भारतकोश
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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

२८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

२८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ उसने अम्भ, मरीचि, मर और आप्—इन लोकोंकी रचना की। जो द्युलोकसे परे है और स्वर्ग जिसकी प्रतिष्ठा है वह 'अम्भ' है, अन्तरिक्ष (भुवर्लोक) 'मरीचि' है, पृथिवी 'मर-लोक' है और जो [पृथिवीके] नीचे है वह 'आप' है ॥ २ ॥ स आत्मेमाँल्लोकानसृजत | उस आत्माने इन लोकोंकी रचना की। जिस प्रकार इस लोकमें सृष्टवान् । यथेह बुद्धिमांस्तक्षादि- | बुद्धिमान् शिल्पकार आदि 'मैं इस प्रकारके महल आदि बनाऊँ' रेवंप्रकारान्प्रासादादीन्सृज इति | ऐसा विचार करके उस विचारके ईक्षित्वेक्षानन्तरं प्रासादादीन्सृज- | अनन्तर ही महल आदिकी रचना करते हैं उसी प्रकार [उसने ईक्षण ति तद्वत् । | करके इन लोकादिकी रचना की] । ननु सोपादानस्तक्षादिः प्रा- | शंका—शिल्पकारादि तो उन महल आदिकी उपादान सामग्रीसे सादादीन्सृजतीति युक्तं निरुपा- | युक्त होते हैं इसलिये वे महल आदिकी रचना करते हैं—ऐसा कहना दानस्त्वात्मा कथं लोकान् | ठीक ही है; किन्तु उपादान (सामग्री) से रहित आत्मा किस प्रकार सृजति ? | लोकोंकी रचना करता है ? नैष दोषः; सलिलफेनस्था- | समाधान—यह कोई दोष नहीं [निरुपादानस्य] नीये आत्मभूते | है, क्योंकि जलमें [व्यक्त न हुए] [आत्मनः सृष्टि-] नामरूपे अव्याकृते | फेनस्थानीय अव्याकृत नाम और [कर्तृत्वम्] रूप, जो आत्मस्वरूप और एकमात्र आत्मैकशब्दवाच्ये | 'आत्मा' शब्दके ही वाच्य हैं, व्याकृतफेनस्थानीयस्य जगतः | व्याकृत फेनस्वरूप जगत्के उपादान उपादानभूते संभवतः । तस्माद् | हो सकते हैं। अतः वह सर्वज्ञ

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९

आत्मभूतनामरूपोपादानभूतः | आत्मा अपने आत्मभूत नाम और सन्सर्वज्ञो जगन्निर्मिमीत इत्य- | रूपका उपादानस्वरूप होकर जगत्- विरुद्धम् । | की रचना करता है—इसमें कोई | विरोध नहीं है । अथवा, यथा विज्ञानवान्मा- | अथवा जिस प्रकार बुद्धियुक्त यावी निरुपादान आत्मानमेव | मायावी कोई उपादान न होनेपर आत्मान्तरत्वेनाकाशेन गच्छन्त- | भी स्वयं अपनेहीको अपने अन्यरूपसे मिव निर्मिमीते, तथा सर्वज्ञो | आकाशमें चलता हुआ-सा बना लेता देवः सर्वशक्तिर्महामाय आत्मान- | है, उसी प्रकार वह सर्वशक्तिमान्, मेवान्तरत्वेन जगद्रूपेण नि- | महामायावी, सर्वज्ञ देव अपनेहीको र्मिमीत इति युक्ततरम् । एवं च | जगत्-रूप अपने अन्य स्वरूपसे रच सति कार्यकारणोभयासद्वाद्यादि- | लेता है—यह बहुत युक्तियुक्त ही पक्षाश्च न प्रसज्यन्ते सुनिरा- | है । ऐसा होनेपर कार्य और कारण- कृताश्च भवन्ति । | इन दोनोंको असत् बतलानेवालोंके | [असद्वाद आदि] पक्षोंकी प्राप्ति नहीं | होती, और उनका पूर्णतया निरा- | करण हो जाता है । कांल्लोकानसृजतेत्याह- | उसने किन लोकोंकी रचना [आत्मसृष्ट- अम्भो मरीचीर्मरमाप | की ? इसपर कहते हैं—अम्भ, लोकाख्यानम् इति । आकाशादि- | मरीची, मर और आप आदिकी । क्रमेण अण्डमुत्पाद्याम्भःप्रभृतीन् | उसने आकाशादि क्रमसे अण्डको लोकानसृजत । तत्राम्भःप्रभृतीन् | उत्पन्न कर अम्भ आदि लोकोंकी स्वयमेव व्याचष्टे श्रुतिः । | रचना की । उन अम्भ आदि लोकों- | की श्रुति स्वयं ही व्याख्या करती है । अदस्तदम्भःशब्दवाच्यो लोकः, | अदः—वह 'अम्भ' शब्दसे कहा परेण दिवं द्युलोकात्परेण पर- | जानेवाला लोक है, जो द्युलोकसे स्तात्; सोऽम्भःशब्दवाच्यः, अम्भो- | परे है; वह जल (मेघों) को धारण

३० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

३० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ भरणात् । द्यौः प्रतिष्ठाश्रयस्तस्या- | करनेवाला होनेसे 'अम्भ' शब्दसे | कहा जाता है। उस अम्भलोकका म्भसो लोकस्य । द्युलोकादधस्ता- | द्युलोक प्रतिष्ठा यानी आश्रय है। | द्युलोकसे नीचे जो अन्तरिक्ष है वह दन्तरिक्षं यत्तन्मरीचयः । ए- | मरीचि लोक है। वह एक होनेपर भी | अनेकों स्थानभेदोंके कारण 'मरीचयः' कोऽप्यनेकस्थानभेदत्वाद्वहुवच- | इस प्रकार बहुवचनरूपसे प्रयुक्त नभाक्-मरीचय इति; मरीचि- | हुआ है। अथवा किरणोंसे सम्बन्धित | होनेके कारण वह 'मरीचि' कह- भिर्वा रश्मिभिः सम्बन्धात् । पृथिवी | लाता है। पृथिवी 'मर' है, क्योंकि | उसमें प्राणी मरते हैं। जो लोक मरो म्रियन्तेऽस्मिन् भूतानीति । | पृथिवीसे नीचेकी ओर हैं वे 'आप' | कहलाते हैं, क्योंकि 'अप्' शब्द या अधस्तात् पृथिव्यास्ता आप | [नीचेके लोकोंमें रहनेवाले प्राणियों- | द्वारा प्राप्य होनेके कारण प्राप्तिरूप उच्यन्ते; आप्नोतेः, लोकाः । यद्यपि | अर्थवाले ] 'आप्' धातुसे बना हुआ | है। यद्यपि सभी लोक पञ्चभूतमय पञ्चभूतात्मकत्वं लोकानां तथा- | हैं तथापि अम्भ, मरीचि, मर और प्यब्बाहुल्यादब्नामभिरेवाम्भो | आप-ये लोक आप (जल) की | अधिकता होनेके कारण 'आप' मरीचीर्मरमाप इत्युच्यन्ते ॥२॥ | ही कहे जाते हैं ॥ २ ॥ पुरुषरूप लोकपालकी रचना सर्वप्राणिकर्मफलोपादानाधि- | सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मफलरूप ष्ठानभूतांश्चतुरो लोकान् सृष्ट्वा- | उपादानके अधिष्ठानभूत चारों | लोकोंकी रचना कर- स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

उसने ईक्षण (विचार) किया कि—'ये लोक तो तैयार हो गये, अब लोकपालोंकी रचना करूँ'—ऐसा सोचकर उसने जलमेंसे ही एक पुरुष निकालकर अवयवयुक्त किया ॥ ३ ॥

स ईश्वरः पुनरेवेक्षत । इमे नु | उस ईश्वरने फिर भी ईक्षण अम्भःप्रभृतयो मया सृष्टा लोकाः | (विचार) किया । मेरे रचे हुए ये परिपालयितृवर्जिता विनश्येयुः; | अम्भ आदि लोक बिना किसी तस्मादेषां रक्षणार्थं लोकपालाँ- | रक्षकके नष्ट हो जायँगे । अतः इनकी ल्लोकानां पालयितॄन्नु सृजै | रक्षाके लिये मैं लोकपालोंकी— सृजेऽहमिति । | लोकोंकी रक्षा करनेवालोंकी रचना करूँ । एवमीक्षित्वा सोऽद्भ्य एव | ऐसा सोच कर उसने जलसे— अप्रधानेभ्य एव पञ्चभूतेभ्यो | जलप्रधान पञ्चभूतोंसे अर्थात् जिनसे येभ्योऽम्भःप्रभृतीन्ससृजांस्तेभ्य | उसने अम्भ आदि लोकोंकी रचना एवेत्यर्थः । पुरुषं पुरुषाकारं | की थीं उन्हींसे पुरुष यानी शिर और शिरःपाण्यादिमन्तं समुद्धृत्य | हाथ आदि वाले पुरुषाकारको, जिस अद्भ्यः समुपादाय मृत्पिण्डमिव | प्रकार कुम्हार पृथिवीसे मिट्टीका पिण्ड कुलालः पृथिव्याः, अमूर्च्छयत् | निकालता है, उसी प्रकार निकाल- मूर्च्छितवान् संपिण्डितवान् स्वाव- | कर मूर्च्छित किया अर्थात् अवयवोंकी यवसंयोजनेनेत्यर्थः ॥ ३ ॥ | योजना कर उसको बढ़ाया ॥ ३ ॥

इन्द्रियगोलक, इन्द्रिय और इन्द्रियाधिष्ठाता देवताओंकी उत्पत्ति तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वाग्वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः

३२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

३२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ्निर- भिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिर्निरभिद्यत नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः ॥ ४ ॥

उस विराट् पुरुषके उद्देश्यसे ईश्वरने संकल्प किया । उस संकल्प किये पिण्डसे अण्डेके समान मुख उत्पन्न हुआ । मुखसे वाक् और वागिन्द्रियसे अग्नि उत्पन्न हुआ । [ फिर ] नासिकारन्ध्र प्रकट हुए, नासिकारन्ध्रोंसे प्राण हुआ और प्राणसे वायु । [ इसी प्रकार ] नेत्र प्रकट हुए तथा नेत्रोंसे चक्षु-इन्द्रिय और चक्षुसे आदित्य उत्पन्न हुआ । [ फिर ] कान उत्पन्न हुए तथा कानोंसे श्रोत्रेन्द्रिय और श्रोत्रसे दिशाएँ प्रकट हुईं । [ तदनन्तर ] त्वचा प्रकट हुई तथा त्वचासे लोम और लोमोंसे ओषधि एवं वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं । [ इसी प्रकार ] हृदय उत्पन्न हुआ तथा हृदयसे मन और मनसे चन्द्रमा प्रकट हुआ । [ फिर ] नाभि उत्पन्न हुई तथा नाभिसे अपान और अपानसे मृत्युकी अभिव्यक्ति हुई । [ तदनन्तर ] शिश्न प्रकट हुआ तथा शिश्नसे रेतस् और रेतस्‌से आप उत्पन्न हुआ ।

तं पिण्डं पुरुषविधमुद्दिश्याभ्य- तपत्। तदभिध्यानं संकल्पं कृतवा- नित्यर्थः; “यस्य ज्ञानमयं तपः” (मु०उ० १।१।९) इत्यादिश्रुतेः। तस्याभितप्तस्येश्वरसंकल्पेन तप- साभितप्तस्य पिण्डस्य मुखं निर- भिद्यत मुखाकारं सुषिरमजायत यथा पक्षिणोऽण्डं निर्भिद्यत उस पुरुषाकार पिण्डके उद्देश्य- से ईश्वरने तप किया । अर्थात् उसका अभिध्यान यानी संकल्प किया, जैसा कि “जिसका तप ज्ञानमय है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। उस अभितप्त—ईश्वरके संकल्परूप तपसे तपे हुए पिण्डका मुख प्रकट हुआ अर्थात् उसमें मुखाकार छिद्र इस प्रकार उत्पन्न हो गया जैसे कि पक्षीका अण्डा फट जाता है । उस

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३

एवम् । तस्मान्निर्भिन्ना- | छिद्ररूप मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न न्मुखाद्वाकरणमिन्द्रियं निरवर्तत; | हुई और उस वाक् से वाणीका तदधिष्ठाताग्निस्ततो वाचो लोक- | अधिष्ठाता लोकपाल अग्नि हुआ । पालः । तथा नासिके निरभिद्ये- | इसी प्रकार नासिकारन्ध्र उत्पन्न हुए, ताम् । नासिकाभ्यां प्राणः, | उन नासिकारन्ध्रोंसे प्राण और प्राणाद्वायुः, इति सर्वत्राधिष्ठानं | प्राणसे वायु हुआ । इस प्रकार सभी करणं देवता च त्रयं क्रमेण | जगह इन्द्रियगोलक, इन्द्रिय और निर्भिन्नमिति । अक्षिणी कर्णौ | उसके अधिष्ठाता देव-ये तीनों ही त्वग् हृदयमन्तःकरणाधिष्ठानम्, | क्रमशः उत्पन्न हुए । दो नेत्र, दो मनोऽन्तःकरणम् । नाभिः सर्व- | कान और त्वचा [-ये इन्द्रियस्थान प्राणबन्धनस्थानम्। अपानसंयुक्त- | हैं], हृदय अन्तःकरणका अधिष्ठान त्वादपान इति पाय्विन्द्रियमुच्यते। | है और मन अन्तःकरण है। नाभि तस्मात् तस्याधिष्ठात्री देवता | सम्पूर्ण प्राणोंके बन्धनका स्थान है। मृत्युः । यथान्यत्र, तथा शिश्नं | अपान वायुयुक्त होनेके कारण पायु निरभिद्यत प्रजननइन्द्रियस्थानम् । | इन्द्रिय अपान कहलाती है; उससे इन्द्रियं रेतो रेतोविसर्गार्थत्वा- | उसकी अधिष्ठात्री देवता मृत्यु उत्पन्न त्सद्द रेतसोच्यते । रेतस आप | हुई । जैसे कि अन्यत्र [इन्द्रिय, इति ॥ ४ ॥ | इन्द्रियस्थान और देवता] बतलाये | गये हैं, उसी प्रकार प्रजननइन्द्रियका | आश्रयस्थान शिश्न उत्पन्न हुआ । | उसमें रेतः इन्द्रिय है, जो रेतोविसर्ग | (वीर्यत्याग) की हेतुभूत होनेसे रेतः | (वीर्य) के सम्बन्धसे 'रेतस्' कही | जाती है और रेतःसे आप (वीर्यके | अधिष्ठाता जल) का प्रादुर्भाव | हुआ ॥ ४ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये प्रथमः खण्डः समाप्तः ॥ १ ॥

द्वितीय खण्ड

द्वितीय खण्ड देवताओंकी अन्न एवं आयतनयाचना ता एता देवता सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्त- मशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥ वे ये [इस प्रकार] रचे हुए [इन्द्रियाभिमानी] देवगण इस महासमुद्रमें पतित हो गये। उस (पिण्ड) को [परमात्माने] क्षुधा- पिपासासे संयुक्त कर दिया। तब उन इन्द्रियाभिमानी देवताओंने उससे कहा—'हमारे लिये कोई आश्रयस्थान बतलाइये, जिसमें स्थित होकर हम अन्न भक्षण कर सकें' ॥ १ ॥ ता एता अग्न्यादयो देवता | ईश्वरद्वारा लोकपालरूपसे संकल्प लोकपालत्वेन संकल्प्य सृष्टा | करके रचे हुए वे ये अग्नि आदि देवगण इस अति महान् संसारार्णव ईश्वरेणास्मिन्संसारार्णवे संसार- | —संसारसमुद्रमें [गिरे], जो (संसार- समुद्र) अविद्या, कामना और कर्मसे समुद्रे महत्यविद्याकामकर्मप्रभव- | उत्पन्न हुए दुःखरूप जल तथा तीव्र दुःखोदके तीव्ररोगजरामृत्यु- | रोग, जरा और मृत्युरूप महाग्राहोंसे पूर्ण है, अनादि अनन्त अपार एवं महाग्राहेऽनादावनन्तेऽपारे निरा- | निरालम्ब है, विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला अणुमात्र सुख ही लम्बे विषयेन्द्रियजनितसुखलवक्ष- | जिसकी क्षणिक विश्रान्तिका स्वरूप णविश्रामे पञ्चेन्द्रियार्थतृणमारुत- | है, जिसमें पाँचों इन्द्रियोंकी विषय-

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦

विक्षोभोत्थितानर्थशतमहोर्मौ म- | तृणारूप पवनके विक्षोभसे उठी हारौरवाद्यनेकनिरयगतहाहेत्या- | हुई अनर्थरूप सैकड़ों उत्ताल तरंगें हैं, दिक्कूजिताक्रोशनोद्भूतमहारवे | जहाँ महारौरव आदि अनेकों नरकोंके सत्यार्जवदानदयाहिंसाशमदम- | 'हा हा' आदिक्रन्दन और चिल्लाहट धृत्याद्यात्मगुणपाथेयपूर्णज्ञानोडुपे | से बड़ा कोलाहल मचा हुआ है, सत्संगसर्वत्यागमार्गे मोक्षतीरे | जिसमें सत्य, सरलता, दान, दया, एतस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन्पतित- | अहिंसा, शम, दम और धैर्य आदि वत्यः। | आत्माके गुणरूप पाथेयसे भरी हुई | ज्ञानरूप नौका है, सत्संग और | सर्वत्याग ही जिसमें [ नौकाओंके | आने-जानेका ] मार्ग है तथा मोक्ष | ही जिसका तीर है—ऐसे [संसार- | रूप] महासागरमें पतित हुए—गिरे।


तस्मादग्न्यादिदेवताप्यय- | अतः यहाँ यही अर्थ कहना इष्ट लक्षणापि या गतिर्व्याख्याता | है कि ज्ञान और कर्मके समुच्चया- ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानफलभूता | नुष्ठानकी फलस्वरूपा जिस अग्नि सापि नालं संसारदुःखोपशमाय, | आदि देवतामें लीन होनारूप गतिकी इत्ययं विवक्षितोऽर्थोऽत्र । यत | [ पूर्व अध्यायोंमें ] व्याख्या की गयी एवं तस्मादेवं विदित्वा परं ब्रह्म | है वह भी सांसारिक दुःखकी आत्मात्मनः सर्वभूतानां च यो | शान्तिके लिये पर्याप्त नहीं है। वक्ष्यमाणविशेषणः प्रकृतश्च जग- | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये दुत्पत्तिस्थितिसंहारहेतुत्वेन स | [ देवतालयरूप गति संसारदुःखकी | शान्तिका उपाय नहीं है ] ऐसा | जानकर जो परब्रह्म अपना और | सब प्राणियोंका आत्मा है, जिसके | विशेषण आगे बतलाये जानेवाले हैं | और संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और | संहारके कारणरूपसे जिसका यहाँ | प्रकरण है उसे संसारके सम्पूर्ण

३६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

३६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ सर्वसंसारदुःखोपशमनाय वेदि- | दुःखोंकी शान्तिके लिये जानना तव्यः । तस्मात् “एष पन्था | चाहिये । अतः “मोक्षप्राप्तिका और एतत्कर्मैतद्ब्रह्मैतत् सत्यम्” (ऐ० | कोई मार्ग नहीं है” इस श्रुतिके उ० २ । १ । १) यदेतत्पर- | अनुसार यह जो परब्रह्मका आत्म- ब्रह्मात्मज्ञानम् “नान्यः पन्था | स्वरूपसे ज्ञान है “यही मार्ग है, यही विद्यतेऽयनाय” (श्वे० उ० ३ । | कर्म है, यही ब्रह्म है और यही ८, ६ । १५) इति मन्त्रवर्णात् । | सत्य है।” तं स्थानकरणदेवतोत्पत्ति- | स्थान (इन्द्रियगोलक), इन्द्रिय बीजभूतं पुरुषं प्रथमोत्पादितं | और इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी पिण्डमात्मानमशनायापिपासाभ्या- | उत्पत्तिके बीजभूत पुरुषरूपसे मन्ववार्जयदनुगमितवान्संयोजित- | प्रथम उत्पन्न किये हुए उस पिण्ड वानित्यर्थः। तस्य कारणभूतस्या- | अर्थात् आत्माको उसने क्षुधा और शनायादिदोषवत्त्वात्तत्कार्यभूता- | पिपासासे अन्ववार्जयत्-अनुगमित नामपि देवतानामशनायादि- | अर्थात् संयुक्त किया । उस कारण- मत्त्वम् । तास्ततोऽशनायापि- | भूत पिण्डके क्षुधा आदि दोषोंसे पासाभ्यां पीड्यमाना एनं पिता- | युक्त होनेके कारण उसके कार्यभूत महं स्रष्टारमब्रुवन्नुक्तवत्यः— | देवता आदि भी क्षुधा आदिसे युक्त आयतनमधिष्ठानं नोऽस्मभ्यं प्र- | हुए । तब क्षुधा-पिपासासे पीड़ित जानीहि विधत्स्व । यस्मिन्नायतने | होकर उन्होंने उस जगद्रचयिता प्रतिष्ठिताः समर्थाः सत्योऽन्न- | पितामहसे कहा—‘हमारे लिये मदाम भक्षयाम इति ॥ १ ॥ | आयतन-आश्रयस्थानकी व्यवस्था | करो, जिस आयतनमें प्रतिष्ठित होकर | हम सामर्थ्यवान् हो अन्न भक्षण कर | सकें’ ॥ १ ॥ गो और अश्वशरीरकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी अस्वीकृति एवमुक्त ईश्वरः— | ऐसा कहे जानेपर ईश्वर—

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७ ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति । ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥ २ ॥ उन देवताओंके लिये गौ ले आया। वे बोले—'यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है।' [ फिर वह ] उनके लिये घोड़ा ले आया। वे बोले— 'यह भी हमारे लिये पर्याप्त नहीं है' ॥ २ ॥ ताभ्यो देव्ताभ्यो गां गवा- । उन देवताओंके लिये गौ-गौके कृतिविशिष्टं पिण्डं ताभ्य एवा- आकारवाला पिण्ड पूर्ववत् उस द्भ्यः पूर्ववत्पिण्डं समुद्धृत्य मूर्च्छ- जलसे निकालकर-अवयवोंकी यित्वानयददर्शितवान् । ताः पुन- योजनाद्वारा रचकर लाया अर्थात् उसे उन देवताओंको दिखलाया। र्गवाकृतिं दृष्ट्वाब्रुवन्—न वै नो- उस गौके समान आकारवाले प्राणको देखकर वे पुनः बोले 'यह पिण्ड हमारे ऽस्मदर्थमधिष्ठानायान्नमत्तुमयं पि- लिये अन्न भक्षण करनेके निमित्त ण्डोऽलं न वै । अलं पर्याप्तः, अत्तुं आश्रय बनानेके लिये पर्याप्त नहीं है। 'अलम्' का अर्थ पर्याप्त है। अर्थात् न योग्य इत्यर्थः । गवि प्रत्या- [ यह आश्रय ] भोजन करनेके योग्य नहीं है।' गौका परित्याग कर देनेपर ख्याते ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रु- वह उनके लिये घोड़ा लाया। तब वे 'हमारे लिये यह भी पर्याप्त नहीं है' वन्न वै नोऽयमलमिति पूर्ववत् ॥२॥ इस प्रकार पूर्ववत् कहने लगे ॥ २ ॥ मनुष्यशरीरकी उत्पत्ति और देवताओंद्वारा उसकी स्वीकृति सर्वप्रत्याख्याने— । इस प्रकार सबका त्याग कर दिया जानेपर— ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति । पुरुषो वाव सुकृतम् । ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥३॥

३८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

३८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ वह उनके लिये पुरुष ले आया। वे बोले—'यह सुन्दर बना है, निश्चय पुरुष ही सुन्दर रचना है।' उन (देवताओं) से ईश्वरने कहा— 'अपने-अपने आयतन (आश्रयस्थानों) में प्रवेश कर जाओ' ॥ ३ ॥ ताभ्यः पुरुषमानयत्स्वयोनि- | [ वह ] उनके लिये उनका भूतम् । ताः स्वयोनिं पुरुषं | योनिरूप पुरुष ले आया । अपने दृष्ट्वा अखिन्नाः सत्यः सुकृतं | योनिभूत उस पुरुषको देखकर वे शोभनं कृतमिदमधिष्ठानं बतेत्य- | खेदरहित हो इस प्रकार बोले—'यह ब्रुवन् । तस्मात्पुरुषो वाव पुरुष | अधिष्ठान सुन्दर बना है । अतः एव सुकृतं सर्वपुण्यकर्महेतुत्वात् । | सम्पूर्ण पुण्यकर्मोंका कारण होनेसे स्वयं वा स्वेनैवात्मना स्वमायाभिः | निश्चय पुरुष ही सुकृत है । अथवा कृतत्वात्सुकृतमित्युच्यते । | स्वयं अपने-आप अपनी ही मायासे रचा होनेके कारण 'सुकृत' ऐसा कहा जाता है । ता देवता ईश्वरोऽब्रवीदिष्ट- | ईश्वरने, यह समझकर कि इन्हें मासामिदमधिष्ठानमिति मत्वा, | यह आश्रयस्थान प्रिय है, क्योंकि सर्वे हि स्वयोनिषु रमन्ते, अतो | सभी अपनी योनिमें सन्तुष्ट रहा यथायतनं यस्य यद्वदनादिक्रिया- | करते हैं, उन देवताओंसे कहा— योग्यमायतनं तत्प्रविशतेति॥३॥ | 'जिसका जो आयतन है उस अपनी सम्भाषणादि क्रियाके योग्य आयतन- में तुम सब प्रविष्ट हो जाओ' ॥३॥ देवताओंका अपने-अपने आयतनोंमें प्रवेश तथास्त्वित्यनुज्ञां प्रतिलभ्ये- | 'ऐसा ही हो' इस प्रकार श्वरस्य नगर्यामिव बलाधिकृता- | राजाकी आज्ञा पाकर जिस प्रकार दयः— | नगरीमें सेनाध्यक्षादि [ प्रवेश कर जाते हैं उसी प्रकार ]—

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९

अग्निर्वादभूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ॥ ४ ॥ अग्निने वागिन्द्रिय होकर मुखमें प्रवेश किया, वायुने प्राण होकर नासिका-रन्ध्रोंमें प्रवेश किया, सूर्यने चक्षु-इन्द्रिय होकर नेत्रोंमें प्रवेश किया, दिशाओंने श्रवणेन्द्रिय होकर कानोंमें प्रवेश किया, ओषधि और वनस्पतियोंने लोम होकर त्वचा में प्रवेश किया, चन्द्रमाने मन होकर हृदयमें प्रवेश किया, मृत्युने अपान होकर नाभिमें प्रवेश किया तथा जलने वीर्य होकर लिङ्गमें प्रवेश किया ॥ ४ ॥


[संस्कृत-भाष्य][हिन्दी-अनुवाद]
अग्निर्वागभिमानी वागेव भूत्वा स्वां योनिं मुखं प्राविशत्तथोक्तार्थमन्यत् । वायुर्नासिके आदित्योऽक्षिणी दिशः कर्णौ ओषधिवनस्पतयस्त्वचं चन्द्रमा हृदयं मृत्युर्नाभिमापः शिश्नं प्राविशन् ॥ ४ ॥वागिन्द्रियके अभिमानी अग्निने वाक् होकर अपने कारणस्वरूप मुखमें प्रवेश किया । इसी प्रकार औरोंका भी अर्थ समझना चाहिये । [ इस प्रकार ] वायुने नासिका में, सूर्यने नेत्रोंमें, दिशाओंने कानोंमें, ओषधि और वनस्पतियोंने त्वचा में, चन्द्रमाने हृदयमें, मृत्युने नाभिमें और जलने शिश्न (लिङ्ग) में प्रवेश किया ॥ ४ ॥

क्षुधा और पिपासाका विभाग

[संस्कृत-भाष्य][हिन्दी-अनुवाद]
एवं लब्धाधिष्ठानासु देवतासु—इस प्रकार देवताओंके आश्रय पा लेनेपर—

४० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

४० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५ ॥ उस ( ईश्वर ) से क्षुधा-पिपासाने कहा—'हमारे लिये आश्रयकी योजना कीजिये।' तब [उसने] उनसे कहा—'तुम दोनोंको मैं इन देवताओंमें ही भाग दूँगा अर्थात् मैं तुम्हें इन्हींमें भागीदार करूँगा।' अतः जिस किसी देवताके लिये हवि दी जाती है उस देवताकी हविमें ये भूख-प्यास भी भागीदार होती ही हैं ॥ ५ ॥ निरधिष्ठाने सत्यौ अशनाया- | क्षुधा और पिपासाने आश्रयहीन पिपासे तमीश्वरमब्रूतामुक्तवत्यौ। | होनेके कारण उस ईश्वरसे कहा— आवाभ्यामधिष्ठानमभिप्रजानीहि | 'हमारे लिये अधिष्ठानका अभिप्रज्ञान- चिन्तय विधत्स्वेत्यर्थः । स | चिन्तन अर्थात् विधान करो।' ऐसा ईश्वर एवमुक्तस्ते अशनायापिपासे | कहे जानेपर उस ईश्वरने उन क्षुधा- अब्रवीत् । न हि युवयोर्भावरूप- | पिपासाओंसे कहा—'भावरूप होनेके त्वाच्चेतनावद्वस्त्वनाश्रित्यान्नात्तृ- | कारण तुम दोनोंका किसी चेतन त्वं संभवति । तस्मादेतास्वेवा- | वस्तुको आश्रय किये बिना अन्न ग्न्याद्यासु वां युवां देवतास्वध्या- | भक्षण करना सम्भव नहीं है। अतः मैं त्माधिदेवतास्वाभजामि वृत्ति- | इन अध्यात्म और अधिदैव अग्नि आदि | देवताओंमें ही तुम दोनोंको आभा- संविभागेनानुगृह्णामि । एतासु : | जित करता हूँ अर्थात् तुम्हारी वृत्ति- | का विभाग करके अनुगृहीत करता

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१ भागिन्यौ यद्देवत्यो यो भागो | हूँ। मैं तुम्हें इन देवताओंमें ही भागी हविरादिलक्षणः स्यात्तस्यास्ते- | करता हूँ-अर्थात् जिस देवताका नैव भागेन भागिन्यौ भागवत्यौ | जो हवि आदि भाग है उसके उसी वां करोमीति सृष्ट्यादाइीश्वर | भागसे मैं तुम्हें उनकी भागिनी-भाग एवं व्यदधाद्यस्मात्तस्मादिदानी- | ग्रहण करनेवाली बनाता हूँ, मपि यस्यै कस्यै च देवतायै | क्योंकि सृष्टिके आदिमें ईश्वरने ऐसी अर्थाय हविर्गृह्यते चरुपुरोडाशा- | व्यवस्था कर दी थी इसलिये इस दिलक्षणं भागिन्यावेव भागव- | समय भी जिस किसी देवताके लिये त्यावेवास्यां देवतायामशनाया- | चरु पुरोडाशादि हवि ग्रहण की पिपासे भवतः ॥ ५ ॥ | जाती है ये क्षुधा-पिपासा भी उस | देवतामें भागिनी होती ही हैं ॥५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः समाप्तः ॥ २ ॥

तृतीय खण्ड

तृतीय खण्ड अन्नरचनाका विचार स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥ उस (ईश्वर) ने विचारा ये लोक और लोकपाल तो हो गये अब इनके लिये अन्न रचूँ ॥ १ ॥ स एवमीश्वर ईक्षत, कथम् ? | उस ईश्वरने इस प्रकार ईक्षण | किया-किस प्रकार ? [सो इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्च | बतलाते हैं-] मैंने इन लोक और | लोकपालोंकी रचना तो कर दी मया सृष्टा अशनायापिपासाभ्यां | और इन्हें क्षुधा-पिपासासे संयुक्त च संयोजिताः; अतो नैषां | भी कर दिया । अतः अन्नके बिना स्थितिरन्नमन्तरेण।तस्मादन्नमेभ्यो | इनकी स्थिति नहीं हो सकती; | इसलिये इन लोकपालोंके लिये मैं लोकपालेभ्यः सृजै सृज इति । | अन्न रचूँ । एवं हि लोके ईश्वराणामनुग्रहे | इस प्रकार लोकमें ईश्वरों | (समर्थों) की अपने लोगोंके ऊपर निग्रहे च स्वातन्त्र्यं दृष्टं स्वेषु । | अनुग्रह एवं निग्रह करनेकी तद्वन्महेश्वरस्यापि सर्वेश्वरत्वा- | स्वतन्त्रता देखी जाती है । इसी | प्रकार सर्वेश्वर होनेके कारण महेश्वर त्सर्वान्प्रति निग्रहानुग्रहेऽपि | (परमेश्वर) की भी सबके प्रति निग्रह स्वातन्त्र्यमेव ॥ १ ॥ | एवं अनुग्रहमें स्वतन्त्रता ही है ॥ १ ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ अन्नकी रचना सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥ २॥ उसने आपों (जलों) को लक्ष्य करके तप किया। उन अभितप्त आपोंसे एक मूर्ति उत्पन्न हुई, यह जो मूर्ति उत्पन्न हुई वही अन्न है ॥२॥ स ईश्वरोऽन्नं सिसृक्षुस्ता एव | अन्न रचनेकी इच्छावाले उस पूर्वोक्ता अप उद्दिश्याभ्यतपत् । | ईश्वरने उन पूर्वोक्त जलोंको ही ताभ्योऽभितप्ताभ्य उपादान- | उद्देश्य करके तप किया। उन भूताभ्यो मूर्तिर्घनरूपं धारण- | उपादानभूत अभितप्त जलोंसे ही समर्थं चराचरलक्षणमजायतोत्प- | धारण करनेमें समर्थ चराचरभूत न्नम्। अन्नं वै तन्मूर्तिरूपं या वै | घनरूप मूर्ति उत्पन्न हुई। यह जो सा मूर्तिरजायत ॥ २॥ | मूर्ति उत्पन्न हुई वह मूर्तिरूप | अन्न ही है ॥ २ ॥ ❧❧❧ अन्नका पलायन और उसके ग्रहणका उद्योग तदेनत्सृष्टं पराङ्त्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्ना- शक्नोद्वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद्वाचाग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ३ ॥ [ लोकपालोंके आहारार्थ ] रचे गये उस इस अन्नने उनकी ओरसे मुँह फेरकर भागना चाहा। तब उस (आदिपुरुष) ने उसे वागिन्द्रिय- द्वारा ग्रहण करना चाहा, किन्तु वह उसे वाणीसे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे वाणीसे ग्रहण कर लेता तो [ उससे परवर्ती पुरुष भी ] अन्नको बोलकर ही तृप्त हो जाया करते ॥ ३ ॥

४४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

४४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १


तदेतदन्नं लोकलोकपालाना- | लोक और लोकपालोंके निमित्त मर्थेऽभिमुखे सृष्टं तद्यथा मूष- | उनके सम्मुख निर्मित हुआ अन्न यह कादिर्मार्जारादिगोचरे सन्मम | मानकर कि अन्न भक्षण करनेवाला तो मृत्युरन्नाद इति मत्वा परागञ्च- | मेरी मृत्यु है, उसकी ओरसे मुख तीति पराङ् सदृत्तन्तीत्याजि- | मोड़कर, जिस प्रकार बिलाव आदिके घांसदतिगन्तुमैच्छत् पलायितुं | सामनेसे [उसे अपनी मृत्यु समझकर] प्रारभतेत्यर्थः । | चूहे आदि भागना चाहते हैं उसी तदन्नाभिप्रायं मत्वा स लोक- | प्रकार उन अन्न भक्षण करनेवालोंका लोकपालसंघातः कार्यकारण- | अतिक्रमण करके जानेकी इच्छा लक्षणः पिण्डः प्रथमजत्वाद् | करने लगा; अर्थात् उसने उनके अन्यांश्चान्नादानपश्यंस्तदन्नं | सामनेसे दौड़ना आरम्भ कर दिया। वाचा वदनव्यापारेणाजिघृक्षद् | अन्नके उस अभिप्रायको जान- ग्रहीतुमैच्छत् । तदन्नं नाशक्नोन्न | कर लोक और लोकपालोंके देह- समर्थोऽभवद्वाचा वदन- | इन्द्रियरूप संघात उस पिण्डने क्रियया ग्रहीतुमुपादातुम् । | प्रथमोत्पन्न होनेके कारण अन्य स प्रथमजः शरीरी यद्यदि | अन्नभोक्ताओंको न देखकर उस हैनद्वाचाग्रहैष्यदगृहीतवान्त्स्याद- | अन्नको वाणी अर्थात् बोलनेकी न्नं सर्वोऽपि लोकस्तत्कार्यभूतत्वा- | क्रियासे ग्रहण करना चाहा। किन्तु दभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत्तृ- | वह वदनक्रियासे उस अन्नको ग्रहण प्तोऽभविष्यत्, न चैतदस्ति; | करनेमें शक्त—समर्थ न हुआ। | वह सबसे पहले उत्पन्न हुआ देह- | धारी यदि इस अन्नको वाणीसे | ग्रहण कर लेता तो उसका कार्यभूत | होनेके कारण सम्पूर्ण लोक अन्नको | बोलकर ही तृप्त हो जाया | करता। परन्तु बात यह है नहीं,

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ अतो नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुमि- | अतः हमें जान पड़ता है कि वह त्यवगच्छामः पूर्वजोऽपि ॥३॥ | पूर्वोत्पन्न विराट् पुरुष भी उसे वाणीसे | ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं हुआ था॥३॥ ❧❧❧❧❧ समानमुत्तरम्— | आगेका प्रसंग भी इसीके समान | है— तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ४ ॥ फिर उसने इसे प्राणसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु इसे प्राणसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे प्राणसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नके उद्देश्यसे प्राणक्रिया करके तृप्त हो जाता ॥ ४ ॥ तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैन- च्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५ ॥ उसने इसे नेत्रसे ग्रहण करना चाहा; परन्तु नेत्रसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे नेत्रसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नको देखकर ही तृप्त हो जाया करता ॥ ५ ॥ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥ उसने इसे श्रोत्रसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह श्रोत्रसे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे श्रोत्रसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नको सुनकर ही तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥

४६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

४६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धै- नत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ७ ॥ उसने इसे त्वचासे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह त्वचासे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे त्वचासे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नको स्पर्श करके ही तृप्त हो जाया करता ॥ ७ ॥ तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धै- नन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ८ ॥ उसने इसे मनसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह मनसे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे मनसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नका ध्यान करके ही तृप्त हो जाया करता ॥ ८ ॥ तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥ उसने इसे शिश्न ( लिङ्ग ) से ग्रहण करना चाहा; परन्तु वह शिश्नसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे शिश्नसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नका विसर्जन करके ही तृप्त हो जाता ॥ ९ ॥ अपानद्वारा अन्नग्रहण तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वा- युरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥ फिर उसने इसे अपानसे ग्रहण करना चाहा और इसे ग्रहण कर लिया। वह यह [ अपान ] ही अन्नका ग्रह (ग्रहण करनेवाला) है। जो वायु अन्नायु (अन्नद्वारा जीवन धारण करनेवाला) प्रसिद्ध है वह यह [ अपान ] वायु ही है ॥ १० ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

तत्प्राणेन तच्चक्षुषा तच्छ्रोत्रेण | [ इसी प्रकार उसने ] उस अन्न- तत्त्वचा तन्मनसा तच्छिश्नेन | को प्राणसे, नेत्रसे, श्रोत्रसे, त्वचासे, तेन तेन करणव्यापारेणान्नं | मनसे, शिश्नसे एवं भिन्न-भिन्न ग्रहीतुमशक्नुवन्पश्चादपानेन | इन्द्रियोंके व्यापारसे ग्रहण करनेमें वायुना मुखच्छिद्रेण तदन्नमजि- | असमर्थ होकर अन्तमें उसे मुखके घृक्षत् । तदावयत्तदन्नमेवं जग्राह | छिद्रद्वारा अपानवायुसे ग्रहण करने- आशितवान् । तेन स एषोऽपान- | की इच्छा की । तब उसे ग्रहण कर वायुरन्नस्य ग्रहोऽन्नग्राहक इत्ये- | लिया; अर्थात् इस प्रकार इस अन्नको तत् । यद्वायुर्र्यो वायुरन्नायुः | भक्षण कर लिया। उसी कारणसे अन्नबन्धनोऽन्नजीवनो वै प्रसिद्धः | वह यह अपानवायु अन्नका ग्रह स एष यो वायुः ॥ ४-१० ॥ | अर्थात् अन्न ग्रहण करनेवाला है। | जो वायु अन्नायु-अन्नरूप बन्धन- | वाला अर्थात् अन्नरूप जीवनवाला | प्रसिद्ध है वह यह [ अपान ] वायु | ही है ॥ ४-१० ॥ ❖❖❖ परमात्माका शरीरप्रवेशसम्बन्धी विचार स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति । स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥ उस परमेश्वरने विचार किया 'यह (पिण्ड) मेरे बिना कैसे रहेगा ?' वह सोचने लगा 'मैं किस मार्गसे [ इसमें ] प्रवेश करूँ ?' उसने विचारा, 'यदि [ मेरे बिना ] वाणीसे बोल लिया जाय, यदि प्राणसे प्राणन क्रिया कर ली जाय, यदि नेत्रेन्द्रियसे देख लिया जाय, यदि कानसे सुना