आश्वलायन गृह्यसूत्र (अनाविला टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Ashvalayana Grihyasutra Hindi
महर्षि आश्वलायन (टीकाकार: हरदत्त आचार्य) द्वारा
स्रोत: Asvalayana Grihya Sutram with Anavila Commentary by Haradatta (उद्गम)
सूत्रसूची।
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| अंसावाभिमृशति | ६१ | अथाग्निमुपसमा | ५८ |
| अकुष्ठिपृषत् | २०८ | अथाग्निमुपसमा | १९३ |
| अक्षतधानाः कृत्वा | १०२ | अथाग्नौ जुहो | २०४ |
| अक्षतसक्तूनां नवं | ,, | अथाग्नौ हुतशे | २०५ |
| अगदः सोमेन | १७२ | अथाचमनीयैना | १०० |
| अगमनीयां गत्वा | १५४ | अथातः पञ्चयज्ञाः | १३८ |
| अग्न आयूंषि पवस | १७ | अथातः पार्वण | १९६ |
| अग्नये स्वाहेति | ३५ | अथातोऽध्यायोपा | १४७ |
| अग्निं परिसमूह्य | ७९ | अथातो वास्तुपरी | १२६ |
| अग्निना वा कक्ष | ११४ | अथानवेक्षं प्रत्या | १९१ |
| अग्निमुखा वै देवा | २०५ | अथापराजितायां | १६८ |
| अग्निरिन्द्रः प्रजापति | १४ | अथापराजितायां दि | १९५ |
| अग्निर्मे होता स | ९० | अथापि विज्ञाय | १४६ |
| अग्निवेलायाम् | १९२ | अथाप्यृच उदा | ३ |
| अङ्गुष्ठोपकनिष्ठि | १८० | अथावदानानां | ११६ |
| अत ऊर्ध्वं पतित | ७३ | अथास्मिन्नन्न आसे | १३४ |
| अत ऊर्ध्वमक्षारलव | ८५ | अथास्यै मण्डला | ५६ |
| अत ऊर्ध्वमक्षारालव | ३२ | अथास्यै युग्मेन | ५८ |
| अतो वृद्धो जपति | १६५ | अथास्यै शिखे वि | २७ |
| अथ काम्यानां स्था | १५२ | अथैतानि पात्रा | १७५ |
| अथ खलु यत्र | १० | अथैतां दिशम | १७५ |
| अथ खलूच्चावचा | २२ | अथैतान्युपक | १५७ |
| अथ दधिसक्तून् | १४८ | अथैतैर्वास्तुं परी | १२९ |
| अथ पशुकल्पः | ४४ | अथैनं सारयमा | १६९ |
| अथ पार्वणः स्थाली | ३६ | अथैनच्छमयति | १३४ |
| अथ बलिहरण | ८ | अथैनमन्तर्वेदि | १७७ |
| अथर्षयः | १४४ | अथैनमन्वीक्षेत | १७० |
| अथ व्याधितस्या | १५३ | अथैनान् प्रोक्षति | ३७ |
| अथ शूलगवः | २०८ | अथैनामपराजितायां | २८ |
| अथ श्वोभूतेऽष्टका | ११३ | अथैनामुच्छ्रीयमाणा | १३३ |
| अथ सायंप्रातः | ६ | अथोदङ्ङावृत्य | २१३ |
| अथ स्वस्त्ययनं | ३३ | अथोपविशन्ति | १९५ |
| अथ स्वाध्यायम् | १४१ | अथोपेतपूर्वस्य | ८७ |
| अथ स्वाध्याय | १३९ | अधिके प्रशस्तम् | १३० |
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| अदितिः केशान् | ६८ | अभिमतेऽनुमते | २०६ |
| अधिज्यं कृत्वा स | १७८ | अभिवादनीयं | ६३ |
| अध्येष्यमाणो | १४८ | अभ्युदियाच्चेद् | १५५ |
| अनभ्यनुज्ञायां | २०४ | अमात्यानन्ततः | २१४ |
| अनार्तस्य नार्तो | १६१ | अमात्येभ्य इतरा | १०४ |
| अनाहिताग्नेरपि | १०८ | अमा पुत्रो वृषदुप | १८० |
| अनिन्दितस्यां दि | ८६ | अमुष्मै स्वाहेति | १४ |
| अनिरुक्तं परिदा | ८८ | अमोहमस्मि सा | २४ |
| अनिष्ट्वा वा | १७३ | अयं तुभ्यमिति | ५२ |
| अनुप्रवचनीयमिति | ८३ | अयुग्मानितरेषु | १२२ |
| अनुस्तरणीं गा | १७५ | अयुजानि स्त्रीणाम् | ६३ |
| अनुस्तरणया वपा | १६१ | अयुजोऽमिथुनाः | १८८ |
| अनूषरमाविवादिष्णु | १२७ | अयुजो वा | १२२ |
| अन्तर्मृत्युं दध | १९३ | अरङ्गरो वावदीतीति | १३४ |
| अन्नपतेऽन्नस्य नो | ६५ | अर्यमणं नु देवं | २६ |
| अन्नं ब्राह्मणेभ्यः | ३३ | अलक्षणायां स्त्रियम् | १८८ |
| अन्यद्वा कौटुम्बम् | १२५ | अलङ्कृतं कुमारं कु | ७५ |
| अन्वञ्चं प्रेतमयु | १७५ | अलङ्कृत्य कन्यामु | २० |
| अन्वञ्चोऽमात्या | १७६ | अलाभेऽपः | १०० |
| अपरासु स्त्रीभ्यः | १२१ | अवदानैर्वा सह | ५० |
| अपरिणीय शूर्पं | २६ | अवप्लुतः स्यादा | १०३ |
| अपरेणाग्निं प्राक् | १४९ | अवसृष्टाः पराप | १७० |
| अपरेद्युरन्वष्टक्यम् | ११८ | अवहतांस्त्रिः फली | ३८ |
| अपामञ्जली पू | ७७ | अविच्छिन्नया चो | १३२ |
| अपामार्गः शाक | १२८ | अविदासिनी ह्रदात् | २० |
| अप्यनडुहो यवस | ११४ | अध्याधितं चेत् स्व | १५२ |
| अप्रच्छिन्नाग्रावनन्त | १२ | अश्मनस्तेजोऽसि | १६० |
| अप्रत्तासु च स्त्रीषु | १८६ | अश्नन्वतीरीयते संरभध्वमित्यर्थे | ३० |
| अप्रत्याख्यायिन | ८३ | अश्नन्वतीरीयते संरभध्वमित्यश्मा | १९५ |
| अप्रत्याख्यायिनी | ,, | अष्टमीमिपून् | १६९ |
| अभयं नः प्रजाप | ११० | अष्टमे वर्षे ब्राह्मण | ७२ |
| अभित आकाशम् | १७३ | अष्टौ पिण्डान् कृत्वा | १९ |
| अभिप्रवर्तमानकेषु | १२४ | अष्टावरानष्ट परान् | २१ |
| अभिप्रवर्तमाने | १६९ | अस्तमितेऽपां पू | १३० |
३
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| अस्तमिते ब्रह्मौदन | ८४ | आ षोडशाद् ब्राह्म | ७३ |
| अस्तमिते स्थाली | १०३ | आसंचनवन्ति पृष | १८० |
| अस्माकमुत्तमं कृ | १२६ | आहवनीयश्चेत् पू | १८३ |
| अहं वर्ष्म सजातानां | ९७ | आहिताग्निश्चेद्वु | १७२ |
| अहिरिव भोगैः | १६९ | इतरेषु | १८७ |
| अहीनस्य | ९३ | इत्यनुपेतपूर्वस्य | ८७ |
| आक्रम्य वा पादौ | ९७ | इदं वत्स्यावो भो | १६४ |
| आगावीयमेके | १३६ | इध्मचितिं चिनो | १७७ |
| आग्नेयीमेके | ११४ | इध्मबर्हिषोश्च | ३६ |
| आचान्तेष्वेके | २०६ | इमं तस्मै बलिं | ५२ |
| आचान्तोदकाय | १०० | इममग्ने चमसं | १८२ |
| आचार्यः समन्वार | ८४ | इमं जीवेभ्यः | १९३ |
| आचार्यान् पितॄंश्च | १५२ | इममश्मानमारोहा | २५ |
| आचार्यश्वशुरपितृ | ९६ | इमे जीवा विष्ट | १८४ |
| आजमन्नाद्यका | ६४ | इमा नारीरविध | १९४ |
| आज्यभागौ हुत्वाज्या | १४७ | इरिणादधन्या | २० |
| आज्यशेषेण वानक्ति | ३२ | इष्ट्वान्यमुत्सृजे | २१५ |
| आत्मनि मन्त्रान् सं | १६० | इह प्रियं प्रजायां | ३१ |
| आत्वाहार्षमन्तरे | १६८ | उक्तं गृहप्रपदनम् | १३१ |
| आदित्यमीक्षयेद् | ७८ | उक्तं वृषले | १७८ |
| आदित्यो मेऽध्वर्यु | ९१ | उक्तानि वैतानिकानि | १ |
| आनडुहं गोमयं | ६६ | उत्तरतः पत्नीं | १७७ |
| आपूर्यमाणपक्षे | ५८ | उत्तरतोऽग्नेर्दभै | २१३ |
| आप्लुत्य वाग्यतः | ७१ | उत्तरतोऽग्नेर्ब्रीहि | ६६ |
| आयतचतुरश्रं वा | १३१ | उत्तरतोऽग्नेः शामि | ४४ |
| आयतीर्यासामू | १३६ | उत्तरपुरस्तात् | ४१ |
| आयुष्यमिति सू | १६२ | उत्तरपुरस्तादा | १८४ |
| आर्द्रया | २०८ | उत्तरमाग्नेयं दक्षिणं | ४० |
| आद्र्रामन्नाद्यका | १५९ | उत्तरया धनुः | १६८ |
| आवृत्तैव कुमार्यै | ६४, १५, ७० | उत्तरया पांसूनव | १८९ |
| आवृत्तैव पर्यग्निकृत्वो | ४६ | उत्तरां वाचयेत् | १६८ |
| आवृत्तैव हृदय | ५० | उत्तरामुत्तरया | २८ |
| आशंसन्त एनं | १७२ | उत्तरार्धात् सौवि | ४२ |
| आश्वयुज्यामाश्व | १०६ | उत्तरेणोत्क्रमयेत् | ३० |
४
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| उदगयन आपूर्यमाण | १५ | एताश्चैव देवता | १५२ |
| उदरं वैश्यः | १६१ | एतेन गोदानं | ७० |
| उदरे पात्रीं समव | १८० | एतेनं माध्यावर्षं | १२१ |
| उदिते सौर्याणि | १९६ | एतेन वापनादि | ८७ |
| उद्धृत्य घृताक्त | २०४ | एतेनाग्ने ब्रह्मणा | ९५ |
| उपनिपदि गर्भ | ५४ | एवं त्रीन् प्रस्तृ | ५६ |
| उपरतेषु शब्देषु | १९२ | एवं प्रातः प्राङ्मुख | १५६ |
| उपरि समिधं कृत्वा | १५९ | एवं विद्व यजमा | २१४ |
| उपश्वास्य पृथि | १७० | एवमतिसृष्टस्य | १६५ |
| उपस्थं स्त्री | १६१ | एवमनाहिताग्नि | ९५ |
| उपस्थे शम्याम् अर | १८० | एवमितरे यथादे | ९२ |
| उभय।मुभयकामः | १५९ | एवमुत्तरतस्त्रिः | ६९ |
| उभयोः सन्निधाय | २९ | एपोऽवदानधर्मः | २५ |
| उरसि ध्रुवां शि | १७९ | एपोऽवभृथः पा | ४३ |
| ऊरू सरणर्जावि | १६१ | एषा मेऽष्टकेति | ११४ |
| ऊर्णास्तुके केश | २८ | ओंपूर्वा व्याहृतयः | १४१ |
| ऋचो यजूंषि सा | १४१ | ओंपूर्वा व्याहृतयः | १४९ |
| ऋतुदेवतामे | ११५ | ओदनं कृसरं | ११३ |
| ऋत्विजे वितते कर्म | २१ | ओप्योप्य हैके | २७ |
| ऋत्विजो वृणीते | ८९ | ओषधिवनस्पति | १२७ |
| ऋत्विजो वृत्वा मधु | ९५ | ओषधीनां प्रादु | १४७ |
| ऋषभं मा समाना | १२६ | कण्टकिक्षीरिण | १२७ |
| ऋषिभ्यस्तृतीयम् | ८५ | कण्टकिक्षीरिणस्त्विव | १७४ |
| एकक्षीरकेण | १६० | कपोतश्चेद्गा | १५६ |
| एकबर्हिरिध्मराज्य | १५ | कर्णयोः प्राशित्र | १८० |
| एकस्यां वा | ११२ | कर्णयोरुपनिधाय | ६१ |
| एकादश पशोरव | ४९ | कर्तारं यजमानः | ४७ |
| एकादशे क्षत्रियम् | ७२ | कर्ता नृपले जपेत् | १७८ |
| एकैकस्यावदानस्य | ५० | कर्तृष्ववकाः शीफाल | १३२ |
| एतत् तन्त्रम् | ४३ | कर्तृष्वेके द्वयोः | १२० |
| एतदुत्सर्जंनम् | १५२ | कलशात् सक्तूनां | १०४ |
| एतान्यान्यपि | १२५ | कल्मापमित्येके | २०८ |
| एतस्मिन्नेवाग्नौ | ४८ | कल्याणेपु देशवृक्ष | ३० |
| एतस्मिन् काले ग | २०४ | कल्याणैः सह सम्प्र | ९४ |
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५
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| कस्य ब्रह्मचार्यसि | ७८ | चतुर्थं संहाय सौ | १११ |
| कामं कृष्णमारो | २०९ | चतुर्थे गर्भमासे | ५७ |
| कामं तु व्रीहियव | ३५ | चतुर्भिः सूक्तैश्चत | २१२ |
| काम्या इतराः | ३७ | चतुष्पथाद् विप्र | २० |
| कालश्च | ८८ | चन्द्रमा मे ब्रह्मा | ९१ |
| किं पिबसि किं पिब | ५५ | चन्द्रमास्ते ब्रह्मा | ९२ |
| कुमारं जातं पुरा | ६० | चरवः | १५२ |
| कुलमग्रे परीक्षेत | १८ | चरितव्रतः सूर्याविदे | ३२ |
| कृताकृतं केशवं | ८८ | चरितव्रताय मेधा | ८६ |
| कृताकृतमाज्य | १३ | चैत्ययज्ञे प्राक् | ५१ |
| केशशब्दे तु इम | ७० | छित्त्वा वैकम् | १८० |
| केशश्मश्रुलोम | ७१ | जपित्वामिष्टे होता | ९१ |
| केशश्मश्रुलोम | १७४ | जानुमात्रं कर्तं खा | १२९ |
| क्षीरोदकेन शमी | १८८ | जायोपेयेत्येके | १५० |
| क्षुत्वा जृम्भित्वा | १५४ | जीमूतस्येव भव | १६८ |
| क्षुरतेजो निमृजेद् | ६९ | जीवं रुदन्तीति | ३० |
| क्षेत्रं प्रकर्षयेदुत्त | १३५ | ज्ञातौ चासपिण्डे | १८७ |
| क्षेत्रस्यानुवातं | १३५ | ज्यायान् ज्यायान् वान | ११० |
| क्षेत्राच्चेदुभयतः स | १९ | तं चतुष्पथे न्युप्य | ११० |
| गणानासामुपति- | १३६ | तं वह्यमानमनु | १८४ |
| गर्भाष्टमे वा | ७२ | तं दीपयमाना | १९२ |
| गाः प्रतिष्ठमाना | १३६ | तं पन्नदतं वृषी | २०९ |
| गार्हपत्यश्चेत् पूर्वे | १८३ | तच्छमीशाखयो | १३१ |
| गुरवे प्रसक्ष्यमा | १६४ | तत् सर्वसमृद्धम् | १२८ |
| गुरुणाभिमृष्टा अ | १९० | तत्स॑वितुर्वृ॑णीमह | ८८ |
| गुरौ चासपिण्डे | १८६ | तत् सहस्रसीतं | १३१ |
| गोमिथुनं दक्षिणा | ७१ | तथाज्यभागौ | १३ |
| गोमिथुनं दत्त्वोपय | २१ | तथोत्तमे आहुती | २७ |
| गोष्ठात् पशुमती | १९ | तथोत्सर्गे | १५० |
| ग्रहणान्तं वा | ८२ | तदाचार्याय वेद | ८४ |
| ग्रामकामा अन्नय | १७२ | तदेपाभियज्ञ | ९५ |
| घृतौदनं तेजस्कामः | ६५ | तद्वरन्ते सर्पीः | २१३ |
| घोषवदाद्यन्तर | ६२ | तद्यदग्नौ जुहोति | १३८ |
| चतसृषु चतसृषु | २११ | तद्दो दिवो दुहि | १२६ |
६
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| तन्मावतु तन्मा वि | ९२ | दक्षिणमग्ने ब्राह्म | ९७ |
| तस्मिन् बर्हिरास्ती | १७७ | दक्षिणाप्रवणे | ११८ |
| तस्य दर्शपूर्ण | ३६ | दक्षिणाप्रवणे स | १२८ |
| तस्य पुरस्तादुल्मु | ४७ | दक्षिणे केशपक्षे | ६८ |
| तस्य वाससा पाणि | ८१ | दक्षिणे पार्श्वे स्फ्यं | १७९ |
| तस्यां जातो द्वादशाव | २१ | दक्षिणे हस्ते जुहूम् | " |
| तस्यामग्निहोत्रेण | ३४ | दधनि मध्वानीय | ९६ |
| तस्याध्यक्षंसौ पाणी | ७८ | दध्यन्यत्र सर्पिरा | १७४ |
| तस्यै तस्यै देवतायै | ३७ | दधिमधुघृतमि | ६५ |
| तस्यैतानि व्रता | १६३ | दशावरान् दश परान् | २१ |
| तस्यैव मांसस्य प्र | ११८ | दानाध्ययने वर्ज | १८६ |
| तां हैके वैश्वदेवीं | ११४ | दुर्ज्ञेयानि लक्षणानि | १९ |
| ताः प्रतिग्राहयि | २०२ | दृश्यमाने प्रविशे | १८५ |
| तानेतान् यज्ञान | १३८ | देवताश्रोपांशुया | ३६ |
| तानेव कामाना | १५३ | देवतास्तर्पयति | १४३ |
| तामुत्थापयेद् | १७८ | देवानां प्रतिष्ठे स्थः | १६१ |
| तासां गृहीत्वा नव | ६७ | देवनात् कितवी | २० |
| तासां पाययित्वा | ४६ | देवयज्ञो ब्रह्मयज्ञो | १३८ |
| तुषान् फलीकरणं | २१२ | देवस्य त्वा सवितुः | ९८ |
| तूष्णीमाघारावाघा | ४० | द्वादशरात्रं वा | १८६ |
| तूष्णीं वै प्रजाप | ७९ | द्वादशवर्षाणि वे | ८२ |
| तृतीये वर्षे चौलम् | ६६ | द्वादशे वैश्यम् | ७२ |
| तृप्तान् ज्ञात्वा मधु | २०६ | द्व्यक्षरं प्रतिष्ठाका | ६२ |
| तेजसा ह्येवात्मानं | ८० | धनुश्च क्षत्रियाय | १७८ |
| तेषां दण्डाः पालाशो | ७६ | धनुर्हस्तादाददानो | " |
| तेषां पुरस्ताच्चतस्र | १६ | धनेनोपतोप्यो | २२ |
| तेषां मेखला मौञ्जी | ७६ | धन्वन्तरियज्ञे | ५३ |
| तैत्तिरं ब्रह्मवर्चस | ६४ | ध्रुवमरुन्धतीं | २९ |
| त्रयः पाकयज्ञाः | २ | ध्रुवान्ते परिददा | १०५ |
| त्रिरात्रमक्षारालव | १८६ | ध्रुवासुं ते ध्रुवासुं | " |
| त्रिर्जामदग्नानाम् | २५ | नक्षत्रदेवतामेके | ११५ |
| त्वमर्यमा भवसि | १८ | न तृप्तिं गच्छेत् | ९९ |
| दक्षिणपूर्वं उद्धता | १७७ | न त्वेवानष्टकः | ११४ |
| दक्षिणपूर्वाभ्या | १२४ | न नक्तं छायात् न | १६३ |
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| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| नमः शौनकाय | २१६ | पवित्रे अन्तर्धाय | ३७ |
| न मांसमश्नीयुर्न | ९४ | पशुकल्पेन पशुं | १९५ |
| न मालोक्ताम् | १६१ | पशूनामुपताए | २१५ |
| नमो ब्रह्मणे नमो | १४३ | पश्चाच्छामित्रस्य | ४७ |
| नवरथेन यश | १२५ | पश्चात्तारयिष्यमाणस्या | ६७ |
| नवान् मणिकान् कु | १९१ | पश्चात् कारयिष्यमाणो | ६६ |
| नवावरान् भोज | १२२ | पश्चादग्नेः स्वस्तरः | ११० |
| न सर्वम् | ९९ | पश्चादग्नेर्हृपद | २३ |
| न हार्पशुभर्वती | २१५ | पाणिग्रहणादि | ३३ |
| न हास्य दाहुकं | १३२ | पात्र्या पलाशेन | २११ |
| नात्र सौविष्टकृत् | १०९ | पादौ पूर्वं शिर | १८८ |
| नात्र हवींषि प्रत्य | ४२ | पिङ्गलोऽनड्वानव्रणः | १९५ |
| नापितं शिष्याच्छी | ६९ | पिण्डपितृयज्ञ | ११९ |
| नाम चास्मै दद्युः | ६२ | पिण्ड्यौ चैके | १८१ |
| नामांसो मधुपर्को | १०१ | पितृदेवतामेके | ११५ |
| नाभ्या चेन्नद्यन्तरा | ५३ | पितृभ्योऽयुक्षु प्र | १२१ |
| नासिकयोः स्रुवौ | १७९ | पीठचक्रेण गोयु | १७५ |
| नास्य प्राश्नीयुर्ना | २१४ | पीतं वैश्यस्य | १३१ |
| नित्यानुगृहीतः | ३४ | पुरस्तात् प्रत्य | ७७ |
| नियोगात् तु प्राक्षी | २१५ | पुरोदयादग्निं | १९० |
| निवेशनं पुनर्न | १०९ | पूर्वासु पितृभ्यो | १२० |
| निवेशनमलङ्कृ | १०७ | पूर्वेद्युः पितृभ्यो | ७७२ |
| नीचदक्षिणस्य | ९३ | पृषातकमञ्जालि | १०७ |
| नैके काञ्चन | १८ | प्रकीर्याङ्गमपर्वी | २०६ |
| नैतस्यां रात्र्यामन्नं | १८५ | प्रक्षालितपादोऽर्घ्यं | ९७ |
| नैनमन्तरा व्यवेयु | १०६ | प्रच्छिनत्ति येनाव | ६८ |
| नैनानुपनयेन्ना | ७३ | प्रच्छिद्य प्रच्छिद्य | ,, |
| नोद्धरेत् प्रथमं पा | २०३ | प्रजापतिर्ब्रह्मा | १४४ |
| न्यस्तमृत्विज्य | ९३ | प्रजावज्जीवपुत्राभ्यां | ५६ |
| न्यूने गर्हितम् | १३० | प्रतिदिशं त्वादेश | २१२ |
| पञ्चमीमुरसि | १८२ | प्रतिपुरुषं पितॄं | १४५ |
| पञ्चम्येषुधिं प्र | १६९ | प्रतिभयं चेदन्तरा | ५३ |
| परिणीय परिणीया | २४ | प्रत्तासु च स्त्रीष्व | १८७ |
| पलाशदूतेन | ५२ | प्रत्यक्षरं वा | ४१ |
| वित्राभ्यामाज्य | ११ | प्रत्यभिघार्य हवि | २५ |
८
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| प्रत्यभ्यनुज्ञा क्रिय | २०४ | ब्रह्मणमेव प्रथमं | ८९ |
| प्र त्वा मुञ्चामि वरु | २८ | ब्रह्मा वैतानि धार | ६७ |
| प्रदक्षिणं परीत्य | १०५ | ब्राह्मणान् भोज | ८५ |
| प्रदक्षिणमग्नि | २४ | ब्राह्मणान् भोज | ११७ |
| प्रदक्षिणमुपचा | १२३ | ब्राह्मणान् श्रुतशी | १९८ |
| प्रधारयन्तु मधु | १७० | ब्राह्मणायोदकुङ्कु | १०० |
| प्रयाण उपपद्यमाने | २९ | ब्राह्मण्यश्च वृद्धा | ६० |
| प्रवासादेत्य | ६३ | भिक्षां भवान् ददा | ८३ |
| प्रसङ्ख्याय हैके | १०६ | भित्त्वा वैकम् | १७९ |
| प्रसव्येनेतर | २०१ | भूतेभ्यस्त्वेति म | ९९ |
| प्रसृष्टास्वनुमन्त्र | २०२ | भोगं चर्मणा कु | २१३ |
| प्राग्वोदग्वा ग्रामा | १३९ | मधुपर्कमाह्रियमा | ९८ |
| प्राक्संस्थान्युदक्सं | ४१ | मध्यमस्थूणायाः | १३३ |
| प्राचीनावीती सु | १४५ | मध्यमाष्टकाया | १५१ |
| प्राजापत्यं तत् | १५१ | मध्यात् पूर्वार्द्धाच्च | ४१ |
| प्राजापत्यस्य स्थाली | ५७ | मध्यात् पूर्वार्द्धात् प | ४२ |
| प्राजापत्यामेके | ११५ | मध्येऽगारस्य स्थाली | १३४ |
| प्राणापानयोरुपं | १६४ | मध्ये हवींषि | ४१ |
| प्राणापानयोरुह | १६५ | मन्त्रविदो मन्त्रान् | ११० |
| प्रादुष्करणहोम | ३५ | मन्त्रेण हैके | ७९ |
| प्राप्यासदन्मइमा | १८५ | ममाग्ने वर्च इति | १६२ |
| प्राप्यैतं भूमिभा | १७६ | मयि दोहः पद्यायै | ९९ |
| प्रेष्यति युगपद् | १८३ | मयि मेधां मयि प्र | ८० |
| प्रोक्षणादि समा | २१० | महद्वै भूतं स्नातको | १६३ |
| बर्हिराज्यं चानु | २१६ | माता रुद्राणां दु | १०१ |
| बर्हिषि पूर्णपात्रं | ४३ | मातुः पिता दक्षि | ६७ |
| बहुलोपाधिकम् | १७४ | मानो अग्नेऽवसृ | १०३ |
| बह्वन्नं ह भवति | १२८ | मार्गशीर्ष्या प्रत्यव | १०८ |
| बाहू राजन्यः | १६१ | मालेति चेद् ब्रूयुः | १६१ |
| बीजवतो गृहान् | १३५ | मासि मासि चैवम् | १२१ |
| बुद्धिमते कन्यां | १८ | मिथः समयं | २० |
| बुद्धिरूपशील | ,, | मृत्स्नो वा | १७७ |
| ब्रह्मवर्चसकाम | १५९ | मेखलामाबध्य द | ८२ |
| ब्रह्मा च धन्वन्तरि | १४ | यज्ञपात्राणि च | १७५ |
९
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| यज्ञोपवीती नि | १५५ | युवतयः पृथक् पा | १९४ |
| यत्तु समानं तद् वक्ष्य। | २२ | युवान ऋत्विजो | ८९ |
| यत्र बाणाः संपतन्ति | १७१ | युवानस्तस्यां कि | १२९ |
| यत्र वेत्थ वनस्पत | ५२ | युवा सुवासाः परि | ७८ |
| यत्र सर्वत आपः | १७४ | येन धाता बृहस्प | ६८ |
| यत्र सर्वत्र आपः | १२९ | यो मे राजन्युज्यो | १५४ |
| यत्र सर्वत्रापो | १२८ | रथमारोक्ष्यन्नाना | १२३ |
| यत्रैनं पूजयिष्य | १६२ | रश्मीन् संगृह्णेद | १२४ |
| यत्रोदकमवहं | १८४ | राज्ञे च | ९६ |
| यथाकुलधर्मं के | ७० | रात्रिदेवतामेके | ११५ |
| यथाकुलधर्मं वा | ६६ | रात्स्यत्यसावमुत्रै | १८३ |
| यथान्यायमितरे | १५० | रुद्राय महादेवाय | २०९ |
| यथावकाशमितरे | ११० | रुद्राय स्वाहेति | २११ |
| यथाशक्ति वाच | ८१ | रुद्रास्त्वा त्रैष्टुभेन | ९८ |
| यदस्य कर्मणो | ४२ | लक्षणे कुम्भे पुमां | १८८ |
| यदि तूपशाम्येत् | ३४ | लोहितं क्षत्रियस्य | १३० |
| यदि नाधीयात् | ५४ | लौहायसं च कौ | १८० |
| यदि नाना श्रपयेद् | ३८ | वंशमाधीयमान | १३३ |
| यदि पाणिष्वाचा | २०५ | वंशान्तरेषु शरणा | १३२ |
| यदि वासांसि व | ७३ | वध्वोऽञ्जला उपस्तीर्य | २५ |
| यदृचोऽधीते पय आ | १४२ | वपाश्रपणीभ्यां | ४७ |
| यदृचोऽधीते पयसः | ,, | वयमद्येन्द्रस्य | १२६ |
| यद्यद्यात ऊर्ध्वं | ८५ | वयसु त्वा पथस्प | १५७ |
| यद्युभयोर्न विन्दे | १५९ | वयसाममनोज्ञां | १६६ |
| यद्यु वै विदेशस्थम् | ५१ | वामदेव्यमक्ष | १२४ |
| यद्यु वै समोप्य | ३८ | वार्षिकमित्येतदा | १५१ |
| यवैस्तिलार्थः | १२३ | वासे वासे सुमङ्गली | ३१ |
| यस्मिन् कुशवीर | १२७ | विगुल्फं बर्हिराज्यं | १७४ |
| यस्या दिशो बिभी | १६६ | विज्ञायते चक्षुषी वा | ४० |
| यां नदीमुपावसि | ५९ | विज्ञायते तस्य | १४६ |
| या देवेषु तन्वा | १३६ | विद्यान्ते गुरुमर्थै | १६३ |
| युगपत् प्रासौ परा | १८३ | विराजो दोहमशी | ९९ |
| युग्मानि त्वेव पुंसाम् | ६२ | विवाहाग्निमग्रतो | ३० |
| युग्मान् वृद्धिपूर्तें | १२२ | विवाहाग्निमुपसमा | ३१ |
१०
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| विष्टरः पाचमर्घ्य | ९६ | संशिष्याद्वा संशि | १७१ |
| विशेषान् वक्ष्यामः | २११ | संहाय अतो देवा | १११ |
| वीणागाथिनौ सं | ५९ | स एवं विद्वा दह्य | १८४ |
| वृक्कयावच्चार इ | १८१ | स एष शूलगवो | २१५ |
| वृक्कयावुद्धृत्य पाण्यो | ,, | स कर्मणामुप | ९० |
| वृषभो दक्षिणा | ६० | सङ्ग्रामे समुपोल्हे | १६८ |
| वेणुरासि वानस्प | १६१ | सङ्कर्त्तृभिः सङ् | १०७ |
| वेदपुरीषाद् ब्रह्म | २० | सञ्चयनमूर्ध्वं द् | १८७ |
| व्याधितस्यातुर | ९४ | सत्यं यशः श्रीर्म | १०० |
| व्रीहियमवतीभिरद्भिः पु | ४५ | सदस्यं सप्तदशं | ५० |
| व्रीहियमवतीभिरद्भिर | २०९ | सद्दुर्वासु चतसृषु | १३४ |
| शं नो भवन्तु वा | १०४ | सप्तम्याश्वान् | १४९ |
| शतर्चिनो माध्यं | १४४ | सप्तावरान् सप्त परान् | २१ |
| शान्तातीयं जपन् गृ | २१५ | समन्वारब्धे | ७७ |
| शान्तातीयं जपन् प | २१६ | समवस्त्रवे भक्त | १२८ |
| शरदि वसन्ते वा | २०८ | समाप्य ओं प्राक् | १६५ |
| शामित्र एष भव | ४७ | समिधं त्वाहरे | १५९ |
| शुन्धि शिरो मुखं | ७१ | समिधमेवापि | ४ |
| शृतानि हवींष्यभि | ३९ | समुच्चयमेके | १७ |
| श्मशानात् पतिघ्नी | २० | समे वर्तम् | १३० |
| श्मश्रूणीहोन्दति | ७१ | समोप्य वा | ३८ |
| श्रावणस्य पञ्च | १४७ | सम्पन्नं पृष्ट्वा यद्य | २०६ |
| श्रावण्यां पौर्णमास्यां | १०२ | स यावन्मन्येत | १४३ |
| श्रेष्ठं स्वस्य यूथ | २०८ | सर्पदेवजनेभ्यः स्वा | १०६ |
| श्वेतं मधुरास्त्रावं | १३० | सर्वे वा | १०० |
| षड्भिर्वोत्तरैः | २११ | सर्वतो भयादनाज्ञा | १६७ |
| षण्मासानधीयी | १५० | सर्वरुद्रयज्ञेषु | २१२ |
| षष्ठे मास्यन्नप्राशनम् | ६४ | सर्वो यथाङ्गं वि | १८१ |
| संपूषन्नध्वन इति | १५७ | सर्वाङ्गेभ्योऽवदाय | ४९ |
| संपूषन् विदुषेति | ,, | सर्वाणि ह वा अ | २१३ |
| संवत्सरमादिशेत् | ७२ | सर्वा दिशोऽनुपरी | १७० |
| संसदमुपयायात् | १२६ | सर्वान् वा येऽही | ८९ |
| संस्थिते भूमिभागं | १७३ | सर्वे वा तेषाम् | ७६ |
| संस्रवान् समवनी | २०३ | सर्वैर्मन्त्रैश्चतु | ६९ |
११
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| सविता ते हस्त | ७७ | सौर्यामेके | ११५ |
| स वृतो जपेद् मह | ९१ | सौविष्टकृतं चतु | ८५ |
| सव्यं जान्वाच्य दक्षि | १८२ | सौविष्टकृत्यष्ट | ११७ |
| सव्यं शूद्राय | ९७ | स्तुहि श्रुत गर्त | १६६ |
| सव्य उपभृतम् | १७९ | स्त्रीभ्यश्च | ११९ |
| सव्ये बाहौ बद्ध्वानु | १७६ | स्थालीपाकं सर्व | २१६ |
| स समिधमाधाय | ८० | स्थिरौ गावौ भव | १२५ |
| सह धर्मं चरतम् | २१ | स्नातकायोपस्थि | ९५ |
| सायम्प्रातः समिध | ८३ | स्वधा पितृभ्य | ९ |
| सायम्प्रातर्भिक्षे | ,, | स्वमप्रमनोज्ञं | १५३ |
| सार्वकालमेके | १६ | स्वयं चतुर्थीं जपे | १६९ |
| सावित्रीं च चतु | १४९ | हतो मे पाप्मा पा | १०१ |
| सावित्रीमन्वाह | १४१ | हत्वा भित्त्वा च शीर्षा | २२ |
| सावित्र्या द्वितीयम् | ८४ | हराय कृपाय श | २११ |
| सुत्रामाणं पृथ्वि | १२५ | हविरुच्छिष्टं दक्षि | ४४ |
| सुप्तानां प्रमत्तानां | २२ | हिरण्यमवधाय | १३४ |
| सुरामाक्षाममि | १२० | हुता अग्नौ | २ |
| सुसंहितं सन्निध | १८९ | हुत्वा मधुमन्थ | ११९ |
| सृष्टं दत्तमार्नु | २०५ | हृदये हृदयम् - | १८१ |
| सोदके प्रशस्तमा | १३० | हेमन्तशिशिरयोः | ११२ |
| सोमं राजानं | ५९ | होतारमेव प्रय | ९० |
| सोमप्रवाकं परि | ९४ | होम्यं च मांसवर्जम् | ३५ |
| सोमो नो राजाव | ५९ |
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|---|
भक्तिमञ्जरी (Stuti) by H. H. Svâti Srî Râma Varma Mahârâjah. — 1 0 0
स्यानानन्दूरपुरवर्णनप्रबन्धः (Kavya) Syânandûrapuravarnanaprabandha by H. H. Svâti Sri Râma Varma Mahârâjah, with the commentary Sundarī of Râjarâja Varma Koil Tampurân. — 2 0 0
Trivandrum Sanskrit Series.
| No. | Title & Description | RS. | AS. | P. |
|---|---|---|---|---|
| No. 1 | —दैवम् (Vyâkaraṇa) by Deva with Purushakâra of Krishnalîlâsukamuni. | 1 | 0 | 0 |
| No. 2 | —अभिनवकौस्तुभमाला-दक्षिणामूर्तिस्तवौ by Krishnalîlâsukamuni. | 0 | 2 | 0 |
| No. 3 | —नलाभ्युदयः (Kâvya) by Vâmana Bhatta Bâna (Second Edition). | 0 | 4 | 0 |
| No. 4 | —शिवलीलाणर्वः (Kâvya) by Nîlakantha Dîkshita. | 2 | 0 | 0 |
| No. 5 | —व्यक्तिविवेकः (Alankâra) by Mahima Bhatta with commentary | 2 | 12 | 0 |
| No. 6 | —दुर्घटवृत्तिः (Vyâkaraṇa) by Saranadeva. | 2 | 0 | 0 |
| No. 7 | —ब्रह्मतत्त्वप्रकाशिका (Vedânta) by Sadâsivendra Sarasvatî | 2 | 4 | 0 |
| No. 8 | —प्रद्युम्नाभ्युदयम् (Nâtaka) by Ravi Varma Bhûpa. | 1 | 0 | 0 |
| No. 9 | —विरूपाक्षपञ्चाशिका (Vedânta) by Virûpâkshanâtha with the commentary of Vidyâchakravartin. | 0 | 8 | 0 |
| No. 10 | —मातङ्गलीला (Gajalakshana) by Nîlakantha. | 0 | 8 | 0 |
| No. 11 | —तपतीसंवरणम् (Nâtaka) by Kulasekhara Varma with the commentary of Sivarâma | 2 | 4 | 0 |
| No. 12 | —परमार्थसारम् (Vedânta) by Bhagavad Âdisesha with the commentary of Râghavânanda. | 0 | 8 | 0 |
| No. 13 | —सुभद्राधनञ्जयम् (Nâtaka) by Kulasekhara Varma with the commentary of Sivarâma. | 2 | 0 | 0 |
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RS. AS. P.
No. 14—नीतिसार: (Nîti) by Kâmandaka, with the commentary of Sankarârya. 3 8 0
No. 15—स्वप्नवासवदत्तम् (Nâtaka) by Bhâsa. (Second Edition). 1 8 0
No. 16—प्रतिज्ञायौगन्धरायणम् (Nâtaka) by Bhâsa. 1 8 0
No. 17—पञ्चरात्रम् Do. Do. 1 0 0
No. 18—नारायणीयम् (Stuti) by Nârâyana Bhatta with the commentary of Desamangala Vârya. 4 0 0
No. 19—मानमेयोदय: (Mîmâmsâ) by Nârâyana Bhatta and Nârâyana Pandita. 1 4 0
No. 20—अविमारकम् (Nâtaka) by Bhâsa. 1 8 0
No. 21—बालचरितम् Do. Do. 1 0 0
No. 22—मध्यमव्यायोग-दूतवाक्य-दूतघटोत्कच-कर्णभारोरुभङ्गानि (Nâtaka) by Bhâsa. 1 8 0
No. 23—नानार्थार्णवसंक्षेप: (Kosa) by Kesavaswâmin (Part I. 1st & 2nd Kândas). 1 12 0
No. 24—जानकीपरिणय: (Kâvya) by Chakra kavi. 1 0 0
No. 25—काणादसिद्धान्तचन्द्रिका (Nyâya) by Gangâdharasûri. 0 12 0
No. 26—अभिषेकनाटकम् (Nâtaka) by Bhâsa. 0 12 0
No. 27—कुमारसम्भव: (Kâvya) by Kâlidâsa with the two commentaries, Prakâsikâ of Arunagirinâtha and Vivarana of Nârâyana Pandita (Part I. 1st & 2nd Sargas). 1 12 0
No. 28—वैखानसधर्मप्रश्न: (Dharmasûtra) by Vikhanas. 0 8 0
No. 29—नानार्थार्णवसंक्षेप: (Kosa) by Kesavaswâmin (Part II. 3rd Kânda). 2 4 0
No. 30—वास्तुविद्या (Silpa). 0 12 0
No. 31—नानार्थार्णवसंक्षेप: (Kosa) by Kesavaswâmin (Part III. 4th, 5th & 6th Kândas). 1 0 0
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$$\text{RS. AS. P.}$$
No. 32—कुमारसम्भवः (Kâvya) by Kâlidâsa with the two commentaries, Prakâsikâ of Arunagirinâtha and Vivarana of Nârâyana Pandita (Part II, 3rd, 4th & 5th Sargas) 2 8 0
No. 33—वाररुचसंग्रहः (Vyâkarana) with the commentary Dîpaprabhâ of Nârâyana. 0 8 0
No. 34—मणिदर्पणः (शब्दपरिच्छेदः) (Nyâya) by Râja chûdâmanimakhin. 1 4 0
No. 35—मणिसारः (अनुमानखण्डः) (Nyâya) by Gopînâtha. 1 8 0
No. 36—कुमारसम्भवः (Kâvya) by Kâlidâsa with the two commentaries, Prakâsikâ of Arunagirinâtha and Vivarana of Nârâyana Pandita (Part III. 6th, 7th & 8th Sargas). 3 0 0
No. 37—आशौचाष्टकम् (Smriti) by Vararuchi with commentary. 0 4 0
No. 38—नामलिङ्गानुशासनम् (Kosa) by Amarasimha with the commentary Tîkâsarvasva of Vandyaghatîya Sarvânanda (Part I. 1st Kânda). 2 0 0
No. 39—चारुदत्तम् (Nâtaka) by Bhâsa. 0 12 0
No. 40—अलङ्कारसूत्रम् (Alankâra) by Râjânaka Srî Ruyyaka with the Alankârasarvaswa of Srî Mankhuka and its commentary by Samudrabandha. 2 8 0
No. 41—अध्यात्मपटलम् (Kalpa) by Âpastamba with Vivarana of Srî Sankara Bhagavat Pâda. 0 4 0
No. 42—प्रतिमानाटकम् (Nâtaka) by Bhâsa. 1 8 0
No. 43—नामलिङ्गानुशासनम् (Kosa) by Amarasimha with the two commentaries, Amarakosodghâtana of Kshîraswamin and Tîkâsarvaswa of Vandyaghatîya Sarvânanda (Part II. 2nd Kânda 1—6 Vargas). 2 8 0
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No. 44—तन्त्रशुद्धम् (Tantra) by Bhattâraka Srî Vedottama. 0 4 0
No. 45—प्रपञ्चहृदयम् (Prapanchahridaya). 1 0 0
No. 46—परिभाषावृत्तिः (Vyâkarana) by Nîlakantha Dîkshita. 0 8 0
No. 47—सिद्धान्तसिद्धाञ्जनम् (Vedânta) by Srî Krishnânanda Sarasvatî. (Part I.) 1 12 0
No. 48— Do. Do. (Part II.) 2 0 0
No. 49—गोलदीपिका (Jyotisha) by Parameswara. 0 4 0
No. 50—रसार्णवसुधाकरः ( Alankâra ) by Singa Bhûpâla. 3 0 0
No. 51—नामलिङ्गानुशासनम् (Kosa) by Amarasimha with the two commentaries, Amarakosodghâtana of Kshîraswâmin and Tîkâsarvaswa of Vandyaghatîya Sarvânanda (Part III. 2nd Kânda 7—10 Vargas) 2 0 0
No. 52—नामलिङ्गानुशासनम् (Kosa) by Amarasimha with the commentary Tîkâsarvaswa of Vandyaghatîya Sarvânanda (Part IV. 3rd Kânda) 1 8 0
No. 53—शाब्दनिर्णयः (Vedânta) by Prakâsâtmayatîndra 0 12 0
No. 54—स्फोटसिद्धिन्यायविचारः (Vyâkarana) 0 4 0
No. 55—मत्तविलासप्रहसनम् (Nâtaka) by Srî Mahendravikramavarman. 0 8 0
No. 56—मनुष्यालयचन्द्रिका (Silpa). 0 8 0
No. 57—रघुवीरचरितम् (Kâvya). 1 4 0
No. 58—सिद्धान्तसिद्धाञ्जनम् (Vedânta) by Srî Krishnânanda Saraswatî (Part III.) 2 0 0
No. 59—नागानन्दम् (Nâtaka) by Srîharshadeva with the commentary Nâgânandavimarsinî of Sivarâma. 3 4 0
No. 60—लघुस्तुतिः (Stuti) by Srî Laghubhattâraka with the commentary of Srî Râghavânanda 0 8 0
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| RS. | AS. | P. | |
|---|---|---|---|
| No. 61—सिद्धान्तसिद्धाञ्जनम् (Vedânta) by Srî Krishnânanda Sarasvatî (Part IV.) | 1 | 8 | 0 |
| No. 62—सर्वमतसंग्रहः (Sarvamatasangraha). | 0 | 8 | 0 |
| No. 63—किरातार्जुनीयम् (Kâvya) by Bhâravi with the commentary Sabdârthadîpikâ of Chitrabhânu (1, 2 and 3 Sargas). | 2 | 8 | 0 |
| No. 64—मेघसन्देशः (Kâvya) by Kâlidâsa with the commentary Pradîpa of Dakshinâvartanâtha. | 1 | 0 | 0 |
| No. 65—मयमतम् (Silpa) by Mayamuni. | 3 | 8 | 0 |
| No. 66—महार्थमञ्जरी (Darsana) with the commentary Parimala of Maheswarânanda. | 2 | 8 | 0 |
| No. 67—तन्त्रसमुच्चयः (Tantra) by Nârâyana with the commentary Vimarsini of Sankara. (Part I. 1–6 Patalas) | 3 | 4 | 0 |
| No. 68—तत्त्वप्रकाशः (Agama) by Sri Bhojadeva with the commentary Tâtparyadîpikâ of Srî Kumâra. | 2 | 0 | 0 |
| No. 69—ईशानशिवगुरुदेवपद्धतिः (Tantra) by Isânasivagurudevamisra (Part I. Sâmânyapâda). | 1 | 8 | 0 |
| No. 70—आर्यमञ्जुश्रीमूलकल्पः (Part I). | 2 | 8 | 0 |
| No. 71—तन्त्रसमुच्चयः (Tantra) by Nârâyana with the commentary Vimarsini of Sankara (Part II. 7—12 Patalas). | 3 | 8 | 0 |
| No. 72—ईशानशिवगुरुदेवपद्धतिः (Tantra) by Isanasivagurudevamisra (Part II. Mantrapada) | 4 | 0 | 0 |
| No. 73—ईश्वरप्रतिपत्तिप्रकाशः (Vedanta) by Sri Madhusudanasarasvati | 0 | 4 | 0 |
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| RS. | AS. | P. | |
|---|---|---|---|
| No. 74— श्रीयाज्ञवल्क्यस्मृतिः (Dharmasâstra) with the commentary Bâlakrîdâ of Visvarûpâchârya. (Part I—Âchâra and Vyavahâra Adhyâyas) | 4 | 0 | 0 |
| No. 75—शिल्परत्नम् (Silpa) by Srîkumâra (Part I). | 3 | 4 | 0 |
| No. 76—आर्यमञ्जुश्रीमूलकल्पः (Part II). | 3 | 4 | 0 |
| No. 77—ईशानशिवगुरुदेवपद्धतिः by Isanasivagurudavamisra (Part III. Kriyapada 1—30 Patalas). | 3 | 4 | 0 |
| No. 78—आश्वलायनगृह्यसूत्रम् with the commentary Anavila of Haradattacharya. | 5 | 0 | 0 |
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- Manjusrimûlakalpa. (Part III.)
- Kâvyaprakâsa (Alankâra) with the commentary Sampradâyaprakâsinî of Srî Vidyâchakravartin and the Sâhityachûḍâmaṇi of Bhaṭṭagopâla.
- Îsânasivagurudevapaddhati (Tantra) by Îsânasivagurudevamisra. (Part IV. Kriyâpâda).
- Yâjñavalkyasmṛiti with the commentary Bâlakrîdâ of Visvarûpâchârya (Part II.) Prâyaschittâdhyâya.
- Nâtyaveda of Bharatamuni with the commentary Abhinavabhâratî of Abhinavaguptâchârya.
- Arthasâstra of Kautalya with commentary.
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- Âsvalâyanagṛihya with Devasvâmin's Bhâshya.
- Ashṭângahṛidaya (Vaidyaka) with the commentary Hṛidayabodika of Srîdâsa Paṇḍita.
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