भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

६१२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ ब्रह्म-


समय आपके नाम ही संसारजन्य दुःखोंके विनाशक हैं। जो अनेक जन्मोंके पापको सहसा विनष्ट कर निर्मल मुक्ति प्रदान करते हैं, मैं उन नामशक्तिकी शरणमें हूँ।

हे विष्णो! जो आपकी भक्ति करनेमें असमर्थ हैं और केवल आपका नाममात्र लेते हैं, वे भी मुक्तिको प्राप्त करते हैं फिर जो भक्तिपूर्वक आपका स्मरण करते हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या!

ये भक्त्या विवशा विष्णो नाममात्रैकजल्पकाः ।
तेऽपि मुक्तिं प्रयान्त्याशु किमुत ध्यायिनः सदा ॥
(७। ६४)

इस प्रकार स्तुति करके क्रतु भी मौन हो गये तब वैवस्वत मनुने स्तुतिसे नारायणको प्रसन्न किया।

विश्वामित्रने स्तुति करते हुए कहा— हे भगवन्! मैंने आपके चरणकमलोंका न तो ध्यान किया और न नित्य संध्योपासना ही की। ज्ञानरूपी द्वारके किवाड़को खोलनेमें दक्ष धर्मका उपार्जन भी मैंने नहीं किया। अन्तःकरणमें व्याप्त मलके विनाश करनेमें अत्यन्त कुशल आपकी कथा भी मैंने कानोंसे नहीं सुनी, इसलिये हे देव! मुझ अनाथकी आप सदा रक्षा करें—

न ध्याते चरणाम्बुजे भगवतो संध्यापि नानुष्ठिता
ज्ञानद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः ।
अन्तर्व्यासमलाभिघातकरणे पट्वी श्रुता ते कथा
नो देव श्रवणेन पाहि भगवन् मामत्रितुल्यं सदा ॥
(७।७१)

—इस प्रकार स्तुति कर महामुनि विश्वामित्र हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

हे खगेश्वर ! क्रतुके बाद मित्रने जगत्के कारण नारायणकी स्तुति करना आरम्भ किया।

**मित्रने कहा—**संसारके बन्धनको विनष्ट करनेवाले हे देव! आप प्राणियोंको संसारसे मुक्ति दिलानेवाले हैं तथा कल्याणके निधान हैं, मैं अज्ञानी हूँ, आपके चरणारविन्दोंको मैं प्रणाम करता हूँ। आप भगवान् वासुदेव ही अपने विषयमें जानते हैं। आपके यथार्थ स्वरूपको न मैं जानता हूँ न अग्नि तथा न ब्रह्मा-विष्णु-महेश—ये तीनों देवता, न मुनीन्द्र ही जानते हैं; परम भागवत भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते तो अन्यकी बात ही क्या है? हे परात्पर स्वामी! आप मेरी नित्य रक्षा करें।

हे खग! इस प्रकार हरिकी स्तुति कर मित्र मौन हो गये, उसके बाद ताराने स्तुति करना प्रारम्भ किया।

**ताराने कहा—**हे विष्णो! अनन्य-भावसे जो आपके प्रति दृढ़ भक्ति करते हैं, आपके लिये जो सभी कर्मोंको त्याग देते हैं और अपने स्वजनों तथा बान्धवोंका परित्याग कर देते हैं, आपकी कथाको सुनकर जो दूसरेको सुनाते हैं और कहते हैं, इस प्रकारके ये साधुगण सभीके प्रति आसक्तिसे रहित हो जाते हैं। हे प्रभो! जैसे आप उन साधुगणों—भक्तोंकी रक्षा करते हैं वैसे ही मेरी भी सदा रक्षा करें।

**निर्ऋतिने कहा—**योगपूर्वक आपके प्रति समर्पित जन भक्तिसे परम गतिको प्राप्त कर लेते हैं। भक्त श्रद्धाभावसे की गयी सेवासे, सांसारिक विषयोंकी अनासक्ति और चित्तका निग्रह करनेसे विष्णुके परमपदको प्राप्त करते हैं, इसलिये हे प्रभो! दयापूर्वक उनके समान मेरी भी रक्षा करें।

तदनन्तर भगवान्के पार्षद वायुपुत्र महाभाग विष्वक्सेनने हरिकी स्तुति करना प्रारम्भ किया।

**विष्वक्सेनने कहा—**पूर्णानन्दस्वरूप भगवान् कृष्ण यदि सदा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं, यदि मेरी अपरोक्ष साधनरूपा परम भक्ति है और गुरुसे लेकर ब्रह्माण्डके साधुओंके प्रति यदि मेरी निष्कपट भक्ति है साथ ही तुलसी आदिके प्रति यदि मेरी प्रीति है और इनका सदा मुझे स्मरण है तो निश्चित ही मुझे आपका आशीर्वाद प्राप्त होगा, इसमें संदेह नहीं है।

इस प्रकार स्तुति कर महाभाग विष्वक्सेन चुप हो गये।

२७३- सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा

काण्ड ] नारायणके प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका विस्तार ६१३

हे पक्षिराज ! इस प्रकार ब्रह्मा आदि देवों तथा लक्ष्मी आदि देवियोंने भगवान् हरिकी पृथक्-पृथक् स्तुति की और वे अंजलि बाँधकर मौन हो उनके सामने स्थित हो गये।
भगवान्ने उन सभीमें प्रविष्ट होकर उन्हें अपने शरीरमें आश्रय प्रदान किया। (अध्याय ६—९)


नारायणसे प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका विस्तार

गरुडजीने कहा—हे प्रभो ! देवताओंके द्वारा इस प्रकार स्तुति किये गये भगवान् विष्णु उन्हें आश्रय देकर स्वयं उन्हींमें किस प्रकार प्रविष्ट हुए और किस प्रकार सृष्टि हुई ? हे कृपालो ! आप इसे भलीभाँति बतायें।

श्रीकृष्णने कहा—वे भगवान् महाप्रभु उन सम्बन्धरहित तत्त्वोंमें प्रविष्ट हुए, इससे उनमें क्षोभ उत्पन्न हुआ। सबसे पहले भगवान्ने हिरण्मयात्मक ब्रह्माण्डकी सृष्टि की, जो पचास कोटियोजनमें चारों ओर विस्तृत था। उसके ऊपर अवस्थित अत्यन्त सूक्ष्म भाग उतने ही विस्तारमें फैला था, जितनेमें उस हिरण्मय अण्डका विस्तार था। उसके भी ऊपर पचास कोटि भूतल था। वह सात आवरणोंसे चारों ओर परिधिद्वारा घिरा हुआ था। पहले आवरणका नाम कबन्ध है। दूसरा आवरण अग्निदेवका है, तीसरा आवरण महात्मा हरका है, चौथा आवरण आकाशका है, पाँचवाँ आवरण अहंकारका है, छठा आवरण महत्तत्त्वात्मक है और सातवाँ आवरण त्रिगुणात्मक है। इसके अनन्तर अव्याकृत आकाश है; इसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं है। इसी मण्डलके मध्यमें अव्यय हरि विराजमान रहते हैं। आठवाँ आवरण आकाशका है। उसके मध्यमें विरजा नदी है। इसकी परिधि पाँच योजन विस्तीर्ण है। यह अतिशय पुण्यवती नदी है। विरजा नदीमें भलीभाँति स्नान करके लिंग-देहका भी परित्याग कर हरिके मोक्षपदकी प्राप्ति होती है। प्रारब्ध कर्मोंका क्षय हो जानेपर ही विरजा नदीमें स्नान करना सम्भव होता है।

हे खगेश्वर ! प्रलयमें भी इस विरजा नदीका लय नहीं होता, उसे लक्ष्मीस्वरूपा समझें; क्योंकि वह प्राणियोंके लिंगशरीरका नाश करनेवाली है। विरजा नदीके बाद व्याकृत आकाश है जो निःसीम है, उसकी अभिमानिनी देवता लक्ष्मी हैं। सृष्टिके समय उस ब्रह्माण्डके अभिमानी देवता ब्रह्मा थे, जो विराट् नामसे कहे गये। इस प्रकार ब्रह्माण्ड आदिका सर्जन कर अव्ययात्मा भगवान् हरि उन-उन तत्त्वाभिमानी देवताओंके साथ उस ब्रह्माण्डके ऊपर-नीचे—सर्वत्र व्याप्त होकर नित्य स्थित रहते हैं। हे पक्षिराज ! यह प्राकृत सृष्टि है, अव्यक्त आदिसे लेकर पृथ्वीतकके जो भी तत्त्व इस अण्डरूप जगत्में बाह्यरूपसे उत्पन्न हुए हैं, वे सभी प्राकृत सृष्ट कहे जाते हैं और ब्रह्माण्ड तथा ब्रह्माण्डान्तर्वर्ती सृष्टि वैकृत सृष्टि कही जाती है।

हे अण्डज ! जिन्हें पुरुष कहा गया है वे हरि तो साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम ही हैं। उन विष्णुने उस हिरण्मय अण्डके मध्य विद्यमान जलराशिमें एक हजार वर्षतक शयन किया था। उस समय लक्ष्मी ही जलरूपमें थीं, शय्यारूपमें विद्या थीं, तरंगरूपमें वायु थे और तम ही निद्रारूपमें था। इसके अतिरिक्त वहाँ और कोई नहीं था। उसी उदकके मध्यमें नारायण योगनिद्रामें स्थित थे। हे पक्षिश्रेष्ठ ! उस समय लक्ष्मीने उस जलगर्भमें शयन कर रहे हरिकी स्तुति की। हरिकी प्रकृति उस समय लक्ष्मी तथा धरा (भूदेवी)—इन दो रूपोंको धारण कर लेती है और शेष वेदका रूप धारण करके जलके मध्य सोये हरिकी स्तुति करते हैं। स्तुतिसे प्रसन्न हुए नित्य प्रबुद्ध वे महाविष्णु निद्राका परित्याग कर प्रबुद्ध हो उठे। उस समय

२७४- लक्ष्मणाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी कथा

६१४संक्षिप्त गरुडपुराण[ ब्रह्म-

उनकी नाभिसे सम्पूर्ण जगत्‌का आश्रयभूत हिरण्मय पद्म प्रादुर्भूत हुआ। इसे प्राकृत सृष्टिके रूपमें समझना चाहिये। उस सृष्टिकी अभिमानिनी देवता भूदेवी थीं। वह पद्म असंख्य सूर्योंके समान प्रकाशवाला कहा गया है। चिदानन्दमय विष्णु उससे भिन्न हैं, उस पद्मको भगवान्‌के किरीट आदि आभूषणोंके समान समझना चाहिये।

हरिके किरीट आदि भी दो प्रकारके हैं—एक स्वरूपभूत तथा दूसरे स्वरूपभिन्न। उस पद्मसे सभी लोकोंके विधायक ब्रह्माण्डकी सृष्टि हुई। उस हिरण्मय पद्मसे चतुर्मुख ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। किसने मेरी सृष्टि की है, वह प्रभु कौन है? ऐसी जिज्ञासावश ब्रह्मा उस पद्मके नालमें प्रविष्ट हो गये। किंतु अज्ञानवश जब वे नारायणके विषयमें कुछ जान न सके तब उस समय उन्हें 'तप', 'तप' इस प्रकार ये दो शब्द सुनायी दिये। उन शब्दोंके अभिप्रायको ठीक-ठीक समझते हुए विष्णुमें एकमात्र निष्ठा रखनेवाले ब्रह्माने हरिकी प्रीति प्राप्त करनेकी इच्छासे दिव्य हजार वर्षतक तपस्या की। हे खगेन्द्र! तपस्यासे प्रसन्न होकर हरि भक्तश्रेष्ठ ब्रह्माको दिव्य वर प्रदान करनेके लिये प्रकट हो गये। भगवान्‌ चतुर्भुजधारी थे, कमलके समान उनके नेत्र थे, वक्षःस्थल श्रीवत्ससे सुशोभित था तथा गला कौस्तुभमणिकी मालासे अलंकृत था, वे अत्यन्त प्रसन्न मुद्रामें थे, उनके नेत्र करुणासे आर्द्र थे। ऐसे उन नारायणका ब्रह्माको दर्शन हुआ।

भक्तोंके वशमें रहनेवाले, अत्यन्त दयालु परब्रह्मस्वरूप नारायणको अपने समक्ष देखकर ब्रह्माने बड़ी ही श्रद्धा-भक्तिसे उनकी पूजा की और उनके पादतीर्थको मस्तकपर धारण किया। तदनन्तर भक्तिमानोंमें श्रेष्ठ तथा महाभागवतोंमें प्रधान ब्रह्माने उन हरिकी अनेक प्रकारसे स्तुति की और उनके सामने वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

श्रीकृष्णने पुनः कहा—ब्रह्माजीके द्वारा स्तुति किये जानेपर दयाके सागर भगवान्‌ मधुसूदन मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले—हे ब्रह्मन्‌! मेरे प्रसादसे इन देवताओंकी वैसी ही सृष्टि आप करें, जिस प्रकार पूर्वकालमें आपके द्वारा हुई थी। यद्यपि इस सृष्टि-कार्यसे आपका कोई प्रयोजन नहीं है, फिर भी मेरी प्रसन्नताके लिये आप ऐसा करें। हरिके ऐसा कहनेपर ब्रह्माने उन हरिकी स्तुति करके उनकी प्रसन्नताके लिये मनमें सृष्टि करनेका निर्णय लिया। तब महत्तत्वात्मक ब्रह्माने सर्वप्रथम जीवके अभिमानी देवता वायुदेवकी सृष्टि की। हे गरुड! वे ही प्रथम सृष्टिके पुरुषात्मा हैं। तदनन्तर ब्रह्माने अपने दाहिने हाथसे ब्रह्माणी तथा भारती नामक दो देवियोंकी सृष्टि की। बायें हाथसे सत्यके पुत्र महत्तत्वात्मक अनलको उत्पन्न किया। ब्रह्माके दाहिने हाथसे ही अहंकारात्मक हरकी सृष्टि हुई। इसी प्रकार गरुड, शेष, वायु, गायत्री, वारुणी, सौपर्णी, चन्द्र, इन्द्र, कामदेव, इन्द्रियोंके अभिमानी देवताओं, मनु-शतरूपा, दक्ष, नारदादि ऋषियों, कश्यप, अदितिदेवी, वसिष्ठ आदि ब्रह्मज्ञानी ऋषियों, कुबेर, विष्वक्सेन तथा पर्जन्य आदि देवसृष्टिका उनसे प्रादुर्भाव हुआ। हे खगेश्वर! मेरी कृपासे ही ब्रह्मा इस सृष्टि-कार्यमें समर्थ हो सके।

(अध्याय १०—१३)

काण्ड ] नारायणकी पूर्णताका वर्णन तथा पदार्थोंके सारासारका निर्णय ६१५

नारायणकी पूर्णताका वर्णन तथा पदार्थोंके सारासारका निर्णय

श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षिराज! जो मूलस्वरूप पूर्ण गुणसम्पन्न सर्वथा स्वतन्त्र, पुरातन पूर्ण शरीरवाले आनन्दस्वरूप भगवान् अनन्त हैं उनके समान कोई भी नहीं है। उनके चरण आदि सभी अङ्ग अपनेमें पूर्ण हैं। उनके एक-एक रोममें उतना ही बल है जितना उनका समग्र बल है। इस प्रकार वे सब प्रकारसे पूर्ण हैं। अतः वे ही सबके कर्ता हैं, वे ही सबके हर्ता हैं और वे ही इस सृष्टिके सार अंशके भोक्ता भी हैं।

हे पक्षीन्द्र! वे हरि सारहीन अथवा असार-अंशका भोग नहीं करते, समस्त द्रव्य पदार्थोंके सारभागको ही ग्रहण करते हैं। वे नित्य भक्तोंके प्रति दयालु और भक्तोंके हितचिन्तक हैं। भक्तोंद्वारा निवेदित भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थों तथा उपचारोंके सारभागको वे बड़े ही आदरके साथ ग्रहण करते हैं। समयद्वारा दूषित एवं भावदुष्ट पदार्थोंको नारायण ग्रहण नहीं करते; द्राक्षा आदि जो फल उन्हें समर्पित किये जाते हैं, वे भी काल आदिके प्रभावसे दोषयुक्त हो जाते हैं इसलिये हे पक्षिश्रेष्ठ! अब आप द्रव्योंके सारासारके विषयमें सुनें—

जामुन आदिके फल अतिशय पकनेके बाद चार दिनमें सारहीन हो जाते हैं। एक मासके बाद कटहल असार हो जाता है। छः मासके बाद खजूर तिक्त पदार्थके समान हो जाता है। पवित्र नारिकेल फोड़नेके बाद एक दिन-रातके अनन्तर असार हो जाता है। सूखे नारिकेल और खजूरमें यह दोष नहीं आता।

हे पक्षिराज! एक वर्षके बाद सुपाड़ी, एक घड़ी (२४ मिनट)-के बाद ताम्बूल, तीन घंटेके बाद पके हुए अन्न और सूप आदि असार हो जाते हैं। तीन पक्षके बाद तेलमें पकाया पदार्थ और बारह घंटेके बाद घीमें पकाया हुआ पदार्थ असार हो जाता है। नौ घंटेके बाद शाक निःसार हो जाता है। जम्बीरी नीबू, शृंगवेर, आँवला, कपूर तथा आम एक वर्षके बाद निःसार हो जाते हैं। परंतु हे द्विज! तुलसी सदा सारयुत ही रहती है, एकादशीके दिन गीली हो या सूखी हो अथवा जलके साथ हो वह सदा सारवान् ही बनी रहती है—

तुलसी सर्वदा सारा एकादश्यामपि द्विज।
आर्द्रा वाप्यथवा शुष्का सार्द्रा सारवती स्मृता॥
(१४।२९)

सारयुता तुलसीको ग्रहण करना चाहिये। एकादशीके दिन अन्न निःसार हो जाता है। हे खगेश्वर! एकादशीके दिन मनुष्योंके लिये हरिका तीर्थ (चरणामृत) सार होता है। हे गरुड! आषाढ़ मासमें शाक, भाद्रपद मासमें दही, आश्विन मासमें दूध निःस्सार हो जाता है, इसी प्रकार हरिके नामोच्चारसे विहीन मुख और हरिको नैवेद्यके रूपमें अर्पित किये बिना बना हुआ समस्त भोजन निःसार हो जाता है—

हरिनाम विहीनं तु मुखं निःसारमुच्यते।
हरिनैवेद्यहीनस्तु पाको निःसार उच्यते॥
(१४।३७)

तीन दिनमें अलसीका पुष्प, एक प्रहरमें मल्लिका, आधे पहरके बाद चमेली सारहीन हो जाती है। तीन वर्षतक केसर, दस वर्षतक कस्तूरी तथा एक वर्षतक कपूर सारवान् कहा गया है, परंतु चन्दनको सदा सारवान् ही कहा गया है—

ससारमितिसम्प्रोक्तं चन्दनं सर्वदा स्मृतम्॥
(१४।४१)

(अध्याय १४)

६१६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ ब्रह्म-

परमात्मा हरि तथा देवी महालक्ष्मीके विभिन्न अवतारोंका वर्णन

हे पक्षिश्रेष्ठ! हरि पूर्णानन्दस्वरूप हैं। उनके समान किसी भी देश अथवा कालमें कोई नहीं है। उन्हीं हरिने लोककल्याणके लिये सम्पूर्ण सद्गुणोंके सागरके रूपमें अवतार ग्रहण किया। वे ही विष्णु समस्त अवतारोंके बीजभूत हैं, वे ही वासुदेव कहलाते हैं, वे वासुदेव ही संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धके रूपमें प्रकट हुए। उन्हीं विष्णुने स्थूल देहसे ब्रह्मादि देवोंकी सृष्टि की। उन्हीं विष्णुने सनत्कुमार आदिके रूपमें शरीर धारण किया और तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा इन्द्रियनिग्रहकी शिक्षा दी। उन्होंने ही पृथ्वीके तथा दैत्यराज हिरण्याक्षके उद्धार हेतु एवं भूमिकी स्थापना और सज्जनोंकी रक्षाके लिये वराहका अवतार धारण किया। पञ्चरात्रकी शिक्षा देनेके लिये भी उन्हींने स्वरूप धारण किया। बदरिकाश्रममें उन्होंने ही नारायण नामसे अवतार लिया। वे ही हरि कपिल मुनिके रूपमें अवतरित हुए और उन्होंने ही कालकवलित चौबीस तत्त्वोंवाले सांख्यशास्त्रका आसुरिके लिये उपदेश किया। वे ही नारायण अत्रिपत्नी देवी अनसूयासे दत्तात्रेयके रूपमें प्रकट हुए और उन्होंने ही राजा अलर्कको आन्वीक्षिकी नामक तर्कविद्याका उपदेश दिया। वे ही सच्चिदानन्द हरि सूर्यके वंशमें आकूतिके गर्भसे प्रादुर्भूत हुए और उन्होंने ही स्वायम्भुव मन्वन्तरमें देवोंके साथ प्रजाका पालन किया। वे ही विष्णु अग्नीध्रपुत्री मेरुदेवीके गर्भसे नाभिके पुत्र-रूपमें उरुक्रम नामसे अवतरित हुए। उन हरिने ही देवता तथा असुरोंद्वारा समुद्रके मन्थनके समय मन्दराचल पर्वतको अपनी पीठपर धारण करनेके लिये कूर्मरूप धारण किया। पुनः वे ही हरि हरितमणिके समान द्युतिवाले महात्मा धन्वन्तरिके रूपमें हाथमें अमृतकलश धारण किये हुए अपथ्यजनित दोषोंको दूर करनेके लिये अवतरित हुए। विष्णुने ही दितिपुत्र असुरोंको मोहित करनेके लिये मोहिनीका रूप धारण किया तथा पुनः नृसंहरूपसे अवतरित होकर उन्होंने ही हिरण्यकशिपुको अपने ऊरुओंपर रखकर नखोंसे विदीर्ण कर डाला। अनन्तर अदिति और कश्यपसे वामनरूपमें अवतरित हुए। बलिसे अधिगृहीत सम्पूर्ण त्रैलोक्यके राज्यको पुनः इन्द्रको प्रदान करनेकी इच्छासे तथा बलिकी दानशीलताका विस्तार करनेके लिये उन्होंने यह रूप धारण किया। पुनः वे जमदग्निके पुत्र परशुरामके रूपमें विख्यात हुए और उन्होंने ब्रह्मद्वेषी क्षत्रियोंसे इस पृथ्वीको विहीन कर दिया। तदनन्तर उन हरिने ही सूर्यवंशमें रघुकुलमें देवी कौसल्यासे श्रीरामके रूपमें अवतार धारण किया। समुद्रबन्धन तथा रावण आदिके वध आदि कार्य उन्होंने ही किये। तदनन्तर द्वापरमें उन विष्णुने ही व्यासरूपमें अवतरित होकर वेदसंहिताको चार भागोंमें विभक्त कर अपने पैल, सुमन्तु आदि शिष्योंको ऋगादि वेदोंको पढ़ाया। वे पराशरके द्वारा सत्यवतीमें प्रादुर्भूत हुए थे। तदनन्तर वे ही हरि वसुदेवके पुत्र-रूपमें देवकीसे कृष्णरूपमें अवतरित हुए। उन्होंने ही कंस आदिका वध किया और पाण्डवोंकी रक्षा की। तदनन्तर कलियुगकी प्रवृत्ति होनेपर वे ही असुरोंको मोहित करनेके लिये कीकट देशमें बुद्ध नामसे प्रादुर्भूत हुए। इसके बाद कलियुगकी मध्यसंधिमें वे हरि विष्णुगुप्त (विष्णुयश)-के घर दस्युप्राय राजाओंका वध करनेके लिये कल्कि नामसे अवतीर्ण होंगे।

इस प्रकार संकर्षण आदि ये सभी अवतार हरिके हुए। हरिके असंख्य अवतार हैं, उन्हें स्वयं नारायण ही जानते हैं। इन सभी अवतारोंमें बलकी दृष्टिसे, रूपकी दृष्टिसे और गुणकी दृष्टिसे किसी भी प्रकारका भेद नहीं किया जा सकता। अनन्त

काण्ड ]श्रीकृष्णपत्नी देवी नीला (नाग्नजिती)-की कथा६१७

नाम-रूपवाले विष्णु अनन्त गुणोंसे सम्पन्न हैं।

श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश्वर ! जिस प्रकार हरिके अनन्त नाम-रूपात्मक अवतार हैं, उसी प्रकार हरिप्रिया भी विभिन्न अवतारोंके रूपमें प्रकट हुई हैं। वे लक्ष्मी ज्ञानस्वरूपा हैं। वे एकमात्र हरिके चरणोंका आश्रय ग्रहण कर नित्य उनके साथ रहती हैं। वे ही पुरुषकी पत्नी और प्रकृतिकी अभिमानिनी देवी हैं। जब ब्रह्माण्डके सृजनकी इच्छा हरिने की थी, उस समय गुणोंकी सृष्टि करनेके लिये ये प्रकृति नामसे प्रादुर्भूत हुई थीं। वासुदेवकी पत्नी माया, संकर्षणकी पत्नी जया, अनिरुद्धकी पत्नी शान्ता तथा प्रद्युम्नकी पत्नी कृतिके रूपमें इन्हींका अवतार हुआ। विष्णुकी पत्नी सत्त्वाभिमानिनी श्रीदेवी, तमोगुणकी अभिमानिनी देवी दुर्गा और रजोगुणकी अभिमानिनी वराहपत्नी देवी भूदेवी तथा भगवान् वेदकी अभिमानिनी देवी अन्नपूर्णा आदि सब इन्हीं देवीके अवतार हैं। साथ ही यज्ञपत्नी दक्षिणा, विदेहराजपुत्री सीता तथा रुक्मिणी, सत्यभामा आदि रूपोंमें भगवती लक्ष्मीका ही प्राकट्य हुआ है। इस प्रकार पृथक्-पृथक् देवी लक्ष्मीके अनन्त अवतार हुए हैं। ऐसे ही पाण्डवोंकी पत्नी द्रौपदी भी शची आदि देवियोंके रूपमें उत्पन्न हुई थीं। (अध्याय १५—१७)

भगवान् शेष तथा भगवान् रुद्रके विविध अवतार

श्रीकृष्णने कहा— भगवान् शेष अनन्त शक्तिसम्पन्न हैं। इनका आविर्भाव भगवान् हरि तथा रमादेवीके शयनके लिये हुआ है। योगनिद्रामें लक्ष्मीके साथ भगवान् नारायण शेषशय्यापर ही शयन करते हैं। 'मैं सर्वदा हरिका दास बना रहूँ और सदा उनकी पूजा करता रहूँ। मैं प्रत्येक जन्मोंमें हरिको नमस्कार करता रहूँ' इस इच्छासे गरुडने हरिके शयनस्थानके समीपमें आश्रय प्राप्त किया। विनताके पुत्र काल नामक गरुडका भगवान्‌के वाहनके रूपमें प्रादुर्भाव हुआ।

शेष भगवान् नारायणके भक्त हैं। उनमें विष्णु, वायु तथा अनन्त—इन तीन देवोंका अंश सदा विद्यमान रहता है। हे खग ! दशरथके पुत्रके रूपमें देवी सुमित्राके अंशसे जिन लक्ष्मणने जन्म लिया, वे शेषके ही अंश हैं, इसलिये शेषावतार कहे जाते हैं। भगवान् श्रीराम तथा देवी सीताकी सेवा करनेके लिये उनका पृथ्वीपर अवतार हुआ। वे ही शेष वसुदेवके पुत्रके रूपमें देवी रोहिणीसे बलभद्र नामसे अवतरित हुए। गरुडजीका पृथ्वीपर कोई अवतार नहीं हुआ, इसमें भगवान्‌की आज्ञा ही है। भगवान् रुद्रने भी अनेक रूप धारण किये हैं, वामदेव, ईशान, अघोर तथा सद्योजात आदि इनके कई अवतार हैं। इसी प्रकार आवेशावतार दुर्वासा तथा द्रोणपुत्र अश्वत्थामा आदि भी रुद्रके ही अंशावतार हैं। (अध्याय १८)

श्रीकृष्णपत्नी देवी नीला (नाग्नजिती)-की कथा

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिराज ! कृष्णपत्नी नाग्नजिती पूर्वजन्ममें पितरोंमें श्रेष्ठ कव्यवाहकी पुत्री थी। वह कन्या पतिरूपमें भगवान् कृष्णका अनन्यचिन्तन किया करती थी। जब वह विवाहके योग्य हुई तो पिताने उसके विवाहके लिये बहुत प्रयत्न किया, किंतु उस कन्याने कृष्णके अतिरिक्त किसी अन्यको वरण न करनेका अपना निश्चय बताया, तब पिताने उससे कहा—किसी दूसरेको पतिरूपमें क्यों नहीं ग्रहण कर लेती हो ? तब उसने अपने पितासे कहा—'हे तात ! सर्वगुणसम्पन्न

६१८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ ब्रह्म-

हरिके अतिरिक्त मेरा और कोई पति नहीं हो सकता। हे तात ! मुझे ऐसा लगता है कि इस जन्ममें मुझे सौभाग्यकी प्राप्ति है ही नहीं; क्योंकि मेरे तो एकमात्र भर्ता वे भगवान् हरि ही हैं और कोई नहीं। यद्यपि इस संसारमें सभी स्त्रियाँ सदा सौभाग्यवती मानी जाती हैं किंतु उन्हें विधवा ही समझना चाहिये; क्योंकि अनादि, नित्य, सम्पूर्ण संसारके एकमात्र सारस्वरूप, परम सुन्दर, मोक्षदाता तथा सभी इच्छाओंकी पूर्ति करनेवाले भगवान्‌को जो पतिरूपमें नहीं मानती हैं, वे सदैव विधवाके समान ही हैं। जिन स्त्रियोंके पति विष्णुभक्त हैं, उन स्त्रियोंका जन्म सफल है। अनेक जन्मोंमें संचित किये गये पुण्योंसे ही विष्णुभक्त पति प्राप्त होता है। कलियुगमें विष्णुभक्त दुर्लभ हैं, हरिभक्ति तो सदा ही दुर्लभ रही है। कलियुगमें हरिकी कथा दुर्लभ है। हरिके भक्तोंकी सत्संगति और भी दुर्लभ है। कलियुगमें शेषाचलपर विराजमान रहनेवाले भगवान् विष्णुका दर्शन दुर्लभ है। विष्णुपदी कालिन्दी नदीके तटपर विराजमान रहनेवाले भगवान् रंगनाथका दर्शन करना बड़ा ही दुर्लभ है। काञ्चीक्षेत्रमें जाकर भगवान् वरदराजकी सेवा करना और दर्शन प्राप्त करना भी सुलभ नहीं है। रामसेतुका दर्शन सरल नहीं है। श्रेष्ठ जनोंने कहा है कि भीमा नदीके तटपर रहनेवाले विष्णुका दर्शन प्राप्त करना सुलभ नहीं है और न तो रेवा नदीके तटपर स्थित विष्णुका एवं गयाक्षेत्रमें विष्णुपदका दर्शन ही सुलभ है। मृत्युलोकमें रहनेवाले लोगोंके लिये बदरीवनमें भगवान् विष्णुका दर्शन पाना भी सुलभ नहीं है। श्रीलक्ष्मीनारायणकी निवासभूमि शेषाचलपर रहनेवाले तपस्वी भी दुर्लभ हैं। प्रयाग नामक तीर्थमें नित्य निवास करनेवाले भगवान् माधवका दर्शन करना मनुष्योंके लिये सरल नहीं है। इसीलिये हे तात ! कृष्णसे अतिरिक्त किसी दूसरेको पतिरूपमें वरण करनेकी मेरी इच्छा नहीं है।' अपने पितासे ऐसा कहकर वह कुमारी शेषाचल पर्वतकी ओर चली गयी।

कपिल नामक महातीर्थमें पहुँचकर उसने वहाँ विराजमान भगवान् श्रीनिवासका दर्शन कर उन्हें प्रणाम किया। तीन दिनतक सम्यक्-रूपसे उनकी सेवा करके वह पापविनाशन नामक तीर्थमें चली गयी। विवाहकी इच्छासे उस तीर्थमें स्नान करके उस तीर्थके उत्तर दिशामें दो कोसके विस्तारमें फैले हुए गुफारूपी एकान्त स्थानमें जाकर भगवान् नारायणके ध्यानमें-तपश्चर्यामें स्थित हो गयी और उसने अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति की।

उस कुमारीने स्तुति करते हुए कहा—'हे देव ! आप ही मेरे माता, पिता, पति, सखा, पुत्र, गुरु, श्रेष्ठ स्वजन, मित्र और प्राणवल्लभ हैं। हे प्रभो! ये सभी सांसारिक पिता आदि स्वजन तो निमित्तमात्रसे अपने बने हैं, पर आप तो बिना निमित्त ही सदासे मेरे सब कुछ हैं। इसीलिये हे मुरारे! मैं आपकी ही भार्या होना चाहती हूँ इसी कारण मैंने यह कौमार्यव्रत धारण किया है। हे श्रीनिवास ! आपको मेरा नमस्कार है। आप मुझपर प्रसन्न हों।

उसकी पराभक्तिसे प्रसन्न हो करुणासागर भगवान् श्रीनिवासने प्रकट होकर कहा—'हे कुमारिके! हे सुभगे ! कृष्णावतारमें मैं तुम्हारा पति होऊँगा।' ऐसा वर देकर भगवान् वहींपर अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर कव्यवाहकी पुत्री वह कुमारी भी यौगिक रीतिसे वहीं अपना शरीर छोड़कर कुम्भकके घरमें नीला नामसे उत्पन्न हुई। हे पक्षिराज! दितिसे उत्पन्न दैत्योंको मार करके मैंने नीला नामकी लक्ष्मीको प्राप्त किया। तत्पश्चात् नग्नजित् नामक राजाके घरमें उस कुमारीने जन्म लिया। नग्नजित् ही पूर्वमें कव्यवाह थे और उनकी पुत्री कुमारी भी नीला नामसे विख्यात हुई थी। उसके स्वयंवरमें मैंने देवताओं और मनुष्योंके द्वारा न जीते जाने योग्य सात दुर्दान्त बैलोंके साथ अनेक राजाओंको जीतकर बंदी बनायी गयी नीलाको भार्यारूपमें प्राप्त किया।

(अध्याय १९)

काण्ड ]
भद्रा तथा मित्रविन्दाद्वारा श्रीकृष्णकी भार्या बननेकी कथा
६१९


भद्रा तथा मित्रविन्दाद्वारा श्रीकृष्णकी भार्या बननेकी कथा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षिराज ! पूर्वजन्ममें विष्णुपत्नीने ही नलकी पुत्रीके रूपमें भद्रा नामसे शरीर धारण किया था। जो परम विष्णुभक्त थी, वह सभी प्रकारके भद्र गुणोंसे सम्पन्न थी, इसी कारण उसका भद्रा यह नाम पड़ा था। वह कन्या भगवान् कृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये नित्य उन्हें प्रणाम-निवेदन और उनकी प्रदक्षिणा किया करती थी। कन्याभावमें स्थित अपनी भद्रा नामक पुत्रीकी वैसी कठिन तपस्या देखकर पिता नलने कहा कि ‘हे नन्दिनी ! पुत्री ! भद्रे ! किसलिये तुम अपने शरीरको कष्ट दे रही हो ऐसा करनेसे तुम्हें कौन-सा फल मिल जायगा, उसे मुझे बताओ।’

भद्रा बोली—हे तात ! आप मेरे पिता हैं, भला मैं आपको क्या बता सकती हूँ। भगवान्‌को नमस्कार आदि क्रियाओंके फलको बतानेमें कौन समर्थ हो सकता है? फिर भी आप सुनें—‘हे तात ! करुणानिधान भगवान् विष्णु ही सदा मेरे स्वामी रहे हैं। मैं हरिके दासोंकी भी दासी हूँ।’ हे विष्णो ! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। मेरी रक्षा करें, ऐसा कहती हुई भद्राने दण्डवत्-रूपमें भूमिपर गिरकर अपने स्वामी नारायणको प्रणाम किया। पुनः भद्रा कहने लगी। हे तात ! भगवान् विष्णुको नित्य-निरन्तर प्रणाम करना चाहिये। जिस प्रकार वन्दना करनेसे वे देव प्रसन्न होते हैं, उस प्रकार वे पूजन करनेसे प्रसन्न नहीं होते। हे तात ! नामस्मरण अथवा प्रणाम-निवेदन तथा वन्दन करनेसे जिस प्रकारसे पापसे मुक्ति हो जाती है, उस प्रकारसे अन्य साधनोंसे नहीं होती।

हे तात ! भगवान् विष्णुको प्रणाम-निवेदन किये बिना जो लोग शरीरका पोषण करते हैं, उनका वह शरीर-पोषण व्यर्थ ही है। ऐसे लोगोंको नरकमें महान् दुःख भोगना पड़ता है। जो देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी प्रदक्षिणा नहीं करता उसे यमराज अत्यन्त त्रास देते हैं। जिनकी जिह्वा ‘हरि’, ‘कृष्ण’ इस प्रकारसे भगवान्‌के मङ्गलमय नामोंका नित्य कीर्तन नहीं करती है, ज्ञानीजनोंद्वारा उस जिह्वाको व्यर्थ ही कहा गया है।

हे तात ! काशीमें निवास करने अथवा प्रयागमें मरनेसे क्या लाभ ! अथवा युद्धमें वीरगति प्राप्त करनेसे अथवा यज्ञादिका अनुष्ठान करनेसे क्या लाभ है ! समस्त तीर्थोंमें भ्रमण करनेसे अथवा शास्त्रके अध्ययनसे किस प्रयोजनकी सिद्धि हो सकती है? जिनकी जिह्वाके अग्रभागपर हरिनाम नहीं है, जिनके शरीरसे भगवान् विष्णुको नमन नहीं किया गया है, जिनके पैरोंने भगवान् विष्णुकी प्रदक्षिणा नहीं की है, ऐसे लोगोंका सब कुछ करना व्यर्थ ही है? ऐसा महान् लोगोंका कहना है।* अतः हे तात ! भगवान् विष्णुको नमन करना और उन्हें निरन्तर स्मरण रखना ही प्राणीका वास्तविक कार्य है। निश्चित ही यह मनुष्य-जन्म अत्यन्त दुर्लभ है, किंतु दुर्लभ होनेपर भी वैसे ही नश्वर है, जैसे जलमें स्थित बुलबुला होता है। हे तात ! इस नश्वर शरीरका कोई भरोसा नहीं है, अतः जो समय प्राप्त है उसमें भगवान्‌को नमस्कार, वन्दन आदि करते रहना चाहिये। हे पिताजी ! आप भी ऐसा ही करें।


* काशीनिवासेन च किं प्रयोजनं किं वा प्रयागे मरणेन तात ॥
किं वा रणाग्रे मरणेन सौख्यं किं वा मखादैः समनुष्ठितेन । समस्ततीर्थ्यष्टनेन किं किमधीतशास्त्रेण सुतीक्ष्णबुद्ध्या ॥
येषां जिह्वाग्रे हरिनामैव नास्ति येषां गात्रैर्नमनं नापि विष्णोः । येषां पद्भ्यां नास्ति हरेः प्रदक्षिणं तेषां सर्वं व्यर्थमाहुर्महान्तः ॥
(२०।१०–१२)

६२०संक्षिप्त गरुडपुराण[ ब्रह्म-

हे पक्षिराज ! पुत्रीके ऐसे निर्मल वचनोंको सुनकर श्रद्धासमन्वित हो पिता नलने भगवान् विष्णुको नमस्कार किया और यथाशक्ति उनकी प्रदक्षिणा की। तदनन्तर पुनः वह भद्रा भगवान्‌को प्राप्त करनेकी इच्छासे उन्हींके ध्यानमें निमग्न हो गयी, इसीमें उसका नश्वर शरीर भी कब शान्त हो गया, इसका उसे भान ही नहीं रहा।

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिश्रेष्ठ ! पुनः मेरे पिता वसुदेवकी बहिनके उदरसे कैकेयी इस नामसे उस भद्रा नामवाली कन्याने जन्म लिया। भद्र गुणोंसे युक्त होनेके कारण वह उस जन्ममें भी भद्रा नामसे ही प्रसिद्ध हुई और उसे मैंने प्राप्त किया।

श्रीकृष्णने गरुडसे पुनः कहा— हे गरुड ! जिस प्रकार मित्रविन्दाका विवाह हुआ, अब मैं उसे बताता हूँ। मित्रविन्दा हरिकी सदैव प्रिय रही है। पूर्वजन्ममें हरिको मित्ररूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाली वह देवी सदा उनके विषयमें चिन्तन करती रहती थी कि किस उपायसे भगवान् विष्णुको प्राप्त किया जा सकता है। यद्यपि उन्हें प्राप्त करनेके बहुत-से उपाय हैं, पर श्रेष्ठतम उपाय कौन हो सकता है वह ऐसा विचार करने लगी। उसने निश्चय किया कि सभी साधनोंमें श्रेष्ठ साधन है 'सात्त्विक पुराणोंमें वर्णित भगवान्‌की कथाओंका श्रवण करना'। जो व्यक्ति भगवान् विष्णुकी कथाका श्रवण नहीं करता उसका जन्म लेना व्यर्थ है। जिसने भगवान् विष्णुके गुणानुवादका कीर्तन करनेवाले भागवतपुराणको नहीं सुना, उसका जीवन व्यर्थ है, इसलिये सदा हरिकथाका श्रवण करना चाहिये।

हे तात ! जहाँ भगवान् विष्णुसे सम्बन्धित कथारूपी महानदी प्रवाहित नहीं होती तथा जहाँ नारायणके चरणाम्बुजोंका आश्रय नहीं है और जहाँ मुखसे भगवान् विष्णुका नामस्मरण नहीं होता, वहाँ किसी प्रकारसे क्षणमात्र भी नहीं रहना चाहिये। 'जिस गाँवमें भागवतशास्त्रकी चर्चा नहीं होती और न जहाँ भागवतके रसको जाननेवाले ही होते हैं, साथ ही जिस घरमें भगवान् विष्णुके द्वारा कही गयी गीताके अर्थोंका निष्कर्ष जाननेवाले नहीं हैं अथवा जिस ग्राममें भगवान्‌की सहस्रनामावली (विष्णुसहस्रनाम)-की चर्चा नहीं होती अथवा जहाँ उन दोनों (गीता और विष्णुसहस्रनाम)-के रसोंका ज्ञान रखनेवाले नहीं हैं' वहाँ क्षणमात्र भी किसी प्रकारसे नहीं रहना चाहिये अथवा मनुष्यके जीवनमें जिस दिन भगवान् विष्णुकी दिव्य कथाका श्रवण नहीं होता है, उस दिन उस प्राणीकी आयु व्यर्थ हो जाती है—

यस्मिन् ग्रामे भागवतं न शास्त्रं न वर्तते भागवता रसज्ञाः ।
यस्मिन् गृहे नास्ति गीतार्थसारो यस्मिन् ग्रामे नामसहस्रकं वा ॥
तयो रसज्ञा यत्र न सन्ति तत्र न संवसेत् क्षणमात्रं कथंचित् ।
यस्मिन् दिने दिव्यकथा च विष्णोर्न वास्ति जन्तोस्तस्य चायुर्वृथैव ॥
(२०। २९-३०)

रसपारखी विद्वान् स्वर्णादिसे निर्मित आभूषणोंसे विभूषित कानोंको सुन्दर नहीं कहते, भगवान् विष्णुकी मङ्गलमयी कथाओंसे पूरित कानोंको ही सुन्दर बताते हैं। इस कारणसे जो लोग सर्वदा भागवतके अर्थतत्त्वका श्रवण करते हैं और निरन्तर उसका वाचन करते हैं, उन्हींका जन्म सफल है, ऐसा श्रेष्ठ जनोंका कहना है। संसारमें हरि सर्वत्र व्याप्त हैं, वे ही नित्य हैं, अन्तर्यामी हैं ऐसा समझते हुए जिनके द्वारा सदा भलीभाँति प्रभुका चिन्तन किया जाता है, उनके योगक्षेमका वहन वे विष्णु स्वयं ही करते हैं ऐसे भक्तोंका [कभी] अशुभ नहीं होता है।

भगवान् हरि शुभ-अशुभ फल कर्मानुसार ही देते हैं, इसलिये धनप्राप्तिके लिये कोई यत्न नहीं करना चाहिये। प्रयत्न तो हरितत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही करना उचित है।

इसी कारण हे तात ! मैं भी सदैव भगवान्‌की सत्कथाओंका श्रवण किया करती हूँ। पूर्वकालमें मैंने भगवान्‌की कथाका श्रवण किया था और फिर

काण्ड ]सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा६२१

शरीरका परित्यागकर आपकी पुत्रीके रूपमें पृथ्वीपर मैंने जन्म लिया है।

श्रीकृष्ण बोले—हे पक्षिन्! उस मित्रविन्दाने पृथ्वीपर रहनेके लिये वसुदेवकी बहिनके उदरमें सुमित्रा नामसे जन्म लिया। भागवतकथाके श्रवणसे ही वह भगवान् विष्णुको मित्रके रूपमें प्राप्त कर सकी है। इसी कारण उसका मित्रविन्दा यह नाम पड़ा है। हे खगराज! स्वयंवरमें अनेक राजाओंके मध्य भामिनी उस मित्रविन्दाने मेरे गलेमें जयमाला डाल दी और मैं समस्त राजाओंको परास्त कर मित्रविन्दाको साथ लेकर अपनी पुरी आ गया।

(अध्याय २०)


सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा

श्रीकृष्णने कहा—हे खगेश्वर! अब मैं कालिन्दीकी उत्पत्तिके विषयमें बता रहा हूँ, आप सुनें—विवस्वान् नामके सूर्यकी कालिन्दी नामवाली एक पुत्री उत्पन्न हुई।

हे पक्षिराज! उस कालिन्दीको यमुना तथा यमानुजाके नामसे भी कहा गया है। भगवान् कृष्णकी पत्नी बननेकी इच्छासे उसने विशिष्ट तप किया था। पूर्वजन्ममें अर्जित पापोंका अनुताप अर्थात् उनका शमन करना तप है। हे पक्षिराज! अब आप अनुतापके विषयमें सुनें—पूर्वजन्ममें जिसने भगवान् मुकुन्दके दिव्य मन्त्रोंका जप नहीं किया, हरिनामामृतका स्मरण नहीं किया, भगवान्‌के पादारविन्दोंकी वन्दना नहीं की, हरिके नैवेद्यको ग्रहण नहीं किया, सुन्दर गन्धसे युक्त पुष्पोंको मुरारिको अर्पित नहीं किया, भगवान्‌की भक्ति नहीं की, ऐसा सोच-सोचकर मनमें जो पश्चात्ताप होता है, दुःख होता है वह कहने लगता है—हे मुकुन्द! मैं इस पुत्र-मित्र-कलत्रादिसे युक्त संसारमें अत्यन्त संतप्त हो रहा हूँ, हे भगवन्! कब मैं आपके मुखारविन्दका दर्शन करूँगा, मुझसे आपकी सेवा-पूजा नहीं हुई है, मेरा उद्धार कैसे होगा? हे हरे! मैं महान् पापी हूँ कब मुझे आपके दर्शन होंगे! हे प्रभो! मैंने अनन्त जन्मोंमें सांसारिक सम्बन्धोंके द्वारा अणुमात्र भी सुख नहीं प्राप्त किया और न तो मैं आपकी सेवा ही कर सका हूँ और न आपके भक्तजनोंकी संगति ही कर सका हूँ, हे मुरारे! मेरा शरीर कष्टसे जल रहा है। ऐसा अगतिक मैं अब आप मुकुन्दकी शरण छोड़कर और किसकी शरणमें जाऊँ? हे भगवन्! मुझपर दया कर मेरी रक्षा करें।'

श्रीकृष्णने पुनः कहा—हे पक्षिराज! इस प्रकारका पश्चात्ताप करना ही अनुताप है। इसका नाम तप भी है। हे पक्षिराज! सूर्यपुत्री उस कालिन्दीने भी इसी प्रकारका अनुताप करते हुए यमुनाके तटपर तपस्या की और श्रीहरिके ध्यानमें वह निमग्न हो गयी।

तत्पश्चात् हे पक्षिराज! एक दिन मैं अर्जुनके साथ यमुनाके तटपर गया। तप करती हुई उसको वहाँ देखकर मैंने अपने मित्र अर्जुनसे कहा कि हे पार्थ! आप शीघ्र ही उस कन्याके समीपमें जाकर पूछें कि 'वह किस कारणसे तप कर रही

६२२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ ब्रह्म-


है' मेरे ऐसा कहनेपर अर्जुनने वैसा ही किया और कालिन्दीका सब वृत्तान्त भी बता दिया। तत्पश्चात् मैंने शुभ मुहूर्त आनेपर सम्यक् रीतिसे वहाँ जाकर उस कालिन्दीका पाणिग्रहण किया। हे पक्षिश्रेष्ठ! मुझ पूर्णानन्दको किस सुखकी अभिलाषा है? फिर भी उसपर अनुग्रह करनेकी दृष्टिसे ही मैंने उस कालिन्दीका पाणिग्रहण किया है। (अध्याय २१)


लक्ष्मणाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी कथा

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिराज! जो ये लक्ष्मणा हैं, पूर्व-सृष्टिमें वेदोंके पारंगत अग्निदेवकी पुत्री थीं। सभी प्रकारके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न होनेके कारण सुलक्षणा इस नामसे इनकी प्रसिद्धि हुई। जिस प्रकार लक्ष्मी सभी लक्षणोंसे पूर्ण हैं, जैसे भगवान् विष्णु सभी लक्षणोंसे परिपूर्ण हैं, उसी प्रकार लक्ष्मणा भी सभी गुणोंसे पूर्ण हैं। वह सुलक्षणा श्रीकृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये नित्य विविध उपचारोंसे उनकी पूजा किया करती थी, एक बार उसने अपने पिताजीसे कहा—हे तात! वे हरि सर्वत्र व्याप्त हैं, सबमें स्थित हैं और सर्वान्तर्यामी हैं। दान आदि जो भी शुभ कर्म किया जाता है उन्हींको उद्देश्य करके करना चाहिये। उनकी संतुष्टिके लिये उन्हें भक्तिपूर्वक विविध उपचारोंको समर्पित करना चाहिये। भक्तिपूर्वक समर्पित किये गये अन्न-पानादि पदार्थोंको वे मुकुन्द निश्चित ही ग्रहण करते हैं।

गृहस्थको चाहिये कि वह सर्वप्रथम भोग्य पदार्थोंका समर्पण भगवान् हरिके लिये अवश्य करे। जो गृहस्थ ऐसा करता है वह गृहस्थ धन्य है। अन्यथा उसका जीवन व्यर्थ है। माधव नामसे अभिहित वे भगवान् हरि इस प्रकारसे हमारे द्वारा समर्पित अन्नादिको ग्रहण करते हैं। ऐसा समझकर उन्हें पदार्थ अर्पित करना चाहिये। इस प्रकारसे दिये गये अन्नादिक नैवेद्यसे भगवान् विष्णु अत्यन्त संतुष्ट होते हैं। इसके विपरीत भावसे दिये गये पदार्थको वे ग्रहण नहीं करते, उनके लिये वह सब व्यर्थ ही है। हे सुपर्ण! वासुदेव हरि हमारे घरमें नित्य निवास करते हुए प्रसन्न रहते हैं। ऐसा समझकर अपने घरको देवालय मानकर सर्वदा अलंकृत रखना चाहिये। हे तात! अनन्तरूपी ऐसे वे हरि अनन्त रूपोंसे सबमें स्थित रहते हैं।

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिराज! अपने पितासे इस प्रकार कहकर वह उन भगवान्‌को पतिरूपमें वरण करनेके लिये अनन्य-मनसे उनकी सपर्यामें लग गयी और की जा रही मेरी इस सेवासे भगवान् हरि ही मेरे पति हों ऐसा चिन्तन करती हुई उस लक्ष्मणाने अपने शरीरका परित्याग कर दिया और पुनः मद्रदेशके राजाकी पुत्रीके रूपमें जन्म लिया। हे पक्षिश्रेष्ठ! तदनन्तर उस लक्ष्मणाके स्वयंवरमें लक्ष्यका भेदन करके मैंने ही वहाँ उपस्थित राजाओंका मान-मर्दन कर उसका पाणिग्रहण किया और अपनी पुरीमें आकर उस देवीके साथ मैं निवास करने लगा। (अध्याय २२)


सोमपुत्री जाम्बवतीकी कथा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिश्रेष्ठ गरुड! इस सृष्टिसे पूर्व-सृष्टिकी बात है। जाम्बवती श्रीसोमकी पुत्री थी। श्रीसोम श्रीविष्णुकी सेवामें लगे रहते थे। उनकी पुत्री जाम्बवती भी पिताका अनुसरण करती थी। वह नित्य पुराण सुनती, प्रतिक्षण भगवान्‌का स्मरण करती, उनके चरणोंकी वन्दना करती और उनकी सेवामें लगी रहती। धीरे-धीरे जाम्बवतीके अन्तःकरणमें संसारकी नश्वरता घर करती चली गयी। वह समझ गयी कि सुख-दुःख मायाके खेल हैं। इनसे ऊपर उठकर वह भगवत्प्रेममें

काण्ड ] सोमपुत्री जाम्बवतीकी कथा ६२३


आनन्द-विभोर रहने लगी। उसकी वाणीसे भगवान्‌के नाम और गुणका कथन होता रहता। आँखें प्रभुकी प्रतीक्षामें रत रहतीं, कान उनकी मीठी बातें सुननेके लिये उत्सुक रहते, हाथ अर्चनाके सम्भारमें लगे रहते और पैर उनकी प्रदक्षिणामें व्यस्त रहते। हृदयमें एक ही कामना रह गयी थी कि मैं भगवान्‌के चरणोंकी दासी कैसे बन जाऊँ। वह सारा कार्य भगवान्‌के लिये करती थी और सम्पन्न होनेपर उन्हें भगवान्‌को ही समर्पित कर देती थी। ब्राह्मणों और संतोंकी पूजामें उसे रस मिलता था।

एक दिन श्रीसोमने तीर्थयात्राका विचार किया। इस समाचारसे जाम्बवती फूली न समायी। वह पहलेसे ही उन स्थलोंको देखना चाहती थी, जहाँ भगवान्‌ने अपनी लीलाएँ की हैं और जहाँ वे अदृश्य-रूपसे आज भी विराजते हैं। भगवान् श्रीनिवासमें जाम्बवतीका मधुर भाव था। शेषाचलपर अब प्रियतमके दर्शन हो जायँगे, इस आशासे उसका रोम-रोम खिल उठा। पिताका भी भगवान्‌में पूरा लगाव था। दोनोंकी उत्सुकता अनिर्वचनीय थी। यात्रा प्रारम्भ हो गयी। पिता-पुत्रीके पग बिना बढ़ाये बढ़ रहे थे। धीरे-धीरे कपिल नामक तीर्थ आ गया। सद्गुरु जैगीषव्यकी आज्ञासे पिताने मुण्डन कराया, स्नान किया और तीर्थ-श्राद्ध किया। फिर विविध प्रकारके दान दिये। इसके बाद सद्गुरुने वेंकटाद्रिका महत्त्व सुनाया। इससे उन यात्रियोंके मनमें श्रद्धाका अतिरेक हो गया। वे लोग बहुत प्रेमसे इस पवित्र पर्वतपर चढ़ने लगे।

सद्गुरु जैगीषव्य नारद, प्रह्लाद, पराशर, पुण्डरीक आदि महाभागवतोंकी कथा सुनाते रहे। नामके रसका आस्वादन करते हुए लोग चल रहे थे। सच पूछा जाय तो वे चल नहीं रहे थे, अपितु आनन्द-वापीमें डूब-उतरा रहे थे और तरंगें स्वयं उन्हें आगे पहुँचाती जाती थीं। जाम्बवती तो मानो आनन्द-वारिधिमें उतराती चली जा रही थी।

चढ़ते-चढ़ते एक मनोरम तीर्थ आया। जाम्बवतीने पूछा—'गुरुदेव! यह कौन-सा तीर्थ है? वह कौन भाग्यशाली है, जिसपर भगवान्‌ने यहाँ अनुग्रह किया है।' इस प्रश्नसे जैगीषव्य बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा—'बेटी! इस तीर्थका नाम नारसिंह तीर्थ है। भक्तराज प्रह्लाद प्रेमवश भगवान् श्रीनिवासके दर्शनोंके लिये यहाँ पधारे थे। उनके साथ दैत्योंके कुमार भी थे। वे यहाँ भगवान्‌के दर्शनोंके लिये उत्कण्ठित हो गये थे। उन्होंने प्रह्लादसे कहा था—'मित्र! जब नृसिंह-रूप भगवान् श्रीनिवास कण-कणमें व्याप्त हैं, तब इस जलमें क्यों नहीं दिखायी देते? कृपाकर उनके दर्शन करा दीजिये!'

भक्तराज प्रह्लादने अपने भगवत्प्रेमी मित्रोंको बहुत आदर दिया। इसके बाद उन्होंने भगवान्‌से प्रार्थना की कि 'वे सबको दर्शन दे दें।' भगवान्‌ने संतराजकी प्रार्थना स्वीकार की। दैत्यकुमार दर्शन पाकर कृतकृत्य हो गये और भगवान् 'इस जलमें स्नान करनेसे ज्ञानकी प्राप्ति होगी'—ऐसा वरदान देकर प्रह्लाद तथा दैत्यकुमारोंके साथ सदाके लिये इस तीर्थमें बस गये। उनका यह वास आज भी वैसे ही है और आगे भी वैसा ही रहेगा। मध्याह्नके बाद आज भी चारों ओर जय-जयके शब्द सुनायी पड़ते हैं।

इस इतिहासको सुनकर सबको रोमाञ्च हो आया। सभीको भगवान् श्रीनिवासने दर्शन दिया। जाम्बवतीके मधुर भावके अनुरूप भगवान्‌ने हजारों कामदेवके समान अपना कमनीय रूप दिखाया। देखते ही जाम्बवतीका प्रत्येक अङ्ग शिथिल हो गया, रोमाञ्च हो आया और आँखोंसे प्रेमके अश्रु ढलने लगे। किसी प्रकार टूटे-फूटे शब्दोंमें जाम्बवतीने कहा—'नाथ! श्रीचरणोंमें रख लो।'

अबतक भगवान्‌ने अपने सौन्दर्य-सुधाका ही पान कराया था, अब उन्होंने अपने वचन-सुधाका पान कराते हुए कहा—'जाम्बवति! मैं तुम्हें वेंकटेश-मन्त्र बताता हूँ। तुम यहीं रहकर इसका जप करो।' जाम्बवतीको लगा कि उसके कानोंमें अमृत उड़ेल दिया गया हो। वह आनन्दसे बेसुध होने लगी। उसे न अपना पता था, न परायेका। जन्मकी साथिन लाज कहाँ चली गयी, इसका भी उसे पता न था।

६२४संक्षिप्त गरुडपुराण[ ब्रह्मकाण्ड ]

आनन्दावेशमें वह नाचने लगी। जाम्बवतीके उस नृत्यसे सारा ब्रह्माण्ड रस-विभोर हो उठा। स्वर्गसे अप्सराएँ उतर आयीं और जाम्बवतीके अगल-बगलमें नाचने लगीं। देवताओंने दुंदुभी बजायी और आकाशसे पुष्पकी वृष्टि की।

इसी प्रकार भगवान्‌के प्रेममें आह्लादित होते हुए जाम्बवतीकी तीर्थयात्रा चलती रही। गुरु जैगीषव्यने भगवान् वेंकटेशका माहात्म्य उसे सुनाया। स्वामिपुष्करिणी तीर्थ, जहाँ श्रीनिवास सदा विराजमान रहते हैं*—का इतिहास बतलाया। जिसे सुनकर वह आनन्दसे भर गयी, श्रीनिवासके प्रति उसका अनुराग बढ़ता ही गया। गुरुद्वारा बताये गये वेंकटाद्रिके सभी तीर्थोंका जाम्बवतीने बड़े ही भावसे सेवन किया। अन्तमें वह ऋषितीर्थ पहुँची। सप्तर्षियोंसे सेवित उस पुण्य-पवित्र ऋषितीर्थमें उसका मन रम गया, वह वहीं रुक गयी। दीर्घ समयतक उसने वहाँ तपका अनुष्ठान किया।

हे पक्षिराज! वह कन्या जाम्बवती मेरे कृष्णावतार-धारण करनेतक वहाँ तपस्यामें अनुरक्त रही। उसका शरीर अत्यन्त पवित्र हो चुका था। अन्तमें उसने मुझे पतिरूपमें प्राप्त करनेकी अभिलाषासे योगधारणाद्वारा अपने उस शरीरका परित्याग कर दिया और वह भक्तराज जाम्बवान्‌के घरमें पुनः उत्पन्न हुई। वहाँ उसका नाम भी जाम्बवती ही पड़ा। भक्तिपरायणा जाम्बवती पिताके घरमें धीरे-धीरे बढ़ने लगी, पूर्व-जन्मके समान ही इस जन्ममें भी वह एकमात्र हरिनिष्ठ थी। उसके पिता जाम्बवान् भी महान् भक्त थे। उन्होंने अपनी पुत्री जाम्बवतीको पत्नीरूपमें मुझे समर्पित कर अपनेको धन्य माना।

जाम्बवतीने भगवान् श्रीकृष्णको सदाके लिये अपना पति बना लिया। उसकी भक्ति सफल हो गयी। विश्वके नाथने विधिके साथ जाम्बवतीसे विवाह किया। सब ओर आनन्द-ही-आनन्द छा गया।

जाम्बवतीके विवाहकी पवित्र कथा बताकर श्रीकृष्णने पक्षिराज गरुडको उन कृपालु भगवान् श्रीनिवासकी भक्तिका विस्तारसे माहात्म्य बतलाया और कहा कि हे गरुडजी! भगवान्‌को कभी भूलना नहीं चाहिये, निरन्तर उनके हरि आदि मङ्गलमय नामोंका उच्चारण करते रहना चाहिये—

हरिं हरिं प्रवदेत् सर्वदैव। (२९।६४)

कल्याणकामी मनुष्यको चाहिये कि वह अपने शास्त्रविहित कर्मोंको करते हुए प्रत्येक समय वासुदेव हरिका स्मरण करता रहे—

पूर्तिर्यदा क्रियते कर्मणां च
सम्यक् स्मरेद्वासुदेवं हरिं च ॥ (२९।६८)

ऐसा करनेसे नारायण अत्यन्त प्रसन्न होते हैं, इसलिये हे गरुडजी! भगवान् हरिको प्रिय लगनेवाले कार्योंमें ही सदा व्यक्तिको अनुराग रखना चाहिये—

हरिप्रीतिकरे धर्मे प्रीतियुक्तो भवेत् सदा ॥ (२९।७०)
(अध्याय २३—२९)

॥ गरुडपुराणान्तर्गत ब्रह्मकाण्ड सम्पूर्ण ॥

॥ गरुडपुराण सम्पूर्ण ॥


* स्वामिपुष्करिणीमध्ये श्रीनिवासोऽस्ति सर्वदा ॥ (२६।३८)