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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत् वस्तुतत्त्वं निःष्यन्दमाना महतां कवीनां भारती अलोकसामान्यं प्रतिभाविशेषं परिस्फुरन्तमभिव्यनक्ति । येनास्मिन्नतिविचित्रकविपर- म्परावाहिनि संसारे कालिदासप्रभृतयो द्वित्राः पञ्चषा वा महाकवय इति गण्यन्ते । इदं चापरं प्रतीयमानस्यार्थस्य सद्भावसाधनं प्रमाणम्— शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते । वेद्यते स तु काव्यार्थतत्त्वज्ञैरेव केवलम् ॥ ७ ॥ उस वस्तुतत्त्व को प्रवाहित करती हुई महान् कवियों की सरस्वती (वाणी) परिस्फुरित होते हुए अलोकसामान्य प्रतिभा-विशेष को अभिव्यक्त करती है। जिससे अतिविचित्र कवियों की परम्परा से युक्त इस संसार में कालिदास प्रभृति दो-तीन अथवा पाँच-छः महाकवि गिने जाते हैं। और यह दूसरा प्रतीयमान अर्थ के सद्भाव का साधन प्रमाण है— केवल शब्द-अर्थ के शासनों (नियमों) के ज्ञानमात्र से नहीं जाना जाता है, बल्कि केवल वह तो काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ लोगों द्वारा ही जाना जाता है ॥ ७ ॥ लोचनम् ‘विशेषो’ रसावेशवैशद्यसौन्दर्य काव्यनिर्माणक्षमत्वम् । यदाह मुनिः—‘कवेर- न्तर्गतं भावम्’ इति । येनेति । अभिव्यक्तेन स्फुरता प्रतिभाविशेषेण निमित्तेन महाकवित्वगणनेति यावत् ॥ ६ ॥ इदं चेति । न केवलं ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव’ इत्येतत्कारिकासूचितौ स्वरूप- विषयभेदावेव; यावद्भिन्नसामग्रीवेद्यत्वमपि वाच्यातिरिक्तत्वे प्रमाणमिति यावत् । वेद्यत इति । न तु न वेद्यते, येन न स्यादसाविति भावः । काव्यस्य तत्त्वभूतो योऽर्थस्तस्य भावना वाच्यातिरेकेणानवरतचर्वणा तत्र विमुखानाम् । उत्पन्न वैशद्यप्रयुक्त सौन्दर्य रूप काव्य-निर्माण की क्षमता है। जैसा कि मुनि ने कहा है—‘कवि के अन्तर्गत भाव को।' जिससे—। मतलब यह कि अभिव्यक्त या स्फुरित होते हुए प्रतिभा विशेष रूप निमित्त से महाकवित्व की गणना (कहाकवियों में गणना) होती है। और यह—। न केवल ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव' इस कारिका से सूचित स्वरूप और विषयगत भेद, बल्कि भिन्न सामग्री द्वारा वेद्यत्व भी (प्रतीयमान = व्यङ्ग्य के) वाच्य से अतिरिक्त (पृथक्) होने में प्रमाण है। जाना जाता है—। भाव यह कि न कि नहीं जाना जाता है जिससे वह नहीं होता। काव्य का तत्त्वभूत जो अर्थ उसकी भावना, वाच्य के अतिरेकपूर्वक निरन्तर चर्वणा उसमें विमुख। स्वर, षड्ज

प्रथम उद्योतः ९५ ध्वन्यालोकः सोऽर्थो यस्मात्केवलं काव्यार्थतत्त्वज्ञैरेव ज्ञायते । यदि च वाच्यरूप एवासावर्थः स्यात्तद्वाच्यवाचकरूपपरिज्ञानादेव तत्प्रतीतिः स्यात् । अथ च वाच्यवाचक लक्षणमात्रकृतश्रमाणां काव्यतत्त्वार्थभाव- नाविमुखानां स्वरश्रुत्यादिलक्षणमिवाऽप्रगीतानां गान्धर्वलक्षणविदाम- गोचर एवासावर्थः । वह अर्थ जिस कारण काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ लोगों द्वारा ही जाना जाता है। और, यदि वह अर्थ वाच्यरूप ही होता तो वाच्य और वाचक के रूप के परिज्ञान से ही उसकी प्रतीति होती । और भी, वाच्य-वाचक के लक्षणमात्र में जिन्होंने श्रम किया है तथा काव्यतत्त्वार्थ की भावना से पराङ्मुख हैं उनके लिए यह अर्थ, गाने में असमर्थ किन्तु सङ्गीतशास्त्र (गान्धर्व) के लक्षणों को जाननेवालों के लिए स्वर और श्रुति आदि के तत्त्व की भाँति, अगोचर ही है। लोचनम् स्वराः षड्जादयः सप्त । श्रुतिर्नाम शब्दस्य वैलक्षण्यमात्रकारि यद्रूपान्तरं तत्परिमाणा स्वरतदन्तरालोभयभेदकल्पिता द्वाविंशतिविधा । आदिशब्देन जात्यंशकग्रामरागभाषाविभाषान्तरभाषादेशीमार्गा गृह्यन्ते । प्रकृष्टं गीतं गानं येषां ते प्रगीताः, गातुं वा प्रारब्धा इत्यादिकर्मणि क्तः । प्रारम्भेण चात्र फलप- र्यन्तता लक्ष्यते ॥ ७ ॥ आदि सात । शब्द का वैलक्षण्यकारी जो रूपान्तर है उसके परिमाण की ‘श्रुति’ होती है वह स्वर, स्वरान्तराल, और उभय के भेद से बाईस¹ प्रकार की होती है । ‘आदि’ शब्द से जात्यंश,² ग्राम, राग, भाषा, विभाषा, अन्तरभाषा, देशी मार्ग गृहीत होते हैं। प्रकृष्ट गीत या गान है जिनका वे ‘प्रगीत’ हैं अथवा गाने के लिए ‘प्रारब्ध’ इस प्रकार ‘आदिकर्म’ में ‘क्त’ प्रत्यय है। यहाँ ‘प्रारम्भ’ से फलपर्यन्तता लक्षित होती है। १. मूल में ‘अप्रगीत’ और ‘प्रगीत’ दोनों पाठ हैं। लोचनकार ने दोनों के अनुसार व्याख्यान किया है; ‘अप्रगीत’ का अर्थ करते हैं कि वे लोग प्रगीत नहीं अर्थात् प्रकृष्ट गान नहीं करते हैं । ‘प्रगीत’ का व्याख्यान है कि जिन्होंने गान का प्रारम्भ ही किया है अर्थात् जो अभी गाने में सफल नहीं हैं । स्पष्टार्थ यह कि जिस प्रकार गान-विद्या में निपुणता हासिल कर लेने वाला यदि गान का अभ्यास न करने पर स्वर और श्रुति आदि के तत्त्वों से अपरिचित रहता है उसी प्रकार केवल वाच्य-वाचक मात्र में श्रम करने वाले तथा काव्यतत्त्वार्थ की भावना से विमुख लोग उस प्रतीयमान अर्थ को नहीं समझ सकते । स्वर और श्रुति आदि सङ्गीत-शास्त्रीय तत्त्वों का विशकलन ग्रन्थान्तर से अवगत करना चाहिए । ‘सङ्गीतरत्नाकर’ में इनका विवेचन विशद रूप से मिलता है।

९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एवं वाच्यव्यतिरेकिणो व्यङ्ग्यस्य सद्भावं प्रतिपाद्य प्राधान्यं तस्यैवेति दर्शयति— इस प्रकार वाच्य से व्यतिरेक ( पार्थक्य ) रखनेवाले व्यङ्ग्य का सद्भाव प्रतिपादन करके 'प्राधान्य उसका ही है' यह दिखलाते हैं— लोचनम् एवमिति । स्वरूपभेदेन भिन्नसामग्रीज्ञेयत्वेन चेत्यर्थः । प्रत्यभिज्ञेयावि- त्याहार्थे कृत्यः, सर्वो हि तथा यतते इतीयता प्राधान्ये लोकसिद्धत्वं प्रमाण- मुक्तम् । नियोगाथेन च कृत्येन शिक्षाक्रम उक्तः । प्रत्यभिज्ञेयशब्देनेदमाह— 'काव्यं तु जातु जायेत कस्यचित्प्रतिभावतः ।' इस प्रकार— । अर्थात् स्वरूप-भेद और भिन्न सामग्री द्वारा ज्ञेय होने के कारण । 'प्रत्यभिज्ञेय' यहाँ अहार्थ में 'कृत्य' प्रत्यय हुआ है, सब लोग इस अंश में प्रयत्न करते हैं, 'सहृदयों द्वारा प्रत्यभिज्ञेय है' इतने से व्यङ्ग्य के प्राधान्य के सम्बन्ध में लोकसिद्धत्व को प्रमाण कहा है । नियोगाथक 'कृत्य' प्रत्यय द्वारा शिक्षा का क्रम सूचित किया है ।' 'प्रत्यभिज्ञेय' शब्द से यह कहते हैं— 'काव्य तो कदाचित् किसी प्रतिभावान् से उत्पन्न होता है ।' १. 'उन अर्थ और शब्द महाकवि के प्रत्यभिज्ञेय हैं' आचार्य के इस कथन का एक अभिप्राय यह भी हो सकता है कि सहृदय लोगों द्वारा महाकवि के शब्द-अर्थ प्रत्यभिज्ञेय या पहचानने योग्य हैं और दूसरा यह भी हो सकता है कि महाकवि को स्वयं उन्हीं शब्द-अर्थ का प्रत्यभिज्ञान करना चाहिए । 'प्रत्यभिज्ञेय' 'अर्हार्थ' में 'कृत्य' प्रत्यय मानने पर प्रथम पक्ष के अनुकूल व्याख्यान होगा । इसलिए लोचनकार ने यहाँ यह अर्थ उद्भावित किया है कि व्यङ्ग्य अर्थ का प्राधान्य इसलिए है कि सभी लोग उस प्रकार के शब्द अर्थ के ज्ञान की इच्छा से प्रयत्न करते हैं । इस प्रकार तथाविध अर्थ और शब्द के प्राधान्य में लोकसिद्धत्व यह प्रमाण या हेतु कहा गया । किसी भी अप्रधान वस्तु के लिए लोकप्रवृत्ति नहीं होती । यहाँ 'लोक' शब्द से 'सहृदय' ही समझना चाहिए । दूसरे अभिप्राय के अनुसार यहाँ कृत्य-प्रत्यय नियोगाथक है । अर्थात् आचार्य कवियों को यह शिक्षा देते हैं कि उन्हें पूर्वोक्त' शब्द-अर्थ का प्रत्यभिज्ञान करना चाहिए । क्योंकि जैसा वृत्तिग्रन्थ भी निर्देश करता है कि व्यङ्ग्य अर्थ और व्यञ्जक शब्द का ही सुप्रयोग करके महाकवि महाकवि बनता है अतः उसके लिए उनका प्रत्यभिज्ञान अनिवार्य है । २. 'प्रत्यभिज्ञेय'—लोचनकार की दृष्टि में ग्रन्थकार का यह प्रयोग विशेष तात्पर्य रखता है । ग्रन्थकार का कहना है कि शब्द अर्थ जो सामान्य रूप से व्यवहार में विदित होते हैं उन्हें काव्य के क्षेत्र में उसी रूप में नहीं जानना चाहिए । यद्यपि 'प्रत्यभिज्ञान' ज्ञात वस्तु का ही पुनः ज्ञान होता है, तथापि यहाँ ज्ञान का विशेष रूप से अनुसन्धान को ही 'प्रत्यभिज्ञान' से समझना चाहिए । जब तक लोकव्यवहार की स्थिति है, शब्द-अर्थ अपने साधारण रूप से होते हैं किन्तु काव्य के क्षेत्र में उनकी सीमा का विस्तार हो जाता है और उनका स्वरूप भी बहुत कुछ निखर जाता है अतः केवल ज्ञात का पुनः ज्ञान न करके ज्ञात का पुनः पुनः अनुसन्धान रूप विशेष निरूपण या प्रत्यभिज्ञान करना चाहिए । यह प्रतिभावान् महाकवि के लिए उतना ही अपेक्षित है जितना सहृदय के लिए । लोचनकार ने प्रस्तुत वक्तव्य को अपने रंग में ढालते हुए

प्रथम उद्योतः ९७ ध्वन्यालोकः सोऽर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी शब्दश्च कश्चन । यत्नतः प्रत्यभिज्ञेयौ तौ शब्दार्थौ महाकवेः ॥ ८ ॥ व्यङ्ग्योऽर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी शब्दश्च कश्चन, न शब्दमात्रम् । तावेव शब्दार्थौ महाकवेः प्रत्यभिज्ञेयौ । व्यङ्ग्यव्यञ्जकाभ्यामेव सुप्रयु- क्ताभ्यां महाकवित्वलाभो महाकवीनां, न वाच्यवाचकरचनामात्रेण । 'वह अर्थ है और उसकी अभिव्यक्ति की सामर्थ्य रखनेवाला कोई शब्द है। वे शब्द और अर्थ महाकवि के यत्नपूर्वक प्रत्यभिज्ञेय हैं' ॥ ८ ॥ व्यंग्य अर्थ है और उसकी अभिव्यक्ति की सामर्थ्य रखनेवाला कोई शब्द है, न कि शब्दमात्र । वे ही शब्द-अर्थ महाकवि के प्रत्यभिज्ञान के योग्य हैं। क्योंकि, व्यंग्य और व्यंजक के ही सुन्दर ढङ्ग से प्रयोग करने पर महाकवियों को महाकवित्व का लाभ है, न कि वाच्य-वाचक-रचनामात्र से ॥ ८ ॥ लोचनम् इति नयेन यद्यपि स्वयमस्यैतत्परिसफुरति, तथापीदमित्थमिति विशेषतो निरूप्यमाणं सहस्रशाखीभवति । यथोक्तमस्मत्परमगुरुभिः श्रीमदुत्पलपादैः— तैस्तैरप्युपयाचितैरुपगतस्तन्व्याः स्थितोऽप्यन्तिके कान्तो लोकसमान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा । लोकस्यैष तथानवेक्षितगुणः स्वात्मापि विश्वेश्वरो नैवालं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता ॥ इति ॥ तेन ज्ञातस्यापि विशेषतो निरूपणमनुसन्धानात्मकमत्र प्रत्यभिज्ञानं, न तु तदेवेदमित्येतावन्मात्रम् । महाकवेरिति। यो महाकविरहं भूयासमित्याशास्ते। इस न्याय से यद्यपि स्वयं उसे (कवि को) यह स्फुरित होता है, तथापि 'यह इत्थं है' इस प्रकार विशेष रूप से निरूपण करने पर हजारों शाखाओं का हो जाता है । जैसा कि हमारे परमगुरु श्रीमदुत्पलपाद ने कहा है— 'अपरिज्ञात एवं उन-उन प्रार्थनाओं द्वारा कृशाङ्गी के समीप में आया हुआ भी कान्त साधारण व्यक्ति के समान जिस प्रकार रमणकार्य नहीं कर पाता उस प्रकार जिसके गुण पहले नहीं देखे गए हैं ऐसा स्वात्मरूप भी विश्वेश्वर लोक के (समक्ष) अपना वैभव (विकास) नहीं कर पाता; इस कारण यह उसकी प्रत्यभिज्ञा बताई गई है।' इस लिए ज्ञात का भी विशेष रूप से अनुसन्धानात्मक निरूपण यह 'प्रत्यभिज्ञान' पदार्थ है, न कि 'वही यह है' केवल इतना ही । महाकवि के—। जो आशा करता है अपने गुरु श्रीमदुत्पलाचार्य का जो श्लोक उद्धृत किया है। कल्पना कीजिए कि कोई नायिका किसी व्यक्ति को बिना देखे ही उसके रूप का वर्णन सुन कर अपना 'प्रिय' मान लेती है और ७ ध्व०

९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इदानीं व्यङ्ग्यव्यञ्जकयोः प्राधान्येऽपि यद्वाच्यवाचकावेव प्रथम- मुपाददते कवयस्तदपि युक्तमेवेत्याह— आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्नवाञ्जनः । तदुपायतया तद्वदर्थे वाच्ये तदादृतः ॥ ९ ॥ अब जो कि व्यंग्य और व्यंजक के प्राधान्य में भी कवि लोग पहले वाच्य और वाचक का ही उपपादन करते हैं वह भी ठीक ही है, यह कहते हैं— जिस प्रकार आलोक चाहनेवाला व्यक्ति उसका उपाय होने के कारण दीपशिखा के लिए यत्न करता है, उसी प्रकार उस (व्यंग्य अर्थ) के प्रति आदरयुक्त जन वाच्य अर्थ के लिए यत्न करता है ॥ ९ ॥ लोचनम् एवं व्यङ्ग्यस्यार्थस्य व्यञ्जकस्य शब्दस्य च प्राधान्यं वदता व्यङ्ग्यव्यञ्जक- भावस्यापि प्राधान्यमुक्तमिति ध्वनति, ध्वन्यते, ध्वननमिति त्रितयमप्युपपन्न- मित्युकम् ॥ ८ ॥ ननु प्रथमोपादीयमानत्वाद्वाच्यवाचकतद्भावस्यैव प्राधान्यमित्याशङ्क्योपा- यानामेव प्रथममुपादानं भवतीत्यभिप्रायेण विरुद्धोऽयं प्राधान्ये साध्ये हेतुरिति दर्शयति-इदानीमित्यादिना । आलोकनमालोकः; वनितावदनारविन्दादिविलो- कनमित्यर्थः । तत्र चोपायो दीपशिखा ॥ ९ ॥ कि मैं महाकवि होऊं । इस प्रकार व्यङ्ग्य अर्थ और व्यञ्जक शब्द का प्राधान्य कहते हुए व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव (व्यञ्जना व्यापार) का भी प्राधान्य सूचित किया । इस तरह 'ध्वनन करता है', 'ध्वनित होता है' और 'ध्वनन' ये तीनों उपपन्न हो जाते हैं, यह कहा गया । प्रथम उपादीयमान होने के कारण वाच्य, वाचक और उनके व्यापार (भाव) का ही प्राधान्य है, यह आशङ्का करके उपायों का ही पहले प्राधान्य होता है, इस अभिप्राय से प्राधान्य रूप साध्य में यह हेतु (प्रथमोपादीयमानत्व रूप) पत्र-लेखनादि उपायों द्वारा उसे अपने पास बुलाने के लिए प्रयत्नशील रहती हैं । अकस्मात् वह कान्त उसके समक्ष पहुँच आता है । ऐसी स्थिति में क्या सम्भव है कि नायिका उसके साथ रमण करे ? नहीं । क्योंकि जब तक नायिका को यह विशेष रूप से ज्ञान नहीं हो जाता कि जिस व्यक्ति के मिलन के लिए वह बहुत दिनों से प्रयत्न कर रही है वहीं यह उपस्थित है तब तक वह व्यक्ति उसके लिए अन्य साधारण व्यक्ति के समान ही रहता है । यही बात आध्यात्मिक क्षेत्र में भी है कि ईश्वर आत्मा से अभिन्न होकर भी अपना विशेष रूप से प्रत्यभिज्ञान न किए जाने पर अपना वैभव नहीं प्रकट करता । यह यहाँ ज्ञातव्य है कि आचार्य अभिनवगुप्त 'प्रत्यभिज्ञा- दर्शन' के परममान्य आचार्य हैं अतः स्वाभाविक है कि उनके प्रायः प्रस्तुत साहित्यिक विवेचनों में उनके दार्शनिक सिद्धान्त का भी प्रभाव पड़ा है ।

प्रथम उद्योतः ९९ ध्वन्यालोकः यथा ह्यालोकार्थी सन्नपि दीपशिखायां यत्नवाञ्जनो भवति तदुपाय- तया । न हि दीपशिखामन्तरेणालोकः सम्भवति । तद्वद्व्यङ्ग्यार्थं प्रत्यादृतो जनो वाच्येऽर्थे यत्नवान् भवति । अनेन प्रतिपादकस्य कवेर्व्यङ्ग्यार्थं प्रति व्यापारो दर्शितः ॥ ९ ॥ प्रतिपाद्यस्यापि तं दर्शयितुमाह— यथा पदार्थद्वारेण वाक्यार्थः सम्प्रतीयते । वाच्यार्थपूर्विका तद्वत्प्रतिपत्तस्य वस्तुनः ॥ १० ॥ जैसे प्रकाश को चाहने वाला होता हुआ भी व्यक्ति दीपशिखा के लिए उस ( आलोक ) का उपाय होने के कारण यत्नवान् होता है, क्योंकि दीपशिखा के विना आलोक सम्भव नहीं, उसी प्रकार व्यंग्य अर्थ के प्रति आदरयुक्त जन वाच्य अर्थ में यत्नवान् होता है । इससे प्रतिपादक ( वक्ता ) कवि का व्यंग्य अर्थ के प्रति व्यापार दिखाया ॥ ९ ॥ प्रतिपाद्य के भी उस ( व्यापार ) को दिखाने के लिए कहते हैं— जिस प्रकार पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ प्रतीत किया जाता है उसी प्रकार उस वस्तु की प्रतिपत् ( प्रतीति ) वाच्यार्थपूर्विका होती है ॥ १० ॥ लोचनम् प्रतिपदिति भावे क्विप् । 'तस्य वस्तुन' इति व्यङ्ग्यरूपस्य सारस्येत्यर्थः । अनेन श्लोकेनात्यन्तसहृदयो यो न भवति तस्यैष स्फुटसंवेद्य एव क्रमः । विरुद्ध¹ है यह दिखाते हैं—अव इत्यादि द्वारा । आलोकन ( देखना ) आलोक है, अर्थात् वनिता के मुखारविन्द आदि का विलोकन । उसके लिए उपाय दीपशिखा है ॥९॥ 'प्रतिपत्'² इसमें भाव में 'क्विप्' प्रत्यय है । 'उस वस्तु की' अर्थात् व्यङ्ग्य रूप १. आशङ्का होती है कि जब वाच्य, वाचक और अभिधा व्यापार का पहले उपादान किया जाता है तब इसी कारण क्यों नहीं इन्हें ही प्रधान मानते हैं ? व्यङ्ग्य के प्राधान्य का पक्ष इस प्रकार ठीक नहीं । इसके समाधान में यह कहना है कि जो आप प्रथम उपादान को प्राधान्य का हेतु मानते हैं वह विरुद्ध है, अर्थात् इस हेतु द्वारा अप्राधान्य भी सिद्ध हो जाता है। मतलब यह कि किसी वस्तु को प्रधान इस लिए माना नहीं जा सकता कि उसका उल्लेख पहले होता है । तब तो जो उपाय होता है वह उपेय से पहले उल्लिखित होता है, ऐसी स्थिति में आप उपाय को भी प्रधान कहेंगे ! प्रस्तुत में वाच्य-वाचक-भाव भी प्रधानभूत व्यङ्ग्य-व्यञ्जक-भाव के उपाय हैं अतः उनका पहले उपादान होता है। इस प्रकार प्रथम उपादान मात्र से उन्हें प्रधान नहीं कहा जा सकता । जिस प्रकार आदमी जब किसी वस्तु को रात्रि में देखना चाहता है तब वह दीपशिखा के लिए यत्नवान् होता है । इस प्रकार दीपशिखा प्रथम उपादीयमान होने पर भी उपेयभूत वस्तु के दर्शन का उपाय होने के कारण अप्रधान है । २. निर्णयसागरीय संस्करण में 'प्रतिपत्तव्यस्य' पाठ माना है, किन्तु 'लोचन' के प्रस्तुत

१०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा हि पदार्थद्वारेण वाक्यार्थावगमस्तथा वाच्यार्थप्रतीतिपूर्विका व्यङ्ग्यस्यार्थस्य प्रतिपत्तिः ॥ १० ॥ इदानीं वाच्यार्थप्रतीतिपूर्वकत्वेऽपि तत्प्रतीतेर्व्यङ्ग्यस्यार्थस्य प्राधान्यं यथा न व्यालुप्यते तथा दर्शयति— जिस प्रकार पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ का अवगम होता है उसी प्रकार व्यंग्य अर्थ की प्रतिपत्ति वाच्यार्थप्रतीतिपूर्विका होती है ॥ १० ॥ अब, उस (व्यंग्य) की प्रतीति के वाच्यार्थप्रतीतिपूर्वक होने पर भी, व्यंग्य अर्थ का प्राधान्य जिस प्रकार व्यालुप्त नहीं होता, वह दिखाते हैं— लोचनम् यथात्यन्तशब्दवृत्तज्ञो यो न भवति तस्य पदार्थवाक्यार्थक्रमः । काष्ठाप्राप्तसहृ- दयभावस्य तु वाक्यवृत्तकुशलस्येव सन्नपि क्रमोऽभ्यस्तानुमानाविनाभावस्मृ- त्यादिवदसंवैद्य इति दर्शितम् ॥ १० ॥ न व्यालुप्यत इति । प्राधान्यादेव तत्पर्यन्तानुसरणरणरणकत्वरिता मध्ये विश्रान्तिं न कुर्वत इति क्रमस्य सतोऽप्यलक्ष्णं प्राधान्ये हेतुः । स्वसामर्थ्य- सार पदार्थ की। इस श्लोक से यह दिखाया कि जो व्यक्ति अत्यन्त सहृदय नहीं है उसके लिए यह क्रम स्फुट संवेद्य है। जिस प्रकार जो व्यक्ति अत्यन्त शब्दवृत्तज्ञ (वाक्य को जानने वाला) नहीं है उसके लिए पदार्थ और वाक्यार्थ का क्रम है। और जो सहृदयता की काष्ठा (उत्कर्ष) तक पहुंचा है, उस वाक्यवृत्त-कुशल पुरुष की भाँति होता हुआ भी क्रम उस प्रकार असंवेद्य है जिस प्रकार अनुमान, व्याप्तिस्मृति आदि के अभ्यस्त व्यक्ति के लिए ॥ १० ॥ व्यालुप्त नहीं होता—। प्राधान्य के कारण ही उस (व्यङ्ग्य अर्थ) तक अनुसरण के रणरणक (औत्सुक्य) से त्वरित हुए (सहृदय लोग) बीच में विश्राम निर्देश से वह प्रामादिक समझना चाहिए। दूसरे यदि निर्णयसागरीय पक्ष को ही मानते हैं तो मूल कारिका में ‘वाच्यार्थपूर्विका’ इस विशेषण के लिए ‘प्रतिपत्तिः’ इस विशेषण के आक्षेप का गौरव करना पड़ता है। १. नियमतः पदार्थ के ज्ञान के द्वारा वाक्यार्थ का ज्ञान होता है अर्थात् पहले पदार्थ का ज्ञान होता है तब वाक्यार्थ का यह क्रम है। किन्तु जो व्यक्ति वाक्यवृत्तकुशल है उसे यह क्रम स्पष्ट रूप से संवेद्य नहीं होता है। उसी प्रकार पहले वाच्य अर्थ की प्रतीति होती है और तब व्यङ्ग्य अर्थ की, यह क्रम है। किन्तु जो अत्यन्त सहृदय व्यक्ति है उसे यह क्रम नहीं प्रतीत होता है। इस लिए आगे ध्वनि को ‘असंलक्ष्यक्रम’ भी कहा गया है। अनुमान आदि में भी जिसे विषय का अभ्यास होता है उसे व्याप्तिस्मृति और अनुमिति का क्रम स्पष्ट ज्ञात नहीं होता। ‘संकेत’-ज्ञान और ‘अर्थ’ ज्ञान के क्रम के सम्बन्ध में भी यही बात है।

प्रथम उद्योतः १०१ ध्वन्यालोकः स्वसामर्थ्यवशेनैव वाक्यार्थं प्रतिपादयन् । यथा व्यापारनिष्पत्तौ पदार्थो न विभाव्यते ॥ ११ ॥ यथा स्वसामर्थ्यवशेनैव वाक्यार्थं प्रकाशयन्नपि पदार्थो व्यापार- निष्पत्तौ न भाव्यते विभक्ततया ॥ ११ ॥ अपनी सामर्थ्य के वश ही वाक्यार्थ का प्रतिपादन करता हुआ पदार्थ जिस प्रकार व्यापार के निष्पन्न ( पूर्ण ) हो जाने पर विभावित नहीं होता ( अलग प्रतीत नहीं होता ) ॥ ११ ॥ जिस प्रकार अपनी सामर्थ्य के वश ही वाक्यार्थ को प्रकाशित करता हुआ भी पदार्थ व्यापार की निष्पत्ति की स्थिति में विभक्तरूप से भावित ( प्रतीत ) नहीं होता । लोचनम् माकाङ्क्षायोग्यतासन्निधयः । विभाव्यत इति । विशब्देन विभक्ततोक्ता; विभक्त- तया न भाव्यत इत्यर्थः । अनेन विद्यमान एव क्रमो न संवेद्यत इत्युक्तम् । तेन यत्स्फोटाभिप्रायेणासन्नेव क्रम इति व्याचक्षते तत्प्रत्युत विरुद्धमेव । वाच्येऽर्थे विमुखो विश्रान्तिनिबन्धनं परितोषमलभमान आत्मा हृदयं येषामि- त्यनेन सचेतसामित्यस्यैवार्थोऽभिव्यक्तः । सहृदयानामेव तर्ह्ययं महिमास्तु, नहीं करते हैं, इस प्रकार होते हुए भी क्रम का लक्षित नहीं होना ( व्यङ्ग्य अर्थ के ) प्राधान्य में हेतु है । अपनी सामर्थ्य१ अर्थात् आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि । विभावित होता है— । 'वि' शब्द से 'विभक्तता' कही गई; अर्थात् विभक्त रूप में नहीं भावित ( प्रतीत ) होता है । इससे जो 'स्फोट के अभिप्राय से नहीं रहता हुआ भी क्रम' ऐसा व्याख्यान करते हैं, वह ( व्याख्यान ) प्रत्युत विरुद्ध ही है । वाच्य अर्थ में विमुख अर्थात् विश्रान्तिमूलक परितोष को न पाये आत्मा ( हृदय ) है जिनका, इससे 'सहृदयों का' इतने का ही अर्थ अभिव्यक्त है । तब तो यह सहृदयों की ही महिमा १. पदार्थों में जब तक योग्यता, आकांक्षा और सन्निधि ये तीनों विद्यमान नहीं रहते तब तक वाक्य स्वरूप-लाभ नहीं करता । 'योग्यता' पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध में बाधा का अभाव है । पदसमूह में इस 'योग्यता' के अभाव में किसी प्रकार वह वाक्य नहीं कहा जा सकता, जैसे 'वह्निना सिञ्चति' । यह पदसमूह योग्यतारहित है, क्योंकि सेचन कार्य की योग्यता अग्नि में नहीं है, इसलिए यह वाक्य नहीं है । पदसमूह को वाक्य बनने में 'आकांक्षा' भी होनी चाहिए, अर्थात् एक पद से दूसरे पद के अन्वय का अनुभावन होना चाहिए, आकांक्षारहित पदसमूह, जैसे 'गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मणः' इत्यादि । यहाँ एक पद से दूसरे का अन्वय प्रतीत नहीं होता । 'सन्निधि' या 'आसत्ति' बुद्धि का अविच्छेद है, अर्थात् एक पद का दूसरे से सामयिक व्यवधान नहीं होना चाहिए । जैसे कोई पदसमूह अंशतः घण्टे-घण्टे के व्यवधान से कहा जाय तब उसमें सन्निधि का अभाव होता है अतः वह वाक्य नहीं कहला सकता । जैसे 'घटम्' कहने के एक घण्टे बाद यदि 'आनय' कहा तो यह पदसमूह वाक्य नहीं हो सकता । इस प्रकार ये तीनों ही पदसमूह के वे धर्म हैं जिनसे वाक्य स्वरूपलाभ करता है । यद्यपि 'आकांक्षा' श्रोता की

१०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तद्वत्सचेतसां सोऽर्थो वाच्यार्थविमुखात्मनाम् । बुद्धौ तत्त्वार्थदर्शिन्यां झटित्येवावभासते ॥ १२ ॥ एवं वाच्यव्यतिरेकिणो व्यङ्ग्यस्यार्थस्य सद्भावं प्रतिपाद्य प्रकृत उपयोजयन्नाह— यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ । व्यङ्क्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः॥१३॥ उसी प्रकार वह अर्थ वाच्यार्थ से विमुख आत्मा वाले सहृदयजनों की तत्त्वार्थ- दर्शिनी बुद्धि में झट से ही अवभासित हो जाता है ॥ १२ ॥ इस प्रकार वाच्यार्थ से अतिरिक्त व्यंग्यार्थ के सद्भाव का प्रतिपादन करके प्रकृत में उसका उपयोग करते हुए कहते हैं— जहाँ अर्थ अपने-आपको अथवा शब्द अपने अर्थ को गुणीभूत करके (प्रतीयमान) अर्थ को व्यक्त ( अभिव्यक्त ) करते हैं वह ‘काव्यविशेष' विद्वान् लोगों द्वारा 'ध्वनि' कहा जाता है ॥ १३ ॥ लोचनम् न तु काव्यस्यासौ कश्चिदतिशय इत्याशङ्कयाह—अवभासत इति । तेनात्र विभक्ततया न भासते, न तु वाच्यस्य सर्वथैवानवभासः। अत एव तृतीयोद्द्योते घटप्रदीपदृष्टान्तबलाद्व्यङ्ग्यप्रतीतिकालेऽपि वाच्यप्रतीतिर्न विघटत इति यद्वक्ष्यति तेन सहास्य ग्रन्थस्य न विरोधः ॥ ११-१२ ॥ सद्भावमिति । सत्तां साधुभावं प्राधान्यं चेत्यर्थः । द्वयं हि प्रतिपिपादयि- है, न कि यह, कोई काव्य का अपना अतिशय है, यह आशङ्का करके कहते हैं— अवभासित होता है— । इस लिए यहाँ विभक्त रूप से भासित नहीं होता, न कि वाच्य का सर्वथा ही अनवभास होता है । अत एव तृतीय 'उद्योत' में घट और प्रदीप के दृष्टान्त १ के बल से जो यह कहेंगे कि व्यङ्ग्य की प्रतीति के काल में भी वाच्यप्रतीति नहीं विघटित होती है उसके साथ इस ग्रन्थ का विरोध नहीं है॥११-१२॥ सद्भाव२—। सत्ता अर्थात् साधुभाव और प्राधान्य । क्योंकि दोनों ही प्रतिपादन की जिज्ञासा रूप है तथापि परम्परा-सम्बन्ध द्वारा पदार्थ का भी धर्म है। अपनी इस 'सामर्थ्य' के द्वारा ही पदार्थ वाक्यार्थ का बोध कराते हैं। १. वाच्यार्थ से व्यङ्ग्यार्थ का द्योतन होता है। इसका मतलब है कि जिस प्रकार दीपक अपने प्रकाश से घट को प्रकाशित करता हुआ अपने को भी प्रकाशित करता है उसी प्रकार वाच्यार्थ भी व्यङ्ग्य अर्थ को प्रतीत कराता हुआ स्वयं भी प्रतीत होता है। वाच्यार्थ से विमुख सहृदय लोग झटिति उस व्यङ्ग्य अर्थ का ज्ञान करते हैं। इससे क्रम रहता हुआ भी उन्हें क्रम अभिलक्षित नहीं होता है। यहाँ यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सहृदयों की विशेषता है जो इस प्रकार व्यङ्ग्य अर्थ का ज्ञान करते हैं, बल्कि व्यङ्ग्यार्थ उन्हें इस प्रकार अवभासित होता है। २. 'सद्भाव' शब्द सत्ता या अस्तित्व के अर्थ में प्रयुक्त होता है, साथ ही उस वस्तु की

प्रथम उद्योतः १०३ लोचनम् षितम् । प्रकृत इति लक्षणे । उपयोजयन् उपयोगं गमयन् । तमर्थमिति चायमुप- योगः । स्वशब्द आत्मवाची । स्वश्चार्थश्च तौ स्वार्थौ; तौ गुणीकृतौ याभ्याम्, यथासंख्येन तेनार्थो गुणीकृतात्मा, शब्दो गुणीकृताभिधेयः । तमर्थमिति । ‘सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु’ इति यदुक्तम् । व्यङ्क्तः द्योतयतः । व्यङ्क्त इति द्विवचनेनेदमाह—यद्यप्यविवक्षितवाच्ये शब्द एव व्यञ्जकस्तथाप्यर्थस्यापि सहकारिता न त्रुट्यति, अन्यथा अज्ञातार्थोऽपि शब्दस्तद्व्यञ्जकः स्यात् । विवक्षितान्यपरवाच्ये च शब्दस्यापि सहकारित्वं भवत्येव, विशिष्टशब्दाभि- धेयतया विना तस्यार्थस्याव्यञ्जकत्वादिति सर्वत्र शब्दार्थयोरुभयोरपि ध्वननं व्यापारः । तेन यद्भट्टनायकेन द्विवचनं दूषितं तद् गजनिमीलिकयैव । अर्थः शब्दो वेति तु विकल्पाभिधानं प्राधान्याभिप्रायेण । काव्यं च तद्विशेषश्चासौ काव्यस्य वा विशेषः । काव्यग्रहणाद् गुणालङ्कारोपस्कृतशब्दार्थपृष्ठपाती ध्वनि- इच्छा के विषय हैं। प्रकृत में—। अर्थात् लक्षण में । उपयोग बताते हुए— । ‘उस प्रतीयमान अर्थ का’ यह उपयोग है । स्व और अर्थ दोनों स्वार्थ हुए, वे स्वार्थ जिनके द्वारा गुणीभूत हुए । उस क्रम से अर्थ अपने आपको गुणीभूत करता है और शब्द अभिधेय ( वाच्य ) का गुणीभूत करता है । उस अर्थ को— । जिसे ‘सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु’ कहा है । ‘व्यक्त करते हैं’ अर्थात् द्योतन करते हैं । ‘व्यङ्क्तः’ ( व्यक्त करते हैं ) इस द्विवचन से यह कहते हैं—यद्यपि ‘अविवक्षितवाच्य’ ध्वनि में शब्द ही व्यञ्जक है, तथापि अर्थ की भी सहकारिता नहीं टूटती है, अन्यथा जिस शब्द का अर्थ ज्ञात नहीं है वह भी उसका व्यञ्जक हो जाता । और ‘विवक्षितान्यपर- वाच्य’ ध्वनि में शब्द भी सहकारी होता ही है, क्योंकि विशिष्ट शब्द द्वारा अभिधान नहीं किया जायगा तो ऐसी स्थिति में वह शब्द उस अर्थ का व्यञ्जक नहीं हो सकता । इस प्रकार सर्वत्र ‘ध्वनन’ शब्द और अर्थ दोनों का ही व्यापार है । इस लिए जो कि भट्टनायक ने ‘द्विवचन’ में दोष बताया था वह तो गजनिमीलिका के कारण ही । ‘अर्थ अथवा शब्द’ इस प्रकार जो विकल्प कहा है वह प्राधान्य१ के अभिप्राय से । अच्छाई और श्रेष्ठता भी इस शब्द से अभिहित होती है—सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रस्तुत में बड़े विस्तार से आचार्य ने ध्वनि के सद्भाव का जो प्रतिपादन किया है उससे केवल ध्वनि का अस्तित्व या मौजूदगी ही सिद्ध नहीं की है बल्कि उसे साधु और प्रधान भी सिद्ध किया है । १. ‘अर्थ अथवा शब्द’ यह विकल्प प्राधान्य के अभिप्राय से कहा है। अर्थात् जैसा कि यह ऊपर की पंक्तियों में कह चुके हैं कि केवल शब्द या केवल अर्थ व्यञ्जक नहीं होते, बल्कि एक दूसरे की सहायता से व्यञ्जक होते हैं । इस प्रकार जब अर्थ प्रधान रूप से व्यङ्ग्य की व्यञ्जना करता है तब शब्द उसका सहकारी होता है और जब शब्द प्रधान रूप से व्यञ्जक होता है तब अर्थ उसका सहकारी होता है । इसी प्राधान्य के अभिप्राय से आचार्य ने ‘विकल्प’ का प्रयोग किया है और शब्द-अर्थ की इसी सम्मिलित व्यञ्जकता के कारण ‘व्यङ्क्तः’ इस द्विवचन के प्रयोग को भी सार्थकता है । भट्टनायक द्वारा ‘द्विवचन’ का दूषण उनका अज्ञान प्रकट करता है।

१०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यत्रार्थो वाच्यविशेषः वाचकविशेषः शब्दो वा तमर्थं व्यङ्क्तः, स काव्यविशेषो ध्वनिरिति । जहाँ अर्थ याने वाच्यविशेष अथवा वाचकविशेष शब्द उस अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं वह काव्यविशेष 'ध्वनि' (कहलाता) है । लोचनम् लक्षण 'आत्मे'त्युक्तम् । तेनैतन्निरवकाशं श्रुतार्थापत्तावपि ध्वनिव्यवहारः स्यादिति । यच्चोक्तम्—'चारुत्वप्रतीतिस्तर्हि काव्यस्यात्मा स्यात्' इति तदङ्गी- कुर्म एव । नाम्नि खल्वयं विवाद इति । यच्चोक्तम्—'चारुणः प्रतीतिर्यदि काव्यात्मा प्रत्यक्षादिप्रमाणादपि सा भवन्ती तथा स्यात्' इति । तत्र शब्दार्थ- मयकाव्यात्माभिधानप्रस्तावे क एष प्रसङ्ग इति न किञ्चिदेतत् । स इति । अर्थो वा शब्दो वा, व्यापारो वा । अर्थोऽपि वाच्यो वा ध्वनतीति, शब्दोऽप्ये- 'काव्य और उसका विशेष' इस प्रकार (कर्मधारय समास) है, या 'काव्य का विशेष' इस प्रकार (षष्ठी तत्पुरुष समास) है । 'काव्य' के ग्रहण से यह कहा कि जो ध्वनि रूप आत्मा है वह गुण और अलङ्कार से उपस्कृत शब्द और अर्थ का पृष्ठपाती है । इस लिए इस बात का कोई अवकाश नहीं कि (स्थूलकाय देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता' इस) "श्रुतार्थापत्ति' में भी 'काव्य' का व्यवहार होने लगेगा । और जो कि कहा है—'तब तो चारुत्व की प्रतीति काव्य का आत्मा होगा' यह हम स्वीकार करते ही हैं। यह विवाद तो नाम में है ! और जो कि कहा है—'चारु की प्रतीति यदि काव्य का आत्मा है तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाण से भी चारु की होतीं हुई प्रतीति उस प्रकार (काव्य का आत्मा) होगी।' वहाँ जब कि शब्दार्थरूप काव्यात्मा के कथन का प्रसङ्ग है, फिर यह कौन प्रसङ्ग है ? अतः यह कुछ भी नहीं । (कारिका में प्रयुक्त) वह—। अर्थ अथवा शब्द, अथवा व्यापार । 'ध्वनति' या ध्वनन करता है, (इस व्युत्पत्ति के अनुसार) वाच्य अर्थ 'ध्वनि' है, इस प्रकार शब्द भी । 'ध्वन्यते' १. आचार्य का यह निर्देश पहले भी हो चुका है कि 'ध्वनि' काव्य का आत्मा अवश्य है किन्तु केवल ध्वनि से काव्य का व्यवहार नहीं होता । बल्कि 'ध्वनि' के साथ शब्द-अर्थ का गुण और अलङ्कार से उपस्कृत भी होना आवश्यक है । इस प्रकार प्रकृत 'कारिका' में 'काव्य' यह साभिप्राय है । यदि केवल ध्वनि के अस्तित्व मात्र से 'काव्य' मान लेने की छूट दे दी जाय तो मीमांसकों के यहाँ प्रसिद्ध 'श्रुतार्थापत्ति' का स्थल भी 'काव्य' के रूप में व्यवहृत होगा । जैसे 'यह मोटा ताजा देवदत्त दिन में नहीं खाता है' (पीनोऽयं देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते) इस श्रुत वाक्य से जो दिन में भोजन के अभाव में पीनत्व रूप अर्थ ज्ञात होता है उसकी अन्यथानुपपत्ति को लेकर 'रात्रि में भोजन करता है' (रात्रौ भुङ्क्ते) इस रात्रिभोजन रूप अर्थ के प्रतिपादक अन्य वाक्य की कल्पना करते हैं । परन्तु यहाँ 'ध्वनि' होते हुए भी गुण-अलङ्कार से उपस्कृत शब्द-अर्थ का अभाव है अतः यहाँ काव्य-व्यवहार नहीं हो सकता । इसका निर्देश 'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' (१।५) कारिका की वृत्ति में 'विविधवाच्यवाचकरचनाप्रपञ्चचारुणः काव्यस्य' में किया है । इस स्थल के लोचन में इसका स्पष्टीकरण दर्शनीय है ।

प्रथम उद्योतः १०५ ध्वन्यालोकः अनेन वाच्यवाचकचारुत्वहेतुभ्य उपमादिभ्योऽनुप्रासादिभ्यश्च विभक्त एव ध्वनेर्विषय इति दर्शितम् । यदप्युक्तम्—‘प्रसिद्धप्रस्थाना- तिक्रमिणो मार्गस्य काव्यहानेर्ध्वनिर्नास्ति’ इति, तदप्ययुक्तम् । यतो लक्षणकृतामेव स केवलं न प्रसिद्धः, लक्ष्ये तु परीक्ष्यमाणे स एव सहृदय- हृदयाह्लादकारि काव्यतत्त्वम् । ततोऽन्यच्चित्रमेवेत्यग्रे दर्शयिष्यामः । इससे वाच्य और वाचक की चारुता के हेतु उपमा आदि और अनुप्रास आदि से ध्वनि का विषय विभक्त ही है, यह दिखाया । जो कि कहा है—‘प्रसिद्ध प्रस्थानों को अतिक्रमण करनेवाला मार्ग काव्यत्व से रहित होता है, अतः ध्वनि नहीं है।’ वह भी ठीक नहीं; क्योंकि लक्षणकारों के लिए ही वह केवल प्रसिद्ध नहीं है, लक्ष्य की परीक्षा करने पर वही सहृदयजनों के हृदय को आह्लादित करनेवाला काव्यतत्त्व है । उससे दूसरा ही ‘चित्र’ है, यह आगे चलकर दिखायेंगे । लोचनम् वम् । व्यङ्ग्यो वा ध्वन्यत इति व्यापारो वा शब्दार्थयोर्ध्वननमिति’ । कारिकया तु प्राधान्येन समुदाय एव काव्यरूपो मुख्यतया ध्वनिरिति प्रतिपादितम् । विभक्त इति । गुणालङ्काराणां वाच्यवाचकभावप्राणत्वात् । अस्य च तदन्यव्यङ्ग्य- व्यञ्जकभावसारत्वान्नास्य तेष्वन्तर्भाव इति । अनन्यत्र भावो विषयशब्दार्थः । एवं तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरिति निराकृतम् । लक्षणकृतामेवेति । लक्षण- (इस व्युत्पत्ति के अनुसार) व्यंग्य ‘ध्वनि’ है, और शब्द और अर्थ का व्यापार ‘ध्वननम्’ ( इस व्युत्पत्ति के अनुसार ) ‘ध्वनि’ है । कारिका द्वारा तो प्रधानतया समुदाय¹ ही काव्यरूप मुख्यरूप से ‘ध्वनि’ है, ऐसा प्रतिपादन किया है । विभक्त —। क्योंकि गुण और अलङ्कार का प्राणभूत तत्त्व वाच्यवाचकभाव है, और इस ध्वनि का सार उसके अतिरिक्त व्यंग्यव्यञ्जकभाव है, इसलिए इसका उनमें अन्तर्भाव नहीं है । ‘विषय’² शब्द का अर्थ है अन्यत्र सद्भाव का अभाव । इस प्रकार उन ( गुण और अलङ्कार ) से व्यतिरिक्त यह ‘ध्वनि’ क्या है, इसका निराकरण किया । लक्षणकारों के लिए ही—। १. मूल कारिकाग्रन्थ में जिस काव्य विशेष को ‘ध्वनि’ कहा गया है वह मुख्य रूप से रूढि द्वारा समुदाय रूप ध्वनि है । ‘ध्वनति’, ‘ध्वन्यते’ और ‘ध्वननम्’ शब्द, वाच्य, व्यङ्ग्य और व्यञ्जन इनका समुदाय यहाँ ‘ध्वनि’ है । पहले भी ‘लोचन’ में ध्वनि की व्युत्पत्तियों का निर्देश हो चुका है । २. व्युत्पत्ति के अनुसार ‘विषय’ शब्द का यह अर्थ है कि जो अपने सम्बन्ध के पदार्थ को बांध देता है, सीमित कर देता है ( विशेषण सिनोति बध्नातीति विषयः ) । प्रस्तुत में ध्वनि का भी अपनी सीमा से बाहर सद्भाव नहीं है, अर्थात् वह सीमा में बँधा हुआ है । अतः ध्वनि को उपमा आदि के अन्तर्गत नहीं लाया जा सकता है । उपमा आदि वाच्य और वाचक के चारुत्व के हेतु हैं किन्तु ध्वनि का प्राण व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव है और यहाँ स्वयं यह चारुत्व की प्रतीति है ।

१०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् काराप्रसिद्धता विरुद्धो हेतुः, तत एव हि यत्नेन लक्षणीयता । लक्ष्ये त्वप्रसिद्धत्व- मसिद्धो हेतुः । यच्च नृत्तगीतादिकल्पं, तत्काव्यस्य न किञ्चित् । चित्रमिति । विस्मयकृद्वृत्त्यादिवशात्, न तु सहृदयाभिलषणीयचमत्कारसाररसनिःष्यन्दमय- मित्यर्थः । काव्यानुकारित्वाद्वा चित्रम्, आलेखमात्रत्वाद्वा, कलामात्रत्वाद्वा । अथ इति । लक्षणकारों में अप्रसिद्धतारूप विरुद्ध¹ हेतु है; इसी कारण यत्नपूर्वक ( आचार्य ने ध्वनि को ) लक्षणीय किया है ! लक्ष्य में 'अप्रसिद्धत्व' रूप हेतु असिद्ध है । और जो कि नृत्त, गीत आदि² के समान है, वह काव्य का ( ध्वनि के रूप में लक्षित काव्य का ) कुछ नहीं है । चित्र—। अर्थात् नृत्त³ आदि के कारण विस्मय उत्पन्न करने वाला, न कि सहृदयजनों द्वारा अभिलषणीय चमत्कारसार रसका निष्पन्दमय । काव्य का अनुकरण करनेवाला होने के कारण 'चित्र' है, अथवा आलेखमात्र अथवा कलामात्र होने के कारण ! आगे—। १, पहले ध्वनि के निराकरण के प्रसङ्ग में यह कह चुके हैं कि प्रसिद्ध प्रस्थान ( अर्थात् वह मार्ग जो परम्परा से व्यवहार में आता है, जैसे प्रस्तुत में शब्द-अर्थ तथा उनके गुण और अलङ्कार आदि ) में 'ध्वनि' का निर्देश न होने के कारण उसे काव्य नहीं माना जा सकता । तात्पर्य यह कि ध्वनि इस कारण नहीं है कि वह प्रसिद्ध प्रस्थानों में नहीं आता उन्हें अतिक्रमण करने वाला है, इस प्रकार ध्वनि का विरोध किया गया है । इसी को 'न्याय' की भाषा में इस प्रकार कह सकते हैं—ध्वनिर्नाम काव्यप्रकारो नास्ति, प्रसिद्धप्रस्थानातिकामित्वात् । इस 'हेतु' के तात्पर्य के रूप में दो बातें प्रतीत होती हैं, एक यह कि प्राचीन अलङ्कार-शास्त्र के लक्षणकारों में यह 'ध्वनि' तत्त्व प्रसिद्ध नहीं था और दूसरी यह कि यह कोई अप्रसिद्ध लक्ष्य था । इन दोनों का निराकरण करते हुये मूल-वृत्ति ग्रन्थ में जैसा कहा है कि लक्षणकारों के लिये ही वह केवल प्रसिद्ध नहीं है, किन्तु लक्ष्य की परीक्षा करने पर वही सहृदयों को आह्लादित करने वाला काव्य तत्त्व है । इस प्रकार 'लक्षणकाराप्रसिद्धता' रूप हेतु विरुद्ध है और 'लक्ष्याप्रसिद्धता' रूप हेतु असिद्ध है । ध्वनि लक्षणकारों के लिये अप्रसिद्ध है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह नहीं है, बल्कि इससे तो यह समझना चाहिये कि वह यत्नपूर्वक लक्षणीय है, क्योंकि वह सिर्फ 'काव्य' नहीं बल्कि 'काव्यविशेष' है । अतः यह हेतु विरुद्ध है । दूसरे यह कहना कि वह लक्ष्य में प्रसिद्ध नहीं, बिलकुल ठीक नहीं, क्योंकि परीक्षा करके लक्ष्य में देखने पर वही सहृदयहृदयाह्लादकारी तत्त्व दिखाई देता है । अतः यह हेतु असिद्ध है । २. जैसे नाटक आदि में शोभा के लिये नृत्त, गीत आदि का आयोजन करते हैं उसी प्रकार यह ध्वनि भी कोई शोभाकारी तत्त्व हो सकता है । जिस प्रकार नृत्त-गीत कवनीय न होने के कारण काव्य नहीं हैं उसी प्रकार ध्वनि भी काव्य नहीं है यह पहले ध्वनि के काव्य के रूप में लक्षित करने के प्रसङ्ग में कह चुके हैं । प्रस्तुत में 'ध्वनि' को 'काव्यविशेष' रूप में सिद्ध करके यह निर्णय कर दिया कि वह एक कवनीय तत्त्व है अतः वह 'काव्य' है । ऐसी स्थिति में उसे नृत्त-गीतादि की समानता की कोटि में नहीं ला सकते हैं, क्योंकि नृत्त-गीत आदि काव्य से कोई सम्बन्ध नहीं रखते, वे सर्वथा कवनीय नहीं हैं और ध्वनि कवनीय है, कवि के व्यापार का विषय है । ३. लोचन में 'वृत्तादि' छपा है, 'बालप्रिया' में 'वृत्त' शब्द से यमक-उपमा आदि का परिग्रह किया है । क्योंकि यमक-उपमा आदि अलङ्कारों के कारण 'विस्मय' होता है । परन्तु 'दिव्याङ्गना'

प्रथम उद्योतः १०७ ध्वन्यालोकः यदप्युक्तम्—'कामनीयकमनतिवर्तमानस्य तस्योक्तालङ्कारादि- प्रकारेष्वन्तर्भावः' इति, तदप्यसमीचीनम्; वाच्यवाचकमात्राश्रयिणि प्रस्थाने व्यङ्ग्यव्यञ्जकसमाश्रयेण व्यवस्थितस्य ध्वनेः कथमन्तर्भावः, वाच्यवाचकचारुत्वहेतवो हि तस्याङ्गभूताः, स त्वङ्गिरूप एवेति प्रति- पादयिष्यमाणत्वात् । जो कि कहा है—'कमनीयता का अतिक्रमण न करने के कारण (विशेष कमनीय न होने के कारण) उस ध्वनि का उक्त अलङ्कार आदि प्रकारों में अन्तर्भाव है।' वह भी समीचीन नहीं। (क्योंकि अलङ्कार आदि) प्रस्थान जब कि एकमात्र वाच्यवाचकभाव पर आश्रित हैं तो उनका ध्वनि, जो व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव का आश्रयण करके व्यवस्थित है, में कैसे अन्तर्भाव होगा ? क्योंकि यह प्रतिपादन करेंगे कि वाच्य और वाचक के चारुत्वहेतु (अलङ्कार आदि) उस (ध्वनि) के अङ्गभूत हैं, और वह (ध्वनि) तो अङ्गी रूप ही है । लोचनम् प्रधानगुणभावाभ्यां व्यङ्ग्यस्यैवं व्यवस्थितम् । द्विधा काव्यं ततोऽन्यद्यत्तच्चित्रमभिधीयते ॥ इति तृतीयोद्द्योते वक्ष्यति । परिकरार्थं कारिकार्थस्याधिकावापं कर्तुं श्लोकः 'इस प्रकार व्यंग्य का प्रधानभाव और गुणभाव के कारण' काव्य दो प्रकार से व्यवस्थित है, उससे जो अतिरिक्त है वह 'चित्र' कहलाता है । यह 'तृतीयोद्योत' में कहेंगे । परिकर के लिए अर्थात् कारिका के अर्थ का अधिक आवाप (अर्थात् कारिका में नहीं कहे गए अधिक अर्थ का प्रक्षेप) करने के लिए जो टिप्पणी में 'वृत्त्यादि' पाठ माना है और 'वृत्ति' शब्द से उपनागरिका आदि का ग्रहण किया है । इस पाठपरिवर्तन का अभिप्राय मैं समझ नहीं पा रहा हूँ । 'वृत्त' के द्वारा अलङ्कारों का ग्रहण करना मुझे ठीक लगता है । क्योंकि चमत्कार या तो रस से होता है या अलङ्कार से । 'चमत्कार विस्मय की ही उत्कृष्ट भूमि है । ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के स्थलों में चमत्कार 'रस' के कारण अनुभव में आता है किन्तु जहाँ केवल अलङ्कारों के कारण चमत्कार होता है वह 'विस्मय' का ही एक रूप है अतः विस्मयकारी होने के कारण अलङ्कार-प्रधान काव्य को 'चित्रकाव्य' कहने की परम्परा है । अलङ्कार-प्रधान काव्य को 'चित्र' कहने के और भी कारण हो सकते हैं जैसे वह वस्तुतः काव्य नहीं बल्कि काव्य का अनुकरण करता है । जैसे घोड़े के चित्र वस्तुतः घोड़ा नहीं, किन्तु घोड़े का अनुकरण करता है । इसी प्रकार आलेखमात्र अथवा कलामात्र होने के कारण यह 'चित्र' कहा गया है ।

१०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः

परिकरश्लोकश्चात्र— व्यङ्ग्यव्यञ्जकसम्बन्धनिबन्धनतया ध्वनेः । वाच्यवाचकचारुत्वहेत्वन्तःपातिता कुतः ॥ ननु यत्र प्रतीयमानस्यार्थस्य वैशद्येनाप्रतीतिः स नाम मा भूद् ध्वनेर्विषयः । यत्र तु प्रतीतिरस्ति, यथा—समासोक्त्याक्षेपानुक्त- निमित्तविशेषोक्तिपर्यायोक्तापह्नुतिदीपकसङ्करालङ्कारादौ, तत्र ध्वनेरन्त- र्भावो भविष्यतीत्यादि निराकर्तुमभिहितम्-‘उपसर्जनीकृतस्वार्थौ’ इति । अर्थो गुणीकृतात्मा, गुणीकृताभिधेयः शब्दो वा यत्रार्थान्तर- मभिव्यनक्ति स ध्वनिरिति । तेषु कथं तस्यान्तर्भावः । व्यङ्ग्य- प्राधान्ये हि ध्वनिः । न चैतत्समासोक्त्यादिष्वस्ति । और यहाँ एक परिकर श्लोक है— 'ध्वनि के मूल में व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के सम्बन्ध के होने के कारण वाच्य और वाचक के चारुत्व के हेतुओं में उसका अन्तर्भाव कैसे हो सकता है ?' जहाँ प्रतीयमान अर्थ की विशदतापूर्वक प्रतीति नहीं होती है वह ध्वनि का विषय मत हो, किन्तु जहाँ प्रतीति है, जैसे—समासोक्ति, आक्षेप, अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्ति, अपह्नुति, दीपक, सङ्कर आदि में, वहाँ ध्वनि का अन्तर्भाव होगा, इत्यादि (शङ्का) के निवारण के लिए अभिहित किया है—'उपसर्जनीकृतस्वार्थौ ।' अर्थात् अर्थ अपने आपको (आत्मा को) गुणीभूत करके, जहाँ दूसरे अर्थ को अभिव्यक्त करता है वह 'ध्वनि' है । उनमें उसका अन्तर्भाव कैसे हो सकता है ? क्योंकि व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य में ध्वनि होता है । और यह समासोक्ति आदि में नहीं है । लोचनम् परिकरश्लोकः । यत्रेत्यलङ्कारे । वैशद्येनेति । चारुतया स्फुटतया चेत्यर्थः । अभिहितमिति । भूतप्रयोग आदौ व्यङ्क्त इत्यस्य व्याख्यातत्वात् । गुणीकृता- त्मेति । आत्मेत्यनेन स्वशब्दस्यार्थो व्याख्यातः । न चैतदिति । व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यम् । प्राधान्यं च यद्यपि ज्ञप्तौ न चकास्ति; 'बुद्धौ तत्त्वावभासिन्याम्' श्लोक होता है वह परिकर श्लोक है । जहाँ—। अलङ्कार में । विशदतापूर्वक—। अर्थात् चारुतापूर्वक और स्फुटतापूर्वक । 'अभिहित' यह 'भूत' प्रयोग है, क्योंकि पहले 'व्यङ्क्तः' ( 'व्यञ्जित करते हैं' ) इसका व्याख्यान किया गया है । गुणीकृतात्मा—। 'आत्मा' द्वारा 'स्व' शब्द का अर्थ व्याख्यान किया है । यह……नहीं है—। व्यंग्य का प्राधान्य (नहीं है )। यद्यपि व्यंग्य का प्राधान्य ज्ञप्ति (ज्ञान) में नहीं भासित होता है, क्योंकि

प्रथम उद्योतः १०९ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः समासोक्तौ तावत्— उपोढरागेण विलोलतारकं तथा गृहीतं शशिना निशामुखम् । यथा समस्तं तिमिरांशुकं तया पुरोऽपि रागाद्गलितं न लक्षितम् ॥ समासोक्ति में—प्रवृद्धराग शशी ने निशा के मुख को इस प्रकार ग्रहण किया कि उस (निशा) ने राग के कारण (सामने = पूर्व दिशा में) ढले हुए पूरे अन्धकार के अंशुक को नहीं लक्षित किया। लोचनम् इति नयेनाखण्डचर्वणाविश्रान्तेः, तथापि विवेचकैर्जीवितान्वेषणे क्रियमाणे यदा व्यङ्ग्योऽर्थः पुनरपि वाच्यमेवानुप्राणयन्नास्ते तदा तदुपकरणत्वादेव तस्यालङ्कारता । ततो वाच्यादेव तदुपस्कृताच्चमत्कारलाभ इति । यद्यपि पर्यन्ते रसध्वनिरस्ति, तथापि मध्यकक्षानिविष्टोऽसौ व्यङ्ग्योऽर्थो न रसोन्मुखीभवति स्वातन्त्र्येण, अपि तु वाच्यमेवार्थं संस्कृतुं धावतीति गुणीभूतव्यङ्ग्यताक्ता । समासोक्ताविति । यत्रोक्तौ गम्यतेऽन्योऽर्थस्तत्समानैर्विशेषणैः । सा समासोक्तिरुदिता संक्षिप्तार्थतया बुधैः ॥ इत्यत्र समासोक्तेर्लक्षणस्वरूपं हेतुर्नाम तन्निर्वचनमिति पादचतुष्टयेन क्रमादुक्तम् । उपोढो रागः सान्ध्योऽरुणिमा प्रेम च येन । विलोलास्तारका ज्योतींषि नेत्रत्रिभागाश्च यत्र । तथेति । झटित्येव प्रेमरभसेन च । गृहीतमाभा- सितं परिचुम्बितुमाक्रान्तं च । निशाया मुखं प्रारम्भो वदनकोकनदं चेति । यथेति । झटिति ग्रहणेन प्रेमरभसेन च । तिमिरं चांशुकञ्च सूक्ष्मंशावस्तिम- 'बुद्धौ तत्त्वावभासिन्याम्' इस न्याय के अनुसार अखण्ड चर्वणा में विश्रान्ति होती है, तथापि विवेचक लोगों द्वारा जीवित (आत्मा) के अन्वेषण किए जाने पर जब व्यंग्य अर्थ फिर भी वाच्य ही को अनुप्राणन करता है तब उस (वाच्य) का उपकरण होने के कारण उसका अलङ्कारत्व माना जाता है। ऐसी स्थिति में, उस व्यंग्य के द्वारा उपस्कृत उस वाच्य से ही चमत्कार का लाभ होता है। यद्यपि पर्यवसान में रसध्वनि है, तथापि बीच वाली कक्षा में पड़ा व्यंग्य अर्थ रस की ओर उन्मुख नहीं होता, बल्कि स्वतन्त्रतापूर्वक वाच्य अर्थ को ही संस्कृत करने के लिए दौड़ लगाता है, इसलिए(उसका) गुणीभूतव्यंग्यत्व कहा है। समासोक्ति में—। जिस उक्ति में अन्य अर्थ (प्रस्तुत से अतिरिक्त अप्रस्तुत अर्थ) समान विशेषणों से प्रतीत होता है उसे विद्वान् लोग संक्षिप्तार्थ होने से समास कहते हैं। यहाँ श्लोक के चार चरणों द्वारा क्रम से समासोक्ति का लक्षण-स्वरूप, हेतु, नाम और उसका निर्वचन (व्युत्पत्ति) बताया गया है। प्रवृद्ध है राग अर्थात् सन्ध्याकाल की लाली और प्रेम जिससे । विलोल (चंचल) तारक अर्थात् तारे और नेत्रत्रिभाग हैं जहाँ । तथा—। झट ही और प्रेम के वेग से। गृहीत (ग्रहण किया) अर्थात् आभासित और

११० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यादौ व्यङ्ग्येनानुगतं वाच्यमेव प्राधान्येन प्रतीयते समारो- पितनायिकानायकव्यवहारयोर्निशाशशिनोरेव वाक्यार्थत्वात् । इत्यादि ( उदाहरण ) में व्यङ्ग्य से अनुगत वाच्य ही प्राधान्यतः प्रतीत होता है, क्योंकि जिस पर नायिका और नायक के व्यवहारों का आरोप किया गया है ऐसे निशा और शशी ही वाक्यार्थ हैं। लोचनम् रांशुकं रश्मिशबलीकृतं तमःपटलं, तिमिरांशुकं नीलजालिका नवोढाप्रौढवधू- चिता । रागाद्रक्तत्वात् सन्ध्याकृतादनन्तरं प्रेमरूपाच्च हेतोः । पुरोऽपि पूर्वस्यां दिशि अग्रे च । गलितं प्रशान्तं पतितं च । रात्र्या करणभूतया समस्तं मिश्रि- तम्; उपलक्षणत्वेन वा । न लक्षितं रात्रिप्रारम्भोऽसाविति न ज्ञातं, तिमिर- संवलितांशुदर्शने हि रात्रिमुखमिति लोकेन लक्ष्यते न तु स्फुट आलोके । नायिकापक्षे तु तयेति कर्तृपदम् । रात्रिपक्षे तु अपिशब्दो लक्षितमित्यस्यान- न्तरः । अत्र च नायकेन पश्चाद्गतेन चुम्बनोपक्रमे पुरो नीलांशुकस्य गलनं पतनम् । यदि वा ‘पुरोऽग्रे नायकेन तथा गृहीतं मुखमि’ति सम्बन्धः । तेनात्र व्यङ्ग्ये प्रतीतेऽपि न प्राधान्यम् । तथाहि नायकव्यवहारो निशाशशिनावेव परिचुम्बन के लिए आक्रान्त । निशा का मुख अर्थात् प्रारम्भ और मुख-कमल । यथा—। झट पकड़ लेने से और प्रेम के वेग से । तिमिर और अंशुक ( चन्द्र की सूक्ष्म किरणें ) । तिमिरांशुक अर्थात् रश्मि से मिला-जुला अन्धकार-पटल, तिमिरांशुक अर्थात् नवोढा प्रौढवधू द्वारा पहनी हुई नीली साड़ी । राग अर्थात् सन्ध्या की लाली के कारण और प्रेमरूप राग के कारण । 'पुरोऽपि'—पूर्व दिशा में, और सामने । गलित अर्थात् प्रशान्त और पतित ( ढला हुआ ) । रात्रि करणभूत रात्रि द्वारा समस्त अर्थात् मिश्रित, अथवा उपलक्षण के रूप में रात्रि से । नहीं लक्षित किया—। यह रात्रि का प्रारम्भ है यह नहीं जाना, क्योंकि अन्धकार से मिश्रित किरणों को देखने पर ही 'रात्रिमुख' को लोग लक्षित करते हैं—समझते हैं, न कि स्फुट आलोक में । नायिका-पक्ष में 'तया' ( उसने ) यह कर्तृपद है । रात्रिपक्ष में 'अपि' ( भी ) शब्द 'लक्षितम्' के बाद है । यहाँ पीछे की ओर से पहुँचे हुए नायक के द्वारा चुम्बन का उपक्रम किए जाने पर सामने नीलांशुक का गलन या पतन है । यदि वा, 'आगे नायक ने उस प्रकार मुख को पकड़ा' यह सम्बन्ध करते हैं, ऐसी स्थिति में यहाँ व्यंग्य के प्रतीत होने पर भी उसका प्राधान्य नहीं बनेगा । क्योंकि नायक का व्यवहार शृंगार के विभावरूप निशा और शशी को ही उपस्कृत करता हुआ अलङ्कारभाव को प्राप्त कर रहा है, तब तो विभावीभूत वाच्य से रसनिष्यन्द होगा । जिसने व्याख्यान किया है—'तया निशया' यह कर्तृपद है, निशा के अचेतन होने के कारण उसका कर्तृत्व बन नहीं सकता, इस प्रकार यहाँ शब्द ही के द्वारा नायक का व्यवहार उन्नीत होने से अभिधेय ही है न कि व्यंग्य,

प्रथम उद्योतः १११ ध्वन्यालोकः आक्षेपेऽपि व्यङ्ग्यविशेषाक्षेपिणोऽपि वाच्यस्यैव चारुत्वं प्राधान्येन वाक्यार्थ आक्षेपोक्तिसामर्थ्यादेव ज्ञायते । तथाहि—तत्र शब्दोपारूढो विशेषाभिधानेच्छया प्रतिषेधरूपो य आक्षेपः स एव व्यङ्ग्यविशेषमाक्षि- पन्मुख्यं काव्यशरीरम् । ‘आक्षेप’ अलङ्कार में भी व्यङ्ग्यविशेष का आक्षेप करने वाले वाच्य अर्थ की ही चारुता है, प्राधान्यतः वाक्यार्थ आक्षेपोक्ति की सामर्थ्य से ही जाना जाता है । जैसा कि—विशेष बात कहने की इच्छा से शब्द द्वारा वाच्य जो प्रतिषेध रूप आक्षेप है वही व्यङ्ग्य विशेष को व्यञ्जित करता हुआ मुख्य काव्यशरीर है । लोचनम् शृङ्गारविभावरूपौ संस्कुर्वाणोऽलङ्कारतां भजते, ततस्तु वाच्याद्विभावीभूताद्र- सनिःष्यन्दः । यस्तु व्याचष्टे—'तया निशयेति कर्तृपदं, न चाचेतनायाः कर्तृ- त्वमुपपन्नमिति शब्देनैवात्र नायकव्यवहार उन्नीतोऽभिधेय एव, न व्यङ्ग्य इत्यत एव समासोक्तिः' इति । स प्रकृतमेव ग्रन्थार्थमत्यजद्व्यङ्ग्येनानुगत- मिति । एकदेशविवर्ति चेत्थं रूपकं स्यात्, 'राजहंसैरवीज्यन्त शरदैव सरोनृपाः' इतिवत्, न तु समासोक्तिः; तुल्यविशेषणाभावात् । गम्यत इति चानेनाभि- धाव्यापारनिरासादित्यलमवान्तरेण बहुना । नायिकाया नायके यो व्यवहारः स निशायां समारोपितः; नायिकायां नायकस्य यो व्यवहारः स शशिनि समा- रोपित इति व्याख्याने नैकशेषप्रसङ्गः । आक्षेप इति । अतएव समासोक्ति है ।' उस ( व्याख्याता ) ने 'व्यंग्येनानुगतम्' यह प्रस्तुत अर्थ छोड़ दिया है । इस प्रकार 'एकदेशविवर्ति' रूपक होगा, जैसा कि—'सरोवररूपी राजे राजहंसरूपी शरत्काल द्वारा हवा दिए गए ।' समासोक्ति नहीं है, क्योंकि समान विशेषण नहीं है । समासोक्ति में 'गम्यते' ( प्रतीत होता है' ) इस पद का प्रयोग करके अभिधा व्यापार का निराकरण किया है । यह बहुत अवान्तर चर्चा व्यर्थ है ! नायिका का नायक में जो व्यवहार है उसका निशा में समारोप किया है और जो व्यवहार नायिका में नायक का है उसका शशी में समारोप किया है, इस प्रकार व्याख्यान करने पर एकशेष' का प्रसंग नहीं उपस्थित होगा । आक्षेप—। १. स्वयं लोचनकार ने प्रस्तुत 'समासोक्ति' के उदाहरण 'उपोढरागेण' का विशद व्याख्यान प्रस्तुत कर दिया है । यहाँ वृत्तिग्रन्थ में 'नायिका और नायक' जो कहा गया है वहाँ पाणिनि के 'पुमान् स्त्रिया' इस नियम के अनुसार एकशेष होना चाहिए यह शङ्का उपस्थित होती है मतलब यह कि 'नायक' कह देने मात्र से स्वतः नायिका का भी ग्रहण हो सकता था । इस शङ्का के समाधान में आचार्य अभिनवगुप्त ने इस प्रकार व्याख्यान किया है दोनों के उल्लेख की आवश्यकता हो जाती है। उनका कहना है कि कवि ने नायिका के नायक में नीलांशुक के गलन को लक्षित न करने आदि व्यवहार ( व्यापार ) को निशा में आरोपित किया है और नायिका में नायक के

११२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् प्रतिषेध इवेष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया । वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः ॥ तत्राद्यौ यथा— अहं त्वां यदि नेक्षेय क्षणमप्युत्सुका ततः । इयद्देवास्त्वतोऽन्येन किमुक्तेनाप्रियेण ते ॥ इति वक्ष्यमाणमरणविषयो निषेधात्माक्षेपः । तत्रेयदस्त्वित्येतदेवात्र म्रिये इत्याक्षिप्तच्चारुत्वनिबन्धनमित्याक्षेपेणाक्षेपकमलङ्कृतं सत्प्रधानम् । उक्तवि- षयस्तु यथा ममैव— भो भोः किं किमकाण्ड एव पतितस्त्वं पान्थ कान्‍या गति- स्तत्तादृक्तृषितस्य मे खलमतिः सोऽयं जलं गूहते । अस्थानोपनतामकालसुलभां तृष्णां प्रति क्रुध्य भो- स्त्रैलोक्यप्रथितप्रभावमहिमा मार्गः पुनर्मारवः ॥ अत्र कश्चित्सेवकःप्राप्तः प्राप्तव्यमस्मात्किमिति न लभ इति प्रत्याशाविशास्य- मानहृदयः केनचिदमुनाक्षेपेण प्रतिबोध्यते । तत्राक्षेपेण निषेधरूपेण विशेष कथन की इच्छा से इष्ट वस्तु का प्रतिषेध-सा किया जाय तो वह 'वक्ष्यमाण- विषय' और 'उक्तविषय' के भेद से दो प्रकार का 'आक्षेप' होता है । उसमें पहला जैसे— 'यदि उत्सुक मैं क्षण भर भी तुझे न देखूँ तब···इतना ही रहने दो, इसके बाद की दूसरी तेरी अप्रिय बात कहने से क्या लाभ ?' यह वक्ष्यमाण मरणविषय निषेधरूप आक्षेप है । 'इतना रहने दो' केवल यही यहाँ 'मर जाऊँगी' इस बात को आक्षिप्त ( व्यञ्जित ) करता हुआ चारुत्व का निबन्धन ( आधार ) है । इस प्रकार आक्षेप्य द्वारा आक्षेपक अलंकृत होता हुआ प्रधान ठहरता है । 'उक्तविषय', जैसे मेरा ही— 'हे हे पथिक ! तुम क्यों गलत जगह में आ पहुँचे ?' 'मुझे ऐसी प्यास ही लगी है, मैं क्या करता ?' यह दुष्ट मार्ग तो जल को छिपा लेता है !' अरे गलत जगह में उत्पन्न हुई अकाल सुलभ मेरी तृष्णा के प्रति क्रोध करो, अन्यथा ( किसे नहीं मालूम कि ) यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध प्रभाव और महिमा वाला मरु का मार्ग है ( यहाँ जल की आशा व्यर्थ है ) ।' यहाँ कोई सेवक अपने मालिक के पास पहुँचा है, इस प्रत्याशा से कि क्यों नहीं इससे वह अपने प्राप्तव्य का लाभ करेगा ? उसका हृदय विश्वास कर रहा है, तभी कोई उसे इस 'आक्षेप' के द्वारा प्रतिबोधन करता है । वहाँ निषेधरूप आक्षेप के द्वारा मुखचुम्बनादि व्यापार को शशी में आरोपित किया है । यदि एकशेष कर दिया जायगा तब इस प्रकार नायिका और नायक के शशी और निशा में व्यवहार के समारोपण का स्पष्टीकरण नहीं हो सकेगा ।

प्रथम उद्योतः ११३ लोचनम् वाच्यस्यैवासत्पुरुषसेवा तद्वैफल्यतत्कृतोद्वेगात्मनः शान्तरसस्थायिभूतनिर्वेद- विभावरूपतया चमत्कृतिदायित्वम् । वामनस्य तु 'उपमानाक्षेपः' इत्याक्षेपलक्ष- णम् । उपमानस्य चन्द्रादेश्चाक्षेपः; अस्मिन्सति किं त्वया कृत्यमिति । यथा— तस्यास्तन्मुखमस्ति सौम्यसुभगं किं पार्वणेनेन्दुना सौन्दर्यस्य पदं दृशौ यदि च तैः किं नाम नीलोत्पलैः । किं वा कोमलकान्तिभिः किसलयैः सत्येव तत्राधरे ही धातुः पुनरुक्तवस्तुरचनारम्भेष्वपूर्वो ग्रहः ॥ अत्र व्यङ्ग्योऽप्युपमार्थो वाच्यस्यैवोपस्कुरुते । किं तेन कृत्यमिति त्वप- हस्तनारूप आक्षेपो वाच्य एव चमत्कारकारणम् । यदि वोपमानस्याक्षेपः सामर्थ्यादाकर्षणम् । यथा— ऐन्द्रं धनुः पाण्डुपयोधरेण शरद्घनाद्र्रनखक्षताभम् । असत्पुरुष की सेवा और उसके वैफल्य तथा उससे उत्पन्न उद्वेगरूप वाच्य का शान्तरस के स्थायीभाव निर्वेद के (उद्दीपक) विभाव होने के कारण चमत्कृतिकारित्व १ है । परन्तु वामन का 'आक्षेप' लक्षण 'उपमान का आक्षेप' है । उपमान चन्द्र आदि का आक्षेप, इसके रहते तुझसे क्या होगा ? जैसे— 'सौम्य एवं सुभग उस रमणी का वह मुख विद्यमान है तो पूर्णिमा के चन्द्र से क्या ? यदि सौन्दर्य का स्थानभूत उसकी आँखें हैं तब उन नीले कमलों से क्या ? वहाँ उसके अधर के रहते कोमल कान्ति वाले किसलयों से क्या ? ओह ! एक वस्तु के बाद पुनः उसी के समान दूसरी वस्तु के निर्माण में विधाता का अपूर्व आग्रह है !' यहाँ उपमारूप अर्थ व्यंग्य होता हुआ भी वाच्य का ही उपस्कारक है । 'उससे क्या काम ?' यह 'अपहस्तना' (निराकरण) रूप 'आक्षेप' वाच्य होकर ही चमत्कार का कारण है । अथवा यदि उपमान का आक्षेप अर्थात् '(अर्थ की) सामर्थ्य से आकर्षण' है । जैसे— 'अपने पाण्डु वर्ण वाले पयोधर (मेघ, पक्ष में स्तन) से गीले नखक्षत की भाँति १. पहले प्रस्तुत उदाहरण के मूल स्वरूप पर विचार कर लेना चाहिए । इसका दूसरा चरण, जैसा कि 'तत्तादृक् तृषितस्य मे खलमतेः सोऽयं जलं गूहते' मुद्रित है, अर्थ होगा 'उस प्रकार मुझ प्यासे की और दूसरी गति क्या हो सकती है ?' यह दुष्ट मति का (मार्ग अथवा व्यक्ति) जल को छिपा लेता है । किन्तु 'बालप्रिया' में इस चरण के अन्य पाठभेद को मानकर कि 'भे खल ! सृतिः सेयं' अर्थात् रे दुष्ट पथिक ! मुझ प्यासे के लिए और दूसरी गति क्या है ?' 'यह मार्ग (सृति) जल को छिपा लेता है।' व्याख्या किया है । मैंने इन दोनों पाठों से कुछ मिलता-जुलता अर्थ किया है । यहाँ असत्पुरुष की सेवा की विफलता वाच्य हो रही है और शान्तरस व्यङ्ग्य है । 'अस्थान में पहुँचने से इष्ट का लाभ होनेवाला नहीं' इस 'आक्षेप' से वाच्य की शोभा हो रही है । चमत्कार के कम-वेश होने पर ही अप्रधानता और प्रधानता का निर्णय होता है यह सिद्धान्त मूल वृत्तिग्रन्थ में, इसी प्रसंग में आचार्य ने निर्देश कर दिया है । इस उदाहरण में 'आक्षेप' का विषय उक्त है । ८ ध्व०