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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

चौथा अध्याय १७-प्रातः सवन में अहीन संतति के लिये (अर्थात् वह सोम यज्ञ जिनमें कई दिन लगते हैं और एक दिन और दूसरे दिनों में सिलसिला जारी रखना पड़ता है) जो अगले दिन के स्तोत्रिय को पहले दिन का अनुरूप करते हैं वह उसी प्रकार होता है जैसे एकाह् में (जिस सोम यज्ञ में एक ही दिन लगता है उसे 'एकाह्' कहते हैं)। जैसे 'एकाह्' के सवनों में सिलसिला होता है उसी प्रकार 'अहीन' के दिनों में भी। प्रातः सवन में अगले दिन के स्तोत्रिय को पहले दिन का अनुरूप इसलिये करते हैं कि 'अहीन' के दिनों में सिलसिला हो जाय। इस प्रकार सिलसिला हो जाता है। देवों और ऋषियों ने सोचा कि यज्ञ में सिलसिला क़ायम करें दिनों को समान करके। तब उन्होंने यह समानता सोची कि प्रगाथ एक ही हों, प्रतिपद् एक ही हों और सूक्त एक ही हों। इन्द्र घर का व्यापी सा है। वह यज्ञ में पहले भी चलता है और अगले दिनों में भी। (अर्थात् इन्द्र यज्ञ में सर्वत्र ( ७९ )

३८० [ छठी पञ्चिका विचरता है ) । इस प्रकार यज्ञ के सब दिनों में इन्द्र के विचरने से समानता या सिलसिला हो जाता है । ( १ ) १८—इन संपात सूक्तों का सबसे पहला ऋषि ( दृष्टा ) विश्वामित्र हुआ । विश्वामित्र के देखे हुये उन मंत्रों को वाम- देव ने फैलाया ( असृजत ) । यह सूक्त यह हैं :-- एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्......( ऋ० ४।१६ ) यन्न इन्द्रो जुजुषेयच्च वष्टि......( ऋ० ४ । २२ ) कथा महामवृधत् कस्य होतुः ( ऋ० ४।२३ ) उसने झट उनका पीछा किया ( समपतत् ) और अपने शिष्यों को पढ़ाया । इसलिये उनका संपात सूक्त नाम पड़ गया । ( समपतत् का अर्थ है मंत्रों को देखकर शिष्यों को पढ़ाना ) । विश्वामित्र ने इन संपात सूक्तों को देखा और कहा कि मेरे देखे हुये मंत्रों को वामदेव ने फैला दिया । मैं इन सूक्तों के प्रतिमान के लिये ऐसे ही अन्य सूक्त बना दूँ । इसलिये उसने यह सूक्त प्रतिमान रूप बना दिये :— सद्यो ह जातो वृषभः ( ऋ० ३।४८ ) इन्द्रः पूर्भिदातिरत् ( ऋ० ३।३४ ) इमामु षु प्रभृतिम् ( ऋ० ३।३६ ) इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः ( ऋ० ३।३० ) शासद् वह्नि र्दुहितुः ( ऋ० ३।३१ ) अभितष्टेव दीधया मनीषा ( ऋ० ३।३८ ) दूसरे संपात सूक्त यह हैं :— भरद्वाज का सूक्त—य एक इद्धव्यः ( ऋ० ६।२२ ) वशिष्ठ के दो सूक्त अर्थात् यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम ( ऋ० ७।१९ ) उदु ब्रह्माण्यैरत......( ऋ० ७।२३ ) नोधा का सूक्त :—

ब्राह्मणाच्छंसी पढ़ता है :—

चौथा अध्याय ] ३८१ अस्मा इदु प्रतवसे तुराय... ऋ० १।६१ ) यह लोग ( मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसी और अच्छावाक ) षडह के प्रातःसवन में स्तोत्रियों के पढ़ने के बाद मध्य सवन में अहीन सूक्तों को पढ़ते हैं । यह सूक्त यह हैं :— आसत्यो यातुमथवाँ ऋजीषी...( ऋ० ४।१६ ) क्योंकि मित्रावरुण सत्य वाला है । ब्राह्मणाच्छंसी पढ़ता है :— अस्मा इदु प्र तवसे तुराय...( ऋ० १।६१ ) इस सूक्त में "इन्द्राय ब्रह्मणा राततम" शब्द आये हैं । और "इंद्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्..." इसमें 'ब्रह्म' शब्द आया है । अच्छावाक यह सूक्त पढ़ता है :— शासद् वह्निर्जन यंत वह्निम् । इसमें "वह्नि" ( नेता ) शब्द आया है । इस पर प्रश्न होता है :—कि अच्छावाक "वह्नि" वाले इस सूक्त को दोनों प्रकार के दिनों में क्यों पढ़ता है । 'परांचि' दिनों में भी और 'अभ्यावर्त्ति' दिनों में भी । ( एक सत्र में दो प्रकार के दिन होते हैं । एक तो अकेले दिन जिनको 'परांचि' कहते हैं । दूसरे 'षडह' आदि जो बारबार आते हैं । इनको 'अभ्यावर्त्ति' कहते हैं) । इसका उत्तर यह है कि वह वृ च ऋत्विज वीर्यवान होता है । यह सूक्त 'वह्नि' वाला है । 'वह्नि' वह है जो अगुआ हो ( वहति ) । 'वह्नि' उस घोड़े को भी कहते हैं जो धुरे को खींचता है जिसमें वह जुता होता है । इसलिये अच्छावाक इन सूक्तों को दोनों प्रकार के दिनों में पढ़ता है अर्थात् 'परांचि' दिनों में भी और 'अभ्यावर्त्ति' दिनों में भी ।

ब्राह्मणाच्छंसी तीन संपात सूक्तों को एक करके एक-एक

३८२ [ छठी पञ्चिका यह पाँच दिनों में पढ़े जाते हैं :—चतुर्विंश, अभिजित् , विषुवत्, विश्वजित् और महाव्रत । यह दिन 'अहीन' हैं । क्योंकि इनमें कुछ छूटता नहीं ( न हि एषु किंचन हीयते ) । यह दिन 'परांचि' हैं । अभ्यावर्त्ति नहीं । अर्थात् यह बार बार नहीं आते । इस लिये इन दिनों अहीन सूक्त पढ़े जाते हैं । इनको पढ़ते हुये वह समझते हैं "हम स्वर्ग लोक को पूर्ण रूप से और समृद्धता से प्राप्त होवें" । जब यह इनका पाठ करते हैं तो इंद्र को बुलाते हैं जैसे गाय के पास बैल को बुलाते हैं । यह पाठ सिलसिले को क़ायम रखने के लिये करते हैं । इससे सिलसिला कायम रहता है ॥(२) १९—इसलिये मैत्रावरुण षडह के पहले तीन दिनों में से हर दिन इन तीन संपातों को विपर्यास अर्थात् उल्टे क्रम से पढ़ता है । पहले दिन "एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्", दूसरे दिन "यन्न इन्द्रो जुजुषे यच्च वष्टी", तीसरे दिन "कथा महामवृधत् कस्य होतुः" । ब्राह्मणाच्छंसी तीन संपात सूक्तों को एक करके एक-एक दिन ( दूसरे तीन दिनों में ) विपर्यास अर्थात् उलटे क्रम से पढ़ता है :—पहले दिन, "इन्द्रः पूर्भिदातिरद् दासमर्कैः"; दूसरे दिन, "एक इदद्व्योश्चर्षणीनाम", तीसरे दिन, "यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम" । अच्छावाक तीन संपात सूक्तों को एक एक करके विपर्यास ( उलटे क्रम ) से एक एक दिन पढ़ता है :-- पहले दिन, "इमामूषु प्रभृति सातयेधा"; दूसरे दिन "इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः"; तीसरे दिन, "शासद् वह्नि- र्दुहितुर्नप्त्यंगात्" । यह नौ और तीन सूक्त जो प्रतिदिन पढ़े जाते हैं बारह हो जाते हैं । बारह मासों का संवत्सर होता है । संवत्सर प्रजा-

ब्राह्मणाच्छंसी इसको :—"वने न वा यो न्यधायि चाकन्"

चौथा अध्याय ] ३८३ पति है। प्रजापति यज्ञ है। इस प्रकार संवत्सर प्रजापति यज्ञ को प्राप्त होते हैं और हर दिन के कृत्य को संवत्सर प्रजापति यज्ञ में प्रतिष्ठित कर देते हैं। इन सूक्तों के बीच-बीच में 'विमद' ऋषि के विराज मंत्रों को चौथे दिन बिना 'न्यूङ्ख' के पढ़ना चाहिये। पंक्ति मंत्रों को पाँचवें दिन, परुच्छेप मंत्रों को छठे दिन। जो दिन महास्तोम के हों उनमें मैत्रावरुण इस मंत्र को पढ़े :—को अद्य नर्यो देवकामः ( ४।२५।१ ) ब्राह्मणाच्छंसी इसको :—"वने न वा यो न्यधायि चाकन्" ( १०।२९।१ ) अच्छावाक इस मंत्र को :—"आ याह्यर्वाङ् उप बंधुरेष्ठा" ( ३।४३।१ ) यह आवपन मंत्र हैं। इन्हीं 'आवपन' मंत्रों से देवों और ऋषियों ने स्वर्गलोक को जीता और इन्हीं के द्वारा यजमान स्वर्गलोक को प्राप्त करता है (३)। २०—उन अहीन सूक्तों के पहले हर दिन मैत्रावरुण इस सूक्त का पाठ करता है :— "सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः" ( ऋ० ३।४८ ) यह सूक्त स्वर्ग से संबंध रखता है। इसी से देवों ने स्वर्ग जीता। इसी से ऋषियों ने। इसी से यजमान भी स्वर्ग जीत सकते हैं। यह विश्वामित्र का सूक्त है। क्योंकि विश्वामित्र सब का मित्र था। इसलिये जो इस रहस्य को समझता है उसके सभी मित्र हो जाते हैं अगर मैत्रावरुण इसको समझकर अहीन सूक्तों से पूर्व रोज़ इसका पाठ करता है। इसमें 'वृषभ' और पशुमत्' शब्द आये हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये।

ब्राह्मणाच्छंसी प्रति दिन इस ब्रह्मासूक्त को पढ़ता है :-

३८४ [ छठी पञ्चिका इसमें पाँच ऋचायें हैं। पंक्ति में पाँच पद होते हैं, पंक्ति अन्न हैं। अन्न की प्राप्ति के लिये। ब्राह्मणाच्छंसी प्रति दिन इस ब्रह्मासूक्त को पढ़ता है :- उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्य (७।२३) इसमें 'ब्रह्मन्' शब्द आने से रूप समृद्धता प्राप्त होती है। यह स्वर्ग का सूक्त है। इससे देवों ने स्वर्ग जीता, ऋषियों ने स्वर्ग जीता और यजमान भी स्वर्ग जीत सकते हैं। यह वशिष्ठ का सूक्त है। इससे वशिष्ठ इन्द्र के प्रिय धाम को गया। और परम लोक को जीता। जो इस रहस्य को समझता है वह इन्द्र के प्रिय धाम को पाता है और परम लोक को जीतता है। इसमें छः ऋचायें हैं। छः ऋतुयें हैं। ऋतुओं की प्राप्ति के लिये। संपात सूक्तों के पीछे इनका पाठ करता है। इस प्रकार यजमान स्वर्ग लोक में जाने के लिए इस लोक में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। अच्छावाक हर रोज़ यह सूक्त पढ़ता है :- अभि तष्टेव दीधया मनीषाम्... (ऋ० ३.३८ ) इसमें 'अभि' शब्द है। इसलिये यह इस लोक और परलोक के सिलसिले के लिये उपयुक्त है। इस सूक्त में "अभिप्रयाणि मर्मृशत् पराणि" शब्द आये हैं। इससे तात्पर्य है कि जो परलोक में आने वाले दिन हैं वह प्रिय हैं। इन्हीं को वह प्राप्त करता है। 'पर' का अर्थ है स्वर्गलोक जो इस लोक से परे हैं। "कवींऽरिच्छामि संदृशे सुमेधा" इन शब्दों से तात्पर्य है उन ऋषियों से जो गुज़र चुके। वे कवि हैं। इन्हीं के विषय में यह मंत्र है। यह विश्वामित्र का है। विश्वामित्र सब का मित्र था। जो इस रहस्य को समझता है उसके सभी मित्र हो जाते हैं!

चौथा अध्याय ] ३८५ वह अब प्रजापति के अनिरुक्त सूक्त को पढ़ता है (अर्थात् इसमें प्रजापति का स्पष्ट नाम नहीं)। प्रजापति अनिरुक्त है। प्रजापति की प्राप्ति के लिये। इसमें एक बार 'इन्द्र' आया है। वह इसलिये कि यज्ञ का इन्द्र-पन न चला जाय। इसमें दस ऋचायें हैं। विराट् में १० अक्षर होते हैं। विराट् अन्न हैं। अन्न की प्राप्ति के लिये। दस ऋचाओं के विषय में यह भी है कि प्राण दस हैं। इससे यजमान प्राणों को प्राप्त करता है और प्राणों को आत्मा में धारण करता है। अच्छावाक संपात सूक्तों के बाद इस सूक्त को इसलिये पढ़ता है कि यजमानों के लिये स्वर्ग की प्राप्ति हो जाय जब यजमान इसी लोक में प्रतिष्ठित हैं। (४) २१—प्रतिदिन के आरम्भ के प्रगाथ "कद्वत्" मन्त्र हैं। (जिन मंत्रों में प्रश्नवाचक 'कः' या उसका कोई रूप आता है उनको "कद्वत्" मंत्र कहते हैं)। वह यह हैं :— कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति। श्रद्धा इत्ते मघवन् पार्ये दिवि वाजी वाजं सिषासति ॥ मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु । तव प्रणीती ह्य॑श्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता ॥ ( ऋ० ७।३२।१४-१५ ) कश्चव्यो अतसीनां तुरो गृणीत मर्त्यः। नही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गन्त आनशुः ॥ कदु स्तुवन्त ऋतयन्त देवत ऋषिः को विप्र ओहते। कदा हवं मघवन्निन्द्र सुन्वतः कदु स्तुवत आ गमः ॥ ( ऋ० ८।३३।१३-१४ ) कदू न्वस्याकृतमिन्द्रस्यास्ति पौंस्यम्। केनो नु कं श्रोमतेन न शुश्रुवे जनुषः परि वृत्रहा ॥ कदू महीरधृष्टा अस्य तविषीः कदु वृत्रघ्नो अस्तृतम्। इन्द्रो विश्वान् वेकनाटाँ अहर्दृश उत क्रत्वा पर्णीँ रभि ॥ ( ऋ० ८।६६।९-१० ) २५

३८६ [ छठी पञ्चिका 'कः' नाम है प्रजापति का। यह 'कद्वन्त' मंत्र प्रजापति की प्राप्ति के लिये हैं। 'कं' नाम है अन्न का। यह 'कद्वन्त' अन्न की प्राप्ति के लिये हैं। ये यजमान प्रतिदिन शांत अहीन सूक्तों से जुड़े रहते हैं। उनको 'कद्वत्' प्रगाथों के द्वारा शांत करते हैं। इस प्रकार यह अहीन सूक्त शांत हो जाते हैं और शांत होकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अहीन सूक्तों का आरम्भ त्रिष्टुभ् से करना चाहिये। कुछ लोग प्रगाथों से पहले इन (त्रिष्टुभों) को पढ़ते हैं और इनको 'धाय्या' कहते हैं। ऐसा नहीं करना चाहिये। होता राजा (शासक) है और होत्रक लोग प्रजा (रय्यत) हैं। (धाय्या को होता ही पढ़ता है। यदि होत्रक भी पढ़ने लगेंगे तो इसका अर्थ यह होगा कि) प्रजा ने राजा का विरोध किया। और यह पाप है। उसको जानना चाहिये कि ये त्रिष्टुभ् मेरे 'प्रतिपद' हैं। जिनसे समुद्र को तरते हैं। ('प्रतिपद' में यहाँ श्लेष है। प्रतिपद का अर्थ है आरम्भ और प्रतिपद का अर्थ है नाव का पतवार) जो द्वादशाह या संवत्सर यज्ञ करते हैं वह समुद्र पर तैरने वालों के समान हैं। जैसे समुद्र के उस पार पहुँचने के लिए जहाज पर सब सामान इकट्ठा करके तब बैठते हैं। इसी प्रकार यजमानों को त्रिष्टुभों से आरम्भ करना चाहिये। यह वीर्यवान् छन्द यजमान को स्वर्ग में ले जाकर फिर लौटाता नहीं। लेकिन इनमें 'आहाव' (शोंसावोम्) नहीं कहना चाहिये। छन्द समान गति से चलना चाहिये। होता को सोचना चाहिये कि मैं धाय्या न पढूँगा। जब इन सूक्तों को पढ़ें। प्रसिद्ध सूक्तों के आरम्भ से सूक्तों का समारोह करना चाहिये। (अर्थात् सूक्तों को त्रिष्टुभ् से शुरू

ब्राह्मणाच्छंसी प्रतिदिन यह मंत्र पढ़ता है :—

चौथा अध्याय ] ३८७ करना चाहिये ) । इन मंत्रों को पढ़ कर इन्द्र को बुलाता है जैसे गाय के पास बैल को। यह पाठ यज्ञ के सिलसिले को कायम रखने के लिये है। इससे सिलसिला कायम रहता है। (५) २२—मैत्रावरुण सूक्तों से पहले हर दिन यह मंत्र बोलता है :— अप प्राच इन्द्र विश्वाँ अमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व । अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन् मदेम ॥ ( ऋ० १०।१३१।१ ) “हे इन्द्र सब अमित्रों को दूर कर दो। हे विजयी, उनको भगा दो। चाहे वे दक्षिण में हों या उत्तर में। जिससे कि हम तेरी विस्तृत शरण से लाभ उठा सकें।” इसमें अभय की बात है। वह अभय चाहता है। ब्राह्मणाच्छंसी प्रतिदिन यह मंत्र पढ़ता है :— ब्रह्मणा ते ब्रह्मयुजा युनज्मि...( ऋ० ३।३५।४ ) 'युनज्मि' में 'जोड़' का भाव है। 'अहीन यज्ञों का यही रूप है। अच्छावाक प्रतिदिन यह मंत्र पढ़ता है :— उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्...( ऋ० ६।४७।८ ) 'अनु' अहीन यज्ञों का रूप है। और 'नेषि' सत्र का रूप है। इन मंत्रों को रोज पढ़े। अन्त के मंत्र एक से हैं। इन्द्र यजमान के घर में व्यापक है। वह यज्ञ में है। जैसे बैल गाय के पास जाता है और गाय प्रसिद्ध गोशाला में जाती है। इसी प्रकार इन्द्र यज्ञ में जाता है। अहीन यज्ञ को “शुनं हुवेम” ( ऋ० ३।३०।२२ ) से समाप्त न करें। क्योंकि जो क्षत्रिय उसको अपने राज्य में आने देता

३८८ [छठी पञ्चिका है जो उसका शत्रु हो चुका है तो उसका राष्ट्र क्षीण हो जाता है। (६) २३—अहीन 'यज्ञ की युक्ति भी है और विमुक्ति भी। ( जोड़ना और अलग करना )। अहीन इन ब्राह्मणाच्छंसीय मंत्रों से युक्त होता है ;— व्यंतरिक्षमतिरद्...( ऋ० ८।१४।७-६ ) और इन मंत्रों से विमुक्त होता है:— एवेदिंद्रम्...( ऋ० ७।२३।६ ) अच्छावाक् के इस मंत्र से युक्त होता है :— आहं सरस्वती वतोः...( ऋ० ८।३८।१० ) इस मंत्र से विमुक्त होता है :— नूनं सा ते...( ऋ० २।११।२१ ) मैत्रावरुण इस मंत्र से जोड़ता है :— ते स्याम देववरुण...( ऋ० ७।६६।६ ) और इससे विमुक्त करता है :— नू ष्टुत... ऋ० ४।१६।२१ ) जो अहीनों को युक्त करना और विमुक्त करना जानता है। वह अहीन यज्ञ के सिलसिले को कायम रख सकता है। चौबीसवें दिन जोड़ते हैं वह युक्ति है और अन्तिम अति- रात्र के दिन अलग करते हैं यह विमुक्ति है। अगर एकाह के मंत्रों से समाप्त करते हैं तो अहीन यज्ञ का कृत्य नहीं हो सकता। अगर अहीन का कृत्य करके समाप्त करते हैं तो जैसे थके बैल को अलग कर देते हैं, ऐसे ही यज- मान भी यज्ञ से अलग हो जाता है। इसलिये एकाह और अहीन कृत्यों से समाप्त करना चाहिये जैसे दूर की यात्रा करने वाले मंजिल पर बैल बदल देते हैं। इस प्रकार यज्ञ सिलसिलेवार हो जाता है और यजमान विश्राम ले लेते हैं।

चौथा अध्याय ] ३८९ दोनों सवनों में स्तोमों में नियत मंत्रों से एक या दो से अधिक न बोले। अधिक बोलने से बड़े वन के समान हो जाता है, तीसरे सवन में अपरिमित बोले क्योंकि स्वर्ग अपरिमित है। स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये। जो इस रहस्य को समझता है उसका अहीन यज्ञ आरंभ होकर विना विघ्न के समाप्त होता है। (७) २४—देवों ने वल ( कन्दरा ) में गायों को देखा। उन्होंने यज्ञ के द्वारा उनको लेना चाहा। छठे दिन के द्वारा उन्होंने इनको पा लिया। पहले सवन में नभाक ( खोदने का कुदाल ) द्वारा वल खोदा। फिर जब छिद्र हो गया तो पत्थरों को हटाया और तीसरे सवन में वालखिल्य मंत्रों रूपी वज्र द्वारा 'वाचः कूट' नामी एक पद से वल को तोड़ लिया और गायों को निकाल लिया। इस प्रकार यजमान प्रातः सवन में नभाक द्वारा वल को तोड़ते हैं और उसके पत्थरों को ढीला कर लेते हैं। इसी लिये होत्रक लोग प्रातः सवन में नाभाक तृचों को पढ़ते हैं। मैत्रा- वरुण “यः ककुभो निधारयः” ( ८।४१।४-६ ) को, ब्राह्मणाच्छंसी “पूर्वीष्ट इंद्रोपमातयः” ( ८।४०।६-११ ) को अच्छावाक “ताहि मध्यं भराणा” ( ८।४०।३-५ ) को। तीसरे सवन में वालखिल्य वज्र से और “वाचः कूट” एक पद द्वारा वल को खोद कर गायों को पालते हैं। वालखिल्य सूक्त छः हैं। उनको तीन बारी में पढ़ते हैं। पहले यह पद करके, फिर आधी आधी ऋचा करके, फिर ऋचा वार । जब पद पद करके पढ़ता है तो हर प्रगाथ में एक पद रखे। इस प्रकार के एक पद पाँच हैं। चार दशाह से लिये हैं और एक महाव्रत से ।

३९० [ छठी पञ्चिका महानामन पदों से आठ अक्षरों को जब जब आवश्यकता हो पूरा कर लें। इतरों की परवाह नहीं। जब आधे आधे मंत्र पढ़ें तो उन पाँच एकपदों को पढ़ें। और महानाम्नी से आठ अक्षर पूरा कर लें। जब ऋचावार बालखिल्यों को पढ़ें तो उन पाँच एकपदों को पढ़ें और महानाम्नी मंत्रों से आठ अक्षर लेकर पूरा कर लें। जब छः बालखिल्यों को पहली बार पढ़ता है तो प्राण और वाणी का विहार कर देता है। जब दूसरी बार पढ़ता है तो आँख और मन को मिला देता है। जब तीसरी बार पढ़ता है तो कानों और आत्मा को मिला देता है। इस प्रकार विहार का सब काम समाप्त हो जाता है । और बालखिल्य रूपी वज्र, तथा एक पद वाचःकूट और प्राणों का निर्माण इन सब के सम्बन्ध का कार्य्य समाप्त हो जाता है। बालखिल्य प्रगाथों को बिना विहार के (बिना दो सूक्तों को मिलाये हुये चौथी बार पढ़ता है। प्रगाथ पशु हैं। पशुओं की प्राप्ति के लिये। यहाँ बीच में एक पद नहीं मिलाना चाहिये। अगर बीच में एक पद मिलायेगा तो 'वाचः कूट' के द्वारा यजमान को पशुओं से अलग कर देगा उनको मारकर। यदि किसी होत्रक को ऐसा करते देखे तो उससे कहे कि तुम ने यजमान से पशुओं को मार कर अलग कर दिया। तुमने उसको पशुओं से वंचित कर दिया। ऐसा हो ही जाता है। इसलिये ऐसे अवसर पर एकपाद को मिलाना नहीं चाहिये। बालखिल्य के पिछले दो सूक्तों (७वां, ८वां) को पर्यास के तौर पर जोड़ता है (मानों किसी बर्तन पर ढक्कन रख दिया) इन दोनों को मिला देता है। वत्स के पुत्र सर्पि ने सुबल नामी

ब्राह्मण कही जा चुकी (४।२०)। जिसको पशु की कामना हो

चौथा अध्याय ] ३९१ यजमान के लिये इनको इसी प्रकार पढ़ा था। उसने कहा था, 'मैंने यजमान के लिये बहुत पशु पकड़ लिये। बहुत अच्छे मुझे मिलेंगे।' उसने उसको इतनी ही दक्षिणा दी जितनी बड़े २ ऋत्विजों को दी गई। इस शस्त्र से पशु और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसलिये इसका पाठ किया जाता है ।(८) २५-अब दुरोहण का पाठ करता है। इसके लिये एक ब्राह्मण कही जा चुकी (४।२०)। जिसको पशु की कामना हो वह इन्द्र का सूक्त पढ़े। क्योंकि पशु इन्द्र के हैं। यह जगती छन्द में हो, क्योंकि पशु जागत (चलने वाले) हैं। यह महा- सूक्त होना चाहिये जिससे यजमान को बहुत से पशु मिल जायें। वरु ऋषि का सूक्त पढ़े (१०।९६ प्रतेमहे)। यह महा सूक्त भी है और जगती छन्द में भी है। प्रतिष्ठा की कामना हो तो इन्द्र वरुण का सूक्त पढ़े। क्योंकि यह होत्र उसी देवता का है। यह इन्द्र वरुण की प्रतिष्ठा है। यह जो इन्द्र-वरुण का याज्य है वह उसी अपनी ही प्रतिष्ठा में स्थित है। यह इन्द्र-वरुण का सूक्त निविद् के समान है इससे कामनायें पूरी हो जाती हैं। जब इन्द्र-वरुण का सूक्त दुरोहण के लिये चुने तो सुपर्ण ऋषि का चुने (८।३९ इमानि वां भागधेयानि...)। इससे इन्द्र-वरुण तथा सुपर्ण सम्बन्धी कामना एक साथ पूरी हो सकती है ।(९) २६-प्रश्न होता है कि दुरोहण के साथ छठे दिन के अहीन सूक्त पढ़े या न पढ़े ? इसका उत्तर यह है कि अवश्य पढ़े। जब और दिन पढ़ता है तो आज क्यों न पढ़े ! कुछ लोग कहते हैं कि न पढ़े। छठा दिन स्वर्ग लोक है। स्वर्ग लोक असमायी है अर्थात् सब इस को प्राप्त नहीं कर सकते (inaccessible)। स्वर्ग लोक में कोई विरला ही पहुँचता है। अगर दुरोहण के साथ में और सूक्त भी पढ़े

३९२ [छठी पञ्चिका जायँगे तो सभी बराबर हो जायँगे । स्वर्ग लोक की विशेषता यह है कि दुरोहण के साथ अन्य सूक्त न पढ़े जायँ । इस लिये न पढ़े।' इसीलिये नहीं पढ़ता । स्तोत्रिय आत्मा हैं और वालखिल्य प्राण हैं । जब अहीन सूक्तों का दुरोहण के साथ पाठ करता है तो इन दो देवतों के द्वारा यजमान के प्राण ले लेता है। जब किसी होत्रक को ऐसा करते देखे तो कहे कि तू ने इन दो देवताओं के द्वारा यजमान के प्राण ले लिये । और वह मर जायगा । सदा ऐसा ही होता है । इस लिये न पढ़े । अगर मैत्रावरुण सोचे कि मैंने वालखिल्य का पाठ कर लिया, अब मैं दुरोहण के पूर्व एकाह सूक्त पढूँ, उसे ऐसा न करना चाहिये। लेकिन अगर घमंड में आकर कहे कि दुरोहण के पीछे बहुत सैकड़ों सूक्त पढ लूँ गा तो इस कामना की पूर्ति के लिये पढ़ ले। परन्तु न पढ़ना अच्छा है। वालखिल्य इन्द्र के हैं। उनमें बारह अक्षरों के पद होते हैं। और जगती छन्द के इन्द्र के सूक्त से जो कामना पूरी हो सकती है वह इनसे भी पूरी हो सकती है । न पढने के लिये एक हेतु यह है कि यह इन्द्र-वरुण के सूक्त हैं। और इन्द्र-वरुण के याज्य से ही यज्ञ की समाप्ति होती हैं। कहते हैं कि जैसा स्तोत्र हो वैसा शस्त्र हो । प्रश्न यह है कि क्या विहार युक्त (मिले हुये) वालखिल्यों की गणना ऐसे स्तोत्रों में है या बिना मिले हुये (अविहृत) की ? इसका उत्तर है कि विहृत सूक्तों की है । बारह अक्षरों का पद आठ अक्षरों के पद से मिल जाता है । कहते हैं कि जैसा याज्य हो वैसा शस्त्र हो । अगर शस्त्र में तीन देवता हों अर्थात् अग्नि, इन्द्र और वरुण तो केवल इन्द्र-

चौथा अध्याय ] ३९३ वरुण का याज्य कैसे पढ़े, अग्नि को कैसे छोड़ दे ? इसका उत्तर यह है कि अग्नि और वरुण तो एक ही हैं। ऋषि भी यही कहता है :— त्वमग्ने वरुणो जायसे ( ५।३।१ ) इसलिये इन्द्र और वरुण के याज्य में अग्नि छूटता नहीं । (१०) ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ ।

पाँचवाँ अध्याय २७—शिल्पसूक्तों को पढ़ते हैं। देव-शिल्प बहुत से हैं। और यह जो मानवी शिल्प है वह देव-शिल्पों की अनुकृति है। हाथी की सुनहरी झूलें और घोड़ों के रथ यह सब शिल्प हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह शिल्प को जान सकता है। शिल्पों से आत्मा का संस्कार होता है और आत्मा छन्दोमय हो जाती है। होत्रक इनसे यजमान की आत्मा का संस्कार कर देता है। नाभानेदिष्ठ को पढ़ता है। नाभानेदिष्ठ वीर्य है। इस प्रकार वह वीर्य को सींचता है। यह अनिरुक्त पढ़ा जाता है (अर्थात् नाभानेदिष्ठ का मंत्र में नाम नहीं होता) क्योंकि वीर्य का नाम नहीं लेते। उसे गुप्त रीति से योनि में डाल देते हैं। वह वीर्य मिश्रित हो जाता है। (जब प्रजापति ने पुत्रों के साथ समागम किया) तब वह वीर्य जमीन पर गिर गया। सन्तानोत्पत्ति के लिये। (ऋ० १०।६१।६) अब नराशंस को पढ़ता है। 'नर' का अर्थ है 'प्रजा', 'शंस' ( ३९४ )

पाँचवाँ अध्याय ] ३९५ का अर्थ है 'वाक्' । इस प्रकार सन्तान में वाणी को रखता है । इस प्रकार बोलने वाली सन्तान उत्पन्न होती है । कुछ लोग नाराशंस को नाभानेदिष्ठ से पहले बोलते हैं क्योंकि जबान आगे है। कुछ पीछे क्योंकि जबान पिछले भाग में है। मध्य में बोले क्योंकि वाणी मध्य में है। चूँकि वाणी नाभानेदिष्ठ के अगले भाग के निकटतम है अतः नाराशंस को नाभानेदिष्ठ के समाप्त होने से पहले पढ़ना चाहिये । होता यजमान को वीर्य के रूप में मैत्रावरुण को दे देता है। यह कहकर "तू इसका प्राण बना” । (१) २८—अब वह वालखिल्य पढ़ता है। वालखिल्य प्राण हैं। इस प्रकार वह यजमान के प्राण बनाता है। वह वालखिल्य को विहृत दशा में पढ़ता है (अर्थात् एक मन्त्र के एक भाग से मिलाकर)। क्योंकि यह प्राण मिले हुये हैं, प्राण अपान से और अपान व्यान से । पहले दो सूक्तों में पद-वार मिलाता है। दूसरे दो में आधी आधी ऋचा करके। और तीसरे दो में मंत्र-वार । पहले सूक्त में जो मिलाता है सो प्राण और वाणी को मिलाता है। दूसरे में चक्षु और मन को । तीसरे में कान और आत्मा को । कुछ लोग वालखिल्य पढ़ते हुये दो बृहती और दो सतो- बृहती को मिलाते हैं। इससे इच्छा तो पूरी हो जाती है परन्तु प्रगाथ नहीं बनते । एक पद अधिक मिला कर पढ़े तो प्रगाथ बन जाते हैं। वालखिल्य प्रगाथ हैं। इस लिये एक पद मिला कर पढ़े । बृहती आत्मा है और सतोबृहती प्राण । बृहती के पढ़ने से आत्मा बनता है और सतोबृहती से प्राण । इस प्रकार बृहती और सतोबृहती के पढ़ने से आत्मा को प्राणों से युक्त करता

ब्राह्मणाच्छंसी के हवाले कर देता है। यह कहकर कि "तू उत्पन्न

३९६ ।[ छठी पञ्चिका है। वालखिल्यों को पद बढ़ा कर ऐसे पढ़े कि प्रगाथ बन जायें। बृहती आत्मा है और सतोबृहती पशु। बृहती पढ़ने से आत्मा बनता है और सतोबृहती पढ़ने से पशु बनते हैं। दोनों के पढ़ने से आत्मा को पशुओं से युक्त कर देता है। इसलिये पद बढ़ाकर पढ़े। पिछले दो सूक्त क्रम बदल कर पढ़े जाते हैं। यह उनका विहार है। मैत्रावरुण इस प्रकार यजमान के प्राण बनाकर उसको ब्राह्मणाच्छंसी के हवाले कर देता है। यह कहकर कि "तू उत्पन्न कर'। (२) २९-अब ब्राह्मणाच्छंसी 'सुकीर्ति' सूक्त (ऋ० १०।१३१) को पढ़ता है। सुकीर्ति देवयोनि है। इस प्रकार यज्ञ रूपी देव योनि से यजमान को उत्पन्न करता है। अब वृषाकपि सूक्त (ऋ० १०।८६) को पढ़ता है। वृषा- कपि आत्मा है। इस प्रकार यजमान के आत्मा को बनाता है। उसको वह न्यूंख के साथ पढ़ता है। न्यूंख अन्न है। इस प्रकार वह उसे उत्पन्न होने पर अन्न से युक्त करता है जैसे माँ बच्चे को दुग्धपान कराती है। यह सूक्त पंक्ति छन्द में है। पुरुष के पाँच भाग हैं—लोम, त्वचा, माँस, अस्थि, मज्जा। वह जैसे पुरुष बनता है उसी प्रकार यजमान को बनाता है। ब्राह्मणाच्छंसी उसको पैदा करके अच्छावाक को दे देता है, यह कह कर, "इसके लिये प्रतिष्ठा को बना"। (३) ३०—'एवायामरुत' सूक्त को अच्छावाक पढ़ता है, 'एव- यामरुत' प्रतिष्ठा है। इससे यजमान के लिये प्रतिष्ठा का संपादन करता है। इसको न्यूंख से पढ़ता है। न्यूंख अन्न है। इससे यजमान को अन्न युक्त करता है। इस सूक्त का छन्द

पाँचवाँ अध्याय ] ३९७ जगती और अतिजंगती है । यह जो कुछ संसार में हैं वह या तो जगत् ( जंगम ) है या अति जगत् ( या स्थावर ) । यह सूक्त मरुत का है । मरुत जल हैं । जल अन्न हैं जो भरे जाने चाहियें । इस प्रकार वह यजमान को अन्न से युक्त करता है । यह जो नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि और एवयामरुत सूक्त हैं यह सहचर कहलाते हैं । उनको दूसरों के साथ साथ पढ़े । अगर दूसरों के साथ न पढ़ना चाहे तो न पढ़े । इनको अलग पढ़ना ऐसा ही है जैसे किसी पुरुष को उसके वीर्य से अलग करना । इस लिये या तो इनको दूसरे सूक्तों के साथ पढ़े या न पढ़े । अश्व के पुत्र अश्वतर के पुत्र बुलिल ने विश्वजित यज्ञ में होता बनते हुये इन शिल्पों के विषय में ऐसा विचार किया था :- “संवत्सर के विश्वजित् यज्ञ में मध्यसवन में दो शस्त्र ( मैत्रावरुण और ब्राह्मणाच्छंसी ) बढ़ाने के बाद मैं 'एवया- मरुत' सूक्त पढूँगा ।” उसने ऐसा ही किया । जब वह पढ़ रहा था तो गौशल आया । और कहने लगा “होता, यह तेरा शस्त्र बिना पहियों के जैसा क्यों घसिट रहा है ? यह दशा कैसे हो गई ? एवयामरुत तो उत्तर की ओर पढ़ा जाता है” । फिर उसने कहा, 'मध्य सवन इंद्र का है । तू इन्द्र को इसमें से क्यों निकालना चाहता है ?” उसने उत्तर दिया, “मैं इंद्र को इससे निकालना नहीं चाहता” । उसने कहा, “तुम चाहते हो । क्योंकि यह जगती और अतिजगती छन्द मध्यसवन का नहीं हैं। यह सूक्त मरुतों का है । इसलिये यहाँ इसका पाठ नहीं होना चाहिये ।” उसने कहा, “अच्छावाक, ठहर जाओ । मैं इनके अनुशासन को पूरा करूँ गा” । गौशल ने कहा, “इंद्र का सूक्त पढ़ो जिसमें विष्णु की छाप पड़ी हो” । इसलिये हे होता, अपने शस्त्र में से 'एवयामरुत' छोड़ दो जो रुद्र

३९८ [ छठी पञ्चिका धाय्या के पहले और मरुत शस्त्र के पीछे पढ़ा गया। उसने ऐसा ही किया और अब भी ऐसा ही करते हैं। (४) ३१—इस पर एक शंका होती है। बालखिल्य प्राण हैं और नाभानेदिष्ट वीर्य। वीर्य प्राणों से पहले होता है। जब विश्वजित, अतिरात्र और षडह के छठे दिन मैत्रावरुण बालखिल्य को पढ़ता है जो प्राण का रूप है तो नाभानेदिष्ट को क्यों नहीं पढ़ता जो वीर्य का रूप है ? इसी प्रकार ब्राह्मणाच्छंसी वृषा- कपि को क्यों पढ़ता है जब नाभानेदिष्ट नहीं पढ़ा जाता। वृषा- कपि आत्मा है। नाभानेदिष्ट वीर्य है। आत्मा अर्थात् शरीर से वीर्य पहले होता है। यज्ञ से ही यजमान का संस्कार करते हैं। जिस प्रकार योनि में गर्भ बनता है। वह एक ही दिन में नहीं बन जाता। एक एक अंग बनता है। जब पूरा बन जाय तभी कहते हैं कि बन गया इसी प्रकार यज्ञ के पूरी तरह से बनने पर यजमान भी बन जाता है। होता तीसरे सवन में 'एवयामरुत' पढ़ता है। यही यजमान की प्रतिष्ठा है जिसको वह अन्त में रखता है। (५) ३२—षडह के छठे दिन छन्दों का रस बहने लगा। प्रजापति डरा कि कहीं यह छन्दों का रस बाहर न निकल जाय और लोकों में फैल जाय। इसीलिये उसने दूसरे स्थान पर छन्द रखकर उसको दबा दिया। नाराशंसी से गायत्री का रस दबाया। रैभि से त्रिष्टुभ् का। पारिक्षिति से जगती का, कारव्य से अनुष्टुभ् का। इस प्रकार उसने छन्दों को फिर रसयुक्त कर दिया। जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ रसवाले छन्दों से पूरा होता है। और वह यज्ञ को रस युक्त छन्दों से पूरा करता है। अब नाराशंसी को पढ़ता है। नर का अर्थ है सन्तान और शंस का अर्थ है वाक्। इस प्रकार वह संतान में वाणी की