गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
* अवधूतगीता ( १ ) * ५९९
विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र
छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ ३२ ॥
पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं; वह अवधूत तो एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है ॥ ३२ ॥
॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
छठा अध्याय
आत्माके सर्वभेदातीतत्वका विचार तथा आत्मतत्त्वबोध
अवधूत उवाच
बहुधा श्रुतयः प्रवदन्ति वयं
वियदादिरिदं मृगतोयसमम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मुपमेयमथो ह्युपमा च कथम् ॥ १ ॥
अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—अनेक श्रुतियाँ कहती हैं कि हम तथा आकाश आदि यह समस्त प्रपंच मृगतृष्णाके जलके समान है। यदि वह चेतन आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो यह उपमेय और उपमाका व्यवहार कैसे हो सकता है ? ॥ १ ॥
अविभक्तिविभक्तिविहीनपरं
ननु कार्यविकार्यविहीनपरम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
यजनं च कथं तपनं च कथम् ॥ २ ॥
वह चेतन आत्मा विभाग तथा अविभागसे विहीन और परे है;
६०० * गीता-संग्रह *
वह कार्य तथा कार्याभावसे रहित और परे है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो पूजन और तप किसलिये ? ॥ २ ॥
मन एव निरन्तरसर्वगतं ह्यविशालविशालविहीनपरम् । मन एव निरन्तरसर्वशिवं मनसापि कथं वचसा च कथम् ॥ ३ ॥
मन ही (आत्मरूपसे) निरन्तर और सर्वगत है; वह विस्तार तथा विस्तारके अभावसे रहित और परे है। मन ही निरन्तर, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है; उस परब्रह्मको मनके द्वारा कैसे जाना जा सकता है और वाणीके द्वारा उसका कथन कैसे किया जा सकता है ? ॥ ३ ॥
दिनरात्रिविभेदनिराकरण- मुदितानुदितस्य निराकरणम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं रविचन्द्रमसौ ज्वलनश्च कथम् ॥ ४ ॥
उस चेतन आत्मामें दिन तथा रात्रिके भेदका निषेध है; उसमें सूर्य आदिके उदय होने अथवा उदय न होनेका भी निराकरण है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो ये सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निरूप भिन्न कैसे हो सकते हैं ? ॥ ४ ॥
गतकामविकामविभेद इति गतचेष्टविचेष्टविभेद इति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं बहिरन्तरभिन्नमतिश्च कथम् ॥ ५ ॥
उस चेतन आत्मामें कामना तथा कामनाके अभावका भेद नहीं है। उसमें चेष्टा तथा चेष्टाके अभावका भेद भी नहीं है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसमें बाहर और भीतरके
- अवधूतगीता (१) * ६०१
भेदकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥५॥ यदि सारविसारविहीन इति यदि शून्यविशून्यविहीन इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं प्रथमं च कथं चरमं च कथम्॥६॥ यदि वह चेतन आत्मा सार तथा असारसे रहित है; यदि वह शून्य तथा अशून्यसे रहित है और यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर उसमें आदि कैसे और अन्त कैसे हो सकता है?॥६॥
यदि भेदविभेदनिराकरणं यदि वेदकवेद्यनिराकरणम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं तृतीयं च कथं तुरीयं च कथम्॥७॥ यदि वह चेतन आत्मा भेद तथा अभेदसे रहित है; यदि वह ज्ञाता तथा ज्ञेयके भेदसे रहित है और यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसमें तृतीय और चतुर्थ-अवस्था कैसे हो सकती है?॥७॥
गदितागदितं न हि सत्यमिति विदिताविदितं न हि सत्यमिति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं विषयेन्द्रियबुद्धिमनांसि कथम्॥८॥ कथित और अकथित व्यवहार सत्य नहीं है; ज्ञात और अज्ञात भी सत्य नहीं है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर विषय, इन्द्रिय, बुद्धि तथा मन उसमें कैसे हो सकते हैं?॥८॥
६०२ * गीता-संग्रह *
गगनं पवनो न हि सत्यमिति धरणी दहनो न हि सत्यमिति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं जलदश्च कथं सलिलं च कथम्॥९॥
आकाश तथा वायु सत्य नहीं हैं, पृथ्वी तथा अग्नि भी सत्य नहीं हैं। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर मेघ कैसे सत्य हो सकता है और जल कैसे सत्य हो सकता है?॥९॥
यदि कल्पितलोकनिराकरणं यदि कल्पितदेवनिराकरणम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं गुणदोषविचारमतिश्च कथम्॥१०॥
यदि कल्पित लोकोंका उसमें निषेध है; यदि कल्पित देवताओंका उसमें निषेध है और यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर गुण तथा दोषके विचारकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥१०॥
मरणामरणं हि निराकरणं करणाकरणं हि निराकरणम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं गमनागमनं हि कथं वदति॥११॥
वह चेतन आत्मा मरण तथा अमरणसे रहित है; वह कर्तव्य तथा अकर्तव्यसे भी रहित है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसमें गमन तथा आगमनका भाव कैसे कहा जा सकता है?॥११॥
- अवधूतगीता (१) * ६०३
प्रकृतिः पुरुषो न हि भेद इति न हि कारणकार्यविभेद इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं पुरुषापुरुषं च कथं वदति॥१२॥
‘प्रकृति और पुरुष’ का भेद वास्तवमें है ही नहीं; कारण तथा कार्यका भी भेद नहीं है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो यह पुरुष है तथा यह पुरुष नहीं है—यह कैसे कहा जा सकता है?॥१२॥
तृतीयं न हि दुःखसमागमनं न गुणाद् द्वितीयस्य समागमनम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं स्थविरश्च युवा च शिशुश्च कथम्॥१३॥
दुःख (और सुखके द्वन्द्व)-से तीसरेकी उत्पत्ति नहीं होती, एक गुणसे दूसरे गुणकी उत्पत्ति नहीं होती। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप और कल्याणस्वरूप है तो वृद्ध, युवा और बालककी भिन्न स्थिति कैसे हो सकती है?॥१३॥
ननु आश्रमवर्णविहीनपरं ननु कारणकर्तृविहीनपरम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव- मविनष्टविनष्टमतिश्च कथम्॥१४॥
वह आत्मा निश्चय ही आश्रम तथा वर्णसे रहित है; वह निश्चय ही कारण तथा कर्तासे भी रहित है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसके विषयमें नाश होने तथा नाश न होनेवाली बुद्धि कैसे हो सकती है?॥१४॥
६०४ * गीता-संग्रह *
ग्रसिताग्रसितं च वितथ्यमिति
जनिताजनितं च वितथ्यमिति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मविनाशिविनाशि कथं हि भवेत् ॥ १५ ॥
वह चेतन आत्मा ग्रसनेवाला है और ग्रसित किया जाता है—यह मिथ्या है; वह उत्पन्न करनेवाला है और उत्पन्न होनेवाला है—यह भी मिथ्या है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो वह नाशरहित अथवा नाशवान् कैसे हो सकता है?॥ १५॥
पुरुषापुरुषस्य विनष्टमिति
वनितावनितस्य विनष्टमिति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मविनोदविनोदमतिश्च कथम् ॥ १६ ॥
वह आत्मा पुरुष है या पुरुष नहीं है—यह विचार व्यर्थ है; वह स्त्री है या स्त्री नहीं है—यह विचार भी व्यर्थ है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो शोक और हर्षकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ १६॥
यदि मोहविषादविहीनपरो
यदि संशयशोकविहीनपरः।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
महमेति ममेति कथं च पुनः ॥ १७ ॥
यदि वह चेतन आत्मा मोह तथा विषादसे रहित और श्रेष्ठ है; यदि वह संशय तथा शोकसे रहित है और श्रेष्ठ है; यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो ‘मैं हूँ तथा यह मेरा है’—इस प्रकारकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ १७॥
- अवधूतगीता ( १ ) * ६०५
ननु धर्मविधर्मविनाश इति ननु बन्धविबन्धविनाश इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव- मिह दुःखविदुःखमतिश्च कथम्॥ १८॥
यदि चेतन आत्मामें धर्म तथा विधर्मका अभाव है; यदि उसमें बन्धन तथा मोक्षका अभाव है और यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो इसके प्रति दुःख-सुखकी बुद्धि किस प्रकार हो सकती है?॥ १८॥
न हि याज्ञिकयज्ञविभाग इति न हुताशनवस्तुविभाग इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं वद कर्मफलानि भवन्ति कथम्॥ १९॥
याज्ञिक तथा यज्ञमें (वास्तविक) भेद नहीं है; इसी प्रकार अग्नि तथा हवनीय वस्तुमें भी भेद नहीं है। यदि आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर बताओ कि कर्मोंके फल किस प्रकार हो सकते हैं?॥ १९॥
ननु शोकविशोकविमुक्त इति ननु दर्पविदर्पविमुक्त इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं ननु रागविरागमतिश्च कथम्॥ २०॥
वह आत्मा निश्चय ही शोक तथा अशोकसे रहित है; वह निश्चय ही अहंकार तथा निरहंकारसे रहित है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो राग-विरागकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ २०॥
६०६ * गीता-संग्रह *
न हि मोहविमोहविकार इति
न हि लोभविलोभविकार इति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
ह्यविवेकविवेकमतिश्च कथम्॥ २१॥
उस आत्मामें मोह तथा विमोहका विकार नहीं है; उसमें लोभ तथा अलोभका भी विकार नहीं है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो निश्चय ही उसमें विचार तथा अविचारकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ २१॥
त्वमहं न हि हन्त कदाचिदपि
कुलजातिविचारमसत्यमिति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २२॥
अहो, 'तुम' और 'मैं' इस प्रकारका भेद कभी नहीं है; कुल तथा जातिका विचार भी सत्य नहीं है। मैं ही कल्याणरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ ? ॥ २२ ॥
गुरुशिष्यविचारविशीर्ण इति
उपदेशविचारविशीर्ण इति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २३॥
वह चेतन आत्मा गुरु तथा शिष्यभावके विचारसे रहित है; वह उपदेश और तर्ककी भावनासे भी रहित है। मैं ही कल्याणस्वरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ?॥ २३॥
न हि कल्पितदेहविभाग इति
न हि कल्पितलोकविभाग इति।
* अवधूतगीता (१) * ६०७
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २४॥
यह (स्थूल-सूक्ष्मादि) देहका कल्पित भेद मिथ्या है। यह (चतुर्दश) लोकोंका कल्पित भेद भी मिथ्या है। मैं ही कल्याणस्वरूप तथा परमार्थ-तत्त्व हूँ तो फिर (अद्वैतरूप) मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ? ॥ २४ ॥
सरजो विरजो न कदाचिदपि
ननु निर्मलनिश्चलशुद्ध इति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २५॥
आत्मा रागयुक्त और रागरहित भी कभी नहीं है; वह निश्चय ही निर्मल, निश्चल तथा शुद्ध है। मैं ही कल्याणरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ? ॥ २५ ॥
न हि देहविदेहविकल्प इति
अनृतं चरितं न हि सत्यमिति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २६॥
उस चेतन आत्मामें देहयुक्त और देहरहित होनेका विकल्प नहीं है; उसमें मिथ्या और सत्य चरित्रका भी विकल्प नहीं है। [आत्मस्वरूप] मैं ही कल्याणरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ? ॥ २६ ॥
विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र
छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः॥ २७॥
पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता
६०८ * गीता-संग्रह *
है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं; वह अवधूत तो एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है॥ २७॥ ॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायां स्वामिकार्तिकसंवादे स्वात्मवित्त्युपदेशमोक्षनिर्णयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
ब्रह्मानन्दमग्न आत्मज्ञानी अवधूतके लक्षण एवं स्थिति
अवधूत उवाच
रथ्याकर्पटविरचितकन्थः
पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।
शून्यागारे तिष्ठति नग्नः
शुद्धनिरञ्जनसमरसमग्नः ॥ १॥
अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—गलियोंमें गिरे-पड़े कपड़ोंकी बनी हुई गुदड़ी धारण करनेवाला, पुण्य-पापसे रहित मार्गपर चलनेवाला, शुद्ध चित्तवाला तथा ब्रह्मानन्दके रसमें मग्न अवधूत नग्न होकर एकान्त स्थानमें स्थित रहता है॥ १॥
लक्ष्यालक्ष्यविवर्जितलक्ष्यो
युक्तायुक्तविवर्जितदक्षः ।
केवलतत्त्वनिरञ्जनपूतो
वादविवादः कथमवधूतः ॥ २॥
जो प्रत्यक्ष-परोक्षसे रहित लक्ष्यवाला है; जो विधि-निषेधके वर्जनमें दक्ष है; जो अद्वितीय अविद्याशून्य तत्त्वज्ञानसे पवित्र है—उस अवधूतके लिये वाद-विवाद कैसा?॥ २॥
आशापाशविबन्धनमुक्ताः
शौचाचारविवर्जितयुक्ताः ।
- अवधूतगीता ( १ ) * ६०१
एवं सर्वविवर्जितसन्तस्-
स्तत्त्वं शुद्धनिरञ्जनवन्तः ॥ ३ ॥
अवधूत लोग आशारूपी पाशके बन्धनसे मुक्त हैं; वे शौचाचार आदिसे रहित होकर आत्मासे सदा जुड़े रहते हैं। इस प्रकार वे सभी व्यवहारोंसे रहित रहते हुए तत्त्वस्वरूप हैं तथा शुद्धज्ञानसे सम्पन्न रहते हैं ॥ ३ ॥
कथमिह देहविदेहविचारः
कथमिह रागविरागविचारः ।
निर्मलनिश्चलगगनाकारं
स्वयमिह तत्त्वं सहजाकारम् ॥ ४ ॥
इस अवधूतकी दृष्टिमें देह तथा विदेहका विचार कैसा; इसकी दृष्टिमें राग तथा विरागका विचार कैसा ? वह निर्मल, निश्चल तथा आकाशके समान व्यापक रूपवाला है; वह स्वयं स्वभावतः आत्मतत्त्वस्वरूप है ॥ ४ ॥
कथमिह तत्त्वं विन्दति यत्र
रूपमरूपं कथमिह तत्र ।
गगनाकारः परमो यत्र
विषयीकरणं कथमिह तत्र ॥ ५ ॥
जहाँ तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया, वहाँ साकार-निराकार (रूप-अरूप)-की क्या बात हो सकती है ? जिसे परम आकाशभाव व्याप्त है, उसे सांसारिक विषयोंका प्रपंच कैसे स्पर्श कर सकता है ? ॥ ५ ॥
गगनाकारनिरन्तरहंस-
स्तत्त्वविशुद्धनिरञ्जनहंसः ।
एवं कथमिह भिन्नविभिन्नं
बन्धविबन्धविकारविभिन्नम् ॥ ६ ॥
वह [ब्रह्मस्वरूप] अवधूत आकाशतुल्य, शाश्वत तथा हंसरूप
६१० * गीता-संग्रह *
है। वह परमतत्त्व, विशुद्ध, मायामलसे रहित तथा हंसस्वरूप है। इस प्रकार इस [आत्मस्वरूप अवधूत]-में भेद-विभेद एवं बन्ध-विबन्धका विकार तथा भेद किस प्रकार हो सकता है? ॥ ६ ॥
केवलतत्त्वनिरन्तरसर्वं
योगवियोगौ कथमिह गर्वम्।
एवं परमनिरन्तरसर्व-
मेवं कथमिह सारविसारम् ॥ ७ ॥
एकमात्र आत्मतत्त्व ही शाश्वत तथा सर्वरूप है; उसमें संयोग, वियोग तथा अहंकार कैसे हो सकते हैं? इस प्रकार जब वह परम, शाश्वत सर्वरूप है तो फिर उसमें सार-असार कैसा? ॥ ७ ॥
केवलतत्त्वनिरञ्जनसर्वं
गगनाकारनिरन्तरशुद्धम् ।
एवं कथमिह सङ्गविसङ्गं
सत्यं कथमिह रङ्गविरङ्गम् ॥ ८ ॥
केवल आत्मतत्त्व ही अज्ञानरहित, सर्वरूप, आकाशके समान व्यापक, एकरस तथा शुद्ध है; ऐसा होनेपर इस आत्मामें संग तथा असंग कैसे हो सकते हैं और इसमें सत्य, वर्ण तथा विवर्णका भाव कैसे होगा? ॥ ८ ॥
योगवियोगै रहितो योगी
भोगविभोगै रहितो भोगी।
एवं चरति हि मन्दं मन्दं
मनसा कल्पितसहजानन्दम् ॥ ९ ॥
वह आत्मज्ञानी अवधूत योग तथा वियोगसे रहित योगी है एवं भोग तथा विरागसे रहित भोगी भी है। इस प्रकार वह मनके द्वारा कल्पित स्वाभाविक आनन्दको धीरे-धीरे प्राप्त करता रहता है॥ ९ ॥
- अवधूतगीता (१) * ६११
| बोधविबोधैः | सततं | युक्तो |
|---|---|---|
| द्वैताद्वैतैः | कथमिह | मुक्तः । |
| सहजो | विरजः | कथमिह |
| शुद्धनिरञ्जनसमरसभोगी |
ज्ञान तथा अज्ञानसे तथा द्वैत-अद्वैतकी भावनासे निरन्तर युक्त योगी इस संसारमें कैसे मुक्त हो सकता है? स्वभावसे ही राग-रहित योगी शुद्ध, अज्ञानरहित आत्मानन्दका भोग कैसे कर सकता है ? ॥ १० ॥
| भग्नाभग्नविवर्जितभग्नो | |
|---|---|
| लग्नालग्नविवर्जितलग्नः | । |
| एवं कथमिह | सारविसारः |
| समरसतत्त्वं | गगनाकारः ॥ ११ ॥ |
वह आत्मतत्त्व खण्ड तथा अखण्डके भावसे रहित है; वह संसर्ग-विसर्गके भावोंसे भी रहित है। इस प्रकार इस आत्मतत्त्वमें सार तथा विसार कैसे हो सकते हैं? यह समरस, परमतत्त्वस्वरूप तथा आकाशके समान व्यापक आकारवाला है ॥ ११ ॥
| सततं | सर्वविवर्जितयुक्तः |
|---|---|
| सर्वं | तत्त्वविवर्जितमुक्तः । |
| एवं कथमिह | जीवितमरणं |
| ध्यानाध्यानैः कथमिह | करणम् ॥ १२ ॥ |
योगी निरन्तर समस्त प्रपंचोंसे रहित होकर आत्मतत्त्वमें लीन रहता है; वह सम्पूर्ण तत्त्वोंसे रहित होकर जीवन्मुक्त है। ऐसी स्थितिमें उसका जीवन और मरण कैसे हो सकता है; इसी प्रकार उसे ध्यान तथा ध्यानका अभाव किस प्रकार हो सकता है ? ॥ १२ ॥
६१२ * गीता-संग्रह *
इन्द्रजालमिदं सर्वं यथा मरुमरीचिका।
अखण्डितघनाकारो वर्तते केवलः शिवः॥ १३॥
यह सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच इन्द्रजाल तथा मरुदेशमें मृगमरीचिकाके जलके समान मिथ्या है। अविनाशी, परिपूर्ण तथा [एकमात्र] कल्याणस्वरूप आत्मतत्त्व ही सत्य है॥ १३॥
धर्मादौ मोक्षपर्यन्तं निरीहाः सर्वथा वयम्।
कथं रागविरागैश्च कल्पयन्ति विपश्चितः॥ १४॥
हम लोग धर्मसे लेकर मोक्षपर्यन्त चारों पुरुषार्थोंके प्रति कामनारहित हैं। विद्वान् लोग राग तथा विरागकी कल्पना किस प्रकार करते रहते हैं?॥ १४॥
विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र
छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः॥ १५॥
पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं। वह अवधूत एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है॥ १५॥
॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायां स्वामिकार्तिकसंवादे स्वात्मसंवित्त्युपदेशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
मुनि (आत्मज्ञानी) एवं अवधूतके लक्षण तथा स्त्रीसंग-परित्यागकी प्रेरणा
अवधूत उवाच
त्वद्यात्रया व्यापकता हता ते
ध्यानेन चेतःपरता हता ते।
* अवधूतगीता ( १ ) * ६१३
स्तुत्या मया वाक्परता हता ते
क्षमस्व नित्यं त्रिविधापराधान् ॥ १ ॥
अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—[हे प्रभो!] तुम्हारी धाम-यात्रा करनेसे मैंने तुम्हारी सर्वव्यापकता घटा दी, तुम्हारा ध्यान करनेसे मैंने तुम्हारा चित्तके परे होनेका गुण नष्ट कर दिया, मेरे द्वारा तुम्हारी स्तुति करनेसे तुम्हारा वाणीसे परे होनेका गुण छिप गया। तुम सदा मेरे इन तीनों अपराधोंको क्षमा करो ॥ १ ॥
कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिञ्चनः ।
अनीहो मितभुक्छान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥ २ ॥
कामनाओंसे अनाहत बुद्धिवाला, इन्द्रियोंका दमन करनेवाला, कोमल स्वभाववाला, पवित्र, संग्रहसे रहित, इच्छारहित, सीमित आहार ग्रहण करनेवाला, शान्त, स्थिर मतिवाला, आत्माकी शरण ग्रहण करनेवाला मुनि (आत्मज्ञानी) होता है ॥ २ ॥
अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमाञ्जितषड्गुणः ।
अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः ॥ ३ ॥
वह प्रमादशून्य, गम्भीर स्वभाववाला, धैर्यसम्पन्न, [काम, क्रोध आदि] छः विकारोंको जीत लेनेवाला, मानरहित, दूसरोंको सम्मान देनेवाला, कर्तव्यपरायण, मैत्रीपूर्ण व्यवहारवाला, दयालु तथा कवि (दूरदर्शी) होता है ॥ ३ ॥
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम् ।
सत्यासारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥ ४ ॥
वह कृपालु, सभी देहधारियोंसे द्रोह न करनेवाला, सहनशील, सत्यसम्पन्न, निर्दोष मनवाला, सबके प्रति समान भाव रखनेवाला तथा सभीका उपकार करनेवाला होता है ॥ ४ ॥
६१४ * गीता-संग्रह *
अवधूतलक्षणं वर्णैर्ज्ञातव्यं भगवत्तमैः।
वेदवर्णार्थतत्त्वज्ञैर्वेदवेदान्तवादिभिः ॥ ५॥
पूर्ण भक्तिसे सम्पन्न, वेदके वर्णों, अर्थ तथा तत्त्वोंको जाननेवाले वेद-वेदान्तके ज्ञानियोंको अकारादि वर्णोंके द्वारा अवधूतका लक्षण जानना चाहिये॥ ५॥
आशापाशविनिर्मुक्त आदिमध्यान्तनिर्मलः।
आनन्दे वर्तते नित्यमकारं तस्य लक्षणम्॥ ६॥
जो आशारूपी पाश (बन्धन)—से पूर्णतः मुक्त है; आदि, मध्य और अन्त (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति)—इन तीनों अवस्थाओंमें अथवा आदि, अन्त, मध्य (भूत, वर्तमान, भविष्यत्)—इन तीनों कालोंमें निर्मल चित्तवाला है और सदा ब्रह्मानन्दमें मग्न रहता है, उस अवधूतका यह 'अकार' लक्षण है॥ ६॥
वासना वर्जिता येन वक्तव्यं च निरामयम्।
वर्तमानेषु वर्तेत वकारं तस्य लक्षणम्॥ ७॥
जिसने वासनाका परित्याग कर दिया है, जिसका वचन विकाररहित है और जो वर्तमानमें व्यवहार करता है अर्थात् वर्तमानमें प्राप्त परिस्थितिके अनुसार आचरण कर लेता है, उस अवधूतका यह 'वकार' लक्षण है॥ ७॥
धूलिधूसरगात्राणि धूतचित्तो निरामयः।
धारणाध्याननिर्मुक्तो धूकारस्तस्य लक्षणम्॥ ८॥
जिसके शरीरके अंग धूलसे धूसरित रहते हैं, जो निष्पाप चित्तवाला है, विकाररहित है, धारणा तथा ध्यान आदि क्रिया-कलापोंसे रहित है, उस अवधूतका यह 'धूकार' लक्षण है॥ ८॥
* अवधूतगीता ( १ ) * ६१५
तत्त्वचिन्ता धृता येन चिन्ताचेष्टाविवर्जितः।
तमोऽहङ्कारनिर्मुक्तस्तकारस्तस्य लक्षणम्॥ ९॥
जिसने आत्मतत्त्वके चिन्तनको धारण कर रखा है, जो भौतिक चिन्ता तथा चेष्टासे रहित है, जो अज्ञानरूप अन्धकार और अहंकारसे रहित है, उस अवधूतका यह ‘तकार’ लक्षण है॥ ९॥
आत्मानं चामृतं हित्वा अभिन्नं मोक्षमव्ययम्।
गतो हि कुत्सितः काको वर्तते नरकं प्रति॥ १०॥
अमृतस्वरूप, भेदरहित, मोक्षस्वरूप तथा शाश्वत आत्माका त्याग करके निन्दित और नीच पुरुष [बार-बार] नरककी ओर दौड़ता है॥ १०॥
मनसा कर्मणा वाचा त्यज्यतां मृगलोचना।
न ते स्वर्गोऽपवर्गो वा सानन्दं हृदयं यदि॥ ११॥
मन, वाणी तथा कर्मसे मृगके समान नेत्रोंवाली नारीका त्याग कर देना चाहिये। यदि तुम्हारा मन आत्मानन्दसे पूर्ण है, तब तुम्हें स्वर्ग अथवा मोक्षकी क्या आवश्यकता? ॥ ११॥
न जानामि कथं तेन निर्मिता मृगलोचना।
विश्वासघातकीं विद्धि स्वर्गमोक्षसुखार्गलाम्॥ १२॥
मैं नहीं जानता कि उस [विधाता]-ने मृगनयनी स्त्रीकी रचना किसलिये की। स्त्रीको तुम विश्वासघात करनेवाली और स्वर्ग तथा मोक्षके सुखकी अर्गला (बाधा) समझो॥ १२॥
मूत्रशोणितदुर्गन्धे ह्यमेध्यद्वारदूषिते।
चर्मकुण्डे ये रमन्ति ते लिप्यन्ते न संशयः॥ १३॥
जो लोग मूत्र तथा रक्तसे दुर्गन्धयुक्त और मलके द्वारसे दूषित चर्मकुण्डमें रमण करते हैं, वे इस दुःखमय संसारमें लिप्त रहते हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ १३॥
६१६ * गीता-संग्रह *
कौटिल्यदम्भसंयुक्ता सत्यशौचविवर्जिता।
केनापि निर्मिता नारी बन्धनं सर्वदेहिनाम्॥१४॥
कुटिलता तथा दम्भसे युक्त और सत्य तथा पवित्रतासे रहित एवं सभी देहधारियोंकी बन्धनस्वरूपा नारीको किसने बना दिया ? ॥ १४ ॥
त्रैलोक्यजननी धात्री सा भगी नरकं ध्रुवम्।
तस्यां जातो रतस्तत्र हा हा संसारसंस्थितिः॥१५॥
जो स्त्री तीनों लोकोंकी जननी और पोषण करनेवाली है, वह भगयुक्त होनेसे निश्चय ही साक्षात् नरक है। उसी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य पुनः उसीका भोग करता है, महान् खेद है कि संसारकी यही स्थिति है॥ १५ ॥
जानामि नरकं नारीं ध्रुवं जानामि बन्धनम्।
यस्यां जातो रतस्तत्र पुनस्तत्रैव धावति॥१६॥
मैं स्त्रीको [साक्षात्] नरक समझता हूँ और इसे निश्चितरूपसे बन्धन मानता हूँ; क्योंकि स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य उसीमें आसक्त हो जाता है और बार-बार उसीकी ओर दौड़ता है॥ १६ ॥
भगादिकुचपर्यन्तं संविद्धि नरकार्णवम्।
ये रमन्ति पुनस्तत्र तरन्ति नरकं कथम्॥१७॥
योनिसे लेकर स्तनपर्यन्त स्त्रीको नरकका समुद्र समझो। जो लोग [उसीसे उत्पन्न होकर] पुनः उसीमें रमण करते हैं, वे नरकको किस प्रकार तर सकते हैं ? ॥ १७ ॥
विष्ठादिनरकं घोरं भगं च परिनिर्मितम्।
किमु पश्यसि रे चित्त कथं तत्रैव धावसि॥१८॥
स्त्रीकी योनि विष्ठा आदिसे युक्त घोर नरकस्वरूप बनायी गयी है। हे चित्त ! तुम उसे क्यों देखते हो और उसकी ओर क्यों दौड़ते हो ? ॥ १८ ॥
- अवधूतगीता (१) * ६१७
भगेन चर्मकुण्डेन दुर्गन्धेन व्रणेन च।
खण्डितं हि जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥१९॥
दुर्गन्धयुक्त तथा घावसदृश चर्मकुण्डरूप स्त्रीभगके द्वारा देवता, असुर तथा मानवसहित सम्पूर्ण जगत् विनाशको प्राप्त हुआ है॥१९॥
देहार्णवे महाघोरे पूरितं चैव शोणितम्।
केनापि निर्मिता नारी भगं चैव अधोमुखम् ॥२०॥
नारीके महाभयंकर देहरूप समुद्रमें रक्त भरा हुआ है। भला किसने नारीकी रचना कर दी और उसकी योनिको अधोमुख बना दिया॥२०॥
अन्तरे नरकं विद्धि कौटिल्यं बाह्यमण्डितम्।
ललितामिह पश्यन्ति महामन्त्रविरोधिनीम् ॥२१॥
स्त्रीके देहके भीतर नरक विद्यमान है—ऐसा जानो; जो कुटिलतासे युक्त है, किंतु बाहरसे शोभायुक्त लगता है। बुद्धिमान् (लोग) इस लोकमें स्त्रीको महामन्त्रस्वरूप वैराग्यका शत्रु समझते हैं॥२१॥
अज्ञात्वा जीवितं लब्धं भवस्तत्रैव देहिनाम्।
अहो जातो रतस्तत्र अहो भवविडम्बना ॥२२॥
आत्माको न जान करके ही मनुष्यने पुनः जन्म प्राप्त किया; देहधारियोंका जन्म उसी स्त्रीसे हुआ। महान् आश्चर्य है कि वह पुनः उसीमें आसक्त हो गया; अहो, संसारकी ऐसी विडम्बना है॥२२॥
तत्र मुग्धा रमन्ते च सदेवासुरमानवाः।
ते यान्ति नरकं घोरं सत्यमेव न संशयः ॥२३॥
देवता, असुर तथा मानवसमेत सभी मूढ़ बुद्धिवाले लोग उसी स्त्रीमें रमण करते हैं और [परिणामस्वरूप] वे घोर नरकमें जाते हैं, यह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है॥२३॥
६१८ * गीता-संग्रह *
अग्निकुण्डसमा नारी घृतकुम्भसमो नरः।
संसर्गेण विलीयेत तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ २४॥
स्त्री अग्निके कुण्डके समान है और पुरुष घृतके कुम्भके समान है। नारीके सम्बन्धसे पुरुषका विलय हो जाता है; अतः उसका त्याग कर देना चाहिये॥ २४॥
गौडी पैष्टी तथा माध्वी विज्ञेया त्रिविधा सुरा।
चतुर्थी स्त्री सुरा ज्ञेया ययेदं मोहितं जगत्॥ २५॥
गुड़, जौ तथा महुएकी बनी हुई तीन प्रकारकी मदिरा जाननी चाहिये; किंतु स्त्रीको चौथी मदिरा समझना चाहिये, जिसके द्वारा यह जगत् उन्मत्त कर दिया गया है॥ २५॥
मद्यपानं महापापं नारीसङ्गस्तथैव च।
तस्माद् द्वयं परित्यज्य तत्त्वनिष्ठो भवेन्मुनिः॥ २६॥
मद्यका पान करना महान् पाप है, उसी तरह स्त्री-संसर्ग भी महान् पाप है। अतः इन दोनोंका त्याग करके मुनिको तत्त्वज्ञानसे युक्त होना चाहिये॥ २६॥
चिन्ताक्रान्तं धातुबद्धं शरीरं
नष्टे चित्ते धातवो यान्ति नाशम्।
तस्माच्चित्तं सर्वतो रक्षणीयं
स्वस्थे चित्ते बुद्धयः सम्भवन्ति॥ २७॥
[रस, रक्त, मांस, मेद (चर्बी), हड्डी, मज्जा, शुक्र—इन] धातुओंसे बँधा हुआ शरीर भी चिन्ता करनेसे नष्ट हो जाता है; क्योंकि [चिन्ताके कारण] चित्तके नष्ट होनेपर सभी धातुएँ नाशको प्राप्त हो जाती हैं। अतः चित्तकी सब प्रकारसे रक्षा करनी चाहिये; स्वस्थ चित्तमें ही [उचित-अनुचितका विचार करनेवाली] विवेक बुद्धि उत्पन्न होती है॥ २७॥