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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

वस्त्र धारण करती है. (१) तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे. अनन्तमन्यद् रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति.. (२) मैं मित्र और वरुण की महिमा का गान करता हूं. वे सूर्य के रूप में स्वर्ग में अपने रूप का निर्माण करते हैं, जिस से उन का तेज प्रकाशित होता है. इन का दूसरा तेज काले रंग का है. उसे सूर्य की रश्मियां धारण करती हैं. (२) सूक्त-१२४ देवता—इंद्र कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा. कया शचिष्ठया वृता.. (१) सदा वृद्धि करने वाले ये सखा किस रक्षा साधन से हमारी रक्षा करेंगे? उन की रक्षात्मक वृत्ति किस प्रकार पूरी होगी? (१) कस्त्वो सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः. दृळ्हा चिदारुजे वसु.. (२) हे इंद्र! हर्ष उत्पन्न करने वाली हवियों में सोम रूप अन्न का कौन सा अंश श्रेष्ठ है, जिस के द्वारा प्रसन्न होते हुए तुम धन को अपने भक्तों में विकीर्ण कर देते हो. (२) अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्. शतं भवास्यूतिभिः.. (३) हे इंद्र! तुम हम स्तुतिकर्ताओं के सखा के समान हो. तुम हमारे सामने सैकड़ों बार प्रकट हुए हो. (३) इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवाः. यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह चीक्लृपाति.. (४) ऋत्विज् तथा सभी देवताओं के साथ इंद्र हमारे उस यज्ञ को पूर्ण करें. (४) आदित्यैरिन्द्रः सगणो मरुद्भिरस्माकं भूत्वविता तनूनाम्. हत्वाय देवा असुरान् यदायन् देवा देवत्वमभिरक्षमाणाः.. (५) देवत्व की रक्षा के लिए जिन देवों ने राक्षसों को नष्ट किया, वे इंद्र आदित्यों और मरुतों सहित हमारे शरीरों की रक्षा करें. (५) प्रत्यञ्चमर्कमनयंछचीभिरादित् स्वधामिषिरां पर्यपश्यन्. अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (६) वे देव अपने बल से सूर्य को सब के सामने उदय करते हैं. उन्होंने पृथ्वी को हवियों से

युक्त किया है. देवताओं के सेवक हम उन्हीं के द्वारा अन्न प्राप्त करें तथा वीरों से सुसंगत रहते हुए सौ वर्ष की आयु प्राप्त करें. (६) सूक्त-१२५ देवता—इंद्र अपेन्द्र प्राचो मघवन्नमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व. अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन् मदेम.. (१) हे धन के स्वामी इंद्र! तुम पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण—चारों दिशाओं से हमारे शत्रुओं को रोको. इस प्रकार हम तुम्हारे द्वारा दिए हुए सुख से सुखी हो सकेंगे. (१) कुविदङ्ग यवमन्तो यवं चिद् यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय. इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नमोवृक्तिं न जग्मुः.. (२) हे अग्नि! जिस प्रकार संपन्न कृषक जौ के बहुत से पौधों को मिला कर काटते हैं, उसी प्रकार तुम हवि से युक्त कुशों का सेवन करो. (२) नहि स्थूर्युतुथा यातमस्ति नोत श्रवो विविदे संगमेषु. गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजमन्तः.. (३) युद्धों में हमें अन्न प्राप्त नहीं हुआ. फसलें पकने के समय भी हमें आवश्यकता के अनुसार अन्न प्राप्त नहीं हुआ. इस कारण हम अपने मित्र इंद्र की कामना करते हुए अश्व, गौ तथा अन्न मांगते हैं. (३) युवं सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा. विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! नमुचि राक्षस के साथ इंद्र का युद्ध होते समय तुम ने आनंदित करने वाला सोमरस पी कर इंद्र की रक्षा की थी. (४) पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्दंसनाभिः. यत् सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्.. (५) हे इंद्र! तुम ने शोभा धारण करने वाला सोमरस पिया है. सरस्वती देवी अपनी विभूतियों से तुम्हें सींचे. (५) इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृडीको भवतु विश्ववेदाः. बाधतां द्वेषो अभयं नः कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (६) रक्षक एवं ऐश्वर्य वाले इंद्र अपने रक्षा साधनों से हमें सुख प्रदान करें. ये शक्तिशाली इंद्र eBook converter DEMO Watermarks*

हमारे शत्रुओं का वध कर के हमारा भय दूर करें. हम उत्तम और प्रभाव पूर्ण धन से संपन्न हों. (६) स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मदाराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु. तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.. (७) रक्षा करने वाले इंद्र हमारे शत्रुओं को दूर से ही भगा दें. यश के योग्य उन इंद्र की कृपामयी बुद्धि में रहते हुए हम सब उन की मंगलकारी भावना प्राप्त करें. (७) सूक्त-१२६ देवता—इंद्र वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत. यत्रामदद् वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१) वृषाकपि देव ने इंद्र को देवता के समान समझा. वे वृषाकपि पुष्टयों के पालनकर्ता तथा मेरे मित्र हैं. हे इंद्र! इस कारण मैं उत्तम हूं. (१) परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः. नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२) हे इंद्र! तुम वृषाकपि की अपेक्षा अधिक वेग वाले हो. तुम शत्रुओं को व्यथित करने में समर्थ हो. जहां सोमपान का साधन नहीं होता, वहां तुम नहीं जाते हो. इस प्रकार इंद्र सब से बढ़ कर हैं. (२) किमयं त्वा वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः. यस्मा इरस्यसीदु न्व १ र्यो वा पुष्टिमद् वसु विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (३) हे इंद्र! इन वृषाकपि ने तुम्हें हरे रंग का मृग क्यों बनाया है? तुम इन्हें पुष्टिकारक अन्न प्रदान करते हो. इस प्रकार इंद्र सब से बढ़ कर हैं. (३) यमिमं त्वं वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि. श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (४) हे इंद्र! तुम जिन वृषाकपि का पालन करते हो, क्या वाराह पर आक्रमण करने वाला कुत्ता उस के कान पर काट लेता है? इस प्रकार इंद्र सब से बढ़ कर हैं. (४) प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्य दूदुषत्. शिरो न्व स्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (५) वृषाकपि ने मेरे स्नेही जनों को दुर्बल बनाया है तथा व्यक्ता ने उन्हें दोषी किया है. बुरे ebook converter DEMO Watermarks*

कार्य में प्रकट होना सुगम नहीं होता. इसलिए मैं इस के शीश को शब्द वाला बनाता हूं. इस प्रकार इंद्र सब से उत्कृष्ट हैं. (५) न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशुतरा भुवत्. न मत् प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तर:.. (६) मेरी पत्नी से अधिक न कोई स्त्री सौभाग्य वाली है और न कोई अधिक सुखी तथा उत्तम संतान वाली है. कोई स्त्री उससे अधिक अपने पति को सुख देने वाली भी नहीं है. (६) उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्ग भविष्यति. भसन्मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वी व हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तर:.. (७) हे माता! मेरा शीश, कमर और टांगें पक्षी के समान फड़क रहे हैं. जैसा होना है, वैसा ही हो. इंद्र सब से उत्कृष्ट हैं. (७) किं सुबाहो स्वङ्गुरै पृथुष्टो पृथुजाघने. किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्य मीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तर:.. (८) हे शूर की पत्नी! तू सुंदर भुजाओं, सुंदर उंगलियों, पृथु नितंबों तथा मोटी जांघों वाली है. वृषाकपि के सामने तू हमारी हिंसा क्यों करती है? इंद्र सब से उत्कृष्ट हैं. (८) अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते. उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तर:.. (९) यह अनिष्टकारी पुरुष मुझे वीर रहित मान रहा है. मैं शूर की पत्नी हूं. मेरे पति मरुद्गण के मित्र हैं. इंद्र सब की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं. (९) संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति. वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तर:.. (१०) यज्ञ में नारी पुरुष के साथ सहयोगिनी के रूप में बैठती है. इस प्रकार वह यज्ञ की रचना करने वाली है. वह वीर पत्नी इंद्राणी की स्तुति के योग्य है, क्योंकि इंद्र श्रेष्ठ हैं. (१०) इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम्. नह्य स्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तर:.. (११) मैं इंद्राणी को अत्यधिक सौभाग्यशालिनी मानता हूं. इस का कारण इन के पति का अमर होना है. इंद्राणी के पति वृद्ध भी नहीं होते. अन्य नारियों के पति मरने वाले हैं. (११) नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते. यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तर:.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्राणी! मैं अपने मित्र वृषाकपि के अतिरिक्त अन्य किसी के पास नहीं जाता हूं. इन की हवि का संस्कार जल से किया जाता है. ये मुझे सभी देवों की अपेक्षा अधिक प्रिय हैं. ये इंद्र सभी देवों में उत्कृष्ट हैं. (१२) वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे. घसत् त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१३) हे वृषाकपि रूप सूर्य की पत्नी! तू सुपुत्रों वाली एवं धन से संपन्न है. तेरी जल रूपी हवि का इंद्र सेवन करें, क्योंकि वे सभी देवों में श्रेष्ठ हैं. (१३) उक्षणो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम्. उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१४) मुझ महान के पंद्रह सेवक बीस प्रकार की हवि का पाक करते हैं. मैं उन हवियों का सेवन करता हूं. इस प्रकार मेरी दोनों कोखें भरी हुई हैं. इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (१४) वृषभो न तिग्मशृङ्गो ऽ नर्त्यूथेषु रोरुवत्. मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१५) हे इंद्र! जिस प्रकार सींगों वाले बैल गायों में शब्द करते हैं, उसी प्रकार जिन के हृदय को तुम्हारा मंथन सुख देता है, वही सुख प्राप्त करता है, क्योंकि इंद्र सर्वोत्कृष्ट हैं. (१५) न सेशे यस्य रम्बते ऽ न्तरा सक्थ्या ३ कपृत्. सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१६) जंघाओं में आभूषण लटकाने वाला ऐश्वर्य प्राप्त नहीं करता. जिस बैठने की इच्छा वाले के रोम अंगड़ाई लेते हैं, वह सामर्थ्य वाला होता है. इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (१६) न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते. सेदीशे यस्य रम्बते ऽ न्तरा सक्थ्या ३ कपृद् विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१७) जिस का रोमों वाला मेढ़ा जमुहाई लेता है, वह असमर्थ होता है. जिस का पुरुष अंग जांघों में लटकता है वह सामर्थ्य वाला होता है. इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (१७) अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत्. असिं सूनां नवं चरुमाधेष्स्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१८) हे इंद्र! वृषाकपि ने अपने समीप नष्ट हुए शत्रु के धन को प्राप्त किया. इस के अतिरिक्त असि, सूना तथा नवीन चरु को ग्रहण किया. वे इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (१८) अयमेमि विचाकशद् विचिन्वन् दासमार्यम्. ebook converter DEMO Watermarks*

पिबामि पाकसुत्वनो ऽ भि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१९) मैं यज्ञ कर्म करने वाले को खोज रहा हूं तथा परिष्कृत सोमरस को पी रहा हूं. इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (१९) धन्व च यत् कृन्तत्रं च कति स्वित् ता वि योजना. नेदीयसो वृषाकपेस्तमेहि गृहाँ उप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२०) मरुस्थल और अंतरिक्ष का विस्तार कितना है? हे वृषाकपि तुम समीप के स्थान से हमारे घरों में आओ. इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (२०) पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै. य एष स्वप्नंशनो ऽ स्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२१) हे वृषाकपि! तुम उदित हो कर स्वप्न को नष्ट कर देते हो. इस के बाद तुम अस्त हो जाते हो. तुम पुनः आओ, जिस से हम सब के हित में यज्ञ कर्म की योजना बनाएं. इंद्र सब से श्रेष्ठ हैं. (२१) यदुदञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन. क्व १ स्य पुल्वघो मृगः कमगं जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२२) हे वृषाकपि! तुम उत्तर में निवास करते हो तथा सभी भुवनों का चक्कर लगाते हुए छिपते हो. उस समय सभी लोक अंधकार के कारण आश्चर्य में पड़ जाते हैं तथा कहते हैं कि सूर्य कहां गए? प्राणियों को मोहने वाले इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (२२) पर्शुर्ह नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम्. भद्रं भल त्यस्या अभूद् यस्या उदरमामयद् विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२३) मानवी नाम के पशु ने बीस को जन्म दिया. जिस के उदर में रोग था, उस के लिए कल्याणकारी हुआ. इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (२३) सूक्त-१२७ विशेष : यहां से अथर्ववेद के बीसवें कांड के दस सूक्तों को सायण आचार्य ने कुंताप सूक्त कहा है. इन के ऋषि, देवता एवं छंद का सायण ने कोई संकेत नहीं किया है. इदं जना उप श्रुत नराशंसं स्तविष्यते. षष्टिं सहस्रा नवतिं च कौरम आ रुशमेषु दद्महे.. (१) हे नराशस स्तोताओ सुनो! हम साठ हजार नब्बे (६०.०९०) रुशम नाम की मुद्रा प्रदान करते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

उष्ट्रा यस्य प्रवाहणो वधूमन्तो द्विर्दश. वर्ष्मा रथस्य नि जिहीडते दिव ईषमाणा उपस्पृशः.. (२) जिस वधू वाले रथ को बारह ऊंट खींचने वाले हैं, वह आकाश का स्पर्श करता हुआ चलता है. (२) एष इषाय मामहे शतं निष्कान् दश स्रजः. त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम्.. (३) अन्न प्राप्ति के निमित्त मैं निष्क नाम की सौ स्वर्ण मुद्राएं, तीन सौ घोड़े, दस हजार गाएं और दस मालाएं देता हूं. (३) वच्यस्व रेभ वच्यस्व वृक्षे न पक्वे शकुनः. नष्टे जिह्वा चर्चरीति क्षुरो न भुरिजोरिव.. (४) हे स्तुतिकर्ताओं! पके हुए फलों वाले वृक्ष पर बैठा हुआ पक्षी जिस प्रकार का मधुर शब्द करता है, तुम भी उसी प्रकार का शब्द करो. जिस प्रकार हाथ में पकड़ा हुआ छुरा नहीं रुकता, उसी प्रकार तुम्हारी जीभ भी न रुके अर्थात् तुम उच्चारण करते रहो. (४) प्र रेभासो मनीषा वृषा गाव इवेरते. अमोतपुत्रका एषाममोत गा इवासते.. (५) यह मनीषी स्तोता यहां शक्तिशाली वृषभों अर्थात् बैलों के समान वर्तमान है. इन के घर में पुत्र, गाएं आदि हैं. (५) प्र रेभ धीं भरस्व गोविदं वसुविदम्. देवत्रेमां वाचं शृणीहीषुर्नावीरस्तारम्.. (६) हे स्तोता! बाण जिस प्रकार मनुष्य की रक्षा करता है, उसी प्रकार वाणी तेरी रक्षा करे. तू गौ तथा धन प्राप्त कराने वाली बुद्धि को प्राप्त करे. (६) राज्ञो विश्वजनीनस्य यो देवो ऽ मर्त्याँ अति. वैश्वानरस्य सुष्टुतिमा सुनोता परिक्षितः.. (७) यदि देवता प्रजा के मनुष्यों का अतिक्रमण करे तो वैश्वानर की मंगलमयी स्तुति करनी चाहिए. (७) परिच्छिन्नः क्षेममकरोत् तम् आसनमाचरन्. कुलायन् कृण्वन् कौरव्यः पतिर्वदति जायया.. (८) मंगल करने वाला देवता आसन का विस्तार करता है. कौरव्य पति इस प्रकार की शिक्षा ebook converter DEMO Watermarks*

देता हुआ अपनी पत्नी से कहता है. (८) कतरत् त आ हराणि दधि मन्थां परि श्रुतम्. जायाः पतिं वि पृच्छति राष्ट्रे राज्ञः परिक्षितः.. (९) राजा परीक्षित के राज्य में पत्नी अपने पति से पूछती है कि मैं तेरे लिए थाली में परोसा हुआ कितना दही लाऊं. (९) अभीवस्वः प्र जिहीते यवः पक्वः पथो बिलम्. जनः स भद्रमेधति राष्ट्रे राज्ञः परिक्षितः.. (१०) राजा परीक्षित के राज्य में मनुष्य इस प्रकार सुखी हैं कि उन्हें अपने उदर रूपी बिल को भरने के लिए जौ प्राप्त हो जाता है. (१०) इन्द्रः कारमबूबुधदुत्तिष्ठ वि चरा जनम्. ममेदुग्रस्य चर्कृधि सर्व इत् ते पृणादरिः.. (११) स्तुति करने वालों से इंद्र ने कहा—उठ कर खड़ा हो जा और मनुष्यों में घूम. तू मेरी कृपा से कर्म करने वाला बने. तेरा शत्रु तेरे पास अपना सर्वस्व छोड़ दे. (११) इह गावः प्रजायध्वमिहाश्वा इह पूरुषाः. इहो सहस्रदक्षिणो ऽ पि पूषा नि षीदति.. (१२) यहां मनुष्य और घोड़े उत्पन्न हों तथा गाएं प्रसव करें. हजार संख्या वाली दक्षिणाओं के दाता पूषन यहां विराजमान हों. (१२) नेमा इन्द्र गावो रिषन् मो आसां गोप रीरिषत्. मासाममित्रयुर्जन इन्द्र मा स्तेन ईशत.. (१३) हे इंद्र! ये गाएं नष्ट न हों. इन का पालन करने वाला भी हिंसित न हो. इन पर शत्रु और चोर का कोई प्रभाव न पड़े. (१३) उप नो न रमसि सूक्तेन वचसा वयं भद्रेण वचसा वयम्. वनादधिध्वनो गिरो न रिष्येम कदा चन.. (१४) हे इंद्र! हम तुम्हें सूक्त के द्वारा प्रसन्न करते हैं. तुम हमारी वाणियां अंतरिक्ष में सुनो. हमारा कभी नाश न हो. (१४) सूक्त-१२८ यः सभेयो विदथ्यः सुत्वा यज्वाथ पूरुषः. ebook converter DEMO Watermarks*

सूर्य चामू रिशादसस्तद् देवाः प्रागकल्पयन्.. (१) अभिषव अर्थात् सोमरस निचोड़ने का काम करने वाला, यज्ञकर्ता एवं सभ्य पुरुष सूर्यलोक को भेद कर उस से ऊपर वाले लोक में जाता है. इस की कल्पना देवताओं ने पहले कर ली थी. (१) यो जाम्या अप्रथयस्तद् यत् सखायं दुधूर्षति. ज्येष्ठो यदप्रचेतास्तदाहुरधरागिति.. (२) जाम्य ने जिसे विस्तृत किया, वह मित्र को सुशोभित करता है. जो ज्येष्ठ प्रचेता है, उसे लोग अधराक् कहते हैं. (२) यद् भद्रस्य पुरुषस्य पुत्रो भवति दाधृषिः. तद् विप्रो अब्रवीदु तद् गन्धर्वः काम्यं वचः.. (३) जिस ब्राह्मण का पुत्र धारण करने वाला होता है. वह ब्राह्मण अभीष्ट वचन करने में समर्थ है. ऐसा गंधर्व कहते हैं. (३) यश्च पणि रघुरिजिष्ठ्यो यश्च देवां अदाशुरिः. धीराणां शश्वतामहं तदपागिति शुश्रुम.. (४) जो वणिक् देवताओं को हवि दान नहीं करता, वह शाश्वत वीरों का सेवक बनता है. ऐसा सुना जाता है. (४) ये च देवा अयजन्ताथो ये च पराददिः. सूर्यो दिवमिव गत्वाय मघवा नो वि रप्शते.. (५) जो स्तोता एवं परा गौ का दान करने वाले हैं, वे सूर्य के समान स्वर्ग में जाते हैं. (५) योनाक्ताक्षो अनभ्यक्तो अमणि वो अहिरण्यरः. अब्रह्मा ब्रह्मणः पुत्रस्तोता कल्पेषु संमिता.. (६) जो भक्त नहीं है, जो आक्त अदक्ष नहीं है, जो मणिवान नहीं, जो हिरपाप नहीं है तथा जो ब्राह्मण नहीं है; वह ब्रह्म पुत्र स्तोता कल्पों में मान्य है. (६) य आक्ताक्षः सुभ्यक्तः सुमणिः सुहिरण्यवः. सुब्रह्म ब्रह्मणः पुत्रस्तोता कल्पेषु संमिता.. (७) जो आक्त अक्ष हैं, जो सुभक्त हैं, जो सुंदर मणि वाले हैं; ऐसे ब्रह्म पुत्र स्तोता हैं, यह कल्पों अर्थात् कला ग्रंथों में माना गया है. (७) eBook converter DEMO Watermarks*

अप्रपाणा च वेशन्ता रेवां अप्रतिदिश्यः. अयभ्या कन्या कल्याणी तोता कल्पेषु संमिता.. (८) जो सरोवर जलपूर्ण नहीं हैं; जो धनी हैं, पर दानी नहीं हैं; जो कन्याएं गृहस्थ धर्म के योग्य नहीं हैं, ऐसा कल्प ग्रंथों के अनुसार है. (८) सुप्रपाणा च वेशन्ता रेवान्त्सुप्रतिदिश्यः. सुयभ्या कन्या कल्याणी तोता कल्पेषु संमिता.. (९) सरोवरों का पीने योग्य जल से भरा होना, धनी होने पर दानी होना तथा सुंदर कन्या होने पर गृहस्थ धर्म के योग्य होना—ऐसा कल्प ग्रंथों के अनुसार है. (९) परिवृक्ता च महिषी स्वस्त्या च युधिंगमः. अनाशुरश्वायामी तोता कल्पेषु संमिता.. (१०) हे इंद्र! तुम ने दाशराज युद्ध में मनुष्यों की खोज की थी. तुम सब के लिए रूपहीन बन गए थे. तुम उन के साथ यज्ञ के लिए कल्पित हुए. (१०) वावाता च महिषी स्वस्त्या च युधिंगमः. श्वाशुरश्वायामी तोता कल्पेषु संमिता.. (११) हे कामनाओं को पूरा करने वाले इंद्र! तुम सूर्य के रूप में अक्षु को झुकाते हो तथा रोहिणी को विस्तृत मुख वाला बना देते हो. तुम ने वृत्र असुर का सिर काटा था. (११) यदिन्द्रादो दाशराज्ञे मानुषं वि गाहथाः. विरूपः सर्वस्मा आसीत् सह यक्षाय कल्पते.. (१२) जिन्होंने पंख काट कर पर्वतों को स्थिर किया, जल का अवगाहन किया और वृत्र असुर का वध किया, उन इंद्र को नमस्कार है. (१२) त्वं वृषाक्षुं मघवन्नम्रं मर्याकरो रविः. त्वं रौहिणं व्या स्यो वि वृत्रस्याभिनच्छिः.. (१३) हरे रंग के घोड़ों पर बैठ कर तेज चाल से आते हुए इंद्र ने घोड़ों के विषय में उच्चैःश्रवा से कहा, “हे अश्व! तेरा कल्याण हो. तू माला से सुशोभित इंद्र को अपनी पीठ पर चढ़ाता है.” (१३) यः पर्वतान् व्यदधाद् यो अपो व्यगाहथाः. इन्द्रो यो वृत्रहान्महं तस्मादिन्द्र नमो ऽ स्तु ते.. (१४) हे इंद्र! श्वेत अश्व तुम्हारे रथ की दाईं ओर जुड़ते हैं. उन अश्वों पर सवारी करने वाले तुम ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१२९ देवता—

देवों के द्वारा नमस्कार के योग्य तथा महिमाशाली हो. (१४) सूक्त-१२९ देवता— एता अश्वा आ प्लवन्ते.. (१) यह घोड़ी अच्छी तरह उछलती है. (१) प्रतीपं प्राति सुत्वनम्.. (२) सुवा प्रतीप को संपन्न करता है. (२) तासामेका हरिक्निका.. (३) उन में एक हरिक्निका है. (३) हरिक्निके किमिच्छसि.. (४) हे हरिक्निका! तेरी क्या इच्छा है? (४) साधुं पुत्रं हिरण्ययम्.. (५) हे पुत्र! साधु को स्वर्ण दो. (५) क्वाहतं परास्यः.. (६) अवाहत अर्थात् घायल हुआ परास्य कहां है? (६) यत्रामूस्तिस्रः शिंशपाः.. (७) इस स्थान पर तीन शिंशिपा वृक्ष हैं. (७) परि त्रयः.. (८) सभी ओर तीन हैं. (८) पृदाकवः.. (९) बहुत से पृदाकू हैं. (९) शृङ्गं धमन्त आसते.. (१०) वे सींगों को नष्ट कर के बैठे हैं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

अयन्महा ते अर्वाहः.. (११) यह दिवस तुम्हारा महान अश्व है. (११) स इच्छकं सघाघते.. (१२) वह कामना करने वालों का समाधान कर्ता है. (१२) सघाघते गोमीद्या गोगतीरिति.. (१३) गोमीठ गायों की गति को एकत्र करता है. (१३) पुमां कुस्ते निमिच्छसि.. (१४) पुरुष और पृथ्वी तुझे प्रसन्न करते हैं. (१४) पल्प बद्ध वयो इति.. (१५) हे वृद्ध पल्प! यह तेरा अन्न है. (१५) बद्ध वो अघा इति.. (१६) बंधा होना पाप है. (१६) अजागार केविका.. (१७) सेविकाएं जागी नहीं हैं. (१७) अश्वस्य वारो गोशपद्यके.. (१८) अश्व के सवार हो कर गाय के खुर के गड्ढे में पड़े हैं. (१८) श्येनीपती सा.. (१९) यह श्येनीपति अर्थात् मादा बाज का स्वामी है. (१९) अनामयोपजिह्विका.. (२०) उप जिह्विका रोग रहित है. (२०) सूक्त-१३० को अर्य बहुलिमा इषूनि.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

बहुत से बाणों पर अधिकार करने वाला कौन है? (१) को असिद्याः पयः.. (२) रजोगुणी प्रकृति का पोषक कौन है? (२) को अर्जुन्याः पयः.. (३) अर्जुनी अर्थात् प्रकृति का पय अर्थात् दूध कौन सा है? (३) कः काष्ण्याः पयः.. (४) तमोगुणी प्रकृति का दूध क्या है. (४) एतं पृच्छ कुहं पृच्छ.. (५) यदि जानते नहीं हो तो पूछो. (५) कुहाकं पक्वंकं पृच्छ.. (६) कुशल एवं परिपक्व मनुष्य से पूछो. (६) यवानो यतिस्वभिः कुभिः.. (७) यत्नकर्ता समान पृथ्वियों से युक्त हुआ. (७) अकुप्यन्तः कुपायकुः.. (८) पृथ्वी का मर्म न जानने वाला क्रोधित हो गया. (८) आमणको मणत्सकः.. (९) आमणक मणत्सक है. (९) देव त्वप्रतिसूर्य.. (१०) हे सूर्य देव. (१०) एनश्विपङ्क्तिका हविः.. (११) यह पापनाशक हवि है. (११) प्रदुद्दुदो मघाप्रति.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

यह ऐश्वर्य के प्रति गति दे. (१२) शृङ्ग उत्पन्न.. (१३) सींग उत्पन्न हुआ. (१३) मा त्वाभि सखा नो विदन्.. (१४) मेरा मित्र मुझे और तुझे मिले. (१४) वशायाः पुत्रमा यन्ति.. (१५) वशा गौ के पुत्र को लाते हैं. (१५) इरावेदुमयं दत्त.. (१६) ज्ञानपूर्ण इरा उसे दो. (१६) अथो इयन्नियन्निति.. (१७) इस के पश्चात यह इस प्रकार का है. (१७) अथो इयन्निति.. (१८) फिर यह इस प्रकार है. (१८) अथो श्वा अस्थिरो भवन्.. (१९) इस के बाद श्वा अर्थात् कुत्ता अस्थिर हुआ. (१९) उयं यकांशलोकका.. (२०) कष्टकारी लोक वाला हो. (२०) सूक्त-१३१ आमिनोनिति भद्यते.. (१) यह परम तत्त्व कहा जाता है. (१) तस्य अनु निभञ्जनम्.. (२) उस के बाद विभाजन है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

वरुणो याति वस्वभिः.. (३) वरुण रात्रि के साथ जाते हैं. (३) शतं वा भारती शवः.. (४) वाणी के सौ बल हैं. (४) शतमाश्वा हिरण्ययाः. शतं रथ्या हिरण्ययाः. शतं कुथा हिरण्ययाः. शतं निष्का हिरण्ययाः.. (५) सुनहरे रंग के सौ घोड़े, सोने के बने सौ रथ, सोने के बने सौ गछे और सोने के सौ निष्क अर्थात् सिक्के या आभूषण हैं. (५) अहल कुश वर्त्तक.. (६) उत्तम कुश वर्तमान है. (६) शफेन इव ओहते.. (७) वह शफ अर्थात् खुर से वहन करता है. (७) आय वनेनती जनी.. (८) आप झुकने वाली माता की तरह आएं. (८) वनिष्ठा नाव गृह्यन्ति.. (९) जल में स्थित नाव ग्रहण की जाती है. (९) इदं मह्यं मद्दूरिति.. (१०) यह मुझे प्रसन्न करता है. (१०) ते वृक्षाः सह तिष्ठति.. (११) वे वृक्षों के साथ बैठते हैं. (११) पाक बलिः.. (१२) बलि पक गई है. (१२) शक बलिः.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*

बलि सशक्त है. (१३) अश्वत्थ खदिरो धवः.. (१४) पीपल, खैर, धव नाम के वृक्ष हैं. (१४) अरदुपरम.. (१५) विराम प्राप्त करो. (१५) शयो हत इव.. (१६) सोने वाला मृतक के समान होता है. (१६) व्याप पूरुषः.. (१७) पुरुष सर्वत्र व्याप्त है. (१७) अदूहमित्यां पूषकम्.. (१८) मैं पूषा का दोहन करता हूं. (१८) अत्यर्धर्चं परस्वतः.. (१९) अर्धर्च अर्थात् आधी ऋचा प्रवृत्त हो. (१९) द्वौ हस्तिनो दृती.. (२०) हाथियों के लिए दो मशकें बनाओ. (२०) सूक्त-१३२ देवता— आदलाबुकमेककम्.. (१) एक अलाबुक अर्थात् रामतोरई है. (१) अलाबुकं निखातकम्.. (२) रामतोरई खोदी गई है. (२) कर्करिको निखातकः.. (३) ककड़ी को खोदा गया. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

तद् वात उन्मथायति.. (४) वह वायु को उखाड़ता है. (४) कुलायं कृणवादिति.. (५) घौंसला बनाता है. (५) उग्रं वनिषदाततम्.. (६) विस्तृत उग्र की सेवा करता है. (६) न वनिषदनाततम्.. (७) जिस का विस्तार नहीं है, उस की सेवा नहीं करता. (७) क एषां कर्करी लिखत्.. (८) इन में से कौन कर्करी को लिखता है. (८) क एषां दुन्दुभिं हनत्.. (९) इन में दुदुंभि राक्षस को किस ने मारा. (९) यदीयं हनत् कथं हनत्.. (१०) यदि यह वध करती है तो किस प्रकार करती है. (१०) देवी हनत् कुहनत्.. (११) देवी ने वध किया, बुरी तरह वध किया. (११) पर्यागारं पुनः पुनः.. (१२) निवास स्थान के चारों ओर बारबार शब्द करती है. (१२) त्रीण्युष्ट्रस्य नामानि.. (१३) ऊंट के तीन नाम हैं. (१३) हिरण्यं इत्येके अब्रवीत्.. (१४) कुछ लोगों ने हिरण्य, ऐसा कहा. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१३३

द्वौ वा ये शिशवः.. (१५) दो बालक हैं. (१५) नीलशिखण्डवाहनः.. (१६) नीलशिखंड उन का वाहन है. (१६) सूक्त-१३३ विततौ किरणौ द्वौ तावा पिनष्टि पूरुषः. न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (१) हे कुमारी! तू उसे जैसा समझती है, वह वैसा नहीं है. दो किरणें फैली हुई हैं. पुरुष उन्हें पीसने वाला है. (१) मातुष्टे किरणौ द्वौ निवृत्तः पुरुषानृते. न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (२) हे पुरुष! तू जिस असत्य से मुक्त हुआ है, वह तेरी माता की दो किरणें हैं. हे कुमारी! उसे तू जैसा समझती है, वह उस तरह का नहीं है. (२) निगृह्य कर्णकौ द्वौ निरायच्छसि मध्यमे. न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (३) हे मध्यमा! तू दोनों कानों को पकड़ कर उसे नियुक्त करती है. तू उसे जैसा समझती है, वह उस प्रकार का नहीं है. (३) उत्तानायै शयानायै तिष्ठन्ती वाव गूहसि. न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (४) हे कुमारी! तू सोने जाती है. तू उसे जैसा समझती है, वह वैसा नहीं है. (४) श्लक्ष्णायाँ श्लक्षिणकायां श्लक्ष्णमेवाव गूहसि. न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (५) हे कुमारी! तु आलिंगन में अपना शरीर छिपाती है. तू उसे जैसा समझती है वह उस तरह का नहीं है. (५) अवश्लक्ष्णमिव भ्रंशदन्तर्लोममति हृदे. न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१३४

आलिंगन के समय टूटे हुए दांत और रोम सरोवर में है. (६) सूक्त-१३४ इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् अरालागुदभर्त्सथ.. (१) यहां चारों दिशाओं से घिरे हुए को भयभीत करो. (१) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् वत्साः पुरुषन्त आसते.. (२) यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में बालक युवक बनने की इच्छा से बैठे हैं. (२) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् स्थालीपाको वि लीयते.. (३) यहां चारों दिशाओं से घिरे हुए स्थान में स्थालीपाक अर्थात् बटलोई में पकाया हुआ पदार्थ समाप्त हो जाता है. (३) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् स वै पृथु लीयते.. (४) यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में वह समाप्त हो जाता है. (४) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् आष्टे लाहणि लीशाथी.. (५) यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में युवती जीवन धारण करती है. (५) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् अक्षिलेली पुच्छिलीयते (६) चारों दिशाओं से घिरे इस स्थान में व्यावहारिक बुद्धि पूछी जाती है. (६) सूक्त-१३५ भुगित्यभिगतः शलित्यपक्रान्तः फलित्यभिष्ठितः. दुन्दुभिमाहननाभ्यां जरितरो ऽ थामो दैव.. (१) खाने वाला चला गया, गतिशील जीव भाग गया है तथा उसका शरीर रखा है. हे स्तुति करने वालो! तुम इस के बाद दुंदुभि जिन दो डंडों से बजाई जाती है, उस से खेलो. (१) कोशबिले रजनि ग्रन्थेर्धानमुपानहि पादम्. उत्तमां जनिमां जन्यानुत्तमां जनीन् वर्त्मन्यात्.. (२) पैर के जूते में, धान की कुटिया में तथा उत्तम धरती से उत्पन्न पदार्थों को मार्ग में रखो. ebook converter DEMO Watermarks*

(२) अलाबूनि पृषातकान्यश्वत्थपलाशम्. पिपीलिकावटश्वसो विद्युत्स्वापर्णशफो गोशफो जरितरो ऽ थामो दैव.. (३) हे स्तोता! पृषातक अर्थात् तुंबी, लौकी, पीपल, ढाक, बरगद, सुंदर पत्तों वाले, कटहल, विद्युत और गाय के खुर के बाद शक्ति से क्रीड़ा कर. (३) वी मे देवा अक्रंसताध्वर्यो क्षिप्रं प्रचर. सुसत्यमिद् गवामस्यसि प्रखुदसि.. (४) हे अध्वर्यु जनो! उन प्रकाश वाले अथवा तेजस्वी देवों के सामने शीघ्र ही मंत्रों का उच्चारण करो. गायों के लिए तुम सत्य रूप हो. (४) पत्नी यदृश्यते पत्नी यक्ष्यमाणा जरितरो ऽ थामो दैव. होता विष्टीमेन जरितरो ऽ थामो दैव.. (५) पत्नी यज्ञ करती हुई दिखाई दे रही है. इस के बाद तुम भयों पर विजय प्राप्त करने की इच्छा करना. (५) आदित्या ह जरितरङ्गिरोभ्यो दक्षिणामनयन्. तां ह जरितः प्रत्यायंस्तामु ह जरितः प्रत्यायन्.. (६) हे स्तोता! उस को उन्होंने ग्रहण किया. उसे तुम ने भी ग्रहण किया. हम चेतन प्राणियों को हानि पहुंचाने वालों को तथा यज्ञ न करने वालों को विशेष चेतन प्राणियों को प्रदान करते हैं. (६) तां ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णंस्तामु ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णः. अहानेतरसं न वि चेतनानि यज्ञानेतरसं न पुरोगवामः.. (७) तुम श्वेत तथा आशुपत्य वाली ऋचाओं से युवा अवस्था प्राप्त करते हो. यह शीघ्र पूर्ण करता है. (७) उत श्वेत आशुपत्वा उतो पद्याभिर्यविष्ठः. उतेमाशु मानं पिपर्ति.. (८) हे स्तोता! तुम अंगिरागोत्रीय ऋषियों से दक्षिणा लाते थे. उसे वे लाए थे, वे उसे लाए थे. (८) आदित्या रुद्रा वसवस्त्वेनु त इदं राधः प्रति गृभ्णीह्याङ्गिरः. इदं राधो विभु प्रभु इदं राधो बृहत् पृथु.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*