ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
तृतीय अध्याय
तृतीय अध्याय ❧☙ प्रथम खण्ड आत्मसम्बन्धी प्रश्न ब्रह्मविद्यासाधनकृतसर्वात्म- | श्रुतिद्वारा वामदेव आदि भावफलावाप्तिं वामदेवाद्याचार्य- | आचार्योंकी परम्परासे प्रकाशित परम्परया श्रुत्यावद्योत्यमानां ब्रह्म- | तथा ब्रह्मवेत्ताओंकी सभामें अत्यन्त वित्परिषदत्यन्तप्रसिद्धामुपलभ- | प्रसिद्ध, ब्रह्मविद्यारूप साधनके माना मुमुक्षवो ब्राह्मणा अधुनातना | किये हुए सर्वात्मभावरूप फलकी ब्रह्मजिज्ञासवोऽनित्यात्साध्यसा- | प्राप्तिको उपलब्ध करनेवाले आधुनिक धनलक्षणात्संसारादाजीवभावाद्व्या- | मुमुक्षु और ब्रह्मजिज्ञासु ब्राह्मणलोग विवृत्सवो विचारयन्तो- | जीवभावपर्यन्त साध्य-साधनरूप ऽन्योन्यं पृच्छन्ति कोऽयमात्मेति ? | अनित्य संसारसे निवृत्त होनेकी कथम्— | इच्छासे परस्पर विचार करते हुए | पूछते हैं—यह आत्मा कौन है ? | किस प्रकार [पूछते हैं ? सो बतलाया | जाता है ]— कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥ १ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
हम जिसकी उपासना करते हैं वह यह आत्मा कौन है ? जिससे [ प्राणी ] देखता है, जिससे सुनता है, जिससे गन्धोंको सूंघता है, जिससे वाणीका विश्लेषण करता है, और जिससे स्वादु-अस्वादुका ज्ञान प्राप्त करता है वह [ श्रुतिकथित दो आत्माओंमेंसे ] कौन-सा आत्मा है ? ॥ १ ॥
यमात्मानमयमात्मेति साक्षा- | हम जिस आत्माकी 'यह आत्मा द्द्वयमुपास्महे कः स आत्मेति यं | है' इस प्रकार साक्षात् उपासना चात्मानमयमात्मेति साक्षादुपा- | करते हैं वह आत्मा कौन है ? तथा सीनो वामदेवोऽमृतः समभवत्त- | जिस आत्माकी 'यह आत्मा है' इस मेव वयमप्युपास्महे को नु खलु | प्रकार साक्षात् उपासना करनेवाला | वामदेव अमर हो गया था उसी स आत्मेति । | आत्माकी हम उपासना करते हैं । | किन्तु वस्तुतः वह आत्मा है कौन-सा? एवं जिज्ञासापूर्वमन्योन्यं पृ- | इस प्रकार जिज्ञासापूर्वक एक- च्छतामतिक्रान्तविशेषविषयश्रुति- | दूसरेसे प्रश्न करते हुए उन्हें आत्म- | सम्बन्धी विशेष विवरणसे युक्त संस्कारजनिता स्मृतिरजायत । | पूर्वोक्त श्रुतिके संस्कारसे यह स्मृति 'तं प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं | पैदा हुई—'इस पुरुषमें ब्रह्म पादाग्र- पुरुषम्' 'स एतमेव सीमानं | भागद्वारा प्रविष्ट हुआ' तथा इसी विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत' | पुरुषमें 'वह इस सीमाको ही | विदीर्णकर इसके द्वारा प्राप्त हुआ।' एतमेव पुरुषम् । अत्र द्वे ब्रह्मणी | इस प्रकार यहाँ एक-दूसरेसे प्रतिकूल इतरेतरप्रातिकूल्येन प्रतिपन्ने | दो ब्रह्म ज्ञात होते हैं और वे इति । ते चास्य पिण्डस्यात्मभूते । | इस पिण्डके आत्मस्वरूप हैं। इनमेंसे तयोरन्यतर आत्मोपास्यो भवि- | कोई एक ही आत्मा उपासनीय हो
८४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३
८४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३ तुमर्हति । योज्ञोपास्यः कः स | सकता है । इनमें जो उपासनीय आत्मेति विशेषनिर्धारणार्थं पुन- | है वह आत्मा कौन-सा है ? इस रन्योन्यं पप्रच्छुर्विचारयन्तः । | विशेष बातको निश्चय करनेके लिये | उन्होंने आपसमें विचार करते हुए | एक-दूसरेसे फिर पूछा । पुनस्तेषां विचारयतां विशेष- | फिर आपसमें विचार करनेवाले | उन मुमुक्षुओंको अपने विचारणीय विचारणास्पदविषया मतिरभूत् । | विशेष विषयके सम्बन्धमें यह बुद्धि | पैदा हुई । किस प्रकार पैदा हुई ? कथम् ? द्वे वस्तुनी अस्मिन् पिण्ड | [सो बतलाते हैं ]-इस पिण्डमें | दो वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं-एक तो उपलभ्येते । अनेकभेदभिन्नेन | जिस चक्षु आदि अनेक प्रकारके | भेदोंसे विभिन्न साधन (इन्द्रियग्राम) करणेन येनोपलभते । यश्चैक | द्वारा [पुरुष विषयोंको] उपलब्ध | करता है और दूसरा जो उपलब्ध उपलभते । करणान्तरोपलब्ध- | किया करता है, क्योंकि वह भिन्न- विषयस्मृतिप्रतिसन्धानात् । तत्र | भिन्न इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध हुए | विषयोंकी स्मृतिका अनुसन्धान न तावद्येनोपलभते स आत्मा | करता है। उनमेंसे जिसके द्वारा पुरुष | उपलब्ध करता है वह तो आत्मा भवितुमर्हति । | हो नहीं सकता । केन पुनरुपलभत इत्युच्यते | तो फिर वह किसके द्वारा उपलब्ध येन वा चक्षुर्भूतेन रूपं पश्यति । | करता है, सो बतलाया जाता है— | नेत्रके साथ एकीभूत हुए जिस येन वा शृणोति श्रोत्रभूतेन शब्दम्, | आत्मासे वह रूपको देखता है, जिस येन वा घ्राणभूतेन गंधानाजि- | श्रोत्रभावापन्नके द्वारा वह शब्द श्रवण घ्रति, येन वा वाक्करणभूतेन वाचं | करता है, जिस घ्राणेन्द्रियभूतसे वह | गन्धोंको सूँघता है, जिस वागिन्द्रिय- नामात्मिकां व्याकरोति गौरश्व | भूतसे वह गौ-अश्व इत्यादि नामात्मिका इत्येवमाद्यां साध्वसाध्विति च, | तथा साधु-असाधु वाणीका विश्लेषण
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५ येन वा जिह्वाभूतेन स्वादु चास्वादु | करता है और जिस रसनेन्द्रियभूतसे च विजानातीति ॥ १ ॥ | वह स्वादु-अस्वादु पदार्थोंको जानता | है ॥ १ ॥ प्रज्ञानसंज्ञक मनके अनेक नाम किं पुनस्तदेवैकमनेकधा भिन्नं | पहले जो एक ही अनेक प्रकार- करणम् ? इत्युच्यते— | से विभिन्न करण बतलाया है वह | कौन है ? इसपर कहते हैं— यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् । संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २ ॥ यह जो हृदय है वही मन भी है। संज्ञान ( चेतनता ), आज्ञान ( प्रभुता ), विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति ( रोगादिजनित दुःख ), स्मृति, सङ्कल्प, क्रतु, असु ( प्राण ), काम और वश ( मनोज्ञ वस्तुओंके स्पर्शादिकी कामना )—ये सभी प्रज्ञानके नाम हैं ॥ २ ॥ यदुक्तं पुरस्तात्प्रजानां रेतो | पहले जो कहा है कि 'प्रजाओं- हृदयं हृदयस्य रेतो मनो मनसा | का रेतस् ( सारभूत ) हृदय है, | हृदयका सारभूत मन है, मनसे जल सृष्टा आपश्च वरुणश्च हृदयान्मनो | और वरुणकी सृष्टि हुई; हृदयसे मन मनसश्चन्द्रमाः । तदेवैतद्धृदयं | हुआ और मनसे चन्द्रमा। वह यह | हृदय ही मन भी है। वह एक ही मनश्च, एकमेव तदनेकधा । | अनेकरूप हो रहा है। इस एक एतेनान्तःकरणेनैकेन चक्षुर्भूतेन | अन्तःकरणसे ही नेत्ररूपसे रूपको
८६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३
८६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३ रूपं पश्यति श्रोत्रभूतेन शृणोति | देखता है, श्रोत्ररूपसे श्रवण करता है, घ्राणभूतेन जिघ्रति वाग्भूतेन | घ्राणरूपसे सूंघता है, वागिन्द्रिय- वदति जिह्वाभूतेन रसयति | रूपसे बोलता है, जिह्बारूपसे चखता स्वेनैव विकल्पानारूपेण मनसा | है, स्वयं सङ्कल्प-विकल्परूप मनसे विकल्पयति हृदयरूपेणाध्यव- | सङ्कल्प करता है और हृदयरूपसे स्यति । तस्मात्सर्वकरणविषय- | निश्चय करता है । अतः उपलब्ध- व्यापारकमेकमिदं करणं सर्वोप- | की समस्त उपलब्धियोंके लिये लब्ध्यर्थमुपलब्धुः । | इन्द्रियसम्बन्धी सारे व्यापारोंको करनेवाला यही एक साधन है । तथा च कौषीतकीनां "प्रज्ञ- | इसी प्रकार कौषीतकी उपनिषद्- या वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि | में भी कहा है—"प्रज्ञाद्वारा वाणी- नामान्याप्नोति । प्रज्ञया चक्षुः | पर आरूढ होकर वाणीसे सम्पूर्ण समारुह्य चक्षुषा सर्वाणि रूपा- | नामोंको प्राप्त ( ग्रहण ) करता है, ण्याप्नोति" (३ । ६) इत्यादि । | प्रज्ञाद्वारा चक्षु इन्द्रियपर आरूढ वाजसनेयके च—"मनसा | होकर चक्षुसे सारे रूपोंको ह्येव पश्यति मनसा शृणोति | प्राप्त करता है" इत्यादि । तथा हृदयेन हि रूपाणि जानाति" | बृहदारण्यकमें कहा है—"मनसे ही ( बृ० उ० १ । ५ । ३ ) | देखता है, मनसे ही सुनता है, इत्यादि । तस्माद्धृदयमनोवाच्य- | हृदयसे ही रूपोंका ज्ञान प्राप्त करता स्य सर्वोपलब्धिकरणत्वं प्रसिद्धम् । | है" इत्यादि । अतः हृदय और मनः- तदात्मकश्च प्राणो "यो वै | शब्दवाच्य अन्तःकरणका ही सब प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स | प्रकारकी उपलब्धिमें साधनत्व प्राणः" (कौषी० ३।३) इति | प्रसिद्ध है । प्राण भी तद्रूप ही है । हि ब्राह्मणम् । | "जो प्राण है वही प्रज्ञा है और जो प्रज्ञा है वही प्राण है" ऐसा ब्राह्मणवाक्य है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७ करणसंहतिरूपश्च प्राण इत्य- 'प्राण इन्द्रियोंका संघातस्वरूप वोचाम प्राणसंवादादौ । तस्मा- है' यह बात हम प्राणसंवाद द्यत्पद्भ्यां प्रापद्यत तद्ब्रह्म तदु- आदि प्रकरणोंमें कह चुके हैं । पलब्धुरुपलब्धिकरणत्वेन गुण- अतः जिसने चरणोंकी ओरसे प्रवेश भूतत्वान्नैव तद्वस्तु ब्रह्मोपास्या- किया था वह ब्रह्म उपलब्धामे त्मा भवितुमर्हति । पारिशेष्या- उपलब्धिका साधन होनेके कारण द्यस्योपलब्धुरुपलब्ध्यर्था एतस्य गौण होनेसे मुख्य ब्रह्म अर्थात् हृदयस्य मनोरूपस्य करणस्य उपास्य आत्मा नहीं हो सकता । वृत्तयो वक्ष्यमाणाः । स उपल- अतः पारिशेष्यनियमानुसार* जिस ब्धोपास्य आत्मा नोऽस्माकं भवि- उपलब्धाकी उपलब्धिका/उपलब्धिके तुमर्हतीति निश्चयं कृतवन्तः । हृदय एवं मनोरूप अन्तःकरणकी तदन्तःकरणोपाधिस्थस्योप- आगे बतलायी जानेवाली वृत्तियाँ लब्धुः प्रज्ञारूपस्य ब्रह्मण उप- होती हैं वह उपलब्धा ही हमारा लब्ध्यर्था या अन्तःकरणवृत्तयो उपासनीय आत्मा है–ऐसा उन्होंने बाह्यान्तर्वर्तिविषयविषयास्ता इमा निश्चय किया । उच्यन्ते । संज्ञानं संज्ञप्तिश्चेतन- उस अन्तःकरणरूप उपाधिमें भावः, आज्ञानमाज्ञप्तिरीश्वरभावः, स्थित प्रज्ञानरूप उपलब्धा ब्रह्मकी विज्ञानं कलादिपरिज्ञानम्, प्रज्ञानं उपलब्धिके लिये जो बाह्य और आन्तरिक विषयोंसे सम्बन्ध रखने- वाली अन्तःकरणकी वृत्तियाँ हैं वे ये बतलायी जाती हैं–'संज्ञान–संज्ञप्ति अर्थात् चेतनभाव, आज्ञान–आज्ञा करना अर्थात् ईश्वरभाव (प्रभुता), विज्ञान–कलादिका ज्ञान, प्रज्ञान–
- जहाँ आपाततः अनेकोंमेंसे किसी एक धर्म या गुणकी सम्भावना प्रतीत होनेपर भी और सबका प्रतिषेध करके बचे हुए किसी एक ही पदार्थमें उसका निर्णय किया जाता है वहाँ 'पारिशेष्यनियम' माना जाता है ।
८८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३
८८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३ प्रज्ञप्तिः प्रज्ञता, मेधा ग्रन्थधारण- | प्रज्ञप्ति यानी प्रज्ञता (समयोचित बुद्धि सामर्थ्यम्, दृष्टिरिन्द्रियद्वारा स- | स्फुरित हो जाना-प्रतिभा ), मेधा- र्वविषयोपलब्धिः, धृतिर्धारण- | ग्रन्थ धारणकी शक्ति, दृष्टि-इन्द्रियों- मवसन्नानां शरीरेन्द्रियाणां ययो- | द्वारा सब विषयोंको उपलब्ध करना, त्तम्भनं भवति-धृत्या शरीर- | धृति-धारण करना, जिससे शिथिल मुद्वहन्तीति हि वदन्ति, मति- | हुए शरीर और इन्द्रियोंमें जागृति र्मननम्, मनीषा तत्र स्वातन्त्र्यम्, | होती है, 'धृतिसे ही शरीरको जूतिश्चेतसो रुजादिदुःखित्व- | उठाकर वहन करते हैं' ऐसा भावः, स्मृतिः स्मरणम्, संकल्पः | [ पण्डितजन ] कहते भी हैं, मति- शुक्लकृष्णादिभावेन संकल्पनं | मनन करना, मनीषा-मनन करनेकी रूपादीनाम्, क्रतुरध्यवसायः, | स्वतन्त्रता, जूति-चित्तका रोगादिसे असुः प्राणनादिजीवनक्रिया- | दुःखी होना, स्मृति-स्मरण, सङ्कल्प निमित्ता वृत्तिः, कामोऽसंनिहि- | -शुक्ल-कृष्णादि भावसे रूपांदिका तविषयाकाङ्क्षा तृष्णा, | सङ्कल्प करना, क्रतु-अध्यवसाय, वशः स्त्रीव्यतिकराद्यभिलाषः, | असु-जीवनकी निमित्तभूत श्वासो- इत्येवमाद्या अन्तःकरणवृत्तयः | च्छ्वासादि क्रिया, काम-अप्राप्त प्रज्ञप्तिमात्रस्योपलब्धुरुपलब्ध्यर्थ- | विषयकी आकाङ्क्षा यानी तृष्णा और त्वाच्छुद्धप्रज्ञानरूपस्य ब्रह्मण | वश-स्त्रीसंसर्गादिकी अभिलाषा- उपाधिभूतास्तदुपाधिजनितगुण- | इत्यादि प्रकारकी अन्तःकरणकी नामधेयानि भवन्ति संज्ञाना- | वृत्तियाँ प्रज्ञप्तिरूप उपलब्धाकी उप- दीनि । सर्वाण्येव एतानि प्रज्ञा- | लब्धिके लिये होनेके कारण विशुद्ध- नस्य नामधेयानि भवन्ति न | बोधस्वरूप ब्रह्मकी उपाधिभूत हैं । स्वतः साक्षात् । तथा चोक्तं | अतः उसकी उपाधिजनित गुणवृत्तिसे | ये संज्ञान आदि उस ब्रह्मके ही नाम | हैं। ये सभी प्रज्ञप्तिमात्र प्रज्ञानके नाम | ही हैं; स्वतः साक्षात् कुछ नहीं हैं।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९ "प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति" | ऐसा ही कहा भी है-"प्राणन (बृ० उ० १ । ४ । ७) | करनेके कारण ही [ब्रह्म] प्राण इत्यादि ॥२॥ | नामवाला है" इत्यादि ॥ २ ॥ प्रज्ञानकी सर्वरूपता एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषी- त्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिजानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किंचेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥३॥ यह (प्रज्ञानरूप आत्मा) ही ब्रह्म है, यही इन्द्र है, यही प्रजापति है, यही ये [अग्नि आदि] सारे देव तथा पृथिवी, वायु, आकाश, जल और तेज-ये पाँच भूत हैं, यही क्षुद्र जीवोंके सहित उनके बीज (कारण) और अन्य अण्डज, जरायुज, स्वेदज, उद्भिज, अश्व, गौ, मनुष्य एवं हाथी है तथा [इनके अतिरिक्त] जो कुछ भी यह जङ्गम (पैरसे चलनेवाले), पतत्रि (आकाशमें उड़नेवाले) और स्थावर (वृक्ष- पर्वत आदि) रूप प्राणिवर्ग है वह सब प्रज्ञानेत्र और प्रज्ञान (निरुपा- धिक चैतन्य) में ही स्थित है। लोक प्रज्ञानेत्र (प्रज्ञा-चैतन्य ही जिसका नेत्र-व्यवहारका कारण है ऐसा) है, प्रज्ञा ही उसका लयस्थान है, अतः प्रज्ञान ही ब्रह्म है ॥ ३ ॥ ऐतरेयो० ४-
९० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३
[Header] ९० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३
[बायाँ स्तम्भ / Sanskrit Text] स एष प्रज्ञानरूप आत्मा ब्रह्मापरं सर्वशरीरस्थः प्राणः प्रज्ञात्मा। अन्तःकरणोपाधिष्वनु- प्रविष्टो जलभेदगतसूर्यप्रतिविम्ब- वद्धिरण्यगर्भः प्राणः प्रज्ञात्मा । एष एव इन्द्रो गुणाद्देवराजो वा । एष प्रजापतिर्यः प्रथमजः शरीरी। यतो मुखादिनिर्भेदद्वारेणाग्न्या- दयो लोकपाला जाताः स प्रजा- पतिरेष एव । येऽप्येतेऽग्न्यादयः सर्वे देवा एष एव । इमानि च सर्वशरीरोपादान- भूतानि पञ्च पृथिव्यादीनि महा- भूतान्यन्नान्नादत्वलक्षणान्येतानि, किंचेमानि च क्षुद्रमिश्राणि क्षुद्रै- रल्पकैर्मिश्राणि, इवशब्दोऽन- र्थकः, सर्पादीनि बीजानि कार- णानीतराणि चेतराणि च द्वैरा- श्येन निर्दिश्यमानानि ।
[दायाँ स्तम्भ / Hindi Commentary] वह यह प्रज्ञानरूप आत्मा ही अपरब्रह्म है, अर्थात् सम्पूर्ण शरीरोंमें स्थित प्राण-प्रज्ञात्मा है । विभिन्न जलपात्रोंमें पड़े हुए प्रतिबिम्बके समान यही अन्तःकरणरूप उपाधियोंमें अनुप्रविष्ट हिरण्यगर्भ— प्राण यानी प्रज्ञात्मा है । यही [ 'इदमदर्शम्' इस श्रुतिमें बतलाये हुए ] गुणके कारण इन्द्र अथवा देवराज है । यही प्रजापति है, जो सबसे पहले उत्पन्न हुआ देहधारी है । जिससे मुखादिनिर्भेदके द्वारा अग्नि आदि लोकपाल उत्पन्न हुए हैं वह प्रजापति भी यही है । और भी ये जो अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता हैं वे भी यही हैं । ये जो समस्त शरीरोंके उपादान- भूत एवं अन्न और अन्नादत्वभावको प्राप्त हुए पृथिवी आदि पञ्च भूत हैं, क्षुद्र यानी अल्प जीवोंके सहित जो सर्पादि हैं तथा बीज— कारण और इतर—कार्यवर्ग इस प्रकार अलग-अलग दो विभागोंसे निर्दिष्ट [ समस्त प्राणी हैं वे भी यही हैं ] । [ 'क्षुद्रमिश्राणीव' इस पदसमूहमें ] 'इव' शब्दका प्रयोग अनर्थक है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧ कानि तानि ? उच्यन्ते— | वे कौन-कौन हैं, सो बतलाते अण्डजानि पक्ष्यादीनि, जारु- | हैं। अण्डज-पक्षी आदि, जारुज- जानि जरायुजानि मनुष्या- | जरायुज-मनुष्यादि, स्वेदज-जूँ दीनि, स्वेदजादीनि यूका- | आदि, उद्भिज-वृक्षादि, तथा अश्व, दीनि, उद्भिजानि च वृक्षा- | गौ, पुरुष, हाथी एवं अन्य भी ये दीनि, अश्वा गावः पुरुषा | जो कुछ प्राणी हैं-वे कौन-कौनसे ? हस्तिनोऽन्यच्च यत्किंचेदं प्राणि- | जङ्गम जो पैरोंसे चलते हैं, पक्षी- जातम् ; किं तत् ? जङ्गमं यच्च- | जो आकाशमें उड़नेवाले हैं और लति पद्भ्यां गच्छति। यच्च | स्थावर-जो अचल हैं, वे सब यही पतत्रि आकाशेन पतनशीलम् । | हैं, अर्थात् वे सब-के-सब प्रज्ञा- यच्च स्थावरमचलम् । सर्वं तदेप | नेत्र हैं। प्रज्ञा प्रज्ञप्तिको कहते एव । सर्वं तदशेषतः प्रज्ञानेत्रम् । | हैं और वह ब्रह्म ही है तथा जिससे प्रज्ञप्तिः प्रज्ञा तच्च ब्रह्मैव । नीय- | नयन किया जाय [अर्थात् ले जाया तेऽनेनेति नेत्रम् । प्रज्ञा नेत्रं यस्य | जाय ] उसे 'नेत्र' कहते हैं। इस तदिदं प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने ब्रह्म- | प्रकार प्रज्ञा ही जिसका नेत्र है वह ण्युत्पत्तिस्थितिलयकालेषु प्रतिष्ठितं | प्रज्ञानेत्र कहलाता है। तथा उत्पत्ति, प्रज्ञाश्रयमित्यर्थः । प्रज्ञानेत्रो | स्थिति और प्रलयके समय प्रज्ञान लोकः पूर्ववत् । प्रज्ञाचक्षुर्वा सर्व | यानी ब्रह्ममें स्थित रहनेवाले अर्थात् एव लोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा सर्वस्य | प्रज्ञाके आश्रित हैं। इस प्रकार जगतः । तस्मात्प्रज्ञानं ब्रह्म । | पूर्ववत् यह लोक प्रज्ञानेत्र है अर्थात् | सभी लोक प्रज्ञारूप नेत्रवाला है, तदेतत्प्रत्यस्तमितसर्वोपाधि- | सम्पूर्ण जगत्का आश्रय प्रज्ञा ही है; | अतः प्रज्ञान ही ब्रह्म है । विशेषं सन्निरञ्जनं निर्मलं निष्क्रियं | जो सम्पूर्ण औपाधिक विशेषता- | से रहित, नित्य, निरञ्जन, निर्मल, शान्तमेकमद्वयं “नेति नेति” | निष्क्रिय, शान्त, एक और | अद्वितीय है, जो "नेति नेति" इति (बृ० उ० ३ । ९ । २६) | इत्यादि [ श्रुतियोंद्वारा ] क्रमसे
९२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३
९२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वविशेषापोहसंवेद्यं सर्वशब्दप्र- | समस्त विशेषोंका बाध करके जानने त्ययागोचरम्। तदत्यन्तविशुद्ध- | योग्य है तथा सब प्रकारके शाब्दिक प्रज्ञोपाधिसंबन्धेन सर्वज्ञमीश्वरं | ज्ञानका अविषय है, अत्यन्त विशुद्ध सर्वसाधारणाव्याकृतजगद्बीजप्र- | प्रज्ञारूप उपाधिके सम्बन्धसे सर्वज्ञ वर्तकं नियन्तृत्वादन्तर्यामिसंज्ञं | तथा जगत्के सर्वसाधारण और भवति। तदेव व्याकृतजगद्बीज- | अव्यक्त बीजका प्रवर्तक वह ईश्वर भूतबुद्ध्यात्माभिमानलक्षणहिर- | ही सबका नियन्ता होनेके कारण ण्यगर्भसंज्ञं भवति। तदेवान्त- | 'अन्तर्यामी' नामवाला है; वही रण्ड़ोद्भूतप्रथमशरीरोपाधिम- | व्याकृत जगत्का बीजभूत विज्ञाना- द्विराट्प्रजापतिसंज्ञं भवति। | त्माका अभिमानी 'हिरण्यगर्भ' तदुद्भूताग्न्याद्युपाधिमद्देवतासंज्ञं | नामवाला है तथा वही ब्रह्माण्डके भवति। तथा विशेषशरीरोपाधि- | भीतर सबसे पहले उत्पन्न हुए ष्वपि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु | शरीररूप उपाधिवाला 'विराट् प्रजा- तत्तन्नामरूपलाभो ब्रह्मणः। | पति' संज्ञावाला है। वही उससे तदेवैकं सर्वोपाधिभेदभिन्नं | उत्पन्न हुए अग्नि आदिकी उपाधि सर्वैः प्राणिभिस्तार्किकैश्च सर्व- | से 'देवता' संज्ञावाला है तथा उस प्रकारेण ज्ञायते विकल्प्यते चा- | ब्रह्मको ही ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त नेकधा। "एतमेके वदन्त्यग्निं | विशेष-विशेष शरीरोंकी उपाधियोंमें मनुमन्ये प्रजापतिम्। इन्द्रमेकेऽपरे | भी उन-उनके नाम और रूप प्राप्त प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम्"(मनु० | हुए हैं। सम्पूर्ण उपाधिभेदसे विभिन्न १२।१२३) इत्याद्या स्मृतिः॥३॥ | वही एक समस्त प्राणियों और | तार्किकोंद्वारा सब प्रकारसे जाना | जाता और अनेक प्रकारसे कल्पना | किया जाता है। [इस विषयमें] | "इसे कोई तो अग्नि बतलाते हैं तथा | कोई मनु, कोई प्रजापति, कोई इन्द्र, | कोई प्राण और कोई सनातन ब्रह्म | कहते हैं" इत्यादि स्मृति भी है॥३॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३ आत्मैक्यवेत्ताकी अमृतत्वप्राप्ति स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत्समभवत् ॥४॥ वह ( वामदेव ) इस चैतन्यस्वरूपसे ही इस लोकसे उत्क्रमण कर इन्द्रियातीत स्वर्गलोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्तकर अमर हो गया, [ अमर ] हो गया ॥ ४ ॥ स वामदेवोऽन्यो वैवं यथोक्तं ब्रह्म वेद प्रज्ञेनात्मना; येनैव प्रज्ञेनात्मना पूर्वे विद्वांसोऽमृता अभूवंस्तथायमपि विद्वानेतेनैव प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्य इत्यादि व्याख्यातम् । अस्माल्लो- कादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वा अमृतः सम- भवत्समभवदित्योमिति ॥४॥ इस प्रकार पूर्वोक्त ब्रह्मको जाननेवाला वह वामदेव अथवा कोई अन्य पुरुष चेतनात्मस्वरूपसे, जिस चेतनात्मस्वरूपसे पूर्ववर्ती विद्वान् अमरभावको प्राप्त हुए थे उसी प्रकार यह विद्वान् भी इस चेतनात्मस्वरूपसे ही इस लोकसे उत्क्रमण कर-इत्यादि वाक्यकी पहले ( १ । २ । ६ में ) ही व्याख्या की जा चुकी है । अर्थात् इस लोकसे उत्क्रमण कर इन्द्रियातीत स्वर्गलोकमें सम्पूर्ण कामनाएँ पाकर अमर हो गया, [अमर] हो गया-इत्यलम् ॥४॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयेऽध्याये प्रथमः खण्डः समाप्तः । उपनिषत्क्रमेण तृतीयः, आरण्यकक्रमेण षष्ठोऽध्यायः समाप्तः । ॐ तत्सत्
ॐ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधा- म्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
श्रीहरिः मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका मन्त्रप्रतीकानि अ० खं० मं० पृ० ॐ आत्मा वा इदम् ... १ १ १ २४ अग्निर्वाग्भूत्वा मुखम् ... १ २ ४ ३९ एष ब्रह्मैष इन्द्रः ... ३ १ ३ ८९ कोऽयमात्मेति वयम् ... ३ १ १ ८२ तच्चक्षुषाजिघृक्षत् ... १ ३ ५ ४५ तच्छिश्नेनाजिघृक्षत् ... १ ३ ९ ४६ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् ... १ ३ ६ ४५ तत्त्वचाजिघृक्षत् ... १ ३ ७ ४६ तत्प्राणेनाजिघृक्षत् ... १ ३ ४ ४५ तत्स्त्रिया आत्मभूतम् ... २ १ २ ७३ तदपानेनाजिघृक्षत् ... १ ३ १० ४६ तदुक्तमृषिणा ... २ १ ५ ७९ तदेनत्सृष्टम् ... १ ३ ३ ४३ तन्मनसाजिघृक्षत् ... १ ३ ८ ४६ तमभ्यतपत् ... १ १ ४ ३१ तमशनायापिपासे ... १ २ ५ ४० तस्मादिदन्द्रो नाम ... १ ३ १४ ५४ ता एता देवता सृष्टाः ... १ २ १ ३४ ताभ्यः पुरुषमानयत्ताः ... १ २ ३ ३७ ताभ्यो गामानयत्ताः ... १ २ २ ३७ पुरुषे ह वा अयम् ... २ १ १ ७१ यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् ... ३ १ २ ८५
[ २ ] स इमाँल्लोकानसृजत ... १ १ २ २७ स ईक्षत कथं न्विदम् ... १ ३ ११ ४७ स ईक्षतेमे नु लोकाः ... १ १ ३ ३० स ईक्षतेमे नु लोकाश्च ... १ ३ १ ४२ स एतमेव सीमानम् ... १ ३ १२ ५० स एतेन प्रज्ञेनात्मना ... ३ १ ४ ९३ स एवं विद्वानस्मात् ... २ १ ६ ८० स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् ... १ ३ १३ ५३ सा भावयित्री ... २ १ ३ ७४ सोऽपोऽभ्यतपत् ... १ ३ २ ४३ सोऽस्यायमात्मा ... २ १ ४ ७७
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॥ श्रीहरिः ॥ गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित उपनिषद् ईशादि नौ उपनिषद् अन्वय, हिंदी व्याख्यासहित ईशावास्योपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकर भाष्यसहित केनोपनिषद् (,, ,,) कठोपनिषद् (,, ,,) माण्डूक्योपनिषद् (,, ,,) मुण्डकोपनिषद् (,, ,,) प्रश्नोपनिषद् (,, ,,) तैत्तिरीयोपनिषद् (,, ,,) ऐतरेयोपनिषद् (,, ,,) श्वेताश्वतरोपनिषद् (,, ,,)