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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

( ६ ) समय के गिरे हुये काल के अनुसार इतिहास पर आधारित विवरण ही होना चाहिये। इस प्रकार के विवरणों से वैदिक सिद्धान्त दूषित नहीं होता। ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर धर्म की गति का निर्धारण नहीं होता है क्योंकि इतिहास का कार्य तो अतीत में घटित तथ्यों का संकलन मात्र है उसमें तो अच्छे बुरे सभी वृत्तान्त होंगे, उन सभी को धर्म में कैसे गिना जा सकता है ? अतः ऐसे तथ्यों को धार्मिक तथ्यों के रूप में लेना ही नहीं चाहिये। गोपथ ब्राह्मण तथा ज्योतिष—गोपथ ब्राह्मण में यथावसर ज्योतिष एवं खगोल विद्या की भी बातें आई हैं जिनसे कई वैदिक तथ्यों का महत्त्वपूर्ण उद्घाटन होता है। ऋतु, संवत्सर तथा मासों का वर्णन इस ग्रन्थ में मिलता है¹। यहाँ ३, ६ अथवा ७ ऋतुयें भी मानी गई हैं। स्पष्टतः यह उस समय के प्रचलित विभिन्न मत हैं। इसी प्रसङ्ग में १२ मासों की चर्चा भी हुई है। यद्यपि उनके नामों का विवरण इसमें नहीं है। बिना कोई नाम लिये १३ वें ²अधिमास का भी वर्णन हुआ है अर्थात् १२ अथवा १३ मास के वर्ष का उल्लेख है। ज्योतिष से सम्बन्धित एक प्रसङ्ग यहाँ अत्यन्त उद्धरणीय है—एक स्थान पर 'फल्गुनी पौर्णमासी' का नाम लिया गया है इससे ज्ञात होता है कि चित्रा, विशाखादि नक्षत्रों के नाम से पूर्णमासी तथा मासों के नाम रखने की परम्परा तब प्रारम्भ हो चली थी।³ इसी वाक्य का पूरा उद्धरण यह कहता है—कि फल्गुनी पौर्णमासी ही संवत्सर का मुख है।⁴ यह उद्धरण ज्योतिर्विदों के लिये अतीव ध्यातव्य है। आज तो वर्ष का प्रारम्भ फाल्गुन पूर्णमासी के अनन्तर होता है। यह उचित नहीं जँचता। जब से नये मास का प्रारम्भ हुआ है तब से ही नये वर्ष का प्रारम्भ मानना चाहिये। चैत्र का प्रारम्भ १५ दिन बाद तथा वर्ष का प्रारम्भ १५ दिन पूर्व होने में कोई औचित्य या सामञ्जस्य नहीं लगता पर गोपथ ब्राह्मण के इस महनीय वाक्य से यह संकेत मिलता है कि वर्ष का प्रारम्भ भी चैत्र मास के प्रारम्भ के साथ ही अर्थात् फल्गुनी पौर्णमासी के ठीक अनन्तर माना जाता था। यहाँ ज्योतिष की दृष्टि से तर्क संगत भी है। बाद के समय में १५ दिन की यह भूल कब से प्रारम्भ हुई, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। इस ग्रन्थ में एक स्थान पर उत्तरायण तथा दक्षिणायन का भी वर्णन है जो कि अन्य प्राचीन ग्रन्थों से तुलनीय है⁵। इसमें ही एक यह भी उद्धरण है कि पृथ्वी गोल है १. द्रष्टव्य गो. पू. ५ । ५॥ २. यजुर्वेद २२ । ३१ में अधिमास = मलमास की अंहसस्पति संज्ञा है। ऋग्वेद १ । २५ । ८ में १२ मास एवं १३ वें लांद मास का स्पष्ट उल्लेख है ॥ ३. वेद में १२ मासों के नाम इस प्रकार आये हैं—"मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभ, नभस्य, इष, ऊर्ज, सह, सहस्य, तप, तपस्य" ( यजु० २२ । ३१ ) इन दो-दो मासों के जोड़े वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर इन छः ऋतुओं के द्योतक हैं ॥ ४. "एतद्वै संवत्सरस्य मुखं यत् फल्गुनी पौर्णमासी" • • • 'द्र. गो. उ. १ । १९ ॥ ५. द्र. गो. उ. ६।६ यह तैत्तिरीय संहिता ६ । ५ । ३ से तुलनीय है ॥

( ७ ) तथा घूमती है। सूर्य कभी छिपता नहीं, अपितु घूमती हुई पृथिवी के ओट में पड़ जाता है¹ । गोपथ में आये कुछ शब्दों की व्युत्पत्तियां—निरुक्त के अनुसार गोपथ ब्राह्मणकार भी “अर्थनित्यः परीक्षेत” (निरु० २ । १) के पूर्ण समर्थक हैं। निरुक्तकार ने जिस प्रकार निर्वचन के सम्बन्ध में “अविद्यमाने सामान्‍येऽप्यक्षरवर्णसामान्यान्निब्रूयात्” का सिद्धान्त स्थिर किया है, उसका पूर्ण अनुसरण ग्रन्थकार करते हैं।² प्रस्तुत ग्रन्थ में आयी कुछ मार्मिक शब्द व्युत्पत्तियाँ यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं— ( क ) सुवेदं सन्तं स्वेद इत्याचक्षते (गो० पू० १ । १) यहाँ एक कथा के आधार पर बताया गया है कि सुवेद अर्थात् वेद के अच्छे जानकार होने से ही पसीने को स्वेद कहा जाता है। वेदाभ्यास करने पर पसीना निकला वह पसीना ही उसके वेदाध्ययन का परिचायक या प्रतीक था अतः वह पसीना ही 'सुवेद' होने से अन्ततः वह स्वेद बन गया। ( ख ) तं वा एतं रसं सन्तं रथ इत्याचक्षते (गो० पू० २ । २१) यहाँ रसपूर्ण अर्थात् आनन्द पूर्ण होने से ही इसकी रथ संज्ञा बताई गई है। ( ग ) श्रेष्ठां धियं क्षियतीति दीक्षितः (गो पू० ३ । १६) अर्थात् श्रेष्ठ बुद्धि का ज्ञापक होने से दीक्षित संज्ञा है। यहाँ “धीक्षितं” ही दीक्षित है। ( घ ) छिद्रं खमित्युक्तं तस्य मेति प्रतिषेधः, मां यज्ञं छिद्रं करिष्यतीति (गो. उ. २ । ५) ॥ यह यज्ञार्थक 'मख' शब्द की अतीव उपयोगी तथा सुन्दर व्युत्पत्ति है, इसमें बताया है कि 'ख' का अर्थ छिद्र है; इसका 'मा' शब्द द्वारा प्रतिषेध किया है, अर्थात् ऐसा कृत्य जो कि सभी छिद्रों या अशुद्धियों से विरहित हो। इससे स्पष्ट है कि यज्ञ में कोई अशुद्धि या भूल न होनी चाहिये। ( ङ ) अथर्ववेद के प्रसिद्ध कुन्ताप सूक्त के कुन्ताप शब्द की बड़ी सुन्दर व्युत्पत्ति प्रस्तुत है—'कुयं वै नाम कुत्सितं तद्यत्तपति, तस्मात् कुन्तापः' (गो. उ. ६ । १२) स्पष्टतः यह अन्वर्थ व्युत्पत्ति है। ( च ) गो. उ. ३ । २० में साम शब्द की सुन्दर व्युत्पत्ति की गई है। इसमें सा + अम यह पदच्छेद बताया गया है। वस्तुतः यह व्युत्पत्ति इससे पूर्व की बृहदारण्यको- पनिषद् ६ । ४ । २० से तुलनीय है। गोपथ ब्राह्मण के सुभाषित—प्रस्तुत ब्राह्मण में कुछ बड़े ही मार्मिक सुन्दर सटीक सुभाषितों का प्रयोग किया गया है। जिसके कुछ उदाहरण पाठकों के रसास्वादनार्थ प्रस्तुत हैं— ( क ) “परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः” ( गो. पू. १ । १ ) । अर्थात् देवता ज्ञानी पुरुष परोक्ष से प्रेम करते हैं तथा प्रत्यक्ष से द्वेष करने वाले होते हैं। यह उस अचिन्त्य शक्ति के सन्दर्भ में कहा गया है कि वह ईश्वर परोक्ष होकर भी प्रिय है तथा अन्य दृश्यमान भौतिक पदार्थ प्रत्यक्ष होकर भी द्वेष-योग्य हैं। १. द्र. गो. उ. ४ । १०॥ २. द्र. “रूपसामान्यादर्थसामान्याद्” ॥ गो. पू. १ । २६ ।

( ८ ) ( ख ) 'यज्ञे अकुशला ऋत्विजो भवन्त्यचरितिनो ब्रह्मचर्यमपराग्या वा तद्वै यज्ञस्य विरिष्टम् इत्याचक्षते' ( गो० पू० १।१३ ) यहाँ यज्ञ के सम्बन्ध में कहा कि यदि यज्ञ में ऋत्विज् अकुशल, ब्रह्मचर्य धारण न करने वाले, वैराग्य रहित होते हैं तो यज्ञ का नाश हो जाता है। इसके आगे भी इस कण्डिका का सम्पूर्ण भाग अत्यन्त ही द्रष्टव्य है जिसमें बड़ी मनोरञ्जकता से यह स्पष्ट किया है कि ऋत्विजों के अकुशल अयोग्य होने पर किस प्रकार क्रमशः ऋत्विज्, यजमान, ऋत्विजों की दक्षिणायें यजमान के पुत्र-पशु एवं योग-क्षेम सब कुछ नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि यज्ञ में श्रेष्ठ सदाचारी ऋत्विज् अवश्य होने चाहियें। ( ग ) 'यथा आमपात्रम् उदक आसिक्ते निर्मृज्येत् एवं यजमानाः निर्मृज्येरन्' (गो० पू० ४।१३ ) । यहाँ भी संवत्सर एवं महाव्रत का वर्णन करते हुये ऋत्विजों की पात्रता के सम्बन्ध में कहा है कि ऋत्विज् तेजस्वी, सत्यवादी संशितव्रत होने चाहियें, जो ऐसे नहीं होते उनके द्वारा कराया हुआ यज्ञ ऐसे ही नष्ट हो जाता है जैसे कच्चे मिट्टी के घड़े में भरा हुआ जल घड़े के टूट जाने के कारण बह जाता है, यजमान का यज्ञ भी इसी प्रकार बह जाता है नष्ट हो जाता है। ( घ ) 'कुम्भे लोष्टः प्रक्षिप्तो नैव शौचार्थाय कल्पते, नैव शस्यं निर्वर्त्तयति' ( गो० पू० २।२३ ) अर्थात् घड़े में मिट्टी के ढेले के डालने पर उसका उपयोग न तो सफाई के लिये हो पाता है, न ही उससे धान्य सम्पत्ति हो पाती है इसका तात्पर्य यही कि उपयोगी वस्तु का भी यदि अस्थान में प्रक्षेप कर दिया जाय तो उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाती है। ( ङ ) 'एनं पूर्वे वयसि पुत्राः पितरमुपजीवन्ति उपोत्तमे वयसि पुत्रान् पितो- पजीवति य एवं वेद स वा एष संवत्सरः' ( गो० पू० ४।१७ ) । यहाँ यह बताया है कि पहली अवस्था में पिता के सहारे पुत्र जीता है किन्तु पिछली अवस्था = बुढ़ापे में पिता पुत्रों के सहारे जीता है जो यह समझता है वही संवत्सर यज्ञ का वेत्ता है। वस्तुतः बुढ़ापे में माता-पिता की सेवा ही वास्तविक श्राद्ध एवं तर्पण है इस विषय में यहाँ बड़ा हृदयग्राही प्रकाश डाला गया है। ( च ) 'परिमितं भूतम् अपरिमितं भव्यम्' ( गो० उ० ५।३ ) अर्थात् भूत सीमित है परन्तु भविष्य असीम है इसलिये किसी बुरे कार्य के कर लेने पर केवल सदैव दुःख ही करते रहने की आवश्यकता नहीं है अपितु वर्त्तमान को सुधार कर भविष्य बनाने की चेष्टा करनी चाहिये, क्योंकि भविष्य असीम है। निराशा में डूबे हुये व्यक्ति के लिये ये वाक्य आशा-सञ्चाररूपी औषध है। गोपथ की मूल पाठगत अशुद्धियाँ—प्रस्तुत गोपथ ब्राह्मण के भाष्यकार श्री पं० क्षेमकरणदास जी त्रिवेदी के समक्ष भाष्य करते समय एशियाटिक सोसाइटी कलकत्ता से सन् १८७२ में प्रकाशित श्री पं० राजेन्द्रलाल मित्र सम्पादित गोपथ मूल की प्रति एवं

( ६ ) सन् १८६१ में प्रकाशित श्री पं० जीवानन्द विद्यासागर, कलकत्ता द्वारा सम्पादित मूल गोपथ की प्रति ये दो ही संस्करण उपलब्ध थे । श्री मित्र जी के पास गोपथ मूल की हस्त- लिखित प्रतियों का प्रायः अभाव होने से इस सर्वप्रथम प्रकाशित संस्करण में अशुद्धियों की भरमार है। थोड़ा भी अर्थ के विचार करने पर जिन पाठों को शुद्ध या सम्भावित कह कर टिप्पणी में दिखाया जा सकता था, वह भी नहीं किया गया । बीच-बीच में कई- कई पंक्तियाँ त्रुटित एवं च्युत हैं¹। इस विषय में श्री जीवानन्द जी विद्यासागर ने भी मित्र संस्करण का ही प्रायः अनुकरण किया है । पाठ भ्रष्टता की दृष्टि से दोनों ही संस्क- रण प्रायः एक जैसे हैं । यतः भाष्यकार अपने भाष्य से पाँच वर्ष पूर्व १६१६ में E. J BRILL, LEI- DEN में छपे Dr. DIEUKE GAASTRA द्वारा सम्पादित संस्करण से पूर्णतया अपरिचित हैं अतः पाठ के संशोधन में यह ( जर्मन सस्करण ) गोपथ का मूल संस्करण जो अतीव उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है उससे त्रिवेदी जी लाभ नहीं उठा सके हैं । निःसन्देह यह संस्करण यदि उन तक उस समय पहुँच पाता तो गोपथ मूल एवं भाष्य दोनों में ही अत्यन्त यथेष्ट परिवर्तन हो सकते थे । इस संस्करण में पूर्व दोनों संस्करणों की अपेक्षा पर्याप्त परिश्रम किया गया है, यद्यपि कुछ भ्रष्टपाठ एवं त्रुटित पाठ इस संस्करण में भी हैं पर वे इन दोनों संस्करणों की अपेक्षा से नगण्य ही हैं । दुर्भाग्य की बात तो यह है कि इतने भ्रष्ट मित्र संस्करण की सन् १६७२ में पुनः इन्डोलॉजिकल बुक हाउस द्वारा फोटो कॉपी करा ली गई है, जिससे अशुद्धियाँ तद्वत् रह गईं । अब तो जर्मन संस्करण को देखकर शुद्ध करके छपवाना चाहिये था । वैदिक ग्रन्थों के प्रति भारतीयों की यह उपेक्षा, उदासी- नता, परिश्रम न्यून तथा धनोपार्जन एवं यश अधिक अर्जित करने की प्रवृत्ति बड़ी ही चिन्तावह है । व्यापारिक दृष्टिकोण के समक्ष आर्ष ग्रन्थों के संरक्षण का प्रश्न समाप्त- प्राय सा हो रहा है । भाष्यकार ने यद्यपि ऐतरेय ब्राह्मणादि से कण्डिकाओं का मिलान करके कुछ भ्रष्टपाठों को शुद्ध करने का प्रयास किया है परन्तु अधिकांश भ्रष्ट पाठों को आर्षशैली, आर्ष प्रयोग कहकर पूर्ववत् पाठ रहने दिया है। स्पष्ट लेखक प्रमाद द्वारा हुई त्रुटियों को भी “आर्षो ह्रस्वत्वम्” “आर्षो दीर्घः” इत्यादि कहकर वह उसे साधु सिद्ध कर देते हैं । ऐसे शब्दों की भाष्यगत शब्द सिद्धियों में भरमार है। प्रस्तुत संस्करण में जर्मन संस्करण के आधार पर ऐसे शब्दों का संशोधन करके प्रायः उनकी आर्ष-प्रयोगः भाषा को निकाल कर शब्द सिद्धियाँ ठीक कर दी गई हैं । यथासंभव ऐसे स्थलों में टिप्पणियाँ देकर पूर्व संस्करण के भ्रष्टपाठ को भी दिखा दिया गया है । यहाँ कुछ शब्दों के नमूने जिन्हें भाष्यकार द्वारा आर्ष-प्रयोगः कहा गया था, दिखाये जा रहे हैं— आर्ष-प्रयोगः कहे हुये पाठ शुद्ध परिवर्त्तित पाठ विन्वन्ति ( आर्षरूपम् ) गो. पू. २ । १६ विदन्ति विद्धूते ( ऊकारः आर्षः ) ,, ,, १ । २७ विद्यते १. गो. उ. २ । १३ प्रस्तुत संस्करण का पृष्ठ ३३५ पंक्ति २० यहाँ पूरी पंक्ति त्रुटित है ।

कण्डिकाओं के मूल पाठों को ठीक न समझ सकने के कारण भी भाष्यगत शब्द

( १० ) आथर्वाणः ( आर्षो ह्रस्वः ) गो० पू० २ । २२ अथर्वाणः कञ्चना ( आर्षो दीर्घः ) ,, ,, ३ । १५ कञ्चन वेदा ( आर्षो दीर्घः ) ,, ,, ४ । ८ वेद अतिरिच्येते ( आर्षप्रयोगः ) ;, ,, ४ । १८ अतिरिच्यते प्रश्नायेयुः ( आर्षरूपम् ) ,, ,, ५ । २ प्रस्नायेयुः ब्रह्म णस्याम् ( आर्षो ह्रस्वः ) ,, ,, ५ । २४ ब्राह्मणस्योम् तानूनप्तृत्त्वम् ( आर्षो दीर्घः ) गो० उ० २ । २ तानूनप्त्रत्त्वम् बभूवुः (आर्षं वहुवचनम्) गो० पू० ३ । ८ बभूव पाठाशुद्धि समझते हुए भी पाठान्तरों के अभाव में जो पाठ हमने तद्वत् रहने दिये हैं उनके कुछ उदाहरण निम्न हैं— आर्ष-प्रयोगः कहे गये पाठ अपेक्षित शुद्ध पाठ शृण्विति गो० पू० २ । २२ शृणोति परिशिषेदेत् ,, ,, ३ । ५ परिषेधेत् अद्यत्ति ,, ,, ३ । १० अत्ति प्रातर्यावद्भ्यः ,, ,, ४ । ७ प्रातर्यावभ्यः आश्यन्नः ,, ,, ३ । १६ आश्यानः यद्यपि पाठान्तरों के अभाव में बहुत से भ्रष्टपाठ समझते हुये भी हमने तद्वत् रख दिये हैं पुनरपि बहुत से ऐसे पाठ संशोधित भी किये हैं जो स्पष्ट रूप से व्याकरणानुसार असाधु थे इनकी व्याकरण प्रक्रिया भी हमने ठीक की है। इनके कुछ नमूने यहाँ प्रदर्शित हैं— पूर्व संस्करण प्रस्तुत संस्करण मेहि गो० पू० २ । २० ( मा+एहि=मैहि ) मैहि प्रायच्छत् ,, ,, २ । २१ ( अर्थसङ्गत्यनुसार ) प्रायच्छन् तिष्ठन् ,, ,, २ । १६ ( व्याकरणानुसारी ) अतिष्ठन् अत्तुर्वै पुरुषः ,, ,, २ । १५ ( जर्मन सं० में भी अभक्तर्तुर्वै पुरुषः पाठ है, 'अभवतुर्वै पुरुषः अर्थानुसार बदला है ) पर्युपसीदेरन् ,, ,, २ । १४ पर्युपासीरन् यहाँ षद्लृ धातु के परस्मैपद होने से पर्युपसीदेरन् नहीं होगा, आस धातु से पर्युपासीरन् पाठ उचित है। कण्डिकाओं के मूल पाठों को ठीक न समझ सकने के कारण भी भाष्यगत शब्द सिद्धियों में कतिपय भयंकर एवं हास्यास्पद भूलें हुई हैं, तद्यथा— ( १ ) गो० पू० १।२१ में 'वाकोवाक्यम्' शब्द के अर्थ को ठीक न समझ सकने के कारण 'वाकः' 'वाक्यम्' ये पृथक्-पृथक् पद मानकर सिद्धि की गई है जिससे भाष्य भी १. यहाँ भाष्य भी इस परिवर्तित पाठानुसार हमने कर दिया है ।।

( ११ ) नितान्त असङ्गत हो गया है, जब कि 'वाकोवाक्यम्' उक्ति प्रत्युक्ति रूप आख्यान ग्रन्थ की संज्ञा है । ( २ ) दीक्षिता ( गो० पू० ५।२४ ) यहाँ इतच् ङीप् किया है, जिससे अर्थ संगत नहीं होता है । जर्मन संस्करणानुसार हमने दीक्षिता क्तान्त पद रखा है । ( ३ ) गो० पू० १।२२ में सहस्रकृत्वो इस अशुद्ध शब्द को सिद्ध करने के लिये भाष्य में सहस्रकृत्वः बनाकर पुनः सहस्रकृत्वः इत्यस्य उपधादीर्घो बाहुलकात् कहकर सहस्रकृत्वो बनाया गया है । इसी कण्डिका में सिद्धन्ति भ्रष्टपाठ को यथावस्थित रखकर व्यत्यय से सिध्यन्ति माना है । (४) गो० पू० १।२३ में 'ऋगि ऋच्' ऐसा पाठ है । यह ऋगि पाठ ऋच् शब्द का सप्तमी एकवचन का रूप है अतः ऋचि होना चाहिये । स्पष्ट है कि लेखक प्रमाद से पूर्व हस्तलेखों में ऋगि पाठ हो गया होगा । श्री त्रिवेदी जी ने इस ऋगि को ही शुद्ध मानकर 'चस्य गः' लिखकर उसकी सिद्धि कर दी है । इस प्रकार बहुत से नमूने दिखाये जा सकते हैं ।' कुछ ऐसे भी शब्दों के निर्वचन भाष्यकार ने किये हैं जो उस प्रक्रिया से शब्द के निष्पन्न होने पर भी व्याकरण-प्रक्रियानुसार ठीक नहीं या कष्ट साध्य है । तद्यथा-- परिदेवयाञ्चक्रिरे ( गो० पू० १।२८ ) की सिद्धि में भाष्यकार ने परिदेवयाम् की सिद्धि उणादि से क्यन् प्रत्यय करके की है जब कि 'परिदेवयाञ्चक्रिरे' सम्पूर्ण रूप ही लिट् लकार बहुवचन १ का है । ऐसे स्थलों में मूल पाठ को शुद्ध करते हुये भाष्यगत उनकी सिद्धियों एवं भाष्य को भी यथावश्यक इस संस्करण में शुद्ध करने का पूर्ण प्रयत्न किया गया है । पूरी संगति लगाते हुये इस कार्य को करने में हमें बड़ी ही कठिनता हुई है । वस्तुतः देखा जाये तो गोपथ भाष्य छापने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण एवं कठिन कार्य यहाँ मूल संशोधन का था क्योंकि भाष्य के साथ-साथ शुद्ध मूल पाठ की प्रति भी पाठकों को उपलब्ध कराना आवश्यक था । यतः ये पाठ बहुसंख्य थे अतः अनेक स्थलों में एवं प्रारम्भ के प्रायः ७-८-६ फर्मों में टिप्पणी भी पाठ परिवर्त्तन की प्रायः नहीं दी जा सकी क्योंकि भ्रष्टपाठों की बहुलता को सोचकर ग्रन्थ के अन्त में परिशिष्ट रूप में सभी पाठ दिखाने की इच्छा बन गई थी किन्तु हमें दो-तीन फर्मों के पश्चात् ही यह अनुभव हुआ कि टिप्पणी पाठकों की सुविधा की दृष्टि से तत्-तत् स्थलों में ही देनी उचित है अतः वहीं देनी प्रारम्भ कर दी । उपयुक्त भ्रष्टपाठों के नमूने प्रायः ऐसे ही हैं जहाँ हमने टिप्पणियाँ नहीं दी है । जिन संशोधित पाठों में हम टिप्पणी न दे सके उनकी कुछ सूची निम्न है— अशुद्ध शुद्ध गो० पू० २।१३ ह्यप्रश्नान् ह्वाः प्रश्नान् ,” ” २।१३ व्याचक्षीय व्याचक्षीत ” ” २।२८ प्रतिश्रुत ( प्रतिशृणु के स्थान में प्रतिश्रुतम् प्रतिश्रुत तिङन्त माना है) १. द्रष्टव्य गो० पू० १।२८

कण्डिका २।१० में तन्वमभि पर नं० २ की टिप्पणी का चिह्न छप गया है यह टिप्पणी

( १२ ) अशुद्ध शुद्ध गो०पू० २।२१ जिघत्सुरतमः जिघत्सुतमः ,, ,, २।२१ अभिहुत्वा अभिहुत्य ,, ,, २।२१ अग्निः पदम् अग्निपदम् ,, ,, २।२१ ब्राह्मणम् ब्राह्मद्यम् ,, ,, ३।४ पं०१६ अशांसीन्ये३ (यहाँ यह पाठ अपपाठ. है क्योंकि शंसन होता का कर्म है) ,, ,, ३।४ ये ऽङ्गिरसः (इस पाठ की पुनरावृत्ति है) गोपथ के मूल संस्करणों में इतने अधिक भ्रष्टपाठों का गोपथ की उपेक्षा के अतिरिक्त एक और भी महत्त्वपूर्ण कारण ये है कि गोपथ ब्राह्मण का कोई भाष्य प्रस्तुत भाष्य के अतिरिक्त नहीं उपलब्ध होता यदि श्री राजेन्द्रलाल मित्रादि को इसका भाष्य भी करना होता तो पदे-पदे पाठों पर पूर्ण गहनता से विचार करना पड़ता। हमारे भाष्यकार के सामने यह बहुत बड़ी कठिनता थी कि इससे पूर्व अर्थ की दृष्टि से पाठ शुद्धि पर विचार ही नहीं किया गया, सर्व प्रथम उन्हें ही इस विषय में घोर परिश्रम करना पड़ा। प्रमाणाभाव में आर्ष- प्रयोगः कहकर अशुद्धियों को उन्हें टालने की आवश्यकता पड़ी। इस संस्करण में पाठशुद्धि के प्रति इतना सचेष्ट रहने पर भी यह कदापि नहीं कहा जा सकता कि अब सर्वथा पाठ शुद्ध किये जा चुके हैं। भूलें अनेकों बाधाओं के कारण अब भी रह गयी हैं जिनका हमें दुःख है तद्यथा-- (१) तत्सम्राज्यस्य सम्राट्त्वम् गो० पू० ५।१३ यह पाठ जर्मन एवं सभी संस्क- रणों में ऐसा ही है किन्तु पं० चमूपति द्वारा सम्पादित वेदार्थ कोष में 'तत्सम्राजः सम्राट्- त्वम्' गो० पू० ५।१३ पाठ है। इसके अनुसार हमने संशोधन किया किन्तु मुद्रण की अनवधानता से पूर्ववत् वही पाठ रह गया। इसी प्रकार-- अशुद्ध शुद्ध अशुद्ध शुद्ध पृ० पृ० पुनन्त ११५ पुनन्तः रूपायामो १४५ रुपयामो तिस्त्रो १४० तिस्रो शकृत् १४५ सकृत् घ्याप्नोति ३३३ प्राप्नोति सपवेदम् २१ सर्पवेदम् व्याहृतिर्गायत्रम् ३२ व्याहृति गायत्रम् कण्डिका २।१० में तन्वमभि पर नं० २ की टिप्पणी का चिह्न छप गया है यह टिप्पणी चिह्न कण्डिका की चौथी पंक्ति "वै" पर जानी चाहिये। मेरा निश्चित विचार है कि ब्राह्मण-ग्रन्थों का अध्ययन अध्यापन करते हुये किसी को भी श्रौत क्रियाओं एवं उसमें वर्णित यज्ञ यागादि का सामान्य परिचय अवश्य होना चाहिये इसका ज्ञान न होने से अर्थ एवं पाठ में भ्रान्ति सुनिश्चित है। प्रस्तुत भाष्य में ऐसे स्थल बहुत हैं जहाँ तद्वर्णित याज्ञिक प्रक्रिया का संकेत न करके शाब्दिक अर्थ मात्र से काम चलाया गया है। तद्यथा- गो० उ.३।८ को देखें। यहाँ सोम याग की एक प्रक्रिया का रहस्योद्घाटित है। इसके ज्ञान के लिये याज्ञिक प्रक्रिया की पूर्वपीठिका का ज्ञान होना चाहिये वह इस प्रकार है-सभी श्रौतयज्ञों में वषट्कार से आहुति देते हैं किन्तु सोमयाग में विशेषता यह

कण्डिका में 'स योऽत्र भक्षयेत्' ·········आदि वाक्यों का भाव है उस सोमरस का

( १३ ) है कि वहां अनुवषट्कार ( एक वषट्कार के पश्चात् दूसरा वषट्कार ) भी किया जाता है जो कि प्रधानाहुति का समर्थक एवं समाप्ति सूचक है । संवत्सर के अन्तर्गत छहों ऋतुओं के देवताओं के लिये ऋतुयाज के नाम से सोमरस दिया जाता है । यतः इन ऋतुओं में प्राणी को सृष्टि के पूर्ण काल तक अन्न प्राप्त करना अत्यन्त अपेक्षित है अतः ऋतुयाज में समाप्तिसूचक अनुवषट्कार नहीं होता क्योंकि ऋतुओं को पूर्णता की सूचना देने पर उनके द्वारा प्राप्त होने वाली अन्नादिक वस्तुओं में भी समाप्ति सम्भावित है अतः अनुवषट्कार न करने के कारण सोमरस का शेष भक्षण भी अन्न की सर्वदा प्राप्ति की इच्छा के कारण नहीं होता, केवल ओष्ठ में सोमरस का लेपन करके विधि पूर्ण मान लेते हैं इसीलिये कण्डिका में 'तथैव ह भवति लिम्पेदिति' कहा है । कण्डिका में 'स योऽत्र भक्षयेत्' ·········आदि वाक्यों का भाव है उस सोमरस का शेष भक्षण जो करे उसे कहें कि बिना अनुवषट्कार किये हुए भक्ष को तुमने अपने शरीर में प्राप्त कर लिया है अतः तुम नहीं जीवोगे अर्थात् उसका भक्षण करके अपने-आप को पूर्णता प्राप्त कर लेने वाला मान लेने से याग में समृद्धि फल को नहीं प्राप्त कर सकोगे । यह यहाँ भाव है। इसी प्रकार गो. उ. १।६ का स्थल देखें, जिसकी पूर्वपीठिका इस प्रकार है— शतपथ एवं अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों में देवताओं के दो भेद किये गये हैं । एक दिव्य देवता तथा दूसरे मर्त्यलोक निवासी वेदज्ञ विद्वान् व्यक्ति । इन दोनों देवताओं की प्रसन्नता एवं आशीर्वाद लाभ के लिये यज्ञ किया जाता है प्रस्तुत कण्डिका में स्पष्ट किया है कि देवताओं के यज्ञीय भाग लेने की प्रक्रिया से अवान्तर दो भेद हैं। एक सोमपा दूसरे असोमपा देवता । दूसरे वर्ग में हुताद देवता एवं अहुताद देवता । द्वितीय वर्ग के अहुताद देवताओं में मनुष्य लोकवासी विद्वानों की गणना है । ये मन्त्र द्रष्टा ब्राह्मण ऋषियों की देवानुग्रह प्राप्त सन्तान है अतः उन ऋषियों के अनुग्रहकारी देवता से संबद्ध होने के कारण विभिन्न ऋषि विभिन्न देवता स्वरूप हैं । इन ऋषियों और उनकी सन्तानों को मनुष्य देवता के रूप से यज्ञ में अग्नि मुख से आहुति नहीं दी जाती है इसलिये इनको यज्ञीय दक्षिणाग्नि में पके हुए अन्वा- हार्य नाम के चार व्यक्तियों के भोजन योग्य मात्र को दक्षिणा स्वरूप से देकर प्रसन्न किया जाता है। इस प्रकार ये ब्राह्मण देवता अग्नि मुख में हवन के बिना यज्ञीय पाक को खाते हैं अतः अहुताद है। जब इनको अन्वाहार्य संज्ञक यज्ञाग्नि सिद्धपाक को दक्षिणा स्वरूप से दे दिया जाता है तो वे इस यजमान के घर में अपने आशीर्वाद से इषम् = अन्न ऊर्जम् = बल को परिपूर्ण कर देते हैं किन्तु प्रथम ही इनको यज्ञीय पाक का भाग न देने पर यजमान के इष एवं ऊर्ज को लेकर ये चले गये थे, और अब भी जा सकते हैं । स्थाली-पुलाक न्याय से हमने यहाँ दो स्थलों का याज्ञिक प्रक्रियानुसार अर्थ प्रदर्शित किया है । ऐसे कतिपय स्थलों में टिप्पणी में भी हमने याज्ञिक भाव को स्पष्ट किया है किन्तु ऐसा सर्वत्र नहीं किया जा सका क्योंकि उससे ग्रन्थ के कलेवर विस्तार का भय था । वैसे गोपथ पर इस दृष्टिकोण से पृथक् कार्य की अपेक्षा है ताकि जिन परम्पराओं की सुरक्षार्थ यह गोपथ है-उस पर पर्याप्त प्रकाश पड़ सके ।

( १४ ) गोपथ ब्राह्मण पर प्रस्तुत भाष्य—किसी भी भाष्य की सहायता के बिना इस पर भाष्य करना निश्चय ही एक बड़े साहस का काम है। पं० क्षेमकरणदास जी त्रिवेदी इस विषय में विद्वानों के हार्दिक बधाई तथा साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने अपनी वृद्धावस्था में भी एक महान् कार्य कर दिखाया। जिस कार्य को युवक भी जल्दी न कर सकें उसको एक ढलती आयु का व्यक्ति पूरा करे, यह उनके अतिशय उत्साह तथा अध्ययन-शीलता का ही परिणाम है। गोपथ ब्राह्मण के इस भाष्य में विभिन्न पाठों को ऐतरेयादि से मिलान करके शुद्ध रूप देने का भरसक प्रयास किया गया है। जो कण्डिका अन्य ब्राह्मणों से मेल रखती थी, उसकी तुलना के लिये प्रायः सभी उद्धरण दे दिये गये हैं। इस ब्राह्मण में उद्धृत ऋचायें भी पूरी-पूरी देकर उनका अर्थ भी कर दिया गया है। अर्थ करते समय प्रायः यौगिक प्रक्रिया का सहारा लिया गया है। शब्दों का व्युत्पत्ति- लभ्य अर्थ ही मान्य समझा गया है। अर्थ को विस्तृत करने हेतु उनके रूढ़ अर्थों से प्रायः बचने की चेष्टा की गई है, प्रायः प्रत्येक शब्द का व्याकरण सम्मत धातु प्रत्यय आदि दिखाते हुये उन्हें सिद्ध करने की पूरी चेष्टा की गई है। यह एक परिश्रम-साध्य एवं महत्त्वपूर्ण कार्य है। इस भाष्य में यौगिक प्रक्रिया के आश्रयण से कहीं भी अनित्य इतिहास या अनुचित वर्णन नहीं आने पाया है। विभिन्न ऋषियों के नाम भी यौगिक ही माने गये हैं। इस भाष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें यथावसर वैदिक सिद्धान्तों को महर्षि दयानन्द कृत ग्रन्थों के वचनों को उद्धृत करते हुये सुपुष्ट किया गया है। इसके विपरीत किसी भी बात को स्वीकार नहीं किया गया। पशुयन्चादि शब्दों को देखकर जहाँ अन्य ब्राह्मणों के भाष्यकारों ने उसे बूचड़खाना बना डाला है, भाष्यकार ने यहाँ ऐसा कदापि नहीं होने दिया है। अपनी बात की पुष्टि में अन्य ऋषि कृत प्राचीन ग्रन्थों के प्रमाण भी यथावसर पर्याप्त दिये हैं जो कि भाष्य की महत्ता को बढ़ाते हैं। इस दृष्टि से इस भाष्य का जितना प्रचार प्रसार विशेष रूप से आर्य जगत् में होना चाहिये वह सन्तोष जनक नहीं। आर्य जगत् में इस भाष्य के समुचित स्थान न प्राप्त कर सकने के कारण ही आज तक अन्य इतिहासज्ञों द्वारा भी यह कम ही उद्धृत हुआ है। आज तक इसके पुनर्मुद्रण के सम्बन्ध में शिरोमणि सभाओं द्वारा भी विचार न किया जा सका। आर्य विद्वानों के ग्रन्थों की उनके निधन के पश्चात् ऐसी उपेक्षा होती है यह अति दुःखद है। प्रस्तुत संस्करण का प्रकाशन व्यक्तिगत रूप से श्री त्रिवेदी जी के पौत्र करा रहे हैं, यह उनका बड़ा साहसिक कार्य है। उपसंहार—१६७० में श्री पं० क्षेमकरणदास जी त्रिवेदी के अथर्ववेदभाष्य के ४ काण्ड पुनः प्रकाशित किये जाने पर लोगों की मांग गोपथ ब्राह्मण के प्रकाशित करने में अत्यधिक हुई। अतः ये प्रकाशन कार्य श्रद्धेय त्रिवेदी जी के ही पौत्र श्री डा० इन्द्रदयाल जी सेठ जो नाइजीरिया यूनिवर्सिटी में गणित के प्राध्यापक हैं व्यक्तिगत रूप से करा रहे थे, अतः आर्थिक दृष्टिकोण से उन्होंने भी यही सम्मति रखी कि अथर्ववेद भाष्य के प्रकाशन से

( १५ ) पूर्वं गोपथ ब्राह्मण भाष्य का सम्पादन हो फलतः कार्य प्रारम्भ कर दिया गया किन्तु मेरे बार-बार बाहिर जाने एवं विद्यालयीय कार्यों में अनिवार्यतया संलग्न होने के कारण यह कार्य बड़ी मन्थर गति से चलता रहा । कई प्रतियों के मिलानादि के कारण इसमें पर्याप्त समय लगाने की आवश्यकता पड़ती थी, ऐसा न होने पर कार्य रुक रुककर ही चलता रहा पर जैसा कि लक्ष्य प्राप्ति के लिये निरन्तर गति की अनिवार्यता अपेक्षित है मन्दता तीव्रता तो साधन की शक्ति पर निर्भर है, हम गतिशील रहे अतः परमेश की महती अनुकम्पा से यह कार्य आज अपने आप में पूर्ण होकर सुधीजनों के समक्ष है। मेरे बाहिर आदि जाने के कारण प्रकाशन की त्रुटियां रह गई होंगी और हैं इसके लिये मैं सहृदय पाठकों से यही कहूँगी वे समय-समय पर मेरा ध्यान इस ओर आकृष्ट करते रहें जिन्हें अगले संस्करण में ठीक किया जा सकेगा। संस्था को चलाते हुये ऐसे समयापेक्षित कार्य करने कितने कठिन हैं यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकते हैं, पुनरपि कार्य भी इसी झपेट में ही हुआ करते हैं, जीवन में कोई भी महत्त्वाकांक्षी-जन कार्य के लिये सर्वथा शान्ति एवं अपेक्षित समय नहीं उपलब्ध कर पाते होंगे, ऐसे ही चलता होगा। प्रकाशन के इस कार्य में श्रद्धेय त्रिवेदी जी के पौत्र डॉ० इन्द्रदयाल जी सेठ एवं उनकी धर्मनिष्ठा पत्नी डॉ० कीर्त्ति सेठ डी० फिल प्राध्यापिका शिक्षाशास्त्र प्रयाग विश्व- विद्यालय, पौत्री श्रीमती सुशीला देवी जी जौहरी मू० पू० प्राचार्या भगवानदीन आर्य- कन्या महाविद्यालय लखीमपुर खीरी तथा प्रदोहित्र श्री अजय कुमार जी जौहरी आदि सभी का अत्यन्त ही उत्साह रहा है। श्री त्रिवेदी की वंशपरम्परा में तीसरी एवं चौथी पीढ़ी में भी वैदिक कार्यों के प्रति वही अनुराग वही निष्ठा समाई हुई है यह सौभाग्य की बात है। श्री त्रिवेदी जी के गहन तप और निष्ठा का ही यह परिणाम है। वस्तुतः आप सभी लोग इस विषय में कोटिशः बधाई के पात्र हैं। इस सम्पादन कार्य में यथावसर पाठों के विवेचन एवं कहीं-कहीं कण्डिकाओं के याज्ञिक अर्थों की सङ्गति में श्री डॉ० युगल किशोर जी मिश्र वेदाचार्य एम० ए०, पी- एच० डी० ने उदारता पूर्वक समय लगाया है, अतः वे बहुशः धन्यवाद के भागी हैं। मेरे लघुभ्राता श्री सुद्युम्न एम० ए०, व्याकरणाचार्य, पी एच० डी० प्राध्यापक मु० म० टाउन डिग्री कॉलेज बलिया ने मेरा कई महत्त्वपूर्ण उपयोगी स्थलों की ओर ध्यान दिलाया है तदर्थ मैं उनकी आभारी हूँ। ईश्वर करे वे सदैव सुयश के भागी हों। अपनी अनुजा बहिन मेधा देवी व्याकरणाचार्या के सम्बन्ध में क्या कहूँ कार्य तो सब हमारा मिला-जुला ही होता है, तथापि वे "नींव की ईंट" बने रहना ही अधिक पसन्द करती हैं अतः बहुत विरोध

( १६ ) के अनन्तर सम्पादक में उनका नाम प्रविष्ट कर पाई हूँ । उन्हें भय था कि इस प्रक्रिया से भूमिका में उल्लिखित आशीः राशि से वे वञ्चित रहेंगी पर यह तो असम्भव है । उनकी कर्म-निष्ठा, त्याग एवं निष्काम-भावना सामान्य स्थिति से ऊपर है इसे देख कौन पुलकित न होगा ? मैं इस प्रकरण को अपूर्ण ही समझूँगी यदि अपनी शास्त्री द्वितीय वर्ष की छात्राओं कु० प्रियम्वदा, कु० माधुरी रानी, कु० सूर्या के नामों का उल्लेख न करूँ । ये पुत्रियाँ हस्तलेख मिलान प्रूफ़ संशोधनादि कार्यों में मेरे साथ बड़ी जिज्ञासा, तत्परता एवं मनोयोग से समय लगाती थीं । उनकी ये प्रवृत्ति कार्यदक्षता के लिये नितान्त उचित है । परमात्मा करे वे सदैव स्वस्थ चिरायु रहते हुये वैदिक कार्यों के प्रति निष्ठावान् तथा ऋषि भक्त हों । अन्त में विष्णु मुद्रणालय के सञ्चालक श्री कालीनाथ जी का भी मैं हार्दिक धन्यवाद करती हूँ कि जिन्होंने अनेक विघ्नों के रहते हुये भी इस कार्य को सम्पन्न किया । विनीता— ३१ जु० गुरुपूर्णिमा } प्रज्ञा देवी सं० २०३४ वि० } पाणिनि कन्या महाविद्यालय दयानन्दाब्द १५३ } तुलसीपुर, वाराणसी-५ सन् १९७७ }

॥ ओ३म् ॥ गोपथ ब्राह्मण भाष्य भूमिका ॥ १—ईश्वर प्रार्थना ॥ त्वं न इन्द्रा भरँ ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे । आ वीरं पृतनाषहम् ॥ १ ॥ मन्त्र १-३ अथर्व० २० । १०८ । १-३, ऋग्० ८ । ६८ [ सायणाभाष्य ८७ ] । १०-१२, साम० उ० ४ । २ । तृच १३ ॥ ( शतक्रतो ) हे सैकड़ों कर्म करने वाले ! ( विचर्षणे ) हे विविध प्रकार देखने वाले ! ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले जगदीश्वर ] ( त्वम् ) तू ( नः ) हमारे लिये ( ओजः ) पराक्रम, ( नृम्णम् ) धन ( आ ) और ( पृतनासहम् ) सङ्ग्राम जीतने वाले ( वीरम् ) वीर को ( आ ) भले प्रकार ( भर ) पुष्ट कर ॥ १ ॥ हे परमात्मन् ! आपके अनुग्रह से हम सैकड़ों शुभ कर्म करते हुये बलवान्, धनवान् और वीर पुरुषों वाले होवें ॥ १ ॥ त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ । अधा ते सुम्नमीमहे ॥ २ ॥ ( वसो ) हे बसाने वाले ! ( शतक्रतो ) हे सैकड़ों कर्मों वाले ! [ परमेश्वर ] ( त्वम् ) तू ( हि ) ही ( नः ) हमारा ( पिता ) पिता और ( त्वम् ) तू ही ( माता ) माता ( बभूविथ ) हुआ है, ( अध ) इसलिये ( ते ) तेरे ( सुम्नम् ) सुख को ( ईमहे ) हम माँगते हैं ॥ २ ॥ हे परमेश्वर ! आप सदा से सब सृष्टि के पालन और पोषण करने वाले हैं, हम आप से प्रार्थना करते हुये सैकड़ों उपकार करके सदा सुखी होवें ॥ २ ॥ त्वां शुष्मिन् पुरुहूत वाजयन्तमुप ब्रुवे शतक्रतो । स नो रास्व सुवीर्य्यम् ॥ ३ ॥ ( शुष्मिन् ) हे महाबली ! ( पुरुहूत ) हे बहुत प्रकार से बुलाये गये ! ( शतक्रतो ) हे सैकड़ों कर्मों वाले ! [ परमेश्वर ] ( वाजयन्तम् ) बलवान् बनाने वाले ( त्वाम् ) तुझको ( उप ) आदर से ( ब्रुवे ) मैं बुलाता हूं, ( सः ) सो तू ( नः ) हमें ( सुवीर्य्यम् ) बड़ा वीरपन ( रास्व ) दे ॥ ३ ॥ हे अनन्त बल जगदीश्वर ! आप कृपा करें । जिससे हम महापराक्रमी और महापुरुषार्थी होकर सदा आनन्द पावें ॥ ३॥

ब्राह्मण [ न० लिङ्ग ] शब्द बना, जिसका अर्थ ब्रह्म परमेश्वर वा वेद का ज्ञान है ।

( १८ ) कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः । गोजित् भूयास॒मश्वजिद् धनंजयो हिरण्यजित् ॥ ४ ॥ अथर्व० ७ । ५० । ८ ॥ [ हे सर्वपोषक परमेश्वर ! ] ( कृतम् ) कर्म [ वेदविहित व्यवहार ] ( मे ) मेरे ( दक्षिणे ) दाहिने ( हस्ते ) हाथ में और ( जयः ) जीत ( मे ) मेरे ( सव्ये ) बायें [ हाथ ] में ( आहितः ) ठहरी हो । मैं ( गोजित् ) भूमि जीतने वाला, ( अश्व- जित् ) घोड़े जीतने वाला, ( धनंजयः ) धन जीतने वाला और ( हिरण्यजित् ) तेज जीतने वाला ( भूयासम् ) रहूं ॥ ४ ॥ हे परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें जिससे हम सदा वेदविहित कर्म में पुरु- षार्थ के साथ आगे बढ़ते हुये संसार में सुखी रहें, और सुपात्र वीर होकर आपसे आपकी कृपा का दान लेवें ॥ ४ ॥ यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगं तन्व१ः स्वायाः । अश्लोणा अङ्गैरहुताः स्वर्गे तत्र पश्येम पितरौ च पुत्रान् ॥ ५ ॥ अथर्व० ६ । १२० । ३ ॥ ( यत्र ) जहाँ पर ( सुहार्दः ) सुन्दर हृदय वाले, ( सुकृतः ) सुकर्मी लोग ( स्वायाः ) अपने ( तन्वः ) शरीर का ( रोगम् ) रोग ( विहाय ) छोड़ कर ( मदन्ति ) आनन्द भोगते हैं । ( तत्र ) वहाँ पर ( स्वर्गे ) स्वर्ग [ सुख ] में ( अश्लोणाः ) बिना लंगड़े हुये और ( अङ्गैः ) अङ्गों से ( अहुताः ) बिना टेढ़े हुये हम ( पितरौ ) माता पिता ( च ) और ( पुत्रान् ) पुत्रों [ सन्तानों ] को ( पश्येम ) देखें ॥ ५ ॥ हे जगत्पिता परमेश्वर ! हम सब ब्रह्मचर्य आदि सेवन से वेदानुगामी सुकर्मी और निरोग रहें और उस स्वर्ग में रहकर हम सब मिलकर प्रयत्नपूर्वक स्थिर सुख पावें ॥ ५ ॥ २—गोपथब्राह्मण क्या है ॥ चार वेदों के चार ब्राह्मण हैं, ऋग्वेद का ऐतरेय, यजुर्वेद का शतपथ, साम- वेद का साम, और अथर्ववेद का गोपथ । विदित नहीं है कि गोपथब्राह्मण के कौन कर्ता थे । यह पद तो तीन शब्दों से बना है, गो+पथ+ब्राह्मण, जिनकी सिद्धि इस प्रकार है—गमेर्डोः ( उ० २ । ६७ ) गमॢ गतौ–जाना, जानना और पाना— डो प्रत्यय । पाने योग्य पदार्थ गो शब्द वाणी, भूमि, स्वर्ग, इन्द्रिय आदि का वाचक है । पथ गतौ--अच् प्रत्यय । पथ नाम मार्ग का है । वृंहेर्नोऽच्च ( उ० ४ । १४६ ) वृहि वृद्धौ—मनिन्, नकार का अकार और रत्व होकर ब्रह्मन् शब्द [ ब्रह्म और ब्रह्मा ] सिद्ध होता है फिर तस्येदम् ( पा० ४ । ३ । १२० ) ब्रह्मन्—अण् । इस प्रकार ब्राह्मण [ न० लिङ्ग ] शब्द बना, जिसका अर्थ ब्रह्म परमेश्वर वा वेद का ज्ञान है । इससे गोपथब्राह्मणम् का यह अर्थ है—गो, वाणी अर्थात् वेदवाणी, भूमि अर्थात् पृथिवी

( १६ ) का राज्य और स्वर्ग अर्थात् सुख पाने के मार्ग का ईश्वरीय वा वैदिक ज्ञान । अर्थात् इस ग्रन्थ के पढ़ने और विचारने से वेदों के पढ़ने, राज्य प्रबन्ध करने और परम आनन्द पाने के लिये मनुष्य का पुरुषार्थ बढ़ता है ॥ महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की वेदों की पठन पाठन विधि, ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका प्रथमवार पृष्ठ ३२० में इस प्रकार लिखते हैं— मनुष्य लोग वेदार्थ जा,ने के लिये अर्थयोजना सहित व्याकरण, अष्टा- ध्यायी धातुपाठ उणादिगण गणपाठ और महाभाष्य शिक्षा, कल्प, निघण्टु निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये छः वेदों के अङ्ग । मीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त, ये छः शास्त्र जो वेदों के उपाङ्ग, अर्थात् जिनसे वेदार्थ ठीक ठीक जाना जाता है । तथा ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ, ये चार ब्राह्मण। इन सब ग्रन्थों को क्रम से पढ़के अथवा जिन्होंने उन सम्पूर्ण ग्रन्थों को पढ़के जो सत्य सत्य वेद व्याख्यान किये हों उनको देखके वेद का अर्थ यथावत् जान लेवें—इस लेख से प्रकट है कि वेदार्थ जिज्ञासुओं के लिये चारों ब्राह्मण महान् उपयोगी हैं जिनमें से यह एक गोपथब्राह्मण है ॥ ३—गोपथ के भाष्य करने में कठिनाई ॥ मेरे पास गोपथब्राह्मण की दो पुस्तकें हैं, एक पं० राजेन्द्रलाल मित्र सम्पादित, छापा एशियाटिक सोसैटी कलकत्ता सन् १८७२ ईस्वी, दूसरा पं० जीवानन्द विद्या- सागर सम्पादित छापा कलकत्ता सन् १८६१ ईस्वी । पं० राजेन्द्रलाल मित्र ने प्रयत्न करके हस्तलिखित पुस्तकों को मिलाकर अपना पुस्तक पहिले ही पहिले छपवाया, उसके पीछे पण्डित जीवानन्द का छपा । दोनों पुस्तकों में कुछ तो लेख प्रमाद और कुछ छापे की अशुद्धियां हैं। इसके अतिरिक्त ग्रन्थ के प्रयोगों में प्रायः आर्ष शैली है— जैसे ( इषे त्वा ) के स्थान पर ( इखे त्वा—पू० १ । २६ ), ( सरंसतायै ) के स्थान पर (सरस्वतायै--उ० ४ । १८), ( पारुच्छेपी ) के स्थान पर (पारुक्षेपी-उ० ६ । १), ( कवीँरिच्छामि ) के स्थान पर ( कवीं ऋच्छामि-उ० ६ । २) इत्यादि इत्यादि । ऐसी अशुद्धियों और शैलियों के यथार्थ रूप वेद मन्त्रों और ऐतरेय ब्राह्मण से यथा- सम्भव मैंने शुद्ध कर दिये हैं ॥ एक और कठिनाई है कि अब तक इस ब्राह्मण का न तो कोई भाष्य और न कोई अनुवाद उपस्थित है राजेन्द्रलाल मित्र ने इसके भाष्य के लिए बहुत प्रयत्न किया परन्तु न मिलने से इन्होंने मूल मात्र ही यथासम्भव शोधकर छपा दिया । पं० राजेन्द्रलाल ने अपने गोपथब्राह्मण की भूमिका में और मौरिसब्लूम्सफील्ड साहिब ने अपने पुस्तक ( The Atharva Veda and the Gopatha Brahmana by Maurice Bloomsfield ) में अंगरेजी भाषा में कुछ टिप्पणियां दी हैं । वे किसी अंश में उपयोगी हैं। उन महाशयों को धन्यवाद है जिन्होंने अपने अन्वेषण का फल प्रका-

शित कर दिया है। मैंने भी पुराने भाष्य और अनुवाद के लिये बहुत खोज किया, परन्तु कोई न मिला। जब मेरा अथर्ववेद भाष्य हिन्दी अनुवाद सहित पूरा होकर संवत् १६७८ विक्रमीय (सन् १६२१ ईस्वी) में छपकर प्रकाशित हो गया, बहुत से विद्वान् महा- शयों ने अनेक पुस्तकों के भाष्य करने की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया, उनमें गोपथ के लिये बहु सम्मति थी, और मैंने विचार कर कि यह प्राचीन वैदिक ग्रन्थ भी महान् उपयोगी है, इसीके लिये प्रयत्न किया। अपनी वृद्धावस्था के कारण मुझे ग्रन्थ के पूरे हो जाने की आशा न थी, परन्तु सर्वशक्तिमान् परमात्मा की महती कृपा से अब यह ग्रन्थ भाषानुवाद, टिप्पणियों, व्याकरण प्रक्रियाओं और विनियोगीय वेद मन्त्रों आदि सहित सर्वसाधारण के सामने छपकर उपस्थित है। सब विचारशील स्त्री पुरुष आत्मोन्नति करने और वेदार्थ जानने में उससे लाभ उठावें। संस्कृत कोषों में वैदिक शब्द और ब्राह्मण शब्द बहुधा नहीं मिलते विद्वान् लोग इस ओर भी ध्यान देवें॥ ४—गोपथब्राह्मण का विषय॥ गोपथब्राह्मण अथर्ववेद का ब्राह्मण कहा जाता है, परन्तु उसमें यज्ञ करने के लिये चारों वेदों के मन्त्रों का विनियोग है। इससे विदित है कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चार वेद संहिताओं के अलग अलग नाम हैं और चारों नाम एक दूसरे के भी बोधक हैं। और यह भी प्रकट है कि चारों वेदों का नाम अलग अलग करके तथा मिलाकर त्रयी वा त्रयी विद्या [कर्म, उपासना और ज्ञान] है। गोपथ पू० २।१८ में वर्णन है—(एष ह वै विद्वांत्सर्ववित् ब्रह्मा यद् भृग्वङ्गिरोवित्) यही विद्वान् सब जानने वाला ब्रह्मा [प्रधान ऋत्विज्] है जो भृगु-अङ्गिराओं [प्रकाशमान ज्ञानों, चारों वेदों] का जानने वाला पुरुष है। भगवान् यास्क मुनि निरुक्त १।८ में लिखते हैं—(ब्रह्माणौ जाते जाते विद्यां वदति ब्रह्मा सर्वविद्यः सर्वं वेदितुमर्हति, ब्रह्मा परिवृढः श्रुतः) एक ब्रह्मा उत्पन्न हुये हुये कर्म में विद्या बताता है, ब्रह्मा सब विद्याओं वाला, और सब जानने योग्य होता है, ब्रह्मा वेदविद्या के कारण बढ़ा हुआ होता है। यह भी प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा चतुर्मुखी अर्थात् चतुर्वेदी होता है। इन कथनों से स्पष्ट है कि भृग्वङ्गिरस्, अथर्ववेद, ब्रह्मवेद आदि शब्द वेद की संहिता विशेष [अथर्ववेद] के और चारों संहिताओं के नाम हैं, प्रकरण के अनु- सार अर्थ कर लेना चाहिये॥ गोपथ में यज्ञ विषय [अर्थात् आहवनीय आदि अग्नियों द्वारा वेद मन्त्रों से अग्नि प्रज्वलन] दीख पड़ता है, परन्तु वस्तुतः आत्मिक यज्ञ अर्थात् आत्मा की उन्नति से पुरुषार्थ बढ़ाकर अन्न, प्रजा, पशु और स्वर्ग [सुख] की प्राप्ति का विधान वेद मन्त्रों द्वारा वर्णित है। (या वाक् सोऽग्निः, यः प्राणः स वरुणः, यन्मनः स इन्द्रः, यच्चक्षुः स बृहस्पतिः, यच्छ्रोत्रं स विष्णुः—गो० उ० ४।११) जो वाणी है वह अग्नि [तापक पदार्थ] है, जो प्राण [श्वास] है, वह वरुण [स्वीकार करने योग्य पदार्थ]

( २१ ) है, जो मन है वह इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला पदार्थ ] है, जो आंख है वह बृहस्पति [ बड़े बड़ों का पालने वाला पदार्थ ] है, जो कान है वह विष्णु [ व्यापक पदार्थ ] है [ यह यज्ञ के देवता हैं ] । (पुरुषो वै यज्ञः, तस्य शिर एव हविर्धानं, मुखमाहवनीयः, उदरं सदः इत्यादि-गो० उ० ५ । ४ ) पुरुष ही यज्ञ है, उसका शिर ही हविर्धान [हवि का स्थान ], मुख आहवनीय [ यज्ञाग्नि ] और उदर सद [ सभा शाला ] है, इत्यादि । ( प्रतितिष्ठति प्रजया पशुभिः य एवं वेद—गो० उ० ६ । १२ ) वह पुरुष प्रजा और पशुओं से प्रतिष्ठा पाता है, जो ऐसा जानता है। इसी प्रकार के अनेक वाक्य आत्मिक यज्ञ के प्रतिपादक हैं । इसके अतिरिक्त विशेष करके सृष्टिविद्या, ओम् शब्द व्याख्या, गायत्री मन्त्र व्याख्या, ब्रह्मचर्यसेवन, शरीरविद्या, सत्य- भाषण आदि विषय मनोरोचक, उन्नतिकारक और पुरुषार्थवर्धक हैं—विषय सूची देखो ॥ ५–गोपथब्राह्मण का विस्तार ॥ गोपथब्राह्मण ( ओं ब्रह्म ह वा इदमग्र आसीत् ) इन पदों से आरम्भ होकर (यत्रैवंविदं शंसति यत्रैवंविदं शंसतीति ब्राह्मणम्) इन पदों पर समाप्त होता है । इसके दो भाग हैं, पूर्वभाग और उत्तरभाग । दोनों भागों में ग्यारह (११) प्रपाठक और दो सौ अट्ठावन (२५८) कण्डिकायें निम्न प्रकार से हैं ॥ गोपथब्राह्मण के प्रपाठक और कण्डिकायें ॥

प्रपाठककण्डिकाप्रपाठककण्डिका
पूर्व भागउत्तर भाग
३६२६
२४२४
२३२३
२४१६
२५१५
१६
योग१३५योग१२३
विवरणपूर्व भागउत्तर भागमहायोग
प्रपाठक११
कण्डिका१३५१२३२५८

( १२ ) ६-धन्यवाद ॥ उस सर्वशक्तिमान् परमपिता जगदीश्वर को अत्यन्त धन्यवाद है जिसकी महती कृपा से अथर्व वेद भाष्य के पीछे यह गोपथब्राह्मण का भाष्य मेरे हाथ से पूरा होकर सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत है । वृद्धावस्था के कारण शरीर तो कुछ ढीला पड़ गया है, और मृत्युदेव कान में यह कहता रहता है । काल करे सो आज कर आज करे सो अब । पल में परलय होइगी फेर करेगा कब ॥ इस प्रेरणा से परमेश्वर पर भरोसा करके अन्य आवश्यकताओं से बचे समय को लगातार लगाये रहने से धीरे-धीरे यह भाष्य पूरा हो गया ॥ मैं यहाँ पर बदायूं निवासी श्रीमान् स्वामी रामभिक्षु जी महाराज को हार्दिक धन्यवाद देता हूं । उनकी प्रेरणा और विचारशीलता आदि सहायता से मेरे चित्त में उत्साह बढ़ता रहा । उक्त स्वामी जी मेरे पास वेदों का स्वाध्याय करने आये थे । जब तक वे रहे, इस भाष्य के और वेद मन्त्रों के देखने, विचारने, लिखने और मुद्रणपत्र ( Proof sheet ) शोधने तथा सूचीपत्र और अनुक्रमणिका आदि बनाने में प्रेम से मेरे सहायक हुये ॥ ७-उपसंहार प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु । प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये—अथ० १६ । ६२ । १ ॥ [ हे सर्वशक्तिमान् परमात्मन् ! ] ( मा ) मुझे ( देवेषु ) विद्वानों में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( मा ) मुझे ( राजसु ) राजाओं में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( उत ) और ( अर्ये ) वैश्यों में ( उत ) और ( शूद्रे ) शूद्रों में, और ( सर्वस्य ) प्रत्येक ( पश्यतः ) दृष्टि वाले का ( प्रियम् ) प्रिय [ बना ] ॥ हे परम पिता ! हमें पुरुषार्थ दीजिये जिससे हम वेदों के पठन-पाठन, विचार और अभ्यास से सब संसार के उपकार करने में उद्यत रहें ॥ ओ३म् । शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः ॥ हे जगदीश्वर ! हमें एक आत्मिक शान्ति, दूसरी शारीरिक शान्ति और तीसरी सामाजिक शान्ति दीजिये ॥ क्षेमकरणदास त्रिवेदी । ५२ लूकरगंज, प्रयाग, जन्म, कार्त्तिक शुक्ला ७ संवत् १६०५ [ इलाहाबाद ] विक्रमीय [ता० ३ नवम्बर १८४८ ईस्वी] कार्त्तिकशुक्ला ७ संवत् १९८१ वि०, जन्मस्थान, ग्राम शाहपुर–मडराक, ता० ३ नवम्बर १९२४ ई०। जिला अलीगढ़ ॥

प्रपाठक १ ॥

गोपथब्राह्मण का विषय सूचीपत्र ॥ पूर्वभाग ॥ प्रपाठक १ ॥ कण्डिका विषय पृष्ठ १—ब्रह्मा और सृष्टि की इच्छा ... ... ... १ २—ब्रह्म के रोमों से पसीने की धारायें और सृष्टि की इच्छा ... ३ ३—ब्रह्म के बीज का जल में गिरना, समुद्र और भृगु की उत्पत्ति ... ५ ४—अथर्वा और प्रजापति ... ... ... ... ७ ५—दस अथर्वा ऋषि, दस आथर्वण, वेद और ओम् ... ... ९ ६—तीन लोक, तीन देवता, तीन वेद और तीन महाव्याहृति ... १३ ७—समुद्र, वरुण, मृत्यु और अङ्गिरा ... ... ... १५ ८—बीस अङ्गिरा, दश आङ्गिरस, वेद और जनत् महाव्याहृति .... १७ ६—ब्रह्म और वेद की सर्वोत्तमता ... ... १६ १०—सर्पवेदादि ५ वेद, वृधत् आदि ५ महाव्याहृति ... ... २१ ११—महाव्याहृति शम् ... ... ... ... २३ १२—चन्द्रमा, नक्षत्र आदि पदार्थ ... ... ... २४ १३—ब्रह्मयज्ञ और उसकी त्रुटि में अनिष्ट फल ... ... २६ १४—यज्ञ के दोष निवारण से इष्ट फल की प्राप्ति ... ... २८ १५—यज्ञ की सफलता का लाभ ... ... ... ३० १६—ब्रह्मा का ब्रह्मचर्य, ओम्, जगत् की सृष्टि ... ... ३१ १७—ओम् की पहली स्वर मात्रा से पृथिवी आदि की उत्पत्ति ::: ३२ १८—ओम् की दूसरी स्वर मात्रा से वायु आदि की उत्पत्ति ... ३३ १६—ओम् की तीसरी स्वर मात्रा से सूर्य आदि की रचना ... ३४ २०—ओम् की वकार मात्रा से जल आदि की रचना ... ... ३५ २१—ओम् से इतिहास पुराण आदि का ज्ञान ... ... ३५ २२—ओम् को सहस्र बार जपने की महिमा ... ... ३७ २३—आख्यायिका—ओम् द्वारा असुरों से देवताओं की रक्षा ... ४० २४—ओङ्कार के विषय में ३६ प्रश्न ... ... ... ४१ २५—आख्यायिका—ओङ्कार के विषय में इन्द्र के प्रश्न और प्रजापति के उत्तर ... ... ... ::: ४२ २६—कण्डिका २४ के ओम् विषयक प्रश्नों के उत्तर -- ::: ४४ २७—कण्डिका २४ के ओम् विषयक शेष प्रश्नों के उत्तर ... ४६ २८—ओम् को आदि में बोलने का वर्णन ... ... -- ४८ २६—चारों वेद और देवता आदि ... -- -- ५०

( २४ ) कण्डिका विषय पृष्ठ ३०-ओङ्कार का चिन्तन और उसका फल -- ... ५३ ३१-मौद्गल्य और मैत्रेय की कथा ... ... ... ५४ ३२-मौद्गल्य और मैत्रेय का गायत्री मन्त्र पर वार्तालाप ... ५७ ३३--सावित्री वा गायत्री मन्त्र के चौबीस उत्पत्ति स्थान और बारह जोड़ा ६० ३४-सावित्री वा गायत्री मन्त्र के प्रथम पाद की व्याख्या ... ६२ ३५- सावित्री वा गायत्री मन्त्र के दूसरे पाद की व्याख्या ... ६४ ३६--सावित्री वा गायत्री मन्त्र के तीसरे पाद की व्याख्या --- ६५ ३७- बारह महातत्त्वों की परम्परा ... - ... ६६ ३८--दूसरे प्रकार से पूर्वोक्त बारह तत्त्वों का विचार ... ... ६७ ३६-आचमन के विधान और लाभ ... ... ... ६६ प्रपाठक २ ॥ १-ब्रह्मचारी की महिमा ... ... ... ७५ २-ब्रह्मचारी का सात मनोरागों का दमन आदि कर्तव्य --- ७८ ३-ब्रह्मचारी के कर्तव्य, आचार्य की सेवा आदि कर्म -- ८० ४-ब्रह्मचारी का अनेक पांच अग्नियों का वशीकरण और दूसरा विनीत कर्तव्य ... ... ... ... ८१ ५-जनमेजय का दो हंसों और दन्तावल से ब्रह्मचर्य की महिमा और अड़तालीस वर्ष आदि समय पर वार्तालाप -- --- ८४ ६-ब्रह्मा ने ब्रह्मचारी और उसे भिक्षा देने वाले गृहपति को छोड़कर सब प्रजाओं को मृत्यु को दिया ... ... ८६ ७-ब्रह्मचारी के दोषों का प्रायश्चित्त विधान -- ... ८८ ८-ब्रह्मचारी के आश्रम वा तपोवन ... -- ... ६० ६- होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा का वर्णन ... ... ६४ १०--काबन्धि की मान्धाता के यज्ञ में यज्ञ विषयक वार्ता ... ६८ ११-काबन्धि के देवयजन और ऋत्विजों के विषय में प्रश्नोत्तर -- १०० १२-काबन्धि का अधिक यज्ञ विषयक विचार ... ... १०२ १३-काबन्धि का आगे यज्ञ विषयक विचार ... ... १०२ १४--काबन्धि का देव यजनों के विषय में वर्णन ... ... १०४ १५-अदिति की सृष्टि रचना के दृष्टान्त से भौतिक यज्ञ की रचना ... १०५ १६--ब्रह्मज्ञानियों को चार चार प्रकार से ब्रह्मप्राप्ति -- ... १०८ १७-ईश्वर मानने वाले की महिमा ... ... ... ११० १८ विघ्नों को हटाकर अश्वनामक अग्नि की स्थापना ... ११२ १६-आख्यायिका-असुरों से इन्द्र द्वारा देवताओं की रक्षा और अग्न्याधान ... -- ... ... ११५

( २५ ) कण्डिका विषय पृष्ठ २०—वैश्वानर जातवेदा और अश्व नामक अग्नि ... ... ११७ २१—वैश्वानर, जातवेदा और अश्व नामक अग्नि का वही विषय ... १२२ २२—सान्तपन अग्नि में प्राजापत्य हवि के साथ ब्राह्म्य हवि की आवश्यकता ... ... ... ... १२६ २३—विना यज्ञ अग्नि वाला ब्राह्मण स्वर्ग नहीं पाता ... ... १२८ २४· ऋत्विजों के चुनाव में ऋग्वेदी होता, यजुर्वेदी अध्वर्यु, सामवेदी उद्गाता, चतुर्वेदी ब्रह्मा होवे ... ... ... १३० प्रपाठक ३ ॥ १—ऋत्विज् चुने हुये वेदवेत्ता पुरुष होवें ... ... १३३ २--चतुर्वेदी चार ऋत्विजों के बिना यज्ञ गिर जाता है ... १३५ ३—यज्ञ में त्रुटि होने पर प्रायश्चित्त ... ... ... १३६ ४—ऋत्विजों के कर्म जिनमें वे दक्षिणा पाते हैं ... ... १३८ ५--तीन ऋत्विजों से यज्ञ करना ... ... ... १४० ६—उद्दालक ऋषि का उत्तर वालों से शास्त्रार्थ करने का प्रयत्न ... १४१ ७—अमावस्या और पौर्णमासी के यज्ञ के सम्बन्ध से उद्दालक के शरीरसम्बन्धी प्रश्न ... ... ... १४३ ८—पूर्वोक्त प्रश्नों के विषय में उद्दालक और स्वैदायण वा शौनक का.वार्तालाप ... ... ... ... १४१ ६--अमावस्या और पूर्णमासी के यज्ञ विधान से शरीर की अवस्था का वर्णन ... ... ... ... १४७ १०--कण्डिका ८ के यज्ञ सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर ... ... १५० ११--प्राचीन योग्य मुनि के उद्दालक से अग्निहोत्र विषयक चालीस प्रश्न ... ... ... ... १५२ १२--प्राचीन योग्य के ४० प्रश्नों के उद्दालक के दिये उत्तर ... १५५ १३--तीनों अग्नियों में विघ्न पड़ने पर उपाय और प्रायश्चित्त ... १५६ १४—खान पान के लाभ ... ... ... १६२ १५—क्रियात्मक और मानसिक यज्ञ करना चाहिये ... ... १६४ १६--स्वाहा शब्द के विषय में प्रश्नोत्तर - ... १६६ १७--अग्निष्टोम विषय ... ... ... ... १६७ १८-पशुरूप वेदवाणी की सूक्ष्मता का विचार ... ... १६८ १६--दीक्षित पुरुष के कर्तव्य और अकर्तव्य कर्म ... ... १७१ २०--दीक्षा विषयक प्रश्नोत्तर ... ... ... १७४ २१—दीक्षित के कर्तव्य कर्म और भूल में प्रायश्चित्त ... ... १७६ २२-दीक्षित की भूल के प्रायश्चित्त ... ... ... १७७ २३--पुत्रेष्टि यज्ञ का विधान ... ... - १७६