भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

यह सुनकर व्यान पूर्ववत् चलने लगा। तब समानने पुनः कहा—'मैं जिस कारणसे सबमें श्रेष्ठ हूँ, वह बताता हूँ सुनो ।। १६ ।। मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ।। १७ ।। ‘मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब-के-सब संचार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ (फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा)' ।। १७ ।। (ब्राह्मण उवाच ततः समानः प्रालिल्ये पुनश्च प्रचचार ह । प्राणापानाबुदानश्च व्यानश्चैव तमब्रुवन् ।। न त्वं समान श्रेष्ठोऽसि व्यान एव वशे तव ।) ब्राह्मण कहते हैं—यह कहकर समान कुछ देरके लिये लीन हो गया और पुनः पूर्ववत् चलने लगा। उस समस प्राण, अपान, व्यान और उदानने उससे कहा—'समान! तुम हमलोगोंसे श्रेष्ठ नहीं हो, केवल व्यान ही तुम्हारे वशमें है' ।। समानः प्रचचाराथ उदानस्तमुवाच ह । श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ।। १८ ।। यह सुनकर समान पूर्ववत् चलने लगा। तब उदानने उससे कहा—'मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ, इसका क्या कारण है? यह सुनो ।। १८ ।। मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ।। १९ ।। ‘मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब-के-सब संचार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ (फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा)' ।। १९ ।। ततः प्रलीयतोदानः पुनश्च प्रचचार ह । प्राणापानौ समानश्च व्यानश्चैव तमब्रुवन् । उदान न त्वं श्रेष्ठोऽसि व्यान एव वशे तव ।। २० ।। यह सुनकर उदान कुछ देरके लिये लीन हो गया और पुनः चलने लगा। तब प्राण, अपान, समान और व्यानने उससे कहा—'उदान! तुम हमलोगोंसे श्रेष्ठ नहीं हो। केवल

व्यान ही तुम्हारे वशमें है' ।। २० ।। ब्राह्मण उवाच ततस्तानब्रवीद् ब्रह्मा समवेतान् प्रजापतिः । सर्वे श्रेष्ठा न वा श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यधर्मिणः ।। २१ ।। ब्राह्मण कहते हैं—तदनन्तर वे सभी प्राण ब्रह्माजीके पास एकत्र हुए। उस समय उन सबसे प्रजापति ब्रह्माने कहा—'वायुगण! तुम सभी श्रेष्ठ हो। अथवा तुममेंसे कोई भी श्रेष्ठ नहीं है। तुम सबका धारणरूप धर्म एक-दूसरेपर अवलम्बित है ।। २१ ।। सर्वे स्वविषये श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यधर्मिणः । इति तानब्रवीत् सर्वान् समवेतान् प्रजापतिः ।। २२ ।। 'सभी अपने-अपने स्थानपर श्रेष्ठ हो और सबका धर्म एक-दूसरेपर अवलम्बित है।' इस प्रकार वहाँ एकत्र हुए सब प्राणोंसे प्रजापतिने फिर कहा— ।। २२ ।। एकः स्थिरश्चास्थिरश्च विशेषात् पञ्च वायवः । एक एव ममैवात्मा बहुधाप्युपचीयते ।। २३ ।। 'एक ही वायु स्थिर और अस्थिररूपसे विराजमान है। उसीके विशेष भेदसे पाँच वायु होते हैं। इस तरह एक ही मेरा आत्मा अनेक रूपोंमें वृद्धिको प्राप्त होता है ।। २३ ।। परस्परस्य सुहृदो भावयन्तः परस्परम् । स्वस्ति व्रजत भद्रं वो धारयध्वं परस्परम् ।। २४ ।। 'तुम्हारा कल्याण हो। तुम कुशलपूर्वक जाओ और एक-दूसरेके हितैषी रहकर परस्परकी उन्नतिमें सहायता पहुँचाते हुए एक-दूसरेको धारण किये रहो' ।। २४ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु त्रयोविंशोऽध्यायः ।। २३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मण-गीताविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २३ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं)

चतुर्विंशोऽध्यायः देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदस्य च संवादमृषेर्देवमतस्य च ॥ १ ॥ ब्राह्मणने कहा—प्रिये! इस विषयमें देवर्षि नारद और देवमतके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥ देवमत उवाच जन्तोः संजायमानस्य किं नु पूर्वं प्रवर्तते । प्राणोऽपानः समानो वा व्यानो वोदान एव च ॥ २ ॥ देवमतने पूछा—देवर्षे! जब जीव जन्म लेता है, उस समय सबसे पहले उसके शरीरमें किसकी प्रवृत्ति होती है? प्राण, अपान, समान, व्यान अथवा उदानकी? ॥ २ ॥ नारद उवाच येनायं सृज्यते जन्तुस्ततोऽन्यः पूर्वमेति तम् । प्राणद्वन्द्वं हि विज्ञेयं तिर्यगूर्ध्वमधश्च यत् ॥ ३ ॥ नारदजीने कहा—मुने! जिस निमित्त कारणसे इस जीवकी उत्पत्ति होती है, उससे भिन्न दूसरा पदार्थ भी पहले कारण-रूपसे उपस्थित होता है। वह है प्राणोंका द्वन्द्व। जो ऊपर (देवलोक), तिर्यक् (मनुष्यलोक) और अधोलोक (पशु आदि)-में व्याप्त है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ३ ॥ देवमत उवाच केनायं सृज्यते जन्तुः कश्चान्यः पूर्वमेति तम् । प्राणद्वन्द्वं च मे ब्रूहि तिर्यगूर्ध्वमधश्च यत् ॥ ४ ॥ देवमतने पूछा—नारदजी! किस निमित्त कारणसे इस जीवकी सृष्टि होती है? दूसरा कौन पदार्थ पहले कारणरूपसे उपस्थित होता है तथा प्राणोंका द्वन्द्व क्या है, जो ऊपर, मध्यमें और नीचे व्याप्त है? ॥ ४ ॥ नारद उवाच संकल्पाज्जायते हर्षः शब्दादपि च जायते । रसात् संजायते चापि रूपापि च जायते ॥ ५ ॥

नारदजीने कहा— मुने! संकल्पसे हर्ष उत्पन्न होता है, मनोनुकूल शब्दसे, रससे और रूपसे भी हर्षकी उत्पत्ति होती है ॥ ५ ॥ शुक्राच्छोणितसंसृष्टात् पूर्वं प्राणः प्रवर्तते । प्राणेन विकृते शुक्रे ततोऽपानः प्रवर्तते ॥ ६ ॥ रजमें मिले हुए वीर्यसे पहले प्राण आकर उसमें कार्य आरम्भ करता है। उस प्राणसे वीर्यमें विकार उत्पन्न होनेपर फिर अपानकी प्रवृत्ति होती है ॥ ६ ॥ शुक्रात् संजायते चापि रसादपि च जायते । एतद् रूपमुदानस्य हर्षो मिथुनमन्तरा ॥ ७ ॥ शुक्रसे और रससे भी हर्षकी उत्पत्ति होती है, यह हर्ष ही उदानका रूप है। उक्त कारण और कार्यरूप जो मिथुन है, उन दोनोंके बीचमें हर्ष व्याप्त होकर स्थित है ॥ ७ ॥ कामात् संजायते शुक्रं शुक्रात् संजायते रजः । समानव्यानजनिते सामान्ये शुक्रशोणिते ॥ ८ ॥ प्रवृत्तिके मूलभूत कामसे वीर्य उत्पन्न होता है। उससे रजकी उत्पत्ति होती है। ये दोनों वीर्य और रज समान और व्यानसे उत्पन्न होते हैं। इसलिये सामान्य कहलाते हैं ॥ ८ ॥ प्राणापानाविदं द्वन्द्वमवाक् चोर्ध्वं च गच्छतः । व्यानः समानश्चैवोभौ तिर्यग् द्वन्द्वत्वमुच्यते ॥ ९ ॥ प्राण और अपान—ये दोनों भी द्वन्द्व हैं। ये नीचे और ऊपरको जाते हैं। व्यान और समान—ये दोनों मध्यगामी द्वन्द्व कहे जाते हैं ॥ ९ ॥ अग्निर्वै देवताः सर्वा इति देवस्य शासनम् । संजायते ब्राह्मणस्य ज्ञानं बुद्धिसमन्वितम् ॥ १० ॥ अग्नि अर्थात् परमात्मा ही सम्पूर्ण देवता हैं। यह वेद उन परमेश्वरकी आज्ञारूप है। उस वेदसे ही ब्राह्मणमें बुद्धियुक्त ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ १० ॥ तस्य धूमस्तमो रूपं रजो भस्मसु तेजसः । सर्वं संजायते तस्य यत्र प्रक्षिप्यते हविः ॥ ११ ॥ उस अग्निका धुआँ तमोमय और भस्म रजोमय है। जिसके निमित्त हविष्यकी आहुति दी जाती है, उस अग्निसे (प्रकाशस्वरूप परमेश्वरसे) यह सारा जगत् उत्पन्न होता है ॥ ११ ॥ सत्त्वात् समानो व्यानश्च इति यज्ञविदो विदुः । प्राणापानावाज्यभागौ तयोर्मध्ये हुताशनः ॥ १२ ॥ एतद् रूपमुदानस्य परं ब्राह्मणा विदुः । निर्द्वन्द्वमिति यत् त्वेतत् तन्मे निगदतः शृणु ॥ १३ ॥ यज्ञवेत्ता पुरुष यह जानते हैं कि सत्त्वगुणसे समान और व्यानकी उत्पत्ति होती है। प्राण और अपान आज्यभाग नामक दो आहुतियोंके समान हैं। उनके मध्यभागमें अग्निकी

स्थिति है। यही उदानका उत्कृष्ट रूप है, जिसे ब्राह्मणलोग जानते हैं। जो निर्द्वन्द्व कहा गया है, उसे भी बताता हूँ, तुम मेरे मुखसे सुनो ॥ १२-१३ ॥ अहोरात्रमिदं द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः । एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥ १४ ॥ ये दिन और रात द्वन्द्व हैं, इनके मध्यभागमें अग्नि हैं। ब्राह्मणलोग इसीको उदानका उत्कृष्ट रूप मानते हैं ॥ १४ ॥ सच्चासचैव तद् द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः । एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥ १५ ॥ सत् और असत्—ये दोनों द्वन्द्व हैं तथा इनके मध्यभागमें अग्नि हैं। ब्राह्मणलोग इसे उदानका परम उत्कृष्ट रूप मानते हैं ॥ १५ ॥ ऊर्ध्वं समानो व्यानश्च व्यस्यते कर्म तेन तत् । तृतीयं तु समानेन पुनरेव व्यवस्यते ॥ १६ ॥ ऊर्ध्व अर्थात् ब्रह्म जिस संकल्प नामक हेतुसे समान और व्यानरूप होता है, उसीसे कर्मका विस्तार होता है। अतः संकल्पको रोकना चाहिये। जाग्रत् और स्वप्नके अतिरिक्त जो तीसरी अवस्था है, उससे उपलक्षित ब्रह्मका समानके द्वारा ही निश्चय होता है ॥ १६ ॥ शान्त्यर्थं व्यानमेकं च शान्तिर्ब्रह्म सनातनम् । एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥ १७ ॥ एकमात्र व्यान शान्तिके लिये है। शान्ति सनातन ब्रह्म है। ब्राह्मणलोग इसीको उदानका परम उत्कृष्ट रूप मानते हैं ॥ १७ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मण-गीताविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥

पञ्चविंशोऽध्यायः चातुर्होत्र यज्ञका वर्णन ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । चातुर्होत्रविधानस्य विधानमिह यादृशम् ॥ १ ॥ ब्राह्मणने कहा— प्रिये! इसी विषयमें चार होताओंसे युक्त यज्ञका जैसा विधान है, उसको बतानेवाले इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥ तस्य सर्वस्य विधिवद् विधानमुपदिश्यते । शृणु मे गदतो भद्रे रहस्यमिदमद्भुतम् ॥ २ ॥ भद्रे! उस सबके विधि-विधानका उपदेश किया जाता है। तुम मेरे मुखसे इस अद्भुत रहस्यको सुनो ॥ २ ॥ करणं कर्म कर्ता च मोक्ष इत्येव भाविनि । चत्वार एते होतारो यैरिदं जगदावृतम् ॥ ३ ॥ भाविनि! करण, कर्म, कर्ता और मोक्ष—ये चार होता हैं, जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् आवृत है ॥ ३ ॥ हेतूनां साधनं चैव शृणु सर्वमशेषतः । घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् च श्रोत्रं च पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च सप्तैते विज्ञेया गुणहेतवः ॥ ४ ॥ इनके जो हेतु हैं, उन्हें युक्तियोंद्वारा सिद्ध किया जाता है। वह सब पूर्णरूपसे सुनो। घ्राण (नासिका), जिह्वा, नेत्र, त्वचा, पाँचवाँ कान तथा मन और बुद्धि—ये सात कारणरूप हेतु गुणमय जानने चाहिये ॥ ४ ॥ गन्धो रसश्च रूपं च शब्दः स्पर्शश्च पञ्चमः । मन्तव्यमथ बोद्धव्यं सप्तैते कर्महेतवः ॥ ५ ॥ गन्ध, रस, रूप, शब्द, पाँचवाँ स्पर्श तथा मन्तव्य और बोद्धव्य—ये सात विषय कर्मरूप हेतु हैं ॥ ५ ॥ घ्राता भक्षयिता द्रष्टा वक्ता श्रोता च पञ्चमः । मन्ता बोद्धा च सप्तैते विज्ञेयाः कर्तृहेतवः ॥ ६ ॥ सूँघनेवाला, खानेवाला, देखनेवाला, बोलनेवाला, पाँचवाँ सुननेवाला तथा मनन करनेवाला और निश्चयात्मक बोध प्राप्त करनेवाला—ये सात कर्तारूप हेतु हैं ॥ ६ ॥ स्वगुणं भक्षयन्त्येते गुणवन्तः शुभाशुभम् । अहं च निर्गुणोऽनन्तः सप्तैते मोक्षहेतवः ॥ ७ ॥

ये प्राण आदि इन्द्रियाँ गुणवान् हैं, अतः अपने शुभाशुभ विषयोंरूप गुणोंका उपभोग करती हैं। मैं निर्गुण और अनन्त हूँ, (इनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, यह समझ लेनेपर) ये सातों—घ्राण आदि मोक्षके हेतु होते हैं ॥ ७ ॥ विदुषां बुध्यमानानां स्वं स्वं स्थानं यथाविधि । गुणास्ते देवताभूताः सततं भुञ्जते हविः ॥ ८ ॥ विभिन्न विषयोंका अनुभव करनेवाले विद्वानोंके घ्राण आदि अपने-अपने स्थानको विधिपूर्वक जानते हैं और देवता-रूप होकर सदा हविष्यका भोग करते हैं ॥ ८ ॥ अदन्नन्नान्यथोऽविद्वान् ममत्वेनोपपद्यते । आत्मार्थे पाचयनन्नं ममत्वेनोपहन्यते ॥ ९ ॥ अज्ञानी पुरुष अन्न भोजन करते समय उसके प्रति ममत्वसे युक्त हो जाता है। इसी प्रकार जो अपने लिये भोजन पकाता है, वह भी ममत्व दोषसे मारा जाता है ॥ ९ ॥ अभक्ष्यभक्षणं चैव मद्यपानं च हन्ति तम् । स चान्नं हन्ति तं चान्नं स हत्वा हन्यते पुनः ॥ १० ॥ वह अभक्ष्य-भक्षण और मद्यपान-जैसे दुर्व्यसनोंको भी अपना लेता है, जो उसके लिये घातक होते हैं। वह भक्षणके द्वारा उस अन्नकी हत्या करता है और उसकी हत्या करके वह स्वयं भी उसके द्वारा मारा जाता है ॥ १० ॥ हन्ता ह्यन्नमिदं विद्वान् पुनर्जनयतीश्वरः । न चान्नाज्जायते तस्मिन् सूक्ष्मो नाम व्यतिक्रमः ॥ ११ ॥ जो विद्वान् इस अन्नको खाता है, अर्थात् अन्नसे उपलक्षित समस्त प्रपंचको अपने- आपमें लीन कर देता है, वह ईश्वर—सर्वसमर्थ होकर पुनः अन्न आदिका जनक होता है। उस अन्नसे उस विद्वान् पुरुषमें कोई सूक्ष्म-से-सूक्ष्म दोष भी नहीं उत्पन्न होता ॥ ११ ॥ मनसा गम्यते यच्च यच्च वाचा निगद्यते । श्रोत्रेण श्रूयते यच्च चक्षुषा यच्च दृश्यते ॥ १२ ॥ स्पर्शेन स्पृश्यते यच्च घ्राणेन घ्रायते च यत् । मनःषष्ठानि संयम्य हवींष्येतानि सर्वशः ॥ १३ ॥ गुणवत्पावको मह्यं दीव्यतेऽन्तःशरीरगः । जो मनसे अवगत होता है, वाणीद्वारा जिसका कथन होता है, जिसे कानसे सुना और आँखसे देखा जाता है, जिसको त्वचासे छूआ और नासिकासे सूँघा जाता है। इन मन्तव्य आदि छहों विषयरूपी हविष्योंका मन आदि छहों इन्द्रियोंके संयमपूर्वक अपने-आपमें होम करना चाहिये। उस होमके अधिष्ठानभूत गुणवान् पावकरूप परमात्मा मेरे तन-मनके भीतर प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १२-१३ १/२ ॥ योगयज्ञः प्रवृत्तो मे ज्ञानवह्निप्रदोद्भवः । प्राणस्तोत्रोऽपानशस्त्रः सर्वत्यागसुदक्षिणः ॥ १४ ॥

मैंने योगरूपी यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया है। इस यज्ञका उद्भव ज्ञानरूपी अग्निको प्रकाशित करनेवाला है। इसमें प्राण ही स्तोत्र है, अपान शस्त्र है और सर्वस्वका त्याग ही उत्तम दक्षिणा है ।। १४ ।। कर्तानुमन्ता ब्रह्मात्मा होताध्वर्युः कृतस्तुतिः । ऋतं प्रशास्ता तच्छस्त्रमपवर्गोऽस्य दक्षिणा ।। १५ ।। कर्ता (अहंकार), अनुमन्ता (मन) और आत्मा (बुद्धि)—ये तीनों ब्रह्मरूप होकर क्रमशः होता, अध्वर्यु और उद्गाता हैं। सत्यभाषण ही प्रशास्ताका शस्त्र है और अपवर्ग (मोक्ष) ही उस यज्ञकी दक्षिणा है ।। १५ ।। ऋचश्चाप्यत्र शंसन्ति नारायणविदो जनाः । नारायणाय देवाय यदविन्दन् पशून् पुरा ।। १६ ।। नारायणको जाननेवाले पुरुष इस योगयज्ञके प्रमाणमें ऋचाओंका भी उल्लेख करते हैं। पूर्वकालमें भगवान् नारायणदेवकी प्राप्तिके लिये भक्त पुरुषोंने इन्द्रियरूपी पशुओंको अपने अधीन किया था ।। १६ ।। तत्र सामानि गायन्ति तत्र चाहुर्निदर्शनम् । देवं नारायणं भीरु सर्वात्मानं निबोध तम् ।। १७ ।। भगवत्प्राप्ति हो जानेपर परमानन्दसे परिपूर्ण हुए सिद्ध पुरुष जो सामगान करते हैं, उसका दृष्टान्त तैत्तिरीय-उपनिषद्के विद्वान् ‘एतत् सामगायन्नास्ते’ इत्यादि मन्त्रोंके रूपमें उपस्थित करते हैं। भीरु! तुम उस सर्वात्मा भगवान् नारायणदेवका ज्ञान प्राप्त करो ।। १७ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु पञ्चविंशोऽध्यायः ।। २५ ।। इस प्रकार महाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २५ ।।

षड्विंशोऽध्यायः अन्तर्यामीकी प्रधानता ब्राह्मण उवाच एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता यो हृच्छयस्तमहमनुब्रवीमि । तेनैव युक्तः प्रवणादिवोदकं यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥ १ ॥ ब्राह्मणने कहा—प्रिये! जगत्‌का शासक एक ही है, दूसरा नहीं। जो हृदयके भीतर विराजमान है, उस परमात्माको ही मैं सबका शासक बतला रहा हूँ। जैसे पानी ढालू स्थानसे नीचेकी ओर प्रवाहित होता है, वैसे ही उस—परमात्माकी प्रेरणासे मैं जिस तरहके कार्यमें नियुक्त होता हूँ, उसीका पालन करता रहता हूँ ॥ १ ॥ एको गुरुर्नास्ति ततो द्वितीयो यो हृच्छयस्तमहमनुब्रवीमि । तेनानुशिष्टा गुरुणा सदैव पराभूता दानवाः सर्व एव ॥ २ ॥ एक ही गुरु है दूसरा नहीं। जो हृदयमें स्थित है, उस परमात्माको ही मैं गुरु बतला रहा हूँ। उसी गुरुके अनुशासनसे समस्त दानव हार गये हैं ॥ २ ॥ एको बन्धुर्नास्ति ततो द्वितीयो यो हृच्छयस्तमहमनुब्रवीमि । तेनानुशिष्टा बान्धवा बन्धुमन्तः सप्तर्षयश्चैव दिवि प्रभान्ति ॥ ३ ॥ एक ही बन्धु है, उससे भिन्न दूसरा कोई बन्धु नहीं है। जो हृदयमें स्थित है, उस परमात्माको ही मैं बन्धु कहता हूँ। उसीके उपदेशसे बान्धवगण बन्धुमान् होते हैं और सप्तर्षि लोग आकाशमें प्रकाशित होते हैं ॥ ३ ॥ एकः श्रोता नास्ति ततो द्वितीयो यो हृच्छयस्तमहमनुब्रवीमि । तस्मिन् गुरौ गुरुवासं निरुष्य शक्रो गतः सर्वलोकाम्ररत्वम् ॥ ४ ॥ एक ही श्रोता है, दूसरा नहीं। जो हृदयमें स्थित परमात्मा है, उसीको मैं श्रोता कहता हूँ। इन्द्रने उसीको गुरु मानकर गुरुकुलवासका नियम पूरा किया अर्थात् शिष्यभावसे वे उस

अन्तर्यामीकी ही शरणमें गये। इससे उन्हें सम्पूर्ण लोकोंका साम्राज्य और अमरत्व प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥ एको द्वेष्टा नास्ति ततो द्वितीयो यो हृच्छयस्तमहमनुब्रवीमि । तेनानुशिष्टा गुरुणा सदैव लोके द्विषाः पन्नगाः सर्व एव ॥ ५ ॥ एक ही शत्रु है दूसरा नहीं। जो हृदयमें स्थित है, उस परमात्माको ही मैं गुरु बतला रहा हूँ। उसी गुरुकी प्रेरणासे जगत्के सारे साँप सदा द्वेषभावसे युक्त रहते हैं ॥ ५ ॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रजापतौ पन्नगानां देवर्षीणां च संविदम् ॥ ६ ॥ पूर्वकालमें सर्पों, देवताओं और ऋषियोंकी प्रजापतिके साथ जो बातचीत हुई थी, उस प्राचीन इतिहासके जानकार लोग उस विषयमें उदाहरण दिया करते हैं ॥ ६ ॥ देवर्षयश्च नागाश्चाप्यसुराश्च प्रजापतिम् । पर्यपृच्छन्नुपासीनाः श्रेयो नः प्रोच्यतामिति ॥ ७ ॥ एक बार देवता, ऋषि, नाग और असुरोंने प्रजापतिके पास बैठकर पूछा—'भगवन्! हमारे कल्याणका क्या उपाय है? यह बताइये' ॥ ७ ॥ तेषां प्रोवाच भगवान् श्रेयः समनुपृच्छताम् । ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ते श्रुत्वा प्राद्रवन् दिशः ॥ ८ ॥ कल्याणकी बात पूछनेवाले उन महानुभावोंका प्रश्न सुनकर भगवान् प्रजापति ब्रह्माजीने एकाक्षर ब्रह्म—ॐकारका उच्चारण किया। उनका प्रणवनाद सुनकर सब लोग अपनी-अपनी दिशा (अपने-अपने स्थान)-की ओर भाग चले ॥ ८ ॥ तेषां प्रद्रवमाणानामुपदेशार्थमात्मनः । सर्पाणां दंशने भावः प्रवृत्तः पूर्वमेव तु ॥ ९ ॥ असुराणां प्रवृत्तस्तु दम्भभावः स्वभावजः । दानं देवा व्यवसिता दममेव महर्षयः ॥ १० ॥ फिर उन्होंने उस उपदेशके अर्थपर जब विचार किया, तब सबसे पहले सर्पोंके मनमें दूसरोंके डँसनेका भाव पैदा हुआ, असुरोंमें स्वाभाविक दम्भका आविर्भाव हुआ तथा देवताओंने दानको और महर्षियोंने दमको ही अपनानेका निश्चय किया ॥ ९-१० ॥ एकं शास्तारमासाद्य शब्देनैकेन संस्कृताः । नाना व्यवसिताः सर्वे सर्पदेवर्षिदानवाः ॥ ११ ॥ इस प्रकार सर्प, देवता, ऋषि और दानव—ये सब एक ही उपदेशक गुरुके पास गये थे और एक ही शब्दके उपदेशसे उनकी बुद्धिका संस्कार हुआ तो भी उनके मनमें भिन्न-भिन्न प्रकारके भाव उत्पन्न हो गये ॥ ११ ॥

शृणोत्ययं प्रोच्यमानं गृह्णाति च यथातथम् । पृच्छात्तस्तदतो भूयो गुरुरन्यो न विद्यते ॥ १२ ॥ श्रोता गुरुके कहे हुए उपदेशको सुनता है और उसको जैसे-तैसे (भिन्न-भिन्न रूपमें) ग्रहण करता है। अतः प्रश्न पूछनेवाले शिष्यके लिये अपने अन्तर्यामीसे बढ़कर दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥ १२ ॥ तस्य चानुमते कर्म ततः पश्चात् प्रवर्तते । गुरुर्बोद्धा च श्रोता च द्रष्टा च हृदि निःसृतः ॥ १३ ॥ पहले वह कर्मका अनुमोदन करता है, उसके बाद जीवकी उस कर्ममें प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार हृदयमें प्रकट होनेवाला परमात्मा ही गुरु, ज्ञानी, श्रोता और द्रष्टा है ॥ १३ ॥ पापेन विचरँल्लोके पापचारी भवत्ययम् । शुभेन विचरँल्लोके शुभचारी भवत्युत ॥ १४ ॥ संसारमें जो पाप करते हुए विचरता है, वह पापाचारी और जो शुभ कर्मोंका आचरण करता है, वह शुभाचारी कहलाता है ॥ १४ ॥ कामचारी तु कामेन य इन्द्रियसुखे रतः । ब्रह्मचारी सदैवैश य इन्द्रियजये रतः ॥ १५ ॥ इसी तरह कामनाओंके द्वारा इन्द्रियसुखमें परायण मनुष्य कामचारी और इन्द्रियसंयममें प्रवृत्त रहनेवाला पुरुष सदा ही ब्रह्मचारी है ॥ १५ ॥ अपेतव्रतकर्मा तु केवलं ब्रह्मणि स्थितः । ब्रह्मभूतश्चरँल्लोके ब्रह्मचारी भवत्ययम् ॥ १६ ॥ जो व्रत और कर्मोंका त्याग करके केवल ब्रह्ममें स्थित है, वह ब्रह्मस्वरूप होकर संसारमें विचरता रहता है, वही मुख्य ब्रह्मचारी है ॥ १६ ॥ ब्रह्मैव समिधस्तस्य ब्रह्माग्निर्ब्रह्मसम्भवः । आपो ब्रह्म गुरुर्ब्रह्म स ब्रह्मणि समाहितः ॥ १७ ॥ ब्रह्म ही उसकी समिधा है, ब्रह्म ही अग्नि है, ब्रह्मसे ही वह उत्पन्न हुआ है, ब्रह्म ही उसका जल और ब्रह्म ही गुरु है। उसकी चित्तवृत्तियाँ सदा ब्रह्ममें ही लीन रहती हैं ॥ १७ ॥ एतदेवैदृशं सूक्ष्मं ब्रह्मचर्यं विदुर्बुधाः । विदित्वा चान्वपद्यन्त क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिताः ॥ १८ ॥ विद्वानोंने इसीको सूक्ष्म ब्रह्मचर्य बतलाया है। तत्त्वदर्शीका उपदेश पाकर प्रबुद्ध हुए आत्मज्ञानी पुरुष इस ब्रह्मचर्यके स्वरूपको जानकर सदा उसका पालन करते रहते हैं ॥ १८ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २६ ।।

सप्तविंशोऽध्यायः अध्यात्मविषयक महान् वनका वर्णन ब्राह्मण उवाच संकल्पदंशमशकं शोकहर्षहिमातपम् । मोहान्धकारतिमिरं लोभव्याधिसरीसृपम् ।। १ ।। विषयैकात्ययाध्वानं कामक्रोधविरोधकम् । तदतीत्य महादुर्गं प्रविष्टोऽस्मि महद् वनम् ।। २ ।। ब्राह्मणने कहा—प्रिये! जहाँ संकल्परूपी डाँस और मच्छरोंकी अधिकता होती है। शोक और हर्षरूपी गर्मी, सर्दीका कष्ट रहता है, मोहरूपी अन्धकार फैला हुआ है, लोभ तथा व्याधिरूपी सर्प विचरा करते हैं। जहाँ विषयोंका ही मार्ग है, जिसे अकेले ही तै करना पड़ता है तथा जहाँ काम और क्रोधरूपी शत्रु डेरा डाले रहते हैं, उस संसाररूपी दुर्गम पथका उल्लंघन करके अब मैं ब्रह्मरूपी महान् वनमें प्रवेश कर चुका हूँ ।। १-२ ।। ब्राह्मण्युवाच क्व तद् वनं महाप्राज्ञ के वृक्षाः सरितश्च काः । गिरयः पर्वताश्चैव कियत्यध्वनि तद् वनम् ।। ३ ।। ब्राह्मणीने पूछा—महाप्राज्ञ! वह वन कहाँ है? उसमें कौन-कौनसे वृक्ष, गिरि, पर्वत और नदियाँ हैं तथा वह कितनी दूरीपर है ।। ३ ।। ब्राह्मण उवाच नैतदस्ति पृथग्भावः किंचिदन्यत् ततः सुखम् । नैतदस्त्यपृथग्भावः किंचिद् दुःखतरं ततः ।। ४ ।। ब्राह्मणने कहा—प्रिये! उस वनमें न भेद है न अभेद, वह इन दोनोंसे अतीत है। वहाँ लौकिक सुख और दुःख दोनोंका अभाव है ।। ४ ।। तस्माद् ह्रस्वतरं नास्ति न ततोऽस्ति महत्तरम् । नास्ति तस्मात् सूक्ष्मतरं नास्त्यन्यत् तत्समं सुखम् ।। ५ ।। उससे अधिक छोटी, उससे अधिक बड़ी और उससे अधिक सूक्ष्म भी दूसरी कोई वस्तु नहीं है। उसके समान सुखरूप भी कोई नहीं है ।। ५ ।। न तत्राविश्य शोचन्ति न प्रहृष्यन्ति च द्विजाः । न च बिभ्यति केषांचित् तेभ्यो बिभ्यति केचन ।। ६ ।। उस वनमें प्रविष्ट हो जानेपर द्विजातियोंको न हर्ष होता है, न शोक। न तो वे स्वयं किन्हीं प्राणियोंसे डरते हैं और न उन्हींसे दूसरे कोई प्राणी भय मानते हैं ।। ६ ।।

तस्मिन् वने सप्त महाद्रुमाश्च फलानि सप्तातिथयश्च सप्त । सप्ताश्रमाः सप्त समाधयश्च दीक्षाश्च सप्तैतदरण्यरूपम् ॥ ७ ॥ वहाँ सात बड़े-बड़े वृक्ष हैं, सात उन वृक्षोंके फल हैं तथा सात ही उन फलोंके भोक्ता अतिथि हैं। सात आश्रम हैं। वहाँ सात प्रकारकी समाधि और सात प्रकारकी दीक्षाएँ हैं। यही उस वनका स्वरूप है ॥ ७ ॥ पञ्चवर्णानि दिव्यानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद् वनम् ॥ ८ ॥ वहाँके वृक्ष पाँच प्रकारके रंगोंके दिव्य पुष्पों और फलोंकी सृष्टि करते हुए सब ओरसे वनको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ ८ ॥ सुवर्णानि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद् वनम् ॥ ९ ॥ वहाँ दूसरे वृक्षोंने सुन्दर दो रंगवाले पुष्प और फल उत्पन्न करते हुए उस वनको सब ओरसे व्याप्त कर रखा है ॥ ९ ॥ सुरभीणि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद् वनम् ॥ १० ॥ तीसरे वृक्ष वहाँ सुगन्धयुक्त दो रंगवाले पुष्प और फल प्रदान करते हुए उस वनको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ १० ॥ सुरभीण्येकवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद् वनम् ॥ ११ ॥ चौथे वृक्ष सुगन्धयुक्त केवल एक रंगवाले पुष्प और फलोंकी सृष्टि करते हुए उस वनके सब ओर फैले हैं ॥ ११ ॥ बहून्यव्यक्तवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । विसृजन्तौ महावृक्षौ तद् वनं व्याप्य तिष्ठतः ॥ १२ ॥ वहाँ दो महावृक्ष बहुत-से अव्यक्त रंगवाले पुष्प और फलोंकी रचना करते हुए उस वनको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ १२ ॥ एको वह्निः सुमना ब्राह्मणोऽत्र पञ्चेन्द्रियाणि समिधश्चात्र सन्ति । तेभ्यो मोक्षाः सप्त फलन्ति दीक्षा गुणाः फलान्यतिथयः फलाशाः ॥ १३ ॥ उस वनमें एक ही अग्नि है, जीव शुद्धचेता ब्राह्मण है, पाँच इन्द्रियाँ समिधाएँ हैं। उनसे जो मोक्ष प्राप्त होता है, वह सात प्रकारका है। इस यज्ञकी दीक्षाका फल अवश्य होता है।

गुण ही फल है। सात अतिथि ही फलोंके भोक्ता हैं ।। १३ ।। आतिथ्यं प्रतिगृह्णन्ति तत्र तत्र महर्षयः । अर्चितेषु प्रलीनेषु तेष्वन्यद् रोचते वनम् ।। १४ ।। वे महर्षिगण इस यज्ञमें आतिथ्य ग्रहण करते हैं और पूजा स्वीकार करते ही उनका लय हो जाता है। तत्पश्चात् वह ब्रह्मरूप वन विलक्षणरूपसे प्रकाशित होता है ।। १४ ।। प्रज्ञावृक्षं मोक्षफलं शान्तिच्छायासमन्वितम् । ज्ञानाश्रयं तृप्तितोयमन्तःक्षेत्रज्ञभास्करम् ।। १५ ।। उसमें प्रज्ञारूपी वृक्ष शोभा पाते हैं, मोक्षरूपी फल लगते हैं और शान्तिमयी छाया फैली रहती है। ज्ञान वहाँका आश्रयस्थान और तृप्ति जल है। उस वनके भीतर आत्मारूपी सूर्यका प्रकाश छाया रहता है ।। १५ ।। येऽधिगच्छन्ति तं सन्तस्तेषां नास्ति भयं पुनः । ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक् च तस्य नान्तोऽधिगम्यते ।। १६ ।। जो श्रेष्ठ पुरुष उस वनका आश्रय लेते हैं, उन्हें फिर कभी भय नहीं होता। वह वन ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर सब ओर व्याप्त है। उसका कहीं भी अन्त नहीं है ।। १६ ।। सप्त स्त्रियस्तत्र वसन्ति सद्य- स्त्ववाङ्मुखा भानुमत्यो जनित्र्यः । ऊर्ध्वं रसानाददते प्रजाभ्यः सर्वान् यथा सत्यमनित्यता च ।। १७ ।। वहाँ सात स्त्रियाँ निवास करती हैं, जो लज्जाके मारे अपना मुँह नीचेकी ओर किये रहती हैं। वे चिन्मय ज्योतिसे प्रकाशित होती हैं। वे सबकी जननी हैं और वे उस वनमें रहनेवाली प्रजासे सब प्रकारके उत्तम रस उसी प्रकार ग्रहण करती हैं, जैसे अनित्यता सत्यको ग्रहण करती है ।। १७ ।। तत्रैव प्रतिष्ठन्ति पुनस्तत्रोपयन्ति च । सप्त सप्तर्षयः सिद्धा वसिष्ठप्रमुखैः सह ।। १८ ।। सात सिद्ध सप्तर्षि वसिष्ठ आदिके साथ उसी वनमें लीन होते और उसीसे उत्पन्न होते हैं ।। १८ ।। यशो वर्चो भगश्चैव विजयः सिद्धतेजसः । एवमेवानुवर्तन्ते सप्त ज्योतींषि भास्करम् ।। १९ ।। यश, प्रभा, भग (ऐश्वर्य), विजय, सिद्धि (ओज) और तेज—ये सात ज्योतियाँ उपर्युक्त आत्मारूपी सूर्यका ही अनुसरण करती हैं ।। १९ ।। गिरयः पर्वताश्चैव सन्ति तत्र समासतः । नद्यश्च सरितो वारि वहन्त्यो ब्रह्मसम्भवम् ।। २० ।।

उस ब्रह्मतत्त्वमें ही गिरि, पर्वत, झरनें, नदी और सरिताएँ स्थित हैं, जो ब्रह्मजनित जल बहाया करती हैं ॥ २० ॥ नदीनां सङ्गमश्चैव वैताने समुपह्वरे । स्वात्मतृप्ता यतो यान्ति साक्षादेव पितामहम् ॥ २१ ॥ नदियोंका संगम भी उसीके अत्यन्त गूढ़ हृदयाकाशमें संक्षेपसे होता है। जहाँ योगरूपी यज्ञका विस्तार होता रहता है। वही साक्षात् पितामहका स्वरूप है। आत्मज्ञानसे तृप्त पुरुष उसीको प्राप्त होते हैं ॥ २१ ॥ कृशाशाः सुव्रताशाश्च तपसा दग्धकिल्बिषाः । आत्मन्यात्मानमाविश्य ब्रह्माणं समुपासते ॥ २२ ॥ जिनकी आशा क्षीण हो गयी है, जो उत्तम व्रतके पालनकी इच्छा रखते हैं। तपस्यासे जिनके सारे पाप दग्ध हो गये हैं। वे ही पुरुष अपनी बुद्धिको आत्मनिष्ठ करके परब्रह्मकी उपासना करते हैं ॥ २२ ॥ शममप्यत्र शंसन्ति विद्यारण्यविदो जनाः । तदारण्यमभिप्रेत्य यथाधीरभिजायत ॥ २३ ॥ विद्या (ज्ञान)-के ही प्रभावसे ब्रह्मरूपी वनका स्वरूप समझमें आता है। इस बातको जाननेवाले मनुष्य इस वनमें प्रवेश करनेके उद्देश्यसे शम (मनोनिग्रह)-की ही प्रशंसा करते हैं, जिससे बुद्धि स्थिर होती है ॥ २३ ॥ एतदेवदृशं पुण्यरमरण्यं ब्राह्मणा विदुः । विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिता ॥ २४ ॥ ब्राह्मण ऐसे गुणवाले इस पवित्र वनको जानते हैं और तत्त्वदर्शीके उपदेशसे प्रबुद्ध हुए आत्मज्ञानी पुरुष उस ब्रह्मवनको शास्त्रतः जानकर शम आदि साधनोंके अनुष्ठानमें लग जाते हैं ॥ २४ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीतासम्बन्धी सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

अष्टाविंशोऽध्यायः ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद* ब्राह्मण उवाच गन्धान् न जिघ्रामि रसान् न वेद्मि रूपं न पश्यामि न च स्पृशामि । न चापि शब्दान् विविधान् शृणोमि न चापि संकल्पमुपैमि कंचित् ॥ १ ॥ ब्राह्मण कहते हैं—मैं न तो गन्धोंको सूँघता हूँ, न रसोंका आस्वादन करता हूँ, न रूपको देखता हूँ, न किसी वस्तुका स्पर्श करता हूँ, न नाना प्रकारके शब्दोंको सुनता हूँ और न कोई संकल्प ही करता हूँ ॥ १ ॥ अर्थानिष्टान् कामयते स्वभावः सर्वान् द्वेष्यान् प्रद्विषते स्वभावः । कामद्वेषावुद्भवतः स्वभावात् प्राणापानौ जन्तुदेहान्निविश्य ॥ २ ॥ स्वभाव ही अभीष्ट पदार्थोंकी कामना रखता है, स्वभाव ही सम्पूर्ण द्वेष्य वस्तुओंके प्रति द्वेष करता है। जैसे प्राण और अपान स्वभावसे ही प्राणियोंके शरीरोंमें प्रविष्ट होकर अन्न-पाचन आदिका कार्य करते रहते हैं, उसी प्रकार स्वभावसे ही राग और द्वेषकी उत्पत्ति होती है। तात्पर्य यह कि बुद्धि आदि इन्द्रियाँ स्वभावसे ही पदार्थोंमें बर्त रही हैं ॥ २ ॥ तेभ्यश्चान्यांस्तेषु नित्यांश्च भावान् भूतात्मानं लक्षयेरन् शरीरे । तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि सक्तः कथंचित् कामक्रोधाभ्यां जरया मृत्युना च ॥ ३ ॥ इन बाह्य इन्द्रियों और विषयोंसे भिन्न जो स्वप्न और सुषुप्तिके वासनामय विषय एवं इन्द्रियाँ हैं तथा उनमें भी जो नित्यभाव हैं, उनसे भी विलक्षण जो भूतात्मा है, उसको शरीरके भीतर योगीजन देख पाते हैं। उसी भूतात्मामें स्थित हुआ मैं कहीं किसी तरह भी काम, क्रोध, जरा और मृत्युसे ग्रस्त नहीं होता ॥ ३ ॥ अकामयानस्य च सर्वकामा- नविद्विषाणस्य च सर्वदोषान् । न मे स्वभावेषु भवन्ति लेपा- स्तोयस्य बिन्दोरिव पुष्करेषु ॥ ४ ॥

मैं सम्पूर्ण कामनाओंमेंसे किसीकी कामना नहीं करता। समस्त दोषोंसे भी कभी द्वेष नहीं करता। जैसे कमलके पत्तोंपर जल-बिन्दुका लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरे स्वभावमें राग और द्वेषका स्पर्श नहीं है ॥ ४ ॥ नित्यस्य चैतस्य भवन्त्यनित्या निरीक्ष्यमाणस्य बहुस्वभावान् । न सज्जते कर्मसु भोगजालं दिवीव सूर्यस्य मयूखजालम् ॥ ५ ॥ जिनका स्वभाव बहुत प्रकारका है, उन इन्द्रिय आदिको देखनेवाले इस नित्यस्वरूप आत्माके लिये सब भोग अनित्य हो जाते हैं। अतः वे भोगसमुदाय उस विद्वान्‌को उसी प्रकार कर्मोंमें लिप्त नहीं कर सकते, जैसे आकाशमें सूर्यकी किरणोंका समुदाय सूर्यको लिप्त नहीं कर सकता ॥ ५ ॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अध्वर्युयतिसंवादं तं निबोध यशस्विनि ॥ ६ ॥ यशस्विनि! इस विषयमें अध्वर्यु और यतिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, तुम उसे सुनो ॥ ६ ॥ प्रोक्ष्यमाणं पशुं दृष्ट्वा यज्ञकर्मण्यथाब्रवीत् । यतिरध्वर्युमासीनो हिंसेयमिति कुत्सयन् ॥ ७ ॥ किसी यज्ञ-कर्ममें पशुका प्रोक्षण होता देख वहीं बैठे हुए एक यतिने अध्वर्युसे उसकी निन्दा करते हुए कहा—'यह हिंसा है (अतः इससे पाप होगा)' ॥ ७ ॥ तमध्वर्युः प्रत्युवाच नायं छागो विनश्यति । श्रेयसा योक्ष्यते जन्तुर्यदि श्रुतिरियं तथा ॥ ८ ॥ अध्वर्युने यतिको इस प्रकार उत्तर दिया—'यह बकरा नष्ट नहीं होगा। यदि 'पशुर्वे नीयमानः' इत्यादि श्रुति सत्य है तो यह जीव कल्याणका ही भागी होगा ॥ ८ ॥ यो ह्यस्य पार्थिवो भागः पृथिवीं स गमिष्यति । यदस्य वारिजं किंचिदपस्तत् सम्प्रवेक्ष्यति ॥ ९ ॥ 'इसके शरीरका जो पार्थिव भाग है, वह पृथ्वीमें विलीन हो जायगा। इसका जो कुछ भी जलीय भाग है, वह जलमें प्रविष्ट हो जायगा ॥ ९ ॥ सूर्य चक्षुर्दिशः श्रोत्रं प्राणोऽस्य दिवमेव च । आगमे वर्तमानस्य न मे दोषोऽस्ति कश्चन ॥ १० ॥ 'नेत्र सूर्यमें, कान दिशाओंमें और प्राण आकाशमें ही लयको प्राप्त होगा। शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार बर्ताव करनेवाले मुझको कोई दोष नहीं लगेगा' ॥ १० ॥ यतिरुवाच

प्राणैर्वियोगे छागस्य यदि श्रेयः प्रपश्यसि । छागार्थे वर्तते यज्ञो भवतः किं प्रयोजनम् ॥ ११ ॥ यतिने कहा—यदि तुम बकरेके प्राणोंका वियोग हो जानेपर भी उसका कल्याण ही देखते हो, तब तो यह यज्ञ उस बकरेके लिये ही हो रहा है। तुम्हारा इस यज्ञसे क्या प्रयोजन है? ॥ ११ ॥ अत्र त्वां मन्यतां भ्राता पिता माता सखेति च । मन्त्रयस्वैनमुन्नीय परवन्तं विशेषतः ॥ १२ ॥ श्रुति कहती है 'पशो! इस विषयमें तुझे तेरे भाई, पिता, माता और सखाकी अनुमति प्राप्त होनी चाहिये।' इस श्रुतिके अनुसार विशेषतः पराधीन हुए इस पशुको ले जाकर इसके पिता माता आदिसे अनुमति लो (अन्यथा तुझे हिंसाका दोष अवश्य प्राप्त होगा) ॥ १२ ॥ एवमेवानुमन्येरंस्तान् भवान् द्रष्टुमर्हति । तेषामनुमतं श्रुत्वा शक्या कर्तुं विचारणा ॥ १३ ॥ पहले तुम्हें इस पशुके उन सम्बन्धियोंसे मिलना चाहिये। यदि वे भी ऐसा ही करनेकी अनुमति दे दें, तब उनका अनुमोदन सुनकर तदनुसार विचार कर सकते हो ॥ १३ ॥ प्राणा अप्यस्य छागस्य प्रापितास्ते स्वयोनिषु । शरीरं केवलं शिष्टं निश्चेष्टमिति मे मतिः ॥ १४ ॥ तुमने इस छागकी इन्द्रियोंको उनके कारणोंमें विलीन कर दिया है। मेरे विचारसे अब तो केवल इसका निश्चेष्ट शरीर ही अवशिष्ट रह गया है ॥ १४ ॥ इन्धनस्य तु तुल्येन शरीरेण विचेतसा । हिंसांनिर्वेष्टुकामानामिन्धनं पशुसंज्ञितम् ॥ १५ ॥ यह चेतनाशून्य जड शरीर ईंधनके ही समान है, उससे हिंसाके प्रायश्चित्तकी इच्छासे यज्ञ करनेवालोंके लिये ईंधन ही पशु है (अतः जो काम ईंधनसे होता है, उसके लिये पशु- हिंसा क्यों की जाय?) ॥ १५ ॥ अहिंसा सर्वधर्माणामिति वृद्धानुशासनम् । यदिहिंस्रं भवेत् कर्म तत् कार्यमिति विद्महे ॥ १६ ॥ वृद्ध पुरुषोंका यह उपदेश है कि अहिंसा सब धर्मोंमें श्रेष्ठ है, जो कार्य हिंसासे रहित हो वही करने योग्य है, यही हमारा मत है ॥ १६ ॥ अहिंसेति प्रतिज्ञेयं यदि वक्ष्याम्यतः परम् । शक्यं बहुविधं कर्तुं भवता कार्यदूषणम् ॥ १७ ॥ इसके बाद भी यदि मैं कुछ कहूँ तो यही कह सकता हूँ कि सबको यह प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिये कि 'मैं अहिंसा-धर्मका पालन करूँगा।' अन्यथा आपके द्वारा नाना प्रकारके कार्य-दोष सम्पादित हो सकते हैं ॥ १७ ॥

अहिंसा सर्वभूतानां नित्यमस्मासु रोचते । प्रत्यक्षतः साधयामो न परोक्षमुपास्महे ॥ १८ ॥ किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना ही हमें सदा अच्छा लगता है। हम प्रत्यक्ष फलके साधक हैं, परोक्षकी उपासना नहीं करते हैं ॥ १८ ॥ अध्वर्युरुवाच भूमेर्गन्धगुणान् भुङ्क्षे पिबस्यापोमयान् रसान् । ज्योतिषां पश्यसे रूपं स्पृशस्यनिलजान् गुणान् ॥ १९ ॥ शृणोष्याकाशजान् शब्दान् मनसा मन्यसे मतिम् । सर्वाण्येतानि भूतानि प्राणा इति च मन्यसे ॥ २० ॥ अध्वर्युने कहा—यते! यह तो तुम मानते ही हो कि सभी भूतोंमें प्राण है, तो भी तुम पृथ्वीके गन्ध गुणोंका उपभोग करते हो, जलमय रसोंको पीते हो, तेजके गुण? रूपका दर्शन करते हो और वायुके गुण स्पर्शको छूते हो, आकाशजनित शब्दोंको सुनते हो और मनसे मतिका मनन करते हो ॥ १९-२० ॥ प्राणादाने निवृत्तोऽसि हिंसायां वर्तते भवान् । नास्ति चेष्टा विना हिंसां किं वा त्वं मन्यसे द्विज ॥ २१ ॥ एक ओर तो तुम किसी प्राणीके प्राण लेनेके कार्यसे निवृत्त हो और दूसरी ओर हिंसामें लगे हुए हो। द्विजवर! कोई भी चेष्टा हिंसाके बिना नहीं होती। फिर तुम कैसे समझते हो कि तुम्हारे द्वारा अहिंसाका ही पालन हो रहा है? ॥ २१ ॥ यतिरुवाच अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावोऽयमात्मनः । अक्षरं तत्र सद्भावः स्वभावः क्षर उच्यते ॥ २२ ॥ यतिने कहा—आत्माके दो रूप हैं—एक अक्षर और दूसरा क्षर। जिसकी सत्ता तीनों कालोंमें कभी नहीं मिटती वह सत्स्वरूप अक्षर (अविनाशी) कहा गया है तथा जिसका सर्वथा और सभी कालोंमें अभाव है, वह क्षर कहलाता है ॥ २२ ॥ प्राणो जिह्वा मनः सत्त्वं सद्भावो रजसा सह । भावैरेतैर्विमुक्तस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ॥ २३ ॥ समस्य सर्वभूतेषु निर्ममस्य जितात्मनः । समन्तात् परिमुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २४ ॥ प्राण, जिह्वा, मन और रजोगुणसहित सत्त्वगुण—ये रज अर्थात् मायासहित सद्भाव हैं। इन भावोंसे मुक्त निर्द्वन्द्व, निष्काम, समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेवाले, ममतारहित, जितात्मा तथा सब ओरसे बन्धनशून्य पुरुषको कभी और कहीं भी भय नहीं होता ॥ २३-२४ ॥