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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अभ्यास करनेवाला, आत्मदर्शन- इच्छुक तथा प्रयत्नशील, कर्मफल त्यागका प्रयत्न करनेवाला, सदैव ब्रह्म चिंतनमें लीन होनेका अभ्यास करनेवाला. साधु— सज्जन, सुविचारी, सदाचारी, साधु और पापीको समान माननेवाला, साम्यवृत्तिवाला. साध्य—देवतागण विशेष, विशिष्ट साधनाके द्वारा सिद्धीतक पहुंचे हुए, जिसको पाना होता है और साधनाके द्वारा उसे पा सकते है वह. साम्यबुद्धि—विश्वात्मैक्य जन्य समत्व बुद्धि. सभी प्राणिमात्रोंमें परमात्मभाव- को अनुभवना. साम्ययोग—समतासे साधा जानेवाला योग, समता प्राप्तिके लिये कीजानेवाली साधना. साधनाके साथ समत्वका अनुभव. साम्राज्य— निष्कंटक सार्वभौम राज्य. सायास— कष्ट. सायुज्यसिद्धिदिन— अंतिम मोक्षावस्था प्राप्त होनेवाला दिवस. सार— सत्य, तत्व, तत्वांश, रहस्य, सारभाग, सारसर्वस्व, समग्रता. सारस्वत—विद्या, साहित्य, सरस्वतीका पुत्र, सरस्वती जन्य. सावध— जागृत, परमार्थके विषयमें, ज्ञानमें तत्पर, सर्वत्र ईश्वरानु- भवमें अभ्यस्त, प्रमादरहित. साक्षात्कार—प्रत्यक्ष परमात्मदर्शन, सदैव सर्वत्र परमात्मानुभूति, साक्षीभूत—केवल दर्शक, तटस्थ, घटना- ओंमें, न उलझा हुवा. सिद्ध— पूर्णावस्थाप्राप्त, सर्वत्र ब्रह्म दर्श- नके कारण सदैव निर्भय, जो पाना है उनका निश्चय किया हुवा, कृतिसे तैयार, निष्कर्ष, एक देवयोनि, प्रत्यक्ष. सिद्धप्रज्ञा— पूर्व जन्मसे परिपक्व, तथा इस जन्ममे कमायी गयी बुद्धि. सिद्धि— अष्टमहासिद्धि, पूर्णत्व प्राप्ति, जीवनकी सफलता=दैवी गुणोंका पूर्णविकास, ईश्वर भक्ति जन्य साम्य दर्शन, ईश्वरलीनता, कर्मकी थकानसे मुक्ति, न करनेकासा कर्म रत रहनेकी क्षमता, शून्यवत् रहना. सुवृततरु- पुण्य कर्मोंका वृक्ष. सुखाभास— सुखका आभास. सुधाब्धि— अमृतका समुद्र. सुप्रभ— तेजस्वी. सुभग— उत्तम दैवका. सुभावभजनभाजन— शुद्धभावनासे भजन करने योग्य. सुमनस— अच्छे मनका, शुभ संकल्पोंका. सुरतरु— कल्पवृक्ष. सुविमल— अतिशय निर्मल. सुस्ताना— आराम करना, विश्रांति लेना. सुहृद्वजन— बदलेकी भावनाके बिना उपकार करनेवाले सज्जन मित्र. सूत्रकार— धर्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्रके सूत्रोंके रचयिता. सूत्रधार— कठपुतलीके नाचमें सूत हिलाने- वाला. सूर्यकांत— सूर्यकांतमणि, जो सूर्यकिरणोंको एकत्र करके उष्णता निर्माण करता है. सृष्टि— सृजन, उत्पत्ती, भूतसृष्टि, सेवा— परिचर्या, उपासना, भक्तिकरना. सैंतीस— छत्तीस तत्व, देखो, पांचवा परिशिष्ट. सोंधणी— सुगंध. सोऽहंबोध— वह आत्मा मैं हूं अथवा वह ब्रह्म मैं हूं इसकी अनुभूति. सोऽहंभाव— सोऽहं बोधमें स्थिर रहना. सौरभ— सुगंध. २२३ परिशिष्ट ६

स्तवन- स्तुति. स्ताव्य- स्तुतिका विषय. स्तोत्र- स्तुति, ईश्वर-स्तवनार्थ बनायेगये विशिष्ट प्रकारके काव्य. स्थावर- अचल हलचल न कर सकनेवाला स्थित- स्थिर, अस्तित्व, अपने स्थान पर अधिष्ठित, स्वप्रमाणपर जमा हुवा. स्थितप्रज्ञ- जिसकी बुद्धि समाधिमें स्थिर है वह, आदर्श-सिद्धांत तथा उसके व्यवहार-कुशलतामें जो प्रवीण है ऐसा, सभी इच्छाओंका अतिक्र- मण करके अपनेमें अपनेसे निरा- लंब आनंदमे स्थिर है वह, गीताका आदर्श पुरुष. स्नेहाद्रंचित्त-स्नेह वात्सल्यपूर्ण चित्त. स्फुरदमंदामंदवत्सल-सदैव स्फुरनेवाले आनंदसे भरा हुवा. स्वजनवनचंदन-अपने भक्तोंके समूहमें चंदनरूप. स्वसंविद्रुमबीजप्रसभूमिरूप स्वसंवित् रूप स्वरूपज्ञानरूपी वृक्षका बीज पडने योग्य भूमिरूप. स्वसंवेद्य अपने आप जानने योग्य. ह हडप — मूल शब्द कन्नड भाषाका, क्षौर सामग्री रखनेका नाईका थैला. किंतु महाराष्ट्रमें इसको पानदानके रूपमें स्वीकार किया गया है. हरना- हरण करना, दूर करना, फैलाना, पीछे हटाना.

हरित-हरे रंगका. हर्ष-आनंद. हवि-हवनद्रव्य. हस्तोदक-हाथपर पानी छोड़कर दान देना, हतोदक देना. हिमवंत-हिमाचल. हिय-हृदय. हृदयकमल आराम-हृदयरूपी कमलमें विश्रांति लेनेवाला. हृदयस्थ-हृदयमें रहनेवाला. हेतुमंत-युक्तित्राला. क्ष क्षमा-सहनशीलता अपराध, सहिष्णुता. क्षय- मरण, नाश क्षर- नाशवंत. क्षितीश- राजा. क्षीण- क्षय होनेवाला, समाप्त होनेवाला. क्षीरसागर- दूध का सागर. क्षीरार्णवकल्लोल-लहरानेवाले दूध-सागरका कल्लोल. क्षुद्रघंटिका- घुंगरू. क्षुब्ध- चंचल, अधीर, क्रुद्ध, भीत. क्षेत्र- खेत, मैदान, पवित्रस्थान, गीतामें जीवात्माका क्षेत्र शरीर, भूतोंका उत्पत्तिस्थल. क्षेत्रसंन्यास- स्थान निष्ठा संन्यास, यह अंतिमस्थान स्थान है इस भावसे एकही स्थान पर रहनेका निश्चय और प्रयत्न करना. क्षेत्रसंन्यासी- क्षेत्रसंन्यास लिया हुवा. क्षेत्रज्ञ- शरीररूप क्षेत्रका साक्षीरूप जीव. क्षेम- मोक्ष विषयक उपलब्धीका रक्षण.

ॐ ज्ञानेश्वरी २२४

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