भारतकोश
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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३९७

एवं शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक ओर शुद्ध मीठा तेलिया ये प्रत्येक चार चार मासें लेवे । सबको एकत्र मिलाकर नींबूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको क्षय, संग्रहणी, अजीर्ण और शूलादि रोगोंमें सेवन करना चाहिये ॥ २६ ॥

द्वितीय-शङ्खवटी । सार्द्धकर्षं रसेन्द्रस्य गन्धकस्य तथैव च । विषं कर्षत्रयं दद्यात्सर्वतुल्यं मरीचकम् ॥ २७ ॥ दग्धशङ्खं च तत्तुल्यं पञ्चकर्षाणि नागरात् । स्वर्जिकारामठकणासिन्धुसौवर्चलं विडम् ॥ २८ ॥ सामुद्रमौद्भिदं चैव भावयेन्निम्बुकद्रवैः । वटी ग्रहण्यम्लपित्तशूलघ्नी वह्निदीपनी ॥ वह्निमान्द्यकृतान् रोगान् सामदोषं विनाशयेत् ॥ २९ ॥

शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक प्रत्येक डेढ़ कर्ष लेकर कज्जली करलेवे । फिर शुद्ध मीठा तेलिया ३ कर्ष और सबके बराबर काली मिरचोंका चूर्ण, शंखभस्म कालीमिरचोंके बराबर, सोंठका चूर्ण ५ कर्ष एवं सज्जी, हींग, पीपल, सैंधानमक, कालानमक, विरियासंचर नमक, समुद्रीनमक और रेह ये प्रत्येक पांच पांच कर्ष लेवे। सबको निम्बूके रसमें खरल करके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह शंखवटी संग्रहणी, अम्लपित्त, शूल, आमदोष, मन्दाग्नि तथा तज्जन्य विकार इन सबको दूर करती है और अग्निको दीपन करती है ॥ २७-२९ ॥

तृतीय-बृहच्छङ्खवटी । द्वौ क्षारौ रसगन्धकौ सलवणौ व्योषं च तुल्यं विषं चिञ्चाशङ्कचतुर्गुणं रसवरैर्लिम्पाकजातैः कृतम् । वारं वारमिदं सुपाकरचितं लोहं क्षिपेद्धिङ्गुके भृष्टं वङ्गसमं सुमर्दितमिदं गुञ्जाप्रमाणा भवेत् ॥ ३० ॥ ख्याता शङ्खवटी महाग्निजननी शूलान्तकृत् पाचनी । कासश्वासविनाशिनी क्षयहरी मन्दाग्निसन्दीपिनी । वातव्याधिमहोदरादिशमनी तृष्णामयोच्छेदिनो सर्व्वव्याधिविनाशिनी कृमिहरी दुष्टामयध्वंसिनी ॥ ३१ ॥

३९८भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

जवाखार, सज्जी, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सेंधानमक, विरियासंचर नमक, सोंठ, पीपल, मिरच, और शुद्धमीठा तेलिया यह प्रत्येक १-१ तोला एवं इमलीका क्षार ४तोले और शंखभस्म ४ तोले सबको एकत्र मिलाकर नीम्बूके रसमें खरल करे । फिर उसमें लोहभस्म, घीमें भुनी हुई हींग और वंगभस्म प्रत्येक एक एक तोला मिलाकर अच्छे प्रकारसे खरलकर १-१ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह शंखवटी जठराग्निकी अत्यन्त वृद्धि करनेवाली, शूलको नष्ट करनेवाली, पाचन शक्तिको बढ़ानेवाली एवं श्वास, खाँसी, क्षय, मन्दाग्नि, वातरोग, उदरके भयंकर रोग, तृषा कृमि रोग, दुष्टव्याधि तथा अन्यान्य सर्वप्रकारके रोगोंको नष्ट करनेवाली है ॥ १३० ॥ १३१ ॥

चतुर्थ-शंखवटी और महाशंखवटी ।

दग्धशङ्खस्य चूर्णं स्यात्तथा लवणपञ्चकम् ।
तिन्तिडीक्षारकं चैव कटुकत्रयमेव च ॥ ३२ ॥
तथैव हिङ्गुकं ग्राह्यं विषं पारदगन्धकम् ।
अपामार्गस्य वन्हेश्च क्वाथैर्लिम्पाकजै रसैः ॥ ३३ ॥
भावयेत् सर्वचूर्णं तदम्लवर्गैर्विशेषतः ।
यावत्तदम्लतां याति गुटिकाऽमृतरूपिणी ॥ ३४ ॥
सद्यो वह्निकरी चैव भस्मकं च नियच्छति ।
भुक्त्वाऽऽकण्ठं तु तस्यान्ते खादेच्च गुटिकामिमाम् ॥
तत्क्षणाज्जरयत्याशु पुनर्भेजनमिच्छति ॥ ३५ ॥

शंखभस्म, पाँचोंनमक, इमलीका क्षार, त्रिकटु, हींग, शुद्ध मीठातेलिया, शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर चिरचिटेके क्वाथ, चीतेकी जडके क्वाथ और नींबूके रसमें तथा विशेषकर अम्लवर्गके रसमें (जबतक खट्टापन उत्पन्न न हो तबतक) खरल करे फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह अमृतरूपी वटी तत्काल अग्निको दीपन करती है और भस्मक रोगको दूर करती है । कण्ठपर्यन्त भोजन करनेपर भी इस गोलीको खावे तो यह वटी तत्क्षण सम्पूर्ण अन्नको पचा देती है और सर्वप्रकारके अजीर्णको नष्ट करती है ॥ ३२-३५ ॥

ज्वरं गुल्मं पाण्डुरोगं कुष्ठं शूलं प्रमेहकम् ॥ ३६ ॥
वातरक्तं महाशोथं वातपित्तकफानपि ।
दुर्नामारियं चाशु दृष्टो वारसहस्रशः ॥ ३७ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३९९

निर्मूलं दह्यते शीघ्रं तूलकं वह्निना यथा । लौहवङ्गयुता सेयं महाशङ्खवटी स्मृता ॥ ३८ ॥ प्रभाते कोष्णतोयानुपानमेव प्रशस्यते ॥ ३९ ॥

एवं ज्वर, गुल्म, पाण्डुरोग, कुष्ठ, शूल, प्रमेह, वातरक्त, अत्यन्त सूजन, वात-पित्तकफके विकार और बवासीर इन सब व्याधियोंको समूल नष्ट करदेती है, जैसे अग्निके द्वारा रूई तत्काल भस्म होजाती है। ऐसा हजारों बार देखागया है। यदि इसमें लोहभस्म और वंगभस्म मिलादीजाय तो यही वटी महाशंखवटी कहलाती है। प्रातःकालमें मन्दोष्णजलके अनुपानसे इस वटीको सेवन करना चाहिये॥ ३६–३९ ॥

-" जम्बीरं बीजपूरं च मातुलुङ्गञ्चचुक्रकम् । चाङ्गेरी तिन्तिडी चैव बदरी करमर्दकम् ॥ अष्टावम्लस्य वर्गोऽयं कथितो मुनिसत्तमैः" ॥ १४० ॥

“ जम्बीरीनींबू, बिजौरानींबू, मातुलुङ्ग, चकोतराके चुका, नोनिया, इमली, बेर और करोंदा इन आठ अम्लपदार्थोंको मुनियोंने अम्लवर्ग कहा है” ॥ १४० ॥

पंचम-महाशंखवटी ।

पटुपञ्चकहिङ्गुशङ्खचिञ्चाभसितव्योषबलारसा- मृतानि । शिखिशैखरिकाम्लवर्गनिम्बु भृश- भाव्यानि यथाऽम्लतां व्रजन्ति ॥ ४१ ॥ महाशंखवटी ख्याता भोजनान्ते प्रकीर्तिता । दीपनी परमा हन्ति महार्र्शोग्रहणीमुखान् ॥ ४२ ॥

पाँचोंनमक, हींग, शंखभस्म, इमलीका क्षार, सोंठ, पीपल, मिरच, शुद्ध गन्धक शुद्ध पारा और शुद्ध मीठा तेलिया इन सबको समान भाग लेकर चीतेके क्वाथ चिरचिटेके क्वाथ, अम्लवर्गकी औषधियोंके रस और नीम्बूके रसमें (जबतक उसमें खट्टापान न आजाय तबतक) उत्तम प्रकारसे खरल करके पश्चात् १-१ रत्तीकी गोलियाँ बनाकर भोजन करनेके पश्चात् इसे एक एक गोलीकी मात्रास सेवन करना चाहिये । एय अत्यन्त अग्निवर्द्धक एवं अर्श, ग्रहणी आदि दुस्तर रोगोंको नष्ट करती है ॥ ४१–४२ ॥

षष्ठ-महाशंखवटी ।

कणामूलं वह्निदन्ती पारदं गन्धकं कणा । त्रिक्षारं पञ्चलवणं मरिचं नागरं विषम् ॥ ४३ ॥

४००भैषज्यरत्नावली ।अग्निमान्द्य-

अजमोदाऽमृता हिङ्गु क्षारं तिन्तिडिकाभवम् ।
संचूर्ण्य समभागं तु द्विगुणं शङ्खभस्मकम् ॥
अम्लद्रवेण सम्भाव्य वटी कोलास्थिसम्मिता ॥ ४४ ॥

पीपलामूल, चीता, दन्तीकी जड, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, पीपल, जवाखार, सज्जी, सुहागा, पाँचों नमक, मिरच, सोंठ, शुद्ध मीठा तेलीया, अजमोद, गिलोय, हींग और इमलीकी क्षार ये प्रत्येक एकएक तोला एवं शङ्खभस्म दो तोले, लेवे । सबको एकत्र मिलाकर अम्लवर्गकी औषधियोंके रसमें पृथक् २ भावना देकर बेरकी गुठलीके बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ ४३ ॥ ४४ ॥

अम्लदाडिमतोयेन लिम्पाकस्वरसेन च ॥ ४५ ॥
भक्षयेत् प्रातरुत्थाय नाम्ना शङ्खवटी शुभा ।
तक्रमस्तुसुरासीधुकाञ्जिकोष्णोदकेन वा ॥ ४६ ॥
शशैणादिरसेनेव रसेन विविधेन च ।
मन्दाग्निं दीपयत्याशु वडवाग्निसमप्रभम् ॥ ४७ ॥
अर्शोसि ग्रहणीरोगं कुष्ठं मेहभगन्दरम् ।
प्लीहानमश्मरीं श्वासं कासं मेहोदरं कृमीन् ॥ ४८ ॥
हृद्रोगं पाण्डुरोगंच विबद्धानुदरे स्थितान् ।
तान् सर्वान् नाशयत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ४९ ॥

इस महाशंखवटी नामसे प्रसिद्ध उत्तम औषधिको प्रतिदिन प्रातःकाल खट्टे अनारके रस, जम्भीरी नींबूके रस, मठा, दहीका तोड, मदिरा, सिरका, काँजी अथवा गरमजल इनमेंसे किसी एक अनुपानके साथ सेवन करे, एवं खरगोश व कृष्णमृग आदिके मांसरेसके अथवा अन्यान्य विविध प्रकारके रसोंके साथ सेवन करे तो यह मन्दाग्निको वडवानलकी समान तत्काल दीपन करती है तथा अर्श, ग्रहणी, कुष्ठ, मेह, भगन्दर, तिल्ली, पथरी, श्वास, खाँसी, उदररोग, कृमिरोग, हृदयरोग, पाण्डुरोग, मलविबन्ध इन सब रोगोंको इस प्रकार नष्ट करदेती है, जैसे सूर्यका प्रकाश अन्धकारको ॥ ४५-४९ ॥

वज्रक्षार ।

स्वार्जिः सौवर्चलं ग्राह्यं प्रत्येकं शाणमानतः ।
यवक्षारस्य शुद्धस्य पलार्द्धं परिकल्पयेत् ॥
स्थापयित्वाऽऽयसे पात्रे स्वेदयेन्मृदुनाऽग्निना ॥ १५० ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४०१


द्रुत तच्चालयेत् प्राज्ञः प्रस्तरे भाजने शुभे ।
दद्याद्रक्तिद्वयं वारि वारिदस्वरसादिभिः ।
अग्निमान्द्यमजीर्णं च शूलानाहोदरामयान् ॥ ५१ ॥
अम्लपित्तं तथाऽऽध्मानं विष्टम्भं गुल्ममेव च ।
वज्रक्षारो निहन्त्याशु शक्रवज्रो यथा तरुम् ॥ ५२ ॥

सज्जी चार मासे, कालानमक चार मासे और शुद्ध जवाखार २ तोले इनको लोहेके बर्त्तनमें रखकर मन्द मन्द अग्निसे गलाकर पत्थरके बर्त्तनमें डालकर पर्पटी तैयार करलेवे। इनको दो दो रत्तीकी मात्रासे शीतलजल अथवा नागरमोथेके स्वरसके साथ सेवन करनेसे यह वज्रक्षार अग्निमान्द्य, अजीर्ण, शूल, आनाह, उदर-रोग, अम्लपित्त, अफारा, विबन्ध, गुल्मप्रभृति विविधप्रकारके रोगोंको नष्ट करता है ॥ १५०-५२ ॥

क्रव्यादरस ।

पलं रसस्य द्विपलं बलेः स्याच्छुल्बायसी चार्द्धपलप्रमाणे ।
विचूर्ण्य सर्वं द्रुतवह्नियोगादेरण्डपत्रेऽथ निवेशनीयम् ॥ ५३ ॥
कृत्वाऽथ तां पर्पटिकां विदध्याल्लौहस्य पात्रे वरपूतमा मन् ।
जम्बीरजं पक्वरसं पलानि शतं नियोज्याग्निमथल्पमल्पम् ॥
जीर्णे रसे भावितमेतदेतैः सुपञ्चकोलोद्भववारिपूरैः ।
सेवेत साम्लैः शतमत्र देयं समं रजष्टङ्कणजं सुभृष्टम् ॥५५॥
विडं तदर्द्धं मरिचं समं च तत्सप्तधाऽऽर्द्रं चणकाम्लकेन ।
क्रव्यादनामा भवति प्रसिद्धो रसस्तु मन्थानकभैरवोक्तः ॥५६॥

शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले, ताम्रभस्म २ तोले और लोहभस्म २ तोले इन सबको एकत्र चूर्ण करके लोहेकी कडाहीमें डालकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब अच्छे प्रकारसे पाक होजाय तब अण्डके पत्तेपर लोटकर उसकी पर्पटी बनालेवे । फिर उस पर्पटीको जम्बीरीनींबूके १०० पल रसमें धीरे धीरे पकावे । जब सब रस सूखजाय तब पञ्चकोलके क्वाथ सौ पल और अम्लवेतके सौपल क्वाथको पृथक् पृथक् डालकर भावना देवे । पश्चात् सुहागेकी खील १६ तोले, विरियासंचर नमक ८ तोले और कालीमिरचोंका चूर्ण ४० तोले मिलाकर भीगे हुए चनोंके खारके पानीमें सातबार भावना देवे तो यह मन्थानक भैरवका कहा हुआ क्रव्यादनामवाला प्रसिद्ध रस सिद्ध होता है ॥ ५३–५६ ॥

२६

४०२भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

माषद्वयं सन्धवतक्रपीतमेतत् सुधन्यं खलु भोजनान्ते।
गुरूणि मांसानि पयांसि पिष्टं घृतानि सेव्यानि फलानि चैव ॥
मात्रातिरिक्तान्यपि सेवितानि यामद्वयाज्जारयति प्रसिद्धः॥ ५७
कार्श्यस्थौल्यनिबर्हणो गरहरः सामातिनिर्णाशनो
गुल्मप्लीहजलोदरादिशमनः शूलार्त्तिशूलापहः ।
वातश्लेष्मनिबर्हणो ग्रहणिकातीसारविध्वंसनो
वातग्रन्थिमहोदरापहरणः क्रव्यादानामा रसः ॥ ५८ ॥

इस रसको दो दो माशेकी मात्रासे भोजनके बाद सैंधानमक और तक्रके साथ सेवन करे इसपर गुरुपाकी पदार्थ, मांस, दूध पिष्ट ( मैदा व पिठ्ठीके बने पदार्थ ), घृत और फल इनका सेवन करना हितकारी है। यदि मात्रासे अधिक भोजन करलिया जाय तो उसको भी यह प्रसिद्ध रस दो प्रहरमेंही पचा देता है तथा कृशता, स्थूलता, विषविकार, आमदोष, गुल्म, प्लीहा, जलोदर, शूलकी पीड़ा, शूल वातकफजन्य रोग, ग्रहणी, अतिसार, वातजग्रन्थि और भयंकर उदररोग इन सबको यह रस शीघ्र नष्ट करताहै ॥५७-५८॥

विश्वोदीपकाभ्र ।

अभ्रं निर्मलमारितं पलमितं चूर्णीकृतं यत्नत-
श्रव्यं चित्रकमिन्द्रसूरकनकं मालूरपत्राद्रकम् ।
मूलं पिप्पलिसम्भवं मधुरिका नीपोर्कमूलं पृथक्
चैषां सत्त्वपलैर्विमर्दितमिदं कर्षं क्षिपेद्दङ्गणम् ॥ ५९ ॥
गुञ्जासम्मितमेतदेव वलितं तत्पारिभद्रद्रवै-
र्मन्दाग्निं चिरजातगुल्मनिचयं शूलाम्लपित्तं ज्वरम् ।
छर्दिं दुष्टमसूरिकामलसकं श्वासं च कासं तृषां
प्लीहानं यकृतं क्षयंस्वरहतं कुष्ठं महारोचकम् ॥ ६० ॥
दाहं मोहमशेषदोषजनितं कृच्छ्रं च दुर्नामकं
ह्यामं वातविमिश्रितं नयनजं रोगं समुन्मूलयेत् ।
विश्वोदीपकनाम रोगहरणे प्रोक्तं पुरा शम्भुना
सर्वेषां हितकारकं गदवतां सर्वामयध्वंसनम् ॥
पाषाणं यदि भक्षितं तदपि तत्कुर्यात् सुजीर्णं पुन-
र्बल्यं वृष्यतरं रसायनवरं मेधाकरं कान्तिदम् ॥ ६१ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४०३


शुद्ध अभ्रकभस्म ४ तोले, चव्य ४ तोले एवं चीता, सिह्लारू, धतूरा, बल और अदरखका रस ३ तोले, एवं पीपलामूल, सौंफ, कदम्ब और आककी जड इन प्रत्येकका क्वाथ चारचार तोले लेवे । सबको पृथक् २ खरलमें डालकर मर्दन करे । फिर उसमें एक कर्ष सुहागा मिलाकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसें प्रतिदिन एकएक गोली फरहदके रसके साथ सेवन करे तो यह रस मन्दाग्नि, बहुत पुराना गुल्म, शूल, अम्लपित्त, ज्वर, वमन, दुष्ट मसूरिका, अलसक, श्वास, खाँसी तृषा, प्लीहा, यकृत्, क्षय, स्वरभंग, कुष्ठ, अरुचि, दाह, मोह, समस्त दोषोत्पन्न मूत्रकृच्छ्र, बवासीर, आमवात और नेत्ररोग इन सबको समूल नष्ट करदेता है । इस विश्वोदीपकनामवाले अभ्रकको सर्व प्रकारके रोगोंको हरनेके लिये पूर्वकालमें शिवजीने कहा है । यह समस्त रोगियोंके लिये हितकारी और सम्पूर्ण रोगोंका नाश करनेवालाहै । अतिसारकोभी पचादेता है तथा बलकारक, अत्यन्त वीर्यवर्द्धक, उत्तम रसायन एवं बुद्धि और शरीरकी कान्तिको बढाता है ॥ १५९-१६१ ॥

वीरभद्राभ्रक ।

अभ्रकं पुटसहस्रमारितं कर्षयुग्ममतिनिर्मलीकृतम् ।
वासराणि नवतिं विमर्दितं चित्रकस्वरससाधुसिक्तकम् ॥ ६२ ॥
शृङ्गवेररसमर्दिता वटी कारिता सकलरोगनाशिनी ।
भक्षिता भुजगवल्लिपत्रकैः शृङ्गवेरशकलेन वा पुनः ॥ ६३ ॥
वह्निमान्द्यमभिनाश्य सत्वरं कारयेत् प्रखरपावकोत्करम् ।
श्वासकासवमिशोथकामलाप्लीहगुल्मजठरारुचिभ्रमान् ॥ ६४ ॥
रक्तपित्तयकृदम्लपित्तकं शूलकोष्ठजगदान् विषूचिकाम् ।
आमवातमथ वातशोणितं दाहशीतबलह्रासकार्श्यकम्॥ ६५ ॥
विद्रधिं ज्वरगदं शिरोगदं नेत्ररोगमखिलं हलीमकम् ।
हन्ति वृष्टयममेतदभ्रकं वीरभद्रमतिबल्यमुत्तमम् ॥
भक्षितं विविधभक्ष्यमानलं काष्ठसङ्घमिव भस्मतां नयेत् ६६

उत्तम सहस्रपुटित अभ्रकको दो कर्ष लेकर चीतेके रसमें ९० दिनतक उत्तम प्रकारसे खरल करे । फिर अदरखके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह वटी सर्वप्रकारके रोगोंको नाश करनेवाली है । इस वटीको पानके साथ अथवा अदरखके टुकडोंके साथ सेवन करनेसे मन्दाग्नि, श्वास, खाँसी आदि

४०४भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

उल्लिखित सभी रोग शीघ्र नष्ट होते हैं। यह वीरभद्र नामक अभ्रक अत्यन्त वृष्य और बलकारक है इसके सेवनसे अनेक प्रकारके भारीसे भारी भक्ष्यपदार्थ भस्म होजाते हैं ॥ ६२–६६ ॥

लवङ्गाद्यमोदक ।

लवङ्गं पिप्पली शुण्ठी मरिचं जीरकद्वयम् ।
केशरं तगरं चैव एला जातीफलं तुगा ॥ ६७ ॥
कट्फलं तेजपत्रं च पद्मबीजं सचन्दनम् ।
कक्कोलमगुरुश्चैव उशीरमभ्रकं तथा ॥ ६८ ॥
कर्पूरं जातिकोषं च मुस्तं मांसी यवस्तथा ।
धान्यकं शतपुष्पा च लवङ्गं सर्वतुल्यकम् ॥ ६९ ॥
सर्वचूर्णद्विगुणितां शर्करां विनियोजयेत् ।
सर्वरोगं निहन्त्याशु अम्लपित्तं सुदारुणम् ॥ ७० ॥
अग्निमान्द्यमजीर्णं च कामलापाण्डुरोगनुत् ।
[ “बलपुष्टिकरं चैव विशेषात् शुक्रवर्द्धनम् ॥ ७१ ॥
ग्रहणीं सर्वरूपां च अतीसारं सुदुर्जयम् ।
अश्विभ्यां निर्मितं हन्ति लवङ्गाद्यमिदं शुभम्” ॥ ७२ ॥ ]

लौंग, पीपल, सोंठ, मिरच, जीरा, कालाजीरा नागकेशर, तगर, छोटी इलायची जायफल, वंशलोचन, कायफल, तेजपात, कमलगट्टा, लालचन्दन, शीतलचीनी, अगर, खस, अभ्रकभस्म, कपूर, जावित्री नागरमोथा, बालछड, इन्द्रजौ, धनियाँ और सोया इन प्रत्येकका चूर्ण समान भाग और समस्त चूर्णकी बराबर लौंगका चूर्ण सबको एकत्र मिलाकर फिर सब चूर्णसे दुगुनी मिश्री लेवे । प्रथम मिश्रीको पकाकर उत्तम विधिसे चासनी बनाकर औषधियोंमें उपरोक्त औषधियोंका समस्त चूर्ण मिलाकर घी और मधुके योगसे मोदक प्रस्तुत करलेवे । ये मोदक अम्लपित्त मन्दाग्नि, अजीर्ण, कामला, पाण्डुरोग, सर्वप्रकारकी ग्रहणी, अतिसार आदि रोगोंको नष्ट करतेहैं ॥ ६७–७२ ॥

सुकुमारमोदक ।

पिप्पली पिप्पलीमूलं नागरं मरिचं शिवा ।
धात्री चित्रकमभ्रं च गुडूची कटुरोहिणी ॥ ७३ ॥

[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४०५


प्रत्येकमेषां कर्षीशं चूर्णं दन्त्यास्त्रिकार्षिकम् ।
द्विपलं त्रिवृताचूर्णं शर्करायाः पलत्रयम् ॥ ७४ ॥
मधुना मोदकं कार्यं सुकुमारकमोदकम् ।
वाताजीर्णप्रशमनं विष्टम्भे परमौषधम् ॥
उदावर्त्तानाहहरं सर्वाजीर्णविनाशनम् ॥ ७५ ॥

पीपल, पीपलामूल, सोंठ, मिरच, हरड, आमला, चीतेकी जड, अभ्रकभस्म, गिलोय और कुटकी प्रत्येक औषधिका चूर्ण एक एक कर्ष, दन्तीकी जडका चूर्ण ३ कर्ष, निसोतका चूर्ण ८ तोले और मिश्री १२ तोले सबको एकत्र विधिपूर्वक पकाकर घी और शहदके योगसे लड्डू बनालेवे । ये सुकुमारनामवाले मोदक वात, अजीर्ण, विष्टम्भ, उदावर्त्त, आनाह और सर्वप्रकारके अजीर्णोंमें उत्तम औषधिहै ७३-७५ ।

त्रिवृदादिमोदक ।

त्रिवृद्दन्तीकणामूलं कणा वह्निः पलं पलम् ।
सर्वतुल्याऽमृता शुण्ठी गुडेन सह मोदकम् ॥
कर्षैकं भक्षयेन्नित्यं दीप्ताग्निं कुरुते क्षणात् ॥ ७६ ॥

नसोत, दन्तीकी जड, पीपलामूल, पीपल और चीतेकी जड ये चारचार तोले एवं गिलोयका और सोंठका चूर्ण बीस २० तोले सबको एकत्र चूर्ण करके गुडकें साथ मिलाकर एक एक कर्षके लड्डू बनाकर प्रतिदिन सेवन करे । ये मोदक अग्निको तत्क्षण दीपन करते हैं ॥ ७६ ॥

हरीतकीप्रयोग ।

हरीतक्याः शतं ग्राह्यं तकैः स्विन्नं च कारयेत् ।
यत्नाद् बीजं समुद्धृत्य चूर्णानीमानि पूरयेत् ॥ ७७ ॥
षडूषणं पञ्चकटु यमानीद्वयमेव च
त्रिक्षारं हिङ्गु दिव्यं च कर्षद्वयमितं पृथक् ॥ ७८ ॥
श्लक्ष्णचूर्णीकृतं सर्वं चुक्राम्लेनापि भावयेत् ।
लिम्पाकस्वरसेनापि भावयेच्च दिनत्रयम् ॥ ७९ ॥
खादयेदभयामेकां सर्वाजीर्णविनाशनम् ।
चतुर्विधमजीर्णं च वह्निमान्द्यं विषूचिकाम् ॥
गुल्मशूलादिरोगांश्च नाशयेदविकल्पतः ॥ १८० ॥

४०६भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

बडीबडी १०० हरडोंको लेकर मट्ठेमें भिगोदेवे। जब अच्छे प्रकारसे वे फूल जाय तब उनकी गुठलियाँ निकालडाले। फिर पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड, सोंठ, मिरच, पाँचोंनमक, अजवायन, अजमोद, जवाखार, सज्जी, सुहागा, हींग और लौंग इन प्रत्येक औषधिके दो दो कर्ष परिमाण लेकर बारीक पीसकर भरदेवे। पश्चात् उन हरडोंको चूकेके रसमें और जम्बीरी नीम्बूके रसमें तीन तीन दिनतक भावना देवे। इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक हरड खानेसे सर्व प्रकारका अजीर्ण दूर होता है। यह हरीतकीप्रयोग चारों प्रकारके अजीर्ण, मन्दाग्नि, विषूचिका, वायुगोला, शूल प्रभृति रोगोंको निश्चय नष्ट करता है ॥ १७७-१८० ॥

अमृता-हरीतकी ।

तक्रे समुत्स्वेद्य शिवाशतानि तद्वीजमुद्धृत्य च कौशलेन ।
षडूषणं पञ्च पटूनि हिङ्गु क्षारावजाजीमजमोदकं च ॥ ८१ ॥
षडूषणास्त्रिवृदद्धभागा गणस्य देया स्वरगालितस्य ।
विभाव्य चुक्रेण रजांस्यमीषां क्षिपेच्छिवाबीजनिवासगर्भे ८२
समूह्य घर्मे च विशोष्य तासां हरीतकीमन्यतमां निषेवेत ।
अजीर्णमन्दानलजाठरामयान सगुल्मशूलग्रहणीगुदाङ्कुरान् ॥
विबन्धमानाहरुजौ जयत्यसौतथामवातांस्त्वमृताहरीतकी ८४

बडी बडी सौ हरडोंको मट्ठेमें उबालकर उनकी गुठलियोंको निकाल डाले। फिर सोंठ, पीपल, मिरच, पीपलामूल, चव्य, चीता, पाँचोंनमक, हींग, जवाखार, सज्जी, कालाजीरा और अजमोद इन सबका चूर्ण दो दो तोले एवं निसोतका चूर्ण १ तोला लेवे। इन सब औषधियोंके चूर्णको चूकेके द्वारा भावना देकर उक्त हरडोंमें भरदेवे और उनको धूपमें सुखाकर रखदेवे। उनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक हरड भक्षण करे तो यह अमृता-हरीतकी अजीर्ण, मन्दाग्नि, उदरविकार, गुल्मशूल, ग्रहणी, बवासीरके अंकुर, मलविबन्ध और आनाह इन समस्त रोगोंको शीघ्र दूर कर देती है ॥ ८१-८४ ॥

शार्दूलकाञ्जिक ।

पिप्पलीं शृङ्गवेरं च देवदारु सचित्रकम् ।
चविकां बिल्वपेशीं च अजमोदं हरीतकीम् ॥ ८५ ॥
महौषधं यमानीं च धान्यकं मरिचं तथा ।
जीरकं चापि हिङ्गुं च काञ्जिकं साधयेद्भिषक् ॥ ८६ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४०७

पीपल, अदरख, देवदारु, चीतेकी जड, चव्य, बेलगिरी, अजमोद, हरड, सोंठ, अजवायन, धनियां, मिरच, जीरा ये प्रत्येक औषधि समान भाग और सम्पूर्ण चूर्णको अष्टमांश सबको अठगुनी हींग काँजी और काँजीसे चौगुने जलमें मिलाकर पकावे और जब पककर कांजीमात्र शेष रह जाय तब उतारकर छान लेवे ॥८५॥८६॥

एष शार्दूलको नाम काञ्जिकोऽग्निबलप्रदः ।
सिद्धार्थतैलसम्भृष्टो दशरोगान् व्यपोहति ॥ ८७ ॥
कासं श्वासमतीसारं पाण्डुरोगं सकामलम् ।
आमं च गुल्मरोगं च वातशूलं सवेदनम् ॥ ८८ ॥
अर्शोसि श्वयथुं चैव भुक्ते पीते च सात्म्यतः ।
क्षीरपाकविधानेन काञ्जिकस्यापि साधनम् ॥ ८९ ॥

यह शार्दूलनामक काँजी अत्यन्त अग्निको बढानेवाली है। इसको सफेद सरसोंके तेलमें बघारकर अग्निके बलानुसार सेवन करनेसे यह खाँसी, श्वास, अतिसार, पाण्डु रोग, कामला, आम, गुल्मरोग, अत्यन्त वेदनायुक्त वातशूल, अर्श, शोथ आदि रोगोंको दूर करती है। इसको भोजन करके पान करना चाहिये ॥ ८७-८९ ॥

मुस्तकारिष्ट ।

मुस्तकस्य तुलाद्वन्द्वं चतुर्द्रोणेऽम्बुनः पचेत् ।
पादशेषे रसे तस्मिन् क्षिपेद् गुडतुलात्रयम् ॥ ९० ॥
धातकीं षोडशपलां यमानीं विश्वभेषजम् ।
मरिचं देवपुष्पं च मेथीं वह्निं च जीरकम् ॥ ९१ ॥
पलयुग्ममितं क्षित्वा रुद्ध्वा भाण्डे निधापयेत् ।
संस्थाप्य मासमात्रं तु ततः संस्रावयेद्भिषक् ॥ ९२ ॥
अजीर्णमग्निमान्द्यं च विषूचीमपि दारुणाम् ।
ग्रहणीं विविधां हन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ ९३ ॥

नागरमोथा २०० पल लेकर चार द्रोण परिमाण जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उस क्वाथमें गुड ३०० पल, धायके फूल १६ पल, एवं अजवायन, सोंठ, मिरच, लौंग, मेथी, चीतेकी जड और जीरा ये प्रत्येक आठ आठ तोले एवं इन सब औषधियोंका एकत्र चूर्ण करके

४०८ | भैषज्यरत्नावली | [ अग्निमान्द्य-

मिलादेवे। पश्चात् उसको एक उत्तम मिट्टीके चिकने पात्रमें भरकर उसके मुँहको अच्छे प्रकारसे बन्दकरके रखदेवे। एक महीनेतक रक्खा रहनेके बाद निकालकर उसको वस्त्रमें छानलेवे। फिर इसको अग्निके बलानुसार सेवन करे तो यह मुस्तकारिष्ट अजीर्ण, मन्दाग्नि, दारुण विषूचिका, विविध प्रकारकी संग्रहणी आदि रोगोंको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥ १९०–९३ ॥

चित्रकगुड ।

नासारोगे विधातव्या या चित्रकहरीतकी ।
विना धात्रीरसं सोऽस्मिन् प्रोक्तश्चित्रगुडोऽग्निदः ॥९४॥

नासारोगमें जो चित्रक हरीतकी नामक औषधि कहीगई है। उसमें यदि आमलोंका रस न डाला जाय तो वह ही चित्रकगुड होजाता है ऐसा आयुर्वेदाचार्योंने कहा है। यह चित्रकगुड अत्यन्त अग्निप्रदीपक हैं ॥ ९४ ॥

क्षारगुड ।

द्वे पञ्चमूले त्रिफलामर्कमूलं शतावरीम् ।
दन्तीं चित्रकमास्फोटां रास्त्रां पाठां सुधां शठीम् ॥९५॥
पृथग् दशपलान् भागान् दग्ध्वा भस्म समावपेत् ।
त्रिःसप्तकृत्वस्तद्भस्म जलद्रोणे च गालयेत् ॥ ९६ ॥
तद्रसं साधयेदग्नौ चतुर्भागावशेषितम् ।
ततो गुडतुलां दत्त्वा साधयेन्मृदुनाऽग्निना ॥ ९७ ॥
सिद्धं गुडं तु विज्ञाय चूर्णानीमानि दापयेत् ।
वृश्चिकाली द्विकाकोल्यौ यवक्षारं समावपेत् ॥ ९८ ॥
एते पंचपला भागाः पृथक् पञ्च पलानि च ।
हरीतकीं त्रिकटुकं स्वर्जिकां चित्रकं वचाम् ॥ ९९ ॥
हिंग्वम्लवेतसाभ्यां च द्वे पले तत्र दापयेत् ।
अक्षप्रमाणां गुटिकां कृत्वा खादेद्यथाबलम् ॥ २०० ॥

दशमूल, त्रिफला, आककी जड शतावर, दन्तीकी जड, चीतेकी जड, विष्णुक्रान्ता, रास्ना, पाठ, थूहरकी जड और कचूर ये प्रत्येक औषधि चालीस चालीस तोले लेकर अग्निमें जलाकर भस्म करलेवे। फिर उस भस्मको एक द्रोण जलमें मिलाकर २१ बार छाने पश्चात् उसको मन्दमन्द अग्निसे पकावे

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४०९

जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें गुड सौ पल डालकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । जब गुड अच्छे प्रकारसे पकजाय तब उसमें बिछौटी, काकोली, क्षीरकाकोली और जवाखार इन प्रत्येकका चूर्ण बीस तोले एवं हरड, त्रिकुटा, सज्जी, चीता और वच इन औषधियोंका चूर्ण समान भाग मिश्रित २० तोले, हींग और अम्लवेतका चूर्ण आठ आठ तोले मिलाकर सबको एकमएक करदेवे । इसको प्रतिदिन प्रातःकाल एक-एक तोलेकी गोली बनाकर अग्निके बलानुसार भक्षण करे ॥ १९५-२०० ॥

अजीर्णे जरयत्येष जीर्णे सन्दीschedule... -> सन्दीschedule wait -> सन्दीschedule (सन्दीschedule = सन्दीschedule -> सन्दीschedule): अजीर्णे जरयत्येष जीर्णे सन्दीschedule अजीर्णे जरयत्येष जीर्णे सन्दीschedule (let's write properly): अजीर्णे जरयत्येष जीर्णे सन्दीschedule अजीर्णे जरयत्येष जीर्णे सन्दीschedule अजीर्णे जरयत्येष जीर्णे सन्दीschedule -> अजीर्णे जरयत्येष जीर्णे सन्दीschedule -> सन्दीschedule -> सन्दीschedule -> सन्दीschedule -> It is सन्दीschedule... wait! `स

४१० भैषज्यरत्नावली । [ अग्निमान्द्य-


द्वौ क्षारौ हबुषा चैव दद्यादर्द्धपलोन्मितान् ।
दधिकाञ्जिकशुक्तानि स्नेहमात्रासमानि च ॥
आर्द्रकस्वरसप्रस्थं घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २०६ ॥

पीपल, पीपलामूल, चीता, गजपीपल, हींग, चव्य, अजमोद, पाँचों नमक, जवा-खार, सज्जी और हाऊबेर इन प्रत्येकका कल्क दो दो तोले, एवं दही, काँजी, सिरका, अदरखका रस और घी ये प्रत्येक एक एक प्रस्थ लेवे। सबको एकत्र मिलाकर यथाविधि घृतको पकावे ॥ २०५ ॥ २०६ ॥

एतदग्निघृतं नाम मन्दाग्नीनां प्रशस्यते ।
अर्शसां नाशनं श्रेष्ठं तथा गुल्मोदरापहम् ॥ २०७ ॥
ग्रन्ध्यर्बुदापचीकासकफमेदोऽनिलानपि ।
नाशयेद् ग्रहणीदोषं श्वयथुं सभगन्दरम् ॥ २०८ ॥
ये च वस्तिगता रोगा ये च कुक्षिसमाश्रिताः ।
सर्वांस्तान् नाशहत्याशु सूर्यस्तम इवोदितः ॥ २०९ ॥

यह अग्निघृत मन्दाग्निवाले मनुष्योंके लिये अत्यन्त हितकारी है। सर्वप्रकारकी बवासीर, गुल्म, उदररोग, ग्रन्थिआदि दुस्तररोग तथा जो वस्तिगत और जो कुक्षिगत रोग हैं उन सबको यह घृत इस प्रकार तत्काल नष्ट करदेता है जैसे सूर्यका प्रकाश अन्धकारको तत्क्षण नष्ट करदेता है ॥ २०७-२०९ ॥

बृहदग्निघृत ।

भल्लातकसहस्रार्द्धं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
अष्टभागावशेषं च कषायमवतारयेत् ॥ २१० ॥
घृतप्रस्थं समादाय कल्कानीमानि दापयेत् ।
त्र्यूषणं पिप्पलीमूलं चित्रको हस्तिपिप्पली ॥ २११ ॥
हिङ्गुचव्याजमोदा च पञ्चैव लवणानि च ।
द्वौ क्षारौ हबुषा चैव दद्यादर्द्धपलोन्मितान् ॥ १२ ॥
दधिकाञ्जिकशुक्तानि स्नेहमात्रासमानि च ।
आर्द्रकस्वरसं चैव शोभाञ्जनरसं तथा ॥
तत्सर्वमेकतःकृत्वा शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ १३ ॥

पाँच सौ भिलावोंको लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब पककर अष्टमांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे। फिर उस क्वाथमें घी १ प्रस्थ और

[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४११


सोंठ, पीपल, मिरच, पीपलामूल, चीता, गजपीपल, हींग, चव्य, अजमोद, पाँचों नमक, जवाखार, सज्जी और हाऊबेर इन समस्त औषधयोंका कल्क दो दो तोले एवं दही, काँजी, सिरका अदरखका रस और सहिजनेका रस ये प्रत्येक एक एक प्रस्थ लेकर सबको एकत्र करके मन्दमन्द अग्निसे विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे ॥ २१०-२१३ ॥

एतदग्निघृतं नाम मन्दाग्नीनां प्रशस्यते ॥ १४ ॥ अर्शसां नाशनं श्रेष्ठं मूढवातानुलोमनम् । कफवातोद्भवे गुल्मे श्लीपदे च दकोदरे ॥ १५ ॥ शोथं पाण्ड्वामयं कासं ग्रहणीं श्वासमेव च । एतान् विनाशयत्याशु तमः सूर्य इवोदितः ॥ १६ ॥ श्लैष्मिके वमनं पूर्वं पैत्तिके मृदु रेचनम् ।

यह बृहदग्निनामक घृत मन्दाग्निवाले रोगियोंको विशेष उपयोगी है एवं अर्शको नष्ट करनेके लिये अत्युत्तम, मूढवायुका अनुलोमन करनेवाला तथा कफ-वातजन्य गुल्म, श्लीपद, जलोदर, शोथ, पाण्डुरोग, खाँसी, ग्रहणी और श्वास इन सम्पूर्ण विकारोंको जैसे सूर्यका प्रकाश अन्धकारको तत्क्षण नष्ट करदेताहै उसीप्रकार दूर करता है ॥ २१४--१६ ॥

अग्निमान्द्यरोगमें पथ्य ।

वातिके स्वेदनं चाथ यथावस्थं हितं च यत् ॥ १७ ॥ नानाप्रकारो व्यायामो दीपवानि लघूनि च । बहुकालसमुत्पन्नाः सूक्ष्मा लोहितशालयः ॥ १८ ॥ विलेपी लाजमण्डश्च मण्डो मुद्गरसः सुरा । एणो बर्ही शशो लावः क्षुद्रमत्स्याश्च सर्वशः ॥ १९ ॥ शालिञ्चशाकं वेत्राग्रं वास्तुकं बालमूलकम् । लशुनं वृद्धकूष्माण्डं नवीनकदलीफलम् ॥ २२० ॥ शोभाञ्जनं पटोलं च वार्त्ताकुं नलदम्बु च । कर्कोटकं कारवेल्लं बार्हतं च महार्द्रकम् ॥ २१ ॥ प्रसारणी मेषशृङ्गी चाङ्गेरी सुनिषण्णकम् । धात्रीफलं नागरङ्गं दाडिमं यवपर्पटाः ॥ २२ ॥

४१२भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

अम्लवेतसजम्बीरमातुलुङ्गानि माक्षिकम् ।
नवनीतं घृतं तक्रं सौवीरकतुषोदके ॥ २३ ॥
धान्याम्लं कटुतैलं च रामठं लवणाईकम् ।
यमानी मरिचं मेथी धान्यकं जीरकं दधि ॥ २४ ॥
ताम्बूलं तप्तसलिलं कटुतिक्तौ रसावपि ।
मन्दानलेऽप्यजीर्णेऽपि पथ्यमेतन्नृणां भवेत् ॥ २५ ॥

रोगीकी अवस्थाको यथाविधि विचारकर कफजन्य अजीर्णमें प्रथम वमन, पित्तके अजीर्णमें प्रथम मृदु विरेचन और वातके अजीर्णमें प्रथम स्वेद देना आदि क्रियायें हितकर हैं एवं विविध प्रकारकी व्यायाम (दण्ड कसरत आदि परिश्रम) अग्निप्रदीपक और लघुपाकी पदार्थ, बहुत पुराने और बारीक लाल शालिधानोंके चावल, विलेपी एवं खीलोंका माँड, भातका माँड मूंगका यूष, मद्य तथा हिरन, मोर, खरगोश, लवापक्षी इस सबका मांसरस, सर्व प्रकारकी छोटी २ मछलियाँ, शान्तिशाक, बेतके अंकुर, बथुएका शाक, कच्चीमूली, लहसुन, पक्का पेठा, कच्ची केलेकी फली, सहिंजनेकी फली, परवल, बैंगन, नीम, ककोडा, करेला, बडी कटेरीके फल, अदरख, गन्धप्रसारिणी, मेढासिंगी, नोनिया, चौपतिया शाक, आमला, नारंगी, अनार, जौका मांड पित्तपापडा, अम्लवेत, जम्बीरी नींबू, बिजौरा नींबू, शहद, मक्खन, घी मट्ठा, सौवीरनामवाली कांजी, तुषोदक और धान्याम्लनामक काँजी, सरसोंका तेल, हींग, सेंधानामक और अदरख, अजवायन, मिरच, मेथी, धनियाँ, जीरा, दही, पान, गरम जल एवं चरपरे और कडुवे रसवाले पदार्थ ये मन्दाग्नि और अजीर्णरोगमें पथ्य हैं ॥ १७-२२५ ॥

अग्निमान्द्यरोगमें अपथ्य ।
विरेचनानि विण्मूत्रवायुवेगविधारणम् ।
अध्यशनं समशनं जागरं विषमाशनम् ॥ २२६ ॥
रक्तस्रुतिं शमीधान्यं मत्स्यं मांसमुपोदिकाम् ।
जलपानं पिष्टकं च जाम्बवं सवमालुकम् ॥ २२७ ॥
कूर्च्चिकां मोरटं क्षीरं किलाटं च प्रपाणकम् ।
तालास्थिसस्यं तद्नालं स्नेहनं दुष्टवारि च ॥ २२८ ॥
विरुद्धासात्म्यपानान्नं विष्टम्भीनि गुरूणि च ।
अग्निमान्द्येऽप्यजीर्णे च सर्वाणि परिवर्जयेत् ॥ २२९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४१३

विरेचन, मल-मूत्र और अधोवायुके वेगको रोकना, भोजनपर भोजन करना, अपथ्य पदार्थोंका भोजन, रातको जागना, विषमभोजन, रक्तमोक्षण, सब प्रकारके दो दलवाले अन्न, मछली, मांस, पोईका शाक, अधिक जलपान, पिष्टक, जामुन, सर्व प्रकारके आलू आदि कन्द, फटा हुआ दूध, खीस, मद्य अधिक शरबत व पन्ना ( मिष्टान्न पकवान आदि ), ताडके फलकी गुठलीकी मींग, घी-तैलादि स्नेहपदार्थ, दूषितजल, स्वभावविरुद्ध व प्रकृतिविरुद्ध और असात्म्य अन्नपान विष्टम्भकारक और गुरुपाकी पदार्थ समस्त मन्दाग्नि और अजीर्णरोगमें सर्वथा त्याग देना चाहिये ॥ २२६-२२९ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्याम् अग्निमान्द्यचिकित्सा ।


कृमिरोग-चिकित्सा ।

पारसीययमानीं पीत्वा पर्युषितवारिणा प्रातः ।
गुडपूर्वां कृमिजातं कोष्ठगतं पातयत्याशु ॥ १ ॥

प्रातःकालमें खुरासानी अजवायनके चूर्ण किंचित् गुड मिलाकर बासी जलके साथ पीनेसे मलके साथ कोष्ठगत कृमि तत्काल निकल जाते हैं ॥ १ ॥

पारिभद्रकपत्रोत्थं रसं क्षौद्रयुतं पिबेत् ।
केबूकस्य रसं वापि पत्तूरस्याथवा पुनः ॥

फरहदके पत्तोंके रसको वा केउआँके अथवा पतङ्गरके पत्तोंके रसको शहद मिलाकर पान करनेसे सब प्रकारके कृमि नष्ट होते हैं ॥

लिह्यात् क्षौद्रेण वैडङ्गं चूर्णं कृमिहरं परम् ॥ २ ॥

वायविडंगके चूर्णको शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे यह चूर्ण सब प्रकारके कृमिको नष्ट करता है ॥ २ ॥

मुस्ताखुकर्णीफलशिग्रुदारुक्वाथः सकृष्णाकृमिशत्रुकल्कः ।
मार्गद्वयेनापि चिरप्रवृत्तान् क्रिमीन्निहन्ति क्रिमिजांश्च रोगान् ॥

नागरमोथा, मूसाकानी, हरड, आमला, बहेडा, सहिंजनेकी छाल और देवदारु इनके क्वाथमें पीपलका चूर्ण और वायविडङ्गका चूर्ण डालकर पान करनेसे ऊर्ध्व और अधः इन दोनों मार्गोंसे निकलनेवाले बहुत दिनोंके कृमि तथा कृमिजन्य अन्यान्य उपद्रव नष्ट होते हैं ॥ ३ ॥

४१४ | भैषज्यरत्नावली । | [ कृमिरोग-

पलाशबीजस्वरसं पिबेद्वा क्षौद्रसयुतम् ।
पिबेत्तद्बीजकल्कं वा तक्रेण कृमिनाशनम् ॥ ४ ॥
ढाकके बीजोंके स्वरसको शहदके साथ मिलाकर पीनेसे अथवा ढाकके बीजोंके चूर्णको मट्ठेके साथ सेवन करनेसे कृमि नष्ट होते हैं ॥ ४ ॥

क्वाथं खर्जूरपत्राणां सक्षौद्रमुषितं निशि ।
पीत्वा निवारयत्याशु कृमिसङ्घमशेषतः ॥ ५ ॥
खजूरके पत्तोंके वासी क्वाथको शहद मिलाकर पान करनेसे सर्व प्रकारके कृमि तत्काल नष्ट होते हैं ॥ ५ ॥

अपक्वं क्रमुकं पिष्टं पीतं जम्बीरजै रसैः ।
निहन्ति विड्भवं कीटं रसः खर्जूरजम्ब्वयोः ॥ ६ ॥
कच्ची सुपारीको जलमें पीसकर जम्भीरी नींबूके रसके साथ अथवा खजूरके पत्तोंका रस और जामुनके पत्तोंका रस मिलाकर पान करनेसे मलमें उत्पन्न हुए कृमि निश्चय नष्ट होते हैं ॥ ६ ॥

पिबेत्तुम्बीबीजचूर्णं तक्रेण कृमिनाशनम् ॥ ७ ॥
कडुवीतोंबीके बीजोंके चूर्णको मट्ठेके साथ सेवन करनेसे कृमि दूर होते हैं ॥ ७ ॥

नारिकेलजलं पीतं सक्षौद्रं कृमिनाशनम् ॥ ८ ॥
नारियलके जलमें शहद डालकर पान करनेसे कृमि नष्ट होते हैं ॥ ८ ॥

विडङ्गपिप्पलीमूलशिग्रुभिर्मरिचेन च ।
तक्रसिद्धा यवागूः स्यात् कृमिघ्नी ससुवर्चिका ॥
पीतं बिम्बीघृतं हन्ति पक्वामाशयगान्कृमीन् ॥ ९ ॥
वायविडङ्ग, पीपलामूल, सहिजनके बीज और कालीमिरच इन सबके चूर्णके साथ मट्ठेमें यवागू सिद्ध करके उसमें सज्जीका चूर्ण डालकर पान करनेसे अथवा बिम्बी (कंदूरी) के द्वारा सिद्ध किये हुए घीको सेवन करनेसे आमाशय और पक्वाशयगत कृमि नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥

यमानीं लवणोपेतां भक्षयेत कल्य उत्थितः ।
अजीर्णमामवातं च कृमिजांश्च जयेद्गदान् ॥ १० ॥
प्रातःकालमें अजवायन, सेंधानमक दोनोंको एकत्र पीसकर भक्षण करनेसें अजीर्ण आमवात और कृमि तथा कृमिजन्य अन्यान्य सर्व प्रकारके रोग दूर होते हैं ॥१०॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४१५

पलाशबीजेन्द्रविडङ्गनिम्बभूनिम्बचूर्णं सगुडं लिहेद्यः। दिनत्रयेण क्रिमयःपतन्ति पलाशबीजेन यमानिकां वा ॥११॥

ढाकके बीज, इन्द्रजौ, वायविडङ्ग, नीमकी छाल और चिरायता इन सबके चूर्णको समान भाग लेकर गुडमें मिलाकर सेवन करनेसे अथवा ढाकके बीज और अजवायनको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कृमि तीन दिनमें नष्ट होकर गिरजाते हैं ॥ ११ ॥

पेषयेदारनालेन नाडीचस्य फलानि च। यूकालिख्याःप्रशान्त्यर्थं दद्याल्लेपं तु मस्तके ॥ १२ ॥

जुओं और लीखोंको नष्ट करनेके लिये नाडीके शाकके फलोंको काँजीके साथ पीसकर सिरपर लेप करे ॥ १२ ॥

रसेन्द्रेण समायुक्तो रसो धुत्तूरपत्रजः। ताम्बूलपत्रजो वापि लेपाद्युकाविनाशनः ॥ १३ ॥

पारेको धतूरेके पत्तोंके रस अथवा पानके रसमें खरल करके मस्तकपर लेप करनेसे शिरकी सब जुयें नष्ट होजाती हैं ॥ १३ ॥

आखुकर्णीदलैः पिष्टैः पिष्टकेन च पूपिकाम्। जग्ध्वा सौवीरकं चानु पिबेत्कृमिहरं परम् ॥ १४ ॥

मूसाकानीके पत्तोंके रससे जौ अथवा चावलोंके चूर्णको मलकर पूए बनाकर खाय और ऊपरसे काँजी पीवे तो कृमिरोग नष्ट होता है ॥ १४ ॥

सुरसादिगणं वापि सर्वथैवोपयोजयेत् । विडङ्गसैन्धवक्षारकम्पिल्लकहरीतकीः ॥ पिबेत्तक्रेण सम्पिष्य सर्वक्रिमीन्निवृत्तये ॥ १५ ॥

सुरसादिगणकी औषधियोंका कल्क वा क्वाथ सेवन करनेसे अथवा वायविडङ्ग सैंधानमक, जवाखार, कबीला और हरड इन सब औषधि समान भाग लेकर और सबका एकत्र चूर्ण करके मट्ठेके साथ सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कृमि नष्ट होते हैं १५

पारसीयादिचूर्ण।

पार्सीयायमानिका च घनकणशृङ्गीविडङ्गारुणा- चूर्णं श्लक्ष्णतरं विलीढमपि तत्क्षौद्रेण संयोजितम् । कासं नाशयति ज्वरं च जयति प्रौढातिसारं जये- च्छर्दिं मर्दयति क्रिमिं तु नियतं कोष्ठस्थमुन्मूलयेत् ॥१६॥

४१६भैषज्यरत्नावली ।[ कृमिरोग-

खुरासानी अजवायन, नागरमोथा, पीपल, काकडासिंगी, वायविडङ्ग और अतीस इन औषधियोंका बारीक चूर्ण समान भाग लेकर शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे खाँसी, ज्वर, पुराना अतिसार, वमनका होना और कोष्ठगत कृमि आदि रोग नष्ट होते हैं ॥ १६ ॥

कृमिकालानल रस ।

विडङ्गं द्विपलं चैव विषचूर्णं तदर्द्धकम् ।
लौहचूर्णं तदर्द्धं च तदर्द्धं शुद्धपारदम् ॥ १७ ॥
रसतुल्यं शुद्धगन्धं छागीदुग्धेन पेषयेत् ।
छायाशुष्कां वटीं कृत्वा खादेत्षोडशरक्तिकाम् ॥ १८ ॥
धान्यजीराऽनुपानेन नाम्ना कालानलो रसः ।
उदरस्थं कृमिं हन्याद् ग्रहण्यार्शःसमन्वितम् ॥ १९ ॥
अग्निदः शोथशमनो गुल्मप्लीहोदरान् जयेत् ।
गहनानन्दनाथेन भाषितो विश्वसम्पदे ॥ २० ॥

वायविडङ्ग ८ तोले, शुद्ध मीठा तेलिया ४ तोले, लोहभस्म २ तोले, शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध आमलासार गन्धक १ तोला; इन सब औषधियोंको एकत्र मिलाकर बकरीके दूधमें खरल करे । फिर छायामें सुखाकर सोलह सोलह रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे, इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली खाकर ऊपरसे धनिये और जीरेके क्वाथको पीवे तो यह कृमिकालानलनामक रस उदरस्थ कृमि, संग्रहणी, बवासीर, सूजन, वायगोला, तिल्ली और उदररोग इन सबको नष्ट करता है और पाचकाग्निको बढाता है । इस प्रयोगको महाराज गहनानन्दनाथने सांसारिक मनुष्योंके हितके लिये कहा है ॥ १७–२० ॥

कृमिधूलिजलप्लव रस ।

पारदं गन्धकं शुद्धं वङ्गं शङ्खं समं समम् ।
चतुर्णां योजयेत्तुल्यं पथ्याचूर्णं भिषग्वरः ॥ २१ ॥
दण्डयन्त्रेण निर्मथ्य पटोलस्वरसं क्षिपेत् ।
कार्पासबीजसदृशीं वटिकां कुरु यत्नतः ॥ २२ ॥
त्रिवटीं भक्षयेत्प्रातः शीततोयं पिबेदनु ।
केवलं पैत्तिके योज्यः कदाचिद्वातपैत्तिके ॥
श्रीमद्गहननाथोक्तः कृमिधूलिजलप्लवः ॥ २३ ॥