर-संधान करे। जो लक्ष्य भ्रमणशील, अत्यन्त चञ्चल और सुस्थिर हो, उसपर सब ओरसे प्रहार करे। उसका भेदन और छेदन करे तथा उसे सर्वथा पीड़ा पहुँचाये॥ १७-१८॥
कर्मयोगके विधानका ज्ञाता पुरुष इस प्रकार समझ-बूझकर उचित विधिके आचरण (अनुष्ठान) करे। जिसने मन, नेत्र और दृष्टिके द्वारा लक्ष्यके साथ एकता-स्थापनकी कला सीख ली है, वह योद्धा यमराजको भी जीत सकता है। (पाठान्तरके अनुसार वह श्रमको जीत लेता है—युद्ध करते-करते थकता नहीं।)॥ १९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘धनुर्वेदका कथन’ नामक दो सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५०॥
पाद-टिप्पणियाँ:
१. 'वासिष्ठ-धनुर्वेद'में 'वेध' तीन प्रकारका बताया गया है—पुष्पवेध, मत्स्यवेध और मांसवेध। फलरहित बाणसे फूलको वेधना 'पुष्पवेध' है। फलयुक्त बाणसे मत्स्यका भेदन करना 'मत्स्यवेध' है। तदनन्तर मांसके प्रति लक्ष्यका स्थिरीकरण 'मांसवेध' कहलाता है। इन वेधोंके सिद्ध हो जानेपर मनुष्योंके बाण उनके लिये सर्वसाधक होते हैं—'एतैर्विंधैः कृतैः पुंसां शराः स्युः सर्वसाधकाः।'
२. 'वीरचिन्तामणि'में 'श्रमकरण' (धनुष चलानेके परिश्रमपूर्वक अभ्यास)-के प्रकरणमें इस तरहकी बातें लिखी हैं। यथा—पहले धनुषको चढ़ाकर शिखा बाँध ले, पूर्वोक्त स्थानभेदमेंसे किसी एकका आश्रय ले, खड़ा हो, बाणके ऊपर हाथ रखे। धनुषके तोलनपूर्वक उसे बायें हाथमें ले। तदनन्तर बाणका आदान करके संधान करे। एक बार धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचकर भूमिवेधन करे। पहले भगवान् शंकर, विघ्नराज गणेश, गुरुदेव तथा धनुष-बाणको नमस्कार करे। फिर बाण खींचनेके लिये गुरुसे आज्ञा माँगे। प्राणवायुके प्रयत्न (पूरक प्राणायाम)-के साथ बाणसे धनुषको पूरित करे। कुम्भक प्राणायामके द्वारा उसे स्थिर करके रेचक प्राणायाम एवं हुंकारके साथ वायु एवं बाणका विसर्जन करे। सिद्धिकी इच्छावाले धनुर्धर योद्धाको यह अभ्यास-क्रिया अवश्य करनी चाहिये। छः मासमें 'मुष्टि' सिद्ध होती है और एक वर्षमें 'बाण'। 'नाराच' तो उसीके सिद्ध होते हैं, जिसपर भगवान् महेश्वरकी कृपा हो जाय। अपनी सिद्धि चाहनेवाला योद्धा बाणको फूलकी भाँति धारण करे। फिर धनुषको सर्पकी भाँति दबावे तथा लक्ष्यका बहुमूल्य धनकी भाँति चिन्तन करे, इत्यादि।
४८६ * अग्निपुराण *
दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय
पाशके निर्माण और प्रयोगकी विधि तथा तलवार और लाठीको अपने पास रखने एवं शत्रुपर चलानेकी उपयुक्त पद्धतिका निर्देश
अग्निदेव कहते हैं—ब्रह्मन्! जिसने हाथ, मन और दृष्टिको जीत लिया है, ऐसा लक्ष्यसाधक नियत सिद्धिको पाकर युद्धके लिये वाहनपर आरूढ़ हो। 'पाश' दस हाथ बड़ा, गोलाकार और हाथके लिये सुखद होना चाहिये। इसके लिये अच्छी मूँज, हरिणकी ताँत अथवा आकके छिलकोंकी डोरी तैयार करानी चाहिये। इनके सिवा अन्य सुदृढ़ (पट्टसूत्र आदि) वस्तुओंका भी सुन्दर पाश बनाया जा सकता है। उक्त सूत्रों या रस्सियोंको कई आवृत्ति लपेटकर खूब बट ले। विज्ञ पुरुष तीस आवृत्ति करके बटे हुए सूत्र या रस्सीसे ही पाशका निर्माण करे॥ १-३॥
शिक्षकोंको पाशकी शिक्षा देनेके लिये कक्षाओंमें स्थान बनाना चाहिये। पाशको बायें हाथमें लेकर दाहिने हाथसे उधेड़े। उसे कुण्डलाकार बना, सब ओर घुमाकर शत्रुके मस्तकके ऊपर फेंकना चाहिये। पहले तिनकेके बने और चमड़ेसे मढ़े हुए पुरुषपर उसका प्रयोग करना चाहिये। तत्पश्चात् उछलते-कूदते और जोर-जोरसे चलते हुए मनुष्योंपर सम्यक्रूपसे विधिवत् प्रयोग करके सफलता प्राप्त कर लेनेपर ही पाशका प्रयोग करे। सुशिक्षित योद्धाको पाशद्वारा यथोचित रीतिसे जीत लेनेपर ही शत्रुके प्रति पाश-बन्धनकी क्रिया करनी चाहिये॥ ४—६$\frac{१}{२}$॥
तदनन्तर कमरमें म्यानसहित तलवार बाँधकर उसे बायीं ओर लटका ले और उसकी म्यानको बायें हाथसे दृढ़ताके साथ पकड़कर दायें हाथसे तलवारको बाहर निकाले। उस तलवारकी चौड़ाई छः अङ्गुल और लंबाई या ऊँचाई सात हाथकी हो॥ ७-८॥
लोहेकी बनी हुई कई शलाकाएँ और नाना प्रकारके कवच अपने आधे या समूचे हाथमें लगा ले; अगल-बगलमें और ऊपर-नीचे भी शरीरकी रक्षाके लिये इन सब वस्तुओंको विधिवत् धारण करे॥ ९॥
युद्धमें विजयके लिये जिस विधिसे जैसी योजना बनानी चाहिये, वह बताता हूँ, सुनो। तूणीरके चमड़ेसे मढ़ी हुई एक नयी और मजबूत लाठी अपने पास रख ले। उस लाठीको दाहिने हाथकी अँगुुलियोंसे उठाकर वह जिसके ऊपर जोरसे आघात करेगा, उस शत्रुकां अवश्य नाश हो जायगा। इस क्रियामें सिद्धि मिलनेपर वह दोनों हाथोंसे लाठीको शत्रुके ऊपर गिरावे। इससे अनायास ही वह उसका वध कर सकता है। इस तरह युद्धमें सिद्धिकी बात बतायी गयी। रणभूमिमें भलीभाँति संचरणके लिये अपने वाहनोंसे श्रम कराते रहना चाहिये, यह बात तुम्हें पहले बतायी गयी है॥ १०-१२॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'धनुर्वेदका कथन' नामक दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५१॥
- अध्याय २५२ * ४८७
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दो सौ बावनवाँ अध्याय तलवारके बत्तीस हाथ, पाश, चक्र, शूल, तोमर, गदा, परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, वज्र, कृपाण, क्षेपणी, गदायुद्ध तथा मल्लयुद्धके दाँव और पैंतरोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं-ब्रह्मन् ! भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत (या सृत), सम्पात, समुदीर्ण, श्येनपात, आकुल, उद्धूत, अवधूत, सव्य, दक्षिण, अनालक्षित, विस्फोट, करालेन्द्र, महासख, विकराल, निपात, विभीषण, भयानक, समग्र, अर्ध, तृतीयांश, पाद, पादार्ध, वारिज, प्रत्यालीढ, आलीढ, वराह और लुलित-ये रणभूमिमें दिखाये जानेवाले ढाल-तलवारके बत्तीस हाथ (या चलानेके ढंग) हैं; इन्हें जानना चाहिये ॥ १-४॥
परावृत्त, अपावृत्त, गृहीत, लघु, ऊर्ध्वक्षिप्त, अधःक्षिप्त, संधारित, विधारित, श्येनपात, गजपात और ग्राह-ग्राह्य-ये युद्धमें 'पाश' फेंकनेके ग्यारह प्रकार हैं ॥ ५-६॥
ऋजु, आयत, विशाल, तिर्यक् और भ्रामित-ये पाँच कर्म 'व्यस्तपाश' के लिये महात्माओंने बताये हैं ॥ ७ ॥
छेदन, भेदन, पात, भ्रमण, शमन, विकर्तन तथा कर्तन-ये सात कर्म 'चक्र'के हैं ॥ ८ ॥
आस्फोट, क्ष्वेडन, भेद, त्रास, आन्दोलितक और आघात-ये छः 'शूल'के कर्म जानो ॥ ९॥
द्विजोत्तम! दृष्टिघात, भुजाघात, पार्श्वघात, ऋजुपात, पक्षपात और इषुपात-ये 'तोमर'के कार्य कहे गये हैं ॥ १० ॥
विप्रवर ! आहत, विहत, प्रभूत, कमलासन, ततोर्ध्वगात्र, नमित, वामदक्षिण, आवृत्त, परावृत्त, पादोद्धूत, अवप्लुत, हंसमर्द (या हंसमार्ग) तथा विमर्द-ये 'गदा-सम्बन्धी' कर्म कहे गये हैं ॥ ११-१२ ॥
कराल, अवघात, दंशोपप्लुत, क्षिप्तहस्त, स्थित और शून्य-ये 'फरसे'के कर्म समझने चाहिये ॥ १३ ॥
विप्रवर ! ताड़न, छेदन, चूर्णन, प्लवन तथा घातान-ये 'मुद्गर'के कर्म हैं ॥ १४॥
संभ्रान्त, विश्रान्त, गोविसर्ग तथा सुदुर्धर-ये 'भिन्दिपाल'के कर्म हैं और 'लगुड'के भी वे ही कर्म बताये गये हैं ॥ १५ ॥
द्विजोत्तम ! अन्त्य, मध्य, परावृत्त तथा निदेशान्त-ये 'वज्र' और 'पट्टिश'के कर्म हैं ॥ १६ ॥
हरण, छेदन, घात, भेदन, रक्षण, पातन तथा स्फोटन-ये 'कृपाण'के कर्म कहे गये हैं ॥ १७ ॥
त्रासन, रक्षण, घात, बलोद्धरण और आयत-ये 'क्षेपणी' (गोफन)-के कार्य कहे गये हैं। ये ही 'यन्त्र'के भी कर्म हैं ॥ १८ ॥
संत्याग, अवदंश, वराहोद्धूतक, हस्तावहस्त, आलीन, एकहस्त, अवहस्तक, द्विहस्त, बाहुपाश, कटिरेचितक, उद्गत, उरोघात, ललाटघात, भुजाविधमन, करोद्धूत, विमान, पादाहति, विपादिक, गात्रसंश्लेषण, शान्त, गात्रविपर्यय, ऊर्ध्वप्रहार, घात, गोमूत्र, सव्य, दक्षिण, पारक, तारक, दण्ड (गण्ड), कबरीबन्ध, आकुल, तिर्यग्बन्ध, अपामार्ग, भीमवेग, सुदर्शन, सिंहाक्रान्त, गजाक्रान्त और गर्दभाक्रान्त-ये 'गदायुद्ध'के हाथ जानने चाहिये। अब 'मल्लयुद्ध'के दाव-पेंच बताये जाते हैं ॥ १९-२३$\frac{१}{२}$॥
आकर्षण, विकर्षण, बाहुमूल, ग्रीवाविपरिवर्त, सुदारुण, पृष्ठभङ्ग, पर्यासन, विपर्यास, पशुमार, अजाविक, पादप्रहार, आस्फोट, कटिरेचितक, गात्राश्लेष, स्कन्धगत, महीव्याजन, उरोललाटघात, विस्पष्टकरण, उद्धूत, अवधूत, तिर्यमार्गगत, गजस्कन्ध, अवक्षेप, अपराङ्मुख, देवमार्ग, अधोमार्ग, अमार्गगमनाकुल, यष्टिघात, अवक्षेप, वसुधादारण,
४८८ * अग्निपुराण *
जानुबन्ध, भुजाबन्ध, सुदारुण, गात्रबन्ध, विपृष्ठ, सोदक, श्वभ्र तथा भुजावेष्टित ॥ २४-२९ $\frac{१}{२}$ ॥
युद्धमें कवच धारण करके, अस्त्र-शस्त्रसे सम्पन्न हो, हाथी आदि वाहनोंपर चढ़कर उपस्थित होना चाहिये। हाथीपर उत्तम अङ्कुश धारण किये दो महावत या चालक रहने चाहिये। उनमेंसे एक तो हाथीकी गर्दनपर सवार हो और दूसरा उसके कंधेपर। इनके अतिरिक्त सवारोंमें दो धनुर्धर होने चाहिये और दो खड्गधारी ॥ ३०-३१ ॥
प्रत्येक रथ और हाथीकी रक्षाके लिये तीन-तीन घुड़सवार सैनिक रहें तथा घोड़ेकी रक्षाके लिये तीन-तीन धनुर्धर पैदल-सैनिक रहने चाहिये। धनुर्धरकी रक्षाके लिये चर्म या ढाल लिये रहनेवाले योद्धाकी नियुक्ति करनी चाहिये ॥ ३२ ॥
जो प्रत्येक शस्त्रका उसके अपने मन्त्रोंसे पूजन करके 'त्रैलोक्यमोहन-कवच'का पाठ करनेके अनन्तर युद्धमें जाता है, वह शत्रुओंपर विजय पाता और भूतलकी रक्षा करता है। (पाठान्तरके अनुसार शत्रुओंपर विजय पाता और उन्हें निश्चय ही मार गिराता है।) ॥ ३३ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'धनुर्वेदका कथन' नामक दो सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५२ ॥
दो सौ तिरपनवाँ अध्याय
व्यवहारशास्त्र तथा विविध व्यवहारोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! अब मैं व्यवहारका वर्णन करता हूँ, जो नय और अनयका विवेक प्रदान करनेवाला है। उसके चार चरण, चार स्थान और चार साधन बतलाये गये हैं। वह चारका हितकारी, चारमें व्याप्त और चारका कर्ता कहा जाता है। वह आठ अङ्ग, अठारह पद, सौ शाखा, तीन योनि, दो अभियोग, दो द्वार और दो गतियोंसे युक्त है॥ १-२ $\frac{१}{२}$ ॥
धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन—ये व्यवहारदर्शनके चार चरण हैं। इनमें उत्तरोत्तर पाद पूर्व-पूर्व पादके साधक हैं। इन सबमें 'धर्म'का आधार सत्य है, 'व्यवहार'का आधार साक्षी (गवाह) है, 'चरित्र' पुरुषोंके संग्रहपर आधारित है और 'शासन' राजाकी आज्ञापर अवलम्बित है। साम, दान, दण्ड और भेद—इन चार उपायोंसे साध्य होनेके कारण वह 'चार साधनोंवाला' है। चारों आश्रमोंकी रक्षा करनेसे वह 'चतुर्हित' है। अभियोक्ता, साक्षी, सभासद और राजा—इनमें एक-एक चरणसे उसकी स्थिति है—इसलिये उसे 'चतुर्व्यापी' माना गया है। वह धर्म, अर्थ, यश और लोकप्रियता—इन चारोंकी वृद्धि करनेवाला होनेसे 'चतुष्कारी' कहा जाता है। राजपुरुष, सभासद, शास्त्र, गणक, लेखक, सुवर्ण, अग्नि और जल—इन आठ अङ्गोंसे युक्त होनेके कारण वह 'अष्टाङ्ग' है। काम, क्रोध और लोभ—इन तीन कारणोंसे मनुष्यकी इसमें प्रवृत्ति होती है, इसीलिये व्यवहारको 'त्रियोनि' कहा जाता है; क्योंकि ये तीनों ही विवाद करानेवाले हैं। अभियोगके दो भेद हैं— (१) शङ्काभियोग और (२) तत्त्वाभियोग। इसी दृष्टिसे वह दो अभियोगवाला है। 'शङ्का' असत् पुरुषोंके संसर्गसे होती है और 'तत्त्वाभियोग' होढा (चिह्न या प्रमाण) देखनेसे होता है। यह दो पक्षोंसे सम्बन्धित होनेके कारण 'दो द्वारोंवाला' कहा जाता है। इनमें पूर्ववाद$^१$ 'पक्ष' और उत्तरवाद$^२$
१. अभियोगका उपस्थापक या 'मुद्दई'।
२. अभियोगका प्रतिवादी या 'मुद्दालह'।
- अध्याय २५३ * ४८९
'प्रतिपक्ष' कहलाता है। 'भूत' और 'छल'—इनका अनुसरण करनेसे यह दो गतियोंसे युक्त माना जाता है ॥ ३—१२ ॥
कैसा ऋण देय है, कैसा ऋण अदेय है—कौन दे, किस समय दे, किस प्रकारसे दे, ऋण देनेकी विधि या पद्धति क्या है तथा उसे लेने या वसूल करनेका विधान क्या है? इन सब बातोंका विचार$^१$ 'ऋणादान' कहा गया है। जब कोई मनुष्य किसीपर विश्वास करके शङ्कारहित होकर उसके पास अपना कोई द्रव्य धरोहरके तौरपर देता है, तब उसे विद्वान् लोग 'निक्षेप' नामक व्यवहारपद कहते हैं। जब वणिक् आदि अनेक मनुष्य मिलकर सहकारिता या साझेदारीके तौरपर कोई कार्य करते हैं तो उसको 'सम्भूयसमुत्थान' संज्ञक विवादपद बतलाते हैं। यदि कोई मनुष्य पहले विधिपूर्वक किसी द्रव्यका दान देकर पुन: उसे रख लेनेकी इच्छा करे, तो वह 'दत्ताप्रदानिक' नामक विवादपद कहा जाता है। जो सेवा स्वीकार करके भी उसका सम्पादन नहीं करता या उपस्थित नहीं होता, उसका यह व्यवहार 'अभ्युपेत्य अशूश्रूषा' नामक विवादपद होता है। भृत्योंको वेतन देने-न-देनेसे सम्बन्ध रखनेवाला विवाद 'वेतनस्यानपाकर्म' माना गया है। धरोहरमें रखे हुए या खोये हुए पराये द्रव्यको पाकर अथवा चुराकर स्वामीके परोक्षमें बेचा जाय तो यह 'अस्वामिविक्रय' नामक विवादपद है। यदि कोई व्यापारी किसी पण्य-द्रव्यका मूल्य लेकर विक्रय कर देनेके बाद भी खरीददारको वह द्रव्य नहीं देता है तो उसको 'विक्रीयासम्प्रदान' नामक विवादपद कहा जाता है। यदि ग्राहक किसी वस्तुका मूल्य देकर खरीदनेके बाद उस वस्तुको ठीक नहीं समझता, तो उसका यह आचरण 'क्रीतानुशय' नामक विवादपद कहलाता है। यदि ग्राहक या खरीददार मूल्य देकर वस्तुको खरीद लेनेके बाद यह समझता है कि यह खरीददारी ठीक नहीं है, (अतः वह वस्तु लौटाकर दाम वापस लेना चाहता है) तो उसी दिन यदि वह लौटा दे तो विक्रेता उसका मूल्य पूरा-पूरा लौटा दे, उसमें काट-छाट न करे$^२$ ॥ १३—२१ ॥
पाखण्डी और नैगम आदिकी स्थितिको 'समय' कहते हैं। इससे सम्बद्ध विवादपदको 'समयानपा-कर्म' कहा जाता है। (याज्ञवल्क्यने इसे 'संविद्-व्यतिक्रम' नाम दिया है।) क्षेत्रके अधिकारको लेकर सेतु, केदार (मेड़) और क्षेत्र
१. ऋणादानके सात प्रकार हैं— १-अमुक प्रकारका ऋण 'देय' है, २-अमुक प्रकारका ऋण 'अदेय' है, ३-अमुक अधिकारीको ऋण देनेका अधिकार है, ४-अमुक समयमें ऋण देना चाहिये, ५-इस प्रकारसे ऋण दिया जाना चाहिये—ये पाँच अधमर्ण (ऋण लेनेवाले) व्यक्तिको लक्ष्य करके विचारणीय हैं और शेष दो बातें साहूकारके लिये विचारणीय हैं—६-साहूकार किस विधानसे ऋण दे तथा ७-किस विधानसे उसको वसूल करे। इन्हीं सातों बातोंको इस श्लोकमें स्पष्ट किया गया है। 'नारद-स्मृति' में भी इसका इसी रूपमें उल्लेख हुआ है। इन सब बातोंके विचारपूर्वक जो ऋणका आदान-प्रदान होता है, उसे 'ऋणादान' नामक व्यवहारपद समझना चाहिये।
२. 'नारदस्मृति' में भी इन श्लोकोंका ठीक ऐसा ही पाठ है। वहाँ इस विषयमें कुछ अधिक बातें बतायी गयी हैं, जो इस प्रकार हैं—
द्वितीयेऽह्नि ददत् क्रेता मूल्यात् त्रिंशांशमाहरेत्। द्विगुणं तु तृतीयेऽह्नि परतः क्रेतुरेव तत्॥
'यदि ग्राहक नापसंद माल (पहले ही दिन न लौटाकर) दूसरे दिन लौटावे तो वह वस्तुके पूरे मूल्यका $\frac{१}{३}$ अर्थात् $३\frac{१}{३}$ प्रतिशत हरजानेके तौरपर विक्रेताको दे। यदि वह तीसरे दिन लौटाये तो इससे दूनी रकम हर्जानेके तौरपर दे। इसके बाद 'अनुशय'का अधिकार समाप्त हो जाता है। फिर तो ग्राहकको माल लेना ही पड़ेगा।'
याज्ञवल्क्य और मिताक्षराकारकी दृष्टिमें यह नियम बीज आदिसे भिन्न वस्तुओंपर लागू होता है। बीज, लोहा, बैल-घोड़े आदि वाहन, मोती-मूँगा आदि रत्न, दासी, दूध देनेवाली भैंस आदि तथा दास—इनके परीक्षणका काल अधिक है। यथा—बीजके परीक्षणका समय दस दिन, लोहेके एक दिन, बैल आदिके पाँच दिन, रत्नके एक सप्ताह, दासीके एक मास, दूध देनेवाली भैंस आदिके तीन दिन तथा दासके परीक्षणका समय पंद्रह दिनतक है। इस समयके भीतर ही ये ठीक न जँचें तो इनको लौटाया जा सकता है; अन्यथा नहीं। मनुने गृह, क्षेत्र आदि वस्तुओंको दस दिनके अंदर ही लौटानेका आदेश दिया है। इसके बाद लौटानेका अधिकार नहीं रह जाता है।
४९० * अग्निपुराण *
सीमाके घटने-बढ़नेके विषयमें जो विवाद होता है, वह 'क्षेत्रज' कहा गया है। जो स्त्री और पुरुषके विवाहादिसे सम्बन्धित विवादपद है, उसे 'स्त्री-पुंस योग' कहते हैं। पुत्रगण पैतृक धनका जो विभाजन करते हैं, विद्वानोंने उसको 'दायभाग' नामक व्यवहारपद माना है। बलके अभिमानसे जो कर्म सहसा किया जाता है, उसे 'साहस' नामक विवादपद बतलाया गया है। किसीके देश, जाति एवं कुल आदिपर दोषारोपण करके प्रतिकूल अर्थसे युक्त व्यंग्यपूर्ण वचन कहना 'वाक्-पारुष्य' माना गया है। दूसरेके शरीरपर हाथ-पैर या आयुधसे प्रहार अथवा अग्नि आदिसे आघात करना 'दण्ड-पारुष्य' कहलाता है। पासे, वध्र (चमड़ेकी पट्टी) और शलाका (हाथीदाँतकी गोटियों)-से जो क्रीडा होती है, उसको 'द्यूत' कहा जाता है। (घोड़े आदि) पशुओं और (बटेर आदि) पक्षियोंसे होनेवाली क्रीडाको 'प्राणिद्यूत' समझना चाहिये। राजाकी आज्ञाका उल्लङ्घन और उसका कार्य न करना यह 'प्रकीर्णक' नामक व्यवहारपद जानना चाहिये। यह विवादपद राजापर आश्रित है। इस प्रकार व्यवहार अठारह पदोंसे युक्त है। इनके भी सौ भेद माने गये हैं। मनुष्योंकी क्रियाके भेदसे यह सौ शाखाओंवाला कहा जाता है॥ २२-३१॥
राजा क्रोधरहित होकर ज्ञान-सम्पन्न ब्राह्मणोंके साथ व्यवहारका विचार करे और ऐसे मनुष्योंको सभासद बनाये, जो वेदवेत्ता, लोभरहित और शत्रु एवं मित्रको समान दृष्टिसे देखनेवाले हों। यदि राजा कार्यवश स्वयं व्यवहारका विचार न कर सके तो सभासदोंके साथ विद्वान् ब्राह्मणको नियुक्त करे। यदि सभासद राग, लोभ या भयसे धर्मशास्त्र एवं आचारके विरुद्ध कार्य करे, तो राजा प्रत्येक सभासदपर अलग-अलग विवादसे दुगुना अर्थदण्ड करे। यदि कोई मनुष्य दूसरोंके द्वारा धर्मशास्त्र और समयाचारके विरुद्ध मार्गसे धर्षित किया गया हो और वह राजाके समीप आवेदन करे तो उसको 'व्यवहार' (पद$^१$) कहते हैं। वादीने जो निवेदन किया हो, राजा उसको वर्ष, मास, पक्ष, दिन, नाम और जाति आदिसे चिह्नित करके प्रतिवादीके सामने लिख ले। (वादीके आवेदन या बयानको 'भाषा', 'प्रतिज्ञा' अथवा 'पक्ष' कहते हैं।) प्रतिवादी वादीका आवेदन सुनकर उसके सामने ही उसका उत्तर$^२$ लिखावे। तब वादी उसी समय अपने निवेदनका प्रमाण लिखावे। निवेदनके प्रमाणित हो जानेपर वादी जीतता है, अन्यथा पराजित हो जाता है॥ ३२-३७॥
इस प्रकार विवादमें चार पाद (अंश$^३$)-से युक्त व्यवहार दिखाया गया है। जबतक अभियुक्तके वर्तमान अभियोगका निर्णय (फैसला) न हो जाय, तबतक उसके ऊपर दूसरे अपराधका मामला न चलाये। जिसपर किसी दूसरेने अभियोग कर दिया हो, उसपर भी कोई वादी दूसरा अभियोग न चलावे। आवेदनके समय जो कुछ कहा गया हो, अपने उस कथनके विपरीत (विरुद्ध) कुछ न कहे। (हिंसा आदि)-का अपराध बन जाय तो पूर्व अभियोगका फैसला होनेके पहले ही मामला चलाया जा सकता है॥ ३८-३९॥
सभासदोंसहित सभापति या प्राड्विवाकको चाहिये कि वह वादी और प्रतिवादी दोनोंके सभी विवादोंमें जो निर्णयका कार्य है, उसके सम्पादनमें समर्थ पुरुषको 'प्रतिभू' बनाये।$^४$ अर्थिके
१. मिताक्षराकारने व्यवहारके सात अङ्ग बताये हैं। यथा—प्रतिज्ञा, उत्तर, संशय, हेतु-परामर्श, प्रमाण, निर्णय एवं प्रयोजन।
२. उत्तरके चार भेद हैं—'सम्प्रतिपत्ति', 'मिथ्या', 'प्रत्यवस्कन्दन' तथा 'प्राङ्न्याय'। उत्तर वह अच्छा माना गया है, जो पक्षके खण्डनमें समर्थ, न्यायसंगत, संदेहरहित, पूर्वापर-विरोधसे वर्जित तथा सुबोध हो—उसे समझनेके लिये व्याख्या अथवा टीका-टिप्पणी न करनी पड़े।
३. १-भाषापाद, २-उत्तरपाद, ३-क्रियापाद और ४-साध्य-सिद्धिपाद।
४. प्रतिभूके अभावमें वेतन देकर रक्षक-पुरुषोंकी नियुक्ति करनी चाहिये। जैसा कि कात्यायनका कथन है—
अथ चेत् प्रतिभूर्नास्ति कार्ययोग्यस्तु वादिनः। स रक्षितो दिनस्यान्ते दद्याद् भृत्याय वेतनम् ॥
* अध्याय २५३ * ४९१
द्वारा लगाये गये अभियोगको यदि प्रत्यर्थीने अस्वीकार कर दिया और अर्थीने गवाही आदि देकर अपने दावेको पुनः उससे स्वीकार करा लिया, तब प्रत्यर्थी अर्थीको अभियुक्त धन दे और दण्डस्वरूप उतना ही धन राजाको भी दे। यदि अर्थी अपने दावेको सिद्ध न कर सका तो स्वयं मिथ्याभियोगी (झूठा मुकदमा चलानेवाला) हो गया; उस दशामें वही अभियुक्त धनराशिसे दूना धन राजाको अर्पित करे॥ ४० $\frac{१}{२}$ ॥
हत्या या डकैती-चोरी, वाक्पारुष्य (गाली-गलौज), दण्डपारुष्य (निर्दयतापूर्वक की हुई मारपीट), दूध देनेवाली गायके अपहरण, अभिशाप (पातकका अभियोग), अत्यय (प्राणघात) एवं धनातिपात तथा स्त्रियोंके चरित्र-सम्बन्धी विवाद प्राप्त होनेपर तत्काल अपराधीसे उत्तर माँगे, विलम्ब न करे। अन्य प्रकारके विवादोंमें उत्तरदानका समय वादी, प्रतिवादी, सभासद् तथा प्राड्विवाककी इच्छाके अनुसार रखा जा सकता है॥ ४१ $\frac{१}{२}$ ॥
(दुष्टोंकी पहचान इस प्रकार करे—) अभियोगके विषयमें बयान या गवाही देते समय जो एक जगहसे दूसरी जगह जाता-आता है, स्थिर नहीं रह पाता, दोनों गलफर चाटता है, जिसके भाल-देशमें पसीना हुआ करता है, चेहरेका रंग फीका पड़ जाता है, गला सूखनेसे वाणी अटकने लगती है, जो बहुत तथा पूर्वापर-विरुद्ध बातें कहा करता है, जो दूसरेकी बातका ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पाता और किसीसे दृष्टि नहीं मिला पाता है, जो ओठ टेढ़े-मेढ़े किया करता है, इस प्रकार जो स्वभावसे ही मन, वाणी, शरीर तथा क्रिया-सम्बन्धी विकारको प्राप्त होता है, वह 'दुष्ट' कहा गया है॥ ४२-४३ $\frac{१}{२}$ ॥
जो संदिग्ध अर्थको, जिसे अधमर्णने अस्वीकार कर दिया है, बिना किसी साधनके मनमाने ढंगसे सिद्ध करनेकी चेष्टा करता है तथा जो राजाके बुलानेपर उसके समक्ष कुछ भी नहीं कह पाता है, वह भी हीन और दण्डनीय माना गया है॥ ४४ $\frac{१}{२}$ ॥
दोनों वादियोंके पक्षोंके साधक साक्षी मिलने सम्भव हों तो पूर्ववादीके साक्षियोंसे ही पूछे, अर्थात् उन्हींकी गवाही ले। जो वादीके उत्तरमें यह कहे कि 'मैंने बहुत पहले इस क्षेत्रको दानमें पाया था और तभीसे यह हमारे उपयोगमें है', वही यहाँ पूर्ववादी है; जिसने पहले अभियोग दाखिल किया है, वह नहीं। यदि कोई यह कहे कि 'ठीक है कि यह सम्पत्ति इसे दानमें मिली थी और इसने इसका उपयोग भी किया है, तथापि इसके यहाँसे अमुकने वह क्षेत्र-सम्पत्ति खरीद ली और उसने पुनः इसे मुझको दे दिया' तब पूर्वपक्ष असाध्य होनेके कारण दुर्बल पड़ जाता है। ऐसा होनेपर उत्तरवादीके साक्षी ही प्रष्टव्य हैं; उन्हींकी गवाही ली जानी चाहिये॥ ४५ $\frac{१}{२}$ ॥
यदि विवाद किसी शर्तके साथ किया गया हो, अर्थात् यदि किसीने कहा हो कि 'यदि मैं अपना पक्ष सिद्ध न कर सकूँ तो पाँच सौ पण अधिक दण्ड दूँगा, तब यदि वह पराजित हो जाय तो उसके पूर्वकृत पणरूपी दण्डका धन राजाको दिलवावे। परंतु जो अर्थी धनी है, उसे राजा विवादका आस्पदभूत धन ही दिलवावे'॥ ४६ $\frac{१}{२}$ ॥
राजा छल छोड़कर वास्तविकताका आश्रय ले व्यवहारोंका अन्तिम निर्णय करे। यथार्थ वस्तु भी यदि लेखबद्ध न हुई हो तो व्यवहारमें वह पराजयका कारण बनती है। सुवर्ण, रजत और वस्त्र आदि अनेक वस्तुएँ अर्थीके द्वारा अभियोग-पत्रमें लिखा दी गयी हैं, परंतु प्रत्यर्थी उन सबको अस्वीकार कर देता है, उस दशामें यदि साक्षी आदिके प्रमाणसे एक वस्तुको भी प्रत्यर्थीने स्वीकार कर लिया, तब राजा उससे अभियोग-पत्रमें लिखित सारी वस्तुएँ दिलवाये। यदि कोई वस्तु पहले नहीं लिखायी गयी और बादमें उसकी भी वस्तुसूचीमें चर्चा की गयी हो
४९२ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
तो उसको राजा नहीं दिलवावे। यदि दो स्मृतियों अथवा धर्मशास्त्र-वचनोंमें परस्पर विरोधकी प्रतीति होती हो तो उस विरोधको दूर करनेके लिये विषय-व्यवस्थापना आदिमें उत्सर्गापवाद-लक्षण न्यायको बलवान् समझना चाहिये। एक वाक्य उत्सर्ग या सामान्य है और दूसरा अपवाद अथवा विशेष है, अतः अपवाद उत्सर्गका बाधक हो जाता है। उस न्यायकी प्रतीति कैसे होगी? व्यवहारसे। अन्वय-व्यतिरेक-लक्षण जो वृद्धव्यवहार है, उससे उक्त न्यायका अवगमन हो जायगा। इस कथनका भी अपवाद है। अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्रके वचनोंमें विरोध होनेपर अर्थशास्त्रसे धर्मशास्त्र ही बलवान् है; यह ऋषि-मुनियोंकी बाँधी मर्यादा है॥ ४७-४९ ½ ॥
(अर्थी या वादी पुरुष सप्रमाण अभियोग-पत्र उपस्थित करे, यह बात पहले कही गयी है। प्रमाण दो प्रकारका होता है—'मानुष-प्रमाण' और 'दैविक-प्रमाण'। 'मानुष-प्रमाण' तीन प्रकारका होता है, वही यहाँ बताया जाता है—) लिखित, भुक्ति और साक्षी—ये तीन 'मानुष-प्रमाण' कहे गये हैं। (लिखितके दो भेद हैं—'शासन' और 'चीरक'। 'शासन'का लक्षण पहले कहा गया है और 'चीरक'का आगे बताया जायगा।) 'भुक्ति'का अर्थ है—उपभोग (कब्जा)। (साक्षियोंके स्वरूप-प्रकार आगे बताये जायँगे।) यदि मानुष-प्रमाणके इन तीनों भेदोंमेंसे एककी भी उपलब्धि न हो तो आगे बताये जानेवाले दिव्य प्रमाणोंमेंसे किसी एकको ग्रहण करना आवश्यक बताया जाता है॥ ५० ½ ॥
ऋण आदि समस्त विवादोंमें उत्तर क्रिया बलवती मानी गयी है। यदि उत्तर क्रिया सिद्ध कर दी गयी तो उत्तरवादी विजयी होता है और पूर्ववादी अपना पक्ष सिद्ध कर चुका हो तो भी वह हार जाता है। जैसे किसीने सिद्ध कर दिया कि 'अमुकने मुझसे सौ रुपये लिये हैं; अतः वह उतने रुपयोंका देनदार है'; तथापि लेनेवाला यदि यह जवाब लगा दे कि 'मैंने लिया अवश्य था, किंतु अमुक तिथिको सारे रुपये लौटा दिये थे' और यदि उत्तरदाता प्रमाणसे अपना यह कथन सिद्ध कर दे, तो अर्थी या पूर्ववादी पराजित हो जाता है; परंतु 'आधि' (किसी वस्तुको गिरवी रखने), प्रतिग्रह लेने अथवा खरीदनेमें पूर्वक्रिया ही प्रबल होती है। जैसे किसी खेतको उसके मालिकने किसी धनीके यहाँ गिरवी रखकर उससे कुछ रुपये ले लिये। फिर उसी खेतको दूसरेसे भी रुपये लेकर उसने उसके यहाँ गिरवी रख दिया, ऐसे मामलोंमें जहाँ पहले खेतको गिरवी रखा है, उसीका स्वत्व प्रबल माना जायगा, दूसरेका नहीं॥ ५१ ½ ॥
यदि भूमिस्वामीके देखते हुए कोई दूसरा उसकी भूमिका उपभोग करता है और वह कुछ नहीं बोलता तो बीस वर्षोंतक ऐसा होनेपर वह भूमि उसके हाथसे निकल जाती है। इसी प्रकार हाथी, घोड़े आदि धनका कोई दस वर्षतक उपभोग करे और स्वामी कुछ न बोले तो वह उपभोक्ता ही उस धनका स्वामी हो जाता है, पहलेके स्वामीको उस धनसे हाथ धोना पड़ता है॥ ५२ ½ ॥
आधि, सीमा और निक्षेप-सम्बन्धी धनको, जड और बालकोंके धनको तथा उपनिधि, राजा, स्त्री एवं श्रोत्रिय ब्राह्मणोंके धनको छोड़कर ही पूर्वोक्त नियम लागू होता है, अर्थात् इनके धनका उपभोग करनेपर भी कोई उस धनका स्वामी नहीं हो सकता। आधिसे लेकर श्रोत्रिय-पर्यन्त धनका चिरकालसे उपभोगके बलपर अपहरण करनेवाले पुरुषसे उस विवादास्पद धनको लेकर राजा धनके असली स्वामीको दिलवा दे और अपहरण करनेवालेसे उस धनके बराबर ही दण्डस्वरूप धन राजाको दिलवाया जाय। अथवा अपहरणकर्ताकी शक्तिके अनुसार अधिक या कम
* अध्याय २५३ * ४९३
धन भी दण्डके रूपमें लिया जाय। स्वत्वका हेतुभूत जो प्रतिग्रह और क्रय आदि है, उसको ‘आगम’ कहते हैं। वह ‘आगम’ भोगकी अपेक्षा भी अधिक प्रबल माना गया है। स्वत्वका बोध करानेके लिये आगमसापेक्ष भोग ही प्रमाण है। परंतु पिता, पितामह आदिके क्रमसे जिस धनका उपभोग चला आ रहा है, उसको छोड़कर अन्य प्रकारके उपभोगमें ही आगमकी प्रबलता है; पूर्व-परम्परा-प्राप्त भोग तो आगमसे भी प्रबल है; परंतु जहाँ थोड़ा-सा भी उपभोग नहीं है, उस आगममें भी कोई बल नहीं है॥ ५३—५५ $\frac{१}{२}$॥
विशुद्ध आगमसे भोग प्रमाणित होता है। जहाँ विशुद्ध आगम नहीं है, वह भोग प्रमाणभूत नहीं होता है। जिस पुरुषने भूमि आदिका आगम (अर्जन) किया है, वही ‘कहाँसे तुम्हें क्षेत्र आदिकी प्राप्ति हुई’—यह पूछे जानेपर लिखितादि प्रमाणोंद्वारा आगम (प्रतिग्रह आदि जनित अर्जन)-का उद्धार (साधन) करे। (अन्यथा वह दण्डका भागी होता है।) उसके पुत्र अथवा पौत्रको आगमके उद्धारकी आवश्यकता नहीं है। वह केवल भोग प्रमाणित करे। उसके स्वत्वकी सिद्धिके लिये परम्परागत भोग ही प्रमाण है॥ ५६-५७ $\frac{१}{२}$॥
जो अभियुक्त व्यवहारका निर्णय होनेसे पहले ही परलोकवासी हो जाय, उसके धनके उत्तराधिकारी पुत्र आदि ही लिखितादि प्रमाणोंद्वारा उसके धनागमका उद्धार (साधन) करें; क्योंकि उस व्यवहार (मामले)-में आगमके बिना केवल भोग प्रमाण नहीं हो सकता॥ ५८ $\frac{१}{२}$॥
जो मामले बलात्कारसे अथवा भय आदि उपाधिके कारण चलाये गये हों, उन्हें लौटा दे। इसी प्रकार जिसे केवल स्त्रीने चलाया हो, जो रातमें प्रस्तुत किया गया हो, घरके भीतर घटित घटनासे सम्बद्ध हो अथवा गाँव आदिके बाहर निर्जन स्थानमें किया गया हो तथा किसी शत्रुने अपने द्वेषपात्रपर कोई अभियोग लगाया हो—इस तरहके व्यवहारोंको न्यायालयमें विचारके लिये न ले—लौटा दे॥ ५९ $\frac{१}{२}$॥
(अब यह बताते हैं कि किनका चलाया हुआ अभियोग सिद्ध नहीं होता—) जो मादक द्रव्य पीकर मत्त हो गया हो, वात, पित्त, कफ, सन्निपात अथवा ग्रहावेशके कारण उन्मत्त हो, रोग आदिसे पीड़ित हो, इष्टके वियोग अथवा अनिष्टकी प्राप्तिसे दुःखमग्न हो, नाबालिग हो और शत्रु आदिसे डरा हुआ हो, ऐसे लोगोंद्वारा चलाया हुआ व्यवहार ‘असिद्ध’ माना गया है। जिनका अभियुक्त-वस्तुसे कोई सम्बन्ध न हो, ऐसे लोगोंका चलाया हुआ व्यवहार भी सिद्ध नहीं होता (विचारणीय नहीं समझा जाता)॥ ६० $\frac{१}{२}$॥
यदि किसीका चोरोंद्वारा अपहृत सुवर्ण आदि धन शौल्किक (टैक्स लेनेवाले) तथा स्थानपाल आदि राजकर्मचारियोंको प्राप्त हो जाय और राजाको समर्पित किया जाय तो राजा उसके स्वामी—धनाधिकारीको वह धन लौटा दे। यह तभी करना चाहिये, जब धनका स्वामी खोयी हुई वस्तुके रूप, रंग और संख्या आदि चिह्न बताकर उसपर अपना स्वत्व सिद्ध कर सके। यदि वह चिह्नोंद्वारा उस धनको अपना सिद्ध न कर सके तो मिथ्यावादी होनेके कारण उससे उतना ही धन दण्डके रूपमें वसूल करना चाहिये॥ ६१ $\frac{१}{२}$॥
राजाको चाहिये कि वह चोरोंद्वारा चुराया हुआ द्रव्य उसके अधिकारी राज्यके नागरिकको लौटा दे। यदि वह नहीं लौटाता है तो जिसका वह धन है, उसका सारा पाप राजा अपने ऊपर ले लेता है॥ ६२॥
(अब ऋणादान-सम्बन्धी व्यवहारपर विचार करते हैं—) यदि कोई वस्तु बन्धक रखकर ऋण लिया जाय तो ऋणमें लिये हुए धनका $\frac{१}{८०}$ भाग प्रतिमास ब्याज धर्मसंगत होता है; अन्यथा
४९४ * अग्निपुराण *
बन्धकरहित ऋण देनेपर ब्राह्मणादि वर्णोंके क्रमसे प्रतिशत कुछ-कुछ अधिक ब्याज लेना भी धर्मसम्मत है। अर्थात् ब्राह्मणसे जितना ले क्षत्रियसे, वैश्यसे और शूद्रसे क्रमशः उससे कुछ-कुछ अधिक प्रतिशत सूद या वृद्धिकी रकम ली जा सकती है॥ ६३॥
ऋणके रूपमें प्रयुक्त मादा पशुओंके लिये वृद्धिके रूपमें उसकी संतति ही ग्राह्य है। तेल, घी आदि रसद्रव्य किसीके यहाँ चिरकालतक रह गया और बीचमें यदि उसकी वृद्धि (सूद-वृद्धिकी रकम) नहीं ली गयी तो वह बढ़ते-बढ़ते आठगुना तक हो सकती है। इससे आगे उसपर वृद्धि नहीं लगायी जाती। इसी प्रकार वस्त्र, धान्य तथा सुवर्ण—इनकी क्रमशः चौगुनी, तिगुनी और दुगुनीतक वृद्धि हो सकती है, इससे आगे नहीं॥ ६४॥
व्यापारके लिये दुर्गम वनप्रदेशको लाँघकर यात्रा करनेवाले लोग ऋणदाताको दस प्रतिशत ब्याज दें और जो समुद्रकी यात्रा करनेवाले हैं, वे बीस प्रतिशत वृद्धि प्रदान करें। अथवा सभी वर्णके लोग अबन्धक या सबन्धक ऋणमें अपने लिये धनके स्वामीद्वारा नियत की हुई वृद्धि सभी जातियोंके लिये दें॥ ६५॥
ऋण लेनेवाले पुरुषने पहले जो धन लिया है और जो साक्षी आदिके द्वारा प्रमाणित है, उसको वसूल करनेवाला धनी राजाके लिये वाच्य (निवारणीय) नहीं होता; अर्थात् राजा उस न्यायसंगत धनको वसूल करनेसे उस ऋणदाताको न रोके। (यदि वह अप्रमाणित या अदत्त धनकी वसूली करता है तो वह अवश्य राजाके द्वारा निवारणीय है।) जो पूर्वोक्त रूपसे न्यायसंगत धनकी वसूली करनेपर भी ऋणदाताके विरुद्ध शिकायत लेकर राजाके पास जाय, वह राजाके द्वारा दण्ड पानेके योग्य है। राजा उससे वह धन अवश्य दिलवावे॥ ६६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'व्यवहारकथन' नामक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५३ ॥
दो सौ चौवनवाँ अध्याय
ऋणादान तथा उपनिधि-सम्बन्धी विचार
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! यदि ऋण लेनेवाले पुरुषके अनेक ऋणदाता साहु हों और वे सब-के-सब एक ही जातिके हों तो राजा उन्हें ग्रहणक्रमके अनुसार ऋण लेनेवालेसे धन दिलवावे। अर्थात् जिस धनीने पहले ऋण दिया हो, उसे पहले और जिसने बादमें दिया हो, उसे बादमें ऋणग्राही पुरुष ऋण लौटाये। यदि ऋणदाता धनी अनेक जातिके हों तो ऋणग्राही पुरुष सबसे पहले ब्राह्मण-धनीको धन देकर उसके बाद क्षत्रिय आदिको देय-धन अर्पित करे। राजाको चाहिये कि वह ऋण लेनेवालेसे उसके द्वारा गृहीत धनके प्रमाणद्वारा सिद्ध हो जानेपर दस प्रतिशत धन दण्डके रूपमें वसूल करे तथा जिसने अपना धन वसूल कर लिया है, उस ऋणदाता पुरुषसे पाँच प्रतिशत धन ग्रहण कर ले और उस धनको न्यायालयके कर्मचारियोंके भरण-पोषणमें लगावे॥ १-२॥
यदि ऋण लेनेवाला पुरुष ऋणदाताकी अपेक्षा हीन जातिका हो और निर्धन होनेके कारण ऋणकी अदायगी न कर सके, तब ऋणदाता उससे उसके अनुरूप कोई काम करा ले और इस प्रकार उस ऋणका भुगतान कर ले। यदि ऋण लेनेवाला ब्राह्मण हो और वह भी निर्धन हो गया हो तो उससे कोई काम न लेकर उसे अवसर देना चाहिये और धीरे-धीरे जैसे-जैसे
- अध्याय २५४ * ४९५
उसके पास आय हो, वैसे-वैसे (उसके कुटुम्बको कष्ट दिये बिना) ऋणकी वसूली करे। जो वृद्धिके लिये ऋणके रूपमें दिये हुए अपने धनको लोभवश ऋणग्राहीके लौटानेपर भी नहीं लेता है, उसके देय-धनको यदि किसी मध्यस्थके यहाँ रख दिया जाय तो उस दिनसे उसपर वृद्धि नहीं होती—ब्याज नहीं बढ़ता; परन्तु उस रखे हुए धनको भी ऋणदाताके माँगनेपर न दिया जाय तो उसपर पूर्ववत् ब्याज बढ़ता ही रहता है॥ ३-४॥
दूसरेका द्रव्य जब खरीद आदिके बिना ही अपने अधिकारमें आता है तो उसे 'रिक्थ' कहते हैं। विभागद्वारा जो उस रिक्थको ग्रहण करता है, वह 'रिक्थग्राह' कहलाता है। जो जिसके द्रव्यको रिक्थके रूपमें ग्रहण करता है, उसीसे उसके ऋणको भी दिलवाया जाना चाहिये। उसी तरह जो जिसकी स्त्रीको ग्रहण करता है, वही उसका ऋण भी दे। रिक्थ-धनका स्वामी यदि पुत्रहीन है तो उसका ऋण वह कृत्रिम पुत्र चुकावे, जो एकमात्र उसीके धनपर जीवन-निर्वाह करता है। संयुक्त परिवारमें समूचे कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये एक साथ रहनेवाले बहुत-से लोगोंने या उस कुटुम्बके एक-एक व्यक्तिने जो ऋण लिया हो, उसे उस कुटुम्बका मालिक दे। यदि वह मर गया या परदेश चला गया तो उसके धनके भागीदार सभी लोग मिलकर वह ऋण चुकावें। पतिके किये हुए ऋणको स्त्री न दे, पुत्रके किये हुए ऋणको माता न दे, पिता भी न दे तथा स्त्रीके द्वारा किये गये ऋणको पति न दे; किंतु यह नियम समूचे कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये किये गये ऋणपर लागू नहीं होता है। ग्वाले, शराब बनानेवाले, नट, धोबी तथा व्याधकी स्त्रियोंने जो ऋण लिया हो, उसे उनके पति अवश्य दें; क्योंकि उनकी वृत्ति (जीविका) उन स्त्रियोंके ही अधीन होती है। यदि पति मुमूर्षु हो या परदेश जानेवाला हो, उसके द्वारा नियुक्त स्त्रीने जो ऋण लिया हो, वह भी यद्यपि पतिका ही किया हुआ ऋण है, तथापि उसे पत्नीको चुकाना होगा; अथवा पतिके साथ रहकर भार्याने जो ऋण किया हो, वह भी पति और पुत्रके अभावमें उस भार्याको ही चुकाना होगा; जो ऋण स्त्रीने स्वयं किया हो, उसकी देनदार तो वह है ही। इसके सिवा दूसरे किसी प्रकारके पतिकृत ऋणको चुकानेका भार स्त्रीपर नहीं है॥ ५-९॥
यदि पिता ऋण करके बहुत दूर परदेशमें चला गया, मर गया अथवा किसी बड़े भारी संकटमें फँस गया तो उसके ऋणको पुत्र और पौत्र चुकावें। (पिताके अभावमें पुत्र और पुत्रके अभावमें पौत्र उस ऋणकी अदायगी करे।) यदि वे अस्वीकार करें तो अर्थी न्यायालयमें अभियोग उपस्थित करके साक्षी आदिके द्वारा उस ऋणकी यथार्थता प्रमाणित कर दे। उस दशामें तो पुत्र-पौत्रोंको वह ऋण देना ही पड़ेगा। जो ऋण शराब पीनेके लिये लिया गया हो, परस्त्री-लम्पटताके कारण कामभोगके लिये किया गया हो, जूएमें हारनेपर जो ऋण लिया गया हो, जो धन दण्ड और शुल्कका शेष रह गया हो तथा जो व्यर्थका दान हो, अर्थात् धूर्तों और नट आदिको देनेके लिये किया गया हो, इस तरहके पैतृक ऋणको पुत्र कदापि न दे। भाइयोंके, पति-पत्नीके तथा पिता-पुत्रके अविभक्त धनमें 'प्रातिभाव्य' ऋण और साक्ष्य नहीं माना गया है॥ १०-१२॥
विश्वासके लिये किसी दूसरे पुरुषके साथ जो समय-शर्त या मर्यादा निश्चित की जाती है, उसका नाम है—'प्रातिभाव्य'। वह विषय-भेदसे तीन प्रकारका होता है। जैसे—(१) दर्शनविषयक प्रातिभाव्य। अर्थात् कोई दूसरा पुरुष यह उत्तरदायित्व ले कि जब-जब आवश्यकता होगी, तब-तब इस व्यक्तिको मैं न्यायालयके सामने उपस्थित कर दूँगा अर्थात् दिखाऊँगा—हाजिर कर दूँगा।
४९६ * अग्निपुराण *
('दर्शन-प्रतिभू' को आजकलकी भाषामें 'हाजिर-जामिन' कहते हैं।) (२) प्रत्ययविषयक प्रातिभाव्य। 'प्रत्यय' कहते हैं विश्वासको 'विश्वास-प्रतिभू' को 'विश्वास-जामिन' कहा जाता है। जैसे कोई कहे कि 'आप मेरे विश्वासपर इसको धन दीजिये, यह आपको ठगेगा नहीं; क्योंकि यह अमुकका बेटा है। इसके पास उपजाऊ भूमि है और इसके अधिकारमें एक बड़ा-सा गाँव भी है' इत्यादि। (३) दानविषयक प्रातिभाव्य। 'दान-प्रतिभू' को 'माल-जामिन' कहते हैं। 'दान-प्रतिभू' यह जिम्मेदारी लेता है कि 'यदि यह लिया हुआ धन नहीं देगा तो मैं स्वयं ही अपने पाससे दूँगा'—इत्यादि। इस प्रकार दर्शन (उपस्थिति), प्रत्यय (विश्वास) तथा दान (वसूली)- के लिये प्रातिभाव्य किया जाता है—जामिन देनेकी आवश्यकता पड़ती है। इनमेंसे प्रथम दो, अर्थात् 'दर्शन-प्रतिभू' और 'विश्वास-प्रतिभू'—इनकी बात झूठी होनेपर, स्वयं धनी ऋण चुकानेके लिये विवश है, अर्थात् राजा उनसे धनीको वह धन अवश्य दिलवावे; परंतु जो तीसरा 'दान-प्रतिभू' है, उसकी बात झूठी होनेपर वह स्वयं तो उस धनको लौटानेका अधिकारी है ही, किंतु यदि वह बिना लौटाये ही विलुप्त हो जाय तो उसके पुत्रोंसे भी उस धनकी वसूली की जा सकती है। जहाँ 'दर्शन-प्रतिभू' अथवा 'विश्वास-प्रतिभू' परलोकवासी हो जायँ, वहाँ उनके पुत्र उनके दिलाये हुए ऋणको न दें; परंतु जो स्वयं लौटा देनेके लिये जिम्मेदारी ले चुका है, वह 'दान-प्रतिभू' यदि मर जाय तो उसके पुत्र अवश्य उसके दिलाये हुए ऋणको दें। यदि एक ही धनको दिलानेके लिये बहुत-से प्रतिभू (जामिनदार) बन गये हों, तो उस धनके न मिलनेपर वे सभी उस ऋणको बाँटकर अपने-अपने अंशसे चुकावें। यदि सभी प्रतिभू एक-से ही हों, अर्थात् जैसे ऋणग्राही सम्पूर्ण धन लौटानेको उद्यत रहा है, उसी प्रकार प्रत्येक प्रतिभू यदि सम्पूर्ण धन लौटानेके लिये प्रतिज्ञाबद्ध हो तो धनी पुरुष अपनी रुचिके अनुसार उनमेंसे किसी एकसे ही अपना सारा धन वसूल कर सकता है। ऋण देनेवाले धनीके द्वारा दबाये जानेपर प्रतिभू राजाके आदेशसे सबके सामने उस धनीको जो धन देता है, उससे दूना धन ऋण लेनेवाले लोग उस प्रतिभूको लौटावें॥ १३-१६॥
मादा पशुओंको यदि ऋणके रूपमें दिया गया हो तो उस धनकी वृद्धिके रूपमें केवल उनकी संतति ली जा सकती है। धान्यकी अधिक-से-अधिक वृद्धि तीनगुनेतक मानी गयी है। वस्त्र वृद्धिके क्रमसे बढ़ता हुआ चौगुना तथा रस (घी, तेल आदि) अधिक-से-अधिक आठगुना तक हो सकता है। यदि कोई वस्तु बन्धक रखकर ऋण लिया गया हो और उस ऋणकी रकम ब्याजके द्वारा बढ़ते-बढ़ते दूनी हो गयी हो, उस दशामें भी ऋणग्राही यदि सारा धन लौटाकर उस वस्तुको छुड़ा नहीं लेता है, तो वह वस्तु नष्ट हो जाती है—उसके हाथसे निकलकर ऋणदाताकी अपनी वस्तु हो जाती है। जो धन समय-विशेषपर लौटानेकी शर्तपर लिया जाता है और उसके लिये कोई जेवर आदि बन्धक रखा जाता है, वह समय बीत जानेपर वह बन्धक नष्ट हो जाता है, फिर वापस नहीं मिलता। परंतु जिसका फलमात्र भोगनेके योग्य होता है, वह बगीचा या खेत आदि बन्धकके रूपमें रखा गया हो तो वह कभी नष्ट नहीं होता; उसपर मालिकका स्वत्व बना ही रहता है॥ १७-१८॥
यदि कोई गोपनीय आधि (बन्धकमें रखी हुई वस्तु—ताँबेकी कराही आदि) ऋणदाताके उपभोगमें आये तो उसपर दिये हुए धनके लिये ब्याज नहीं लगाया जा सकता। यदि बन्धकमें
- अध्याय २५४ * ४९७
कोई उपकारी प्राणी (बैल आदि) रखा गया हो और उसके काम लेकर उसकी शक्ति क्षीण कर दी गयी हो तो उसपर दिये गये ऋणके ऊपर वृद्धि नहीं जोड़ी जा सकती। यदि बन्धककी वस्तु नष्ट हो जाय—टूट-फूट जाय तो उसे ठीक कराकर लौटाना चाहिये और यदि वह सर्वथा विलुप्त (नष्ट) हो जाय तो उसके लिये भी उचित मूल्य आदि देना चाहिये। यदि दैव अथवा राजाके प्रकोपसे वह वस्तु नष्ट हुई हो तो उसपर उक्त नियम लागू नहीं होता। उस दशामें ऋणग्राही धनीको वृद्धिसहित धन लौटाये अथवा वृद्धि रोकनेके लिये दूसरी कोई वस्तु बन्धक रखे। 'आधि' चाहे गोप्य हो या भोग्य, उसके स्वीकार (उपभोग)-मात्रसे आधि-ग्रहणकी सिद्धि हो जाती है। उस आधिकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनेपर भी यदि वह कालवश निस्सार हो जाय—वृद्धिसहित मूलधनके लिये पर्याप्त न रह जाय तो ऋणग्राहीको दूसरी कोई वस्तु आधिके रूपमें रखनी चाहिये अथवा धनीको उसका धन लौटा देना चाहिये॥ १९-२०॥
सदाचारको ही बन्धक मानकर उसके द्वारा जो द्रव्य अपने या दूसरेके अधीन किया जाता है, उसको 'चरित्र-बन्धककृत' धन कहते हैं*। ऐसे धनको ऋणग्राही वृद्धिसहित धनीको लौटावे या राजा ऋणग्राहीसे धनीको वृद्धिसहित वह धन दिलवाये। यदि 'सत्यङ्कारकृत' द्रव्य बन्धक रखा गया हो तो धनीको द्विगुण धन लौटाना चाहिये। तात्पर्य यह कि यदि बन्धक रखते समय ही यह बात कह दी गयी हो कि 'ऋणकी रकम बढ़ते-बढ़ते दूनी हो जाय तो भी मैं दूना द्रव्य ही दूँगा। मेरी बन्धक रखी हुई वस्तुपर धनीका अधिकार नहीं होगा'—इस शर्तके साथ जो ऋण लिया गया हो वह 'सत्यङ्कारकृत' द्रव्य कहलाता है। इसका एक दूसरा स्वरूप भी है। क्रय-विक्रय आदिकी व्यवस्था (मर्यादा)-के निर्वाहके लिये जो दूसरेके हाथमें कोई आभूषण इस शर्तके साथ समर्पित किया जाता है कि व्यवस्था-भङ्ग करनेपर दुगुना धन देना होगा, उस दशामें जिसने वह भूषण अर्पित किया है, यदि वही व्यवस्था भङ्ग करे तो उसे वह भूषण सदाके लिये छोड़ देना पड़ेगा। यदि दूसरी ओरसे व्यवस्था भङ्ग की गयी तो उसे उस भूषणको द्विगुण करके लौटाना होगा। यह भी 'सत्यङ्कारकृत' ही द्रव्य है। यदि धन देकर बन्धक छुड़ानेके लिये ऋणग्राही उपस्थित हो तो धनदाताको चाहिये कि वह उसका बन्धक लौटा दे। यदि सूदके लोभसे वह बन्धक लौटानेमें आनाकानी करता या विलम्ब लगाता है तो वह चोरकी भाँति दण्डनीय है। यदि धन देनेवाला कहीं दूर चला गया हो तो उसके कुलके किसी विश्वसनीय व्यक्तिके हाथमें वृद्धिसहित मूलधन रखकर ऋणग्राही अपना बन्धक वापस ले सकता है। अथवा उस समयतक उस बन्धकको छुड़ानेका जो मूल्य हो, वह निश्चित करके उस बन्धकको धनीके लौटनेतक उसीके यहाँ रहने दे, उस दशामें उस धनपर आगे कोई वृद्धि नहीं लगायी जा सकती। यदि ऋणग्राही दूर चला गया हो और नियत समयतक न लौटे तो धनी ऋणग्राहीके विश्वसनीय पुरुषों और गवाहोंके साथ उस बन्धकको बेचकर अपना प्राप्तव्य धन ले ले (यदि पहले बताये अनुसार ऋण लेते समय ही केवल द्रव्य लौटानेकी शर्त हो गयी हो, तब बन्धकको नहीं बेचा या नष्ट किया जा सकता है)। जब किया
* जैसे धनीके सदाचारसे प्रभावित हो ऋणग्राही बहुत अधिक मूल्यकी वस्तु उसके यहाँ बन्धक रखकर स्वल्प ही ऋण लेता है, उसे यह विश्वास है कि धनी मेरी बहुमूल्य वस्तु नष्ट नहीं करेगा; इसी प्रकार ऋणग्राहीके सद्भावपर विश्वास रखकर धनी स्वल्प मूल्यकी वस्तु बन्धकके तौरपर लेकर अधिक धन ऋणमें दे देता है, अथवा कुछ भी बन्धक न रखकर पर्याप्त ऋण दे देता है, ये सब 'चरित्रबन्धककृत' धनकी श्रेणीमें आते हैं।
४९८ * अग्निपुराण *
हुआ ऋण अपनी वृद्धिके क्रमसे दूना होकर आधिपर चढ़ जाय और धनिकको आधिसे दूना धन प्राप्त हो गया हो तो वह आधिको छोड़ दे। (ऋणग्राहीको लौटा दे) ॥ २१—२४॥
'उपनिधि-प्रकरण'—यदि निक्षेप-द्रव्यके आधारभूत वासन या पेटी आदिमें धरोहरकी वस्तु रखकर उसे सील-मोहरसहित बन्द करके वस्तुका स्वरूप या संख्या बताये बिना ही विश्वास करके किसी दूसरेके हाथमें रक्षाके लिये उसे दिया जाता है तो उसे 'उपनिधि-द्रव्य' कहते हैं। उसे स्थापकके माँगनेपर ज्यों-का-त्यों लौटा देना चाहिये$^१$। यदि उपनिधिकी वस्तु राजाने बलपूर्वक ले ली हो या दैवी बाधा (आग लगने आदि)-से नष्ट हुई हो, अथवा उसे चोर चुरा ले गये हों तो जिसके यहाँ वह वस्तु रखी गयी थी, उसको वह वस्तु देने या लौटानेके लिये बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि स्वामीने उस वस्तुको माँगा हो और धरोहर रखनेवालेने नहीं दिया हो, उस दशामें यदि राजा आदिकी बाधासे उस वस्तुका नाश हुआ हो तो रखनेवाला उस वस्तुके अनुरूप मूल्य मालधनीको देनेके लिये विवश किया जा सकता है और राजाको उससे उतना ही दण्ड दिलाया जाय। जो मालधनीकी अनुमति लिये बिना स्वेच्छासे उपनिधिकी वस्तुको भोगता या उससे व्यापार करता है, वह दण्डनीय है। यदि उसने उस वस्तुका उपभोग किया है तो वह सूदसहित उस वस्तुको लौटाये और यदि व्यापारमें लगाकर लाभ उठाया है तो लाभसहित वह वस्तु मालधनीको लौटाये और उतना ही दण्ड राजाको दे। याचित$^२$, अन्वाहित$^३$, न्यास$^४$ और निक्षेप$^५$ आदिमें यह उपनिधि-सम्बन्धी विधान ही लागू होता है॥ २५—२८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'व्यवहारका कथन' नामक दो सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५४॥
दो सौ पचपनवाँ अध्याय
साक्षी, लेखा तथा दिव्यप्रमाणोंके विषयमें विवेचन
'साक्षी-प्रकरण'
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! तपस्वी, कुलीन, दानशील, सत्यवादी, कोमलहृदय, धर्मात्मा, पुत्रयुक्त, धनी, पञ्चयज्ञ आदि वैदिक क्रियाओंसे युक्त अपनी जाति और वर्गके पाँच या तीन साक्षी होने चाहिये। अथवा सभी मनुष्य सबके साक्षी हो सकते हैं; किंतु स्त्री, बालक, वृद्ध, जुआरी, मत्त (शराब आदि पीकर मतवाला), उन्मत्त (भूत या ग्रहके आवेशसे युक्त), अभिशस्त (पातकी), रंगमञ्चपर उतरनेवाला चारण, पाखण्डी, कूटकारी (जालसाज), विकलेन्द्रिय (अंधा, बहरा आदि), पतित, आप्त (मित्र या सगे-सम्बन्धी), अर्थ-
$^१$. जो वस्तु बिना गिनती या स्वरूप बताये सील-मोहर करके धरोहर रखी जाती है, उसे 'उपनिधि' समझे और जो गिनकर, दिखाकर रखी जाती है, उसे 'निक्षेप' माना जाता है। जैसा कि नारदका वचन है—
'असंख्यातमविज्ञातं समुद्रं यन्निधीयते। तज्जानीयादुपनिधिं निक्षेपं गणितं विदुः॥'
$^२$. विवाह आदि उत्सवोंमें मँगनीके तौरपर माँगकर लाये हुए वस्त्र और आभूषण आदिको 'याचित' कहते हैं।
$^३$. एकके हाथमें रखी हुई वस्तुको वहाँसे लेकर दूसरेके हाथमें रखी जाय तो उसे 'अन्वाहित' कहते हैं।
$^४$. घरके मालिकके परोक्षमें ही घरवालोंके हाथमें जो धरोहरकी वस्तु यह कहकर दी जाती है कि गृहस्वामीके आनेपर उन्हें यह वस्तु दे दी जाय तो उसको 'न्यास' कहते हैं।
$^५$. सबके सामने गिनकर, दिखाकर जो वस्तु धरोहर रखी जाती है, उसका नाम 'निक्षेप' है।
- अध्याय २५५ * ४९९
सम्बन्धी (विवादास्पद अर्थसे सम्बन्ध रखनेवाला), सहायक, शत्रु, चोर, साहसी (दुस्साहसपूर्ण कार्य करनेवाला), दृष्टदोष (जिसका पूर्वापर-विरुद्ध बोलनेका स्वभाव देखा गया हो, वह) तथा निर्धूत (भाई-बन्धुओंसे परित्यक्त) आदि साक्षी बनानेयोग्य नहीं हैं। वादी और प्रतिवादी-दोनोंके मान लेनेपर एक भी धर्मवेत्ता पुरुष साक्षी हो सकता है। किसी स्त्रीको बलपूर्वक पकड़ लेना, चोरी करना, किसीको कटुवचन सुनाना या कठोर दण्ड देना तथा हत्या आदि दुःसाहसपूर्ण कार्य करना-इन अपराधोंमें सभी साक्षी बनाये जा सकते हैं॥ १-५॥
जो मनुष्य साक्षी होना स्वीकार करके तीन पक्षके भीतर गवाही नहीं देता है, राजा छियालीसवें दिन उससे सारा ऋण सूदसहित वादीको दिलावे और अपना दशांश भाग भी उससे वसूल करे। जो नराधम जानते हुए भी साक्षी नहीं होता, वह कूटसाक्षी (झूठी गवाही देनेवालों)-के समान दण्ड और पापका भागी होता है। न्यायाधिकारी वादी एवं प्रतिवादीके समीप-स्थित साक्षियोंको यह वचन सुनावे-'पातकियों और महापातकियोंको तथा आग लगानेवालों और स्त्री एवं बालकोंकी हत्या करनेवालोंको जो लोक (नरक) प्राप्त होते हैं, झूठी गवाही देनेवाला मनुष्य उन सभी लोकों (नरकों)-को प्राप्त होता है। तुमने सैकड़ों जन्मोंमें जो कुछ भी पुण्य अर्जित किया है, वह सब उसीको प्राप्त हुआ समझो, जिसे तुम असत्यभाषणसे पराजित करोगे।' साक्षियोंकी बातोंमें द्विविधा (परस्पर विरुद्धभाव) हो तो उनमेंसे बहुसंख्यक साक्षियोंका वचन ग्राह्य होता है। यदि समान संख्यावाले साक्षियोंकी बातोंमें विरोध हो, अर्थात् जहाँ दो एक तरहकी बात कहते हों और दो दूसरे तरहकी बात, वहाँ गुणवानोंकी बातको प्रमाण मानना चाहिये। यदि गुणवानोंकी बातोंमें भी विरोध उपस्थित हो तो उनमें जो सबसे अधिक गुणवान् हो, उसकी बातको विश्वसनीय एवं ग्राह्य माने। साक्षी जिसकी प्रतिज्ञा (दावा)-को सत्य बतायें, वह विजयी होता है। वे जिसके दावेको मिथ्या बतलायें, उसकी पराजय निश्चित है॥ ६-११$\frac{१}{२}$॥
साक्षियोंके साक्ष्य देनेपर भी यदि गुणोंमें इनसे श्रेष्ठ अन्य पुरुष अथवा पूर्वसाक्षियोंसे दुगुने साक्षी उनके साक्ष्यको असत्य बतलावें तो पूर्वसाक्षी कूट (झूठे) माने जाते हैं। उन लोगोंको, जो कि धनका प्रलोभन देकर गवाहोंको झूठी गवाही देनेके लिये तैयार करते हैं तथा जो उनके कहनेसे झूठी गवाही देते हैं, उनको भी पृथक्-पृथक् दण्ड दे। विवादमें पराजित होनेपर जो दण्ड बताया गया है, उससे दूना दण्ड झूठी गवाही दिलानेवाले और देनेवालेसे वसूल करना चाहिये। यदि दण्डका भागी ब्राह्मण हो तो उसे देशसे निकाल देना चाहिये। जो अन्य गवाहोंके साथ गवाही देना स्वीकार करके, उसका अवसर आनेपर रागादि दोषोंसे आक्रान्त हो अपने साक्षीपनको दूसरे साक्षियोंसे अस्वीकार करता है, अर्थात् यह कह देता है कि 'मैं इस मामलेमें साक्षी नहीं हूँ', वह विवादमें पराजय प्राप्त होनेपर जो नियत दण्ड है, उससे आठगुना दण्ड देनेका अधिकारी है। उससे उतना दण्ड वसूल करना चाहिये। परंतु जो ब्राह्मण उतना दण्ड देनेमें असमर्थ हो, उसको देशसे निर्वासित कर देना चाहिये। जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रके वधकी सम्भावना हो, वहाँ (उनके रक्षार्थ ) साक्षी झूठ बोले (कदापि सत्य न कहे। यदि किसी हत्यारेके विरुद्ध गवाही देनी हो तो सत्य ही कहना चाहिये)॥ १२-१५॥
लेखा-प्रकरण
धनी और अधमर्ण (साहु और खदुका)-के बीच जो सुवर्ण आदि द्रव्य परस्पर अपनी ही रुचिसे इस शर्तके साथ कि 'इतने समयमें इतना