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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

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स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद १५६

अकबर बीरबल विनोद १५६ इस मन्नत पर बादशाह ने हँस दिया और उसे संबोधन कर बोला—"क्यों बीरबल अब तुम्हारी अक्ल ठिकाने आ गई; आखिरश लाचार होकर तुम्हें भी मानता माननी ही पड़ी।" बीरबल ने उत्तर दिया—"बेशक ! पीर साहब की ही शरण लेनी पड़ी।" पश्चात् वह सब दरबारियों सहित कबर के समीप जा पहुँचा और उसके बीच वाला पत्थर अपने हाथ से उठाकर अलग रख दिया और उसके भीतर से उस गठरी को निकाल कर बाहर किया। बादशाह इस बात को देखकर बड़ा हैरान हुआ और बीरबल से उसका कारण पूछा। बीरबल ने उत्तर दिया—"पृथ्वीनाथ ! यही आपके यकीन- शाह पीर हैं और आपने इन्हीं की मानता की थी। बादशाह को उस शाल की गठरी के भीतर अपने जूते की पवाई देख- कर बड़ा आश्चर्य हुआ और लज्जित होकर अपनी गर्दन नीची कर ली। बीरबल बोला—"गरीबपरवर ! अब आप ही फर्मावें कि आस्था बड़ी है वा पीर।" अपने मनका विश्वास ही मुख्य है। जब विश्वास नहीं रहता तो मानता भी निष्फल हो जाती है। इसलिये आपको कहना पड़ेगा कि मुख्य विश्वास ही है।" बादशाह ने बीरबल की बात मान ली। यकीनशाह की बड़ी शोहरत हो गई थी जिस कारण वहाँ पर काफी धन संचित हो गया था। उस धन से बीरबल ने वहाँ पर एक मसजिद बनवा दिया। बीरबल की बुद्धिमानी से बादशाह को मात होना पड़ा।

१५७ अकबर बीरबल विनोद

१५७ अकबर बीरबल विनोद कौन सा अच्छा एक दिन बादशाह अपने दर्बार में बैठा हुआ दर्बारियों से दिल-बहलाव की बातें कर रहा था, इसी दर्मियान बीरबल भी आ पहुँचा ! बादशाह ने बीरबल से पूछा- “बीरबल ! क्या बतला सकते हो कि फल कौन सा अच्छा? दूध किसका अच्छा, पत्ता किसका अच्छा, फूल कौन सा अच्छा, मिठास कौन सी अच्छी, राजा कौन अच्छा ?” उप- स्थित मण्डली में एक भी ऐसा न था जो ऊपर के प्रश्नों का उचित उत्तर देता । तब बादशाह ने इसका भार बीरबल के ऊपर दिया । बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ ! फलों में बेटा अच्छा है जिससे बाप दादों का नाम पुस्त दरपुस्त चला जाता है । दूध माता का उत्तम होता है जिससे सब का पालन पोषण होता है । पत्ता पान का अच्छा होता है। इसके देने से नौकर स्वामिभक्त हो जाता है, यहाँतक कि उसके लिये प्राण तक न्योछावर करने को उद्यत हो जाता है। फूल कपास का अच्छा होता है कारण कि उसके सहारे संसार भर की लज्जा रहती है। मिठास वाणी की अच्छी होती है, जिसके फल- स्वरूप बिना पैसा कौड़ी के लोग वश में हो जाते हैं। राजाओं में इन्द्र महान है जो पानी बरसाकर जगत को पालता है।” बीरबल के ऐसे उत्तर से सब सभासदों के सहित बादशाह अति प्रसन्न हुए और बीरबल को कई बीघे भूमि जागीर दी ।

अकबर बीरबल विनोद १५८

अकबर बीरबल विनोद १५८ गरीब की आह एक दिन तुर्किस्तान के बादशाह को अकबर की परीक्षा लेने का विचार हुआ। वह एक एलची को पत्र देकर कई और सिपाहियोंके साथ दिल्ली भेजा। पत्रका आशय यह था-“अक- बर शाह ! मुझे सुनने में आया है कि आपके भारतवर्ष में कोई ऐसा वृक्ष उत्पन्न होता है कि जिसके पत्तों के खाने से मनुष्य की आयु बड़ी होती है। यदि यह बात सच्ची है तो मेरे लिये उस वृक्ष के थोड़े पत्ते भेज देना।” बादशाह इस पत्र को पढ़कर विचारमग्न हो गया, फिर कुछ देर तक बीरबल से राय मिलाकर सिपाहियों सहित उस एलची को कैद कर एक सुदृढ़ किले में बन्द करा दिया। इस प्रकार कैद हुए जब उनको कई दिन हो गये तो एक दिन बादशाह बीरबल को साथ लेकर उन कैदियों को देखने गया। बादशाह को देखकर उनको अपने मुक्त होने की आशा हुई; परन्तु वह बात निर्मूल थी। बादशाह उनके पास पहुँच कर बोला-“तुम्हारा बादशाह जिस वस्तु को चाहता है वह मैं तबतक उसे न दे सकूँगा जबतक कि इस सुदृढ़ किले की एक एक ईंट न ढह जाय। उसी वक्त तुम लोग आजाद भी किये जावोगे। तुमको खाने पहनने की तकलीफ न होगी; मैंने उसका यथोचित प्रबन्ध कर दिया है।” इतना कहकर बादशाह चले गये, परन्तु उन कैदियों की चिन्ता और भी बढ़ गई। वे अपने मुक्त होने का उपाय सोचने लगे। उनको अपने स्वदेश के सुखों का स्मरण कर बड़ा दुख होता था।

१५६ अकबल बीरबल विनोद

१५६ अकबल बीरबल विनोद वे सब कुछ देर तक इसी चिन्ता में डूबे रहे, अन्तमें उनका ध्यान ईश्वर प्रार्थना की तरफ झुका और अपने मुक्त होने के लिये ईशवन्दना करने लगे । “हे भगवन् ! क्या हम इस बन्धन से मुक्त न किये जायँगे ! क्या हमारा जन्म इसी किले में बन्द रहकर कष्ट भोगने ही के लिये हुआ था ! आप दीना- नाथ बजते हैं, अपना नाम याद कर हम असहायों की वेगि सुधि लीजिये ।” जैसे २ उनकी मुक्त होने की आशा विलीन होती गई तैसे २ नित्य परमेश्वर से उस किले के टूटने के लिये प्रार्थना करने लगे । ईश्वर की दयालुता प्रसिद्ध है-एक दिन बड़े जोरों का भूकम्प आया और किले का कुछ भाग भूकम्प के कारण धराशायी हो गया। सामने का पर्वत भी टूटकर चकनाचूर हो गया। इस घटना के पश्चात् एलची ने बादशाह के पास किला टूटने की सूचना भेजी। बादशाह को अपने बचन का स्मरण हो आया। इसलिये उस एलची को उसके साथियों सहित दर्बार में बुलवा कर बोला-“आपको अपने बादशाह का आशय विदित होगा और अब उसका उत्तर भी तुमने समझ लिया है, यदि न भी समझे हों तो सुनो, मैं उसे और भी स्पष्ट किये देता हूँ। देखो तुम लोग गणना के केवल सौ ही मनुष्य हो, परन्तु तुम्हारी आह से ऐसा सुदृढ़ किला ढह गया, फिर जहाँ हजारो मनुष्यों पर अत्याचार हो रहा है वहाँ के बादशाह की आयु कैसे बढ़ेगी, बल्कि दिनोंदिन घटती ही जायगी और यथाशीघ्र लोगों की आह से उसका पतन हो जायगा। तब बादशाह की आयु

अकबर बीरबल विनोद १६०

अकबर बीरबल विनोद १६० क्योंकर बढ़ सकती है। हमारे राज्य में तो अत्याचार भरसक नहीं होने पाता है। गरीब प्रजा पर अत्याचार न करना और उसका भलीभाँति पालन पोषण करना ही आयुवर्धक वृक्ष है बाकी सारी बातें मिथ्या हैं। दो०-दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय। मुए खाल को स्वाँस सों, सार भसम ह्वै जाय॥ इस प्रकार समझा बुझाकर बादशाह ने उस एलची को उसके साथियों सहित स्वदेश लौट जाने की आज्ञा दी और उनका राह खर्च भी दिया गया। वे तुर्किस्तान में पहुँच कर यहाँ की सारी बातें अपने बादशाह को समझाया। अकबर की शिक्षा को सुनकर बादशाह दरबारियों सहित उसकी भूरि भूरि प्रशंसा करने लगा।

जूते की मार अकबर बादशाह के राज में दिल्ली के निकट ग्राम में एक स्त्री रहती थी। उसका दिमाग बहुत चढ़ा हुआ था, जिस कारण वह नित्य अपने पति को दस जूते मारा करती थी। उसको एक पुत्री भी थी। जब वह सयानी हुई तो उसके विवाह की चरचा छिड़ी। उसने वर के लिये दूर २ के गाँवों में अपना पैगाम भेजा, परन्तु कोई उस कन्या से अपने लड़के का विवाह करने के लिये राजी न हुआ। कारण कि सबको उस कन्या के माता की करतूत मालूम थी। वे लोग

अकबर बीरबल बिनोद १६१ यही सोचते थे कि जैसी माता है उसकी पुत्री भी उसीके समान होगी । उन दिनों भगवान की कृपा से बीरबल की बड़ी ख्याति हो रही थी। जिसकारण कितने ही लोग क्या जात क्या परजात भीतर भीतर उससे ईर्षा करने लगे । सबों ने मिलकर सोचा कि यदि इस लड़की से बीरबल का विवाह हो जावे तो इसकी कीर्ति की जगह अपकीर्ति फैलने लगे।” एक दिन बीर- बल को बिरादरी का एक ब्राह्मण जो कि पुरोहिती करता था उससे मिलने आया । थोड़ी देरतक इधर उधर की बातें कर वह बीरबल से उस लड़की के साथ विवाह करने का आग्रह किया। बीरबल ने कहा-“पंडितवर ! आप जानते ही हैं कि मेरा विवाह हो चुका है, फिर एक स्त्री के रहते हुए दूसरी के साथ विवाह करना अनुचित होगा; हाँ यदि आपकी ऐसी ही इच्छा है तो आप मेरे भाई को पसंद करें । वह काशी जी पढ़ने गया है, मैं उसका विवाह करने के लिये तय्यार हूँ ।” पुरोहित की मंशा वर आई, बीरबल नहीं तो उसका भाई ही सही । घरमें अशान्ति होने से बीरबल को भी कष्ट होगा । ऐसी पक्की धारणा बनाकर वह राम बाई के घर पहुँचा, वहाँ की अजीब हालत थी । रामबाई पतिदेव के मस्तक पर नौ जूता चढ़ा चुकी थी । दसवें के लिये भी तैयार थी, इसी बीच पुरोहित जी उसके मकान में दाखिल हुये और हैं ! हैं ! हैं करके उसे रोकना चाहा, परन्तु वह कुलटा भला कब मानने वाली थी । अपना दसवाँ जूता भी विचारे पति को जड़कर ही शान्त हुई । ११

१६२ अकबर बीरबलविनोद

१६२ अकबर बीरबलविनोद जब उसका मिजाज कुछ ठिकाने आया तो उसने पुरोहित के आनेका कारण पूछा। पुरोहित बीरबल का नाम लेकर बोला- मैं तुम्हारी लड़की की शादी के लिये एक वर देख आया हूँ। लड़का काशी में पढ़ रहा है; केवल तुम्हारी अनुमति की देर थी। यदि कहो तो विवाह निश्चित किया जाय। रामबाई पुरो- हित से बड़ी प्रसन्न हुई और उसका आदर सत्कार कर बोली-"मुझे मंजूर है, आप जाकर पक्का कर आइये।" पुरोहितजी फिर उल्टे पाँव बीरबल के पास पहुँचे और दोनों पक्ष को राजी कर रामबाई की कन्या और बीरबल के छोटे भाई की शादी पक्की कर दी। बीरबल पुरोहित का आन्तरिक भाव पहले ही ताड़ गया था। इसलिये झूठ मूठ अपना छोटा भाई होना बतला कर पुरोहित को फाँस लिया था। इधर जब विवाह पक्का हो गया तो वह एक सजातीय अनाथ लड़के की खोज में पड़ा। कहा भी है- जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। हौं बौरी ढूढ़न गई, रही किनारे बैठ॥ दो तीन दिनों के प्रयास करने ही से उसे एक लड़का २०, २५ वर्ष का मिल गया। वह अपने पेट पालन के फिराक में दिहात से ऊबकर दिल्ली नगर में आया था, हाँ इतना अव- श्य था कि उसने पहले कुछ विद्या भी हासिल कर ली थी। बीरबल उस लड़के को आश्रय देने का वचन देकर अपने घर ले गया और उसको समझा बुझा कर बोला-"देखो मैं तुम्हारा विवाह रामबाई की कन्या से करा दूँगा और तुम्हें निर्वाह मात्र के लिये सारा सामान भी दूँगा, परन्तु एक बात तुमको

अकबर बीरबल विनोद १६३

अकबर बीरबल विनोद १६३

भी करनी पड़ेगी। लोगों में तुमको मेरा छोटा भाई होना विख्यात करना पड़ेगा, बल्कि यत्र तत्र इसका प्रचार भी काफी तौर से करना होगा, वह लड़का बहुत प्रसन्न हुआ और बीरबल का छोटा भाई बनना सहर्ष स्वीकार किया। “मरत रहे एक चना के, पाय गये दो दाल।” भला इस जमाने में ऐसा कौन होगा जिसको अपना विवाह होना न भावे। अब दोनों तरफ से विवाह की तय्यारी होने लगी। जब अच्छा मुहूर्त आया तो बाजे गाजे के साथ उसका गठबन्धन हो गया। लड़की के बिदाई की शायत शोधकर पुरोहित फिर रामबाई से मिला और उसे कन्या के रुखसती का दिन बतला कर बोला-“बाईजी! मैं चाहता हूँ कि आप जैसी मिजाज की तेज हैं और अपने पति को दबाकर उसपर अपना पूरा प्रभाव जमाये रहती हैं; उसी प्रकार आपकी लड़की आपसे भी बढ़कर हो, तब तो तुम्हारा नाम, नहीं तो सब व्यर्थ होगा।” इतना कहकर पुरोहितजी अपने घर चले गये। रामबाई बड़े चिड़चिड़े मिजाज की औरत थी उसने अपनी लड़की को बुलाकर समझाया-“देखना बेटी! तुम हमारे नाम को कायम रखना; अपने पति को हर समय दबाये रहना, मैं तो अपने पतिको प्रतिदिन दस ही जूते मारती हूँ, तुम पन्द्रह का हिसाब रखना। अगर मेरे कहे अनुसार न चलेगी तो मैं फिर आजन्म तेरा मुख नहीं देखूँगी।” क्रमशः लड़की के बिदाई की घड़ी भी आ पहुँची। रामबाई ने अपने पति को उसे ससुराल पहुँचाने के लिये

१६४ अकबर बीरबल विनोद

१६४ अकबर बीरबल विनोद भेजा। लड़की को घर आते ही बीरबल ने अपना रुख ऐसा बनाया कि वह कन्या बीरबल के सामने गाय की तरह काँपने लगी। इधर बीरबल ने अपने बनावटी भाई को भी उससे चिड़चिड़ा बनकर रहने की सीख पहले से ही दे रक्खी थी। इन दोनों के चिड़चिड़ेपन को देखकर बिचारी कन्या का जूता जड़नेका भाव काफूर होगया और डरके कारण अपने माँ के दिये जूते को एक कोनेमें गुप्त रीति से छिपा कर रख दिया। बीरबल ने लड़की के बाप यानी अपने ससुर को कुछ दिन वहीं ठहरने का आग्रह किया जिस कारण वह कुछ दिनों के लिये वहीं रुक गया। बीरबलने देखा कि अब यहाँ तो सफलता मिल गई, दूसरी तरफ भी हाथ साफ करना चाहिये। एक दिन अपने भाई के श्वसुर विटोकड़ा विष्णु से वार्तालाप करता हुआ प्रेम से गदगद होकर उनके पीठ पर हाथ फेरने लगा। पीठ में गढ़े तो पड़े ही थे, उसने द्रवित होकर पूछा-हैं ! आपकी पीठ में ये गढ़े कैसे हैं?" लड़की का पिता दुखित होकर अपना सारा समाचार कह सुनाया। बीरबलने कहा-"भाई दुख मनाने से दुख न छूटेगा, बल्कि वृवृत्ति के लिये कुछ उपाय करना चाहिये। यदि आप करें तो मैं एक रास्ता बतलाऊँ, उससे आप का दुःख अवश्य छूट जायगा।" उसने बीरबलकी बात मान ली। तब बीरबलने कहा- "आपको मेरे यहाँ लगातार चार महीने रहना पड़ेगा और नित्य सूर्य के सामने मुख कर के इतने दण्डवत करने होंगे कि जिससे आपका शरीर पसीने से तर न हो जाय। वह नित्य

अकबर बीरबल विनोद १६५

अकबर बीरबल विनोद १६५ बीरबल के बतलाये क्रमानुसार सूर्य्य को दण्ड प्रणाम करने लगा । उधर बीरबलने उसके खाने पीने का अच्छा प्रबन्धकर दिया। पौष्टिक पदार्थ खाने को मिलने से चार महीने में वह मुटाकर लड़की का कुन्दा हो गया। तब बीरबल ने लुहार को आर्डर देकर एक सुन्दर डंडा बनवाया, उसमें स्थान २ पर ऐसे लोहे जड़वा दिये कि वह खासा लुहाँगी बन गया। बीरबल उस लुहांगी को उसे देकर बोला- “देखो लोगों के पूछने पर इस लुहांगी को अपना गुरुभाई बतलाना । फिर उसे भलीभाँति शिक्षित कर उसको घर भेज दिया। इधर रामबाई नित्य के जूतों का हिसाब जोड़कर उसका घाटा जोड़ा करती थी। जब उसका पति पाँच महीने में हृष्टपुष्ट होकर आया तो वह देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। कहाँ तो बिचारा थकामांदा मंजिल मार कर आया था, कहाँ उसे जूता जमाने की सूझी। वह कुल्टा पतिको जूता खानेके निश्चित स्थान पर ले गई, वह चुप चाप बैठा रहा, परन्तु अपने गुरुभाई यानी लुहाँठी को नहीं भूला। ज्योंही उसकी स्त्री ने उसके सिरपर पहला जूता लगाया कि वह उठकर लुहाँठी को तानकर उसके सिर पर ऐसा जमाया कि उसका सिर भन्नाने लगा-वह बोली-“अरे ! राम राम यह तो मार ली रे।” पति ने थोड़ा अन्तर देकर एक दण्डा और जमाया। अभी तीसरा मारने ही जा रहा था कि इतने ही में अड़ोस पड़ोस के कुछ लोग जमा हो गये और पीछे से उसका हाथ पकड़ लिये। स्त्री डर के कारण काँपने लगी और उसने

१६६ अकबर बीरबल विनोद

१६६ अकबर बीरबल विनोद उठकर !अपने पति से क्षमा प्रार्थना की। वह सदैव के लिये उसकी चेलिन हो गई। बीरबल के द्वेषियों का दिल टूट गया और उसी तारीख से लोगों ने उसका अनिष्ट सोचना छोड़ दिया। ———०*०——— गद्दी पर पाखाना सिंहल द्वीप का बादशाह् दिल्लीधीश्वर से कुछ भीतर २ कुढ़ा करता था। एक दिन उसे नीचा दिखानेके अभिप्राय से एक वेश्या को कुछ सिखला पढ़ाकर दिल्ली भेजा। वह वारांगना महासुन्दरी और नृत्य कला की पूर्ण पण्डिता थी। उसने दिल्ली नगर में पहुँचकर एक बढ़िया मकान सड़क के चौराहे पर किराये में लिया और उसमें नित्य सायंकाल में श्रृङ्गार कर गायन वाद्य किया करती थी। तबला और सारंगी बजाने वाले भी सिंहल द्वीप ही से अपने साथ लायी थी। धीरे २ इसकी शोहरत नागरिकों में फैली। वे उसके पास अधिक संख्या में आने जाने लगे, वह किसी से कुछ नहीं लेती थी बल्कि आगतोंकी बड़ी प्रीतिपूर्वक स्वागत करती थी। इसकी ऐसी प्रतिष्ठा सुनकर बादशाह के कितने दरबारी भी गुप्तरूप से उसके पास आये और उसकी आवभगत और कलावि- शेषता से मुग्ध होकर लौटे। यह बात बड़े तेजी से अमीर गरीबके कानों तक फैल गई। जब बादशाह ने इस नवयौवना वेश्या की प्रशंसा अपने दरबारियों के मुख से सुनी तो उसे भी उसको देखने की इच्छा हुई। वह उसके मकान पर नहीं जा सकता।

अकबर बीरबल विनोद १६७

अकबर बीरबल विनोद १६७ था अतएव उसे अपने यहाँ बुलवाने का निश्चय किया। दूसरे दिन दीवानखाना खूब सजाया गया। उस कमरे में भारतवर्ष की एक से एक सजावट की वस्तुएँ अपने २ करीने से सजाकर रख दी गईं। दरबारियों के बैठने के लिये आसन भी खूब सजाकर लगाया गया। जब इस प्रकार से बादशाह ने अपने यहाँ तय्यारी कर ली तो एक चपरासी द्वारा उस नवागत बारांगणा को बुलावा भेजा। वह भला कब नहीं करने वाली थी यह तो उसकी मनचाही बात थी। उसने बादशाह के दरबार में जाना सहर्ष स्वीकार किया। फिर सायंकाल में खूब सार श्रृङ्गार कर अपने सफरदाइयों को लिये हुये दरबार में दाखिल हुई। उसकी लुनाई से दिल्ली दर्बार रौशन हो गया। बादशाह ने चपरासी भेजकर अपने सब दरबारियों को बुलवाया। वे बादशाह का निमंत्रण पाकर नवीन वेश्या का नृत्य देखने की इच्छा से आये। यह नायका अपने रूप लावण्य और कला कौशल से कितनों को मोहित कर चुकी थी, फिर बादशाह क्यों न मुग्ध होता-“उसने बड़ी निपुणता से लगातार छः सात घण्टों तक नृत्य गान किया। सभी लोग उसकी तारीफ करने लगे। बादशाह ने भी मुक्तकंठ से प्रसंशा की। बादशाह ने अपने मन में अनुमान किया कि यह द्रव्योपार्जन के निमित्त यहाँ आई है इसलिये इसको द्रव्या- भूषण देकर संतुष्ट करना चाहिये। बादशाह दीवान से राय मिलाकर उसके लिये बहुत सी अशर्फियाँ और सुन्दर २ वस्त्र देने के लिये मँगवाया। वह उनको देखकर विनम्रता से बोली-“पृथ्वीनाथ ! मैं यह नृत्य गान आपको गुणग्राही

१६८ अकबर बीरबल विनोद

१६८ अकबर बीरबल विनोद समझकर किया है, मुझे अपना मन प्रसन्न करना अभीष्ठ था, इनाम की चाहना नहीं है।" बादशाहने मनमें सोचा-"शायद इतने पारितोषिकको न्यून समझकर यह संतुष्ट नहीं हुई है अतएव इसे कुछ और धन पाने की लिप्सा है। वह उस वेश्या से बोला-"यदि तुझे और कुछ माँगने की इच्छा हो तो उसे भी माँग सकती हो?" वेश्या ने कहा-"पृथ्वीनाथ ! मुझे केवल एक वस्तु माँगने की इच्छा है, परन्तु आप पहले बचनबद्ध हों तो माँगू।" बाद- शाह कुछ सोंच विचार के बाद बोला-"मेरी घर की निजी वस्तुओं के अतिरिक्त जो कुछ माँगोगी तुझे दिया जायगा। मैं अपनी बात एक बार कहकर फिर लौटाता नहीं हूँ।" वह कुछ देर खामोश रहकर फिर बोलो-"गरीबपरवर ! मैं आपके गद्दी पर पाखाना फिरने की इच्छा रखती हूँ।" उस वेश्या की इस ढिठाई पर सब दरबारी सन्न हो गये। उसने खुल्लमखुल्ला बादशाह का अपमान किया था। बादशाह भीतर २ बड़ा क्रोधित हुआ, परन्तु चूँकि बचनबद्ध हो चुका था इसलिये प्रगट रूप से खामोश रहा। सबको बड़ा सोच हुआ। किसी की अकल काम नहीं करती थी। आखिर बीरबल से राय मिलाई गई। बीरबल ने बादशाह को ढाढ़स दिलाया। वह वेश्या लोगों को फुस-फुस करते देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और उसके चेहरे पर हठात् हँसी आने लगी। बीरबल बोला-"इसको बचन दिया जा चुका है इसलिये उसका पालन किया जायगा।" वेश्या बोली-"मैंने पहले ही आपसे आज्ञा प्राप्त करली है तब माँगा है। यदि नहीं

अकबर बीरबल विनोद १६६

अकबर बीरबल विनोद १६६ कर दिया जायगा तो मैं बिना उज्र चली जाऊँगी ।” बीरबल उसे डाँटकर बोला-“ऐ वेश्या ! तुझे ज्ञात होना चाहिये था कि यह दिल्लीधीश्वर का दरबार है और ये जगत विजयी बादशाह हैं; यहाँ पर आकर यह क्या गंदी बात मुँह से निकालती है, यदि तुझे माँगना ही था तो कोई अलभ्य वस्तु माँगती जिससे तू अजाचक हो जाती और तेरी कीर्ति देशदेशान्तर में फैलती।” वह बोली-“दीवान महोदय ! मैंने जिस चीज को आप से माँगा है यदि उसे देना मंजूर हो तब तो देवें नहीं तो इन्कार करें, मैं अपने घर लौट जाऊँगी । आगा पीछा करने से क्या लाभ ? हाँ तो हाँ, नहीं तो नहीं ।” बीरबल ने बादशाह से कहा-“पृथ्वीनाथ ! मैंने इस विदेशी वेश्याको आगा पीछा दिखलाकर बहुत कुछ समझाया, परन्तु वह एक भी मानने को राजी नहीं है, बचन का पालन करना आवश्यक है, नहीं तो संसार में आपकी बड़ी अपकीर्ति फैलेगी। बादशाह ने बीरबल के मत को स्वीकार किया। तब कौल बीरबल ने वेश्या से कहा-“बादशाह की आज्ञा है, तू अपना मनोभिलषित पूर्ण कर ले। यानी गद्दी पर पाखाना कर ले। हाँ एक बात याद रखना कि पाखाना के समय पेशाब न निकले। जो तू इस बात में जरा भी चूकेगी तो तुरत जान से मार डाली जायगी।” अब तो उस भठियारिन के कान खड़े हो गये; कुछ देर तक आगा पीछा करती रही, फिर बादशाह को सलाम कर चुपके से चली गई । उसका काम समाप्त हो गया इसलिये वह अब दिल्ली

१७० \hfill अकबर बीरबल विनोद

१७० \hfill अकबर बीरबल विनोद शहर में टिककर निरर्थक समय खोना अच्छा नहीं समझती थी। डेरे पर पहुँचकर तुरत स्वदेश लौटने की तैयारी कर सिंहलद्वीप चली गई। पहुँचकर दिल्लीधीश्वर के दरबार का सब समाचार यथातथ्य कहकर अपने राजा को सुनाया। वहाँ के लोग बीरबल की बुद्धि की सराहना करने लगे। झख मार रहे हैं एक दिन जमुना किनारे एक मल्लाह मछलियों का शिकार कर रहा था उसी समय बीरबल को लिये दिये बादशाह भी वहीं पर जा पहुँचा “देखा-देखी पाप, देखा-देखी पुन्य।” बादशाह को भी शौक हुआ और वह वहीं बैठकर मछलियाँ मारने लगा। मछली मारते-मारते उसे कोई ऐसा काम स्मरण हो आया कि उससे बीरबल को बेगम के पास भेजना पड़ा। बीरबल हुक्म पाकर बेगम से जा मिला। कुशल भलाई के बाद बेगम ने पूछा-“बादशाह क्या कर रहे हैं?” बीरबल ने कहा-“कर क्या रहे हैं, जमुना जी के किनारे बैठे २ झख मार रहे हैं।” बीरबल के मुख से उपरोक्त उत्तर पाकर बेगम भीतर २ बड़ी नाराज हुई, परन्तु बीरबल से कुछ बोल न सकी। जब रात्रि समय में बादशाह आया तो वह कुपित होकर बोली- “पृथ्वीनाथ! बीरबल को आपने बहुत सिर चढ़ा लिया है जिस कारण वह बड़ा ढीठ होता जा रहा है। वह आपके निस्वत पूछने पर मुझसे कह गया है कि झख मार रहे हैं; आपको उचित है

अकबर बीरबल विनोद १७१

अकबर बीरबल विनोद १७१ कि उसको ऐसा कठोर दण्ड दें ताकि वह फिर ऐसी गुस्ताखी न करे।” यह सुनकर बादशाह को बड़ा विस्मय हुआ और उसी क्षण बीरबल को दण्ड देने का प्रण किया। कुछ समय बाद चपरासी द्वारा बीरबल को बुलवाया। जब वह आया तो बादशाह ने कहा-“बीरबल ! तुम बड़े घमंडी होगये हो?” बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ ! मैं तो अपने को ऐसा अनुमान नहीं करता, परन्तु यदि मुझसे कोई अपराध हुआ हो तो आपको अधिकार है कि मुझे दंड दें।” बादशाह तो बेगम से सब सुनही चुका था। वह बोला-“तुमने बेगम से मेरे निस्बत क्या कहा था, मुझसे झख मरवाते थे, क्या यह सही नहीं है?” बीरबल बाअदब हाथ जोड़कर बोला-“पृथ्वीनाथ ! मेरी गुस्ताखी माफ की जावे तो कहूँ। मेरी जबान में यानी संकृत में मछली को झख कहते हैं और आप उस समय मछली ही मार रहे थे। अतएव मैंने बेगम के पूछने पर आपको झख मारना बतलाया था।” बीरबल के इस उत्तर से बादशाह और बेगम दोनों ही प्रसन्न हो गये और बीरबल को पुरस्कार देकर बिदा किया। काली ही न्यामत है एक दिन सन्ध्या समय बादशाह और बीरबल हवा सेवन के लिये कहीं जा रहे थे। नगर के बाहर जाकर बाद- शाह ने देखा कि एक कुत्ता एक फूली और कई दिन की

१७२ अकबर बीरबल विनोद सड़ी होने के कारण काली पड़ी हुई रोटी को बड़ी चाव से खा रहा है। उसे देख बादशाह को मजाक करने की सूझी और बीरबल को सम्बोधन कर बोला-“देखो बीरबल ! कुत्ता काली को खा रहा है।” बीरबल अपने हाजिर जवाबी के लिये तो विख्यात ही था, वह झट बोला-“पृथ्वीनाथ ! उसे वही न्यामत है।” इसपर बादशाह कुछ चिड़चिड़ा सा गया क्योंकि नियामत उसकी माता का नाम था और काली बीरबल की माता का नाम था। उसने कहा-“बीरबल तुम मेरी माता को कुत्तेको खिला रहा है।” बीरबल ने उत्तर दिया- “क्या आप ने मेरी माता से पहले कुत्तेको नहीं खिलाया था?” बादशाह ने उत्तर दिया-“मैं तुम्हारी माता को नहीं उस काली रोटी के लिये कह रहा था।” बीरबल बोला-“मैं भी तो यही कहा था कि रोटी चाहे कैसी भी सड़ी गली क्यों न हो; परन्तु उसके लिये तो वही नियामत है।” बाद- शाह संतुष्ट हो गया और उस समय से फिर बीरबल से कोई दूसरा मजाक नहीं किया।


और क्या ? कढ़ी एक दिन बीरबल को बिरादरी भोज में जाना था, अतएव वह बादशाह से अवकाश लेकर भोज में शामिल हुआ। जब भोजन करके लौटकर आया तो बादशाह ने उससे पूछा- “क्यों बीरबल ! आज भोज में कौन २ सा पदार्थ खाये हो।” बीरबल ने पहले तो उस जगह की सुन्दरता का वर्णन किया

अकबर बीरबल विनोद १७३

अकबर बीरबल विनोद १७३ फिर भोजन की सामग्री बतलाने लगा। वह क्रमशः सारी चीजों का नाम बतला कर चुप हो गया। बादशाह को इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ इसलिये बीरबल से फिर पूछा- “और क्या था” बीरबल याद कर और दो चार चीजों का नाम बतलाया। परन्तु बात की श्रृंखला न टूटी बीरबल ज्यों-ज्यों अधिक बतलाता बादशाह बराबर और और की धुन बाँधे रहता। हरेच्छा से वह बात अधूरी ही रह गई, बीच में एक ऐसा जरूरी काम आ पड़ा कि दोनों पृथक २ चले गये। कई महीने बाद एक दिन वह बात बादशाह को फिर स्मरण हो आई अतएव बीरबल की याददास्त समझने के लिये बोला-“बीरबल ! और ?” बीरबल ने तत्काल उत्तर दिया- “पृथिवीनाथ ! और क्या, कढ़ी।” बादशाह बीरबल की याददास्त से बड़ा सन्तुष्ट हुआ और उसे तत्क्षण एक सुन्दर मोती की माला प्रदान की। दूसरे सभासद् इस बात को देखकर बड़े चकित हुए, उन लोगों ने अपनी अकल लड़ायी- “हो न हो बादशाह को कढ़ी से बड़ा प्रेम है, तभी तो कढ़ी का नाम लेते ही खुश होकर बीरबल को मोती की माला दी। दूसरे दिन मोती की माला के लालच से दरबारी लोग भी अपने २ घरों से उत्तमोत्तम मट्ठे की कढ़ी बनवा लाये। उनके साथ नौकर भी थे। वे कढ़ी का पात्र सिरों पर लिये हुए खड़े थे। यह दृश्य देखकर बादशाह ने दरबारियों से इस समारोह का कारण पूछा-वे उत्तर दिये-“गरीबपरवर ! आपके लिये हम लोग कढ़ी बनवा कर लाये हैं?” बादशाह उनकी ऐसी मूर्खता पर बहुत चिड़चिड़ा गया और कढ़ी लाने वालों के हाथ

१७४ अकबर बीरबल विनोद

१७४ अकबर बीरबल विनोद और पैरों में बेड़ियाँ जकड़ने की आज्ञा दी। वह बोला- "ये महामूर्ख हैं, केवल नकल करना जानते हैं। बीरबल ने जो कढ़ी का नाम लिया था उसका तात्पर्य दूसरा ही था। बादशाह के क्रोध के सामने सबका छक्का छूट गया और सबों ने एक साथ करबद्ध प्रार्थना कर अपने अपराधों की माफी माँगी। —:*:— माला दे ? एक दिन बीरबल को जमुना नहाने की इच्छा जागृत हुई इसलिये वह तड़के उठकर जमुना जी नहाने गया। स्ना- नोपरान्त एक जगह आसन बिछाकर रुद्राक्ष की माला जपने लगा। उसी समय हवा खोरी से लौटकर घूमता २ घोड़े पर सवार बादशाह भी वहीं जा पहुँचा। वह घोड़े से उतर पड़ा और बीरबल से बोला- "बीरबल ! मुझे मा ला दे।" बीरबल बड़ा लाल बुझकड़ था, वह तुरत ताड़ गया कि बादशाह दुअर्थी कहकर मजाक कर रहे हैं। वह मुँह से तो कुछ न बोला परन्तु उसी समय अपना दुपट्टा नदी के जल में छोड़ दिया-बादशाह यह देखकर फिर बोला- "बीरबल ! देखो दुपट्टा बहता है।" अब बीरबल को औसर मिला वह तुरत बोल उठा-"पृथिवीनाथ ! बहने दो।" बादशाह बीरबल के दुअर्थक उत्तर को समझ कर बड़ा नाराज हुआ और भृकुटी बदलकर बीरबल से पूछा- "क्यों बीर- बल ! तू हँसी हँसी में मेरी बहन माँग रहा है?" बीरबल बोला- "पृथिवीनाथ ! आप भी तो हमारी माँ माँगते हैं।" बादशाह

अकबरबीरबल विनोद १७५

अकबरबीरबल विनोद १७५ जरा नरमा कर फिर बोला- "मैंने तेरी माँ कब माँगी है, क्या मैंने किसी का नाम लिया था ?" बीरबल ने कहा- "गरीबपरवर ! मैंने आपके बहन का नाम कब लिया था और कब उसे माँगा था । मैंने तो आपसे केवल दुपट्टा बहने देने की अर्ज करी थी । आपकी बहन मेरे बहन के समान है। मैं उसका नाम अपनी जबान पर कैसे ला सकता हूँ।" बादशाह को आगे बढ़ने का कोई मार्ग नहीं मिला अतएव खामोश रह गया ।

भाग्य बड़ी है कि उद्योग एक दिन बादशाह ने अपने दरबारियों से भरी सभा में पूछा- "भाग्य बड़ी है कि उद्योग।" सब दरबारियों ने एक मत होकर बतलाया- "पृथिवीनाथ ! उद्योग बड़ा है ?" परन्तु बीरबल की राय सबसे भिन्न थी। वह अपनी तरफ से अकेला होकर बोला- "महाराज ! मेरी सम्मति से भाग्य बड़ी है।" बादशाह ने बीरबल से पूछा- "यदि उद्योग न किया जाय तो भाग्य क्या कर सकती है, भला उस मनुष्य को जो भाग्य के भरोसे बैठ रहे, कभी खाना नसीब हो सकता है ?" बीरबल ने उत्तर दिया- "चाहे कोई कितना ही उद्योग क्यों न करे, परन्तु जो बात उसके भाग्य में लिखी न होगी, कदापि नहीं मिल सकती। यह सब देखते हुए भाग्य को ही प्रधानता मिलनी चाहिये ।" एक दरबारी को बीरबल की यह दलील बहुत खटकी