भारतकोश
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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३७७

हिंग्वष्टकचूर्ण ।

त्रिकटुकमजमोदा सैन्धवं जीरके द्वे
समधरणधृतानामष्टमो हिङ्गुभागः ।
प्रथमकवलभुक्तं सर्पिषा चूर्णमेत-
ज्जनयति जठराग्निं वातरोगांश्च हन्यात् ॥ ८ ॥

सोंठ, पीपल, मिरच, अजमोद, सेंधानमक, जीरा, कालाजीरा प्रत्येकका चूर्ण समान भाग और सब औषधियोंका आठवाँ भाग हींग लेवे । सबको एकत्र कूटपीसकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको भोजनके पहले ग्रासमें घीके साथ मिलाकर भक्षण करे तो यह चूर्ण अग्निको दीपन करता है और वातरोगोंको नष्ट करताहै॥८॥

वडवामुखचूर्ण ।

पथ्यानागरकृष्णाकरञ्जबिल्वाग्निभिः सितातुल्यः ।
वडवामुखं विजयते गुरुतरमपि भोजनं चूर्णम् ॥ ९ ॥

हरड, सोंठ, पीपल, करञ्जके बीज, बेलगिरी और चीतेकी जड इन सबका चूर्ण समान भाग और समस्त चूर्णकी बराबर मिश्री मिलाकर यथोचित मात्रासे सेवन करे तो यह वडवामुख नामक चूर्ण अत्यन्त भारी भोजनको भी शीघ्र पचादेता है ॥ ९ ॥

स्वल्पाग्निमुखचूर्ण ॥

हिङ्गुभागो भवेदेको वचा च द्विगुणा भवेत् ।
पिप्पली त्रिगुणा प्रोक्ता शृङ्गवेरं चतुर्गुणम् ॥ १० ॥
यमानिका पञ्चगुणा षड्गुणा च हरीतकी ।
चित्रकं सप्तगुणितं कुष्ठमष्टगुणं भवेत् ॥ ११ ॥
एतद् वातहरं चूर्ण पीतमात्रं प्रसन्नया ।
पिबेद्दध्ना मस्तुना वा सुरया कोष्णवारिणा ॥ १२ ॥
सोदावर्त्तमजीर्णं च प्लीहानमुदरं तथा ।
अङ्गानि यस्य शीर्यन्ते विषं वा येन भक्षितम् ॥ १३ ॥
अर्शोहरं दीपनं च शूलघ्नं गुल्मनाशनम् ।
कासं श्वासं निहन्त्याशु तथैव क्षयनाशनम् ॥
चूर्णमग्निमुखं नाम न क्वचित् प्रतिहन्यते ॥ १४ ॥

३७८ भैषज्यरत्नावली । [ अग्निमान्द्य-

हींग १ भाग, वच २ भाग, पीपल ३ भाग, सोंठ, ४ भाग, अजवायन ५ भाग, हरड, ६ भाग, चीतेकी जड, ७ भाग और कूट ८ भाग लेकर सबको एकत्र बारीक पीस लेवे । यह स्वल्पाग्निमुख चूर्ण सुरामण्ड, दहीका पानी, मदिरा अथवा गरम-जल इनमेंसे किसी एक अनुपानके साथ पान करतेही वायुको हरता है तथा उदावर्त्त, अजीर्ण, प्लीहा, उदररोग, अर्श, शूल, गुल्म, खाँसी, श्वास और क्षय इन सब रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है । एवं अग्निको दीपन करता है । जिसके अङ्ग शिथिल होगये हों या जिसने विष खा लिया हो उनके लिये भी यह चूर्ण हितकर है । यह अग्निमुखनामक चूर्ण कहीं भी विफल नहीं होता है ॥

बृहदग्निमुखचूर्ण ।

द्वौ क्षारौ चित्रकं पाठा करञ्जं लवणानि च ।
सूक्ष्मैलापत्रकं भार्गी कृमिघ्नं हिङ्गु पुष्करम् ॥ १५ ॥
शठी दार्बी त्रिवृन्मुस्तं वचा चेन्द्रयवस्तथा ।
धात्री जीरकवृक्षाम्लं श्रेयसी चोपकुञ्चिका ॥ १६ ॥
अम्लवेतसमम्लीका यमानी सुरदारु च ।
अभयाऽतिविषा श्यामा हबुषाऽऽरग्वधं समम् ॥ १७ ॥
तिलमुष्ककशिग्रूणां कोकिलाक्षपलाशयोः ।
क्षाराणि लौहकिट्टं च तप्तं गोमूत्रसेचितम् ॥ १८ ॥
समभागानि सर्वाणि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ।
मातुलुङ्गरसेनैव भावयेच्च दिनत्रयम् ॥ १९ ॥
दिनत्रयं तु शुक्तेन आर्द्रकस्य रसेन च ।
अत्यग्निकारकं चूर्णं प्रदीप्ताग्निसमप्रभम् ॥ २० ॥

जवाखार, सज्जी, चीतेकी जड, पाठ, करंज, पाँचों नमक, छोटी इलायची, तेजपात, भारगी, वायविडङ्ग, हींग, पुहकरमूल, कचूर, दारुहल्दी, निसोत, नागरमोथा, वच, इन्द्रजौ, आमला, जीरा, विषांबिल ( तिन्तडीक ), गजपीपल, कालाजीरा, अम्लवेत, इमली, अजवायन, देवदारु, हरड, अतीस, अनन्तमूल, हाऊबेर, अमलतास, तिलोंका क्षार, रोवेका क्षार, सहिंजनेका क्षार, तालमखानेका क्षार, ढाकका क्षार और गोमूत्रमें सिद्ध कियाहुआ लोहकी मण्डूर इन सबको समान भाग लेकर पीसकर एकत्र बारीक चूर्ण कर लेवे । फिर इस चूर्णको बिजौरानींबुके रसमें तथा तीन दिन शुक्तनामक काँजी और तीन दिन

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३७९

अदरखके रसमें भावना देवे तो यह वृहदग्निमुखचूर्ण सिद्ध होता है। यह चूर्ण जठरा- ग्निको प्रज्वलित अग्निकी समान अत्यन्त दीपन करता है ॥ १५-२० ॥

उपयुक्तविधानेन नाशयत्यचिराद् गदान् ।
अजीर्णकमथो गुल्मान् प्लीहानं गुदजानि च ॥ २१ ॥
उदराण्यन्त्रवृद्धिं च अष्ठीलां वातशोणितम् ।
प्रणुदत्युल्बणान् रोगान् नष्टमग्निं प्रदीपयेत् ॥ २२ ॥
समस्तव्यञ्जनोपेतं भक्तं कृत्वा सुभाजने ।
दापयेदस्य चूर्णस्य बिडालपदमात्रकम् ॥
गोदोहमात्रात्तत्सर्वं भस्मीभवति सोष्मकम् ॥ २३ ॥

इसको उपयुक्त विधिसे सेवन किया जाय तो यह अजीर्ण, गुल्म, प्लीहा, अर्श, उदररोग, आन्त्रवृद्धि, अष्ठीला, वातरक्त और अत्यन्त उल्बण दोष इन समस्त रोगोंको बहुत जल्द नष्ट करता है । एवं नष्टहुई अग्निको पुनः दीपन करता है । सम्पूर्ण व्यंजनोंसे युक्त भातको सुन्दर थालमें रखकर उसमें चूर्ण डालकर भक्षण करे तो गोदोहन कालमें जितना समय लगता है उतन समयमें अर्थात् तत्कालही खाया हुआ भोजन सब भस्म होजाता है अर्थात् पच जाता है ॥ २१-२३ ॥

अग्निमुखलक्षण ।

चित्रकं त्रिफला दन्ती त्रिवृता पुष्करं समम् ।
यावन्त्येतानि चूर्णानि तावन्मात्रं तु सैन्धवम् ॥ २४ ॥
भावयित्वा स्नुहीक्षीरैस्तत्काण्डे निक्षिपेत्ततः ।
मृदुपङ्कनानुुलिप्तं प्रक्षिपेज्जातवेदसि ॥ २५ ॥
सुदग्धं तु समुद्धृत्य सचूर्ण्योष्णाम्बुना पिबेत् ।
एतदग्निमुखं नाम लवणं वह्निकृत्परम् ॥
यकृत्प्लीहोदरानाहगुल्मार्शःपार्श्वशूलनुत् ॥ २६ ॥

चीतेकी जड, हरड, आमला, बहेडा, दन्तीकी जड, निसोत और पुहकरमूल इन सबका चूर्ण समान भाग और सब चूर्णकी बराबर भाग सेंधानमकका चूर्ण लेवे । फिर सबको एकत्र थूहरके दूधमें अच्छीतरह खरल करके एक थूहरके डंडेमें भरकर ऊपरसे कपरोटी करके अग्निमें पुटपाक की विधिसे पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पक जाय तब उसको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस अग्निमुखनामक लवणको

३८० | भैषज्यरत्नावली । | [ अग्निमान्द्य-

छः छः रत्तीकी मात्रासे मन्दोष्ण जलके साथ सेवन करनेसे अग्निकी अत्यन्त वृद्धि होती है । एवं यकृत्, प्लीहा, उदररोग, आनाह, गुल्म, अर्श और पार्श्वशूल आदि रोग दूर होते हैं ॥ २४-२६ ॥ भास्करलवण ।

पिप्पली पिप्पलीमूलं धान्यकं कृष्णजीरकम् ।
सैन्धवं च विडं चैव पत्रं तालीशकेशरम् ॥ २७ ॥
एषां द्विपलिकान् भागान् पंच सौवर्चलस्य च ।
मरिचाजाजिशुण्ठीनामेकैकस्य पलं पलम् ॥ २८ ॥
त्वगेला चार्द्धभागे च समुद्रात् कुडवद्वयम् ।
दाडिमात् कुडव चैव द्वे पले चाम्लवेतसात् ॥ २९ ॥
एतच्चूर्णीकृतं श्लक्ष्णं गन्धाढ्यममृतोपमम् ।
लवणं भास्करं नाम भास्करेण विनिर्मितम् ।
जगतस्तु हितार्थाय वातश्लेष्मामयापहम् ॥ ३० ॥

पीपल, पीपलामूल, धनियाँ, काला जीरा, सेंधानमक, विरियासंचरनमक, तेजपात तालिशपत्र और नागकेशर ये प्रत्येक ओषधि आठ आठ तोले, कालानमक २० तोले, मिरच, जीरा और सोंठ प्रत्येक ४-४ तोले, दालचीनी दो तोले, इलायची २ तोले, समुद्रनमक ३२ तोले, अनारदाना १६ तोल और अम्लवेत ८ तोले लेवे । सबको एकत्र कूटपीसकर बारीक चूर्ण करलेवे तो लवणभास्करनामक चूर्ण सिद्ध होता है । इस अत्यन्त सुगन्धित और अमृतकी समान गुणकारी चूर्णको संसारके कल्याणके लिये सूर्यभगवान्ने निर्माण किया है ॥ २७-३० ॥

वातगुल्मं निहत्याशु वातशूलानि यानि च ॥ ३१ ॥
तक्रमस्तुसुरासीधुशुक्तकाञ्जिकयोजितम् ।
जाङ्गलानां तु मांसेन रसेषु विविधेषु च ॥ ३२ ॥
मन्दाग्नेरश्नतो नित्यं भवेदाश्वव पावकः ।
अर्शांसि ग्रहणीदोषं कुष्ठामयभगन्दरान् ॥ ३३ ॥
हृद्रोगमामदोषं च विविधानुदरस्थितान् ।
प्लीहानमश्मरीं चैव श्वासकासोदरक्रिमीन् ॥ ३४ ॥
विशेषतः शर्करादीन् रोगान् नानाविधांस्तथा ।
पाण्डुरोगांश्च विविधान् नाशयत्यशनिर्यथा ॥ ३५ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३८१

इस चूर्णको मट्ठा, दहीका तोड, मदिरा, सिर्का, शुक्तनामक काँजी, जंगली जीवोंका मांभरस इन अनुपानाँके साथ अथवा अन्यान्य विविध प्रकारके रसोंके साथ प्रतिदिन सेवन करनेसे मन्दहुई अग्नि तत्कालही अत्यन्त दीपन होती है, एवं वात-कफजन्य रोग, वातगुल्म और सर्वप्रकारके वातशूल नष्ट होते हैं । यह चूर्ण बवासीर, संग्रहणी, कुष्ठ, भगन्दर, हृदयरोग, आमदोष, अनेक प्रकारके उदरविकार, प्लीहा, पथरी, श्वास, खाँसी, उदरके कृमि, विशेषकर शर्करासम्बन्धी रोग, पाण्डुरोग, तथा अन्यान्य विविध प्रकारके रोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है, जैसे—वज्र वृक्षोंको तत्काल विनाश करदेता है ॥ ३१-३५ ॥

श्रीरामबाणरस ।

पारदामृतलवङ्गगन्धकं भागयुग्ममरिचेन मिश्रितम् ।
जातिकाफलमथार्द्धभागिकं तिन्तिडीफलरसेन मर्दितम् ॥ ३६ ॥
माषमात्रमनुपानयोगतः सद्य एव जठराग्निदीपनः ।
संग्रहग्रहणि कुम्भकर्णकं सामवातखरदूषणं जयेत् ॥
वह्निमान्द्यदशवक्त्रनाशनो रामबाण इव विश्रुतो रसः ॥ ३७ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध मीठा तेलिया, लौंग और शुद्ध गन्धक प्रत्येक एक एक तोला, मिरच दो तोले एवं जायफल ६ मासे इन सबको एकत्र पीसकर कच्ची इमलीके रसमें खरल करके उर्दकी बराबर गोलियाँ बनालेवे तो यह रामबाण रस सिद्ध होता है । इस रसके सेवनसे जठराग्नि शीघ्रही अत्यन्त दीपन होती है । एवं प्रबल संग्रहणीरूपी कुम्भकर्ण, आमवातरूप खर-दूषण और मन्दाग्निरूपी रावणको रामबाणकी समान नष्ट कर देता है । ऐसा सुनागया है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥

अग्नितुण्डीरस ।

शुद्धसूतं विषं गन्धमजमोदा फलत्रयम् ।
सर्जिक्षारं यवक्षारं वह्निसैन्धवजीरकम् ॥ ३८ ॥
सौवर्चलविडङ्गानि सामुद्रं टङ्कणं समम् ।
विषमुष्टिं सर्वतुल्यं जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥
मरिचाभां वटीं खादेदग्निमान्द्यप्रशान्तये ॥ ३९ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध मीठातेलिया, शुद्ध गन्धक, अजमोद, हरड, आमला, बहेडा, सज्जी, जवाखार, चीतेकी जड, सेंधानमक, जीरा, कालानमक, वाय, विडंग, सामुद्र-नमक और सुहागा ये सब समान भाग और शुद्ध कुचला सबकी बराबर भाग लेवे । सबको एकत्र कूट पीसकर जम्बीरीनींबुके रसमें खरल करके काली मिरचकी

३८२भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

बराबर गोलियाँ बनालेवे। मन्दाग्निको नष्ट करनेके लिये इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली खानी चाहिये ॥ ३८ ॥ ३९ ॥

अमृतकल्पवटी ।

शुद्धौ पारदगन्धौ च समानौ कज्जलीकृतौ ।
तयोरर्द्धं विषं शुद्धं तत्समं टङ्कण भवेत् ॥ ४० ॥
भृङ्गराजद्रवैर्भाव्यं त्रिदिनं यत्नतः पुनः ।
मुद्गप्रमाणा वटिका कर्तव्या भिषजां वरैः ॥ ४१ ॥
वटीद्वयं हरेच्छूलमग्निमान्द्यं सुदारुणम् ।
अजीर्णं जरयत्याशु धातुपुष्टिं करोति च ॥ ४२ ॥
नानाव्याधिहरा चेयं वटी गुरुवचो यथा ।
अनुपानविशेषेण सम्यग्गुणकरी भवेत् ॥ ४३ ॥

शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समान भाग लेकर कज्जली करलेवे। फिर शुद्ध मीठातेलिया और सुहागा दोनों आधे भाग लेवे। सबको एकत्र मिलाकर भाँगरेके रसमें ३ दिनतक भावना देकर मूँगकी समान गोलियाँ तैयार करलेवे। इसमेंसे दो दो वटी नित्य सेवन करनेसे शूल, मन्दाग्नि, दारुण, अजीर्ण आदि विकार शीघ्र ही दूर होते हैं। यह वटी धातुपुष्टिको करनेवाली नाना प्रकारकी व्याधियोंको हरनेवाली और गुरुदेवके वचनसे अनुपान विशेषके द्वारा सेवन करनेसे उत्तम गुण करती है ॥ ४०-४३ ॥

अमृतवटी ।

अमृतवराटकमरिचैर्द्विपञ्चनवभागिकैः क्रमशः ।
वटिका मुद्गसमाना कफपित्ताऽग्निमान्द्यहारिणी ॥ ४४ ॥

शुद्ध मीठातेलिया दो भाग, कौडीकी भस्म ५ भाग और काली मिरच ९ भाग लेकर सबको एकत्र जलमें पीसकर मूगका बराबर गोलियां बनालेवे। यह वटी कफ-पित्तके विकार और अग्निमान्द्यको दूर करती है ॥ ४४ ॥

क्षुधासागर रस ।

त्रिकटु त्रिफला चैव तथा लवणपञ्चकम् ।
क्षारत्रयं रसं गन्धं भागैकं पूर्ववद्वै विषम् ॥ ४५ ॥
गुञ्जामात्रां वटीं कुर्याल्लवङ्गैः पञ्चभिः सह ।
क्षुधासागरनामाऽयं रसः सूर्येण निर्मितः ॥ ४६ ॥


१ “पूर्ववद्विषमिति अमृतवट्युक्तभागवत्” ॥

चिकित्सा } भाषाटीकासहिता । ३८३

सौंंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, पाँचो नमक, जवाखार, सज्जाखार और सुहागा प्रत्येक १-१ तोला एवं पारे गन्धककी कजली और शुद्ध मीठातेलिया प्रत्येक २-२ तोले इन सबको एकत्र जलमें बारीक पीसकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन एक एक गोली पांच पांच लोंगोंके साथ सेवन करनेसे क्षुधाकी अत्यन्त वृद्धि होती है । इस क्षुधासागरनामवाले रसको सूर्यभगवान्‌ने निर्माण किया है ॥ ४५ ॥ ४६ ॥

लवङ्गादिवटी ।

लवङ्गशुण्ठीमरिचानि भृष्टसौभाग्यचूर्णानि समानि कृत्वा ।
भाव्यान्यपामार्गहुताशवारा प्रभूतमांसादिकजारणाय ॥ ४७ ॥

लाग, साँंठ, मिरच और भुनाहुआ सुहागा इनको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे फिर उसको चिराचटे और चीतेकी जडके रसमें अलग २ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस गोलीके सेवन करनेसे बहुतसा खायाहुआ मांस भी पच जाता है ॥ ४७ ॥

बृहल्लवङ्गादिवटी ।

लवङ्गजातीफलधान्यकुष्ठं जीरद्वयं त्र्यूषणत्रैफलं च ।
एलात्वचं टङ्कवराटमुस्तं वचाऽजमोदा विडसैन्धवं च ॥
तदर्द्धकं पारदगन्धमभ्रं लौहं च तुल्यं सुविचूर्ण्य सर्वम् ४८
तन्नागवल्लीदलतोयपिष्टं वल्लप्रमाणां वटिकां च कृत्वा ।
प्रातर्विदध्यादपि चोष्णतोयैरियं निहन्याद्ग्रहणीविकारम्॥४९
आमानुबद्धं सरुजं प्रवाहं ज्वरं तथा श्लेष्मभवं सशूलम् ।
कुष्ठाम्लपित्तं प्रबलं समीरं मन्दानलं कोष्ठगतं च वातम् ॥
वटीलवङ्गाद्यवसुप्रणीता तथा सवातं विनिहन्ति शीघ्रम् ५०

लाग, जायफल, धनियां, कुठ, जीरा, कालाजीरा, साँंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, इलायची, दालचीनी, सुहागा, कौडीकी भस्म, नागरमोथा, वच, अजमोद, विडियासंचरनमक और सेंधानमक ये प्रत्येक १-१ भाग एवं शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रककी भस्म, लोहेकी भस्म ये प्रत्येक आधा आधा भाग सबको एकत्र पानोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेनी चाहिये । इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली गरम जलके साथ सेवन करे तो यह बृहल्लवंगाद्यवटी सग्रहणी, आमसहित मलविबन्ध, पीडायुक्त प्रवाह, ज्वर, कफजन्य

३८४ भैषज्यरत्नावली । [ अग्निमान्द्य-

शूल, कुष्ठ, अम्लपित्त, प्रबलवायु, मन्दाग्नि, कोष्ठगत वायु तथा वातयुक्त अन्यान्य सर्वप्रकारके विकारोंको नष्ट करती है ॥ ४८-५० ॥

अजीर्णकण्टकरस ॥

शुद्धसूतं विषं गन्धं समं सर्वं विचूर्णयेत् ।
मरिचं सर्वतुल्यं स्यात् कण्टकार्याः फलद्रवैः ॥ ५१ ॥
मर्दयेद् भावयेत् सर्वमेकविंशतिवारकम् ।
गुञ्जामात्रां वटीं खादेत्सर्वाजीर्णप्रशान्तये ॥
अजीर्णकण्टकः सोऽयं रसो हन्ति विसूचिकाम् ॥५२॥

शुद्ध पारे और शुद्ध गन्धकको एक एक तोला लेकर कज्जली बनालेवे। फिर शुद्ध मीठातेलिया १ तोला और मिरच ३ तोले लेकर सबको एकत्र कटेरीके फलोंके रसमें २१ बार भावना देकर खरल करे फिर सर्वप्रकारके अजीर्णको शमन करनेके लिये इसमेंसे एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर सेवन करे । यह अजीर्णकण्टकरस विसूचिकाको विशेषकर दूर करता है ॥ ५१-५२ ॥

महोदधिवटी ।

एकैकं विषसूतौ च जाती टङ्कं द्विकं द्विकम् ।
कृष्णात्रिकं विश्वषट्कं गन्धं कार्पर्दकं द्विकम् ॥ ५३ ॥
देवपुष्पं बाणमितं सर्वं संमर्द्य यत्नतः ।
महोदधिवटी नाम्ना नष्टमग्निं प्रदीपयेत् ॥ ५४ ॥

शुद्ध मीठा तेलिया १ तोला, शुद्ध पारा १ तोला, जायफल २ तोले सुहागा दो तोले, पीपल ३ तोले, सोंठ ६ तोले, शुद्ध गन्धक २ तोले, कौडीकी भस्म २ तोले और लौंग ५ तोले सबको एकत्र जलमें यथाविधि खरल करके १-१ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह महोदधि नामावाली वटी नष्टहुई अग्निको तत्काल दीपन करती है ॥ ५३ ॥ ५४ ॥

बृहन्महोदधिवटी ।

लवङ्गं चित्रकं शुण्ठी जयपालं समं समम् ।
टङ्कणं च प्रदातव्य वृद्धदारं च कार्षिकम् ॥ ५५ ॥
चतुर्दश भावनाश्च दन्तीद्रावैः प्रदापयेत् ।
लिम्पाकेन त्रिधा देया वृद्धदारेण पञ्चधा ॥ ५६ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३८५


रसं गन्धंच गरलं मेलयित्वा विभावयेत् ।
आर्द्रकस्य रसेनैव चित्रकस्य रसेन वा ॥ ५७ ॥
मुद्गप्रमाणां वटिकां कृत्वा खादेव दिनेदिने ।
क्षुत्प्रबोधकरी चेयं जीर्णज्वरविनाशिनी ॥ ५८ ॥

लौंग, चीतेकी जड, सोंठ, जमाल गोटा और सुहागा प्रत्येक एक एक तोला और विधारा २ तोले इन सबको एकत्र मिश्रित करके दन्तीके क्वाथमें १४ बार, कागजीनींबूके रसमें ३ बार और विधारेके रसमें ५ बार भावना दे । पश्चात् उसमें शुद्ध पारे और शुद्ध गन्धककी कज्जली २ भाग और शुद्ध वत्सनाभविष १ भाग मिलाकर अदरखके रसमें और चीतेके रसमें ७-७ बार खरल करके मूँगकी बराबर गोलियाँ तैयार करलेवे। इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली खानेसे क्षुधाकी वृद्धि होती है ओर जीर्णज्वर दूर होता है ॥ ५५–५८ ॥

अग्निकुमाररस ।

रसेन्द्रगन्धौ सह टङ्कणेन समं विषं योज्यमिह त्रिभागम् ।
कपर्दशङ्खौविह नेत्रभागौ मरीचमत्राष्टगुणं प्रदेयम् ॥ ५९ ॥
सुपक्वजम्बीररसेन घृष्टः सिद्धो भवेदग्निकुमार एषः ।
विषूचिकाजीर्णसमीरणातैं दद्याद् द्विवल्लं ग्रहणीगदे च ॥ ६० ॥
“अत्र सर्वमेकभागापेक्षया वचनान्तरसंवादात् ”॥

पारे और गन्धककी कज्जली २ भाग, सुहागा १ भाग, शुद्ध मीठा तेलिया ३ भाग, कौडीकी भस्म ३ भाग, शंखकी भस्म ३ भाग और मिरच ८ भाग सबको एकत्र चूर्ण करके पकेहुए जम्भीरीनींबूके रसमें खरलकरे तो अग्नि कुमाररस सिद्ध होता है । इस रसको विषूचिका, अजीर्ण, वातविकार और संग्रहणीरोगमें दो दो रत्ती प्रमाण सेवन कराना चाहिये ॥ ५९ ॥ ६० ॥

बृहदग्निकुमाररस ।

शुद्धसूतं द्विधा गन्धं गन्धतुल्यं च टङ्कणम् ।
फलत्रयं यवक्षारं व्योषं पञ्च पटूनि च ॥ ६१ ॥
द्वादशैतानि सर्वाणि रसतुल्यानि दापयेत् ।
संमर्द्य सप्तधा सर्वं भावयेदार्द्रकद्रवैः ।
संशोष्य चूर्णयित्वा तु भक्षयेदार्द्रकाम्बुना ।
शाणमात्रं वयो वीक्ष्य नानाऽजीर्णप्रशान्तये ॥ ६२ ॥

२५

३८६भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

रसश्चाग्निकुमारोऽयं महेशेन प्रकाशितः ।
महाग्निकारकश्चैव कालभास्करतेजसाम् ॥ ६३ ॥
अग्निमान्द्यभवान् रोगान् शोथं पाण्ड्वामयं जयेत् ।
दुर्नाम ग्रहणीं सामरोगान् हन्ति न संशयः ॥
यथेष्टाहारचेष्टस्य नास्त्यत्र नियमः क्वचित् ॥ ६४ ।

शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग, सुहागेकी खील २ भाग एवं हरड, आमला, बहेडा, जवाखार, सोंठ, पीपल, मिरच और पाँचों नमक ये बारहों औषधियें एक एक भाग लेवे । सबको एकत्र खरल करके अदरखके रसमें ७ बार भावना देवे फिर उसको सुखाकर चूर्ण करलेवे । इस रसको चार चार मासेकी मात्रासे अथवा अवस्थाका विचार करके आदरखके रसके साथ भक्षण करे तो इससे विविधप्रकारके अजीर्ण शमन होते हैं । इस बृहदग्निकुमार रसको महादेवजीने प्रकाशित किया है । यह इस कालाग्निके तेजकी समान जठराग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाला एवं मन्दाग्निसे उत्पन्नहुए रोग, सूजन, पाण्डुरोग, बवासीर, संग्रहणी और आमयुक्त अनेक प्रकारके रोगोंको निश्चय नष्ट करनेवाला ह । इसपर यथेष्ट आहार विहार करना चाहिये । इसपर किसी प्रकारका परहेज नहीं है ॥ ६१-६४॥

हुताशनरस ।

गन्धेशटङ्कमेकैकं विषमत्र त्रिभागिकम् ।
अष्टभागं तु मरिचं जम्भाम्भोमर्दितं दिनम् ॥ ६५ ॥
तद्वटीं मुद्गमानेन कृत्वाऽऽद्रैण प्रयोजयेत् ।
शूलारोचकगुल्मेषु विषूच्यामग्निमान्द्यके ॥
अजीर्णसान्निपातादा शत्ये जाड्य शिरोगदे ॥ ६६ ॥

शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा और सुहागा प्रत्येक एक एक भाग, शुद्ध मीठातेलिया ३ भाग और मिरच ८ भाग इन सबको नींबूके रसमें एक दिनतक खरल करके मूँगकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे शूल, अरुचि, गुल्म, विषूचिका, मन्दाग्नि, अजीर्ण, सन्निपात, शिथिलता, जडता और शिरोरोगमें अधिक लाभ होता है ॥ ६६ ॥

बृहद्धुताशन रस ।

एकद्विकद्वादशभागयुक्तं योज्यं विषं टङ्कणमूषणं च ।
हुताशनो नाम हुताशनस्य करोति वृद्धिं कफजिन्नराणाम् ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३८७

शुद्ध मीठातेलिया १ भाग, सुहागा २ भाग और मिरच १२ भाग इनको एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर सेवन करनेसे यह हुताशननामवाला रस जठराग्निकी विशेषरूपसे वृद्धि करता है और कफको नष्ट करता है ॥ ६७ ॥

जातीफलादिवटी ।

जातीफलं लवङ्गं च पिप्पली सिन्धुकंऽमृतम् ।
शुण्ठी धुस्तूरबीजं च दरदं टङ्कणं तथा ॥ ६८ ॥
समं सर्वं समाहृत्य जम्भारम्भसा विमर्दयेत् ।
वल्लमाना वटी कार्या चाग्निमान्द्यप्रशान्तये ॥ ६९ ॥

जायफल, लौंग, पीपल, सिम्हालूके पत्ते, (किती किसीके मतसे सेंधानमक) शुद्ध मीठातेलिया, सोंठ, धतूरेके बीज, सिंगिरफ और सुहागा इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करे । फिर इसकी दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर मन्दाग्निको शान्त करनेके लिये सेवन करे ॥ ६८ ॥ ६९ ॥

भास्कररस।

विषं सूतं फलं गन्धं त्र्यूषणं टङ्कजीरकम् ।
एकैकं द्विगुणं लौहं शङ्खमभ्रवराटकम् ॥ ७० ॥
सर्वतुल्यं लवङ्गं च जम्बीरैर्भावयेद्भिषक् ।
सप्तवासरपर्यन्तं ततः स्याद् भास्करा रसः ॥ ७१ ॥
गुञ्जाद्वयप्रमाणेन वटीं कुर्याद् विचक्षणः ।
ताम्बूलीदलयोगेन वटीं संचर्व्य भक्षयेत् ॥ ७२ ॥
शूलरोगेषु सर्वेषु विषूच्यामग्निमान्द्यके ।
सद्यो वह्निकरो ह्येष चन्द्रनाथेन भाषितः ॥ ७३ ॥

शुद्ध मीठातेलिया, शुद्ध पारा, त्रिफला, शुद्ध गन्धक, सोंठ, पीपल, मिरच सुहागा और जीरा ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला एवं लौह, शंखभस्म, अभ्रक और कौड़ीकी भस्म ये प्रत्येक दो दो तोले और सम्पूर्ण औषधियोंका बराबर भाग लौंग लेवे । इन सबका एकत्र चूर्ण करके जम्बीरी नींबूके रसमें ७ दिनतक


१ "अत्र सिन्धुकः सिन्दुवारः । भट्टस्तु-सैन्धवमित्याह ॥"

३८८ भैषज्यरत्नावली । [ अग्निमान्द्य-

खरल करे तो भास्करनामक रस सिद्ध होता है । इसकी दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली पानमें रखकर भक्षण करे तो यह रस जठराग्निको तत्काल दीपन करता है एवं सर्वप्रकारके शूल, विषूचिका और अग्निमान्द्यादि विकारोंमें हितकर है । ऐसा चन्द्रनाथने कहा है ॥ ७०-७३ ॥

अग्निसन्दीपन रस । षडूषणं पञ्चपटु त्रिक्षारं जीरकद्वयम् । ब्रह्मदर्भोग्रगन्धे च मधुरी हिङ्गु चित्रकम् ॥ ७४ ॥ जातीफलं तथा कुष्ठं जातीकोषं त्रिजातकम् । चिञ्चाशेखारिकक्षारममृतं रसगन्धकौ ॥ ७५ ॥ लौहमभ्रं च वङ्गं च लवङ्गं च हरीतकी । समभागानि सर्वाणि भागौ द्वावम्लवेतसात् ॥ ७६ ॥ शङ्खस्य भागाश्चत्वारः सर्वमेकत्र भावयेत् । क्वाथेन पञ्चकोलस्य चित्रापामार्गयोस्तथा ॥ ७७ ॥ अम्ललोणीरसेनैव प्रत्येकं भावयेद् द्विधा । त्रिः सप्तकृत्वो निम्पाकरसैः पश्चाद् विभावयेत् ॥ ७८ ॥ बदराभा वटी कार्या भोक्तव्या सन्ध्ययोर्द्वयोः । अनुपानं प्रदातव्यं बुद्ध्वा दोषानुसारतः ॥ ७९ ॥ अग्निसन्दीपनो नाम रसोऽयं भुवि दुर्लभः । दीपयत्याशु मन्दाग्निमजीर्णं च विनाशयेत् ॥ अम्लपित्तं तथा शूलं गुल्ममाशु व्यपोहति ॥ ८० ॥

पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड, सोंठ, मिरच, पाँचों नमक, जवाखार सज्जी, सुहागा, जीरा, कालाजीरा, अजवायन, वच, सौंफ, हींग, चीतेकी, जड, जायफल, कूठ, जावित्री, दालचीनी, तेजपात, इलायची, इमलीकी छालकी भस्म, चिरचिटेकी भस्म, शुद्ध मीठा तेलिया, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहा, अभ्रक, वङ्ग, लौंग, और हरड इन सबको समान भाग अर्थात् प्रत्येक १-१ तोला, एवं अम्लवेत २ तोले और शंखभस्म ४ तोले लेवे । सबको एकत्र चूर्ण करके पञ्चकोलके क्वाथ, चीतेकी जडके क्वाथ, चिरचिटेके क्वाथ और नोनियाके रसमें पृथक् पृथक् दो दो बार भावना देवे । फिर जम्भीरी

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । [ ३८९

नींबूके रसमें २१ बार भावना देकर छोटे बेरकी समान गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालमें एक एक गोली खानी चाहिये । और ऊपरसे वातादि दोषोंको देखकर तदनुसार अनुपान सेवन करना चाहिये । यह अग्निसन्दीपनामक रस पृथ्वीमें परमदुर्लभ है । यह मन्दाग्निको तत्क्षण दीपन करता है एवं अजीर्ण, अम्लपित्त, शूल और गुल्मरोगको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ७४-८० ॥

त्रिफलालौह ।

त्रिफलामुस्तवेलैश्च सितया कणया समम् ।
खरमञ्जरीबीजैश्च लौहं भस्मकनाशनम् ॥ ८१ ॥
त्रिफला, नागरमोथा, वायविडंग, मिश्री, पीपल और चिरचिटेके बीज इन समस्त औषधियोंका चूर्ण समान भाग और सम्पूर्ण चूर्णकी बराबर लोहभस्म मिलाकर दो दो रत्तीकी मात्रासे सेवन करे तो यह लोह भस्मक रोगको दूर करता है ॥ ८१ ॥

प्रदीपनरस ।

रसनिष्कं गन्धनिष्कं निष्कमात्रं प्रदीपनम् ।
मानमर्द्धं प्रदातव्यं चुल्लिकालवणं भिषक् ॥ ८२ ॥
मर्दयित्वा प्रदातव्यमथास्य माषमात्रकम् ।
अजीर्णे चाग्निमान्द्ये च दातव्यो रसवल्लभः ॥ ८३ ॥
शुद्ध पारा ४ माशे, शुद्ध गन्धक ४ मासे, शुद्ध मीठा तेलिया ४ मासे और चुल्लिका-लवण २ मासे इनको एकत्र खरल करके अजीर्ण और मन्दाग्नि रोगमें एक एक मासेकी मात्रासे सेवन करावे ॥ ८२ ॥ ८३ ॥

विजयरस ।

रसस्यैकं पलं दत्त्वा नागं च गन्धकं पलम् ।
क्षारत्रयं पलं देयं लवणं पलपञ्चकम् ॥ ८४ ॥
दशमूलीजयाचूर्णं तद्द्रवेण तु भावयेत् ।
चित्रकस्य रसेनाथ भृङ्गराजरसेन तु ॥ ८५ ॥


१ “ अत्र नागशब्देन विषं ग्राह्यम् ” ॥

३९०भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

शिग्रुमूलद्रवैश्चापि ततो भाण्डे निरुध्य च।
याममात्रं पचेदग्नौ मर्दयेदार्द्रकद्रवैः ॥
ताम्बूलीपत्रसंयुक्तं खादेन्निष्कमितं सदा ॥ ८६ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध विष, शुद्ध गन्धक, सुहागा, जवाखार और सज्जी ये प्रत्येक चार चार तोले एवं लौंग २० तोले, दशमूलकी सब औषधियाँ २० तोले और भाँग २० तोले लेवे एकत्र चूर्ण करके दशमूलके क्वाथ, भाँगके रस, चीतेके क्वाथ, भाँगरेके स्वरस और सहिंजनेकी जडके क्वाथमें अलग २ सात सात बार भावना देवे । फिर एक पात्रमें बन्द करके १ प्रहरतक अग्निमें पकावे पश्चात् औषधिको निकाल-कर अदरखके रसमें खरल करलेवे । इस रसको प्रतिदिन चार-चार मासे प्रमाण लेकर पानमें रखकर सेवन करना चाहिये । इससे मन्दाग्निआदि उदर सम्बन्धी विकार दूर होते हैं ॥ ८४-८६ ॥

अग्निरस ।

मरिचाब्दवचा कुष्ठं समांशं विषमेव च ।
आर्द्रकस्य रसैः पिष्ट्वा मुद्गमात्रं तु कारयेत् ॥
स्वयमग्निरसो नाम सर्वाजीर्णप्रशान्तये ॥ ८७ ॥

मिरच, नागरमोथा, वच और कूठ ये प्रत्येक ११ तोले एवं शुद्ध वत्सनाभ ४ तोले सबको अदरखके रसमें खरल करके मूँगकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। यह स्वयं अग्निनामवाला रस सर्वप्रकारके अजीर्णको शमन करनेके लिये देना चाहिये ॥ ८७ ॥

टङ्कणादि वटी ।

टङ्कणनागरगन्धकपारदगरलं मरिचं समभागयुतम् ।
लकुचस्वरसैश्चणकप्रमिता गुडिका जनयत्यचिरादनलम् ॥८८ ॥

सुहागा, सोंठ, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, शुद्ध विष और कालीमिरच ये प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर बडहलके पत्तोंके रसमें खरल करके चनेकी समान गोलियाँ बनाकर सेवन करे । यह वटी तत्काल अग्निको दीपन करती है ॥ ८८ ॥

रस राक्षस ।

ताम्रं पारदगन्धकं त्रिकटुकं तीक्ष्णं च सौवर्चलं
खल्ले मर्द्य दिनं निधाय सिकताकुम्भेषु यामं ततः ।
स्विन्नं तेष्वपि रक्तशाकिनिभवं क्षारं समं भावये-
देकीकृत्य च मातुलुङ्गजलेर्नाम्ना रसो राक्षसः ॥ ८९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३९१


ताँबेकी भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, साँठ, पीपल, मिरच, तीक्ष्णलोह और कालानमक इन सबको समानभाग लेकर खरलमें १ दिनतक घोटकर वालुकायंत्रमें रख १ प्रहरतक पकावे । जब पककर स्वयं शीतल हो तब उसमें लाल विषखपरेका क्षार सब औषधिके समान मिलाकर बिजौरेनीम्बूके रसमें खरल करलेवे तो यह राक्षसनामसे प्रसिद्ध रस सिद्ध होताहै । यह रस मन्दाग्निको नष्ट करताहै ॥८९॥

पञ्चामृतवटी ।

अभ्रकं पारदं ताम्रं गन्धकं मरिचानि च ।
समभागमिदं चूर्णं चाङ्गेरीरसमर्दितम् ॥ ९० ॥
मर्दिते हि रसे भूयो जयन्तीसिन्धुवारयोः ।
भावनापि च दातव्या गुञ्जापरिमिता वटी ॥ ९१ ॥
तप्तोदकानुपानेन चतस्रस्तिस्र एव वा ।
वह्निमान्द्ये प्रदातव्या वट्यः पञ्चामृतास्तथा ॥ ९२ ॥

अभ्रककी भस्म, शुद्ध पारा, ताँबेकी भस्म, शुद्ध गन्धक और मिरच इन प्रत्येकके चूर्णको समान भाग लेकर नोनियाके रसमें खरल करके अरणी और सिंहालुके रसमें खरल करे । फिर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर इनमेंसे ३ वा ४ गोली गरम जलके साथ सेवन करावे तो यह पञ्चामृतनामवाली वटी मन्दाग्निरोगमें पञ्चामृतकी समान गुण करती है ॥ ९०-९१ ॥

जवालानलरस ।

क्षारद्वयं सुतगन्धौ पञ्चकोलमिदं समम् ।
सर्वतुल्या जया देया तदर्द्धं शिग्रुवल्कलम् ॥ ९३ ॥
एतत् सर्वं जया शिग्रु वह्निमार्कवजै रसैः ।
भावयेत्त्रिदिनं घर्मे ततो लघुपुटे पचेत् ॥ ९४ ॥
भावयेत्सप्तधा चार्द्रद्रवैर्ज्वालानलो भवेत् ।
पाचनो दीपनो हृद्यश्चोदरामयनाशनः ॥ ९५ ॥

जवाखार, सज्जी, पारा, गन्धक और पंचकोलकी औषधियाँ ये सब समान भाग समस्त औषधियोंकी बराबर भाँग और भाँगसे आधी सहिंजनेकी जड़की छाल इन सबका एकत्र चूर्ण करके भाँग, सहिंजना, चीता और भाँगरा प्रत्येकके रसमें वा क्वाथमें पृथक् २ तीन दिनतक धूपमें खरल करके लघुपुटमें पकावे । फिर अदरखके रसमें

३९२ भैषज्यरत्नावली । [ अग्निमान्द्य-

७ बार खरल करे तो ज्वालानल नामक रस सिद्ध होता है । यह रस पाचक, अग्निप्रदीपक हृदयको हितकारी, उदररोगनाशक है ॥९३-९५॥

भक्तविपाकवटी ।

माक्षिकं रसगन्धौ च हरितालं मनःशिला ।
त्रिवृद्दन्ती वारिवाहं चित्रकं च महौषधम् ॥ ९६ ॥
पिप्पली मरिचं पथ्या यमानी कृष्णजीरकम् ।
रामठः कटुका पाठा सैन्धवं साजमोदकम् ॥ ९७ ॥
जातीफलं यवक्षारं समभागं विचूर्णयेत् ।
आर्द्रकस्य रसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च ॥ ९८ ॥
सूर्य्यावर्त्तरसेनैव तुलस्याः स्वरसेन च ।
आतपे भावयेद्वैद्यः खल्लपात्रे च निर्मले ॥
पेषयित्वा वटीं खादेद्गुञ्जाफलसमप्रभाम् ॥ ९९ ॥
भक्तोत्तरीये बहुभोजनान्ते मुहुर्मुहुर्वाञ्छति भोजनानि ।
आमानुबन्धे च चिराग्निमान्द्ये विड्विग्रहे पित्तकफानुबन्धे १००
शोथोदरे चार्शंगदेऽप्यजीर्णे शूले त्रिदोषप्रभवे ज्वरे च ।
शस्ता वटी भक्तविपाकसंज्ञा सुखं विपाच्याशु नरस्य कोष्ठम्॥

सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, हरतालकी भस्म, मैनसिलकी भस्म, निसोत, दन्ती, नागरमोथा, चीता, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, अजवायन, कालाजीरा, हींग, कुटकी, पाठ, सैंधानमक, अजमोद, जायफल और जवाखार इन सबको समानभाग लेकर एकत्र चूर्ण कर लेवे । फिर इस चूर्णको उत्तम खरलमें डालकर अदरख, निर्गुण्डी, हुलहुल और तुलसी इन प्रत्येकके स्वरससे अलग २ धूपमें रखकर भावना देवे । पश्चात् खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर सेवन करे । इस वटीको बहुतसा भोजन करनेके बाद सेवन करनेसे बारबार भोजनकी इच्छा होती है । एव आमयुत मलविबन्ध, बहुत पुरानी मन्दाग्नि, मलावरोध, पित्त और कफका अनुबन्ध, शोथ, उदररोग, बवासीर, अजीर्ण, शूल और त्रिदोषज ज्वर इन समस्त रोगोंमें यह भक्तविपाकनामवाली वटी हितकारिणी कहीगई है तथा मनुष्यके कोठेको शीघ्रही शुद्ध करके सुख उत्पन्न करती है ॥ ९६-१०१ ॥

बृहद्भक्तपाकवटी ।

अभ्रं पारदगन्धकौ सवरदौ ताम्रं च तालं शिला
वङ्गं च त्रिफला विषं च कुनटी भागास्त्रयो दन्तिनः ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३९३

शृङ्गीव्योषयमानीचित्रजलदं द्वे जीरके टङ्कणं ह्येलापत्रलवङ्गहिङ्गु कुटकी जातीफलं सैन्धवम् ॥ १०२ ॥ एतान्यार्द्रकचित्रदन्तिसुरसावासारसैर्बिल्वजः पत्रोत्थैरपि सप्तधा सुविमले खल्वे विभाव्यान्यतः । खादेद्वल्लमितं तथा च सकलव्याधौ प्रयोज्या बुधैः विड्बन्धे कफजे त्रिदोषजनिते ह्यामानुबन्धेऽपि च ॥ १०३ ॥ मन्देऽग्नौ विषमज्वरे च सकले शूले त्रिदोषोद्भवे हन्यात्तानपि भक्तपाकवटिका भूयश्च सामं जयेत् ॥ १०४॥

अभ्रककी भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध सिंगरफ, ताँबेकी भस्म, हरतालकी भस्म, मैनसिलकी भस्म, वंगभस्म, त्रिफला, शुद्ध मीठातेलिया, नेपाली मैनसिल, दन्तकि बीज, काकड़ासिंगी, त्रिकुटा, अजवायन, चीता, नागरमोथा, जीरा, काला-जीरा, सुहागा, इलायची, तेजपात, लौंग, हींग, कुटकी, जायफल और सेंधानमक इन सबको समान भाग लेकर शुद्ध खरलमें रख अदरख, चीता, दन्ती, तुलसी, अडूसा और बेल इन प्रत्येकके पत्तोंके रसमें ७-७ बार भावना देवे । फिर इसकी दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर सेवन करे । बुद्धिमान् वैद्यको चाहिये कि, इस वटीको सब प्रकारकी व्याधियोंमें प्रयोग करे । मलावरोध, कफजनितरोग, त्रिदोषसे उत्पन्नहुए रोग, आमानुबन्ध, मन्दाग्नि, विषमज्वर, सर्वप्रकारके शूल एवं त्रिदोषजन्य अन्यान्य प्रकारके तथा आमयुक्त विकार इन सबको यह बृहद्भक्तपाकवटी दूर करती है ॥ १०२–१०४ ॥

पाशुपतरस ।

शुद्धसूतं द्विधा गन्धं त्रिभागं तीक्ष्णभस्मकम् । त्रिभिः समं विषं देयं चित्रकक्वाथभावितम् ॥ १०५ ॥ धूर्त्तबीजस्य भस्मापि द्वात्रिंशद्भागसंयुतम् । कटुत्रयं त्रिभागं स्याल्लवङ्गैला च तत्समम् ॥ १०६ ॥ जातीफलं तथा कोषमर्द्धभागं नियोजयेत् । तथाऽर्द्धं लवणं पञ्च स्नुह्यर्कैरण्डतिन्तिडी ॥ १०७ ॥ अपामार्गाश्वत्थजं च क्षारं दद्याद्विचक्षणः । हरीतकी यवक्षारं स्वर्ज्जिका हिङ्गु जीरकम् ॥ १०८ ॥

३९४भैषज्यरत्नावली।[ अग्निमान्द्य-

टङ्कणं सूततुल्यं तु चाम्लयोगेन मर्दयेत् ।
भोजनान्ते प्रयोक्तव्या गुञ्जाफलप्रमाणतः ॥ १०९ ॥
शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग, तीक्ष्ण लोहभस्म ३ भाग और शुद्ध मीठा तेलिया ६ भाग इन सबको एकत्र कर चीतेके क्वाथमें भावना देवे । फिर उसमें धतूरेके बीजोंकी भस्म ३२ भाग त्रिकुटा ३ भाग, लौंग ३ भाग, इलायची ३ भाग, जायफल और जावित्री प्रत्येक डेढ डेढ भाग तथा पाँचों नमक, थूहर, आक, अण्ड, इमली, चिरचिटा, पीपल इनका क्षार दो भाग और हरड, जवाखार, सज्जी, हींग, जीरा और सुहागा य प्रत्येक एक एक भाग मिलाकर काँजी आदि अम्लपदार्थोंके रसमें खरल करे इनका प्रतिदिन एकएक रत्तीकी मात्रासे भोजनके पश्चात् सेवन करे ॥ १०५–१०९ ॥

रसः पाशुपतो नाम सद्यः प्रत्ययकारकः ।
दीपनः पाचनो हृद्यः सद्यो हन्ति विषूचिकाम् ॥ ११० ॥
तालमूलीरसेनैव उदरामयनाशनः ।
मोचारसेनातिसारं ग्रहणीं तक्रसैन्धवैः ॥ १११ ॥
सौवर्चलकणाशुण्ठीयुतः शूलं विनाशयेत् ।
अर्शो हन्ति च तक्रेण पिप्पल्या राजयक्ष्मकम् ॥ ११२ ॥
वातरोगं निहन्त्याशु शुण्ठीसौवर्चलान्वितः ।
शर्कराधान्ययोगेन पित्तरोगं निहन्त्ययम् ॥ ११३ ॥
पिप्पलीक्षौद्रयोगेन श्लेष्मरोगं च तत्क्षणात् ।
अतः परतरो नास्ति धन्वन्तरिमतो रसः ॥ ११४ ॥
यह पाशुपतनामवाला रस तत्काल अग्निको दीपन करनेवाला, पाचक, हृदयको हितकारी और विषूचिका रोगको शीघ्र नष्ट करता है । मुसलीके क्वाथके साथ इस रसको सेवन करनेसे उदररोग दूर होते हैं । मोचरसके साथ देनेसे अतिसार, मट्ठे और सैंधानमकके साथ देनेसे संग्रहणी एवं कालानमक पीपल और सोंठ इनके समान भाग चूर्णके साथ इस रसको देनेसे शूलरोग दूर होता है । यह रस तक्रके साथ बवासीर, पीपलके साथ राजयक्ष्मा, सोंठ और कालेनमकके साथ सेवन करनेसे वातरोगको नष्ट करता है । एवं मिश्री और धनियेके साथ सेवन करनेसे पित्तके रोग और पीपल तथा शहदके साथ सेवन करनेसे कफके रोगोंको तत्क्षण दूर करता है ! इससे बढकर अन्य औषध नहीं है ऐसा धन्वन्तरि महाराजने कहा है ॥ ११०-११४ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३९५

अजीर्णबलकालानलरस ।

द्विपलं शुद्धसूतं च गन्धकं च सम समम् ।
लौहं ताम्रं हरतालं विषं तुत्थं सवङ्गकम् ॥ १५ ॥
पलप्रमाणं च पृथक् लवङ्गं टङ्कणं तथा ।
दन्तीमूलं त्रिवृच्चूर्णमेकैकं पलसम्मितम् ॥ १६ ॥
अजमोदा यमानी च द्विक्षारलवणानि च ।
पृथगर्द्धपलं ग्राह्यमेकीकृत्य च भावयेत् ॥ १७ ॥
आर्द्रकस्य रसेनैर्काविंशतिः पञ्चकोलजैः ।
दशधा भावयेत्तोयैर्गुडूचीनां रसैर्दश ॥ १८ ॥
सर्वार्द्धं मरिचं दत्त्वा काचकुप्यां च धारयेत् ।
चणमात्रां वटीं कृत्वा च्छायायां परिशोषयेत् ॥
रसोऽजीर्णबलकालानल एष प्रकीर्त्तितः ॥ १९ ॥

शुद्ध पारा ८ तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले, दोनोंकी कजली एवं लोहेकी भस्म, ताम्रभस्म, हरताल भस्म, शुद्ध विष, शुद्ध तूतिया, वंगभस्म, लौंग, सुहागा, दन्तीकी जड और निसोध ये प्रत्येक चार चार तोले तथा अजमोद, अजवायन, जवाखार, सज्जी और पाँचोंनमक प्रत्येक औषधि दो दो तोले, इन सबको एकत्र मिलाकर अदरकके रसमें २१ बार एवं पंचकोलकी औषधियोंके क्वाथमें और गिलोयके रसमें दसदस बार खरल करे । फिर इसमें समस्त औषधिसे आधा भाग मिरचोंका चूर्ण मिलाकर चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । उनको छायामें सुखाकर शीशीमें भरकर रखदेवे । इसको अजीर्णबलकालानलरस कहते हैं ॥ १५-१९ ॥

अनेककालनष्टाग्नेर्दीपनः परमः स्मृतः ॥ २० ॥
आमवातकुलध्वंसी प्लीहपाण्डुगदापहः ।
प्रमेहानाहविष्टम्भसूतिकाग्रहणीहरः ॥ २१ ॥
श्वासकासप्रतिश्याययक्ष्मक्षयविनाशनः ।
अम्लपित्तं च शूलं च भगन्दरगुदोद्भवौ ॥ २२ ॥
अष्टोदराणि प्लीहानं यकृतं हन्ति दारुणम् ।
आकण्ठं भोजयित्वा तु खादयेच्च रसोत्तमम् ॥ २३ ॥

३९६ भैषज्यरत्नावली । [ अग्निमान्द्य-


अर्द्धयामेन तत् सर्वं भस्मीभवति निश्चितम् ।
चतुर्विधरसोपेतं महाभोजनमिच्छतः ॥ २४ ॥
भोजस्य नृपतेः कांक्षां भोजनात्कृपया कृतः ।
गहनानन्दनाथेन सर्वलोकहितैषिणा ॥ २५ ॥

यह रस बहुत कालसे नष्टहुई जठराग्निको अत्यन्त दीपन करता है । एवं आमवात, प्लीहा, पाण्डुरोग, प्रमेह, अफारा, मलविवन्ध, प्रसूतरोग, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, प्रतिश्याय, राजयक्ष्मा, क्षय, अम्लपित्त, शूल, भगन्दर, बवासीर, ८ प्रकारके उदररोग और दारुण यकृत् इन सब रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है । जो कण्ठपर्यन्त भोजन करके इस रसको खावे तो खायाहुआ सब भोजन अर्द्धप्रहरमें ही निश्चय भस्म होजाता है । भोज्य, भक्ष्य, चोष्य और लेह्य इन चारों प्रकारके रसोंसे युक्त भोजनोंमें राजा भोजकी अधिक इच्छा होनेसे और संपूर्ण मनुष्योंके हितकी इच्छासे श्रीगहनानन्दनाथजीने कृपा करके इस रसको निर्माण किया है ॥ १२०-२५ ॥

शङ्खवटी ।

चिञ्चाक्षारपलं पटुव्रजपलं निम्बूरसे कल्कितं
तस्मिन् शंखपलं प्रतप्तमसकृत् संस्थाप्य शीर्णावधि ।
हिङ्ग्व्योषपलं रसामृतवलीन् निक्षिप्य निष्कांशिकान्
बद्धा शंखवटी क्षयग्रहणिकारुक्पंक्तिशूलादिषु ॥ २६ ॥

[ पटु-लवणं पञ्चलवणं मिलित्वा पलं हिङ्गुशुण्ठी-
पिप्पलीमरिचानामपि मिलित्वा पलं, रसविषगन्ध-
कानां प्रत्येकं निष्कं माषचतुष्टयं शंखं गड्ड्यां वह्नौ
ध्मात्वा निम्बुरसतप्तां निक्षिपेत् यावच्चूर्णीभूय तद्रसे
पतति सर्वं चूर्णमेकीकृत्य निम्बूरसेन रौद्रे तावद्
भावयेद्यावदम्लता भवति ]

इमलीका क्षार ४ तोले, पाँचोंनमक ४ तोले और शंखभस्म ४ तोले लेवे । उसमें शंखभस्म ४ तोले लेकर नींबूके रसमें न मिलने लगे तबतक अग्निमें तपाकर नींबूके रसमें बुझाता रहे । फिर सबचूर्णको एकत्र करके नीम्बूके रसमें धूपमें तबतक भावना देवे कि जबतक उसमें अम्लता ( खटाई ) न आजाय । हींग, सोंठ, पीपल और मिरच ये समान भाग मिश्रित ४ तोले