भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

७०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

समझना चाहिये। इसी प्रकार रेखाकी तरह दाढ़ दिखायी दे तो मदसे काटा हुआ, दो दाढ़ दिखायी दे और बड़ा घाव भर जाय तो भूखसे काटा हुआ, दो दाढ़ दिखायी दे और घावमें रक्त हो जाय तो विषके वेगसे काटा हुआ, दो दाढ़ दिखायी दे, किंतु घाव न रहे तो संतानकी रक्षाके लिये काटा हुआ मानना चाहिये। काकके पैरकी तरह तीन दाढ़ गहरे दिखायी दें या चार दाढ़ दिखायी दें तो कालकी प्रेरणासे काटा हुआ जानना चाहिये। यह

असाध्य है, इसकी कोई भी चिकित्सा नहीं है।*

सर्पके काटनेके दंष्ट्र, दंष्ट्रानुपीत और दंष्ट्रोद्भूत—ये तीन भेद हैं। सर्पके काटनेके बाद ग्रीवा यदि झुके तो दंष्ट्र तथा काटकर पार करे तो दंष्ट्रानुपीत कहते हैं। इसमें तिहाई विष चढ़ता है और काटकर सब विष उगल दे तथा स्वयं निर्विष होकर उलट जाय—पीठके बल उलटा हो जाय, उसका पेट दिखायी दे तो उसे दंष्ट्रोद्भूत कहते हैं।

(अध्याय ३३)

विभिन्न तिथियों एवं नक्षत्रोंमें कालसर्पसे डँसे हुए पुरुषके लक्षण, नागोंकी उत्पत्तिकी कथा

कश्यप मुनि बोले—गौतम! अब मैं कालसर्पसे काटे हुए पुरुषका लक्षण कहता हूँ, जिस पुरुषको कालसर्प काटता है, उसकी जिह्वा भंग हो जाती है, हृदयमें दर्द होता है, नेत्रोंसे दिखायी नहीं देता, दाँत और शरीर पके हुए जामुनके फलके समान काले पड़ जाते हैं, अङ्गोंमें शिथिलता आ जाती है, विष्टाका परित्याग होने लगता है, कंधे, कमर और ग्रीवा झुक जाते हैं, मुख नीचेकी ओर लटक जाता है, आँखें चढ़ जाती हैं, शरीरमें दाह और कम्प होने लगता है, बार-बार आँखें बंद हो जाती हैं, शस्त्रसे शरीरमें काटनेपर खून नहीं निकलता। बेतसे मारनेपर भी शरीरमें रेखा नहीं पड़ती, काटनेका स्थान कटे हुए जामुनके समान नीले रंगका, फूला हुआ, रक्तसे परिपूर्ण और कौएके पैरके समान हो जाता है, हिचकी आने लगती है, कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है, श्वासकी गति बढ़ जाती है, शरीरका रंग पीला पड़ जाता

है। ऐसी अवस्थाको कालसर्पसे काटा हुआ समझना चाहिये। उसकी मृत्यु आसन्न समझनी चाहिये।

घाव फूल जाय, नीले रंगका हो जाय, अधिक पसीना आने लगे, नाकसे बोलने लगे, ओठ लटक जाय, हृदयमें कम्प होने लगे तो कालसर्पसे काटा हुआ समझना चाहिये। दाँत पीसने लगे, नेत्र उलट जायें, लम्बी श्वास आने लगे, ग्रीवा लटक जाय, नाभि फड़कने लगे तो कालसर्पसे काटा हुआ जानना चाहिये। दर्पण या जलमें अपनी छाया न दीखे, सूर्य तेजहीन दिखायी पड़े, नेत्र लाल हो जायें, सम्पूर्ण शरीर कष्टके कारण कॉपने लगे तो उसे कालसर्पसे काटा हुआ समझना चाहिये, उसकी शीघ्र ही मृत्यु सम्भाव्य है।

अष्टमी, नवमी, कृष्णा चतुर्दशी और नागपञ्चमीके दिन जिसको साँप काटता है, उसके प्रायः प्राण नहीं बचते। आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, भरणी, कृत्तिका, विशाखा, तीनों पूर्वा, मूल, स्वाती और

  • सभी सर्पाकी दवाके रूपमें मन्त्र-शास्त्रोंमें विशेषकर गरुडोपनिषदमें गरुड-मन्त्र और सर्पाकी मणियाँ उनके विषकी अबूक ओषधियाँ हैं। कुछ अन्य ओषधियाँ भी अचूक होती हैं जो सर्पाको निर्विष एवं स्तम्भित बना देती हैं। इंडुभ सर्पके काट लेनेपर किसी भी अन्य सर्पका विष नहीं चढ़ता। नर्मदा नदीका नाम लेनेसे भी साँप भागते हैं—

नर्मदाये नमः प्रातर्नर्मदाये नमो निशि। नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पतः ॥ (विष्णुपु. ४। ३। १३)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

७१

शतभिषा नक्षत्रमें जिसको साँप काटता है वह भी नहीं जीता। इन नक्षत्रोंमें विष पीनेवाला व्यक्ति भी तत्काल मर जाता है। पूर्वोक्त तिथि और नक्षत्र दोनों मिल जायँ तथा खण्डहरमें, श्मशानमें और सूखे वृक्षके नीचे जिसे साँप काटता है वह नहीं जीता।

मनुष्यके शरीरमें एक सौ आठ मर्म-स्थान हैं, उनमें भी शंख अर्थात् ललाटकी हड्डी, आँख, भूमध्य, वस्ति, अण्डकोशका ऊपरी भाग, कक्ष, कंधे, हृदय, वक्षःस्थल, तालु, ठोढ़ी और गुदा—ये बारह मुख्य मर्म-स्थान हैं। इनमें सर्प काटनेसे अथवा शस्त्राघात होनेपर मनुष्य जीवित नहीं रहता।

अब सर्प काटनेके बाद जो वैद्यको बुलाने जाता है उस दूतका लक्षण कहता हूँ। उत्तम जातिका हीन वर्ण दूत और हीन जातिका उत्तम वर्ण दूत भी अच्छा नहीं होता। वह दूत हाथमें दंड लिये हुए हों, दो दूत हों, कृष्ण अथवा रक्तवस्त्र पहने हों, मुख ढके हों, सिरपर एक

वस्त्र लपेटे हो, शरीरमें तेल लगाये हो, केश खोले हो, जोरसे बोलता हुआ आये, हाथ-पैर पीटे तो ऐसा दूत अत्यन्त अशुभ है। जिस रोगीका दूत इन लक्षणोंसे युक्त वैद्यके समीप जाता है, वह रोगी अवश्य ही मर जाता है।

कश्यपजी बोले— गौतम! अब मैं भगवान् शिवके द्वारा कथित नागोंकी उत्पत्तिके विषयमें कहता हूँ। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने अनेक नागों एवं ग्रहोंकी सृष्टि की। अनन्त नाग सूर्य, वासुकि चन्द्रमा, तक्षक भौम, कर्कोटक बुध, पद्म बृहस्पति, महापद्म शुक्र, कुलिक और शंखपाल शनैश्चर ग्रहके रूप हैं। रविवारके दिन दसवाँ और चौदहवाँ यामार्थ, सोमवारको आठवाँ और बारहवाँ, भौमवारको छठा और दसवाँ, बुधवारको नवाँ, बृहस्पतिको दूसरा और छठा, शुक्रको चौथा, आठवाँ और दसवाँ, शनिवारको पहिला, सोलहवाँ, दूसरा और बारहवाँ प्रहरार्थ अशुभ है। इन समयोंमें सर्पके काटनेसे व्यक्ति जीवित नहीं रहता। (अध्याय ३४)

सर्पोंके विषका वेग, फैलाव तथा सात धातुओंमें प्राप्त विषके लक्षण और उनकी चिकित्सा

कश्यपजी बोले— गौतम! यदि यह ज्ञात हो जाय कि सर्पने अपने यमदूती नामक दाढ़से काटा है तो उसकी चिकित्सा न करे। उस व्यक्तिको मरा हुआ ही समझे*। दिनमें और रातमें दूसरा और सोलहवाँ प्रहरार्थ साँपोंसे सम्बन्धित नागोदय नामक वेला कही गयी है। उसमें साँप काटे तो कालके द्वारा काटा गया समझना चाहिये और उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। पानीमें बाल डुबोनेपर और उसे उठानेपर बालके अग्रभागसे जितना जल गिरता है, उतनी ही मात्रामें विष सर्प

प्रविष्ट कराता है। वह विष सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाता है। जितनी देरमें हाथ पसारना और समेटना होता है, उतने ही सूक्ष्म समयमें काटनेके बाद विष मस्तकमें पहुँच जाता है। हवासे आगकी लपट फैलनेके समान रक्तमें पहुँचनेपर विषकी बहुत वृद्धि हो जाती है। जैसे जलमें तेलकी बूँद फैल जाती है, वैसे ही त्वचामें पहुँचकर विष दूना हो जाता है। रक्तमें चौगुना, पित्तमें आठ गुना, कफमें सोलह गुना, वातमें तीस गुना, मज्जामें साठ गुना और प्राणोंमें पहुँचकर वही विष अनन्त

  • गारुडोपनिषद् एवं ताक्ष्योपनिषद्में यमदूतीके नामसे भी मन्त्र पढ़े गये हैं, यहाँ मध्यम नियमका वर्णन है। वैसे भगवत्कृपासे कुछ भी असाध्य नहीं है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

७२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

गुना हो जाता है। इस प्रकार सारे शरीरमें विषके व्याप्त हो जाने तथा श्रवणशक्ति बंद हो जानेपर वह जीव श्वास नहीं ले पाता और उसका प्राणान्त हो जाता है। यह शरीर पृथ्वी आदि पञ्चभूतोंसे बना है, मृत्युके बाद भूत-पदार्थ अलग-अलग हो जाते हैं और अपने-अपनेमें लीन हो जाते हैं। अतः विषकी चिकित्सा बहुत शीघ्र करनी चाहिये, विलम्ब होनेसे रोग असाध्य हो जाता है। सर्पादि जीवोंका विष जिस प्रकार प्राण हरण करनेवाला होता है, वैसे ही शंखिया आदि विष भी प्राणको हरण करनेवाले होते हैं।

विषके पहले वेगमें रोमाञ्च तथा दूसरे वेगमें पसीना आता है। तीसरे वेगमें शरीर काँपता है तथा चौथेमें श्रवणशक्ति अवरुद्ध होने लगती है, पाँचवेंमें हिचकी आने लगती है और छठेमें ग्रीवा लटक जाती है तथा सातवें वेगमें प्राण निकल जाते हैं। इन सात वेगोंमें शरीरके सातों धातुओंमें विष व्याप्त हो जाता है। इन धातुओंमें पहुँचे हुए विषका अलग-अलग लक्षण तथा उपचार इस प्रकार हैं—

आँखोंके आगे अँधेरा छा जाय और शरीरमें बार-बार जलन होने लगे तो यह जानना चाहिये कि विष त्वचामें है। इस अवस्थामें आककी जड़, अपामार्ग, तगर और प्रियंगु—इनको जलमें घोंटकर पिलानेसे विषकी बाधा शान्त हो सकती है। त्वचासे रक्तमें विष पहुँचनेपर शरीरमें दाह और मूर्च्छा होने लगती है। शीतल पदार्थ अच्छा लगता है। उशीर (खस), चन्दन, कूट, तगर, नीलोत्पल, सिंदुवारकी जड़, धतूरेकी जड़, हींग और मिरच—इनको पीसकर देना चाहिये। इससे बाधा शान्त न हो तो भटकटैया, इन्द्रायणकी जड़ और सर्पगन्धाको घीमें पीसकर देना चाहिये। यदि इससे भी शान्त न हो तो सिंदुवार और

हींगका नस्य देना चाहिये और पिलाना चाहिये। इसीका अञ्जन और लेप भी करना चाहिये, इससे रक्तमें प्राप्त विषकी बाधा शान्त हो जाती है।

रक्तसे पित्तमें विष पहुँच जानेपर पुरुष उठ-उठकर गिरने लगता है, शरीर पीला हो जाता है, सभी दिशाएँ पीले वर्णकी दिखायी देती हैं, शरीरमें दाह और प्रबल मूर्च्छा होने लगती है। इस अवस्थामें पीपल, शहद, महुआ, घी, तुम्बेकी जड़, इन्द्रायणकी जड़—इन सबको गोमूत्रमें पीसकर नस्य, लेपन तथा अञ्जन करनेसे विषका वेग हट जाता है।

पित्तसे विषके कफमें प्रवेश कर जानेपर शरीर जकड़ जाता है। श्वास भलीभाँति नहीं आती, कण्ठमें घर्घर शब्द होने लगता है और मुखसे लार गिरने लगती है। यह लक्षण देखकर पीपल, मिरच, सौंठ, श्लेष्मातक (बहुवार वृक्ष), लोध एवं मधुसारको समान भाग करके गोमूत्रमें पीसकर लेपन और अञ्जन लगाना चाहिये और उसे पिलाना भी चाहिये। ऐसा करनेसे विषका वेग शान्त हो जाता है।

कफसे वातमें विष प्रवेश करनेपर पेट फूल जाता है, कोई भी पदार्थ दिखायी नहीं पड़ता, दृष्टि-भंग हो जाता है। ऐसा लक्षण होनेपर शोणा (सोनागाछ)—की जड़, प्रियाल, गजपीपल, भारंगी, वचा, पीपल, देवदारु, महुआ, मधुसार, सिंदुवार और हींग—इन सबको पीसकर गोली बना ले और रोगीको खिलाये एवं अञ्जन तथा लेपन करे। यह औषधि सभी विषोंका हरण करती है।

वातसे मज्जामें विष पहुँच जानेपर दृष्टि नष्ट हो जाती है, सभी अङ्ग बेसुध हो शिथिल हो जाते हैं, ऐसा लक्षण होनेपर घी, शहद, शर्करायुक्त खस और चन्दनको घोंटकर पिलाना चाहिये और नस्य आदि भी देना चाहिये। ऐसा करनेसे विषका वेग हट जाता है।

मज्जासे मर्मस्थानोंमें विष पहुँच जानेपर सभी

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

७३

इन्द्रियाँ निश्चेष हो जाती हैं और वह जमीनपर गिर जाता है। काटनेसे रक्त नहीं निकलता, केशके उखाड़नेपर भी कष्ट नहीं होता, उसे मृत्युके ही अधीन समझना चाहिये। ऐसे लक्षणोंसे युक्त रोगीकी साधारण वैद्य चिकित्सा नहीं कर सकते। जिनके पास सिद्ध मन्त्र और ओषधि होगी वे ही ऐसे रोगियोंके रोगको हटानेमें समर्थ होते हैं। इसके लिये साक्षात् रुद्रने एक ओषधि कही है।

मोरका पित्त तथा मार्जारका पित्त और गन्धनाडीकी जड़, कुंकुम, तगर, कूट, कासमर्दकी छाल तथा उत्पल, कुमुद और कमल—इन तीनोंके केसर—सभीका समान भाग लेकर उसे गोमूत्रमें पीसकर नस्य दे, अञ्जन लगाये। ऐसा करनेसे कालसर्पसे ढँसा हुआ भी व्यक्ति शीघ्र विषरहित हो जाता है यह मृतसंजीवनी ओषधि है अर्थात् मरेको भी जिला देती है। (अध्याय ३५)

सर्पोंकी भिन्न-भिन्न जातियाँ, सर्पोंके काटनेके लक्षण, पञ्चमी तिथिका नागोंसे सम्बन्ध और पञ्चमी-तिथिमें नागोंके पूजनका फल एवं विधान

गौतम मुनिने कश्यपजीसे पूछा—महात्मन्! सर्प, सर्पिणी, बालसर्प, सूतिका, नपुंसक और व्यन्तर नामक सर्पोंके काटनेमें क्या भेद होता है, इनके लक्षण आप अलग-अलग बतायें।

कश्यपजी बोले—मैं इन सबको तथा सर्पोंके रूप-लक्षणोंको संक्षेपमें बतलाता हूँ, सुनिये—

यदि सर्प काटे तो दृष्टि ऊपरको हो जाती है, सर्पिणीके काटनेसे दृष्टि नीचे, बालसर्पके काटनेसे दाहिनी ओर और बालसर्पिणीके काटनेसे दृष्टि बायीं ओर झुक जाती है। गर्भिणीके काटनेसे पसीना आता है, प्रसूती काटे तो रोमाञ्च और कम्पन होता है तथा नपुंसकके काटनेसे शरीर टूटने लगता है। सर्प दिनमें, सर्पिणी रात्रिमें और नपुंसक संध्याके समय अधिक विषयुक्त होता है। यदि अँधेरेमें, जलमें, वनमें सर्प काटे या सोते हुए या प्रमत्तको काटे, सर्प न दिखायी पड़े अथवा दिखायी पड़े, उसकी जाति न पहचानी जाय और पूर्वोक्त लक्षणोंकी जानकारी न हो तो वैद्य उसकी कैसे चिकित्सा कर सकता है!

सर्प चार प्रकारके होते हैं—दर्वीकर, मण्डली, राजिल और व्यन्तर। इनमें दर्वीकरका विष वात-स्वभाव, मण्डलीका पित्त-स्वभाव, राजिलका कफ-

स्वभाव और व्यन्तर सर्पका संनिपात-स्वभावका होता है अर्थात् उसमें वात, पित्त और कफ—इन तीनोंकी अधिकता होती है। इन सर्पोंके रक्तकी परीक्षा इस प्रकार करनी चाहिये। दर्वीकर सर्पमें रक्त कृष्णवर्ण और स्वल्प होता है, मण्डलीमें बहुत गाढ़ा और लाल रंगका रक्त निकलता है, राजिल तथा व्यन्तरमें स्निग्ध और थोड़ा-सा रुधिर निकलता है। इन चार जातियोंके अतिरिक्त सर्पोंकी अन्य कोई पाँचवीं जाति नहीं मिलती। सर्प ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इन चार वर्णोंके होते हैं। ब्राह्मण सर्प काटे तो शरीरमें दाह होता है, प्रबल मूच्छा आ जाती है, मुख काला पड़ जाता है, मज्जा स्तम्भित हो जाती है और चेतना जाती रहती है। ऐसे लक्षणोंके दिखायी देनेपर अश्वगन्धा, अपामार्ग, सिंदुवारको घीमें पीसकर नस्य दे और पिलाये तो विषकी निवृत्ति हो जाती है। क्षत्रिय वर्णके सर्पके काटनेपर शरीरमें मूच्छा छा जाती है, दृष्टि ऊपरको हो जाती है, अत्यधिक पीड़ा होने लगती है और व्यक्ति अपनेको पहचान नहीं पाता। ऐसे लक्षणोंके होनेपर आककी जड़, अपामार्ग, इन्द्रायण और प्रियंगुको घीमें पीसकर मिला ले तथा इसीका नस्य देनेसे एवं पिलानेसे बाधा मिट

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

७४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जाती है। वैश्य सर्प डँसे तो कफ बहुत आता है, मुखसे लार बहती है, मूच्छा आ जाती है और वह चेतनाशून्य हो जाता है। ऐसा होनेपर अश्वगन्धा, गृहधूम, गुग्गुल, शिरीष, अर्क, पलाश और श्वेत गिरिकणिंका (अपराजिता)—इन सबको गोमूत्रमें पीसकर नस्य देने तथा पिलानेसे वैश्य सर्पकी बाधा तत्क्षण दूर हो जाती है। जिस व्यक्तिको शूद्र सर्प काटता है, उसे शीत लगकर ज्वर होता है, सभी अङ्ग चुलचुलाने लगते हैं, इसकी निवृत्तिके लिये कमल, कमलका केसर, लोध, क्षौद्र, शहद, मधुसार और श्वेतगिरिकर्णी—इन सबको समान भागोंमें लेकर शीतल जलके साथ पीसकर नस्य आदि दे और पान कराये। इससे विषका वेग शान्त हो जाता है।

ब्राह्मण सर्प मध्याह्नेके पहले, क्षत्रिय सर्प मध्याह्नेमें, वैश्य सर्प मध्याह्नेके बाद और शूद्र सर्प संध्याके समय विचरण करता है। ब्राह्मण सर्प वायु एवं पुष्प, क्षत्रिय मूषक, वैश्य मेढक और शूद्र सर्प सभी पदार्थोंका भक्षण करता है। ब्राह्मण सर्प आगे, क्षत्रिय दाहिने, वैश्य बायें और शूद्र सर्प पीछेसे काटता है। मैथुनकी इच्छासे पीड़ित सर्प विषके वेगके बढ़नेसे व्याकुल होकर बिना समय भी काटता है। ब्राह्मण सर्पमें पुष्पके समान गन्ध होती है, क्षत्रियमें चन्दनके समान, वैश्यमें घृतके समान और शूद्र सर्पमें मत्स्यके समान गन्ध होती है। ब्राह्मण सर्प नदी, कूप, तालाब, झरने, बाग-बगीचे और पवित्र स्थानोंमें रहते हैं। क्षत्रिय सर्प ग्राम, नगर आदिके द्वार, तालाब, चतुष्पथ तथा तोरण आदि स्थानोंमें, वैश्य सर्प श्मशान, ऊधर स्थान, भस्म, घास आदिके ढेर तथा वृक्षोंमें; इसी प्रकार शूद्र सर्प अपवित्र स्थान, निर्जन वन, शून्य घर, श्मशान आदि बुरे स्थानोंमें निवास करते हैं। ब्राह्मण सर्प श्वेत एवं कपिल

वर्ण, अग्रिके समान तेजस्वी, मनस्वी और सात्त्विक होते हैं। क्षत्रिय सर्प मूँगेके समान रक्तवर्ण अथवा सुवर्णके तुल्य पीत वर्ण तथा सूर्यके समान तेजस्वी, वैश्य सर्प अलसी अथवा बाण-पुष्पके समान वर्णवाले एवं अनेक रेखाओंसे युक्त तथा शूद्र सर्प अञ्जन अथवा काकके समान कृष्णवर्ण और धूम्रवर्णके होते हैं। एक अङ्गुष्ठके अन्तरमें दो दंश हों तो बालसर्पका काटा हुआ जानना चाहिये। दो अङ्गुल अन्तर हो तो तरुण सर्पका, ढाई अङ्गुल अन्तर हो तो वृद्ध सर्पका दंश समझना चाहिये।

अनन्तनाग सामने, वासुकि बायीं ओर, तक्षक दाहिनी ओर देखता है और कर्कोटककी दृष्टि पीछेकी ओर होती है। अनन्त, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल और कुलिक—ये आठ नाग क्रमशः पूर्वादि आठ दिशाओंके स्वामी हैं। पद्म, उत्पल, स्वस्तिक, त्रिशूल, महापद्म, शूल, क्षत्र और अर्धचन्द्र—ये क्रमशः आठ नागोंके आयुध हैं। अनन्त और कुलिक—ये दोनों ब्राह्मण नाग-जातियाँ हैं, शंख और वासुकि क्षत्रिय, महापद्म और तक्षक वैश्य तथा पद्म और कर्कोटक शूद्र नाग हैं। अनन्त और कुलिक नाग शुक्लवर्ण तथा ब्रह्माजीसे उत्पन्न हैं, वासुकि और शंखपाल रक्तवर्ण तथा अग्रिसे उत्पन्न हैं, तक्षक और महापद्म स्वल्प पीतवर्ण तथा इन्द्रसे उत्पन्न हैं, पद्म और कर्कोटक कृष्णवर्ण तथा यमराजसे उत्पन्न हैं।

सुमन्तु मुनिने पुनः कहा—राजन्! सर्पोंके ये लक्षण और चिकित्सा महर्षि कश्यपने महामुनि गौतमको उपदेशके प्रसंगमें कहे थे और यह भी बताया कि सदा भक्तिपूर्वक नागोंकी पूजा करे और पञ्चमीको विशेषरूपसे दूध, खीर आदिसे उनका पूजन करे। श्रावण शुक्ला पञ्चमीको द्वारके दोनों ओर गोबरके द्वारा नाग बनाये। दही, दूध,

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

७५

दूर्वा, पुष्प, कुश, गन्ध, अक्षत और अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे नागोंका पूजन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। ऐसा करनेपर उस पुरुषके कुलमें कभी सपोंका भय नहीं होता।

भाद्रपदकी पञ्चमीको अनेक रंगोंके नागोंको चित्रितकर घी, खीर, दूध, पुष्प आदिसे पूजनकर गुगुलकी धूप दे। ऐसा करनेसे तक्षक आदि नाग प्रसन्न होते हैं और उस पुरुषकी सात पीढ़ीतकको सोंपका भय नहीं रहता।

आश्विन मासकी पञ्चमीको कुशका नाग

बनाकर गन्ध, पुष्प आदिसे उनका पूजन करे। दूध, घी, जलसे स्नान कराये। दूधमें पके हुए गेहूँ और विविध नैवेद्योंका भोग लगाये। इस पञ्चमीको नागकी पूजा करनेसे वासुकि आदि नाग संतुष्ट होते हैं और वह पुरुष नागलोकमें जाकर बहुत कालतक सुखका भोग करता है। राजन्! इस पञ्चमी तिथिके कल्पका मैंने वर्णन किया। जहाँ 'ॐ कुरुकुल्ले फट् स्वाहा'—यह मन्त्र पढ़ा जाता है, वहाँ कोई सर्प नहीं आ सकता१।

(अध्याय ३६—३८)

षष्ठी-कल्प-निरूपणमें स्कन्द-षष्ठी-व्रतकी महिमा

सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अब मैं षष्ठी तिथि-कल्पका वर्णन करता हूँ। यह तिथि सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली है। कार्तिक मासकी षष्ठी तिथिको फलाहारकर यह तिथिव्रत किया जाता है२। यदि राज्यच्युत राजा इस व्रतका अनुष्ठान करे तो वह अपना राज्य प्राप्त कर लेता है। इसलिये विजयकी अभिलाषा रखनेवाले व्यक्तिको इस व्रतका प्रयत्न-पूर्वक पालन करना चाहिये।

यह तिथि स्वामिकार्तिकेयको अत्यन्त प्रिय है। इसी दिन कृतिकाओंके पुत्र कार्तिकेयका आविर्भाव हुआ था। वे भगवान् शङ्कर, अग्नि तथा गङ्गाके भी पुत्र कहे गये हैं। इसी षष्ठी तिथिको स्वामिकार्तिकेय देवसेनाके सेनापति हुए। इस तिथिको व्रत कर घृत, दही, जल और पुष्पोंसे स्वामिकार्तिकेयको दक्षिणकी ओर मुख कर अर्घ्य देना चाहिये।

अर्घ्यदानका मन्त्र इस प्रकार है—

समर्षिदारज स्कन्द स्वाहापतिसमुद्भव। रुद्रार्यमाग्निज विभो गङ्गागर्भ नमोऽस्तु ते। प्रियतां देवसेनानीः सम्पादयतु हृदतम्॥

(ब्राह्मपर्व ३९।६)

ब्राह्मणको अन्न देकर रात्रिमें फलका भोजन और भूमिपर शयन करना चाहिये। व्रतके दिन पवित्र रहे और ब्रह्मचर्यका पालन करे। शुक्ल-पक्ष तथा कृष्णपक्ष—दोनों षष्ठियोंको यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके करनेसे भगवान् स्कन्दकी कृपासे सिद्धि, धृति, तुष्टि, राज्य, आयु, आरोग्य और मुक्ति मिलती है। जो पुरुष उपवास न कर सके, वह रात्रि-व्रत ही करे, तब भी दोनों लोकोंमें उत्तम फल प्राप्त होता है। इस व्रतको करनेवाले पुरुषको देवता भी नमस्कार करते हैं और वह इस लोकमें आकर चक्रवर्ती राजा होता है। राजन्! जो पुरुष षष्ठी-व्रतके माहात्म्यका भक्तिपूर्वक श्रवण

१-कश्मीर नागोंका देश माना जाता है। 'नीलमतपुराण' में इसका विस्तृत वर्णन है।

२-पञ्चाङ्गोंके अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ला षष्ठीको स्कन्द-षष्ठी होती है तथा कार्तिक शुक्ला षष्ठीको रवि-षष्ठी मानी जाती है, जिस दिन सम्पूर्ण भारतमें सूर्योपासना होती है। परंतु यहाँ कार्तिक शुक्ला षष्ठीके रूपमें वर्णन आया है, यह गणना अमान्तमास (अमावास्याको पूर्ण होनेवाले मास)-के अनुसार प्रतीत होती है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

७६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

करता है, वह भी स्वामिकातिकेयकी कृपासे विविध उत्तम भोग, सिद्धि, तुष्टि, धृति और लक्ष्मीको प्राप्त करता है। परलोकमें वह उत्तम गतिका भी अधिकारी होता है। (अध्याय ३९)

आचरणकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन

राजा शतानीकने कहा—मुने! अब आप ब्राह्मण आदिके आचरणकी श्रेष्ठताके विषयमें बतलानेकी कृपा करें।

सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! मैं अत्यन्त संक्षेपमें इस विषयको बताता हूँ, उसे आप सुनें। न्याय-मार्गका अनुसरण करनेवाले शास्त्रकारोंने कहा है कि 'वेद आचारहीनको पवित्र नहीं कर सकते, भले ही वह सभी अङ्गोंके साथ वेदोंका अध्ययन कर ले। वेद पढ़ना तो ब्राह्मणका शिल्पमात्र है, किंतु ब्राह्मणका मुख्य लक्षण तो सदाचरण ही बतलाया गया है*।' चारों वेदोंका अध्ययन करनेपर भी यदि वह आचरणसे हीन है तो उसका अध्ययन वैसे ही निष्फल होता है, जिस प्रकार नपुंसकके लिये स्त्रीरत्न निष्फल होता है।

जिनके संस्कार उत्तम होते हैं, वे भी दुराचरण कर पतित हो जाते हैं और नरकमें पड़ते हैं तथा संस्कारहीन भी उत्तम आचरणसे अच्छे कहलाते हैं एवं स्वर्ग प्राप्त करते हैं। मनमें दुष्टता भरी रहे, बाहरसे सब संस्कार हुए हों, ऐसे वैदिक संस्कारोंसे संस्कृत कतिपय पुरुष आचरणमें शूद्रोंसे भी अधिक मलिन हो जाते हैं। क्रूर कर्म करनेवाला, ब्रह्महत्या करनेवाला, गुरुदारगामी, चोर, गौओंको मारनेवाला, मद्यपायी, परस्त्रीगामी, मिथ्यावादी, नास्तिक, वेदनिन्दक, निषिद्ध कर्मोंका आचरण करनेवाला यदि ब्राह्मण है और सभी तरहके संस्कारसे सम्पन्न भी है, वेद-वेदाङ्ग-पारङ्गत भी है, फिर भी उसकी सद्गति नहीं होती। दयाहीन, हिंसक, अतिशय

दाम्भिक, कपटी, लोभी, पिशुन (चुगलखोर), अतिशय दुष्ट पुरुष वेद पढ़कर भी संसारको उगते हैं और वेदको बेचकर अपना जीवन-यापन करते हैं, अनेक प्रकारके छल-छिद्रसे प्रजाकी हिंसा कर केवल अपना सांसारिक सुख सिद्ध करते हैं। ऐसे ब्राह्मण शूद्रसे भी अधम हैं।

जो ग्राह्य-अग्राह्यके तत्त्वको जाने, अन्याय और कुमार्गका परित्याग करे, जितेन्द्रिय, सत्यबादी और सदाचारी हो, नियमोंके पालन, आचार तथा सदाचरणमें स्थिर रहे, सबके हितमें तत्पर रहे, वेद-वेदाङ्ग और शास्त्रका मर्मज्ञ हो, समाधिमें स्थित रहे, क्रोध, मत्सर, मद तथा शोक आदिसे रहित हो, वेदके पठन-पाठनमें आसक्त रहे, किसीका अत्यधिक सङ्ग न करे, एकान्त और पवित्र स्थानमें रहे, सुख-दुःखमें समान हो, धर्मनिष्ठ हो, पापाचरणसे डरे, आसक्तिरहित, निरहंकार, दानी, शूर, ब्रह्मवेता, शान्त-स्वभाव और तपस्वी हो तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें परिनिष्ठित हो—इन गुणोंसे युक्त पुरुष ब्राह्मण होते हैं। ब्रह्मके भक्त होनेसे ब्राह्मण, क्षतसे रक्षा करनेके कारण क्षत्रिय, वार्ता (कृषि-विद्या आदि)-का सेवन करनेसे वैश्य और शब्द-श्रवणमात्रसे जो द्रुतगति हो जायँ, वे शूद्र कहलाते हैं। क्षमा, दम, शम, दान, सत्य, शौच, धृति, दया, मृदुता, त्रह्युता, संतोष, तप, निरहंकारता, अक्रोध, अनसूया, अतृष्णता, अस्तेय, अमात्सर्य, धर्मज्ञान, ब्रह्मचर्य, ध्यान, आस्तिक्य, वैराग्य, पाप-भीरुता, अद्वेष,

  • आचारहीनान् न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह यद्भिर्द्वैः । शिल्पं हि वेदाध्ययनं द्विजानां वृत्तं स्मृतं ब्राह्मणलक्षणं तु॥

(ब्राह्मपर्व ४१।८)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

७७

गुरुशुश्रूषा आदि गुण जिनमें रहते हैं, उनका ब्राह्मणत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहता है।

शम, तप, दम, शौच, क्षमा, ऋजुता, ज्ञान-विज्ञान और आस्तिक्य—ये ब्राह्मणोंके सहज कर्म हैं। ज्ञानरूपी शिखा, तपोरूपी सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत जिनके रहते हैं, उनको मनुने ब्राह्मण कहा है। पाप-कर्मोंसे निवृत्त होकर उत्तम आचरण करनेवाला

भी ब्राह्मणके समान ही है। शीलसे युक्त शूद्र भी ब्राह्मणसे प्रशस्त हो सकता है और आचाररहित ब्राह्मण भी शूद्रसे अधम हो जाता है।

जिस तरह दैव और पौरुषके मिलनेपर कार्य सिद्ध होते हैं, वैसे ही उत्तम जाति और सत्कर्मका योग होनेपर आचरणकी पूर्णता सिद्ध होती है।

(अध्याय ४०—४५)

भगवान् कार्तिकेय तथा उनके षष्ठी-व्रतकी महिमा

सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! भाद्रपद मासकी षष्ठी तिथि बहुत उत्तम तिथि है, यह सभी पापोंका हरण करनेवाली, पुण्य प्रदान करनेवाली तथा सभी कल्याण-मङ्गलोंको देनेवाली है। यह तिथि कार्तिकेयको अतिशय प्रिय है। इस दिन किया हुआ स्नान, दान आदि सत्कर्म अक्षय होता है। जो दक्षिण दिशा (कुमारिकाक्षेत्र)—में निवास करनेवाले कुमार कार्तिकेयका इस तिथिको दर्शन करते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाते हैं, इसलिये इस तिथिमें भगवान् कार्तिकेयका अवश्य दर्शन करना चाहिये। भक्तिपूर्वक कार्तिकेयका पूजन करनेसे मानव मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है और अन्तमें इन्द्रलोकमें निवास करता है। ईट, पत्थर, काष्ठ आदिके द्वारा श्रद्धापूर्वक कार्तिकेयका मन्दिर बनानेवाला पुरुष स्वर्णके विमानमें बैठकर कार्तिकेयके लोकमें जाता है। इनके मन्दिरपर ध्वजा चढ़ाने तथा झाडू-पोंछा (मार्जन) आदि करनेसे रुद्रलोक

प्राप्त होता है। चन्दन, अगर, कपूर आदिसे कार्तिकेयकी पूजा करनेपर हाथी, घोड़ा आदि वाहनोंका स्वामी होता है और सेनापतित्व भी प्राप्त होता है। राजाओंको कार्तिकेयकी अवश्य ही आराधना करनी चाहिये। जो राजा कृत्तिकाओंके पुत्र भगवान् कार्तिकेयकी आराधना कर युद्धके लिये प्रस्थान करता है, वह देवराज इन्द्रकी तरह अपने शत्रुओंको परास्त कर देता है। कार्तिकेयकी चम्पक आदि विविध पुष्पोंसे पूजा करनेवाला व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और शिवलोकको प्राप्त करता है। इस भाद्रपद मासकी षष्ठीको तेलका सेवन नहीं करना चाहिये। षष्ठी तिथिको व्रत एवं पूजनकर रात्रिमें भोजन करनेवाला व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो कार्तिकेयके लोकमें निवास करता है। जो व्यक्ति कुमारिकाक्षेत्रमें स्थित भगवान् कार्तिकेयका दर्शन एवं भक्तिपूर्वक उनका पूजन करता है, वह अखण्ड शान्ति प्राप्त करता है। (अध्याय ४६)

ससमी-कल्पमें भगवान् सूर्यके परिवारका निरूपण एवं शाक-ससमी-व्रत

सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! अब मैं ससमी-कल्पका वर्णन करता हूँ। ससमी तिथिको भगवान् सूर्यका आविर्भाव हुआ था। वे अण्डके साथ उत्पन्न हुए और अण्डमें रहते हुए ही उन्होंने वृद्धि

प्राप्त की। बहुत दिनोंतक अण्डमें रहनेके कारण ये 'मार्तण्ड' के नामसे प्रसिद्ध हुए। जब ये अण्डमें ही स्थित थे तो दक्ष प्रजापतिने अपनी रूपवती कन्या रूपाको भायाँके रूपमें इन्हें अर्पित

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

७८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

किया*। दक्षकी आज्ञासे विश्वकर्मा ने इनके शरीरका संस्कार किया, जिससे ये अतिशय तेजस्वी हो गये। अण्डमें स्थित रहते ही इन्हें यमुना एवं यम नामकी दो संतानें प्राप्त हुई। भगवान् सूर्यका तेज सहन न कर सकनेके कारण उनकी स्त्री व्याकुल हो सोचने लगी—इनके अतिशय तेजके कारण मेरी दृष्टि इनकी ओर ठहर नहीं पाती, जिससे इनके अङ्गोंको मैं देख नहीं पा रही हूँ। मेरा सुवर्ण-वर्ण, कमनीय शरीर इनके तेजसे दग्ध हो श्यामवर्णका हो गया है। इनके साथ मेरा निर्वाह होना बहुत कठिन है। यह सोचकर उसने अपनी छायासे एक स्त्री उत्पन्न कर उससे कहा—‘तुम भगवान् सूर्यके समीप मेरी जगह रहना, परंतु यह भेद खुलने न पाये।’ ऐसा समझाकर उसने उस छाया नामकी स्त्रीको वहाँ रख दिया तथा अपनी संतान यम और यमुनाको वहाँ छोड़कर वह तपस्या करनेके लिये उत्तरकुरु देशमें चली गयी और वहाँ घोड़ीका रूप धारण कर तपस्यामें रत रहते हुए इधर-उधर अनेक वर्षोंतक घूमती रही।

भगवान् सूर्यने छायाको ही अपनी पत्नी समझा। कुछ समयके बाद छायासे शनैश्चर और तपती नामकी दो संतानें उत्पन्न हुई। छाया अपनी संतानपर यमुना तथा यमसे अधिक स्नेह करती थी। एक दिन यमुना और तपतीमें विवाद हो गया। पारस्परिक शापसे दोनों नदी हो गयीं। एक बार छायाने यमुनाके भाई यमको ताड़ित किया। इसपर यमने क्रुद्ध होकर छायाको मारनेके लिये पैर उठाया। छायाने क्रुद्ध होकर शाप दे दिया—‘मूढ़! तुमने मेरे ऊपर चरण उठाया है, इसलिये तुम्हारा प्राणियोंका प्राणहिंसक रूपी यह बीभत्स कर्म तबतक रहेगा, जबतक सूर्य और चन्द्र रहेंगे। यदि तुम मेरे शापसे कलुषित अपने पैरको

पृथ्वीपर रखोगे तो कृमिगण उसे खा जायेंगे।’

यम और छायाका इस प्रकार विवाद हो ही रहा था कि उसी समय भगवान् सूर्य वहाँ आ पहुँचे। यमने अपने पिता भगवान् सूर्यसे कहा—‘पिताजी! यह हमारी माता कदापि नहीं हो सकती, यह कोई और स्त्री है। यह हमें नित्य क्रूर भावसे देखती है और हम सभी भाई-बहनोंमें समान दृष्टि तथा समान व्यवहार नहीं रखती। यह सुनकर भगवान् सूर्यने क्रुद्ध होकर छायासे कहा—‘तुम्हें यह उचित नहीं है कि अपनी संतानोंमें ही एकसे प्रेम करो और दूसरेसे द्वेष। जितनी संतानें हों सबको समान ही समझना चाहिये। तुम विषम-दृष्टिसे क्यों देखती हो? यह सुनकर छाया तो कुष्ठ न बोली, पर यमने पुनः कहा—‘पिताजी! यह दुष्टा मेरी माता नहीं है, बल्कि मेरी माताकी छाया है। इसीसे इसने मुझे शाप दिया है।’ यह कहकर यमने पूरा वृत्तान्त उन्हें बतला दिया। इसपर भगवान् सूर्यने कहा—‘बेटा! तुम चिन्ता न करो। कृमिगण मांस और रुधिर लेकर भूलोकको चले जायेंगे, इससे तुम्हारा पाँव गलेगा नहीं, अच्छा हो जायगा और ब्रह्माजीकी आज्ञासे तुम लोकपालपदको भी प्राप्त करोगे। तुम्हारी बहन यमुनाका जल गङ्गाजलके समान पवित्र हो जायगा और तपतीका जल नर्मदाजलके तुल्य पवित्र माना जायगा। आजसे यह छाया सबके देहोंमें अवस्थित होगी।’

ऐसी व्यवस्था और मर्यादा स्थिर कर भगवान् सूर्य दक्ष प्रजापतिके पास गये और उन्हें अपने आगमनका कारण बताते हुए सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। इसपर दक्ष प्रजापतिने कहा—‘आपके अति प्रचण्ड तेजसे व्याकुल होकर आपकी भायी उत्तरकुरु देशमें चली गयी है। अब आप विश्वकर्मासे अपना रूप प्रशस्त करवा लें।’ यह कहकर उन्होंने

  • सूर्यकी पत्नी ‘रूपा’ का दूसरा नाम ‘संज्ञा’ है। अन्य पुराणोंमें संज्ञाको विश्वकर्माकी पुत्री कहा गया है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

७९

विश्वकर्माको बुलाकर उनसे कहा—‘विश्वकर्मन्! आप इनका सुन्दर रूप प्रकाशित कर दें।’ तब सूर्यकी सम्मति पाकर विश्वकर्माने अपने तक्षण-कर्मसे सूर्यको खरादना प्रारम्भ किया। अङ्गोंके तराशनेके कारण सूर्यको अतिशय पीड़ा हो रही थी और बार-बार मूर्च्छा आ जाती थी। इसीलिये विश्वकर्माने सब अङ्ग तो ठीक कर लिये, पर जब पैरोंकी अङ्गुलियोंको छोड़ दिया तब सूर्य भगवान्ने कहा—‘विश्वकर्मन्! आपने तो अपना कार्य पूर्ण कर लिया, परंतु हम पीड़ासे व्याकुल हो रहे हैं। इसका कोई उपाय बताइये।’ विश्वकर्माने कहा—‘भगवन्! आप रक्त चन्दन और करवीरके पुष्पोंका सम्पूर्ण शरीरमें लेप करें, इससे तत्काल यह वेदना शान्त हो जायगी।’ भगवान् सूर्यने विश्वकर्माके कथनानुसार अपने सारे शरीरमें इनका लेप किया, जिससे उनकी सारी वेदना मिट गयी। उसी दिनसे रक्त चन्दन और करवीरके पुष्प भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय हो गये और उनकी पूजामें प्रयुक्त होने लगे। सूर्यभगवान्के शरीरके खरादनेसे जो तेज निकला, उस तेजसे दैत्योंके विनाश करनेवाले वज्रका निर्माण हुआ।

भगवान् सूर्यने भी अपना उत्तम रूप प्राप्तकर प्रसन्नमनसे अपनी भायिके दर्शनोंकी उत्कैण्टासे तत्काल उत्तरकुरुकी ओर प्रस्थान किया। वहाँ उन्होंने देखा कि वह घोड़ीका रूप धारण कर विचरण कर रही है। भगवान् सूर्य भी अश्वका रूप धारण कर उससे मिले।

पर-पुरुषकी आशंकासे उसने अपने दोनों नासापुटोंसे सूर्यके तेजको एक साथ बाहर फेंक दिया, जिससे अश्वनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई और यही देवताओंके वैद्य हुए। तेजके अन्तिम अंशसे रेवन्तकी उत्पत्ति हुई। तपती, शनि और सावर्णि—ये तीन संतानें छायासे और यमुना तथा यम

संज्ञासे उत्पन्न हुए। सूर्यको अपनी भार्या उत्तरकुरुमें ससमी तिथिके दिन प्राप्त हुई, उन्हें दिव्य रूप ससमी तिथिको ही मिला तथा संतानें भी इसी तिथिको प्राप्त हुई, अतः ससमी तिथि भगवान् सूर्यको अतिशय प्रिय है।

जो व्यक्ति पञ्चमी तिथिको एक समय भोजन कर षष्ठीको उपवास करता है तथा ससमीको दिनमें उपवास कर भक्ष्य-भोज्योंके साथ विविध शाक-पदार्थोंको भगवान् सूर्यके लिये अर्पण कर ब्राह्मणोंको देता है तथा रात्रिमें मौन होकर भोजन करता है, वह अनेक प्रकारके सुखोंका भोग करता है तथा सर्वत्र विजय प्राप्त करता एवं अन्तमें उत्तम विमानपर चढ़कर सूर्यलोकमें कई मन्वन्तरोंतक निवासकर पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रोंसे समन्वित चक्रवर्ती राजा होता है तथा दीर्घकालपर्यन्त निष्कण्टक राज्य करता है।

राजा कुरुने इस ससमी-व्रतका बहुत कालतक अनुष्ठान किया और केवल शाकका ही भोजन किया। इसीसे उन्होंने कुरुक्षेत्र नामक पुण्यक्षेत्र प्राप्त किया और इसका नाम रखा धर्मक्षेत्र। ससमी, नवमी, षष्ठी, तृतीया और पञ्चमी—ये तिथियाँ बहुत उत्तम हैं और स्त्री-पुरुषोंको मनोवाञ्छित फल प्रदान करनेवाली हैं। माघकी ससमी, आश्विनकी नवमी, भाद्रपदकी षष्ठी, वैशाखकी तृतीया और भाद्रपद मासकी पञ्चमी—ये तिथियाँ इन महीनोंमें विशेष प्रशस्त मानी गयी हैं। कार्तिक शुक्ला ससमीसे इस व्रतको ग्रहण करना चाहिये। उत्तम शाकको सिद्ध कर ब्राह्मणोंको देना चाहिये और रात्रिमें स्वयं भी शाक ही ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार चार मासतक व्रतकर व्रतका पहला पारण करना चाहिये। उस दिन पञ्चगव्यसे सूर्यभगवान्को स्नान कराना चाहिये और स्वयं भी पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये, अनन्तर

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

८०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

केसरका चन्दन, अगस्त्यके पुष्प, अपराजित नामक धूप और पायसका नैवेद्य सूर्यनारायणको समर्पित करना चाहिये। ब्राह्मणोंको भी पायसका भोजन कराना चाहिये। दूसरे पारणमें कुशाके जलसे भगवान् सूर्यनारायणको स्नान कराकर स्वयं गोमयका प्राशन करना चाहिये और श्वेतचन्दन, सुगन्धित पुष्प, अगुरुका धूप तथा गुडके अपूप नैवेद्यमें अर्पण करना चाहिये और वर्षके समाप्त होनेपर तीसरा पारण करना चाहिये। गौर सर्षपका उबटन लगाकर भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। इससे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। फिर रक्तचन्दन, करवीरके पुष्प, गुग्गुलका धूप और अनेक भक्ष्य-भोज्यसहित दही-भात नैवेद्यमें अर्पण करना चाहिये

तथा यही ब्राह्मणोंको भी भोजन कराना चाहिये। भगवान् सूर्यनारायणके सम्मुख ब्राह्मणसे पुराण-श्रवण करना चाहिये अथवा स्वयं बाँचना चाहिये। अन्तमें ब्राह्मणको भोजन कराकर पौराणिकको वस्त्र-आभूषण, दक्षिणा आदि देकर प्रसन्न करना चाहिये। पौराणिकके संतुष्ट होनेपर भगवान् सूर्यनारायण प्रसन्न हो जाते हैं। रक्त चन्दन, करवीरके पुष्प, गुग्गुलका धूप, मोदक, पायसका नैवेद्य, घृत, ताम्रपात्र, पुराण-ग्रन्थ और पौराणिक—ये सब भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय हैं। राजन्! यह शाक-ससमी-व्रत भगवान् सूर्यको अति प्रिय है। इस व्रतका करनेवाला पुरुष भाग्यशाली होता है। (अध्याय ४७)

श्रीकृष्ण-साम्ब-संवाद तथा भगवान् सूर्यनारायणकी पूजन-विधि

राजा शतानीकने कहा—ब्राह्मणश्रेष्ठ! भगवान् सूर्यनारायणका माहात्म्य सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, इसलिये ससमी-कल्पका आप पुनः कुछ और विस्तारसे वर्णन करें।

सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! इस विषयमें भगवान् श्रीकृष्ण और उनके पुत्र साम्बका जो परस्पर संवाद हुआ था, उसीका मैं वर्णन करता हूँ, उसे आप सुनें।

एक समय साम्बने अपने पिता भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा—‘पिताजी! मनुष्य संसारमें जन्म-ग्रहणकर कौन-सा कर्म करे, जिससे उसे दुःख न हो और मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त कर वह स्वर्ग प्राप्त करे तथा मुक्ति भी प्राप्त कर सके। इन सबका आप वर्णन करें। मेरा मन इस संसारमें अनेक प्रकारकी आधि-व्याधियोंको देखकर अत्यन्त उदास हो रहा है, मुझे क्षणमात्र भी जीनेकी इच्छा नहीं होती, अतः आप कृपाकर ऐसा उपाय बतायें कि जितने

दिन भी इस संसारमें रहा जाय, ये आधि-व्याधियाँ पीड़ित न कर सकें और फिर इस संसारमें जन्म न हो अर्थात् मोक्ष प्राप्त हो जाय।’

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—वत्स! देवताओंके प्रसादसे, उनके अनुग्रहसे तथा उनकी आराधना करनेसे यह सब कुछ प्राप्त हो सकता है। देवताओंकी आराधना ही परम उपाय है। देवता अनुमान और आगम-प्रमाणोंसे सिद्ध होते हैं। विशिष्ट पुरुष विशिष्ट देवताकी आराधना करे तो वह विशिष्ट फल प्राप्त कर सकता है।

साम्बने कहा—महाराज! प्रथम तो देवताओंके अस्तित्वमें ही संदेह है, कुछ लोग कहते हैं देवता हैं और कुछ कहते हैं कि देवता नहीं हैं, फिर विशिष्ट देवता किन्हें समझा जाय?

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—वत्स! आगमसे, अनुमानसे और प्रत्यक्षसे देवताओंका होना सिद्ध होता है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

८१

साम्बने कहा—यदि देवता प्रत्यक्ष सिद्ध हो सकते हैं तो फिर उनके साधनके लिये अनुमान और आगम-प्रमाणकी कुछ भी अपेक्षा नहीं है।

श्रीकृष्ण बोले—वत्स! सभी देवता प्रत्यक्ष नहीं होते। शास्त्र और अनुमानसे ही हजारों देवताओंका होना सिद्ध होता है।

साम्बने कहा—पिताजी! जो देवता प्रत्यक्ष हैं और विशिष्ट एवं अभीष्ट फलोंको देनेवाले हैं, पहले आप उन्हींका वर्णन करें। अनन्तर शास्त्र तथा अनुमानसे सिद्ध होनेवाले देवताओंका वर्णन करें।

श्रीकृष्णने कहा—प्रत्यक्ष देवता तो संसारके नेत्रस्वरूप भगवान् सूर्यनारायण ही हैं, इनसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। सम्पूर्ण जगत् इन्हींसे उत्पन्न हुआ है और अन्तमें इन्हींमें विलीन भी हो जायगा*।

सत्य आदि युगों और कालकी गणना इन्हींसे सिद्ध होती है। ग्रह, नक्षत्र, योग, करण, राशि, आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, अश्विनीकुमार, इन्द्र, प्रजापति, दिशाएँ, भूः, भुवः, स्वः—ये सभी लोक और पर्वत, नदी, समुद्र, नाग तथा सम्पूर्ण भूतग्रामकी उत्पत्तिके एकमात्र हेतु भगवान् सूर्यनारायण ही हैं। यह सम्पूर्ण चराचर-जगत् इनकी ही इच्छासे उत्पन्न हुआ है। इनकी ही इच्छासे स्थित है और सभी इनकी ही इच्छासे अपने-अपने व्यवहारमें प्रवृत्त होते हैं। इन्हींके अनुग्रहसे यह सारा संसार प्रयत्नशील दिखायी देता है। सूर्यभगवान्के उदयके साथ जगत्का उदय और उनके अस्त होनेके साथ जगत् अस्त होता है। इनसे अधिक न कोई देवता हुआ और न होगा। वेदादि शास्त्रों तथा इतिहास-

पुराणदिमें इनका परमात्मा, अन्तरात्मा आदि शब्दोंसे प्रतिपादन किया गया है। ये सर्वत्र व्याप्त हैं। इनके सम्पूर्ण गुणों और प्रभावोंका वर्णन सौ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। इसीलिये दिवाकर, गुणाकर, सबके स्वामी, सबके स्रष्टा और सबका संहार करनेवाले भी ये ही कहे गये हैं। ये स्वयं अव्यय हैं।

जो पुरुष सूर्य-मण्डलकी रचना कर प्रातः, मध्याह्न और सायं उनकी पूजा कर उपस्थान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है। फिर जो प्रत्यक्ष सूर्यनारायणका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, उसके लिये कौन-सा पदार्थ दुर्लभ है। जो अपनी अन्तरात्मामें ही मण्डलस्थ भगवान् सूर्यको अपनी बुद्धिद्वारा निश्चित कर लेता है तथा ऐसा समझकर वह इनका ध्यानपूर्वक पूजन, हवन एवं जप करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त करता है और अन्तमें इनके लोकको प्राप्त होता है। इसलिये हे पुत्र! यदि तुम संसारमें सुख चाहते हो और भुक्ति तथा मुक्तिकी इच्छा रखते हो तो विधिपूर्वक प्रत्यक्ष देवता भगवान् सूर्यकी तन्मयतासे आराधना करो। इससे तुम्हें आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक कोई भी दुःख नहीं होंगे। जो सूर्यभगवान्की शरणमें जाते हैं, उनको किसी प्रकारका भय नहीं होता और उन्हें इस लोक तथा परलोकमें शाश्वत सुख प्राप्त होता है। स्वयं मैंने भगवान् सूर्यकी बहुत कालतक यथाविधि आराधना की है, उन्हींकी कृपासे यह दिव्य ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ है। इससे बढ़कर मनुष्योंके हितका और कोई उपाय नहीं है। (अध्याय ४८)

  • प्रत्यक्षं देवता सूर्यो जगच्छुर्दिवाकरः। तस्मादभ्यधिका काचिदेवता नास्ति शाश्वती ॥

यस्माददिं जगजातं लयं यास्यति यत्र च। (ब्राह्मपर्व ४८। २१-२२)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

८२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

श्रीसूर्यनारायणके नित्यार्चनका विधान

भगवान् श्रीकृष्णाने कहा—साम्ब! अब हम सूर्यनारायणके पूजनका विधान बताते हैं, जिसके करनेसे सम्पूर्ण पाप और विघ्न नष्ट हो जाते हैं तथा सभी मनोरथोंकी सिद्धि होती है और पुण्य भी प्राप्त होता है। प्रातःकाल उठकर शौच आदिसे निवृत्त हो नदीके तटपर जाकर आचमन करे तथा सूर्योदयके समय शुद्ध मृत्तिकाका शरीरपर लेपन कर स्नान करे। पुनः आचमन कर शुद्ध वस्त्र धारण करे और ससाक्षर-मन्त्र 'ॐ खखोल्लाक्य स्वाहा' से सूर्यभगवान्को अर्घ्य दे तथा हृदयमें मन्त्रका ध्यान करे एवं सूर्य-मन्दिरमें जाकर सूर्यकी पूजा करे। सर्वप्रथम श्रद्धापूर्वक पूरक, रेचक और कुम्भक नामक प्राणायाम कर वायवी, आग्रेयी, माहेन्द्री तथा वारुणी धारणा करके भूतशुद्धिकी रीतिसे शरीरका शोषण, दहन, स्तम्भन एवं प्लावन करके अपने शरीरकी शुद्धि कर ले। अपने शुद्ध हृदयमें भगवान् सूर्यकी भावना कर उन्हें प्रणाम करे। स्थूल, सूक्ष्म शरीर तथा इन्द्रियोंको अपने-अपने स्थानोंमें उपन्यस्त करे। 'ॐ खः स्वाहा हृदयाय नमः, ॐ खं स्वाहा शिरसे स्वाहा, ॐ उल्लाक्य स्वाहा शिखायै वषट्, ॐ याय स्वाहा कवचाय हुम्, ॐ स्वां स्वाहा नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ हां स्वाहा अस्त्राय फट्।'

—इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास कर पूजन-सामग्रीका मूल मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलद्वारा प्रोक्षण करे। फिर सुगन्धित पुष्पादि उपचारोंसे सूर्यभगवान्का पूजन करे। सूर्यनारायणकी पूजा दिनेके समय सूर्य-मूर्तिमें और रात्रिके समय अग्रिममें करनी चाहिये। प्रभातकालमें पूर्वाभिमुख, सायंकालमें पश्चिमाभिमुख तथा रात्रिमें उत्तराभिमुख होकर पूजन करनेका विधान है। 'ॐ खखोल्लाक्य स्वाहा' इस ससाक्षर मूल मन्त्रसे सूर्यमण्डलके बीच षट्दल-कमलका

ध्यान कर उसके मध्यमें सहस्र किरणोंसे देदीप्यमान भगवान् सूर्यनारायणकी मूर्तिका ध्यान करे। फिर रक्त चन्दन, करवीर आदि रक्त पुष्पों, धूप, दीप, अनेक प्रकारके नैवेद्य, वस्त्राभूषण आदि उपचारोंसे पूजन करे अथवा रक्त चन्दनसे ताम्रपात्रमें षट्दल-कमल बनाकर उसके मध्यमें सभी उपचारोंसे भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करे। छहों दलोंमें षडङ्ग-पूजन कर उत्तर आदि दिशाओंमें सोमादि आठ ग्रहोंका अर्चन करे और अष्टदिकपालों तथा उनके आयुधोंका भी तत्तद् दिशाओंमें पूजन करे। नामके आदिमें 'प्रणव' लगाकर नामको चतुर्थी-विभक्तिपुत्र करके अन्तमें 'नमः' कहे—जैसे 'ॐ सोमाय नमः' इत्यादि। इस प्रकार नाममन्त्रोंसे सबका पूजन करे। अनन्तर व्योम-मुद्रा, रवि-मुद्रा, पद्म-मुद्रा, महाश्वेत-मुद्रा और अस्त्र-मुद्रा दिखाये। ये पाँच मुद्राएँ पूजा, जप, ध्यान, अर्घ्य आदिके अनन्तर दिखानी चाहिये।

इस प्रकार एक वर्षतक भक्तिपूर्वक तन्मयताके साथ भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करनेसे अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति होती है और बादमें मुक्ति भी प्राप्त होती है। इस विधिसे पूजन करनेपर रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है, धनहीन धन प्राप्त करता है, राज्यभ्रष्टको राज्य मिल जाता है तथा पुत्रहीन पुत्र प्राप्त करता है। सूर्यनारायणका पूजन करनेवाला पुरुष प्रज्ञा, मेधा तथा सभी समृद्धियोंसे सम्पन्न होता हुआ चिरंजीवी होता है। इस विधिसे पूजन करनेपर कन्याको उत्तम वरकी, कुरूपा स्त्रीको उत्तम सौभाग्यकी तथा विद्यार्थीको सद्बुद्धाकी प्राप्ति होती है। ऐसा सूर्यभगवान्ने स्वयं अपने मुखसे कहा है। इस प्रकार सूर्यभगवान्का पूजन करनेसे धन, धान्य, संतान, पशु आदिकी नित्य अभिवृद्धि होती है। मनुष्य निष्काम हो जाता है तथा अन्तमें उसे सद्गति प्राप्त होती है। (अध्याय ४९)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

८३

भगवान् सूर्यके पूजन एवं व्रतोद्यापनका विधान, द्वादश आदित्योंके नाम और रथससमी-व्रतकी महिमा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—साम्ब! अब मैं सूर्यके विशिष्ट अवसरोंपर होनेवाले व्रत-उत्सव एवं पूजनकी विधियोंका वर्णन करता हूँ, उन्हें सुनो। किसी मासके शुक्लपक्षकी ससमी, ग्रहण या संक्रान्तिके एक दिन-पूर्व एक बार हविष्यान्नका भोजन कर सायंकालके समय भलीभाँति आचमन आदि करके अरुणदेवको प्रणाम करना चाहिये तथा सभी इन्द्रियोंको संयतकर भगवान् सूर्यका ध्यान कर रात्रिमें जमीनपर कुशकी शय्यापर शयन करना चाहिये। दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक स्नान सम्पन्न करके संध्या करे तथा पूर्वोक्त मन्त्र ‘ॐ खखोल्लकाय स्वाहा’ का जप एवं सूर्यभगवान्की पूजा करे। अग्निको सूर्यतापके रूपमें समझकर वेदी बनाये और संक्षेपमें हवन तथा तर्पण करे। गायत्री-मन्त्रसे प्रोक्षणकर पूर्वाग्रि और उत्तराग्र कुशा बिछाये। अनन्तर सभी पात्रोंका शोधन कर दो, कुशाओंकी प्रादेशमात्रकी एक पवित्री बनाये। उस पवित्रीसे सभी वस्तुओंका प्रोक्षण करे, घीको अग्निपर रखकर पिघला ले, उत्तरकी ओर पात्रमें उसे रख दे, अनन्तर जलते हुए उल्लुकसे पर्यग्रिकरण करते हुए घृतका तीन बार उत्प्लवन करे। खुवा आदिका कुशोंके द्वारा परिमार्जन और सम्प्रोक्षण करके अग्निमें सूर्यदेवकी पूजा करे और दाहिने हाथमें खुवा ग्रहणकर मूल मन्त्रसे हवन करे। मनोयोगपूर्वक मौन धारण कर सभी क्रियाएँ सम्पन्न करनी चाहिये। पूर्णाहुतिके पश्चात् तर्पण करे। अनन्तर ब्राह्मणोंको उत्तम भोजन कराना चाहिये और यथाशक्ति उनको दक्षिणा भी देनी चाहिये। ऐसा करनेसे मनोवाञ्छित

फलकी प्राप्ति होती है।

माघ मासकी ससमीको वरुण नामक सूर्यकी पूजा करे। इसी प्रकार क्रमशः फाल्गुनमें सूर्य, चैत्रमें वैशाख*, वैशाखमें धाता, ज्येष्ठमें इन्द्र, आषाढ़में रवि, श्रावणमें नभ, भाद्रपदमें यम, आश्विनमें पर्जन्य, कार्तिकमें त्वष्टा, मार्गशीर्षमें मित्र तथा पौष मासमें विष्णु नामक सूर्यका अर्चन करे। इस विधिसे बारहों मासमें अलग-अलग नामोंसे भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक दिन पूजा करनेसे वर्षपर्यन्त की गयी पूजाका फल प्राप्त हो जाता है।

उपर्युक्त विधिसे एक वर्षतक व्रत कर रत्नजटित सुवर्णका एक रथ बनवाये और उसमें सात घोड़े बनवाये। रथके मध्यमें सोनेके कमलके ऊपर रत्नोंके आभूषणोंसे अलंकृत सूर्यनारायणकी सोनेकी मूर्ति स्थापित करे। रथके आगे उनके सारथिको बैठाये। अनन्तर बारह ब्राह्मणोंमें बारह महीनोंके सूर्योंकी भावना कर तेरहवें मुख्य आचार्यको साक्षात् सूर्यनारायण समझकर उनकी पूजा करे तथा उन्हें रथ, छत्र, भूमि, गौ आदि समर्पित करे। इसी प्रकार रत्नोंके आभूषण, वस्त्र, दक्षिणा और एक-एक घोड़ा उन बारह ब्राह्मणोंको दे तथा हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करे—‘ब्राह्मण देवताओ! इस सूर्यव्रतके उद्यापन करनेके बाद यदि असमर्थतावश कभी सूर्यव्रत न कर सकूँ तो मुझे दोष न हो।’ ब्राह्मणोंके साथ आचार्य भी ‘एवमस्तु’ ऐसा कहकर यजमानको आशीर्वाद दे और कहे—‘सूर्यभगवान् तुमपर प्रसन्न हों। जिस मनोरथकी पूर्तिके लिये तुमने यह व्रत किया है और भगवान्

  • प्रायः अन्य सभी पुराणोंमें चैत्रादि बारह महीनोंमें सूर्यके ये नाम मिलते हैं—धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पृषा, पर्जन्य, अंश, भग, त्वष्टा और विष्णु। कल्पभेदके अनुसार नामोंमें भेद है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

८४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

सूर्यकी पूजा की है, वह तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो और भगवान् सूर्य उसे पूरा करें। अब व्रत न करनेपर भी तुमको दोष नहीं होगा।' इस प्रकार आशीर्वाद प्राप्त कर दीनों, अन्धों तथा अनार्थोंको यथाशक्ति भोजन कराये और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर, दक्षिणा देकर व्रतकी समाप्ति करे।

जो व्यक्ति इस सप्तमी-व्रतको एक वर्षतक करता है, वह सौ योजन लम्बे-चौड़े देशका धार्मिक राजा होता है और इस व्रतके फलसे सौ वर्षोंसे भी अधिक निष्कण्टक राज्य करता है। जो स्त्री इस व्रतको करती है, वह राजपत्नी होती है। निर्धन व्यक्ति इस व्रतको यथाविधि सम्पन्न कर बतलायी हुई विधिके अनुसार ताँबेका रथ ब्राह्मणको देता है तो वह अस्सी योजन लम्बा-चौड़ा राज्य प्राप्त करता है। इसी प्रकार आटेका रथ बनवाकर दान करनेवाला साठ योजन विस्तृत राज्य प्राप्त करता है तथा वह चिरायु, नीरोग और सुखी रहता है। इस व्रतको करनेसे पुरुष एक कल्पतक सूर्यलोकमें निवास करनेके पश्चात् राजा होता है। यदि कोई व्यक्ति भगवान् सूर्यकी मानसिक आराधना भी करता है तो वह भी समस्त आधि-व्याधियोंसे रहित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। जिस प्रकार भगवान् सूर्यको कुहरा स्पर्श नहीं कर पाता, उसी प्रकार मानसिक पूजा करनेवाले साधकको किसी प्रकारकी आपत्तियाँ स्पर्श नहीं कर पातीं। यदि किसीने मन्त्रोंके द्वारा भक्तिपूर्वक विधि-विधानसे व्रत सम्पन्न करते हुए भगवान् सूर्यनारायणकी आराधना की तो फिर उसके विषयमें क्या कहना? इसलिये अपने कल्याणके लिये भगवान् सूर्यकी पूजा अवश्य करनी चाहिये। पुत्र! सूर्यनारायणने इस विधि-विधानको स्वयं

अपने मुखसे मुझसे कहा था। आजतक उसे गुप्त रखकर पहली बार मैंने तुमसे कहा है। मैंने इसी व्रतके प्रभावसे हजारों पुत्र और पौत्रोंको प्राप्त किया है, दैत्योंको जीता है, देवताओंको वशमें किया है, मेरे इस चक्रमें सदा सूर्यभगवान् निवास करते हैं। नहीं तो इस चक्रमें इतना तेज कैसे होता? यही कारण है कि सूर्यनारायणका नित्य जप, ध्यान, पूजन आदि करनेसे मैं जगत्का पूज्य हूँ। वत्स! तुम भी मन, वाणी तथा कर्मसे सूर्यनारायणकी आराधना करो। ऐसा करनेसे तुम्हें विविध सुख प्राप्त होंगे। जो पुरुष भक्तिपूर्वक इस विधानको सुनता है, वह भी पुत्र-पौत्र, आरोग्य एवं लक्ष्मीको प्राप्त करता है और सूर्यलोकको भी प्राप्त हो जाता है।

भगवान् कृष्णने कहा— साम्ब! माघ मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमी तिथिको एकभुक्त-व्रत और षष्ठीको नक्तव्रत करना चाहिये*। सुव्रत! कुछ लोग सप्तमीमें उपवास चाहते हैं और कुछ विद्वान् षष्ठीमें उपवास और सप्तमी तिथिमें पारण करनेका विधान कहते हैं (इस प्रकार विविध मत हैं)। वस्तुतः षष्ठीको उपवास कर भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। रक्तचन्दन, करवीर-पुष्प, गुगुल धूप, पायस आदि नैवेद्योंसे माघ आदि चार महीनोंतक सूर्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। आत्मशुद्धिके लिये गोमयमिश्रित जलसे स्नान, गोमयका प्राशन और यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन भी कराना चाहिये।

ज्येष्ठ आदि चार महीनोंमें श्वेत चन्दन, श्वेत पुष्प, कृष्ण अग्र धूप और उत्तम नैवेद्य सूर्यनारायणको अर्पण करना चाहिये। इसमें पञ्चगव्यप्राशन कर ब्राह्मणोंको उत्कृष्ट भोजन कराना चाहिये।

  • जिस दिन प्रायः दिनका अधिक अंश बिताकर सार्थ चार बजेके लगभग भोजन कर पूरी रात उपवास रहकर बिताया जाता है, उसे एकभुक्त-व्रत कहा जाता है और दिनभर उपवासकर रात्रिको भोजन करना 'नक्तव्रत' कहलाता है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

८५

आश्विन आदि चार मासोंमें अगस्त्य-पुष्प, अपराजित धूप और गुड़के पूए आदिका नैवेद्य तथा इक्षुरस भगवान् सूर्यको समर्पित करना चाहिये। यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराकर आत्मशुद्धिके लिये कुशाके जलसे स्नान करना चाहिये। उस दिन कुशोदकका ही प्राशन करे। व्रतकी समाप्तिमें माघ मासकी शुक्ला सप्तमीको रथका दान करे और सूर्यभगवान्की प्रसन्नताके लिये रथयात्रोत्सवका आयोजन करे। महापुण्यदायिनी इस सप्तमीको रथसप्तमी कहा गया है। यह महासप्तमीके नामसे अभिहित है। रथसप्तमीको जो उपवास करता है,

वह कीर्ति, धन, विद्या, पुत्र, आरोग्य, आयु और उत्तमोत्तम कान्ति प्राप्त करता है। हे पुत्र! तुम भी इस व्रतको करो, जिससे तुम्हारे सभी अभीष्टोंकी सिद्धि हो। इतना कहकर शङ्ख, चक्र, गदा-पद्मधारी श्रीकृष्ण अन्तर्हित हो गये।

सुमन्तुने कहा— राजन्! उनकी आज्ञा पाकर साम्बने भी भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणकी आराधनामें तत्पर हो रथसप्तमीका व्रत किया और कुछ ही समयमें रोगमुक्त होकर मनोवाञ्छित फल प्राप्त कर लिया*।

(अध्याय ५०-५१)

सूर्यदेवके रथ एवं उसके साथ भ्रमण करनेवाले देवता-नाग आदिका वर्णन

राजा शतानीकने पूछा—मुने! सूर्यनारायणकी रथयात्रा किस विधानसे करनी चाहिये। रथ कैसा बनाना चाहिये? इस रथयात्राका प्रचलन मृत्युलोकमें किसके द्वारा हुआ? इन सब बातोंको आप कृपाकर मुझे बतलायें।

सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! किसी समय सुमेरु पर्वतपर समासीन भगवान् रुद्रने ब्रह्माजीसे पूछा—‘ब्रह्मन्! इस लोकको प्रकाशित करनेवाले भगवान् सूर्य किस प्रकारके रथमें बैठकर भ्रमण करते हैं, इसे आप बतायें।’

ब्रह्माजीने कहा— त्रिलोचन! सूर्यनारायण जिस प्रकारके रथमें बैठकर भ्रमण करते हैं, उसका मैं वर्णन करता हूँ, आप सानन्द सुनें।

एक चक्र, तीन नाभि, पाँच अरे तथा स्वर्णमय अति कान्तिमान् आठ बन्धोंसे युक्त एवं एक

नेमिसे सुसज्जित—इस प्रकारके दस हजार योजन लम्बे-चौड़े अतिशय प्रकाशमान स्वर्ण-रथमें विराजमान भगवान् सूर्य विचरण करते रहते हैं। रथके उपस्थसे ईषा-दण्ड तीन-गुना अधिक है। यहाँ उनके सारथि अरुण बैठते हैं। इनके रथका जुआ सोनेका बना हुआ है। रथमें वायुके समान वेगवान् छन्दरूपी सात घोड़े जुते रहते हैं। संवत्सरमें जितने अवयव होते हैं, वे ही रथके अङ्ग हैं। तीनों काल चक्रकी तीन नाभियाँ हैं। पाँच ऋतुएँ अरे हैं, छठी ऋतु नेमि है। दक्षिण और उत्तर—ये दो अयन रथके दोनों भाग हैं। मुहूर्त रथके इषु, कला, शम्य, काष्ठाएँ रथके कोण, क्षण अक्षदण्ड, निमेष रथके कर्ण, ईषा-दण्ड लव, रात्रि वरूथ, धर्म रथका ध्वज, अर्थ और काम धुरीका अग्रभाग, गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती तथा उष्णिक—

  • रथसप्तमीके विषयमें व्रतरत्नाकर, व्रतकल्पद्रुम, व्रतराज आदिके अतिरिक्त पद्मपुराण एवं वायुपुराणके माघ-माहात्म्यमें बहुत विस्तारसे व्रत-विधानका निरूपण हुआ है और कुछ पञ्चाङ्गोंमें भी इसी दिन भगवान् सूर्यके रथपर चढ़कर आकाशकी प्रथम यात्रा करनेका उल्लेख किया गया है। जैसे रामनवमीके दिन भगवान् रामका, जन्माष्टमीके दिन भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य मानकर उत्सव किया जाता है, वैसे ही रथसप्तमीके दिन भगवान् सूर्यका प्राकट्य मानकर उनके लिये व्रत-उपवासके साथ विशेष अर्चा सम्पन्न की जाती है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

८६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

ये सात छन्द सात अक्ष हैं। धुरीपर चक्र घूमता है। इस प्रकारके रथमें बैठकर भगवान् सूर्य निरन्तर आकाशमें भ्रमण करते रहते हैं।

देव, ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, ग्रामणी और राक्षस सूर्यके रथके साथ घूमते रहते हैं और दो-दो मासोंके बाद इनमें परिवर्तन हो जाता है।

धाता और अर्यमा—ये दो आदित्य, पुलस्त्य तथा पुलह नामक दो ऋषि, खण्डक, वासुकि नामक दो नाग, तुम्बुरु और नारद ये दो गन्धर्व, ऋतुस्थला तथा पुञ्जिकस्थला ये अप्सराएँ, रथकृत्स्न तथा रथौजा ये दो यक्ष, हेति तथा प्रहेति नामके दो राक्षस ये क्रमशः चैत्र और वैशाख मासमें रथके साथ चला करते हैं।

मित्र तथा वरुण नामक दो आदित्य, अत्रि तथा वसिष्ठ ये दो ऋषि, तक्षक और अनन्त दो नाग, मेनका तथा सहजन्या ये दो अप्सराएँ, हाहा-हूहू दो गन्धर्व, रथस्वान् और रथचित्र ये दो यक्ष, पौरुषेय और बध नामक दो राक्षस क्रमशः ज्येष्ठ तथा आषाढ़ मासमें सूर्यरथके साथ चला करते हैं।

श्रावण तथा भाद्रपदमें इन्द्र तथा विवस्वान् नामक दो आदित्य, अङ्गिरा तथा भृगु नामक दो ऋषि, एलापर्ण तथा शङ्खपाल ये दो नाग, प्रम्लोचा और दुंदुका नामक दो अप्सराएँ, भानु और दुर्दुर नामक गन्धर्व, सर्प तथा ब्राह्म नामक दो राक्षस, स्नोत तथा आपूरण नामके दो यक्ष सूर्यरथके साथ चलते रहते हैं।

आश्विन और कार्तिक मासमें पर्जन्य और पूषा नामके दो आदित्य, भारद्वाज और गौतम नामक दो ऋषि, चित्रसेन तथा वसुरुचि नामक दो गन्धर्व, विश्वाची तथा घृताची नामकी दो अप्सराएँ, ऐरावत और धनञ्जय नामक दो नाग एवं सेनजित् तथा सुषेण नामक दो यक्ष, आप एवं वात नामक दो

राक्षस सूर्यरथके साथ चला करते हैं।

मार्गशीर्ष तथा पौष मासमें अंशु तथा भग्न नामक दो आदित्य, कश्यप और ऋतु नामक दो ऋषि, महापद्म और कर्कोटक नामक दो नाग, चित्राङ्गद और अरण्यायु नामक दो गन्धर्व, सह्य तथा सहस्य नामक दो अप्सराएँ, तार्क्ष्य तथा अरिष्टनेमि नामक यक्ष, आप तथा वात नामक दो राक्षस सूर्यरथके साथ चला करते हैं।

माघ-फाल्गुनमें क्रमशः पूषा तथा जिष्णु नामक दो आदित्य, जमदग्नि और विश्वामित्र नामक दो ऋषि, काद्रवेय और कम्बलाश्रतर ये दो नाग, धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा नामक दो गन्धर्व, तिलोत्तम और रम्भा ये दो अप्सराएँ तथा सेनजित् और सत्यजित् नामक दो यक्ष, ब्रह्मोपेत तथा यज्ञोपेत नामक दो राक्षस सूर्यरथके साथ चला करते हैं*।

ब्रह्माजीने कहा—रुद्रदेव ! सभी देवताओंने अपने अंशरूपसे विविध अस्त्र-शस्त्रोंको भगवान् सूर्यकी रक्षाके लिये उन्हें दिया है। इस प्रकार सभी देवता उनके रथके साथ-साथ भ्रमण करते रहते हैं। ऐसा कोई भी देवता नहीं है जो रथके पीछे न चले। इस सर्वदेवमय सूर्यनारायणके मण्डलको ब्रह्मवेता ब्रह्मस्वरूप, याज्ञिक यज्ञस्वरूप, भगवद्भक्त विष्णुस्वरूप तथा शैव शिवस्वरूप मानते हैं। ये स्थानाभिमानी देवगण अपने तेजसे भगवान् सूर्यको आप्यायित करते रहते हैं। देवता और ऋषि निरन्तर भगवान् सूर्यकी स्तुति करते रहते हैं, गन्धर्वगण गान करते रहते हैं तथा अप्सराएँ रथके आगे नृत्य करती हुई चलती रहती हैं। राक्षस रथके पीछे-पीछे चलते हैं। साठ हजार बालखिल्य ऋषिगण रथको चारों ओरसे घेरकर चलते हैं। दिवस्मति और स्वयम्भू रथके आगे, भर्ग दाहिनी ओर, पद्मज बायाँ ओर, कुबेर दक्षिण दिशामें, वरुण उत्तर दिशामें, वीतिहोत्र

  • ये नाम विष्णु आदि अन्य पुराणोंमें कुछ भेदसे मिलते हैं।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

८७

और हरि रथके पीछे रहते हैं। रथके पीठमें पृथ्वी, मध्यमें आकाश, रथकी कान्तिमें स्वर्ग, ध्वजमें दण्ड, ध्वजाग्रमें धर्म, पताकामें ऋद्धि-वृद्धि और श्री निवास करती हैं। ध्वजदण्डके ऊपरी भागमें गरुड तथा उसके ऊपर वरुण स्थित हैं। मैनाक पर्वत छत्रका दण्ड, हिमाचल छत्र होकर सूर्यके साथ रहते हैं। इन देवताओंका बल, तप, तेज, योग और तत्त्व जैसा है वैसे ही सूर्यदेव तपते हैं। ये ही देवगण तपते हैं, बरसते हैं, सृष्टिका पालन-पोषण करते हैं, जीवोंके अशुभ-कर्मको निवृत्त करते हैं, प्रजाओंको आनन्द देते हैं और सभी प्राणियोंकी रक्षाके लिये भगवान् सूर्यके साथ भ्रमण करते रहते हैं। अपनी किरणोंसे चन्द्रमाकी वृद्धि कर सूर्यभगवान् देवताओंका पोषण करते हैं। शुक्ल पक्षमें सूर्यकिरणोंसे चन्द्रमाकी क्रमशः वृद्धि होती है और कृष्ण पक्षमें देवगण उसका पान करते हैं। अपनी किरणोंसे पृथ्वीका रस-पान कर सूर्यनारायण वृष्टि करते हैं। इस वृष्टिसे सभी ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं तथा अनेक प्रकारके अन्न भी उत्पन्न होते हैं, जिससे पितरों और मनुष्योंकी तृप्ति होती है।

एक चक्रवाले रथमें भगवान् सूर्यनारायण बैठकर एक अहोरात्रमें सातों द्वीप और समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीके चारों ओर भ्रमण करते हैं। एक वर्षमें ३६० बार भ्रमण करते हैं। इन्द्रकी पुरी अमरावतीमें

जब मध्याह्न होता है, तब उस समय यमकी संयमनी पुरीमें सूर्योदय, वरुणकी सुखा नामकी नगरीमें अर्धरात्रि और सोमकी विभा नामकी नगरीमें सूर्यास्त होता है। संयमनीमें जब मध्याह्न होता है, तब सुखामें उदय, अमरावतीमें अर्धरात्रि तथा विभामें सूर्यास्त होता है। सुखामें जब मध्याह्न होता है, उस समय विभामें उदय, अमरावतीमें आधी रात और संयमनीमें सूर्यास्त होता है। विभा नगरीमें जब मध्याह्न होता है, तब अमरावतीमें सूर्योदय, संयमनीमें आधी रात और सुखा नामकी वरुणकी नगरीमें सूर्यास्त होता है। इस प्रकार मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा करते हुए भगवान् सूर्यका उदय और अस्त होता है। प्रभातसे मध्याह्नतक सूर्य-किरणोंकी वृद्धि और मध्याह्नसे अस्ततक ह्रास होता है। जहाँ सूर्योदय होता है वह पूर्व दिशा और जहाँ अस्त होता है वह पश्चिम दिशा है। एक मुहूर्तमें भूमिका तीसवाँ भाग सूर्य लौघ जाते हैं। सूर्यभगवान्के उदय होते ही प्रतिदिन इन्द्र पूजा करते हैं, मध्याह्नमें यमराज, अस्तके समय वरुण और अर्धरात्रिमें सोम पूजन करते हैं।

विष्णु, शिव, रुद्र, ब्रह्मा, अग्नि, वायु, निर्वृति, ईशान आदि सभी देवगण रात्रिकी समाप्तिपर ब्राह्मवेलामें कल्याणके लिये सदा भगवान् सूर्यकी आराधना करते रहते हैं। (अध्याय ५२-५३)

भगवान् सूर्यकी महिमा, विभिन्न ऋतुओंमें उनके अलग-अलग वर्ण तथा उनके फल

भगवान् रुद्रने कहा—ब्रह्मन्! आपने भगवान् सूर्यनारायणके माहात्म्यका वर्णन किया, जिसके सुननेसे हमें बहुत आनन्द मिला, कृपाकर आप उनके माहात्म्यका और वर्णन करें।

ब्रह्माजी बोले—हे रुद्र! इस सचराचर त्रैलोक्यके मूल भगवान् सूर्यनारायण ही हैं। देवता, असुर,

मानव आदि सभी इन्हींसे उत्पन्न हैं। इन्द्र, चन्द्र, रुद्र, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि जितने भी देवता हैं, सबमें इन्हींका तेज व्याप्त है। अग्निमें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यभगवान्को ही प्राप्त होती है। भगवान् सूर्यसे ही वृष्टि होती है, वृष्टिसे अन्नोत्पन्न होते हैं और यही अन्न प्राणियोंका

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

८८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जीवन है। इन्हींसे जगत्की उत्पत्ति होती है और अन्तमें इन्हींमें सारी सृष्टि विलीन हो जाती है। ध्यान करनेवाले इन्हींका ध्यान करते हैं तथा ये मोक्षकी इच्छा रखनेवालोंके लिये मोक्षस्वरूप हैं। यदि सूर्यभगवान् न हों तो क्षण, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष तथा युग आदि काल-विभाग हो ही नहीं और काल-विभाग न होनेसे जगत्का कोई व्यवहार भी नहीं चल सकता। ऋतुओंका विभाग न हो तो फिर फल-फूल, खेती, ओषधियाँ आदि कैसे उत्पन्न हो सकती हैं? और इनकी उत्पत्तिके बिना प्राणियोंका जीवन भी कैसे रह सकता है? इससे यह स्पष्ट है कि इस (चराचरात्मक) विश्वके मूलभूत कारण भगवान्

सूर्यनारायण ही हैं। सूर्यभगवान् वसन्त-ऋतुमें कपिलवर्ण, ग्रीष्ममें तप्त सुवर्णके समान, वर्षामें श्वेत, शरद्-ऋतुमें पाण्डुवर्ण, हेमन्तमें ताम्रवर्ण और शिशिर-ऋतुमें रक्तवर्णके होते हैं। इन वर्णोंके अलग-अलग फल हैं। रुद्र! उसे आप सुनें।

यदि सूर्यभगवान् (असमयमें) कृष्णवर्णके हों तो संसारमें भय होता है, ताम्रवर्णके हों तो सेनापतिके नाश होता है, पीतवर्णके हों तो राजकुमारकी मृत्यु, श्वेतवर्णके हों तो राजपुरोहितका ध्वंस और चित्र अथवा धूम्रवर्णके होनेसे चोर और शस्त्रका भय होता है, परंतु ऐसा वर्ण होनेके अनन्तर यदि वृष्टि हो जाती है तो अनिष्ट फल नहीं होते।

(अध्याय ५४)

भगवान् सूर्यका अभिषेक एवं उनकी रथयात्रा

रुद्रने पूछा—ब्रह्मन्! भगवान् सूर्यकी रथयात्रा कब और किस विधिसे की जाती है? रथयात्रा करनेवाले, रथको खींचनेवाले, रथको वहन करनेवाले, रथके साथ जानेवाले और रथके आगे नृत्य-गान करनेवाले एवं रात्रि-जागरण करनेवाले पुरुषोंको क्या फल प्राप्त होता है? इसे आप लोककल्याणके लिये विस्तारपूर्वक बताइये।

ब्रह्माजी बोले—हे रुद्र! आपने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। अब मैं इसका वर्णन करता हूँ, आप इसे एकाग्र-मनसे सुनें।

भगवान् सूर्यकी रथयात्रा और इन्द्रोत्सव—ये दोनों जगत्के कल्याणके लिये मैंने प्रवर्तित किये हैं। जिस देशमें ये दोनों महोत्सव आयोजित किये जाते हैं, वहाँ दुर्गिष्ठ आदि उपद्रव नहीं होते और न चोरी आदिका कोई भय ही रहता है। इसलिये दुर्गिष्ठ, अकाल आदि उपद्रवोंकी शान्तिके लिये

इन उत्सवोंको मनाना चाहिये। मार्गशीर्षके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको घृतके द्वारा भगवान् सूर्यको श्रद्धापूर्वक स्नान कराना चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष सोनेके विमानमें बैठकर अग्निलोकको जाता है और वहाँ दिव्य भोग प्राप्त करता है। जो व्यक्ति शर्कराके साथ शालि-चावलका भात, मिष्ठान और चित्रवर्णके भातको भगवान् सूर्यको अर्पित करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन भगवान् सूर्यको भक्तिपूर्वक घृतका उबटन लगाता है, वह परम गतिको प्राप्त करता है।

पौष शुक्ल सप्तमीको तीर्थोंके जल अथवा पवित्र जलसे वेदमन्त्रोंके द्वारा भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। सूर्यभगवान्के अभिषेकके समय प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, नैमिष, पृथूदक (पेहवा), शोण, गोकर्ण, ब्रह्मवर्त, कुशावर्त, बिल्वक, नीलपर्वत, गङ्गाद्वार, गङ्गासागर, कालप्रिय

  • इस विषयका बृहद् वर्णन 'बृहत्संहिता' की भट्टोत्पली टीका आदिमें है। विशेष जानकारीके लिये उन्हें देखा जा सकता है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

८९

मित्रवन, भाण्डीरवन, चक्रतीर्थ, रामतीर्थ, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, सिन्धु, चन्द्रभागा, नर्मदा, विपाशा (व्यासनदी), तापी, शिवा, वैत्रवती (वैतवा), गोदावरी, पयोष्णी (मन्दाकिनी), कृष्णा, वेण्णा, शतद्वु (सतलज), पुष्करिणी, कौशिकी (कोसी) तथा सरयू आदि सभी तीर्थों, नदियों और समुद्रोंका स्मरण करना चाहिये*। दिव्य आश्रमों और देवस्थानोंका भी स्मरण करना चाहिये। इस प्रकार स्नान कराकर तीन दिन, सात दिन, एक पक्ष अथवा मासभर उस अभिषेकके स्थानमें ही भगवान्का अधिवास करे और प्रतिदिन भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता रहे।

माघ मासके कृष्ण पक्षकी सप्तमीको मङ्गल कलशों तथा वितान आदिसे सुशोभित चौकोर एवं पक्के ईंटोंसे बनी वेदीपर सूर्यनारायणको भलीभाँति स्थापित कर हवन, ब्राह्मण-भोजन, वेद-पाठ और विभिन्न प्रकारके नृत्य, गीत, वाद्य आदि उत्सवोंको करना चाहिये। अनन्तर माघ शुक्ला चतुर्थीको अयाचित व्रत करे, पञ्चमीको एक बार भोजन करे, षष्ठीको रात्रिके समय ही भोजन करे और सप्तमीको उपवास कर हवन, ब्राह्मण-भोजन आदि सम्पन्न करे। सबको दक्षिणा देकर पौराणिककी भलीभाँति पूजा करे। तदनन्तर रजजटित सुवर्णके रथमें भगवान् सूर्यको विराजित करे। उस रथको उस दिन मन्दिरके आगे ही खड़ा करे। रात्रिमें जागरण करे और नृत्य-गीत चलता रहे। माघ शुक्ला अष्टमीको रथयात्रा करनी चाहिये। रथके

आगे विविध बाजे बजते रहें, नृत्य-गीत और मङ्गल वेदध्वनि होती रहे। रथयात्रा प्रथम नगरके उत्तर दिशासे प्रारम्भ करनी चाहिये, पुनः क्रमशः पूर्व, दक्षिण और पश्चिम दिशाओंमें भ्रमण कराना चाहिये। इस प्रकार रथयात्रा करनेसे राज्यके सभी उपद्रव शान्त हो जाते हैं। राजाको युद्धमें विजय मिलती है तथा उस राज्यमें सभी प्रजाएँ और पशुगण नीरोग एवं सुखी हो जाते हैं। रथयात्रा करनेवाले, रथको वहन करनेवाले और रथके साथ जानेवाले सूर्यलोकमें निवास करते हैं।

रुद्रने कहा—हे ब्रह्मन्! मन्दिरमें प्रतिष्ठित प्रतिमाको किस प्रकार उठाना चाहिये और किस प्रकार रथमें विराजमान करना चाहिये। इस विषयमें मुझे कुछ संदेह हो रहा है, क्योंकि वह प्रतिमा तो स्थिर अर्थात् अचल प्रतिष्ठित है। अतः उसे कैसे चलाया जा सकता है? कृपाकर आप मेरे इस संशयको दूर करें।

ब्रह्माजी बोले—संवत्सरके अवयवोंके रूपमें जिस रथका पूर्वमें मैंने वर्णन किया है, वह रथ सभी रथोंमें पहला रथ है, उसको देखकर ही विश्वकर्माने सभी देवताओंके लिये अलग-अलग विविध प्रकारके रथ बनाये हैं। उस प्रथम रथकी पूजाके लिये भगवान् सूर्यने अपने पुत्र मनुको वह रथ प्रदान किया। मनुने राजा इक्ष्वाकुको दिया और तबसे यह रथयात्रा पूजित हो गयी और परम्परासे चली आ रही है। इसलिये सूर्यकी रथयात्राका उत्सव मनाना चाहिये। भगवान् सूर्य तो सदा आकाशमें

  • यजेन्द्र तीर्थनामानि मनसा संस्मरन् बुधः । प्रयागं पुष्करं देवं कुरुक्षेत्रं च नैमिषम् ॥ पृथूदकं चन्द्रभागां शोणं गोकर्णमेव च । ब्रह्मावर्तं कुशावर्तं बिल्वकं नीलपर्वतम् ॥ गङ्गाद्वारं तथा पुण्यं गङ्गासागरमेव च । कालप्रियं मित्रवनं शुण्डीरस्वामिनं तथा ॥ चक्रतीर्थं तथा पुण्यं रामतीर्थं तथा शिवम् । वितस्ता हर्षपन्था वै तथा वै देविका स्मृता ॥ गङ्गा सरस्वती सिन्धुश्चन्द्रभागा सनर्मदा । विपाशा यमुना तापी शिवा वैत्रवती तथा ॥ गोदावरी पयोष्णी च कृष्णा वेण्णा तथा नदी । शतरुद्रा पुष्करिणी कौशिकी सरयूस्तथा ॥ तथान्ये सागरशैव सांनिध्यं कल्पयन्तु वै । तथाश्रमाः पुण्यतमा दिव्यान्यायतनानि च ॥ (ब्राह्मपर्व ५५।२४-३०)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth