अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
इमं मे कुष्ठ पूरुषं तमा वह तं निष्कुरु. तमु मे अगदं कृधि.. (६) हे कूठ! मेरे इस पुरुष को अपने समीप ले कर और इस रोग से छुटकारा दिला कर स्वस्थ बनाओ. (६) देवेभ्यो अधि जातो ऽ सि सोमस्यासि सखा हित:. स प्राणाय व्यानाय चक्षुषे मे अस्मै मृड.. (७) हे कूठ! तुम देवों के समीप उत्पन्न हुए हो तथा सोम के हितकारक मित्र हो. तुम मेरे इस पुरुष के प्राण, व्यान एवं नेत्रों को सुख देने वाले बनो. (७) उदङ् जातो हिमवत: स प्राच्यां नीयसे जनम्. तत्र कुष्ठस्य नामान्युत्तमानि वि भेजिरे.. (८) कूठ हिमालय पर्वत के उत्तरभाग में उत्पन्न हुआ है एवं मनुष्यों के द्वारा पूर्व दिशा में लाया गया है. वहां उस के उत्तम नामों का विभाजन हुआ. (८) उत्तमो नाम कुष्ठास्युत्तमो नाम ते पिता. यक्ष्मं च सर्वं नाशय तक्मानं चारसं कृधि.. (९) हे कूठ! तुम्हारी प्रसिद्धि उत्तम है तथा तुम्हारे पिता भी उत्तम थे. तुम सभी प्रकार के राजयक्ष्मा रोगों का नाश करो तथा कुष्ठ रोग को हम से दूर भगाओ. (९) शीर्षामयमुपहत्यामक्ष्योस्तन्वो ३ रेप:. कुष्ठस्तत् सर्वं निष्करद् दैवं समह वृष्ण्यम्.. (१०) सिर संबंधी रोग, नेत्र संबंधी व्याधियां एवं रोग उत्पन्न करने वाले पाप को कूठ ने दैवी बल पा कर इन सब को नष्ट कर दिया. (१०) सूक्त-५ देवता—लाक्षा रात्री माता नभ: पितार्यमा ते पितामह:. सिलाची नाम वा असि सा देवानामसि स्वसा.. (१) हे लाख नामक ओषधि! तू चंद्रमा की किरणों से पुष्ट होती है. इसलिए रात्रि तेरी माता है. तू वर्षा काल में उत्पन्न होती है, इसलिए आकाश तेरा पिता है. आकाश में मेघों को उत्पन्न करने के कारण सूर्य तेरा पितामह है. तेरा नाम सिलाची है और तू देवों की बहन है. (१) यस्त्वा पिबति जीवति त्रायसे पुरुषं त्वम्. भर्त्री हि शश्वतामसि जनानां च न्यञ्चनी.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
जो तुझे पीता है, वह जीवित रहता है. तू पुरुष की रक्षा करती है, तू मनुष्यों का भरणपोषण करने वाली एवं उन्नत बनाने वाली है. (२) वृक्षंवृक्षमा रोहसि वृषण्यन्तीव कन्यला. जयन्ती प्रत्यातिष्ठन्तीस्परणी नाम वा असि.. (३) तू बैल की इच्छा करने वाली गाय के समान प्रत्येक वृक्ष पर चढ़ती है. तू विजय प्राप्त करती है एवं स्थित रहती है, इसलिए तेरा नाम स्मरणी है. (३) यद् दण्डेन यदिष्वा यद् वारुर्हरसा कृतम्. तस्य त्वमसि निष्कृतिः सेमं निष्कृधि पूरुषम्.. (४) हे लाख! जो डंडे से चोट खाया है और जो धारदार शस्त्र से घायल है, तू उन के घावों को ठीक करने का उपाय है, इसलिए तू इस पुरुष को घावविहीन बना. (४) भद्रात् प्लक्षान्निस्तिष्ठस्यश्वत्थात् खदिराद् धवात्. भद्रान्न्यग्रोधात् पर्णात् सा न एह्यरुन्धति.. (५) हे लाख! तू कदंब, पाकड़, पीपल, खैर, धौ, भद्र, न्यग्रोध एवं पर्ण नामक वृक्षों से उत्पन्न होती है. हे घाव को शुद्ध करने वाली एवं भरने वाली ओषधि लाख! तू हमें प्राप्त हो. (५) हिरण्यवर्णे सुभगे सूर्यवर्णे वपुष्टमे. रुतं गच्छासि निष्कृते निष्कृतिर्नाम वा असि.. (६) हे स्वर्ण के समान वर्ण वाली सुभगा एवं सूर्य के समान चमक वाली ओषधि लाख! तू शरीर को स्वस्थ बनाती है. तू घाव को ठीक करती है, इसलिए तेरा नाम निष्कृति है. (६) हिरण्यवर्णे सुभगे शुष्मे लोमशवक्षणे. अपामसि स्वसा लाक्षे वातो हात्मा बभूव ते.. (७) हे सोने के समान वर्ण वाली, सुभगा, सूर्य के समान वर्ण वाली एवं लोगों का विनाश करने वाली लाख! तू जलों की बहन है और वायु तेरी आत्मा है. (७) सिलाची नाम कानीनो ऽ जबभ्रु पिता तव. अश्वो यमस्य यः श्यावस्तस्य हास्नास्युक्षिता.. (८) हे लाख! तेरे नाम सिलाची और कानीन हैं. बकरियों का पालक तेरा पिता है. यमराज का जो पीले रंग का घोड़ा है, उस के रक्त से तुझे सींचा गया है. (८) अश्वस्यास्नः सम्पतिता सा वृक्षां अभि सिष्यदे. सरा पतत्रिणी भूत्वा सा न एह्यरुन्धति.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-६ देवता—ब्रह्म
हे घाव भरने वाली लाख! तू घोड़े के रंग वाली है एवं वृक्षों को सींचती हैं. तू सरकने वाली है, इसलिए चिड़िया बन कर हमारे समीप आ. (९) सूक्त-६ देवता—ब्रह्म ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः. स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१) संपूर्ण सृष्टि का कारण ब्रह्म सृष्टि के आरंभ में सूर्य के रूप में प्रकट हुआ. उस का तेज सीमा रहित है, जो सभी दिशाओं और लोकों में व्याप्त होता है. वह अनुपम है. सत् इसी से उत्पन्न हुआ है और असत् इसी में समा जाता है. (१) अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे. वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (२) हे मनुष्यो! तुम्हारे विरोधी शत्रुओं ने जो उत्तम कर्म किए हैं, उन कर्मों से वे हमारी संतानों तथा वीरों का विनाश न करें, इसलिए मैं वह अभिचार कर्म तुम्हारे सामने प्रस्तुत कर रहा हूं. (२) सहस्रधार एव ते समस्वरन् दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः. तस्य स्पशो न नि मिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवे.. (३) आकाश में स्थित एवं हजारों मार्गों वाले स्वर्ग में विनाश करने वाले यह घोषित कर चुके हैं. जो लोग युद्ध में जाने के लिए आनाकानी करते हैं, उन्हें बांधने के लिए यमदूत पाश लिए हुए सदा तत्पर रहते हैं एवं अपनी आंखें कभी बंद नहीं करते. (३) पर्यु षु प्र धन्वा वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः. द्विषस्तदध्यर्णविनेयसे सनिस्रसो नामासि त्रयोदशो मास इन्द्रस्य गृहः.. (४) हे सूर्य! तुम अन्न उत्पादन के निमित्त मेघों के समीप जाते हो और उन्हें ताड़ित कर के सागर के पास पहुंचाते हो. इसी कारण तुम्हारा नाम सनिस्रत है. वर्ष का तेरहवां महीना जो इंद्र का घर है, तुम उस में भी वर्षा करने को तत्पर हो. (४) न्वे ३ तेनारात्सीरसौ स्वाहा. तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (५) इसी अभिचार कर्म द्वारा इस पुरुष ने सिद्धि प्राप्त की थी. यह अभिचार कर्म सुंदर आहुति वाला हो. हे सोम और रुद्र! तुम तीखे अस्त्रों वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में विजयी बना कर सुख प्रदान करो. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
अवैतेनारातत्सीरसौ स्वाहा. तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (६) इस अभिचार कर्म के द्वारा ही इस राजा ने सिद्धि प्राप्त की है एवं शत्रुओं का विनाश किया है. इस की छवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम एवं रुद्र! तुम तीक्ष्ण शस्त्रों वाले हो. तुम इस युद्ध में विजय प्रदान करा के हमें सुख दो. (६) अपैतेनारातत्सीरसौ स्वाहा. तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (७) इस अभिचार कर्म द्वारा ही इस राजा ने अपने शत्रुओं का विरोध करते हुए उन का दमन किया तथा सिद्धि प्राप्त की. इस की यह हवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम और रुद्र! तुम अत्यधिक तीक्ष्ण आयुधों वाले तथा सुख प्राप्त करने वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में विजयी बना कर सुख प्रदान करो. (७) मुमुक्तमस्मान्दुरितादवद्याज्जुषेथां यज्ञममृतमस्मासु धत्तम्.. (८) हे सोम एवं रुद्र देव! हमें ऐसे पाप से बचाओ, जिस का नाम लेने में भी लज्जा आती है. तुम इस यज्ञ को प्राप्त करो और इस में अमृत धारण करो. (८) चक्षुषो हेते मनसो हेते ब्रह्मणो हेते तपसश्च हेते. मेन्या मेनिरस्यमेनयस्ते सन्तु ये३स्मां अभ्यघायन्ति.. (९) हे नेत्र की, मन की, ब्रह्म की एवं तप की संहारक शक्ति! तुम सभी आयुधों की अपेक्षा श्रेष्ठ आयुध हो. जो आयुधधारी हमें नष्ट करना चाहते हैं, वे आयुधहीन हो जाएं. (९) यो ३ स्मांश्चक्षुषा मनसा चित्त्याकूत्या च यो अघायुरभिदासात्. त्वं तानग्ने मेन्यामेनीन् कृणु स्वाहा.. (१०) हे अग्नि! हमारी हत्या रूपी पाप करने का इच्छुक जो व्यक्ति हम को चक्षु से, मन से और चित्तवृत्ति से क्षीण करना चाहता है, उसे अपने आयुध के द्वारा आयुधहीन बनाओ. हमारी यह आहुति उत्तम हो. (१०) इन्द्रस्य गृहो ऽ सि. तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मेऽस्ति तेन.. (११) हे अग्नि! तुम इंद्र के गृह हो. तुम सर्वत्र गमन करने वाले, सब के पुरुष, सब की आत्मा एवं सब के शरीर हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित आप की शरण में आया हूं. (११) eBook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रस्य शर्मासि. तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मेऽस्ति तेन.. (१२) हे अग्नि! तुम इंद्र के मुख, सर्वत्र गमन करने वाले, सब की आत्मा, सब के शरीर एवं सब के पुरुष हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित तुम्हारी शरण में आया हूं. (१२) इन्द्रस्य वर्मासि. तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मे ऽ स्ति तेन.. (१३) हे अग्नि! तुम इंद्र के कवच, सर्वत्र गमन करने वाले, सब की आत्मा, सब के शरीर और सब के पुरुष हो. मैं अपने समस्त परिवार और पूरी संपत्ति के साथ तुम्हारी शरण में आता हूं. (१३) इन्द्रस्य वरूथमसि. तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मे ऽ स्ति तेन.. (१४) हे अग्नि! तुम इंद्र के सैनिक, सर्वत्र गमन करने वाले, सब के पुरुष, सब की आत्मा और सब के शरीर हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित तुम्हारी शरण में आया हूं. (१४) सूक्त-७ देवता—अराति आ नो भर मा परि ष्ठा अराते मा नो रक्षीर्दक्षिणां नीयमानाम्. नमो वीत्सार्या असमृद्धये नमो अस्त्वरातये.. (१) हे अराति! हम को धन संपन्न बना. तू हमारे चारों ओर स्थित मत हो और हमारे द्वारा लाई गई दक्षिणा को प्रभावित मत कर. यह हवि हम दान हीनता की अधिष्ठात्री देवी को वृद्धि न होने की इच्छा से दे रहे हैं. यह तुझे प्राप्त हो. (१) यमराते पुरोधत्से पुरुषं परिरापिणम्. नमस्ते तस्मै कृण्मो मा वनिं व्यथयीर्मम.. (२) हे अराति! हम उस पुरुष को दूर से प्रणाम करते हैं, जो तुम्हारे सम्मुख रहता है एवं केवल बोलने वाला है, काम नहीं करता. तुम हमारी इस इच्छा को ठुकराना मत. (२) प्र णो वनिर्देवकृता दिवा नक्तं च कल्पताम्. अरातिमनुप्रेमो वयं नमो अस्त्वरातये.. (३)
हम में देवों की भक्ति रातदिन बढ़ती रहे. इसीलिए हम अराति की शरण में जाते हैं. अराति को नमस्कार हो. (३) सरस्वतीमनुमतिं भगं यन्तो हवामहे. वाचं जुष्टां मधुमतीमवादिषं देवानां देवहूतिषु.. (४) मैं देवों का आह्वान करने वाले यज्ञों में उस वाणी का उच्चारण करता हूं, जो उन्हें प्रसन्न करने वाली है. हम सब सरस्वती, अनुमति और भगदेव की शरण प्राप्त करते हैं और उन्हें बुलाते हैं. (४) यं याचाम्यहं वाचा सरस्वत्या मनोयुजा. श्रद्धा तमद्य विन्दतु दत्ता सोमेन बभ्रुणा.. (५) मन से उत्पन्न सरस्वती की वाणी के द्वारा मैं जिस वस्तु को पाने की प्रार्थना करता हूं, वह शक्तिशाली सोमदेव की श्रद्धा द्वारा दी हुई प्राप्त हो. (५) मा वनिं मा वाचं नो वीत्सीरुभाविन्द्राग्नी आ भरतां नो वसूनि. सर्वे नो अद्य दित्सन्तो ऽ रातिं प्रति हर्यत.. (६) हे अराति! तू हमारी वाणी और भक्ति को अवरुद्ध मत कर. इंद्र और अग्नि हमें धन प्रदान करें तथा वे इस समय हमारे शत्रुओं के अनुकूल न हों. (६) परो ऽ पेह्यसमृद्धे वि ते हेतिं नयामसि. वेद त्वाहं निमीवन्तीं नितुदन्तीमराते. (७) हे अराति! मैं जानता हूं कि तू दुर्बल बनाने वाला और पीड़ा देने वाला है. इस कारण तू मुझ से दूर रह. मैं तेरी विनाशक शक्ति को दूर कर सकता हूं. (७) उत नग्ना बोभुवती स्वप्रया सचसे जनम्. अराते चित्तं वीर्त्सन्त्याकूतिं पुरुषस्य च.. (८) हे अराति! तू मनुष्यों की कामनाओं को असफल करता है तथा उन्हें सदा प्रभाव के रूप में प्राप्त होता है. (८) या महती महोन्माना विश्वा आशा व्यानशे. तस्यै हिरण्यकेश्यै निर्ऋत्या अकरं नमः.. (९) असमृद्धि अर्थात् दरिद्रता हमारी सभी आशाओं को सीमित कर रही है. सुनहरे केशों वाली इस असमृद्धि को मैं नमस्कार करता हूं. (९) हिरण्यवर्णा सुभगा हिरण्यकशिपुर्मही. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-८ देवता—अग्नि
तस्यै हिरण्यद्रापये ऽ रात्य अकरं नमः.. (१०) यह सुनहरे रंग वाली पृथ्वी व्याप्ति के कारण हिरण्यकश्यप के वश में हो कर समृद्धहीन हो गई थी. यह असमृद्धि रमणीयता का विनाश करती है. मैं इस को नमस्कार करता हूं. (१०) सूक्त-८ देवता—अग्नि वैकङ्कतेनेध्मेन देवेभ्य आज्यं वह. अग्ने ताँ इह मादय सर्व आ यन्तु मे हवम्.. (१) हे अग्नि! तुम शक्तिशाली ओषधि के ईंधन से देवों के हेतु घृत का वहन करो. इस कर्म से तुम देवों को प्रसन्न करो. मेरे यह में सभी देव आएं. (१) इन्द्रा याहि मे हवमिदं करिष्यामि तच्छृणु. इम ऐन्द्रा अतिसरा आकूतिं सं नमन्तु मे. तेभिः शकेम वीर्यं १ जातवेदस्तनूवशिन्.. (२) हे इंद्र! मेरे इस यज्ञ में आओ और मैं जो स्तुति कर रहा हूं, उसे सुनो. सभी ऋत्विज् मेरी इच्छा के अनुसार कार्य करें. हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता इंद्र! जिन ऋत्विजों का मैं ने वर्णन किया है, उन के प्रयत्न से हम शक्तिशाली बनें. (२) यदसावमृतो देवा अदेवः संश्रिकीर्षति. मा तस्याग्निर्हव्यं वाक्षीद्भवं देवा अस्य मोप गुर्ममैव हवमेतन.. (३) हे देवगण! जो भक्तिहीन पुरुष यज्ञ करना चाहता है, उस के हव्य को अग्नि तुम्हारे पास तक न पहुंचाएं. देवगण उस भक्ति हीन पुरुष के यज्ञ में न जा कर मेरे यज्ञ में पधारें. (३) अति धावतार्तिसरा इन्द्रस्य वचसा हत. अविं वृक इव मथ्नीत स वो जीवन् मा मोचि प्राणमस्यापि नह्यत.. (४) हे मनुष्यो! तुम इंद्र के वचनों से वृद्धि प्राप्त करो और शत्रुओं का विनाश करो. तुम शत्रु को इस प्रकार मथो, जिस प्रकार भेड़िया भेड़ को मथता है. वह जीवित न रहने पाए. तुम उसे नष्ट कर दो. (४) यममी पुरोदधिरे ब्रह्माणमपभूतये. इन्द्र स ते अधस्पदं तं प्रत्यस्यामि मृत्यवे.. (५) हे इंद्र! इन शत्रुओं ने हमारी दुर्गति के निमित्त यज्ञ में जिसे अपना पुरोहित बनाया है, उस का अधःपतन हो जाए. मैं उसे मृत्यु के समीप फेंक रहा हूं. (५)
यदि प्रेयुर्देवपुरा ब्रह्म वर्माणि चक्रिरे. तनूपानं परिपाणं कृण्वाना यदुपोचिरे सर्वं तदरसं कृधि.. (६) हे देव! हमारे शत्रुओं ने तनुपान एवं परिपाण नामक कर्म के समय अपने मंत्रमय कवचों को सिद्ध कर लिया है. तुम इन कर्मों से संबंधित मंत्रों को असफल बनाओ. (६) यानसावतिसराँश्चकार कृणवच्च यान्. त्वं तानिन्द्र वृत्रहन् प्रतीचः पुनरा कृधि यथामुं तृणहां जनम्.. (७) हे वृत्र राक्षस का नाश करने वाले इंद्र! हमारे शत्रु ने जिन योद्धाओं को आगे की ओर बढ़ाया है, उन्हें तुम पीछे धकेल दो, जिस से मैं शत्रु की सेना का विनाश कर सकूं. (७) यथेन्द्र उद्वाचनं लब्ध्वा चक्रे अधस्पद्म्. कृण्वे ३ हमधरांस्तथामूञ्छश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (८) इंद्र ने जिस प्रकार स्तुति वचनों के श्रेष्ठ अस्त्र से अपने शत्रु को पराजित किया था, उसी प्रकार मैं इन शत्रुओं का तिरस्कार करता हूं. (८) अत्रैनानिन्द्र वृत्रहन्नुग्रो मर्मणि विध्य. अत्रैवैनानभि तिष्ठेन्द्र मेद्य१हं तव. अनु त्वेन्द्रा रभामहे स्याम सुमतौ तव.. (९) हे वृत्र को मारने वाले इंद्र! तुम उग्र बन कर इस युद्ध में मेरे शत्रु के मर्मस्थलों का वेध करो. मैं तुम्हारा स्नेहपात्र हूं, इसीलिए तुम मेरे इन शत्रुओं से युद्ध करो. मैं तुम्हारा अनुगामी हूं और भविष्य में भी तुम्हारी सुमति में रहूंगा. (९) सूक्त-९ देवता—वास्तोष्पति दिवे स्वाहा.. (१) द्युलोक के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (१) पृथिव्यै स्वाहा.. (२) पृथ्वी के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (२) अन्तरिक्षाय स्वाहा.. (३) आकाश के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (३) अन्तरिक्षाय स्वाहा.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
अंतरिक्ष अर्थात् धरती और आकाश के अधिष्ठाता देव के लिए यह हवि समर्पित है. (४) दिवे स्वाहा.. (५) द्युलोक अर्थात् स्वर्ग के अधिष्ठाता के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (५) पृथिव्यै स्वाहा.. (६) पृथ्वी के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (६) सूर्यो मे चक्षुर्वातः प्राणो ३ न्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम्. अस्तुतो नामाहमयमस्मि स आत्मानं नि दधे द्यावापृथिवीभ्यां गोपीथाय.. (७) वायु मेरे नेत्र हैं, वायु मेरा प्राण है, अंतरिक्ष के अधिष्ठाता देव मेरी आत्मा हैं और पृथ्वी मेरा शरीर है. मैं अमर अथवा मृत्युरहित नाम वाला हूं. हे द्यावा पृथ्वी! मैं अपनी आत्मा को सुरक्षा के निमित्त आपके सामने समर्पित करता हूं. (७) उदायुरुद् बलमृत् कृतमृत् कृत्यामुन्मनीषामुदिन्द्रियम्. आयुष्कृदायूष्पत्नी स्वधावन्तौ गोपा मे स्तं गोपायतं मा. आत्मसदौ मे स्तं मा मा हिंसिष्टम्.. (८) हे द्यावा पृथ्वी! तुम हमारी आयु, बल, कर्म, कृत्या, बुद्धि तथा इंद्रियों को उत्कृष्ट बनाओ. हे आयु बढ़ाने वाले, आयु की रक्षा करने वाले एवं स्व भासमान द्यावा पृथ्वी! तुम मेरी रक्षा करो! आप मेरी आत्मा में स्थित हो और कभी मेरी हिंसा न करें. (८) सूक्त-१० देवता—वास्तोष्पति अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा प्राच्या दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (१) हे पत्थर के बने घर! तू मेरा है. जो पापी हत्यारा मुझे पूर्व दिशा की ओर से नष्ट करना चाहता है, वह नाश को प्राप्त हो. (१) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा दक्षिणाया दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (२) हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है. जो हत्या करने का इच्छुक पापी दक्षिण दिशा से मुझे नष्ट करने का इच्छुक है, वह यहां आतेआते स्वयं नष्ट हो जाए. (२) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा प्रतीच्या दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ebook converter DEMO Watermarks*
ऋच्छात्.. (३) हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है. जो हत्या करने का इच्छुक पापी मुझे पश्चिम दिशा से नष्ट करना चाहता है, वह मेरे समीप आने से पहले ही नष्ट हो जाए. (३) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मोदीच्या दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (४) हे पत्थर के बने घर! तू मेरा है. जो पापी मेरी हत्या करने की इच्छा से उत्तर दिशा से आता है, वह मेरे समीप आ कर नष्ट हो जाए. (४) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा ध्रुवाया दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (५) हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है. जो पापी ध्रुव दिशा अर्थात् नीचे की ओर से मुझे नष्ट करने की इच्छा करता है, उस का नाश हो. (५) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा मोर्ध्वाया दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (६) हे पत्थर के घर! तू मेरा है. जो पापी मुझे ऊपर की दिशा से समाप्त करना चाहता है, उस का नाश हो. (६) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा दिशामन्तर्देशेभ्यो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (७) हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है जो पापी दिशाओं के कोनों से मेरा नाश करना चाहता है, उस का नाश हो. (७) बृहता मन उप ह्वये मातरिश्वना प्राणापानौ. सूर्याच्चक्षुरन्तरिक्षाच्छोत्रं पृथिव्याः शरीरम्. सरस्वत्या वाचमुप ह्वयामहे मनोयुजा.. (८) मैं चंद्रमा के मन का आह्वान करता हूं. मैं वायु से प्राण अपान की, सूर्य से नेत्र की, अंतरिक्ष से क्षेत्र की, पृथ्वी से शरीर की और सरस्वती से मन युक्त वाणी की प्रार्थना करता हूं. (८) सूक्त-११ देवता—वरुण कथं महे असुरायाब्रवीरिह कथं पित्रे हरये त्वेषनृम्णः. पृश्निं वरुण दक्षिणां ददावान् पुनर्मघ त्वं मनसाचिकिल्सीः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे शक्तिशाली वरुण! तुम ने जगत् के पालन करने वाले सूर्य से क्या कहा था? तुम सूर्य को दक्षिणा देते हो एवं मन से चिकित्सा करते हो. (१) न कामेन पुनर्मघो भवामि सं चक्षे कं पृश्निमेतामुपाजे. केन नु त्वमथर्वन् काव्येन केन जातेनासि जातवेदाः.. (२) मैं इच्छा मात्र से ही संपत्तिशाली नहीं बन गया हूं, अपितु सूर्य देव से प्रार्थना करता हूं. मैं यह सुख प्राप्त करता रहूं. हे ऋत्विज्! तुम किस विद्या और चातुर्य के द्वारा सभी जन्म लेने वालों के ज्ञाता बन गए हो? (२) सत्यमहं गभीरः काव्येन सत्यं जातेनास्मि जातवेदाः. न मे दासो नार्यो महित्वा व्रतं मीमाय यदहं धरिष्ये.. (३) यह सत्य बात है कि मैं काव्य अर्थात् अथर्व के द्वारा प्राप्त चतुरता से ज्ञानी बन गया हूं तथा अग्नि के समान सब का मार्गदर्शन करता हूं. मैं जिस व्रत को धारण करूंगा, उसे कोई भंग नहीं कर सकता. (३) न त्वदन्यः कवितरो न मेधया धीरतरो वरुण स्वधावन्. त्वं ता विश्वा भुवनानि वेत्थ स चिन्नु त्वज्जनो मायी बिभाय.. (४) हे स्वधा वाले वरुण! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी दूसरा विद्वान् मेधावी और वीर नहीं है. तुम सभी भुवनों को जानते हो, इसलिए सब लोग तुम से भयभीत रहते हैं. (४) त्वं ह्य १ ङ्ग वरुण स्वधावन् विश्वा वेत्थ जनिमा सुप्रणीते. किं रजस एना परो अन्यदस्त्येना किं परेणावरममुर.. (५) हे सुधा के पात्र एवं नीति पालक वरुण! तुम प्राणियों के सभी जन्मों को जानते हो. तुम सभी से मोह रखते हो. इस रजोगुण युक्त धन से श्रेष्ठ कौन सी वस्तु है. इस से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है. (५) एकं रजस एना परो अन्यदस्त्येना पर एकेन दुर्णशं चिदर्वाक्. तत् ते विद्वान् वरुण प्र ब्रवीम्यधोवचसः पणयो भवन्तु नीचैर्दासा उप सर्पन्तु भूमिम्.. (६) इस रजोगुण युक्त धन से श्रेष्ठ गुण युक्त धन है. सतोगुण युक्त से श्रेष्ठ ब्रह्म है. हे वरुण देव! तुम इस विषय के जानने वाले हो, इसलिए मैं तुम से निवेदन करता हूं कि बुरा व्यवहार करने वाले लोग मेरे सामने निकृष्ट वचन न बोलें और दास जन झुक कर चलें. (६) त्वं ह्य १ ङ्ग वरुण ब्रवीषि पुनर्मघेष्ववद्यानि भूरि. मो षु पर्णीँ रभ्ये ३ तावतो भून्मा त्वा वोचन्नराधसं जनासः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
हे वरुण देव! तुम बारबार धन प्राप्ति के अवसरों के विषय में बताते हो. तुम इन व्यवहार करने वालों की उपेक्षा मत करो. अन्यथा ये तुम्हें धनहीन समझने लगेंगे. (७) मा मा वोचन्नराधसं जनासः पुनस्ते पृश्निं जरितर्ददामि. स्तोत्रं मे विश्वमा याहि शचीभिरन्तर्विश्वाुसु मानुषीषु दिक्षु.. (८) लोग बारबार तुम्हें धनहीन अथवा कंजूस न समझ लें, इसलिए मैं तुम्हें यह थोड़ा सा धन भेंट करता हूं. मेरी इच्छा है कि तुम्हारी यह स्तुति सारे संसार में फैल जाए और सभी दिशाओं में मनुष्य इसे गाएं. (८) आ ते स्तोत्राण्युद्यतानि यन्तून्वन्तर्विश्वा्सु मानुषीषु दिक्षु. देहि नु मे यन्मे अदत्तो असि युज्यो मे सप्तपदः सखासि.. (९) हे वरुण! मनुष्यों से युक्त सभी दिशाओं में तुम्हारी स्तुतियां फैल जाएं. तुम मुझे यह वस्तु दो जो अब तक नहीं दी है. तुम मेरे सप्तदा अर्थात् सात कदम साथ चलने वाले सखा हो. (९) समा नौ बन्धुर्वरुण समा जा वेदाहं तद्यन्नावेषा समा जा. ददामि तद् यत् ते अदत्तो अस्मि युज्यस्ते सप्तपदः सखास्मि.. (१०) हे बंधु वरुण! हम और तुम दोनों समान हैं. हमारी संतान भी समान हो. इन बातों को मैं जानता हूं. मैं ने तुम्हें अब तक जो नहीं दिया है, वह अब दे रहा हूं. मैं तुम्हारा सप्तदा सखा हूं. (१०) देवो देवाय गृणते वयोधा विप्रो विप्राय स्तुवते सुमेधाः. अजीजनो हि वरुण स्वधावन्नथर्वाणं पितरं देवबन्धुम्. तस्मा उ राधः कृणुहि सुप्रशस्तं सखा नो असि परमं च बन्धुः.. (११) हे अन्नधारक वरुण देव! देवगण देवों की स्तुति करते हैं तथा बुद्धिमान ब्राह्मण ब्राह्मणों की स्तुति करते हैं. हे सुधा के पात्र वरुण! तुम ने देवों को बंधु एवं हमारे पिता के समान अथर्व को जानने वाले को उत्पन्न किया है. तुम मुझे श्रेष्ठ धन में स्थापित करो. तुम हमारे सब से बड़े बंधु एवं सखा हो. (११) सूक्त-१२ देवता—अग्नि समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान् यजसि जातवेदः. आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान् त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः.. (१) हे उत्पन्न हुओं को जानने वाले अग्नि! तुम आज मनुष्य के यज्ञ में प्रज्वलित हुए हो और देवों का यजन कर रहे हो. तुम मित्रों की पूजा करने वाले एवं ज्ञाता हो. तुम देवों का आह्वान ebook converter DEMO Watermarks*
करो. तुम देवों के दूत, ज्ञानवान और क्रांतदर्शी हो. (१) तनूनपात् पथ ऋतस्य यानान् मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व. मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन् देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः.. (२) हे शरीररक्षक एवं उत्तम जिह्वा वाले अग्नि! तुम सत्यलोक को प्राप्त कराने वाले मार्गों को मधुर बना कर उन का आस्वादन करो एवं मेरे यज्ञ को बढ़ाते हुए इसे देवों को प्राप्त कराओ. (२) आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्च याह्यग्ने वसुभिः सजोषाः. त्वं देवानामासि यह्व होता स एनान् यक्षीषितो यजीयान्.. (३) हे अग्नि! तुम पूज्य व वंदना करने योग्य हो. तुम में भलीभांति हवन किया जाता है. हमारे इस यज्ञ कर्म में तुम वसुओं के सहित आओ. तुम देवों के होता हो. तुम हमारी प्रेरणा से देवों की पूजा करो. (३) प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम्. व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम्.. (४) वेदी रूपी भूमि को ढकने वाले आह्वनीय अग्नि पूर्वाह्न में विस्तृत होते हैं. अग्नि अन्य ज्योतियों की अपेक्षा श्रेष्ठ, धनवान तथा पृथ्वी को सुख देने वाले हैं. (४) व्यचस्वतीरुरुविया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः. देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः.. (५) अग्नि की ज्वाला हवि को वहन करने वाली और व्याधियों को रोकने वाली है. इस कारण वह द्वार के समान है. हे अग्नि की प्रकाशमान ज्वाला! जिस प्रकार स्त्रियां पतियों का आदर करती है, उसी प्रकार तुम देवों को सुख देने वाली बनो. तुम हवि को व्याप्त करने वाली हो. (५) आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्ता सदतां नि योनौ. दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रियं शुक्रपिशं दधाने.. (६) अग्नि की दीप्ति उषा और यज्ञ की दीप्ति से युक्त है. वह यज्ञों का संपादन करती एवं देवों से संयुक्त होती है. वह दिव्य, परस्पर मिलने वाली एवं उत्तम दीप्ति यजमान के हेतु अग्नि की स्थापना करे. (६) दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै. प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (७)
वायु और अग्नि दिव्य हैं. मनुष्य होताओं में प्रमुख हैं. वे सुंदर वाणी वाले, यज्ञ के प्रेरक एवं यज्ञ के निर्माता हैं. वायु होताओं पर अनुग्रह करते हैं और आह्वनीय अग्नि की सेवा का आदेश देते हैं. अतएव यज्ञ पर उपकार करने वाले वायु और अग्नि देव मुझ पर भी उपकार करें. (७) आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विडा मनुष्यदिह चेतयन्ती. तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं स्योनं सरस्वतीः स्वपसः सदन्ताम्.. (८) सब प्राणियों को जल से संतुष्ट करने वाले अग्नि देव की कांति पृथ्वी का और सरस्वती का आह्वान करने पर सचेत हो. सुंदर कर्म करने वाली ये तीन देवियां कुश पर विराजमान हों. (८) य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद् भुवनानि विश्वा. तमद्य होतरिषितो यजीयान् देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (९) हे अग्नि! जो त्वष्टा देवता द्यावा पृथ्वी तथा समस्त प्राणियों को अनेक रूप प्रदान करता है, हमारी प्रेरणा से आज उस का यजन करो. (९) उपावसृज त्मन्या समञ्जन् देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि. वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (१०) हे अग्नि देव! यह यज्ञ रूप अन्न देवों का भाग है. इसे और हवियों को प्रत्येक ऋतु में देवों तक पहुंचाओ. वनस्पति, सविता देव और अग्नि इस हव्य को मधु और घृत से युक्त कर के स्वादिष्ट बनाएं. (१०) सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत् पुरोगाः. अस्य होतुः प्रशिष्यतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः.. (११) अग्नि देव प्रकट होते ही यज्ञ का आरंभ करते हैं और प्रकट होते ही समस्त देवों में अग्रगण्य बन जाते हैं. देवों का आह्वान करने वाले इस अग्नि के मुख में देव गण स्वाहा शब्द से युक्त हवि ग्रहण करें. (११) सूक्त-१३ देवता—सर्प-विषनाशन ददिर्हि मह्यं वरुणो दिवः कविर्वचोभिरुग्रैर्नि रिणामि ते विषम्. खातमखातमुत सक्तमग्रभमिरेव धन्वन्नि जजास ते विषम्.. (१) स्वर्ग के देवता वरुण ने मुझे उपदेश दिया है. उन के वचनों के द्वारा मैं तेरे विष को दूर करता हूं. जो विष मांस के ऊपर अथवा मांस के भीतर है, उसे मैं ग्रहण करता हूं. जिस प्रकार जल रेत में गिरने पर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तेरा विष नष्ट हो जाए. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
यत् ते अपोदकं विषं तत् त एतास्वग्रभम्. गृह्णामि ते मध्यममुत्तमं रसमुतावमं भियसा नेशदादु ते.. (२) जल को दूषित करने वाला तेरा जो विष है, उसे मैं ने भीतर ही रोक लिया है. तेरे उत्तम और मध्यम रस अर्थात् विष को मैं ग्रहण करता हूं. वह रस अर्थात् तेरा विष नष्ट हो जाए. (२) वृषा मे रवो नभसा न तन्यतुरुग्रेण ते वचसा बाध आदु ते. अहं तमस्य नृभिरग्रभं रसं तमस इव ज्योतिरुदेतु सूर्यः.. (३) मेरा वचन वर्षा करने वाला तथा मेघ के समान गर्जन करता है. मैं अपने उग्र वचन से तुझ सर्प को बांधता हूं. जिस प्रकार सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार यह पुरुष विष से मुक्त हो कर जीवित हो जाए. (३) चक्षुषा ते चक्षुर्हन्मि विषेण हन्मि ते विषम्. अहे म्रियस्व मा जीवीः प्रत्यगभ्येतु त्वा विषम्.. (४) हे सर्प! मैं अपनी नेत्र शक्ति से तेरी नेत्र शक्ति का विनाश करता हूं तथा ऋषि के द्वारा तेरे विष को समाप्त करता हूं. तू मृत्यु को प्राप्त हो, जीवित न रहे. तेरा विष तुझ पर ही बुरा प्रभाव डाले. (४) कैरात पृश्न उपतृण्य बभ्र आ मे शृणुतासिता अलीकाः. मा मे सख्युः स्तामानमपि छाताश्रावयन्तो नि विषे रमध्वम्.. (५) हे सर्पो! तुम जंगल में घूमने वाले, काले धब्बों से युक्त, घास में रहने वाले, भूरे वर्ण वाले, काले वर्ण वाले तथा निंदनीय हो. तुम हमारे कथन को सुनो. तुम हमारे सखा के घर के समीप निवास मत करो. हमारा यह कथन तुम दूसरे सर्पों को भी सुना दो. (५) असितस्य तैमातस्य बभ्रोरपोदकस्य च. सात्रासाहस्याहं मन्योरव ज्यामिव धन्वनो वि मुञ्चामि रथाँ इव.. (६) गीली जगह में निवास करने वाले, श्याम एवं श्वेत वर्ण से युक्त, पानी से दूर रहने वाले और सब को पराजित करने वाले क्रोध पूर्ण सर्पों के विष को हम उसी प्रकार दूर करते हैं, जिस प्रकार धनुष की डोरी और रथों के बंधन को उतारा जाता है. (६) आलिगी च विलिगी च पिता च माता च. विद्म वः सर्वतो बन्ध्वरसाः किं करिष्यथ.. (७) हे सर्पो! तुम्हारे मातापिता आलिगी अर्थात् चिपकने वाले और विलिगी अर्थात् न चिपकने वाले हैं. हम तुम्हारे सभी बंधुओं से परिचित हैं. तुम रसहीन अर्थात् विष हीन हो कर ebook converter DEMO Watermarks*
क्या करोगे? (७) उरुगूलाया दुहिता जाता दास्यसिक्न्या. प्रतङ्कं दुद्रुषीणां सर्वासामरसं विषम्.. (८) जो सांपिन गूलर नाम के विशाल वृक्ष से उत्पन्न हुई है, वह काली सांपिन की दासी है. जो सांपिन दांतों के माध्यम से अपना क्रोध प्रकट करती है, इस का विष हमें दुःख प्रदान करता है यह विष प्रभावहीन हो जाए. (८) कर्णा श्वावित् तदब्रवीद् गिरेरवचरन्तिका. याः काश्चेमाः खनित्रिमास्तासामरसतं विषम्.. (९) पर्वतों पर घूमने वाली और कांटों वाली ने कहा कि जो सांपिनें धरती में बिल बना कर निवास करती हैं, उन का विष प्रभावहीन हो जाए. (९) ताबुवं न ताबुवं न घेत् त्वमसि ताबुवम्. ताबुवेनारसं विषम्.. (१०) तुम ताबुव नहीं हो, तुम ताबुव नहीं हो, क्योंकि ताबुव विष को प्रभावहीन कर देता है. (१०) तस्तुवं न तस्तुवं न घेत् त्वमसि तस्तुवम्. तस्तुवेनारसं विषम्.. (११) तुम तस्तुव नहीं हो, तुम तस्तुव नहीं हो. निश्चित रूप से तुम तस्तुव नहीं हो. तस्तुव विष को प्रभावहीन कर देता है. (११) सूक्त-१४ देवता—ओषधि सुपर्णस्त्वान्वविन्दत् सूकरस्त्वाखनन्नसा. दिप्सौषधे त्वं दिप्सन्तमव कृत्याकृतं जहि.. (१) हे ओषधि! सुपर्ण अर्थात् गरुड़ या सूर्य ने तुम्हें प्राप्त किया था. सुअर ने अपनी नाक से तुम्हें खोदा था. हे कृत्या से संबंधित ओषधि! तुम कृत्या का प्रयोग करने वाले और हमें मारने का प्रयत्न करने वाले का नाश करो. (१) अव जहि यातुधानानव कृत्याकृतं जहि. अथो यो अस्मान् दिप्सति तमु त्वं जह्योषधे.. (२) हे ओषधि! तुम याततुधानों अर्थात् राक्षसों और कृत्या का निर्माण करने वाले का
विनाश करो. तुम उस का भी विनाश करो जो हमारी मृत्यु की इच्छा करता है. (२) रिश्यस्येव परीशासं परिकृत्य परि त्वचः. कृत्यां कृत्याकृते देवा निष्कमिव प्रति मुञ्चत.. (३) हे देवो! जो हमारी हिंसा करने वाले हैं, उन की त्वचा पर अपने आयुधों से घाव बना कर अपने आयुधों को अलग करो. लोग जिस प्रकार सोने के सिक्के अथवा आभूषण को ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार कृत्या का निर्माण करने वाला उस को स्वीकार करे. (३) पुनः कृत्यां कृत्याकृते हस्तगृह्य परा णय. समक्षमस्मा आ धेहि यथा कृत्याकृतं हनत्.. (४) हे ओषधि! तुम कृत्या का हाथ पकड़ कर उन के समीप ले जाओ, जिन्होंने इस का निर्माण किया है. उन के समीप पहुंची हुई कृत्या उन का विनाश कर देगी. (४) कृत्याः सन्तु कृत्याकृते शपथः शपथीयते. सुखो रथइव वर्ततां कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (५) कृत्या का प्रयोग करने वाले पर कृत्या का बुरा प्रभाव पड़े और शाप देने वाले को ही शाप लगे. जिस प्रकार रथ सरलतापूर्वक घूम जाता है, उसी प्रकार कृत्या अपने प्रेरक की ओर घूम जाए. (५) यदि स्त्री यदि वा पुमान् कृत्यां चकार पाप्मने. तामु तस्मै नयामस्यश्वमिवाश्वाभिधान्या.. (६) यदि किसी स्त्री अथवा पुरुष ने तुझे पाप कर्म अर्थात् मुझे डसने के लिए प्रेरणा दी है तो जिस प्रकार लगाम का संकेत करने से घोड़ा पीछे की ओर लौट पड़ता है, उसी प्रकार हम तुझे प्रेरणा देने वालों की ओर ही लौटाते हैं. (६) यदि वासि देवकृता यदि वा पुरुषैः कृता. तां त्वा पुनर्णीयामसीन्द्रेण सयुजा वयम्.. (७) हे कृत्या! यदि तुझे देवों ने अथवा पुरुषों ने प्रेरित किया है तो हम तुझे उन्हीं की ओर वापस लौटाते हैं, क्योंकि हम इंद्र के सखा हैं. (७) अग्ने पृतनाषाट् पृतनाः सहस्व. पुनः कृत्यां कत्याकृते प्रतिहरणेन हरामसि.. (८) हे राक्षसों की सेना का सामना करने वाले अग्नि देव! तुम इन सेनाओं का सामना करो. हम इस कृत्या को कृत्या के प्रेरक की ओर ही वापस लौटा रहे हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
कृत्यव्यधनि विध्य तं यश्चकार तमज्जहि. न त्वामचकृषे वयं वधाय सं शिशीमहि.. (९) हे संहार का साधन कृत्या! जिस ने तेरा निर्माण किया है, तू उसी का छेदन कर के मार डाल. जिस ने तेरा निर्माण नहीं किया है, उस के वध के निमित्त हम तुझे शक्तिशालिनी नहीं बनाते. (९) पुत्र इव पितरं गच्छ स्वज इवाभिष्ठितो दश. बन्धमिवावक्रामी गच्छ कृत्ये कृत्याकृतं पुनः.. (१०) हे कृत्या! जिस प्रकार पुत्र पिता के पास जाता है, उसी प्रकार तू अपने उत्पत्तिकर्ता के समीप जा. दबने पर जिस प्रकार सांप काट लेता है, उसी प्रकार तू उसे डस ले, जिस ने तुझे बनाया है. जिस प्रकार टूटा हुआ बंधन अपने ही शरीर पर गिरता है, उसी प्रकार तू कृत्याकर्ता के पास लौट जा. (१०) उढेणीव वारण्यभिस्कन्दं मृगीव. कृत्या कर्तारमृच्छतु.. (११) कृत्या इस प्रकार अपने निर्माणकर्ता के पास जाए, जिस प्रकार ऐणी नाम की हिरनी, हथिनी और मृगी शीघ्रता से झपटती है. (११) इष्वा ऋजीयः पततु द्यावापृथिवी तं प्रति. सा तं मृगमिव गृह्णातु कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (१२) कृत्या अपने निर्माण कर्ता की ओर उस के प्रतिकूल आचरण करती हुई अग्नि के समान जाए. जैसे किनारे को काट कर गिराता हुआ जल का वेग मिलता है अथवा रथ जिस प्रकार सरलता से मुड़ जाता है, उसी प्रकार कृत्या अपने निर्माणकर्ता से मिले. (१२) अग्निरिवैतु प्रतिकूलमनुकूलमिवोदकम्. सुखो रथ इव वर्ततां कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (१३) अग्नि की तरह कृत्याकारी से प्रतिकूल आचरण करती हुई वह कृत्या उस के पास पहुंचे. जिस प्रकार पानी किनारों को काटता हुआ बढ़ता है उसी प्रकार वह कृत्या कृत्याकारी के अनुकूल हो कर उस के पास पहुंचे. वह कृत्या सुखकारी रथ के समान कृत्याकारी के पास पुनः चली आए. (१३) सूक्त-१५ देवता—मधुला ओषधि एका च मे दश च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे यज्ञ के निमित्त उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे एक और दस अर्थात् ग्यारह हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना. क्योंकि तू मधुर है. (१) द्वे च मे विंशतिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (२) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे दो और बीस अर्थात् बाईस हों, परंतु तू मेरे शब्दों को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (२) तिस्रश्च मे त्रिंशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (३) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे तीन और तीस अर्थात् तैंतीस हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (३) चतस्रश्च मे चत्वारिंशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (४) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे चार और चालीस अर्थात् चवालीस हों, परंतु तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (४) पञ्च च मे पञ्चाशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (५) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे पांच और पचास अर्थात् पचपन हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (५) षट् च मे षष्टिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (६) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे छः और साठ अर्थात् छियासठ हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (६) सप्त च मे सप्ततिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (७) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे सात और सत्तर अर्थात् सतहत्तर हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (७) अष्ट च मे ऽ शीतिश्च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले आठ और अस्सी अर्थात अट्ठासी हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (८) नव च मे नवतिश्च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (९) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे नौ और नब्बे अर्थात् निन्यानवे हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (९) दश च मे शतं च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (१०) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे दस और सौ अर्थात एक सौ दस हों, परंतु तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (१०) शतं च मे सहस्रं चापवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (११) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे सौ और हजार अर्थात् ग्यारह सौ हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (११) सूक्त-१६ देवता—एक वृष यद्येकवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (१) हे लवण! यदि तू एक वृषभ अर्थात् बैल के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर, अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (१) यदि द्विवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (२) हे लवण! यदि तू दो बैलों के समान शक्तिशाली है तो इस गाय को संतान वाली बना, अन्यथा तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (२) यदि त्रिवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (३) हे लवण! यदि तू तीन बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर, अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (३) यदि चतुर्वृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (४) हे लवण! यदि तू चार बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय को संतान वाली बना, ebook converter DEMO Watermarks*