भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ
५००संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

पीड़ाएँ हैं, उनका मैं वर्णन कर रहा हूँ। जब स्त्रियोंका ऋतुकाल निष्फल हो जाता है, वंशवृद्धि नहीं होती है। अल्पायुमें ही किसी परिजनकी मृत्यु हो जाती है तो उसे प्रेतोत्पन्न पीड़ा माननी चाहिये। अकस्मात् जब जीविका छिन जाती है, लोगोंके बीच अपनी प्रतिष्ठा विनष्ट हो जाती है, एकाएक घर जलकर नष्ट हो जाता है तो उसे प्रेतजन्य पीड़ा ही मानें। जब अपने घरमें नित्य कलह हो, मिथ्यापवाद हो, राजयक्ष्मा आदि रोग उत्पन्न हो जायें तो उसे प्रेतोद्भूत पीड़ा समझे। जब अपने प्राचीन अनिन्दित व्यापार-मार्गमें प्रयत्न करनेपर भी मनुष्यको सफलता नहीं मिलती है, उसमें लाभ नहीं होता है, अपितु हानि ही उठानी पड़ती है तो उस पीड़ाको भी प्रेतजन्य ही मानें। जब अच्छी वर्षा होनेपर भी कृषि विनष्ट हो जाती है, व्यापारमें प्राणीकी जीविका भी चली जाती है, अपनी स्त्री अनुकूल नहीं रह जाती है तो उस पीड़ाको भी प्रेतसमुद्भूत माननी चाहिये। हे राजन्! इसी प्रकारकी अन्य पीड़ाओंसे आप प्रेतत्वका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

हे राजेन्द्र! जब मनुष्य वृषोत्सर्ग करता है, तब जाकर वह प्रेतत्वसे मुक्त होता है। आपका इस कार्यमें अधिकार है, इसलिये कृपया आप मेरे उद्देश्यसे वृषोत्सर्ग करें। आप इस मणिरत्नको ग्रहण करें। इसीके धनसे मेरे लिये वृषोत्सर्ग करें। यह कार्य कार्तिककी पूर्णिमा अथवा आश्विनमासके मध्यकालमें करना चाहिये। हे राजन्! मेरा यह संस्कार रेवतीनक्षत्रसे युक्त तिथिमें भी हो सकता है। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके विधिवत् अग्निस्थापन तथा वेद-मन्त्रोंके द्वारा यथाविधान होम करें। बहुत-से ब्राह्मणोंको बुलाकर इस रत्नसे प्राप्त हुए धनके द्वारा उन्हें भोजन करायें। ऐसा करनेसे मुझे मुक्ति प्राप्त हो सकेगी।

श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश! इसके बाद राजाने उस प्रेतसे 'ऐसा ही होगा', यह कहकर मणि ले ली। जो व्यक्ति धन ले लेता है, वह भी उस दाताकी क्रिया करनेका अधिकारी हो जाता है। प्रेतविषयक इस प्रकारकी वार्ता उन दोनोंके मध्य जिस समय चल रही थी, उसी समय देखते-ही-देखते वहाँ घण्टा और भेरियोंकी ध्वनि करती हुई राजाकी चतुरंगिणी सेना आ गयी। उस सेनाके आते ही प्रेत अदृश्य हो गया। उसके बाद उस वनसे निकलकर राजा अपने नगर चला आया। तदनन्तर उसने कार्तिक-मासकी पूर्णिमा तिथि आनेपर उस प्राप्त हुई मणिके धनसे प्रेतत्वनिवृत्तिके लिये विधिवत् वृषोत्सर्ग किया। हे गरुड! उस संस्कारके पूर्ण होते ही वह प्रेत भी तत्काल सुवर्ण देहसे सुशोभित हो उठा और उसने राजाको प्रणाम किया। तत्पश्चात् उस राजाकी प्रशंसा करते हुए प्रेतने कहा— हे देव! यह सब आपकी महिमा है। इस प्रकार राजाके द्वारा किये गये उपकारके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए वह स्वर्गलोकको चला गया। जिस प्रकार राजाके द्वारा किये गये संस्कारसे वह प्रेत अपने प्रेतत्वसे मुक्त हुआ था, वह सब वृत्तान्त मैंने तुम्हें सुना दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय ९)


२२८- वृषोत्सर्ग तथा सत्कर्मकी महिमा

प्रेतकल्प ]श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना५०१

श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना, दृष्टान्तरूपमें देवी सीताद्वारा भोजन करते हुए ब्राह्मणके शरीरमें महाराज दशरथ आदिका दर्शन करना, मृत्युके अनन्तर दूसरे शरीरकी प्राप्ति, सत्कर्मकी महिमा तथा पिण्डदानसे शरीरका निर्माण

गरुडने कहा— हे प्रभो! सपिण्डीकरण और वार्षिक श्राद्ध करनेके पश्चात् मृत व्यक्ति स्वकर्मानुसार देवत्व, मनुष्यत्व अथवा पक्षित्वको प्राप्त करता है। फिर भिन्न-भिन्न आहारवाले उन लोगोंके लिये किये गये श्राद्ध, ब्राह्मण-भोजन और होमसे उन्हें कैसे संतृप्ति होती है? अपने शुभाशुभ कर्मोंके द्वारा प्राप्त हुई प्रेतयोनिमें स्थित वह प्राणी अपने सम्बन्धियोंसे प्राप्त उस भोज्य पदार्थका उपभोग कैसे करता है? श्राद्धकी आवश्यकता तो मैंने अमावास्यादि तिथियोंमें सुनी है। [यह बतलानेकी कृपा करें।]

श्रीभगवान्‌ने कहा— हे पक्षिराज! श्राद्ध प्रेतजनोंको जिस प्रकारसे तृप्ति प्रदान करता है, उसे सुनो। मनुष्य अपने कर्मानुसार यदि देवता हो जाता है तो श्राद्धान्न अमृत होकर उसे प्राप्त होता है तथा वही अन्न गन्धर्व-योनिमें भोगरूपसे और पशुयोनिमें तृणरूपमें प्राप्त होता है। वही श्राद्धान्न नागयोनिमें वायुरूपसे, पक्षीकी योनिमें फलरूपसे और राक्षसयोनिमें आमिष बन जाता है। वही श्राद्धान्न दानव-योनिके लिये मांस, प्रेतके लिये रक्त, मनुष्यके लिये अन्न-पानादि तथा बाल्यावस्थामें भोगरस हो जाता है*।

गरुडने कहा— हे स्वामिन्! इस लोकमें मनुष्योंके द्वारा दिये गये हव्य-कव्य पदार्थ पितृलोकमें कैसे जाते हैं? उनको प्राप्त करानेवाला कौन है? यदि श्राद्ध मरे हुए प्राणियोंके लिये भी तृप्ति प्रदान करनेवाला है तो बुझे हुए दीपकका तेल भी उसकी लौको बढ़ा सकता है। मरे हुए पुरुष अपने कर्मानुसार गति प्राप्त करते हैं तो अपने पुत्रके द्वारा दिये गये पुण्य कर्मोंके फल वे कैसे प्राप्त कर सकेंगे?

श्रीभगवान्‌ने कहा— हे तार्क्ष्य! प्रत्यक्षकी अपेक्षा श्रुतिका प्रमाण बलवान् होता है। श्रुतिसे प्राप्त हुए ज्ञानका स्वरूप अमृतादिके समान होता है। श्राद्धमें उच्चरित पितरोंके नाम तथा गोत्र हव्य-कव्यके प्रापक हैं। भक्तिपूर्वक पढ़े गये मन्त्र श्राद्धके प्रापक होते हैं। हे सुपर्ण! ये अचेतन मन्त्र कैसे उस श्राद्धको प्राप्त करा सकते हैं, इस विषयमें तुम्हें संशय नहीं रखना चाहिये। अस्तु, इसे समझनेके लिये मैं तुम्हें दूसरा प्रापक बता रहा हूँ। अग्निष्वात्त आदि पितृगण उन पितरोंके राजपदपर नियुक्त हैं। समय आनेपर विधिवत् प्रतिपादित अन्न, अभीष्ट पितृपात्रमें पहुँच जाता है। जहाँ वह जीव रहता है, वहाँ ये अग्निष्वात्त आदि पितृदेव ही अन्न लेकर जाते हैं। नाम-गोत्र और मन्त्र ही उस दान दिये गये अन्नको ले जाते हैं। शतशः योनियोंमें जो जीव जिस योनिमें स्थित रहता है उस योनिमें उसे


* देवो यदपि जातोऽयं मनुष्यः कर्मयोगतः ॥
तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्वेऽप्यनुयाति च। गान्धर्वे भोगरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत् ॥
श्राद्धं हि वायुरूपेण नागत्वेऽप्यनुगच्छति। फलं भवति पक्षित्वे राक्षसेषु तथामिषम् ॥
दानवत्वे तथा मांसं प्रेतत्वे रुधिरं तथा। मनुष्यत्वेऽन्नपानादि बाल्ये भोगरसो भवेत् ॥ (१०।४—७)

२२९- और्ध्वदेहिक क्रिया, गोदान एवं वृषोत्सर्गका माहात्म्य

५०२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

नाम-गोत्रके उच्चारणसे तृप्ति प्राप्त होती है। संस्कार करनेवाले व्यक्तिके द्वारा कुशाच्छादित पृथ्वीपर दाहिने कन्धेपर यज्ञोपवीत करके दिये गये तीन पिण्ड उन पितरोंको संतुष्टि प्रदान करते हैं।

पितर जिस योनिमें, जिस आहारवाले होते हैं, उन्हें श्राद्धके द्वारा वहाँ उसी प्रकारका आहार प्राप्त होता है। गायोंका झुंड तितर-बितर हो जानेपर भी बछड़ा अपनी माताको जैसे पहचान लेता है, वैसे ही वह जीव जहाँ जिस योनिमें रहता है, वहाँ पितरोंके निमित्त ब्राह्मणको कराया गया श्राद्धान्न स्वयं उसके पास पहुँच जाता है—

यदाहारा भवन्त्येते पितरो यत्र योनिषु।
तासु तासु तदाहारः श्राद्धान्नेनोपतिष्ठति॥
यथा गोषु प्रनष्टासु वत्सो विन्दति मातरम्।
तथान्नं नयते विप्रो जन्तुर्यत्रावतिष्ठते॥

<div style="text-align: right;">(१०।१९-२०)</div>

पितृगण सदैव विश्वेदेवोंके साथ श्राद्धान्न ग्रहण करते हैं। ये ही विश्वेदेव श्राद्धका अन्न ग्रहण कर पितरोंको संतृप्त करते हैं। वसु, रुद्र, देवता, पितर तथा श्राद्धदेवता श्राद्धोंमें संतृप्त होकर श्राद्ध करनेवालोंके पितरोंको प्रसन्न करते हैं। जैसे गर्भिणी स्त्री दोहद (गर्भावस्थामें विशेष भोजनकी अभिलाषा)-के द्वारा स्वयंको और अपने गर्भस्थ जीवको भी आहार पहुँचाकर प्रसन्न करती है, वैसे ही देवता श्राद्धके द्वारा स्वयं संतुष्ट होते हैं और पितरोंको भी संतुष्ट करते हैं—

आत्मानं गुर्विणी गर्भमपि प्रीणाति वै यथा।
दोहदेन तथा देवाः श्राद्धैः स्वांश्च पितॄन् नृणाम्॥

<div style="text-align: right;">(१०।२३)</div>

'श्राद्धका समय आ गया है'—ऐसा जानकर पितरोंको प्रसन्नता होती है। वे परस्पर ऐसा विचार करके उस श्राद्धमें मनके समान तीव्रगतिसे आ पहुँचते हैं। अन्तरिक्षगामी वे पितृगण उस श्राद्धमें ब्राह्मणोंके साथ ही भोजन करते हैं। वे वायुरूपमें वहाँ आते हैं और भोजन करके परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं। हे पक्षिन्! श्राद्धके पूर्व जिन ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया जाता है, पितृगण उन्हींके शरीरमें प्रविष्ट होकर वहाँ भोजन करते हैं और उसके बाद वे पुनः वहाँसे अपने लोकको चले जाते हैं—

निमन्त्रितास्तु ये विप्राः श्राद्धपूर्वदिने खग।
प्रविश्य पितरस्तेषु भुक्त्वा यान्ति स्वमालयम्॥

<div style="text-align: right;">(१०।२६)</div>

यदि श्राद्धकर्ता श्राद्धमें एक ही ब्राह्मणको निमन्त्रित करता है तो उस ब्राह्मणके उदरभागमें पिता, वामपार्श्वमें पितामह, दक्षिणपार्श्वमें प्रपितामह और पृष्ठभागमें पिण्डभक्षक पितर रहता है। श्राद्धकालमें यमराज प्रेत तथा पितरोंको यमलोकसे मृत्युलोकके लिये मुक्त कर देते हैं। हे काश्यप! नरक भोगनेवाले भूख-प्याससे पीड़ित पितृजन अपने पूर्वजन्मके किये गये पापका पश्चात्ताप करते हुए अपने पुत्र-पौत्रोंसे मधुमिश्रित पायसकी अभिलाषा करते हैं। अतः विधिपूर्वक पायसके द्वारा उन पितृगणोंको संतृप्त करना चाहिये।

गरुडने कहा— हे स्वामिन्! उस लोकसे आकर इस पृथ्वीपर श्राद्धमें भोजन करते हुए पितरोंको किसीने देखा भी है?

श्रीभगवान्ने कहा— हे गरुत्मन्! सुनो—देवी सीताका उदाहरण है। जिस प्रकार सीताने पुष्करतीर्थमें अपने ससुर आदि तीन पितरोंको श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणके शरीरमें प्रविष्ट हुआ देखा था, उसको मैं कह रहा हूँ।

हे गरुड! पिताकी आज्ञा प्राप्त करके जब श्रीराम वन चले गये तो उसके बाद सीताके साथ श्रीरामने पुष्कर-तीर्थकी यात्रा की। तीर्थमें पहुँचकर उन्होंने श्राद्ध करना प्रारम्भ किया। जानकीने एक

प्रेतकल्प ] श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना ५०३


पके हुए फलको सिद्ध करके रामके सामने उपस्थित किया। श्राद्धकर्ममें दीक्षित प्रियतम रामकी आज्ञासे स्वयं दीक्षित होकर सीताने उस धर्मका सम्यक् पालन किया। उस समय सूर्य आकाशमण्डलके मध्य पहुँच गये और कुतुपमुहूर्त (दिनका आठवाँ मुहूर्त) आ गया था। श्रीरामने जिन ऋषियोंको निमन्त्रित किया था, वे सभी वहाँपर आ गये थे। आये हुए उन ऋषियोंको देखकर विदेहराजकी पुत्री जानकी रामकी आज्ञासे अन्न परोसनेके लिये वहाँ आयीं; किंतु ब्राह्मणोंके बीच जाकर वे तुरंत वहाँसे दूर चली गयीं और लताओंके मध्य छिपकर बैठ गयीं। सीता एकान्तमें छिप गयी हैं, इस बातको जानकर श्रीरामने यह

विचार किया कि ब्राह्मणोंको बिना भोजन कराये साध्वी सीता लज्जाके कारण कहीं चली गयी होंगी, पहले मैं इन ब्राह्मणोंको भोजन करा लूँ फिर उनका अन्वेषण करूँगा। ऐसा विचारकर श्रीरामने स्वयं उन ब्राह्मणोंको भोजन कराया। भोजनके बाद उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके चले जानेपर श्रीरामने अपनी प्रियतमा सीतासे कहा कि ब्राह्मणोंको देखकर तुम लताओंकी ओटमें क्यों छिप गयी? हे तन्वङ्गी! तुम इसका समस्त कारण अविलम्ब मुझे बताओ। श्रीरामके ऐसा कहनेपर सीता मुँहको नीचे कर सामने खड़ी हो गयीं और अपने नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई रामसे बोलीं—

सीताजीने कहा— हे नाथ! मैंने यहाँ जिस प्रकारका आश्चर्य देखा उसे आप सुनें। हे राघव! इस श्राद्धमें उपस्थित ब्राह्मणके अग्रभागमें मैंने आपके पिताका दर्शन किया, जो सभी आभूषणोंसे सुशोभित थे। उसी प्रकारके अन्य दो महापुरुष भी उस समय मुझे दिखायी पड़े। आपके पिताको देखकर मैं बिना बताये एकान्तमें चली आयी थी। हे प्रभो! वल्कल और मृगचर्म धारण किये हुए मैं कैसे राजा (दशरथ)-के सम्मुख जा सकती थी। हे शत्रुपक्षके वीरोंका विनाश करनेवाले प्राणनाथ! मैं आपसे यह सत्य ही कह रही हूँ, अपने हाथसे राजाको मैं वह भोजन कैसे दे सकती थी, जिसके दासोंके भी दास कभी भी वैसा भोजन नहीं करते रहे? तृणपात्रमें उस अन्नको रखकर मैं कैसे उन्हें ले जाकर देती? मैं तो वही हूँ जो पहले सभी प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित रहती थी और राजा मुझे वैसी स्थितिमें देख चुके थे। आज वही मैं कैसे राजाके सामने जा पाती? हे रघुनन्दन! उसीसे मनमें आयी हुई लज्जाके कारण मैं वापस हो गयी।

श्रीभगवान्‌ने कहा— हे गरुड! अपनी पत्नीके ऐसे वचनोंको सुनकर श्रीरामका मन विस्मित हो उठा। यह तो आश्चर्य है; ऐसा कहकर वे अपने स्थानपर चले आये। सीताने जिस प्रकार अपने पितरोंका दर्शन किया था, उसी प्रकार तुम्हें मैंने सुना दिया। अब मैं संक्षेपमें श्राद्धका माहात्म्य बता रहा हूँ, सुनो—

पितृगण अमावास्याके दिन वायुरूपमें घरके दरवाजेपर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनोंसे

५०४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

श्राद्धकी अभिलाषा करते हैं। जबतक सूर्यास्त नहीं हो जाता, तबतक वे वहीं भूख-प्याससे व्याकुल होकर खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जानेके पश्चात् वे निराश होकर दुःखित मनसे अपने वंशजोंकी निन्दा करते हैं और लम्बी-लम्बी साँस खींचते हुए अपने-अपने लोकोंको चले जाते हैं। अतः प्रयत्नपूर्वक अमावास्याके दिन श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। यदि पितृजनोंके पुत्र तथा बन्धु-बान्धव उनका श्राद्ध करते हैं और गया-तीर्थमें जाकर इस कार्यमें प्रवृत्त होते हैं तो वे उन्हीं पितरोंके साथ ब्रह्मलोकमें निवास करनेका अधिकार प्राप्त करते हैं। उन्हें भूख-प्यास कभी नहीं लगती। इसीलिये विद्वान्‌को प्रयत्नपूर्वक यथाविधि शाक-पातसे भी अपने पितरोंके लिये श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। समयानुसार श्राद्ध करनेसे कुलमें कोई दुःखी नहीं रहता। पितरोंकी पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्यसे भी पितृकार्यका विशेष महत्त्व है। देवताओंसे पहले पितरोंको प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है—

कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।
आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्॥
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।
देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते॥
देवताभ्यः पितॄणां हि पूर्वमाप्यायनं शुभम्।

<p align="right">(१०।५७-५९)</p>

जो लोग अपने पितृगण, देवगण, ब्राह्मण तथा अग्निकी पूजा करते हैं, वे सभी प्राणियोंकी अन्तरात्मामें समाविष्ट मेरी ही पूजा करते हैं। शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य ब्रह्मपर्यन्त समस्त चराचर जगत्‌को प्रसन्न कर लेता है।

हे आकाशचारिन् गरुड! मनुष्योंके द्वारा श्राद्धमें पृथ्वीपर जो अन्न बिखेरा जाता है, उससे जो पितर पिशाच-योनिमें उत्पन्न हुए हैं, वे संतुष्ट होते हैं। श्राद्धमें स्नान करनेसे भीगे हुए वस्त्रोंद्वारा जो जल पृथ्वीपर गिरता है, उससे वृक्षयोनिको प्राप्त हुए पितरोंकी संतुष्टि होती है। उस समय जो गन्ध तथा जल भूमिपर गिरता है, उससे देवत्व-योनिको प्राप्त पितरोंको सुख प्राप्त होता है। जो पितर अपने कुलसे बहिष्कृत हैं, क्रियाके योग्य नहीं हैं, संस्कारहीन और विपन्न हैं, वे सभी श्राद्धमें विकिरान्न और मार्जनके जलका भक्षण करते हैं। श्राद्धमें भोजन करके ब्राह्मणोंके द्वारा आचमन एवं जलपान करनेके लिये जो जल ग्रहण किया जाता है, उस जलसे उन पितरोंको संतृप्ति प्राप्त होती है। जिन्हें पिशाच, कृमि और कीटकी योनि मिली है तथा जिन पितरोंको मनुष्य-योनि प्राप्त हुई है, वे सभी पृथ्वीपर श्राद्धमें दिये गये पिण्डोंमें प्रयुक्त अन्नकी अभिलाषा करते हैं, उसीसे उन्हें संतृप्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्योंके द्वारा विधिपूर्वक श्राद्ध किये जानेपर जो शुद्ध या अशुद्ध अन्न तथा जल फेंका जाता है, उससे जिन्होंने अन्य जातिमें जाकर जन्म लिया है, उनकी तृप्ति होती है। जो मनुष्य अन्यायपूर्वक अर्जित किये गये पदार्थोंसे श्राद्ध करते हैं, उस श्राद्धसे नीच योनियोंमें जन्म ग्रहण करनेवाले चाण्डाल पितरोंकी तृप्ति होती है।

हे पक्षिन्! इस संसारमें श्राद्धके निमित्त जो कुछ भी अन्न, धन आदिका दान अपने बन्धु-बान्धवोंके द्वारा दिया जाता है, वह सब पितरोंको प्राप्त होता है। अन्न, जल और शाक-पात आदिके द्वारा यथासामर्थ्य जो श्राद्ध किया जाता है, वह सब पितरोंकी तृप्तिका हेतु है। तुमने इस विषयमें जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। तुम अब जो यह पूछ रहे हो कि मृत्युके बाद प्राणीको

२३०- मरनेके समय तथा मृत्युके अनन्तर किये जानेवाले कर्म, पापात्माओंको रौद्ररूपमें तथा पुण्यात्माओंको सौम्यरूपमें यम-दर्शन, यमदूतोंद्वारा दी जानेवाली यातनाका स्वरूप, शवके निमित्त प्रदत्त छः पिण्डोंका प्रयोजन, शवदाहकी विधि, संक्षेपमें दशाहासे त्रयोदशाहतकके कृत्य, यममार्गमें पड़नेवाले सोलह पुर तथा प्रेतका विलाप

प्रेतकल्प ] श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना ५०५


तत्काल दूसरे शरीरकी प्राप्ति हो जाती है? अथवा विलम्बसे उसको दूसरे शरीरमें जाना पड़ता है? वह मैं तुम्हें संक्षेपमें बता रहा हूँ।

हे गरुड! प्राणी मृत्युके पश्चात् दूसरे शरीरमें तुरंत भी प्रविष्ट हो सकता है और विलम्बसे भी। मनुष्य जिस कारण दूसरे शरीरको प्राप्त करता है, उस वैशिष्ट्यको तुम मुझसे सुनो। शरीरके अंदर जो धूमरहित ज्योतिके सदृश प्रधान पुरुष जीवात्मा विद्यमान रहता है, वह मृत्युके बाद तुरंत ही वायवीय शरीर धारण कर लेता है। जिस प्रकार एक तृणका आश्रय लेकर स्थित जोंक दूसरे तृणका आश्रय लेनेके बाद पहलेवाले तृणके आश्रयसे अपने पैरको आगे बढ़ाता है, उसी प्रकार शरीरी पूर्व-शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है। उस समय भोगके लिये वायवीय शरीर सामने ही उपस्थित रहता है। मरनेवाले शरीरके अंदर विषय ग्रहण करनेवाली इन्द्रियाँ उसके निश्चेष्ट (निर्व्यापार) हो जानेपर वायुके साथ चली जाती हैं। वह जिस शरीरको प्राप्त करता है उसको भी छोड़ देता है। जैसे स्त्रीके शरीरमें स्थित गर्भ उसके अन्नादिक कोशसे शक्ति ग्रहण करता है और समय आनेपर उसे छोड़कर वह बाहर आ जाता है, वैसे ही जीव अपना अधिकार लेकर दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। उस एक शरीरमें प्रविष्ट होते हुए प्राणीके कालक्रम, भोजन या गुण-संक्रमणकी जो स्थिति है उसे मूर्ख नहीं, अपितु ज्ञानी व्यक्ति ही देखते हैं।

विद्वान् लोग इसको आतिवाहिक वायवीय शरीर कहते हैं। हे सुपर्ण! भूत-प्रेत और पिशाचोंका शरीर तथा मनुष्योंका पिण्डज शरीर भी ऐसा ही होता है।

हे पक्षीन्द्र! पुत्रादिके द्वारा जो दशगात्रके पिण्डदान दिये जाते हैं, उस पिण्डज शरीरसे वायवीय शरीर एकाकार हो जाता है। यदि पिण्डज देहका साथ नहीं होता है तो वायुज शरीर कष्ट भोगता है। प्राणीके इस शरीरमें जैसे कौमार्य, यौवन और बुढ़ापेकी अवस्थाएँ आती हैं, वैसे ही दूसरे शरीरके प्राप्त होनेपर भी तुम्हें समझना चाहिये। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रोंका परित्याग कर नये वस्त्रोंको धारण कर लेता है, उसी प्रकार शरीरी पुराने शरीरका परित्याग कर नये शरीरको धारण करता है। इस शरीरीको न शस्त्र छेद सकता है, न अग्नि जला सकती है, न जल आर्द्र कर सकता है और न वायु सुखा सकती है—

देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिः पक्षीन्द्रेत्यवधारय॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
(१०।८३-८५)

जीव तत्काल वायवीय शरीरमें प्रवेश कर लेता है, यह तो मैंने तुम्हें बता दिया; अब जीवात्माको विलम्बसे जैसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है, उसको तुम मुझसे सुनो।

हे गरुड! कोई-कोई जीवात्मा पिण्डज शरीर विलम्बसे प्राप्त करता है; क्योंकि मृत्युके बाद वह स्वकर्मानुसार यमलोकको जाता है। चित्रगुप्तकी आज्ञासे वह वहाँ नरक भोगता है। वहाँकी यातनाओंको झेलनेके पश्चात् उसे पशु-पक्षी आदिकी योनि प्राप्त होती है। मनुष्य जिस शरीरको ग्रहण करता है, उसी शरीरमें मोहवश उसकी ममता हो जाती है। शुभाशुभ कर्मोंके फल भोगकर मनुष्य इससे मुक्त भी हो जाता है।

गरुडने कहा— हे दयानिधे! बहुत-से पापोंको

५०६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-

करनेके बाद भी इस संसारको पार करके प्राणी आपको कैसे प्राप्त कर सकता है? उसे आप मुझे बतायें। हे लक्ष्मीरमण! जिस प्रकार मनुष्यका संसर्ग पुनः दुःखसे न हो उस उपायको बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षिराज! प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने कर्ममें रत रहकर संसिद्धि प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें अनुरक्त रहकर वह उस सिद्धिको जिस प्रकार प्राप्त करता है, उसको तुम मुझसे सुनो—

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ (१०।९२)

हे कश्यपनन्दन! सत्कर्मसे जिसने अपने कालुष्यको नष्ट कर दिया है, वह व्यक्ति वासुदेवके निरन्तर चिन्तनसे विशुद्ध हुई बुद्धिसे युक्त होकर धैर्यसे अपना नियमन करके स्थिर रहता है, जो शब्दादि विषयोंका परित्याग कर राग-द्वेषको छोड़कर विरक्तसेवी और यथाप्राप्त भोजनसे संतुष्ट रहता है, जिसका मन-वाणी-शरीर संयमित है, जो वैराग्य धारणकर नित्य ध्यान-योगमें तत्पर रहता है, जो अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह—इन षड्विकारोंका परित्याग करके निर्भय होकर शान्त हो जाता है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। इसके बाद मनुष्योंके लिये कुछ करना शेष नहीं रह जाता—

कर्मविभ्रष्टकालुष्यो वासुदेवानुचिन्तया।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च॥
शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।
विरक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः॥
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्॥
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।
अतः परं नृणां कृत्यं नास्ति कश्यपनन्दन॥
(१०।९३—९६)
(अध्याय १०)

जीवकी ऊर्ध्वगति एवं अधोगतिका वर्णन

गरुडजीने कहा—हे देवश्रेष्ठ! मनुष्ययोनि कैसे प्राप्त होती है? मनुष्य कैसे मृत्युको प्राप्त होता है? शरीरका आश्रय लेकर कौन मरता है? उसकी इन्द्रियाँ कहाँसे कहाँ चली जाती हैं? मनुष्य कैसे अस्पृश्य हो जाता है? यहाँ किये हुए कर्मको कहाँ और कैसे भोगता है और कहाँ कैसे जाता है? यमलोक और विष्णुलोकको मनुष्य कैसे जाता है? हे प्रभो! आप मुझपर प्रसन्न हों। मेरे इस सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे विनतानन्दन! परायी स्त्री और ब्राह्मणके धनका अपहरण करके प्राणी अरण्य एवं निर्जन स्थानमें रहनेवाले ब्रह्मराक्षसकी योनिको प्राप्त करता है। रत्नोंकी चोरी करनेवाला मनुष्य नीच जातिके घर उत्पन्न होता है। मृत्युके समय उसकी जो-जो इच्छाएँ होती हैं, उन्हींके वशीभूत हो वह उन-उन योनियोंमें जाकर जन्म लेता है। इस जीवात्माका छेदन शस्त्र नहीं कर सकता, अग्नि इसको जलानेमें समर्थ नहीं है, जल इसे आर्द्र नहीं कर सकता और वायुके द्वारा इसका शोषण सम्भव नहीं है।

हे पक्षिन्! मुख, नेत्र, नासिका, कान, गुदा और मूत्रनली—ये सभी छिद्र अण्डजादि जीवोंके शरीरमें विद्यमान रहते हैं। नाभिसे मूर्धापर्यन्त शरीरमें आठ छिद्र हैं। जो सत्कर्म करनेवाले पुण्यात्मा हैं, उनके प्राण शरीरके ऊर्ध्व छिद्रोंसे निकलकर परलोक जाते हैं। मृत्युके दिनसे लेकर एक वर्षतक जैसी विधि पहले बतायी गयी है, उसीके अनुसार सभी और्ध्वदैहिक श्राद्धादि संस्कार

प्रेतकल्प ] चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्यजन्मकी श्रेष्ठता ५०७


निर्धन होनेपर भी यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक करने चाहिये। जीव जिस शरीरमें वास करता है उसी शरीरमें वह अपने शुभाशुभ कर्मफलका भोग करता है। हे पक्षिराज! मन, वाणी और शरीरके द्वारा किये गये दोषोंको वह भोगता है। जो [अनासक्तभावसे] सत्कर्ममें रत रहता है, वह मृत्युके बाद सुखी रहता है और सांसारिकताके मायाजालमें नहीं फँसता। जो विकर्ममें निरत रहता है वह मनुष्य पाशबद्ध हो जाता है।
(अध्याय ११)


चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्यजन्मकी श्रेष्ठता, मनुष्यमात्रका एकमात्र कर्तव्य — धर्माचरण

श्रीकृष्णजीने कहा—हे तार्क्ष्य! मनुष्योंके हित एवं प्रेतत्वकी विमुक्तिके लिये जीवित प्राणीके कर्म-विधानका निर्णय मैंने तुम्हें सुना दिया। इस संसारमें चौरासी लाख योनियाँ हैं। उनका विभाजन चार प्रकारके जीवोंमें हुआ है। उन्हें अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज कहा जाता है। इक्कीस लाख योनियाँ अण्डज मानी गयी हैं। इसी प्रकार क्रमशः स्वेदज, उद्भिज्ज तथा जरायुज योनियोंके विषयमें भी कहा गया है। मनुष्यादि योनियाँ जरायुज कही जाती हैं। इन सभी प्राणियोंमें मनुष्ययोनि परम दुर्लभ है। पाँच इन्द्रियोंसे युक्त यह योनि प्राणीको बड़े ही पुण्यसे प्राप्त होती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चार वर्ण हैं। रजक, चमार, नट, बंसखोर, मछुआरा, मेद तथा भिल्ल—ये सात अन्त्यज जातियाँ मानी गयी हैं। म्लेच्छ और तुम्बु जातिके भेदसे अनेक प्रकारकी जातियाँ हो जाती हैं। जीवोंके हजारों भेद हैं। आहार, मैथुन, निद्रा, भय और क्रोध—ये कर्म सभी प्राणियोंमें पाये जाते हैं, किंतु विवेक सभीमें परम दुर्लभ है। एक पाद, दो पाद आदिके भेदसे शारीरिक संरचनामें भी अनेक भेद प्राप्त होते हैं।

जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग रहता है, वह धर्मदेश कहलाता है। सब प्रकारसे ब्रह्मा आदि देवता वहीं निवास करते हैं। पञ्चमहाभूतोंमें प्राणी, प्राणियोंमें बुद्धिजीवी, बुद्धिजीवियोंमें मनुष्य और मनुष्योंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ है। स्वर्ग और मोक्षके साधनभूत मनुष्ययोनिको प्राप्त करके जो प्राणी इन दोनोंमेंसे एक भी लक्ष्य सिद्ध नहीं कर पाता, निश्चित ही उसने अपनेको ठग दिया। सौका मालिक एक हजार और एक हजारवाला व्यक्ति लाखकी पूर्तिमें लगा रहता है। जो लक्षाधिपति है वह राज्यकी इच्छा करता है। जो राजा है वह सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने वशमें रखना चाहता है। जो चक्रवर्ती नरेश है वह देवत्वकी इच्छा करता है। देवत्व-पदके प्राप्त होनेपर उसकी अभिलाषा देवराज इन्द्रके पदके लिये होती है और देवराज होनेपर वह ऊर्ध्वगतिकी कामना करता है; फिर भी उसकी तृष्णा शान्त नहीं होती। तृष्णासे पराजित व्यक्ति नरकमें जाता है। जो लोग तृष्णासे मुक्त हैं, उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति होती है।*

इस संसारमें जो प्राणी आत्माके अधीन है, वह निश्चित ही सुखी है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय हैं, इनकी अधीनतामें रहनेवाला निश्चित ही दुःखी रहता है। मृग, हाथी, पतंग, भ्रमर और मीन—ये पाँचों क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध, रस—ये एक-एक विषयके सेवनसे मारे जाते हैं; फिर जो प्रमादी मनुष्य पाँचों इन्द्रियोंसे इन पाँचों विषयोंका सेवन करता है, वह इनके द्वारा कैसे नहीं


* इच्छति शती सहस्रं सहस्री लक्षमीहते कर्तुम्। लक्षाधिपती राज्यं राजापि सकलां धरां लब्धुम् ॥
चक्रधरोऽपि सुरत्वं सुरभावे सकलसुरपतिर्भवितुम्। सुरपतिरूर्ध्वगतित्वं तथापि न निवर्तते तृष्णा ॥
तृष्णया चाभिभूतस्तु नरकं प्रतिपद्यते। तृष्णामुक्तास्तु ये केचित् स्वर्गवासं लभन्ति ते ॥ (१२। १३–१५)

५०८संक्षिप्त गरुडपुराण[धर्मकाण्ड-

मारा जायगा? मनुष्य बाल्यावस्थामें अपने पिता-माताके अधीन होता है। युवावस्था आनेपर वह स्त्रीका हो जाता है और अन्त समय आनेपर पुत्र-पौत्रके व्यामोहमें फँस जाता है। वह मूर्ख कभी किसी अवस्थामें आत्माके अधीन नहीं रहता। लौह और काष्ठके बने हुए पाशसे बँधा हुआ व्यक्ति मुक्त हो जाता है, किंतु पुत्र तथा स्त्री आदिके मोहपाशमें बँधा हुआ प्राणी कभी मुक्त नहीं हो पाता।

पाप एक मनुष्य करता है, किंतु उसके फलका उपभोग बहुत-से लोग करते हैं। भोक्ता तो अलग हो जाते हैं पर कर्ता दोषका भागी होता है। चाहे बालक हो, चाहे वृद्ध हो और चाहे युवा हो, कोई भी मृत्युपर विजय नहीं प्राप्त कर सकता। कोई अधिक सुखी हो अथवा अधिक दुःखी हो, वह बारम्बार आता-जाता है। मृत प्राणी सबके देखते-देखते सब कुछ छोड़कर चला जाता है। इस मर्त्यलोकमें प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है और अकेले ही पाप-पुण्यका भोग करता है। 'बन्धु-बान्धव मरे हुए स्वजनके शरीरको पृथ्वीपर लकड़ी और मिट्टीके ढेलेकी भाँति फेंककर पराङ्मुख हो जाते हैं; धर्म ही उसका अनुसरण करता है। प्राणीका धन-वैभव घरमें ही छूट जाता है। मित्र एवं बन्धु-बान्धव श्मशानमें छूट जाते हैं। शरीरको अग्नि ले लेती है। पाप-पुण्य ही उस जीवात्माके साथ जाते हैं।'

मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं क्षितौ॥
बान्धवा विमुखा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति।
गृहेष्वर्था निवर्तन्ते श्मशानान्मित्रबान्धवाः॥
शरीरं वह्निरादत्ते सुकृतं दुष्कृतं व्रजेत्।
शरीरं वह्निना दग्धं पुण्यं पापं सह स्थितम्॥
(१२। २४-२६)

'मनुष्यने जो भी शुभ या पाप-कर्म किया है, वह सर्वत्र उसीको भोगता है। हे पक्षिराज! सूर्यास्ततक जिसने याचकोंको अपना धन नहीं दे दिया तो न जाने प्रातः होनेपर उसका वह धन किसका हो जायगा? पूर्वजन्मके पुण्यसे जो थोड़ा या बहुत धन प्राप्त हुआ है, उसे यदि परोपकारके कार्यमें नहीं लगाया या श्रेष्ठ द्विजॉँको दानमें नहीं दिया तो उसका वह धन यह रटता रहता है कि कौन मेरा भर्ता होगा? ऐसा विचार कर धर्मके कार्यमें अपना धन लगाना चाहिये। मनुष्य श्रद्धापूत शुद्ध मनसे दिये गये धनके द्वारा धर्मको धारण करता है। श्रद्धारहित धर्म इस लोक तथा परलोकमें फलीभूत नहीं होता। धर्मसे ही अर्थ और कामकी भी प्राप्ति होती है। धर्म ही मोक्षका प्रदायक है। अतः मनुष्यको धर्मका सम्यक् आचरण करना चाहिये। धर्मकी सिद्धि श्रद्धासे होती है, प्रचुर धनराशिसे नहीं। अकिञ्चन अर्थात् धन-वैभवसे रहित श्रद्धावान् मुनियोंको स्वर्गकी प्राप्ति हुई है। श्रद्धारहित होकर किया गया होम, दान तथा तप असत् कहा जाता है। हे पक्षिन्! उसका फल न तो इस लोकमें मिलता है और न परलोकमें ही मिलता है'—

शुभं वा यदि वा पापं भुङ्क्ते सर्वत्र मानवः।
यदनस्तमिते सूर्ये न दत्तं धनमर्थिनाम्॥
न जाने तस्य तद्वित्तं प्रातः कस्य भविष्यति।
रारटीति धनं तस्य को मे भर्ता भविष्यति॥
न दत्तं द्विजमुख्येभ्यः परोपकृतये तथा।
पूर्वजन्मकृतात् पुण्याद्यल्लब्धं बहु चाल्पकम्॥
तदीदृशं परिज्ञाय धर्मार्थे दीयते धनम्।
धनेन धार्यते धर्मः श्रद्धापूतेन चेतसा॥
श्रद्धाविरहितो धर्मो नेहामुत्र च तत्फलम्।
धर्माच्च जायते ह्यर्थो धर्मात् कामोऽपि जायते॥
धर्म एवापवर्गाय तस्माद्धर्मं समाचरेत्।
श्रद्धया साध्यते धर्मो बहुभिर्नार्थराशिभिः॥
अकिञ्चना हि मुनयः श्रद्धावन्तो दिवं गताः।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पक्षिन् प्रेत्य चेह न तत्फलम्॥
(१२। २७-३३)

(अध्याय १२)


प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्ग तथा सत्कर्मकी महिमा ५०९


वृषोत्सर्ग तथा सत्कर्मकी महिमा

श्रीगरुडजीने कहा— हे देवेश ! इस भूलोकमें किस कर्मको करनेसे प्राणियोंको प्रेतयोनिकी प्राप्ति नहीं होती ? उसे आप मुझे बतायें।

श्रीकृष्णजीने कहा— अब मैं संक्षेपमें क्षयाहसे लेकर आगे की जानेवाली और्ध्वदैहिक क्रियाको कह रहा हूँ, जिसे मोक्ष चाहनेवाले लोगोंको अपने ही हाथोंसे करना चाहिये। स्त्री और विशेषरूपसे पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले बालककी मृत्यु होनेपर उनके प्रेतत्वकी निवृत्तिके लिये वृषोत्सर्ग करना चाहिये। प्रेतत्वकी निवृत्तिके लिये वृषोत्सर्गके अतिरिक्त इस पृथ्वीपर अन्य कोई साधन नहीं है। जो मनुष्य जीवित रहते हुए वृषोत्सर्ग करता है अथवा मृत्युके पश्चात् भी जिसकी यह क्रिया सम्पन्न हो जाती है उसे दान, यज्ञ एवं व्रत किये बिना भी प्रेतत्वकी प्राप्ति नहीं होती।

गरुडने कहा— हे देवश्रेष्ठ मधुसूदन ! जीवित रहते हुए अथवा मृत्युके पश्चात् भी किस कालमें यह वृषोत्सर्ग-क्रिया होनी चाहिये ? आप इस बातको मुझे बतायें। सोलह श्राद्धोंको करनेसे अन्तमें क्या फल प्राप्त हो सकता है ?

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिराज ! यदि वृषोत्सर्ग किये बिना ही पिण्डदान दिया जाता है तो उसका श्रेय दाताको नहीं प्राप्त होता। प्रत्युत वह क्रिया प्रेतके लिये निष्फल हो जाती है। जिसके एकादशाहमें वृषोत्सर्ग नहीं होता, सौ श्राद्ध करनेपर भी उसका प्रेतत्व सुस्थिर रहता है।*

गरुडने कहा— हे प्रभो ! सर्पदंशसे मरे हुए लोगोंकी अग्निदाहादि क्रिया नहीं की जाती है। यदि जलमें, सींगवाले पशु अथवा शस्त्रादिके प्रहारसे कोई मर जाता है, तो इस प्रकार असत् मृत्युको प्राप्त हुए लोगोंकी शुद्धि कैसे हो ? हे देव ! आप मेरे इस संशयको दूर करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश ! उक्त प्रकारसे अपमृत्युको प्राप्त हुआ ब्राह्मण छः मास, क्षत्रिय ढाई मास, वैश्य डेढ़ मास एवं शूद्र एक मासमें शुद्ध हो जाता है। यदि तीर्थमें सभी प्रकारका दान देकर कोई ब्रह्मचारी मर जाता है तो वह शुद्ध होकर ऐहिक दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। वृषोत्सर्ग आदि करके यति-धर्मका आचरण करना चाहिये। यदि संन्यास-धर्मका पालन करते हुए किसी प्राणीकी मृत्यु हो जाती है तो वह शाश्वत ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति शिष्टाचाररहित धर्मविरुद्ध कर्म करता है, वह भी वृषोत्सर्ग आदिकी क्रिया करके यमराजके शासनमें नहीं जाता। पुत्र, सहोदर भाई, पौत्र, बन्धु-बान्धव, सगोत्री अथवा सम्पत्ति लेनेवाला उत्तराधिकारी कोई भी हो, उसको मरे हुए स्वजनके लिये वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये। पुत्रके अभावमें पत्नी, दौहित्र (नाती) और दुहिता (पुत्री) भी इस कर्मको कर सकती है। पुत्रोंके रहनेपर वृषोत्सर्ग अन्यसे नहीं कराना चाहिये।

गरुडने कहा— हे सुरेश्वर ! चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष जिसके पुत्र नहीं है, उसका संस्कार किस प्रकारसे किया जाय ? हे देव ! इस विषयमें उत्पन्न हुई मेरी शंकाको आप भली प्रकारसे दूर करें।

श्रीकृष्णने कहा— पुत्रहीन व्यक्तिकी गति नहीं है, उसके लिये स्वर्गका सुख नहीं है। अतः ऐसे मनुष्यको सदुपायसे पुत्र अवश्य उत्पन्न करना चाहिये। पुरुष स्वयं जो कुछ भी दान देते हैं, परलोकमें वे सभी उसके सामने ही उपस्थित रहते हैं।


  • एकादशाहे प्रेतस्य यस्य नोत्सृज्यते वृषः। प्रेतत्वं सुस्थिरं तस्य दत्तैः श्राद्धशतैरपि॥ (१३।८)

२३१- यममार्गके सोलह पुरोंका वर्णन

५१० संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-

अपने हाथोंसे जो नाना प्रकारके स्वादिष्ट एवं विविध व्यञ्जन खानेके लिये दिये जाते हैं, वे सभी मृत्युके पश्चात् अक्षय फल प्रदान करते हैं। जो गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, भोजन और पद-दान अपने हाथसे दिये जाते हैं, वे सभी दान जिस-जिस योनिमें जहाँ-जहाँ दानकर्ता जाते हैं, वहाँ-वहाँ उपस्थित रहते हैं*।

जबतक प्राणीका शरीर स्वस्थ रहता है, तबतक धर्मका सम्यक् पालन करना चाहिये। अस्वस्थ होनेपर दूसरोंकी प्रेरणासे भी वह कुछ नहीं कर पाता है। यदि अपने जीवनकालमें व्यक्ति और्ध्वदैहिक कर्म नहीं कर लेता अथवा मरनेके बाद अधिकारी पुत्र-पौत्रादिकोंके द्वारा भी यह कर्म नहीं होता है तो वह वायुरूपमें भूख-प्याससे पीड़ित रात-दिन भटकता रहता है। वह कृमि, कीट अथवा पतंगा होकर बार-बार जन्म लेता है और मर जाता है। वह कभी असत् मार्गसे गर्भमें प्रविष्ट होता है एवं जन्म लेते ही तत्काल विनष्ट हो जाता है।

जबतक यह शरीर स्वस्थ और नीरोग है, जबतक इससे बुढ़ापा दूर है, जबतक इन्द्रियोंकी शक्ति किसी भी प्रकारसे क्षीण नहीं हुई है और जबतक आयु नष्ट नहीं हुई है, तबतक अपने कल्याणके लिये महान् प्रयत्न कर लेना चाहिये; क्योंकि घरमें महाभयंकर आगके लग जानेपर कुआँ खोदनेके उद्योगसे मनुष्यको क्या लाभ प्राप्त हो सकता है—

यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावज्जरा दूरतो यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः। आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् संदीप्ते भवने तु कूपखनने प्रत्युद्यमः कीदृशः॥ (१३।२५)

(अध्याय १३)


और्ध्वदैहिक क्रिया, गोदान एवं वृषोत्सर्गका माहात्म्य

गरुडने कहा— हे विभो! मृत्युको प्राप्त कर रहे दुःखित व्यक्तिके द्वारा जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल है? स्वस्थ अवस्थामें और विधिहीन जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल है?

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिश्रेष्ठ! स्वस्थ चित्तवाले मनुष्यके द्वारा दानमें दी गयी एक गौ, रोगी पुरुषके द्वारा दानमें दी गयी एक सौ गाय, मर रहे प्राणीके द्वारा दानमें धनको छोड़कर दी गयी हजार गाय तथा व्यक्तिके मर जानेपर विधिवत् पुत्र-पौत्रादिके द्वारा दानमें दी गयी एक लाख गायोंके बराबर होती है। तीर्थ एवं पात्रके समायोगसे यथाविधि एक ही गोदान कर दिया जाय तो वह अकेली गौ दाताको एक लाख गोदानका पुण्य प्रदान करती है।


* व्यञ्जनानि विचित्राणि भक्ष्यभोज्यानि यानि च। स्वहस्तेन प्रदत्तानि देहान्ते चाक्षयं फलम्॥
गोभूहिरण्यवासांसि भोजनानि पदानि च। यत्र यत्र वसेज्जन्तुस्तत्रतत्रोपतिष्ठति॥ (१३।२०-२१)

प्रेतकल्प ] और्ध्वदैहिक क्रिया, गोदान एवं वृषोत्सर्गका माहात्म्य [ ५११

हे खगराज! सत्पात्रको दिया गया दान दिन-दिन बढ़ता है। दाताके दिये हुए दानको यदि ज्ञानी ग्रहण करता है तो उसे पाप नहीं लगता। विष और शीतका अपहरण करनेवाले मन्त्र और अग्नि क्या दोषभाजन होते हैं? अतः प्रतिदिन सत्पात्रको विशेष उद्देश्योंकी पूर्तिके लिये दान देना चाहिये। अपने कल्याणकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिको अपात्रको कुछ भी नहीं देना चाहिये। यदि कदाचित् अपात्रके लिये गौका दान दिया जाता है तो वह दाताको नरकमें ले जाता है और अपात्र ग्रहीताको इक्कीस पीढ़ियोंके सहित नरकमें ढकेल देता है।

हे खगेश! जिस प्रकारसे अपने हाथसे भूमिमें निवेश किया गया धन मनुष्यके आवश्यकतानुसार वह जब चाहे काममें आ सकता है, उसी प्रकार अपने हाथसे किया गया दान भी देहान्तरमें प्राप्त होता है। निर्धन होनेके बाद भी अपुत्र व्यक्तिको मोक्षकी कामनासे अपनी और्ध्वदैहिक क्रिया अवश्य कर लेनी चाहिये। थोड़े धनसे भी अपने हाथसे की गयी अपनी और्ध्वदैहिक क्रिया उसी प्रकारसे अक्षय फल देनेवाली होती है, जिस प्रकार अग्निमें डाली हुई आज्याहुति। दान लेनेके योग्य व्यक्तिको ही शय्या, कन्या एवं गौका दान देना चाहिये और यह भी ध्यान रखना चाहिये कि दो शय्याएँ एकको न दी जायँ, दो कन्याएँ एकको न दी जायँ तथा दो गायें भी एकको न दी जायँ। इसका आशय यह है कि भलीभाँति गोपालनमें समर्थ, गोपालनके प्रति आस्थावान् तथा दान लेने योग्य प्रतिग्रहीताको ही गोदान करना चाहिये। इसके अतिरिक्त यह भी विशेषरूपमें ज्ञातव्य है कि दो दान लेने योग्य व्यक्तियोंको भी एक गौ कदापि न दी जाय; क्योंकि यदि वह किसीके हाथ बेची जाती है अथवा उसका किन्हीं दो या दोसे अधिक लोगोंके बीच विभाजन होता है तो ऐसा करनेवाले मनुष्यको सात पीढ़ियोंके सहित वह दान जला देता है। अतः इस नश्वर जीवनमें समस्त और्ध्वदैहिक कर्म स्वयं सम्पन्न कर लेना चाहिये। पाथेयके रूपमें दिये गये दानादिको प्राप्त करके प्राणी उस महाप्रयाणके मार्गमें सुखपूर्वक जाता है, अन्यथा पाथेयरहित जीवात्मा अनेक प्रकारका कष्ट झेलता है। ऐसा जानकर मनुष्य विधिवत् वृषोत्सर्ग करे। जो पुत्रहीन वृषोत्सर्ग किये बिना ही मर जाता है, उसे मुक्ति नहीं प्राप्त होती है। अतः पुत्रविहीन मनुष्य इस धर्मका पालन विधिवत् करे। ऐसा करनेसे यमके उस महापथमें वह सुखपूर्वक गमन करता है। अग्निहोत्र, विभिन्न प्रकारके यज्ञ और दानादिसे प्राणीको वह सद्गति नहीं प्राप्त होती है, जो गति वृषोत्सर्गसे प्राप्त होती है। समस्त यज्ञोंमें वृषोत्सर्ग यज्ञ श्रेष्ठतम है, इसलिये प्रयास करके मनुष्यको भलीभाँति वृषोत्सर्ग सम्पन्न करना चाहिये।

गरुड़ने कहा— हे गोविन्द! आप मुझे क्षयाह और और्ध्वदैहिक क्रियाके विषयमें उपदेश दें कि इस क्रियाको किस काल, किस तिथि और किस प्रकारकी विधिसे सम्पन्न करना चाहिये। इसको करके मनुष्य क्या फल प्राप्त करता है, इसे भी आप मुझे बतायें। हे गोविन्द! आपकी कृपासे तो प्राणी मुक्त हो जाता है।

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिन्! कार्तिक आदि मासमें सूर्यके दक्षिणायन हो जानेपर शुक्लपक्षकी द्वादशी आदि शुभ तिथियोंमें, शुभ लग्न और मुहूर्तमें तथा पवित्र देशमें समाहितचित्त होकर विधिज्ञ, शुभलक्षणोंसे युक्त सत्पात्र ब्राह्मणको बुलाकर जप, होम तथा दानसे अपने शरीरका सर्वप्रथम शोधन करे। उसके बाद वह अभिजित् नक्षत्रमें ग्रहों और देवताओंकी विधिवत् पूजा करके विभिन्न वैदिक मन्त्रोंसे यथाशक्ति अग्निमें आहुति प्रदान करे। हे खगेश्वर! तदनन्तर ग्रहस्थापन-कार्य

५१२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-


करके मातृका-पूजनका कार्य करना चाहिये। तत्पश्चात् वह वसुधारा हवन सम्पन्न करे। अग्नि-स्थापन करके पूर्णाहुतिका कार्य करे। इसके बाद शालग्रामको स्थापित कर वैष्णव श्राद्ध करे। वस्त्राभूषणोंसे वृषको सुसज्जित करके उसकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर पहले चार बछियोंको सुगन्धित पदार्थोंसे सुवासित करे। वस्त्र और अलंकारसे विभूषित कर उन्हें उस यज्ञमें वृषके साथ स्थान दे। उसके बाद उनकी प्रदक्षिणा एवं होम करके अन्तमें विसर्जन करे। तत्पश्चात् उत्तराभिमुख होकर इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—

धर्म त्वं वृषरूपेण ब्रह्मणा निर्मितः पुरा॥
तवोत्सर्गप्रभावान्मामुद्धरस्व भवार्णवात्।
(१४। २६-२७)

‘हे धर्म! पुराकालमें ब्रह्माने आपको वृषके रूपमें निर्मित किया है। आपके उत्सर्गके प्रभावसे मेरा भवसागरसे उद्धार हो।’

इसके बाद पवित्र करनेवाले शुभ मन्त्रोंसे विधिपूर्वक वृषको अभिषिक्त करके ‘तेन क्रीडन्ति०’ इस मन्त्रसे वृषोत्सर्ग करे। पुनः रुद्र नामक कुम्भके जलसे उस नील वृषका अभिषेक करना चाहिये। उसके बाद उस नील वृषके नाभिभागमें घटको स्पर्श कराके वह जल अपने सिरपर भी डालना चाहिये। हे पक्षिराज! तदनन्तर अन्नश्राद्ध कर द्विजोत्तमको दान देना चाहिये। इन कार्योंको करके जलाशयपर पहुँचे और वहाँ जलाञ्जलि क्रिया करे। मनुष्यको अपने जीवनमें जो वस्तु प्रिय हो, उसका यथाशक्ति वहाँपर दान करना चाहिये। वृषोत्सर्ग करनेपर न्यूनता पूरी हो जाती है। मृत व्यक्ति इससे भलीभाँति तृप्त होकर यमलोकके कठिन मार्गमें सुखपूर्वक गमन करता है, इसमें संदेह नहीं है। सदैव दानादिकी क्रियाओंमें अनुरक्त मनुष्य यमलोकका दर्शनतक नहीं करते हैं। जबतक प्राणीका एकादशाह श्राद्ध नहीं किया जाता है, तबतक अपने द्वारा दिया गया दान अथवा दूसरेके हाथसे दिया गया दान न इस लोकमें प्राप्त होता है और न परलोकमें ही।

हे गरुड! श्रद्धाभावपूर्ण प्राणीको क्रमशः तेरह, सात, पाँच तथा तीन पद-दान करना चाहिये। अतः दाता पहले यथाक्रम सात एवं पाँच तिलपात्रोंका दान करे। वह ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें एक गौका दान भी दे। तत्पश्चात् ‘वृषं हि शं नो देवी०’ इस वेदमन्त्रसे यथाविधि चार बछियोंके साथ वृषका विवाह करना चाहिये। तदनन्तर उसके शरीरमें बायीं ओर चक्र और दाहिनी ओर त्रिशूलका चिह्न अंकित करके और जिसको वृषदान किया गया है, उसको उसका मूल्य देकर विसर्जन कर दे।

बुद्धिमान् व्यक्तिको एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार क्रमशः प्रयत्नपूर्वक एकादशाह तथा द्वादशाह श्राद्ध करना चाहिये। सपिण्डीकरणके पहले षोडश श्राद्ध सम्पन्न करे। ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें पद-दान दे। उसके बाद ताम्रपात्रमें कार्पास (सूती) वस्त्रपर भगवान् विष्णुकी मूर्तिको स्थापित करे और वस्त्रसे आच्छादित करके शुभ फलसे अर्घ्य समर्पित करे। तत्पश्चात् ईंखके पेड़ोंसे नौकाका निर्माण करके रेशमी सूत्रसे उसको लपेट दिया जाय। वैतरणीके निमित्त कांस्यपात्रमें घृत रखकर नौकारोहणकी क्रिया हो और भगवान् गरुडध्वजकी पूजा करे। सामर्थ्यके अनुसार किया गया दान अनन्त फलोंको देनेवाला है। भगवान् जनार्दन इस संसार-सागरमें डूब रहे शोक-संतापसे दुःखित तथा धर्मरूपी नौकासे रहित जनोंके उद्धारक हैं।

हे तार्क्ष्य! तिल, लौह, सुवर्ण, कार्पास वस्त्र, लवण, सप्तधान्य, पृथ्वी और गौ एक-से-एक बढ़कर पवित्र माने गये हैं। श्राद्धमें तिलसे परिपूर्ण पात्रोंका दान देकर शय्यादान देना चाहिये।

२३२- समस्त शुभाशुभ कर्मोंके साक्षी ब्रह्माके पुत्र श्रवणदेवोंका स्वरूप

प्रेतकल्प ]मरनेके समय तथा मृत्युके अनन्तर किये जानेवाले कर्म५१३

दीन-अनाथ एवं विशिष्टजनोंको सामर्थ्यानुसार दक्षिणा भी प्रदान करे। पुत्रहीन अथवा पुत्रवान् जो भी इसे करता है, उसको वही सिद्धि प्राप्त होती है, जो एक ब्रह्मचारीको प्राप्त होती है। मनुष्य इस पृथ्वीपर जबतक जीवित रहता है, तबतक उसे नित्य-नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। जो कोई जीवित-श्राद्ध करता है, तीर्थयात्रा, व्रत एवं सांवत्सरिक श्राद्धादि धर्मकार्य करता है, उसका अक्षय फल उसे प्राप्त होता है। देवता, गुरु और माता-पिताके निमित्त पुरुषको प्रयत्नपूर्वक दान करना चाहिये। वह दान प्रतिदिन अभिवृद्धिको प्राप्त होता है।

इस यज्ञमें जिसके द्वारा प्रचुर धन दानमें दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है, जिस प्रकार इस संसारमें संन्यासी और ब्रह्मचारी अत्यधिक पूज्य हैं, उसी प्रकार वृषोत्सर्गादि कर्मोंको करनेवाले सभी पुण्यात्मा भी इस संसारमें पूजे जाते हैं। उन पुण्यात्माओंको मैं, चतुर्मुख ब्रह्मा और शिव सदैव वरदान देते हैं। वे सभी परम लोककी गति प्राप्त करते हैं। मेरा यह वचन सत्य है।

छोड़ा गया वृषभ जिस जलाशयमें जलपान करता है अथवा सींगसे जिस भूमिको नित्य खोद-खोदकर प्रसन्न होता है, उससे पितरोंके लिये अन्न और पेय पदार्थ अत्यधिक मात्रामें उत्पन्न होता है।

पूर्णिमा अथवा अमावास्या तिथिमें तिलसे परिपूर्ण पात्रोंका दान देना चाहिये। हजार संक्रान्तियों और सैकड़ों सूर्यग्रहणके पर्वोंपर दान देकर जो पुण्य अर्जित होता है, वह मात्र नील वृषको छोड़कर ही मनुष्य प्राप्त कर सकता है*। ब्राह्मणोंको बछिया, पद-दान तथा शिव-भक्तोंको तिलसे पूर्ण पात्रोंका दान देना चाहिये। उस समय उमा-महेश्वरको भी परिधानसे अलंकृत कर दान करना चाहिये। अतसी (तीसी) पुष्पके सदृश कान्तिवाले पीताम्बरधारी भगवान् अच्युतकी प्रतिमाको वस्त्राच्छादित कर प्रदान करना चाहिये। जो लोग भगवान् गोविन्दको नमन करते हैं, उनके लिये भय नहीं रहता है। प्रेतत्वसे मोक्ष चाहनेवाले जो प्राणी इस सत्कर्मको करेंगे, वे श्रेष्ठ लोकोंको प्राप्त करेंगे। मेरा यह कथन सत्य ही है।

हे गरुड! मैंने तुमसे जो सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक क्रिया कही है, इसे सुनकर मनुष्य अपने समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है।

इस प्रकारका अनुपम माहात्म्य सुनकर गरुड अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और उन्होंने मनुष्योंके हितमें पुनः भगवान् केशवसे पूछा। (अध्याय १४)


मरनेके समय तथा मृत्युके अनन्तर किये जानेवाले कर्म, पापात्माओंको रौद्ररूपमें तथा पुण्यात्माओंको सौम्यरूपमें यम-दर्शन, यमदूतोंद्वारा दी जानेवाली यातनाका स्वरूप, शवके निमित्त प्रदत्त छः पिण्डोंका प्रयोजन, शवदाहकी विधि, संक्षेपमें दशाहसे त्रयोदशाहतकके कृत्य, यममार्गमें पड़नेवाले सोलह पुर तथा प्रेतका विलाप

गरुडने कहा— हे भगवन्! जीवात्माके प्रयाण-कालसे लेकर यमलोकके मार्गविस्तारतकका वर्णन एवं माहात्म्य मुझे सुनायें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे तार्क्ष्य! मैं यथाक्रम यममार्गका और जीवात्माके गमनमार्गमें पड़नेवाले सोलह पुरोंका वर्णन करता हूँ, तुम उसे सुनो।

हे गरुड! प्रमाणतः यमलोक और मृत्युलोकके मध्य छियासी हजार योजनकी दूरी है। हे खगेश!


* संक्रान्तीनां सहस्राणि सूर्यपर्वशतानि च। दत्त्वा यत्फलमाप्नोति तद्वै नीलविसर्जने॥ (१४।५४)

२३३- विविध दानादि कर्मोंका फल प्रेतको प्राप्त होना, पददानका माहात्म्य, जीवको अवान्तर-देहकी प्राप्तिका क्रम

५१४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

इस संसारमें पूर्वार्जित सुकृत और दुष्कृत कर्मोंका फल भोगकर अपने कर्मके अनुसार ही किसी व्याधिका जन्म होता है और अपने द्वारा किये गये कर्मोंके आधारपर निमित्तमात्र बनकर कोई व्याधि उत्पन्न होती है। जिसकी जिस निमित्तसे मृत्यु निश्चित है, वह निमित्त किये गये कर्मोंके अनुसार उसे अवश्य प्राप्त हो जाता है।

जीवात्मा कर्मभोगके कारण जब अपने वर्तमान शरीरका परित्याग करता है, तब भूमिको गोबरसे लीपकर उसके ऊपर तिल और कुशासन बिछाकर उसीपर उसे लिटा दे। तदनन्तर उस प्राणीके मुखमें सुवर्ण डाले और उसके समीप तुलसीका वृक्ष एवं शालग्रामकी शिलाको भी लाकर रखे। तत्पश्चात् यथाविधान विभिन्न सूक्तोंका पाठ करना चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे मनुष्यकी मृत्यु मुक्तिदायक होती है। उसके बाद मरे हुए प्राणीके शरीरगत विभिन्न स्थानोंमें सोनेकी शलाकाओंको रखनेका विधान है, जिसके अनुसार क्रमशः एक शलाका मुख, एक-एक शलाका नाकके दोनों छिद्र, दो-दो शलाकाएँ नेत्र और कान, एक शलाका लिङ्ग तथा एक शलाका उसके ब्रह्माण्डमें रखनी चाहिये। उसके दोनों हाथ एवं कण्ठभागमें तुलसी रखें। उसके शवको दो वस्त्रोंसे आच्छादित करके कुंकुम और अक्षतसे पूजन करना चाहिये। तदनन्तर उसको पुष्पोंकी मालासे विभूषित करके उसे बन्धु-बान्धवों तथा पुत्र, पुरवासियोंके साथ अन्य द्वारसे ले जाय। उस समय अपने बान्धवोंके साथ पुत्रको मरे हुए पिताके शवको कन्धेपर रखकर स्वयं ले जाना चाहिये।

श्मशान देशमें पहुँचकर पुत्र, पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख वहाँकी उस भूमिपर चिताका निर्माण कराये, जो पहलेसे जली न हो। उस चितामें चन्दन, तुलसी और पलाश आदिकी लकड़ीका प्रयोग करना चाहिये।

जब मरणासन्न व्यक्तिकी इन्द्रियोंका समूह व्याकुल हो उठता है, चेतन शरीर जब जडीभूत हो जाता है, उस समय प्राण शरीरको छोड़कर यमराजके दूतोंके साथ चल देते हैं। उस समय मृतकको दिव्य-दृष्टि प्राप्त होती है, जिसके द्वारा वह समस्त संसारको देखता है। जब मृतकके प्राण कण्ठमें आकर अटक जाते हैं, उस कालमें उस आतुर व्यक्तिका रूप बड़ा बीभत्स और कठोर हो जाता है। कोई मरता हुआ प्राणी मुखसे फेन उगलता है, किसीका मुख लाला (लार)-से भर जाता है। उस समय जो प्राणी दुरात्मा होते हैं, उन्हें यमदूत अपने पाशबन्धनोंसे जकड़कर मारते हैं। जो सुकृती हैं, उनको स्वर्गके पार्षद अपने लोकको सुखपूर्वक ले जाते हैं। यमलोकके दुर्गम मार्गमें पापियोंको दुःख झेलते हुए जाना पड़ता है।

यमराज अपने लोकमें शङ्ख, चक्र तथा गदा आदिसे विभूषित चतुर्भुज रूप धारण कर पुण्यकर्म करनेवाले साधु पुरुषोंके साथ मित्रवत् आचरण करते हैं। वे सभी पापियोंको संनिकट बुलाकर उन्हें अपने दण्डसे तर्जना देते हैं। वह यमराज प्रलयकालीन मेघके समान गर्जना करनेवाला है। अञ्जनगिरिके सदृश उसका कृष्णवर्ण है। वह एक बहुत बड़े भैंसेपर सवार रहता है। अत्यन्त साहस करके ही लोग उसकी ओर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। वह विद्युत्‌के तेजके समान विद्यमान है। उसके शरीरका विस्तार तीन योजन है। वह महाक्रोधी एवं अत्यन्त भयंकर है। भीमकाय दुराकृति यमराज अपने हाथमें लोहेका दण्ड और पाश धारण करता है। उसके मुख तथा नेत्रोंको देखनेसे ही पापियोंके मनमें भय उत्पन्न हो उठता है। इस प्रकारका महाभयानक यमराज जब पापियोंको दिखायी पड़ता है, तब हाहाकार करता हुआ

प्रेतकल्प ] मरनेके समय तथा मृत्युके अनन्तर किये जानेवाले कर्म ५१५


अंगुष्ठमात्रका मृत पुरुष अपने घरकी ओर देखता हुआ यमदूतोंके द्वारा ले जाया जाता है।

प्राणोंसे मुक्त शरीर चेष्टाहीन हो जाता है। उसको देखनेसे मनमें घृणा उत्पन्न होने लगती है। वह तुरंत अस्पृश्य एवं दुर्गन्धयुक्त और सभी प्रकारसे निन्दित हो जाता है। यह शरीर अन्तमें कीट, विष्ठा या राखमें परिवर्तित हो जाता है। हे तार्क्ष्य! क्षणभरमें विध्वंस होनेवाले इस शरीरपर कौन ऐसा होगा जो गर्व करेगा। इस असत् शरीरसे होनेवाले वित्तका दान, आदरपूर्वक वाणी, कीर्ति, धर्म, आयु और परोपकार यही सारभूत है। यमलोक ले जाते हुए यमदूत प्राणीको बार-बार नरकका तीव्र भय दिखाते हुए डाँटकर यह कहते हैं कि हे दुष्टात्मन्! तू शीघ्र चल। तुझे यमराजके घर जाना है। शीघ्र ही हम सब तुझे 'कुम्भीपाक' नामक नरकमें ले चलेंगे। उस समय इस प्रकारकी वाणी और बन्धु-बान्धवोंका रुदन सुनकर ऊँचे स्वरमें हा-हा करके विलाप करता हुआ वह मृतक यमदूतोंके द्वारा यमलोक पहुँचाया जाता है।

हे गरुड! एकादशाहके दिन उचित स्थानपर श्राद्ध करना चाहिये। प्राणोत्क्रमणसे लेकर क्रमशः छः पिण्डदान करने चाहिये। उन पिण्डोंका दान यथाक्रम मृतस्थान, द्वार, चत्वर (चौराहा), विश्राम-स्थल, काष्ठचयन (चिता) और अस्थिचयनके स्थानपर करना चाहिये। हे पक्षिन्! इन छः पिण्डोंकी परिकल्पनाका कारण तुम सुनो।

हे तार्क्ष्य! जिस स्थानमें मनुष्य मरता है, उस स्थानपर मृतकके नामसे 'शव' नामका पिण्ड दिया जाता है। उस पिण्डदानको देनेसे गृहके वास्तुदेवता प्रसन्न हो जाते हैं और उससे भूमि तथा भूमिके अधिष्ठातृ देवता प्रसन्न होते हैं। द्वारपर जो दूसरा पिण्डदान दिया जाता है, उसका नाम 'पान्थ' है। उसे देनेसे द्वारस्थ गृहदेवता प्रसन्न होते हैं। चौराहेपर 'खेचर' नामक पिण्डदान होता है। इस पिण्डदानको देनेसे भूत आदि देवयोनियाँ बाधा नहीं करतीं। विश्राम-स्थलपर होनेवाला पिण्डदान 'भूत' संज्ञक है। इसको देनेसे पिशाच, राक्षस और यक्ष आदि जो अन्य दिग्वासी योनियाँ हैं, वे जलाये जाने योग्य उस मृतक शरीरको अयोग्य नहीं बनातीं। हे खगेश्वर! चिता-स्थलपर पिण्डदान देनेसे प्रेतत्वकी उत्पत्ति होती है। एक मतमें चितापर दिये जानेवाले पिण्डदानका नाम साधक है और प्रेतकल्पके विद्वानोंने इस श्राद्धको प्रेतके नामसे अभिहित किया है। चितामें पिण्डदानके बाद ही 'प्रेत' नामसे पिण्डदान देना चाहिये। इस प्रकार इन पाँचों पिण्डोंसे शव आहुतिके योग्य होता है अन्यथा पूर्वोक्त उपघातक होते हैं।

प्राणोत्क्रमणके स्थानपर पहला पिण्डदान देना चाहिये। उसके बाद दूसरा पिण्डदान आधे मार्गमें और तीसरा चितापर देना चाहिये। पहले पिण्डमें विधाता, दूसरेमें गरुडध्वज तथा तीसरेमें यमदूत—इस प्रकारका प्रयोग कहा गया है। तीसरा पिण्डदान देते ही मृत व्यक्ति शरीरके दोषोंसे मुक्त हो जाता है।

इसके बाद चिता प्रज्वलित करनेके लिये वेदिका निर्माण करके उसका उल्लेखन, उद्धरण और अभ्युक्षण आदि करके विधिपूर्वक अग्नि-स्थापन करके पुष्प और अक्षतसे क्रव्याद नामके अग्निदेवकी पूजा करके यह प्रार्थना करनी चाहिये—

त्वं भूतकृज्जगद्योने त्वं लोकपरिपालकः ॥
उपसंहारदस्तस्मादेनं स्वर्गं मृतं नय।
(१५।४४-४५)

'हे क्रव्याद अग्निदेव! आप महाभूततत्त्वोंसे बने हुए इस जगत्के कारण, पालनहार एवं संहारक हैं। अतः इस मृत व्यक्तिको आप स्वर्ग पहुँचायें।'

इस प्रकार क्रव्याद नामक अग्निदेवकी विधिवत्

२३४- जीवका यमपुरीमें प्रवेश, वहाँ शुभाशुभ कर्मोंका फलभोग, कर्मानुसार अन्य देहकी प्राप्ति, मनुष्य-जन्म पाकर धर्माचरण ही मुख्य कर्तव्य

५१६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

पूजा करके शवको जलानेका कार्य करे। मृतकका आधा शरीर जल जानेपर घृतकी आहुति देनी चाहिये। 'लोमभ्यः स्वाहा०' इस मन्त्रसे यथाविधि होम करना चाहिये। चितापर उस प्रेतको रखकर आज्याहुति देनी चाहिये। यम, अन्तक, मृत्यु, ब्रह्मा, जातवेदस्‌के नामसे आहुति देकर एक आहुति प्रेतके मुखपर दे। सबसे पहले अग्निको ऊपरकी ओर प्रज्वलित करे। तदनन्तर चिताके पूर्वभागको उसी अग्निसे जलाये। इस प्रकार चिताको जलाकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिमन्त्रित तिलमिश्रित आज्याहुति पुनः प्रदान करे—

अस्मात् त्वमधिजातोऽसि त्वदयं जायतां पुनः। असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ज्वलितपावकः ॥

<div align="right">(१५।४९)</div>

'हे अग्निदेव! आप इससे उत्पन्न हुए हैं। पुनः आपसे यह उत्पन्न हुआ है। इस मृतककी स्वर्गकामनाके लिये आपके निमित्त यह स्वाहा है।'

इस प्रकार तिलमिश्रित समन्त्रक आज्याहुति देकर पुत्रको दाह करना चाहिये। उस समय उसे तेज रुदन करना चाहिये। ऐसा करनेसे मृतकको सुख प्राप्त होता है। दाह-संस्कारके पश्चात् वहींपर अस्थि-संचयन करना चाहिये। उसके बाद प्रेतके दाहजन्य क्लेशकी शान्तिके लिये पिण्डदान दे।

दाह-संस्कारके पश्चात् मृत व्यक्तिके पुत्रोंको वस्त्रके सहित स्नान करना चाहिये। तदनन्तर नामगोत्रोच्चार करते हुए वे तिलाञ्जलि दें। उसके बाद गाँव या जनपदके सभी लोग ताली बजा-बजाकर विष्णु-नाम-संकीर्तन और मृतकके गुणोंकी चर्चा करें। सभी लोग उस मृत व्यक्तिके घर आकर द्वारके दक्षिण भागमें गोमय और श्वेत सरसोंको रखें। अपने मनमें वरुणदेवका ध्यान कर नीमकी पत्तियोंका भक्षण तथा घीका प्राशन करके वे सभी अपने-अपने घर जायें।

हे खगेश्वर! कुछ लोग चितास्थानको दूधसे सींचते हैं। मृतकको जलाञ्जलि देते हुए अश्रुपात नहीं करना चाहिये। बन्धु-बान्धवोंके जो उस समय रोते हुए मुँहसे कफ और नेत्रोंसे आँसू गिराया जाता है, उसको ही वह प्रेत विवश होकर खाता है। अतः उन सभीको उस समय रोना नहीं चाहिये, अपनी शक्तिके अनुसार क्रिया करनी चाहिये।

हे तार्क्ष्य! सूर्यके अस्त हो जानेके बाद घरके बाहर अथवा कहीं एकान्तमें चौराहेपर दाह-क्रियाके दिनसे लेकर तीन दिनतक मिट्टीके पात्रमें दूध और जल देना चाहिये; क्योंकि मरनेके बाद जो मूढ-हृदय जीवात्मा है, वह पुनः उस शरीरको प्राप्त करनेकी इच्छासे यमदूतोंके पीछे-पीछे श्मशान, चौराहा तथा घरका दर्शन करता हुआ यमलोकको जाता है। प्रतिदिन दशाहतक प्रेतके लिये पिण्डदान और जलाञ्जलि देनी चाहिये। जबतक दशाह-संस्कार न हो जाय, तबतक एक जलाञ्जलि प्रतिदिन अधिक बढ़ाना अनिवार्य है। यह और्ध्वदैहिक संस्कार पुत्रके द्वारा अपेक्षित है। उसके अभावमें पत्नीको करना चाहिये। पत्नीके न होनेपर शिष्य, उसके न होनेपर सहोदर भाई कर सकता है। श्मशान अथवा अन्य किसी तीर्थमें मृतकके लिये जल और पिण्डदान देना चाहिये। पहले दिन शाक-मूल और फल, भात या सत्तू आदिमेंसे जिस-किसीद्वारा पिण्डदान दिया जाय, उसीके द्वारा बादके दिनोंमें भी पिण्डदान देना चाहिये।

हे खगेश! दस दिनोंतक प्रेतके उद्देश्यसे पुत्रगण पिण्डदान देते हैं। दिये गये पिण्डका प्रतिदिन चार भाग हो जाता है, उसके दो भागसे मृतकका शरीर बनता है, तीसरा भाग यमदूत ले लेते हैं और चौथा भाग मृतकको खानेके लिये मिलता है। नौ दिन-रातमें प्रेत पुनः शरीरयुक्त हो जाता है। शरीर बन जानेपर दसवें पिण्डसे प्राणीको अत्यधिक भूख लगती है।

२३५- प्रेतबाधाका स्वरूप तथा मुक्तिके उपाय

प्रेतकल्प ] मरनेके समय तथा मृत्युके अनन्तर किये जानेवाले कर्म ५१७


दस दिनके पिण्डमें विधि<sup></sup>, मन्त्र, स्वधा, आवाहन और आशीर्वादका प्रयोग नहीं होता है, केवल नाम तथा गोत्रोच्चारपूर्वक पिण्डदान दिया जाता है। हे पक्षिन्! मृतकका दाह-संस्कार हो जानेके पश्चात् पुनः शरीर उत्पन्न होता है। पहले दिन जो पिण्डदान दिया जाता है, उससे मूर्धा, दूसरे दिनके पिण्डदानसे ग्रीवा और दोनों स्कन्ध, तीसरे दिनके पिण्डदानसे हृदय, चौथे दिनके पिण्डदानसे पृष्ठ, पाँचवें दिनके पिण्डदानसे नाभि, छठे दिनके पिण्डदानसे कटिप्रदेश, सातवें दिनके पिण्डदानसे गुह्यभाग, आठवें दिनके पिण्डदानसे ऊरु, नौवें दिनके पिण्डदानसे तालु-पैर और दसवें दिनके पिण्डदानसे क्षुधाकी उत्पत्ति होती है। जीवात्मा शरीर प्राप्त करनेके पश्चात् भूखसे पीड़ित हो करके घरके दरवाजेपर रहता है। दसवें दिन जो पिण्डदान होता है, उसको मृतकके प्रिय भोज्य-पदार्थसे बना करके देना चाहिये, क्योंकि शरीर-निर्माण हो जानेपर मृतकको अत्यधिक भूख लग जाती है, प्रिय भोज्य-पदार्थके अतिरिक्त अन्य किसी अन्नादिक पदार्थोंसे बने हुए पिण्डका दान देनेसे उसकी भूख दूर नहीं होती है।

एकादशाह और द्वादशाहके दिन प्रेत भोजन करता है। मरे हुए स्त्री-पुरुष दोनोंके लिये प्रेत शब्दका उच्चारण करना चाहिये। उन दिनों दीप, अन्न, जल, वस्त्र जो कुछ भी दिया जाता है, उसको प्रेत शब्दके द्वारा देना चाहिये, क्योंकि वह मृतकके लिये आनन्ददायक होता है<sup></sup>

त्रयोदशाहको पिण्डज शरीर धारण करके भूख-प्याससे पीड़ित वह प्रेत यमदूतोंके द्वारा महापथपर लाया जाता है। जो प्रेत पापी होते हैं, उनका मार्ग शीत, ताप, शंकुके आकारका चुभनेवाला, मांस खानेवाले जन्तु तथा अग्निसे परिव्याप्त रहता है। जो सुकृती हैं उनका मार्ग सब प्रकारसे सौम्य है, उनको उस मार्गमें कोई कष्ट नहीं होता है। असिपत्रवनसे व्याप्त उस मार्गमें इतने दुःख हैं कि क्षुधा-प्याससे पीड़ित उस प्रेतको नित्य यमदूत अत्यधिक संत्रास देते हैं। प्रतिदिन वह प्रेत दो सौ सैंतालिस योजन चलता है। यमदूतोंके पाशसे बँधा, हा-हा करके विलाप करता हुआ वह प्रेत अपने घरको छोड़कर दिन और रात चलकर यमलोक पहुँचता है। उस महापथमें पड़नेवाले प्रसिद्ध पुरोंके शुभाशुभ भोग प्राप्त करते हुए वह यमलोकको जाता है। इस मार्गमें क्रमशः—याम्यपुर, सौरिपुर, नगेन्द्रभवन, गन्धर्वनगर, शैलागम, क्रौञ्चपुर, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापद, दुःखद, नानाक्रन्दनपुर, सुतप्तभवन, रौद्रनगर, पयोवर्षण, शीताढ्य और बहुधर्म-भीतिभवन नामक प्रसिद्ध पुर हैं।

त्रयोदशाह अर्थात् तेरहवींके दिन यमदूत प्रेतको उस मार्गपर उसी प्रकारसे पकड़कर ले जाते हैं, जिस प्रकार मनुष्य बंदरको पकड़कर ले जाता है। उस प्रकारसे बँधा हुआ वह प्रेत चलते हुए नित्य 'हा पुत्र, हा पुत्र' का करुण विलाप करता है। वह कहता है कि मैंने किस प्रकारका कर्म किया है जो ऐसा कष्ट मैं भोग रहा हूँ। वह यह भी कहते हुए चलता है कि यह मनुष्य-योनि कैसे प्राप्त होती है। मैंने इसको व्यर्थमें गँवा दिया है। प्राणी इस मनुष्य-योनिको बहुत बड़े पुण्यसे प्राप्त करता है। उसको पाकर मैंने याचकोंको स्वार्जित धन दानमें नहीं दिया। आज वह भी पराधीन हो गया है। ऐसा कहकर वह गद्गद हो उठता है<sup></sup>। जब यमदूत


१-पार्वणादि श्राद्धोंमें निर्दिष्ट पिण्डदानविधि।
२-दीपमन्नं जलं वस्त्रं यत्किञ्चिद्वस्तु दीयते। प्रेतशब्देन तद्देयं मृतस्यानन्ददायकम्॥
३-मानुष्यं लभ्यते कस्मादिति ब्रूते प्रसर्पति। महता पुण्ययोगेन मानुष्यं जन्म लभ्यते॥
न तत् प्राप्य प्रदत्तं हि याचकेभ्यः स्वकं धनम्। पराधीनं तद्भवदिति ब्रूते (रौति) सगद्गदः॥

५१८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

उसको अत्यधिक पीड़ित करते हैं तो वह बार-बार अपने पूर्व-शरीरजन्य कर्मोंका स्मरण करता हुआ इस प्रकार कहता है—

सुख-दुःखका दाता कोई दूसरा नहीं है। जो लोग सुख-दुःखका दाता दूसरेको समझते हैं, वे कुबुद्धि ही हैं। जीवात्मा सदैव पहले किये गये कर्मका भोग करता है। हे देही! तुमने जो कुछ किया है, उसमें निस्तार करो<sup></sup>। मैंने न दान दिया है, न अग्निमें आहुति डाली है, न हिमालय पर्वतकी गुफामें जाकर तपस्या ही की है और न तो गङ्गाके परम पवित्र जलका ही सेवन किया है। हे जीव! तुमने जो कुछ भी किया है, उसीका फल भोग करो। हे देही! पहले तुमने नित्य न दान दिया है, न गोदान किया है, न आह्निक कृत्य किया है, न तो वेदका दान किया, न शास्त्रको देखा और न शास्त्रबोधित मार्गका सेवन किया, इसलिये हे जीव! जैसा तुमने किया है, अब उसीमें अपना निस्तार करो। हे देही! तुमने जलरहित देशमें मनुष्य और पशु-पक्षियोंके लिये जलाशयका निर्माण नहीं करवाया है, न गायोंकी क्षुधा-शान्ति लिये गोचर-भूमि ही छोड़ी है। हे देही! जो कुछ किया है, अब उसका फल भोग करो<sup></sup>

हे पक्षिन्! पुरुष प्रेतके द्वारा कहे गये उक्त वचनोंको मैंने सुनाया। अब स्त्रीका शरीर लेकर देही पूर्व किये हुए कर्मोंके सम्बन्धमें जैसा कहता है, उसे सावधान होकर सुनो—‘हे देहिन्! मैंने पतिके साथ रहकर उन्हें सुख नहीं दिया है। उनके मरनेपर मैं उनके साथ चितामें भी नहीं प्रविष्ट हुई हूँ और न तो उनके मर जानेपर उस वैधव्य-व्रतका ही पालन किया है, अतएव जो कुछ नहीं किया है उसका फलभोग मैं कर रही हूँ। मैंने मासोपवास अथवा चान्द्रायणव्रतके नियमोंसे इस शरीरका शोधन भी नहीं किया है। हे जीव! स्त्रीका शरीर बहुत-से दुःखोंका पात्र है, पहले किये गये बुरे कर्मोंके अनुसार मैंने इसे प्राप्त किया और इसे भी व्यर्थ ही गँवा दिया। (अध्याय १५)


यममार्गके सोलह पुरोंका वर्णन

**श्रीभगवान्‌ने कहा—**हे खगेश! इस प्रकार करुण-क्रन्दन और विलाप करते हुए अत्यधिक दुःखित प्रेतको सत्रह दिनतक अकेले वायुमार्गमें ही यमदूतोंके द्वारा निर्दयतापूर्वक खींचा जाता है। अट्ठारहवाँ दिन-रात पूर्ण होनेपर पहले वह ‘याम्यपुर’ पहुँचता है। उस रमणीक नगरमें प्रेतोंके महान् गण रहते हैं। वहाँ पुष्पभद्रा नदी तथा देखनेमें सुन्दर लगनेवाला एक वटवृक्ष है। यमदूत वहाँ पहुँचकर उस प्रेतको विश्राम करनेका समय देते हैं। वहाँ प्रेत दुःखित होकर अपनी स्त्री और पुत्रादि सगे-सम्बन्धियोंसे प्राप्त होनेवाले सुखका स्मरण करता है। मार्गमें पड़नेवाले परिश्रमसे थका एवं भूख-प्याससे व्याकुल वह प्रेत वहाँ करुण विलाप करता है। उस समय वह धन, स्त्री, पुत्र, घर, सुख, नौकर और मित्रके विषयमें तथा अन्य सभीके विषयमें सोचता है। उस नगरमें भूख-प्याससे


<sup></sup>सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता परो ददातीति कुबुद्धिरेषा।
पुरा कृतं कर्म सदैव भुज्यते देहिन् क्वचिन्निस्तर यत् त्वया कृतम्॥ (१५।८९)
<sup></sup>मया न दत्तं न हुतं हुताशने तपो न तप्तं हिमशैलह्वरे। न सेवितं गाङ्गमहो महाजलं देहिन् क्वचिन्निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
न नित्यदानं न गवाहिकं कृतं न वेददानं न च शास्त्रपुस्तकम्। पुरा न दृष्टं न च सेवितोऽध्वा देहिन् क्वचिन्निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
जलाशयो नैव कृतो हि निर्जले मनुष्यहेतोः पशुपक्षिहेतवे। गोतृप्तिहेतोर्न कृतं हि गोचरं देहिन् क्वचिन्निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(१५।९०—९२)

प्रेतकल्प ] यममार्गके सोलह पुरोंका वर्णन ५१९


पीड़ित उस प्रेतको देखकर यमदूत कहते हैं।

यमदूतोंने कहा—'हे प्रेत! कहाँ धन है, कहाँ पुत्र है, कहाँ स्त्री है, कहाँ घर है और कहाँ तू इस प्रकारका दुःख झेल रहा है! चिरकालतक अब तू अपने कर्मोंसे अर्जित पापोंका भोग कर और इस महापथपर चल। हे परलोकके पथिक! तुम जानते हो कि राहगीरोंका बल पाथेयके वशमें है। निश्चित ही तुझे उस मार्गसे चलना होगा, जहाँ कुछ क्रय-विक्रय करना भी सम्भव नहीं है।'

हे पक्षिराज! यमदूतोंके द्वारा इस प्रकार कहे जानेके बाद वह यमदूतोंके द्वारा मुद्गरोंसे मारा जाता है। तत्पश्चात् स्नेहवश अथवा कृपा करके भूलोकमें पुत्रोंके हाथोंसे दिये गये मासिक पिण्डको वह खाता है। उसके बाद वहाँसे वह 'सौरिपुर' के लिये चल देता है। उस नगरमें कालरूपधारी जंगम नामका राजा है। उसको देखकर प्रेत भयभीत हो उठता है और विश्राम करना चाहता है। त्रैपाक्षिक श्राद्धमें दिये गये अन्न और जलका वह उसी नगरमें उपभोग करके दिन और रात चलकर सुन्दर बसे हुए 'नगेन्द्रभवन' नामक नगरकी ओर जाता है। उस महापथपर चलते हुए महाभयंकर वन देखकर वह करुण विलाप करता है। वहाँके कष्टोंसे दुःखित होकर वह बार-बार रोता है। दो मास बितानेके पश्चात् वह उस नगरमें पहुँचता है। यहाँ वह अपने बन्धु-बान्धवोंके द्वारा दिये गये अन्न और जलको खाता-पीता है। उसके बाद यमदूत पाशमें बाँधकर उसे दुःख देते हुए पुनः आगेकी ओर ले जाते हैं। तीसरे मासमें वह 'गन्धर्वनगर' पहुँच जाता है। तीसरे मासमें दिये गये श्राद्ध-पिण्डका यहाँ भक्षण करके चौथे मासमें वह 'शैलागम' नामक नगर पहुँचता है। यहाँ प्रेतके ऊपर पत्थरोंकी वर्षा होती है। वहाँ वह चौथे मासमें दिये गये श्राद्ध-पिण्डको खाकर संतुष्ट होता है। इसके बाद प्रेत पाँचवें मासमें 'क्रौञ्चपुर' जाता है। उस पुरमें पुत्रोंके द्वारा दिये गये पाँचवें मासके श्राद्धके पिण्डको खाता है। तदनन्तर छठे मासमें प्रेत 'क्रूरपुर' नामक नगरकी यात्रा करता है। उस पुरमें छठे मासमें पुत्रोंद्वारा दिये गये श्राद्ध-पिण्डको खाकर उसकी संतुष्टि होती है; किंतु आधे मुहूर्तभर विश्राम करनेके बाद उसका हृदय पुनः दुःखसे काँपने लगता है। यमदूतोंसे तर्जित होकर वह प्रेत उस पुरको लाँघकर 'विचित्रभवन' की ओर प्रस्थान करता है जहाँका राजा विचित्र है। यमराजका छोटा भाई सौरि ही यहाँके राज्यपर शासन करता है।

हे पक्षिराज! पाँच मास और पंद्रह दिनपर ऊनषाण्मासिक श्राद्ध होता है। अतः यमदूतोंके द्वारा संत्रस्त वह प्रेत उसी 'विचित्रभवन' में ऊनषाण्मासिक श्राद्ध-पिण्डका उपभोग करता है। मार्गमें बार-बार उसको भूख पीड़ा पहुँचाती है। अतः यमदूतोंके द्वारा रोके जानेपर भी वह उस मार्गमें विलाप करता है कि क्या कोई पुत्र या बान्धव है? जो मेरे मरनेपर शोक-सागरमें गिरते हुए मुझे सुखी नहीं कर रहा है? इसी समय वहाँपर उसके सामने हजारों मल्लाह आते हैं और कहते हैं कि 'सौ योजन विस्तृत मवाद और रक्तसे पूर्ण नाना प्रकारकी मछलियोंसे व्याप्त, नाना पक्षिगणोंसे आवृत महावैतरणी नदीको पार करनेकी इच्छा करनेवाले तुम्हें हम लोग सुखपूर्वक तारेंगे। किंतु हे पथिक! यदि उस मर्त्यलोकमें तुम्हारे द्वारा गोदान दिया गया है तो उस नावसे तुम पार जाओ।' मनुष्योंका अन्त समय आनेपर वैतरणी-गोदान ही हितकारी होता है। अतः शरीर स्वस्थ रहनेपर वैतरणी-व्रत करना चाहिये और वैतरणी नदीको पार करनेकी इच्छासे विद्वान् ब्राह्मणको गोदान करना चाहिये। वह पापीके समस्त पापोंको विनष्ट करके उसे विष्णुलोक ले जाता है। जिसने वैतरणी-दान नहीं किया है, वह प्रेत उसी नदीमें जाकर डूबने लगता है। डूबते हुए स्वयं अपनी