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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

३०४ चरकसंहिता [अ० २६

ङा-श्लीपद-गलशोफ-बस्ति-धमनीगण्डोपलेपाक्ष्यामयानभिष्यन्दमित्येवं प्रभृतीन् कफजान् विकारानुपजनयति ॥ (१)॥ इन छः रसों में से एक-एक रस के आधार द्रव्य के अनुसार गुण, कर्म की व्याख्या करेंगे। इन में मधुर रस—जन्म से ही शरीर के अनुकूल (सात्म्य) है। (जन्म से ही मधुर रसयुक्त दूध को पीकर बच्चा बढ़ता है)। रस, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि, ओज और शुक्र को बढ़ाता है, आयुवर्द्धक, श्रोत्र, त्वक्, नासिका, चक्षु, रसना ये पांच ज्ञानेन्द्रिय और मन इन को प्रसन्न, निर्मल करता है। बलकारक, कान्तिकारक पित्त- नाशक, विषनाशक, वायुनाशक, तृष्णानाशक, त्वचा, केश, और स्वर के लिये हितकारी, आह्लादजनक, अभिघात आदि से बेहोश पुरुष को जीवन देने वाला, तृप्ति करने वाला, वृद्धि करने वाला, स्थिरकारक, क्षीण और क्षत व्यक्ति का पोषण करने एवं सन्धान अर्थात् टूटे का जोड़ने वाला नासिका, मुख, कण्ठ, ओष्ठ और जीभ का आह्लाद करने वाला, जलन और मूर्च्छानाशक, भ्रमर और चिऊंटियों का प्रिय, स्निग्ध, शीत और गुरु है। यद्यपि इस मधुर रस में इतने गुण हैं, तो भी इस अकेले रस को ही निरन्तर अधिक मात्रा में खाने से स्थूलता कोमलता, आलस्य, नींद की अधिकता, भारीपन, अन्न में अरुचि, अग्नि की निर्बलता, मुख (गाल), गले में मांस की वृद्धि, श्वास, कास, प्रतिश्याय, अलसक, शीत ज्वर, आनाह (अफारा), मुख की मधुरता, वमन, संज्ञानाश, स्वर नाश, गलगण्ड, गण्डमाला, श्लीपद, गले की सूजन, बस्ति, धमनी गुदा (गले में) में मांस, चर्बी या कफ कोई पदार्थ बढ़ जाता है, नेत्र रोग, अभिष्यन्द, कफ रोग (कफस्राव) आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं॥ अम्लो रसो भक्तं रोचयति, अग्निं दीपयति, देहं बृंहयति ऊर्जयति, वातमनुलोमयति, हृदयं तर्पयति, आस्यमास्रावयति, भुक्तमपकर्षयति, क्लेदयति, जरयति, प्रीणयति, लघुरुष्णः स्निग्धश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो दन्तान् हर्षयति, तर्षयति, संवीजयति लोमानि, कफं विलापयति, पित्तमभिवर्धयति, रक्तं दूषयति, मांसं विदहति, कायं शिथिलीकरोति, क्षीण-क्षत-कृश-दुर्बलानां श्वयथुमापादयति, अपिच क्षताभिहत-दष्ट-दग्ध-भग्न-शून-प्रच्युतावमूत्रित-परिसर्पित-मर्दित-च्छिन्न- भिन्न-विश्लिष्ट-विद्धोत्पिष्टादीन् पाचयत्याग्नेयस्वभावात् परिदह्यं कण्ठ-मुरो हृदयं च ॥ (२)॥ अम्ल रस अन्न में रुचि पैदा करता है, अग्नि को बढ़ाता है, शरीर

बढ़ाता है, तेज देता है, मन को उत्तेजित ( जाग्रत ) करता है । इन्द्रियों को बलवान् करता है, बल को बढ़ाता है वायु का अनुलोमन करता हैं, हृदय के लिये हितकारी है । मुख में लार चुआता है, खाये हुए भोजन को बाहर निका- लता है, क्लिन्न ( शरीर को गीला ) बनाता है । खाये भोजन को पचाता है, प्रसन्नता करता है लघु, उष्ण, स्निग्ध गुण वाला है ।। यही एक रस यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय, तो दांतों को खोट करता है, ( खट्टा करता है ), तृप्ति अर्थात् भोजन में अनिच्छा उत्पन्न करता है, आंखों को मीचाता है, शरीर के बालों को कंपा देता है, ( रोमांचित करता है ), कफ को पिघलाता है, पित्त को बढ़ाता है, रक्त को दूषित करता है, मांस में जलन पैदा करता है, शरीर को ढीला ( सुस्त करता है ), क्षीण, उरः- क्षत रोगी, निर्बल, कमजोर पुरुषों में सूजन उत्पन्न करता है और भी जख्म, चोट, दांत लगे, जले, अस्थि आदिका टूटना, सूजन, सन्धिभ्रंश, प्राणियों के मूत्रजन्य विष, स्पर्शजन्य विष ( मकड़ी के ), रगड़ लगे हुए, दो टुकड़े हुए, चुभे हुए पिसे हुए आदि व्रणों को पका देता है । अग्निगुण होने से कण्ठ, छाती और हृदय में जलन उत्पन्न करता है ॥ (२) ॥ लवणो रसः पाचनः क्लेदनो दीपनश्च्यावनश्छेदनो भेदनस्तीक्ष्णः सरो विकाश्यधः संस्रंस्यवकाशकरो वातहरः स्तम्भ-बन्ध संघात-विधमनः सर्वरसप्रत्यनीकभूतः, आस्यमास्त्रावयति, कफं विष्यन्दयति, मार्गान् विशोधयति, सर्वशरीरावयवान्मृदूकरोति, रोचयत्याहारमाहारयोगी, नात्यर्थं गुरुः स्निग्ध उष्णश्च; स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः पित्तं कोपयति, रक्तं वर्धयति, तर्षयांत्, मूर्च्छयति, तापयति, दारयति, कुष्णाति मांसानि, प्रगाळयति कुष्ठानि, विषं वर्धयति, शोफान् स्फोटयति, दन्तांश्च्यावयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, इन्द्रियाण्युपरुणद्धि, वली-पलित- खालित्यमापादयति, अपि च लोहित-पित्ताम्ल-पित्त-वीसर्प-वात-रक्त- विचर्चिकेन्द्रलुप्त-प्रभृतीन्वकारानुपजनयति ॥ ( ३ )॥ लवण रस—पाचक, नरम बनाने वाला, अग्निदीपक, नीचे गिराने वाला, छेदन भेदन करने वाला, तीक्ष्ण, सर ( मल लाने वाला ), विकाशी ( क्लेद का छेदन करने वाला ) अधःस्रंसी, विष्यन्दशील ( रेचक ) विरलता करने वाला वातनाशक, मल-मूत्रादि के अवरोध को नाश करने वाला और जहां पर जरा सा अधिक हो जाता है, वहां पर और कोई दूसरा रस स्पष्ट नहीं में थूक उत्पन्न करता है, कफ को पिघलाता है, मागों का शोधन

३०६ चरकसंहिता [ अ० २६ करता है, शरीर के सब अवयवों को कोमल करता है, आहार में रुचि उत्पन्न करता है, आहार में सदा बरता जाता है, बहुत भारी नहीं होता, स्निग्ध और उष्ण गुणवाला है। यही एक रस यदि अधिक सेवन किया जाय तो पित्त को कुपित करता है, रक्त को बढ़ाता है, प्यास उत्पन्न करता है, संज्ञा नाश करता है, शरीर को गरम करता है, फाड़ता है, मांस को गलाता है, कुष्ठों को द्रवित करता है, विष को बढ़ाता है, सूजन को फाड़ता है, दांतों को गिरा देता है, पुरुषत्व का नाश करता है, इन्द्रियों को जड़ बनाता है। झुर्रियां पैदा करता, बालों को श्वेत करता, गंज अर्थात् बालों को गिराता है। इसके अतिरिक्त रक्तपित्त, अम्लपित्त, वीसर्प, वातरक्त, विचर्चिका, इन्द्रलुप्त आदि रोगों को उत्पन्न करता है ॥(३)॥ कटुको रसो वक्त्रं शोधयति, अग्निं दीपयति, भुक्तं शोषयति, घ्राण- मास्रावयति, चक्षुर्विरेचयति, स्फुटीकरोतीन्द्रियाणि, अलसक-श्वयथूप- चयोदर्दाभिष्यन्द-स्नेह-स्वेद-क्लेद-मलानुपहन्ति, रोचयत्यशनं कण्डूर्विनाश- यति, क्रिमीन् हिनस्ति, मांसं विलिखति, शोणितसंघातं भिनत्ति, बन्धां- श्छिनत्ति, मार्गान्विवृणोति, श्लेष्माणं शमयति, लघुरुष्णो रूक्षश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति, रसवीर्यप्रभावान्मोहयति, ग्लपयति, सादयति, कर्षयति, मूर्च्छयति, नमयति, तमयति, भ्रमयति, कण्ठं परिदहति, शरीरतापमुपजनयति, बलं क्षिणोति, तृष्णां चोपजनयति । अपिच वाय्वग्निबाहुल्याद् भ्रम-म- द-द्रवथु¹ कम्प-तोद भेदंश्चरण-भुज-पार्श्वपृष्ठ-प्रभृतिषु मारुतजान्विका- रानुपजनयति ॥ (४) ॥ कटु रस मुख का शोधन करता है, अग्नि को बढ़ाता है, खाये हुए भोजन को सुखाता है, नाक से कफ बहाता है, आंखों में आंसू लाता है, इन्द्रियों को उत्तेजित करता है, अलसक, सूजन, वृद्धि, उदर्द, अभिष्यन्द, स्नेह, पसीना, क्लेद, मल का नाश करता है। कृमियों को मारता है, मांस का लेखन करता है (स्थूलता को कम करता है)। खाये हुए भोजन का रेचन करता है, खाज को मिटाता है, व्रणों को बैठाता है, भरता है । जमे हुए रक्त को तोड़ता है, सन्धि-बन्धनों को छेदन करता है, मार्गों को साफ़ बनाता है, कफ को शान्त करता है । लघु, उष्ण और रूक्ष होता है । यही एक रस यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो कटु । १. 'भ्रममदवमथु' इति च पाठः ।

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०७

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०७ प्रभाव से (कटु रस का कटु विपाक) पुरुषत्व का नाश करता है। रस और वीर्य के प्रभाव से संज्ञानाश करता है। ग्लानि उत्पन्न करता है, अवसन्न करता है, कर्षण (निर्बल) करता है, मूर्च्छित करता है, शरीर को झुकाता है, अन्धकार लाता है, चक्कर लाता है, गले में जलन तथा शरीर में तापज्वर उत्पन्न करता है। बल को कम करता है, प्यास को पैदा करता है। वायु, अग्नि गुण की अधिकता होने से चक्कर; मुख ओठ में जलन, कंपकपी, चुभने की सी दर्द, भेदन जैसी पीड़ा, पांव, हाथ, पार्श्व पसलियों और पीठ में बात विकार उत्पन्न करता है ॥ (४) ॥ तिक्तो रसः स्वयमरोचिष्णुररोचकघ्नो विषघ्नः कृमिघ्नो मूर्च्छा- दाह-कण्डू-कुष्ठ-तृष्णा-प्रशमनः त्वङ्मांसयोः स्थिरीकरणो ज्वरघ्नो दीपनः पाचनः स्तन्यशोधनो लेखनः क्लेद-मेदो-वसा-मज्ज-लसीका-पूय-स्वेद-मूत्र- पुरीष-पित्त-श्लेष्मोपशोषणो रूक्षः शीतो लघुश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवा- त्यर्थमुपयुज्यमानो रौक्ष्यात् खरविशदस्वभावाच्च रस-रुधिर-मांस-मेदोऽ- स्थि-मज्ज-शुक्राण्युच्छोषयति, स्रोतसां खरत्वमुपपादयति, बलमादत्ते, कर्षयति, ग्लपयति, मोहयति, भ्रमयति, वदनमुपशोषयति, अपरांश्च वातविकारानुपजनयति, ॥ (५) ॥ तिक्त रस अपने आप अरुचिकारक होने पर भी दूसरे भोजनों में रुचि उत्पन्न करता है, इसलिये अरोचकनाशक है। विषनाशक, कृमिनाशक, मूर्च्छा, जलन, खाज, फोढ़ और प्यास को शान्त करने वाला, त्वचा मांस को स्थिर करने वाला, ज्वरनाशक, अग्निदीपक, पाचक, दूध का शोधन करने वाला, लेखन करने वाला, क्लेद, मेद, वसा, मज्जा, लसीका, पूय, स्वेद, मूत्र पुरीष (मल) पित्त, कफ को सुखाता है, रूक्ष, शीत और लघु है। यही रस अधिक मात्रा में सेवन करने से रूक्ष, कर्कश और विशद स्वभाव होने से रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र का शोषण करता है, स्रोतों में खरता उत्पन्न करता है, बल लेता है, शरीर की स्थूलता का कर्षण करता है, हर्ष का क्षय करता है, संज्ञानाश करता है, चक्कर उत्पन्न करता है, मुख में शुष्कता उत्पन्न करता है और अन्य वात रोगों को भी उत्पन्न करता है ॥ (५) ॥ कषायो रसः संशमनः १ संग्राही संधारणः पीडनो रोपणः शोषणः १ इति च पाठः ।

३०८ चरकसंहिता [ अ० २६ स्तम्भनः श्लेष्म-पित्त-रक्त-प्रशमनः शरीरक्लेदस्योपयोक्ता, रूक्षः शीतो गुरुश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमान आस्यं शोषयति, हृदयं पीडयति, उदरमाध्मापयति, वाचं निगृह्णाति, स्रोतांस्यवबध्नाति, श्यावत्वमापादयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, विष्टभ्य जरां गच्छति, वातमूत्र- पुरीषाण्यवगृह्णाति, कर्षयति, ग्लापयति, तर्षयति, स्तम्भयति, खर- विशद-रूक्षत्वात्पक्ष-वध-महापतानकार्दित-प्रभृतींश्च वातविकारानुपन- नयतीति ॥ ( ६ ) ॥ कषाय रस संशमन करने वाला, संग्राहक, सन्धारक, व्रण का पीड़न करने वाला, रोपण, व्रण को शुष्क करने वाला, स्तम्भन, कफ, रक्त, पित्तनाशक, शरीर में क्लेद को चूसने वाला, रूक्ष, शीत और गुरु है। यही रस अधिक मात्रा में उपयोग करने से मुख को सुखा देता है, हृदय को पीड़ित करता है, उदर में वायु से फुलाव उत्पन्न करता है, वाणी को जड़ कर देता है, स्रोतों को बन्द कर देता है, कृष्णता उत्पन्न करता है, पुरुषत्व को नष्ट करता है, अन्न को अवरोध करके पचन कराता है, वात, मूत्र, मल, रेतस् (शुक्र) को बन्द कर देता है, रोक देता है, शरीर को कर्षण करता है, म्लान कर (मुरझा) देता है, प्यास लगाता है, जकड़ देता है। खर, विशद और रूक्ष होने से पक्षवध, हनुग्रह, मन्याग्रह, पृष्ठग्रह, अपतानक, अर्दित आदि वात रोगों को उत्पन्न करता है ॥ ( ६ ) ॥ एवमेते षड् रसाः पृथक्त्वेनैकत्वेन वा मात्रशः सम्यगुपयुज्यमाना उपकारकरा भवन्त्यात्मलोकस्य, अपकारकराः पुनरतोऽन्यथोपयुज्य- मानाः । तान् विद्वानुपकारार्थमेव मात्रशः सम्यगुपयोजयेदिति ॥ ४१ ॥ इस प्रकार से ये छः रस पृथक् पृथक् या दो या तीन अथवा सब परस्पर, मिलकर मात्रा में योग्य प्रमाण से सेवन करने से सर्व प्राणिमात्र को आरोग्य पुष्टि देकर उपकार करते हैं और असम्यक् रूप में उपयोग करने से सब प्राणियों का अपकार करते हैं। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि इन को मात्रा में सम्यक् प्रकार से बरतें ॥ ४१ ॥ भवन्ति चात्र—शीतं वीर्येण यद् द्रव्यं मधुरं रसपाकयोः । तयोरम्लं यदुष्णं च यच्चोष्णं कटुकं तयोः ॥ ४२ ॥ तेषां रसोपदेशेन निर्देश्यो गुणसंग्रहः । वीर्यतोऽविपरीतानां पाकस्तश्चोपदेक्ष्यते ॥ ४३.॥

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०९

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०९ यथा पयो यथा सर्पिर्यथा वा चव्यचित्रकौ। एवमादीनि चान्यानि निर्दिशेद्रसतो भिषक् ॥ ४४ ॥ इसमें श्लोक हैं—रसानुसारी द्रव्यों का वीर्य—जो द्रव्य रस और विपाक में मधुर हो, उस को शीतवीर्य समझना चाहिये, और जो द्रव्य रस और पाक में अम्ल हो, उस को उष्णवीर्य, जो द्रव्य रस और पाक में कटु हो, उस को भी उष्णवीर्य समझना चाहिये। जो द्रव्य वीर्य और विपाक में विरोधी न हों—एक समान हों, उनके गुणों का ज्ञान रस से ही करना चाहिये। परन्तु इस का अपवाद भी है। जहां पर रस समान हैं, वहां पर विपाक द्वारा गुणों का ज्ञान होता है। जिस प्रकार कि दूध और घी मधुर रस और मधुर विपाक हैं, इन का वीर्य भी शीत है, इसी प्रकार चव्य और चित्रक इन का रस और विपाक कटु हैं, इसलिये वीर्य भी इन का 'उष्ण' है। इस प्रकार से अन्य द्रव्यों को भी रसनिर्देश से वैद्य सुगमता से समझ सकता है। क्योंकि रस के अनुसार गुण हैं ॥ ४२-४४ ॥ मधुरं किंचिदुष्णं स्यात्कषायं तिक्तमेव च। यथा महत्पञ्चमूलं यथा चानूपमामिषम् ॥ ४५ ॥ लवणं सैन्धवं नोष्णमम्लमामलकं तथा। अर्कागुरुगुडूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते ॥ ४६ ॥ किंचिदम्लं हि संग्राहि किंचिदम्लं भिनत्ति च। यथा कपित्थं संग्राहि, भेदि चामलकं तथा ॥ ४७ ॥ पिप्पली नागरं वृष्यं कटु चावृष्यमुच्यते । कषायः स्तम्भनः शीतः सोऽभयायामतोऽन्यथा ॥४८॥ तस्माद्रसोपदेशेन न सर्वं द्रव्यमादिशेत् । दृष्टं तुल्यरसेऽप्येवं द्रव्ये द्रव्ये गुणान्तरम् ॥ ४९ ॥ कभी कभी मधुर, कषाय और तिक्त रस भी उष्णवीर्य हो जाते हैं। यथा— बिल्वादि महापञ्चमूल तिक्त और कषाय होने पर भी उष्ण वीर्य हैं, और जल- चर या जलदेशीय मांस मधुर होने पर भी उष्ण है। सैन्धव नमक उष्णवीर्य नहीं और आंवला खट्टा होने पर भी उष्णवीर्य नहीं है। आकड़ा, अगरू और गिलोय ये तिक्त रस होने पर भी 'उष्ण' वीर्य हैं। अम्ल-रस में कोई द्रव्य ग्राहक और कोई रेचक हैं। जिस प्रकार की कैथ अम्ल होने पर संग्राहक और आंवला अम्ल होने पर भी रेचक है। पिप्पली और सोंठ कटु रस होने पर भी

३१० चरकसंहिता [ अ० २६ अवृष्य होता है। कषाय रस स्तम्भनकारक और शीतवीर्य होता है, परन्तु हरड़ का कषाय रस रेचक और उष्ण-वीर्य है। इस लिये रस को ही देखकर 'सब द्रव्य के गुण नहीं समझने चाहिये। रस की समानता होने पर भी द्रव्य-द्रव्य में गुणभेद देखा जाता है ॥ ४५-४९ ॥ रौक्ष्यात्कषायो रूक्षाणामुत्तमो मध्यमः कटुः । तिक्तोऽवरस्तथोष्णानामुष्णत्वाल्लवणः परः ॥ ५० ॥ मध्योऽम्लः कटुकश्चान्त्यः स्निग्धानां मधुरः परः । मध्योऽम्लो लवणश्चान्त्यो रसः स्नेहाग्निरुच्यते ॥ ५१॥ मध्योत्कृष्टवराः शैत्यात्कषाय-स्वादु-तिक्तकाः । [ तिक्तात्कषायो मधुरः शीताच्छीततरः परः । ] स्वादुरु॑रुत्वादधिकः कषायाल्लवणोऽवरः ॥ ५२ ॥ अम्लात्कटुस्ततस्तिक्तो लघुत्वादुत्तमो मतः । केचिल्लघूनामवरमिच्छन्ति लवणं रसम् ॥ ५३ ॥ गौरवे लाघवे चैव सोऽवरस्तूभयोरपि । इन छः रसों में कषाय, कटु, तिक्त तीनों रस रूक्ष हैं। इनमें भी कषाय रस रूक्षतम ( उत्तम ), कटु रसरूक्षतर ( मध्यम ) और तिक्त रस रूक्ष (अवर) है। इसी प्रकार लवण रस उष्णतम ( उत्तम ), अम्ल उष्णतर ( मध्यम ), कटु रस उष्ण ( अवर ) है। मधुर रस स्निग्धतम ( उत्तम ), अम्ल रस स्निग्धतर ( मध्यम ), लवण रस स्निग्ध ( अवर ) है। शैत्य धर्म सम्बन्ध की दृष्टि में कषाय रस मध्यम; स्वादु रस उत्कृष्ट और तिक्त रस अवर है। गुरुता की दृष्टि से मधुर रस सबसे गुरु, कषाय रस मध्यम और लवण रस सब से अवर है। लघु गुण की दृष्टि से अम्ल रस उत्तम, कटु मध्यम और तिक्त रस अवर है। कुछ आचार्य लवण रस को सब से लघु ( अवर ) मानते हैं। क्योकि अम्ल में पृथिवी कारण है, लवण में जल कारण है। इसलिये पृथिवीजन्य रस की अपेक्षा जलजन्य वस्तु हल्की होनी चाहिये, इसलिये भूतों के आधार से गौरव या लाघव का ज्ञान नहीं करना चाहिये। क्योंकि पानी की अधिकता से उत्पन्न रस, पृथ्वी की अधिकता से उत्पन्न कषाय रस से 'गुरु' होता है। यहां पर गुरुत्व की । से लघु माना है। वास्तव में इस मतभेद का कोई विशेष अर्थ नहीं, क्योकि ही पक्ष (लवण रस ) को अवर मानते हैं। अम्ल, कटु, तिक्त रस हूँ जो लवण रस को गुरु समझते हैं; वे गुरुता की दृष्टि से देखते हैं ।

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३११

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३११ मानते हैं वे लघुत्व होने से लघु समझते हैं। दोनों ही पक्ष किञ्चित् गुरुत्व स्वीकार करते हैं ॥ परं चातो विपाकानां लक्षणं संप्रवक्ष्यते ॥ ५४ ॥ कटु तिक्त-कषायाणां विपाकः प्रायशः कटुः । अम्लोऽम्लं पच्यते, स्वादुर्मधुरं लवणस्तथा ॥५५॥ मधुरो लवणाम्लौ च स्निग्धभावात्त्रयो रसाः । वात-मूत्र-पुरीषाणां प्रायो मोक्षे सुखा मताः ॥५६॥ कटुतिक्तकषायास्तु रूक्षभावात्त्रयो रसाः । दुःखाय मोक्षे दृश्यन्ते वातविण्मूत्ररेतसाम् ॥ ५७ ॥ शुक्रहा बद्धविण्मूत्रो विपाको वातलः कटुः । मधुरः सृष्टविण्मूत्रो विपाकः कफशुक्रलः ॥ ५८ ॥ पित्तकृत्सृष्टविण्मूत्रः पाकोऽम्लः शुक्रनाशनः । तेषां गुरुः स्यान्मधुरः कटुकाम्लाबतोऽन्यथा ॥ ५९ ॥ विपाक लक्षणस्याल्पमध्यभूयिष्ठतां प्रति । द्रव्याणां गुणवैशेष्यात्तत्र तत्रोपलक्षयेत् ॥ ६० ॥ विपाक-इसके आगे विपाकों १ का लक्षण कहते हैं। कटु, तिक्त, कषाय रस के आधार भूत द्रव्यों का विपाक प्रायः कटु होता है। ( पिप्पलो कटु रस होने पर भी विपाक में प्रायः कटु होता है। पिप्पलो कटु रस होने पर भी विपाक में मधुर है, इसलिये प्राय शब्द है)। अम्ल रस का अम्ल और मधुर तथा लवण रस का मधुर विपाक होता है। मधुर, अम्ल और लवण ये तीनों रस स्निग्ध होने के कारण वायु, मूत्र, मल को सुख पूर्वक बाहर निकालने में सहायक होते हैं। कटु, तिक्त और कषाय रस रूक्षगुण होने से वात, मल, मूत्र और शुक्र के बाहर निकालने में कष्ट रूप होते हैं, अवरोध करते हैं। जिस द्रव्य का विपाक कटु होता है, वह वीर्यनाशक, मल मूत्र का अवरोध करने वाला और वायुकारक होता है। जिस द्रव्य का विपाक मधुर होता है, वह मल मूत्र का प्रवर्त्तक (रेचक) और कफ एवं शुक्र को बढ़ाता है। जिस द्रव्य का विपाक अम्ल होता है, वह पित्तकारक, मल-मूत्र का रेचक और वीर्यनाशक होता है। १. विपाक—खाये हुए अन्न का जाठराग्नि में पाचन क्रिया के पश्चात् रस उत्पन्न होता है उसका नाम विपाक है। “जाठरेणाग्नियोगात् यदुदेयति रसान्तरम् । रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥”

३१२ चरकसंहिता [अ० २६ इन विपाकों में मधुर विपाक गुरु और कटु तथा अम्ल विपाक लघु होते हैं। विपाक के अल्पत्व और बहुत्व उस उस द्रव्य के रस रूपी गुण की अधिकता या न्यूनता पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिये गन्ने में मधुर रस अधिक प्रमाण में है, इसलिये इसका विपाक भी मधुर ( उत्तम ) होगा। इसी प्रकार जिसमें मध्यम प्रमाण में होगा उस का विपाक भी मध्यम, जिसमें न्यून प्रमाण में होगा, उसका विपाक भी अवर होगा। प्रत्येक पदार्थ का विपाक उसके रस के परिमाण में होता है ॥ ५४-६० ॥ तीक्ष्णं रूक्षं मृदु स्निग्धं लघूष्णं गुरु शीतलम् १ । वीर्यमष्टविधं केचित्केचिद् द्विविधमास्थिताः ॥ ६१ ॥ शीतोष्णमिति, वीर्यं तु क्रियते येन या क्रिया । नावीर्यं कुरुते किंचित्सर्वा वीर्यकृता क्रिया ॥ ६२ ॥ रसो निपाते द्रव्याणां, विपाकः कर्मनिष्ठया । वीर्यं यावदधीवासात्निपाताच्चोपलभ्यते ॥ ६३ ॥ कोई आचार्य वीर्य को आठ प्रकार मानते हैं। यथा—मृदु, तीक्ष्ण रूक्ष, लघु, स्निग्ध, उष्ण और शीतल । और कोई आचार्य वीर्य को दो प्रकार का मानते हैं। यथा—शीत और उष्ण । रस, विपाक और प्रभाव इनसे व्यतिरिक्त जो द्रव्य के अन्दर छिपी शक्ति विशेष कार्य करती है, उसका नाम 'वीर्य' है। कार्यरहित वस्तु कुछ क्रिया नहीं कर सकती, सम्पूर्ण क्रियायें वीर्य अर्थात् शक्ति से होती हैं। रस, वीर्य और विपाक के पृथक्-पृथक् लक्षण कहकर अब एक द्रव्य में स्पष्ट करते हैं। जिह्वा के साथ किसी पदार्थ का सम्बन्ध होने पर जो रस ( खट्टा, कडुवा ) अनुभव होता है, वह रस, वस्तु के पाचन होने के पीछे शरीर में कफ- वृद्धि, पित्तवृद्धि, वीर्यवृद्धि, वातवृद्धि आदि कार्य के होने से जो अनुभव होता है, उसका नाम विपाक है। वस्तु का ( पचन से पूर्व और रसना के सम्बन्ध होने के पीछे ) शरीर के साथ संयोग होने से वीर्य का ज्ञान होता है। तथा— जलचर प्राणियों के मांस का जिह्वा के साथ सम्बन्ध मात्र से उष्णत्व स्पष्ट हो जाता है, मरिच का तीक्ष्णवीर्य जिह्वा स्पर्श से मालूम हो जाता है। मरिच की अग्निवर्धक दीपन क्रिया शरीर के साथ सम्बन्ध होने पर ज्ञात होती है। रसका ज्ञान द्रव्य का जिह्वा के साथ सम्बन्ध होने पर तुरन्त होता है; विपाक का ज्ञान कर्म से; वीर्य का ज्ञान-शरीर में जब तक रहने से तथा जिह्वा के साथ स... १. 'मृदुतीक्ष्णगुरुस्निग्धलघुरूक्षोष्णशीतलम्।' इति च पाठः ।

अ० २६ ] सूत्रस्थानम ३१३

अ० २६ ] सूत्रस्थानम ३१३ होने से होता है । रस प्रत्यक्ष है, विपाक सदा परोक्ष और वीर्य अनुमान द्वारा ज्ञात होता है । यथा-सैन्धव नमक शीत वीर्य और जलचर मांस उष्ण है । कहीं २ वीर्य का प्रत्यक्ष द्वारा भी ज्ञान हो जाता है । यथा-राई को चखकर तीक्ष्ण वीर्य का पता लग जाता है । यह वीर्य सहज और कृत्रिम है, उड़द का भारीपन और मूंग का हल्कापन यह स्वभाव से ही है । और लाजा का हल्का- पन यह कृत्रिम है ॥ ६१-६३ ॥ रसवीर्यविपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते । विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ॥ ६४ ॥ कटुकः कटुकः पाके वीर्योष्णश्चित्रको मतः । तद्वद्दन्ती प्रभावात्तु विरेचयति मानवम् ॥ ६५ ॥ विषं विषघ्नमुक्तं यत् प्रभावस्तत्र कारणम् । ऊर्ध्वानुलोमिकं यच्च तत्प्रभावप्रभावितम् ॥ ६६ ॥ मणीनां धारणीयानां कर्म यद्विविधात्मकम् । तत्प्रभावकृतं तेषां, प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ॥ ६७ ॥ किंचिद्रसेन कुरुते कर्म वीर्येण चापरम् । द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेण च किंचन ॥ ६८ ॥ रसं विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तानपोहति । बलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ ६९ ॥ सम्यग्विपाकवीर्याणि प्रभावश्चाप्युदाहृतः । प्रभाव—जिस स्थान पर रस, वीर्य और विपाक की समानता होने पर भी कार्य में विशेषता उत्पन्न होती हो, उसे 'प्रभाव' कहते हैं । जिस प्रकार चित्रक ( चीतामूल ) का रस कटु, विपाक कटु और वीर्य उष्ण है, उसी प्रकार दन्ती ( जमालमोटा ) भी कटु रस, कटु विपाक और उष्णवीर्य है । परन्तु जमालमोटा विरेचन करता है, चीता नहीं करता । जो विष विष को ( स्थावर विष जंगम विष को—'तस्माद् दंष्ट्राविषं मौलम्' ) नष्ट करता है, उसका भी कारण प्रभाव है । जो द्रव्य ऊर्ध्वगामी और अधोगामी दोनों मार्गों का संशोधन करता है, वह भी प्रभाव है । मणियों के धारण करने से विषनाश, शूलहरण आदि जो नाना प्रकार के कार्य होते हैं, वे सब प्रभाव के कारण ही होते हैं। प्रभाव द्रव्य की वह अचिन्त्य शक्ति है जिसके विषय में कुछ कह नहीं सकते कि क्यों होता है । कोई द्रव्य अपने रस से, कोई वीर्य से, कोई गुण से, कोई विपाक से और कोई प्रभाव से कार्य करता है । किसी पदार्थ में रस आदि का बल

३१४ चरकसंहिता [ अ० २६ समान हों, तो वहां पर रस को विपाक, रस और विपाक को वीर्य, रस, विपाक, वीर्य को प्रभाव अपने स्वाभाविक बल से जीत लेता है। जिस प्रकार कि भैंस की चर्बी रस और विपाक में मधुर है, परन्तु वीर्य-उष्ण है, इसलिये वह मधुर रस के कार्य पित्त-शमन को न करके, उष्ण वीर्य के कार्य पित्तप्रकोप को करता है। मद्य, इसका रस और विपाक अम्ल है, वीर्य उष्ण है, परन्तु यही मद्य अपने प्रभाव से इन तीनों को रद्द करके स्त्रियों में दुग्ध उत्पन्न करता है। अब तक विपाक, वीर्य और प्रभाव का वर्णन भली प्रकार कर दिया है ॥ ६४-६६ ॥ षण्णां रसानां विज्ञानमुपदेक्ष्याम्यतः परम् ॥ ७० ॥ स्नेहन-प्रीणनाह्लाद-मार्दवै रुपलभ्यते । मुखस्थो मधुरश्चाऽऽस्यं व्याप्रुवंल्लिम्पतीव च ॥ ७१ ॥ दन्तहर्षान्मुखस्रावात्स्वेदनान्मुखबोधनात् । विदाहाच्चाऽऽस्यकण्ठस्य प्राश्यैवाम्लं रसं वदेत् ॥ ७२ ॥ प्रलीयन्क्लेदविष्यन्दमार्दवं कुरुते मुखे । यः शीघ्रं लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च ॥ ७३ ॥ संवेजयेद्यो रसनां निपाते तुदतीव च । विदहन्मुखनासाक्षि संस्रावी स कटुः स्मृतः ॥ ७४ ॥ प्रतिहन्ति निपाते यो रसनं स्वदते न च । स तिक्तो मुख-वैशद्य-शोष-प्रह्लाद-कारकः ॥ ७५ ॥ वैशद्य-स्तम्भ-जाड्यैर्यो रसनं योजयेद्रसः । बध्नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि ॥ ७६ ॥ इति ॥ इसके आगे छः रसों के लक्षण कहते हैं। जो रस स्निग्धता, प्रसन्नता, आल्हाद अथवा मृदुता उत्पन्न करता है, मुख में रखने से सम्पूर्ण मुख को चिकास से भर देता है, लिसलिसा बना देता है, वह मधुर रस है। जो रस दांतों को खट्टा कर देता है, मुख से थूक ( लाला ) चुआता है, पसीना लाता है, मुख में जागृति उत्पन्न कर देता है, मुख और गले में जलन करता है, वह 'अम्ल' रस है। जो रस मुख में रखने से घुलने लगे, क्लिन्न नमीदार, लाला बहावे, मुख में हल्कापन लाये, मुख में विदाह करता हो, उसे 'लवण' रस कहते हैं। जो रस जीभ को छूते ही चुरचुराहट उत्पन्न करे और सुई जैसा चुभने लगे, मुख को जलाता हुआ नाक और आँखों से पानी बहाने लगे वह 'कटु' रस है। जो रस जीभ के साथ स्पर्श होने पर जीभ को जड़ कर दे और और कुछ अच्छा नहीं लगता और मुख को साफ करता है, सन्तोष की

आह्लादित करता है वह 'तिक्त' रस है । जिस रस के खाने से जीभ स्वच्छ, जड़ और स्तम्भित हो जाती है और गले को रोक देता है और हृदय को पीड़ित करता है, वह 'कषाय' रस है ॥ ७०-७६ ॥ एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयं पुनरग्निवेश उवाच—भगवन् ! श्रुत- मेतदवितथमर्थसंपद्युक्तं भगवतो यथावद् द्रव्यगुणकर्माधिकारे वचः, परं त्वाहारविकाराणां वैरोधिकानां लक्षणमनतिसंक्षेपेणोपदिश्यमानं शुश्रूषामह इति ॥ ७७ ॥ तमुवाच भगवान्नात्रेयः—देहधातुप्रत्यनीकभूतानि द्रव्याणि देह- धातुभिर्विरोधमापद्यन्ते, परस्परगुणविरुद्धानि कानिचित् कानिचित्सं- योगात्संस्कारादपराणि देश-काल-मात्रादिभिश्चापराणि तथा स्वभावा- दपराणि ॥ ७८ ॥ तत्र यान्याहारमधिकृत्य भूयिष्ठमुपयुज्यन्ते तेषामेकदेशं वैरोधिक- मधिकृत्योपदेक्ष्यामः—न मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहरेत्, उभयं ह्येतन्मधुरं मधुरविपाकं महाभिष्यन्दि शीतोष्णत्वाद्विरुद्धवीर्यं विरुद्ध- वीर्यत्वाच्छोणितप्रदूषणाय महाभिष्यन्दित्वान्मागर्गापरोधाय चेति ॥७९॥ इस प्रकार से कहते हुए महर्षि आत्रेय को अग्निवेश ने कहा कि हे भगवन् ! आपने द्रव्यगुण कर्म के विषय में जो कुछ अर्थयुक्त वाणी कही है, वह यथार्थ रूप में सुन ली । परन्तु विरुद्ध आहार के लक्षणों को विस्तार से सुनने की इच्छा से, इसलिये आप उसको प्रतिपादन करें । इस पर आत्रेय ऋषि ने कहा—शरीर के रसादि सात धातु या वातादि दोष, इनको प्रकृति के विरुद्ध करने (दूषित करने) वाले द्रव्यों से शरीर के धातु बिगड़ जाते हैं। इन द्रव्यों में कुछ द्रव्य परस्पर गुणों से कुछ संयोग से और कुछ संस्कार से, कुछ देश, काल, मात्रा से और कुछ स्वभाव से ही दूषित करने वाले (विरोधी गुण के) होते हैं। परस्पर विरुद्ध जैसे मछलियों को दूध के साथ खाना । संयोग विरुद्ध-जैसे पके हुए बड़हल को उड़दों में मिलाकर खाना । संस्कार विरुद्ध-जैसे कबूतर को सरसों के तेल में भून कर खाना । देश दो प्रकार का है, भूमि और शरीर । भूमि विरुद्ध—राख और धूल में मिला भोजन या परोक्ष में बना भोजन खाना । शरीरविरुद्ध—उष्णावस्था में मधु खाना । समयविरुद्ध-वासी रक्खा मकोय का ; खाना । मात्रा विरुद्ध—एक वजन में मधु और घी खाना । स्वभाव विरुद्ध- विष ओज के विरुद्ध दसगुण रखता है। इनमें से जो विरोधी द्रव्य

३१६ चरकसंहिता [ अ० २६ मछलियों को दूध के साथ नहीं खाना चाहिये। क्योंकि दोनों ही वस्तुएं मधुर रस और मधुर विपाक वाली हैं। इसलिये दोनों को एक साथ सेवन करने से कफ की बहुत वृद्धि होती है, दूध शीतवीर्य और मछलियां उष्णवीर्य हैं। इस- लिये रक्त को दूषित करती हैं और महा अभिष्यन्दि होने से स्रोतों को रोक देंगी ॥ तदनन्तरमात्रेयवचनमनुनिशम्य भद्रकाप्योऽग्निवेशमुवाच— सर्वानेव मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहरेदन्यत्रैकस्माच्चिलिचिमात्, स पुनः शकली सर्वतो लोहितराजी रोहितप्रकारः प्रायो भूमौ चरति, तं चेत्प- यसा सहाभ्यवहरेन्निःसंशयं शोणितजानां विबन्धजानां च व्याधीनाम- न्यतममथवा मरणं प्राप्नुयादिति ॥ ८० ॥ आत्रेय महर्षि के वचन को श्रवण कर भद्रकाप्य मुनि अग्निवेश को बोले कि एक चिलचिम मछली को छोड़कर और सब मछलियों को दूध के साथ खा सकते हैं। इस चिलचिम मछली पर चारों ओर लाल लाल रेखायें, धारियां होती हैं, इसका रंग लाल होता हे और प्रायः भूमि (रेगिस्तान, जैसलमेर में जिसे रेगमाही मच्छी कहते हैं) में फिरती हैं। इस मछली को दूध के साथ खाने से निश्चय रूप में रक्तजन्य या अवरोध (मलमूत्र) जन्य रोगों या मृत्यु को भी प्राप्त हो सकता है ॥ ८० ॥ नेति भगवानात्रेयः । सर्वानेव मत्स्यान्न पयसाऽभ्यवहरेद्विशेषतस्तु चिलिचिमं, स हि महाभिष्यन्दित्वात्स्थूललक्षणतरानेतान् व्याधीनुपज- नयत्यामविषमुदीरयति च ॥ ८१ ॥ ग्राम्यानूपौदकपिशितानि च मधु-तिल-गुड-पयो-माष-मूलक-बिसै- र्विरूढधान्यैश्च नैकघाऽद्यात्, तन्मूलं च बाधिर्य्यान्ध्य-वेपथु-जाड्य-विक- ळ-मूकतामैन्मिण्यमथवा मरणमाप्नोति न पौष्करं, रोहिणीकं शाकं, कपोतान् वा सार्षप-तैल-मृष्टान्मधुपयोभ्यां सहाभ्यवहरेत्, तन्मूलं हि शोणिताभिष्यन्द-धमनी-प्रविचयापस्मार-शङ्खक-गलगण्ड-रोहिणीकाना- मन्यतमं प्राप्नोत्यथवा मरणमिति । न मूलक-लशुन कृष्णगन्धार्जक- सुमुख-सुरसादीनि भक्षयित्वा पयः सेव्यं, कुष्ठाबाधभयात् । न जातुक- शाकं न लिकुचं पक्वं मधुपयोभ्यां सहोपयोज्यं, एतद्धि मरणायाथवा बल-वर्ण-तेजो-वीर्योपरोधायालगुण्याधये षाण्ढ्याय चेति । तदेव लिकुचं पक्वं न माष-सूप-गुड-सर्पिर्भिः सहोपयोज्यं वैरोधिकत्वात् । तथाऽम्लाम्र- तक-मातुलुङ्ग-लिकुच-करमर्द-मोच-दन्त-शठ-बदर-कोशाम्र-भव्य-जम्बु- कपित्थ-तिन्तिडीक-पारावताक्षोट-पनस-नालिकेर-दाडिमामलक- की

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३१७

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३१७ प्रकाराणि चान्यानि सर्वं चाम्लं द्रवमद्रवं च पयसा सह विरुद्धम्। तथा कङ्गुवनक-मकुष्ठक-कुलत्थ-माष-निष्पावाः पयसा सह विरुद्धाः। पद्मोत्त- रिकाशाकं शार्करो मैरेयो मधु च सहापयुक्तं विरुद्धं वातं चातिकोपयति। हारिद्रकः सर्षप-तैल-भृष्टो विरुद्धः पित्तं चातिकोपयति। पायसो मन्था- नुपानो विरुद्धः श्लेष्माणं चातिकोपयति। उपोदिका तिलकल्कसिद्धा हेतुरतीसारस्य। बलाका वारुण्या सह कुल्माषैरपि विरुद्धा। सैव सूकरवसापरिभृष्टा सद्यो व्यापादयति मायूर-मांसमेरण्ड-सीसकावस- क्तमेरण्डाग्नि-प्लुष्टमेरण्ड-तैल-युक्तं सद्यो व्यापादयति तदेव भस्मपांसु- परिव्वस्तं सक्षौद्रं मरणाय। हारांतकमांसं १हारिद्रसीसकावसक्तं हारिद्रा- ग्निप्लुष्टं सद्यो व्यापादयति। तदेव भस्मपांशुपारध्वस्तं सक्षाद्रं मरणाय मत्स्यांनेस्तालनसिद्धाः पिप्पल्यस्तथा काकमाची मधु च मरणाय; मधु चोष्णमुष्णार्तस्य च मधु मरणाय। मधुसर्पिषी समघृते; मधु वारि चान्तरिक्षं समघृतं, मधुपुष्करबीजं, मधु पांत्वाष्णोदकं, भल्लातकाष्णो- दकं; तक्रसिद्धः कम्पिल्लकः, पर्युषिता काकमाची, अङ्गारशूल्या भास- श्चेति विरुद्धानि-इत्येतद्यथाप्रशमभिनिर्दिष्टं भवतीति ॥८२॥ भगवान् आत्रेय ने कहा—यह ठीक नहीं। सभी मछलियों को दूध के साथ नहीं खाना चाहिये, परन्तु खासकर चिलचिम मछली को तो कभी भी नहीं खाना चाहिये। क्योंकि यह मछली (चिलचिम) बहुत अभिष्यन्द करने वाली है, इसलिये भयंकर बड़े २ रोगों को और आमविष को उत्पन्न करती है। ग्राम्य, आनूप और जलचर प्राणियों का मांस, मधु, तिल, गुड़, दूध, उड़द, मूली, भिस, नाल, अंकुरित धान्यों के साथ एक साथ नहीं खाना चाहिये। इन के साथ में खाने से बहरापन, अन्धत्व, कम्पन, जड़ता, अव्यक्त उच्चार (मिन्मिन) गूंगापन, नाक से बोलना, अथवा मरण तक हो सकता है। पुष्करपत्र के शाक कटु रोहिणी के शाक को, या कबूतर के मांस के सरसों के तेल में भूनकर दूध और शहद के साथ नहीं खाना चाहिये; इन के खाने से रक्ताभिष्यन्द, शिराजन्य ग्रन्थि-रोग, अपस्मार, शंखकशूल, गलगण्ड, रोहिणी (कण्ठरोहिणी) रोगों में से कोई एक रोग अथवा मृत्यु प्राप्त होती है। मूली, लहसुन, शोभाञ्जन की भाजी, अर्जक (कुठेरक), सुमुख (राई) और तुलसी आदि को खाकर दूध नहीं पीना चाहिये, क्योंकि कुष्ठरोग होने की शंका है। वंशपत्रिका का शाक या पके हुए ब्यो (बड़हल) को शहद और दूध के साथ नहीं खाना १ 'हारिद्रक' इति च पाठः।

३१८ चरकसंहिता [ अ० २६ चाहिये, क्योंकि इन के खाने से या तो मृत्यु हो जाती है, अथवा बल, वर्ण, तेज, वीर्य का नाश होता है और बड़े २ रोग तथा नपुंसकता उत्पन्न होती है। इसी पके हुए ट्यो फल को उड़द की दाल, गुड़ और घी के साथ मिलाकर नहीं खाना चाहिये क्योंकि संयोग विरुद्ध है। इसी प्रकार कच्चे आम, बिजौरा, ट्यो, करौंदा, केला, निम्बू, बेर, जंगली आम, कमरख, जामुन, कैथ, इमली, फालसा, अखरोट, पनस (कटहल), नारियल, अनार, आंवला या इस प्रकार के अन्य सब तरल अथवा ठोस सब प्रकार के खट्टे पदार्थ दूध के साथ विरोधी गुण रखते हैं। इसी प्रकार कंगु (नीवार धान्य), जंगली मूंग, मोठ, कुलत्थी, उड़द, या पिष्टी से बने पदार्थ दूध के साथ विरोधी हैं। पद्मोत्तरिका के शाक, को शक्कर, मैरेय, मधु के साथ खाना विरुद्ध है और वायुकारक है। कबूतर को सरसों के तेल में भूनकर खाना विरुद्ध है, वह पित्त को बहुत कुपित करता है। सत्तू को दूध में या खीर में मथकर खाना विरुद्ध है और श्लेष्मा को बढ़ाता है। तिल कल्क के साथ तैयार की हुई चोलाई की भाजी अतीसार रोग को उत्पन्न करती है। बलाका (पक्षी), वारुणी-शराब तथा कुल्माष (धान्य) के साथ विरुद्ध है। इसी बलाका पक्षी को सुअर की चर्बी में भूनकर खाने से शीघ्र मरण होता है। मोर का मांस, एरण्ड की कड़छी (खोंचा, भूनने की लकड़ी) से, एरण्ड की लकड़ियों की आग से, एरण्ड तैल में पकाकर खाने से तुरन्त मार देता है। हलदा कबूतर का मांस, हलद की लकड़ी की बना कड़छी से, हलद की लकड़ियों के आंच में पकाकर खाने से शीघ्र मार देता है। इसी कबूतर के मांस को राख, धूल में मिले हुए शहद में मिलाकर खाने से मृत्यु होती है। मछलियों की चर्बी में अथवा जिस बर्तन में मछलियां पकाई जाती हैं, उसी पात्र में पिप्पली, मकोय या शहद पकाकर खाने से मृत्यु होती है। उष्ण क्रिया करने पर या उष्ण शरीरावस्था में गरम शहद खाना मृत्यु का कारण होता है। एक मात्रा में मधु और घी, मधु और वृष्टि जल, शहद और कमलगट्टा, मधु पीकर गरमपानी, भिलावा और गरमपानी, छाछ में सिद्ध पकाया कसीला, रात की बासी रक्खी मकोय, अंगारों पर शूलाकृत भास (कुक्कुट) पक्षी का मांस ये विरुद्ध होते हैं। ये प्रश्न के अनुसार विरोधी अन्न कह दिये गये ॥ ८१-८२ ॥ भवन्ति चात्र श्लोकाः- यत्किंचिद्दोषमुत्क्लेश्य न निर्हरति कायतः । आहारजातं तत्सर्वमहितायोपपद्यते ॥ ८३ ॥

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३१६

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३१६ यच्चापि देश-कालाग्नि-मात्रा'-सात्म्यानिलादिभिः । संस्कारतो वीर्यतश्च कोष्ठावस्थाक्रमैरपि ॥ ८४ ॥ परिहारोपचाराभ्यां पाकात्संयोगतोऽपि च । विरुद्धं तच्च न हितं हृत्संपद्विधिभिश्च यत् ॥ ८५ ॥ विरुद्धं देशतस्तावद्रूक्षतीक्ष्णादि धन्वनि । आनूपे स्निग्धशीतादि भेषजं यन्निषेव्यते ॥ ८६ ॥ कालतोऽपि विरुद्धं यच्छीत-रूक्षादि-सेवनम् । शीते काले तथोष्णे च कटूकोष्णादिसेवनम् ॥ ८७ ॥ विरुद्धमनले तद्वन्नानुरूपं चतुर्विधे । मधुसर्पिः समधृतं मात्रया तद्विरुध्यते ॥ ८८ ॥ कटूष्णोष्णादिसात्म्यस्य स्वादुशीतादिसेवनम् । यत्तत्सात्म्यविरुद्धं तु, विरुद्धं त्वनिलादिभिः ॥ ८६ ॥ या समानगुणाभ्यासविरुद्धात्रौषधक्रिया । संस्कारतो विरुद्धं तद्यद्रोज्यं विषवद् भवेत् ॥ ९० ॥ ऐरण्डसीसकासक्तं शिखिमांसं तथैव हि । विरुद्धं वीर्यतो ज्ञेयं वीर्यतः शांतलात्मकम् ॥ ९१ ॥ तत्संयोज्योष्णवीर्येण द्रव्येण सह सेव्यते । क्रूरकोष्ठस्य चात्यल्पं मन्दवीर्यमभेदनम् ॥ ९२ ॥ मृदुकोष्ठस्य गुरु च भेदनीयं तथा बहु । एतत्कोष्ठविरुद्धं तु, विरुद्धं स्यादवस्थया ॥ ९३ ॥ श्रम-व्यवाय-व्यायाम-सक्तस्यानिलकोपनम् । निद्रालसस्यालसस्य भोजनं श्लेष्मकोपनम् ॥ ९४ ॥ यच्चानुत्सृज्य विण्मूत्रं भुङ्क्ते यच्चाबुभुक्षितः । तच्च क्रमविरुद्धं स्याद्यच्चातिक्षुद्वशानगः ॥ ९५ ॥ परिहारविरुद्धं तु वराहादीन्निषेव्य यत् । सेवेतोष्णं, घृतादींश्च पीत्वा शीतं निषेवते ॥ ९६ । विरुद्धं पाकतश्चापि दुष्टदुर्दारुसाधितम् । अपक्व-तण्डुलात्यर्थ-पक्व-दग्धं च यद्भवेत् । संयोगतो विरुद्धं यद्यथाऽम्लं पयसा सह । अमनोरुचितं यच्च हृद्विरुद्धं तदुच्यते ॥ ९८ ॥

३२० चरकसंहिता [ अ० २६

संपद्विरुद्धं तद्विद्यादसंजातरसं तु यत् । अतिक्रान्तरसं वाऽपि विपन्नरसमेव वा ॥ ९९ ॥ ज्ञेयं विधिविरुद्धं तु भुज्यते निभृतेन यत् । तदेवंविधमन्नं स्याद्विरुद्धमुपयोजितम् ॥ १०० ॥ सात्म्यतोऽल्पतया वाऽपि दीप्ताग्नेस्तरुणस्य च । स्नेह-व्यायाम-बलिनो विरुद्धं वितथं भवेत् ॥ १०१ ॥ षाण्ढ्यान्ध्य-वीसर्प-दकोदराणां विस्फोटकोन्माद-भगन्दराणाम् । मूर्च्छा-मदाध्मान-गलामयानां पाण्ड्वामयस्याऽऽम-विषस्य चैव ॥१०२॥ किलास-कुष्ठ-ग्रहणी-गदानां शोषास्र-पित्त-ज्वर-पीनसानाम् । संतानदोषस्य तथैव मृत्योर्विरुद्धमन्नं प्रवदन्ति हेतुम् ॥ १०३ ॥

जो भोजन दोषों को विशेष रूप में कुपित करके शरीर से बाहर नहीं करता, अर्थात् कुपित अवस्था में शरीर में ही रहने देता है वह सब अन्न अहितकारी होता है। इसी प्रकार देश, काल, अग्नि, सात्म्य, वायु आदि दोष, संस्कार वीर्य, कोष्ठ, अवस्था, क्रम, परिहार, उपचार, पाक, संयोग, हृत्-संपत् और विधि में जो द्रव्य विरोधी हों, वे अहितकारी हैं । मारवाड़ आदि निर्जल देशों में रूक्ष, तीक्ष्ण पदार्थ; जलबहुल ( बंगाल आदि ) प्रदेश में स्निग्ध और शीत पदार्थों का सेवन करना देशविरुद्ध है । इसी प्रकार शीत ऋतु में शीत और रूक्ष पदार्थों का सेवन या उष्णकाल में कटु और उष्ण पदार्थों का सेवन कालविरुद्ध है। अग्नि के विषम, मन्द या तीक्ष्ण या सम इन चार प्रकार की जाठराग्नि में विरोधी अन्नपान (यथा-तीक्ष्णाग्नि में मन्द आहार और मन्दाग्नि में गुरु आहार करना) विरोधी है। मधु और घी एकसमान मात्रामे परस्पर विरोधी हैं। जिस पुरुषको कटु, उष्ण आदि वस्तुओं का सात्म्य हो, वह यदि मधुर और शीत पदार्थ सेवन करे तो यह सात्म्य-विरोधी है । समान गुणों के अभ्यास के विरुद्ध जो आहार है वह वायु आदि दोषों का भी विरोधी है। एरण्ड की कड़छी से पकाया हुआ मोर का मांस विष के समान होने से संस्कार-विरुद्ध है। जो वस्तु शीतवीर्य हो उस को यदि उष्णवीर्य की वस्तु के साथ मिलाकर खाया जाये तो यह वीर्य-विरोधी है। क्रूरकोष्ठ वाले पुरुष को थोड़ा, मृदुवीर्य अथवा अरेचक पदार्थ देना और मृदुकोष्ठ वाले पुरुष को गुरु, बहुत अथवा रेचक पदार्थ देना, कोष्ठविरोधी है। परिश्रम, मैथुन, स्त्रीसंग और व्यायाम में लगे हुए पुरुष को वायुकोपक आहार देना या निद्राशील, आलसी पुरुष को कफकोपक भोजन देना अवस्थाविरुद्ध जो मल मूत्र का त्याग किये बिना, बिना भूख के खाना, अथवा बहुत की

अ० २६] २१ सूत्रस्थानम् ३२१

अ० २६] २१ सूत्रस्थानम् ३२१ लाचार होकर खाना ये क्रमविरुद्ध है। सुअर आदि का मांस खाकर या गरम अथवा घी आदि खाकर ऊपर शीतल पदार्थों का सेवन करना परिहार विरोधी है। दुष्ट या बुरी (बांस आदि, या मिट्टी के तेल से) लकड़ियों से पकाये, कच्चे-पके, बहुत पके, या जले हुए चावल आदि आहार का खाना पाकविरोधी कहते हैं। खटाई का दूध के साथ संयोग करना यह संयोगविरोधी है। जो आहार मन को नहीं रुचता वह हृदयविरोधी है। जिस आहार में रस उत्पन्न नहीं हुआ वह सम्पद्विरुद्ध है। इसी प्रकार जिस आहार का रस नष्ट हो गया या बिगड़ गया है, वह भी सम्पद्विरुद्ध है। जो भोजन एकान्त में नहीं खाया जाता है वह आहारविधि अर्थात् शास्त्र के विरुद्ध है। इस प्रकार का विरोधी अन्न भी स्वस्थ पुरुष को, जिसकी अग्नि दीप्त हो, युवा पुरुष को, सात्म्य बन गया हो, या अल्पमात्रा में हो अथवा स्नेह एवं व्यायाम से बलवान् बने पुरुष को विरुद्ध भोजन विशेष हानि नहीं करते। विरोधी अन्न के सेवन से निम्न रोग उत्पन्न होते हैं। यथा—नपुंसकता, अन्धापन, वीसर्प, जलोदर, विस्फोटका, उन्माद, भगन्दर, मूर्च्छा, मद, अफारा, गलरोग, पाण्डुरोग, आमविष, किलास, कुष्ठ, संग्रहणी, शोष, रक्तपित्त, ज्वर, पीनस। इसी प्रकार संतति में पहुंचने वाले दोषों एवं मृत्यु का भी कारण विरुद्ध आहार को ही कहते हैं॥ ८३–१०३॥ एषां च खलु परेषां च वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामिमे भावाः प्रतिकारा भवन्ति। यथा—वमनं विरेचनं च, तद्विरोधिनां च द्रव्याणां संशमनार्थमुपयोगः, तथाविधैश्च द्रव्यैः पूर्वमभिसंस्कारः शरीर- स्येति ॥ १०४ ॥ इस प्रकार के विरुद्ध अन्न पान के सेवन से अथवा अन्य विरोधरूपी कारणों से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा के ये उपाय हैं। यथा—वमन, विरेचन, उक्त रोगों के विरोधी द्रव्यों का शान्ति के लिये उपयोग करना, विरुद्ध आहार- जन्य रोगों के विरुद्धद्रव्यों का निरन्तर उपयोग करके शरीर को संस्कृत करना, अथवा रसायन ओषधियों से शरीर को शुद्ध करना ॥ १०४ ॥ भवति चात्र—विरुद्धाशनजान् रोगान् प्रतिहन्ति विरेचनम् । वमनं शमनं चैव पूर्वं वा हितसेवनम् ॥ १०५ ॥ विरुद्ध आहार से उत्पन्न रोगों को विरेचन, वमन, संशमन क्रिया अथवा व्याधि के निवारणार्थ पहले ही पथ्य तथा रसायनादि का सेवन नष्ट करता है॥ १०५ ॥

३३२ चरकसंहिता [अ० २७ तत्र श्लोकाः—मतिरासीन्महर्षीणां या या रसविनिश्चये । द्रव्याणि गुणकर्मभ्यां द्रव्यसंख्या रसाश्रयाः ॥ १०६ ॥ कारणं रससंख्या या रसानुरसलक्षणम् । परादीनां गुणानां च लक्षणानि पृथक् पृथक् ॥ १०७ ॥ पञ्चात्मकानां षट्त्वं च रसानां येन हेतुना । ऊर्ध्वानुलोमभाजश्च यद्गुणातिशयाद्रसाः ॥ १०८ ॥ षण्णां रसानां षट्त्वे च सविभक्ता विभक्तयः । उद्देशश्चापवादश्च द्रव्याणां गुणकर्मणी ॥ १०९ ॥ प्रवरावरमध्यत्वं रसानां गौरवादिषु । पाकप्रभावयोर्लिङ्गं वीर्यसंख्याविनिश्चयः ॥ ११० ॥ षण्णामास्वाद्यमानानां रसानां यत्स्वलक्षणम् । यद्यद्विरुध्यते तस्माद्येन यत्कारि चैव यत् । वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामौषधं च यत् । आत्रेयभद्रकाप्यीये तत्सर्वमवदन्मुनिः ॥ ११२ ॥ रस-निश्चय सम्बन्ध में महर्षियों की भिन्न २ मति, द्रव्यों के गुण कर्म, रस की संख्या, इन के भेद होने के कारण, रस या अनुरस का लक्षण, पर आदि गुण एवं उन के लक्षण, पंच महाभूतों से उत्पन्न रसों की संख्या, कौन कौन द्रव्य ऊर्ध्वगामी, अधोगामी क्रिया करते हैं, छः रसों के विभाग, रसके आधार- भूत द्रव्यों के सामान्य गुण, कर्म और इनके अपवाद, गौरव, लघुता, रसों में उत्कृष्ट, मध्यम, अवर भेद, विपाक, प्रभाव का लक्षण, वीर्य कितने प्रकार का, छः रसों के लक्षण, परस्पर विरुद्ध द्रव्य, इन के सेवन से उत्पन्न विकार एवं इन रोगों की औषध ये सब विषय इस 'आत्रेय-भद्रकाप्यीय' अध्याय में आत्रेय ऋषि ने कह दिये ॥ १०६-११२ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थानेऽन्नपानचतुष्के आत्रेयभद्रकाप्यीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः समाप्तः ॥ २६ ॥

सप्तविंशोऽध्यायः । अथातोऽन्नपानविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२३

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२३ इस के आगे अन्नपानविधि नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भग- वान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२॥ इष्ट-वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शं विधिविहितमन्नपानं प्राणिनां प्राणिसंज्ञ- कानां प्राणमाचक्षते कुशलाः, प्रत्यक्षफलदर्शनात्, तदिन्धना ह्यन्तराग्नेः स्थितिः; तत् सत्त्वमूर्जयति, तच्छरीर-धातु-व्यूह-बल-वर्णोन्द्रियप्रसाद- करं यथोक्तमुपसेव्यमानं, विपरीतमहिताय संपद्यते ॥ ३ ॥ प्रिय या हितकर वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्शयुक्त विधिपूर्वक^१ सेवन किया अन्न पान, प्राणिमात्र का प्राण है; ( 'अन्नं वै प्राणाः' ) ऐसा विद्वान् मनुष्य कहते हैं । सब प्राणियों के प्राण स्थिर रखने के लिये आहार मुख्य कारण है । यह बात प्रत्यक्ष प्रमाण से भी सिद्ध है । ठीक प्रकार सेवन करने पर अन्न शरीर में स्थित जाठराग्नि का आधार है और इस अग्नि का अन्न इन्धन रूप होता है । अन्न के सेवन करने से मन की शक्ति बढ़ती है, शरीर के धातुसमूह, बल वर्ण बढ़ता है, तथा इन्द्रियां निर्मल होती हैं । विधि से विपरीत^१ सेवन करने पर अन्न, विप- रीत परिणाम उत्पन्न करता है ॥ ३ ॥ तस्माद्धिताहितावबोधनार्थमन्नपानविधिमखिलेनोपदेक्ष्यामोऽग्नि- वेश ! तत्स्वभावादुदकं क्लेदयति, लवणं विष्यन्दयति, क्षारः पाचर्यात, मधु संदधाति, सर्पिः स्नेहयति, क्षीरं जीवयति, मांसं बृंहयति, रसः प्रीणयति, सुरा जर्जराकरोति, शीधुरवधमयति, द्राक्षासवो दीपयति, फाणितमाचिनोति, दधि शोफं जनयति, पिण्याकशाकं ग्लपयति, प्रभू- तान्तर्मलो माषसूपः, दृष्टिशुक्रघ्नः क्षारः, प्रायः पित्तलमम्लमन्यत्र दाडि- मामलकात्, प्रायो मधुरं श्लेष्मलमन्यत्र मधुनः पुराणाच्च शालयवगो- धूमात्, प्रायः सर्वं तिक्तं वातलमवृष्यं चान्यत्र वेत्राग्रपटोलात्, प्रायः कटुकं वातलमवृष्यं चान्यत्र पिप्पलीविश्वभेषजात् ॥ ४ ॥ इसलिये हे अग्निवेश ! हितकारी और अहितकारी विषय का ज्ञान करनेके लिये अन्न- पान विधि को विस्तार से कहते हैं। स्वाभाविक रीति से जल (क्लिन्नता) उत्पन्न करता है । लवण विष्यन्द (नरम बनाना, जलस्राव उत्पन्न) करता है । क्षार पाचन करता है, शहद जोड़ता है, घी चिकना बनाता है । दूध जीवन देता है, मांस बृंहण पोषण देता है । रस क्षीणता को पुष्ट करता है । मद्य शरीर को जीर्ण करता है । शीधु [ सिरका ] शरीर का लेखन करता है, द्राक्षासव अग्नि को बढ़ाता है । १. सूत्रस्थान इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय ( ८। सू० १६) में ('नात्न- न्नमुद्धृत्यादि भोजन करने के सम्बन्ध में उचित विधान किया है।