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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

महाबोधि-ग्रन्थ-माला—१ धम्मपदं [ मूल पाली, संस्कृत-छाया और हिन्दी अनुवाद सहित ] अनुवादक "महापण्डित" "त्रिपिटकाचार्य" राहुल सांकृत्यायन प्रयाग १९३३ ई० प्रथम संस्करण } { मूल्य ||) ३००० प्रतियाँ } { ॥) आना

प्रकाशक ब्रह्मचारी देवप्रिय, बी० ए० प्रधानमन्त्री महाबोधि-सभा, ऋषिपतन सारनाथ ( बनारस )

मुद्रक नरेन्द्रनाथ पाण्डेय इलाहाबाद मॉडर्न प्रेस इलाहाबाद

लंकाद्वीपमें विद्यालंकार महाविद्यालयके अधिपति त्रिपिटकवागीश्वराचार्य स्नेहमूर्ति गुरुदेव लु० श्रीधर्मानन्द-नायक-महा- स्थविरपादके करकमलोंमें सादर समर्पित

( १० ) व्यवस्थापकीय वक्तव्य रक्त-मांस भाषा-विचार सभी दृष्टियोंसे हिन्दीभाषाभाषी भग- वान् बुद्धके उत्तराधिकारी हैं। इन्हीं के पूर्वजोंने उनके अमृतमय उपदेशोंको सर्व प्रथम अपनाया । इन्होंने ही दुनियामें भारतकी धार्मिक और सांस्कृतिक विजयदुन्दुभी बजाई । पूर्वजोंकी इस अद्भुत और अमर कीर्त्तिका स्मरण करते, किसका शिर ऊँचा न होगा । लेकिन, यह कितने शोककी बात है, कि मातृ-भाषा हिन्दीमें भगवान् के दिव्य संदेश नहींके बराबर हैं । इसी कमी को दूर करनेके लिये हिन्दीमें महाबोधि-ग्रंथ-माला निकालनेका उप- क्रम हुआ है । धम्मपद मालाका प्रथम पुष्प है । आगे निकलनेवाली पुस्तकोंके सस्तेपन और सुंदर छपाईका अनुमान इसी पुस्तकसे आप कर सकते हैं । मालाकी दूसरी पुस्तक होगी—मज्झिमनिकाय । हम आशा करते हैं, कि हिन्दीप्रेमी सज्जन इस काममें हमारा हाथ बँटायेंगे और आठ आना भेज कर मालाके स्थायी ग्राहक बन जायेंगे । ( ब्रह्मचारी ) देवप्रिय प्रधानमंत्री, महाबोधि सभा, ऋषिपत्तन, सारनाथ ( बनारस )

1 प्रस्तावना तिपिटक (=त्रिपिटक ) अधिकांशतः भगवान् बुद्धके उपदेशोंका संग्रह है। त्रिपिटकका अर्थ है, तीन पिटारी। यह तीन पिटक हैं— सुत्त (=सूत्र ), विनय और अभिधम्म (=अभिधर्म ) । १. सुत्तपिटक निम्नलिखित पाँच निकायोंमें विभक्त है— १. दीघ-निकाय ३४ सुत्त (=सूक्त या सूत्र ) २ मज्झिम-नि. १५२ सुत्त ३. संयुत्त-नि ५६ संयुत्त ४ अंगुत्तर-नि. ११ निपात ५. खुद्दक-नि. १५ ग्रंथ खुद्दक-निकायके १५ ग्रंथ यह हैं— ( १ ) खुद्दकपाठ ( ९ ) थेरी-गाथा ( २ ) धम्मपद ( १० ) जातक ( ५५० कथायें ) ( ३ ) उदान ( ११ ) निद्देस ( चुल्ल-; महा- ) ( ४ ) इतिवृत्तक ( १२ ) पटिसंम्भिदामग्ग ( ५ ) सुत्तनिपात ( १३ ) अपदान ( ६ ) विमान-वत्थु ( १४ ) बुद्धवंस ( 1= )

( १६ ) ( ७ ) पेत-वत्थु ( १५ ) चरियापिटक ( ८ ) थेर-गाथा २. विनयपिटक निम्न भागोंमें विभक्त है— १—सुत्तविभंग— ( १ ) भिक्खु-विभंग (\Big}) या (\Big{) ( १ ) पाराजिक ( २ ) भिक्खुनी-विभंग (\quad) ( २ ) पाचित्तिय २—खन्धक— ( १ ) महावग्ग ( २ ) चुल्लवग्ग ३—परिवार ३. अभिधम्मपिटकमें निम्नलिखित सात ग्रंथ हैं— १. धम्मसंगणी ५. कथावत्थु २. विभंग ६. यमक ३. धातुकथा ७. पट्ठान ४. पुग्गलपञ्ञत्ति धम्मपद (=धर्मपद) त्रिपिटकके खुद्दकनिकाय विभागके पंद्रह ग्रंथों- मेंसे एक है। इसमें भगवान् गौतम बुद्धके मुखसे समय समयपर निकली ४२३ उपदेशगाथाओंका संग्रह है। चीनी तिब्बती आदि भाषाओंके पुराने अनुवादोंके अतिरिक्त, वर्तमान कालकी दुनियाकी सभी सभ्य भाषाओंमें इसके अनुवाद मिलते हैं, अंग्रेजीमें तो प्रायः एक दर्जन हैं। भारतकी अन्य भाषाओंकी तरह हमारी हिन्दी भी इसमें किसीसे पीछे नहीं है। जहाँ तक मुझे मालूम है, हिन्दीमें धम्मपदके अभीतक पाँच अनु- वाद हो चुके हैं, जिनके लेखक हैं— १. श्री सूर्यकुमारवर्मा हिन्दी ( १९०४ ई० ) २. भदन्त चन्द्रमणि महास्थविर हिन्दी और पालीदोनों (१९०९ ई०)

( ॥. ) ३. स्वामी सत्यदेव परिव्राजक हिन्दी ( बुद्धगीता ) ४. श्री विष्णुनारायण हिन्दी ( सं० १९८५ ) ५. पं० गंगा प्रसाद उपाध्याय पाली-हिन्दी ( १९३२ ई० ) पाँच अनुवादोंके होते छठेंकी क्या आवश्यकता ?—इसका उत्तर आप पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी और महाबोधिसभाके मंत्री ब्रह्मचारी देवप्रियसे पूछिये । मैंने बहुत ननु-नच किया किन्तु उन्होंने एक नहीं सुनी । ६ फरवरीसे ८ मार्च तक मैं सुल्तानगंज ( भागलपुर )में “गंगा”के पुरातत्त्वांकके सम्पादनके लिये श्री धूपनाथ सिंहका अतिथि था । सम्पादनका काम ही कम न था, उसपरसे वहाँ रहते दो लेख भी लिखने पड़े । उसी समय इस अनुवाद में भी हाथ लगा दिया । जो अंश बाकी रह गया था, उसे किताब को प्रेसमें देनेके बाद समाप्त किया । इस तरह "बुद्धचर्या"की भाँति "धम्मपद"में भी जल्दीसे काम लिया गया है । इससे पुस्तकमें प्रूफ़ही- की गलतियाँ नहीं रहगईं, बल्कि जल्दीमें किये अनुवादको पुनरावृत्ति न करनेसे अनुवादकी भाषाको और सरल नहीं बनाया जा सका, इन त्रुटियोंका मैं स्वयं दोषी हूँ । ग्रंथमें पहिले बारीक टाइपमें बाईं ओर उस स्थानका नाम दिया है, जहाँ पर उक्त गाथा बुद्धके मुखसे निकली; दाहिनी ओर उस व्यक्तिका नाम है, जिसके प्रति या विषयमें उक्त गाथा कही गई । धम्मपदकी अट्ठकथा (=टीका )में हर एक गाथाका इतिहास भी दिया हुआ है; संक्षिप्त करके उसे देनेका विचार तो उठा, लेकिन समयाभाव और ग्रंथविस्तारके भयसे वैसा नहीं किया जा सका । सुत्तपिटकके प्राय १०० सूत्र, और विनयके कुछ अंशको मैंने अपनी बुद्धचर्यामें अनुवादित किया है । भारतीय भाषाओंमें पाली ग्रंथोंका सबसे अधिक अनुवाद बगलामें हुआ है । जातकोंका

( ॥- ) बगला अनुवाद कई जिल्दोंमें है । श्रीयुत चारुचन्द्र वसुने धम्मपदका पालीके साथ संस्कृत और बँगलामें अनुवाद किया है (इस ग्रंथसे मुझे अपने काममें बडी सहायता मिली है, और इसके लिए मैं चारु बाबूका आभारी हूँ)। बँगलाके वाद दूसरा नम्बर मराठी का है, जिसमें आचार्य धर्मानन्द कौशाम्बीके ग्रंथोंके अतिरिक्त सारे दीघनिकायका भी अनुवाद मिलता है। इस क्षेत्रमें हिन्दीका तीसरा नम्बर होना लज्जाकी बात है। मैंने अगले तीन चतुर्मासोंमें मज्झिम- निकाय, महावग्ग, और चुल्लवग्ग—इन तीन ग्रंथोंको हिन्दी में अनुवाद करनेका निश्चय किया है। यदि विघ्नबाधा न हुई, तो आशा है, इस वर्षके अन्तमें पाठक मज्झिम-निकायको हिन्दी रूप में देख लेंगे। गुरुकल्प भदन्त चन्द्रमणि महास्थविरने ही सर्व प्रथम धम्मपदका मूलपाली सहित हिन्दी अनुवाद किया था। उन्होंने अनुवादकी एक प्रति भेज दी थी; और सदाकी भाँति इस काममें भी उनसे बहुत प्रोत्साहन मिला; तदर्थं पूज्य महास्थविरका मैं कृतज्ञ हूँ। प्रयाग ७-४-१९३३ राहुल सांकृत्यायन

( ॥= ) वर्ग-सूची पृष्ठ १—यमकवग्गो १ १४—बुद्धवग्गो २—अप्पमादवग्गो ११ १५—सुखवग्गो ३—चित्तवग्गो १६ १६—पियवग्गो ४—पुप्फवग्गो २१ १७—कोधवग्गो ५—बालवग्गो २८ १८—मलवग्गो ६—पंडितवग्गो ३५ १९—धम्मट्ठवग्गो ७—अरहन्तवग्गो ४२ २०—मग्गवग्गो ८—सहस्सवग्गो ४७ २१—पकिण्णकवग्गो ९—पापवग्गो ५४ २२—निरयवग्गो १०—दंडवग्गो ६० २३—नागवग्गो ११—जरावग्गो ६७ २४—तण्हावग्गो १२—अत्तवग्गो ७२ २५—भिक्खुवग्गो १३—लोकवग्गो ७७ २६—ब्राह्मणवग्गो गाथा-सूची शब्द-सूची ────

नमो तस्स भगवतो अरहतोसम्मासम्बुद्धस्स धम्मपदं १—यमकवग्गो स्थान—श्रावस्ती व्यक्ति—चक्खुपाल (थेर) १-मनोपुब्बङ्गमा धम्मा मनोसेट्ठा मनोमया । मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा । ततो 'नं दुक्खमन्वेति चक्कं 'व वहतो पदं ॥ १॥ (मनःपूर्वङ्गमा धर्मा मनःश्रेष्ठा मनोमया मनसा चेत्प्रदुष्टेन भाषते वा करोति वा । तत एनं दुःखमन्वेति चक्रमिव वहतः पदम् ॥१॥ ) अनुवाद—सभी धर्मों (=कायिक, वाचिक, मानसिक कर्मों, या सुख दुःख आदि अनुभवों) का मन अग्रगामी है, मन (उनका) प्रधान है, (कर्म) मनोमय हैं। जब (कोई) सदोष मनसे (बात) बोलता है, या (काम) करता है, तो

२ ] धमपदं [ १३ वाहन (बैल घोड़े) के पैरोंको जैसे (रथका) पहिया अनुगमन करता है (वैसेही) उसका दुःख अनुगमन करता है। श्रावस्ती मट्ठकुण्डली २-मनो पुब्बङ्गमा धम्मा मनोसेट्ठा मनोमया। मनसा चे पसन्नेन भासति वा करोति वा। ततो 'नं सुखमन्वेति छाया' व अनपायिनी ॥२॥ (मनःपूर्वङ्गमा धर्मा मनःश्रेष्ठा मनोमयाः। मनसा चेत् प्रसन्नेन भाषते वा करोति वा। तत एनं सुखमन्वेति छायेवानपायिनी ॥२॥ ) अनुवाद - सभी धर्मोंका मन अग्रगामी है, मन प्रधान है; (कर्म) मनोमय हैं। यदि (कोई) स्वच्छ मनसे बोलता या करता है, तो (कभी) न (साथ) छोडनेवाली छायाकी तरह सुख उसका अनुगमन करता है। श्रावस्ती (जेतवन) थुल्लतिस्स (थेर) ३-अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे। ये च तं उपनय्हन्ति वेरं तेसं न सम्मति ॥३॥ (अक्रोशीत् मां अबधीत् मां अजैषीत् मां अहार्षीत् मे। ये च तत् उपनह्यन्ति तेषां वैरं न शाम्यति ॥३॥) अनुवाद - 'मुझे गाली दिया', 'मुझे मारा', 'मुझे हरा दिया', 'मुझे लूट लिया' (ऐसा) जो (मनमें) बाँधते हैं, उनका वैर कभी शान्त नहीं होता।

१।६ ] यमकवग्गो [ ३ ४—अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे । ये तं न उपनय्हन्ति वेरं तेसूपसम्मति ॥४॥ ( अक्रोशीत् मां अवधीत् मां अजैषीत् मां अहार्षीत् मे । ये तत् नोपनह्यन्ति वैरं तेषूपशाम्यति ॥४॥ ) अनुवाद—'मुझे गाली दिया'० ( ऐसा ) जो ( मनमें ) नहीं रखते उनका वैर शान्त हो जाता है । श्रावस्ती ( जेतवन ) काली ( यक्खिनी ) ५—न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं । अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो ॥५॥ ( न हि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीह कदाचन । अवैरेण च शाम्यन्ति, एष धर्मः सनातनः ॥ ५ ॥ ) अनुवाद—यहाँ ( संसारमें ) वैरसे वैर कभी शान्त नहीं होता, अवैर से ही शान्त होता है, यही सनातन धर्म (=नियम ) है । श्रावस्ती ( जेतवन ) कोसम्बक भिक्खू ६—परे च न विजानन्ति मयमेत्थ यमामसे । ये च तत्थ विजानन्ति ततो सम्मन्ति मेधगा ॥६॥ ( परे च न विजानन्ति वयमत्र यंस्यामः । ये च तत्र विजानन्ति ततः शाम्यन्ति मेधगाः ॥ ६ ॥ ) अनुवाद—अन्य ( अज्ञ लोग ) नहीं जानते, कि हम इस ( संसार ) से जानेवाले हैं । जो इसे जानते हैं, फिर ( उनके ) मनके ( सभी विकार ) शान्त हो जाते हैं ।

४ ] धम्मपदं [ ११८ श्रावस्ती चुल्लकाल, महाकाल ७-सुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु असंवुतं । भोजनम्हि अमत्तञ्जुं कुसीतं हीनवीरियं । तं वे पसहति मारो वातो रुक्खं 'व दुब्बलं ॥७॥ ( शुभमनुपश्यन्तं विहरन्तं इन्द्रियेषु असंवृतम् । भोजनेऽमात्रज्ञं कुसीदं हीनवीर्यम् । तं वै प्रसहति मारो वातो वृक्षमिव दुर्बलम् ॥ ७ ॥ ) अनुवाद—( जो ) शुभ ही शुभ देखते विहरता है, इन्द्रियोंमें संयम न करनेवाला होता है, भोजनमें मात्राको नहीं जानता आलसी और उद्योगहीन होता है; उसे मार (=मनकी दुष्प्रवृत्तियाँ ) ( वैसे ही ) पीडित करता है, जैसे दुर्बल वृक्षको हवा । ८-असुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु सुसंवुतं । भोजनम्हि च मत्तञ्जुं सद्धं आरद्धवीरियं । तं वे नप्पसहति मारो वातो सेलं 'व पब्बतं ॥८॥ ( अशुभमनुपश्यन्तं विहरन्तं इन्द्रियेषु सुसंवृतम् । भोजने च मात्रज्ञं श्रद्धं आरब्धवीर्यम् । तं वै न प्रसहते मारो वातः शैलमिव पर्वतम् ॥ ८ ॥ ) अनुवाद—जो अशुभ देखते विहरता, इन्द्रियोंको सयम करता, भोजनमें मात्राको जानता, श्रद्धावान् तथा उद्योगी है, उसे शिलामय पर्वतको जैसे वायु नहीं हिला सकता, ( वैसेही ) मार नहीं ( हिला सकता ) ।

१।११ ] यमकवग्गो [ ५ सावत्थी ( जेतवन ) देवदत्त ९-अनिक्कसावो कासावं यो वत्थं परिदहेस्सति । अपेतो दमसच्चेन न स कासावमरहति ॥६॥ ( अनिष्कषायः काषायं यो वस्त्रं परिधास्यति । अपेतो दमसत्याभ्यां न स काषायमर्हति ॥ ९॥ ) अनुवाद—जो ( पुरुष ) ( राग, द्वेष आदि ) कषायों (=मलों ) को बिना छोड़े काषाय वस्त्रको धारण करेगा, वह संयम- सत्यसे परे हटा हुआ (है), और (वह) काषाय (धारण) करनेका अधिकारी नहीं है। १०-यो च वन्तकसावस्स सीलेसु सुसमाहितो । उपेतो दमसच्चेन स वे कासावमरहति ॥१०॥ ( यश्च वान्तकषायः स्यात् शीलेषु सुसमाहितः । उपेतो दम-सत्याभ्यां स वै काषायमर्हति ॥ १०॥ ) अनुवाद—जिसने कषायोंको वमन कर दिया है, जो आचार (=शील) से सुसम्पन्न, तथा संयम-सत्यसे सयुक्त है, वही काषाय (वस्त्र) का अधिकारी है। राजगृह ( वेणुवन ) संजय ११-असारे सारमतिनो सारे चासारदस्सिनो । ते सारं नाधिगच्छन्ति मिच्छासङ्कप्पगोचरा ॥११॥ ( असारे सारमतयः सारे चासारदर्शिनः । ते सारं नाधिगच्छन्ति मिथ्यासङ्कल्पगोचराः ॥ ११॥ )

६ ] धम्मपदं [ १।१४ अनुवाद—जो असारको सार समझते हैं, और सारको असार; वह झूठे संकल्पोंमें सलग्न (पुरुष) सारको नहीं प्राप्त करते हैं। १२—सारञ्च च सारतो ञत्वा असारञ्च असारतो । ते सारं अधिगच्छन्ति सम्मासङ्कप्पगोचरा ॥१२॥ (सारं च सारतो ज्ञात्वा, असारं च असारतः । ते सारं अधिगच्छन्ति सम्यक्-सङ्कल्प-गोचराः ॥ १२ ॥ ) अनुवाद—जो सारको सार जानते हैं, और असार को असार; वह सच्चे सङ्कल्पमें संलग्न (पुरुष) सारको प्राप्त करते हैं। श्रावस्ती (जेतवन) नन्द (थेर) १३-यथागारं दुच्छन्नं वुट्ठी समतिविज्झति । एवं अभावितं चित्तं रागो समतिविज्झति ॥१३॥ (यथागारं दुश्छन्नं वृष्टिः समतिविध्यति । एवं अभावितं चित्तं रागः समतिविध्यति ॥१३॥ ) अनुवाद—जैसे ठीकसे न छाये घरमें वृष्टि घुस जाती है। वैसे ही अभावित ( = न संयम किये) चित्तमें राग घुस जाता है। १४-यथागारं सुच्छन्नं वुट्ठी न समतिविज्झति । एवं सुभावितं चित्तं रागो न समतिविज्झति ॥ १४॥ (यथागारं सुच्छन्नं वृष्टिर्न समतिविध्यति । एवं सुभावितं चित्तं रागो न समतिविध्यति ॥ १४॥ ) अनुवाद—जैसे ठीकसे छाये घरमें वृष्टि नहीं घुसती, वैसे ही सुभावित चित्तमें राग नहीं घुसता ।

१।१६ ] यमकवग्गो [ ७ राजगृह ( वेणुवन ) चुन्द ( सूकरिक ) १५-इध सोचति पेच्च सोचति पापकारी उभयत्थ सोचति । सो सोचति सो विहञ्‍ञति दिस्वा कम्मकिलिट्ठमत्तनो ॥ १५॥ ( इह शोचति प्रेत्य शोचति पापकारी उभयत्र शोचति । स शोचति स विहन्यते दृष्ट्वा कर्म क्लिष्टमात्मनः ॥१५॥ ) अनुवाद—यहाँ ( इस लोकमें ) शोक करता है, मरनेके बाद शोक करता है, पाप करनेवाला दोनों ( लोक ) में शोक करता है । वह अपने मलिन कर्मोंको देखकर शोक करता है, पीड़ित होता है । श्रावस्ती ( जेतवन ) धम्मिक ( उपासक ) १६-इध मोदति पेच्च मोदति कतपुञ्‍ञो उभयत्थ मोदति । सो मोदति सो पमोदति दिस्वा कम्मविसुद्धिमत्तनो ॥१६॥ ( इह मोदते प्रेत्य मोदते कृतपुण्य उभयत्र मोदते । स मोदते स प्रमोद्ते दृष्ट्वा कर्मविशुद्धिमात्मनः ॥१६॥ ) अनुवाद—यहाँ प्रमुदित होता है, मरनेके बाद प्रमुदित होता है, जिसने पुण्य किया है, वह दोनों ही जगह प्रमुदित होता, है । वह अपने कर्मोंकी शुद्धताको देखकर मुदित होता है, प्रमुदित होता है ।

८ ] धम्मपदं [ १।१८ श्रावस्ती ( जेतवन ) देवदत्त १७-इध तप्पति पेच्च तप्पति , पापकारी उभयत्थ तप्पति । पापं मे कतन्ति तप्पति , भीय्यो तप्पति दुग्गतिङ्गतो ॥१७॥ ( इह तप्यति प्रेत्य तप्यति पापकारी उभयत्र तप्यति । पापं मे कृतमिति तप्यति, भूयस्तप्यति दुर्गतिंगतः ॥१७॥ ) अनुवाद—यहाँ सन्तप्त होता है, मरकर सन्तप्त होता है, पापकारी दोनों जगह सन्तप्त होता है । "मैंने पाप किया है"—यह ( सोच ) सन्तप्त होता है , दुर्गति को प्राप्त हो और भी सन्तप्त होता है । श्रावस्ती ( जेतवन ) सुमना देवी १८-इध नन्दति पेच्च नन्दति , कतपुञ्ञो उभयत्थ नन्दति । पुञ्ञं मे कतन्ति नन्दति , भीय्यो नन्दति सुगतिंगतः ॥ १८॥ ( इह नन्दति प्रेत्य नन्दति कृतपुण्य उभयत्र नन्दति । पुण्यं मे कृतमिति नन्दति, भूयो नन्दति सुगतिंगतः ॥१८॥ ) अनुवाद—यहाँ आनन्दित होता है, मरकर आनन्दित होता है । जिसने पुण्य किया है, वह दोनों जगह आनन्दित होता है । "मैंने पुण्य किया है"—यह ( सोच ) आनन्दित होता है ; सुगति को प्राप्त हो और भी आनन्दित होता है ।

१।२० ] यमकवग्गो [ ९ श्रावस्ती ( जेतवन ) दो मित्र भिक्षु १६—बहुंपि चे संहितं१ भासमानो , न तक्करो होति नरो पमत्तो । गोपो 'व गावो गणयं परेसँ , न भागवा सामञ्ञस्स होति ॥१६॥ ( बह्वीमपि संहितां भाषमाणः, न तत्करो भवति नरः प्रमत्तः । गोप इव गा गणयन् परेषां, न भागवान् श्रामण्यस्य भवति ॥१९॥ अनुवाद—चाहे कितनी ही संहिताओ (=धर्मग्रंथो ) का उच्चारण करे, किन्तु प्रमादी बन, (जो) नर उसके (अनुसार ) (आचरण) करनेवाला नहीं होता ; (वह) दूसरेकी गायोको गिननेवाले ग्वालेकी भाँति श्रमणपन (=संन्यासी- पन ) का भागी नहीं होता । २०—अप्पम्पि चे संहितं भासमानो , धम्मस्स होति अनुधम्मचारी । रागञ्च दोसञ्च पहाय मोहं , सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो । अनुपादियानो इध वा हुरं वा , स भागवा सामञ्ञस्स होति ॥२०॥ १ संहित ।

१. यमकवग्गो (यमक वर्ग)

१० ] धम्मपदं [ १।२० ( अल्पामपि संहितां भाषमाणो धर्मस्य भवत्यनुधर्मचारी । रागं च द्वेषं च प्रहाय मोहं सम्यक् प्रजानन् सुविमुक्तचित्तः। अनुपादान इह वाऽमुत्र वा, स भागवान् श्रामण्यस्य भवति ॥२०॥) अनुवाद-चाहे अल्पमात्र ही सहिताका भाषण करे, किन्तु यदि वह धर्मके अनुसार आचरण करनेवाला हो, राग, द्वेष, और मोहको त्यागकर, अच्छी प्रकार सचेत और अच्छी प्रकार मुक्तचित्त हो, यहाँ और वहाँ (दोनों जगह) बटोरनेवाला न हो; (तो) वह श्रमणपनका भागी होता है । १-यमकवर्ग समाप्त

२—अप्पमादवग्गो कौशाम्बी (घोषिताराम) - सामावती (रानी) २१—अप्पमादो अमत-पदं पमादो मच्चुनो पदं । अप्पमत्ता न मीयन्ति ये पमत्ता यथा मता ॥१॥ ( अप्रमादोऽमृतपदं प्रमादो मृत्योः पदम् । अप्रमत्ता न म्रियन्ते ये प्रमत्ता यथा मृताः ॥१॥ ) २२-एतं विसेसतो ञत्वा अप्पमादम्हि पण्डिता । अप्पमादे पमोदन्ति अरियानं गोचरे रता ॥२॥ ( एवं विशेषतो ज्ञात्वाऽप्रमादे, पण्डिताः । अप्रमादे प्रमोद्न्त आर्याणां गोचरे रताः ॥२॥ ) २३-ते झायिनो साततिका निच्चं दळ्ह-परक्कमा । फुसन्ति धीरा निब्वाणं योगक्खेमं अनुत्तरं ॥३॥ ( ते ध्यायिनः साततिका नित्यं दृढपराक्रमाः । स्पृशन्ति धीरा निर्वाणं योगक्षेमं अनुत्तरम् ॥३॥ ) [ ११