भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

अपने पितामहोंके इस प्रकार कहनेपर महान् सौभाग्यशाली जमदग्निनन्दन परशुरामजीने कठोर तपस्या की और इससे उन्हें परम दुर्लभ सिद्धि प्राप्त हुई ॥ ३३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥

एकत्रिंशोऽध्यायः राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा ब्राह्मण उवाच त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः । प्रहर्षः प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः ॥ १ ॥ तृष्णा क्रोधोऽभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः । श्रमस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः ॥ २ ॥ ब्राह्मणने कहा—देवि! इस संसारमें सत्त्व, रज और तम—ये तीन मेरे शत्रु हैं। ये वृत्तियोंके भेदसे नौ प्रकारके माने गये हैं। हर्ष, प्रीति और आनन्द—ये तीन सात्त्विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेषभाव—ये तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह—ये तीन तामस गुण हैं ॥ १-२ ॥ एतान् निकृत्य धृतिमान् बाणसंघैरतन्द्रितः । जेतुं परानुत्सहते प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः ॥ ३ ॥ शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, आलस्यहीन और धैर्यवान् पुरुष शम-दम आदि बाण-समूहोंके द्वारा इन पूर्वोक्त गुणोंका उच्छेद करके दूसरोंको जीतनेका उत्साह करते हैं ॥ ३ ॥ अत्र गाथाः कीर्तयन्ति पुराकल्पविदो जनाः । अम्बरीषेण या गीता राज्ञा पूर्वं प्रशाम्यता ॥ ४ ॥ इस विषयमें पूर्वकालकी बातोंके जानकार लोग एक गाथा सुनाया करते हैं। पहले कभी शान्तिपरायण महाराज अम्बरीषने इस गाथाका गान किया था ॥ ४ ॥ समुदीर्णेषु दोषेषु बाध्यमानेषु साधुषु । जग्राह तरसा राज्यमम्बरीषो महायशाः ॥ ५ ॥ कहते हैं—जब दोषोंका बल बढ़ा और अच्छे गुण दबने लगे, उस समय महायशस्वी महाराज अम्बरीषने बलपूर्वक राज्यकी बागडोर अपने हाथमें ली ॥ ५ ॥ स निगृह्यात्मनो दोषान् साधून् समभिपूज्य च । जगाम महतीं सिद्धिं गाथाश्चेमा जगाद ह ॥ ६ ॥ उन्होंने अपने दोषोंको दबाया और उत्तम गुणोंका आदर किया। इससे उन्हें बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई और उन्होंने यह गाथा गायी— ॥ ६ ॥ भूयिष्ठं विजिता दोषा निहताः सर्वशत्रवः । एको दोषो वरिष्ठश्च वध्यः स न हतो मया ॥ ७ ॥

'मैंने बहुत-से दोषोंपर विजय पायी और समस्त शत्रुओंका नाश कर डाला; किंतु एक सबसे बड़ा दोष रह गया है। यद्यपि वह नष्ट कर देने योग्य है तो भी अबतक मैं नाश न कर सका ।। ७ ।। यत्प्रयुक्तो जन्तुरयं वैतृष्ण्यं नाधिगच्छति । तृष्णार्त इह निम्नानि धावमानो न बुध्यते ।। ८ ।। 'उसीकी प्रेरणासे इस प्राणीको वैराग्य नहीं होता। तृष्णाके वशमें पड़ा हुआ मनुष्य संसारमें नीच कर्मोंकी ओर दौड़ता है, सचेत नहीं होता ।। ८ ।। अकार्यमपि येनेह प्रयुक्तः सेवते नरः । तं लोभमसिभिस्तीक्ष्णैर्निकृत्य सुखमेधते ।। ९ ।। 'उससे प्रेरित होकर वह यहाँ नहीं करने-योग्य काम भी कर डालता है। उस दोषका नाम है लोभ। उसे ज्ञानरूपी तलवारसे काटकर मनुष्य सुखी होता है ।। ९ ।। लोभाद्धि जायते तृष्णा ततश्चिन्ता प्रवर्तते । स लिप्यमानो लभते भूयिष्ठं राजसान् गुणान् । तदवाप्तौ तु लभते भूयिष्ठं तामसान् गुणान् ।। १० ।। 'लोभसे तृष्णा और तृष्णासे चिन्ता पैदा होती है। लोभी मनुष्य पहले बहुत-से राजस गुणोंको पाता है और उनकी प्राप्ति हो जानेपर उसमें तामसिक गुण भी अधिक मात्रामें आ जाते हैं ।। १० ।। स तैर्गुणैः संहतदेहबन्धनः पुनः पुनर्जायति कर्म चेहते । जन्मक्षये भिन्नविकीर्णदेहो मृत्युं पुनर्गच्छति जन्मनैव ।। ११ ।। 'उन गुणोंके द्वारा देह-बन्धनमें जकड़कर वह बारंबार जन्म लेता और तरह-तरहके कर्म करता रहता है। फिर जीवनका अन्त समय आनेपर उसके देहके तत्त्व विलग-विलग होकर बिखर जाते हैं और वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इसके बाद फिर जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़ता है ।। ११ ।। तस्मादेतं सम्यगवेक्ष्य लोभं निगृह्य धृत्याऽऽत्मनि राज्यमिच्छेत् । एतद् राज्यं नान्यदस्तीह राज्य- मात्मैव राजा विदितो यथावत् ।। १२ ।। 'इसलिये इस लोभके स्वरूपको अच्छी तरह समझकर इसे धैर्यपूर्वक दबाने और आत्मराज्यपर अधिकार पानेकी इच्छा करनी चाहिये। यही वास्तविक स्वराज्य है। यहाँ दूसरा कोई राज्य नहीं है। आत्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर वही राजा है' ।। १२ ।। इति राजाम्बरीषेण गाथा गीता यशस्विना ।

अधिराज्यं पुरस्कृत्य लोभमेकं निकृन्तता ॥ १३ ॥ इस प्रकार यशस्वी अम्बरीषने आत्मराज्यको आगे रखकर एकमात्र प्रबल शत्रु लोभका उच्छेद करते हुए उपर्युक्त गाथाका गान किया था ॥ १३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ इस प्रकार महाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥

द्वात्रिंशोऽध्यायः ब्राह्मणरूपधारी धर्म और जनकका ममत्वत्यागविषयक संवाद ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ब्राह्मणस्य च संवादं जनकस्य च भाविनि ।। १ ।। ब्राह्मणने कहा—भामिनि! इसी प्रसंगमें एक ब्राह्मण और राजा जनकके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। १ ।। ब्राह्मणं जनको राजा सन्नं कस्मिंश्चिदागसि । विषये मे न वस्तव्यमिति शिष्ट्यर्थमब्रवीत् ।। २ ।। एक समय राजा जनकने किसी अपराधमें पकड़े हुए ब्राह्मणको दण्ड देते हुए कहा —‘ब्रह्मन्! आप मेरे देशसे बाहर चले जाइये’ ।। २ ।। इत्युक्तः प्रत्युवाचाथ ब्राह्मणो राजसत्तमम् । आचक्ष्व विषयं राजन् यावांस्तव वशे स्थितः ।। ३ ।।

यह सुनकर ब्राह्मणने उस श्रेष्ठ राजाको उत्तर दिया—'महाराज! आपके अधिकारमें जितना देश है, उसकी सीमा बताइये ॥ ३ ॥ सोऽन्यस्य विषये राज्ञो वस्तुमिच्छाम्यहं विभो । वचस्ते कर्तुमिच्छामि यथाशास्त्रं महीपते ॥ ४ ॥ 'सामर्थ्यशाली नरेश! इस बातको जानकर मैं दूसरे राजाके राज्यमें निवास करना चाहता हूँ और शास्त्रके अनुसार आपकी आज्ञाका पालन करना चाहता हूँ' ॥ ४ ॥ इत्युक्तस्तु तदा राजा ब्राह्मणेन यशस्विना । मुहुरुष्णं विनिःश्वस्य न किंचित् प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥ उस यशस्वी ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजा जनक बार-बार गरम उच्छ्वास लेने लगे, कुछ जवाब न दे सके ॥ ५ ॥ तमासीनं ध्यायमानं राजानममितौजसम् । कश्मलं सहसागच्छद् भानुमन्तमिव ग्रहः ॥ ६ ॥ वे अमित तेजस्वी राजा जनक बैठे हुए विचार कर रहे थे, उस समय उनको उसी प्रकार मोहने सहसा घेर लिया जैसे राहु ग्रह सूर्यको घेर लेता है ॥ ६ ॥ समाश्वास्य ततो राजा विगते कश्मले तदा ।

ततो मुहूर्तादिव तं ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥ जब राजा जनक विश्राम कर चुके और उनके मोहका नाश हो गया, तब थोड़ी देर चुप रहनेके बाद वे ब्राह्मणसे बोले ॥ ७ ॥ जनक उवाच पितृपैतामहे राज्ये वश्ये जनपदे सति । विषयं नाधिगच्छामि विचिन्वन् पृथिवीमहम् ॥ ८ ॥ जनकने कहा—ब्रह्मन्! यद्यपि बाप-दादोंके समयसे ही मिथिला-प्रान्तके राज्यपर मेरा अधिकार है, तथापि जब मैं विचारदृष्टिसे देखता हूँ तो सारी पृथ्वीमें खोजनेपर भी कहीं मुझे अपना देश नहीं दिखायी देता ॥ ८ ॥ नाधिगच्छं यदा पृथ्व्यां मिथिला मार्गिता मया । नाध्यगच्छं यदा तस्यां स्वप्रजा मार्गिता मया ॥ ९ ॥ नाध्यगच्छं तदा तस्यां तदा मे कश्मलोऽभवत् । जब पृथ्वीपर अपने राज्यका पता न पा सका तो मैंने मिथिलामें खोज की। जब वहाँसे भी निराशा हुई तो अपनी प्रजापर अपने अधिकारका पता लगाया, किंतु उनपर भी अपने अधिकारका निश्चय न हुआ, तब मुझे मोह हो गया ॥ ९ १/२ ॥ ततो मे कश्मलस्यान्ते मतिः पुनरुपस्थिता ॥ १० ॥ तदा न विषयं मन्ये सर्वो वा विषयो मम । आत्मापि चायं न मम सर्वा वा पृथिवी मम ॥ ११ ॥ फिर विचारके द्वारा उस मोहका नाश होनेपर मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि कहीं भी मेरा राज्य नहीं है अथवा सर्वत्र मेरा ही राज्य है। एक दृष्टिसे यह शरीर भी मेरा नहीं है और दूसरी दृष्टिसे यह सारी पृथ्वी ही मेरी है ॥ १०-११ ॥ यथा मम तथान्येषामिति मन्ये द्विजोत्तम । उष्यतां यावदुत्साहो भुज्यतां यावदुष्यते ॥ १२ ॥ यह जिस तरह मेरी है, उसी तरह दूसरोंकी भी है—ऐसा मैं मानता हूँ। इसलिये द्विजोत्तम! अब आपकी जहाँ इच्छा हो, रहिये एवं जहाँ रहें, उसी स्थानका उपभोग कीजिये ॥ १२ ॥ ब्राह्मण उवाच पितृपैतामहे राज्ये वश्ये जनपदे सति । ब्रूहि कां मतिमास्थाय ममत्वं वर्जितं त्वया ॥ १३ ॥ ब्राह्मणने कहा—राजन्! जब बाप-दादोंके समयसे ही मिथिला-प्रान्तके राज्यपर आपका अधिकार है, तब बताइये, किस बुद्धिका आश्रय लेकर आपने इसके प्रति अपनी ममताको त्याग दिया है? ॥ १३ ॥

कां वै बुद्धिं समाश्रित्य सर्वो वै विषयस्तव । नावैषि विषयं येन सर्वो वा विषयस्तव ॥ १४ ॥ किस बुद्धिका आश्रय लेकर आप सर्वत्र अपना ही राज्य मानते हैं और किस तरह कहीं भी अपना राज्य नहीं समझते एवं किस तरह सारी पृथ्वीको ही अपना देश समझते हैं? ॥ १४ ॥ जनक उवाच अन्तवन्त इहावस्था विदिताः सर्वकर्मसु । नाध्यगच्छमहं तस्मान्ममेदमिति यद् भवेत् ॥ १५ ॥ जनकने कहा—ब्रह्मन्! इस संसारमें कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली सभी अवस्थाएँ आदि-अन्तवाली हैं, यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम है। इसलिये मुझे ऐसी कोई वस्तु नहीं प्रतीत होती जो मेरी हो सके ॥ १५ ॥ कस्येदमिति कस्य स्वमिति वेदवचस्तथा । नाध्यगच्छमहं बुद्ध्या ममेदमिति यद् भवेत् ॥ १६ ॥ वेद भी कहता है—'यह वस्तु किसकी है? यह किसका धन है?* (अर्थात् किसीका नहीं है)' इसलिये जब मैं अपनी बुद्धिसे विचार करता हूँ, तब कोई भी वस्तु ऐसी नहीं जान पड़ती, जिसे अपनी कह सकें ॥ १६ ॥ एतां बुद्धिं समाश्रित्य ममत्वं वर्जितं मया । शृणु बुद्धिं च यां ज्ञात्वा सर्वत्र विषयो मम ॥ १७ ॥ इसी बुद्धिका आश्रय लेकर मैंने मिथिलाके राज्यसे अपना ममत्व हटा लिया है। अब जिस बुद्धिका आश्रय लेकर मैं सर्वत्र अपना ही राज्य समझता हूँ, उसको सुनो ॥ १७ ॥ नाहमात्मार्थमिच्छामि गन्धान् घ्राणगतानपि । तस्मान्मे निर्जिता भूमिर्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥ १८ ॥ मैं अपनी नासिकामें पहुँची हुई सुगन्धको भी अपने सुखके लिये नहीं ग्रहण करना चाहता। इसलिये मैंने पृथ्वीको जीत लिया है और वह सदा ही मेरे वशमें रहती है ॥ १८ ॥ नाहमात्मार्थमिच्छामि रसानास्येऽपि वर्ततः । आपो मे निर्जितास्तस्माद् वशे तिष्ठन्ति नित्यदा ॥ १९ ॥ मुखमें पड़े हुए रसोंका भी मैं अपनी तृप्तिके लिये नहीं आस्वादन करना चाहता, इसलिये जलतत्त्वपर भी मैं विजय पा चुका हूँ और वह सदा मेरे अधीन रहता है ॥ १९ ॥ नाहमात्मार्थमिच्छामि रूपं ज्योतिश्च चक्षुषः । तस्मान्मे निर्जितं ज्योतिर्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥ २० ॥ मैं नेत्रके विषयभूत रूप और ज्योतिका अपने सुखके लिये अनुभव नहीं करना चाहता, इसलिये मैंने तेजको जीत लिया है और वह सदा मेरे अधीन रहता है ॥ २० ॥

नाहमात्मार्थमिच्छामि स्पर्शांस्त्वचि गताश्च ये । तस्मान्मे निर्जितो वायुर्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥ २१ ॥ तथा मैं त्वचाके संसर्गसे प्राप्त हुए स्पर्शजनित सुखोंको अपने लिये नहीं चाहता, अतः मेरे द्वारा जीता हुआ वायु सदा मेरे वशमें रहता है ॥ २१ ॥ नाहमात्मार्थमिच्छामि शब्दान् श्रोत्रगतानपि । तस्मान्मे निर्जिताः शब्दा वशे तिष्ठन्ति नित्यदा ॥ २२ ॥ मैं कानोंमें पड़े हुए शब्दोंको भी अपने सुखके लिये नहीं ग्रहण करना चाहता, इसलिये वे मेरे द्वारा जीते हुए शब्द सदा मेरे अधीन रहते हैं ॥ २२ ॥ नाहमात्मार्थमिच्छामि मनो नित्यं मनोऽन्तरे । मनो मे निर्जितं तस्माद् वशे तिष्ठति नित्यदा ॥ २३ ॥ मैं मनमें आये हुए मन्तव्य विषयोंका भी अपने सुखके लिये अनुभव करना नहीं चाहता, इसलिये मेरे द्वारा जीता हुआ मन सदा मेरे वशमें रहता है ॥ २३ ॥ देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च भूतेभ्योऽतिथिभिः सह । इत्यर्थं सर्व एवेति समारम्भा भवन्ति वै ॥ २४ ॥ मेरे समस्त कार्योंका आरम्भ देवता, पितर, भूत और अतिथियोंके निमित्त होता है ॥ २४ ॥ ततः प्रहस्य जनकं ब्राह्मणः पुनरब्रवीत् । त्वज्जिज्ञासार्थमद्येह विद्धि मां धर्ममागतम् ॥ २५ ॥ जनककी ये बातें सुनकर वह ब्राह्मण हँसा और फिर कहने लगा—'महाराज! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं धर्म हूँ और आपकी परीक्षा लेनेके लिये ब्राह्मणका रूप धारण करके यहाँ आया हूँ ॥ २५ ॥ त्वमस्य ब्रह्मलाभस्य दुर्वारस्यानिवर्तिनः । सत्त्वनेमिनिरुद्धस्य चक्रस्यैकः प्रवर्तकः ॥ २६ ॥ 'अब मुझे निश्चय हो गया कि संसारमें सत्त्वगुणरूप नेमिसे घिरे हुए और कभी पीछेकी ओर न लौटनेवाले इस ब्रह्मप्राप्तिरूप दुर्निवार चक्रका संचालन करनेवाले एकमात्र आप ही हैं' ॥ २६ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिकेपर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥

*– मा गृधः कस्य स्विद्धनम् । (ईशावास्योपनिषद् १)

त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ब्राह्मणका पत्नीके प्रति अपने ज्ञाननिष्ठ स्वरूपका परिचय देना ब्राह्मण उवाच नाहं तथा भीरु चरामि लोके यथा त्वं मां तर्जयसे स्वबुद्ध्या । विप्रोऽस्मि मुक्तोऽस्मि वनेचरोऽस्मि गृहस्थधर्मा व्रतवांस्तथास्मि ॥ १ ॥ नाहमस्मि यथा मां त्वं पश्यसे च शुभाशुभे । मया व्याप्तमिदं सर्वं यत् किंचिज्जगतीगतम् ॥ २ ॥ ब्राह्मणने कहा—भीरु! तुम अपनी बुद्धिसे मुझे जैसा समझकर फटकार रही हो, मैं वैसा नहीं हूँ। मैं इस लोकमें देहाभिमानियोंकी तरह आचरण नहीं करता। तुम मुझे पाप- पुण्यमें आसक्त देखती हो; किंतु वास्तवमें मैं ऐसा नहीं हूँ। मैं ब्राह्मण, जीवन्मुक्त महात्मा, वानप्रस्थ, गृहस्थ और ब्रह्मचारी सब कुछ हूँ। इस भूतलपर जो कुछ दिखायी देता है, वह सब मेरेद्वारा व्याप्त है ॥ १-२ ॥ ये केचिज्जन्तवो लोके जङ्गमाः स्थावराश्च ह । तेषां मामन्तकं विद्धि दारूणामिव पावकम् ॥ ३ ॥ संसारमें जो कोई भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबका विनाश करनेवाला मृत्यु उसी प्रकार मुझे समझो, जिस प्रकार कि लकड़ियोंका विनाश करनेवाला अग्नि है ॥ ३ ॥ राज्यं पृथिव्यां सर्वस्यामथवापि त्रिविष्टपे । तथा बुद्धिरियं वेत्ति बुद्धिरेव धनं मम ॥ ४ ॥ सम्पूर्ण पृथ्वी तथा स्वर्गपर जो राज्य है, उसे यह बुद्धि जानती है; अतः बुद्धि ही मेरा धन है ॥ ४ ॥ एकः पन्था ब्राह्मणानां येन गच्छन्ति तद्विदः । गृहेषु वनवासेषु गुरुवासेषु भिक्षुषु ॥ ५ ॥ ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रममें स्थित ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण जिस मार्गसे चलते हैं, उन ब्राह्मणोंका वह मार्ग एक ही है ॥ ५ ॥ लिङ्गैर्बहुभिरव्यग्रैरेका बुद्धिरुपास्यते । नानालिङ्गाश्रमस्थानां येषां बुद्धिः शमात्मिका ॥ ६ ॥ ते भावमेकमायान्ति सरितः सागरं यथा ।

क्योंकि वे लोग बहुत-से व्याकुलतारहित चिह्नोंको धारण करके भी एक बुद्धिका ही आश्रय लेते हैं। भिन्न-भिन्न आश्रमोंमें रहते हुए भी जिनकी बुद्धि शान्तिके साधनमें लगी हुई है, वे अन्तमें एकमात्र सत्स्वरूप ब्रह्मको उसी प्रकार प्राप्त होते हैं, जिस प्रकार सब नदियाँ समुद्रको प्राप्त होती हैं ।। ६ १/२ ।। बुद्ध्यायं गम्यते मार्गः शरीरेण न गम्यते । आद्यन्तवन्ति कर्माणि शरीरं कर्मबन्धनम् ।। ७ ।। यह मार्ग बुद्धिगम्य है, शरीरके द्वारा इसे नहीं प्राप्त किया जा सकता। सभी कर्म आदि और अन्तवाले हैं तथा शरीर कर्मका हेतु है ।। ७ ।। तस्मात् ते सुभगे नास्ति परलोककृतं भयम् । तद्द्भावभावनिरता ममैवात्मानमेष्यसि ।। ८ ।। इसलिये देवि! तुम्हें परलोकके लिये तनिक भी भय नहीं करना चाहिये। तुम परमात्मभावकी भावनामें रत रहकर अन्तमें मेरे ही स्वरूपको प्राप्त हो जाओगी ।। ८ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३३ ।।

चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मणगीताका उपसंहार

ब्राह्मण्युवाच नेदमल्पात्मना शक्यं वेदितुं नाकृतात्मना । बहु चाल्पं च संक्षिप्तं विप्लुतं च मतं मम ॥ १ ॥ **ब्राह्मणी बोली—**नाथ! मेरी बुद्धि थोड़ी और अन्तःकरण अशुद्ध है, अतः आपने संक्षेपमें जिस महान् ज्ञानका उपदेश किया है, उस बिखरे हुए उपदेशको समझना मेरे लिये कठिन है। मैं तो उसे सुनकर भी धारण न कर सकी ॥ १ ॥ उपायं तं मम ब्रूहि येनैषा लभ्यते मतिः । तन्मन्ये कारणं त्वत्तो यत एषा प्रवर्तते ॥ २ ॥ अतः आप कोई ऐसा उपाय बताइये, जिससे मुझे भी यह बुद्धि प्राप्त हो। मेरा विश्वास है कि वह उपाय आपहीसे ज्ञात हो सकता है ॥ २ ॥ ब्राह्मण उवाच अरणीं ब्राह्मणीं विद्धि गुरुरस्योत्तरारणिः । तपःश्रुतेऽभिमथ्नीतो ज्ञानाग्निर्जायते ततः ॥ ३ ॥ **ब्राह्मणने कहा—**देवि! तुम बुद्धिको नीचेकी अरणी और गुरुको ऊपरकी अरणी समझो। तपस्या और वेद-वेदान्तके श्रवण-मननद्वारा मन्थन करनेपर उन अरणियोंसे ज्ञानरूप अग्नि प्रकट होती है ॥ ३ ॥ ब्राह्मण्युवाच यदिदं ब्रह्मणो लिङ्गं क्षेत्रज्ञ इति संज्ञितम् । ग्रहीतुं येन यच्छक्यं लक्षणं तस्य तत् क्व नु ॥ ४ ॥ **ब्राह्मणीने पूछा—**नाथ! क्षेत्रज्ञ नामसे प्रसिद्ध शरीरान्तर्वर्ती जीवात्माको जो ब्रह्मका स्वरूप बताया जाता है, यह बात कैसे सम्भव है? क्योंकि जीवात्मा ब्रह्मके नियन्त्रणमें रहता है और जो जिसके नियन्त्रणमें रहता है, वह उसका स्वरूप हो, ऐसा कभी नहीं देखा गया ॥ ४ ॥ ब्राह्मण उवाच अलिङ्गो निर्गुणश्चैव कारणं नास्य लक्ष्यते । उपायमेव वक्ष्यामि येन गृह्येत वा न वा ॥ ५ ॥

ब्राह्मणने कहा— देवि! क्षेत्रज्ञ वास्तवमें देह-सम्बन्धसे रहित और निर्गुण है; क्योंकि उसके सगुण और साकार होनेका कोई कारण नहीं दिखायी देता। अतः मैं वह उपाय बताता हूँ जिससे वह ग्रहण किया जा सकता है अथवा नहीं भी किया जा सकता ॥ ५ ॥ सम्यगुपायो दृष्टश्च भ्रमरैरिव लक्ष्यते । कर्मबुद्धिरबुद्धित्वाज्ज्ञानलिङ्गैरिवाश्रितम् ॥ ६ ॥ उस क्षेत्रका साक्षात्कार करनेके लिये पूर्ण उपाय देखा गया है। वह यह है कि उसे देखनेकी क्रियाका त्याग कर देनेसे भौंरोंके द्वारा गन्धकी भाँति वह अपने-आप जाना जाता है। किंतु कर्मविषयक बुद्धि वास्तवमें बुद्धि न होनेके कारण ज्ञानके सदृश प्रतीत होती है तो भी वह ज्ञान नहीं है। (अतः क्रियाद्वारा उसका साक्षात्कार नहीं हो सकता) ॥ ६ ॥ इदं कार्यमिदं नेति न मोक्षेषूपदिश्यते । पश्यतः शृण्वतो बुद्धिरात्मनो येषु जायते ॥ ७ ॥ यह कर्तव्य है, यह कर्तव्य नहीं है—यह बात मोक्षके साधनोंमें नहीं कही जाती। जिन साधनोंमें देखने और सुननेवालेकी बुद्धि आत्माके स्वरूपमें निश्चित होती है, वही यथार्थ साधन है ॥ ७ ॥ यावन्त इह शक्येरंस्तावन्तोंऽशान् प्रकल्पयेत् । अव्यक्तान् व्यक्तरूपांश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥ यहाँ जितनी कल्पनाएँ की जा सकती हैं, उतने ही सैकड़ों और हजारों अव्यक्त और व्यक्तरूप अंशोंकी कल्पना कर लें ॥ ८ ॥ सर्वान्नार्थयुक्तांश्च सर्वान् प्रत्यक्षहेतुकान् । यतः परं न विद्येत ततोऽभ्यासे भविष्यति ॥ ९ ॥ वे सभी प्रत्यक्ष प्रतीत होनेवाले पदार्थ वास्तविक अर्थयुक्त नहीं हो सकते। जिससे पर कुछ भी नहीं है, उसका साक्षात्कार तो ‘नेति-नेति’ अर्थात् यह भी नहीं, यह भी नहीं—इस अभ्यासके अन्तमें ही होगा ॥ ९ ॥ श्रीभगवानुवाच ततस्तु तस्या ब्राह्मण्या मतिः क्षेत्रज्ञसंक्षये । क्षेत्रज्ञानेन परतः क्षेत्रज्ञेभ्यः प्रवर्तते ॥ १० ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कहा— पार्थ! उसके बाद उस ब्राह्मणीकी बुद्धि, जो क्षेत्रज्ञके संशयसे युक्त थी, क्षेत्रके ज्ञानसे अतीत क्षेत्रज्ञोंसे युक्त हुई ॥ १० ॥ अर्जुन उवाच क्व नु सा ब्राह्मणी कृष्ण क्व चासौ ब्राह्मणर्षभः । याभ्यां सिद्धिरियं प्राप्ता तावुभौ वद मेऽच्युत ॥ ११ ॥

अर्जुनने पूछा— श्रीकृष्ण! वह ब्राह्मणी कौन थी और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था? अच्युत! जिन दोनोंके द्वारा यह सिद्धि प्राप्त की गयी, उन दोनोंका परिचय मुझे बताइये ।। ११ ।। श्रीभगवानुवाच मनो मे ब्राह्मणं विद्धि बुद्धिं मे विद्धि ब्राह्मणीम् । क्षेत्रज्ञ इति यश्चोक्तः सोऽहमेव धनंजय ।। १२ ।। भगवान् श्रीकृष्ण बोले— अर्जुन! मेरे मनको तो तुम ब्राह्मण समझो और मेरी बुद्धिको ब्राह्मणी समझो एवं जिसको क्षेत्रज्ञ—ऐसा कहा गया है, वह मैं ही हूँ ।। १२ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४ ।।

पञ्चत्रिंशोऽध्यायः श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर अर्जुन उवाच ब्रह्म यत्परमं ज्ञेयं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि । भवतो हि प्रसादेन सूक्ष्मे मे रमते मतिः ॥ १ ॥ अर्जुन बोले—भगवन्! इस समय आपकी कृपासे सूक्ष्म विषयके श्रवणमें मेरी बुद्धि लग रही है, अतः जाननेयोग्य परब्रह्मके स्वरूपकी व्याख्या कीजिये ॥ १ ॥ वासुदेव उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं मोक्षसंयुक्तं शिष्यस्य गुरुणा सह ॥ २ ॥ कश्चिद् ब्राह्मणमासीनमाचार्यं संशितव्रतम् । शिष्यः पप्रच्छ मेधावी किंस्विच्छ्रेयः परंतप ॥ ३ ॥ भगवन्तं प्रपन्नोऽहं निःश्रेयसपरायणः । याचे त्वां शिरसा विप्र यद् ब्रूयां ब्रूहि तन्मम ॥ ४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन! इस विषयको लेकर गुरु और शिष्यमें जो मोक्षविषयक संवाद हुआ था, वह प्राचीन इतिहास बतलाया जा रहा है। एक दिन उत्तम व्रतका पालन करनेवाले एक ब्रह्मवेत्ता आचार्य अपने आसनपर विराजमान थे। परंतप! उस समय किसी बुद्धिमान् शिष्यने उनके पास जाकर निवेदन किया—'भगवन्! मैं कल्याणमार्गमें प्रवृत्त होकर आपकी शरणमें आया हूँ और आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर याचना करता हूँ कि मैं जो कुछ पूछूँ; उसका उत्तर दीजिये। मैं जानना चाहता हूँ कि श्रेय क्या है?' ।। २-४ ।।

तमेवंवादिनं पार्थ शिष्यं गुरुरुवाच ह । सर्वं तु ते प्रवक्ष्यामि यत्र वै संशयो द्विज ॥ ५ ॥ पार्थ! इस प्रकार कहनेवाले उस शिष्यसे गुरु बोले—‘विप्र! तुम्हारा जिस विषयमें संशय है, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा’ ॥ ५ ॥ इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठ गुरुणा गुरुवत्सलः । प्राञ्जलिः परिपप्रच्छ यत्तच्छृणु महामते ॥ ६ ॥ महाबुद्धिमान् कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! गुरुके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उस गुरुके प्यारे शिष्यने हाथ जोड़कर जो कुछ पूछा, उसे सुनो ॥ ६ ॥ शिष्य उवाच कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत्सत्यं ब्रूहि यत्परम् । कुतो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ७ ॥ शिष्य बोला—विप्रवर! मैं कहाँसे आया हूँ और आप कहाँसे आये हैं? जगत्के चराचर जीव कहाँसे उत्पन्न हुए हैं? जो परमतत्त्व है, उसे आप यथार्थरूपसे बताइये ॥ ७ ॥ केन जीवन्ति भूतानि तेषामायुश्च किं परम् ।

किं सत्यं किं तपो विप्र के गुणाः सद्भि रीरिताः ॥ ८ ॥ विप्रवर! सम्पूर्ण जीव किससे जीवन धारण करते हैं? उनकी अधिक-से-अधिक आयु कितनी है? सत्य और तप क्या है? सत्पुरुषोंने किन गुणोंकी प्रशंसा की है? ॥ ८ ॥ के पन्थानः शिवाश्च स्युः किं सुखं किं च दुष्कृतम् । एतान् मे भगवन् प्रश्नान् याथातथ्येन सुव्रत ॥ ९ ॥ वक्तुमर्हसि विप्रर्षे यथावदिह तत्त्वतः । त्वदन्यः कश्चन प्रश्नानेतान् वक्तुमिहार्हति ॥ १० ॥ ब्रूहि धर्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं मम । मोक्षधर्मार्थकुशलो भवाँल्लोकेषु गीयते ॥ ११ ॥ कौन-कौन-से मार्ग कल्याण करनेवाले हैं? सर्वोत्तम सुख क्या है? और पाप किसे कहते हैं? श्रेष्ठ व्रतका आचरण करनेवाले गुरुदेव! मेरे इन प्रश्नोंका आप यथार्थरूपसे उत्तर देनेमें समर्थ हैं। धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! यह सब जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है। इस विषयमें इन प्रश्नोंका तत्त्वतः यथार्थ उत्तर देनेमें आपसे अतिरिक्त दूसरा कोई समर्थ नहीं है। अतः आप ही बतलाइये; क्योंकि संसारमें मोक्षधर्मोंके तत्त्वके ज्ञानमें आप कुशल बताये गये हैं ॥ ९—११ ॥ सर्वसंशयरांश्छेत्ता त्वदन्यो न च विद्यते । संसारभीरवश्चैव मोक्षकामास्तथा वयम् ॥ १२ ॥ हम संसारसे भयभीत और मोक्षके इच्छुक हैं। आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं, जो सब प्रकारकी शंकाओंका निवारण कर सके ॥ १२ ॥ वासुदेव उवाच तस्मै सम्प्रतिपन्नाय यथावत् परिपृच्छते । शिष्याय गुणयुक्ताय शान्ताय प्रियवर्तिने ॥ १३ ॥ छायाभूताय दान्ताय यतते ब्रह्मचारिणे । तान् प्रश्नानब्रवीत् पार्थ मेधावी स धृतव्रतः । गुरुः कुरुकुलश्रेष्ठ सम्यक् सर्वानरिंदम ॥ १४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कहा—कुरुकुलश्रेष्ठ शत्रुदमन अर्जुन! वह शिष्य सब प्रकारसे गुरुकी शरणमें आया था। यथोचित रीतिसे प्रश्न करता था। गुणवान् और शान्त था। छायाकी भाँति साथ रहकर गुरुका प्रिय करता था तथा जितेन्द्रिय, संयमी और ब्रह्मचारी था। उसके पूछनेपर मेधावी एवं व्रतधारी गुरुने पूर्वोक्त सभी प्रश्नोंका ठीक-ठीक उत्तर दिया ॥ १३-१४ ॥ गुरुरुवाच ब्रह्मणोक्तमिदं सर्वमृषिप्रवरसेवितम् ।

वेदविद्यां समाश्रित्य तत्त्वभूतार्थभावनम् ॥ १५ ॥ गुरु बोले—बेटा! ब्रह्माजीने वेद-विद्याका आश्रय लेकर तुम्हारे पूछे हुए इन सभी प्रश्नोंका उत्तर पहलेसे ही दे रखा है तथा प्रधान-प्रधान ऋषियोंने उसका सदा ही सेवन किया है। उन प्रश्नोंके उत्तरमें परमार्थविषयक विचार किया गया है ॥ १५ ॥ ज्ञानं त्वेव परं विद्मः संन्यासं तप उत्तमम् । यस्तु वेद निराबाधं ज्ञानतत्त्वं विनिश्चयात् । सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥ १६ ॥ हम ज्ञानको ही परब्रह्म और संन्यासको उत्तम तप जानते हैं। जो अबाधित ज्ञानतत्त्वको निश्चयपूर्वक जानकर अपनेको सब प्राणियोंके भीतर स्थित देखता है, वह सर्वगति (सर्वव्यापक) माना जाता है ॥ १६ ॥ यो विद्वान् सहसंवासं विवासं चैव पश्यति । तथैकत्वनानात्वे स दुःखात् परिमुच्यते ॥ १७ ॥ जो विद्वान् संयोग और वियोगको तथा वैसे ही एकत्व और नानात्वको एक साथ तत्त्वतः जानता है, वह दुःखसे मुक्त हो जाता है ॥ १७ ॥ यो न कामयते किंचिन्न किंचिदभिमन्यते । इहलोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ १८ ॥ जो किसी वस्तुकी कामना नहीं करता तथा जिसके मनमें किसी बातका अभिमान नहीं होता, वह इस लोकमें रहता हुआ ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥ प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्वभूतविधानवित् । निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः ॥ १९ ॥ जो माया और सत्त्वादि गुणोंके तत्त्वको जानता है, जिसे सब भूतोंके विधानका ज्ञान है और जो ममता तथा अहंकारसे रहित हो गया है, वह मुक्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं है ॥ १९ ॥ अव्यक्तबीजप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान् । महाहङ्कारविटप इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥ २० ॥ महाभूतविशेषश्च विशेषप्रतिशाखवान् । सदापर्णः सदापुष्पः सदा शुभफलोदयः ॥ २१ ॥ अजीवः सर्वभूतानां ब्रह्मबीजः सनातनः । एतज्ज्ञात्वा च तत्त्वानि ज्ञानेन परमासिना ॥ २२ ॥ छित्त्वा चामरतां प्राप्य जहाति मृत्युजन्मनी ।

यह देह एक वृक्षके समान है। अज्ञान इसका मूल अंकुर (जड़) है, बुद्धि स्कन्ध (तना) है, अहंकार शाखा है, इन्द्रियाँ खोखले हैं, पञ्च महाभूत उसके विशेष अवयव हैं और उन भूतोंके विशेष भेद उसकी टहनियाँ हैं। इसमें सदा ही संकल्परूपी पत्ते उगते और कर्मरूपी फूल खिलते रहते हैं। शुभाशुभ कर्मोंसे प्राप्त होनेवाले सुख-दुःखादि ही उसमें सदा लगे रहनेवाले फल हैं। इस प्रकार ब्रह्मरूपी बीजसे प्रकट होकर प्रवाहरूपसे सदा मौजूद रहनेवाला देहरूपी वृक्ष समस्त प्राणियोंके जीवनका आधार है। जो इसके तत्त्वको भलीभाँति जानकर ज्ञानरूपी उत्तम तलवारसे इसे काट डालता है, वह अमरत्वको प्राप्त होकर जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ।। २०—२२ ½ ।। भूतभव्यभविष्यादि धर्मकामार्थनिश्चयम् । सिद्धसंघपरिज्ञातं पुराकल्पं सनातनम् ।। २३ ।। प्रवक्ष्येऽहं महाप्राज्ञ पदमुत्तममद्य ते । बुद्ध्वा यदिह संसिद्धा भवन्तीह मनीषिणः ।। २४ ।। महाप्राज्ञ! जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्य आदिके तथा धर्म, अर्थ और कामके स्वरूपका निश्चय किया गया है, जिसको सिद्धोंके समुदायने भलीभाँति जाना है, जिसका पूर्वकालमें निर्णय किया गया था और बुद्धिमान् पुरुष जिसे जानकर सिद्ध हो जाते हैं, उस परम उत्तम सनातन ज्ञानका अब मैं तुमसे वर्णन करता हूँ ।। २३-२४ ।। उपगम्यर्षयः पूर्वं जिज्ञासन्तः परस्परम् । प्रजापतिर्भरद्वाजौ गौतमो भार्गवस्तथा ।। २५ ।। वसिष्ठः कश्यपश्चैव विश्वामित्रोऽत्रिरेव च । मार्गान् सर्वान् परिक्रम्य परिश्रान्ताः स्वकर्मभिः ।। २६ ।। ऋषिमाङ्गिरसं वृद्धं पुरस्कृत्य तु ते द्विजाः । ददृशुर्ब्रह्मभवने ब्रह्माणं वीतकल्मषम् ।। २७ ।। तं प्रणम्य महात्मानं सुखासीनं महर्षयः । पप्रच्छुर्विनयोपेता नैःश्रेयसमिदं परम् ।। २८ ।। पहलेकी बात है, प्रजापति दक्ष, भरद्वाज, गौतम, भृगुनन्दन शुक्र, वसिष्ठ, कश्यप, विश्वामित्र और अत्रि आदि महर्षि अपने कर्मोंद्वारा समस्त मार्गोंमें भटकते-भटकते जब बहुत थक गये, तब एकत्रित हो आपसमें जिज्ञासा करते हुए परम वृद्ध अंगिरा मुनिको आगे करके ब्रह्मलोकमें गये और वहाँ सुखपूर्वक बैठे हुए पापरहित महात्मा ब्रह्माजीका दर्शन करके उन महर्षि ब्राह्मणोंने विनयपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। फिर तुम्हारी ही तरह अपने परम कल्याणके विषयमें पूछा— ।। २५—२८ ।। कथं कर्म क्रियात् साधु कथं मुच्येत किल्बिषात् । के नो मार्गाः शिवाश्च स्युः किं सत्यं किं च दुष्कृतम् ।। २९ ।।