भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

-१३८ ] गढ़ जीतनेके उपायका कथन २०९ पीछे उन सभीने गढ़के द्वार पर जा कर बड़ा घनघोर युद्ध किया । दूसरे दिन राजा चित्रवर्णगिद्धसे बोला—'प्यारे ! अब अपनी प्रतिज्ञाका पालन कर ।' गिद्ध बोला—'महाराज ! पहले सुन लीजिये, — अकालसहमत्यल्पं मूर्खव्यसनिनायकम् । अगुप्तं भीरुयोद्धं च दुर्गव्यसनमुच्यते ॥ १३७ ॥ बहुत काल तक घेरा न सहने वाला अर्थात् कच्चा, अत्यंत स्वल्प सैन्य- युक्त, मूर्ख और मद्यपानादि दोषयुक्त नायक जिसका हो, जिसकी अच्छे प्रकारसे रक्षा नहीं की गई हो और जिसमें कायर और डरपोक योद्धा हों वह गढ़की विपत्ति कही गई है ॥ १३७ ॥ तत्तावदत्र नास्ति । सो बात तो यहाँ नहीं है । उपजापश्चिरारोधोऽवस्कन्दस्तीव्रपौरुषम् । दुर्गस्य लङ्घनोपायाश्चत्वारः कथिता इमे ॥ १३८ ॥ गढ़की भीतरी सेनामें किसी भेदियेको भेज कर फूट करा देना, बहुत काल तक चारों ओरसे घेरे पड़े रहना, बार बार शत्रु पर चढ़ाई करना और अत्यन्त साहस दिखलाना ये चार गढ़के जीतनेके उपाय हैं ॥ १३८ ॥ अत्र यथाशक्ति क्रियते यत्नः ( कर्णे कथयति । ) एवमेवम् ।' ततोऽनुदित एव भास्करे चतुर्ष्वपि दुर्गद्वारेषु वृत्ते युद्धे दुर्गा- भ्यन्तरगृहेष्वेकदा काकैरग्निर्निक्षिप्तः । ततः 'गृहीतं गृहीतं दुर्गम्' इति कोलाहलं श्रुत्वा सर्वतः प्रदीप्ताग्निमवलोक्य राजहंस- सैनिका दुर्गवासिनश्च सत्वरं हृदं प्रविष्टाः । इसमें शक्तिके अनुसार उपाय किया जाता है। (कानमें कहने लगा) इस प्रकार इस प्रकार ।' फिर एक दिन सूर्यके विना ही निकले गढ़के चारों द्वारों पर घनघोर युद्ध होने पर गढ़के भीतरके डेरोंमें कौओंने आग लगा दी । फिर तो “गढ़को ले लिया ले लिया” यह हुर्रा सुन कर चारों ओर आगको धधकती हुई देख कर राजहंसकी सेनाके शूर वीर और गढ़के रहने वाले शीघ्र सरोवरमें घुस गये । हि० १४

युद्ध और जी ले कर भागना इन बातोंको जैसा बन पड़े अपनी शक्तिके अनुसार

२१० हितोपदेशः [ विग्रहः १३९-

यतः,— सुमन्त्रितं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् । कार्यकाले यथाशक्ति कुर्यान्न तु विचारयेत्' ॥ १३९ ॥ अवसरके आ पड़ने पर अच्छा उपाय, अच्छी भाँति पराक्रम, भली भाँति युद्ध और जी ले कर भागना इन बातोंको जैसा बन पड़े अपनी शक्तिके अनुसार करना ही चाहिये और सोचना नहीं चाहिये' ॥ १३९ ॥ राजहंसः स्वभावान्मन्दगतिः सारसद्वितीयश्च चित्रवर्णस्य सेनापतिना कुक्कुटेनागत्य वेष्टितः । हिरण्यगर्भः सारसमाह- 'सारस सेनापते ! ममानुरोधादात्मानं कथं व्यापादयिष्यसि ? त्वमधुना गन्तुं शक्तः । तद्गत्वा जलं प्रविश्यात्मानं परिरक्ष । अस्मत्पुत्रं चूडामणिनामानं सर्वज्ञसंमत्या राजानं करिष्यसि ।' सारसो ब्रूते—'देव ! न वक्तव्यमेवं दुःसहं वचः । यावच्चन्द्रार्कौ दिवि तिष्ठतस्तावद्विजयतां देवः । अहं देवदुर्गाधिकारी । मन्मां- सासृग्विलिप्तेन द्वारवर्त्मना प्रविशतु शत्रुः । राजहंस तो स्वभावहीसे धीरे चलने वाला था और उसके साथी सारसको चित्रवर्णके सेनापति मुर्गेने आ कर घेर लिया । हिरण्यगर्भने सारससे कहा-'हे सेनापति सारस ! हमारे पीछे अपनेको क्यों मारता है ? तू अभी जा सकता है; इसलिये जा कर, जलमें घुस और अपनी रक्षा कर । मेरे चूड़ामणि नाम बेटेको सर्वज्ञकी संमतिसे राजा कर दीजिये ।' सारसने कहा-'महाराज ! इस प्रकार कठोर वचन नहीं कहना चाहिये । जब तक आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा ठहरे हुए हैं तब तक महाराजकी जय हो । महाराज ! मैं गढ़का अधिकारी हूँ, मेरे मांस और लोहूसे सने हुए द्वारके मार्गसे भलेही शत्रु घुस जाय; अपरं च,— दाता क्षमी गुणग्राही स्वामी दुःखेन लभ्यते ।' और दूसरे-दाता, क्षमावान्, गुणग्राही स्वामी दुःखसे मिलता है ।' राजाह—'सत्यमेवैतत् । राजा बोला-'यह तो ठीक ही है; किंतु,— शुचिर्दक्षोऽनुरक्तश्च जाने भृत्योऽपि दुर्लभः' ॥ १४० ॥

-१४४ ] सारसकी स्वामिभक्तिमें परायणता २११ परंतु,-मैं जानता हूँ कि नेक, सच्चा, चतुर और स्वामीको चाहने वाला सेवक तो मिलना भी कठिन है ॥ १४० ॥ सारसो ब्रूते—'शृणु देव ! सारसने कहा-'महाराज ! सुनिये,— यदि समरमपास्य नास्ति मृत्यो- र्भयमिति युक्तमितोऽन्यतः प्रयातुम् । अथ मरणमवश्यमेव जन्तोः, किमिति मुधा मलिनं यशः क्रियेत ? ॥ १४१ ॥ जो युद्धको छोड़ कर जानेमें मृत्युका भय न हो तो यहाँसे अन्य कोई स्थानमें चले जाना ठीक है; पर प्राणीका मरण अवश्य ही है इसलिये जा कर क्यों वृथा अपना यश मलिन करना चाहिये ? ॥ १४१ ॥ अन्यच्च,— भवेऽस्मिन्पवनोद्भ्रान्तवीचिविभ्रमभङ्गुरे । जायते पुण्ययोगेन परार्थे जीवितव्ययः ॥ १४२ ॥ और दूसरे-वायुसे उठी हुई ल्हरियोंके खेलके समान क्षणभंगुर इस असार संसारमें पराये उपकारके लिये प्राणोंका त्याग बड़े पुण्यसे होता है ॥ १४२ ॥ स्वाम्यमात्यश्च राष्ट्रं च दुर्गं कोशो बलं सुहृत् । राज्याङ्गानि प्रकृतयः पौराणां श्रेणयोऽपि च ॥ १४३ ॥ और स्वामी, मंत्री, राज्य, गढ़, कोश, सेना, मित्र और पुरवासियोंके समूह ये राज्यके अंग हैं ॥ १४३ ॥ देव ! त्वं च स्वामी सर्वथा रक्षणीयः । और हे महाराज ! आप स्वामी हैं, आपकी सर्वथा रक्षा करनी चाहिये; यतः,— प्रकृतिः स्वामिनं त्यक्त्वा समृद्धापि न जीवति । अपि धन्वन्तरिर्वैद्यः किं करोति गतायुषि ? ॥ १४४ ॥ क्योंकि—स्वामीको त्याग कर प्रजा, सब ऐश्वर्यसे युक्त भी नहीं जी सकती है, जैसे आयु का अंत होने पर धन्वन्तरि वैद्य भी क्या कर सकता है? ॥ १४४ ॥

२१२ हितोपदेशः [ विग्रहः १४५-

अपरं च,— नरेशे जीवलोकोऽयं निमीलति निमीलति । उदेत्युदीयमाने च रवाविव सरोरुहम्' ॥ १४५ ॥ और दूसरे-सूर्यके उदय तथा अस्त होनेसे कमलके समान, राजाके मरने पर यह जीवलोक मरता है और उदय होने (जीने) पर जीता है' ॥ १४५ ॥ अथ कुक्कुटेनागत्य राजहंसस्य शरीरे खरतरनखाघातः कृतः । तदा सत्वरमुपसृत्य सारसेन स्वदेहान्तरितो राजा जले क्षिप्तः । अथ कुक्कुटैर्नखप्रहारजर्जरीकृतेन सारसेन कुक्कुटसेना बहुशो हताः । पश्चात्सारसोऽपि चञ्चुप्रहारेण विभिद्य व्यापादितः । अथ चित्रवर्णो दुर्गं प्रविश्य दुर्गावस्थितं द्रव्यं ग्राहयित्वा बन्दि- भिर्जयशब्दैरानन्दितः स्वस्कन्धावारं जगाम ॥ फिर मुर्गेने आ कर राजहंसके शरीर पर बड़े तीखे तीखे नोहट्टे मारे । तब सारसने तुरन्त पास जा कर और अपनी देहसे छिपा कर राजाको जलमें फेंक दिया । फिर मुर्गोंके नोहट्टोंसे व्याकुल हुए सारसने मुर्गोंकी सेनाको बहुत मारा । पीछे सारस भी चोंचोंके प्रहारसे छिद कर मारा गया । फिर चित्रवर्ण गढ़में घुस कर गढ़में धरे हुए द्रव्यको लिवा कर बंदिजनोंके जय जय शब्दसे प्रसन्न होता हुआ अपने डेरेमें चला गया । अथ राजपुत्रैरुक्तम्—'तस्मिन् राजबले स पुण्यवान् सारस एव, येन स्वदेहत्यागेन स्वामी रक्षितः । फिर राजकुमारोंने कहा-'उस राजाकी सेनामें एक सारस ही पुण्यात्मा था जिसने अपनी देहको त्याग करके स्वामीकी रक्षा की । उक्तं चैतत्,— जनयन्ति सुतान् गावः सर्वा एव गवाकृतीन् । विषाणोल्लिखितस्कन्धं काचिदेव गवां पतिम्' ॥ १४६ ॥ और ऐसा कहा है कि-सभी गायें गौके आकारके समान बछड़ोंको जनती हैं, परन्तु दोनों सींगोंसे ऊंचे दीखते हुए कंधे वाले साँड़को विरलीही जनती है' १४६ विष्णुशर्मोवाच—'स तावद्विद्याधरीपरिजनः स्वर्गसुखमनुभवतु महासत्त्वः ।

[Page Header] -१४९ ] रणवीरों की प्रशंसा २१३

[Page Content] विष्णुशर्मा बोले-'वह महात्मा सारस विद्याधरियोंके परिवारके साथ स्वर्गका सुख भोगें । तथा चोक्तम्,— आहवेषु च ये शूराः स्वाम्यर्थे त्यक्तजीविताः । भर्तृभक्ताः कृतज्ञाश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ १४७ ॥ जैसा कहा है-जिन शूर वीरोंने संग्राममें अपने स्वामीके लिये प्राणत्याग किए हैं वे स्वामीके भक्त तथा राजाके उपकारको मानने वाले मनुष्य स्वर्गको पाते हैं ॥ यत्र तत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः । अक्षयाँल्लभते लोकान् यदि क्लीब्यं न गच्छति ॥ १४८ ॥ और जिस किसी स्थानमें शत्रुओंसे घिर कर मरा हुआ शूर जो युद्धभूमि छोड़ नहीं भागा तो वह अमर लोकोंको पाता है ॥ १४८ ॥ विग्रहः श्रुतो भवद्भिः ?' । राजपुत्रैरुक्तम्,—'श्रुत्वा सुखिनो भूता वयम् ।' 'आपने विग्रह सुन लिया ।' राजपुत्रोंने कहा-'हम सुन कर बहुत संतुष्ट हुए ।' विष्णुशर्माऽब्रवीत्—'अपरमप्येवमस्तु— विग्रहः करितुरङ्गपत्तिभि- र्नो कदापि भवतां महीभुजाम् । नीतिमन्त्रपवनैः समाहताः संश्रयन्तु गिरिगह्वरं द्विषः' ॥ १४९ ॥ इति हितोपदेशे विग्रहो नाम तृतीयः कथासंग्रहः समाप्तः । विष्णुशर्मा बोले-'यह और भी हो-आपके समान महाराजाओंका कभी हाथी घोड़े और पैदल आदि सेनासे संग्राम न हो और नीतिके मंत्ररूपी पवनसे उड़ाये गये शत्रु पर्वतकी गुफामें ( जा कर ) आसरा लें' ॥ १४९ ॥ पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेश ग्रंथके विग्रह नामक तीसरे भागका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्.

पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रैरुक्तम्—‘आर्य ! विग्रहः श्रुतो-

हितोपदेशः संधिः ४ पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रैरुक्तम्—‘आर्य ! विग्रहः श्रुतो- ऽस्माभिः, संधिरधुनाऽभिधीयताम् ।’ फिर कथाके आरम्भमें राजपुत्रोंने कहा-‘हे गुरुजी ! हम विग्रह सुन चुके; अब सन्धि सुनाइये ।’ विष्णुशर्मणोक्तम्—‘श्रूयताम्; संधिमपि कथयामि यस्या- यमाद्यः श्लोकः— वृत्ते महति संग्रामे राज्ञोर्निहतसेनयोः । स्थेयाभ्यां गृध्रचक्राभ्यां वाचा संधिः कृतः क्षणात्’ ॥ १ ॥ विष्णुशर्माने कहा-‘सुनिये, संधि भी कहता हूँ कि जिसके आदिका यह वाक्य है—दोनों राजाओंकी सेनाके मरने पर और घनघोर युद्ध होने पर गिद्ध और चकवेने पंच बन कर शीघ्र मेल करा दिया’ ॥ १ ॥ राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’ । विष्णुशर्मा कथयति— राजपुत्र बोले-‘यह कथा कैसी है ?’ विष्णुशर्मा कहने लगे ।— कथा १ [ हंस और मोरके मेलके लिए कहानी १ ] ततस्तेन राजहंसेनोक्तम्—‘केनास्मद्दुर्गे निक्षिप्तोऽग्निः ? किं पार- क्येण किं वाऽस्मद्दुर्गवासिना केनापि विपक्षप्रयुक्तेन ?’ । चक्रो ब्रूते—‘देव ! भवतो निष्कारणबन्धुरसौ मेघवर्णः सपरिवारो न दृश्यते। तन्मन्ये तस्यैव विचेष्टितमिदम् ।’ राजा क्षणं विचि- न्त्याह—‘अस्ति तावदेव मम दुर्दैवमेतत् । फिर उस राजहंसने कहा-‘हमारे किलेमें किसने आग लगाई है ? शत्रुने अथवा शत्रुसे सिखाये हुए किसी हमारे गढ़के रहनेवालेने ?’ चकवा बोला— महाराज ! आपका अकृत्रिम बन्धु वह मेघवर्ण अपने परिवारसहित नहीं दीखता

कहीं अच्छे प्रकारसे किया हुआ काम भी भाग्यके वशसे बिगड़ जाता है' ॥२॥

-४ ] हितकारी वचन को मानना लाभदायक है २१५

है इसलिये यह उसीका काम दीख पड़ता है।' राजाने क्षण भर सोच कर कहा-'यह मेरी प्रारब्ध ही फूटी है; तथा चोक्तम्,— अपराधः स दैवस्य न पुनर्मन्त्रिणामयम् । कार्यं सुचरितं कापि दैवयोगाद्विनश्यति'॥ २ ॥ जैसा कहा है—वह प्रारब्धका दोष है, मंत्रियोंका कुछ दोष नहीं है, क्योंकि कहीं अच्छे प्रकारसे किया हुआ काम भी भाग्यके वशसे बिगड़ जाता है' ॥२॥ मन्त्री ब्रूते—'उक्तमेवैतत्,— मंत्री बोला—ऐसा भी कहा है,— विषमां हि दशां प्राप्य दैवं गर्हयते नरः । आत्मनः कर्मदोषांश्च नैव जानात्यपण्डितः ॥ ३ ॥ मूर्ख मनुष्य बुरी दशाको पा कर भाग्यकी निन्दा करता है और यह अपने कर्मका दोष ऐसा नहीं मानता ॥ ३ ॥ अपरं च,— सुहृदां हितकामानां यो वाक्यं नाभिनन्दति । स कूर्म इव दुर्बुद्धिः काष्ठाद्भ्रष्टो विनश्यति'॥ ४ ॥ और दूसरे-जो मनुष्य हितकारी मित्रोंका वचन नहीं मानता है वह मूर्ख काठसे गिरे हुए कछुएके समान मरता है' ॥ ४ ॥ राजाह—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— राजा बोला-'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।— कथा २ [ दो हंस और उनका स्नेही कछुएकी कहानी २ ] ‘अस्ति मगधदेशे फुल्लोत्पलाभिधानं सरः । तत्र चिरं संकट- विकटनामानौ हंसौ निवसतः । तयोर्मित्रं कम्बुग्रीवनामा कूर्मश्च प्रतिवसति । अथैकदा धीवरैरागत्य तत्रोक्तम्-‘तदत्रास्माभिर- द्योषित्वा प्रातर्मत्स्यकूर्मादयो व्यापादयितव्याः ।' तदाकर्ण्य कूर्मो हंसावाह—'सुहृदौ ! श्रुतोऽयं धीवरालापः; अधुना किं मया कर्त-

२१६ हितोपदेशः [ संधिः ५- व्यम् ?।' हंसावाहतुः—'ज्ञायताम् । पुनस्तावत्प्रातर्यदुचितं तत्कर्त्त- व्यम् ।' कूर्मो ब्रूते—'मैवम् । यतो दृष्टव्यतिकरोऽहमत्र । 'मगध देशमें फुल्लोत्पल नाम एक सरोवर है । वहाँ बहुत कालसे संकट और विकट नामक दो हंस रहा करते थे और उन दोनोंका मित्र एक कम्बुग्रीव नाम कछुआ रहता था । फिर एक दिन धीवरोंने वहाँ आ कर कहा कि—आज हम यहाँ रह कर प्रातःकाल मछली कछुआ आदि मारेंगे' यह सुन कर कछुआ हंसोंसे कहने लगा—'मित्रो ! धीवरोंकी यह बात मैने सुनी । अब मुझे क्या करना उचित है ? हंसोंने कहा-'समझलो । फिर प्रातःकाल जो उचित हो सो करना।' कछुआ बोला-'ऐसा मत कहो, क्योंकि मैं यहाँ पर भय देख चुका हूं। तथा चोक्तम्,— अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा । द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ५ ॥ जैसा कहा है-अनागतविधाता याने आगे होने वाली बातको प्रथमही सोचने वाला और प्रत्युत्पन्नमति अर्थात् अवसर जान कर कार्य करने वाला इन दोनोंने आनंद भोगे हैं और यद्भविष्य मारा गया' ॥ ५ ॥ तावाहतुः—'कथमेतत् ?' । कूर्मः कथयति— वे दोनों बोले-'यह कथा कैसे है ?' कछुआ कहने लगा ।— कथा ३ [ दूरदर्शी दो मच्छ और यद्भविष्य मच्छकी कहानी ३ ] 'पुरास्मिन्नेव सरस्येवंविधेषु धीवरेषूपस्थितेषु मत्स्यत्रयेणालो- चितम् । तत्रानागतविधाता नामैको मत्स्यः । तेनालोचितम्— 'अहं तावज्जलाशयान्तरं गच्छामि' इत्युक्त्वा हृदान्तरं गतः । अपरेण प्रत्युत्पन्नमतिनाम्ना मत्स्येनाभिहितम्—' भविष्यदर्थे प्रमा- णाभावात् कुत्र मया गन्तव्यम् ? तदुत्पन्ने यथाकार्यं तदनुष्ठेयम् । 'पहले इसी सरोवर पर जब ऐसे ही धीवर आये थे तब तीन मछलियोंने विचार किया । और उनमें अनागतविधाता नाम एक मच्छ था, उसने विचार किया-'मैं तो दूसरे सरोवरको जाता हूँ।' इस प्रकार कह कर वह दूसरे सरोवरको चला गया ।

-६] आपत्ति में शीघ्र उपाय से सफलता २१७ फिर दूसरे प्रत्युत्पन्नमति नाम मच्छने कहा- 'होने वाले काममें निश्चय न होनेसे मैं कहाँ जाऊँ ? इसलिये काम आ पड़ने पर जैसा होगा वैसा करूंगा। तथा चोक्तम्, — उत्पन्नामापदं यस्तु समाधत्ते स बुद्धिमान् । वणिजो भार्यया जारः प्रत्यक्षे निहुतो यथा' ॥ ६ ॥ जैसा कहा है— जो उत्पन्न हुई आपत्तिका उपाय करता है वह बुद्धिमान् है, जैसे कि बनियेकी स्त्रीने प्रत्यक्षमें जारको छुपा लिया' ॥ ६ ॥ यद्द्रविष्यः पृच्छति— 'कथमेतत् ?' । प्रत्युत्पन्नमतिः कथ- यति— यद्द्रविष्य पूछने लगा-'यह कथा कैसी है?' प्रत्युत्पन्नमति कहने लगा।— कथा ४ [ एक बनिया, उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और उसके यारकी कहानी ४] 'पुरा विक्रमपुरे समुद्रदत्तो नाम वणिगस्ति । तस्य रत्नप्रभा नाम गृहिणी स्वसेवकेन सह सदा रमते । अथैकदा सा रत्नप्रभा तस्य सेवकस्य मुखे चुम्बनं ददती समुद्रदत्तेनावलोकिता । ततः सा बन्धकी सत्वरं भर्तुः समीपं गत्वाह — 'नाथ ! एतस्य सेवकस्य महती निर्वृतिः । यतोऽयं चौरिकां कृत्वा कर्पूरं खादतीति मयाऽस्य मुखमाघ्राय ज्ञातम् ।' तथा चोक्तम्- "आहारो द्विगुणः स्त्रीणाम्” इत्यादि ।' तच्छ्रुत्वा सेवकेन प्रकुप्योक्तम्— 'नाथ ! यस्य स्वामिनो गृह एतादृशी भार्या तत्र सेवकेन कथं स्थातव्यं यत्र प्रतिक्षणं गृहिणी सेवकस्य मुखं जिघ्रति ।' ततो- ऽसावुत्थाय चलितः साधुना यत्नात्प्रबोध्य धृतः । अतोऽहं ब्रवीमि-“उत्पन्नामापदम्” इत्यादि ॥' 'किसी समय विक्रमपुरमें समुद्रदत्त नाम एक बनिया रहता था । उसकी रत्नप्रभा नाम स्त्री अपने सेवकके संग सदा व्यभिचार किया करती थी। पीछे एक दिन उस रत्नप्रभाको उस सेवकका मुखचुम्बन करते हुए समुद्रदत्तने देख लिया । फिर वह व्यभिचारिणी शीघ्र अपने पतिके पास जा कर बोली-

२१८ हितोपदेशः [ संधिः ७- 'स्वामी ! इस सेवकको बड़ा सुख है, क्योंकि यह चोरी करके कपूर खाया करता है, यह मैंने इसका मुख सूँघ कर जान लिया।' जैसा कहा है-'स्त्रियोंका भोजन दूनो होता है' इत्यादि।' यह सुन कर सेवकने क्रोध कर कहा-'हे स्वामी ! जिस स्वामीकी ऐसी स्त्री है वहाँ सेवक कैसे टिक सकता है कि जहाँ क्षणक्षणमें घरवाली सेवकका मुख सूँघती है?' फिर वह उठ कर जाने लगा, तब बनियेने बड़ी कोशिशसे समझा कर रख उसे लिया । इसलिये मैं कहता हूँ-"आपत्तिके उत्पन्न होने पर" आदि ।' ततो यद्भविष्येणोक्तम्,— 'यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ?' ॥ ७ ॥ फिर यद्भाविष्यने कहा-'जो होनहार नहीं है वह कभी नहीं होगा, और जो होनहार है उससे उलटा कभी न होगा अर्थात् होनहार अवश्य होगा यह चिंतारूपी विषका नाश करने वाली औषध क्यों नहीं पीते हो ?' ॥ ७ ॥ ततः प्रातर्जालेन बद्धः प्रत्युत्पन्नमतिर्मृतवदात्मानं संदर्श्य स्थितः । ततो जालादपसारितो यथाशक्त्युत्प्लुत्य गभीरं नीरं प्रविष्टः । यद्भाविष्यश्च धीवरैः प्राप्तो व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि-"अनागतविधाता" इत्यादि ॥ तद्यथाहमन्यह्रदं प्राप्नोमि तथा क्रियताम् ।' हंसावाहतुः—'जलाशयान्तरे प्राप्ते तव कुशलम्, स्थले गच्छतस्ते को विधिः ?' कूर्म आह—'यथाऽहं भवद्भ्यां सहाकाशवर्त्मना यामि तथा विधीयताम् ।' हंसौ ब्रूतः—'कथमुपायः संभवति ?' । कच्छपो वदति—'युवाभ्यां चञ्चुधृतं काष्ठखण्डमेकं मया मुखेनावलम्ब्य गन्तव्यम् । युवयोः पक्षबलेन मयाऽपि सुखेन गन्तव्यम् ।' फिर प्रातःकाल जालसे बँध कर प्रत्युत्पन्नमति अपनेको मरेके समान दिखला कर बैठा रहा । फिर जालसे बाहर निकाला हुआ अपनी शक्तिके अनुसार उछल कर गहरे पानीमें घुस गया और यद्भविष्यको धीवरोंने पकड़ लिया और मार डाला । इसलिये मैं कहता हूँ, “अनागतविधाता” इत्यादि—॥ सो जिस प्रकार मैं दूसरे सरोवरको पहुँच जाऊँ वैसे करो।' दोनों हंस बोले-'दूसरे सरोवरके १ सुहृद्भेदका ११९ वाँ श्लोक देखो ।

-८ ] उपायके साथ अपायका चिन्तन २१९ जानेमें तुम्हारी कुशल है । परंतु पटपड़में तुम्हारे जानेका कौनसा उपाय है ?' कछुआ बोला- 'जिस प्रकार मैं तुम्हारे साथ आकाशमार्गसे जाऊँ वैसा करो ।' हंसोंने कहा-'उपाय कैसे हो सकता है ?' कछुयेने कहा- 'तुम दोनों एक काठके टुकड़ेको चोंचसे पकड़ लो और मैं मुखसे पकड़ कर चलूंगा और तुम्हारे पंखोंके बलसे मैं सुखसे पहुँच भी जाऊँगा ।' हंसौ ब्रूतः- 'संभवत्येष उपायः; किंतु,- हंस बोले-'यह उपाय तो हो सकता है; परंतु,- उपायं चिन्तयन् प्राज्ञो ह्यपायमपि चिन्तयेत् । पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलैर्भक्षिताः प्रजाः' ॥ ८ ॥ पण्डितको उपाय सोचना चाहिये साथ साथ और विपत्तिका भी विचार करना चाहिये । जैसे मूर्ख बगुलेके देखते देखते नेवले सब बच्चे खा गये' ॥ ८ ॥ कूर्मः पृच्छति-'कथमेतत् ?' । तौ कथयतः- कछुआ पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' वे दोनों कहने लगे ।- कथा ५ [ बगुले, साँप और नेवलेकी कहानी ५ ] 'अस्त्युत्तरापथे गृध्रकूटनाम्नि पर्वते महान्पिप्पलवृक्षः । तत्रा- नैकबका निवसन्ति । तस्य वृक्षस्याधस्ताद्विवरे सर्पो बालाप- त्यानि खादति । अथ शोकार्तानां बकानां विलापं श्रुत्वा केनचि- द्वृद्धेनाभिहितम्- 'एवं कुरुत । यूयं मत्स्यानुपादाय नकुलवि- वरादारभ्य सर्पविवरं यावत्पङ्किक्रमेण विकिरत । ततस्तदाहार- लुब्धैर्नकुलैरागत्य सर्पो द्रष्टव्यः स्वभावद्वेषाद्व्यापादयितव्यश्च ।' तथानुष्ठिते तद्वृत्तम् । ततस्तत्र वृक्षे नकुलैर्बकशावकरावः श्रुतः । पश्चात्तैर्वृक्षमारुह्य बकशावकाः खादिताः । अत आवां ब्रूवः- “उपायं चिन्तयन्” इत्यादि ॥ आवाभ्यां नीयमानं त्वामवलोक्य लोकैः किंचिद्वक्तव्यमेव । तदाकर्ण्य यदि त्वमुत्तरं दास्यसि तदा त्वन्मरणम् । तत्सर्वथाऽत्रैव स्थीयताम् ।' कूर्मो वदति-'किमहम- प्राज्ञः ? नाहमुत्तरं दास्यामि किमपि न वक्तव्यम् । तथानुष्ठिते तथाविधं कूर्ममालोक्य सर्वे गोरक्षकाः पश्चाद्धावन्ति वदन्ति च।

२२० | हितोपदेशः | [ संधिः ८- कश्चिद्वदति—'यद्ययं कूर्मः पतति तदाऽत्रैव पक्त्वा खादितव्यः।' कश्चिद्वदति—'अत्रैव दग्ध्वा खादितव्योऽयम्।' कश्चिद्वदति— 'गृहं नीत्वा भक्षणीयः' इति। तद्वचनं श्रुत्वा स कूर्मः कोपाविष्टो विस्मृतपूर्वसंस्कारः प्राह—'युष्माभिर्भस्म भक्षितव्यम्।' इति वदन्नेव पतितस्तैर्व्यापादितश्च। अतोऽहं ब्रवीमि—"सुहृदां हितकामानाम्" इत्यादि॥' अथ प्रणिधिर्बकस्तत्रागत्योवाच— 'देव! प्रागेव मया निगदितम्। दुर्गशोधनं हि प्रतिक्षणं कर्तव्य- मिति। तच्च युष्माभिर्न कृतं तदनवधानस्य फलमनुभूतम्। दुर्गदाहो मेघवर्णेन वायसेन गृध्रप्रयुक्तेन कृतः।' 'उत्तर दिशामें गृध्रकूटक नाम पर्वत पर एक बड़ा पीपलका पेड़ है। उस पर बहुतसे बगले रहते थे। उस वृक्षके नीचे बिलमें एक साँप बगुलोंके छोटे छोटे बच्चोंको खा लिया करता था। फिर शोकसे व्याकुल बगुलोंके विलापको सुन कर किसी बगुलेने कहा—'ऐसा करो। तुम मछलियोंको ले कर नेवलेके बिलसे साँपके बिले तक लगातार फैला दो। फिर उनको खानेके लोभी नेवले वहाँ आ कर साँपको देखेंगे और अपने स्वभावके वैरसे उसे मार डालेंगे। ऐसा करने पर वैसा ही हुआ। पीछे उस वृक्षके ऊपर नेवलोंने बगुलोंके बच्चोंका चहचहाट सुना। फिर उन्होंने पेड़ पर चढ़ कर बगुलोंके बच्चे खा लिये। इसलिये हम दोनों कहते हैं कि "उपायको सोचना चाहिये" इत्यादि। और हम दोनोंसे ले जाते हुए तुमको देख कर लोग कुछ कहेंगेही। वह सुन कर जो तुम उत्तर दोगे तो तुम मरोगे। इस- लिये चाहे जो कुछ भी हो, पर यहाँ ही रहो।' कछुआ बोला-'क्या मैं मूर्ख हूँ? मैं उत्तर नहीं दूँगा। कुछ न बोलूँगा। और वैसा करने पर कछुएको वैसा देख कर सब ग्वाले पीछे दौड़े और कहने लगेः कोई कहता था-जो यह कछुआ गिर पड़े तो यहाँ ही पका कर खा लेना चाहिये। कोई कहता था—यहाँ ही इसे भून कर खा लें। कोई कहता था कि घर ले चल कर खाना चाहिये। उन सभीका वचन सुन कर वह कछुआ क्रोधयुक्त हो कर पहले उपदेशको भूल कर बोला— 'तुम सभीको धूल फाँकनी चाहिये।' यह कहतेही गिर पड़ा और उन्होंने मार डाला। इसलिये मैं कहता हूँ—"हितकारी मित्रोंका" इत्यादि।' फिर दूत बगुला वहाँ आ कर बोला-'हे महाराज! मैंने तो पहले ही जता दिया था कि गढ़का

-१० ] चित्रवर्ण की मनमोहक बातें करना २२१ संशोधन क्षणक्षणमें अवश्य करना चाहिये। और वह आपने नहीं किया इसलिये उस भूलका फल भुगता । गिद्धके सिखाये भलाये मेघवर्ण कौएने दुर्ग जला दिया। राजा निःश्वस्याह, — 'प्रणयादुपकाराद्वा यो विश्वसिति शत्रुषु । स सुप्त इव वृक्षाग्रात् पतितः प्रतिबुध्यते' ॥ ९ ॥ राजाने साँस भर कर कहा—'जो मनुष्य स्नेहसे अथवा उपकारसे शत्रुओं पर विश्वास करता है वह सोये हुएके समान वृक्षकी फुनगीसे गिर कर जाग पड़ता है, अर्थात् आपत्तिमें पड़ कर उसे जानता हैं' ॥ ९ ॥ प्रणिधिरुवाच— 'इतो दुर्गदाहं विधाय यदा गतो मेघवर्णस्तदा चित्रवर्णेन प्रसादितेनोक्तम्— 'अयं मेघवर्णोऽत्र कर्पूरद्वीपराज्ये- ऽभिषिच्यताम् । दूत बोला—'यहाँसे गढ़का दाह करके जब मेघवर्ण गया तब चित्रवर्णने प्रसन्न हो कर कहा—'इस मेघवर्णको इस कर्पूरद्वीपके राज्य पर राजतिलक कर दो । तथा चोक्तम्,— कृतकृत्यस्य भृत्यस्य कृतं नैव प्रणाशयेत्। फलेन मनसा वाचा दृष्ट्या चैनं प्रहर्षयेत्' ॥ १० ॥ जैसा कहा है— जिस सेवकने कार्य सिद्ध किया है उसके किये हुए कृत्यको कभी निष्फल नहीं करना चाहिये; वरना पारितोषिकसे, मनसे, वचनसे और दृष्टिसे, उसको प्रसन्न करना चाहिये' ॥ १० ॥ चक्रवाको ब्रूते —'ततस्ततः ?।' प्रणिधिरुवाच —'ततः प्रधान- मन्त्रिणा गृध्रेणाभिहितम्— 'देव ! नेदमुचितम् । प्रसादान्तरं किमपि क्रियताम् । चकवा पूछने लगा—'उसके पीछे फिर क्या हुआ ?' दूत बोला- 'पीछे प्रधान मंत्री गिद्धने कहा— 'महाराज ! यह बात उचित नहीं है, कुछ दूसरे भी प्रसाद कीजिये;

यतः,— अविचारयतो युक्तिकथनं तुषखण्डनम् । नीचेषूपकृतं राजन् ! बालुकास्विव मुद्रितम् ॥ ११ ॥ क्योंकि—हे राजन् ! पूर्वापरको नहीं विचारने वालेको उपाय बतलाना भुसीके पीसनेके समान बेखारथ है और नीचोंमें उपकार करना धुलिमें चिह्न करनेके समान है, अर्थात् जैसा धुलिका चिह्न थोड़ीसी देरमें मिट जाता है वैसा नीचोंमें किया हुआ उपकार और अविचारी पुरुषोंमें उपदेश किया हुआ नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥ महतामास्पदे नीचः कदापि न कर्तव्यः । ऊँचे ओहदे पर नीचकी नियुक्ति कभी नहीं करनी चाहिये । जैसा कहा है— तथा चोक्तम्,— नीचः श्लाघ्यपदं प्राप्य स्वामिनं हन्तुमिच्छति । मूषिको व्याघ्रतां प्राप्य मुनिं हन्तुं गतो यथा १॥ १२ ॥ नीच अच्छे पदको पा कर स्वामीको मारना चाहता है, जैसे चूहा व्याघ्रत्वको पा कर मुनिको मारने चला' ॥ १२ ॥ चित्रवर्णः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— चित्रवर्ण पूछने लगा—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।— कथा ६ [ महातप नामक संन्यासी और एक चूहेकी कहानी ६ ] 'अस्ति गौतमस्य महर्षेस्तपोवने महातपा नाम मुनिः । तत्र तेन मुनिना काकेन नीयमानो मूषिकशावको दृष्टः । ततः स्वभावदयात्मना तेन मुनिना नीवारकणैः संवर्धितः । ततो बिडालस्तं मूषिकं खादितुमुपधावति । तमवलोक्य मूषिकस्तस्य मुनेः क्रोडे प्रविवेश । ततो मुनिनोक्तम्—'मूषिक ! त्वं मार्जारो भव ।' ततः स बिडालः कुक्कुरं दृष्ट्वा पलायते । ततो मुनिनोक्तम्—'कुक्कुराद्विभेषि ? । त्वमेव कुक्कुरो भव ।' स च कुक्कुरो व्याघ्राद्विभेति । ततस्तेन मुनिना कुक्कुरो व्याघ्रः कृतः । १ 'नीचेषूपकृतं राजन् ! बालुकास्विव मूत्रितम्' यह भी पाठ प्रचलित है, जिसका अर्थ—नीच पुरुषमें उपकार करना तो सचमुच धूलि(रेत)में मूतने के समान है'

  • १३ ] नीच की बड़े पदपर हानिदायिता २२३

अथ तं व्याघ्रं मुनिर्मूषिकोऽयमिति पश्यति । अथ तं मुनिं दृष्ट्वा व्याघ्रं च सर्वे वदन्ति—'अनेन मुनिना मूषिको व्याघ्रतां नीतः।' एतच्छ्रुत्वा स व्याघ्रोऽचिन्तयत्—'यावदनेन मुनिना स्थीयते तावदिदं मे रूपाख्यानमकीर्तिकरं न पलायिष्यते' इत्यालोच्य मूषिकस्तं मुनिं हन्तुं गतः । ततो मुनिना तज्ज्ञात्वा 'पुनर्मूषिको भव' इत्युक्त्वा मूषिक एव कृतः । अतोऽहं ब्रवीमि—“नीचः श्लाघ्यपदं” इत्यादि ॥ 'गौतम महर्षिके तपोवनमें महातपा नाम एक मुनि था । वहाँ उस मुनिने कौएसे लाये हुए एक चूहेके बच्चेको देखा । फिर स्वभावसे दयामय उस मुनिने तृणके धान्यसे उसको बड़ा किया । फिर बिलाव उस चूहेको खानेको दौड़ा । उसे देख कर चूहा उस मुनिकी गोदमें चला गया । फिर मुनिने कहा कि-‘हे चूहे ! तू बिलाव हो जा ।' फिर वह बिलाव कुत्तेको देख कर भागने लगा । फिर मुनिने कहा-‘तू कुत्तेसे डरता है ? जा तू भी कुत्ता हो जा।' बाद वह कुत्ता बाघसे डरने लगा । फिर उस मुनिने उस कुत्तेको बाघ कर दिया । वह मुनि, उस बाघको “यह तो चूहा है” ऐसे (उसे असली स्वरूपसे) देखता था । उस मुनिको और व्याघ्रको देख कर सब लोग कहा करते थे कि “इस मुनिने इस चूहेको बाघ बना दिया है ।” यह सुन कर वह बाघ सोचने लगा-‘जब तक यह मुनि जिंदा रहेगा तब तक यह मेरा अपयश करने वाले स्वरूपकी कहानी नहीं मिटेगी ।' यह विचार कर चूहा उस मुनिको मारनेके लिये चला । फिर मुनिने यह जान कर “फिर चूहा हो जा” यह कह कर चूहाही कर दिया । इसलिये मैं कहता हूँ—“नीच ऊँचा पद पर” इत्यादि; अपरं च, सुकरमिदमिति न मन्तव्यम् । शृणु,— और दूसरे-यह बात सुलभ है ऐसा नहीं जानना चाहिये । सुनिये,— भक्षयित्वा बहून्मत्स्यानुत्तमाधममध्यमान् । अतिलोभाद्वकः पश्चान्मृतः कर्कटकग्रहात्' ॥ १३ ॥ एक बगुला बहुतसे बड़े छोटे, और मध्यम मच्छोंको खा कर अधिक लोभसे कर्कटके पकड़नेसे मारा गया' ॥ १३ ॥ चित्रवर्णः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— चित्रवर्ण पूछने लगा—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा।—

कथा ७

२२४ हितोपदेशः [ संधिः १४- कथा ७ [ बूढे बगुले, केंकडे और मछलीकी कहानी ७ ] 'अस्ति मालवदेशे पद्मगर्भनामधेयं सरः। तत्रैको वृद्धो बकः सामर्थ्यहीन उद्विग्नमिवात्मानं दर्शयित्वा स्थितः। स च केनचि- त्कुलीरेण दृष्टः पृष्टश्च—'किमिति भवानत्राहारत्यागेन तिष्ठति ?' बकेनोक्तम्-‘मत्स्या मम जीवनहेतवः ते कैवर्तैरागत्य व्यापादयि- तव्या इति वार्ता नगरोपान्ते मया श्रुता। अतो वर्तनाभावादे- वास्मन्मरणमुपस्थितमिति ज्ञात्वाऽऽहारेऽप्यनादरः कृतः ।' ततो मत्स्यैरालोचितम्—'इह समये तावदुपकारक एवायं लक्ष्यते । तदयमेव यथाकर्तव्यं पृच्छ्यताम् । 'मालव देशमें पद्मगर्भ नाम एक सरोवर है। वहाँ एक बूढ़ा बगुला सामर्थ्य- रहित सोचमें डूबे हुएके समान अपना स्वरूप बनाये बैठा था। तब किसी कर्कटने उसे देखा और पूछा—'यह क्या बात है ? तुम भूखे प्यासे यहाँ बैठे हो ?' बगु- लेने कहा—'मच्छ मेरे जीवनमूल हैं। उन्हें धीवर आ कर मारेंगे यह बात मैंने नगरके पास सुनी है। इसलिये जीविकाके न रहनेसे मेरा मरणही आ पहुँचा, यह जान कर मैंने भोजनमें भी अनादर कर रक्खा है।' फिर मच्छोंने सोचा-'इस समय तो यह उपकार करने वाला ही दीखता है इसलिये इसीसे जो कुछ करना है सो पूछना चाहिये । तथा चोक्तम्,— उपकर्त्राऽरिणा संधिर्न मित्रेणापकारिणा । उपकारापकारौ हि लक्ष्यं लक्षणमेतयोः' ॥ १४ ॥ जैसा कहा है कि—उपकारी शत्रुके साथ मेल करना चाहिये और अपकारी मित्रके साथ नहीं करना चाहिये, क्योंकि निश्चय करके उपकार और अपकार ही मित्र और शत्रुके लक्षण हैं ॥ १४ ॥ मत्स्या ऊचुः-‘भो बक ! कोऽत्र रक्षणोपायः ?' । बको ब्रूते— 'अस्ति रक्षणोपायो जलाशयान्तराश्रयणम् । तत्राहमेकैकशो युष्मान्नयामि।' मत्स्या आहुः—'एवमस्तु ।' ततोऽसौ बकस्तान्म- त्यानेकैकशो नीत्वा खादति ।' अनन्तरं कुलीरस्तमुवाच—'भो बक ! मामपि तत्र नय ।' ततो बकोऽप्यपूर्वकुलीरमांसार्थी

तत्स्थलमालोक्याचिन्तयत्—'हा हतोऽस्मि मन्दभाग्यः । भवतु,

-१५] मनोरूपराज्यमें आनंद माननेवालेकी निंदा २२५ सादरं तं नीत्वा स्थले धृतवान् । कुलीरोऽपि मत्स्यकण्टकाकीर्णं तत्स्थलमालोक्याचिन्तयत्—'हा हतोऽस्मि मन्दभाग्यः । भवतु, इदानीं समयोचितं व्यवहरिष्यामि' इत्यालोच्य कुलीरस्तस्य ग्रीवां चिच्छेद । स बकः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि—"भक्ष- यित्वा बहून्मत्स्यान्" इत्यादि ॥' ततश्चित्रवर्णोऽवदत्—'शृणु तावन्मन्त्रिन् ! मयैतदालोचितमस्ति ।' अत्रावस्थितेन मेघवर्णेन राज्ञा यावन्ति वस्तूनि कर्पूरद्वीपस्योत्तमानि तावन्त्यस्माकमुप- नेतव्यानि । तेनास्माभिर्महासुखेन विन्ध्याचले स्थातव्यम् ।' मच्छ बोले—'हे बगुले ! इसमें रक्षाका कौनसा उपाय है ? तब बगुला बोला— दूसरे सरोवरका आश्रय लेना ही रक्षाका उपाय है । वहाँ मैं एक एक करके तुम सबको पहुँचा देता हूँ।' मच्छ बोले—'अच्छा, ले चलो।' पीछे यह बगुला उन मच्छोंको एक एक ले जा कर खाने लगा । इससे पीछे कर्कट उससे बोला—'हे बगुले ! मुझे भी वहाँ ले चल ।' फिर अपूर्व कर्कटके मांसका लोभी बगुलेने आदरसे उसे भी वहाँ ले जा कर पटपड़में धरा । कर्कट भी मच्छोंकी हड्डियोंसे बिछे हुए उस पड़ावको देख कर चिन्ता करने लगा—'हाय मैं मन्दभागी मारा गया । जो कुछ हो, अब समयके अनुसार उचित काम करूँगा।' यह विचार कर कर्कटने उसकी नाइ काट डाली और वह बगुला मर गया । इसलिये मैं कहता हूँ "बहुतसे मच्छोंको खा कर" इत्यादि । फिर चित्रवर्ण बोला—'हे मंत्री ! सुनो, मैंने तो यही सोच रक्खा है । वहाँ बैठा हुआ राजा मेघवर्ण जितनी उत्तम वस्तुएँ कर्पूरद्वीपकी हैं उतनी हमारे पास भेटमें लावेगा । उससे हम विन्ध्याचलमें आनन्दसे रहेंगे ।' दूरदर्शी विहस्याह—'देव ! दूरदर्शी हँस कर बोला—'हे महाराज ! अनागतवतीं चिन्तां कृत्वा यस्तु प्रहृष्यति । स तिरस्कारमाप्नोति भग्नभाण्डो द्विजो यथा' ॥ १५ ॥ जो नहीं आई हुई चिंताको करके प्रसन्न होता है वह मट्टीके बर्तन फोड़ने वाले ब्राह्मणके समान अपमानको पाता है' ॥ १५ ॥ राजाह—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।— हि० १५

कथा ८

२२६ हितोपदेशः [ संधिः १५- कथा ८ [ देवशर्मा नामक ब्राह्मण और कुम्हारकी कहानी ८ ] 'अस्ति देवीकोटनाम्नि नगरे देवशर्मा नाम ब्राह्मणः । तेन महा- विषुवसंक्रान्त्यां सक्तुपूर्णशराव एकः प्राप्तः । तमादायासौ कुम्भ- कारस्य भाण्डपूर्णमण्डपैकदेशे रौद्रेणाकुलितः सुप्तः । ततः सक्तु- रक्षार्थं हस्ते दण्डमेकमादायाचिन्तयत्—'यद्यहं सक्तुशरावं विक्रीय दश कपर्दकान् प्राप्स्यामि तदाऽत्रैव तैः कपर्दकैर्घटशरावा- दिकमुपक्रीयानेकधावृद्धैस्तद्धनैः पुनः पुनः पूगवस्त्रादिकमुपक्रीय विक्रीय लक्षसंख्यानि धनानि कृत्वा विवाहचतुष्टयं करिष्यामि । अनन्तरं तासु सपत्नीषु रूपयौवनवती या तस्यामधिकानुरागं करिष्यामि । सपत्न्यो यदा द्वन्द्वं करिष्यन्ति तदा कोपाकुलोऽहं ता लगुडेन ताडयिष्यामि' इत्यभिधाय लगुडः क्षिप्तः । तेन सक्तु- शरावश्चूर्णितो भाण्डानि च बहूनि भग्नानि । ततस्तेन शब्देनाग- तेन कुम्भकारेण तथाविधानि भाण्डान्यवलोक्य ब्राह्मणस्तिरस्कृतो मण्डपाद्बहिःकृतश्च । अतोऽहं ब्रवीमि—"अनागतवतीं चिन्ताम्" इत्यादि ॥' ततो राजा रहसि गृध्रमुवाच—'तात ! यथा कर्तव्यं तथोपदिश ।' 'देवीकोट नाम एक नगरमें देवशर्मा नाम ब्राह्मण रहता था । उसने मेषकी संक्रान्ति पर सत्तूसे भरा एक सकोरा पाया । उसको ला कर वह कुम्हारके बर्त- नोंसे भरे हुए अवेकी एक ओर गरमीके कारण सो गया । फिर सत्तूकी रख- वालीके लिये हाथमें एक लकड़ी ला कर सोचने लगा कि-'जो मैं सत्तूके सकोरे- को बेच कर दस कौड़ी पाऊंगा तो यहाँ ही उन कौड़ियोंसे घड़े, सकोरे आदि मोल ले कर अनेक रीतिसे बढ़ाये हुए उस धनसे बार बार सुपारी कपड़े आदि मोल ले कर और बेच कर लाखों रुपयेका धन इकट्ठा करके चार विवाह करूँगा । फिर उन स्त्रियोंमें जो रूपरंगमें अच्छी होगी उसी पर अधिक स्नेह करूँगा, और सौतें जब लड़ाई करेंगी तब क्रोधसे उखता कर मैं उन्हें लकड़ीसे मारूँगा— यह कह कर लकड़ी फेंकी । उससे सत्तूका सकोरा चूर चूर हो गया और बहुतसे बर्तन भी फूट गये । फिर उस शब्दको सुन कुम्हार आया। उसने वैसे फूटे टूटे बर्तनोंको देख कर ब्राह्मणका तिरस्कार किया और अवेसे बाहर निकाल दिया ! इसलिये मैं कहता हूँ—"विना आई चिंताको" इत्यादि ।' फिर राजा एकांतमें गिद्धसे बोला-'प्यारे ! जो करना हो सो कहो ।

-१८ ] समयानुसार कथन २२७ गृध्रो ब्रूते, — 'मदोद्धतस्य नृपतेः संकीर्णस्येव दन्तिनः । गच्छन्त्युन्मार्गयातस्य नेतारः खलु वाच्यताम् ॥ १६ ॥ गृद्ध बोला-'कुमार्गमें जाने वाले अर्थात् अनुचित काम करने वाले अभिमानी राजाके मंत्री लोग, कुमार्गमें जाने वाले तथा मत्त वाले हाथीवानोंके समान, निश्चय करके निन्दाको पाते हैं ॥ १६ ॥ शृणु देव ! किमस्माभिर्बलदर्पाह्दुर्गं भग्नम् ? न; किंतु तव प्रतापाधिष्ठितेनोपायेन।' राजाह—'भवतामुपायेन।' गृध्रो ब्रूते— ‘यद्यस्मद्वचनं क्रियते तदा स्वदेशे गम्यताम् । अन्यथा वर्षाकाले प्राप्ते पुनर्विग्रहे सत्यस्माकं परभूमिष्ठानां स्वदेशगमनमपि दुर्लभं भविष्यति । सुखशोभार्थं संधाय गम्यताम् । दुर्गं भग्नं कीर्तिश्च लब्धैव । मम संमतं तावदेतत् । सुनिये महाराज ! क्या हमने बलके घमंडसे गढ़ तोड़ा है ? यह बात नहीं है । परन्तु आपके प्रतापसे निश्चित किये उपायसे तोड़ा है।' राजा बोला-'तुम्हारे उपायसे टूटा है।' गिद्ध बोला-'जो मेरा कहना मानो तो अपने देशमें चले चलो। नहीं तो वर्षा आने पर फिर लड़ाई होनेमें, पराई भूमिमें रहने वाले हम लोगोंका अपने देशको जाना भी कठिन होगा। इसलिये सुख और शोभाके लिये मेल करके चलिये, गढ़ टूट गया और यश भी मिला । मेरी तो यह राय है । यतः,— यो हि धर्मं पुरस्कृत्य हित्वा भर्तुः प्रियाऽप्रिये । अप्रियाण्याह तथ्यानि तेन राजा सहायवान् ॥ १७ ॥ क्योंकि—जो मनुष्य धर्मको आगे रख कर स्वामीके प्रिय और अप्रियको छोड़ कर अप्रिय भी सत्य कहता है उससे राजाको सहारा होता है, अर्थात् कटु भले हो, सच्चा और योग्य सलाह देने वालाही मंत्री राजाका सचमुच सहायकती होता है ॥ १७ ॥ अन्यच्च,— सुहृद्बलं तथा राज्यमात्मानं कीर्तिमेव च । युधि संदेहदोलास्थं को हि कुर्याद्बालिशः ? ॥ १८ ॥

२२८ हितोपदेशः [ संधिः १९ -

दूसरे-और कौनसा बुद्धिमान् मित्रकी सेनाको, राज्यको, अपनेको, और कीर्तिको संग्रामके संदेहरूपी हिंडोलेमें झुलावेगा अर्थात् संकटमें गिरा देगा ॥१८॥ अपरं च,— संधिमिच्छेत् समेनापि संदिग्धो विजयो युधि । सुन्दोपसुन्दावन्योन्यं नष्टौ तुल्यबलौ न किम् ?' ॥ १९ ॥ और समानके साथ भी मेल करनेकी इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि युद्धमें विजयका संदेह है । जैसे समान बल वाले सुन्द और उपसुन्द आपसमें क्या नष्ट नहीं हो गये ?' ॥ १९ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।—

कथा ९ सुन्द उपसुन्द नामक दो दैत्योंकी कहानी ९ ] 'पुरा दैत्यौ महोदारौ सुन्दोपसुन्दनामानौ महता क्लेशेन त्रैलो- क्यकामनया चिराच्चन्द्रशेखरमाराधितवन्तौ । ततस्तयोर्भगवान् परितुष्टः 'वरं वरयतम्' इत्युवाच । अनन्तरं तयोः समधिष्ठि- तया सरस्वत्या तावन्वद्वक्तुकामावन्यदभिहितवन्तौ । यद्यावयो- र्भगवान् परितुष्टस्तदा स्वप्रियां पार्वतीं परमेश्वरो ददातु । अथ भगवता क्रुद्धेन वरदानस्यावश्यकतया विचारमूढयोः पार्वती प्रदत्ता । ततस्तस्या रूपलावण्यलुब्धाभ्यां जगद्धातिभ्यां मनसो- त्सुकाभ्यां पापतिमिरान्यां ममेत्यन्योन्यकलहाभ्यां प्रमाणपुरुषः कश्चित् पृच्छ्यतामिति मतौ कृतायां स एव भट्टारको वृद्धद्विज- रूपः समागत्य तत्रोपस्थितः । अनन्तरम् 'आवाभ्यामीयं स्वबल- लब्धा, कस्येयमावयौर्भवति ?' इति ब्राह्मणमपृच्छताम् । 'पहले बड़े उदार सुन्द और उपसुन्द नाम दो दैत्योंने बड़े क्लेशसे तीनों लोककी इच्छासे बहुत काल तक महादेवजीकी आराधना की । फिर उन दोनों पर भगवान्ने प्रसन्न हो कर यह कहा कि “वर माँगो” । फिर हृदयमें स्थित सर- स्वतीकी प्रेरणासे वे दोनों, कहना तो कुछही चाहते थे और कुछका कुछ कह दिया कि जो हम दोनों पर भगवान् प्रसन्न हैं तो परमेश्वर अपनी प्रिया पार्वती-