संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* दशाश्वमेधिक और पैशाचतीर्थका माहात्म्य * १६३
प्राप्ति होती है। विश्वकर्माके पुत्र महाबली विश्वरूप हुए। विश्वरूपके प्रथम नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्रका नाम भौवन हुआ। महाबाहु भौवन सार्वभौम राजा हुए। उनके पुरोहित कश्यप थे, जो सब प्रकारके ज्ञानमें निपुण थे। एक दिन महाबाहु भौवनने अपने पुरोहितसे पूछा—'मुने! मैं एक ही साथ दस अश्वमेध-यज्ञ करना चाहता हूँ। वह यज्ञ कहाँ करूँ?' कश्यपने प्रयागका नाम लिया और उन-उन स्थानोंपर यज्ञ करनेको बताया, जहाँ श्रेष्ठ द्विजोंने पूर्वकालमें बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। राजाके यज्ञमें बहुत-से ऋषि ऋत्विज हुए। पुरोहितने एक ही साथ दस अश्वमेध-यज्ञ आरम्भ किये, किंतु उनमेंसे एक भी पूर्ण न हुआ। यह देखकर राजाको बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने प्रयाग छोड़कर अन्य स्थानोंमें उन यज्ञोंका आरम्भ किया, किंतु वहाँ भी विघ्न-दोष आ पहुँचे। इस प्रकार अपने यज्ञोंको अपूर्ण देख राजाने पुरोहितसे कहा—'देश और कालके दोषसे अथवा मेरे और आपके दोषसे हमारे दस अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण नहीं हो पाते।' यों कहकर दुःखी हुए राजा भौवन अपने पुरोहित कश्यपके साथ बृहस्पतिके ज्येष्ठ भ्राता संवर्तके पास गये और इस प्रकार बोले—'भगवन्! मुझे ऐसा कोई उत्तम प्रदेश बतलाइये, जहाँ एक ही साथ आरम्भ किये हुए दस अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण हो जायँ।' तब मुनिश्रेष्ठ संवर्तने कुछ कालतक ध्यान करके महाराज भौवनसे कहा—'ब्रह्माजीके पास जाओ। वे ही उत्तम प्रदेश बतायेंगे।'
महाबुद्धिमान् भौवन महात्मा कश्यपको साथ ले मेरे पास आ पहुँचे और मुझसे भी उत्तम देश आदिके विषयमें प्रश्न करने लगे। उस समय मैंने भौवन और कश्यपसे कहा—'राजेन्द्र! तुम गोदावरीके तटपर जाओ। वही यज्ञके लिये पुण्यवान् प्रदेश है। वेदोंके पारगामी विद्वान् ये महर्षि कश्यप ही श्रेष्ठ गुरु हैं। इनकी कृपा और गौतमी गङ्गाके प्रसादसे एक ही अश्वमेधसे अथवा वहाँ स्नान करनेमात्रसे तुम्हारे दस अश्वमेध-यज्ञ सिद्ध हो जायेंगे।' यह सुनकर राजा भौवन कश्यपजीके साथ गौतमीके तटपर आये और वहाँ अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ग्रहण की। वह महायज्ञ आरम्भ होकर जब पूर्ण हो गया, तब राजा इस पृथ्वीका दान करनेको उद्यत हुए। उसी समय आकाशवाणी हुई—'राजन्! तुमने पुरोहित कश्यपजीको पर्वत, वन और काननोंसहित पृथ्वी देनेकी कामना करके सब कुछ दान कर दिया। अब भूमिदानकी अभिलाषा छोड़कर अन्नदान करो। वह महान् फल देनेवाला है। तीनों लोकोंमें अन्नदानके समान दूसरा पुण्यकार्य नहीं है। विशेषतः गङ्गाजीके तटपर श्रद्धाके साथ किये हुए अन्नदानकी महिमा अकथनीय है।*
तुमने जो प्रचुर दक्षिणासे युक्त यह अश्वमेध-यज्ञ किया है, इससे तुम कृतार्थ हो गये। अब इस विषयमें तुम्हें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। तिल, गौ, धन, धान्य—जो कुछ भी गोदावरीके तटपर दिया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है।
यह सुनकर सम्राट् भौवनने ब्राह्मणोंको बहुत-सा अन्नदान किया। तबसे वह तीर्थ दशाश्वमेधिकके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ स्नान करनेसे दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
उससे आगे पैशाचतीर्थ है, जो ब्रह्मवादी
* भूमिदानस्पृहां त्यक्त्वा अन्नं देहि महाफलम्। नान्नदानसमं पुण्यं त्रिषु लोकेषु विद्यते॥
विशेषतस्तु गङ्गायाः श्रद्धया पुलिने मुने।
(८३। २१-२२)
४२- क्षुधातीर्थ और अहल्या-संगमतीर्थका माहात्म्य
१६४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
महर्षियोंद्वारा सम्मानित है। यह गोदावरीके दक्षिण-तटपर स्थित है। अब मैं उसका स्वरूप बतलाता हूँ, सुनो। मुनिश्रेष्ठ नारद! ब्रह्मगिरिके पार्श्वभागमें अञ्जन नामसे प्रसिद्ध एक पर्वत है। वहाँ एक सुन्दरी अप्सरा शापभ्रष्ट होकर उत्पन्न हुई। उसका नाम अञ्जना था। उसके सब अङ्ग बहुत सुन्दर थे, किंतु मुँह वानरीका था। केसरी नामक श्रेष्ठ वानर अञ्जनाके पति थे। केसरीके एक दूसरी भी स्त्री थी, जिसका नाम अद्रिका था। वह भी शापभ्रष्ट अप्सरा ही थी। उसके भी सब अङ्ग सुन्दर थे। किंतु मुँह बिल्लीके समान था। अद्रिका भी अञ्जन पर्वतपर ही रहती थी। एक समय केसरी दक्षिणसमुद्रके तटपर गये थे। इसी बीचमें महर्षि अगस्त्य अञ्जन पर्वतपर आये। अञ्जना और अद्रिका दोनोंने महर्षिका यथोचित पूजन किया। इससे प्रसन्न होकर महर्षिने कहा—'तुम दोनों वर माँगो।' वे बोलीं—'मुनीश्वर! हमें ऐसे पुत्र दीजिये, जो सबसे बलवान्, श्रेष्ठ और सब लोगोंका उपकार करनेवाले हों।' 'तथास्तु' कहकर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य दक्षिण दिशामें चले गये। कुछ कालके बाद अञ्जनाने वायुके अंशसे हनुमान्जीको जन्म दिया और अद्रिकाके गर्भसे निर्ऋतिके अंशसे पिशाचोंका राजा अद्रि उत्पन्न हुआ। इसके बाद उन दोनों स्त्रियोंने उक्त देवताओंसे कहा—'हमें मुनिके वरदानसे पुत्र तो प्राप्त हुए, किंतु इन्द्रके शापसे हमारा मुख कुरूप होनेके कारण सारा शरीर ही विकृत हो गया है। इसे दूर करनेके लिये हम क्या उपाय करें—इसे आप दोनों बतायें।' तब भगवान् वायु और निर्ऋतिने कहा—'गोदावरीमें स्नान और दान करनेसे तुम्हें शापसे छुटकारा मिल जायगा।' यों कहकर वे दोनों वहीं अन्तर्धान हो गये। तब पिशाचरूपधारी अद्रिने अपने भाई हनुमान्जीको प्रसन्न करनेके लिये माता अञ्जनाको लाकर गोदावरीमें नहलाया। इसी प्रकार हनुमान्जी भी अद्रिकाको लेकर बड़ी उतावलीके साथ गौतमी गङ्गाके तटपर आये। तबसे वह पैशाच और आञ्जनतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वह समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला शुभ तीर्थ है। ब्रह्मगिरिसे तिरपन योजन पूर्वकी ओर मार्जार-तीर्थ है। मार्जार-तीर्थसे आगे हनुमत्-तीर्थ और वृषाकपि-तीर्थ है। उसके आगे फेना-संगमतीर्थ बताया गया है, जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। उसका स्वरूप और फल उसीके प्रसङ्गमें बताया जायगा।
क्षुधातीर्थ और अहल्या-संगम-तीर्थका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं— नारद! अब क्षुधातीर्थका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। वह परम पुण्यमय तीर्थ मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। पूर्वकालमें कण्व नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि थे। वे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और तपस्वी थे। महर्षि कण्व भूखसे पीड़ित होकर अनेक आश्रमोंपर घूमा करते थे। एक दिन वे गौतमके पवित्र आश्रमपर आये। वह आश्रम अन्न और जलसे सम्पन्न था। अपनेको क्षुधासे पीड़ित और गौतमको वैभवशाली देख कण्वका मन विरक्तिसे भर गया। वे सोचने लगे—'गौतम भी एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं और मैं भी उन्हींकी भाँति तपोनिष्ठ हूँ। बराबरवालेके पास याचना करना कदापि उचित नहीं है। अतः यद्यपि मैं भूखसे व्याकुल हूँ और मेरे शरीरमें पीड़ा भी हो रही है, तथापि गौतमके घरमें भोजन नहीं करूँगा। इस समय गौतमी गङ्गाके तटपर चलूँ और उन्हींसे सम्पत्ति माँगूँ।' ऐसा निश्चय करके महर्षि कण्व परम पावन
६१- कण्वके द्वारा गङ्गा और क्षुधाकी स्तुति
- क्षुधातीर्थ और अहल्या-संगम-तीर्थका माहात्म्य * । १६५
गङ्गाजीके तटपर गये और स्नान करके पवित्र एवं संयतचित्त हो कुशासनपर बैठकर गौतमी गङ्गा तथा क्षुधादेवीकी स्तुति करने लगे।
कण्व बोले— भारी पीड़ाओंको हरनेवाली भगवती गङ्गा! तुम्हें नमस्कार है तथा सब लोगोंको पीड़ा देनेवाली क्षुधादेवी! तुमको भी नमस्कार है। महादेवजीकी जटासे प्रकट हुई कल्याणमयी गौतमी! तुम्हें नमस्कार है तथा महामृत्युके मुखसे निकली हुई क्षुधादेवी! तुम्हें भी नमस्कार है। देवि! तुम्हीं पुण्यात्माओंके लिये शान्तिरूपा और दुरात्माओंके लिये क्रोधस्वरूपा हो। नदीके रूपसे सबके पाप-ताप हर लेती हो और क्षुधारूपमें आकर सबको पाप-ताप देती रहती हो। कल्याणकारिणी देवी! तुम्हें नमस्कार है। पापोंका दमन करनेवाली गङ्गा! तुम्हें प्रणाम है। भगवती शान्तिकरी! तुम्हें नमस्कार है। दरिद्रताका विनाश करनेवाली देवी! तुम्हें प्रणाम है!
कण्वके इस प्रकार स्तुति करनेपर उनके सामने दो रूप प्रकट हुए—'एक तो गङ्गाका मनोहर स्वरूप और दूसरी क्षुधाकी भयानक मूर्ति। द्विजश्रेष्ठ कण्वने पुनः हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए कहा—'देवि गोदावरी! तुम सम्पूर्ण मङ्गलोंके लिये भी मङ्गलमयी हो। शुभे! ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी और त्र्यम्बका—ये सब तुम्हारे ही नाम हैं। तुम्हें नमस्कार है। भगवान् त्र्यम्बककी जटासे प्रकट होकर महर्षि गौतमका पाप नष्ट करनेवाली गोदावरी! तुम सात धाराओंमें विभक्त होकर समुद्रमें मिलती हो। तुम्हें नमस्कार है। क्षुधादेवी! तुम समस्त पापियोंके लिये पापमयी, दुःखमयी और लोभमयी हो। धर्म, अर्थ और कामका नाश करनेवाली भी तुम्हीं हो। तुम्हें बारंबार नमस्कार है।'
कण्वका यह वचन सुनकर गङ्गा और क्षुधा दोनों ही बहुत प्रसन्न हुईं और बोलीं—'सुव्रत! तुम मनोवाञ्छित वर माँगो।' तब कण्वने गङ्गाजीको प्रणाम करके कहा—'देवि! मुझे मनके अनुकूल भोग, वैभव, आयु, धन और मोक्ष प्रदान कीजिये।' गङ्गासे यों कहकर द्विजश्रेष्ठ कण्वने क्षुधादेवीसे कहा—'क्षुधे! तुम तृष्णा एवं दरिद्रतारूपिणी, अत्यन्त पापमयी तथा रूक्ष स्वभाववाली हो। मेरे अथवा मेरे वंशजोंके यहाँ तुम कभी न रहना। जो क्षुधातुर मनुष्य इस स्तोत्रसे तुम्हारी स्तुति करें, उनके दारिद्र्य और दुःखका नाश हो जाय।* जो लोग इस परम पुण्यमय तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान, दान और जप आदि करें, वे धन-सम्पत्तिके भागी हों।
* मयि मद्वंशजे चापि क्षुधे तृष्णे दरिद्रिणि। याहि पापतरे रूक्षे न भूयास्त्वं कदाचन॥
अनेन स्तवेन ये वै त्वां स्तुवन्ति क्षुधातुराः। तेषां दारिद्र्यदुःखानि न भवेयुर्वरोऽपरः॥
(८५।२०-२१)
६२- गौतमके द्वारा प्रसवकालमें गायकी परिक्रमा
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जो तीर्थ अथवा अपने घरमें इस स्तोत्रका पाठ करे, उसे दरिद्रता और दुःखसे कभी भय न हो।'
'एवमस्तु' कहकर गङ्गा और क्षुधा दोनों अपने-अपने स्थानको चली गयीं। तबसे उस तीर्थके तीन नाम हो गये—काण्वतीर्थ, गाङ्गतीर्थ और क्षुधातीर्थ। नारद! वह तीर्थ सब पापोंको दूर करनेवाला और पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है।
गोदावरीमें अहल्यासंगम नामक एक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाला है। मुनिश्रेष्ठ! उस तीर्थकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो। पूर्वकालकी बात है, मैंने अत्यन्त कौतूहलवश कुछ सुन्दरी कन्याओंकी सृष्टि की। उनमेंसे एक कन्या सबसे श्रेष्ठ और उत्तम लक्षणोंसे युक्त थी। उसके सब अङ्ग बड़े मनोहर तथा रूप और गुणोंसे सम्पन्न थे। उस समय मेरे मनमें यह विचार हुआ कि कौन पुरुष इस कन्याका पालन-पोषण करनेमें समर्थ है। सोचनेपर महर्षि गौतम ही मुझे समस्त गुणोंमें श्रेष्ठ, तपस्वी, बुद्धिमान्, समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित और वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता प्रतीत हुए। अतः उन्हींको मैंने वह कन्या दे दी और कहा—'मुनिश्रेष्ठ! जबतक यह युवती न हो जाय, तबतक तुम्हीं इसका पालन-पोषण करना। युवावस्था होनेपर पुनः इस साध्वी कन्याको मेरे पास ले आना।' यों कहकर मैंने गौतमको वह कन्या समर्पित कर दी। गौतम अपने तपोबलसे निष्पाप हो चुके थे। उन्होंने विधिपूर्वक उस कन्याका पालन-पोषण किया और युवती होनेपर उसे वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित करके मेरे पास ले आये। उस समय उनके मनमें कोई विकार नहीं था। अहल्याको देखकर इन्द्र, अग्नि और वरुण आदि सब देवता बारी-बारीसे मेरे पास आये और कहने लगे—'सुरेश्वर! यह कन्या मुझे दे दीजिये।' इन्द्रका तो उसके लिये विशेष आग्रह था। महर्षि गौतमकी महत्ता, गम्भीरता और धीरताका विचार करके मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैंने सोचा—'यह सुमुखी कन्या गौतमको ही देने योग्य है और किसीको नहीं। अतः उन्हींको दूँगा।' ऐसा निश्चय करके मैंने देवताओं और ऋषियोंसे कहा—'यह सुन्दरी कन्या उसीको दी जायगी, जो सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके सबसे पहले यहाँ उपस्थित हो जाय; दूसरे किसीको नहीं मिलेगी।
मेरी बात सुनकर सब देवता अहल्याकी प्राप्तिके लिये पृथ्वीकी परिक्रमा करने चले गये। इसी बीचमें कामधेनु सुरभि बच्चा देने लगी। अभी बच्चेका आधा शरीर ही बाहर निकला था। उसी अवस्थामें गौतमने उसे देखा और उसीको पृथ्वीभावसे देखते हुए उसकी परिक्रमा की। साथ ही उन्होंने शिवलिङ्गकी भी प्रदक्षिणा की। इसके बाद सोचा, सम्पूर्ण देवताओंने अभी पृथ्वीकी एक परिक्रमा भी पूरी नहीं की और मेरे द्वारा दो परिक्रमाएँ पूरी हो गयीं। ऐसा निश्चय करके वे मेरे समीप
- क्षुधातीर्थ और अहल्या-संगम-तीर्थका माहात्म्य * १६७
आये और मुझे प्रणाम करके बोले— 'कमलासन! विश्वात्मन्! आपको बारंबार नमस्कार है। ब्रह्मन्! मैंने सारी वसुधाकी प्रदक्षिणा कर ली।' मैंने ध्यानके द्वारा सब बातें जानकर गौतमसे कहा—'ब्रह्मर्षे! तुम्हींको यह सुन्दरी कन्या दी जाती है। वास्तवमें तुमने पृथ्वीकी परिक्रमा पूरी कर ली। जो वेदोंके लिये भी दुर्बोध है, उस धर्मका स्वरूप तुम जानते हो। जो गाय आधा प्रसव कर चुकी हो, वह सात द्वीपोंवाली पृथ्वीके तुल्य है। उसकी परिक्रमा कर ली जाय तो समूची पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है। शिवलिङ्गकी प्रदक्षिणाका भी यही फल है। अतः उत्तम व्रतका पालन करनेवाले गौतम! मैं तुम्हारे धैर्य, ज्ञान और तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ।' यों कहकर मैंने गौतमको अहल्या सौंप दी। उन दोनोंका विवाह हो जानेपर देवतालोग पृथ्वीकी परिक्रमा करके धीरे-धीरे आने लगे। आनेपर सबने अहल्याके साथ गौतमका विवाह हुआ देखा। इससे उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। अन्तमें सब देवता स्वर्गमें चले गये, परंतु इन्द्रके मनमें इससे बड़ी ईर्ष्या हुई। मैंने प्रसन्न होकर महात्मा गौतमको रहनेके लिये ब्रह्मगिरि प्रदान किया, जो परम पवित्र, समस्त अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला तथा मङ्गलमय है। मुनिश्रेष्ठ गौतम वहाँ अहल्याके साथ विहार करने लगे।
इन्द्रने स्वर्गमें भी गौतमकी पवित्र कथा सुनी। अतः मुनिको, उनके आश्रमको और उनकी सुन्दरी पत्नीको देखनेके लिये वे ब्राह्मणका वेष धारण करके आये। वहाँ आनेपर उन्होंने मनमें पापकी भावना लेकर अहल्याको देखा। उस समय वे अपने-आपको भी भूल गये। देश-कालकी भी सुध न रही और ऋषिके शापका भय भी उन्होंने भुला दिया। उनका हृदय कामके वशीभूत हो रहा था। एक समय महर्षि गौतम मध्याह्नसे पहलेकी क्रिया समाप्त करके शिष्योंके साथ आश्रमसे बाहर गये। उस समय अवसर देखकर इन्द्रने अपने मनके अनुकूल कार्य किया। वे गौतमका रूप धारण करके आश्रममें आये और सर्वाङ्गसुन्दरी अहल्यासे बोले—'प्रिये! मैं तुम्हारे गुणोंसे आकृष्ट हूँ। तुम्हारे रूपका स्मरण करके मेरा मन विचलित हो गया है। पाँव लड़खड़ा रहे हैं।' यों कहकर हँसते-हँसते उन्होंने अहल्याका हाथ पकड़ लिया और आश्रमके भीतर चले गये। अहल्याने उन्हें गौतम ही समझा। यह कोई जार पुरुष है—यह बात उसके ध्यानमें नहीं आयी। वह इन्द्रके साथ सुखपूर्वक रमण करने लगी। इतनेमें ही महर्षि गौतम पुनः अपने शिष्योंके साथ लौट आये। प्रतिदिनका ऐसा नियम था कि जब वे बाहरसे आश्रमपर आते तब प्रियवादिनी अहल्या आगे बढ़कर उनका स्वागत करती, प्रिय लगनेवाली बातें कहती और अपने सद्गुणोंसे उन्हें संतुष्ट करती थी। उस दिन अहल्याको न देखकर परम बुद्धिमान् गौतमको ऐसा जान पड़ा मानो कोई बड़ी अद्भुत बात हो गयी। मुनिश्रेष्ठ गौतम द्वारपर खड़े हैं और सब लोग उनकी ओर देखते हैं। अग्निहोत्र और शालाके रक्षक तथा घरमें कामकाज करनेवाले अनुचर उन्हें देखकर बड़े विस्मयमें पड़े और भयभीत होकर बोले—'भगवन्! यह कैसी विचित्र बात है कि आप भीतर और बाहर दोनों जगह देखे जाते हैं। अहो! आपकी तपस्याका ही यह प्रभाव है कि आप अनेक रूप धारण करके विचरते हैं।'
यह सुनकर गौतमके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे—आश्रमके भीतर कौन गया है। उन्होंने पुकारा—'प्रिये! अहल्ये! आज तुम मुझसे बोलती क्यों नहीं?' महर्षिका वचन सुनकर अहल्याने उस जारसे कहा—'अरे! तू
६३- गौतमका इन्द्र और अहल्याको शाप
१६८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
कौन है, जो मुनिका रूप धारण करके तूने मेरे साथ यह पापकर्म किया है?' यह कहती हुई वह भयके मारे शय्यासे सहसा उठकर खड़ी हो गयी। पापाचारी इन्द्र भी मुनिके भयसे बिलाव बन गया। अहल्या थर-थर काँप रही थी। उसके वेश-भूषा बिगड़ चुके थे। अपनी प्यारी पत्नीको कलङ्कित हुई देख महर्षिने क्रोधमें आकर कहा— 'तुमने यह दुःसाहस कैसे किया?' उनके इस प्रकार पूछनेपर देवी अहल्याने लज्जावश कोई उत्तर नहीं दिया। तब मुनि उस जारकी खोज करने लगे। इतनेमें उस बिलावपर उनकी दृष्टि पड़ी। अरे! ठीक-ठीक बता, तू कौन है? यदि झूठ बोलेगा तो मैं तुझे अभी भस्म कर दूँगा।'
इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला—'तपोधन! मैं शचीका स्वामी इन्द्र हूँ, मुझसे ही यह पाप हो गया है। मैंने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। ब्रह्मन्! कामदेवके बाणोंसे जिनका हृदय विदीर्ण हो चुका है, वे कौन-सा दुष्कर्म नहीं करते। आप करुणाके सागर हैं, मुझ महापापीको क्षमा करें। साधु पुरुष अपराधीपर भी कठोरता नहीं दिखाते।'
गौतम बोले—इन्द्र! तूने स्त्रीकी योनिमें आसक्त होकर यह पापकर्म किया है, अतः तेरे शरीरमें योनिके सहस्रों चिह्न हो जायँगे।
इसके बाद मुनिने अहल्यासे भी कुपित होकर कहा—'तू सूखी नदी हो जा।'
अहल्या बोली—भगवन्! जो पापिनी स्त्रियाँ मनसे भी दूसरे पुरुषकी कामना करती हैं, वे तथा उनके समस्त पूर्वज भी अक्षय नरकोंमें पड़ते हैं। आप कृपा करके मेरी बातोंपर ध्यान दें। यह इन्द्र आपका रूप धारण करके मेरे पास आया था। ये सब लोग इस बातके साक्षी हैं।
रक्षकोंने कहा—'ऐसी ही बात है। अहल्या ठीक कहती हैं।' मुनिने भी ध्यानके द्वारा सच्ची बातको जान लिया और शान्त होकर अपनी पतिव्रता पत्नीसे कहा—'कल्याणी! नदी होनेपर जब तुम सरिताओंमें श्रेष्ठ गौतमी गङ्गासे मिलोगी, उस समय पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त कर लोगी।' महर्षिका वचन सुनकर पतिव्रता अहल्याने वैसा ही किया। गौतमी गङ्गासे मिलनेपर पुनः उसका वही स्वरूप हो गया, जैसा मैंने बनाया था। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने हाथ जोड़कर महर्षि गौतमसे कहा—'मुनिश्रेष्ठ! अपने घरपर आये हुए मुझ पापिष्ठकी रक्षा कीजिये।' यों कहकर इन्द्र उनके चरणोंमें गिर पड़े। यह देख महर्षिने कृपापूर्वक कहा—'पुरंदर! तुम्हारा कल्याण हो। तुम गोदावरीके तटपर जाओ और उसमें स्नान करो। इससे तुम्हारे सारे पाप क्षणभरमें धुल जायँगे। तुम्हारे शरीरमें योनिके जो सहस्रों चिह्न हैं, वे नेत्रोंके रूपमें परिणत हो जायँगे। तुम सहस्राक्ष हो जाओगे। नारद! गौतमीके प्रभावसे ये
४३- जनस्थान, अश्वतीर्थ, भानुतीर्थ और अरुणा-वरुणा-संगमकी महिमा
* जनस्थान, अश्वतीर्थ, भानुतीर्थ और अरुणा-वरुणा-संगमकी महिमा * १६९
दो आश्चर्यजनक बातें मैंने देखी हैं—अहल्या नदी होकर पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त हुई और शचीपति इन्द्र सहस्राक्ष हो गये। तबसे वह तीर्थ
अहल्या-संगमके नामसे विख्यात हुआ, उसे इन्द्रतीर्थ भी कहते हैं। वह मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है।
जनस्थान, अश्वतीर्थ, भानुतीर्थ और अरुणा-वरुणा-संगमकी महिमा
**ब्रह्माजी कहते हैं—**उसके बाद विश्वविख्यात जनस्थान नामक तीर्थ है, जिसका विस्तार चार योजनका है। वह स्मरणमात्रसे मनुष्योंको मुक्ति देनेवाला है। पूर्वकालकी बात है, वैवस्वत मनुके वंशमें जनक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हुए। उन्होंने वरुणकी पुत्री गुणार्णवाके साथ विवाह किया था। गुणार्णवा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धि करनेवाली थी। जनकमें भी ये ही गुण थे, अतः राजाको अपने गुणोंके अनुरूप सुयोग्य भार्या मिली। विप्रवर याज्ञवल्क्य राजा जनकके पुरोहित थे। एक दिन राजाने अपने पुरोहितसे पूछा—‘द्विजश्रेष्ठ! बड़े-बड़े मुनियोंने यह निर्णय किया है कि भोग और मोक्ष दोनों श्रेष्ठ हैं; अन्तर इतना ही है कि भोग अन्तमें विरस हो जाता है और मुक्ति नित्य एवं निर्विकार है। अतः भोगसे भी मुक्तिको ही श्रेष्ठ माना गया है। आप बतायें, भोगसे मुक्तिकी प्राप्ति कैसे होती है? सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करनेसे जो मुक्ति प्राप्त होती है, वह तो अत्यन्त दुःखसाध्य है; अतः जिस उपायसे अत्यन्त सुखपूर्वक मुक्ति हो सके, वह बताइये।
**याज्ञवल्क्य बोले—**राजन्! साक्षात् भगवान् वरुण तुम्हारे गुरुजन, श्वशुर और हितकारी हैं। उन्हींके पास चलकर पूछो। वे तुम्हें हितका उपदेश देंगे।
तदनन्तर याज्ञवल्क्य और जनक दोनों राजा वरुणके पास गये और वहाँ उन्होंने मुक्तिका मार्ग पूछा।
**वरुणने कहा—**दो प्रकारसे मुक्ति प्राप्त होती है—एक तो कर्म करनेसे और एक कर्म न करनेसे। वेदमें यह मार्ग निश्चित किया गया है कि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ कर्मसे बँधे हुए हैं। नृपश्रेष्ठ! कर्मद्वारा सब प्रकारके साध्योंकी सिद्धि होती है, इसलिये मनुष्योंको सब तरहसे वैदिक कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। इससे वे इस लोकमें भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं। अकर्मसे कर्म पवित्र है। कर्म भिन्न-भिन्न आश्रमों और वर्णोंके अनुसार
| १७० | * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण * |
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अनेक प्रकारके होते हैं। वर्णों और आश्रमोंमें भी चार आश्रम कर्मके द्वारा माने गये हैं। उनमें भी गृहस्थाश्रम अधिक पुण्यदायक है। उससे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त हो सकते हैं।* यही मेरा मत है।†
यह सुनकर राजा जनक और बुद्धिमान् याज्ञवल्क्यने वरुणका पूजन किया और पुनः यह बात पूछी—'सुरश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है। आप सर्वज्ञ हैं। बताइये, कौन-सा देश और तीर्थ ऐसा है जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है?
वरुणने कहा— इस पृथ्वीपर भारतवर्ष और उसमें भी दण्डकवन पुण्यदायक है। इसमें किया हुआ शुभ कर्म मनुष्योंको भोग तथा मोक्ष दोनों प्रदान करता है। तीर्थोंमें गौतमी गङ्गा श्रेष्ठ हैं। वे मुक्तिदायिनी मानी गयी हैं। वहाँ यज्ञ और दान करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होगी।
वरुणका यह उपदेश सुनकर याज्ञवल्क्य और जनक उनकी आज्ञा ले अपनी पुरीमें लौट आये, फिर गङ्गातीर्थपर जाकर राजा जनकने अश्वमेध आदि यज्ञ किये और विप्रवर याज्ञवल्क्यने उन यज्ञोंमें आचार्यका कार्य किया। गौतमी गङ्गाके तटपर यज्ञ करनेसे राजाको मोक्षकी प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् जनकवंशके बहुत-से राजा क्रमशः वहाँ आकर यज्ञ करते और गोदावरीकी कृपासे मोक्षके भागी होते रहे। तभीसे यह तीर्थ जनस्थानके नामसे विख्यात हुआ। जनकोंका यज्ञस्थान होनेसे उसका नाम जनस्थान पड़ गया। वहाँ स्नान, दान और पितरोंका तर्पण करनेसे तथा उस तीर्थका चिन्तन करने, वहाँ जाने और भक्तिपूर्वक उसका सेवन करनेसे मनुष्य सब अभिलषित वस्तुओंको पाता और मोक्षका भागी होता है।
अरुणा और वरुणा नामकी दो परम पवित्र नदियाँ हैं। उन दोनोंका गोदावरीमें संगम हुआ है, जो बहुत ही पवित्र तीर्थ है। उसकी उत्पत्तिकी कथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। उसे बताता हूँ, सुनो। महर्षि कश्यपके ज्येष्ठ पुत्र आदित्य (सूर्य) समस्त लोकोंमें विख्यात हैं। वे तीनों लोकोंके नेत्र हैं। उनकी किरणें अत्यन्त दुस्सह हैं। भगवान् सूर्यके रथमें सात घोड़े जुते होते हैं। सूर्यदेव सम्पूर्ण लोकोंद्वारा पूजित हैं। उनकी पत्नीका नाम उषा है। उषा विश्वकर्माकी पुत्री और त्रिभुवनकी अद्वितीय सुन्दरी है। उसे अपने स्वामीके तीव्र तापका सहन नहीं हो पाता था। वह सदा इसी चिन्तामें पड़ी रहती कि 'मुझे क्या करना चाहिये?' उषाके दो बुद्धिमान् पुत्र थे—वैवस्वत मनु और यम। एक कन्या भी थी, जो परम पवित्र यमुना नदीके रूपमें विख्यात हुई। एक दिन उषाने अपने ही समान रूपवाली अपनी छाया उत्पन्न की और उससे कहा—'तू मेरी-ही-जैसी होकर मेरी आज्ञासे पतिकी सेवा तथा मेरे पुत्रोंका पालन कर। मैं जबतक लौट न आऊँ, तबतक तुम्हीं पतिकी प्रेयसी बनकर रहो; यह रहस्य किसीको न बताना। मेरी संतानोंपर भी यह भेद प्रकट न होने पाये।' छायाने 'बहुत अच्छा' कहकर उषाकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उषा घरसे निकल गयी। उसने तपस्याके लिये उत्तरकुरु नामक देशको प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर उसने घोड़ीका रूप धारण करके कठोर तपस्या आरम्भ की। जब सूर्यदेवको
* गृहस्थ-आश्रममें भोगकी प्राप्ति तो स्वाभाविक है और मोक्षकी प्राप्ति निष्काम धर्मका अनुष्ठान करनेसे होती है।
† अकर्मणः कर्म पुण्यं कर्म चाप्याश्रमेषु च
जात्याश्रितं च राजेन्द्र तत्रापि शृणु धर्मवित्। आश्रमाणि च चत्वारि कर्मद्वाराणि मानद॥
चतुर्णामाश्रमाणां च गार्हस्थ्यं पुण्यदं स्मृतम्। (८८।१३-१५)
४४- गारुड़तीर्थ और गोवर्धनतीर्थकी महिमा
* गारुड़तीर्थ और गोवर्धनतीर्थकी महिमा * १७१
इसका पता लगा, तब वे भी घोड़ेका रूप धारण करके उसके पास गये। पतिव्रता उषा परपुरुषकी आशङ्कासे भागकर भारतवर्षमें गौतमीके तटपर आयी। वहाँ उसका पतिके साथ समागम हुआ, जिससे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई। वह स्थान अश्वतीर्थ, भानुतीर्थ और पञ्चवटी आश्रमके नामसे विख्यात हुआ। तापी और यमुना दोनों सूर्यकी कन्याएँ थीं। वे गौतमी-तटपर अपने पितासे मिलनेके लिये अरुणा-वरुणा नामक नदियोंके रूपमें आयी थीं। उन दोनोंका जहाँ गङ्गामें संगम हुआ है, वह बहुत उत्तम तीर्थ है। उसमें भिन्न-भिन्न देवताओं और तीर्थोंका पृथक्-पृथक् समागम हुआ है। उक्त संगममें सत्ताईस हजार तीर्थोंका समुदाय है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान अक्षय पुण्य देनेवाला है। नारद! उस तीर्थके स्मरण, कीर्तन और श्रवणसे भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो धर्मवान् और सुखी होता है।
गारुड़तीर्थ और गोवर्धनतीर्थकी महिमा
**ब्रह्माजी कहते हैं—**नारद! गारुड नामक तीर्थ सब विघ्नोंकी शान्ति करनेवाला है। उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। शेषनागके एक महाबली पुत्र था, जो मणिनागके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसे सदा गरुड़का भय बना रहता था, अतः उसने अपनी भक्तिके द्वारा भगवान् शंकरको संतुष्ट किया। प्रसन्न होनेपर भगवान् महेश्वरने कहा—'नाग! कोई वर माँगो।' नागने कहा—'प्रभो! मुझे गरुड़से अभय-दान दीजिये।' भगवान् शिवने कहा—'ऐसा ही होगा। तुम्हें गरुड़से भय न हो।' वरदान पाकर मणिनाग गरुड़से निर्भय हो बाहर निकला। वह क्षीरसागरके समीप, जहाँ भगवान् विष्णु शयन करते हैं, इधर-उधर विचरने लगा। जहाँ गरुड़ निवास करते थे, उस स्थानपर भी वह जाया करता। गरुड़ने उस नागको निर्भय विचरते देख पकड़ लिया और अपने घरमें लाकर डाल दिया।
इसी बीचमें नन्दीने जगदीश्वर भगवान् शिवसे कहा—'देवेश्वर! अब मणिनाग नहीं आता है। जान पड़ता है गरुड़ने उसे खा लिया या बाँध रखा है। यदि वह जीवित होता तो यहाँ आये बिना न रहता।' नन्दीकी बात सुनकर भगवान् शिवने नागकी अवस्थाको जान लिया और कहा—'वह नाग गरुड़के घरमें बँधा पड़ा है। तुम शीघ्र जाकर जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी स्तुति करो और गरुड़के द्वारा बन्धनमें डाले हुए नागको मेरे कहनेसे ले आओ।' प्रभुकी बात सुनकर नन्दी स्वयं ही लक्ष्मीपतिके पास उपस्थित हुए और भगवान् शिवकी कही हुई बातें वहाँ निवेदन कीं। तब भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर गरुड़से कहा—'विनतानन्दन! मेरी बात मानकर नन्दीको वह नाग लौटा दो।' गरुड़ने नाग देना स्वीकार नहीं किया और गर्वसे कहा—'मैं आपका भृत्य हूँ; मैं नागको लाया, आप उसे नन्दीको दे रहे हैं। स्वामी तो सेवकोंको दिया करते हैं, परंतु आप तो मेरी प्राप्य वस्तुको छीन रहे हैं। मेरी शक्ति आप जानते ही हैं। मेरे ही बलसे तो आपने संग्राममें दैत्योंपर विजय प्राप्त की है।'
भगवान् विष्णुने गरुड़की बात सुनकर सबके सामने हँसकर कहा—'पक्षिराज! ठीक है, तुम्हारे ही बलसे मैंने असुरोंपर विजय पायी है।' फिर भगवान्ने क्रोध न करके कहा—'गरुड़! मैं
६५- देवताओंद्वारा गोयज्ञका अनुष्ठान
१७२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
मानता हूँ तुममें विलक्षण शक्ति है; पर तुम मेरी इस कनिष्ठ अँगुलीको तो वहन करो।' इतना कहकर भगवान्ने अपनी अँगुली गरुड़के मस्तकपर रख दी। गरुड़ अँगुलीका भार सह नहीं सके। तब गरुड़ने दीनभावसे लज्जित होकर हाथ जोड़कर प्रार्थना की और कहा—'मैं आपका अपराधी सेवक हूँ। मेरा परित्राण कीजिये।' फिर उन्होंने माता लक्ष्मीसे प्रार्थना की। लक्ष्मीजीने कृपाकुल होकर जनार्दनसे कहा—'नाथ! विपन्न भृत्य गरुड़की रक्षा कीजिये।' तब भगवान्ने नन्दीसे कहा—'नन्दिकेश्वर! तुम गरुड़के साथ ही नागको महादेवजीके पास ले जाओ।' 'बहुत अच्छा' कहकर नन्दी गरुड़ और नागके साथ धीरे-धीरे शंकरजीके पास गये और सब समाचार उन्हें कह सुनाया।
तब शंकरजीने गरुड़से कहा—'महाबाहो! तुम लोकपावनी गौतमी गङ्गाके पास जाओ। वे समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं। उस शान्तिमयी सरितामें स्नान करनेसे तुम्हें समस्त इच्छित वस्तुएँ सौगुनी अथवा सहस्रगुनी होकर मिलेंगी। गरुड़! जो सब प्रकारके पापोंसे सन्तप्त हैं, दुर्देवसे जिनका उद्योग नष्ट हो गया है, उन प्राणियोंके लिये मनोवाञ्छित फल देनेवाली गोदावरी नदी ही शरण हैं।' भगवान् शिवकी यह बात सुनकर गरुड़ प्रणाम करके चले गये। गोदावरीके तटपर पहुँचकर उन्होंने जलमें स्नान किया और भगवान् शिव तथा विष्णुके चरणोंमें मस्तक झुकाया। फिर उनमें पूर्ववत् वेग आ गया और वे उड़कर भगवान् विष्णुके समीप चले गये। तबसे वह समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला तीर्थ 'गारुड़तीर्थ' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। वत्स नारद! मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए वहाँ स्नान आदि जो भी कर्म करता है, वह सब अक्षय तथा शिव और विष्णुको प्रिय लगनेवाला होता है।
उसके आगे सब पापोंका नाश करनेवाला गोवर्धनतीर्थ है। वह पितरोंके लिये पुण्यजनक तथा स्मरणमात्रसे पाप दूर करनेवाला है। नारद! मैंने उसका प्रभाव प्रत्यक्ष देखा है। पूर्वकालमें जाबालि नामसे प्रसिद्ध एक किसान ब्राह्मण रहता था। वह दोपहर हो जानेपर भी हलसे बैलोंको खोलता नहीं था। उनके दोनों बगलमें और पीठपर चाबुक मारता रहता था। उसके दोनों बैल सदा आँखोंसे आँसू बहाते रहते थे। एक दिन कामधेनु गौ जगन्माता सुरभिने नन्दीसे सब हाल कहा। नन्दीने भी खिन्न होकर भगवान् शंकरको सब बातें बतायीं। तब शंकरजीने नन्दीसे कहा—'तुम्हारी प्रत्येक बात सिद्ध हो।'
महादेवजीकी यह आज्ञा पाकर नन्दीने समस्त गोजातिको अपनेमें समेट लिया। स्वर्गलोक और मर्त्यलोककी समस्त गौएँ अदृश्य हो गयीं। तब देवताओंने मेरे पास आकर कहा—'भगवन्!
४५- श्वेततीर्थ, शुक्रतीर्थ और इन्द्रतीर्थका माहात्म्य
* श्वेततीर्थ, शुक्रतीर्थ और इन्द्रतीर्थका माहात्म्य * | १७३
गौओंके बिना जीवन नहीं रह सकता।' उस समय मैंने देवताओंसे कहा—'जाओ, भगवान् शंकरसे याचना करो।' तदनन्तर उन्होंने भगवान् शंकरकी स्तुति करके उनसे सब हाल कहा। महादेवजीने भी देवताओंको उत्तर दिया—'इस विषयमें नन्दी जानते हैं।' तब सब देवता नन्दिकेश्वरके पास जाकर बोले—'हमें जगत्का उपकार करनेवाली गौएँ दीजिये।' नन्दी बोले— 'आपलोग गो-यज्ञ कीजिये, तभी दिव्य और मानस गौएँ प्राप्त होंगी।' तत्पश्चात् गौतमी गङ्गाके तटपर देवताओंने गोयज्ञका आयोजन किया। फिर वहाँसे गौएँ बढ़ने लगीं। तभीसे वह तीर्थ 'गोवर्धन' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह देवताओंकी प्रीति बढ़ानेवाला है। मुनिश्रेष्ठ ! वहाँ किया हुआ केवल स्नान भी सहस्र गो-दानोंका फल देनेवाला है।
श्वेततीर्थ, शुक्रतीर्थ और इन्द्रतीर्थका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! श्वेततीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। पूर्वकालमें श्वेत नामके एक ब्राह्मण थे, जो महर्षि गौतमके प्रिय सखा थे। वे गोदावरीके तटपर रहकर अतिथियोंके स्वागत-सत्कारमें लगे रहते और मन-वाणी तथा क्रियाद्वारा भगवान् शिवका भजन करते थे। वे सदा भगवान् सदाशिवकी पूजा और ध्यान करते रहते थे। शिवके भजनमें ही उनकी आयु पूरी हो गयी। तब यमराजके दूत उन्हें ले जानेके लिये आये, परंतु नारदजी ! वे ब्राह्मण-देवताके घरमें प्रवेश न कर सके। जब ब्राह्मणकी मृत्युका समय व्यतीत हो गया, तब चित्रकने मृत्युसे पूछा—'मृत्यो ! श्वेतका जीवन समाप्त हो चुका है, वह अबतक क्यों नहीं आया? तुम्हारे दूत भी अभीतक नहीं लौटे। ऐसा होना उचित नहीं।' यह सुनकर मृत्युको बड़ा क्रोध हुआ और वे स्वयं ही श्वेतके घरपर पधारे। उनके दूत भयभीत होकर बाहर ही खड़े थे। उन्हें देखकर मृत्युने पूछा—'दूतो! यह क्या बात है?' दूत बोले—'श्वेत भगवान् शिवके द्वारा सुरक्षित हैं। हम उनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते। जिनके ऊपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो जायँ, उन्हें भय कैसा।'
तब मृत्युने अपना फंदा हाथमें लेकर स्वयं ही ब्राह्मणके घरमें प्रवेश किया। ब्राह्मण तो भक्तिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा कर रहे थे। उन्हें न तो मृत्युके आनेका पता था और न यमदूतोंके। श्वेतके समीप पाशधारी मृत्युको खड़ा देख दण्डधारी भैरवने विस्मित होकर पूछा—'मृत्युदेव! यहाँ क्या देखते हो?' मृत्युने उत्तर दिया—'मैं श्वेतको ले जानेके लिये यहाँ आया हूँ, अतः इन्हींको देखता हूँ।' भैरवने कहा—'लौट जाओ।' मृत्युने श्वेतपर अपना फंदा फेंका। यह देखकर भैरव कुपित हो उठे। उन्होंने शिवके दिये हुए दण्डसे मृत्युपर गहरी चोट की। मृत्युदेवता पाश हाथमें लिये हुए ही धरतीपर गिर पड़े। मृत्युको मारा गया देख यमदूत भाग गये। उन्होंने मृत्युके वधका समाचार यमराजसे कहा। यह सुनकर महिषवाहन यमराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अधिक बलवान् चित्रगुप्त, अपनी रक्षा करनेवाले यमदण्ड, महिष, भूत, वेताल तथा आधि-
१७४
* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
व्याधियोंको शीघ्रतापूर्वक चलनेका आदेश दे तुरंत वहाँसे प्रस्थान किया। अपने साथियोंसहित यमराज उस स्थानपर पहुँचे, जहाँ द्विजश्रेष्ठ श्वेत भगवान् शिवकी आराधनामें संलग्न थे।
उस समय यमराज तथा भगवान् शिवके पार्षदोंमें अत्यन्त भयानक संग्राम छिड़ गया। कार्तिकेयने स्वयं ही शक्ति सँभाली और यमराजके दूतोंको विदीर्ण कर डाला। साथ ही दक्षिण-दिशाके स्वामी अत्यन्त बलवान् यमराजको भी मौतके घाट उतार दिया। मरनेसे बचे हुए यमदूतोंने भगवान् सूर्यको यह सब समाचार कह सुनाया। यह अद्भुत बात सुनकर सूर्य समस्त देवताओं और लोकपालोंके साथ मेरे समीप आये। फिर मैं, भगवान् विष्णु, इन्द्र, अग्नि, वरुण तथा अन्य बहुत-से देवता यमराजके पास गये। वे गोदावरीके तटपर मरे पड़े थे। यमराजको सेनासहित मरा देख देवता भयसे व्याकुल हो उठे और हाथ जोड़कर बारंबार भगवान् शिवकी प्रार्थना करने लगे।
देवता बोले—भगवन् ! आपको अपने भक्त सदा ही प्रिय हैं तथा आप दुष्टोंका वध किया करते हैं। संसारके आदि स्रष्टा नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ब्रह्मप्रिय! आपको नमस्कार है। देवप्रिय! आपको नमस्कार है। विप्रवर श्वेत आपके भक्त हैं। इनकी आयु क्षीण हो जानेपर भी यम आदि सब लोग इन्हें ले जानेमें समर्थ न हो सके। आपका अपने भक्तोंपर ऐसा महान् प्रेम देखकर हम सबको बड़ा संतोष हुआ। नाथ ! सचमुच ही आप बड़े भक्तवत्सल हैं। जो लोग आप-जैसे दयालु परमेश्वरकी शरणमें आ गये हैं, उन्हें यमराज भी नहीं देख सकता। यह जानकर ही सब लोग पराभक्तिके साथ आपका भजन करते हैं। शंकर! आप ही इस जगत्के स्वामी हैं। क्या यह बात आप भूल गये? आपके बिना यहाँ व्यवस्था करनेमें कौन समर्थ हो सकता है।
इस प्रकार स्तुति करनेवाले देवताओंके समक्ष भगवान् शंकर स्वयं प्रकट हो गये और बोले—'देवताओ! तुम्हें क्या दूँ?'
देवताओंने कहा—देवेश्वर! ये सूर्यके पुत्र धर्म हैं, जो समस्त देहधारियोंका नियन्त्रण करते हैं। इन्हें धर्म और अधर्मकी व्यवस्थामें नियुक्त किया गया है। ये लोकपाल हैं। अपराधी और पापी नहीं हैं। अतः इनका वध नहीं होना चाहिये। इनके बिना ब्रह्माजीका कोई कार्य नहीं चल सकता। इसलिये सेना और वाहनोंसहित यमराजको जीवित कर दीजिये। नाथ ! महात्माओंके सामने की हुई प्रार्थना सफल ही होती है। वह कभी व्यर्थ नहीं जाती।
भगवान् शिव बोले—देवताओ! मेरी बात सुनो—जो मेरे तथा भगवान् विष्णुके भक्त हैं, गौतमी गङ्गाका निरन्तर सेवन करनेवाले हैं, उनके स्वामी हमलोग स्वयं ही हैं। मृत्युका उनके ऊपर कोई अधिकार नहीं है। यमराजको तो कभी उनकी बाततक नहीं चलानी चाहिये। व्याधि-आधिके द्वारा उनका पराभव करना कदापि उचित नहीं है। जो मेरी शरणमें आ जाते हैं, वे तत्काल मुक्त हो जाते हैं। यमराजको तो चाहिये अपने अनुचरोंसहित उन्हें प्रणाम करे।
'बहुत अच्छा' कहकर देवताओंने भगवान् शिवकी बातका अनुमोदन किया। तब भगवान् शिवने अपने वाहन नन्दीसे कहा—'तुम गौतमीका जल लेकर मरे हुए यमराज आदिके शरीरपर छिड़क दो।' आज्ञा पाकर नन्दीने यम आदि सब लोगोंपर गोदावरीका जल छिड़का। इससे वे जीवित होकर उठ बैठे और दक्षिण दिशाकी ओर चले गये। गौतमीके उत्तर-तटपर विष्णु
* श्वेततीर्थ, शुक्रतीर्थ और इन्द्रतीर्थका माहात्म्य * १७५
आदि सब देवता ठहर गये और देवाधिदेव महेश्वरकी पूजा करने लगे। उस समय वहाँ एक लाख बारह हजार तीर्थ एकत्रित हुए थे। इसी प्रकार गोदावरीके दक्षिण-तटपर तीस हजार तीर्थ एकत्रित हुए। यही श्वेततीर्थका पवित्र उपाख्यान है। जहाँ मृत्यु देवता मरकर गिरे थे, वह स्थान मृत्युतीर्थ कहलाता है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसके माहात्म्यका श्रवण, पठन और स्मरण अन्तःकरणके मलको धोनेवाला और सब लोगोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है।
इसके आगे शुक्रतीर्थ है, जो मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। वह सब पापोंको शान्त करनेवाला तथा सब प्रकारकी व्याधियोंका नाशक है। अङ्गिरा और भृगु—ये दो परम धर्मात्मा ऋषि हुए हैं। इन दोनोंके दो-दो पुत्र हुए, जो बड़े ही विद्वान् और रूप तथा बुद्धिसे सुशोभित थे। अङ्गिराके पुत्रका नाम था जीव और भृगुके पुत्रका नाम था कवि। ये दोनों अपने माता-पिताके अधीन रहते थे। जब दोनोंका यज्ञोपवीत-संस्कार हो गया, तब उनके पिता परस्पर कहने लगे—'हम दोनोंमेंसे एक ही इन दोनों पुत्रोंका शिक्षक हो। इससे एक ही शासन करेगा और दूसरा सुखसे बैठा रहेगा।' यह सुनकर अङ्गिराने कहा—'मैं कविको भी अपने पुत्रके समान ही पढ़ाऊँगा। वह सुखपूर्वक मेरे यहाँ रहे।'
अङ्गिराकी बात सुनकर भृगुने कहा—'ठीक है' और उन्होंने अपने पुत्र शुक्रको अङ्गिराकी सेवामें सौंप दिया। परन्तु अङ्गिरा उन दोनों बालकोंमें विषम बुद्धि रखते थे। इसलिये दोनोंको पृथक्-पृथक् पढ़ाते थे। बहुत दिनोंतक किसी प्रकार चलता रहा, तब एक दिन शुक्रने कहा—'गुरुदेव! आप मुझे प्रतिदिन विषमभावसे पढ़ाते हैं। गुरुओंके लिये यह उचित नहीं कि वे पुत्र और शिष्यमें भेदभाव समझें। जो लोग विषम बुद्धि रखते हैं, उनके पापकी कोई गणना नहीं है। आचार्य! अब मैंने आपको अच्छी तरह समझ लिया। आपको बारंबार नमस्कार करता हूँ। अब दूसरे किसी गुरुके यहाँ जाऊँगा। मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये।'
इस प्रकार गुरु और बृहस्पतिसे पूछकर उनकी आज्ञा ले शुक्र चले गये। उन्होंने सोचा अब पूर्ण विद्या प्राप्त करके ही पिताके पास चलूँ। किन्तु किससे पूछूँ, कौन सबसे श्रेष्ठ गुरु हो सकता है? इन्हीं सब बातोंका विचार करते हुए शुक्रने महाप्राज्ञ गौतमके पास जाकर पूछा— 'मुनिश्रेष्ठ! बताइये, कौन मेरा गुरु हो सकता है? जो तीनों लोकोंका गुरु हो, उसीके पास मैं जाऊँगा।'
गौतमने कहा—जगद्गुरु भगवान् शंकर ही गुरु होने योग्य हैं।
शुक्रने पूछा—मैं कहाँ रहकर शङ्करजीकी आराधना करूँ?
गौतम बोले—गौतमी गङ्गामें स्नान करके पवित्र हो स्तोत्रोंद्वारा भगवान् शंकरको संतुष्ट करो। संतुष्ट होनेपर वे जगदीश्वर तुम्हें विद्या प्रदान करेंगे।
गौतमके कहनेसे शुक्र गोदावरीके तटपर गये और वहाँ स्नान करके पवित्र हो भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे।
शुक्र बोले—प्रभो ! मैं बालक हूँ। मेरी बुद्धि बालककी ही है और आप बालचन्द्रमाको मस्तकपर धारण करनेवाले हैं। मुझे आपकी स्तुति करनेका कुछ भी ज्ञान नहीं है। केवल आपको नमस्कार करता हूँ। गुरुने मुझे त्याग दिया है। मेरा कोई सुहृद् अथवा सखा नहीं है। आप ही सब प्रकारसे मेरे प्रभु हैं। जगन्नाथ!
६६- भगवान् शिवका शुक्रको मृतसंजीवनी विद्याका दान
१७६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
आपको नमस्कार है। आप गुरुवालोंके भी गुरु और बड़ोंके भी बड़े हैं। मैं छोटा बच्चा हूँ। मुझपर कृपा कीजिये। जगन्मय ! आपको नमस्कार है। सुरेश्वर! मैं विद्याके लिये आपकी शरणमें आया हूँ। मुझे आपके स्वरूपका कुछ भी ज्ञान नहीं है। आप स्वयं ही कृपा करके मेरी ओर देखें। लोकसाक्षी शिव ! आपको नमस्कार है।
शुक्रके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर बोले—'वत्स ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम इच्छानुसार वर माँगो, भले ही वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ क्यों न हो।' उदारबुद्धि कविने भी हाथ जोड़कर कहा—'नाथ ! ब्रह्मा आदि देवताओं तथा ऋषियोंको भी जो विद्या नहीं प्राप्त हुई हो, उसके लिये मैं याचना करता हूँ। आप ही मेरे गुरु और देवता हैं।'
**ब्रह्माजी कहते हैं—**शुक्रने जब इस प्रकार प्रार्थना की, तब देवश्रेष्ठ भगवान् शिवने उन्हें मृतसंजीवनी विद्या प्रदान की, जिसका ज्ञान देवताओंको भी नहीं था। साथ ही उन्होंने लौकिकी, वैदिकी तथा अन्यान्य विद्याएँ भी दीं। जब साक्षात् भगवान् शंकर ही प्रसन्न हो गये थे, तब क्या बाकी रह जाता। वह महाविद्या पाकर शुक्र अपने पिता और गुरुके पास गये। अपनी विद्यासे पूजित होकर वे दैत्योंके गुरु हुए। किसी समय कुछ कारणवश बृहस्पतिके पुत्र कचने शुक्राचार्यसे मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की। कचसे बृहस्पतिने और बृहस्पतिसे पृथक्-पृथक् देवताओंने उस विद्याको ग्रहण किया। गौतमीके उत्तरतटपर, जहाँ भगवान् महेश्वरकी आराधना करके शुक्रने विद्या पायी थी, वह स्थान शुक्रतीर्थ कहलाता है। मृत्यु-संजीवनीतीर्थ भी उसका नाम है। वह आयु और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाला है। वहाँ स्नान, दान आदि जो कुछ भी शुभ कर्म किया जाता है, वह अक्षय पुण्य देनेवाला होता है।
शुक्रतीर्थके बाद इन्द्रतीर्थ है। वह ब्रह्महत्याका विनाश करनेवाला है। उसके स्मरणमात्रसे पाप-राशि तथा क्लेशसमुदायका नाश हो जाता है। नारद ! पूर्वकालकी बात है। जब इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया, तब ब्रह्महत्या उनके पीछे लग गयी। उसे देखकर इन्द्रको बड़ा भय हुआ। वे इधर-उधर भागने लगे। किंतु जहाँ-जहाँ वे जाते, ब्रह्महत्या उनका पीछा नहीं छोड़ती थी। तब वे एक बहुत बड़े सरोवरमें प्रवेश करके कमलकी नालमें छिप गये और उसमें तन्तुकी भाँति होकर रहने लगे। ब्रह्महत्या भी उस सरोवरके तटपर एक हजार दिव्य वर्षोंतक बैठी रही। इस बीचमें सब देवता बिना इन्द्रके हो गये थे। उन्होंने आपसमें सलाह की, किस प्रकार इन्द्र प्रकट हों? उस समय मैंने देवताओंसे कहा—'ब्रह्महत्याके लिये दूसरा स्थान दे दिया जाय और इन्द्रको शुद्ध करनेके लिये गोदावरी नदीमें नहलाया जाय। उसमें स्नान करनेसे इन्द्र पुनः शुद्ध हो जायँगे।'
४६- पौलस्त्य, अग्नि और ऋणमोचन नामक तीर्थोंका माहात्म्य
* पौलस्त्य, अग्नि और ऋणमोचन नामक तीर्थोंका माहात्म्य * १७७
इन्द्रका प्रथम अभिषेक नर्मदा-तटपर हुआ। वहाँ उनके मलका शोधन होनेके कारण उस देशका नाम मालव पड़ा। तत्पश्चात् वे गौतमी गङ्गाके तटपर लाये गये। वहाँ पुण्या नदीके जलमें गौतमीका जल लाकर उसीसे समस्त देवता, ऋषि, मैं, विष्णु, वसिष्ठ, गौतम, अगस्त्य, अत्रि, कश्यप, अन्यान्य ऋषि, यक्ष तथा पन्नगोंने इन्द्रका अभिषेक किया। तत्पश्चात् मैंने उन्हें अपने कमण्डलुके जलसे भी अभिषिक्त किया। इस प्रकार वहाँ 'पुण्या' और 'सिक्ता' दो नदियाँ हो गयीं और वे दोनों गौतमी गङ्गामें आकर मिलीं।
उन दोनोंके संगम मुनियोंद्वारा सेवित विख्यात तीर्थ बन गये। तबसे उस तीर्थको पुण्यासंगम कहते हैं। सिक्तासङ्गमका ही नाम इन्द्रतीर्थ हो गया। वहाँ सात हजार मङ्गलमय तीर्थ निवास करने लगे। उन तीर्थोंमें तथा विशेषतः संगमके जलमें जो स्नान-दान किया जाता है, वह सब अक्षय जानना चाहिये। इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो इस पवित्र उपाख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है, वह मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा होनेवाले समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
पौलस्त्य, अग्नि और ऋणमोचन नामक तीर्थोंका माहात्म्य
**ब्रह्माजी कहते हैं—**उसके आगे पौलस्त्य-तीर्थ है, जो मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। मैं उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ—वह छिने हुए राज्यकी भी प्राप्ति कराता है। विश्रवा मुनिके ज्येष्ठ पुत्र कुबेर, जो ऋद्धि-सिद्धिसे सम्पन्न और उत्तर दिशाके स्वामी हैं, पहले लङ्काके राजा थे। उनके सौतेले भाई रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण बड़े बलवान् थे। यद्यपि वे भी विश्रवाके ही पुत्र थे, तथापि राक्षसपुत्री कैकसीके गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण राक्षस कहलाते थे। वे तीनों भाई तपस्या करनेके लिये वनमें गये। वहाँ उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और मुझसे वरदान प्राप्त किया। तदनन्तर अपने मामा मारीचके तथा नाना और माताके कहनेसे रावणने कुबेरसे लङ्काकी राजधानी अपने लिये माँगी। इस बातको लेकर दोनों भाइयोंमें भारी शत्रुता हो गयी। फिर तो देवताओं और दानवोंमें भयंकर युद्ध हुआ। रावणने अपने बड़े भाई कुबेरको युद्धमें हराकर पुष्पक विमान और लङ्कापुरीपर अधिकार जमा लिया तथा तीनों लोकोंमें घोषणा करा दी कि जो
मेरे भाईको आश्रय देगा, वह मेरे हाथसे मारा जायगा। कुबेरको कहीं आश्रय न मिला। तब वे अपने पितामह पुलस्त्यके पास गये और उन्हें प्रणाम करके बोले—'मेरे दुष्ट भ्राताने मुझे लङ्कासे निकाल दिया। बताइये, अब क्या करूँ? अब मेरे
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
लिये दैव अथवा तीर्थ ही आश्रय या शरण हैं।' पौत्रकी यह बात सुनकर पुलस्त्यने कहा—'बेटा! तुम गौतमी गङ्गामें जाकर भगवान् शंकरकी स्तुति करो। वहाँ गङ्गाके जलमें रावणका प्रवेश नहीं हो सकता। अतः मेरे साथ वहीं चलकर कल्याणमयी सिद्धि प्राप्त करो।'
कुबेरने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और पत्नी, पिता, माता तथा वृद्ध महर्षि पुलस्त्यके साथ गौतमी गङ्गाके तटपर गये। वहाँ गङ्गामें स्नान करके पवित्र हो कुबेर भोग-मोक्षके दाता देवदेवेश्वर भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे—"शम्भो! आप ही इस चराचर जगत्के स्वामी हैं, दूसरा कोई नहीं। जो लोग आपकी भी अवहेलना करके मोहवश धृष्टता करते हैं, वे शोकके ही योग्य हैं। आप अपनी आठ मूर्तियोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्का भरण-पोषण करते हैं। आपकी आज्ञासे ही सब लोग चेष्टा करते हैं, तथापि विद्वान् पुरुष ही आपकी महिमाको कुछ-कुछ जान पाते हैं। अज्ञानी पुरुष आप पुरातन प्रभुको कभी नहीं जान सकता। एक दिन जगदम्बा पार्वतीने अपने शरीरके मैलसे एक पुतला बनाकर रख दिया और परिहासमें आपसे कहा—'देव! यह आपका शूरवीर पुत्र है।' उसपर आपकी कृपादृष्टि हुई और वह विघ्नोंका राजा गणेश बन गया। अहो, महेश्वरकी दृष्टिका कितना अद्भुत प्रभाव है! जब कामदेव भस्म हो गया और रति उसके लिये विलाप करने लगी, तब दयामयी माता पार्वतीने आँसू बहाते हुए आपकी ओर देखकर कहा—'भगवन्! इन बेचारोंका दाम्पत्य-सुख छिन गया।' तब आपने उसपर भी कृपा की। कामदेव मनोभव हो गया—वह रतिकी मनोभूमिमें प्रकट हो गया। इस प्रकार उमासहित महादेवजीकी कृपासे रतिने पूर्ण सौभाग्य प्राप्त किया।"
इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकर कुबेरके सामने प्रकट हुए। उन्होंने वर माँगनेके लिये कहा, किंतु हर्षातिरेकके कारण कुबेरके मुखसे कोई बात नहीं निकली। इसी समय आकाशवाणी हुई। उसने मानो पुलस्त्य, विश्रवा और कुबेरके हार्दिक अभिप्रायको जानकर यह कल्याणमय वचन कहा—'भगवन्! ये लोग धनका प्रभुत्व प्राप्त करना चाहते हैं। इनके लिये भविष्य भूत-सा बन जाय। जिस वस्तुको ये किसीके लिये देना चाहें, वह दी हुईके समान हो जाय तथा जो वस्तु ये स्वयं प्राप्त करना चाहें, वह पहले ही इनके सामने प्रस्तुत हो जाय। ये भगवान् शंकरकी आराधना करके इस बातकी अभिलाषा रखते हैं कि हमारे शत्रु परास्त हों, दुःख दूर हो जाय, दिक्पालका पद प्राप्त हो, धनका प्रभुत्व मिले, अपरिमित दान-शक्ति हो। साथ ही स्त्री और पुत्रका सुख भी बना रहे।'
कुबेरने वह आकाशवाणी सुनकर त्रिशूलधारी भगवान् शंकरसे कहा—'देव! ऐसा ही हो।' 'तथास्तु' कहकर शिवने उस दैवी वाणीका अनुमोदन किया। इस प्रकार पुलस्त्य, विश्रवा और कुबेरका वरदानसे अभिनन्दन करके भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तबसे उस तीर्थके तीन नाम पड़े—पौलस्त्यतीर्थ, धनदतीर्थ और वैश्रवणतीर्थ। वह समस्त कामनाओंको देनेवाला शुभ तीर्थ है। वहाँ स्नान आदि जो कुछ भी पुण्यकर्म किया जाता है, वह अधिक पुण्यदायक होता है।
पौलस्त्यतीर्थके बाद अग्नितीर्थ है। वह सब यज्ञोंका फल देनेवाला और समस्त विघ्नोंको शान्त करनेवाला है। उस तीर्थका फल सुनो। अग्निके भाई जातवेदा हैं, जो देवताओंके पास हविष्य पहुँचाया करते हैं। एक दिनकी बात है—गोदावरीके तटपर ऋषियोंके यज्ञमण्डपमें यज्ञ हो
- पौलस्त्य, अग्नि और ऋणमोचन नामक तीर्थोंका माहात्म्य * १७९
रहा था। अग्निके प्रिय भाई जातवेदा देवताओंके हविष्यका वहन कर रहे थे। उसी समय दितिके बलवान् पुत्र मधुने प्रधान-प्रधान ऋषियों और देवताओंके देखते-देखते जातवेदाको मार डाला। उनके मरनेपर देवताओंको हविष्य मिलना बंद हो गया। इधर अपने प्रिय भाई जातवेदाके मारे जानेसे अग्निको बड़ा क्रोध हुआ। वे गौतमी गङ्गाके जलमें समा गये। अग्निके जलमें प्रवेश करनेपर देवता और मनुष्य जीवनका त्याग करने लगे, क्योंकि अग्नि ही उनका जीवन है। अग्निदेव जहाँ जलमें प्रविष्ट हुए थे, उस स्थानपर सम्पूर्ण देवता, ऋषि और पितर आये और यह सोचकर कि बिना अग्निके हम जीवित नहीं रह सकते, उनकी स्तुति करने लगे। इतनेमें ही जलके भीतर उन्हें अग्निका दर्शन हुआ। उन्हें देखकर देवता बोले—'अग्ने! आप हविष्यके द्वारा देवताओंको, कव्य (श्राद्ध)-से पितरोंको तथा अन्नको पचाने और बीजको गलाने आदिके द्वारा मनुष्योंको जीवित कीजिये।'
अग्निने उत्तर दिया—'मेरा छोटा भाई, जो इस कार्यमें समर्थ था, चला गया। आपलोगोंका काम करनेमें जातवेदाकी जो गति हुई है, वह मेरी भी हो सकती है। अतः मुझे आपलोगोंके कार्य-साधनमें उत्साह नहीं है।' तब देवताओं और ऋषियोंने सब प्रकारसे अग्निकी प्रार्थना करते हुए कहा—'हव्यवाहन! हमलोग आपको आयु, कर्म करनेमें उत्साह और सर्वत्र व्यापक होनेकी शक्ति देते हैं। साथ ही प्रयाज और अनुयाज भी देंगे। देवताओंके आप ही श्रेष्ठ मुख होंगे। पहली आहुतियाँ आपको ही मिलेंगी। आप जो द्रव्य हमें देंगे, वही हम भोजन करेंगे।'
इस आश्वासनसे अग्निदेव प्रसन्न हुए। उन्हें इस लोक और परलोकमें व्यापक रहनेकी शक्ति प्राप्त हुई। वे सर्वत्र निर्भय हो गये। जातवेदा, बृहद्भानु, सप्तार्चि, नीललोहित, जलगर्भ, शमीगर्भ और यज्ञगर्भ—इन नामोंसे उन्हींका बोध होने लगा। देवताओंने अग्निको जलसे निकाला और जातवेदा तथा अग्नि दोनोंके पदपर उनका अभिषेक किया। कार्य सिद्ध होनेपर देवता भी अपने-अपने स्थानको चले गये। तभीसे वह स्थान 'वह्नितीर्थ' कहलाता है। वहाँ सात सौ उत्तम तीर्थोंका निवास है। जो जितात्मा पुरुष उन तीर्थोंमें स्नान और दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका पूरा फल प्राप्त होता है। वहीं देवतीर्थ, अग्नितीर्थ और जातवेदस्तीर्थ भी हैं। अग्निद्वारा स्थापित अनेक वर्णोंके शिवलिङ्गोंका भी वहाँ दर्शन होता है। उसके दर्शनसे सब यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
उसके बाद 'ऋणमोचन' नामक तीर्थ है। जिसके महत्त्वको वेदवेत्ता पुरुष जानते हैं। नारद! मैं उसके स्वरूपको बतलाता हूँ, मन लगाकर सुनो। कक्षीवान्का ज्येष्ठ पुत्र पृथुश्रवा था। वह वैराग्यके कारण न तो विवाह करता था और न अग्निहोत्र ही। कक्षीवान्का कनिष्ठ पुत्र भी विवाहके योग्य हो गया था तो भी उसने परिवित्ति* होनेके भयसे विवाह और अग्निहोत्र नहीं किये। तब पितरोंने कक्षीवान्के दोनों पुत्रोंसे पृथक्-पृथक् कहा—'तुम देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋणसे मुक्त होनेके लिये विवाह करो।' ज्येष्ठ पुत्रने कहा, 'नहीं, कैसा ऋण और कौन उससे मुक्त होता है।' छोटे पुत्रने उत्तर दिया, 'बड़े भाईके अविवाहित रहते मेरा विवाह करना उचित नहीं है। अन्यथा परिवित्ति होनेका भय है।' तब
- बड़े भाईकी अविवाहित अवस्थामें विवाह कर लेनेवाला छोटा भाई परिवित्ति कहलाता है। इसे शास्त्रोंमें दोष माना गया है।
४७- सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थ तथा वृद्धा-संगम-तीर्थकी महिमा
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पितरोंने उन दोनोंसे कहा—'तुमलोग गौतमी गङ्गामें जाकर स्नान करो। गौतमीका स्नान सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। गौतमी गङ्गा तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली हैं। उनके जलमें श्रद्धापूर्वक स्नान और तर्पण करो। गौतमीका दर्शन, वन्दन और ध्यान करनेसे वे समस्त कामनाएँ पूर्ण करती हैं। वहाँ स्नान करनेके लिये कोई देश, काल और जाति आदिका नियम नहीं है। गौतमीमें स्नान करनेसे बड़े भाईपर कोई ऋण नहीं रहता और छोटा भाई परिवित्ति नहीं होता।'
पितरोंके आदेशसे कक्षीवान्का ज्येष्ठ पुत्र पृथुश्रवा गौतमीमें स्नान और तर्पण करके तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया। तबसे वह तीर्थ 'ऋणमोचन' कहलाता है। वहाँ स्नान और दान करनेसे ऋणवान् मनुष्य श्रौत-स्मार्त तथा अन्य ऋणोंसे भी मुक्त होकर सुखी होता है।
सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थ तथा वृद्धा-संगम-तीर्थकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं— इसके बाद सुपर्णा-संगम तथा काद्रवा-संगम नामक तीर्थ हैं, जहाँ भगवान् महेश्वर गङ्गाके तटपर स्थित हैं। वहीं अग्निकुण्ड, रुद्रकुण्ड, विष्णुकुण्ड, सूर्यकुण्ड, सोमकुण्ड, ब्रह्मकुण्ड, कुमारकुण्ड तथा वरुणकुण्ड भी हैं। उस स्थानपर अप्सरा नामकी नदी गौतमी गङ्गामें मिली है। उस तीर्थके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। वह सब पापोंका निवारण करनेवाला है।
उससे आगे पुरूरवस् नामक तीर्थ है। उसके दर्शनकी तो बात ही क्या, स्मरणमात्रसे ही पापोंका नाश हो जाता है। एक समय राजा पुरूरवा ब्रह्माजीकी सभामें गये। वहाँ देवनदी सरस्वती ब्रह्माजीके पास बैठी हँस रही थीं। उस रूपवती देवीको देखकर राजाने उर्वशीसे पूछा— 'ब्रह्माजीके पास यह रूपवती साध्वी स्त्री कौन है ? यह तो सबसे सुन्दरी युवती है और अपने सौन्दर्यके प्रकाशसे इस सभाको उद्दीप्त कर रही है।' उर्वशीने कहा—'ये कल्याणमयी ब्रह्मकुमारी देवनदी सरस्वती हैं। ये प्रतिदिन आती-जाती रहती हैं।' यह सुनकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने उर्वशीसे कहा—'इसको मेरे पास बुला लाओ।' उर्वशीने जाकर राजाका संदेश सुना दिया। सरस्वतीने स्वीकार कर लिया तथा अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार वह पुरूरवाके पास आयी। राजाने सरस्वती नदीके तटपर उसके साथ अनेक वर्षोंतक विहार किया। यह देख मैंने सरस्वतीको शाप दे दिया। मेरे शापके कारण वह मृत्युलोकमें कहीं लुप्त हो गयी है और कहीं दिखायी देती है। जहाँ सरस्वती नदी गङ्गामें मिली है, वहाँ पहुँचकर राजा पुरूरवाने तपस्या की और महादेवजीकी आराधना करके गङ्गाजीके प्रसादसे सम्पूर्ण अभीष्ट प्राप्त कर लिया। तबसे उस स्थानका नाम पुरूरवस्तीर्थ, सरस्वती-संगम और ब्रह्मतीर्थ पड़ गया। वहाँ सिद्धेश्वर नामसे प्रसिद्ध महादेवजी रहते हैं। वह तीर्थ समस्त कामनाओंको देनेवाला है।
उसके सिवा सावित्री, गायत्री, श्रद्धा, मेधा और सरस्वती—ये पाँच पुण्य तीर्थ हैं। वहाँ स्नान और जलपान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। ये पाँचों मेरी कन्याएँ हैं, जो नदीरूपमें परिणत हो गयी हैं। जहाँ वे भगवती गङ्गासे मिली हैं, वहीं पाँच तीर्थ हैं। वे पाँच नदियाँ और सरस्वती पवित्र तीर्थ हैं। मनुष्य उनमें स्नान, दान
* सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थोंकी महिमा * १८१
आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला तथा नैष्कर्म्यसे भी बढ़कर मोक्षका साधक माना गया है।
शमीतीर्थके नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, वह भी सब पापोंकी शान्ति करनेवाला है। नारद! उस तीर्थकी कथा सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनो। पूर्वकालमें प्रियव्रत नामसे प्रसिद्ध क्षत्रिय राजा हो गये हैं। उन्होंने गोदावरीके दक्षिण- तटपर अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ली। उस यज्ञके पुरोहित हुए वसिष्ठजी। एक दिन उस यज्ञमें हिरण्यक नामका दानव आया। महर्षि वसिष्ठने अपने ब्रह्मदण्डसे सब दैत्योंको मार भगाया। तदनन्तर पुनः यज्ञ आरम्भ हुआ। दैत्य अपनी सेनाके साथ भाग खड़ा हुआ। वहाँ निम्नाङ्कित तीर्थोंने अश्वमेध-यज्ञके फल दिये—शमीतीर्थ, विष्णुतीर्थ, अर्कतीर्थ, शिवतीर्थ, सोमतीर्थ और वसिष्ठतीर्थ। यज्ञ समाप्त होनेपर देवताओं और ऋषियोंने वसिष्ठ और प्रियव्रतसे कहा—इन तीर्थोंने अश्वमेध-यज्ञका फल दिया है; अतः इनमें स्नान- दान करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका पुण्य-फल प्राप्त करेगा—इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है।
मुने! गौतमीमें एक स्थानपर अनेक नद- नदियाँ मिली हैं। उन सबके नामपर पृथक्-पृथक् तीर्थ हैं। उन तीर्थोंके नाम ये हैं—सोमतीर्थ, गन्धर्वतीर्थ, देवतीर्थ, पूर्णातीर्थ, शालतीर्थ, श्रीपर्णा- संगम, स्वागता-संगम, कुसुमा-संगम, पुष्टि-संगम, कर्णिका-संगम, वैणवी-संगम, कृशरा-संगम, वासवी- संगम, शिवशर्मा, शिखी, कुसुम्भिका, उपारथ्या, शान्तिजा, देवजा, अज, वृद्ध, सुर और भद्र आदि। ये तथा और भी बहुत-से नद-नदीगण गौतमीमें मिले हैं। पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी देवगिरिपर गये थे। फिर वे ही क्रमशः गङ्गामें आ मिले। कोई नदीरूपमें था और कोई नदरूपमें। किसीका रूप सरोवरके आकारमें था और किसीका स्रोतके आकारमें। वे ही सब तीर्थ पृथक्-पृथक् विख्यात हुए। उन सबमें किया हुआ स्नान, जप, होम, पितृ-तर्पण आदि कर्म समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला और मुक्तिदायक माना गया है। जो इनके नामोंका पाठ अथवा स्मरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
वृद्धा-संगम नामक एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ वृद्धेश्वर नामक शिवका निवास है। उस तीर्थकी कथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। पूर्वकालमें एक महातपस्वी मुनि थे। उनका नाम वृद्धगौतम था। वे जब बालक थे, तब किसी तरह पिताने उनका यज्ञोपवीतमात्र कर दिया। इसके बाद वे बाहर भ्रमण करनेको चले गये। उन्हें केवल गायत्री-मन्त्र याद था। वे वेदोंका अध्ययन और शास्त्रोंका अभ्यास नहीं कर सके। केवल गायत्रीका जप और अग्निहोत्र नियमपूर्वक कर लेते थे। इतनेसे ही उनका ब्राह्मणत्व सुरक्षित था। विधिपूर्वक अग्निकी उपासना और गायत्री-जप करनेसे उनकी आयु बहुत बढ़ गयी। यों भी उनकी अवस्था अधिक हो चुकी थी। किंतु विवाह न हो सका, कोई उन्हें कन्या देनेवाला नहीं मिला।
गौतम भिन्न-भिन्न तीर्थों, वनों और पवित्र आश्रमोंमें भ्रमण करते रहे। घूमते-घूमते शीत- गिरिपर चले गये और वहीं रहने लगे। वहाँ उन्होंने एक रमणीय गुफा देखी, जो लताओं और वृक्षोंसे घिरी हुई थी। उसमें एक अत्यन्त दुर्बल वृद्धा तपस्विनी रहती थी, उसके सब अङ्ग शिथिल हो गये थे। वह वीतरागा ब्रह्मचारिणी थी और एकान्तमें रहा करती थी। उसे देख मुनिश्रेष्ठ गौतम नमस्कारके लिये खड़े हो गये।
वृद्धाने कहा—आप मेरे गुरु होंगे, अतः
६८- वृद्धा तपस्विनीका गौतमको अपना परिचय देना
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मुझे प्रणाम न करें। जिसे गुरु नमस्कार करता है, उसकी आयु, विद्या, धन, कीर्ति, धर्म और स्वर्ग आदि सब नष्ट हो जाते हैं।
यह सुनकर गौतम बड़े आश्चर्यमें पड़े। वे हाथ जोड़कर बोले—'तुम वृद्धा तपस्विनी हो, गुणोंमें भी मुझसे बढ़ी-चढ़ी हो। मैं बहुत कम पढ़ा-लिखा और अवस्थामें भी छोटा हूँ, फिर तुम्हारा गुरु कैसे हो सकता हूँ।'
वृद्धाने कहा—आर्ष्टिषेणके प्रिय पुत्र ऋतध्वज थे; वे बड़े गुणवान्, बुद्धिमान्, शूरवीर तथा क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहनेवाले थे। एक दिन वे शिकार खेलनेके लिये वनमें आये और इसी गुफामें आकर विश्राम करने लगे। यहाँ उनपर एक सुन्दरी अप्सराकी दृष्टि पड़ी, उसका नाम सुश्यामा था। वह गन्धर्वराजकी कन्या थी। राजाने भी उसे देखा। दोनोंके मनमें एक-दूसरेसे मिलनेकी इच्छा हुई। ऋतध्वजने सुश्यामाके साथ विहार किया। भोगेच्छा निवृत्त होनेपर राजा उसकी अनुमति ले अपने घर चले गये। तदनन्तर सुश्यामाके गर्भसे मेरा जन्म हुआ। जब माता यहाँसे जाने लगी, तब बोली--'कल्याणी ! जो पुरुष इस गुफामें पहले आ जाय, वही तुम्हारा पति होगा।' तबसे आजतक तुम्हीं यहाँ आये हो। दूसरा कोई पुरुष कभी यहाँ नहीं आया। ब्रह्मन्! और किसीने मेरा वरण नहीं किया है। न मेरी माता है, न पिता। मैं आप ही अपनी मालिक हूँ। अबतक ब्रह्मचर्य-व्रतमें रही। अब पुरुषकी इच्छा रखती हूँ, आप मुझे स्वीकार करें।
गौतम बोले—भद्रे ! मेरी अवस्था तो अभी एक हजार वर्षकी ही है और तुम नब्बे हजार वर्षकी हो गयी हो। मैं बालक और तुम वृद्धा; यह सम्बन्ध योग्य नहीं जान पड़ता।
वृद्धाने कहा—पूर्वकालमें ही आप मेरे पति नियत कर दिये गये हैं। अब दूसरा कोई मेरा पति नहीं हो सकता, विधाताने आपको मुझे दिया है; अतः अब आप मुझे अस्वीकार न करें। मुझमें कोई दोष नहीं है। मैं आपमें भक्ति रखती हूँ; तब भी यदि आप मुझे ग्रहण करना नहीं चाहते तो आपके देखते-देखते अभी अपने प्राण त्याग दूँगी। यदि अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति न हो तो प्राणियोंके लिये मर जाना ही अच्छा है। प्रेमीजनके परित्यागसे जो पातक लगता है, उसका अन्त नहीं है।
वृद्धाकी बात सुनकर गौतमने कहा—'मुझमें न तपस्या है न विद्या। मैं कुरूप और निर्धन हूँ, अतः तुम्हारे लिये योग्य वर नहीं हो सकता। पहले सुन्दर रूप और उत्तम विद्याकी प्राप्ति करके मुझे तुम्हारी बात माननी चाहिये।'
वृद्धाने कहा—ब्रह्मन्! मैंने अपनी तपस्यासे सरस्वतीदेवीको संतुष्ट किया है, साथ ही रूप देनेवाले अग्नि भी मुझपर प्रसन्न हैं; अतः