गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
२३- अवधूतगीता (१) (भगवान दत्तात्रेय)
५३६ * गीता-संग्रह *
षोडश प्रकरणमें १० श्लोक हैं। तत्त्वस्वरूपनामक सप्तदश प्रकरणमें २० श्लोक हैं। शमनामक अष्टादश प्रकरणमें १०० श्लोक हैं॥४॥
अष्टकं चात्मविश्रान्तौ जीवन्मुक्तौ चतुर्दश।
षट् सङ्ख्याक्रमविज्ञाने ग्रन्थैकात्म्यं ततः परम्॥५॥
विंशत्येकमितैः खण्डैः श्लोकैरात्माग्निमध्यखैः।
अवधूतानुभूतेशच श्लोकाः सङ्ख्याक्रमा अमी॥६॥
आत्मविश्रान्तिनामक उन्नीसवें प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। जीवन्मुक्तिनामक विंशतिक प्रकरणमें १४ श्लोक हैं और संख्याक्रमविज्ञान नामक एकविंशतिक प्रकरणमें ६ श्लोक हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें इक्कीस प्रकरण और ३०३ श्लोक हैं। इस प्रकार अवधूतका अनुभवरूप जो ‘अष्टावक्रगीता’ है, उसके श्लोकोंकी संख्याका क्रम बताया है॥५-६॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां संख्याक्रमविज्ञाननाम एकविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम्॥२१॥
॥ अष्टावक्रगीता सम्पूर्ण॥
अवधूतगीता-(१)
[ भगवान् श्रीदत्तात्रेयकृत अवधूतगीता एक प्राचीन स्वतन्त्र ग्रन्थके रूपमें प्राप्त है। आठ अध्यायोंमें विभक्त इस गीतामें अवधूत श्रीदत्तात्रेयजीने मुमुक्षुजनोंके कल्याणार्थ वेदान्तमार्गद्वारा गूढ़ ब्रह्म-ज्ञानप्राप्तिका सुन्दर विवेचन किया है। इसमें आत्माका निरूपण, निर्द्वन्द्व भाव-कथन, जीव-ब्रह्मकी एकता, प्रणवका स्वरूप, वेदान्तके महावाक्योंपर विचार, ब्रह्मकी सर्वव्यापकता, मनकी लोलुपतासे निवृत्तिका उपाय, विषय-भोगकी निन्दा एवं उसके त्यागका उपाय इत्यादि अनेक परमोपयोगी उपदेश गुम्फित हैं। विरक्त मुमुक्षुजनों एवं प्रबुद्ध विचारकोंके मध्य यह अवधूतगीता प्राचीनकालसे लोकप्रिय बनी हुई है, इसीको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है— ]
पहला अध्याय
आत्मतत्त्व एवं ब्रह्मतत्त्वका निरूपण, उनका ऐक्य तथा अनुभूति
अवधूत उवाच
ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना ।
महद्भयपरित्राणा विप्राणामुपजायते ॥ १ ॥
अवधूत दत्तात्रेयजी बोले—ईश्वरकी कृपासे ही श्रेष्ठ पुरुषोंको [जन्ममरण-रूपी] महान् भयसे रक्षा करनेवाली अद्वैत वासना उत्पन्न होती है॥ १॥
येनेदं पूरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि ।
निराकारं कथं वन्दे ह्यभिन्नं शिवमव्ययम् ॥ २ ॥
जिस आत्माके द्वारा निश्चय ही अपनेमें यह सम्पूर्ण जगत् परिव्याप्त हो रहा है, उस निराकार आत्मतत्त्वकी वन्दना मैं किस प्रकार करूँ, क्योंकि वह [जीवसे] अभिन्न, कल्याणस्वरूप तथा अविनाशी है॥ २॥
पञ्चभूतात्मकं विश्वं मरीचिजलसन्निभम् ।
कस्याप्यहो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः ॥ ३ ॥
पाँच भूतों [पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश]–से निर्मित
अवधूतगीता (१) ❂ ॐ
अवधूत भगवान् दत्तात्रेयद्वारा आत्मतत्त्वका निरूपण
- अवधूतगीता ( १ ) * ५३९
यह जगत् मृगतृष्णाके जलके समान [मिथ्या] है। मायामलसे रहित मैं एक हूँ तो फिर किसको नमस्कार करूँ ? ॥ ३ ॥
आत्मैव केवलं सर्वं भेदाभेदो न विद्यते।
अस्ति नास्ति कथं ब्रूयां विस्मयः प्रतिभाति मे ॥ ४ ॥
[सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें] सब कुछ एकमात्र आत्मा ही है। इसमें भेद तथा अभेद दोनों ही नहीं है। यह है अथवा नहीं है—यह मैं कैसे कहूँ; मुझे विस्मय प्रतीत हो रहा है॥ ४ ॥
वेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानविज्ञानमेव च।
अहमात्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः ॥ ५ ॥
वेदान्तका सार तथा ज्ञान-विज्ञान इतना ही है कि मैं स्वभावसे ही सर्वव्यापी निराकार आत्मा (ब्रह्मतत्त्व) हूँ॥ ५॥
यो वै सर्वात्मको देवो निष्कलो गगनोपमः।
स्वभावनिर्मलः शुद्धः स एवाहं न संशयः ॥ ६॥
जो सर्वरूप परमात्मा हैं, वे निश्चय ही अखण्ड, आकाशतुल्य, स्वभावसे निर्मल तथा शुद्ध हैं। मैं वही [चेतन ब्रह्म] हूँ; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६ ॥
अहमेवाव्ययोऽनन्तः शुद्धविज्ञानविग्रहः।
सुखं दुःखं न जानामि कथं कस्यापि वर्तते ॥ ७ ॥
मैं निश्चय ही नाशरहित, अनन्त तथा शुद्ध विज्ञानस्वरूप हूँ। मैं नहीं जानता कि यह सुख-दुःख किसीको भी किस प्रकार हो सकता है ॥ ७ ॥
न मानसं कर्म शुभाशुभं मे
न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे।
न वाचिकं कर्म शुभाशुभं मे
ज्ञानामृतं शुद्धमतीन्द्रियोऽहम् ॥ ८ ॥
[कोई भी] मानसिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं
५४० * गीता-संग्रह *
है, कायिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं हैं और वाचिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं है। मैं तो ज्ञानामृत, शुद्ध तथा इन्द्रियातीत हूँ॥८॥
मनो वै गगनाकारं मनो वै सर्वतोमुखम्। मनोऽतीतं मनः सर्वं न मनः परमार्थतः॥९॥
मन आकाशके आकारवाला है, मनकी गति सभी ओर है, मन सबसे परे है और मन ही सब कुछ है, किंतु परमार्थकी दृष्टिसे मन कुछ भी नहीं है॥९॥
अहमेकमिदं सर्वं व्योमातीतं निरन्तरम्। पश्यामि कथमात्मानं प्रत्यक्षं वा तिरोहितम्॥१०॥
मैं एक हूँ और यह दृश्यमान सर्वरूप भी मैं ही हूँ। मैं आकाशसे भी अतीत हूँ तथा असीम हूँ। मैं इस आत्माको प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष किस प्रकार देखूँ?॥१०॥
त्वमेवमेकं हि कथं न बुध्यसे समं हि सर्वेषु विमृष्टमव्ययम्। सदोदितोऽसि त्वमखण्डितः प्रभो दिवा च नक्तं च कथं हि मन्यसे॥११॥
वस्तुतः तुम एक ही हो ऐसा क्यों नहीं समझते? सम्पूर्ण शरीरोंमें तुम (आत्मारूपसे) एक समान व्याप्त हो। तुम शाश्वत तथा अव्यय हो। हे प्रभो! तुम सर्वदा प्रकाशमान हो और भेदरहित हो। [निरन्तर प्रकाशमान होनेके कारण] तुम [उदयास्तरूप] दिन तथा रातको किस प्रकार मान सकते हो?॥११॥
आत्मानं सततं विद्धि सर्वत्रैकं निरन्तरम्। अहं ध्याता परं ध्येयमखण्डं खण्ड्यते कथम्॥१२॥
[हे वत्स!] आत्मा (स्वयं)-को सर्वदा सर्वत्र एक तथा अनन्त
- अवधूतगीता (१) * ५४१
जानो। मैं ध्यान करनेवाला हूँ तथा अन्य कोई ध्यानका विषय है— (यदि तुम ऐसा कहते हो) तो फिर उस भेदरहित आत्माको भेदयुक्त कैसे किया जा सकता है?॥ १२॥
न जातो न मृतोऽसि त्वं न ते देहः कदाचन। सर्वं ब्रह्मेति विख्यातं ब्रवीति बहुधा श्रुतिः॥ १३॥
[हे शिष्य!] वास्तवमें तुम न तो उत्पन्न होते हो और न मरते ही हो; न तो यह देह ही कभी तुम्हारा है। सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही है— ऐसा प्रसिद्ध है और श्रुति भी अनेक प्रकारसे ऐसा ही कहती है॥ १३॥
स बाह्याभ्यन्तरोऽसि त्वं शिवः सर्वत्र सर्वदा। इतस्ततः कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत्॥ १४॥
[हे शिष्य!] [सम्पूर्ण प्राणियोंके] बाहर तथा भीतर रहनेवाला, कल्याणस्वरूप, सर्वत्र सभी कालोंमें विद्यमान जो चेतन तत्त्व है, वह तुम ही हो। [अतः उसकी प्राप्तिके लिये] भ्रमित होकर तुम [व्यर्थ ही] पिशाचकी भाँति इधर-उधर क्यों दौड़ते हो?॥ १४॥
संयोगश्च वियोगश्च वर्तते न च ते न मे। न त्वं नाहं जगन्नेदं सर्वमात्मैव केवलम्॥ १५॥
संयोग तथा वियोग न तुम्हारेमें है और न तो मुझमें ही है। [वस्तुतः] न तुम हो, न मैं हूँ और न तो यह जगत् ही है; केवल आत्मा ही सब कुछ है॥ १५॥
शब्दादिपञ्चकस्यास्य नैवासि त्वं न ते पुनः। त्वमेव परमं तत्त्वमतः किं परितप्यसे॥ १६॥
शब्द आदि (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) पाँच विषयोंके साथ तुम्हारा सम्बन्ध नहीं है और तुम्हारे साथ इनका भी सम्बन्ध नहीं है। तुम ही परमतत्त्व हो, अतः तुम क्यों सन्तप्त होते हो?॥ १६॥
५४२ * गीता-संग्रह *
जन्म मृत्युर्न ते चित्तं बन्धमोक्षौ शुभाशुभौ।
कथं रोदिषि रे वत्स नामरूपं न ते न मे॥ १७॥
जन्म-मृत्यु, बन्धन-मोक्ष और शुभ-अशुभ—ये तुम्हारे नहीं हैं, ये चित्तके धर्म हैं, हे वत्स! तुम क्यों रोते हो; ये नाम तथा रूप तुम्हारे भी नहीं हैं और मेरे भी नहीं हैं॥ १७॥
अहो चित्त कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत्।
अभिन्नं पश्य चात्मानं रागत्यागात्सुखी भव॥ १८॥
हे चित्त! तुम भ्रमित होकर पिशाचकी भाँति क्यों दौड़ रहे हो? तुम आत्माको भेदरहित देखो और रागका त्याग करके सुखी हो जाओ॥ १८॥
त्वमेव तत्त्वं हि विकारवर्जितं
निष्कम्पमेकं हि विमोक्षविग्रहम्।
न ते च रागो ह्यथवा विरागः
कथं हि सन्तप्यसि कामकामतः॥ १९॥
तुम वास्तवमें विकारहीन, निश्चल तथा मोक्षस्वरूप [परम] तत्त्व हो। तुम्हें राग अथवा विराग भी नहीं है; तब तुम विषय-भोगोंकी कामनासे सन्तप्त क्यों होते हो?॥ १९॥
वदन्ति श्रुतयः सर्वा निर्गुणं शुद्धमव्ययम्।
अशरीरं समं तत्त्वं तन्मां विद्धि न संशयः॥ २०॥
सभी श्रुतियाँ परमतत्त्वको निर्गुण, शुद्ध, नाशरहित, शरीररहित और सबमें समरूप कहती हैं; उसे ही तुम आत्मस्वरूप जानो, इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥
साकारमनृतं विद्धि निराकारं निरन्तरम्।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः॥ २१॥
साकार (पदार्थों)-को मिथ्या जानो और निराकारको शाश्वत समझो। इस तत्त्वोपदेशको धारण करनेसे [इस संसारमें] पुनर्जन्म नहीं होता है॥ २१॥
- अवधूतगीता ( १ ) * ५४३
एकमेव समं तत्त्वं वदन्ति हि विपश्चितः।
रागत्यागात्पुनश्चित्तमेकानेकं न विद्यते॥ २२ ॥
विद्वज्जन एक ही आत्मतत्त्वको समरूप कहते हैं। रागका त्याग कर देनेसे पुनः चित्तमें द्वैत-अद्वैत (-का प्रपंच) नहीं रहता है॥ २२ ॥
अनात्मरूपं च कथं समाधि-
रात्मस्वरूपं च कथं समाधिः।
अस्तीति नास्तीति कथं समाधि-
र्मोक्षस्वरूपं यदि सर्वमेकम्॥ २३ ॥
अनात्मस्वरूपको समाधि कैसे हो सकती है और आत्म-स्वरूपको भी समाधिका क्या प्रयोजन है? आत्मा है अथवा आत्मा नहीं है—इन दोनों ही स्थितियोंमें समाधि सम्भव नहीं है; यदि सभी मोक्षस्वरूप और एक हैं तो समाधिकी क्या आवश्यकता है?॥ २३ ॥
विशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहस्त्वमजोऽव्ययः।
जानामीह न जानामीत्यात्मानं मन्यसे कथम्॥ २४ ॥
[हे शिष्य!] तुम विशुद्ध, समरस, देहरहित, जन्मरहित तथा अव्यय आत्मतत्त्व हो। ‘इस लोकमें मैं आत्माको जानता हूँ अथवा नहीं जानता हूँ’—ऐसा तुम क्यों मानते हो?॥ २४ ॥
तत्त्वमस्यादिवाक्यैश्च स्वात्मा हि प्रतिपादितः।
नेति नेति श्रुतिर्ब्रूयादनृतं पाञ्चभौतिकम्॥ २५ ॥
‘तत्त्वमसि’ आदि वचनोंके द्वारा अपनी आत्माका ही प्रतिपादन किया गया है और श्रुति भी जो ‘नेति-नेति’ का उद्घोष करती है, उसका तात्पर्य यही है कि यह पांचभौतिक जगत् मिथ्या है॥ २५ ॥
५४४ * गीता-संग्रह *
आत्मन्येवात्मना सर्वं त्वया पूर्णं निरन्तरम्। ध्याता ध्यानं न ते चित्तं निर्लज्जं ध्यायते कथम्॥२६॥
तुम्हारे द्वारा सब कुछ आत्मामें निरन्तर आत्मासे ही पूर्ण हो रहा है। ध्यान करनेवाले तथा ध्यानकी तुम्हें आवश्यकता ही नहीं है; तो फिर यह लज्जारहित चित्त ध्यान कैसे करता है?॥२६॥
शिवं न जानामि कथं वदामि शिवं न जानामि कथं भजामि। अहं शिवश्चेत्परमार्थतत्त्वं समस्वरूपं गगनोपमं च॥२७॥
मैं कल्याणस्वरूप ब्रह्मको नहीं जानता हूँ तो उसका वर्णन कैसे कर सकता हूँ, मैं उसे नहीं जानता हूँ तो उसका भजन कैसे कर सकता हूँ; मैं ही कल्याणस्वरूप, परमार्थस्वरूप, समस्वरूप और आकाशतुल्य ब्रह्म हूँ (तो भजन आदिकी क्या आवश्यकता?)॥२७॥
नाहं तत्त्वं समं तत्त्वं कल्पनाहेतुवर्जितम्। ग्राह्यग्राहकनिर्मुक्तं स्वसंवेद्यं कथं भवेत्॥२८॥
मैं महत् आदि तत्त्व नहीं हूँ और साम्यावस्थारूप प्रकृति तत्त्व भी नहीं हूँ। मैं कल्पना तथा हेतुसे रहित हूँ और ग्राह्य-ग्राहक भावसे निर्मुक्त हूँ; ऐसी स्थितिमें स्वसंवेद्यता भी कैसे सम्भव है?॥२८॥
अनन्तरूपं न हि वस्तु किञ्चित् तत्त्वस्वरूपं न हि वस्तु किञ्चित्। आत्मैकरूपं परमार्थतत्त्वं न हिंसको वापि न चाप्यहिंसा॥२९॥
कोई भी वस्तु अनन्तरूप नहीं है और कोई भी वस्तु तत्त्वस्वरूप नहीं है; वस्तुतः आत्मा ही एकरूप परमतत्त्वके रूपमें अधिष्ठित है। [अद्वैत भावकी स्थितिमें] न कोई हिंसक है और न अहिंसाकी ही
* अवधूतगीता ( १ ) * ५४५
भावना रहती है॥ २९॥
विशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहमजमव्ययम्।
विभ्रमं कथमात्मार्थे विभ्रान्तोऽहं कथं पुनः॥ ३०॥
तुम विशुद्ध हो; देहरहित, जन्मरहित, अव्यय तथा समरस तत्त्व हो। आत्माके विषयमें तुम्हें भ्रान्ति क्यों है? तुम कैसे कह सकते हो कि मैं भ्रान्तियुक्त हूँ?॥ ३०॥
घटे भिन्ने घटाकाशं सुलीनं भेदवर्जितम्।
शिवेन मनसा शुद्धो न भेदः प्रतिभाति मे॥ ३१॥
घटके नष्ट हो जानेपर घटाकाश (घटके भीतरका आकाश) महाकाशमें पूरी तरह विलीन हो जाता है और भेदरहित हो जाता है। परमतत्त्वमें शुद्ध मनके द्वारा किसी भेदकी प्रतीति नहीं होती है॥ ३१॥
न घटो न घटाकाशो न जीवो जीवविग्रहः।
केवलं ब्रह्म संविद्धि वेद्यवेदकवर्जितम्॥ ३२॥
[उस चेतन ब्रह्ममें उपाधिरूप] घट नहीं है, घटाकाश भी नहीं है, [अन्तःकरणरूपी उपाधिके अभावसे] जीव भी नहीं है और जीवका विग्रह भी नहीं है। अतः ज्ञेय-ज्ञाताके भेदसे रहित एकमात्र उस परब्रह्मको भली-भाँति जानो॥ ३२॥
सर्वत्र सर्वदा सर्वमात्मानं सततं ध्रुवम्।
सर्वं शून्यमशून्यं च तन्मां विद्धि न संशयः॥ ३३॥
आत्माको सर्वत्र, सभी कालोंमें विद्यमान, सर्वरूप, सतत तथा शाश्वत जानो। सभी शून्य तथा अशून्य (पदार्थों)-को निस्संदेह आत्मस्वरूप समझो॥ ३३॥
वेदा न लोका न सुरा न यज्ञा
वर्णाश्रमौ नैव कुलं न जातिः।
५४६
- गीता-संग्रह *
न धूममार्गो न च दीप्तिमार्गो
ब्रह्मैकरूपं परमार्थतत्त्वम् ॥ ३४ ॥
वस्तुतः न वेद हैं, न लोक हैं, न देवता हैं, न यज्ञ हैं, न वर्ण तथा आश्रम हैं, न कुल है, न जाति है, न धूममार्ग (दक्षिणायन) है और न दीप्तिमार्ग (उत्तरायण) है; एकमात्र ब्रह्म ही परमार्थतत्त्व है ॥ ३४ ॥
व्याप्यव्यापकनिर्मुक्तः त्वमेकः सफलो यदि।
प्रत्यक्षं चापरोक्षं च ह्यात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ३५ ॥
यदि तुम व्याप्य तथा व्यापक भावसे रहित, एक रूपसे (अपनेको जाननेमें सफल) हो तो तुम आत्माको प्रत्यक्ष और परोक्ष कैसे मानते हो? ॥ ३५ ॥
अद्वैतं केचिदिच्छन्ति द्वैतमिच्छन्ति चापरे।
समं तत्त्वं न विन्दन्ति द्वैताद्वैतविवर्जितम् ॥ ३६ ॥
कुछ लोग अद्वैतकी इच्छा करते हैं और कुछ अन्य लोग द्वैतकी इच्छा करते हैं; वे सभी लोग द्वैताद्वैतसे रहित समतत्त्वको नहीं जानते हैं ॥ ३६ ॥
श्वेतादिवर्णरहितं शब्दादिगुणवर्जितम्।
कथयन्ति कथं तत्त्वं मनोवाचामगोचरम् ॥ ३७ ॥
परब्रह्म श्वेत आदि वर्णोंसे रहित है, शब्द आदि गुणोंसे रहित है और मन तथा वाणीसे परे है; तब लोग उस परब्रह्मका वर्णन कैसे करते हैं? ॥ ३७ ॥
यदानृतमिदं सर्वं देहादि गगनोपमम्।
तदा हि ब्रह्म संवेत्ति न ते द्वैतपरम्परा ॥ ३८ ॥
जब कोई इस सम्पूर्ण जगत्-प्रपंचको मिथ्या तथा शरीर आदिको आकाशतुल्य (मायामात्र) जान लेता है, तभी वह ब्रह्मको सम्यक् रूपसे जानता है। (इस अवस्थामें) उसे द्वैतभावना नहीं रहेगी ॥ ३८ ॥
- अवधूतगीता ( १ ) * ५४७
परेण सहजात्मापि ह्यभिन्नः प्रतिभाति मे।
व्योमाकारं तथैवकं ध्याता ध्यानं कथं भवेत्॥ ३९॥
परब्रह्मके साथ अनादि आत्मा मुझे भेदरहित प्रतीत होता है। वह गगनाकार, व्यापक और एकरूप है। इसमें ध्याता और ध्यानका व्यवहार कैसे हो सकता है?॥ ३९॥
यत्करोमि यदश्नामि यज्जुहोमि ददामि यत्।
एतत्सर्वं न मे किञ्चिद्विशुद्धोऽहमजोऽव्ययः॥ ४०॥
मैं जो कुछ करता हूँ, जो कुछ खाता हूँ, जो कुछ हवन करता हूँ और जो कुछ देता हूँ—यह सब कुछ भी नहीं है; क्योंकि मैं शुद्ध, जन्मरहित तथा अव्यय हूँ॥ ४०॥
सर्वं जगद्विद्धि निराकृतीदं
सर्वं जगद्विद्धि विकारहीनम्।
सर्वं जगद्विद्धि विशुद्धदेहं
सर्वं जगद्विद्धि शिवैकरूपम्॥ ४१॥
तुम सम्पूर्ण जगत्को आकाररहित जानो, समस्त जगत्को विकाररहित जानो, समग्र जगत्को ब्रह्मका विग्रह जानो और सम्पूर्ण जगत्को एकमात्र कल्याणस्वरूप जानो॥ ४१॥
तत्त्वं त्वं हि न सन्देहः किं जानाम्यथवा पुनः।
असंवेद्यं स्वसंवेद्यमात्मानं मन्यसे कथम्॥ ४२॥
तुम वही परमतत्त्व हो, इसमें सन्देह नहीं है। तब तुम यह क्यों सोचते हो कि मैं आत्माको जानता हूँ अथवा नहीं जानता हूँ? जो आत्मा किसीसे भी न जाननेयोग्य है, उसे अपनेसे जाननेयोग्य कैसे मानते हो?॥ ४२॥
मायामाया कथं तात छायाछाया न विद्यते।
तत्त्वमेकमिदं सर्वं व्योमाकारं निरञ्जनम्॥ ४३॥
हे तात! अन्धकार तथा प्रकाश एक साथ विद्यमान नहीं रह सकते,
५४८ * गीता-संग्रह *
अतः ब्रह्ममें माया तथा अमाया कैसे साथ रह सकती है ? यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् आकाशरूप है। मायामलसे रहित वह परमब्रह्म तुम्हीं हो ॥ ४३ ॥
आदिमध्यान्तमुक्तोऽहं न बद्धोऽहं कदाचन ।
स्वभावनिर्मलः शुद्ध इति मे निश्चिता मतिः ॥ ४४ ॥
मैं आदि, मध्य और अन्तसे रहित हूँ; मैं कभी भी बद्ध नहीं हूँ। मैं स्वभावसे निर्मल और शुद्ध हूँ—ऐसी मेरी निश्चित बुद्धि है ॥ ४४ ॥
महदादि जगत्सर्वं न किञ्चित्प्रतिभाति मे ।
ब्रह्मैव केवलं सर्वं कथं वर्णाश्रमस्थितिः ॥ ४५ ॥
महत् आदि तत्त्वोंसे बना यह सम्पूर्ण जगत् मुझको कुछ भी भासित नहीं होता है; यह सब केवल ब्रह्म ही है। वर्ण तथा आश्रमोंकी (पृथक्) स्थिति कैसे सिद्ध हो सकती है ? ॥ ४५ ॥
जानामि सर्वथा सर्वमहमेको निरन्तरम् ।
निरालम्बमशून्यं च शून्यं व्योमादिपञ्चकम् ॥ ४६ ॥
मैं अपनेको हर प्रकारसे एक शाश्वत, निरालम्ब तथा पूर्ण जानता हूँ। आकाश आदि पाँच भूत शून्य (अवास्तविक) हैं ॥ ४६ ॥
न षण्ढो न पुमान् स्त्री न बोधो नैव कल्पना ।
सानन्दो वा निरानन्दमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ४७ ॥
आत्मा न पुरुष है, न स्त्री है और न तो नपुंसक ही है। यह ज्ञान तथा कल्पना भी नहीं है। तुम आत्माको आनन्दयुक्त अथवा आनन्दरहित भी कैसे मानते हो ? ॥ ४७ ॥
षडङ्गयोगान्न तु नैव शुद्धं
मनोविनाशान्न तु नैव शुद्धम् ।
* अवधूतगीता ( १ ) * ५४९
गुरूपदेशान्न तु नैव शुद्धं स्वयं च तत्त्वं स्वयमेव शुद्धम् ॥ ४८ ॥
षडंगयोगसे भी आत्मा शुद्ध नहीं होता, मनका नाश होनेसे भी यह शुद्ध नहीं होता और गुरुके उपदेशसे भी यह शुद्ध नहीं होता; आत्मा तो परतत्त्व है और स्वयं शुद्ध ही है ॥ ४८ ॥
न हि पञ्चात्मको देहो विदेहो वर्तते न हि। आत्मैव केवलं सर्वं तुरीयं च त्रयं कथम् ॥ ४९ ॥
आत्मा पाँच भूतोंसे निर्मित देह नहीं है और यह देहरहित भी नहीं है। वस्तुतः सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच आत्मा ही है, (आत्मासे भिन्न कुछ नहीं है) तब तीन अवस्थाएँ (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) तथा तुरीयावस्था—ये कैसे हो सकती हैं? ॥ ४९ ॥
न बद्धो नैव मुक्तोऽहं न चाहं ब्रह्मणः पृथक्। न कर्ता न च भोक्ताहं व्याप्यव्यापकवर्जितः ॥ ५० ॥
मैं (आत्मा) बद्ध नहीं हूँ, मैं मुक्त भी नहीं हूँ और ब्रह्मसे पृथक् नहीं हूँ। मैं न तो कर्ता हूँ, न भोक्ता हूँ। मैं तो व्याप्य तथा व्यापक भावसे रहित हूँ ॥ ५० ॥
यथा जलं जले न्यस्तं सलिलं भेदवर्जितम्। प्रकृतिं पुरुषं तद्वदभिन्नं प्रतिभाति मे ॥ ५१ ॥
जिस प्रकार जलमें डाला गया जल समरूप (जलके रूपमें) हो जाता है, उसी प्रकार प्रकृति तथा पुरुष भी मुझे अभिन्नरूप ही प्रतीत होते हैं ॥ ५१ ॥
यदि नाम न मुक्तोऽसि न बद्धोऽसि कदाचन। साकारं च निराकारमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ५२ ॥
यदि ऐसी बात है कि तुम मुक्त नहीं हो तो तुम कभी बद्ध भी नहीं हो। फिर तुम आत्माको साकार अथवा निराकार किस प्रकार
५५० * गीता-संग्रह *
मानते हो ? ॥ ५२ ॥
जानामि ते परं रूपं प्रत्यक्षं गगनोपमम्।
यथा परं हि रूपं यन्मरीचिजलसन्निभम्॥ ५३ ॥
मैं तुम्हारे परमरूपको जानता हूँ, जो प्रत्यक्ष तथा आकाशतुल्य (व्यापक) है। साथ ही तुम्हारे अपररूपको भी जानता हूँ, जो मृगतृष्णाके जलके समान है॥ ५३॥
न गुरुर्नोपदेशश्च न चोपाधिर्न मे क्रिया।
विदेहं गगनं विद्धि विशुद्धोऽहं स्वभावतः॥ ५४ ॥
मेरे लिये न कोई गुरु है, न उपदेश है, न उपाधि है और न तो क्रिया ही है। तुम मुझे देहरहित तथा आकाशतुल्य व्यापक जानो। मैं स्वभावसे ही पूर्णतया शुद्ध हूँ॥ ५४ ॥
विशुद्धोऽस्यशरीरोऽसि न ते चित्तं परात्परम्।
अहं चात्मा परं तत्त्वमिति वक्तुं न लज्जसे॥ ५५ ॥
तुम विशुद्ध, देहरहित हो। यह चित्त तुम्हारा नहीं है, तुम परम तत्त्व हो, अतः 'मैं आत्मा हूँ-परमतत्त्व हूँ'—ऐसा कहनेमें तुम्हें लज्जा नहीं आती ॥ ५५ ॥
कथं रोदिषि रे चित्त ह्यात्मैवात्मात्मना भव
पिब वत्स कलातीतमद्वैतं परमामृतम्॥ ५६ ॥
हे चित्त! तुम रुदन क्यों करते हो, तुम आत्मा ही हो। तुम स्वयं आत्मस्वरूप हो जाओ। हे वत्स! तुम कलारहित अद्वैतरूपी परम अमृतका पान करो॥ ५६॥
नैव बोधो न चाबोधो न बोधाबोध एव च।
यस्येदृशः सदा बोधः स बोधो नान्यथा भवेत्॥ ५७॥
आत्मा न ज्ञानरूप है, न अज्ञानरूप और न तो ज्ञान-अज्ञान उभयरूप ही है। जिसे इस प्रकारका सर्वदा ज्ञान है, उसका यह ज्ञान
- अवधूतगीता ( १ ) * ५५१
मिटता नहीं ॥ ५७ ॥
ज्ञानं न तर्को न समाधियोगो
न देशकालौ न गुरूपदेशः ।
स्वभावसंवित्तिरहं च तत्त्व-
माकाशकल्पं सहजं ध्रुवं च ॥ ५८ ॥
मैं ज्ञान नहीं हूँ, तर्क नहीं हूँ, समाधियोगरूप नहीं हूँ, देश-काल नहीं हूँ और गुरुका उपदेशरूप भी नहीं हूँ। मैं स्वभावसे ही ज्ञानस्वरूप, आकाशतुल्य, सहज तथा शाश्वत परतत्त्व हूँ॥ ५८ ॥
न जातोऽहं मृतो वापि न मे कर्म शुभाशुभम् ।
विशुद्धं निर्गुणं ब्रह्म बन्धो मुक्तिः कथं मम ॥ ५९ ॥
मैं न तो कभी उत्पन्न हुआ हूँ और न तो कभी मृत ही हुआ हूँ। मुझे शुभ-अशुभ कोई भी कर्म व्याप्त नहीं करता। मैं विशुद्ध तथा निर्गुण ब्रह्म हूँ तो फिर मेरा बन्धन तथा मोक्ष कैसा ? ॥ ५९ ॥
यदि सर्वगतो देवः स्थिरः पूर्णो निरन्तरः ।
अन्तरं हि न पश्यामि स बाह्याभ्यन्तरः कथम् ॥ ६० ॥
जब आत्मा सर्वव्यापी, प्रकाशमान, निश्चल, पूर्ण तथा निरन्तर है, इसलिये मुझे अन्तरकी प्रतीति नहीं होती। वह आत्मतत्त्व बाहर या भीतर कैसे (कहा जा सकता) है ? ॥ ६० ॥
स्फुरत्येव जगत्कृत्स्नमखण्डितनिरन्तरम् ।
अहो मायामहामोहो द्वैताद्वैतविकल्पना ॥ ६१ ॥
[परब्रह्ममें ही] सम्पूर्ण जगत् अखण्डित तथा सतत रूपमें स्फुरित हो रहा है। आश्चर्य है कि माया, महामोह और द्वैत-अद्वैतकी कल्पना—ये सब भी उसीमें स्फुरित हो रहे हैं ॥ ६१ ॥
५५२
- गीता-संग्रह *
साकारं च निराकारं नेति नेतीति सर्वदा।
भेदाभेदविनिर्मुक्तो वर्तते केवलः शिवः॥ ६२॥
स्थूल तथा सूक्ष्म जो भी सम्पूर्ण जगत् दृश्यमान है, वह नहीं है—नहीं है—ऐसा श्रुति कहती है। भेद-अभेदसे रहित तथा कल्याणस्वरूप एकमात्र आत्मतत्त्व ही सर्वदा विद्यमान है॥ ६२॥
न ते च माता च पिता च बन्धु-
र्न ते च पत्नी न सुतश्च मित्रम्।
न पक्षपातो न विपक्षपातः
कथं हि सन्तप्तिरियं हि चित्ते॥ ६३॥
तुम्हारी न तो माता है, न कोई पिता है, न बन्धु है, न पत्नी है, न पुत्र है, न मित्र है, न पक्षपाती है और विपक्षपाती भी नहीं है; तब तुम्हारे चित्तमें यह सन्ताप कैसा?॥ ६३॥
दिवानक्तं न ते चित्ते उदयास्तमयौ न हि।
विदेहस्य शरीरत्वं कल्पयन्ति कथं बुधाः॥ ६४॥
[हे तात!] तुम्हारे (सदा प्रकाशमान) चेतनस्वरूपमें उदय तथा अस्त होनेवाले दिन तथा रात नहीं हैं। विद्वान् लोग देहरहित (आत्मतत्त्व)-के शरीरत्वकी कल्पना क्यों करते हैं?॥ ६४॥
नाविभक्तं विभक्तं च न हि दुःखसुखादि च।
न हि सर्वमसर्वं च विद्धि चात्मानमव्ययम्॥ ६५॥
आत्मा न तो विभक्त है और न अविभक्त, यह सुख-दुःखसे भी युक्त नहीं है, यह न तो पूर्ण है और न अपूर्ण; इस (द्वन्द्वरहित) शाश्वत आत्माको जानो॥ ६५॥
नाहं कर्ता न भोक्ता च न मे कर्म पुराधुना।
न मे देहो विदेहो वा निर्ममेति ममेति किम्॥ ६६॥
मैं न तो [कर्मोंका] कर्ता हूँ और न [उनके फलोंका] भोग
* अवधूतगीता ( १ ) * ५५३
करनेवाला हूँ। कर्म न तो मेरे पूर्व जन्मका है और न इसी जन्मका है। मेरा देह नहीं है और मैं देहसे रहित भी नहीं हूँ। मैं ममतारहित अथवा ममतायुक्त भी कैसे हो सकता हूँ॥ ६६॥
न मे रागादिको दोषो दुःखं देहादिकं न मे।
आत्मानं विद्धि मामेकं विशालं गगनोपमम्॥ ६७॥
राग आदि दोष मेरे नहीं हैं और देह आदिसे सम्बन्धित दुःख भी मेरे नहीं हैं। मुझको एकरूप, विराट् तथा आकाशतुल्य आत्मा जानो॥ ६७॥
सखे मनः किं बहुजल्पितेन
सखे मनः सर्वमिदं वितर्क्यम्।
यत्सारभूतं कथितं मया ते
त्वमेव तत्त्वं गगनोपमोऽसि॥ ६८॥
हे मित्र मन! अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन है? तुम्हें इस सब पर मनन करना चाहिये। जो सारभूत है, उसे मैंने तुमको बता दिया कि तुम वास्तवमें परतत्त्व हो और आकाशतुल्य व्यापक हो॥ ६८॥
येन केनापि भावेन यत्र कुत्र मृता अपि।
योगिनस्तत्र लीयन्ते घटाकाशमिवाम्बरे॥ ६९॥
योगिजन जिस किसी भी भावसे तथा जहाँ कहीं भी मृत्युको प्राप्त होनेपर उसी परब्रह्ममें [वैसे ही] विलीन हो जाते हैं, जैसे [घटके टूट जानेपर] घटाकाश महाकाशमें विलीन हो जाता है॥ ६९॥
तीर्थे चान्त्यजगेहे वा नष्टस्मृतिरपि त्यजन्।
समकाले तनुं मुक्तः कैवल्यव्यापको भवेत्॥ ७०॥
तीर्थमें अथवा चाण्डालके घरमें अचेतावस्थामें भी देहका त्याग करता हुआ योगी तत्क्षण मुक्त होकर व्यापक ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥ ७०॥
५५४ * गीता-संग्रह *
धर्मार्थकाममोक्षांश्च द्विपदादिचराचरम्।
मन्यन्ते योगिनः सर्वं मरीचिजलसन्निभम्॥ ७१ ॥
योगिजन धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको तथा द्विपद आदि जंगम प्राणियों और [वृक्ष, पर्वत] आदि स्थावर पदार्थोंको मृगतृष्णाके जलके समान [मिथ्या] मानते हैं॥ ७१ ॥
अतीतानागतं कर्म वर्तमानं तथैव च।
न करोमि न भुञ्जामि इति मे निश्चला मतिः॥ ७२ ॥
मैं भूत, भविष्य तथा वर्तमान कालके कर्मोंको न तो करता हूँ और न इनके फलका भोग ही करता हूँ—इस प्रकारकी मेरी दृढ़ बुद्धि है॥ ७२ ॥
शून्यागारे समरसपूत-
स्तिष्ठन्नेकः सुखमवधूतः।
चरति हि नग्नस्त्यक्त्वा गर्वं
विन्दति केवलमात्मनि सर्वम्॥ ७३ ॥
समतारूपी रसके द्वारा पवित्र हुआ अवधूत एकान्त स्थानमें सुखपूर्वक अकेला रहता है। अभिमानका त्याग करके वह अनावृत विचरण करता है और केवल अपनेमें ही सबका अनुभव करता है॥ ७३ ॥
त्रितयतुरीयं नहि नहि यत्र
विन्दति केवलमात्मनि तत्र।
धर्माधर्मौ नहि नहि यत्र
बद्धो मुक्तः कथमिह तत्र॥ ७४ ॥
जिस जीवन्मुक्तताकी दशामें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय—ये अवस्थाएँ नहीं रह जाती हैं, उस दशामें वह केवल अपने आत्मामें ब्रह्मानन्दको प्राप्त होता है। जिस अवस्थामें धर्म-अधर्मका भाव नहीं रहता, उस अवस्थामें बद्ध और मुक्तका भाव कैसे रह सकता है ?॥ ७४ ॥
- अवधूतगीता (१) * ५५५
विन्दति विन्दति नहि नहि मन्त्रं
छन्दो लक्षणं नहि नहि तन्त्रम्।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपितमेतत्परमवधूतः ॥ ७५ ॥
आत्मरसमें मग्न तथा ध्यानके द्वारा पवित्र हुआ जीवन्मुक्त अवधूत कोई मन्त्र नहीं प्राप्त करता है और न तो किसी छन्दरूपी तन्त्रको ही प्राप्त करता है। उस (परब्रह्मको प्राप्त हुए) अवधूतने ही इस (गीता)-का कथन किया है॥ ७५ ॥
सर्वशून्यमशून्यं च सत्यासत्यं न विद्यते।
स्वभावभावतः प्रोक्तं शास्त्रसंवित्तिपूर्वकम् ॥ ७६ ॥
सम्पूर्ण जगत् शून्यरूप है और अशून्यरूप भी है। (परब्रह्ममें) न तो सत्य विद्यमान है और न असत्य। अवधूतने अपने अनुभवसे तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार इसका वर्णन किया है॥ ७६ ॥
॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
गुणोंकी ग्राहकता, ब्रह्मका स्वरूप, ब्रह्मानुभूति-वर्णन, परमज्ञानप्रदाता गुरुकी प्रशंसा तथा आत्मतत्त्वकी विलक्षणता
अवधूत उवाच
बालस्य वा विषयभोगरतस्य वापि
मूर्खस्य सेवकजनस्य गृहस्थितस्य।
एतद् गुरोः किमपि नैव न चिन्तनीयं
रत्नं कथं त्यजति कोऽप्यशुचौ प्रविष्टम् ॥ १ ॥
अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—बालक, विषय-भोगमें लीन, मूर्ख, सेवकजन अथवा गृहस्थ—इस प्रकारके गुरुओंसे कुछ भी लाभ